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एकाधिकार की ओर भाजपा!

भाजपा के सांगठनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया में हुए व्यापक फेरबदल चर्चा में है। संसदीय बोर्ड से नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान जैसे वरिष्‍ठ नेताओं को बाहर करने के साथ ही महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल आदि कई राज्यों में महत्त्वपूर्ण बदलाव हुए। इसे साल 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र संगठनात्मक मुद्दों एवं उभरती राजनीतिक चुनौतियों से निपटने तथा सामाजिक और क्षेत्रीय रूप से अधिक समावेशी बनाने की कार्ययोजना बताया जा रहा है। हालाँकि इसके गहरे परोक्ष निहितार्थ हैं। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है- ‘प्रारम्भ में पदाधिकारियों का चयन आंतरिक चुनाव से होता था। लेकिन आज हर पद पर चयन हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुमति आवश्यक है। स्वामी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और सरकार से नाराज़गी छुपी नहीं है। फिर भी उनका बयान अन्यथा नहीं लिया जा सकता।’

सन् 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के चार मुख्य दावेदार- नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह एक तरह से पार्टी में विभिन्न शक्ति-केंद्र थे। हालाँकि इनमें पूँजीपतियों के साथ और प्रचार के माध्यम से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निर्विवाद रूप से सर्वाधिक हो चली थी। लेकिन तब भी असुरक्षा तो बनी ही थी। केंद्र की सत्ता में आने के बाद सुषमा स्वराज के स्वर्गवास, जनाधार विहीन राजनाथ सिंह के ख़ामोश हो जाने के बाद मोदी को चुनौती देने वाले एकमात्र नितिन गडकरी ही थे। सन् 2019 आते-आते यह चुनौती भी लगभग समाप्त हो गयी। हालाँकि गडकरी के पास वृहत् जनाधार है। पार्टी काडर में उनका सम्मान है। उन्हें संघ का भी पूर्ण समर्थन रहा है। केंद्रीय मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली प्रभावित करती है, जिसके प्रशंसक विपक्षी नेता भी हैं। उन्होंने अपने व्यक्तित्व को मोदी सरकार के आभामंडल में विलीन नहीं होने दिया; बल्कि उनके बेबाक बयानों एवं समालोचना से मोदी सरकार को कई बार रक्षात्मक होना पड़ा है। मोदी की अब तक की राजनीतिक यात्रा को क़रीब से देखने वाले जानते हैं कि वह अपने समक्ष कोई चुनौती बर्दाश्त नहीं करते, और न ही अपने विरोधियों को माफ़ करते हैं। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव संजय जोशी का हश्र इसका बेहतरीन उदाहरण है। सन् 2012 में उनको संगठन से बाहर करवाने के लिए नरेंद्र मोदी ने जैसा अमर्यादित आचरण दिखाया था, उस समय उसे लेकर मोहन भागवत, एम.जी. वैद्य जैसे संघ के पदाधिकारियों से लेकर राजनाथ सिंह, सुशील मोदी आदि भाजपा नेताओं ने भी आपत्ति ज़ाहिर की थी। अत: गडकरी को हाशिये पर धकेलने की कोशिशों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यही स्थिति शिवराज चौहान, योगी आदित्यनाथ की है। इनकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी के बरअक्स कम नहीं रही है। दोनों ने ही मुख्यमंत्री के रूप में अपनी विशिष्ट कार्यशैली से सम्मान अर्जित किया है। दोनों की छवि बेदाग़ बतायी जाती है। भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्रियों में मात्र शिवराज और योगी ही ऐसे हैं, जो मोदी-शाह की अनुकम्पा के बजाय अपनी क़ाबिलियत एवं व्यापक जनाधार के बलबूते सत्ता में हैं। इन्हें अनदेखा करना अभी भी मोदी-शाह के लिए दुष्कर है। अत: इनके समक्ष प्रतिपक्ष खड़ा करके इनका मार्ग बाधित करने का प्रयास हो रहा है। बताते चलें कि सन् 2014 में लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री पद के लिए जो नाम सुझाये थे, उनमें शिवराज चौहान भी थे। अत: उनका शीर्ष नेतृत्व के निशाने पर होना अचरज की बात नहीं है। इसी प्रकार बहुत-से आम जनमानस योगी आदित्यनाथ को 2024 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देख रहे हैं।

मध्य प्रदेश में सत्यनारायण जटिया विकल्प बने हैं, जिनके नरेंद्र मोदी से मधुर सम्बन्ध हैं। आश्चर्यजनक है, जटिया एक लम्बे समय से सक्रिय राजनीतिक धारा में उपेक्षित थे। उनकी 76 वर्ष की आयु भी नयी ज़िम्मेदारी का समर्थन नहीं करती। यह आयु तो मार्गदर्शक मण्डल के लिए निर्धारित थी। फिर भी केंद्रीय नेतृत्व उन्हें आगे ला रहा है, तो अवश्य इसका विशेष आधार होगा। वहीं उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में ऐसे नेता शामिल किये गये, जो पूरे कोरोना-काल में योगी को हटाने की मुहिम चलाते रहे थे। उत्तर प्रदेश में समानांतर सत्ता संचालनकर्ता संगठन महासचिव सुनील बंसल, जिनके योगी से मतभेद जगज़ाहिर हैं; उन्हें तेलंगाना, बंगाल और ओडिशा का प्रभारी बनाकर शीर्ष नेतृत्व ने अपने प्रति वफ़ादारी को तरजीह देने का सन्देश पार्टी काडर को दिया है। भूपेंद्र चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा की कमान सौंपने के पीछे बड़ा कारण उनका अमित शाह का विश्वस्त होना है।

मार्गदर्शक मण्डल की व्यवस्था भी निष्कंटक एकाधिकार स्थापना के छद्म उपायों में शामिल है, जिसके अंतर्गत 70-75 साल की आयु पूरी कर चुके नेताओं को चुनावी राजनीति एवं सरकार में भागीदारी से हटाकर मार्गदर्शक मण्डल भेजने की नयी परम्परा स्थापित हुई। इसके माध्यम से लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार जैसे वरिष्ठ नेताओं से पीछा छुड़ाया गया। इसके नियम भी केंद्रीय नेतृत्व के अनुकूल परिवर्तित होते रहे हैं। उस आयु सीमा पर पहुँच चुके मोदी अब तक सत्ता त्यागने की मन:स्थिति में नहीं दिख रहे हैं।

वर्तमान में प्रचलित एकाकी निर्णयन की प्रथा भाजपा के अब तक के इतिहास में कभी भी नहीं रहीं है। उदाहरणस्वरूप सन् 2002 के गुजरात दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक वर्ग द्वारा नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के निर्णय के बावजूद वह अपने पद पर बने रहे; क्योंकि आडवाणी के नेतृत्व में दूसरा वर्ग इसका विरोधी था। तात्पर्य यह है कि भाजपा का नेतृत्व कभी भी एकध्रुवीय नहीं रहा है। यहाँ तक कि किसी विषय पर असहमत होने पर भाजपा नेता कई बार सार्वजनिक रूप से भी अपनी नाराज़गी व्यक्त करते थे। किन्तु वर्तमान परिस्थिति यह है कि केंद्रीय नेतृत्व से असहमति जताने वालों को केंद्र या राज्य सरकारों में तो छोडि़ए, पार्टी में रहना कठिन है।

यह एकाकी नेतृत्व रणनीतिक रूप से स्थापित हुआ। सन् 2014 की पहली पारी में मोदी के विश्वासपात्रों को संगठन के महत्त्वपूर्ण पदों पर फिट किया जाने लगा। जैसे अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बना दिये गये। दूसरे कार्यकाल तक जनाधार वाले नेताओं को हाशिये पर धकेला जाने लगा, जैसे सुमित्रा महाजन, मुरली मनोहर जोशी, हुकुमदेव नारायण, करिया मुंडा, बैस, कोश्यारी आदि। साथ ही ऐसे लोग पार्टी एवं सरकार में भर्ती किये गये, जिनका जनाधार तो छोडि़ए, आम जनता नाम तक नहीं जानती।

असल में इस समय भाजपा में यस मैन की माँग सर्वाधिक है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में एस. जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, हरदीप पुरी, आर.के. सिंह जैसे भूतपूर्व नौकरशाह भरे हैं। अनायास ही नहीं पार्टी में नौकरशाहों को प्राथमिकता मिलने लगी है, जिन्हें न लोकतांत्रिक आन्दोलनों के संघर्ष की समझ है और न ज़मीनी मुद्दों से उनका कोई जुड़ाव है। इन आयातित जनप्रतिनिधियों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि राजनीतिक सत्ता द्वारा स्थापित अपने वजूद की वास्तविकता को ये भलीभाँति जानते हैं।

सत्ता की जी-हुज़ूरी का हुनर इनमें विशेष गुण होता है। मोदी-शाह जैसे नेताओं के विरोध की क्षमता इनमें नहीं है। बग़ैर जनाधार के लोकसभा-विधानसभाओं एवं विभिन्न मंत्रालयों में घुस चुके इन भूतपूर्व नौकरशाहों को पता हैं कि उनकी कुर्सी मोदी-शाह की कृपा का प्रतिफल है। अत: ये कभी भी सत्तासीन नेतृत्व के समक्ष संकट बन भी नहीं सकते, बल्कि इनका पूरा ज़ोर अपनी संरक्षक सत्ता को सुरक्षित करने पर होता है। आश्चर्य है कि लोकतंत्र की उन्नति एवं विकास के मानक स्थापित करने के लिए जनप्रतिनिधि के तौर पर उस नौकरशाही को थोपा जा रहा है, जो इस लोकतंत्र की दुरावस्था के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी हैं। ये मूल रूप से उसी प्रशासनिक व्यवस्था के नुमाइंदे हैं, जिन्हें इस देश में कार्य अक्षमता, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही तथा आम जनता के प्रति निकृष्ट व्यवहार के लिए जाना जाता है। हर लोकसभा या विधानसभा चुनाव में जनता मतदान द्वारा जब सरकारें बदलती हैं, तो उसका ध्येय किसी दलीय सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक रवैये में बदलाव होता है। आज उसी अभिकरण के सदस्य पिछले दरवाज़े से भारतीय जनतंत्र पर लादे जा रहे हैं।

इसी सन्दर्भ में भाजपा के कार्यक्रमों पर ध्यान दीजिए। पहले की तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी की नज़र आने वाली तस्वीरें दुर्लभ हो चुकी हैं, बल्कि अब तो सब कुछ मोदीमय नज़र आने लगा है। भाजपा नेताओं के बातचीत के तरीक़े अब कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों के नेताओं की वाक्-शैली से होड़ कर रही है, जिसमें वे सिर्फ़ अपने पार्टी नेतृत्व का महिमामंडन करने में लगे रहते थे। अर्थात् जो कुछ अच्छा है, वो हमारे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की देन है; और कुछ बुरा हुआ, तो दोषारोपण के लिए पार्टी के दूसरे नेता एवं नौकरशाही तो हैं ही। यह भाजपा में चाटुकारिता की नयी परम्परा की शुरुआत है। पार्टी के आंतरिक विषय के लिए तो यह ठीक हो सकता है; लेकिन एक लोकतांत्रिक सरकार के नज़रिये से सर्वथा अनुचित है। जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने व्यक्ति पूजन की भावना के विरुद्ध कभी चेतावनी दी थी।

पार्टी विद् डिफरेंस की वर्तमान हालत धीरे-धीरे कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों की भाँति होती जा रही है; क्योंकि इसमें आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। जहाँ पद पाने की एकमात्र योग्यता शीर्ष नेतृत्व का यस मैन होना है। वरना क्या वजह थी कि उच्च शिक्षित एवं अनुभवी नेताओं के होते हुए भी मानव संसाधन मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों को इंटरमीडियट पास स्मृति ईरानी को सौंप दिया गया? इसी तरह गृह राज्य मंत्रालय अजय मिश्र को दिया गया, जो गम्भीर क़िस्म के आपराधिक मामलों के आरोपी हैं। संघ, जो अब तक भाजपा नेताओं की नकेल कसता रहा है; बहुत हद तक मोदी के समक्ष बेबस नज़र आ रहा है।
भाजपा की स्थापना के पश्चात् ऐसा पहली बार हो रहा है कि पार्टी विशुद्ध रूप से एकाधिकार की ओर बढ़ चुकी है। अब मोदी और शाह की मंशा क्या है? यह तो ईश्वर जाने। परन्तु इतिहास की सीख है कि किसी व्यक्तित्व को दल से बड़ा एवं राष्ट्र के समानांतर खड़ा करने का प्रयास लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। भारत ऐसी ही कोशिशों का दुष्परिणाम 80 के दशक में भुगत चुका है। अब एक बार फिर उससे भी ख़राब मुहाने पर खड़ा है।
(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। यह उनका अपना विचार है।)

आख़िर नाराज़ क्यों हैं गडकरी और चौहान?

भाजपा संसदीय बोर्ड से बाहर किये जाने से मायूस हैं दोनों दिग्गज

भाजपा संसदीय बोर्ड से हटाये जाने के क़रीब एक हफ़्ते बाद आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में लक्ष्मणराव मानकर स्मृति संस्था के एक कार्यक्रम में वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भाजपा के सत्ता में आने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और दीनदयाल उपाध्याय के कार्यों को दिया। साथ ही यह भी कहा कि देश निर्माण की सोचने वाला सामाजिक-आर्थिक सुधारक एक सदी से दूसरी सदी तक की सोचता है, जबकि नेता अगले चुनाव की सोचता है। उन्होंने अपने पूर्व राज्य में मंत्री पद के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बताया कि वह मंत्री पद की परवाह नहीं करते। क्योंकि वह ज़मीनी आदमी हैं। गडकरी के शब्दों से उनकी नाराज़गी उजागर होती है। गडकरी के अलावा भाजपा की सर्वोच्च और सबसे ताक़तवर संस्था संसदीय बोर्ड से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी हाल में बाहर कर दिया गया था और कुछ हलक़ों में इसे इस दृष्टि से देखा गया कि क्योंकि यह दोनों नेता ‘भविष्य में भाजपा नेतृत्व के लिए चुनौती’ बन सकते थे, उनके पर कतर दिये गये।

राजनीतिक हलक़ों में भाजपा के भीतर तनाव की ख़बरें भले कांग्रेस जैसी न हों, फिर भी इक्का-दुक्का बाहर आती रहती हैं। गडकरी को मोदी सरकार में सबसे बेहतर काम करने वाले मंत्रियों में गिना जाता है। हालाँकि उनकी छवि प्रधानमंत्री मोदी भक्त की कभी नहीं रही, बल्कि वे नागपुर (आरएसएस) के प्रतिनधि माने जाते हैं। भाजपा के कामयाब अध्यक्ष रहे हैं और भाजपा में उनका क़द तीन बड़े नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टक्कर का है। ऐसे में उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड से बाहर करने के बाद राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चा है कि वह इससे प्रसन्न नहीं हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाते रहे हैं। भले पार्टी में नेतृत्व को लेकर विरोधी सुर खुले रूप से भाजपा के भीतर नहीं सुनने को मिलते हैं। लेकिन यह माना जाता है कि पार्टी में कुछ ऐसे नेता हैं, जो भाजपा के भीतर लोकतंत्र कमज़ोर होने की बात ढके-छिपे स्वर में कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि भाजपा दो प्रमुख लोगों के ही इर्द-गिर्द सिमट गयी है। यही स्थिति इंदिरा गाँधी के ज़माने में कांग्रेस में थी, जब राज्यों के क़द्दावर नेताओं के पर कतर दिये जाते थे, ताकि वे नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोलने की जुर्रत न करें। नेतृत्व की इसी नीति ने कांग्रेस को ज़मीन पर कमज़ोर कर दिया।

भाजपा की दो बड़ी समितियों में यह फेरबदल सिर्फ़ भविष्य की राजनीति को लक्ष्य में रखकर किया गया फेरबदल भर नहीं है। होता, तो 79 साल के येदियुरप्पा दोनों समितियों में जगह नहीं पाते। इस लिहाज़ से शिवराज सिंह चौहान अभी महज़ 63 साल के हैं, जबकि नितिन गडकरी 65 साल के। राजनीति में यह कोई ज़्यादा उम्र नहीं मानी जाती। लिहाज़ा उम्र का तक़ाज़ा भी यहाँ लागू नहीं होता; क्योंकि यह दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (71 वर्ष) की उम्र से भी कम के नेता हैं। ऐसे में गडकरी और चौहान को संसदीय बोर्ड से बाहर करने पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा होना स्वाभाविक है।

भाजपा के कुछ नेताओं ने इस फेरबदल को पार्टी की आने वाले चुनाव में उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से लेकर उत्तर पूर्व की राजनीति को साधने की रणनीति बताया है। लेकिन यहाँ यह ग़ौर करने वाली बात यह है कि गडकरी को बाहर करके उनके राज्य महाराष्ट्र से जिन देवेंद्र फडणवीस को चुनाव समिति में जगह दी गयी है, उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा की राजनीति में गडकरी का कट्टर विरोधी माना जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या गडकरी को निशाना बनाया गया है, ताकि भाजपा में उनका क़द छोटा किया जा सके?

यह सही है कि पार्टी नेतृत्व ने नये संसदीय बोर्ड में पार्टी में लम्बे समय से योगदान दे रहे नेताओं को जगह दी है। लेकिन चूँकि बाहर ऐसे दो नेताओं को किया गया है, जिन्हें मोदी-शाह के नेतृत्व के लिए चुनौती माना जाता है; तो यह पूछा जा रहा है कि ये दोनों ही क्यों बाहर किये गये, अन्य (और कोई) क्यों नहीं? सभी जानते हैं कि संसदीय बोर्ड में कर्नाटक के जिन पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को शामिल किया गया है, जबकि उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। उनकी उम्र भी 79 साल है। अभी भी न्यायालय में उनके ख़िलाफ़ कई मामले रहे हैं, जिनमें भूमि के कुछ हिस्से को ग़ैर-अधिसूचित करने और उद्योगपतियों को आवंटित करने के आरोप वाला मामला भी है। माना जाता है कि येदियुरप्पा दक्षिण में अपना क़िला खड़ा करने की भाजपा की क़वायद का एक हिस्सा हैं। भाजपा ने येदियुरप्पा को बहुत ख़राब तरीक़े से मुख्यमंत्री पद से हटाया था और उसे डर है कि इससे पार्टी को नुक़सान होगा। लिहाज़ा येदियुरप्पा तमाम विरोधाभासों के बावजूद बड़ी कश्ती पर सवार किये गये हैं।
देखना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक में उनका मज़बूत लिंगायत समुदाय इसे कैसे लेता है? येदियुरप्पा किसी भी दक्षिण भारत राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री बनने वाले पहले नेता रहे हैं। वैसे एक और नेता पार्टी का इकलौता मुस्लिम चेहरा शहनवाज़ हुसैन ने पार्टी के लिए लगातार काम किया है; लेकिन अब चुनाव समिति से बाहर हो गये हैं। वाजपेयी के ज़माने में तेज़ी से भाजपा में उभरे शहनवाज़ का राजनीतिक करियर फ़िलहाल भँवर में लगता है। क्योंकि बिहार में हाल में नीतीश कुमार की पलटी के बाद मंत्री पद भी उनके हाथ से निकल गया था।

भाजपा की रणनीति
दक्षिण भारत पर भाजपा की कसरत का आभास संसदीय बोर्ड में के. लक्ष्मण को लेने से भी होता है। दरअसल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भाजपा ख़ुद को मज़बूती करना चाहती है। आरएसएस के आक्रामक नीतिकार की छवि रखने वाले बी.एल. संतोष भी दक्षिण भारत में भाजपा के प्रभारी रहे हैं और वहाँ की नब्ज़ पहचानते हैं। नये संसदीय बोर्ड में भाजपा नेतृत्व ने दक्षिण और उत्तर पूर्व पर ख़ास नज़र रखी है। संसदीय बोर्ड में सुधा यादव के लेना अर्धसैनिक बलों को ध्यान में रखने के लिए है। क्योंकि उनके पति बीएसएफ में थे, जो कारगिल ऑपरेशन में शहीद हो गये थे। यह माना जाता है कि सिख भाजपा से नाराज़ हैं। लिहाज़ा उन्हें साधने की दृष्टि से वरिष्ठ सदस्य इकबाल सिंह लालपुरा को संसदीय बोर्ड में जगह दी गयी है।

फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में सिख बहुल पंजाब में भाजपा महज़ दो सीटों पर सिमट गयी थी। हालाँकि लालपुरा कोई ऐसा चेहरा नहीं, जो पार्टी को पंजाब में पुनर्जीवित कर सकें। दूसरे किसान अभी भी भाजपा से सख़्त नाराज़ हैं और नये सिरे से आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं। सत्यनारायण जटिया, के. लक्ष्मण, सर्बानंद सोनोवाल, बी.एस. येदियुरप्पा और इकबाल सिंह लालपुरा को संसदीय बोर्ड में जगह मिलना इस बात का सन्देश देने की कोशिश है कि भाजपा उन लोगों का सम्मान करेगी, जो उसके वफ़ादार रहते हैं। कुछ युवा चेहरों पर भी भरोसा किया गया है। हालाँकि बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि क्या गडकरी और चौहान का कोई योगदान नहीं था? जो उन्हें संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से बाहर कर दिया गया। कम-से-कम गडकरी और चौहान के दिल में तो यह कसक है, जो उनकी बातों से झलकती भी है।
राके
महाराष्ट्र में हाल के घटनाक्रम से लगता था कि पार्टी में देवेंद्र फडणवीस क़द घटा है। उन्हें शिंदे जैसे नेता से नीचे उप मुख्यमंत्री का पद देने से यह सोच पुख़्ता हुई थी। हालाँकि उन्हें गडकरी पर तरजीह देकर चुनाव समिति में शामिल किया गया है। चुनाव समिति में भूपेंद्र यादव भी लिये गये हैं, जो अमित शाह के बेहद क़रीबी माने जाते हैं। उनके अलावा राजस्थान के ओम माथुर भी हैं, जहाँ विधानसभा चुनाव जल्द ही होने हैं। चुनाव समिति में चार स्थान अभी ख़ाली हैं। लिहाज़ा कुछ और नाम अगले महीनों में जुड़ सकते हैं।

एक विधायक, एक पेंशन; पंजाब सरकार का मास्टरस्ट्रोक

पूर्व विधायकों को मिलेगी एक ही कार्यकाल की पेंशन, भले ही कितनी भी बार रहे हों विधायक

मासिक पेंशन मिलेगी 60,000 रुपये और राज्य के पेंशनर्स की तर्ज पर ही मिलेगा महँगाई भत्ता

पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने एक विधायक, एक पेंशन क़ानून लागू कर दिया है। राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने लगभग 42 दिन बाद इस सम्बन्ध में राज्य सरकार के गत विधानसभा सत्र में पारित ‘पंजाब राज्य विधानमंडल सदस्य (पेंशन और चिकित्सा सुविधाएँ नियमन) संशोधन विधेयक-2022 को मंज़ूरी प्रदान कर दी है। इस सम्बन्ध में बीती 11 अगस्त को गजट अधिसूचना जारी होने के साथ ही पेंशन संशोधन राज्य में अधिनियम के रूप में तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।

अधिनियम में नयी पेंशन की गणना के तहत राज्य में अब किसी भी पूर्व विधायक को एक ही कार्यकाल की पेंशन मिलेगी, भले ही वह कितनी ही बार निर्वाचित हुआ है। यह पेंशन 60,000 रुपये मासिक होगी और इस पर राज्य सरकार के पेंशनर्स को देय महँगाई भत्ते की दर भी लागू होगी। अधिनियम में पेंशन वृद्धि का भी प्रावधान किया गया है। किसी भी पूर्व विधायक की 65, 75 और 80 वर्ष उम्र होने पर उसकी मासिक पेंशन में क्रमश: पाँच, 10 और 15 फ़ीसदी की वृद्धि होगी।

विदित हो कि पहले प्रत्येक पूर्व विधायक को उसके हर कार्यकाल के लिए पेंशन मिलती थी। उसमें हर वर्ष वृद्धि भी होती रहती थी। ऐसे में कुछ विधायकों की पेंशन पाँच से छ: लाख रुपये तक पहुँच चुकी थी। सरकार ने पेंशन में बदलाव को लेकर विधानसभा में विधेयक लाने से पहले गत 2 मई की मंत्रिमंडल की बैठक में पंजाब राज्य विधानसभा सदस्य पेंशन और चिकित्सा सुविधाएँ विनियमन) अधिनियम-1977 में संशोधन के प्रस्ताव को मंज़ूरी देकर इसे अध्यादेश के माध्यम से लागू करने का प्रयास किया था। यह प्रस्ताव मंज़ूरी के लिए राज्यपाल को भेजा गया; लेकिन वहाँ से इसे जल्द प्रस्तावित विधानसभा सत्र में संशोधन विधेयक के रूप में लाने का सुझाव दिया गया। इस पर सरकार ने गत विधानसभा सत्र में पेंशन संशोधन विधेयक पेश किया और इसे उसी दिन पारित कर मंज़ूरी के लिए राज्यपाल को भेज दिया था।

राज्य की आम आदमी पार्टी की सरकार के एक विधायक-एक पेंशन को एक बड़ा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। देश में यह अपनी तरह का एक बड़ा और ऐतिहासिक फ़ैसला है, जिससे सरकारी और जनता के पैसे की राजनेताओं की मौज़ पर लगाम लगी है। यह फ़ैसला न केवल सराहनीय है, बल्कि जनता को भी रास आ रहा है। आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों से पूर्व ही जनता किये गये वादों में यह ऐलान किया था कि अगर वह सत्ता में आती है, तो वह ‘एक विधायक, एक पेंशन’ योजना लेकर आएगी।

राज्य सरकार का यह फ़ैसला जनभावनाओं के इसलिए भी अनुरूप है; क्योंकि उसमें राजनेताओं को सरकारी ख़ज़ाने से मिल रही अनाप-शनाप सहूलियतों, राज्य सरकारों द्वारा जनता की गाढ़ी कमायी के पैसे के दुरुपयोग और मूलभूत जनसुविधाओं की उपेक्षा के प्रति विरोध और रोष झलकता है।

पेंशन में बदलाव के फ़ैसले को राज्य की ख़स्ता हालत सुधारने तथा वित्तीय प्रबंधन, नियोजन और नियंत्रण बेहतर बनाने के एक ठोस क़दम के रूप में देखा जा रहा है। राज्य सरकार अपने इस फ़ैसले के माध्यम से अपनी कार्यप्रणाली को लेकर एक अहम संदेश जनमानस में देने में भी काफ़ी हद तक सफल रही है।

आम आदमी पार्टी ने पंजाब में उसकी सरकार के इस क़दम से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस समेत उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक नज़ीर और नसीहत पेश करते हुए इनसे उनके शासित राज्यों में इस फ़ैसले को अपने यहाँ लागू करने की बड़ी चुनौती दे डाली है। सोशल मीडिया समेत अन्य संचार माध्यमों पर भी इन दलों पर इसी तरह का फ़ैसला लेने की माँग उठ रही है। देश के तीन राज्यों गुज़रात, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष के अन्त तक विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी ने ‘एक विधायक, एक पेंशन’ को राजनीतिक मुद्दे में तब्दील करके अपनी चुनावी रणनीति को अन्तिम रूप देने के साथ-साथ विरोधी दलों को कड़ी टक्कर देने के संकेत दिये हैं।

बहरहाल पंजाब सरकार के इस फ़ैसले से अनेक पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों की जेब ख़ासी हल्की होने जा रही है, जो एक से अधिक यानी छ: पेंशन्स तक ले रहे थे। इनमें तीन पूर्व विधायक छ:-छ:, दो पूर्व विधायक पाँच-पाँच, 12 पूर्व विधायक चार-चार, 39 पूर्व विधायक तीन-तीन, 56 पूर्व विधायक दो-दो तथा 127 पूर्व विधायक एक कार्यकाल की पेंशन ले रहे थे। यानी 112 पूर्व विधायक ऐसे हैं, जो एक से अधिक पेंशन ले रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, रजिंदर कौर भट्ठल और कैप्टन अमरिंदर सिंह सबसे ज़्यादा कार्यकाल की पेंशन्स लेने वालों में शामिल हैं। बताया जाता है कि इनकी मासिक पेंशन पाँच लाख रुपये से ऊपर है।

बलविंदर सिंह भुंदड़, सरवन सिंह फिल्लौर, आदेश प्रताप सिंह कैरों, गोविंदर सिंह लौंगोवाल, गुलजार सिंह राणिके, मदन मोहन मित्तल, रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रतन सिंह अजनाला, सुखदेव सिंह ढींडसा, अजीत इंदर सिंह मोफर, सुनील जाखड़, अश्विनी सेखड़ी, तीक्ष्ण सूद, सुरजीत सिंह ज्याणी, चुन्नीलाल भगत, जनमेजा सिंह सेखों, लक्ष्मीकांता चावला, मोहिंदर कौर जोश, बीबी जागीर कौर, मनोरंजन कालिया और मनतार सिंह बराड़ एक से अधिक पेंशन्स लेने वाले पूर्व विधायकों में शामिल रहे हैं। राज्य में ऐसे भी अनेक नेता हैं, जिन्हें विधायक के अलावा लोकसभा और राज्यसभा सदस्यता की भी पेंशन मिल रही थी।

प्रदेश के मुख्यमंत्री भगवंत मान का एक विधायक, एक पेंशन विधेयक को मंज़ूरी मिलने पर कहना है कि इससे जनता की गाढ़ी कमायी और करदाताओं के पैसे की बचत होगी। उन्होंने ट्वीट किया कि सरकार के राज्य की अर्थ-व्यवस्था में सुधार की दिशा में इस अहम फ़ैसले से बहु-पेंशन के रूप में जा रहा बड़ा पैसा बचेगा, जिसे जनता के कल्याण पर ख़र्च किया जाएगा। एक बयान में उन्होंने विधायकों को एक तरह से नसीहत देते हुए कहा कि वे अपनी इच्छानुसार राजनीति में आये हैं। ऐसे में उनका पेंशन पर हक़ कैसे बनता है? उनके अनुसार, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय नायकों ने ऐसे लोकतंत्र की परिकल्पना की थी, जहाँ निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के कल्याणार्थ लोक सेवक के रूप में काम करेंगे। अफ़सोस है कि गत लगभग 75 वर्षों में इन नेताओं ने सरकारी ख़ज़ाने से मोटा वेतन और पेंशन ली; जिसके लिए आम जनता और करदाताओं को निचोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि यह पैसा जनता की भलाई और विकास पर ख़र्च होना चाहिए था।

वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के अनुसार, राज्य में 100 से अधिक पूर्व विधायक हैं, जो एक से अधिक पेंशन्स ले रहे हैं, जिससे राज्य के ख़ज़ाने पर बड़ा बोझ पड़ रहा है। सरकार इस बोझ को कम करने का प्रयास कर रही है। राज्य में वर्तमान विधायक को 25,000 रुपये और मंत्री को 50,000 रुपये वेतन मिलता है। लेकिन बैठक, यातायात समेत सभी भत्ते जोड़ दिये जाएँ, तो एक विधायक और मंत्री लगभग एक लाख रुपये महीना तक लेता है। उनका कहना है कि राजनेता अगर सेवा भाव से राजनीति में आते हैं, तो एक पेशन से भी उनका गुज़ारा चल सकता है। सरकार के इस फ़ैसले से ख़ज़ाने के हर वर्ष लगभग 20 करोड़ रुपये और पाँच साल में 100 करोड़ रुपये बचेंगे।
अब आम आदमी पार्टी का फ़ैसला वास्तव में क्या मास्टरस्ट्रोक साबित होता है? और आने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फ़ायदे की कसौटी पर यह कितना खरा उतरेगा? यह तो वक़्त ही बताएगा। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों के कामकाज को स्वीकारने अथवा नकारने को लेकर मत (वोट) के माध्यम से अपनी मुहर लगाने का अधिकार केवल और केवल जनता को ही हासिल है।

बाग़ी ग़ुलाम

आज़ाद के जाने से कांग्रेस को झटका, पर पार्टी गाँधी परिवार के साथ

ग़ुलाम नबी आज़ाद के रूप में कांग्रेस से एक और दिग्गज की विदाई हो गयी। वह भी ऐसे समय में, जब पार्टी आठ साल की चोटों के बाद ख़ुद को खड़ा करने के लिए महँगाई और बेरोज़गारी जैसे बड़े जन मुद्दों के साथ देशव्यापी अभियान शुरू करने जा रही है। आज़ाद के जाने से कांग्रेस पर असर और नये अध्यक्ष की सम्भावनाओं पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

राज्यसभा का रास्ता बन्द होते ही बग़ावती हो गये, वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद डेढ़ साल के भीतर कांग्रेस से पाँच दशक का नाता तोडक़र अलग रास्ते पर चले गये। पिछले साल राज्यसभा से उनकी विदाई के मौक़े पर उनकी सेवाओं को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भावुक हो गये थे और उनकी आँखों में आँसू भी दिखे थे। कांग्रेस में बहुत-से लोगों को लगता है कि आज़ाद इन्हीं आँसुओं में बह गये। आज़ाद का कांग्रेस में इतिहास देखें, तो उसमें भी वे हमेशा पार्टी की शीर्ष सत्ता के साथ रहे। इंदिरा और राजीव गाँधी से लेकर नरसिंह राव, सीताराम केसरी और सोनिया गाँधी तक। आठ साल से सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस जब कमज़ोर दिख रही है, तब इसे मज़बूत करने के दावे करने वाले आज़ाद अपनी ज़मान मज़बूत करने के लिए कांग्रेस से बाहर निकल गये हैं।

उनके साथ और कितने नेता आने वाले दिनों में कांग्रेस से बाहर जाएँगे, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इसकी बहुत ज़्यादा सम्भावना नहीं दिखती। आनंद शर्मा और मनीष तिवारी जैसे नेता हैं, जिनके सुर बाग़ी हैं। लेकिन दोनों भाजपा के कट्टर विरोधी हैं; ख़ासकर आनंद शर्मा। कहते हैं एक बार आज़ाद को जम्मू-कश्मीर से राज्य सभा चुनाव जीतने देने के लिए भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने उनकी सिर्फ़ इसलिए गुपचुप मदद की थी और अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हरवा दिया था, ताकि आनंद शर्मा राज्यसभा में कांग्रेस के नेता न बनने पाएँ। जेटली मानते थे कि आनंद कट्टर भाजपा विरोधी हैं। लिहाज़ा आज़ाद जीतकर नेता बनते हैं, तो भाजपा को वह ज़्यादा सुहाता है। इतने बड़े नेता के कांग्रेस छोडऩे से पार्टी को नुक़सान तो हुआ है। लेकिन इसकी कांग्रेस की चुनावी सम्भावना पर शायद ही असर पड़े, क्योंकि 50 साल तक आज़ाद कांग्रेस आलाकमान से नज़दीकियों के बूते राज्य सभा में ही ज़्यादा रहे। उनके कांग्रेस से बाहर जाने से लोगों को इतनी हैरानी नहीं हुई, जितनी उनकी उस चिट्ठी की भाषा से हुई, जो उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा देते हुए अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखी। आज़ाद को नज़दीक से जानने वाले जानते हैं कि वह अपनी भाषा का बहुत ख़याल रखने वाले नेता हैं। पार्टी के नेताओं के मुताबिक, चिट्ठी में राहुल गाँधी के प्रति उनकी भाषा को ज़्यादातर नेताओं ने पसन्द नहीं किया है।

सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर इस संवाददाता से कहा- ‘ऐसा लगता है पत्र में लिखी भाषा किसी और की है। राहुल गाँधी को निशाने पर रखने के लिए जैसी भाषा उन्होंने लिखी है, वह उन जैसे वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देती। उनके पत्र ने कांग्रेस में राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने वालों का इरादा और पक्का कर दिया है।’

कांग्रेस को यह नुक़सान ज़रूर हुआ है कि हाल के वर्षों में उसके ऐसे नेता पार्टी छोडक़र चले गये, जो खाँटी कांग्रेसी माने जाते थे। आज़ाद के बारे में दो साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह कांग्रेस को छोडऩे की सोच भी सकते हैं। लेकिन राज्य सभा में उन्हें न भेजने के बाद उनका मूड ही बदल गया और बग़ावत उनके शब्दों से झलकने लगी।

ग़ुलाम नबी आज़ाद ऐसे नेता हैं, जो हमेशा कांग्रेस की शीर्ष सत्ता के क़रीब रहे। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के बाद जब सन् 1991 में नरसिम्हा राव का वक़्त आया, तो वह उनके साथ हो गये। लेकिन जब हवा राव के ख़िलाफ़ हुई, तो वह उनके ख़िलाफ़ होने वालों में सबसे पहले नेता थे। सीताराम केसरी अध्यक्ष बनें, तो आज़ाद उनके साथ हो गये और जैसे ही सोनिया गाँधी सक्रिय हुईं, आज़ाद ने केसरी को बाहर करने में पूरा सहयोग दिया।

उन्हें कांग्रेस ने पाँच बार राज्यसभा भेजा। गाँधी परिवार के ही कारण वह जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। इस दौरान वो इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकारों में केंद्र में मंत्री रहे। अब जब पार्टी ने नये लोगों को अवसर देने के लिए उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा, तो वह गाँधी परिवार से ही बाग़ी हो गये।
इसमें कोई दो-राय नहीं कि कांग्रेस में आज भी उसकी सबसे बड़ी धुरी गाँधी परिवार ही है। नहीं भूलना चाहिए कि इक्का-दुक्का नेताओं के कांग्रेस छोडऩे के बावजूद सन् 2014 और सन् 2019 में चुनावी हार से भी कांग्रेस में कोई टूट नहीं हुई। हालाँकि यह सही है कि सन् 2019 की हार के बाद राहुल गाँधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े से पार्टी में मायूसी भर गयी और इसका निचले स्तर तक व्यापक असर हुआ। राहुल इस्तीफ़े का फ़ैसला न करते, तो शायद स्थिति कुछ और होती।

राहुल के इस्तीफ़े के पीछे कुछ ठोस कारण थे, जिनमें एक आज़ाद जैसे नेताओं का उनसे सहयोग न करना था। यह नेता एसी कमरों में बैठने के आदी हो गये थे और ज़मीन पर उतरना उन्होंने छोड़ दिया था। इस्तीफ़े के बावजूद मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चे पर अकेले राहुल गाँधी ही खड़े दिखे। राफेल से लेकर महँगाई-बेरोज़गारी के मुद्दों तक।

अपने पत्र में ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राहुल गाँधी के व्यक्तित्व और नेतृत्व को निशाने पर लिया और आरोप लगाया कि जैसे मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलती थी, वैसे ही कांग्रेस पार्टी रिमोट कंट्रोल से चल रही है। उनके मुताबिक, पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की बात नहीं सुनी जाती है और अधिकतर फ़ैसले राहुल गाँधी और उनके क़रीबी ‘पीए और गार्ड’ लेते हैं। मनमोहन सिंह की सरकार में जब वह मंत्री थे, तब उन्होंने कुछ नहीं कहा। यहाँ तक कि जब राहुल गाँधी पार्टी अध्यक्ष बने थे आज़ाद उनके लिए तालियाँ बजाने वालों में सबसे आगे थे।

अब क्या करेंगे आज़ाद?
आज़ाद अब अपना कोई राजनीतिक संगठन बनाएँगे, जिसका कांग्रेस से मिलाजुला लोकतांत्रिक कांग्रेस जैसा कोई नाम रख सकते हैं। आज़ाद के प्रधानमंत्री मोदी के साथ अच्छे रिश्ते माने जाते हैं। लेकिन उन्होंने ख़ुद कहा है कि न तो वह भाजपा के साथ जाएँगे, न भाजपा से कोई तालमेल करेंगे। वैचारिक स्तर पर वह हमेशा भाजपा की विचारधारा के विपरीत दिखे हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने का उन्होंने कड़ा विरोध किया था। भाजपा के साथ जाने की बात करते, तो कश्मीर में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता। निश्चित ही वह राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जैसी विचारधारा वाला दल बनाएँगे और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भी दख़ल रखेंगे। वह ममता बनर्जी के तीसरे मोर्चे के साथ खड़े हो सकते हैं। इस मोर्चे में एनसीपी नेता शरद पवार भी हो सकते हैं। हालाँकि पवार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से अलग होना नहीं चाहते। कई बार चर्चा रही है कि अपनी उम्र देखते हुए पवार एनसीपी का कांग्रेस में विलय कर सकते हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव भी साथ आ सकते हैं। यह सभी कभी कांग्रेस में रहे हैं।

भारत जोड़ो यात्रा
कांग्रेस को 7 सितंबर से पहले मोदी सरकार के ख़िलाफ़ पिछले आठ साल का अपना सबसे बड़ा आयोजन भारत जोड़ो यात्रा के रूप में शुरू करना है। इसका मक़सद जनता में मोदी सरकार की नाकामियों को उजागर कर माहौल को बदलना है, जो लगातार चुनावी नाकामियों के कारण कांग्रेस के लिए मुसीबत बना हुआ है। चूँकि यह पद यात्रा होगी और वह भी 3,500 किलोमीटर लम्बी, कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि यह उसके कायाकल्प में मददगार साबित होगी। इससे उसका कार्यकर्ता भी सक्रिय होगा। कांग्रेस ने चूँकि अध्यक्ष का चुनाव आगे खिसका दिया है। इससे ज़ाहिर होता है कि पार्टी भारत जोड़ो यात्रा कार्यक्रम को कितना ज़्यादा महत्त्व दे रही है।
कांग्रेस नेताओं- दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश के मुताबिक, यात्रा का मक़सद देश में बनाये गये नफ़रत के माहौल, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का हनन, महँगाई और बेरोज़गारी बढऩे को लेकर जनता के बीच जाने को लेकर है। यह पदयात्रा 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों से होकर गुज़रेगी और तमिलनाडु के कन्याकुमारी से शुरू होकर कश्मीर में ख़त्म होगी।
पार्टी ने इस यात्रा में शामिल होने के लिए कांग्रेस नेताओं के अलावा सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और समान विचारधारा के लोगों के लिए भी रास्ता खुला रखा है। इस यात्रा को लेकर राहुल गाँधी 23 अगस्त को सिविल सोसायटी के कई प्रमुख लोगों के साथ बैठक कर चुके हैं।
इस बैठक में कांग्रेस को अच्छा समर्थन मिला और इसमें स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव, योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद, एकता परिषद् के पी.वी. राजगोपाल, सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन के बेजवाड़ा विल्सन और कई अन्य सामाजिक और ग़ैर-सरकारी संगठनों के क़रीब 150 प्रतिनिधि शामिल हुए। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों ने घोषणा की है कि वे देश को जोडऩे के इस अभियान से जुड़ेंगे और इसके समर्थन में अपील भी जारी करेंगे।

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव कार्यक्रम

नामांकन 24-30 सितंबर
चुनाव 17 अक्टूबर
नतीजा 19 अक्टूबर
मतदाता प्रतिनिधि क़रीब 9,200

गाँधी या ग़ैर-गाँधी अध्यक्ष!
कांग्रेस ने अध्यक्ष पद के चुनाव की तारीख़ भले 17 अक्टूबर तय कर दी है; लेकिन साफ़ नहीं अध्यक्ष बनेगा कौन? क्या कांग्रेस ने ख़ुद को मानसिक रूप से एक ग़ैर-गाँधी अध्यक्ष चुनने के लिए तैयार कर लिया है? राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष देखने की चाह रखने वाले नेता मानते हैं कि राहुल अध्यक्ष नहीं बनते हैं, तो भाजपा सबसे ज़्यादा ख़ुश होगी और कांग्रेस का एक बहुत बड़ा वर्ग निराश। लेकिन ख़ुद राहुल गाँधी अध्यक्ष नहीं बनना चाहते। प्रियंका गाँधी को लेकर तो राहुल ने ही न कह दिया है और ग़ैर-गाँधी के अध्यक्ष बनने का समर्थन कर रहे हैं। ग़ैर-गाँधी के रूप में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नाम की पार्टी के भीतर काफ़ी चर्चा है; भले ख़ुद गहलोत राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने की बात कह रहे हों। देखें, तो कांग्रेस के इतिहास में सन् 1947 के बाद कुल 19 नेता कांग्रेस अध्यक्ष बने, जिनमें से 14 ग़ैर-गाँधी थे। ऐसे में अबकी बार कोई ग़ैर-गाँधी अध्यक्ष बनता है, तो हैरानी की उतनी बड़ी बात नहीं होगी।

देश की आज़ादी के बाद के इन 75 वर्षों में 34 साल कांग्रेस में ऐसे रहे, जब कोई ग़ैर-गाँधी पार्टी का अध्यक्ष रहा। बा$की के 41 वर्षों में से अकेले सोनिया गाँधी 22 साल (पूर्णकालिक और अंतरिम मिलाकर) अध्यक्ष रही हैं। अर्थात् जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी और राहुल गाँधी सभी मिलाकर भी उनसे कम समय तक अध्यक्ष रहे हैं। अब एक बार फिर ग़ैर-गाँधी के अध्यक्ष होने का रास्ता खुलता दिख रहा है।

ज़्यादा सम्भावना वाले अशोक गहलोत के अलावा केंद्र में मंत्री रहे महाराष्ट्र के दलित नेता सुशील कुमार शिंदे, राहुल गाँधी के क़रीबी माने जाने वाले मल्लिकार्जुन खडग़े, मुकुल वासनिक, जयराम रमेश और सोनिया गाँधी की क़रीबी लोकसभा की अध्यक्ष रहीं मीरा कुमार के नाम ग़ैर-गाँधी नेताओं में चर्चा में हैं। जिस तरह राहुल गाँधी अध्यक्ष बनने के लिए मना कर रहे हैं, उससे इन नेताओं में से किसी एक या किसी अन्य ग़ैर-गाँधी का रास्ता खुलता दिख रहा है।

अक्टूबर में नया अध्यक्ष चुना जाना है और यह तय है कि कोई ग़ैर-गाँधी भी अध्यक्ष बनेगा, तो वह गाँधी परिवार का क़रीबी होगा। गाँधी परिवार के विरोधी भले कांग्रेस में मुट्ठी भर हों, वह चाहेंगे कि चुनाव किया जाए। वैसे अध्यक्ष के लिए चुनाव कराने के कांग्रेस के भीतर सबसे बड़े समर्थक ख़ुद राहुल गाँधी हैं।

पार्टी का बड़ा तबक़ा राहुल गाँधी या प्रियंका गाँधी को अध्यक्ष बनाने के हक़ में है। कुछ की राय है कि सोनिया गाँधी ही पूर्णकालिक अध्यक्ष बन जाएँ। उनका मानना है कि गाँधी परिवार से बाहर जाते ही कांग्रेस बिखर जाएगी। देखा जाए तो ग़ैर-गाँधी नेता अभी तक गाँधी परिवार के आसरे ही पद पाते रहे हैं या चुनाव जीतते रहे हैं।
भले सन् 2014 के बाद कांग्रेस कमज़ोर हुई हो; लेकिन आज भी कांग्रेस के पास भाजपा के बाद सबसे ज़्यादा विधायक राज्यों में हैं। पर जो एक चीज़ बदली है, वह यह है कि गाँधी परिवार का करिश्मा फीका पड़ा है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गाँधी के खुलकर मैदान में उतरने के बावजूद पार्टी का वोट बैंक नहीं बढ़ा। यह अस्थायी दौर हो सकता है; क्योंकि अभी भी गाँधी परिवार का पैन-इण्डिया इम्पैक्ट है, इसमें कोई शक नहीं।

अपना नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक सांसद ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘मोदी हमेशा नहीं रहेंगे। जनता उनके कई फ़ैसलों से असहमत हो रही है और अगला चुनाव उनके लिए मुश्किल होने वाला है। भाजपा नेतृत्व गाँधी परिवार को ख़त्म करना चाहता है; क्योंकि वह अपने लिए उसे ही सबसे बड़ी चुनौती मानता है। लिहाज़ा कोई गाँधी ही कांग्रेस को दोबारा सत्ता में ला सकता है; क्योंकि जनता में इस परिवार की साख है।’

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, आने वाले समय में राज्य ईकाइयाँ आलाकमान को यह प्रस्ताव भेज सकती हैं कि राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाया जाए। कांग्रेस के भीतर सबसे ज़्यादा सहमति राहुल गाँधी के नाम पर है। उनके बाद प्रियंका गाँधी के हक़ में भी काफ़ी नेता हैं।
राहुल गाँधी ने हाल में पार्टी की भारत जोड़ो यात्रा को लेकर सिविल सोसायटी के कई प्रमुख लोगों से बैठक की, जिसके बाद उन्होंने कहा कि यह यात्रा उनके लिए तपस्या जैसी है और भारत को एकजुट करने की लम्बी लड़ाई के लिए वह तैयार हैं। हालाँकि यहाँ यह सवाल उठता है कि यदि वे लम्बी लड़ाई के लिए तैयार हैं, तो यह काम वह कांग्रेस अध्यक्ष बनकर क्यों नहीं करना चाहते?

भारत जोड़ो यात्रा के लिए बनी समिति के सदस्य दिग्विजय सिंह कहते हैं कि राहुल गाँधी को पार्टी का नया अध्यक्ष बनने को लेकर मजबूर नहीं किया जा सकता और वह नहीं बनना चाहते हैं, तो उन्हें जबरदस्ती तो नहीं बनाया जा सकता। लेकिन इसके बावजूद एक सच यह भी है कि कांग्रेस के अधिकांश नेता चाहते हैं कि राहुल गाँधी अपना फ़ैसला बदल दें और अध्यक्ष बनें।

राहुल गाँधी भले पिछले तीन साल से कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, पार्टी में उनकी ही टीम बन रही है। राज्यों में अध्यक्ष से लेकर पार्टी में प्रमुख लोग उनके समर्थक हैं। निश्चित ही वह अपनी टीम बना रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे उनके पिता राजीव गाँधी ने अपने समय में ग़ुलाम नबी आज़ाद और आनंद शर्मा जैसे युवा नेताओं को साथ जोडक़र किया था।


“मैं भाजपा में तब शामिल होऊँगा, जब कश्मीर में काली बर्फ़ गिरेगी। भाजपा ही क्यों? उस दिन मैं किसी भी पार्टी में शामिल हो जाऊँगा। जो लोग यह कहते हैं या इस तरह की अफ़वाहों को फैलाते हैं, वे मुझे नहीं जानते हैं।’’
ग़ुलाम नबी आज़ाद
(12 फरवरी, 2021 को एक बयान में)

Shri Mallikarjun Kharge takes over the charge of Union Minister of Railways, in New Delhi on June 19, 2013.

“राहुल गाँधी के अलावा कोई ऐसा नहीं, जिसकी अखिल भारतीय अपील हो। पार्टी का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर और पश्चिम बंगाल से गुजरात तक समर्थन होना चाहिए। वह व्यक्ति पूरी कांग्रेस पार्टी में जाना-पहचाना, स्वीकृत व्यक्ति होना चाहिए। मुझे ऑप्शन (विकल्प) बताएँ, राहुल गाँधी के अलावा पार्टी में और कौन है?’’
मल्लिकार्जुन खडग़े
वरिष्ठ कांग्रेस नेता

किस-किसके निशाने पर योगी सरकार?

उत्तर प्रदेश में सदैव राजनीतिक माहौल गर्म रहता है। बिहार में भाजपा को झटका लगने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार थोड़ी चौकन्नी दिखायी दे रही है। ऊपर से प्रदेश के वर्तमान सबसे बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री रहे नारद राय ने ऐसा बयान दे दिया है, जिसका उत्तर भारतीय जनता पार्टी के लिए भारी पड़ गया है।

नारद राय ने समाजवादी पार्टी के सदस्यता अभियान में खुले रूप से कहा है कि जिस दिन अखिलेश यादव मन बना लेंगे, 15 दिन में सरकार गिर जाएगी। भाजपा के क़रीब 150 विधायक दु:खी हैं। मंत्री भी दु:खी हैं। उन्होंने लोगों से कहा कि आपने ब्रजेश पाठक का चेहरा देखा है, जबसे उनका ट्रांसफर बदला है तो क्या अन्दर-अन्दर घाव नहीं है? उन्होंने लोगों से यह भी कहा है कि झूठे वादे करने वाली सरकार से बचकर रहें। राय का यह संकेत सीधे-सीधे योगी सरकार की तरफ़ ही था।

पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर में पूर्व मंत्री ने यहाँ तक कह दिया कि हम लोग चुनाव इसलिए हार गये, क्योंकि बूथ पर हमारे काम कर रहे लोगों को डराया गया और मशीनें गड़बड़ कर दी गयीं। कर्मचारियों ने गड़बड़ करने का काम किया। अब हम समाजवादी पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए बूथ स्तर पर 100 लोगों को सदस्य बनाएँगे। नारद राय और ने यह भी दावा किया कि 2024 में समाजवादी पार्टी की सरकार फिर बनेगी। अगले प्रधानमंत्री के प्रश्न पर नारद राय ने कहा कि देश में प्रधानमंत्री कौन होगा? यह तो हम नहीं जानते; मगर जो भी होगा, अखिलेश यादव के इशारे पर होगा।

अब चर्चा यह है कि समाजवादी पार्टी के नेता नारद राय के इस बयान को भारतीय जनता पार्टी ने भले ही दिखाने के लिए इस प्रकार अनसुना कर दिया है, मानो कुछ हुआ ही न हो। मगर सच तो यह है कि नारद राय के इस बयान ने भारतीय जनता पार्टी के धुरंधरों की नींद उड़ाकर रख दी है। इसका तात्पर्य यही है कि प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अगर सब कुछ ठीकठाक होता, तो अब तक भारतीय जनता पार्टी के नेता नारद राय को घेर चुके होते। वास्तव में नारद राय का बयान में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में वही बेचैनी पैदा करने के लिए आया है, जो बेचैनी भारतीय जनता पार्टी दूसरे दलों की सरकार गिराने के पूर्व करती है। संदेहास्पद यह है कि नारद राय का बयान सोशल मीडिया पर $खूब वायरल हो रहा है। इतने पर भी हाज़िर जवाब भारतीय जनता पार्टी के नेता चुप हैं। इस चुप्पी पर कयास लग रहे हैं।

एक स्थानीय भाजपा नेता ने नाम न छापने की सौगंध देते हुए कहा कि भाजपा में अब हाईकमान की चलती है। योगी भी कुछ नहीं हैं। क्योंकि उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के पद पर वह अपनी पसन्द के आदमी को नहीं बैठा पा रहे हैं। योगी कहने को सत्ता में हैं और उनकी तूती बोलती है, मगर जब कोई बड़ा निर्णय लेना होता है, तो उन्हें हाईकमान का मुँह ही ताकना पड़ता है। इसी कारण से अन्दरख़ाने मनमुटाव की स्थिति बनी हुई है। हाल यह है कि जो नेता हाईकमान के सम्पर्क में हैं और वहीं से उन्हें दिशा-निर्देश मिलता है, उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पसन्द नहीं करते; और जो नेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ खुलकर खड़े हैं, उन्हें हाईकमान कुछ नहीं समझता। जो नेता दोनों तरफ़ के भले रहने में भलाई समझते हैं, उन्हें दोनों ही ओर से सन्देह भरी दृष्टि से देखा जाता है। भाजपा नेता के बयान से समाजवादी पार्टी के नेता की यह बात तो सच लगती है कि भाजपा के कुछ विधायक योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व से रूठे हुए हैं। मगर यह बात गले नहीं उतरती कि 150 विधायक अखिलेश यादव के सम्पर्क में हैं और अखिलेश जब चाहें योगी सरकार को गिराकर अपनी सरकार बना सकते हैं। मगर यह एक कोरी अफ़वाह है, यह दावा भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि राजनीति में कोई भी हलचल तभी होती है, जब किसी दिशा में हवा बहती हो। भाजपा में बह रही अनबन की हवा कितनी तेज़ बह रही है? इसका अनावरण तो तभी सम्भव है, जब उत्तर प्रदेश में नये भाजपा अध्यक्ष की घोषणा होगी।

माना यह जा रहा था कि प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है। इस बात का संकेत स्वयं केशव प्रसाद मौर्य ने दिया था। हालाँकि भूपेंद्र सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। देखने वाली बात यह है कि भूपेंद्र सिंह को भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने ही चुना है। भूपेंद्र सिंह योगी सरकार में मंत्री हैं; मगर हाईकमान के क़रीबी माने जाते हैं। हो सकता है कि अब योगी यह न चाहें कि चौधरी मंत्रिमंडल में बने रहें। वैसे भी उन्हें अब संगठन की ज़िम्मेदारी मिली है, तो केंद्र की मेहरबानी से पीछे के दरवाज़े से मिला मंत्री पद त्यागना ही होगा। इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच 36 का आँकड़ा रहता है। इसकी वजह यही है कि केशव प्रसाद मौर्य केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेहद क़रीबी माने जाते हैं और योगी की इच्छा के विरुद्ध उन्हें प्रदेश का उप मुख्यमंत्री बनाया गया। यह बात भारतीय जनता पार्टी के लोग भी मानते हैं कि केशव प्रसाद मौर्य हाईकमान की पहली पसन्द बने हुए हैं। यही बात योगी आदित्यनाथ को रास नहीं आती। लोग बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ का अपना एक दबदबा है और सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उन्हें संरक्षण प्राप्त हैं, मगर केंद्र के हाईकमान से उनकी इसलिए नहीं बनती, क्योंकि उन्हें भाजपा का एक घटक अगला प्रधानमंत्री बताने में लगा है।

विदित हो कि लगभग पाँच महीने से उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष चुने जाने को लेकर भाजपा में मंत्रणा चल रही है। योगी आदित्यनाथ हर महत्त्वपूर्ण पद पर अपने लोगों को रखने के पक्ष में रहे हैं। मगर उनकी हर बात हाईकमान ने कभी नहीं सुनी। अब केशव प्रसाद मौर्य ने अचानक ट्वीट करके इस ओर इशारा कर दिया है कि उन्हें हाईकमान से प्रदेश अध्यक्ष की सत्ता सँभालने का संकेत मिल चुका है। हालाँकि आधिकारिक रूप से प्रदेश अध्यक्ष पद की घोषणा होने पर ही तस्वीर स्पष्ट होगी।

रही प्रदेश में बिहार की तरह सरकार गिरने की बात, तो बिहार में भाजपा के विधायकों की संख्या और उत्तर प्रदेश में विधायकों की संख्या में विकट अन्तर है। वहाँ गठजोड़ वाली पंगु सरकार थी; मगर उत्तर प्रदेश में एक सुदृढ़ व पूर्ण बहुमत वाली सरकार है।

इतना अवश्य है कि प्रदेश में जनता में योगी आदित्यनाथ सरकार के प्रति धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे अपराध न रोक पाने की सरकार की नाकामी भी है, तो अब तक नि:शुल्क बँट रहे राशन पर अचानक रोक भी है। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की डगमग व्यवस्था भी है, तो स्कूलों में ख़राब शिक्षा व्यवस्था भी है। किसानों के साथ अन्याय है, तो निर्धनों के आगे आजीविका का संकट भी है। जनता जनार्दन में सबसे अधिक आक्रोश राशन केंद्रों पर से नि:शुल्क गेहूँ-चावल का वितरण बन्द होने से है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना (एनएफएसए) के तहत प्रत्येक माह मिलने वाले राशन के लिए अब उत्तर प्रदेश के सभी राशन कार्ड धारकों को रियायती दाम चुकाने होंगे। अब राशन कार्ड धारकों को भी दो रुपये किलो गेहूँ एवं तीन रुपये किलो चावल क्रय करने की प्रतिबद्धता सरकार ने लगा दी है। मगर चना, तेल एवं नमक नि:शुल्क ही मिलते रहेंगे। इस योजना में अब किसी भी राशन कार्ड धारकों को किसी भी राशन की सरकारी दुकान लेने की सुविधा भी दी जाएगी।
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विपक्षी दलों व लोगों के निशाने पर रहने लगी भाजपा सरकार को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार-2 में सुधारों की आवश्यकता तो है ही, साथ ही अपने ही लोगों को विश्वास में लेने की आवश्यकता भी है। योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि उनका व्यवहार उग्र और कड़ी कार्रवाई वाला ही है; जो प्रदेश की जनता को तो रास आ ही नहीं रहा है, मगर भाजपा के कुछ नेताओं को भी रास नहीं आ रहा है। विरोध के संकट में फँसी योगी आदित्यनाथ सरकार को जनता के समर्थन की आवश्यकता तो रहेगी ही, साथ ही उन्हें कुछ अकड़ से दूरी बनानी होगी और व्यवहार में नरमी लानी होगी।

नयी आबकारी नीति और दिल्ली मॉडल

राजनीति में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे दिल्ली मॉडल को नयी आबकारी नीति से जैसे ग्रहण लग गया है। नयी नीति से जहाँ सरकारी राजस्व में बड़ा घाटा हुआ, वहीं इसमें भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोप लगे हैं। आरोप यह है कि इस आबकारी नीति में पारदर्शिता नहीं बरती गयी। ज़ाहिर है जहाँ पारदर्शिता नहीं होती, वहाँ गड़बड़ी की आशंका प्रबल होती है। मुख्य सचिव नरेश कुमार की इस रिपोर्ट के बाद कि ‘आबकारी नीति में नियमों की अनदेखी कर भ्रष्टाचार किया गया है और चहेते लोगों को लाभ पहुँचाया गया है;’ उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने तत्कालीन आबकारी आयुक्त आरव गोपीकृष्ण समेत 11 अधिकारी और कर्मचारी निलंबित कर दिये गये थे।
अब इसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय भी कूद पड़ा है। उप मुख्यमंत्री व आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया समेत एक दर्ज़न लोगों के नाम प्राथमिकी दर्ज हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि भ्रष्टाचार सिद्ध हो सकेगा? क्योंकि अभी तक सिर्फ़ आरोप हैं। इसीलिए इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है। भाजपा के लोगों का कहना है कि देर-सबेर इस प्रकरण में बड़े स्तर पर गिरफ़्तारियाँ होंगी। क्योंकि हर जगह दिल्ली मॉडल को सफलता से लागू करने की बात कहने वाले आबकारी नीति पर बग़ले झाँकते हुए नज़र आ रहे हैं। दरअसल यह आबकारी नीति दिल्ली सरकार के गले की फाँस बन गयी है। शराब से मिलने वाला राजस्व साल-दर-साल बढ़ता है; लेकिन दिल्ली में इस नीति के चलते बहुत कम राजस्व सरकार को प्राप्त हुआ है। सवाल यह है कि इस नुक़सान की ज़िम्मेदारी किसकी है? नयी नीति जब बनी थी, तो इससे क़रीब 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के राजस्व का अनुमान लगाया गया था। लेकिन नवंबर में जारी इस नीति के तहत जुलाई अन्त तक 2,000 करोड़ रुपये भी सरकारी खाते में नहीं आये।
चार माह के दौरान 10,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाना सम्भव नहीं था। मतलब दिल्ली सरकार को बड़ा घाटा हुआ। फिर शराब की बढ़ती खपत से कौन लोग मुनाफ़ा कमा रहे थे? निश्चित ही कुछ लोग मोटी कमायी कर रहे होंगे। ये लोग कौन है? सीबीआई इसी की जाँच में जुटी है। हालाँकि सिसोदिया के घर सीबीआई छापेमारी करके उनका मोबाइल, कम्प्यूटर और कुछ फाइल्स सीबीआई टीम ले जा चुकी है। लेकिन ख़ामोश बैठी है। ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग का कोई मामला नहीं मिला। माना जा रहा है कि नयी आबकारी नीति में बिचौलियों की भूमिका सामने आएगी। हो सकता है कि इन बिचौलियों में कुछ लोग सरकार के क़रीबी हों। जिन 15 लोगों पर आरोप हैं, उनमें से दो अभी देश से बाहर हैं। लुकआउट नोटिस के बाद अब उनमें से किसी का बाहर जाना मुश्किल है।

नयी आबकारी नीति में एकमुश्त 10 फ़ीसदी कमीशन बढ़ाने का क्या औचित्य था? अब बोलीदाताओं की सुरक्षा राशि वापस करना भी सन्देह के घेरे में है। आबकारी नीति को मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दी थी; लेकिन इसके बाद भी इसमें अतिरिक्त संशोधन किये गये। पूर्व उप राज्यपाल अनिल बैजल ने उसे पास किया। मंत्रिमंडल समूह में आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और कैलाश गहलोत थे। सवाल यह भी है कि जब पुरानी नीति के तहत शराब की बिक्री चल रही थी, तो नयी नीति की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या इसका उद्देश्य किसी को लाभ पहुँचाना था? या सरकारी राजस्व में बढ़ोतरी करने का था? नयी नीति में स्पष्ट अंकित है कि उत्पादक, वितरक और ख़ुदरा विक्रेता तीनों अलग-अलग होने चाहिए। किसी का किसी के साथ कोई तालुल्क़ नहीं होना चाहिए। आरोप है कि इसकी अनदेखी हुई है। दो कम्पनियाँ ऐसी हैं, जो उत्पादक, वितरक और ख़ुदरा में शामिल हैं। जहाँ-जहाँ ऐसा होता है, वहाँ सरकार को राजस्व नाम मात्र की कमायी होती है, जबकि बोली दाता को मोटी कमायी। बोलीदाताओं पर यह दरियादिली दिखाने का कुछ तो मक़सद रहा होगा। जाँच में ऐसे कई राज़ खुल सकते हैं। सवाल यह है कि यह सब सरकार की जानकारी में रहा; लेकिन इसकी जाँच उसने नहीं करायी।

शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य सरकारों के लिए जीएसटी के बाद सबसे बड़ा होता है। सरकारें इस राजस्व को बढ़ाने के लिए हर वर्ष नीति में बदलाव करती हैं, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा राजस्व प्राप्त हो सके। हालाँकि दिल्ली सरकार ने भी यही किया। लेकिन ज़्यादा के चक्कर में उसे घाटा उठाना पड़ गया। पहली तालाबंदी में उसने शराब पर टैक्स भी बढ़ाया था। लेकिन बाद में शराब पर मुफ़्त की योजना लागू कर दी।

दिल्ली में सस्ती शराब के चलते इसकी खपत बहुत ज़्यादा बढ़ी। एक ख़रीदो, दो ले जाओ (बोतल या पेटी) की स्कीम भी चली। पर इसका फ़ायदा सरकार को नहीं हुआ। क्योंकि नयी नीति में सरकार की सीधे तौर पर कोई भूमिका नहीं थी। आबकारी मंत्री होने के नाते मनीष सिसोदिया प्राथमिकी में पहला आरोपी बनाया गया है; लेकिन इसकी आँच केजरीवाल तक भी पहुँच सकती है। ज़ाहिर है मसौदे मंत्रिमंडल में पास होने और फिर अलग से मंत्रिमंडल समूह में अतिरिक्त संशोधन जैसे फ़ैसलों की जानकारी मुख्यमंत्री को भी होगी ही। सत्येंद्र जैन पर ईडी का शिकंजा कसे जाने के बाद अब कौन-कौन मंत्री निशाने पर आएँगे? ऐसी चर्चा है।
संगीन आरोपों से घिरे मनीष सिसोदिया ने हर सवाल और आरोप का जवाब देते हुए दहाड़ लगा दी है और चुनौती दी है कि उनके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं मिलने वाला, क्योंकि वह निर्दोष हैं। वह आरोपों को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं। उनका कहना है कि 800 करोड़ के घोटाले से भाजपा एक करोड़ के घोटाले के आरोप पर आ गयी है। यह झूठ साफ़ दिख रहा है। बता दें कि सत्येंद्र जैन के मामले में भी एक न्यायालय ने ईडी की कड़ी फटकार लगायी थी कि वह इस तरह किसी को आरोपी कैसे बना सकता है, जब उनके नाम कम्पनी तक नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा के एक बड़े नेता ने उन्हें फोन पर आम आदमी पार्टी को तोडक़र भाजपा में शामिल होने का ऑफर दिया है। अगर यह आरोप सही है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। कोई भले ही खुलकर नहीं बोल रहा हो; लेकिन भाजपा किस तरह से लोगों को अपने ख़ेमे में करने या उन्हें नष्ट करने में लगी है, यह किसी से छिपा भी नहीं है।

इधर जाँच में फँसे सिसोदिया केजरीवाल के साथ गुज़रात का चुनावी दौरे पर भी गये। बीच-बीच में केजरीवाल भी सिसोदिया की तरह अपनी गिरफ़्तारी की आशंका भी जताते रहते हैं। केजरीवाल सिसोदिया को ईमानदार, देशभक्त और देश का सबसे अच्छा शिक्षामंत्री बताते हैं। सवाल यह है कि अब तक बेदाग़ छवि के रहे सिसोदिया क्या अपनी प्रतिष्ठा को बचाये रखने में सफल होंगे? या फिर उन्हें भी सत्येंद्र जैन की तरह जेल जाना पड़ेगा? यह तो जाँच में मिले सुबूतों के आधार पर तय होगा। लेकिन जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए, यह ज़िम्मेदारी जाँच एजेंसियों की बनती है।

एक दर्ज़न से ज़्यादा विभागों को सँभाल रहे सिसोदिया केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति हैं। लोगों में उनकी एक अच्छी छवि है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने सराहनीय काम किया है और उनके इस काम की तारीफ़ न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर दुनिया के कई बड़े अख़बारों, पत्रिकाओं और देशों मंन हुई है। हो सकता है कि शिक्षा की तरह वह आबकारी नीति में भी कुछ नया और बड़ा करना चाहते हों; लेकिन इससे आरोप तो यही लगे कि वह सरकार के चहेतों को लाभ पहुँचाना चाहते थे। इस नीति के तहत बिचौलियों के माध्यम से कोई बड़ा हेरफेर किया गया है। बहरहाल जब तक मामले का कोई फ़ैसला नहीं आ जाता, तब तक दिल्ली मॉडल से दिल्ली सरकार की आबकारी नीति को तो बाहर ही रखा जाना चाहिए।


“वे (भाजपाई) सिसोदिया को 22 साल से जानते हैं। वह ईमानदार और देशभक्त हैं। आबकारी नीति में नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नीयत में खोट है। मैंने तीन माह पहले ही कह दिया था कि सत्येंद्र जैन के बाद अब निशाने पर मनीष सिसोदिया होंगे। मेरी बात सही साबित हो रही है। केंद्र सरकार को दिल्ली में आप सरकार खटक रही है।’’
अरविंद केजरीवाल
मुख्यमंत्री, दिल्ली


“मुझे आप छोडक़र भाजपा में आने का प्रस्ताव आया। इसके एवज़ में मेरे ख़िलाफ़ सभी मामले रफ़ा-दफ़ा करने का ऑफर है। इसका सुबूत मेरे पास है, जिसे समय आने पर पेश किया जाएगा। मेरे ख़िलाफ़ जाँच राजनीति से प्रेरित और दिल्ली सरकार को गिराने की साज़िश है। मैं बेदाग़ हूँ और रहूँगा। मैं जाँच में पूरा सहयोग करूँगा; क्योंकि मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया है।’’
मनीष सिसोदिया
उप मुख्यमंत्री, दिल्ली

पंजाब में शराब पर घटा टैक्स
पंजाब में आबकारी नीति का मामला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में लम्बित है। वितरकों ने इसे सरकार की मोनोपोली (एकाधिकार) बताते हुए इसे रद्द करने की याचिका दायर की है। न्यायालय ने सरकार को नोटिस देकर इस बाबत जवाब माँगा है। वैसे पंजाब की आबकारी दिल्ली जैसी ही है। यहाँ भगवंत मान सरकार ने शराब पर कर (टैक्स) 350 फ़ीसदी से घटाकर 150 फ़ीसदी किया है। कांग्रेस राज में यह 6,156 करोड़ वार्षिक था, वहीं आम आदमी पार्टी ने अब 9,648 करोड़ से ज़्यादा का लक्ष्य रखा है। पहले पंजाब में चंडीगढ़ और हरियाणा से काफ़ी महँगी शराब थी; लेकिन अब 10 से 15 फ़ीसदी सस्ती हो गयी है। कम टैक्स पर ज़्यादा राजस्व शायद शराब की ज़्यादा खपत और अवैध शराब की बिक्री पर रोक से इकट्ठा होना सम्भव होगा।

नेशनल हेराल्ड मामला, रियल एस्टेट का खेल!

यह सन् 2013 की बात है, जब भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक निचली अदालत में याचिका के ज़रिये यह आरोप लगाया कि गाँधी परिवार ने धोखाधड़ी से नेशनल हेराल्ड समाचार पत्रों की प्रकाशन कम्पनी का अधिग्रहण किया था। अब साल 2022 में एक साक्षात्कार में अर्थशास्त्री से राजनेता बने स्वामी ने कहा है कि इस मामले में उपलब्ध सभी तथ्यों के आधार पर सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और अन्य को निश्चित रूप से जेल में डाल दिया जाएगा। अगर भाजपा सरकार सत्ता में रहती है, तो उन्हें निश्चित रूप से जेल में डाल दिया जाएगा।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि पूरा लेन-देन प्रमोटरों ने 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की अचल सम्पत्ति हासिल करने के लिए दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से अंजाम दिया था। रियल एस्टेट रिसर्च फर्म लिएसस फोरास, जिसे डाटा और सलाहकार सेवाओं की पेशकश करने वाली एक अत्यधिक सम्मानित ग़ैर-ब्रोकरेज रियल एस्टेट रिसर्च फर्म होने का दर्जा हासिल है; ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) द्वारा आयोजित अचल सम्पत्ति के सन् 2010 से सन् 2016 तक अनुमानित बाज़ार मूल्य वृद्धि पर ध्यान दिया।

कुल अचल सम्पत्ति
यह अनुमान लगाया गया कि 63,750 वर्ग फुट में फैली दिल्ली की सम्पत्ति सन् 2010 में 28.69 करोड़ रुपये थी, जो सन् 2016 तक बढक़र 57.38 करोड़ रुपये हो गयी। क़रीब 69,610 वर्ग फुट में फैली लखनऊ की सम्पत्ति इस दौरान 3.48 करोड़ रुपये से बढक़र 6.96 करोड़ रुपये हो गयी। वहीं 37,660 वर्ग फुट में फैली पंचकूला की सम्पत्ति इन्हीं छ: वर्षों में 7.53 करोड़ रुपये से बढक़र 13.18 करोड़ रुपये हो गयी थी। इसी तरह मुम्बई के बांद्रा के उपनगर में 26,508.605 वर्ग फुट में फैली सम्पत्ति का मूल्य सन् 2010 में 29.16 करोड़ रुपये था, जो सन् 2016 में 45.06 करोड़ रुपये पर पहुँच गया। एजेएल के पास 31 मार्च, 2021 तक नई दिल्ली और पटना में लीजहोल्ड ज़मीन थी। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत भूमि और विकास कार्यालय द्वारा 1962 में 4,88,599 रुपये में नई दिल्ली की ज़मीन लीज पर दी गयी थी, जहाँ आज हेराल्ड हाउस है।

एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के शुरुआती शेयरधारक के रूप में शुरुआत में 5,000 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी थे। हालाँकि सितंबर, 2010 तक नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, मुम्बई, इंदौर, पटना और पंचकुला में एजेएल के 1,057 शेयरधारक और करोड़ों की सम्पत्ति थी। दिल्ली में हेराल्ड हाउस अपने आप में एक छ: मंज़िला इमारत है, जिसमें लगभग 10,000 वर्ग मीटर कार्यालय की जगह है। अपने धन के बावजूद एजेएल का उत्पाद (नेशनल हेराल्ड) सन् 2008 में गम्भीर नक़दी संकट के कारण बन्द हो गया।

कांग्रेस का पक्ष
जाँच के केंद्र में 90 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण है, जिसे कांग्रेस ने 2001 से समय-समय पर अपने फंड से एजेएल को दिया है। कांग्रेस का बचाव इस तथ्य में निहित है कि यंग इंडियन धारा-25 के तहत बनी एक ग़ैर-लाभकारी कम्पनी के रूप में पंजीकृत है। एजेएल को सन् 1956 के कम्पनी अधिनियम की धारा-25 के तहत कम्पनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिसका अर्थ है कि एक ग़ैर-लाभकारी संगठन के रूप में पंजीकृत कम्पनी, जो दान, विज्ञान, शिक्षा, संस्कृति और अन्य सामाजिक चीज़ों को बढ़ावा देती है, और इसके मालिक एक नियमित कम्पनी की तरह लाभ या लाभांश प्राप्त नहीं कर सकते हैं। 23 नवंबर, 2010 को यंग इंडियन नामक एक और धारा-25 कम्पनी शुरू की गयी थी। सन् 1937 में एजेएल की तरह यंग इंडियन को 5,00,000 रुपये की चुकता पूँजी के साथ शामिल किया गया था और उसी 5ए, हेराल्ड हाउस, बहादुर शाह जफ़र मार्ग पते के साथ पंजीकृत किया गया था।

कहाँ हुई चूक?
13 दिसंबर, 2010 को राहुल गाँधी को यंग इंडियन का निदेशक नियुक्त किया गया था और एक महीने बाद 22 जनवरी, 2011 को सोनिया गाँधी निदेशक मंडल में शामिल हो गयीं। 31 मार्च, 2021 तक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी (प्रत्येक) की यंग इंडियन में 38 फ़ीसदी हिस्सेदारी (1,900 शेयर) थी। वहीं पूर्व राज्यपाल, पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत मोती लाल वोरा और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत ऑस्कर फर्नांडीस में से प्रत्येक के पास 12 फ़ीसदी हिस्सेदारी यानी 600 शेयर थे। वोरा का 21 दिसंबर, 2020 को निधन हो गया, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री फर्नांडीस का 13 सितंबर, 2021 को निधन हो गया। 30 मार्च, 2022 तक उनके शेयरों के ट्रांसमिशन के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया था।

यंग इंडियन के निदेशक के रूप में राहुल गाँधी की नियुक्ति के लगभग एक हफ़्ते बाद कांग्रेस ने यंग इंडियन को एजेएल का ऋण सौंपा, जिसका मतलब था कि एजेएल पर अब यंग इंडियन का 90 करोड़ रुपये बक़ाया है। दिलचस्प बात यह है कि यंग इंडियन ने कांग्रेस को 90 करोड़ रुपये का ऋण ख़ुद पर ट्रांसफर करने के लिए केवल 50 लाख रुपये का भुगतान किया। 21 दिसंबर 2010 को एजेएल के बोर्ड ने यंग इंडियन को संचित ऋणों के आवंटन को मंज़ूरी दी। लेकिन राशि का भुगतान करने में असमर्थ एजेएल ने इसके बजाय अपनी इक्विटी का एक हिस्सा यंग इंडियन को हस्तांतरित कर दिया, जिसका अर्थ है कि सोनिया और राहुल द्वारा नियंत्रित निजी कम्पनी सार्वजनिक रूप से सीमित एजेएल का अधिग्रहण कर रही थी और एजेएल के साथ वे कथित तौर पर सात शहरों में मूल्यवान अचल सम्पत्ति सम्पत्तियों को नियंत्रित करना चाहते थे।

कांग्रेस शासन में प्रकाशन बन्द
01 अप्रैल, 2008 को दिल्ली में अख़बार के अन्तिम संस्करण के आने के साथ नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन बन्द हो गया। लखनऊ संस्करण उससे 10 साल पहले ही बन्द हो चुका था। सन् 2008 को एडिटर-इन-चीफ टीवी वेंकटचलम को शीर्ष पर रहते हुए 20 वर्ष हो चुके थे। आख़िरी संस्करण में एक नोटिस के ज़रिये समाचार पत्र के अस्थायी निलंबन की घोषणा की गयी। वेंकटचलम ने समापन की पूर्व संध्या पर घोषणा की कि ‘एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के प्रबंधन द्वारा नेशनल हेराल्ड और क़ौमी आवाज़ को अस्थायी रूप से बन्द करने की घोषणा की गयी थी, जिसने अख़बार का प्रकाशन किया था।’

अख़बार के बन्द होने का कारणों में अत्यधिक स्टाफ, मुख्य रूप से प्रेस और ग़ैर-पत्रकारों की वजह से होने वाली हानियाँ और विज्ञापनों से होने वाली आय की कमी जैसे कारण शामिल थे। 31 अगस्त, 2016 को कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड और नवजीवन के पुनरुद्धार की घोषणा की। नीलाभ मिश्र, जो पहले आउटलुक (हिन्दी) के सम्पादक थे; प्रधान संपादक बनाये गये। विडंबना यह है कि सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका के आधार पर दिल्ली की एक न्यायालय ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और तत्कालीन पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को नोटिस जारी करने के कुछ दिन बाद पुनरुद्धार की घोषणा की। उन्होंने आरोप लगाया कि एजेएल को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का ऋण अवैध था, क्योंकि एक राजनीतिक दल को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 29(ए) से लेकर (सी) तक और आयकर अधिनियम-1961 की धारा-13(ए) के तहत व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए पैसा उधार देने पर रोक लगी है।

कोलकाता फर्म की भूमिका
नेशनल हेराल्ड मामले में कोलकाता स्थित एक कथित फ़र्ज़ी फर्म की संलिप्तता का भी आरोप लगाया गया है। स्वामी के अनुसार, डोटेक्स नाम की फर्म से एक करोड़ रुपये लिये गये थे, जिस पर उन्होंने हवाला लेन-देन और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) में शामिल होने का आरोप लगाया था। उनका दावा है कि इस रक़म में से 50 लाख रुपये का इस्तेमाल एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड के अधिग्रहण में किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने स्विट्जरलैंड स्थित बैंकों से डोटेक्स को चेक जारी किये थे। डोटेक्स ने उन पैसों को आईएनआर में बदल दिया था और कांग्रेस को भुगतान कर दिया था। इसी से यह धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) का स्पष्ट उदाहरण बन गया।
इस साल जून में मामले ने तब फिर तूल पकड़ लिया, जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को समन जारी किये। राहुल गाँधी से 13 जून, 14 जून, 15 जून, 20 जून और 21 जून को क़रीब 55 घंटे तक पूछताछ की गयी। वहीं सोनिया गाँधी से 21 जुलाई को, 26 जुलाई को और 27 जुलाई को कुल 11 घंटे की पूछताछ की गयी। पूछताछ कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े और यंग इंडिया के एक पदाधिकारी से भी की गयी, जो 11 अप्रैल और 4 अगस्त को कुल 12 घंटे तक चली। कांग्रेस के अंतरिम कोषाध्यक्ष पवन बंसल, जो एजेएल के एमडी भी हैं; से 12 अप्रैल को पूछताछ की गयी थी।

वर्तमान परिदृश्य
राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को ईडी की तरफ़ से इस मामले में पूछताछ के लिए तलब करने के प्रत्येक दिन कांग्रेस के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। वरिष्ठ नेताओं ने गिरफ़्तारी भी दी। सोनिया गाँधी से पूछताछ के एक हफ़्ते बाद ईडी ने 2 अगस्त को दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग स्थित नेशनल हेराल्ड के हेड ऑफिस और कोलकाता में ‘डोटेक्स’ शेल कम्पनी के ठिकाने समेत 11 अन्य जगहों पर छापेमारी की गयी। ईडी ने 3 अगस्त को नेशनल हेराल्ड के परिसर में यंग इंडियन के कार्यालय स्थान को भी अस्थायी रूप से सील कर दिया। इस मामले में अब आगे क्या होगा, यह समय ही बताएगा।

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरत रहे भारतीय

भारतीय चिकित्सा पद्धति दुनिया की सबसे मज़बूत और पुरातन चिकित्सा पद्धति मानी जाती है। कहा जाता है कि यहाँ के खानपान में ही चिकित्सा का ध्यान ऋषि, मुनियों के दौर से रखा गया है। लेकिन आजकल के बिगडऩे खानपान के चलते ही अब सबसे ज़्यादा बीमारियाँ भी भारतीयों को ही हो रही हैं। हमारे आम समाज के लोगों को फास्ट फूड और तली-भुनी चीज़ों का इतना आदि बना दिया है कि लोगों में कुछ बीमारियाँ तो हमेशा के लिए घर कर चुकी हैं। इन बीमारियों में तनाव, चिड़चिड़ापन, सुगर, बीपी, कमज़ोरी, मोटापा, पेट के रोग शामिल हैं। इन बीमारियों को सबसे ज़्यादा बढ़ाने में चाइनीज फास्ट फूड का योगदान है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फास्ट फूड की सबसे ज़्यादा खपत वाले टॉप 10 देशों की सूची में भारत शामिल है। भारत में क़रीब 38 फ़ीसदी लोग नाश्ते में चाइनीज फास्ट फूड का इस्तेमाल करते हैं। इसमें नूडल्स का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे देश में हेल्दी डाइट के बहुतायत में चलन के बावजूद भी कोरोना-काल के बाद मैगी की बिक्री में 25 फ़ीसदी की बिक्री इसका सुबूत है कि यहाँ लोग मैगी को तब भी नहीं छोडऩा चाहते, जब डॉक्टर भी कई बार इससे होने वाले नुक़सानों के बारे में आगाह कर चुके हैं। लोग तो यह भी भूल गये कि साल 2015 में ख़ुद भारत सरकार ने मैगी में शीशे की मात्रा अधिक होने के चलते इस पर बैन लगा दिया था। बाद में मैगी में सुधार होने के बाद इसे फिर से बिकने दिया गया। लेकिन फिर भी मैगी में मैदा और शीशे की मात्रा होने से साफ़ ज़ाहिर है कि लगातार इसे खाना स्वास्थ्य से खिलवाड़ ही करना है।

मिंटेल ग्लोबल न्यू प्रोडक्ट्स डेटाबेस (जीएनपीडी) के अनुसार, 2018 में भारत में लॉन्च हुए 42 फ़ीसदी इंस्टेंट नूडल मसाला फ्लेवर वाले थे। इसके बाद से कई नये फ्लेवर वाले नूडल्स मार्केट में उतर चुके हैं और यह लोगों के भोजन का कब हिस्सा बन गये, किसी को ध्यान ही नहीं है।

सन् 2020 में चीन के नॉर्थ-ईस्ट रीज़न के हिले जियांग प्रांत में घर में बने नूडल सूप को पीने से एक ही परिवार के नौ लोगों की मौत के बावजूद नूडल्स से भारतीयों का प्यार लगातार बढ़ता जा रहा है। ख़ासकर बच्चे नूडल्स के दीवाने होते जा रहे हैं और घर में बड़े उन्हें इसका शिकार बना रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह घर की महिलाएँ हैं, जो बनाने के आलस से भारतीय व्यंजनों से नाक-भौं सिकोडऩे लगी हैं। एक अमेरिकी शोध के अनुसार भारत में जो महिलाएँ हर दूसरे-तीसरे नूडल्स खाती हैं, उनमें दिल के रोग, पेट के रोग, माइग्रेन, चिड़चिड़ेपन, मोटापा, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल बढऩे से मेटाबॉलिक सिंड्रोम के लक्षणों मिले हैं। वहीं हफ़्ते में दो बार नूडल्स खाने वाली महिलाओं में भी हार्ट रिस्क बढ़ा है। इतना ही नहीं, इससे कैंसर जैसी बीमारी में भी बढ़ोतरी हुई है। वहीं बच्चों का बौद्धिक और शारीरिक विकास भी रुका है, उनमें मिसकैरेज का रिस्क बढऩे के साथ-साथ उनमें हृदय और पेट सम्बन्धी रोग बढ़े हैं।

यह खानपान का ही असर है कि लोगों का स्टैमिना कमज़ोर हो रहा है और उनका इम्युनिटी सिस्टम भी लगातार कमज़ोर होता जा रहा है। इसी का नतीजा था कि साल 2020 में दस्तक देने वाली नयी महामारी कोरोना वायरस ने 2020 के बाद 2021 में भी तांडव मचाया, जिससे लाशों के ढेर लग गये। इस कोरोना ने अभी तक किसी भी देश का पीछा पूरी तरह नहीं छोड़ा है। इसके नये-नये वैरिएंट आते जा रहे हैं। भारत में कोरोना के मामले फिर से बढऩे की रिपोट्र्स हर रोज़ आ रही हैं। मेडिकल रिपोट्र्स के मुताबिक, जीनोम अनुक्रमण के लिए भेजे गये 90 सैंपल्स की जाँच के दौरान कोरोना के इस नये रूप की पहचान की गयी है। अब तक कोरोना के सब-वैरिएंट के रूप में आठ से ज़्यादा वैरिएंट आ चुके हैं। इसी तरह इस साल मंकी पॉक्स की डरावनी जानकारियों ने सभी को सहमाया हुआ है। इस वक़्त कई देशों में मंकीपॉक्स वायरस काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है, जिनमें भारत भी है। हालाँकि भारत में इसकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है। लेकिन इसकी रफ़्तार कम होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
इतना ही नहीं भारत में खानपान बिगडऩे से लोगों की औसत आयु और औसत लम्बाई के घटने की भी रिपोट्र्स सामने आ चुकी हैं। पहले कहा जाता था कि एक व्यक्ति की औसत आयु 100 साल होती थी। आज भी ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने बड़े-बुज़ुर्गों की उम्र 100 साल या उससे ज़्यादा होते देखी होगी। लेकिन अब यह आयु औसतन 65 साल मानी जाती है। अब अगर कोई व्यक्ति 100 साल हो जाए, तो लोगों को आश्चर्य होता है। वहीं औसत लम्बाई भी भारत में पिछले दो दशक से हैरतअंगेज़ तरीक़े से घटी है।

दरअसल ओपन एक्सेस साइंस जर्नल पलॉस वन की सन् 2021 की स्टडी में पता चला है कि भारतीयों की औसत लम्बाई घट रही है। प्लॉस वन ने साल 1998-99, साल 2005-06 और साल 2015-16 में हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में वयस्क महिलाओं और पुरुषों की औसत ऊँचाई की तुलना की गयी। इस अध्ययन में पाया कि 2005-06 और 2015-16 में सबसे ग़रीब तबक़े के लोगों की औसत लम्बाई सबसे ज़्यादा घटी है। वहीं इस दौरान 15 से 25 वर्ष की उम्र की महिलाओं में भी ज़्यादा ग़रीब महिलाओं की औसत लम्बाई 150.37 सेंटीमीटर से घटकर 149.74 सेंटीमीटर हो गयी थी। लेकिन मध्यम वर्ग की महिलाओं की लम्बाई 0.17 सेमी और अमीर महिलाओं की औसत लम्बाई 0.23 सेमी बढ़ी भी है। लेकिन अगर औसत देखें, तो भारतीयों की लम्बाई लगातार घट रही है।

जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कहते हैं कि व्यक्ति के खानपान पर उसका स्वास्थ्य तो निर्भर करता ही है, साथ ही उसका शारीरिक और मानसिक विकास भी निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का खानपान जितना शुद्ध होगा, वह उतना ही ज़्यादा स्वस्थ। लेकिन साथ ही डॉक्टर मनीष यह भी कहते हैं कि लेकिन आजकल स्वास्थ्य का मामला केवल खानपान से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि खानपान में हो रही मिलावट, जलवायु प्रदूषण और भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से जुड़ा है। फिर भी अगर लोग अपना खानपान ठीक कर लें, तो वे काफ़ी हद तक स्वस्थ रह सकते हैं। सभी लोगों को ध्यान यह रखना चाहिए कि शरीर भी एक प्राकृतिक मशीन है, जिसमें जितना कचरा और केमिकल जाएगा, यह मशीन उतनी ही बिगड़ती जाएगी।

वहीं बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर धवल का कहना है कि बच्चों में जितनी बीमारियाँ आजकल देखने को मिल रही हैं, उतनी बीमारियाँ पहले देखने को नहीं मिलती थीं। इसकी वजह हमारी माताओं का उलटा-सीधा खानपान और बच्चों का शुरू से ही फास्ट फूड की ओर मोह पैदा होना है। इसलिए यह ज़िम्मेदारी तो माता-पिता की है कि वे अपने को भी स्वस्थ रखने के लिए घर का बना साफ़, शुद्ध खाना खाएँ और अपने बच्चों को भी बाज़ारू चीज़ें खाने से बचाएँ; ख़ासतौर पर पैक्ड प्रोडक्ट्स और नूडल्स आदि से बच्चों को कोसों दूर रखने की कोशिश करें। अगर बच्चा कुछ ऐसा खाने को मागता है, तो उसे घर में बनाकर भारतीय व्यंजन ही खिलाएँ, ताकि उसका स्वास्थ्य सही रह सके।

महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर परेस कहते हैं कि महिलाओं पर पूरे घर के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी होती है। यदि वे चाहें तो वे पूरे घर की सेहत सुधार सकती हैं और यदि वे चाहें तो पूरे घर को बीमार कर सकती हैं। लेकिन आजकल देखा जाता है कि महिलाएँ ख़ुद भी फास्ट फूड, ख़ासतौर पर चाइनीज फास्ट फूड ख़ुद भी चाव से खाती हैं और अपने बच्चों को भी खिलाती हैं। ऐसे में उन्हें रोगों से कौन बचा सकता है?

जातिगत भेदभाव की बीमारी

राजस्थान के जालौर ज़िला के सुराणा गाँव के एक निजी स्कूल में पढऩे वाले नौ साल के दलित छात्र की मौत के मामले ने देश के मीडिया और सियासत में सुर्ख़ियाँ बटोरीं। 20 जुलाई को सवर्ण जाति के शिक्षक द्वारा कथित तौर पर इंद्र मेघवाल की बेरहमी से पिटाई के बाद उसकी 13 अगस्त को मौत हो गयी। कहा जा रहा है कि इंद्र मेघवाल ने स्कूल में रखे शिक्षक के मटके से पानी पी लिया था और ग़ुस्साये शिक्षक ने उसकी पिटाई कर दी। सारा मामला जातिगत भावना से प्रेरित है। बहरहाल पुलिस ने आरोपी शिक्षक को गिरफ्तार करके उस पर हत्या और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 जैसे प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है।

सवाल यह है कि देश में आज़ादी के इतने साल बाद भी जातिवाद की मानसिकता लोगों के दिमाग़ से निकल क्यों नहीं रही है? राजस्थान तो हाल यह है कि वहाँ कई जगहों पर दलित दूल्हों को घोड़ी पर बैठकर बारात नहीं निकालने दी जाती। कई बार दलितों की इसे लेकर पिटाई के मामले सामने आ चुके हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु में भी दलितों के ख़िलाफ़ जातिगत भेदभाव वाली ख़बरें हमारा ध्यान खींचती हैं। कई मर्तबा वहाँ दलितों की पिटाई सिर्फ़ इसलिए कर दी जाती है, कि वे कथित उच्च जाति के लोगों के भोजन या पानी को छू देते हैं या उनकी बराबरी करते हैं।

इसी साल 15 अगस्त के मौक़े पर देश में आज़ादी की 75वीं वर्षगाँठ अमृत महोत्सव के रूप में मनायी गयी और केंद्र सरकार ने इसे जोशीली राष्ट्रभक्ति में बदलने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। मगर अफ़सोस इस देश के सामने कई चुनौतियाँ बरक़रार हैं, बल्कि बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों में जातिगत भेदभाव एक दुर्भाग्यपूर्ण सामाजिक बुराई है। आख़िर सरकारें और समाज ख़ुद से यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि आख़िर जाति के नाम पर भेदभाव, हिंसा ख़त्म करने में हम कहाँ असफल हुए हैं? सरकारों ने नगरों को महानगरों में तब्दील कर दिया। बहुमंज़िला इमारतें खड़ी कर दीं। हाईवे बना दिये। हवाई अड्डों की संख्या भी बढ़ रही है। मगर सामाजिक ताना-बाना, सामाजिक समरसता में खटास और कड़वाहट घुलने से नहीं रोक सकी। स्कूलों में दलितों के हाथ से बना मिड-डे मील नहीं खाने की ख़बरों के बावजूद भी सरकार कोई कड़ी कार्रवाई जब नहीं करती, तो ज़ाहिर है यह ज़हर बढ़ेगा ही। दलित डिलीवरीमैन से खाने का पैकेट नहीं लेने वाली ख़बरें भी परेशान करती हैं।

सवाल यह है कि यह समाज किधर जा रहा है? क्या ज़िन्दगी में हर वक़्त इंटरनेट, वाई-फाई का तेज़ गति से चलना ही सब कुछ है? क्या इस बात की भी फ़िक्र है कि देश में दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार के आँकड़ों में वृद्धि हुई है? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट-2021 में कहा गया है कि सन् 2020 में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के ख़िलाफ़ अपराध में बढ़ोतरी हुई है। एनसीआरबी की ओर से जारी आँकड़ों के अनुसार, सन् 2011 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों की संख्या 33,719 थी। जबकि सन् 2020 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ देश भर में 50,291 मामले दर्ज किये गये। ये सन् 2019 के 45,961 मामलों की तुलना में ये 9.4 फ़ीसदी ज़्यादा हैं। सन् 2020 में दर्ज 50,291 मामलों में से 16,543 मामले मामूली रूप से चोट पहुँचाने के दर्ज हुए। इसके अलावा बलात्कार के लिए शील भंग करने के इरादे से महिलाओं पर हमले के 3,372 मामले, हत्या के 855 मामले और हत्या के प्रयास के 1,119 मामले दर्ज किये गये। ध्यान देने वाली बात यह है कि सन् 2020 में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ सबसे अधिक 12,714 (25.2 फ़ीसदी) मामले यानी कुल मामलों के एक-चौथाई से अधिक भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश में दर्ज किये गये। दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहाँ जातिगत भेदभाव के 7,368 मामले दर्ज हुए। इसी प्रकार राजस्थान तीसरे स्थान पर रहा और मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर, जहाँ क्रमश: 7,017 और 6,899 मामले दर्ज हुए। कुल मिलाकर केवल इन चार प्रदेशों में अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ प्रताडऩा के दर्ज मामलों की संख्या देश भर में दर्ज कुल मामलों की दो-तिहाई है। पूरे देश में अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी क़रीब 19.7 करोड़ है और उसमें से 40 फ़ीसदी इन चार राज्यों में बसते हैं।

एनसीआरबी के आँकड़ों में कहा गया है कि सन् 2020 में हर 10 मिनट में अनुसूचित जाति के व्यक्ति को आपराधिक प्रताडऩा का सामना करना पड़ा। 15 अगस्त से चार दिन पहले ही यानी 11 अगस्त को तमिलनाडु अस्पृष्यता उन्मूलन मोर्चा (टीएनयूईएफ) ने एक सर्वे जारी किया। इस सर्वे में पाया गया कि राज्य में कई दलित पंचायत अध्यक्षों को उनके कार्यालयों में कुर्सी तक नहीं दी गयी है। राज्य के 24 ज़िलों में किये गये सर्वे में पाया गया कि कई दलित पंचायत अध्यक्षों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने तक की अनुमति नहीं मिली। कुछ मामलों में पंचायत अध्यक्षों को स्थानीय निकाय कार्यालयों में प्रवेश तक की अनुमति नहीं दी गयी। वहीं कई मामलों में उन्हें दस्तावेज़ों का आकलन नहीं करने दिया गया।

इस सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाले महासचिव पी. सैमुअल राज ने पत्रकारों से कहा कि सर्वेक्षण का नतीजा चौंकाने वाला व दु:खद है। यह देखकर दु:ख होता है कि तमिलनाडु में जातिगत भेदभाव प्रचलित है। एक ऐसा राज्य, जो जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ लडऩे वाले पेरियार की विचारधारा पर निर्भर है। हम सरकार से दलित पंचायत अध्यक्षों की शिकायतों के निवारण के लिए एक विशेष तंत्र बनाने की अपील करते हैं।

जातिगत भेदभाव मामले आज़ाद भारत में घटे भी हैं; लेकिन बढ़े भी हैं। कांग्रेस की सरकार में भी ऐसे मामले बढ़े; लेकिन भाजपा की सरकार में ऐसे मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव के कुचक्र में राजनीति की भागीदारी सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इससे अलावा सामाजिक और आर्थिक असमानता भी इसके बहुत बड़े कारण हैं। सवर्ण जातियाँ इसके चलते भी उन्हें आसानी से अपना निशाना बना लेती हैं। एक अहम बात यह भी है कि ऐसे मामलों में अधिकांश लम्बित रहते हैं। न्यायालयों में लम्बी सुनवाई चलती रहती है। मामलों में सज़ा की दर कम है। सन् 2018 में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि अधिकतर मामलों में एफआईआर, शिकायत करने में देरी, गवाह के मुकर जाने जैसे कई कारणों से भी आरोपी छूट जाते हैं। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत न्यायालयों में लम्बित मामलों की दर सन् 2020 में 96.5 फ़ीसदी थी, जो सन् 2019 के 94 फ़ीसदी के मुक़ाबले 2.5 फ़ीसदी बढ़ी है। एक बढ़ोतरी एक साल में हुई है। ऐसे मामलों में सज़ा की दर का कम होना चिन्तनीय है। क्योंकि जिस तरह से भरतीय समाज की संरचना में जाति अपनी मज़बूत भूमिका निभाती है, उसके मद्देनज़र देश के दलितों को क़ानून, न्याय व्यवस्था से ही न्याय की उम्मीद है। देश में दलितों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 है। इसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के सदस्यों के ख़िलाफ़ किये गये अपराधों का निपटारा किया जाता है। इसमें अपराधों के सम्बन्ध में मुक़दमा चलाने और दण्ड (सजा) देने का प्रावधान किया गया है। हमारे देश में क़ानून तो बहुत हैं; लेकिन उस अनुपात में संरक्षण नहीं मिलता। लोग इसे सार्वजनिक रूप से मानने को तैयार ही नहीं होते कि दलितों के ख़िलाफ़ भेदभाव आज भी मौज़ूद है। फिर क़ानून का अमल कराने वाली सरकारी संस्थाओं में बैठे कर्मचारी, अधिकारीगण ख़ुद ही इस मुद्दे के प्रति संवेदनशील नज़र नहीं आते। पुलिस जहाँ एक दलित अपने ख़िलाफ़ हुई हिंसा के बारे में मामला दर्ज कराने जाता है, तो उसे वहाँ कमतर इंसान समझा जाता है। अभी भी यह भावना लोगों में घर किये हुए है कि ये लोग (दलित और महादलित) सम्मान के हक़दार नहीं हैं। ऐसे में उन्हें न्याय कैसे मिल सकेगा?

राजस्थान के जिस मामले का ज़िक्र शुरू में किया गया है, उसके विरोध में राजस्थान के ही एक कांग्रेसी विधायक पनाचंद मेघवाल ने इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने इस इस्तीफ़े में कहा है कि ऐसे मामलों की जाँच के नाम पर केवल फाइलें ही स्थानातंरित की जाती हैं। ऐसे मामले विधानसभा में उठाने के बाद भी पुलिस ने तेज़ी से कार्रवाई नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि जब हम अपने समाज के अधिकारों की रक्षा और न्याय सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं, तो हमें इस पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

अक्सर देखा गया है कि जब भी ऐसे मामले मीडिया में अपनी जगह बनाते हैं, तो सत्तारूढ़ व विपक्षी दल आपस में भिड़ जाते हैं। कुछ दिनों के बाद यह मुद्दा बासी सब्ज़ी की तरह कूड़ेदान में चला जाता है। अगर क़ानून का कड़ाई से पालन हो, तो समाज में सभी को बराबरी का माहौल तैयार करने में मदद मिले भी। स्कूलों से इसकी शुरुआत होनी चाहिए। इसके लिए पाठ्यक्रमों में कुछ समानतावादी अध्यायों को शामिल करना होगा। भेदभाव करने वाले अध्यापकों से कड़ाई से निपटना होगा। राजनीतिक धड़ों की तरफ़ से, $खासतौर से सरकारों द्वारा समानता को लेकर मज़बूत सन्देश देना और भेदभाव करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ाई से निपटना होगा। दलितों, महादलितों को केवल फ़ौरी आर्थिक राहत देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें टिकाऊ संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें भी मज़बूत करना होगा।

शिक्षा पर भी मज़हबी रंग!

मज़बूत शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश के विकास और समृद्धि का आधार होती है। चाणक्य ने कहा है कि शिक्षा के बिना इंसान का जीवन कुत्ते की पूँछ की तरह होता है। जिस प्रकार कुत्ते की पूँछ उसके किसी काम की नहीं होती, ठीक उसी प्रकार शिक्षा विहीन मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं होता। शिक्षा की शुरुआत घर और समाज से होती है। इसके बाद स्कूल आता है। पिछले एक दशक में भारत में शिक्षा व्यवस्था पर कमज़ोर होने के आरोप लगे हैं। एक तरफ़ जहाँ स्कूलों तक बच्चों के जाने की सुविधाएँ बढ़ रही हैं, स्कूलों की ख़राब होती दशा और कोरोना में ठप हुई बच्चों की पढ़ाई ने चिन्ता बढ़ायी है। हालाँकि पिछले चार-पाँच दशक में दाख़िले के आँकड़े बढ़े हैं, जिसके पीछे छात्रवृत्ति और मिड-डे मील जैसी योजना का योगदान रहा है। लेकिन इससे न ही शिक्षा की गुणवत्ता में ख़ास सुधार हुआ और न ही निम्न वर्ग से आने वाले बच्चों की दशा में।

इसी का नतीजा रहा कि झारखण्ड में शिक्षा का स्तर भी गिरा और मज़हबी जुनून भी हावी हुआ। राज्य के विभिन्न ज़िलों में स्थानीय लोगों के दबाव में स्कूल के नाम में उर्दू शब्द जुड़ गया। मज़हब के तौर पर स्कूलों का इस्तेमाल किया जाने लगा है। रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश होने लगा। वहीं बच्चे हाथ मोडक़र प्रार्थना करने लगे हैं। यह लम्बे अर्से से चल रहा। जब मामले का ख़ुलासा हुआ, तो सरकार हरकत में आयी। स्कूलों के नाम ठीक कराये गये। अधिकारियों और शिक्षकों पर दबाव बनाया गया। हालाँकि कुछ इलाक़ों के स्कूलों की स्थिति थोड़ी बदली है। लेकिन कितने समय तक बदली रहेगी और भविष्य में इस तरह की घटना दोबारा नहीं होगी, यह कहना मुश्किल है। क्योंकि समस्या सामाजिक है। दरअसल समाज में जो धर्म का ज़हर घुल रहा, उसका असर झारखण्ड के स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर दिख रहा। इसे दूर करने की ज़रूरत है। न कि दबाव बनाकर तात्कालिक लीपापोती कर मामले को टालने की। नहीं तो आने वाले दिनों में मामला फिर से तूल पकड़ सकता है।

519 स्कूलों में बदलाव हैरानी की बात है कि झारखण्ड में राज्य के गढ़वा, दुमका और जामताड़ा समेत कई ज़िलों में सरकारी स्कूलों के नाम बदल दिये गये। सरकारी स्कूलों के नाम में उर्दू शब्द जुड़ गया और स्कूल के बोर्ड पर भी लिख गया। इन स्कूलों का नाम राजकीय प्राथमिक विद्यालय या राजकीय प्राथमिक मध्य विद्यालय था। इन्हें एक साज़िश के तहत बदलकर ‘राजकीय उर्दू प्राथमिक विद्यालय’ और ‘राजकीय उर्दू प्राथमिक मध्य विद्यालय’ लिख दिया गया। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि पूरे राज्य में 519 स्कूल थे। इसी तरह इन स्कूलों में रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश होने लगा। विभागीय जानकारी के अनुसार, देवघर के 156 स्कूलों, गोड्डा के 88, गिरिडीह के 67, पलामू के 50, दुमका के 10, जामताड़ा के 10, गढ़वा के 10, साहिबगंज के आठ, लातेहार के सात, पूर्वी सिंहभूम के पाँच, कोडरमा, चतरा, रामगढ़ और रांची के दो-दो और गुमला व सरायकेला के एक-एक स्कूल के नाम बदले दिये गये थे। वहीं राज्य के इन ज़िलों के 519 स्कूलों में रविवार की जगह शुक्रवार को छुट्टी हो रही थी। हालाँकि इस तरह के स्कूल सरकारी आँकड़े से अधिक हों, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

घातक प्रयास

स्कूल वो जगह है, जहाँ बच्चों का भविष्य बनाया जाता है। उन्हें अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छा नागरिक बनने का भी पाठ पढ़ाया जाता है। समानता, समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए खोली गये इन्हीं स्कूलों में अगर नौनिहालों का मन बदलने का प्रयास हो, तो यह भविष्य के लिए घातक साबित होगा। राज्य के 519 स्कूलों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ स्कूलों में बच्चे नियम के तहत प्रार्थना नहीं करते। वे हाथ जोडऩे के बजाय हाथ बाँधकर खड़े रहते हैं। कई बच्चे हैं, जो हाथ जोडक़र या खोलकर प्रार्थना करने का अर्थ भी नहीं समझते हैं। फिर हाथ न जोडऩे की सोच उनमें कौन भर रहा है? स्कूलों के नाम बदलने में भी बच्चों की भूमिका का सवाल नहीं है। ज़ाहिर है कुछ परिवारों और समाज से यह मानसिकता स्कूलों तक पहुँच रही है।

विधानसभा में उठा मामला
स्कूलों के नाम बदलने और छुट्टी के दिन बदलने का मामला मानसून सत्र के दौरान झारखण्ड विधानसभा में उठा। विधायक अनंत कुमार ओझा ने स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से इस सम्बन्ध में जानकारी माँगी थी। विभाग ने बताया है कि इस सम्बन्ध में विभिन्न ज़िलों से प्रतिवेदन प्राप्त हुआ है। वस्तुस्थिति यह है कि राज्य के 407 स्कूलों में स्थानीय स्तर पर उसे उर्दू स्कूल घोषित किया गया था। इसी तरह से राज्य भर के 509 ऐसे स्कूलों का पता लगा, जिसमें रविवार को निर्धारित सरकारी अवकाश की बजाय शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश दिया जा रहा था। कई स्कूलों में एक विशेष समुदाय द्वारा हाथ जोडक़र प्रार्थना करने से मना किये जाने के सवाल पर भी स्कूली शिक्षा विभाग ने जानकारी दी।

एनआईए जाँच की माँग
पिछले दिनों लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे ने भी इस मुद्दे को उठाया था। सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया कि झारखण्ड में 1,800 स्कूलों में रविवार की बजाय शुक्रवार को छुट्टी हो रही है। उन्होंने कहा कि यह प्रमाणित करता है कि देश इस्लामीकरण की तरफ़ बढ़ रहा है। उन्होंने सदन में शून्यकाल के दौरान यह विषय उठाते हुए कहा कि इस मामले की जाँच राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से कराई जाए, ताकि कड़ा सन्देश दिया जा सके।

देरी से उठा पर्दा
राज्य के 24 ज़िले हैं। यह मामला 16 ज़िलों तक पहुँचा। यह साज़िश लम्बे समय का परिणाम है। हालाँकि यह सब सरकारी या विभागीय आदेश पर नहीं हुआ। विशेष समुदाय के स्थानीय लोगों और नेताओं के दबाव में हुआ। लेकिन हैरानी है कि इसकी भनक शिक्षा विभाग और स्थानीय अधिकारियों को नहीं लगी। या यह कहें कि इस गतिविधि को नज़रअंदाज़ किया गया। सवाल यह है कि आख़िर स्कूलों के शिक्षकों ने इस बारे में शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी? सरकार भी काफ़ी देर बाद तब जागी, जब मीडिया में इस मामले का ख़ुलासा हुआ। फ़िलहाल स्कूल के नाम से उर्दू शब्द हटाने का आदेश जारी कर दिया गया। शुक्रवार की जगह रविवार को अवकाश बनाये रखने का आदेश दिया गया। सवाल यह है कि सरकार कब तक विशेष समुदाय की इस सोच पर रोक लगा सकेगी? क्योंकि जिन स्कूलों में यह सब हुआ, वो सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में हैं। लेकिन यहाँ सनातन और दूसरे धर्मों के भी बच्चे हैं। बच्चों को इस राजनीति का अंजाम नहीं मालूम है, उन्हें तो सिर्फ़ मोहरा बनाया जा रहा है। समाज में घर्म का नशा घोला जा रहा है। नौनिहालों को इसमें शामिल किया जाना समाज और देश के लिए घातक है।

स्कूल केवल शिक्षा का मन्दिर
मैं ख़ुद एक क्रिश्चन माइनॉरिटी स्कूल का छात्र रहा हूँ। स्कूल में ईसाई समुदाय की तरह प्रार्थना कराया जाता था। प्रार्थना के शब्द ‘अवर फादर, हू आर्ट इन हेवन….’ लगभग 32 साल बाद आज भी याद हैं। इसे सभी छात्र करते थे। चाहे वे किसी भी धर्म के हों। मेरी तरह लाखों-करोड़ों की संख्या में लोग होंगे, जो जिस भी स्कूल में पढ़ते थे, वहाँ के निर्धारित तरीके से ही प्रार्थना करते थे। स्कूल में या बच्चों में मज़हब और धर्म जैसे शब्द नहीं होते थे। स्कूल केवल शिक्षा का मन्दिर हुआ करता था।

कालांतर में इसमें बदलाव आने लगा है, जो धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। राजनीतिक और सामाजिक गड़बड़ी और कुरीतियों का असर शिक्षा पर छाने लगा। यही झारखण्ड के स्कूलों में भी हुआ। सामाजिक दबाव, राजनीति के खेल और वोट बैंक ने स्कूलों की व्यवस्था को बदला। बच्चों की सोच को बदलने का प्रयास किया जा रहा। ऐसी बातों को प्रश्रय देने का सीधा-सीधा निहितार्थ यही है कि धर्म के आधार पर समाज का बँटवारा। धार्मिक वैमनस्यता की विष बेल रोपना स्वीकार्य नहीं हो सकता। इस तरह तो एक नई और बेहद विध्वंसक परम्परा की शुरुआत हो जाएगी। स्कूली शिक्षा को इससे अलग रखना आवश्यक है। इस पर समाज के सभी वर्ग, जाति, धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को सोचना होगा। शिक्षा का वह मन्दिर जहाँ हम इकबाल का लिखा हुआ गीत एक सुर में सीख कर गाते हैं कि ‘हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा।’ इसे कायम रखना होगा। तभी भविष्य सुदृढ़ हो सकेगा। समानता, समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए खोली गयी संस्थाएँ राजनीति का अखाड़ा बनाने से रोकना होगा। तभी भविष्य में धर्म और जाति का विष बेल बड़ी होकर समाज को और नहीं बाँट सकेगी।