Home Blog Page 1484

अव्यवस्था की आहुतियां

मौनी अमावस्या का स्नान. इलाहाबाद के संगम तट पर देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक से उमड़ी करीब तीन करोड़ श्रद्धालुओं की भीड़. स्नान के बाद सभी को अपने-अपने घर जाने की जल्दी. इन सब के बीच प्रशासन व रेलवे की आधी अधूरी तैयारी. इस सबका परिणाम 10 फरवरी की रात रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर छह पर भगदड़ के रूप में देखने को मिला, खामियाजा 36 श्रद्धालुओं को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा. घटना क्यों और कैसे हुई, इसमें दोष किसका था, इस पर मंथन करने के बजाए केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार दोनों ने ही एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया.

सबसे पहले हम बात शुरू करते हैं घटना वाले दिन यानि 10 फरवरी की जिस दिन मौनी अमावस्या का स्नान था. दरअसल उस दिन रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर पौने दो घंटे के अंतराल पर दो बार भगदड़ मची थी. पहली बार भगदड़ देर शाम करीब सात बजे हुई थी. स्टेशन पर दस प्लेटफार्म हैं जिसमें से छह नम्बर प्लेटफार्म सबसे बड़ा है. इस प्लेटफार्म से बिहार, झारखंड सहित पश्चिम बंगाल की तरफ जाने वाली रेलगाडि़यों को चलाया जाता है. शाम सात बजे इस प्लेटफार्म पर पटना को जाने वाली रेलगाड़ी खड़ी थी. दूसरे प्लेटफार्मों से इस प्लेटफार्म को जोड़ने वाले फुटब्रिज पर यात्रियों की भारी भीड़ पटना जाने वाली रेलगाड़ी को पकड़े के लिए बढ़ी आ रही थी. इसी बीच यात्रियों में किसी तरह यह अफवाह फैल गई कि गाड़ी छूट रही है. फुटब्रिज पर चलने वाले यात्रियों को जैसे ही पता चला कि ट्रेन छूट रही है वे एक दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में धक्का-मुक्की करते हुए बढ़ने लगे और पल भर में ही वहां अव्यवस्था फैल गई जिसके कारण भगदड़ मच गई.

इस घटना के बाद भी न तो रेलवे ने और न ही प्रशासन ने कोई सबक लिया. घटना के समय मौके पर ड्यूटी दे रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के दो सिपाहियों ने तहलका को बताया, ‘सात बजे वाली घटना के बाद भी स्टेशन पर आने वाली भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए न तो अतिरिक्त पुलिस बल लगाया गया और न ही भीड़ का डायवर्जन किया गया. जिससे भीड़ का दबाव प्लेटफर्मों पर कुछ कम हो सके.’ इसका नतीजा यह रहा कि रात करीब पौने नौ बजे दूसरी बार प्लेटफार्म नम्बर छह पर उतरने वाले फुटब्रिज की सीढि़यों पर दोबारा भगदड़ मच गई.

इस घटना के बाद भी न तो रेलवे ने और न ही प्रशासन ने कोई सबक लिया.फुटब्रिज से नीचे जाने वाली सीढ़ियों से आने वाले और जाने वाले दोनों ही तरफ के रास्तों यात्रियों का भारी दबाव था. पुलिस के चंद सिपाहियों ने मानव श्रंखला बनाते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर आने व जाने वाले यात्रियों को अलग-अलग करने का पहले प्रयास किया लेकिन कुछ देर में ही भारी भीड़ के कारण पुलिस का यह प्रयोग धराशाई हो गया. भीड़ अनियंत्रित होते देख जवानों ने लाठी पटकना शुरू किया जिससे स्थिति और भी विकराल हो गई. लोग एक दूसरे पर गिरने लगे और सीढ़ी पर भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई. दोनों ही भगदड़ों में 36 लोगों की मौत हुई और 100 से अधिक लोग घायल हुए. मौके पर मौजूद रेलवे के कर्मचारी बताते हैं कि स्टेशन पर ऐसी स्थिति इस लिए हुई क्योंकि सिविल लाइंस साइड और सिटी साइड दो ओर से यात्रियों का दबाव बढ़ने लगा जिससे भारी भीड़ आमने सामने आ गई और स्थिति अनियंत्रित हो गई.

रेलवे व जिला प्रशासन दोनों ने ही घटना को छुपाने का भरसक प्रयास किया. घटना की जानकारी बाहर तक न जाए इस बात को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों ने तत्काल शवों को हटवा कर साफ-सफाई करवा दिया. इसके बावजूद घटना कितनी वीभत्स थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे दिन भी प्लेटफार्म नम्बर छह से लेकर फुटब्रिज की सीढि़यों तक पर जगह-जगह बिखरे जूते-चप्पल, यात्रियों के सामान व खून से रंगे कपड़े 10 फरवरी के रात की कहानी बयां कर रहे थे.

मेला प्रशासन व प्रदेश सरकार दोनों ने ही मौनी अमावस्या के स्नान वाले दिन करीब तीन करोड़ श्रद्धालुओं के संगम तट पर एकत्र होने का अनुमान लगाया था. श्रद्धालुओं को स्नान के बाद सकुशल उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए राज्य सकार ने उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों व केंद्र सरकार ने रेलगाडि़यां उपलब्ध कवाने का वायदा किया था. स्नान के बाद श्रद्धालुओं को उनके गंतव्य तक पहुंचाने की दोनों ही सरकारों की यह कवायद सिर्फ कागजों तक ही सीमित रही.

यदि हम राज्य सरकार की व्यवस्था पर नजर डालें तो यात्रियों के आवागमन के लिए उसके पास परिवहन निगम की बसों का संसाधन उपलब्ध था. मौनी अमावस्या के स्नान के लिए करीब छह हजार बसों को चलाने की तैयारी थी. लेकिन ऐन मौके पर राज्य सरकार की यह व्यवस्था धरी की धरी रह गई. 10 फरवरी को सरकार व परिवहन निगम श्रद्धालुओं के लिए मात्र 3445 बसें ही उपलब्ध करा पाया. इन बसों के माध्यम से मात्र ढ़ाई लाख के करीब श्रद्धालु ही निकल पाए. परिवहन निगम के सूत्र बताते हैं कि पूरे प्रदेश से दो हजार बसें स्नान वाले दिन इलाहाबाद पहुंचनी थी लेकिन पहुंच नहीं सकीं. यात्रियों के लिए जो 3445 बसें उपलब्ध भी थीं उनमें से भी सैकड़ों बसें सड़कों पर यात्रियों की भारी भीड़ के कारण शहर के भीतर ही प्रवेश नहीं कर सकीं. इन बसों से मात्र ढ़ाई लाख यात्री ही रवाना किए जा सके. बसें उपलब्ध न होने के कारण भीड़ निराश होकर रेलवे स्टेशन की ओर रवाना होने लगी.

भगदड़ मचने की वजह से काफी संख्या में श्रद्धालु हताहत हुए

स्नान वाले दिन रेलवे ने हर आधे घंटे पर एक रेलगाड़ी चलाने का प्लान बनाया था लेकिन यह व्यवस्था भी शुरू नहीं हो सकी. अप-डाउन मिला कर कुल 58 रेलगाडि़यां ही चल सकीं. रेलवे की लापरवाही का आलम यह रहा कि रूटीन की जो रेलगाडि़यां इलाहाबाद से चलती थीं उनमें भी कटौती कर दी गई. प्रयाग पैसेंजर, इंटर सिटी एक्सप्रेस और बरेली पैसेंजर जैसी नियमित गाडि़यों को रद्द कर दिया गया. जो गाड़ियां चलीं उनसे मात्र ढाई से तीन लाख के बीच ही यात्रियों को रेलवे इलाहाबाद से बाहर निकालने में सफल रहा. इस तरह देखा जाए तो इतने बड़े स्नान वाले दिन मात्र पांच से साढ़े पांच लाख यात्रियों को ही बस व रेलगाड़ी से उनके गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था राज्य व केंद्र सरकार कर सकी थी. ऐसी स्थिति तब थी जब कि कुंभ का स्नान शुरू होने से पहले ही इस बात का आंकलन लग चुका था कि मौनी अमावस्या के स्नान पर करीब तीन करोड़ श्रद्धालुओं की भीड़ तीर्थराज प्रयाग में उमड़ेगी.

घटना का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि स्नान के बाद भीड़ को लगातार स्टेशनों की ओर रवाना करने पर मेला प्रशासन ने जोर दिया. इसके लिए बाकायदा माइक से मेले में एनांउंस किया जा रहा था कि श्रद्धालु जल्द से जल्द नहा कर घाट खाली कर के रेलवे स्टेशन व बस स्टेशन की ओर प्रस्थान करें. वहां से उनके गंतव्य को जाने के लिए पर्याप्त संख्या में बस व रेलगाडि़यां मौजूद हैं. पुलिस विभाग के एक अधिकारी कहते हैं,’ भीड़ एक साथ स्टेषनों पर न पहुंचे इसके लिए प्रशासन को चाहिए था कि इलाहाबाद के अन्य दर्शनीय स्थलों का भी प्रचार प्रसार किया जाता. ताकि श्रद्धालु इन स्थानों को देखते हुए स्टेशनों तक पहुंचते तो भीड़ का दबाव रेलवे स्टेशन पर एक साथ न बढ़ता.’ रेलवे स्टेशन के आसपास जो फोर्स लगा था उसे भी इस बात का प्रषिक्षण नहीं दिया गया था कि अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले यात्रियों को किन-किन रास्तों से स्टेशन परिसर में प्रवेश कराना है. जबकि अलग-अलग दिशाओं में जाने वाले यात्रियों के लिए अलग-अलग गेट स्टेशन परिसर में आने के लिए बनाए गए थे. फिलहाल मेला प्रशासन जागा लेकिन घटना के बाद. घटना के अगले दिन यानि 11 फरवरी को मेले में बार बार एनाउंस किया जा रहा था कि बस व रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ है तथा दोनों स्थानों पर अभी साधन भी उपलब्ध नहीं है. लिहाजा श्रद्धालुओं से अनुरोध है कि वे अगली सूचना तक मेला परिसर में ही बने रहें.

ऐसी स्थिति तब थी जब कि कुंभ का स्नान शुरू होने से पहले ही इस बात का आंकलन लग चुका था कि मौनी अमावस्या के स्नान पर करीब तीन करोड़ श्रद्धालुओं की भीड़ तीर्थराज प्रयाग में उमड़ेगी.दस फरवरी को सिर्फ रेलवे स्टेशन पर ही भगदड़ नहीं मची बल्कि मेला परिसर में भी श्रद्धालुओं को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा. पहली घटना सेक्टर 12 में दोपहर करीब एक बजे की है. वहां भारी भीड़ के कारण अचानक अफरा-तफरी का माहौल उत्पन्न हो गया जिससे भगदड़ मच गई. भारी भीड़ व भगदड़ में दबने से प. बंगाल से आए 62 साल के गोविंद राय की मौत हो गई. इस घटना के एक घंटे बाद ही सेक्टर दो में त्रिवेणी बांध के नीचे भगदड़ मच गई. गनीमत यह रही कि यहां किसी भी श्रद्धालु की मौत तो नहीं हुई, कई लोग घायल जरूर हुए.

घटना के बाद मृतकों के परिवारों को भी कम अव्यवस्था का सामना नहीं करना पड़ा. जालंधर के राजागार्डेन से एक ही परिवार के 11 लोग गंगा स्नान को आए थे. इन सभी का महाबोधि एक्सप्रेस से वापस जाने का टिकट था. परिवार के सदस्य फुटब्रिज होते हुए प्लेटफार्म नम्बर छह पर जाने की तैयारी कर रहे थे तभी भगदड़ मच गई. जिसमें परिवार के साथ आई किरन नाम की महिला की मृत्यु हो गई. किरन के भाई सतीश कुमार बताते हैं कि घटना के काफी देर बात तक प्राथमिक उपचार नहीं मिला. काफी देर बाद एक नर्स आई भी तो उसने घायलों को हाथ तक नहीं लगाया. काफी देर बाद एम्बुलेंस आई जिसमें किरन को डाल कर सीधे स्वरूपरानी अस्पताल पहुंचाया जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. सतीश बताते हैं, ‘घटना के बाद अस्पताल तक पहुंचने में करीब तीन घंटे का समय लग गया. समय रहते यदि किरन को अस्पताल पहुंचाया जाता तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी.’ सतीश और उनके परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई. 11 फरवरी को पोस्टमार्टम के बाद दूसरे राज्य से आए इस परिवार को प्रशासन की ओर से कफन तक नहीं दिया गया. थक हार कर परिवार के लोग खुद ही पता करते करके कहीं से 1200 रुपये में किरन के लिए एक कफन लेकर आए जिससे शव को ढका जा सका.

पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को कहा गया कि शव ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था वे खुद करें. जिस पर मोर्चरी पर मौजूद किरन के परिवार सहित दूसरे लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इतने में इलाहाबाद मंडल के कमिश्नर मौके पर पहुंच गए. स्थिति बिगड़ते देख प्रशासन ने शवों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया. सतीश व विनोद कुमार जैसे लोगों ने अपने परिजनों के शव के साथ जाने के लिए तो दूसरे वाहन की व्यवस्था कर ली लेकिन वहां ऐसे परिवार भी थे जिनके पास किराया तक नहीं बचा था.

इन्हीं में से एक मध्य प्रदेश के जबलपुर से आई चैनबाई भी थीं. स्टेशन पर हुई भगदड़ में चैनबाई की आठ साल की पुत्री मुस्कान सहित परिवार उनकी मां बिपता बाई व चाची फूलबाई की मौत हुई है. प्रशासन की ओर से मुहैया कराई जा रही एम्बुलेंस में परिवार के तीन शव रखने के बाद इतनी जगह नहीं बच रही थी कि और लोग बैठ कर घर को जा सकें. लिहाजा प्रशासन की ओर से मोर्चरी पर मौजूद कर्मचारियों ने अपने स्तर पर दूसरा वाहन करने की सलाह दी. चैनबाई बताती हैं, ‘रेलगाड़ी तक का किराया अब पास बचा नहीं है ऐसे में दूसरे वाहन का बोझ परिवार कैसे उठा पाएगा.’ लिहाजा चैनबाई ने परिवार के तीनों सदस्यों का अंतिम संस्कार इलाहाबाद के ही किसी घाट पर करने का निर्णय लिया.

भगदड़ के बाद दर्जनों की संख्या में ऐसे परिवार भी थे जिनके परिजन गायब थे. गायब लोगों का न तो मोबाइल ही काम कर रहा था और न ही परिजनों से संपर्क हो पा रहा था. सेना में सूबेदार मेजर रामेश्वर प्रसाद यादव अपनी पत्नी कुंती देवी के साथ 9 फरवरी को इलाहाबाद गंगा स्नान के लिए पहुंचे थे. पहले मेडिकल कालेज फिर स्वरूपरानी अस्पताल तक अपने पति को खोजते हुए पहुंची कुंती बताती हैं कि 10 फरवरी की शाम करीब सवा सात बजे वे पति के साथ प्लेटफार्म नम्बर छह पर बैठी थीं. उसी समय उनके पति ने अपनी जैकेट, घड़ी व मोबाइल निकाल कर देते हुए कहा कि वे शौच करने जा रहे हैं. रामेश्वर दोबारा वापस नहीं आए. कुंती बताती हैं कि पति न तो बलिया स्थित अपने घर पहुंचे हैं और न ही कोई संपर्क हो पा रहा है. लिहाजा किसी अनहोनी को सोच कर कुंती के आंसू थमने का नाम नहीं लेते.

भारी अव्यवस्था और तालमेल के अभाव के कारण हुई घटनाओं पर अब बारी केंद्र व राज्य सरकार की एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की थी. उत्तर प्रदेश सरकार घटना का ठीकरा जहां रेलवे पर फोड़ रही है तो केंद्र सरकार पूरी घटना के पीछे मेला प्रशासन की खामियां बता रही है. 

बसंत और फागुन के बीच प्रेम दिवस

बासंती बया और फागुन का पागलपन उधार लेकर बसंत पंचमी और होली के उमंग भरे त्योहारों के बीच हर वर्ष 14 फरवरी को प्रेम का नया त्योहार दस्तक देता है, वैलेंटाइंस डे. प्रेम का यह नया त्योहार आर्थिक उदारीकरण का सह उत्पाद ही तो है. 1991 के बाद से हमारे जीवन में काफी बदलाव आ चुका है. कुछ चीजें हमारे जीवन में रिक्त होती जा रही हैं और हमें उसका अहसास तक नहीं हो पा रहा. हमारे पास वस्तुएं बढ़ी हैं लेकिन रिश्ते? उनका क्या?

पहले त्योहार अपनों से मिलने के बहाने हुआ करते थे लेकिन अब वह बाजार के लिए अपना प्रॉडक्ट बेचने का एक जरिया भर हैं. इसी तरह वैलेंटाइन डे भी आता है और अचानक आसपास और बाजारों में गुलाब के फूल छा जाते हैं.

फरवरी महीने के शुरुआती दिनों बाग में गुलाब के फूलों को देखकर पता नहीं क्यों लगता है कि वह बेचारे अपनी जान की भीख मांग रहे हों. खिले हुए फूल अधखिली कलियों को अपनी पत्तियों के आंचल में छिपाते नजर आते हैं. लेकिन अंत में सब बेकार. ऐसा नहीं है कि वैलेंटाइंस डे के आने से पहले इतनी सदियां हमने बिना प्रेम के गुजार दीं. प्रेम तो हमेशा से था. यहीं हमारे बीच हमारी सांसों में हवा की तरह घुला हुआ जिसके लिए एक दिन तय करने की बात हमारे जेहन में कभी भूल से भी नहीं आई. बात अगर प्रतीकों से ही बनती हो तो हमारे पास वसंतोत्सव जैसे विनम्र आयोजन तो थे ही. लेकिन एक दिन सागर पार के आसमान से यह आक्रामक त्योहार अचानक डैने फैलाए उतरा और हमारे नन्हे मुन्ने त्योहारों को बुहार कर जाने कहां फेंक दिया. फिर भी अगर वे सामने आएं और उनको भी बाजार में बेचने की जरा सी भी गुंजाइश हो तो यह उनको कम से कम अपने उपनिवेश का दर्जा तो दे ही देगा. इतनी दरियादिली तो है ही इसमें.

वैलेंटाइंस डे यानी भावनाओं पर जेब की ताकत की स्थापना का त्योहार. दिल की नाजुकी की बातों पर चमकीली पन्नियों की जीत का त्योहार. जितना महंगा तोहफा, उतना गहरा प्रेम. इसके शब्दकोश में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है. और ऐसा हो भी क्यों न आखिर इसने प्रेम की शाश्वत भावना को एक दिन के आयोजन में जो तब्दील कर दिया है. ऐसे में स्वाभाविक ही है कि 13 फरवरी की रात तक जो केवल लड़कियां होती हैं, 14 फरवरी की सुबह नींद खुलने पर वे सब प्रेमिकाएं बन चुकी होती हैं. इसके बाद शुरू होगा धावों का सिलसिला.

प्रेमीगण अपनी प्रेमिकाओं के लिए फूलों पर धावा बोलेंगे, संस्कृति के ठेकेदार इन प्रेमी-प्रेमिकाओं पर धावा बोलेंगे और भारतीय संस्कृति को ‘नष्ट’ होने से बचा लेंगे. वैलेंटाइंस डे की आलोचना का आधार केवल छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चिंता नहीं है. वैश्विक ग्राम की अवधारणा के बीच ऐसे सांस्कृतिक मेल से बचना संभव नहीं है. लेकिन क्या वाकई यह प्रेम का त्योहार है, या फिर पहले से ही अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रही जनता का दम निकालने वाला बाजार का एक और औजार भर है? अगर यह प्रेम का त्योहार है तो इसका तोहफों से इतना गहरा नाता क्यों है?

जिस तरह महंगी चॉकलेटों ने हमारी देसी मिठाइयों को चलन से बाहर करने का काम किया है मुझे डर लगता है कि यह बाजारू त्योहार जो अपने साथ रोज डे, प्रपोज डे, चॉकलेट डे और न जाने कौन-कौन से डे लाता है वह कहीं हमारे लिए होली और दिवाली के विकल्प भी न पेश कर दे. प्यार केवल दिखावा और मात्रा बनकर न रह जाए बल्कि बचा रहे हमारे अंतर्मन में हमारी ताकत बनकर. इसके लिए थोड़ी उम्मीद और थोड़ी प्रार्थना तो बनती है.

‘अफजल की फांसी एक सियासी कत्ल है’

अफजल गुरु की फांसी को आप किस रूप में देखते हैं?
देखिए, जब 2001 में संसद पर हमला हुआ था तो उस समय हमने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की थी. जहां तक अफजल गुरु का संबंध है तो वो उस हमले में शामिल नहीं थे. उनके खिलाफ हमले की साजिश में शामिल होने का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं था. ट्रायल कोर्ट में जब यह मामला गया तो उनको न तो कोई वकील मिला और न ही अफजल को अपनी सफाई पेश करने का कोई मौका दिया गया. बिना अपना पक्ष रखने का मौका दिए एक व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया गया.

लेकिन अफजल का केस सभी न्यायिक चरणों से गुजरा है. सभी कानूनी विकल्प समाप्त हो चुके थे. 
ये अलग बात है. लेकिन ये पूरी तरह सच है कि ट्रायल कोर्ट में उसको अपनी सफाई पेश करने का मौका नहीं दिया गया. ऐसे में जब अफजल के मामले की शुरुआत ही अन्याय से हुई तो फिर उसके बाद सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ इसका कोई मतलब नहीं रह जाता. फिर जब उसको फांसी दे दी गई तो फांसी से पहले उसका हक बनता था कि उसको अपने परिवारवाले, अपनी बीवी, अपने बच्चे से मिलने का मौका दिया जाता. सरकार ने फांसी की सूचना वाली जो चिट्ठी अफजल के परिवारवालों को भेजी वो फांसी लगने के दो दिन बाद उन्हें मिली.

क्या आपको लगता है कि अफजल को अभी फांसी देने का फैसला राजनीति से प्रेरित था?
बिल्कुल.अफजल को फांसी देने के लिए बीजेपी की तरफ से लगातार दबाव बना हुआ था. ये लोग कांग्रेस और उसकी सरकार पर लगातार हमला करते हुए कहते कि आप अफजल गुरु को बचा रहे हो. बीजेपी का दबाव एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से यह फैसला हुआ. कांग्रेस ने बीजेपी के हाथ से अफजल का मुद्दा छीनने के उद्देश्य से अफजल को फांसी दी. ये सब 2014 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए किया गया. इस तरह से अफजल की फांसी एक सियासी कत्ल भी है. पहले ये ज्यूडिशियल मर्डर बनता है क्योंकि उनको अपनी सफाई पेश करने का मौका नहीं दिया गया. दूसरा ये सियासी मर्डर भी इसलिए बनता है क्योंकि यह राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर किया गया.

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि गिलानी समेत अन्य पृथकतावादी नेता जो फांसी पर आज घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं उन्होंने अफजल के जीते जी उसकी मदद क्यों नहीं की. अगर उसे ट्रायल कोर्ट में वकील नहीं मिला तोइन्होंने अपनी तरफ से वकील की व्यवस्था क्यों नहीं कराई?
उमर अब्दुल्ला की बातें छोड़ दीजिए. वो तो इक्तेदार (सत्ता) के पुजारी लोग हैं. इन लोगों को पावर और अपनी कुर्सियों से मतलब हैं. इन्हें जम्मू-कश्मीर के लोगों से कोई हमदर्दी नहीं है. उनकी बात रद्देअमल (प्रतिक्रिया) के लायक नहीं है. ये लोग इक्तेदारपरस्त रहे हैं हमेशा से. इनके पिता को देखा, इनके दादा को भी देखा है और अब इन्हें भी देख रहा हूं. मैं इन्हें अच्छी तरह से जानता हूं.

लेकिन फिर भी ये प्रश्न तो है ही कि अगर आप लोगों को लगता था कि अफजल को वकील नहीं मिल रहा है, न्याय नहीं मिल रहा, तो आपलोगों ने उसके लिए क्या किया.
जो कुछ हो सकता था वो सब हमने अफजल के लिए किया.   

आपके हिसाब से अफजल गुरु की फांसी का जम्मू-कश्मीर पर क्या असर पड़ेगा?
देखिए, वहां के लोगों का अब तक जो ये ख्याल रहा है कि हम भारत सरकार के कब्जे में है, जो हमारे ऊपर बंदूक के दम पर शासन कर रही हैं. अफजल की फांसी के बाद यह ख्याल और भावना और गहरी तथा मजबूत होगी. अलगाव की भावना और भारत के प्रति नफरत और बढेगी. इसकी झलक आपको दिखाई दे रही है. घाटी में कर्फ्यू लगने के बाद से अब तक चार जवानों को शहीद कर दिया गया है. 50 के करीब लोग जख्मी हो चुके हैं.    

अफजल गुरु के परिवारवालों से क्या आपकी कभी कोई मुलाकात हुई है?
हां, हम उनसे मिलते रहे हैं. वो तो हमारे हमसाया है. 

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सह-संस्थापक मकबूल भट की फांसी से अफजल की फांसी की तुलना की जा रही है. क्या घाटी में अब भी वो हालात हैं जिससे भट के समय की अराजकता दोबारा पैदा हो सके?
पूरी घाटी में 9 फरवरी से ही कर्फ्यू लगा हुआ है. इससे ज्यादा हालात की खराबी का और क्या सूचक हो सकता है? लोगों को बुनियादी जरूरतों से वंचित रख जा रहा है. उन्हें घरों से बाहर नहीं आने दिया जा रहा. कश्मीरियों के मन में मकबूल भट के समय से भी ज्यादा आज गुस्सा है. बहुत ज्यादा नफरत है. भारत के साम्राज्यवाद के खिलाफ लोगों के अंदर सालों से गुस्सा जमा होता जा रहा है. ऐसे माहौल में वहां के लोगों की तरफ से मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं. आपकी हुकूमत आपकी लीडरशीप, आपका मीडिया जम्मू-कश्मीर के लोगों को इंसान नहीं मानता.

हड्डियां कमजोर क्यों हो जाती हैं ?

इलस्टेशन:मनीषा यादव

gyan--skeletonबुढ़ापे में तो हड्डियां कमजोर हो ही जाती हैं, पर इस कमजोरी के तात्पर्य क्या हैं? इसका कारण तथा इलाज क्या है? क्या जवानी या अधेड़ उम्र में हड्डियां कमजोर हो सकती हैं? आजकल ‘हर डॉक्टर कह देता है’ कि ‘बोन डेन्सिटी’ की जांच करा लें जिससे पता चल सके कि आपकी हड्डियां कमजोर तो नहीं हो रहीं? हर मरीज को खून में विटामिन-डी का लेवल जांच करने को भी बोल देते हैं साहब- ये विटामिन-डी का क्या चक्कर है? बहुत-सी बातें हैं, बहुत-सी गलतफहमियां हैं, बहुत-सी धंधे वाली बातें हैं और बहुत सी ऐसी सूचनाएं हैं जिनको आप जानें तो बेहतर रहेगा.

मैं अगले एक-दो अंकों तक आपको हड्डी कमजोर होने का फंडा समझाने की कोशिश करूंगा.

इसे चिकित्सा शास्त्र में आस्टियोपोरोसिस कहते हैं.  मतलब यह कि शरीर की हड्डियों की शक्ति इतनी कम हो जाए कि हड्डी टूटने का खतरा कई गुना बढ़ जाए. हड्डियां खोखली-सी होने लगें. ढांचा तो खड़ा हो और पलस्तर झर-सा जाए. फिर छोटी-सी चोट से, या कभी-कभी तो पता ही न चले और हड्डी टूट जाए. जी हां, ऐसा भी हो सकता है कि दर्द न हो और आपका मेरुदंड या रीढ़ की कोई हड्डी टूट जाए. आपने शायद कभी ध्यान दिया हो कि मीनोपॉज (रजोनिवृति) के बाद, बुढ़ापे में कई औरतों का कद छोटा हो जाता है. यह बौनापन कैसे? रीढ़ की कई हड्डियां धीरे-धीरे टूटकर पिचक जाती हैं तो रीढ़ छोटी हो जाती है. इससे कद कई इंच तक छोटा हो सकता है. प्राय: आस्टियोपोरोसिस में सबसे ज्यादा फ्रैक्चर रीढ़ की हड्डियों के ही होते हैं, या फिर कूल्हे की हड्डी के. रीढ़ की हड्डी का टूटना इस मामले में थोड़ा अनोखा है कि हड्डी टूटने से वैसा दर्द कभी नहीं भी होता है जैसा हम हड्डी टूटने पर होने की सोचा करते हैं.

हां, टूटी हड्डी से कोई नस दब जाए तब बहुत दर्द होगा, अन्यथा हल्का या तेज कमर दर्द हो सकता है. हो सकता है कि विशेष दर्द हो ही न, लेकिन रीढ़ के टूटने पर दर्द को छोड़कर अन्य बहुत सी और तकलीफें हो सकती हैं. मानो कि छाती की हड्डी यदि टूट जाए तो सांस फूलने की तकलीफ हो सकती है, पेट तथा कमर के हिस्से की  हड्डी टूट जाए तो पेट की तकलीफें हो सकती हैं.

यदि आपको गैस से पेट फूला लगे, भूख लगे पर एक रोटी खाकर ही लगे कि बहुत सारा खा लिया, यदि आपको कब्जियत होने लगी हो- और आपकी जांच करके यदि डॉक्टर कहे कि यह सब इसीलिए हो रहा है कि आपकी रीढ़ की हड्डी टूट गई है तो आप विश्वास ही नहीं करेंगे. पर ऐसा हो सकता है फिर कमर टेढ़ी होना, कमर का झुक जाना आदि भी प्राय: रीढ़ की हड्डी कई जगह से टूट जाने के कारण होता है.

और यह सब कुछ रोका जा सकता था! कैसे?

वैसे तो बढ़ती उम्र में यह रोग पुरुष और स्त्री दोनों को हो सकता है परंतु स्त्रियों में यह बहुत आम है. 50 वर्ष से ऊपर की स्त्री को इसका खतरा होता है. और फिर बढ़ता ही जाता है. ऐसा मान लें कि 70-80 वर्ष की उम्र की हर स्त्री को आस्टियोपोरोसिस होता ही है.

आंकड़े बताते हैं कि कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा 70 वर्ष की उम्र के बाद हर पांच वर्ष में दोगुना होता जाता है. 50 से 60 वर्ष की उम्र में तो हाथों की हड्डी का फ्रैक्चर ज्यादा होता है, 60 वर्ष के बाद कूल्हे की हड्डी का. यह शायद इसलिए भी कि 70 वर्ष की उम्र के बाद आदमी के लड़खड़ा कर गिरने की आशंका बढ़ जाती है. देखा गया है कि 60 वर्ष तक का आदमी प्राय: गिरते समय, बचने के लिए अपने हाथ फैला लेता है- सो हाथ के बल गिरने से उसकी हाथ की हड्डी ज्यादा टूटती है. इसके विपरीत सत्तर या उसके आस-पास का आदमी, सीधे ही, धड़ाम से गिरता है तो सीधी चोट कूल्हे और कमर पर लगती है. इसी कारण यह हाथ और कूल्हे की हड्डी टूटना उम्र के हिसाब से अलग हो सकता है.

यदि बुढ़ापे के साथ आदमी का वजन कम हो, वह खूब दारू पीता रहा हो और धकाधक सिगरेट भी पीता है- तब उसकी हड्डियां और भी कमजोर हो जाती हैं. वास्तव में डॉक्टर मानते हैं कि 50 वर्ष से ऊपर के आदमी की हड्डी किसी भी चोट से (चाहे छत से गिरकर ही क्यों न टूटी हो!) टूटे, हम मानेंगे कि इस टूटने में आस्टियोपोरोसिस का भी हाथ है. हड्डी जोड़ने के साथ हम उसकी यह जांच तथा इलाज भी करेंगे.

अब प्रश्न यह उठता है कि आस्टियोपोरोसिस होती क्यों है. क्या यह मात्र कैल्शियम की कमी से हो जाती है? हड्डियां, बढ़ती उम्र के साथ हल्की तथा कमजोर क्यों होने लगती हैं?

इसे समझेंगे तभी हम समझ पाएंगे कि इसे कैसे रोकें, या कम करें? इसे यूं समझिए कि बचपन से लेकर किशोरावस्था तक तो हमारी हड्डियां बनती हैं. बढ़ती हैं. विकसित होती हैं. मोटी होती हैं. विभिन्न गतिविधियों (चलने, दौड़ने, कूदने, वजन उठाने आदि) के हिसाब से हड्डियों का आकार तथा मजबूती तय होती है. खास तौर पर जवान होते-होते शरीर में जो सेक्स हार्मोंस बनने लगते हैं, वे भी हड्डी के विकास में मदद करते हैं. तो यूं समझें कि पैदा होने से लेकर किशोर अवस्था तक तो हड्डियां विकसित होती हैं, मजबूत होती हैं, बड़ी होती हैं. उसके बाद हड्डियों का बढ़ना बंद हो जाता है. अब केवल मरम्मत का ही काम चलता है. जवानी के बाद आपकी हड्डी मजबूत नहीं हो रही. जितनी मजबूत हो चुकी थी, वैसी बनी रहे, इसके लिए शरीर उसकी मरम्मत करता रहता है, बस. दिन भर की उठापटक, भागदौड़ में हड्डियों को जो सूक्ष्म चोटें पहुंचती हैं, उनकी मरम्मत चलती रहती है. इसके अलावा खून में यदि कभी, किसी भी कारण से कैल्शियम कम हो जाए तो हड्डी में जमा कैल्शियम निकालकर काम चलाया जाता है.

इसमें हड्डी गलने और बनने (रिपेयर) का काम साथ-साथ चलता रहता है. उम्र के साथ इन दो कामों का संतुलन बिगड़ जाता है. तब हड्डी गलती ज्यादा है, बनती कम है- यही आस्टियोपोरोसिस पैदा करता है.

री-मॉडलिंग में सेक्सहार्मोंस, विटामिन डी, कैल्शियम, पैराथायरायड हार्मोंस अन्य बीमारियों (लीवर, किडनी, डायबिटीज आदि) तथा कई दवाईयों (जिनमें स्टेरॉयड्स प्रमुख हैं) का बड़ा रोल होता है. इनको अगली बार समझाऊंगा. तब तक यह जान लें कि दादी या नानी ठीक ही कहती थीं कि बचपन में जो शरीर बना लोगे वही जीवन भर साथ देगा. बचपन में खान-पान और व्यायाम का बहुत अधिक महत्व इसीलिए है.

शेष, अगली बार.

इनके दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे नहीं हैं.

नवीन पटनायक,

उम्र-66,

मुख्यमंत्री, उड़ीसा

बीजू पटनायक की मृत्यु के बाद जब 1997 में उनके 51 वर्षीय नवीन पटनायक ने राजनीति की दुनिया में अपना पहला कदम रखा तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी भाषा. वह भाषा जो उड़ीसा की आम जनता बोलती और समझती थी लेकिन नवीन नहीं. हल निकला कि वे रोमन में लिखे उड़िया भाषण पढ़ें. इधर, नवीन पटनायक रोमन में लिखे उड़िया भाषण पढ़ते और उधर सामने खड़ी जनता हंसी के मारे लोटपोट हुई जाती. तत्कालीन राजनीतिक पंडित कहते कि जो नेता जनता से उसकी भाषा में संवाद नहीं कर सकता, जो अपनी युवावस्था को कभी का पीछे छोड़ चुका है वह इस उम्र में राजनीतिक अनुभव और राजनीति से लगाव के बिना कैसे राज्य की जनता से जुड़ पाएगा. और जो जुड़ नहीं पाएगा वह चुनाव कैसे जीतेगा. कहा गया कि उनकी कुल जमा यही योग्यता है कि वे कुल (पटनायक) के दीपक हैं.

वही नवीन पटनायक पिछले 13 साल से उड़ीसा के मुख्यमंत्री हैं. जनता दल से हटते हुए उन्होंने पिता बीजू पटनायक के नाम पर दिसंबर, 1997 में बीजू जनता दल का गठन किया. 2009 में लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने नवीन ने न केवल खुद को सफल मुख्यमंत्री वरन एक ऐसे राजनेता के रूप में भी स्थापित किया है जिसकी ईमानदारी, नेतृत्व और व्यक्तित्व की चर्चा आज राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है. राजनीति में आने से पूर्व वे लेखन के क्षेत्र में थे. उनके राजनैतिक जीवन में संभवतः सबसे बड़ी परीक्षा उस समय आई जब 2008 में कंधमाल में सांप्रदायिक दंगे हुए. कंधमाल में विश्व हिंदू परिषद से जुड़े स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगे में लगभग 38 लोगों की मौत हुई थी. इस मुद्दे पर सत्तासीन बीजेडी-भाजपा गठबंधन सरकार में दरार पड़ने लगी. एक तरफ जहां नवीन के नेतृत्व वाली बीजेडी दंगे में भाजपा और उससे जुड़े समूहों की भूमिका होने की बात कर रही थी, वहीं भाजपा का मानना था कि सरकार लक्ष्मणानंद के हत्यारों को न सिर्फ खुली छूट दे रही है बल्कि ईसाई समुदाय के सांप्रदायिक तत्वों के आगे घुटने टेक रही है. दोनों दलों के बीच हुए संघर्ष का नतीजा अलगाव के रूप में सामने आया. नवीन का कहना था कि वे किसी कीमत पर सांप्रदायिकता बर्दाश्त नहीं करेंगे, सरकार रहे या जाए.  उस समय कहा गया कि भाजपा से अलग होने पर बीजेडी को काफी नुकसान होगा. लेकिन नवीन ने  2009 के लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में अकेले जाने का फैसला किया. चुनाव में न सिर्फ बीजेडी विजयी हुई बल्कि 2004 के मुकाबले उसे प्रचंड बहुमत मिला. इसका श्रेय नवीन की चुनावी तैयारियों के साथ ही उनके भाजपा के अलग होने के कठोर निर्णय को भी मिला. जानकारों का कहना था कि जनता ने एक मजबूत और गैरसांप्रदायिक व्यक्ति को वोट दिया जो उसकी सुरक्षा के लिए राजनीतिक नफे-नुकसान का गणित नहीं देखता था.

नवीन को आज राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जिसमें देश को नेतृत्व देने की संभावना है. जो पढ़ा-लिखा, संवेदनशील तथा प्रगतिशील है. जिसके दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे नहीं हैं. स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार मोहंती चंद मोहंती कहते हैं, ‘नवीन बिना किसी के दबाव में आए कड़े कदम उठाने और उस पर टिके रहने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने समय-समय पर आधे दर्जन से अधिक मंत्रियों को भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त होने की आशंका के आधार पर ही मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया है. वित्त मंत्री घादेई को नवीन ने मंत्री पद से उस समय चलता कर दिया था जब उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति होने की बात सामने आई थी.’ घादेई नवीन के बेहद करीबी लोगों में से थे. अपने पिता बीजू पटनायक के समान ही ब्यूरोक्रेसी पर मजबूत पकड़ के लिए भी नवीन की सराहना की जाती है.    

-बृजेश सिंह

मनोहरी मुख्यमंत्री!

मनोहर परिकर,

उम्र-57,

मुख्यमंत्री, गोवा

2012 की घटना है. मनोहर परिकर गोवा के मुख्यमंत्री बने ही थे. राज्य के एक पांचसितारा होटल में किसी कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था जिसमें उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था. तय वक्त पर परिकर आयोजनस्थल पर पहुंचे. लेकिन उनके साथ वह तामझाम नहीं था जो अमूमन मुख्यमंत्रियों के साथ देखने को मिलता है. गेट पर खड़ा सुरक्षाकर्मी उन्हें पहचान नहीं पाया और उसने परिकर को जांच के लिए रोक दिया. पूरी सुरक्षा जांच करने और हर तरह से आश्वस्त होने के बाद ही सुरक्षाकर्मी ने परिकर को अंदर जाने दिया. अगर उत्तर भारत के किसी मामूली नेता को भी कोई सुरक्षाकर्मी इस तरह रोक दे तो नतीजे का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.

लेकिन यह सरलता तो मनोहर परिकर के स्वभाव का सिर्फ एक पहलू है. ऐसी कई वजहें हैं जिनके चलते उनसे उम्मीदें जगती हैं. पिछले दिनों जब भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे और उनके दोबारा अध्यक्ष बनने की संभावनाओं पर आशंकाओं के बादल मंडराए तो विकल्प के रूप में जिन नामों की चर्चा प्रमुखता से हुई उनमें एक परिकर भी थे. कइयों का मानना था कि परिकर जैसा ईमानदार आदमी अगर पार्टी को संभालेगा तो कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा होगा. 

2012 में गोवा में हुए चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करके भाजपा को सत्ता में लाने वाले परिकर की छवि न सिर्फ पार्टी में बल्कि पार्टी के बाहर भी बहुत अच्छी है. गोवा में हुए चुनाव के बाद पता चला कि परिकर को वहां के ईसाइयों ने भी बड़ी संख्या में वोट दिया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वहां की खनन लॉबी के खिलाफ जिस तरह का रुख अख्तियार किया है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है. अब भी अपने निजी मकान में रहने वाले और जरूरत पड़ने पर कहीं भी स्कूटर उठाकर चल देने वाले मुख्यमंत्री की कार्यशैली की वजह से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.

13 दिसंबर, 1955 को जन्मे मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु परिकर की स्कूली शिक्षा मराठी माध्यम के स्कूल में हुई. इसके बाद उन्होंने आईआईटी मुंबई से इंजीनियरिंग की पढ़ाई 1978 में पूरी की. कम ही लोगों को मालूम होगा कि आधार परियोजना के प्रमुख नंदन नीलेकणी और परिकर आईआईटी मुंबई में एक ही बैच में थे. 1994 में वे पहली दफा विधायक बने और 1999 में गोवा विधानसभा में विपक्ष के नेता. 24 अक्टूबर, 2000 को उन्होंने पहली बार गोवा के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. 2002 में उनके नेतृत्व में भाजपा ने विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की और परिकर दोबारा मुख्यमंत्री बने. 2005 में उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर वे विपक्ष के नेता की भूमिका में आ गए. 2007 में भाजपा गोवा में विधानसभा चुनाव हार गई, लेकिन 2012 में फिर से एक बार पार्टी ने जीत हासिल की और परिकर ने तीसरी दफा प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला.

भाजपा में जो लोग परिकर की कार्यशैली को जानते हैं उनका कहना है कि वे बिल्कुल वैज्ञानिक ढंग से काम करते हैं और अगर उन्होंने कोई काम किसी को सौंपा है तो वे चाहते हैं कि तय समय में वह काम पूरा हो. बहुत कम लोगों को पता होगा कि मनोहर परिकर पहले गुटखा भी खाते थे. 2003 में जब वे बतौर मुख्यमंत्री एक स्कूल में गए तो उन्होंने छह साल के एक बच्चे को अपने सामने गुटखा खाते देखा. उन्होंने उस बच्चे को डांट लगाई और तय किया कि गोवा में गुटखा प्रतिबंधित करना है. लेकिन उनके सामने दुविधा यह थी कि वे खुद गुटखा खाते थे. ऐसे में उन्होंने पहले खुद गुटखा खाना बंद किया और फिर इसे प्रतिबंधित किया. अब उनकी तैयारी ‘गोवा’ नाम से भारत के कई हिस्सों में बेचे जा रहे गुटखे को गोवा नाम का इस्तेमाल करने से रोकने की है. इसके लिए वे जरूरी कदम उठा रहे हैं.

उनके काम करने की शैली भी ‘जरा हटके’ है. बीते जून में उनसे एक पत्रकार ने गोवा के किसी थाने के बारे में शिकायत की कि उस थाने का लैंडलाइन फोन काम ही नहीं करता. फिर क्या था परिकर ने पत्रकार से नंबर पूछकर उसके सामने ही अपने मोबाइल से वह नंबर मिला दिया. फोन लग गया. इसके बाद उन्होंने मोबाइल पत्रकार महोदय को थमा दिया. इस तरह के और भी कई उदाहरण हैं. उन्होंने 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद पेट्रोल की कीमतों में कटौती करके खूब वाहवाही लूटी. इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (आईएफएफआई) को गोवा में लाने का श्रेय भी परिकर को ही दिया जाता है.

-हिमांशु शेखर

राजनीति के 'मिस्टर क्लीन'

पृथ्वीराज चव्हाण,

उम्र-66,

मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र

इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे पृथ्वीराज चव्हाण की पॉलिटिकल इंजीनियरिंग में सफलता भविष्य के एक बेहतर राजनीतिक समाज की तरफ इशारा करती दिखती है. अब तक के अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने अलग-अलग जिम्मेदारियों को जिस तरह से निभाया है उसे देखते हुए उनसे काफी उम्मीदें जगती हैं. पीएमओ में बतौर राज्यमंत्री रहे चव्हाण विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कार्मिक लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय समेत और कई मंत्रालयों में राज्य मंत्री रहने के बाद दो साल से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाले हुए हैं.

विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद जब कांग्रेस ने अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र का मुखिया बनाया तो उसे यह भरोसा था कि उसने राज्य में नेतृत्व की समस्या हल कर ली है. लेकिन पार्टी हाईकमान ने अभी चैन की सांस ली ही थी कि आदर्श घोटाले में उसके मुख्यमंत्री पर सीधे आरोप लगने लगे. पार्टी की लगातार खराब होती छवि से चिंतित हाईकमान ने साफ-सुथरी छवि के चलते ‘मिस्टर क्लीन ’ के नाम से जाने जाने वाले पृथ्वीराज चव्हाण को प्रदेश की कमान सौंप दी. भ्रष्टाचार के आरोपों से त्रस्त कांग्रेस के लिए विवाद और भ्रष्टाचार से दूर चव्हाण राज्य में पार्टी के लिए संजीवनी साबित हुए.

हालांकि बर्कले शिक्षित एयरोस्पेस इंजीनियर चव्हाण के लिए महाराष्ट्र जैसे जटिल राज्य में बतौर मुखिया काम कर पाना बेहद कठिन था. लेकिन पिछले दो साल में उन्होंने अपने सुलझे व्यक्तित्व तथा साफ-सुथरी और सकारात्मक राजनीति की छाप छोड़ी है. हालांकि भारतीय भाषाओं के कंप्यूटरीकरण में उल्लेखनीय योगदान करने वाले चव्हाण को प्रदेश की जटिल राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था को समझने में काफी समय लगा जिसे लेकर उनकी कई हलकों में आलोचना भी हुई. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने जिस तरह से प्रदेश की राजनीतिक फिजा में घुली सड़ाध का स्रोत तलाशना शुरू किया उसने उन्हें एक नई ऊंचाई प्रदान की. मुंबई विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र जोंधाले कहते हैं, ‘उन्होंने मुंबई में व्यापारियों और बिल्डरों की अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाई. इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना बहुत हिम्मत की बात है क्योंकि इनको हमेशा से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहा है. नेताओं को ये लोग मोटा चुनावी चंदा देते और बदले में नेता इन्हें संरक्षण.’ कुछ समय बाद जैसे ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे और राज्य के उप-मुख्यमंत्री अजीत पवार सिंचाई घोटाले में फंसे, कांग्रेस ने एनसीपी के सामने अपने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की स्वच्छ छवि का उदाहरण रखते हुए एनसीपी पर अजीत से इस्तीफा दिलाने का दबाव बनाना शुरू किया. आखिरकार अजीत को झुकना पड़ा.

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता अनंत गाडगिल कहते हैं, ‘चव्हाण ने राज्य प्रशासन को बेहद पारदर्शी और सक्षम बनाया है. उन्होंने राज्य के विकास की दिशा में कई कड़े और सकारात्मक कदम उठाए हैं. कुछ लोग उनकी आलोचना करते हुए कहते हैं कि वे धीरे काम करते हैं. फाइलों पर जल्दी हस्ताक्षर नहीं करते. हकीकत ये है कि वो हर फाइल को बहुत ध्यान से पढ़ते हैं. उनसे आप किसी अनैतिक या अवैध चीज़ पर साइन नहीं करा सकते. जो लोग देरी का आरोप लगाते हैं, उनकी पीड़ा सिर्फ ये है कि मुख्यमंत्री उनकी गलत चीजों पर स्वीकारोक्ति की मोहर नहीं लगाते.’

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई पृथ्वीराज चव्हाण के व्यक्तित्व के एक अलग पहलू पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, ‘पृथ्वी चमक-दमक की राजनीति से बिल्कुल दूर रहते हैं. जिस जगह पूरा बॉलीवुड है, पैसा है, पावर है, वहां के मुखिया का इतना लो प्रोफाइल रहना एक आश्चर्य है और सुखद भी.’ एक और घटना का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ‘ सीएम बनने के बाद जब उनके मुख्यमंत्री निवास में जाने की बात हुई तो उन्होंने पहले इनकार कर दिया. बाद में पता चला कि निवास में बहुतायत में मौजूद सुख-सुविधाओं के साधनों पर उन्हें आपत्ति थी. पहले उन चीजों को वहां से निकाला गया. फिर पृथ्वीराज मुख्यमंत्री आवास में रहने गए.’

महाराष्ट्र की कराड लोकसभा सीट से तीन बार सांसद रह चुके पृथ्वीराज को भले ही महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति का कोई अनुभव न रहा हो लेकिन अपने कार्यकाल में उन्होंने जिस राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण प्रस्तुत किया वह उन्हें स्टेट्समैन के रूप में स्थापित करता है. किदवई कहते हैं, ‘आप देखिए जिस तरह से उन्होंने बाल ठाकरे के मामले को हैंडिल किया वो काफी सराहनीय है. शिवसेना ने शिवाजी पार्क में बाल ठाकरे की अंत्येष्टि की जगह पर मेमोरियल बनाने की मांग करते हुए वहां एक अस्थाई ढांचा खड़ा कर दिया. इसको लेकर राज्य में काफी हो हल्ला मचा. शिवसेना ने वहां से किसी भी कीमत पर ढांचा हटाने से इनकार कर दिया था. बाद में चव्हाण से बातचीत के बाद शिवसेना ढांचा हटाने पर राजी हो गई. जो राजनेता  शिवसेना को कुछ करने या न करने से रोक सकता है, उसकी परिपक्वता और क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है.’   

-बृजेश सिंह

दिल्लीवाले नेता!

अजय माकन,

उम्र-49,

केंद्रीय आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्री

दिल्ली प्रदेश से अपनी सियासी पारी की शुरुआत करने वाले अजय माकन को जब केंद्र की राजनीति करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी जिसके चलते लोग उनसे अच्छे काम की उम्मीद करते हैं. 2004 में पहली नई दिल्ली लोकसभा सीट जीतकर लोकसभा में पहुंचे माकन ने वैसे तो राजनीति की शुरुआत तब ही कर दी थी जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 1985 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. लोगों में उन्हें लेकर उम्मीदें तब बढ़ीं जब उन्होंने युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय का कार्यभार स्वतंत्र राज्य मंत्री के तौर पर संभाला. इस दौरान उन्होंने खेलों में व्याप्त राजनीति और खेलों से संबंधित पूरी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने का काम शुरू किया. उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा. खुद पार्टी के अंदर के कई ऐसे लोग उनके खिलाफ खड़े हो गए जो किसी न किसी खेल संगठन के आला पदों पर काबिज थे. इनके विरोध की वजह से माकन राष्ट्रीय खेल विकास कानून ला तो नहीं सके लेकिन उनकी कोशिशों से खेलों के प्रशासन को साफ-सुथरा बनाने की बहस जरूर छिड़ गई.

अपनी कार्यशैली की वजह से माकन कई बार पार्टी लाइन से अलग जाते दिखने लगते हैं,  लेकिन अच्छी बात यह है कि उनका काम लोगों के हित में दिखता है. राष्ट्रमंडल खेलों की ही बात करें. इन खेलों को सफल बनाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था. जब इन खेलों के आयोजन में धांधली की बात आई तो न सिर्फ उस समय बल्कि बाद में भी कांग्रेस ने इस पर भरसक पर्दा डालने की कोशिश की. लेकिन तहलका से हुई बातचीत में अजय माकन ने कहा, ‘अगर राष्ट्रीय खेल विकास कानून होता तो कम से कम राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में जो घोटाला हुआ वह नहीं होता. क्योंकि इन खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष और खजांची आईओए के पदाधिकारी नहीं बन पाते. इसलिए इस कानून की बहुत ज्यादा जरूरत है.’

माकन जो कानून लाना चाह रहे थे उसमें यह प्रावधान है कि देश के सभी खेल संगठनों को राष्ट्रीय खेल संगठन के तौर पर नए सिरे से मान्यता लेनी होगी. कोई भी खेल संघ निजी तौर पर काम नहीं कर सकेगा. सभी खेल संगठन सूचना के अधिकार के तहत आएंगे. उन्हें अपने आय-व्यय का ब्योरा देना होगा. यह नीति खेल संघों के प्रशासन में खिलाड़ियों की 25 फीसदी भागीदारी सुनिश्चित करने की बात भी करती है. खेल संगठनों के पदाधिकारियों की चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात भी प्रस्तावित विधेयक में की गई है. पदाधिकारियों के लिए 70 साल की उम्र सीमा तय करने की बात भी प्रस्तावित नीति में है. साथ ही एक स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल के गठन की बात भी है. इस ट्रिब्यूनल में न सिर्फ खेल संघों के झगड़ों का निपटारा होगा बल्कि खिलाड़ी भी अपनी समस्याएं यहां उठा सकते हैं.

अब माकन इस मंत्रालय में नहीं हैं और प्रस्तावित विधेयक को लेकर स्थिति साफ नहीं है. लेकिन राज्य मंत्री से प्रमोशन पाकर कैबिनेट मंत्री बने अजय माकन जिस आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय में गए हैं, वहां भी उनके पास छाप छोड़ने का अच्छा मौका है. गांधी परिवार से करीबी के चलते उन्हें कुछ लोग दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी देखते हैं. उनका मानना है कि शीला दीक्षित की उम्र को देखते हुए इस साल के चुनाव के बाद अगर नेतृत्व परिवर्तन का सवाल खड़ा होता है तो संभव है कि दिल्ली की जिम्मेदारी माकन को सौंपी जाए.

29 साल की उम्र में 1993 में पहली दफा विधायक बनने वाले अजय माकन के पास सबसे कम उम्र में किसी विधानसभा का स्पीकर बनने का रिकॉर्ड है. 2003 में वे 39 साल की उम्र में इस पद पर पहुंच गए थे. दिल्ली की परिवहन व्यवस्था में सीएनजी लागू करने का श्रेय भी अजय माकन को ही जाता है. हालांकि जब वे दिल्ली के ऊर्जा मंत्री बने तो उन्होंने बिजली का निजीकरण किया. इसकी मार आज भी दिल्लीवासियों पर बढ़े हुए अनाप-शनाप बिलों के रूप में पड़ रही है.

पुलिस अधिकारी से बने नेता

अजय कुमार

उम्र-50,

सांसद, झारखंड विकास मोर्चा

अजय कुमार उस दौर में बिहार में एसपी बने जब लालू प्रसाद यादव ने राज्य की सत्ता संभाली थी. भले ही लालू प्रसाद ने राज्य के एक बड़े वर्ग को आत्मविश्वास देने का काम किया हो लेकिन उनके कार्यकाल का एक दूसरा सच यह भी है कि बिहार में अपराधियों का बोलबाला बढ़ा और राजनीतिक दबाव ने कानून-व्यवस्था को भोथरा बनाना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रशासन और व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठने लगा. ऐसे समय में अजय कुमार जैसे अधिकारियों ने आकर जिस तरह से अपराधियों के खिलाफ काम करना शुरू किया उससे लोगों में आत्मविश्वास पैदा हुआ. भारतीय पुलिस सेवा के 1986 बैच के अधिकारी अजय कुमार पटना के सिटी एसपी बने. दो साल के अपने कार्यकाल के दौरान वे कई ऐसे आपराधिक मामलों से सख्ती से निपटे जिनमें उन पर राजनीतिक दबाव होने की बात बिहार में की जाती है. इसके बाद उन्हें जमशेदपुर भेज दिया गया. उस समय बिहार का बंटवारा नहीं हुआ था. बिहार के ईमानदार अधिकारियों के बीच जमशेदपुर की नियुक्ति को सजा माना जाता था. जमशेदपुर के बारे में यह प्रचलित था कि वहां काफी बड़े-बड़े और रसूख वाले कारोबारी हैं और अगर किसी अधिकारी के काम से उसके हित प्रभावित होते हैं तो संबंधित अधिकारी को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. लेकिन यहां भी अजय कुमार ने बढ़िया काम किया. हालांकि, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि टाटा समूह के आग्रह पर लालू यादव ने ही अजय कुमार को जमशेदपुर भेजा था ताकि वहां कानून-व्यवस्था दुरुस्त की जा सके. मूलतः कर्नाटक के रहने वाले अजय कुमार को बिहार में बतौर पुलिस अधिकारी अच्छे काम के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है.

हालांकि, औपचारिक तौर पर तो वे नहीं मानते लेकिन बिहार-झारखंड में इस बात की चर्चा होती है कि जमशेदपुर जाने के बाद ही उनका भारतीय पुलिस सेवा से मोहभंग हो गया. इसके बाद उन्होंने टाटा कंपनी के साथ काम करना शुरू किया. लंबे समय तक वे टाटा के साथ जुड़े रहे. जब 2011 में जमशेदपुर सीट के लिए उपचुनाव होना था तो भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास पार्टी बनाने वाले और झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी ने उन्हें इस सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया. अजय कुमार डेढ़ लाख से अधिक वोट से यह चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए.

एसपी की भूमिका में अजय कुमार जिस तरह की उम्मीद लोगों में जगाते थे, उसी तरह की उम्मीद वे बतौर सांसद भी जगा रहे हैं. अब तक जितनी बार भी उन्होंने संसद में किसी मुद्दे पर बोला है, उसे सुनकर यह लगता है कि उनके पास समस्याओं के समाधान के लिए नए विचार हैं. विषयों को बारीकी से उठाने का उनका कौशल कई मौकों पर दिखता रहता है. 22 मार्च, 2012 को संसद में उन्होंने इस मामले को उठाया कि आखिर एकीकृत कार्ययोजनाओं में स्थानीय सांसदों से राय क्यों नहीं ली जाती. उनका तर्क था कि स्थानीय सांसद अपने यहां की स्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ होता है, इसलिए उसकी राय ली जानी चाहिए. जब एयर इंडिया को बचाने को लेकर संसद में बहस चल रही थी तो उस दौरान भी अजय कुमार ने बिल्कुल अलग बात कही. उन्होंने कहा, ‘इस नतीजे पर मत पहुंचिएगा कि हम एयर इंडिया को बचाना नहीं चाहते. लेकिन तीन-चार मुख्य बिंदु मैं आपके सामने रखना चाहता हूं. पहले तो 2006-07 में एयर इंडिया का घाटा 770 करोड़ रुपये था. उसके बाद यह 7,200 करोड़ हो गया. 2009 में एयर इंडिया तीन प्लेन्स बेच देती है. वह बेचती है हर प्लेन सौ-सौ करोड़ रुपये में. एयर इंडिया एक प्लेन 4000 करोड़ रुपये में खरीदती है. 30,000 करोड़ रुपये देने की बात चल रही है. 1000 करोड़ रुपये में एक ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस स्थापित हो जाता है. इस आधार पर इतने में 30 एम्स स्थापित हो जाएंगे. अगर आप हिसाब लगाएं तो इतने पैसे में डेढ़ लाख गांवों में सड़क बनाई जा सकती है.’

अजय कुमार सप्ताह में तीन दिन दिल्ली रहते हैं और चार दिन अपने क्षेत्र यानी जमशेदपुर में. संभवतः प्रबंधन का यह गुर उनके अंदर उसी समय से है जब उन्होंने पांडिचेरी विश्वविद्यालय से एमबीए किया था. कुमार ने डॉक्टरी की पढ़ाई पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज से की है लेकिन जिस तरह से वे हर मुद्दे को उठाते हैं उससे लगता है कि वे सामाजिक डॉक्टर बन गए हैं. हालांकि बतौर सांसद अब तक संसद में अच्छा प्रदर्शन करने वाले अजय कुमार को सांसद विकास निधि के जरिए अपने क्षेत्र के लोगों के कल्याण के मामले में अधिक ध्यान देने की जरूरत है. जब से वे सांसद बने हैं तब से लेकर अब तक उन्हें सांसद विकास निधि के तहत जितनी रकम मिली है, वे उसका 57 फीसदी ही इस्तेमाल कर पाए हैं.

-हिमांशु शेखर

‘यह रेडियो-अखबार पर निर्भर समाज नहीं है. इसके पास सूचना का भंडार मौजूद है’

सीताराम येचुरी उस रास्ते से राजनीति में आए हैं जहां से अब कम ही लोग आते हैं. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्र राजनीति से उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और अपने पहले ही पड़ाव में इतिहास रच दिया. सन 77 से 78 के बीच लगातार तीन बार वे जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष रहे. इस मामले में वे इकलौते हैं. कम्युनिस्ट विचारधारा के बावजूद लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता शानदार है. येचुरी का व्यक्तित्व एक राजनेता की सीमाओं से परे जाकर उन्हें एक विचारक और लेखक के तौर पर भी स्थापित करता है. 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर लिखी गई उनकी किताब सैफ्रॉन ब्रिगेड  राजनीति की बेस्ट सेलर्स में से एक है. हाल की एक घटना उनके राजनीतिक कद का अंदाजा देती है. 2006 में नेपाल में माओवादियों के विद्रोह और राजशाही के पतन के बाद वहां राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया था. माओवादियों का स्वाभाविक झुकाव चीन की तरफ था. नेपाल के सैनिक या तानाशाही शासन के चंगुल में फंसने के पूरे आसार थे. ऐसे वक्त में येचुरी ने शानदार राजनीतिक कौशल दिखाया. उन्होंने नेपाल के माओवादियों के साथ मध्यस्थता की और उन्हें लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए राजी किया. इस तरह चीन, पाकिस्तान और म्यांमार के बाद भारत के पड़ोस में एक और अलोकतांत्रिक सत्ता का निर्माण नहीं हो सका. 61 वर्षीय सीपीआई(एम) नेता और राज्यसभा सदस्य सीताराम येचुरी से अतुल चौरसिया की बातचीत.

राजनेताओं की विश्वसनीयता इतनी नीचे क्यों गिर गई है?

इसके पीछे कई कारण हैं. एक तो राजनेता जो वायदे करते हैं उन्हें पूरा नहीं करते. नेताओं की खिंचाई का सिलसिला तीन साल पहले लोकपाल आंदोलन के साथ शुरू हुआ. अन्ना का आंदोलन एक टर्निंग प्वाइंट था. 1968 से अब तक नौ बार लोकपाल का मामला लटक चुका है. पिछली बार भी सबने मिलकर इसे एक बार फिर से लटका दिया. वायदे करके जब काम नहीं होता तो उससे अविश्वास पैदा होता है. दूसरा है राजनीति में अपराधी. मैं कहूंगा कि अपराधियों का राजनीतिकरण हुआ है. राजनीति में बाहुबल और धनबल के जोर से लोग आ रहे हैं. ये दो मुख्य कारण हैं नेताओं की घटती विश्वसनीयता के. लेकिन हमें समझना होगा कि जैसे इंसान-इंसान में फर्क होता है उसी तरह से नेताओं में भी फर्क है. हर नेता चोर-बेईमान नहीं है. यह निर्णायक समय है. जनता को अब फैसला करना होगा कि किसकी राजनीति सही है. चुनाव के वक्त जो लोग जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर वोट डालते हैं उन्हें यह कहने का हक नहीं है कि संसद में भ्रष्ट और अपराधी बैठे हैं. इन्हें आपने ही भेजा है. 

सच है कि अपराधियों का राजनीतिकरण हो रहा है. पर इसके लिए उन्हें टिकट देने वाली पार्टियां ही जिम्मेदार नहीं हैं? जब जनता के सामने विकल्प ही नहीं होगा तो वह क्या करेगी?

यह तो पार्टियों की मौकापरस्ती है. वे ऐसे लोगों को सिर्फ इसलिए टिकट दे देती हैं क्योंकि वे जीतने की गारंटी हैं. उस आदमी की योग्यता को नजरअंदाज कर दिया जाता है. राजनीतिक पार्टियों को इस मामले में बदलाव लाना चाहिए. 

हम देख रहे हैं कि आज हर महीने-दो महीने में जनता इंडिया गेट, राजपथ, जंतर-मंतर पर पहुंच जा रही है. वह अब आश्वासनों पर यकीन करने को तैयार नहीं है. तो क्या यह राजनेताओं के लिए अपने अंदर झांकने का और आत्ममंथन करने का समय है?  

बिल्कुल, नेताओं के लिए आत्ममंथन करने का समय है. लेकिन अगर नेता आपके बीच जाता है तो उसे भगा देना भी ठीक नहीं है. जनतांत्रिक व्यवस्था के तहत ही काम होगा. नेताओं के लिए आत्ममंथन करने का समय है उससे भी ज्यादा जरूरी है कि वे जो वादे करें उन्हें पूरा करें. आज जनता के मन में ये बात बैठ गई है कि साल दर साल नेता हमें सिर्फ वादे करके बेवकूफ बना रहे हैं. इससे नेताओं के खिलाफ एक किस्म की निराशा और मोहभंग का माहौल है जनता में. 

अगर मैं बिंदुवार पूछूं तो नेताओं और जनता को बदलाव के लिए क्या-क्या करना चाहिए ताकि दोनों का विश्वास बहाल हो?

नेताओं को करना यह है कि राजनीति का मतलब सिर्फ करियर बनाना नहीं है. यह सामाजिक परिवर्तन का हथियार है. बेहतरी के लिए इसका इस्तेमाल करना है. नेताओं को दोहरा रवैया नहीं अपनाना चाहिए. कथनी और करनी में भेद होगा तो आप जनता को गलत नहीं ठहरा सकते. और जनता को भी सोचना होगा कि वह अपना नेता चुनते समय सही और गलत का फैसला करे. सिर्फ नेताओं को कसूरवार ठहराकर आप अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. दूसरा ये कि जनता चुनावी प्रक्रिया में शामिल हो. आप देखिए कि हमारा वोटिंग का पर्सेंटेज इतना कम होता है. आज की तारीख में कोई भी सरकार ऐसी नहीं बनती जिसके पास कुल वोटिंग का पचास फीसदी समर्थन हो. 

 

‘जननेता वाली इज्जत तो खत्म हो चुकी है. नेता डरने लगे हैं कि कहीं ऐसा न हो कि वे कहीं जाएं और जनता उन्हें बेइज्जत कर दे, जैसा शीला दीक्षित के साथ हुआ. नेताओं के मन में जनता का सामना करने का विश्वास नहीं बचा है’

इस समय कोई बड़ी चुनौती जिसे आप देखते हैं..

 

जो चीज मुझे महत्वपूर्ण लग रही है वह दरअसल चुनौती नहीं एक सकारात्मक शुरुआत है. जनता आज चुपचाप नहीं बैठी है. जनता सवाल उठा रही है. जिन चीजों को लेकर जनता सड़कों पर उतर रही है, वे सवाल लंबे समय से लटके हुए थे. हमारे देश में पुलिस-जनता का अनुपात पूरी दुनिया में सबसे कम है. इसे कब सुधारेंगे. यही हाल न्यायपालिका का है. जजों की कमी है. बलात्कार के मामलों को ले लीजिए यहां सजा की दर है 26 प्रतिशत. चार में से तीन रिहा हो जाते हैं. तो डर किसी को रहा नहीं है. बेसिक जरूरतें सरकार पूरी नहीं कर पाई है. मेरे ख्याल से लोगों का गुस्सा पूरी तरह जायज है. 

हाल के समय में जनता का इतना व्यापक प्रतिरोध क्यों देखने को मिल रहा है. 

मौजूदा पीढ़ी बेहद जागरूक है, दुनिया के संपर्क में है. उसकी अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई है, उसे अपने अधिकारों और ताकत का पता है. सोशल नेटवर्किंग, ब्लॉग, इंटरनेट के रूप में उसके पास इतने हथियार हैं कि एक पल में उसकी मुहिम दुनिया भर में फैल जाती है. एक या दो दशक पहले ऐसे हालात नहीं थे. हमारा राजनीतिक वर्ग इस बदलाव को समझने में नाकाम हो रहा है. उसे इस बात की आदत ही नहीं है कि कोई मुद्दा महीनों-महीनों तक मीडिया की सुर्खी बना रहता है. यहां हम सबको विचार करना होगा कि लोगों की अपेक्षाओं को कैसे पूरा करना है. यह सिर्फ रेडियो और अखबार पर निर्भर समाज नहीं है. यह वह दौर है जब चौबीसों घंटे सूचना लोगों को उपलब्ध है. 

नीतियों के चलते जो वर्ग भेद बढ़ रहा है उसे समझना होगा. नीतियां गलत हैं. एक चमकता भारत है, दूसरा तरसता भारत है. विकास का फायदा सबको मिल नहीं रहा है. बीस साल के अंदर अमीर-गरीब की खाई कितनी बढ़ी है इसका एक नमूना देखिए. इस देश में 52 खरबपति हैं. इन 52 लोगों के पास देश की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा संचित है. दूसरी तरफ 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो 20 रुपये प्रतिदिन पर गुजारा कर रहे हैं. नीतियां इन्हीं 52 लोगों के लिए बन रही हैं. अगर इस अंतर को पाटने का काम नहीं शुरू हुआ तो यह अराजकता आगे और बढ़ेगी. 

आज के नेता जनता से इतना कटे हुए क्यों हैं. हमने यह कमी दिल्ली रेप कांड के बाद बहुत शिद्दत से महसूस की.

सामंतवादी चेतना हमारी राजनीति में अभी भी कायम है. जो नए नेता आ रहे हैं वे या तो किसी के बेटे हैं या किसी के रिश्तेदार हैं. ज्यादातर लोगों का आंदोलन या संघर्ष का कोई इतिहास नहीं है. कइयों ने तो जमीनी स्तर पर कोई महत्वपूर्ण काम तक नहीं किया है. नेताओं की जो पैराशूट लैंडिंग हो रही है उसकी वजह से हम ये कटाव देख रहे हैं. पहले एक तरीका था छात्र राजनीति के जरिए राजनीति में आने का. परिवारवाद का असर बढ़ने और छात्रसंघों को खत्म करने के बाद से यह रास्ता भी बंद होता जा रहा है. छात्र राजनीति के जरिए आने वाले नेताओं को अपने देश समाज और स्थितियों का अंदाजा होता था. आज कोई अमेरिका से आ रहा है कोई ब्रिटेन से और सीधे मंत्री-सांसद बन जाता है. हमने बीस साल तक गोलघर (संसद भवन) से दूरी बनाए रखी ताकि पहले देश को समझा जा सके. आज लेफ्ट को छोड़कर देश की सभी पार्टियां परिवारवाद की चपेट में हैं. 

एक समाज के स्तर पर किस तरह की खामियां आप पाते हैं यहां ?

यह बात बहुत चिंता में डालती है. दिल्ली गैंगरेप के मामले को ही लें. लड़की के मित्र ने जो बात टीवी पर कही है वह कितनी शर्मनाक हैं? वे लोग दो घंटे तक सड़क पर पड़े रहे और किसी ने वहां रुककर उनके ऊपर कपड़ा डालने या अस्पताल ले जाने की कोशिश नहीं की. सैकड़ों लोग वहां से गुजरे होंगे. न जाने उनमें से कितने लोग बाद में इंडिया गेट पर प्रदर्शन भी करने पहुंचे होंगे. यह दोहरापन है हमारे समाज का. इससे गलत लोगों को अपने बचाव का तर्क मिल जाता है. यह पाखंड नेता या व्यक्ति दूर नहीं कर सकते. यह खुद के दूर करने से होगा. हां, राजनीतिक व्यवस्था इसके लिए एक माहौल बनाने का काम जरूर कर सकती है.

युवा नेताओं में कौन आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है…

मैं खुद संसद में हूं, इसलिए किसी एक व्यक्ति का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा. पर अच्छे और युवा नेता हर पार्टी में हैं. मीडिया को भी ध्यान देना चाहिए कि वह सही लोगों को सामने लाए, उन्हें मौका दे. युवाओं के नाम पर एक बुरा चलन हमारे यहां है. जिन लोगों को युवा कहा जा रहा है उनमें से 90 फीसदी लोग किसी न किसी परिवार से आते हैं. यह लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है.