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जिनपिंग की ताक़त बढ़ी

माओ त्से तुंग के बाद शी जिनपिंग अब चीन के सबसे शक्तिशाली नेता हो गये हैं। देश की सेना से लेकर तमाम अहम संस्थानों पर अब उनके वफ़ादार कमान में हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री हु जिंताओ के बाहर जाने के जो वीडियो सामने आये हैं, उनसे पता चलता है कि जिनपिंग के बिना अब चीन में पत्ता भी नहीं हिलेगा।

दुनिया में चिन्ता यह है कि जिनपिंग तानाशाह होकर ताईवान और अपने अन्य पड़ोसियों के साथ अब कैसा व्यवहार करेंगे? क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में उन्होंने साफ़ कह दिया है कि उनका पहला काम अब ताईवान को चीन में मिलाने का होगा। भारत भी जिनपिंग के तीसरी बार चीन का राष्ट्रपति बनने के बाद के घटनाक्रम पर गहरी नज़र रखे हुए है। क्योंकि सीमा पर हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच काफ़ी तनाव वाली स्थिति रही है, जिसका मुख्य कारण चीन का लगातार निर्माण करते जाना है।

बांग्लादेश में चीन के शीर्ष राजनयिक ली जिमिंग ने अक्टूबर के आख़िर में भले यह कहा था कि भारत के साथ उनके देश की कोई रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है। भारत चीन को लेकर सतर्क भी है और आशंकित भी। यह इस बात से ज़ाहिर हो जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के तीसरी बार चीन का राष्ट्रपति बनने के एक हफ़्ते बाद तक (जब यह रिपोर्ट लिखी गयी) भी जिनपिंग को बधाई का सन्देश नहीं भेजा था।

ली का कहना था कि वह (चीन) बंगाल की खाड़ी में भारी हथियारों का जमावड़ा नहीं देखना चाहते। ली ने तो यह भी कहा कि भारत और चीन इस क्षेत्र और उसके बाहर भी किसी आर्थिक, भू-राजनीतिक और अन्य मुद्दों के हल के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। राजदूत ली का कहना कि हम भारत को कभी भी चीन के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी या रणनीतिक प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं देखते हैं। बकौल ली- ‘निजी तौर पर मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। हम आर्थिक और भू-राजनीतिक मुद्दों के हल के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।’

ली की यह टिप्पणी उस दिन आयी, जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नयी दिल्ली में निवर्तमान चीनी राजदूत सुन विडोंग से कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में अमन और शान्ति दोनों देशों के बीच सामान्य सम्बन्धों के लिए ज़रूरी है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि पूर्वी लद्दाख़ में सीमा मुद्दों को लेकर भारत और चीन के बीच 29 महीने से अधिक समय से गतिरोध चल रहा है। जून, 2020 में गलवान घाटी में संघर्ष के बाद दोनों देशों के जो रिश्ते तनावपूर्ण हुए थे, वह अभी भी पटरी पर नहीं लौटे हैं।

कैसे ताक़तवर हुए जिनपिंग?

राष्ट्रपति शी जिनपिंग को 21 अक्टूबर को जब पाँच साल के कार्यकाल के लिए रिकॉर्ड तीसरी बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) का महासचिव चुना गया, तो उन्होंने इतिहास बना दिया। इससे यह भी ज़ाहिर हुआ कि उनकी पार्टी, सेना और सत्ता पर पकड़ कितनी मज़बूत है। पार्टी के संस्थापक माओ त्से तुंग के बाद सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के जिनपिंग पहले नेता हैं, जिन्हें तीसरा कार्यकाल मिला है। अब ज़्यादा सम्भावना यही है कि वह आयु-पर्यंत चीन के शीर्ष नेता रहेंगे।

जिनपिंग को केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) का अध्यक्ष भी नामित किया गया है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जनरल झांग यूशिया और हे वीदोंग को सीएमसी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। सीएमसी के अन्य सदस्यों में शीर्ष सैन्य अधिकारी ली शांगफू, लियू जेनली, मियाओ हुआ और झांग शेंगमिन शामिल हैं। वह नौसेना और रॉकेट फोर्स सहित सेना की विभिन्न शाखाओं का नेतृत्व करेंगे। पहले के कार्यकाल की तरह जिनपिंग सीएमसी के एक मात्र असैन्य सदस्य हैं।

जिस केंद्रीय समिति ने 24 सदस्यीय राजनीतिक ब्यूरो को मंज़ूरी दी, जिसके बाद उसने जिस सात सदस्यीय स्थायी समिति का चयन किया, उसके सभी सदस्य जिनपिंग के समर्थक हैं। इनमें से सिर्फ़ दो झाओ और वांग पिछली समिति में थे। सदस्यों में ली कियांग, झाओ लेजी, वांग हुनिंग, सिया क्वी, डिंग शुएशियांग और ली शी शामिल हैं।

शंघाई सीपीसी के प्रमुख ली कियांग भी जिनपिंग के क़रीबी हैं। सम्भावना है कि मार्च, 2023 में कियांग को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा। इसके अलावा झाओ लेजी ने सन् 2017 से केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग का संचालन किया था, जो चीन में भ्रष्टाचार और अन्य तरह की गड़बडिय़ों को रोकने वाली संस्था है। एक और सदस्य हुनिंग सन् 2017 से पोलिब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य हैं और उन्हें जिनपिंग के प्रमुख सलाहकारों में गिना जाता है। उधर पार्टी के अहम बुद्धिजीवियों में से एक सिया क्वी समिति के नये सदस्य हैं। डिंग सन् 2017 से जनरल ऑफिस के प्रमुख हैं। वह पार्टी में सबसे महत्त्वपूर्ण नौकरशाहों में से एक हैं। ली शी समिति के सदस्य बनाये गये हैं। उन्हें लेजी के बाद केंद्रीय अनुशासन समिति का अध्यक्ष भी नामित किया गया है। इसके अलावा विदेश मंत्री वांग यी अन्य प्रमुख व्यक्ति हैं, जिन्हें समिति में। यी केंद्रीय समिति के सदस्य रहे हैं।

हालाँकि कई जानकारों का मानना है कि जिनपिंग ने पोलित ब्यूरो स्टेडिंग समिति (मंत्री परिषद्) में जिन लोगों को चुना है, उससे लगता है कि उन्होंने अनुभव और विशेषज्ञता पर वफ़ादारी को तरजीह दी है। उन्होंने पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में ली कियांग को चुना है, जिन्हें चीन की केंद्रीय सरकार में काम करने का कोई अनुभव नहीं है। चीन में दूसरा सबसे बड़ा नेता ही प्रधानमंत्री बनता है।

उदारवादी नेता दरकिनार

चीन में नये निजाम में उदारवादी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है। इससे ज़ाहिर होता है कि जिनपिंग की राह क्या हो सकती है। इनमें पार्टी में दूसरे नंबर का समझे जाने वाले प्रधानमंत्री ली क्विंग समेत कई उदारवादी नेता शामिल हैं, जो केंद्रीय समिति में जगह नहीं बना पाये। इस समिति में 300 सदस्य हैं।

जिनपिंग की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि माओ त्से तुंग को छोडक़र जिनपिंग से पहले देश के सभी राष्ट्रपतियों ने 10 साल के कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त होने के नियम का पालन किया। अब जिनपिंग के तीसरी बार सत्ता में आने से यह नियम ख़त्म हो गया है। जिनपिंग पहली बार सन् 2012 में राष्ट्रपति और पार्टी महासचिव चुने गये थे, अब तीसरे कार्यकाल में प्रवेश कर गये हैं।

तीसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने के बाद जिनपिंग ने कहा- ‘हमें चीनी सन्दर्भ में माक्र्सवाद को अपनाकर ऐतिहासिक पहल करनी चाहिए और नये युग में चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद के विकास में नया अध्याय लिखना चाहिए। चीन और दुनिया को एक दूसरे की आवश्यकता है। हमारी अर्थ-व्यवस्था सकारात्मक है, जो कोरोना-काल के प्रतिबंधों के कारण मंदी झेल रही थी।’

कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में सभी चीज़ें जिनपिंग के हिसाब से हुईं। पहले राजनीतिक ब्यूरो ने सात सदस्यीय स्थायी समिति चुनी, जिसने शी जिनपिंग को तीसरे कार्यकाल के लिए महासचिव चुन लिया। जिनपिंग को केंद्रीय समिति में चुने जाने के बाद राजनीतिक ब्यूरो और फिर स्थायी समिति में चुना गया और वह आसानी से महासचिव चुन लिये गये।

इसमें सबसे दिलचस्प यह रहा कि महासम्मेलन में पार्टी के संविधान में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसमें निर्देश दिया गया कि जिनपिंग के निर्देशों और सिद्धांतों का पालन करना पार्टी के सभी सदस्यों का दायित्व है। समझा जा सकता है कि जिनपिंग कितने ताक़तवर हो गये हैं और उनके विरोध का क्या मतलब होगा?

पार्टी के महासम्मेलन में सीपीसी के संविधान में संशोधन सबसे प्रमुख घटना है, जो जिनपिंग के बहुत ताक़तवर हो जाने की कहानी कहती है। संशोधन के प्रस्ताव में कहा गया है- ‘नये युग के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर जिनपिंग का विचार समकालीन चीन और 21वीं सदी का माक्र्सवाद है और इस युग की सर्वश्रेष्ठ चीनी संस्कृति और लोकाचार का प्रतीक है।’

दुनिया में माक्र्सवाद के घटते प्रभाव के बीच चीन में जिनपिंग के और मज़बूत होने के कई मायने हैं। महासम्मेलन में पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग (सीसीडीआई) का नया दल भी नियुक्त किया गया, जो सीधे जिनपिंग के अधीन कार्य करता है।

आंतरिक चुनौतियाँ

जिनपिंग भले ताक़तवर नेता बन गये हों, उनके सामने आंतरिक चुनौतियाँ रहेंगी। सीपीसी की बैठक में जिस तरह हु जिंताओ को बैठक से बाहर करने का वीडियो सामने आया, उससे संकेत मिलता है कि सब कुछ अच्छा नहीं है। वायरल हुए इस वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि समापन समारोह में जिन्ताओ को बाहर ले जाने लगा क़रीब एक मिनट तक वह उनके सामने से उठायी गयी फाइल और उन्हें ले जाने की कोशिशों का विरोध कर रहे हैं। कुछ मीडिया रिपोट्र्स में हु की ख़राब सेहत की बात कही गयी है। हालाँकि घटनाक्रम के दौरान जिंताओ की शारीरिक भाषा कुछ और बयाँ करती है।

साफ़ दिख रहा है कि जब उनकी बाजू पकडक़र उन्हें बाहर ले जाने की कोशिश हो रही है, वह क़रीब एक मिनट तक ठिठके खड़े रहते हैं। जाते-जाते वह जिनपिंग के कंधे पर हाथ रखकर कुछ कहते भी महसूस होते हैं। इसके बाद वह जाते हुए वह प्रधानमंत्री ली के च्यांग का भी कंधा थपथपाते दिखते हैं। यह भी हो सकता है कि हु जिंताओ के ज़रिये जिनपिंग देश की कम्युनिस्ट पार्टी में अन्य ताक़तों को सन्देश देना चाहते हों। यहाँ यह ग़ौर करने वाली बात है कि जब इस घटना का वीडियो दुनिया के सामने आया उससे कुछ घंटों के भीतर ही प्रधानमंत्री ली के च्यांग और कुछ वरिष्ठ नेताओं को सीपीसी की केंद्रीय समिति से बाहर कर दिया गया। याद रहे सीपीसी के महाधिवेशन से कुछ समय पहले ही दो मंत्रियों को भी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में डाल दिया गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि जिनपिंग विद्रोह के रास्ते बन्द करना चाहते थे। सीपीसी की बैठक से कुछ दिन पहले ही बीजिंग में एक पुल पर बैनर लहराते एक व्यक्ति की फोटो भी बहुत वायरल हुई थी। इस बैनर पर स्कूलों और फैक्ट्रियों में हड़ताल करने की अपील की गयी थी। जिनपिंग को तानाशाह बताते हुए हटाने की माँग भी इसमें की गयी थी।

बाहरी चुनौतियाँ 

चीन पश्चिम से लेकर एशिया में ही कई चुनौतियाँ झेल रहा है। उसकी विस्तारवादी नीति के चलते दूसरे कई देश उससे नाराज़ हैं। इसके अलावा चीन की अर्थ-व्यवस्था के सामने देश और विदेश में कई चुनौतियाँ हैं। चीन की शून्य कोरोना-नीति और अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव भी जिनपिंग के लिए चुनौती हैं। जिस तरह जिनपिंग को तीसरा कार्यकाल मिला है और उनके आयुपर्यंत चीन का नेता बने रहने की सम्भावना बन गयी, उससे एक बात साफ़ है कि जिनपिंग अपनी विचारधारा पर मज़बूती से चलेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी क़ीमत अर्थ-व्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है। अधिकारिक आँकड़े देखें, तो जुलाई से सितंबर के बीच चीन की अर्थ-व्यवस्था पिछले साल के इसी समय के मुक़ाबले 3.9 फ़ीसदी की दर से बढ़ी और अनुमानों से आगे रही।

हालाँकि चीन की अर्थ-व्यवस्था बीते कुछ दशकों में जिस रफ्तार से बढ़ी है उसके मुक़ाबले यह बहुत कम है। मार्च में साल 2022 के लिए चीन ने जो 5.5 फ़ीसदी का लक्ष्य तय किया था, ये उससे भी कम है। इससे पिछले तीन महीनों में अर्थ-व्यवस्था सिर्फ़ 0.4 फ़ीसदी की दर से बढ़ी थी और इसी लिहाज़ से इसे लम्बी छलांग माना जा रहा है। उस समय शंघाई लॉकडाउन में था।

हालाँकि सीपीसी की बैठक में अर्थ-व्यवस्था से जुड़े आँकड़े जारी नहीं विशेषज्ञों ने राय जतायी कि ये अर्थ-व्यवस्था के कमज़ोर होने का संकेत है। सैन्य चुनौतियों की बात करें, तो चीन की सीमा से दुनिया में सबसे ज़्यादा पड़ोसी देश हैं। इनमें अफ़ग़ानिस्तान, भूटान, भारत, क़ज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, लाओस, म्यांमार, मंगोलिया, नेपाल, उत्तर कोरिया, रूस, ताजिकिस्तान और वियतनाम हैं। चीन के ब्रूनेई, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे समुद्री पड़ोसी भी हैं। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से शायद ही कोई देश होगा, जो चीन के साथ अपने सम्बन्धों को भरोसे की नज़र से देखता हो।

जल्द होंगे दिल्ली नगर निगम के चुनाव

लगभग सात-आठ महीने पहले होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनाव की बारी आ चुकी है। हालाँकि नगर निगम चुनाव मार्च में होने थे। लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें क़ानूनी पेच फँसाते हुए इन्हें टाल दिया, जिस पर चुनाव आयोग ने भी असमर्थता जतायी थी। विपक्षी पार्टियों, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) ने इस पर आपत्ति भी जतायी, परन्तु केंद्र सरकार ने नगर निगम को एक करके चुनाव समय पर न होने दिये। अब दिल्ली नगर निगम के चारों निकायों के एक होने के बाद परिसीमन समिति ने केंद्र सरकार को अपनी अन्तिम रिपोर्ट सौंप दी है, जिसके बाद दिल्ली नगर निगम चुनाव का रास्ता साफ़ हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली में नगर निगम वार्डों के परिसीमन पर 800 पृष्‍ठों की अन्तिम गजट अधिसूचना जारी कर दी है।

अब गजट अधिसूचना के बाद परिसीमन की क़वायद पूरी मानी जानी चाहिए और चुनाव जल्द होने चाहिए, क्योंकि सीटों पर आरक्षण भी तय हो चुका है। अब राज्य चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीख़ों के ऐलान का इंतज़ार है। एक नये आदेश के अनुसार, आयोग का दफ़्तर हफ़्ते के सातों दिन खुला है। रविवार या शनिवार की भी अभी कोई छुट्टी नहीं है।

विदित हो कि इसी साल अप्रैल में होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालने पर आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर चुनाव में हार के डर का आरोप लगाया था। केंद्र सरकार द्वारा चुनाव टालने को लेकर आम आदमी पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ जमकर पोस्टरबाज़ी भी की थी। वहीं भाजपा ने आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ नगर निगम की बक़ाया राशि न देने के लिए जमकर पोस्टरबाज़ी की थी।

हालाँकि अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए भाजपा ने आम आदमी पार्टी की खुली चुनौती को कभी स्वीकार नहीं किया। नगर निगम में समय पर सफ़ाई और अन्य कर्मचारियों का वेतन न देने, स्कूलों की दशा ठीक न करने और शहर में जगह-जगह बार-बार गन्दगी जमा होने देने को लेकर आम आदमी पार्टी भाजपा को जमकर घेरती रही है। अब, जब नवंबर-दिसंबर में गुज़रात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसा माना जा रहा है कि इसी दौरान दिल्ली नगर निगम के चुनाव भी होंगे। आप-नेताओं को भरोसा है कि इस बार नगर निगम की बाग़डोर उनके ही हाथ होगी। लेकिन भाजपा ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी रणनीति बना ली है, ताकि किसी भी हाल में उसके हाथ से यह कमाऊ विभाग न खिसके।

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इसी साल अप्रैल में होने वाले चुनाव टालकर मई में निगम के चारों निकायों को मिलाकर एकीकृत दिल्ली नगर निगम बनाया था। अब दिल्ली नगर निगम के वार्डों की संख्या घटकर 250 हो चुकी है। राज्य चुनाव आयोग ने कहा है कि नगर निगम चुनावों की तारीख़ों के ऐलान को लेकर वह सातों दिन तेज़ी से काम कर रहा है।

वार्डों के आरक्षण का बँटवारा भी हो चुका है। इस बार सभी वार्डों पर चुनाव लडऩे के लिए महिला-पुरुषों के लिए 50-50 फ़ीसदी के हिसाब से समान रूप से विभाजन किया गया है। कुल 250 वार्डों में से 104 वार्ड सामान्य व अन्य महिलाओं के लिए और 104 वार्ड सामान्य व अन्य पुरुषों के लिए आरक्षित किये गये हैं, जबकि बाकी आरक्षित 42 वार्डों में से 21 वार्ड अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए और 21 वार्ड अनुसूचित जाति के लिए पुरुषों के लिए आरक्षित हैं।

इधर दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने अपनी चुनाव प्रबंधन समिति समेत कुल 21 समितियाँ बनायी हैं। भाजपा ने इस चुनाव को जीतने के लिए जम्मू-कश्मीर के सह प्रभारी आशीष सूद, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय, पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व विधायक विजेंद्र गुप्ता, विधायक अभय वर्मा, प्रदेश महामंत्री हर्ष मल्होत्रा और पूर्व महापौर आरती मेहरा जैसे बड़े चेहरों को मैदान में लगा दिया है। कांग्रेस ने अभी कोई बड़ी योजना अपनी चुनावी रणनीति को लेकर नहीं बनायी है। परन्तु आम आदमी पार्टी पिछले साल से ही चुनाव के लिए कमर कसे बैठी है। उसके कई उम्मीदवारों के पोस्टर 2022 के शुरू से ही राजधानी में लगे हुए हैं।

अशिष्ट नेता, अमर्यादित राजनीति

जद(यू) अध्‍यक्ष ललन सिंह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अभद्र टिप्‍पणी के बाद राजनीति गरमा गयी है। उनके द्वारा प्रधानमंत्री को डुप्लीकेट पिछड़ा एवं बहरूपिया कहने के पश्चात् भाजपा नेता भी हमलावर हो गये। यह कोई नयी बात नहीं है। भारतीय राजनीति में ऐसा नहीं है कि यह किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी की समस्या है, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय राजनीति का विशेष दुर्गुण बन चुका है। कुछ उदाहरण देखिए, मध्य प्रदेश के भाजपा नेता प्रीतम लोधी ने ब्राह्मणों एवं कथावाचकों को बेईमान एवं महिलाओं पर गंदी नज़र रखने वाला बताया। सपा सांसद शफ़ीक़ुर्रहमान बर्क़ ने भाजपा द्वारा मुस्लिमों को देश का नहीं मानने, तिरंगा देश के कार्यालयों पर फहराने की जबरदस्ती का आरोप लगाते हुए कहा था कि जिसकी मर्ज़ी हो वह झण्डा लगाए। उन्होंने कहा कि क्या झण्डा लगाने से ही देशभक्ति साबित होगी? संविधान में कहीं भी तिरंगा घरों पर फहराये जाने को अनिवार्य नहीं किया गया है। फिर इस प्रकार के अभियान की क्या ज़रूरत? बर्क़ ने इस तरह के आड़े-टेड़े तर्कों से हर घर तिरंगा अभियान का विरोध किया। केरल के संस्कृति मंत्री साजी चेरियन ने भी संविधान पर सवाल उठाते हुए उसे शोषकों एवं लुटेरों का पक्षधर बता दिया।

पार्टी विद् डिफरेंस वाली भाजपा के राजस्थान इकाई के वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया का अहंकार $गज़ब का है। वह कहते हैं कि अगर भाजपा नहीं होती, तो भगवान राम आज समुद्र में होते। उन्हें सम्भवत: इतनी भी समझ नहीं है कि भगवान राम का अस्तित्व उनकी पार्टी से नहीं, बल्कि उनकी पार्टी का अस्तित्व ही भगवान राम की वजह से है। वही उत्तराखण्ड के भाजपा विधायक बंशीधर भगत ने विद्यार्थियों को सफलता के लिए ‘सरस्वती को पटाने’ जैसी अशोभनीय की सलाह दी। ये कुछ मामूली उदाहरण भर हैं, वर्ना ऐसे अशिष्ट नेताओं द्वारा इस तरह की ओछी और अमर्यादित राजनीतिक करना अब रोज़मर्रा की बात हो गयी है।

वर्तमान राजनीति के अपने तर्क हैं। अर्थात् जो आज के नेताओं के अनुकूल है, वो उचित है और जो प्रतिकूल है, वो अनुचित। लेकिन असभ्यता की हदें पार करते हुए अभद्र और गाली-गलौज की भाषा को कैसे उचित ठहराया जा सकता है? हालाँकि यह स्वीकार करने से परहेज़ नहीं होना चाहिए कि इस तरह के बयानवीरों की अभद्र बयानबाज़ी को अप्रत्यक्ष रूप से उनकी पार्टी का समर्थन मिलता है। अन्यथा असभ्य, अभद्र होने की हिम्मत नेताओं की होती ही नहीं। लेकिन सवाल यह है कि आख़िर पार्टियों के मुखिया और संचालक अपने-अपने नेताओं को यह क्यों नहीं कहते कि मर्यादा में रहना आवश्यक है। ध्यान देने योग्य है कि अगर कभी विवाद बढ़ जाए, तो प्रतीकात्मक रूप से इन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके अथवा निलंबित करके पार्टी प्रमुखों द्वारा अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। इन नेताओं की अभद्रता के लिए पार्टी द्वारा इनको कोरी हिदायत देने के अतिरिक्त राजनीतिक दल कुछ नहीं किया जाता, ये सर्वविदित है। लेकिन जब विवाद ठण्डा पड़ जाता है, तो पुन: इन्हें वापस दल में लेकर इनके योग्य कार्य अनर्गल बयानबाज़ी में लगा दिया जाता है।

भारतीय राजनीति में ऐसे तथाकथित नेताओं के जहालत की यह स्थिति है कि इन्होंने समाज में फूट डालकर उसको अस्थिर रखने एवं उनमें उन्माद पैदा करने की क़सम-सी उठा रखी है। हाल यह है कि एक ख़राब बयान को लोग भूल पाएँ, उससे पहले कोई दूसरा नेता नया अभद्र और अशोभनीय बयान दे देता है। आज सारी राजनीतिक पार्टियों की यही समस्या हो चुकी है कि उनके जनप्रतिनिधियों में अशिष्टों की कमी नहीं है। उनकी भाषा-शैली ऐसी है कि कई बार तो राजनीति से घृणा होने लगती है। अक्सर इनके कारण पैदा होने वाले विवाद कभी-कभी इतने बढ़ जाते हैं कि सार्वजनिक हिंसा का कारण बन जाते हैं। आज तो ऐसे अमर्यादित राजनीति करने वाले अशिष्ट नेताओं की जैसे बाढ़-सी आ गयी है। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि देश के लिए आवश्यक मूलभूत मुद्दों से जनता का ध्यान हट जाता है।

इस तरह के भडक़ाऊ और बेहूदा बयान देने वालों की ज़ुबान पर लगाम इसलिए भी नहीं कस पाती, क्योंकि इन्हें क़ानून से दण्डित होने का भय नहीं है। इसकी वजह न्याय व्यवस्था में में ख़ामी भी है। दरअसल ऐसे मुद्दों पर निर्णय में इतना विलम्ब होता है कि जनता की स्मृति से विस्मृत होने पर बयानों का विशेष औचित्य नहीं रहता। चुनाव के दौरान तो यह अनाचार विशेष रूप से होता है। कुछ महीने पहले ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। जल्द ही होने वाले गुज़रात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों की स्थिति देख लीजिए, जिनमें अशोभनीय बयानों की झड़ी लगी रही है। निर्वाचन आयोग भी मात्र चुनाव प्रचार से रोककर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। होना तो यह चाहिए कि ऐसे उम्मीदवारों का पर्चा ख़ारिज़ करके इन्हें चुनाव में प्रतिभाग करने से रोक देना चाहिए। साथ ही ऐसे लोगों को प्रत्याशी बनाने वाले दलों पर भी दण्ड आरोपित किया जाना चाहिए।

आजकल तो ऐसी बयानबाज़ियाँ कराने में मीडिया जगत, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मुख्य रूप से आगे है। मीडिया जगत का एक बड़ा तबक़ा नेताओं की सुर्ख़ियों में बने रहने भावना का लाभ उठा रहा है, उसे लोगों की समस्याओं से जैसे कोई वास्ता नहीं है। मतलब पत्रकारिता की मूल आत्मा को मारकर ये टीवी चैनल अब मात्र पैसा कमाने के साधन बने हुए हैं। इसी तरह वर्तमान में राजनीतिज्ञ होने का अर्थ जनसेवा का ध्येय और जनलाभ के कार्यों में रुचि नहीं, बल्कि मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहना है। टीवी चैनलों की पत्रकारिता का अर्थ ही सार्थक एवं मूलभूत मुद्दों पर विमर्श एवं उन पर जनता व सरकार का ध्यान आकर्षित करना नहीं, बल्कि अनर्गल विवादों पर बहस करके उन्हें बढ़ाना हो गया है। अगर कोई विवाद न हो, तो किसी मूल्यहीन विषय पर ये टीवी चैनल विवाद पैदा कर देते हैं। यही वजह है कि इन टीवी चैनलों के ऐसे बयानवीर नेता बड़े मुफ़ीद साबित होते हैं। चूँकि पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों एवं उसकी नैतिकता से ऐसे समाचार चैनलों का वास्ता तो दूर-दूर तक नहीं है, इसलिए इन पर यथार्थ पत्रकारिता करने का दबाव भी नहीं है। अब तो ये चैनल कमोबेश भाँडगीरी के नमूने बन गये हैं, जहाँ भूत-प्रेत की कहानियाँ, यौनिकता से भरपूर अपराध कथाएँ, सनसनीख़ेज़ स्टिंग ऑपरेशन दिखाने का चलन हो गया है; क्योंकि इन्हें टीआरपी चाहिए। हैरानी होती है कि इसके लिए ये कुछ भी करेंगे, चाहें उसके लिए अनैतिकता के निम्नतम स्तर पर ही क्यों न उतरना पड़े।

प्रसिद्ध अमेरिकी विचारक बेंजामिन फ्रैंकलिन लिखते हैं- ‘वे लोग जो थोड़ी-सी अल्पकालिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिए अत्यावश्यक आज़ादी का त्याग करते हैं, वे न तो आज़ादी के और न ही सुरक्षा के लायक होते हैं।’ यह मूल अधिकारों के दुरुपयोग है। हो सकता ऐसे ऊल-जुलूल बयानों से इन नेताओं को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ मिल जाता होगा, किन्तु यह संविधान प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट अपमान है। वास्तव में इस देश में मूल अधिकारों के नाम पर फैली अराजकता और अभद्रता का सबसे बड़ा दोषी देश का नेतृत्व वर्ग है। नूपुर शर्मा और मोहम्मद जुबैर के मामलों के पश्चात् देश में अभिव्यक्ति की मर्यादा स्थापित करने की लम्बी बहस चल पड़ी है। किन्तु इसकी शुरुआत राजनीतिक वर्ग से हो यही अधिक उचित होगा। समाज एवं राष्ट्र को अनुशासित करने से पूर्व नेतृत्व वर्ग का मर्यादित आचरण करना आवश्यक है।

असभ्यता को प्रश्रय देती भारतीय राजनीति  अनर्गल और कटुतापूर्ण बयानों की एक बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुर्धर्ष (उग्र) सी परम्परा चल चुकी है। किन्तु तारीख़ गवाह है कि ऐसी राजनीति करने वाले तथाकथित नेता कभी भी राजनीति में अपनी जगह स्थिर कर पाये हैं और न ही सामाजिक दृष्टि से सम्मान अर्जित कर पाये हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में लाल बहादुर शास्त्री से लेकर चंद्रशेखर, चौधरी चरण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेताओं की परम्परा में से कोई भी इस तरह के अनर्गल बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व की श्रेष्ठता एवं सभ्यता से आदरणीय माना गया है। इन्होंने सदैव अपनी गरिमा की सुरक्षा सुनिश्चित रखी।

हालाँकि अब परिस्थितियाँ विकट हो चुकी हैं। देश की राजनीति व सामाजिक जीवन में मर्यादाओं का मूल्य इतना नीचे गिर चुका है कि सुधार की गुंजाइश अति न्यून प्रतीत होती है। राष्ट्र की दिशा-दशा तय करने वाली राजनीति व राजनेताओं, दोनों का स्तर गिरा है। किन्तु जिन्हें सामाजिक जीवन में सामान्य शिष्टाचार की भी समझ नहीं, ऐसे असभ्य और संस्कारहीन नेताओं से क्या उम्मीद की जाए। कैसे उम्मीद की जाए कि ये देश को सही मार्गदर्शन देंगे? क्या कोई सरकार ऐसी क़ानूनी आचार संहिता बनाएगी, जहाँ नेतृत्व वर्ग को भाषा की मर्यादा बनाये रखना अति आवश्यक हो, अन्यथा अभद्रता पर कठोर दण्ड हो। हालाँकि निकट भविष्य में तो ऐसा होता नहीं दिख रहा; परन्तु यह बहुत ज़रूरी है। नहीं तो सार्वजनिक जीवन में मर्यादाओं के विध्वंस का तमाशा देखने के लिए राष्ट्र व समाज अभिशप्त तो हैं ही।

(लेखक राजनीति और इतिहास के जानकार हैं।)

पाक सेना की सत्ता हो रही कमज़ोर!

इमरान ख़ान के हमलों से पाकिस्तान की राजनीति में मची हलचल

इमरान ख़ान जब क्रिकेट खेलते थे, तब भी क्रीज पर उतने नहीं टिके होंगे, जितने अब वह पाकिस्तान सेना के ख़िलाफ़ खुलकर खेल रहे हैं। पाकिस्तान में तब राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गयी, जब अक्टूबर के आख़िरी हफ़्ते पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अहमद अंजुम ने अहम ख़ुलासा करते हुए दावा किया कि कुछ महीने पहले राजनीतिक उथल-पुथल के बीच तत्कालीन सरकार ने सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा को मार्च में एक आकर्षक प्रस्ताव दिया था। हालाँकि इमरान ने इसका जवाब देते हुए कहा कि देखते रहिए, अभी बहुत ख़ुलासे होंगे। इमरान निश्चित ही पाकिस्तान में सेना की सत्ता को कमज़ोर करते हुए दिख रहे हैं।

इसके बाद से पाकिस्तान में अब न सिर्फ़ बहस छिड़ गयी है, बल्कि लगातार बयानबाजियाँ भी हो रही हैं। इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अहमद अंजुम के आरोपों का जवाब पीटीआई ने यह कहते हुए कि पूर्व प्रधानमंत्री (इमरान ख़ान) ने बन्द दरवाज़े की बातचीत के दौरान कभी भी कोई असंवैधानिक माँग नहीं की। यह पहली बार था, जब आईएसआई के किसी प्रमुख ने मीडिया से सीधे बात की थी।

पीटीआई नेताओं शाह महमूद क़ुरैशी, फवाद चौधरी और शिरीन मज़ारी ने कहा कि इमरान ख़ान ने सेना प्रमुख के साथ पिछले दरवाज़े से बातचीत के दौरान कभी कोई असंवैधानिक माँग नहीं की थी। उमर ने कहा कि बन्द दरवाज़ों के पीछे चर्चा किये गये मामले कोई गुप्त नहीं थे, क्योंकि ख़ान ने रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन पर चर्चा की थी। उन्होंने कहा कि माँगें हमेशा से जनता के सामने रही हैं। उन्होंने कहा कि इमरान ख़ान के पास सेना और देश दोनों हैं। लेकिन क्या इमरान ख़ान सेना के हर फ़ैसले से सहमत होंगे? उन्होंने कहा कि ख़ान को सेना से असहमत होने और यहाँ तक कि इसकी आलोचना करने का भी अधिकार है।

ज़ाहिर है पीटीआई यह कह रही है कि सेना देश या प्रधानमंत्री से ऊपर नहीं है। यह एक तरह से सेना की सत्ता को सीधी चुनौती है। पाकिस्तान में हाल के वर्षों में यह रिवाज़ रहा है कि देश के प्रधानमंत्री को विदेश यात्रा पर जाना होता है, तो पहले वह सेना प्रमुख से मिलता है। इमरान ख़ान सेना के राजनीतिक सत्ता में सेना की इस दख़लंदाज़ी के सख़्त ख़िलाफ़ रहे हैं। अब यह लड़ाई सडक़ों पर आ गयी है और साफ़ लग रहा है कि इसका कोई-न-कोई नतीजा ज़रूर निकलेगा; क्योंकि पाकिस्तान के कमोवेश सभी राजनीतिक दल सेना की इस दादागीरी के ख़िलाफ़ रहे हैं।

देखें, तो बीते एक साल से पाकिस्तान में काफ़ी कुछ बदला है। राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे। इसकी शुरुआत अक्टूबर, 2021 में हुई, जब प्रधानमंत्री रहते हुए इमरान ख़ान और सेना के बीच आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर टकराव हुआ। इमरान ख़ान के रिश्ते सेना से ख़राब होने लगे। अब यह लड़ाई बहुत आगे बढ़ गयी है।

यदि कुछ पुरानी बातें याद करें, तो अक्टूबर, 2021 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चाहते थे कि लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद आईएसआई के प्रमुख बनें। उनके विपरीत सेना नदीम अंजुम को आईएसआई चीफ बनाना चाहती थी। जबरदस्त मतभेद के बीच सेना की चली और न चाहते हुए भी इमरान को सेना के दबाव में नदीम अंजुम को आईएसआई चीफ बनाना पड़ा। लेकिन इमरान के मन में सेना के प्रति कड़वाहट भर गयी। अप्रैल में इमरान की ही सत्ता चली गयी। इमरान ख़ान ने आरोप लगाया कि उनकी सरकार गिराने के लिए विपक्ष ने विदेशी ताक़तों (अमेरिका) के साथ मिलकर साज़िश रची।

इमरान जब सत्ता से बाहर हुए, तो नयी सरकार लिए कई समस्याएँ भी छोड़ गये। हाल में इमरान ख़ान को चुनाव लडऩे से अयोग्य ठहरा दिया गया। इसके बाद केन्या में एक पाकिस्तानी पत्रकार अरशद शरीफ़ की हत्या हुई, जिसे लेकर इमरान ने सेना पर बहुत-ही गम्भीर आरोप लगाये। इन आरोपों ने पाकिस्तान में नयी बहस शुरू कर दी। पत्रकार की केन्या में हत्या पर सेना और इमरान आमने-सामने आ गये। आईएसआई चीफ की प्रेस कॉन्फ्रेंस सेना ने आग में घी का काम किया।

इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पीटीआई वैसे ही पाकिस्तान चुनाव आयोग की तरफ़ से इमरान ख़ान को तोशाख़ाना मामले में अयोग्य क़रार देने से बिफरी हुई है। आयोग ने तो इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की भी सिफ़ारिश की है। अपने फ़ैसले में आयोग ने इमरान ख़ान को पाँच साल तक सार्वजनिक पद पर रहने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। यह मामला इमरान को विदेशी राजनेताओं या मेहमानों से प्राप्त क़ीमती उपहारों की बिक्री से प्राप्त आय को छिपाने का दोषी पाये जाने से जुड़ा है।

जिस पत्रकार की नैरोबी (केन्या) में हत्या हुई है, उसके ख़िलाफ़ कुछ दिन पहले ही देशद्रोह का मुक़दमा दायर किया गया था। अरशद पूर्व में पाक टीवी चैनल एआरवाय से जुड़े थे। अरशद को इमरान ख़ान का समर्थक माना जाता था। यही नहीं, अरशद एक से ज़्यादा बार पाक सेना के प्रमुख जनरल बाजवा की आलोचना कर चुके थे। इसमें कोई दो-राय नहीं कि अरशद की हत्या को लेकर पाकिस्तानी सेना सवालों के घेरे में है। इमरान ख़ान का आरोप है कि पत्रकार की हत्या राजनीति से प्रेरित है। इमरान ख़ान से लेकर उनके कई समर्थक इसके लिए पाकिस्तानी सेना को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

पत्रकार की हत्या के मामले में जब हंगामा हुआ, तो सेना को बचाने के लिए आईएसआई चीफ नदीम अंजुम सामने आ गये। अंजुम ने कहा- ‘हमें बिना किसी कारण के निशाना बनाया जा रहा है। मार्च में (इमरान ख़ान के प्रधानमंत्री रहते) जनरल बाजवा को उनके कार्यकाल में अनिश्चितकालीन विस्तार के लिए आकर्षक प्रस्ताव दिया गया था। यह मेरे सामने दिया गया था। उन्होंने (जनरल बाजवा) इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वह चाहते थे कि सेना एक विवादास्पद भूमिका से संवैधानिक भूमिका की ओर बढ़े।’

इमरान ख़ान पर हमला करते हुए आईएसआई चीफ ने कहा- ‘आप (इमरान) रात को उनसे चुपचाप मिलते हैं और अपनी असंवैधानिक इच्छाएँ व्यक्त करते हैं। लेकिन दिन के उजाले में देशद्रोही (सेना प्रमुख को) कहते हैं। यह आपके शब्दों और आपके कृत्यों के बीच एक बड़ा विरोधाभास है।’

इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने भी एक बयान जारी किया। सेना ने कहा कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के प्रमुख इमरान ख़ान को अपने दावों को साबित करने की ज़रूरत है। आईएसपीआर के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल बाबर इफ्तिखार ने कहा-  ‘अरशद शरीफ़ और अन्य पत्रकारों ने दुनिया में पाकिस्तान और देश के संस्थानों को बदनाम करने का प्रयास किया। शरीफ़ की मौत के बाद लोगों ने सेना पर उँगली उठानी शुरू कर दी है। जबकि यह निर्धारित किया जाना बाक़ी है कि इस हत्या से वास्तव में किसे लाभ हुआ है? 30-40 साल की सेवा करने के बाद कोई भी देशद्रोही नहीं होना चाहता। हम कमज़ोर हो सकते हैं। हम $गलतियाँ कर सकते हैं; लेकिन हम कभी देशद्रोही नहीं हो सकते।’

इमरान ख़ान सरकार के साथ-साथ सेना पर भी लगातार दबाव बनाने की कोशिशों में जुटे हैं। अक्टूबर के शुरू में उन्होंने ऐलान किया कि अगर सरकार नये चुनाव की घोषणा नहीं करती है, तो अक्टूबर के अन्त में आज़ादी-मार्च निकाला जाएगा। इमरान को अयोग्य ठहराये जाने और पत्रकार अरशद शरीफ़ की हत्या के बीच ये मार्च और ज़्यादा सुर्ख़ियों में आ गया। लाहौर इस्लामाबाद जाने वाले मार्च के लिए इमरान समर्थक सुबह से ही सडक़ों पर जुट गये। शाम को इमरान ने अपने समर्थकों को सम्बोधित करके इस मार्च का आग़ाज़ किया। इमरान के इस मार्च को इमरान और सरकार के बीच आर पार की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है।

यह माना जा रहा है कि हाल के वर्षों में पाकिस्तान की सेना कमज़ोर हुई है। सत्ता पलट का जो खेल सेना खेलती थी, वह अब नहीं दिख रहा। सेना के ख़िलाफ़ राजनीतिक दल भी खुलकर बोलने लगे हैं। यहाँ तक कि जनता भी सेना के सत्ता में दखल के ख़िलाफ़ होने लगी है। आने वाले महीनों में देखना होगा कि यह ऊँट किस करवट बैठता है?

प्रतिष्ठा के ख़िलाफ़

ख़राब होते हालात पर भाजपा नेताओं की बयानबाज़ी ज़ख़्मों पर नमक छिडक़ने जैसी

क्या हो जब सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग देश की दिनोंदिन बिगड़ती अर्थ-व्यवस्था और बुरे हालात पर एक लंपट बच्चे की तरह जवाब दें? ज़ाहिर है कि यह सब किसी भी हिन्दुस्तानी को अटपटा लगेगा। आप समझ गये होंगे कि मैं डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमज़ोर हो रहे रुपये पर विदेश में जाकर देश की वित्त मंत्री के बयान को लेकर बात कर रहा हूँ, जिसको विपक्ष ने आज मुद्दा बनाया हुआ है। देश में विभिन्न मंचों पर इस विषय पर चर्चाएँ हो रही हैं और वित्त मंत्री को जैसे कोई फ़िक्र नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले ही वह महँगाई को झुठलाने के लिए बाज़ार में सब्ज़ियाँ लेने भी गयी थीं। इससे पहले प्याज महँगा होने पर उन्होंने कहा था कि वह प्याज नहीं खातीं। इसी प्रकार महँगाई और बेरोज़गारी पर भी कई भाजपा नेता और मंत्री बेतुके बयान देते रहे हैं, जो देश में ख़राब होते हालात में भी ज़ख़्मों पर नमक छिडक़ने जैसे लगते हैं। ऐसे बयान उनकी अपनी प्रतिष्ठा के ख़िलाफ़ ही लगते हैं।

हालाँकि जनता के अहम मुद्दों पर इस प्रकार की टिप्पणियाँ करने पर भी देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बेतुके बयानों पर मैं कोई प्रतिक्रिया देना नहीं चाहता हूँ। लेकिन देश का एक जागरूक नागरिक और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में होने के नाते सिर्फ़ कुछ सच्चाइयाँ और कुछ सवाल जनता और सरकार की अदालत में रखना चाहता हूँ।

कहते हैं कि सन् 1947 में जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ, तो एक रुपया एक अमेरिकी डॉलर के बराबर था। ज़ाहिर है कि उस समय अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा लुटा-पिटा हिन्दुस्तान आज की तरह समृद्ध और मज़बूत नहीं था। उस समय एक ब्रिटिश पाउंड की क़ीमत 13 रुपये के बराबर ज़रूर थी। अगर हम कुछ लोगों की यह बात भी मान लें कि डॉलर की क़ीमत एक रुपये से ज़्यादा थी, तो भी ऐसे लोग उस समय भी दो रुपये के आसपास एक डॉलर की क़ीमत बताते हैं। लेकिन आज उसी एक डॉलर की क़ीमत रिकॉर्ड 83 रुपये के क़रीब है। यह इसी अक्टूबर में दो बार रुपये में आयी और कमज़ोरी के बाद हुआ है। उस पर वित्त मंत्री कह रही हैं कि रुपया कमज़ोर नहीं हुआ है, बल्कि डॉलर मज़बूत हो गया है।

यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि किसी देश की मुद्रा (करेंसी) क्यों और कैसे कमज़ोर होती है? दरअसल जब किसी देश पर जैसे-जैसे क़र्ज़ बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उस देश की मुद्रा कमज़ोर होती जाती है। हाल ही में सरकार की ओर से जारी ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक, 31 मार्च, 2022 तक हिन्दुस्तान का विदेशी क़र्ज़ 620.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो चुका है। सरकारी आँकड़े ही बताते हैं कि मार्च, 2021 के अन्त में यह क़र्ज़ 573.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। मतलब सरकार ने इस एक साल में 47 बिलियन अमेरिकी डॉलर का क़र्ज़ और लिया। एक बिलियन एक अरब यानी 100 करोड़ के बराबर होता है। मतलब इस हिसाब से हमारे देश पर 62,070 करोड़ डॉलर यानी 5,112,519.69 करोड़ रुपये का क़र्ज़ है। सन् 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद देश पर 49 फ़ीसदी क़र्ज़ बढ़ाया है। इसका मतलब यह है कि जितना क़र्ज़ 70 साल में पिछली सरकारों ने लिया, उतना या शायद उससे कहीं ज़्यादा 2024 तक केवल 10 साल के कार्यकाल में केंद्र की मोदी सरकार ले चुकी होगी। फ़िलहाल 70 बनाम साढ़े आठ साल के क़र्ज़ लेने के इन आँकड़ों के बराबर होने में महज़ एक फ़ीसदी का फ़र्क़ रह गया है। याद दिला दें कि सन् 2014 के लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा में ख़ुद नरेंद्र मोदी (जो तब गुज़रात के मुख्यमंत्री थे) कहा था- ‘मित्रों यह ऐसे नहीं होता। रुपया उसी देश का गिरता है, जिस देश की सरकार गिरी हुई होती है।’

यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि सन् 2014 में एक डॉलर 63.33 रुपये के बराबर था। यानी तबसे अब तक ठीक साढ़े आठ साल में डॉलर के मुक़ाबले हमारा रुपया 20 रुपये से ज़्यादा कमज़ोर हुआ है। देखने वाली बात यह है कि मोदी सरकार ने पिछले 70 साल के कुल 51 फ़ीसदी के मुक़ाबले अपने साढ़े आठ साल के कार्यकाल में 49 फ़ीसदी क़र्ज़ ही नहीं लिया है, बल्कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई से भी पिछली सरकारों के मुक़ाबले पैसा भी ज़्यादा निकाला है और बड़ी मात्रा में सोना भी गिरवी रखा है। और यह मैं नहीं कह रहा, बल्कि सरकार और आरबीआई के आँकड़े बता रहे हैं।

अगर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बात को ध्यान करें, तो इसका मतलब यही हुआ कि चिन्ता की कोई बात नहीं है। जबकि विदेशी क़र्ज़ के अनुपात के रूप में विदेशी मुद्रा भण्डार गिरकर मार्च, 2022 के अन्त में 97.8 फ़ीसदी हो गया है। इसकी चिन्ता कौन करेगा? उन्हें याद रखना चाहिए कि इस देश की ज़्यादातर, बल्कि 80-85 फ़ीसदी आबादी ऐसी है, जिसे भले ही आपके वित्तीय आँकड़ों का ज्ञान न हो; लेकिन उसे यह पता है कि महँगाई बहुत बढ़ चुकी है और लोग जो भी कमाते हैं, उसमें उन्हें घर चलाने में बहुत दिक़्क़त आ रही है। अब इसी प्रकार अगर भुखमरी सूचकांक को देखें, तो पता चलता है कि हम वैश्विक भुखमरी के मामले में श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल से भी पिछड़ चुके हैं। अब हर साल की तरह इसे केंद्र की मोदी सरकार फिर से नकार रही है। दु:ख होता कि एक तरफ़ प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि हिन्दुस्तान पूरी दुनिया का पेट भरा सकता है, बस उन्हें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की अनुमति मिल जाए। वहीं दूसरी तरफ़ वह अपने ही देश में फैली भुखमरी से निपटने में नाकाम हैं। ग़रीबों को पाँच किलो राशन देकर उसका प्रचार लगातार किया जा रहा है। लेकिन न तो किसानों से हो रही लूट, बढ़ती बेरोज़गारी, भुखमरी, ग़रीबी, महँगाई का और न ही तहस-नहस होती अर्थ-व्यवस्था का कहीं कोई ज़िक्र है।

आयरलैंड की एजेंसी कन्सर्न वल्र्डवाइड और जर्मनी के संगठन वेल्ट हंगर हिल्फ ने मिलकर तैयार की ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानी वैश्विक भुखमरी सूचकांक में हिन्दुस्तान को इस साल 107वें नंबर पर माना है। जबकि जब मोदी सरकार के आने के दौरान सन् 2014 में हिन्दुस्तान वैश्विक भुखमरी के मामले में महज़ 55वें स्थान पर था। यानी भुखमरी के आँकड़े भी नरेंद्र मोदी की इन साढ़े आठ साल की सत्ता के दौरान तक़रीबन दोगुने स्तर पर पहुँच गयी है। इस बार सिर्फ़ 15 देश ही भुखमरी के मामले में हिन्दुस्तान से पीछे हैं। लेकिन अगर ऐसे ही भारत में भुखमरी बढ़ती रही, तो भारत उन देशों से भी आगे निकल जाएगा, जहाँ रोटी के लिए मारामारी मची रहती है। शर्मनाक यह है कि केंद्र की मोदी सरकार देश की जनता का पेट भराने में उन पड़ोसी देशों से भी पीछे रह गयी, जो हिन्दुस्तान के सामने दूसरे किसी भी मामले में कहीं भी नहीं टिकते हैं। सोचने वाली बात यह भी है कि जिन देशों में भुखमरी महामारी की तरह फैली थी, उनके यहाँ हमसे हालात काफ़ी सुधरे हैं। मसलन इस साल जारी आँकड़ों के मुताबिक, वैश्विक भुखमरी में श्रीलंका की रैंक 64, पाकिस्तान की रैंक 92, नेपाल और बांग्लादेश की रैंक 76, म्यांमार की रैंक 71 और अफ़ग़ानिस्तान की रैंक 103 है, जबकि साढ़े आठ साल पहले यानी सन् 2014 में वैश्विक भुखमरी में पाकिस्तान और बांग्लादेश की रैंक 57 थी। हालाँकि नेपाल की स्थिति सन् 2014 में भी हिन्दुस्तान से अच्छी थी। लेकिन हमें अपने देश के बारे में सोचना चाहिए, न कि दूसरे के बारे में।

हालाँकि कुछ जानकारों का मानना हैं कि यह सब वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से हुआ है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि कोरोना महामारी की वजह से हिन्दुस्तान में बहुत-सी और भी मुसीबतें आयी हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इसकी एक बड़ी वजह नोटबंदी भी है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से सवाल किया है कि वह बताये कि किस क़ानून के तहत उसने नोटबंदी की थी। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान के लोगों की मुसीबतें बढऩे की दूसरी बड़ी वजह यह भी है कि यहाँ से बड़ी-बड़ी देशी और विदेशी कम्पनियाँ बोरिया-बिस्तर समेटकर बाहर चली गयीं। देश में बढ़ रही तीसरी सबसे बड़ी वजह है नये रोज़गारों का कम संख्या में सृजन होना और ज़्यादा संख्या में लोगों की नौकरियाँ छिनना भी है। इन परेशानियों की चौथी वजह महँगाई और टैक्स बढऩा है। हैरानी होती है कि जो खाद्य पदार्थ किसानों से कौड़ी भाव में ख़रीदे जाते हैं, वही खाद्यान्न और उनसे बनायी हुई चीज़ें सोने के भाव उपभोक्ताओं को मिलती हैं। ऊपर से उन पर जीएसटी लगाने में सरकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। कहते हैं कि यह पहली ऐसी सरकार है, जिसने दूध, दही, आटा, चावल, दाल पर तो जीएसटी लगा ही रखा है। जब इससे भी सरकारी ख़ज़ाना ख़ाली लगा, तो रोटी पर पाँच फ़ीसदी और पराठें पर 18 फ़ीसदी जीएसटी लगा दिया गया।

बहरहाल जानकारों का मानना है कि लोगों की बढ़ती परेशानियों की पाँचवीं सबसे बड़ी वजह 50 से ज़्यादा डिफाल्टर उद्योगपतियों का देश के बैंकों का मोटा पैसा लेकर विदेश भागना है, जिनके ख़िलाफ़ सरकार शायद कोई कार्रवाई करने की सोच ही नहीं रही है। सत्ता में आने से पहले नरेंद्र मोदी कहा करते थे कि काला धन लाएँगे। सत्ता में आने के बाद कहा कि कालेधन वालों की सूची उनके हाथ में है। ताज्जुब होता है कि आज तक न तो एक भी विदेशों में कालाधन रखने वाला पकड़ा गया है और न ही कोई काला धन देश में वापस आया है, जिसको लाने पर हर हिन्दुस्तानी के हिस्से में 15 लाख रुपये आने की बात ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने कही थी। ये पैसे आने तो दूर बल्कि और घोटालों व कालेधन में बढ़ोतरी होती जा रही है।

देश में धोखाधड़ी का हाल यह है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने पिछले साल ख़ुद कहा था कि पिछले सात वर्षों में हर रोज़ देश को 100 करोड़ रुपये का चूना लगा है। आरबीआई के मुताबिक, महज़ 1 अप्रैल, 2015 से 31 दिसंबर, 2021 तक सभी राज्यों में क़रीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की बैंकिंग धोखाधड़ी हुई। वित्त वर्ष 2015-16 में 67,760 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई, वित्त वर्ष 2016-17 में 59,966 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी हुई, वित्त वर्ष 2019-20 में 27,698 करोड़ रुपये से ज़्यादा की धोखाधड़ी हुई, तो 2020-21 में कऱीब 10,670 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई। सवाल यह है कि जब ख़ुद आरबीआई के आँकड़े इतने साफ़ हैं, तो फिर सरकार कर क्या रही है? यह धोखाधड़ी करके देश का पैसा हड़पने वाले लोग कौन हैं? क्या ये लोग सरकार की पहुँच से दूर हैं? या फिर इनसे सरकार को डर लगता है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

गुज़रात का रुख़

इस बार गुज़रात के विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों के नेता-कार्यकर्ता जितना पसीना बहा रहे हैं, इससे पहले शायद ही उन्हें इतना पसीना कभी बहाना पड़ा हो। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस बार गुज़रात में जो हिन्दू-मुस्लिम फैक्टर पिछले 27 साल से, ख़ासकर पिछले 20-22 साल से बहुत ही कारगर तरीक़े से काम कर रहा था, वह अब उतना काम नहीं कर रहा है। अब बड़ी संख्या में मतदाता गुज़रात में काम की बात करने लगे हैं और इस मामले में उन्हें आम आदमी पार्टी के संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से सबसे ज़्यादा उम्मीदें नज़र आ रही हैं।

हालाँकि अब तक हुए विभिन्न सर्वे अलग-अलग आँकड़े बता रहे हैं। कुछ का कहना है कि 40 से 45 फ़ीसदी मतदाता आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न झाड़ू का बटन दबाने के मूड में हैं। वहीं कुछ सर्वे सिर्फ़ 12 से 19 फ़ीसदी मतदाताओं को ही आम आदमी पार्टी के साथ बता रहे हैं, जबकि राज्य में फिर से भाजपा की सरकार बनने की बात कह रहे हैं। जो भी हो, यह सच है कि गुज़रात में आम आदमी पार्टी (आप) के कार्यकर्ताओं की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। लेकिन आम आदमी पार्टी के बड़े-बड़े नेता, ख़ासकर अरविंद केजरीवाल जिस सिद्दत से गुज़रात में प्रचार में लगे हैं, उससे उनके आश्वासनों और दिल्ली व पंजाब मॉडल ने गुज़रात के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह पहली बार है, जब बहुत-से लोग यह सवाल कर रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और नरेंद्र मोदी ने उन्हें दिया क्या है? यह बातें लोग छिप-छिपाकर नहीं बोल रहे हैं, बल्कि ऑन कैमरा खुलकर बोल रहे हैं।

गुज़रात के लोगों के इसी रुख़ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी भाजपा टीम की नींद उड़ाकर रख दी है। भाजपा के हालात यहाँ तक पहुँच गये हैं कि उसे भी काम करने की बात करनी पड़ रही है। केजरीवाल लोगों से किसी अपने की तरह बात कर रहे हैं, लोगों की समस्याएँ सुन रहे हैं और गुज़रात में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर उनके काम करने का वादा कर रहे हैं। इससे भाजपा के अनेक कार्यकर्ता चुपचाप तरीक़े से आम आदमी पार्टी के सपोर्ट में जाकर खड़े हो रहे हैं। हाल यह है कि अगर सत्ता बदलने की आहट हुई, तो भाजपा की गुज़रात इकाई के कई बड़े नेता भी आम आदमी पार्टी में जा सकते हैं। ये वे नेता हैं, जिनमें कुछ तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बावजूद उनके गुज़रात में दख़ल से परेशान हैं, कुछ अपने मन मुताबिक मंत्रालय न पाने या मंत्रिमंडल में जगह न पाने से परेशान हैं, तो कुछ हार के डर से परेशान हैं। बता दें कि हिन्दू-मुस्लिम में फूट के दम पर भाजपा 2002 के गुज़रात दंगों के बाद से जबरदस्त जीत हासिल करती आ रही थी। लेकिन इस बार यह मुद्दा गौड़ होता दिखायी दे रहा है।

हिन्दू-मुस्लिम नहीं, काम चाहिए

अहमदाबाद के नारोल में कुछ लोगों से जब हमने पूछा कि इस बार उन्हें विधानसभा चुनाव में किसकी जीत नज़र आ रही है, तो उनमें से अधिकतर लोगों ने झाड़ू वाला बटन दबाने की बात कही। एक काका ने कहा कि युवावस्थाथी में भाजपानी सेवा करी छे, पण मणी कछु नथी। हवे बीजाने तक आपमा मांगु छुं। (मैंने अपनी जवानी के दिनों से भाजपा की सेवा की है, पर मिला कुछ नहीं। अब किसी और को भी मौक़ा देना चाहता हूँ।)

वहीं पास खड़े एक युवा आटो ड्राइवर ने सीधे-सीधे शब्दों में कहा कि तमारू कौण? जे काम पर आव्या हता। नरेंद्र भाई पण जाणे छे कि आपणी समस्या शुं छे। तेनो फोटो लेवा माटे ते नक़ली स्कूल बनावे छे। (अपना कौन? जो अपने काम आये। नरेंद्र भाई को कुछ पता भी है कि हमारी समस्या क्या है? वो तो नक़ली स्कूल बनाता है।) जब ऑटो चालक से पूछा कि कहाँ है नक़ली स्कूल, तो उसने भडक़ते हुए कहा कि मैडम तमने ख़बर नथी? आखी दुनियामां हंगामो मची गयो छे। (मैडम तुम्हें ख़बर नहीं है? पूरी दुनिया में तो हंगामा मचा है।) एक युवक ने कहा कि उसे तो नौकरी चाहिए, उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा चाहिए और यह सब केजरीवाल देंगे। जब युवक से पूछा कि तुम्हें केजरीवाल पर भरोसा है, तो उसने कहा कि भरोसा तो अपने तोड़ते हैं। बाहर वाले को पता है कि अगर वो काम नहीं करेगा, तो उसे लोग भगा देंगे। इसी तरह कुछ अन्य लोगों ने भी भाजपा और नरेंद्र मोदी से नाराज़गी जतायी; लेकिन एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने किसी भी हाल में भाजपा को ही वोट देने की बात कही। उन्होंने कहा कि नरेंद्र भाई आपणाज भाई छे। अने ज्याँ सुधी नरेंद्र भाई छे त्याँ सुधी आपणे बीजा कोईनो विचार पण करी शकता नथी। (नरेंद्र भाई अपने हैं और जब तक नरेंद्र भाई हैं, तब तक हम किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकते।)

ऐसा लगता है कि गुज़रात में अब हिन्दू-मस्लिम के नाम पर नहीं, बल्कि काम पर मतदान ज़्यादा होगा। ज़्यादातर लोगों की बातों और इच्छा के बारे में जाने के बाद तो यही लगता है। लेकिन अभी बहुत ज़्यादा लोग खुलकर नहीं बता रहे हैं कि वो किस पार्टी के पक्ष में वोट डालेंगे। फिर भी जितने लोग खुलकर सामने आ रहे हैं, उनमें साफ़तौर पर देखा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी के प्रशंसक ज़्यादा हैं। भाजपा नेताओं में इसी को लेकर एक डर बना हुआ है। लेकिन गुज़रात में भाजपा को भी हल्के में लेना ठीक नहीं है, क्योंकि अब गुज़रात को भाजपा का गढ़ माना जाता है। साथ ही गुज़रात में जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए गुज़रात नाक का सवाल है।

वर्तमान हालात

अब तक गुज़रात में भाजपा को क़रीब 8 फ़ीसदी मुसलमान मतदाता, तो 60 फ़ीसदी से ज़्यादा हिन्दू मतदाता वोट देते आ रहे थे, जिसमें पिछले साल कुछ घाटा हुआ था और गुज़रात की 182 सीटों में से कांग्रेस ने 80 सीटें हासिल कर ली थीं, जो कि पिछले कई विधानसभा चुनावों के बाद उसकी एक बड़ी जीत रही। लेकिन इस बार भाजपा को टक्कर देने के लिए आम आदमी पार्टी आ चुकी है। ज़्यादातर चुनावी विश्लेषक मानकर चल रहे हैं कि आम आदमी पार्टी या तो 125 सीटों से आगे जाएगी या फिर 35 से 37 सीटें लेकर राज्य में अपना खाता खोलेगी।

हालाँकि कुछ सर्वे यह बताने में जुटे हैं कि आम आदमी पार्टी 0 से 4 सीटें ही जीत सकेगी। लेकिन जिस तरह से लोगों में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के लिए दीवानगी उमड़ रही है, उससे तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी के डर से ऐसे आँकड़े जानबूझकर पेश किये जा रहे हैं, ताकि जो लोग आम आदमी पार्टी के पक्ष में खड़े हैं, वो पलटकर भाजपा के पाले में चले जाएँ। कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी इस बार बड़ी संख्या में भाजपा के वोट तो काटेगी ही कांग्रेस के भी काफ़ी संख्या में कांग्रेस के भी वोट काटेगी और इस प्रकार उसका मत फ़ीसद, जो अभी तक के अनुमान में सबसे अधिक 37 फ़ीसदी है; और बढ़ सकता है। क्योंकि इसमें कुछ मसले आग में घी का काम कर रहे हैं।

नक़ली स्कूल, ड्रग्स और शराब

भाजपा को नुक़सान पहुँचाने वाली जिन मसलों का ऊपर ज़िक्र किया गया है, उनमें एक मसला हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटोशूट के लिए टैंट में तैयार किया गया नक़ली स्कूल है। इस स्कूल को लेकर गुज़रात में चर्चा इतनी बढ़ गयी है कि जिसे देखो, वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी ओछी राजनीति को लेकर निशाने पर ले रहा है। लोग उनकी इस हरकत को बहुत ओछी और गिरी हुई बता रहे हैं।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा छ: बच्चों का एक छोटा सा नक़ली कमरा बनवाकर वहाँ फोटोशूट कराना उनकी छवि पर कालिख पोतने वाला एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जिसकी लोग कहीं निंदा कर रहे हैं, तो कहीं मज़ाक़ बना रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने शासन काल में और अब दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी राज्य में एक भी ऐसा स्कूल नहीं बनवा सके, जिसमें जाकर वह लोगों से कह सकें कि यह स्कूल उन्होंने बनवाया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर वह गुज़रात में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति के डोनाल्ड ट्रंप के आने पर ग़रीबों को ढकने के लिए लाखों रुपये ख़र्च करके दीवार बनवा सकते हैं, तो एक स्कूल उनसे आज तक क्यों नहीं बना? इसका मतलब साफ़ है कि उनकी नीयत लोगों को शिक्षा और रोज़गार देने की नहीं है। वहीं गुज़रात में हर साल नक़ली शराब से लोगों के मरने से और राज्य में नक़ली शराब, ड्रग्स आदि के फलते-फूलते धंधे से भी लोग काफ़ी परेशान हैं। इसके अलावा और भी कई मुद्दे लोगों को अब याद आने लगे हैं, जिनमें बर्बाद होता कपड़ा उद्योग भी है, जिसके सहारे एक बड़ी आबादी अपना पेट भरती आयी है। बहुत-से लोगों के सिर से स्टेच्यु ऑफ यूनिटी का भूत भी उतर चुका है और वे मान रहे हैं कि इससे राज्य के लोगों को कोई ख़ास फायदा नहीं हो रहा है, उन्हें तो रोज़गार चाहिए, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए।

उधर भाजपा के बड़े नेता लगातार बैठकें कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि भाजपा की इन बैठकों में आम आदमी पार्टी के काट पर ही बात होती है। ऐसी ख़बरें हैं कि हाल ही में देश के गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी पार्टी के नेताओं से कहा है कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल को हल्के में न लें। इसका मतलब साफ़ है कि भाजपा में एक डर आम आदमी पार्टी ने बैठा दिया है। इधर मोरबी पुल हादसे में क़रीब दो सौ लोगों की मौत हो गयी, जिसका असर भी गुजरात चुनाव में दिखेगा। देखना यह है कि गुज़रात का ऊँट किस करवट बैठता है?

बीमार होते सरकारी अस्पताल

देश की आबादी लगातार बढ़ रही है। मरीज़ों और मर्ज़ों की संख्या भी उसी तेज़ी से बढ़ रही है। बढ़ती मरीज़ों की संख्या के हिसाब से देश में सरकारी अस्पतालों की संख्या काफ़ी कम है। बढ़ते मरीज़ों के इलाज के लिए इन अस्पतालों की दशा में सुधार होना चाहिए, पर नहीं हो रहा है। कई सरकारी अस्पतालों की दशा तो पहले से भी ख़राब हुई है।

सीधे शब्दों में कहें, तो बीमारों का इलाज करने के लिए देश भर में बने सरकारी अस्पताल ख़ुद बीमार हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों को छोड़ दें, तो पूरे देश में बाक़ी सरकारी अस्पतालों की यही दशा है। सामान्य लोगों के लिए इन सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना पहाड़ पर चढऩे की तरह मुश्किल हो गया है। अस्पतालों में बढ़ती बीमार लोगों की भीड़ और उनके इलाज में होती देरी से देश में हर साल लाखों मरीज़ दम तोड़ देते हैं।

यह हाल छोटे-मोटे सरकारी अस्पतालों का ही नहीं, बल्कि देश के जाने-माने सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एम्स का भी है। एम्स में सामान्य बीमारों के धक्के खाने का हाल इसी से देखा जा सकता है कि वहाँ हज़ारों लोग अस्पताल के बाहर अपना या किसी अपने का इलाज कराने के लिए महीनों पड़े रहते हैं। देश के लोगों के टैक्स से चल रहे सरकारी अस्पतालों में उन्हीं लोगों को इलाज नहीं मिल पाता, जिनके लिए इन अस्पतालों की बुनियाद रखी गयी थी।

एम्स का तो हाल ही यह है कि वहाँ किसी सामान्य बीमार को महीनों इलाज नहीं मिलता, पर वीआईपी लोगों, सांसदों, मंत्रियों को तत्काल लग्जरी निजी अस्पतालों की तरह इलाज की सुविधा उपलब्ध रहती है। हाल यह है कि अगर किसी गम्भीर मरीज़ को इलाज के लिए बेड मिला हुआ है और उसका बहुत ज़रूरी इलाज भी हो रहा है, पर अगर उसी बीच कोई वीआईपी मरीज़ आ जाता है, तो पहले वाले मरीज़ को उसकी गम्भीर हालत पर बिना तरस खाए ज़मीन पर या स्ट्रेचर पर डाल दिया जाता है।

इतना ही नहीं, एम्स में किसी बीमारी के इलाज के लिए कोई मरीज़ ओपीडी में दिखाने के लिए अपना पर्चा बनवाता है, तो उसका नंबर कब आएगा, इसका भी कोई भरोसा नहीं। सम्भव है कि उसे 15 दिन की तारीख़ मिल जाए, या फिर यह भी सम्भव है कि उसे छ: महीने भी लग जाएँ। पर सांसदों और मंत्रियों के बीमार पडऩे पर उनके अस्पताल पहुँचने से पहले ही सारी सुविधाएँ मौज़ूद रहती हैं।

यहाँ सवाल यह उठता है कि जब एम्स जैसे प्रतिष्ठित और बड़े अस्पताल की यह दशा है, तो छोटे शहरों और गाँव-देहात में बने सरकारी अस्पतालों की क्या दशा होगी?

सरकार के थिंक-टैंक नीति आयोग ने पिछले साल देश के 707 ज़िला अस्पतालों को 10 प्रमुख मानकों पर परखा था। अपनी अध्ययन रिपोर्ट ऑन बेस्ट प्रैक्टिसिस इन द परफॉर्मेंस ऑफ डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में आयोग ने 2017-18 के आँकड़े जुटाये थे। इस अध्ययन में पाया गया था कि देश के कुल 707 ज़िला अस्पतालों में 27 फ़ीसदी अस्पतालों में 100 बेडों पर सिर्फ़ 29 डॉक्टर हैं। 88 अस्पतालों में नर्सों की संख्या औसतन ठीक है। 399 अस्पतालों में पैरामेडिकल स्टाफ की संख्या भी उचित मिली। पूरे देश में सिर्फ़ 89 अस्पताल के सभी सपोर्ट सर्विस मापदंड पर खरे उतरे। सिर्फ़ 21 अस्पतालों में डायग्नोस्टिक सर्विस उपलब्ध थी। पर बाक़ी अस्पतालों में किसी-न-किसी तरह की कमियाँ मिलीं। विदित हो कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का प्रबंधन की मुख्य ज़िम्मेदारी राज्यों की है। स्वास्थ्य क्षेत्र की समूची नीति और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय निर्धारित करता है।

सवाल यह है कि सरकारी अस्पतालों की दशा इतनी ख़राब क्यों है? जबकि केंद्र सरकार की ओर से पयाप्त स्वास्थ्य बजट जारी किया जाता है। यह तब है, जब देश भर में केंद्र सरकार के जन औषधि केंद्र हैं, जहाँ आधे दाम में दवाएँ मिलती हैं। देश में एम्स में सीजीएचएस, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन जैसी योजनाएँ हैं, जिनके चलने के बावजूद भी सामान्य मरीज़ों को इलाज के लिए धक्के खाने पड़ते हैं।

हाल ही में एम्स के नये निदेशक डॉक्टर एम. श्रीनिवास ने लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव वाईएम कांडपाल को एक पत्र लिखकर बताया था कि सिटिंग एमपी (मौज़ूदा सांसदों) को सुचारू तरीक़े से इलाज मिले, इसके लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिड्यूर (एसओपी) तैयार कर लिया गया है। पत्र में एम्स के निदेशक डॉक्टर एम. श्रीनिवास ने बताया कि सांसदों को ओपीडी, इमरजेंसी में दिखाने और भर्ती होने के हालात के लिए क्या-क्या व्यवस्था रहेगी। उन्होंने एम्स में सांसदों के इलाज के लिए सभी सुविधाओं के उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल एडमिनिस्ट्रेशन ने एक कंट्रोल रूम और 24 घंटे के लिए एक ड्यूटी ऑफिसर तैनात कर दिया है। ये ड्यूटी ऑफिसर एक डॉक्टर होगा, जिसकी ज़िम्मेदारी बीमार सांसद को बिना देरी के सही और सुचारू इलाज दिलाना होगा। सांसदों को ज़रूरत पडऩे पर एम्स में फोन करने के लिए तीन लैंडलाइन नंबर के अतिरिक्त एक मोबाइल नंबर भी जारी किया गया है। अगर ज़रूरत हुई, तो मेडिकल ऑफिसर उस विभाग के एचओडी से भी सम्पर्क करेगा।  इस पत्र के सार्वजनिक होने से सवाल उठने लगे, तो एम्‍स के चीफ एडमिनिस्‍ट्रेटिव ऑफिसर देव नाथ साह ने पत्र लिखकर बताया कि मौज़ूदा सांसदों को मेडिकल केयर को लेकर एम्‍स की ओर से जारी किये गये आदेश को तत्‍काल प्रभाव से वापस ले लिया है। अब एम्‍स में सांसदों को वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं मिलेगा।

लेकिन सांसदों और मंत्रियों का तो पहले से ही एम्स में तत्काल प्रभाव से इलाज होता है। एम्स में पिछले तीन-चार दशक से जिस तरह से वीआईपी कल्चर चलन है, उसके चलते बाक़ी सामान्य मरीज़ धक्के ही खाते रहते हैं। महीनों से गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों का तत्काल इलाज नहीं होता है।

2022-23 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के लिए 86,201 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को इस बजट का 96 फ़ीसदी हिस्सा दिया गया है। स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग को चार फ़ीसदी बजट दिया गया है।

पिछले साल कोरोना के प्रकोप के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी अपने एक बयान में कहा था कि भारत में स्वास्थ बजट और डॉक्टरों की कमी है। इसके अलावा 2020-21 में केंद्र सरकार ने पाँच फ़ीसदी स्वास्थ्य सेस शुरू किया। अब यह सेस कुछ मेडिकल उपकरणों पर कस्टम्स ड्यूटी की तरह लगाया जाता है, ताकि देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने में मदद मिल सके। सरकार का अनुमान है कि 2020-23 में इस स्वास्थ्य सेस (कस्टम्स) से 870 करोड़ रुपये जमा हो सकते हैं।

सवाल यह है कि आज़ादी के बाद देश में निजी अस्पतालों की भरमार हो चुकी है। पर वहीं सरकारी अस्पतालों का निर्माण वर्ष 2014 के बाद बहुत धीमी गति से हुआ है, जिसमें कि दिल्ली के कई नये अस्पतालों को अगर निर्माण से दूर कर दिया जाए, तो इस दौरान शायद ही कोई अस्पताल बना हो।

सन् 2006 से सन् 2022 के बीच सीएजीआर से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का आबंटन 13 फ़ीसदी बढ़ा था। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण से सम्बन्धित स्टैंडिंग कमेटी ने अस्पतालों के लिए और बजट की माँग करते हुए कहा है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभाग जितनी राशि की माँग करता रहा है, उसे उससे कम राशि आवंटित की जाती है। फिर भी 2015-16 से पहले बजट का 100 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा बजट का उपयोग किया जाता रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में देश में स्वास्थ्य पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने केंद्रीय स्वास्थ्य बजट से 19 फ़ीसदी अधिक 77,569 करोड़ रुपये ख़र्च किये। ऐसे ही 2021-22 में भी केंद्रीय स्वास्थ्य बजट से 16 फ़ीसदी अधिक ख़र्च बताया गया है।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत और सच्चाई

वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2022 ने भारत को 121 देशों में से पिछले साल के 101 रैंक से और नीचे गिराकर 107वें स्थान पर धकेल दिया है। भारत इस तरह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे खिसकते हुए दिखाया है। हालाँकि केंद्र्र सरकार ने इस रिपोर्ट को ग़लत बताते हुए कहा है कि एक ऐसे राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को ख़राब करने के लिए लगातार प्रयास फिर से दिखायी दे रहे हैं और यह बताने की कोशिश हो रही है जैसे कि भारत अपनी आबादी की खाद्य सुरक्षा और पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।

संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों पर भारत का प्रदर्शन, जो 2030 तक भूख रहित देश के लक्ष्य को अनिवार्य करता है; यह दर्शाता है कि इस लक्ष्य में पिछड़ गया है। सतत् विकास लक्ष्य-2021 की रिपोर्ट के अनुसार भूख, अपव्यय, एनीमिया, पीने के पानी और लैंगिक समानता पर भारत के प्रदर्शन के बाद से भारत की सूचकांक (रैंकिंग) 193 देशों में 117 से और गिरकर 120 हो गयी है। हालाँकि आज़ादी के बाद से देश में कृषि उत्पादन छ: गुना बढ़ गया है। इसी 13 अक्टूबर को जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2022 दर्शाता है कि दुनिया में भारत की रैंकिंग पिछले साल से छ: अंक और फिसल गयी है। इस महत्त्वपूर्ण मामले में यह भूख और कुपोषण की स्थिति का सूचक है। अफ़ग़ानिस्तान, जो एक युद्धग्रस्त देश है, अपने ग्लोबल हंगर इंडेक्स रैंक के मामले में भारत से नीचे दक्षिण एशिया का एकमात्र देश है। वैश्विक सन्दर्भ में अकेले भारत में लगभग एक-तिहाई लोग भूख से पीडि़त हैं और एक-चौथाई लोग खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और सरकार के पास पिछली जनगणना, दोनों के अनुसार कम-से-कम 75 फ़ीसदी ग्रामीण आबादी और 50 फ़ीसदी शहरी आबादी को रियायती खाद्यान्न उपलब्ध कराने का संवैधानिक अधिकार है। क्या खाद्य क़ीमतों में उच्च मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती बेरोज़गारी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है?

हालाँकि महिला और बाल विकास मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ग़लत सूचना सालाना जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक की पहचान है। सूचकांक भूख का एक ग़लत माप है और गम्भीर कार्यप्रणाली मुद्दों से ग्रस्त है। सूचकांक की गणना के लिए उपयोग किये जाने वाले चार संकेतकों में से तीन बच्चों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित हैं और पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। कुपोषित (पीओयू) आबादी के अनुपात का चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण संकेतक अनुमान 3,000 के बहुत छोटे नमूने के आकार पर किये गये एक जनमत सर्वेक्षण पर आधारित है।

सरकार के दावे के मुताबिक, रिपोर्ट न केवल ज़मीनी हक़ीक़त से अलग है, बल्कि विशेष रूप से कोरोना महामारी के दौरान आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयासों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करने का भी संकेत देती है। एक आयामी दृष्टिकोण लेते हुए रिपोर्ट भारत के लिए कुपोषित जनसंख्या के अनुपात (पीओयू) के अनुमान के आधार पर 16.3 फ़ीसदी पर भारत की रैंक को कम करती है। एफएओ का अनुमान गैलप वल्र्ड पोल के माध्यम से आयोजित खाद्य असुरक्षा अनुभव स्केल (एफआईईएस) सर्वेक्षण मॉड्यूल पर आधारित है, जो 3,000 उत्तरदाताओं के नमूने के आकार के साथ आठ प्रश्नों पर आधारित एक जनमत सर्वेक्षण है।

एफआईईएस के माध्यम से भारत के आकार के देश के लिए एक छोटे-से नमूने से एकत्र किये गये डाटा का उपयोग भारत के लिए पीओयू मूल्य की गणना करने के लिए किया गया है, जो न केवल ग़लत और अनैतिक है, बल्कि यह पूर्वाग्रह का भी स्पष्ट संकेत देता है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट जारी करने वाली कंसर्न वल्र्डवाइड और वेल्ट हंगर हिल्फ की प्रकाशन एजेंसियों ने स्पष्ट रूप से उचित परिश्रम नहीं किया है। सरकार ने एफएओ के साथ जुलाई, 2022 में एफआईईएस सर्वेक्षण मॉड्यूल डाटा के आधार पर इस तरह के अनुमानों का उपयोग नहीं करने का निर्णय किया था, क्योंकि इसका सांख्यिकीय आउटपुट योग्यता पर आधारित नहीं होगा। हालाँकि सरकार का कहना है कि इस बात का आश्वासन दिया जा रहा था कि इस मुद्दे पर आगे और जुड़ाव होगा, इस तरह के तथ्यात्मक विचारों के बावजूद वैश्विक भुखमरी सूचकांक रिपोर्ट का प्रकाशन खेदजनक है।

सर्वे में पूछे गये कुछ प्रश्न- पिछले 12 महीने के दौरान क्या कोई समय था, जब पैसे या अन्य संसाधनों की कमी के कारण आप चिन्तित थे कि आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होगा? क्या आपने जितना सोचा था, उससे कम खाया? यह स्पष्ट है कि इस तरह के प्रश्न सरकार द्वारा पोषण सम्बन्धी सहायता प्रदान करने और खाद्य सुरक्षा के आश्वासन के बारे में प्रासंगिक जानकारी के आधार पर तथ्यों की खोज नहीं करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति आहार ऊर्जा आपूर्ति जैसा कि खाद्य बैलेंस शीट से एफएओ द्वारा अनुमान लगाया गया है, देश में प्रमुख कृषि वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि के कारण साल-दर-साल बढ़ रहा है और इसका कोई कारण नहीं है कि देश का कुपोषण का स्तर बढऩा चाहिए।

मोदी सरकार का काम

इस अवधि के दौरान सरकार ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई उपाय किये गये थे। सरकार विश्व का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चला रही है। देश में कोरोना वायरस के अभूतपूर्व संकटकाल के कारण हुए आर्थिक व्यवधानों के मद्देनज़र सरकार ने मार्च, 2020 में लगभग 80 करोड़ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभार्थियों को उनके राशन कार्ड पर पाँच किलोग्राम प्रति व्यक्ति नियमित मासिक अतिरिक्त मु$फ्त खाद्यान्न (चावल / गेहूँ) के वितरण की घोषणा की थी। यह योजना प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना (पीएम-जीकेएवाई) के तहत आती है।

अब तक पीएम-जीकेएवाई योजना के तहत सरकार ने राज्यों / केंद्र्र शासित प्रदेशों को लगभग 1,121 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न आवंटित किया है, जो लगभग 3.91 लाख करोड़ रुपये का है। अब खाद्य सब्सिडी में योजना को दिसंबर, 2022 तक बढ़ा दिया गया है। इसका वितरण राज्य सरकारों के माध्यम से किया गया है, जिन्होंने लाभार्थियों को दाल, खाद्य तेल और मसाले आदि प्रदान करके केंद्र्र सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाया है।

इसके अलावा आँगनबाड़ी सेवाओं के तहत कोरोना महामारी के बाद से छ: वर्ष तक के क़रीब 7.71 करोड़ बच्चों और 1.78 करोड़ गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण प्रदान किया गया। क़रीब 5.3 मिलियन मीट्रिक टन खाद्यान्न (जिसमें 2.5 मिलियन मीट्रिक टन गेहूँ, 1.1 मिलियन मीट्रिक टन चावल, 1.6 मिलियन मीट्रिक टन चावल और 12,037 मीट्रिक टन ज्वार और बाजरा शामिल हैं) की आपूर्ति की गयी।

भारत में 14 लाख आँगनबाडिय़ों में आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं द्वारा पूरक पोषाहार का वितरण किया गया है। लाभार्थियों को टेक होम राशन हर पखवाड़े उनके घरों पर पहुँचाया गया। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 1.5 करोड़ से अधिक पंजीकृत महिलाओं को उनके पहले बच्चे के जन्म पर गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि के दौरान मज़दूरी समर्थन और पौष्टिक भोजन के लिए 5,000 रुपये प्रदान किये गये।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में शामिल पीओयू के अलावा तीन अन्य संकेतक मुख्य रूप से बच्चों से सम्बन्धित हैं। ये संकेतक भूख के अलावा पीने के पानी, स्वच्छता, आनुवंशिकी, पर्यावरण और भोजन के सेवन के उपयोग जैसे विभिन्न अन्य कारकों की जटिल बातचीत के परिणाम हैं, जिसे जीएचआई में स्टंटिंग और वेस्टिंग के लिए कारक / परिणाम कारक के रूप में लिया जाता है। मुख्य रूप से बच्चों के स्वास्थ्य संकेतकों से सम्बन्धित संकेतकों के आधार पर भूख की गणना करना न तो वैज्ञानिक है और न ही तर्कसंगत। वास्तव में विचार के लिए पर्याप्त भोजन है।

सावधान हो जाएँ 50 के पार वाली महिलाएँ

यदि आप की उम्र 50 वर्ष के पार हो गयी हो और आपका मासिक चक्र बन्द हो गया हो, तो सावधान हो जाएँ। सेहत पर अधिक ध्यान देना होगा, वरना लापरवाही महँगी पड़ सकती है। 50 वर्ष की उम्र के बाद पोस्टमेनोपॉजल की स्थिति में शरीर की हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं। हड्डी टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद की स्थिति अधिक नाज़ुक होती है। शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन बनना कम हो जाता है, जो शरीर की हड्डियों को मज़बूत बनाता है। हार्मोन का का स्तर कम होने के कारण ओस्टियोपोरोसिस बीमारी होने का ख़तरा अधिक रहता है। वैश्विक स्तर पर बात करें, तो विशेषज्ञों के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स और यूरोप में 30 फ़ीसदी पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस है। उनका कहना है कि दुनिया भर में बढ़ती उम्र के साथ इन महिलाओं में ओस्टियोपोरोसिस की घटनाओं में एक बड़ी वृद्धि की सम्भावना हो सकती है।

ओस्टियोपोरोसिस की बीमारी के बारे में अधिक जागरूकता के लिए हर वर्ष 20 अक्टूबर को विश्व ओस्टियोपोरोसिस दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय ओस्टियोपोरोधसिस फाउंडेशन (आईओएएफ) ने ‘स्टेप अप फॉर बोन हेल्थ’ लक्ष्य रखा है। इसके मुताबिक, किसी भी उम्र में हड्डियों को तंदुरुस्त रखने के लिए पाँच स्टेप्स ज़रूरी हैं, जो भविष्य में हड्डी के टूटने को कम करने के लिए सहायक होंगे। इनमें पोषक आहार, हड्डियों और पशुओं को मज़बूत बनाने के लिए व्यायाम, शरीर के भार को सन्तुलित रखना, सिगरेट और शराब का सेवन नहीं करना और जागरूकता। ओस्टियोपोरोसिस ऐसी बीमारी है जिसका आसानी से पता नहीं चलता। इसमें हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे हड्डी टूटने का रिस्क बढ़ जाता है। हड्डी टूटने तक ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण न के बराबर होते हैं। हड्डियाँ खोखली हो रही हैं, इसका तब पता चलता है, जब हल्की-सी चोट लगने पर हड्डी टूट जाती है। डब्ल्यूएचओ ऑस्टियोपोरोसिस को एक दैहिक अस्थि रोग के रूप में परिभाषित करता है, जो कम अस्थि घनत्व, हड्डी के ऊतकों की सूक्ष्म संरचना बिगडऩे के द्वारा होता है। इसके परिणाम स्वरूप हड्डी की नाज़ुकता एवं अस्थि टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है। रीड की हड्डी या कूल्हे पर हड्डी का घनत्व, जो सामान्य औसत संदर्भ आबादी में 2.5 मानक विचलन से कम या बराबर है; ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है।

इस बार विश्व ओस्टियोपोरोसिस दिवस के मौक़े पर पीजीआई चंडीगढ़ के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के नये ओपीडी कम्प्लेक्स में एक जागरूकता अभियान चलाया गया। विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर संजय भदादा ने बताया कि यहाँ पिछले एक वर्ष से महीने के हर पहले मंगलवार को ओस्टियोपोरोसिस एंड मेटाबॉलिक बोन डिजीज क्लीनिक चलाया जा रहा है। इसके अलावा एक ऑनलाइन ऑस्टियोपोरोसिस रजिस्ट्री ऑफ इंडिया भी चल रहा है, जिसमें इस रोग से पीडि़त 130 रोगियों का डाटा है। इनमें ज़्यादातर 93 फ़ीसदी महिलाएँ ऑस्टियोपोरोसिस से पीडि़त हैं। 20 फ़ीसदी लोगों की हड्डियाँ एक या एक अधिक जगह से टूटी थीं। 27 फ़ीसदी लोग एक साल में एक या इससे अधिक बार गिर चुके थे। डॉक्टर संजय भदादा का कहना है कि पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं और बड़ी उम्र के पुरुषों में हड्डी टूटने का एक बड़ा कारण ऑस्टियोपोरोसिस है। इस मौक़े पर डॉक्टर संजय, डॉक्टर कन्हैया अग्रवाल और डॉक्टर अनिल किशोर सिन्हा के संयुक्त प्रयासों से ‘ओस्टियोपोरोसिस : कारण एवं निवारण’ पुस्तिका का विमोचन भी किया गया। पुस्तिका में इस बीमारी के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।

हड्डी का टूटना एक गम्भीर समस्या है, ख़ासकर यदि हड्डी कूल्हे की हो। डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों की कूल्हे की हड्डी टूट जाती है, वे कभी-कभी ख़ुद चलने की क्षमता खो देते हैं। इनमें से कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इसलिए कूल्हे की हड्डी को टूटने से बचाना बहुत महत्त्वपूर्ण है। क़रीब 20 फ़ीसदी लोगों की कूल्हे की हड्डी टूटने के एक साल के अन्दर ही मौत हो जाती है। लेकिन अब इसका उपचार उपलब्ध है, जो कि हड्डियों के घनत्व को (बीएमडी) को बनाये रखने या बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। विशेषज्ञ 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए डेक्सा परीक्षण यानी हड्डी सघनता परीक्षण की सलाह देते हैं। ऐसा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इस आयु वर्ग की महिलाओं में ओस्टियोपोरोसिस का ख़तरा सबसे अधिक होता है। रजोनिवृत्ति की शुरुआत के साथ हड्डी पुनर्निर्माण की दर बढ़ जाती है। पुनर्निर्माण असन्तुलन के प्रभाव को बढ़ाता है। हड्डी की व्यक्तिगत ट्रेबेकुलर प्लेट ख़त्म हो जाती हैं। इससे हड्डी की मात्रा काफ़ी कम हो जाती है और सूक्ष्म संरचनात्मक रूप से हड्डी का ढाँचा कमज़ोर हो जाता है। हड्डी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया यानी रीमॉडलिंग में पुरानी हड्डी को हटाकर उसे नयी हड्डी से बदलकर एक जटिल सन्तुलन बनाये रखती है। जब यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तो हड्डी का नुक़सान होता है। जिसके परिणाम स्वरूप हड्डियों का क्षरण प्रतिस्थापन की तुलना में अधिक होता है। यह असन्तुलन रजोनिवृत्ति और बढ़ती उम्र के साथ ज़्यादा होता है।

ज़्यादा टूटती हैं भारतीयों की हड्डियाँ

वर्ष 2009 में इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन के एशियन ऑडिट में विशेषज्ञ समूहों ने अनुमान लगाया था कि भारत में इस बीमारी के रोगियों की संख्या वर्ष 2003 में लगभग 2.5 करोड़ थी। वर्ष 2013 में पाँच करोड़ लोग या तो ओस्टियोपोरोटिक हैं या हड्डियों का घनत्व कम है। सिंगापुर में प्रवासी भारतीयों पर वर्ष 2001 में हुए अध्ययन से पता चला कि भारतीयों में प्रति लाख आबादी पर कूल्हे की हड्डी टूटने की आशंका ज़्यादा पायी गयी, जो कि क्रमश: महिलाओं और पुरुषों में 308 एवं 128 प्रति लाख थी। डॉक्टरों का कहना है कि भारतीयों में अपने उत्तरी अमेरिकी समकक्षों की तुलना में बीएमडी कम है। इस अन्तर का कारण आनुवंशिक, अस्थि का छोटा आकार होना और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण कुपोषण हो सकता है। अधिक मात्रा में धूप के बावजूद विटामिन डी की कमी भारत में काफ़ी है। यह त्वचा के कालेपन, कपड़ों के पहनने की आदतों और विटामिन डी की अनुपस्थिति जैसे कारकों के कारण हैं। भारतीय भोजन में कैल्शियम की मात्रा पश्चिमी देशों की तुलना में कम होती है।

महिलाओं में ख़तरा ज़्यादा

विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की उम्र बढऩे के साथ ट्रैबेकुला ढीला होना शुरू हो जाता है। ट्रैबेकुले के बीच अन्तर अधिक होता रहता है। जबकि पुरुषों में बढ़ती उम्र के साथ ट्रैबेकुला केवल पतला होता है। कॉर्टिकल हड्डी का नुक़सान बाद में शुरू होता है। महिलाओं के जीवन-काल में हड्डियों के टूटने का ख़तरा 50 फ़ीसदी होता है, जबकि महिलाओं में कम (13-25 फ़ीसदी) होता है।

कैसे करें हड्डियों की देखभाल?

डॉक्टरों की राय में मीनोपॉज के पाँच वर्ष बाद सभी महिलाओं को कम से कम एक बार बोन डेंसिटी परीक्षण करवाने चाहिए। इन परीक्षण के परिणामों को टी और जेड स्कोर कहा जाता है। 50 वर्ष और इससे अधिक आयु वाले पुरुषों में और पोस्ट मीनोपॉजल महिलाओं में टी स्कोर अधिक महत्त्वपूर्ण है। अन्य लोगों में जेड।

डॉक्टरों का कहना है कि हड्डियों को टूटने का बचाव ही बेहतर इलाज है। यदि आप की हड्डी एक बार टूट जाए, तब वो कभी भी मूल अवस्था में नहीं पहुँच सकती। इसलिए ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में पौष्टिक आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और धूम्रपान से बचना शामिल है। हड्डी को स्वस्थ रखने के लिए यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि आप को पर्याप्त प्रोटीन और कैलोरी के साथ-साथ कैल्शियम और विटामिन डी भी भरपूर मात्रा में मिले। कैल्शियम शरीर में हड्डियों को मज़बूत बनाये रखने के लिए बहुत ज़रूरी है और विटामिन डी शरीर में कैल्शियम को अवशोषित करने में मदद करता है। विटामिन डी की कमी तब होती है, जब आपके शरीर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी नहीं बनता है। दूध एवं दूध से बने सभी खाद्य पदार्थ कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं। बादाम सिर्फ़ दिमाग़ को तेज़ ही नहीं करते, बल्कि हड्डियों और दातों को भी मज़बूत बनाते हैं। मांसपेशियों को तंदुरुस्त रखते हैं। कीवी, नारियल, आम, जायफल, अनानास और सीताफल में भरपूर कैल्शियम होता है।

कैल्शियम, विटामिन की ज़रूरत

विशेषज्ञों के अनुसार प्रीमेनोपॉजल महिला और पुरुष को प्रतिदिन कम से कम 1000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना चाहिए। पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं को प्रतिदिन 1200 मिलीग्राम कैल्शियम के सेवन की आवश्यकता होती है। विटामिन डी की बात करें तो इन महिलाओं को 800 अंतरराष्ट्रीय विटामिन डी इकाइयों (20 माइक्रोग्राम) का सेवन करना चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि लोगों के शरीर में सूरज की रोशनी से विटामिन डी बनता है। चमड़ी सीधे धूप का उपभोग करके विटामिन डी बनाती है। 30 मिनट के लिए प्रतिदिन कम कपड़े के साथ खुली धूप में बैठना चाहिए। विटामिन डी का प्राथमिक आहार स्रोत दूध है।

अन्य खाद्य पदार्थ जैसे सन्तरे का रस, दही और अनाज में भी अतिरिक्त विटामिन डी होता है। हरी सब्ज़ियाँ, कश्मीरी हरा साग, ब्रोकली, मशरूम आदि में भी विटामिन डी पाया जाता है। अधिकांश विशेषज्ञ हर सप्ताह में 5 बार कम से कम 30 मिनट प्रतिदिन व्यायाम करने की सलाह देते हैं। इसके अलावा टहलना और चलना भी ज़रूरी है। व्यायाम प्री मेनोपजल महिलाओं में हड्डी के घनत्व में सुधार लाता है। मीनोपॉज की स्थिति से गुज़रने वाली महिलाओं में हड्डियों के घनत्व को बनाये रखता है, और टूटने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

तंत्र-जाल के अपराध

हाल में केरल जैसे प्रगतिशील राज्य में बलि के नाम पर एक दम्पति द्वारा कथित तौर पर एक तांत्रिक के साथ मिलकर दो महिलाओं की हत्या वाली ख़बर ने एक बार फिर याद दिला दिया कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद अभी भी इस समाज में तंत्र-मंत्र, जादू-टोना जैसी तांत्रिक क्रियाएँ अपनी जगह बनाये हुए हैं। क्या इस वैज्ञानिक युग में सोच सकते हैं कि कोई इंसान किसी दूसरे इंसान की बलि दे सकता है? पुलिस का कहना है कि इस मामले में जिन तीन आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया है, उन्होंने इन महिलाओं की हत्या जादू-टोना के लिए तंत्र क्रियाओं के तहत की। आरोपियों को भरोसा था कि यदि वे मानव बलि देंगे, तो उनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी हो जाएगी। केरल की रोजलिन और पद्मा नामक दोनों महिलाएँ, जिनकी बलि दी गयी; लॉटरी बेचने का काम करती थीं। दोनों ही इसी साल जून और सितंबर माह में लापता हुई थीं। पुलिस ने जब उनके लापता होने की जाँच शुरू की, तो पता चला कि इन दोनों का अपहरण करने के बाद उनकी मानव बलि दी गयी।

बहरहाल इस ख़बर ने केरल की सत्ताधारी वामपंथी सरकार पर भी सवालिया निशान लगा दिये हैं। वहाँ ऐसी अंधविश्वासी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए और इस सन्दर्भ में मौज़ूदा क़ानूनों के कड़ाई से अमल करने की माँग उठी है। सीपीएम पार्टी के सदस्यों ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया और कहा कि पार्टी मानव की आत्मा को झकझरोने वाली इस घटना की निंदा करती है।’

मौज़ूदा क़ानूनों के कड़ाई से अमल करने के अलावा यदि ज़रूरी हुआ, तो एक नये क़ानून पर भी विचार किया जा सकता है। ग़ौरतलब है कि देश में अंधविश्वास, काला जादू, जादू-टोना या मानव बलि से निपटने के लिए कोई केंद्रीय क़ानून नहीं है। काला जादू के नाम पर किसी भी नागरिक के प्रति किया गया अपराध उसके मूल अधिकार का उल्लघंन है और संविधान के अनुच्छेद-14,15 और 21 का उल्लघंन करता है।

दरअसल देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर मानव बलि की ख़बरें, जादू-टोना से जुड़ी ख़बरें पढऩे सुनने को मिलती रहती हैं। बीते दिनों गुज़रात के जूनागढ़ में एक पिता पर 14 साल की बेटी की हत्या का आरोप लगा और पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया है। पिता पर धन और पुत्र प्राप्ति की लालसा में बेटी को बलि देने का सन्देह है। दो साल पहले कानपुर की छ: साल की एक बच्ची भी मानव बलि का शिकार बन गयी। कानपुर के एक दम्पति की ख़ुद की सन्तान नहीं थी। पति-पत्नी दोनों दु:खी रहते थे, उन्हें किसी तांत्रिक ने बच्चे होने का यह उपाय बताया कि वह किसी मानव की बलि देंगे, तो सन्तान प्राप्ति होगी। दम्पति ने इस अंधविश्वास के फेर में गाँव से एक छ: साल की बच्ची का अपहरण करवाया और फिर उसकी बलि दे दी। इसी तरह विदिशा (बिहार) में एक नव-विवाहित पति-पत्नी के आपसी झगड़े का फायदा उठाते हुए एक तांत्रिक ने झाड़-फूँक के नाम पर महिला से दुष्कर्म कर दिया। महिलाओं से तांत्रिकों द्वारा दुष्कर्म के ऐसे मामले हर महीने कहीं-न-कहीं सुनने, पढऩे को मिलते हैं।

दरअसल धर्म, आस्था, तर्क इंसान को गढऩे में कितना योगदान देते हैं। इस पर मतभिन्नता हो सकती है; लेकिन अंधविश्वास, जादू-टोना, काला जादू की इस वैज्ञानिक युग में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। मानव की विकास यात्रा से भी यही सन्देश मिलता है। लेकिन कई कट्टरवादी आज भी अंधविश्वास, जादू-टोने में आस्था वाली अवधारणा को कमज़ोर होते नहीं देखना चाहते और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों को अपना घोर दुश्मन मानने लगते हैं। वे अंधविश्वास के ख़िलाफ़ सोचने वाली मानसिकता को नास्तिकता से जोडक़र देखने के आदी हो गये हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि धर्म, आस्था एक निजी मामला है; लेकिन मानव बलि का धर्म व आस्था में कोई स्थान नहीं। अंधविश्वासी लोगों का ख़ेमा वैज्ञानिकों व तर्कवादियों को समय-समय पर अपने तरीकों से चुनौती देने का दुस्साहस करता रहता है। सन्दर्भवश ज़िक्र किया जा रहा है- डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का। पुणे के 71 वर्षीय डॉ. नरेंद्र दाभोलकर प्रसिद्ध तर्कवादी थे और अंधविश्वास के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे थे। और काला जादू जैसे तंत्र-मंत्र को एक क़ानून के तहत प्रतिबन्धित करने के मक़सद से कई वर्षों से महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बना रहे थे। वह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक व अध्यक्ष थे।

20 अगस्त, 2013 को उनकी हत्या कर दी गयी। उनकी हत्या के बाद देश भर में उमड़े रोश के मद्देनज़र महाराष्ट्र सरकार ने काला जादू, अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के निर्मूलन के लिए लम्बे समय से लम्बित विधेयक को एक अध्यादेश की शक्ल में लाने का ऐलान कर दिया था। यह एक सामाजिक बुराई है और इसकी ज़द में अधिकतर महिलाओं व बच्चों को निशाना बनाया जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा की सन् 2021 रिपोर्ट के देश में जादू-टोना के 68 मामले दर्ज किये गये। सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में 20 मामले व उसके बाद मध्य प्रदेश में 18 दर्ज किये गये। महिलाओं को डायन, चुडै़ल, टोनही कहकर समाज में बदनाम करने की परम्परा बहुत पुरानी है। ऐसी महिलाएँ जो अकेली होती हैं, विधवा होती हैं; उन्हें समाज का बहुत बड़ा तबक़ा कमज़ोर महिला के तौर पर आँकता है और कई मर्तबा उनकी जायदाद पर क़ब्ज़ा करने के लिए उनके ख़िलाफ़ साज़िश रचता है। कुछ लोग उनकी छवि को बुरी आत्मा के तौर पर प्रचारित करके बहुत कुछ हासिल करने के चक्कर में लगे रहते हैं। गाँव, दूर-दराज़ इलाक़ों व शहरों की भी कुछ बस्तियों में भी अगर कोई लम्बे समय तक बीमार रहता है, तो उसके इलाज के लिए अभिभावक, रिश्तेदार अंधविश्वास का सहारा लेते हैं। तांत्रिकों के पास जाते हैं और जादू-टोना को असली सच स्वीकार कर लेते हैं। महिलाओं, बच्चों को इससे संरक्षण प्रदान करने व इस धंधे में शामिल लोगों को दण्डित करने की मंशा से देश के कई राज्यों ने इसके ख़िलाफ़ क़ानून भी बनाये हैं। मसलन बिहार ऐसा पहला राज्य है, जिसने यह क़ानून बनाकर दूसरे राज्यों के सामने एक मिसाल क़ायम की।

सन् 1999 में बिहार राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-1999 क़ानून लागू किया गया। यह अधिनियम कहता है कि इसकी मंशा जादू-टोने की प्रथाओं को रोकने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाना है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति किसी भी महिला की डायन के रूप में पहचान करता है, उसे दण्डित करना और जैसा कि ऐसी घटनाएँ अधिकतर आदिवासी इलाक़ों में व राज्य के दूसरे इलाक़ों में होती हैं और समाज के द्वारा महिलाओं को दी जाने वाली यातनाओं व हत्याओं को ख़त्म करना है। इसके तहत डायन ऐसी महिला के लिए पारिभाषित किया गया है, जिसके बारे में समाज की राय थी कि उस महिला के पास दूसरों को नुक़सान पहुँचाने वाली शक्तियाँ हैं और वह काला जादू, बुरी नज़र या मंत्र के ज़रिये दूसरों को हानि पहुँचा सकती है। जो महिलाओं को डायन के तौर पर प्रचारित करते हैं, उनके लिए इस अधिनियम में जेल की अवधि तीन महीने की है और 1,000 रुपये का आर्थिक दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।

बिहार की तर्ज पर सन् 2001 में झारखण्ड राज्य डायन प्रथा प्रतिषेध क़ानून लागू किया। छत्तीसगढ़ ने 2002 में टोनही प्रताडऩा निवारण अधिनियम लागू किया। इस राज्य में डायन को टोनही कहा जाता है। किसी की भी टोनही के रूप में पहचान करने चाले इंसान की सज़ा की अवधि बढ़ाकर तीन साल की जा सकती है। इसके अलावा प्रताडऩा करने की सूरत में कठिन सज़ा की अवधि पाँच साल है। इसके साथ ही तंत्र-मंत्र से किसी का इलाज करना व पशुओं को नुक़सान पहुँचाने वाले कामों को भी दण्डनीय माना गया है। राजस्थान, असम, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र में भी ऐसे क़ानून लागू है। राजस्थान के ऐसे क़ानून के तहत अपराधी के लिए न्यूनतम सज़ा तीन साल व अधिकतम सात साल या 50,000 रुपये का आर्थिक दण्ड का प्रावधान है।

कुछ राज्यों ने जब ये क़ानून बनाये, तो राजनीतिक विरोधी दलों व कुछ धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया। आलोचकों ने इसे धार्मिक आज़ादी में सरकारी दख़लंदाज़ी बताया। अर्थात् इस सामाजिक बुराई में भी सियासत अपना रंग दिखाने से बाज़ नहीं आता। जहाँ तक ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्रीय स्तर पर अभी कोई क़ानून पारित नहीं हुआ है। सन् 2016 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से तत्कालीन सांसद राघव लखन पाल ने द प्रिवेंशन ऑफ विच हंटिंग बिल-2016 को लोकसभा में पेश किया था। इसमें एक महिला को समाज डायन क्यों मानता है? उन कारणों के साथ ही पुनर्वास और सरकार के द्वारा चलाये जाने वाले जागरूकता कार्यक्रमों का ज़िक्र किया गया था। लेकिन इस बिल पर चर्चा करने के लिए आज तक कोई विचार नहीं किया गया।