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झारखंड के सीएम सोरेन को ईडी ने कल रांची में अवैध खनन मामले में पूछताछ के लिए बुलाया  

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गुरुवार को रांची में अपने दफ्तर में पूछताछ के लिए तलब किया है। उनसे अवैध खनन के एक मामले में पूछताछ होगी। इसे देखते हुए ईडी ने झारखंड पुलिस के डीजीपी को पत्र लिखकर सुरक्षा के इंतजाम करने का अनुरोध किया है।

अभी तय नहीं है कि सोरेन इस पूछताछ में शामिल होंगे या आगे के लिए समय की मांग करेंगे। याद रहे इस मामले में सितंबर में मुख्यमंत्री के सहयोगी पंकज मिश्रा को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उससे पहले ईडी ने जुलाई में राज्य भर में कई जगह छापे मारे थे।

ईडी के मुताबिक इस दौरान उसने पंकज मिश्रा और उनके सहयोगी दाहू यादव के बैंक खातों से 11.88 करोड़ रुपए जब्त किए थे। इसके बाद मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया था।

अदालत में दायर अपनी चार्जशीट में ईडी ने दावा किया है कि हेमंत सोरेन के राजनीतिक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बरहेट में अपने सहयोगियों के जरिए अवैध खनन व्यवसाय को नियंत्रित करते हैं।

कांग्रेस ने असम में भी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू की, खोई ज़मीन तलाशने की तैयारी में पार्टी

राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तर्ज पर कांग्रेस ने असम में भी ऐसी ही यात्रा की शुरुआत कर दी है। पार्टी का मकसद 834 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के जरिये पुराणी ज़मीन हासिल करना है। इसे एक तरह से 2024 के आम चुनाव की तैयारी माना जा रहा है।

असम में पार्टी की यह यात्रा तब शुरू हुई है जब कांग्रेस पहले ही राहुल गांधी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3,570 किलोमीटर लंबी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कर रही है। इसमें काफी भीड़ उमड़ती देखी गयी है जिससे पार्टी उत्साहित नजर आ रही है। अब असम की यात्रा शुरू करके उसने उत्तर पूर्व के सबसे प्रमुख राज्य  दस्तक दे दी है।

यात्रा का आयोजन असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी कर रही है। उसने अपने जनसंपर्क अभियान के तहत इसका आयोजन किया है। पूजा अर्चना के बाद इसकी शुरुआत लोअर असम के धुबरी से की गई है, जो कि अपर असम के सादिया तक जाएगा। पार्टी नेताओं की उपस्थिति में भारत-बांग्लादेश सीमा के पास स्थित गोलोकगंज शहर में यह यात्रा शुरू हुई।

इस दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और असम इकाई के प्रभारी जितेंद्र सिंह, एपीसीसी अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा, लोकसभा सदस्य प्रद्युत बोरदोलोई और राज्य इकाई के अन्य वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। कांग्रेस ने दावा किया है कि पहले ही दिन पार्टी को जनता की तरफ से अच्छा रिस्पांस मिला है।

उत्तर कोरिया के लगातार 10 मिसाइलें दागने के बाद दक्षिण कोरिया ने जारी की चेतावनी

उत्तर कोरिया की तरफ से बुधवार को विवादित समुद्री सीमा के दक्षिण में और दक्षिण कोरिया के क्षेत्रीय जल के करीब एक के बाद एक दस मिसाइलें दागने के बाद दक्षिण कोरिया ने अपने द्वीप के लिए पहली बार किसी हवाई हमले की चेतावनी जारी की है।  घटना की गंभीरता को देखते हुए दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यूं सुक-योल ने इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की एक बैठक बुलाई।

दक्षिण कोरिया के संयुक्त चीफ ऑफ स्टाफ (जेसीएस) आई कांग शिन-चुल ने मीडिया के लोगों को बताया – ‘उत्तर कोरियाई मिसाइल प्रक्षेपण बहुत ही असामान्य और अस्वीकार्य है, क्योंकि यह पहली बार उत्तरी सीमा रेखा के दक्षिण में दक्षिण कोरियाई क्षेत्रीय जल के करीब गिरी। हमने उल्लुंगडो द्वीप पर हवाई हमले की चेतावनी जारी की थी, जिसे राष्ट्रीय टेलीविजन पर दिखाया गया था और निवासियों के लिए चेतावनी जारी की गई।’

बता दें उत्तर कोरिया का यह मिसाइल प्रक्षेपण सियोल और वाशिंगटन के सबसे बड़े संयुक्त हवाई अभ्यास के बाद हुआ है। विजिलेंट स्टॉर्म नाम के इस साझे हवाई अभ्यास के तहत दोनों पक्षों के सैकड़ों युद्धक विमान शामिल हुए हैं।

प्रमुख सेना अधिकारी ने कहा कि प्योंगयांग (उत्तर कोरिया) की एक मिसाइल उत्तरी सीमा रेखा के दक्षिण में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में उतरी थी, जो दोनों देशों के बीच विवादित समुद्री सीमा है। उधर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यूं सुक-योल ने लॉन्च को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की एक बैठक भी बुलाई। उत्तर कोरिया की इस हरकत को विश्लेषकों ने ‘सबसे आक्रामक और धमकी’ ‘भरा बताया।

इस बीच जापान ने भी कथित उत्तर कोरियाई बैलिस्टिक मिसाइलों के प्रक्षेपण की पुष्टि की है। जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने मीडिया से कहा – ‘जैसा कि हम कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढ़ता देख रहे हैं, मैं जल्द ही राष्ट्रीय सुरक्षा बैठक बुलाने वाला हूं।’

संकट के साये में यूरोप

परमाणु तबाही के ख़तरे के बीच अमीर राष्ट्रों के सामने अस्तित्व की चुनौती

साल 2020 की शुरुआत से दुनिया कई बड़ी प्राकृतिक और अप्राकृतिक आपदाओं से जूझ रही है। इन आपदाओं के बीच रूस और यूक्रेन की लम्बी लड़ाई ने पहले से ही कई समस्याओं और आर्थिक संकट की आशंकाओं से जूझ रहे ब्रिटेन को उसकी हाल ही में चुनी गयी प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस के इस्तीफ़े के बाद अब भारतीय मूल के अपने नये प्रधानमंत्री ऋषि सुनक से कई उम्मीदें हैं। बता रहे हैं गोपाल मिश्रा :-

रूस-यूक्रेन युद्ध न केवल एक ख़तरनाक मोड़ पर है, बल्कि यह पूरे यूरोप में आजीविका की तलाश में पहुँचे शरणार्थियों के मानवीय दु:ख के साथ-साथ ऐसे विनाश को भी दर्शाता है, जिसे मापा नहीं जा सकता। यदि रूस सामरिक परमाणु हथियारों का उपयोग करता है, तो मानव त्रासदी एक तबाही में तब्दील हो सकती है। ऐसा नहीं है कि लगभग एक तिहाई यूक्रेन अँधेरे में डूब रहा है। वहाँ हज़ारों लोग पीने के पानी की जबरदस्त कमी का सामना कर रहे हैं। रूसी मिसाइलों से बिजली की लाइनें प्रभावित हुई हैं। लिहाज़ा ठिठुरन भरी सर्दी यूरोप की प्रतीक्षा कर रही है। इस संघर्ष के किसी भी समाधान के बजाय काले युद्ध के बादल यूरोपीय अस्तित्त्व के लिए ख़तरा बने हुए हैं। इसने यूरोप के विभिन्न हिस्सों में लोगों के लिए बढ़ते असन्तोष की शुरुआत की है। वे बायोमास जलाकर ख़ुद को गर्म कर रहे हैं। पोलैंड के गाँवों में सर्दी से बचने के लिए पेड़ों को काटकर उनकी लकड़ी से काम चलाया जा रहा है। फ्रांस में पेट्रोल की राशनिंग शुरू हो चुकी है। कार के लिए केवल 30 लीटर पेट्रोल और एक ट्रक के लिए 100 लीटर पेट्रोल पाने के लिए लम्बी कतारें लग रही है। कुछ पेट्रोल पंपों पर हिंसा की ख़बरें भी आयी, जिसके बाद मालिकों को पम्प बन्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जर्मनी में, ऊर्जा बचाने के लिए रात के समय ट्रैफिक लाइट बन्द की जा रही है। ब्रिटेन में बिजली प्रतिबंधों के कारण रेस्तरां बन्द हो रहे हैं। स्पेन में एयर कंडीशनर के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। साथ ही इस आदेश के उल्लंघन को अपराध बना दिया गया है।

वर्तमान संकट का पता सन् 2014 में क्रीमिया के रूसी विलय से लगाया जा सकता है। इसे युद्ध का मूल कारण बताया गया है। इसके बाद रूस के ख़िलाफ़ अमेरिका के नेतृत्व में प्रतिबंध लगाये गये, लेकिन मतभेदों को सुलझाने के लिए कोई गम्भीर अंतरराष्ट्रीय प्रयास नहीं किये गये। इससे पहले, यूक्रेनी राष्ट्रपति यानुकोविच थे, जिन्होंने रूसी मदद से देश छोड़ दिया और इस प्रकार नये चुनाव का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार ज़ेलेंस्की 2019 में यूक्रेन के राष्ट्रपति बने। उन्होंने नाटो की सदस्यता की माँगकर रूस को नाराज़ कर लिया।

यूक्रेन को नाटो और यूरोपीय संघ (ईयू) में शामिल किया जाना बाक़ी है, लेकिन इस साल फरवरी में युद्ध छिडऩे के बाद से वह पश्चिमी शक्तियों का पूर्ण समर्थन हासिल करने में सफल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनके नाटो सहयोगी ज़्यादातर यूरोपीय संघ के सदस्य हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में रूसी तेल और गैस की बिक्री के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंध लगाये हैं। लेकिन रूस की आर्थिक शक्ति को कमज़ोर करने के बजाय इसने रूबल को मज़बूत किया है, और उसी ने नेतृत्व भी किया है। यूरोपीय अर्थ-व्यवस्था के लगभग पतन के कारण महाद्वीप में अभूतपूर्व अशान्ति बन गयी है।

हाल के हफ़्तों में नाटो और यूरोपीय संघ (ईयू) के ख़िलाफ़ विरोध तेज़ हो गया है। फ्रांस, जर्मनी और कई अन्य देशों में प्रदर्शनकारी इस माँग को लेकर मार्च कर रहे हैं कि फ्रांस को नाटो और यूरोपीय संघ पर अपना रुख़ मौलिक रूप से बदलना चाहिए। ब्रसेल्स में तीन मुख्य यूनियनों के हरे, नीले और लाल रंग के कपड़े पहने 10,000 से अधिक लोगों को खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों, चौंकाने वाले ऊर्जा बिलों की जाँच के लिए तत्काल राहत की माँग करते देखा गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों के दौरान यह महाद्वीप शायद सबसे बड़ी त्रासदी का सामना कर रहा है। यह बाल्कन के ईसाई-मुस्लिम संघर्ष से भी बड़ा है, जब बोस्निया की मुस्लिम महिलाओं को सर्बियाई ईसाई गुंडों द्वारा अपमानित और उल्लंघन किया गया था। पिछले आठ महीनों के दौरान यूरोप में इतिहास दोहराया जा रहा है, जहाँ यूक्रेनी शरणार्थियों, विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं को जीवित रहने के लिए हर तरह के अपमान का सामना करना पड़ रहा है। संघर्ष को समाप्त करने के बजाय अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी शक्तियाँ रूसियों को युद्ध क्षेत्र को और बढ़ाने के लिए उकसा रही हैं, यह महसूस किये बिना कि युद्ध के लिए परमाणु तबाही हो सकती है, भले ही सामरिक परमाणु बमों का उपयोग किया गया हो।

युद्ध से मोहभंग

इस बार यूरोप में बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता या नवीनतम हथियारों के परीक्षण के लिए एक प्रायोगिक प्रयोगशाला के स्थल के रूप में युद्ध छिड़ गया है। युद्ध क्षेत्र न तो एशिया है और न ही अफ्रीका, बल्कि यूरोप है जो औपनिवेशिक युग की दुर्जेय शक्तियों की भूमि है। इसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड और अन्य छोटे देश शामिल हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ये देश पिछले 77 वर्षों के दौरान पहली बार उथल-पुथल का सामना कर रहे हैं।

औपनिवेशिक काल की पिछली तीन शताब्दियों के दौरान इन शक्तियों ने अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की अपार सम्पदा को लूटा था। उनके द्वारा जमा की गयी सम्पत्ति को ख़रबों अमेरिकी डॉलर में भी नहीं मापा जा सकता है। उन्होंने एक व्यवसाय मॉडल कैसे विकसित किया है, यह काफ़ी हैरान करने वाला है। यूरोपियों ने महाद्वीपों के लोगों को सफलतापूर्वक अपने अधीन कर लिया था। पोप्स बुल के अनुमोदन से उन्हें ग़ुलाम बना लिया था। अमेरिका में लाखों लोगों का जीवन नष्ट करने के लिए चेचक फैलाया था। इसके बाद 20वीं शताब्दी के दौरान उन्होंने पृथ्वी पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए आपस में ख़तरनाक पहला और दूसरा विश्व युद्ध लड़ा था। हालाँकि युद्धों ने इन औपनिवेशिक शक्तियों को कमज़ोर कर दिया था। इस प्रकार एशिया और अफ्रीका में बड़ी संख्या में देशों की राजनीतिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ। अपनी पूर्व औपनिवेशिक जीवन शैली को बनाये रखने के लिए इन सबसे धनी देशों ने विभिन्न संस्थानों के माध्यम से अपनी अर्जित सम्पत्ति को बचाने का फ़ैसला किया। उनमें से एक यूरोपीय संघ और एक दुर्जेय रक्षा कवच नाटो है। हालाँकि रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोपीय संघ की एकता के मिथक को उजागर कर दिया है और नाटो के साथ मोहभंग अब खुले रूप से स्पष्ट हो रहा है।

यूरोप में इस बात का अहसास बहुत देरी से हुआ कि रूस के ख़िलाफ़ हाल में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की एक गुप्त बैठक आयोजित करने के अमेरिकी क़दम से दुनिया भर में संघर्ष शुरू हो सकते हैं। यह संयुक्त राज्य अमेरिका को नुक़सान नहीं पहुँचा सकता है, जो युद्ध क्षेत्र से काफ़ी दूर है। रूस के ख़िलाफ़ जो बाइडेन के आक्रामक मिजाज़ ने अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो की एक दुर्जेय सुरक्षा गठबंधन के रूप में भूमिका के बारे में यूरोप में आम लोगों को मोहभंग कर दिया है। उनका मानना है कि यूरोपीय संघ और नाटो के आक्रामक रुख़ के कारण यूरोप सीधे तौर पर इस युद्ध के नतीजों का सामना कर रहा है। उन्हें यह भी सन्देह है कि यह संघर्ष जानबूझकर रूस को एक और संघर्ष में फँसाने के लिए तैयार किया गया है।

बदलता यूरोप

नाटो और यूरोपीय संघ द्वारा चतुराई से बेचे जाने वाले ‘युद्ध के रोमांस’ के बाद बनी कठिनाइयों के साथ ही वहाँ अब भ्रम दूर होने लगे हैं। युद्ध के बीच अब यूरोपीय लोग अब भारी ऊर्जा की कमी और आर्थिक कठिनाइयों के साथ-साथ अपनी औद्योगिक इकाइयों के बन्द होने और यूक्रेन से शरणार्थियों के कभी न ख़त्म होने वाले प्रवाह की आमद का सामना कर रहे हैं। इन सबसे धनी देशों की अर्थ-व्यवस्थाएँ उनकी नाज़ुक राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले पतन का सामना कर रही हैं। यूके यानी ब्रिटिश प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस पहले ही इस्तीफ़ा दे चुकी हैं और इटली के नये प्रधानमंत्री एक स्वतंत्र राजनीतिक लाइन पर चल सकते हैं। शुरुआत में नये नेता, मेलोनी ने पुतिन को मिठाई और शराब भेजने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी की आलोचना की है; लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह नाटो और यूरोपीय संघ की टकराव की नीति को नहीं मान सकती हैं, जब सडक़ पर विरोध अधिक-से-अधिक मुखर हो जाता है।

नाटो और यूरोपीय संघ को ख़त्म करने की माँग को लेकर यूरोप में विरोध और प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। इस बात का अहसास बढ़ रहा है कि न तो जो बाइडेन और न ही यूरोपीय संघ के अध्यक्ष, उर्सुला वॉन डेर लेयेन, शान्तिपूर्ण प्रक्रियाओं द्वारा संघर्ष के समाधान में रुचि रखते हैं। यह पूछा जा रहा है कि यूरोपीय संघ ने क्रीमिया के विलय के बाद सन् 2014 से रूस पर उत्तरोत्तर लगाये गये प्रतिबंधों के प्रभाव का ऑडिट क्यों नहीं किया है। यूरोपीय संघ के सदस्य इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि वर्तमान युद्ध के दौरान, उनकी मुद्रा (यूरो) कमज़ोर हो गयी है, जबकि डॉलर और रूबल मज़बूत हुए हैं। यूरोपीय देशों को अपने नागरिकों को अरबों यूरो की सब्सिडी देनी पड़ती है, ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें, क्योंकि उन्होंने रूसी गैस ख़रीदने से इनकार कर दिया है।

वह इस बात से झटके में हैं और काफ़ी आश्चर्यचकित भी कि अमेरिका ने विस्फोट, जिसने नॉर्डिक-ढ्ढ पाइप लाइन को बाधित कर दिया था; के तुरन्त बाद तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) यूक्रेन को भेज दी। उसने रूसी गैस की तुलना में चार गुना अधिक क़ीमत वसूलकर इसे एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। इसी तरह नॉर्वे भी यूरोपीय संघ द्वारा सुझायी गयी मूल्य सीमा को न मानकर महाद्वीप में अपने मित्र देशों से दूर जा रहा है। पश्चिमी मीडिया युद्ध स्तर पर इसकी आलोचना करने की जगह रूस को उस विस्फोट के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहा है, जिसने नॉर्डिक-ढ्ढ को बाधित किया था। रूस पर नॉर्डिक-ढ्ढढ्ढ पाइपलाइन को तुरन्त चालू करने से रोकने के लिए पाइप लाइन को बाधित करने का भी आरोप लगाया जा रहा है। दूसरी ओर रूसी पक्ष को सन्देह है कि कुछ अमेरिकी परदे के पीछे अमेरिका को अपने एलएनजी को बहुत अधिक क़ीमत पर बेचने में सक्षम बनाने के लिए व्यवधान पैदा कर रहे थे।

यूरोपीय संघ के सामने चुनौती

रूसी-यूक्रेन युद्ध एक महत्त्वपूर्ण चरण में प्रवेश करने के साथ, पाँचवीं पीढ़ी के उच्च तकनीक वाले विमानों और मिसाइलों का उपयोग करते हुए दिख रहा है। सुरक्षा और सामरिक मुद्दों के समाधान के लिए कूटनीति का सहारा लेने के बजाय रूस के ख़िलाफ़ टकराव को हवा दी जा रही है। इस बीच अमेरिकी और रूसी यूरोपीय लोगों की क़ीमत पर युद्ध क्षेत्र में अपने नवीनतम हथियारों का परीक्षण कर रहे हैं।

इस यूरोपीय संघर्ष के कारण अमेरिका के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक गठबंधन की भावना को नुक़सान पहुँचा है। अमेरिका के अधीन पश्चिमी शक्तियों को संघर्षों को भडक़ाने के लिए जाना जाता है; लेकिन यूक्रेन-रूस युद्ध ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पैदा हुई यूरोप की नयी पीढ़ी के सामने वास्तविक रूप से युद्ध का ख़तरा सामने ला दिया है, जो फरवरी 2022 से महाद्वीप में दस्तक दे रहा है; जब रूस को यूक्रेन पर आक्रमण करने के लिए उकसाया गया था। यूक्रेन यूएसएसआर का सबसे पसंदीदा गणराज्य या प्रान्त रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों के ख़िलाफ़ उनके बलिदान के लिए रूसियों ने हमेशा यूक्रेनियन पर भरोसा किया और उनकी प्रशंसा की। दोनों पक्ष, ईसाई होने के कारण बाइबल के इस वर्णन कि देवदूत लुसिफर ने अपने निर्माता को उखाड़ फेंकने की कोशिश की थी; इस युद्ध को सही नहीं ठहरा सकता। युद्ध एक दिन समाप्त हो सकता है, लेकिन यह दुनिया के नेताओं को हमेशा परेशान करेगा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना को क्यों भुलाया जा रहा था और युद्ध ने किस उद्देश्य की पूर्ति की; लेकिन यह खलनायक लूसिफेर की पहचान करने की हिम्मत कभी नहीं कर सकता।

संघर्ष की गम्भीरता

लम्बे रूस-यूक्रेन युद्ध से पनपी मुश्किलें अब पूरे यूरोप में महसूस की जा रही है। हज़ारों यूक्रेनी मर चुके हैं या घायल हैं और अपंग भविष्य को अभिशप्त हैं। उनमें से कई भाग रहे हैं और उन्हें पड़ोसी देशों में शरण लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इसने न केवल क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, बल्कि यूरोपीय अर्थ-व्यवस्था भी चरमराने के कगार पर है। आने वाले महीनों में कड़ी सर्दी का सामना कर रहे महाद्वीप पर बेरोज़गारी की मार पड़ी है। जब तक शान्ति के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं किये जाते, यूरोपीय संघ के देशों को अभूतपूर्व पैमाने पर उथल-पुथल का सामना करना पड़ेगा। पूरे यूरोप में यह पूछा जा रहा है कि अमेरिका संघर्ष को समाप्त करने की माँग क्यों नहीं कर रहा है, जबकि उसके प्रतिबंध अब तक रूसियों को डराने में विफल रहे हैं। रूस युद्ध में कोई कमज़ोरी नहीं दिखा रहा है; लेकिन यूरोप में अमेरिकी सहयोगियों को संघर्ष का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है। जबकि आम यूरोपीय युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिकी अनिच्छा के कारणों पर सवाल उठा रहा है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर यूरोप में प्रमुख शक्तियाँ एक राजनयिक पहल के लिए बाइडेन और उनकी टीम पर हावी होने में असमर्थ हैं।

संघर्ष का प्रभाव पूरे महाद्वीप में दिखायी दे रहा है। युद्ध को समाप्त करने के लिए यूरोपीय संघ के लगभग हर देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जो बाइडेन अभी भी रूस को अलग-थलग करने या पुतिन की सत्ता को क्रेमलिन में आंतरिक तख़्तापलट करके पलटने की उम्मीद कर रहे हैं। गुप्त यूएनएससी बैठक आयोजित करने के क़दम ने वार्ता के माध्यम से संघर्ष को समाप्त करने के लिए पुतिन को और अलग कर दिया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के इस आरोप कि ईरान रूस को ड्रोन की आपूर्ति कर रहा है; ने पुतिन को और नाराज़  कर दिया है। रूस ने इस आरोप का खण्डन किया है और वह यूक्रेन में अधिक संवेदनशील लक्ष्यों को नुक़सान पहुँचाने वाले ड्रोन हमलों को तेज़ कर रहा है।

बाइडेन को मात

ऐसा प्रतीत होता है कि चीन और रूस दोनों ने बाइडेन की भू-राजनीतिक रणनीति को पछाड़ दिया है। जर्मनी कथित तौर पर अपनी ऑटोमोबाइल प्रमुख वोक्सवैगन को चीन ले जा रहा है और अमेरिकी सलाह के बावजूद वह चीन के साथ घनिष्ठ वित्तीय और तकनीकी गठजोड़ की तरफ़ बढ़ रहा है। इसी तरह रूसी गैस पाइपलाइन, नॉर्डिक-ढ्ढ को नुक़सान के बावजूद यूरोप को गैस की आपूर्ति करने की पुतिन की पेशकश, नाटो और यूरोपीय संघ में अमेरिका को अलग-थलग करने का एक और प्रयास है। इससे पहले पश्चिमी मीडिया ने रूस पर यूरोप को रूसी गैस काटने के लिए जानबूझकर नॉर्डिक-ढ्ढ को नुक़सान पहुँचाने का आरोप लगाया था; लेकिन बहुत जल्द यूरोपीय लोगों ने महसूस किया कि इस व्यवधान का वास्तविक लाभार्थी यूएसए है। कोरोना वायरस के बाद के ख़राब दिनों से अपनी जनता को राहत देने के लिए बाइडेन बहुत अधिक मुद्रास्फीति पैदा किये बिना ख़रबों अमेरिकी डॉलर प्रिंट कर सकते थे; लेकिन अमेरिकी सहयोगी इस युद्ध के कारण अस्तित्त्व के संकट का सामना कर रहे हैं।

ऊर्जा के लिए वे इस सर्दी में अमेरिकियों को रूसी गैस की तुलना में चार गुना अधिक भुगतान कर रहे हैं। इस साल फरवरी में रूस-यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत के बाद से अमेरिकी कम्पनियों को यूरोप में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करके भारी मुनाफ़ा कमाने से अत्यधिक लाभ हुआ है। अमेरिका 2022 के पहले चार महीनों के बाद से यूरोप को अपनी सभी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का लगभग तीन-चौथाई निर्यात कर रहा था, इस क्षेत्र में दैनिक शिपमेंट पिछले साल के औसत से तीन गुना अधिक है। इसका मतलब है अमेरिकी अपने ही सहयोगियों से मुनाफ़ाख़ोरी के लिए युद्ध को आगे बढ़ा रहे हैं। प्राकृतिक गैस के एक अन्य प्रमुख आपूर्तिकर्ता नॉर्वे ने गैस की क़ीमतों को सीमित करने के सुझाव को ख़ारिज़ कर दिया है। यह बहुत कम सम्भावना है कि अमेरिकी कम्पनियाँ उर्सुला वॉन डेर लेयेन के मूल्य कैप सुझाव से सहमत होंगी।

पुतिन की रणनीति

हाल ही में क्रीमिया में रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण पुल को उड़ाने के लिए यूक्रेनी सेना की सफलता के रूप में बताया गया है; लेकिन रूस ने अपने नियंत्रण में सभी रूसी भाषी क्षेत्रों में सख़्त मार्शल लॉ लागू करके इसका जवाब दिया है। पिछले आठ महीने के दौरान जबसे युद्ध शुरू हुआ है, रूस ने अमेरिकी प्रतिबंधों को सफलतापूर्वक विफल कर दिया है। रूबल मज़बूत हो गया है और यूरोपीय अर्थ-व्यवस्था ढहने के कगार पर है। यूरोप ख़तरे में है। युद्ध के फ्रंट पर यूक्रेनी सेना की कोई भी सफलता देश के लिए कठोर सज़ा को आमंत्रित करती है, जो कभी यूएसएसआर का हिस्सा था। यदि यूक्रेनी बलों ने क्रीमिया में एक महत्त्वपूर्ण-रणनीतिक पुल को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया है, तो पुतिन ने क्रीमिया में मार्शल लॉ लगाकर इस आक्रामकता का जवाब किया है।

रूसी सेना अब पाँचवीं पीढ़ी के हथियारों का उपयोग कर रही है, जिसमें विमान और मिसाइल शामिल हैं। युद्ध के दौरान रूस ने 2014 में क्रीमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था। अब पुतिन ने कुछ प्रमुख रूसी भाषी क्षेत्रों को वापस ले लिया है, जहाँ रूसी भाषी आबादी पर हमला किया जा रहा था। यूक्रेन नाटो और यूरोपीय संघ में शामिल होने का इच्छुक है, इस रिपोर्ट के बाद पुतिन ने कुछ क्षेत्रों, विशेष रूप से क्रीमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया है। यह यूक्रेन के लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी आक्रमण को हराने में उनके साहस और बलिदान के लिए दिया गया था।

सोवियत संघ के पतन के बाद यूक्रेन ने एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने का फ़ैसला किया था। प्रारम्भिक वर्षों के दौरान रूस और यूक्रेन के बीच सम्बन्ध काफ़ी भाईचारे वाले थे। हालाँकि यूक्रेन द्वारा नाटो सदस्यता की माँग करने वाली रिपोट्र्स के बाद उनके सम्बन्धों को नुक़सान हुआ। इसने रूस को चिन्तित कर दिया, जिसे इसकी सदस्यता से वंचित कर दिया गया था। दूसरी ओर इसके पूर्व गणराज्यों या प्रान्तों और वारसा सन्धि के सहयोगियों को नाटो में शामिल किया जा रहा था। यूएसएसआर के पतन के बाद वारसा सन्धि को रद्द कर दिया गया और इस तरह शीत युद्ध समाप्त हो गया। अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी शक्तियों को भी नाटो को ख़त्म कर देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। पूर्वी यूरोपीय राष्ट्रों को शामिल करने के अलावा रूसी इससे चिन्तित थे, जब उन्होंने यूक्रेन के रूसी बहुसंख्यक क्षेत्रों में नव-नाज़ियों के उद्भव के बारे में जाना जो इस क्षेत्र को छोडऩे के लिए रूसियों पर हमला कर रहे थे। इसने रूसियों को तब और सतर्क कर दिया, जब उन्होंने पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में शामिल किये गये जिहादियों की तरह की रणनीति देखी।

इन फ़र्ज़ी (प्रॉक्सी) लोगों को ग़ैर-राज्य खिलाड़ी कहा जा रहा था; लेकिन यूक्रेन की अमेरिकी समर्थक लॉबी रूस के ख़िलाफ़ उनका इस्तेमाल कर रही थी। उन्हें रूसी भाषी लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू करके क्रीमिया, डोनेट्स्क, लुहान्स्क और ज़ापोरिज़िया को साफ़ करने के लिए कहा गया था। रूसियों ने यह भी महसूस किया कि अमेरिका पूर्वी यूरोप और यूरेशिया में अपनी पकड़ को कमज़ोर करना चाहता है, और ये नव-नाज़ी सिर्फ़ अमेरिकी प्रॉक्सी थे।

विनाश की ओर

यूक्रेन अग्रिम पंक्ति का राज्य होने के कारण अभूतपूर्व तबाही और मौतों का सामना कर रहा है, और शेष यूरोप इसके कगार पर है। यह ऊर्जा संकट खाद्यान्न की कमी और अभूतपूर्व मूल्य-वृद्धि की चपेट में है; वह भी परमाणु आपदा की छाया में। नाटो और यूरोपीय संघ के ख़िलाफ़ विरोध ने पूरे महाद्वीप को मुश्किल यूरोपीय सर्दियों की सम्भावना के साथ इस क्षेत्र में चुपचाप स्थापित कर दिया है। दिसंबर के बाद स्थिति और ख़राब होने की आशंका जतायी जा रही है। सर्दियों के महीनों के दौरान औसत तापमान -1 से -3 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की आशंका है। यूरोपीय लोगों के बीच एक आम धारणा है कि हैमलिन के महान् पाइड पाइपर की तरह बाइडेन, जो नाटो में अन्तिम शब्द और यूरोपीय संघ में निर्विवाद प्रभाव रखते हैं; जानबूझकर यूक्रेन के निर्दोष बहादुर लोगों को उनके अन्तिम विनाश की ओर ले जा रहे हैं। उनका एजेंडा पुतिन को अपदस्थ करना है, जिसे अब यूरेशिया में पश्चिमी प्रभाव के विस्तार में मुख्य बाधा माना जा रहा है।

इसी तरह उर्सुला वॉन डेर लेयन से भी उनकी रूस विरोधी नीति में एक नासमझ रणनीति का पालन करने के लिए पूछताछ की जा रही है; जो प्रतिकूल साबित हुई है। उदाहरण के लिए, गैस की क़ीमतों को सीमित करने या यूरोपीय कम्पनियों को रूसी जहाज़ों का बीमा करने से रोकने के सम्बन्ध में उनके सुझावों को सही कहने वाले काम ही लोग हैं। यह सन्देह किया जा रहा है कि क्या जहाज़ों का बीमा करने से इनकार करने से रूसियों को दुनिया भर में अपनी आपूर्ति बन्द करने से रोक दिया जाएगा।

रूस पर प्रतिबंध के मायने

नाटो के सदस्य रूस और तुर्की के बीच हालिया तेल समझौते ने अपने सहयोगियों पर अमेरिका के घटते प्रभाव की पुष्टि की है। रूस ने काला सागर के पास यूरोप के एक हिस्से- तुर्की शहर में एक विशाल तेल वितरण केंद्र स्थापित करने का निर्णय किया है। यह बिना किसी बाधा के यूरोप को रूसी गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेगा। क्षेत्र में मौज़ूद रूसी बेड़े के साथ नयी तेल आपूर्ति लाइन को बाधित करना असम्भव नहीं, तो मुश्किल तो होगा ही।

यह घोषणा की जा रही है कि तुर्की के राष्ट्रपति एंडोगन ने रूसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है और जल्द-से-जल्द एक गैस वितरण केंद्र स्थापित करने का निर्णय किया है। इस घोषणा के समय में आश्चर्य का एक तत्त्व है कि जैसे ही चीन ने आधिकारिक तौर पर इनकार किया कि यूरोप और एशिया को तरल प्राकृतिक गैस या एलएनजी की आपूर्ति करना सम्भव नहीं होगा, सीएनजी की क़ीमतें बढ़ जाती हैं। इस बीच नॉर्वे की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के प्रधानमंत्री, जोनास गहर स्टोरे ने किसी भी मूल्य सीमा के विचार को ख़ारिज कर दिया है, जैसा कि ब्रसेल्स में अक्टूबर में आयोजित यूरोपीय संघ के ऊर्जा मंत्रियों की एक आपातकालीन बैठक में सुझाया गया था। उन्होंने यूरोपीय आयोग से व्यापक गैस मूल्य सीमा प्रस्तावित करने के लिए कहा था। नॉर्वे यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम गैस की लगभग 25 फ़ीसदी की माँग को पूरा करने वाले पेट्रोलियम उत्पादों की भारी मात्रा में आपूर्ति कर रहा है।

यूके और यूरोपीय संघ दोनों ही काफ़ी हद तक नॉर्वे पर निर्भर हैं, जो यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है। रूस के निर्यात में कटौती के बाद नॉर्डिक राष्ट्र को अपने पेट्रोलियम उद्योग से रिकॉर्ड आय देने के बाद यह यूरोपीय संघ का गैस का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है क्योंकि क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं।

क्या संकट में है यूरोप?

पूरे महाद्वीप में भोजन और ऊर्जा की लागत बढऩे के साथ यूरोपीय लोग आने वाले समय के प्रति आशंकित हैं। रूस में घटती गैस की आपूर्ति यूरोप के आम आदमी पर भारी पडऩे वाली है। यूरोपीय लोग हैरान हैं कि न तो अमेरिका और न ही यूरोपीय संघ इस युद्ध को समाप्त करने के लिए कोई गम्भीर प्रयास कर रहा है। इस बीच रिपोट्र्स हैं कि रूस यूक्रेन के ख़िलाफ़ अपनी पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर, एसयू-57 का इस्तेमाल कर रहा है। ऐसा दावा किया जाता है कि इसे हाल ही में ज़ाइटॉमिर शहर के ऊपर देखा गया था। युद्ध के मोर्चे पर इन घटनाक्रमों के बीच यह पूछा जाना एक वैध प्रश्न है कि क्या यूरोपीय राष्ट्र गिरावट पर हैं। यूरोप की प्रमुख औपनिवेशिक शक्तियों, ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी और अन्य, जो पिछली तीन शताब्दियों से पृथ्वी पर शासन कर रहे हैं, अस्तित्त्व की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अमेरिकी दबाव में रूसी गैस नहीं ख़रीदने के उनके फ़ैसले ने जर्मनी, इटली, फ्रांस और स्पेन जैसे देशों को अपनी-अपनी औद्योगिक उत्पादन इकाइयों को बन्द करने के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे हज़ारों श्रमिक बिना रोज़गार के हो गये हैं। रूसी गैस की अनुपलब्धता भी लोगों को आने वाले सर्दियों के महीनों में घरेलू हीटिंग सिस्टम का उपयोग नहीं करने के लिए मजबूर कर रही है। यह क्षेत्र के अधिकांश लोगों के लिए एक दु:स्वप्न बनने जा रहा है।

पूरे ब्रिटेन में बढ़ती राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक संकट के बीच क़ीमतों में वृद्धि और बेरोज़गारी की ओर ले जाने वाली गैस कटौती के ख़िलाफ़ देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। पहले ही लिज़ ट्रस का प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा हो चुका है और भारतीय मूल के ऋषि सुनक, जो देश के वित्त मंत्री रह चुके हैं; नये प्रधानमंत्री बन गये हैं। आन्दोलन इंगित करता है कि लोग जल्द-से-जल्द संघर्ष को समाप्त करने के इच्छुक हैं। वे यूक्रेन को रूस के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति करने के ब्रिटिश फ़ैसले से ख़ुश नहीं हैं, जिसके बारे में उनका मानना है कि इससे संघर्ष को बढ़ावा मिला है। बैंक ऑफ इंग्लैंड ने सितंबर-दिसंबर 2022 के दौरान मुद्रास्फीति को बढ़ाकर 13 फ़ीसदी करने का अनुमान जताया है।

इसी तरह अन्य यूरोपीय देशों में भी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, जो अपनी शानदार सम्पत्ति के लिए जाने जाते हैं। फ्रांस और जर्मनी दोनों ने यह संकेत दिया है कि वे युद्ध में भाग नहीं लेंगे। और जो अभी भी बाइडेन के युद्ध सिद्धांत के दायरे में हैं, उन्हें नाटो और यूरोपीय संघ के ख़िलाफ़ कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस प्रकार तत्कालीन औपनिवेशिक शक्तियों की नाज़ुक एकता समाप्त हो रही है। मेन लाइन न्यूज चैनल्स के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बार-बार यह पूछा जा रहा है कि क्या रूस के ख़िलाफ़ अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रतिबंध रूसी अर्थ-व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। वास्तव में रूसी मुद्रा रूबल पिछले आठ महीनों के दौरान मज़बूत हुई है। संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस, दोनों संघर्ष नहीं झेल रहे हैं; मुख्य शिकार यूरोपीय देश हैं। यूरोपीय सरकारें यह समझने में असमर्थ हैं कि जब कृषि उत्पादों के परिवहन पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तो पिछले एक महीने के दौरान आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतें क्यों आसमान छू रही हैं? संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्व के ख़िलाफ़ नाराज़गी हर गुज़रते दिन के साथ और अधिक स्पष्ट होती जा रही है। कुछ यूरोपीय राष्ट्र बाइडेन के लोकतंत्र समर्थक दावे को मानने के लिए तैयार हैं कि यूरोपीय राष्ट्रों को साम्राज्यवादी रूस को रोकने के लिए बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। इस प्रकार, यूरोपीय शक्तियों को दुनिया भर में अपने रणनीतिक मूल्य में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।

एकता की परीक्षा

कई मीडिया वेबसाइट और चैनल बाइडेन पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने जानबूझकर यूरोप को उस कगार पर धकेल दिया है, जिससे सहयोगी सामरिक परमाणु हथियारों के ख़तरे का सामना कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि असली अमेरिकी एजेंडा पुतिन को अपदस्थ करवाना है। अधिकांश यूरोपीय इस परिहार्य युद्ध को झेलने के लिए इस्तेमाल हुआ महसूस करते हैं। ब्रिटिश पत्रिका, इकोनॉमिस्ट, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को रूसी गैस का संकट खड़ा करने के लिए दोषी ठहराती है, और आगे चेतावनी देती है कि संकट के लिए; लेकिन राज्य कोई ग़लती नहीं करते हैं, मुश्किल सर्दी आ रही है, और यह ऊर्जा संकट के कारण और क्रूर होगी। पिछले दशक में पिछली आपदाओं की तरह स्थति तेज़ी से बिगड़ रही है और यूरोप को अलग-थलग करने के क़रीब आ गयी है। साल 2022 के चल रहे शीतकालीन ऊर्जा झटके के दौरान यूरोपीय एकता के संकल्प की परीक्षा भी होगी।

प्रचार युद्ध

इस युद्ध का दूसरा आयाम यह है कि क्या नव-नाज़ी पक्ष बदल रहे हैं और वे रूस का समर्थन कर रहे हैं। सन् 2014 में क्रीमिया पर क़ब्ज़ा करने से पहले रूस ने यूक्रेन पर देश में रूसी भाषी लोगों पर हमला करने के लिए नव-नाज़ियों का पोषण करने का आरोप लगाया था। हालाँकि हाल ही में एक जर्मन ख़ुफ़िया रिपोर्ट ने दावा किया है कि दो नव-नाज़ी समूह यूक्रेन में मास्को के साथ लड़ रहे हैं और यह सब क्रेमलिन के अपने दक्षिण-पश्चिमी पड़ोसी, यूक्रेन को अस्वीकार करने के दावे के बावजूद हुआ है। ग़लत सूचना के इस दौर में ऐसी ख़बरों पर विश्वास करना मुश्किल है। इस दावे के अलावा कुछ पश्चिमी देशों के मीडिया प्लेटफार्मों ने एक प्रचार युद्ध छेड़ दिया है, जिसमें रूस को दानव दिखाने के लिए पिछले संघर्षों से पुरानी तस्वीरों को साझा करना और आक्रमण के ख़िलाफ़ अपनी ज़मीन पर खड़े होने के लिए यूक्रेनी नेतृत्व की प्रशंसा करना शामिल है।

मंदी का ख़तरा

यूएन के अनुसार, यूक्रेन युद्ध ने खाद्य क़ीमतों में बड़ी छलांग लगायी है। इसने दुनिया के सबसे बड़े सूरजमुखी तेल निर्यातक से आपूर्ति में कटौती की है, जिसका अर्थ है कि विकल्पों की लागत भी बढ़ गयी है। यूक्रेन मक्का और गेहूँ जैसे अनाज का भी एक प्रमुख उत्पादक है, जिसकी क़ीमत भी तेज़ी से बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा काला सागर क्षेत्र में युद्ध ने प्रधान अनाज और वनस्पति तेलों के लिए बाज़ारों के माध्यम से झटके दिये। संयुक्त राष्ट्र खाद्य मूल्य सूचकांक अनाज, वनस्पति तेल, डेयरी, मांस और चीनी की औसत क़ीमतों को मापने के लिए दुनिया की सबसे अधिक कारोबार वाली खाद्य वस्तुओं को ट्रैक करता है। यह पहले ही 13 फ़ीसदी को पार कर चुका है और पिछले 60 वर्षों के दौरान उच्चतम दर्ज किया गया है। इसने जीवन की लागत के संकट को हवा और पूरे यूरोप में सामाजिक अशान्ति की चेतावनी दी है। इस बीच रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इस सर्दी के दौरान चेक मुद्रास्फीति 20 फ़ीसदी तक पहुँचने की आशंका है। पूरे महाद्वीप की सरकारें इस चुनौती से निपटने के लिए एक व्यवहार्य रणनीति तैयार करने में असमर्थ हैं, जब घरेलू आय का क्षरण यूरोप में व्यापक मंदी का कारण बन सकता है।

ऋषि से उम्मीदें

अस्तित्व की चुनौती का सामना कर रहे यूरोप के अमीर देशों के बीच यूनाइटेड किंगडम (यूके), जिसे ब्रिटेन भी कहते हैं; को प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार भारतीय मूल के ऋषि सुनक मिले हैं, जो ख़ुद को एक गर्वित हिन्दू कहते हैं। उन्होंने सांसद बनने के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शपथ ली थी और इस कुर्सी पर बैठने वाले वह पहले अश्वेत नेता हैं। सुनक दो शताब्दियों में यूनाइटेड किंगडम के सबसे कम उम्र (क़रीब 42 वर्ष) के प्रधानमंत्री हैं।

यही नहीं, वह महज़ तीन महीने में ब्रिटेन के तीसरे और छ: वर्षों में पाँचवें प्रधानमंत्री बने हैं। इतने कम समय में प्रधानमंत्रियों के बनने की यह संख्या ब्रिटेन की अर्थ-व्यवस्था में गहरी समस्याओं को दर्शाती है।

इस बार ‘तहलका’ में गोपाल मिश्रा की आवरण कथा ‘संकट के साये में यूरोप’ यूरोपीय अमीर राष्ट्रों के अपने अस्तित्व की चुनौतियों पर है। मिश्रा लिखते हैं कि रूस-यूक्रेन का युद्ध एक ऐसा ख़तरनाक मामला है, जिसने न केवल यूक्रेन के लगभग एक-तिहाई हिस्से को अँधेरे में डुबोने के साथ-साथ पीने के पानी की भारी कमी पैदा कर दी है, बल्कि इस समय अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे यूरोप में एक ठंडी सर्दी भी दस्तक दे चुकी हैै। यूरोप के विभिन्न हिस्सों में लोगों के लिए बढ़ते असन्तोष के साथ ही सर्दी की शुरुआत भी हो रही है। बायोमास जलाकर लोग ख़ुद को गर्म कर रहे हैं। पोलैंड के गाँवों में इस ठंड से बचने के लिए लोग मजबूरन पेड़ों को काट रहे हैं। फ्रांस में पेट्रोल की रसद (राशनिंग) शुरू हो चुकी है। जर्मनी में ऊर्जा बचाने के लिए रात के समय ट्रैफिक लाइट्स बन्द की जा रही हैं। ब्रिटेन में बिजली प्रतिबंधों के कारण रेस्तरां बन्द हो रहे हैं। स्पेन में वातानुकूलित (एयर कंडीशनर) के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध है और इसके उल्लंघन को अपराध तय कर दिया गया है।

ऐसे परिदृश्य में पूर्व औपनिवेशिक शासकों पर भारतीय मूल के ऋषि सुनक द्वारा शासन करते हुए एक संकटग्रस्त देश का बाग़डोर सँभालने से सबसे ज़्यादा उत्साहित प्रवासी भारतीय समुदाय है। लिज़ ट्रस के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के रूप में बहुत छोटे कार्यकाल के बाद 10 डाउनिंग स्ट्रीट में ऋषि का उत्थान वास्तव में समकालीन ब्रिटिश इतिहास में एक बड़ी घटना है। इससे पहले उनके पूर्ववर्ती बोरिस जॉनसन को कोरोना वायरस महामारी के कथित अयोग्य प्रबंधन के मद्देनज़र एक अपमानजनक स्थिति में सत्ता से बाहर जाना पड़ा। क्योंकि उन पर भष्टाचार, पक्षपात के आरोपों के अलावा आर्थिक व्यवस्था बनाये रखने में नाकाम रहते हुए ब्रिटेन को आर्थिक मोर्चे पर भारत से भी नीचे ले जाने का आरोप था।

शेक्सपियर की प्रसिद्ध पंक्ति- ‘जो सिर पर ताज पहनता है, उसके सिर में बेचैनी रहती है;’ ख़ुद सुनक के लिए भी सबसे उपयुक्त हैं। उन्होंने कहा था कि यूके 45 बिलियन डॉलर के अनुमानित बजट घाटे में है और लगभग 10 फ़ीसदी की बढ़ती मुद्रास्फीति और मंदी के साथ गहन आर्थिक चुनौती का सामना कर रहा है।

सुनक के लिए चुनौतियाँ कठिन हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले भाषण में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वह डरते नहीं हैं। इसे महज़ उनका उत्साह भर नहीं मानें। सुनक के 10 डाउनिंग स्ट्रीट पहुँचने में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लोग नयी चुनौतियों का सामना करने और रंग, पंथ से दूर रहकर भी बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं। भारत ने लम्बे समय से दुनिया को दिखाया है कि अल्पसंख्यक समुदायों और विनम्र पृष्ठभूमि के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ किसी भी राष्ट्र को बेहतर ढंग से चलाया जा सकता है।

जयललिता की हत्या का शक

जे. जयललिता के मौत मामले की जाँच ने शशिकला को कठघरे में किया खड़ा

कहा जाता है कि राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। पद और पैसे की चमाचम वाली राजनीति अब एक ऐसा प्रोफेशन हो चली है, जिसमें ऊँची-से-ऊँची कुर्सी की चाह हर किसी के मन में हमेशा रहती है। ऐसे में ज़ाहिर है हर किसी को मौक़े की तलाश रहती है। इसलिए कहा भी गया है कि राजनीति में अपने बाप पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए।

यह 5 दिसंबर, 2016 की बात है, जब तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके नेता रहीं जे. जयललिता की मौत की ख़बर पूरे देश को दी गयी। उनकी मौत को साधारण बताया गया। लेकिन सवाल भी कई उठे और कहा गया कि हो न हो, जयललिता की हत्या हुई है। क्योंकि यह कोई साधारण मौत नहीं थी। लेकिन इन सवालों को कुछ ताक़तवर लोगों ने दबा दिया। हालाँकि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम इस मामले को लेकर बराबर सवाल उठाते रहे और उन्होंने जयललिता की मौत की जाँच कराने का अनुरोध मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से किया। मुख्यमंत्री स्टालिन एक ईमानदार और अच्छे मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने इस मुद्दे को गम्भीरता से लेते हुए एक जाँच समिति का गठन किया, जिसका प्रमुख सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए. अरुमुगा सामी को बनाया। अब इस मामले में सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए. अरुमुगा सामी जाँच समिति ने एक बार फिर सवालिया निशान लगाकर जाँच के घेरे में खड़ा कर दिया है। अरुमुगा सामी जाँच समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को सौंपी थी। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार ने इसे विधानसभा में पेश कर दिया है, जिससे यह रिपोर्ट सार्वजनिक हो चुकी है। तमिल भाषा में अरुमुगा सामी समिति की यह रिपोर्ट 608 पन्नों की है, जबकि अंग्रेजी में अन्तिम रिपोर्ट 500 पन्नों की है।

अरुमुगा सामी जाँच समिति की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मौत के मामले में वी.के. शशिकला, डॉक्टर के.एस. शिवकुमार, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव जे. राधाकृष्णन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सी. विजय भास्कर के ख़िलाफ़ जाँच होनी चाहिए। समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की नाज़ुक हालत को कई दिनों तक लोगों से छुपाकर रखा गया और यह कहा गया कि वह बिलकुल ठीक हैं, जल्द ही उनकी अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी। क्योंकि तमिलनाडु के लोग जे. जयललिता को अम्मा कहकर बुलाते थे, इसलिए उनके मन में जयललिता के प्रति जो प्यार और अपनापन था, वैसा प्यार और अपनापन उत्तर भारत के किसी भी बड़े-से-बड़े नेता के लिए जनता का कभी नहीं देखा गया। इसलिए जैसे ही 5 दिसंबर, 2016 को 11:30 बजे यह घोषित किया गया कि अम्मा यानी जे.जयललिता नहीं रहीं, तो जनता में हाहाकार मच गया। काफ़ी दिनों से अस्पताल को घेरे बैठे लोग पुलिस सुरक्षा तोडक़र उन्हें देखने के लिए उतावले हो उठे और दर्ज़नों लोगों ने जयललिता के जाने के शोक में आत्महत्या तक कर ली। अब अरुमुगा सामी जाँच समिति की रिपोर्ट ने ख़ुलासा किया है कि जयललिता की मौत 5 दिसंबर को नहीं, बल्कि 4 दिसंबर को ही दिन में 3-3:50 बजे के बीच हो चुकी थी।

जब भी कोई अपराधी अपराध करता है, तो वो सुबूतों को पहले मिटाने की कोशिश करता है। तमिलनाडु की छ: बार मुख्यमंत्री रहीं जयललिता के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। दरअसल उनकी बचपन की सहेली वी.के. शशिकला जानती थीं कि जयललिता की हत्या की बात अगर किसी तरह सामने आ गयी, तो उन्हें भी सज़ा से कोई नहीं बचा सकता। इसलिए ऐसे कई सुबूत मिटा दिये गये, जो जाँच में अहम साबित होते।

इन सुबूतों में सबसे अहम थी चेन्नई के अपोलो अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज, जिसे डिलीट कर दिया गया। ऐसे में जाँच समिति अभी इस बात का ठीक से पता नहीं लगा पायी है कि जयललिता के चिकित्सीय कमरे में कौन-कौन आता था और उन्हें इलाज के दौरान कौन-कौन सी दवाइयाँ दी जाती थीं।

जयललिता और शशिकला

कहा जाता है कि जयललिता अपनी बचपन की सहेली वी.के. शशिकला पर आँख बन्द करके विश्वास करती थीं। हालाँकि वर्ष 2011 में यह विश्वास एक बार टूटा भी। दरअसल तब के गुज़रात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, जो कि अब देश के प्रधानमंत्री हैं, सीधे अपनी समकक्ष जे. जयलिलता से मिलने उनके निवास पर पहुँचे। नरेंद्र मोदी ने उस समय जे. जयललिता से कहा कि उनका शरीर नीला पड़ रहा है, उन्हें अपने खानपान पर ध्यान देने के अतिरिक्त अपने क़रीबियों पर नज़र रखनी चाहिए। साथ ही गुज़रात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने उनसे यह शिकायत भी की कि गुज़रात के कुछ उद्योगपति तमिलनाडु में उद्योग स्थापित करना चाहते हैं; लेकिन उनसे उनकी क़रीबी शशिकला और उनके ख़ास पॉवरफुल लोग मोटी रिश्वत माँगते हैं, जिसके चलते तमिलनाडु में उद्योग स्थापित करना सम्भव नहीं हो पा रहा है। कहा जाता है कि मोदी के पास जयललिता को धीमा ज़हर देने की ख़ुफ़िया रिपोर्ट थी। मोदी के गुज़रात लौटने के बाद जयललिता ने मामले की पड़ताल करायी, तो पता चला कि शशिकला की रखी हुई नर्स, जो कि जे. जयललिता को खाना देती थी, उनके खाने में नींद की ऐसी दवा मिला रही थी, जो कि उनके शरीर पर धीमे ज़हर का काम कर रही थी। इसके बाद जे. जयललिता ने अपनी सबसे विश्वसनीय दोस्त शशिकला, नर्स और शशिकला के कई क़रीबियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

17 दिसंबर, 2011 को जयललिता ने शशिकला, उनके रिश्तेदारों और शशिकला के द्वारा गाँव से लाये गये 40 से ज़्यादा नौकरों को हटा दिया। लेकिन जयललिता ने सबसे बड़ी ग़लती यह की कि उन्होंने 100 दिन के अन्तराल में फिर शशिकला को बुला लिया। इससे शशिकला और भी ताक़तवर होती चली गयीं और जयललिता मौत की ओर बढऩे लगीं। सन् 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने कई बार जयललिता से मुलाक़ात और उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली।

तहलका ने उठाया था मुद्दा

‘तहलका’ ने शशिकला द्वारा तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता के साथ किये जा रहे धोखे की रिपोर्ट प्रकाशित करने के साथ ही उनकी मौत पर भी शशिकला की तरफ़ उँगलियाँ उठायी थीं। ‘तहलका’ ने लिखा था कि शशिकला इस साज़िश की सबसे बड़ी सूत्रधार थीं।

दरअसल जयललिता शशिकला को इतना मानती थीं कि उन्होंने सन् 1995 में शशिकला के बेटे की शादी में 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा का ख़र्चा किया। जयललिता की ज़िन्दगी में शशिकला की दख़लंदाज़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह मंत्रियों तक को हुक्म देती थीं। आरोप है कि शशिकला और उसके रिश्तेदारों जयललिया के जीवन में आने के बाद क़रीब 5,000 करोड़ रुपये की सम्पत्ति जोड़ ली। शशिकला पर तो विधानसभा चुनाव में टिकट बाँटने में 300 करोड़ रुपये कमाने का भी आरोप है। दरअसल वह अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहती थीं, पर उनकी यह चाल कामयाब नहीं हुई। अब अगर जयललिता मौत मामले को गम्भीरता से लिया गया, तो सम्भव है कि शशिकला और उनके कुछ सहयोगियों की बा$की ज़िन्दगी जेल में कटे।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)

आसान नहीं खडग़े की राह

नवनियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष को निकलना होगा गाँधी और ग़ैर-गाँधी के दायरे से बाहर

ज़मीन से जुड़े और 50 साल से राजनीति में अपनी मेहनत से जमे हुए मल्लिकार्जुन खडग़े कांग्रेस के अध्यक्ष बन चुके हैं। उनके सामने अब कांग्रेस का सर्वसम्मत अध्यक्ष बनने की चुनौती है। इसके लिए उन्हें पार्टी के बीच गाँधी और ग़ैर-गाँधी के दायरे से बाहर निकलना होगा। साथ ही पार्टी से बाहर चले गये नेताओं को वापस पार्टी में लाने की बड़ी और चुनौतीपूर्ण शुरुआत करनी होगी। चूँकि वह गाँधी परिवार के पसंदीदा उम्मीदवार थे, उनकी जीत कांग्रेस के बीच गाँधी परिवार की ही जीत है। अर्थात् अध्यक्ष चुनाव के बहाने भी गाँधी परिवार के हक़ में ही पार्टी के अधिकांश नेताओं, कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया है। लेकिन इसके बावजूद यदि खडग़े कांग्रेस अध्यक्ष से ज़्यादा गाँधी परिवार के प्रतिनिधि ही कहलाये जाते रहे, तो भाजपा के पास उन पर आक्रमण करने का अवसर रहेगा और ख़ुद पार्टी के भीतर अध्यक्ष के नाते वह अपनी अथॉर्टी को स्थापित नहीं कर पाएँगे। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि राहुल गाँधी ही भविष्य में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे। ऐसे में खडग़े यदि मज़बूत अध्यक्ष के रूप में काम करके पार्टी के बीच सभी पक्षों का साथ पाने में सफल रहते हैं, तो वह देश के सर्वोच्च पद के लिए राहुल गाँधी की ही राह आसान करेंगे, जो भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये देश की राजनीति और जनता में अपनी एक नयी छवि गढऩे में सफल होते दिख रहे हैं।

अध्यक्ष का चुनाव करवाकर कांग्रेस ने अब भाजपा को ही चुनौती दे दी है कि वह भी अपने अध्यक्ष का चुनाव करवाये, जहाँ हमेशा मनोनयन से ही अध्यक्ष तय होते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, जब भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में खडग़े के नाम की घोषणा होने के कुछ मिनट के भीतर ही उन पर गाँधी परिवार का डमी होने का तमगा चस्पा कर दिया।

देखा जाए, तो यह तो भाजपा में भी है कि जहाँ अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को मोदी और शाह के खास के रूप में चिह्नित किया जाता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि खडग़े को गाँधी परिवार का प्रतिनिधि कहते रहना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है, ताकि कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए खडग़े के चुनाव के ज़रिये चयन को कमतर करके आँका जा सके। यह वैसा ही है, जैसे भाजपा राहुल गाँधी को पप्पू कहकर उनकी छवि को $खराब करती रही है।

लेकिन भाजपा के लिए खडग़े उतना आसान शिकार नहीं होंगे। खडग़े ज़मीनी राजनीति से बख़ूबी वाक़िफ़ हैं और भाजपा की सोच के प्रति उनके तेवर हमेशा तीखे रहे हैं। मुद्दों पर वह बहुत बेहतरीन तर्कों के साथ बात करते हैं और दक्षिण भारत से होते हुए भी उनका हिन्दी प्रेम और भाषा पर उनकी पकड़ उन्हें एक मज़बूत नेता बनाती है। उत्तर भारत में कांग्रेस को हिन्दी भाषी छवि वाला नेता चाहिए और खडग़े हिन्दी भाषी न होते हुए भी जैसी हिन्दी बोलते हैं, उसमें वह किसी को भी अपनी बात समझाने में सफल रहते हैं।

खडग़े अक्सर उन मुद्दों पर बहुत बेबाक़ी और तर्कों के साथ बोलते हैं, जो राहुल गाँधी के प्रिय विषय रहे हैं। इस तरह खडग़े को राहुल गाँधी का अनुभवी अवतार कहा जा सकता है। ऐसे में खडग़े और राहुल गाँधी एक मज़बूत टीम बनाकर नये तेवर से भाजपा को टक्कर दे सकते हैं। खडग़े के लिए तो यह चुनौती गुज़रात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव से ही शुरू होने वाली है, जहाँ मतदान के लिए मुश्किल से पखवाड़े भर का ही समय बचा है। गुज़रात के चुनाव भी नवंबर-दिसंबर में होने हैं।

हिमाचल में भाजपा के लिए चुनौतियाँ हैं और कांग्रेस ठोस रणनीति से काम करे, तो भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती है। गुज़रात में भी भाजपा को तश्तरी में रखकर सत्ता नहीं मिलने वाली है, जहाँ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) दोनों ही उसके लिए गम्भीर चुनौती बने हुए हैं। कांग्रेस ने इस बार गुज़रात में ज़मीनी अभियान पर काम की रणनीति अपनायी है, जिसकी और ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी तक अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए संकेत कर चुके हैं। इसके विपरीत आप ने अपना अभियान धमाकेदार तरीक़े से चलाया हुआ है। दोनों ही पार्टियों के अभियान ने भाजपा पर दबाव बनाया है।

खडग़े दोनों ही राज्यों में इस दबाव से कांग्रेस की राह निकाल सकते हैं। हिमाचल और गुज़रात भाजपा के लिए कई कारणों से अहम हैं। गुज़रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबसे नज़दीकी नेता गृह मंत्री अमित शाह, जिन्हें भाजपा में उनके समर्थक चाणक्य कहते हैं; का गृह राज्य होने के कारण चुनावी राजनीति के लिहाज़ से बहुत महत्त्वपूर्ण है। दूसरी और हिमाचल भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का गृह राज्य है और वहाँ भाजपा की जीत / हार पार्टी में उनकी स्थिति पर असर डालेगी। भाजपा किसी भी सूरत में यह राज्य नहीं हारना चाहती। विपरीत नतीजे उसके लिए बड़ा संकट खड़ा कर सकते हैं और उस पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकते हैं।

चुनावों में कांग्रेस और खडग़े को मोदी-शाह-नड्डा की मज़बूत तिकड़ी से भिडऩा होगा। खडग़े इतने कम समय में इन दोनों राज्यों के चुनाव के लिए क्या रणनीति बनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। वह अपने अध्यक्ष होने की शुरुआत चुनाव में हार से नहीं नहीं करना चाहेंगे। इसके लिए उन्हें निश्चित ही पार्टी के भीतर नकारात्मक माहौल को बदलना होगा, जो हाल के महीनों में बना है। पार्टी के कार्यकर्ताओं में जीत की भूख जगानी होगी और उन्हें यह बताना होगा कि कांग्रेस राज्यों को जीत सकती है। कांग्रेस के लिए यह अच्छा हुआ कि गुज़रात के पूर्व मुख्यमंत्री और क़द्दावर नेता शंकर सिंह बघेला के बेटे महेंद्र सिंह बघेला कांग्रेस में शामिल हो गये हैं, जिसका असर वहाँ दिख सकता है।

हालाँकि अध्यक्ष बनना और उस पर काम करना दो लग चीज़ें हैं। इसलिए खडग़े के सामने एक बड़ी चुनौती है। भाजपा का दबाव, पार्टी के भीतर नेताओं को सन्तुष्ट रखना, चुनावों की चुनौतियाँ, रणनीति बनाना, राज्यों में यूपीए सहयोगियों के साथ तालमेल रखना इनमें शामिल हैं। इसके अलावा पार्टी ने उदयपुर के चिन्तन शिविर में जो फ़ैसले किये थे, उन्हें लागू करने की कठिन ज़िम्मेदारी खडग़े पर रहेगी।

खडग़े अनुभवी राजनेता हैं और कांग्रेस की नब्ज़ पहचानते हैं। अध्यक्ष बनते ही उन्होंने सक्रियता दिखायी है। संगठन और चुनाव में 50 फ़ीसदी पद युवाओं को देने की राहुल गाँधी की सोच को उन्होंने अपनी घोषणा में शामिल किया है। देखना दिलचस्प होगा कि खडग़े का आना कांग्रेस के लिए क्या परिवर्तन लाता है? यदि दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती है, तो यह माना जाएगा कि खडग़े का आना पार्टी के लिए शुभ रहा है।

मज़बूत टीम की ज़रूरत

समय आ गया है कि कांग्रेस अब एक रणनीति के तहत अपनी टीम बनाये, जिसमें खडग़े के ख़िलाफ़ चुनाव लडऩे वाले शशि थरूर से लेकर अशोक गहलोत और कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक का मज़बूत प्रतिनिधित्व हो। महज़ पद भरने वाले नेताओं की जगह संगठन और विचार और मज़बूती दे सकने वाले नेता इस टीम में हों। खडग़े को ग़ुलाम नबी आज़ाद से लेकर उन तमाम मज़बूत नेताओं को वापस कांग्रेस में लाने की मुहिम चलानी चाहिए, जो हाल के वर्षों में पार्टी से बाहर गये हैं। इससे देश भर में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में मदद मिल सकती है।

खडग़े पर सबसे मुश्किल ज़िम्मेदारी यह भी है कि राज्यों में बिना कांग्रेस की क़ीमत पर उन्हें सहयोगियों के साथ चलना होगा। अगले चुनाव के लिए अभी भी पौने दो साल हैं और राज्यों में भारत जोड़ो यात्रा जैसे और अभियान चलाकर वह कांग्रेस को खड़ा कर सकते हैं। कांग्रेस के लिए यह इसलिए भी ज़रूरी है कि उसे यदि मुख्य विपक्षी दल बने रहना है और भविष्य में केंद्र की सत्ता हासिल करनी है, तो राज्यों में ज़मीन मज़बूत करनी होगी। अन्यथा आम आदमी पार्टी जैसा दल उसकी जगह लेने में देर नहीं करेगा, जो राज्यों पर फोकस कर अपना देशव्यापी आधार बनाने में जुट गयी है। आम आदमी पार्टी राज्यों में सरकार बनाने के लिए जैसे मेहनत कर रही है, उससे वह निश्चित ही आने वाले समय में कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है।

खडग़े ने पद का ज़िम्मा सँभालते ही सबसे पहले सीडब्ल्यूसी को भंग कर दिया और उसकी जगह संचालन समिति का गठन कर दिया। इसमें कमोवेश वही चेहरे हैं, जो हाल के वर्षों में कांग्रेस में चर्चा में रहे हैं। हालाँकि यह बहुत अच्छा सन्देश होता यदि खडग़े अध्यक्ष पद के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी रहे शशि थरूर को भी इस महत्त्वपूर्ण समिति में जगह देते। थरूर पार्टी के ही भीतर के चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी थे। लिहाज़ा उन्हें स्थान देने से खडग़े की तारीफ़ ही होती और विपक्ष में इसका सन्देश जाता कि चुनाव के बाद पार्टी अब फिर एकजुट है। थरूर और जी-23 के कुछ अन्य नेताओं को भी इस समिति से बाहर रखा गया है, जिनमें मनीष तिवारी भी हैं। इससे यह भी हो सकता है कि पार्टी के भीतर एक विरोधी गुट का अस्तित्व बना रहे, भले चुनाव हो जाने के बाद उनका ज़्यादा दबाव या विरोध शायद अब नाममात्र को ही रहे। इस गुट के आनंद शर्मा जैसे नेताओं को संचालन समिति में लेकर यह सन्देश देने की कोशिश की गयी है। यदि आप सँभल जाते हैं, तो आपके लिए स्थान है। यह तो साफ़ है ही कि खडग़े को अध्यक्ष चुनकर पार्टी के बहुमत ने सोनिया गाँधी (गाँधी परिवार) के ही हक़ में मुहर लगायी है। स्टीरियंग कमिटी बनानी के बाद खडग़े को अब अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का गठन करना है। इसमें महासचिवों से लेकर उपाध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारी मनोनीत होने हैं। यह देखा दिलचस्प होगा कि थरूर जैसे नेताओं को वह कैसे समायोजित करते हैं, क्योंकि अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुका नेता शायद महासचिव या उपाध्यक्ष न बनना चाहे।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, खडग़े राज्यों में वरिष्ठ नेताओं को बड़ी ज़िम्मेदारियाँ दे सकते हैं। पार्टी ज़मीन से जुड़े नेताओं को राज्यों का ज़िम्मा देने जा रही है, ताकि संगठन को ज़मीन पर मज़बूत किया जा सके।

राहुल का प्रभाव

यह तय है कि संगठन में राहुल गाँधी से असहयोग करते रहे नेताओं को अब जगह नहीं मिलेगी। एक पद-एक व्यक्ति के नियम का भी पालन होगा। ज़ाहिर है जो व्यक्ति विधायक या सांसद हैं, उन्हें दूसरा पद शायद न मिले। इससे यह भी लगता है कि प्रदेश के पदाधिकारी यदि विधायक बनते हैं, तो उन्हें पदाधिकारी का पद छोडऩा पड़ेगा। राहुल गाँधी आने वाले समय में सभी चुनाव घोषणा-पत्र जनता की राय से बनाने के हक़ में हैं। तेलंगाना को लेकर तो उन्होंने यह कह ही दिया है।

हिमाचल प्रदेश और गुज़रात में विधानसभा चुनाव में पार्टी ने तामझाम वाले प्रचार की जगह ज़मीनी स्तर के प्रचार अभियान की रणनीति अपनायी है। देखना दिलचस्प होगा कि इसका क्या नतीजा निकलता है। गुज़रात में कांग्रेस को देखकर लगता है कि वहाँ वह प्रचार में कहीं नहीं है; लेकिन हक़ीक़त यह है कि उसने प्रचार और जनता तक पहुँचने के लिए अलग रणनीति अपनायी है। उसके नेता ज़मीनी स्तर पर मैदान में डटे हुए हैं। इसके नतीजे दिलचस्प हो सकते हैं। खडग़े के अध्यक्ष बनने से पहले ही यह रणनीति बना ली गयी थी। हालाँकि इसमें उनकी भी सहमति थी।

वास्तव में इस रणनीति के पीछे गुज़रात के चुनाव प्रभारी अशोक गहलोत थे। राहुल गाँधी चाहते थे कि कांग्रेस भारी भरकम प्रचार अभियान की जगह ज़मीनी स्तर पर जनता तक पहुँचे। यही किया गया। यही कारण है कि पार्टी ने अभियान में बड़े नेताओं की $फौज नहीं झोंकी है। आख़िरी दिनों में हो सकता है कि राहुल गाँधी की सभाएँ पार्टी करवाये।

उधर आम आदमी पार्टी और उसके नेता केजरीवाल बहुत उम्मीद में हैं कि वह पंजाब की तरह गुज़रात में सत्ता पा सकते हैं। भारतीय मुद्रा (करंसी) पर गणेश जी और लक्ष्मी जी की तस्वीर लगाने की माँग करके केजरीवाल ने एक तरह से भाजपा वाली हिन्दुत्व की लकीर पकड़ ली है। हाल में महीनों में केजरीवाल ने ऐसे बहुत-सी चीज़ें की हैं, जिनसे ज़ाहिर होता है कि वह हिन्दुत्व को अपनी राजनीति का मज़बूत हिस्सा बनाकर रखना चाहते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि वह इस मुद्दे पर भाजपा को भी मात देने की कोशिश कर रहे हैं। देखना होगा कि चुनाव में उन्हें इसका क्या लाभ मिलता है।

हिमाचल प्रदेश में पार्टी ने साझे नेतृत्व के साथ लडऩे की रणनीति बनायी है। वहाँ भाजपा डबल इंजन की सरकार की बात कह रही है; लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर उतने बेहतर रणनीतिकार साबित नहीं हुए हैं। लिहाज़ा भाजपा की नैया पार हुई, तो प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ही हो पाएगी। वहाँ कांग्रेस मज़बूती से भाजपा का मुक़ाबला कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल इस बार चुनावी दृश्य से बाहर हैं, क्योंकि उन्हें टिकट नहीं दिया गया है। इस पहाड़ी राज्य में धूमल ऐसे नेता थे, जो भाजपा को आश्चर्यजनक नतीजा देने की क्षमता रखते थे। राजनीति के बहुत-से जानकार मानते हैं कि बिना धूमल के बिना भाजपा का ‘रिवाज़ बदल देंगे’ नारा फेल हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषक बी.डी. शर्मा ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि पिछली बार भाजपा को सत्ता में लाने का काफ़ी श्रेय धूमल को जाता है। मुख्यमंत्री नहीं बनने के बावजूद वह ज़मीन पर लगातार पार्टी के लिए काम करते रहे हैं। धूमल को टिकट नहीं मिलने से पार्टी के एक बड़े वर्ग ही नहीं, जनता में भी मायूसी है। इसका भाजपा के मिशन रिपीट पर विपरीत असर पद सकता है।

पंजाब में सरकार बनाने के बाद आप को भरोसा था कि हिमाचल में उसको चुनाव में लाभ मिलेगा। लेकिन हाल के महीनों में पार्टी इस पहाड़ी राज्य में अपना आधार नहीं बना पायी। उसके पास कोई ऐसा नेता नहीं, जो उसका मज़बूत नेतृत्व कर सके। यहाँ तक कि उसके पास मज़बूत उम्मीदवार भी नहीं हो पाये। ऐसे में वह कितनी सीटें जीत सकेगी या कितने फ़ीसदी मत (वोट) ले सकेगी, यह देखना दिलचस्प होगा। साथ ही यह भविष्य में उसकी सम्भावनाएँ भी तय करेगा।

गाँधी परिवार कहाँ?

काफ़ी साल बाद कांग्रेस को ग़ैर-गाँधी अध्यक्ष मिलने के बाद सभी के मन में यह सवाल उठा कि क्या अब गाँधी परिवार पार्टी में अप्रासंगिक हो गया? इस सवाल का एक ही जवाब नहीं कि ऐसा बिलकुल नहीं है। अध्यक्ष पद सँभालने के बाद खडग़े ने तो यह कहा ही कि पार्टी के लिए गाँधी परिवार हमेशा महत्त्वपूर्व रहेगा। पार्टी के अधिकांश नेता भी मानते हैं कि गाँधी परिवार की पार्टी में भूमिका को $खत्म करने का मतलब होगा, पार्टी को शून्य कर देना। इसमें कोई दो-राय नहीं कि कांग्रेस को नये विचार और नेतृत्व की ज़रूरत थी; लेकिन यह भी सच है कि यदि कांग्रेस के भीतर देशव्यापी पहचान किसी नेता की है, तो वह गाँधी परिवार के ही नेता हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हाल के वर्षों में भाजपा की तरफ़ से इतने झटके मिलने के बाद भी गाँधी परिवार के ही कारण कांग्रेस मज़बूती से अपना अस्तित्व बनाये रख पायी है।

भाजपा यदि आज भी किसी पार्टी या नेता से ख़ुद के लिए चुनौती मानती है, तो वह कांग्रेस और गाँधी परिवार ही है। यहाँ तक कि खडग़े को भी राहुल गाँधी की पसन्द माना जाता है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गाँधी दक्षिण राज्यों में जैसे भीड़ खींचने में सफल रहे हैं, उसकी चर्चा अब हर जगह है। यह कहा जाने लगा है कि भविष्य के चुनावों में कांग्रेस दक्षिण में बहुत बेहतर नतीजे ला सकती है। लिहाज़ा इन तमाम हालात में यह तो साफ़ है कि कांग्रेस में गाँधी परिवार की भूमिका हमेशा रहेगी। उनके प्रति वफ़ादार नेताओं में ज़्यादातर ऐसे हैं, जिनका ज़मीनी आधार भी है। ख़ुद खडग़े को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। जबकि हाल के महीनों में जिन नेताओं ने विरोध का स्वर उठाया था, उनमें से कई ऐसे हैं, जिनकी राजनीति हाल के वर्षों में राज्यसभा तक सीमित रही है।

काँटों भरा ताज

भारतीय मूल के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के सामने चुनौतियाँ-ही-चुनौतियाँ

ऋषि सुनक, जिनका परिवार अविभाजित भारत के समय पूर्वी अफ्रीका चला गया था; ने किसी समय दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाले यूनाइटेड किंग्डम का प्रधानमंत्री बनकर एक इतिहास रच दिया है। हालाँकि वह जिस बात के लिए प्रधानमंत्री चुने गये हैं, वह ब्रिटेन के लोगों के लिए बहुत ही महत्त्व; लेकिन चिन्ता वाली स्थिति में पहुँच चुकी अर्थ-व्यवस्था है, जिसे उन्हें पटरी पर लाना है। सुनक से पहले डेढ़ महीने प्रधानमंत्री रहीं लिज़ ट्रस को ऐसा करने में नाकाम रहने के कारण ही अपनी कुर्सी गँवानी पड़ी। सुनक के सामने गम्भीर आर्थिक चुनौतियाँ हैं और यदि वह इससे पार पा लेते हैं, तो निश्चित ही ब्रिटेन में अपनी ख़ास जगह बना लेंगे।

प्रधानमंत्री बनने के बाद ख़ुद ऋषि सुनक ने देश के सामने खड़े संकट को गम्भीर बताया है। उनका कहना है कि ब्रिटेन की अर्थ-व्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए वह दिन-रात काम करेंगे। ब्रिटेन में महँगाई अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि महँगाई का सामना करने के लिए योजना बनाते समय सुनक को मंदी से सावधान रहना होगा; क्योंकि ज़्यादा सख़्त फ़ैसले ब्रिटेन की ढीली पड़ चुकी अर्थ-व्यवस्था को गम्भीर मंदी की तरफ़ धकेल सकते हैं।

हाल में इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अगले साल तक ब्रिटेन की अर्थ-व्यवस्था में 0.3 फ़ीसदी की वृद्धि देखने को मिल सकती है। निश्चित ही सुनक के लिए यह आँकड़े चिन्ता का कारण हैं। स्थिर विकास के साथ उच्च महँगाई दर सुधार कार्यक्रम की बैंड बजा सकती है।

यही नहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद मास्को पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के चलते यूरोप की ऊर्जा सप्लाई पर विपरीत असर पड़ा है। अब ब्रिटेन में प्राकृतिक ऊर्जा की क़ीमतों में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। देश में प्रति परिवार ऊर्जा की क़ीमतें एक साल पहले के 1,277 पाउंड के मुक़ाबले आज की तारीख़ में 3,549 पाउंड हो चुकी हैं। जहाँ तक ब्रिटेन की अर्थ-व्‍यवस्‍था का सवाल है, एसएंडपी ग्लोबल कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स मार्च, 2021 के बाद के सबसे निचले स्तर 47.2 पर आ गया है। मैन्यूफैक्क्रिंग पीएमआई 48.4 से घट 45.8 के स्‍तर पर है। सुनक के लिए यह बड़ी चुनौती है। अर्थ-व्यवस्था से इतर सुनक के सामने कंजरवेटिव पार्टी के भीतर अपना भरोसा मज़बूत करने की भी चुनौती है। यह तभी होगा, जब सुनक ब्रिटेन के लोगों के भरोसे को जीतेंगे। कंजर्वेटिव पार्टी की विरोधी लेबर पार्टी लोकप्रिय हो रही है। सुनक के नाकाम होने का मतलब होगा- नये चुनाव और लोकप्रियता की महज़ 14 फ़ीसदी की दर उन्हें सत्ता से बाहर कर देगी।

सुनक की पृष्ठभूमि

सुनक भले ब्रिटेन के नागरिक हों, एक भारतीय उनके दिल में अभी भी बसा हुआ है। प्रधानमंत्री बनने के बाद ऋषि सबसे पहले मन्दिर गये और हाथ में कलावा भी बाँधा। यही नहीं, सुनक ने बतौर सांसद पहली बार जब ब्रिटिश संसद में शपथ ली थी, तो उन्होंने यह श्रीमद्भगवद्गीता के नाम पर शपथ ली थी। ब्रिटेन में ऐसा करने वाले वह इकलौते सांसद हैं। उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति अभी भी भारतीय नागरिक हैं। हालाँकि इस दम्पति की दोनों बेटियाँ ब्रिटिश नागरिक हैं। अक्षता इंफोसिस के को-फाउंडर नारायण मूर्ति की बेटी हैं और इस दम्पति की कुल सम्पति ब्रिटेन के शाही परिवार से भी कई गुना ज़्यादा है। सुनक को विवादों का भी सामना करना पड़ा है, जब उनकी पत्नी के नॉन-डोमिसाइल टैक्स स्टेटस पर सवाल उठे थे। यही नहीं, ख़ुद सुनक पर आरोप लगे थे कि वह जब मंत्री पद पर थे, उस समय उनके पास अमेरिकी ग्रीन कार्ड था।

प्रधानमंत्री पद सँभालने के बाद उन्होंने अपनी टीम में भारतीय मूल के तीन लोगों को स्थान दिया है, जिनमें एक कंजर्वेटिव पार्टी की सांसद सुएला ब्रेवरमैन भी हैं; जिनकी पृष्ठभूमि गोवा की है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यह सुएला ब्रेवरमैन ही थीं, जिन्होंने कहा था कि भारत के साथ व्यापार समझौते से यूनाइटेड किंगडम में प्रवासन में वृद्धि होगी।

कंजर्वेटिव पार्टी के नया नेता चुने जाने के समय ब्रिटेन में जो सर्वे आये हैं, उनमें लेवर पार्टी को बढ़त दिखायी जा रही है। ज़ाहिर है कंजर्वेटिव पार्टी को राजनीतिक रूप से मज़बूत रखने में सुनक को बड़ी भूमिका निभानी होगी। यदि वह ऐसा कर पाते हैं, तो अगले आम चुनाव में उनकी पार्टी कंजर्वेटिव फिर सत्ता में आ सकती है और लेवर पार्टी का खेल बिगड़ सकता है।

सुनक महज़ 42 साल के हैं और भारत पर कभी राज करने वाले ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना उनके साथ-साथ भारत और दुनिया के लिए बड़ा उदाहरण है। ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों को क़ानूनी रूप से अल्पसंख्यक माना जाता है। इस लिहाज़ से भी यह महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि उनकी आबादी कम है। वह भी एक ऐसी पार्टी का प्रधानमंत्री बनना, जिसे रूढि़वादी माना जाता है और रंगभेद के आरोप उस पर लगते रहे हैं। सुनक आधुनिक दौर में ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री हैं।

ऋषि के भारतीय मूल के माता-पिता 60 के दशक में पूर्वी अफ्रीका से ब्रिटेन आये थे। अफ्रीका उनके दादा-दादी 1935-36 में चले गये थे, इससे पहले वह जिस अविभाजित भारत में रहते थे, वह अब पाकिस्तान का हिस्सा है। रिचमंड (यॉर्कस) से कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद चुने गये सुनक बोरिस जॉनसन सरकार में वित्त मंत्री रहे हैं। हालाँकि जब उन्होंने अपने पद से दो महीने पहले त्याग-पत्र दिया था, तो जॉनसन के समर्थक इससे बहुत नाराज़ हो गये थे और उनका आरोप था कि सुनक के कारण ही जॉनसन को अपना पद छोडऩा पड़ा।

सुनक की चुनौतियाँ

 गहरा आर्थिक संकट

 महँगाई पर क़ाबू पाना

 कर (टैक्स) कम करना

 कम दर की अर्थ-व्यवस्था

 

भारत और ब्रिटेन के रिश्ते

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऋषि सुनक को जब ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने की बधाई दी, तो साथ ही उन्होंने रोडमैप-2030 पर मज़बूती से काम करने की इच्छा भी जतायी। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 2021 में एक आभासी बैठक (वर्चुअल मीटिंग) के दौरान रोडमैप-2030 पर दस्तख़त किये थे। यह एक तरह का समझौता था, जिसमें दोनों देशों के बीच साल 2030 तक व्यापार को दोगुना करने और मुक्त व्यापार को गति देने की बात कही गयी थी। जॉनसन अब सत्ता से बाहर हो चुके हैं। हालाँकि सच यह भी है कि उनके समय में इस पर कुछ ख़ास काम नहीं हुआ।

अब ऋषि सुनक प्रधानमंत्री बन गये हैं, तो उम्मीद की जा रही है कि यदि मोदी-सुनक के बीच बेहतर रिश्ते बनेंगे। अगर ऐसा होता है, तो दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी साझेदारी पर अर्थात् रोडमैप-2030 पर तेज़ी से काम होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी उम्मीद भी जतायी है। वैसे बोरिस जॉनसन के बाद जब लिज़ ट्रस ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनी थीं, तो उनकी नीति अलग दिखी थी। उन्हें मुक्त व्यापार के अलावा माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप जैसे मुद्दों पर ऐतराज़ था। लिज़ प्रशासन को भय था कि यदि समझौते पर पूरी तरह अमल किया जाता है, तो इससे भारतीयों के ब्रिटेन आने की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ सकती है।

अब जबकि एक भारतीय मूल का प्रधानमंत्री ब्रिटेन की सत्ता में क़ाबिज़ हो चुका है, तो उम्मीद की जा रही है कि समझौते को लेकर उनकी सलाहकार टीम की राय अलग होगी।

जिनपिंग की ताक़त बढ़ी

माओ त्से तुंग के बाद शी जिनपिंग अब चीन के सबसे शक्तिशाली नेता हो गये हैं। देश की सेना से लेकर तमाम अहम संस्थानों पर अब उनके वफ़ादार कमान में हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री हु जिंताओ के बाहर जाने के जो वीडियो सामने आये हैं, उनसे पता चलता है कि जिनपिंग के बिना अब चीन में पत्ता भी नहीं हिलेगा।

दुनिया में चिन्ता यह है कि जिनपिंग तानाशाह होकर ताईवान और अपने अन्य पड़ोसियों के साथ अब कैसा व्यवहार करेंगे? क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में उन्होंने साफ़ कह दिया है कि उनका पहला काम अब ताईवान को चीन में मिलाने का होगा। भारत भी जिनपिंग के तीसरी बार चीन का राष्ट्रपति बनने के बाद के घटनाक्रम पर गहरी नज़र रखे हुए है। क्योंकि सीमा पर हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच काफ़ी तनाव वाली स्थिति रही है, जिसका मुख्य कारण चीन का लगातार निर्माण करते जाना है।

बांग्लादेश में चीन के शीर्ष राजनयिक ली जिमिंग ने अक्टूबर के आख़िर में भले यह कहा था कि भारत के साथ उनके देश की कोई रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है। भारत चीन को लेकर सतर्क भी है और आशंकित भी। यह इस बात से ज़ाहिर हो जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के तीसरी बार चीन का राष्ट्रपति बनने के एक हफ़्ते बाद तक (जब यह रिपोर्ट लिखी गयी) भी जिनपिंग को बधाई का सन्देश नहीं भेजा था।

ली का कहना था कि वह (चीन) बंगाल की खाड़ी में भारी हथियारों का जमावड़ा नहीं देखना चाहते। ली ने तो यह भी कहा कि भारत और चीन इस क्षेत्र और उसके बाहर भी किसी आर्थिक, भू-राजनीतिक और अन्य मुद्दों के हल के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। राजदूत ली का कहना कि हम भारत को कभी भी चीन के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी या रणनीतिक प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं देखते हैं। बकौल ली- ‘निजी तौर पर मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। हम आर्थिक और भू-राजनीतिक मुद्दों के हल के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।’

ली की यह टिप्पणी उस दिन आयी, जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नयी दिल्ली में निवर्तमान चीनी राजदूत सुन विडोंग से कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में अमन और शान्ति दोनों देशों के बीच सामान्य सम्बन्धों के लिए ज़रूरी है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि पूर्वी लद्दाख़ में सीमा मुद्दों को लेकर भारत और चीन के बीच 29 महीने से अधिक समय से गतिरोध चल रहा है। जून, 2020 में गलवान घाटी में संघर्ष के बाद दोनों देशों के जो रिश्ते तनावपूर्ण हुए थे, वह अभी भी पटरी पर नहीं लौटे हैं।

कैसे ताक़तवर हुए जिनपिंग?

राष्ट्रपति शी जिनपिंग को 21 अक्टूबर को जब पाँच साल के कार्यकाल के लिए रिकॉर्ड तीसरी बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) का महासचिव चुना गया, तो उन्होंने इतिहास बना दिया। इससे यह भी ज़ाहिर हुआ कि उनकी पार्टी, सेना और सत्ता पर पकड़ कितनी मज़बूत है। पार्टी के संस्थापक माओ त्से तुंग के बाद सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के जिनपिंग पहले नेता हैं, जिन्हें तीसरा कार्यकाल मिला है। अब ज़्यादा सम्भावना यही है कि वह आयु-पर्यंत चीन के शीर्ष नेता रहेंगे।

जिनपिंग को केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) का अध्यक्ष भी नामित किया गया है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जनरल झांग यूशिया और हे वीदोंग को सीएमसी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। सीएमसी के अन्य सदस्यों में शीर्ष सैन्य अधिकारी ली शांगफू, लियू जेनली, मियाओ हुआ और झांग शेंगमिन शामिल हैं। वह नौसेना और रॉकेट फोर्स सहित सेना की विभिन्न शाखाओं का नेतृत्व करेंगे। पहले के कार्यकाल की तरह जिनपिंग सीएमसी के एक मात्र असैन्य सदस्य हैं।

जिस केंद्रीय समिति ने 24 सदस्यीय राजनीतिक ब्यूरो को मंज़ूरी दी, जिसके बाद उसने जिस सात सदस्यीय स्थायी समिति का चयन किया, उसके सभी सदस्य जिनपिंग के समर्थक हैं। इनमें से सिर्फ़ दो झाओ और वांग पिछली समिति में थे। सदस्यों में ली कियांग, झाओ लेजी, वांग हुनिंग, सिया क्वी, डिंग शुएशियांग और ली शी शामिल हैं।

शंघाई सीपीसी के प्रमुख ली कियांग भी जिनपिंग के क़रीबी हैं। सम्भावना है कि मार्च, 2023 में कियांग को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा। इसके अलावा झाओ लेजी ने सन् 2017 से केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग का संचालन किया था, जो चीन में भ्रष्टाचार और अन्य तरह की गड़बडिय़ों को रोकने वाली संस्था है। एक और सदस्य हुनिंग सन् 2017 से पोलिब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य हैं और उन्हें जिनपिंग के प्रमुख सलाहकारों में गिना जाता है। उधर पार्टी के अहम बुद्धिजीवियों में से एक सिया क्वी समिति के नये सदस्य हैं। डिंग सन् 2017 से जनरल ऑफिस के प्रमुख हैं। वह पार्टी में सबसे महत्त्वपूर्ण नौकरशाहों में से एक हैं। ली शी समिति के सदस्य बनाये गये हैं। उन्हें लेजी के बाद केंद्रीय अनुशासन समिति का अध्यक्ष भी नामित किया गया है। इसके अलावा विदेश मंत्री वांग यी अन्य प्रमुख व्यक्ति हैं, जिन्हें समिति में। यी केंद्रीय समिति के सदस्य रहे हैं।

हालाँकि कई जानकारों का मानना है कि जिनपिंग ने पोलित ब्यूरो स्टेडिंग समिति (मंत्री परिषद्) में जिन लोगों को चुना है, उससे लगता है कि उन्होंने अनुभव और विशेषज्ञता पर वफ़ादारी को तरजीह दी है। उन्होंने पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में ली कियांग को चुना है, जिन्हें चीन की केंद्रीय सरकार में काम करने का कोई अनुभव नहीं है। चीन में दूसरा सबसे बड़ा नेता ही प्रधानमंत्री बनता है।

उदारवादी नेता दरकिनार

चीन में नये निजाम में उदारवादी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है। इससे ज़ाहिर होता है कि जिनपिंग की राह क्या हो सकती है। इनमें पार्टी में दूसरे नंबर का समझे जाने वाले प्रधानमंत्री ली क्विंग समेत कई उदारवादी नेता शामिल हैं, जो केंद्रीय समिति में जगह नहीं बना पाये। इस समिति में 300 सदस्य हैं।

जिनपिंग की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि माओ त्से तुंग को छोडक़र जिनपिंग से पहले देश के सभी राष्ट्रपतियों ने 10 साल के कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त होने के नियम का पालन किया। अब जिनपिंग के तीसरी बार सत्ता में आने से यह नियम ख़त्म हो गया है। जिनपिंग पहली बार सन् 2012 में राष्ट्रपति और पार्टी महासचिव चुने गये थे, अब तीसरे कार्यकाल में प्रवेश कर गये हैं।

तीसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने के बाद जिनपिंग ने कहा- ‘हमें चीनी सन्दर्भ में माक्र्सवाद को अपनाकर ऐतिहासिक पहल करनी चाहिए और नये युग में चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद के विकास में नया अध्याय लिखना चाहिए। चीन और दुनिया को एक दूसरे की आवश्यकता है। हमारी अर्थ-व्यवस्था सकारात्मक है, जो कोरोना-काल के प्रतिबंधों के कारण मंदी झेल रही थी।’

कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में सभी चीज़ें जिनपिंग के हिसाब से हुईं। पहले राजनीतिक ब्यूरो ने सात सदस्यीय स्थायी समिति चुनी, जिसने शी जिनपिंग को तीसरे कार्यकाल के लिए महासचिव चुन लिया। जिनपिंग को केंद्रीय समिति में चुने जाने के बाद राजनीतिक ब्यूरो और फिर स्थायी समिति में चुना गया और वह आसानी से महासचिव चुन लिये गये।

इसमें सबसे दिलचस्प यह रहा कि महासम्मेलन में पार्टी के संविधान में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसमें निर्देश दिया गया कि जिनपिंग के निर्देशों और सिद्धांतों का पालन करना पार्टी के सभी सदस्यों का दायित्व है। समझा जा सकता है कि जिनपिंग कितने ताक़तवर हो गये हैं और उनके विरोध का क्या मतलब होगा?

पार्टी के महासम्मेलन में सीपीसी के संविधान में संशोधन सबसे प्रमुख घटना है, जो जिनपिंग के बहुत ताक़तवर हो जाने की कहानी कहती है। संशोधन के प्रस्ताव में कहा गया है- ‘नये युग के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर जिनपिंग का विचार समकालीन चीन और 21वीं सदी का माक्र्सवाद है और इस युग की सर्वश्रेष्ठ चीनी संस्कृति और लोकाचार का प्रतीक है।’

दुनिया में माक्र्सवाद के घटते प्रभाव के बीच चीन में जिनपिंग के और मज़बूत होने के कई मायने हैं। महासम्मेलन में पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा केंद्रीय अनुशासन निरीक्षण आयोग (सीसीडीआई) का नया दल भी नियुक्त किया गया, जो सीधे जिनपिंग के अधीन कार्य करता है।

आंतरिक चुनौतियाँ

जिनपिंग भले ताक़तवर नेता बन गये हों, उनके सामने आंतरिक चुनौतियाँ रहेंगी। सीपीसी की बैठक में जिस तरह हु जिंताओ को बैठक से बाहर करने का वीडियो सामने आया, उससे संकेत मिलता है कि सब कुछ अच्छा नहीं है। वायरल हुए इस वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि समापन समारोह में जिन्ताओ को बाहर ले जाने लगा क़रीब एक मिनट तक वह उनके सामने से उठायी गयी फाइल और उन्हें ले जाने की कोशिशों का विरोध कर रहे हैं। कुछ मीडिया रिपोट्र्स में हु की ख़राब सेहत की बात कही गयी है। हालाँकि घटनाक्रम के दौरान जिंताओ की शारीरिक भाषा कुछ और बयाँ करती है।

साफ़ दिख रहा है कि जब उनकी बाजू पकडक़र उन्हें बाहर ले जाने की कोशिश हो रही है, वह क़रीब एक मिनट तक ठिठके खड़े रहते हैं। जाते-जाते वह जिनपिंग के कंधे पर हाथ रखकर कुछ कहते भी महसूस होते हैं। इसके बाद वह जाते हुए वह प्रधानमंत्री ली के च्यांग का भी कंधा थपथपाते दिखते हैं। यह भी हो सकता है कि हु जिंताओ के ज़रिये जिनपिंग देश की कम्युनिस्ट पार्टी में अन्य ताक़तों को सन्देश देना चाहते हों। यहाँ यह ग़ौर करने वाली बात है कि जब इस घटना का वीडियो दुनिया के सामने आया उससे कुछ घंटों के भीतर ही प्रधानमंत्री ली के च्यांग और कुछ वरिष्ठ नेताओं को सीपीसी की केंद्रीय समिति से बाहर कर दिया गया। याद रहे सीपीसी के महाधिवेशन से कुछ समय पहले ही दो मंत्रियों को भी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में डाल दिया गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि जिनपिंग विद्रोह के रास्ते बन्द करना चाहते थे। सीपीसी की बैठक से कुछ दिन पहले ही बीजिंग में एक पुल पर बैनर लहराते एक व्यक्ति की फोटो भी बहुत वायरल हुई थी। इस बैनर पर स्कूलों और फैक्ट्रियों में हड़ताल करने की अपील की गयी थी। जिनपिंग को तानाशाह बताते हुए हटाने की माँग भी इसमें की गयी थी।

बाहरी चुनौतियाँ 

चीन पश्चिम से लेकर एशिया में ही कई चुनौतियाँ झेल रहा है। उसकी विस्तारवादी नीति के चलते दूसरे कई देश उससे नाराज़ हैं। इसके अलावा चीन की अर्थ-व्यवस्था के सामने देश और विदेश में कई चुनौतियाँ हैं। चीन की शून्य कोरोना-नीति और अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव भी जिनपिंग के लिए चुनौती हैं। जिस तरह जिनपिंग को तीसरा कार्यकाल मिला है और उनके आयुपर्यंत चीन का नेता बने रहने की सम्भावना बन गयी, उससे एक बात साफ़ है कि जिनपिंग अपनी विचारधारा पर मज़बूती से चलेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी क़ीमत अर्थ-व्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है। अधिकारिक आँकड़े देखें, तो जुलाई से सितंबर के बीच चीन की अर्थ-व्यवस्था पिछले साल के इसी समय के मुक़ाबले 3.9 फ़ीसदी की दर से बढ़ी और अनुमानों से आगे रही।

हालाँकि चीन की अर्थ-व्यवस्था बीते कुछ दशकों में जिस रफ्तार से बढ़ी है उसके मुक़ाबले यह बहुत कम है। मार्च में साल 2022 के लिए चीन ने जो 5.5 फ़ीसदी का लक्ष्य तय किया था, ये उससे भी कम है। इससे पिछले तीन महीनों में अर्थ-व्यवस्था सिर्फ़ 0.4 फ़ीसदी की दर से बढ़ी थी और इसी लिहाज़ से इसे लम्बी छलांग माना जा रहा है। उस समय शंघाई लॉकडाउन में था।

हालाँकि सीपीसी की बैठक में अर्थ-व्यवस्था से जुड़े आँकड़े जारी नहीं विशेषज्ञों ने राय जतायी कि ये अर्थ-व्यवस्था के कमज़ोर होने का संकेत है। सैन्य चुनौतियों की बात करें, तो चीन की सीमा से दुनिया में सबसे ज़्यादा पड़ोसी देश हैं। इनमें अफ़ग़ानिस्तान, भूटान, भारत, क़ज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, लाओस, म्यांमार, मंगोलिया, नेपाल, उत्तर कोरिया, रूस, ताजिकिस्तान और वियतनाम हैं। चीन के ब्रूनेई, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे समुद्री पड़ोसी भी हैं। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से शायद ही कोई देश होगा, जो चीन के साथ अपने सम्बन्धों को भरोसे की नज़र से देखता हो।

जल्द होंगे दिल्ली नगर निगम के चुनाव

लगभग सात-आठ महीने पहले होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनाव की बारी आ चुकी है। हालाँकि नगर निगम चुनाव मार्च में होने थे। लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें क़ानूनी पेच फँसाते हुए इन्हें टाल दिया, जिस पर चुनाव आयोग ने भी असमर्थता जतायी थी। विपक्षी पार्टियों, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) ने इस पर आपत्ति भी जतायी, परन्तु केंद्र सरकार ने नगर निगम को एक करके चुनाव समय पर न होने दिये। अब दिल्ली नगर निगम के चारों निकायों के एक होने के बाद परिसीमन समिति ने केंद्र सरकार को अपनी अन्तिम रिपोर्ट सौंप दी है, जिसके बाद दिल्ली नगर निगम चुनाव का रास्ता साफ़ हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली में नगर निगम वार्डों के परिसीमन पर 800 पृष्‍ठों की अन्तिम गजट अधिसूचना जारी कर दी है।

अब गजट अधिसूचना के बाद परिसीमन की क़वायद पूरी मानी जानी चाहिए और चुनाव जल्द होने चाहिए, क्योंकि सीटों पर आरक्षण भी तय हो चुका है। अब राज्य चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीख़ों के ऐलान का इंतज़ार है। एक नये आदेश के अनुसार, आयोग का दफ़्तर हफ़्ते के सातों दिन खुला है। रविवार या शनिवार की भी अभी कोई छुट्टी नहीं है।

विदित हो कि इसी साल अप्रैल में होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालने पर आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर चुनाव में हार के डर का आरोप लगाया था। केंद्र सरकार द्वारा चुनाव टालने को लेकर आम आदमी पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ जमकर पोस्टरबाज़ी भी की थी। वहीं भाजपा ने आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ नगर निगम की बक़ाया राशि न देने के लिए जमकर पोस्टरबाज़ी की थी।

हालाँकि अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए भाजपा ने आम आदमी पार्टी की खुली चुनौती को कभी स्वीकार नहीं किया। नगर निगम में समय पर सफ़ाई और अन्य कर्मचारियों का वेतन न देने, स्कूलों की दशा ठीक न करने और शहर में जगह-जगह बार-बार गन्दगी जमा होने देने को लेकर आम आदमी पार्टी भाजपा को जमकर घेरती रही है। अब, जब नवंबर-दिसंबर में गुज़रात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसा माना जा रहा है कि इसी दौरान दिल्ली नगर निगम के चुनाव भी होंगे। आप-नेताओं को भरोसा है कि इस बार नगर निगम की बाग़डोर उनके ही हाथ होगी। लेकिन भाजपा ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी रणनीति बना ली है, ताकि किसी भी हाल में उसके हाथ से यह कमाऊ विभाग न खिसके।

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इसी साल अप्रैल में होने वाले चुनाव टालकर मई में निगम के चारों निकायों को मिलाकर एकीकृत दिल्ली नगर निगम बनाया था। अब दिल्ली नगर निगम के वार्डों की संख्या घटकर 250 हो चुकी है। राज्य चुनाव आयोग ने कहा है कि नगर निगम चुनावों की तारीख़ों के ऐलान को लेकर वह सातों दिन तेज़ी से काम कर रहा है।

वार्डों के आरक्षण का बँटवारा भी हो चुका है। इस बार सभी वार्डों पर चुनाव लडऩे के लिए महिला-पुरुषों के लिए 50-50 फ़ीसदी के हिसाब से समान रूप से विभाजन किया गया है। कुल 250 वार्डों में से 104 वार्ड सामान्य व अन्य महिलाओं के लिए और 104 वार्ड सामान्य व अन्य पुरुषों के लिए आरक्षित किये गये हैं, जबकि बाकी आरक्षित 42 वार्डों में से 21 वार्ड अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए और 21 वार्ड अनुसूचित जाति के लिए पुरुषों के लिए आरक्षित हैं।

इधर दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने अपनी चुनाव प्रबंधन समिति समेत कुल 21 समितियाँ बनायी हैं। भाजपा ने इस चुनाव को जीतने के लिए जम्मू-कश्मीर के सह प्रभारी आशीष सूद, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय, पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व विधायक विजेंद्र गुप्ता, विधायक अभय वर्मा, प्रदेश महामंत्री हर्ष मल्होत्रा और पूर्व महापौर आरती मेहरा जैसे बड़े चेहरों को मैदान में लगा दिया है। कांग्रेस ने अभी कोई बड़ी योजना अपनी चुनावी रणनीति को लेकर नहीं बनायी है। परन्तु आम आदमी पार्टी पिछले साल से ही चुनाव के लिए कमर कसे बैठी है। उसके कई उम्मीदवारों के पोस्टर 2022 के शुरू से ही राजधानी में लगे हुए हैं।