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उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण पर बुलडोजर

मुख्यमंत्री योगी ने दिये शत्रु सम्पत्ति को मुक्त कराने के आदेश

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार दो का उद्देश्य उत्तर प्रदेश को स्वच्छ तथा सुन्दर बनाना है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए गाँवों के सौंदर्यीकरण की दिशा में काम कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार दो के आने के बाद इसके लिए एक सबसे बड़ा कार्य बुलडोजर से अतिक्रमण हटाने का हुआ है। मगर बुलडोजर चलाने पर योगी आदित्यनाथ सरकार पर अकारण ही घर तोड़कर लोगों को बेघर करने के आरोप भी लगे हैं। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ गृह विभाग की समीक्षा के दौरान प्रशासन को निर्देश दिया है कि प्रदेश के विभिन्न जनपदों की शत्रु सम्पत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु अतिक्रमण हटाया जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आदेश है कि शत्रु सम्पत्ति का ब्योरा तैयार करके उस पर से अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर चलाया जाए।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के अनुरूप प्रदेश भर में शत्रु सम्पत्ति पर से अतिक्रमण हटाने का कार्य राज्य के गृह विभाग की निगरानी में होगा। इसके तहत शत्रु सम्पत्ति की सुरक्षा, निगरानी तथा प्रबंधन के लिए प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों को नोडल अधिकारियों की तरह तैनात किया जाएगा। असल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अन्तरराज्यीय, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित गाँवों को व्यावसायिक, सांस्कृतिक तथा पर्यटन योग्य ऐतिहासिक विरासतों का बेजोड़ नमूना बनाना चाहते हैं, जिसके लिए अतिक्रमण हटाना परम् आवश्यक है। सीमावर्ती जनपदों में केंद्र व राज्य सरकार की जनहितकारी योजनाओं का लोगों को शत्-प्रतिशत सन्तुष्टि सुनिश्चित कराने के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों के अतिरिक्त स्वयंसेवकों को इन क्षेत्रों का भ्रमण कराने का भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासन को आदेश दिया है। इसके लिए उन्होंने इन क्षेत्रों में रहने वाले सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों, अर्धसैनिक बलों के जवानों एवं स्थानीय जानकारों का सहयोग लेने का सुझाव दिया है।

शत्रु सम्पत्ति का अर्थ

भारत में शत्रु सम्पत्ति उसे कहा जाता है, जो सन् 1962 के भारत चीन युद्ध तथा सन् 1965 व सन् 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के बाद भारत छोडऩे वालों द्वारा छोड़ी गयी चल-अचल सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को भारत सरकार ने अपने अधीन रखा हुआ है। मगर धीरे-धीरे इस सम्पत्ति पर स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर लिया, जिसे अब उत्तर प्रदेश की योगी आतित्यनाथ सरकार मुक्त कराना चाहती है।

भू-राजस्व के एक सरकारी अधिकारी की मानें तो देश के कई राज्यों विशेषकर सीमावर्ती राज्यों में शत्रु सम्पत्ति अथाह है। अधिकारी ने बताया कि शत्रु सम्पत्ति के मुद्रीकरण के उद्देश्य से सन् 2020 में भारत के गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसमें शत्रु सम्पत्तियों के सफल निपटान के निर्देश दिये गये थे। कहा जाता है कि भारत पाकिस्तान के बीच सन् 1965 में हुए युद्ध के बाद सन् 1966 में भारत तथा पाकिस्तान के बीच ताशकंद घोषणा समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें दोनों देशों द्वारा ली गयी एक-दूसरे की सम्पत्ति को वापस करने का वादा किया था। मगर पाकिस्तान ने सन् 1971 में उस वादे के विरुद्ध जाते हुए भारत की सम्पत्तियों का निपटारा कर दिया। मगर भारत सरकार ने उसे अभी तक शत्रु सम्पत्ति ही बनाकर रखा हुआ है। यह अलग बात है कि स्थानीय लोगों द्वारा ऐसी सम्पत्तियों पर अतिक्रमण कर लिया गया है, जिसे अब उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार मुक्त कराना चाहती है।

सन् 1968 में भारत सरकार ने शत्रु सम्पत्ति पर नियंत्रण के लिए शत्रु सम्पत्ति अधिनियम भी बनाया था। इसके बाद से इस सम्पत्ति पर कई तरह के विवाद भी होते रहे हैं, जिनका निपटान अभी पूर्ण रूप से नहीं हो सका है। शत्रु सम्पत्ति अधिनियम में कई संशोधन भी अब तक हो चुके हैं। शत्रु सम्पत्ति की परिभाषा को लेकर भी विवाद होते रहे हैं।

बेघर होंगे सैकड़ों लोग

गाँवों तथा जनपदों में रहने वाले लोगों के पास जितनी सम्पत्ति है, उसमें से कुछ नहीं तो 10 प्रतिशत सम्पत्ति तो अतिक्रमण की ही होगी। प्रश्न यह उठता है कि यह अतिक्रमण वाली सम्पत्ति में से किसको पता कि उसके पास जो अतिक्रमण वाली सम्पत्ति है, वह शत्रु सम्पत्ति है अथवा सरकार की सम्पत्ति है। कई सम्पत्तियाँ तो ऐसी भी होंगी, जिनके दस्तावेज़ तहसील अथवा रजिस्ट्रार कार्यालय से तैयार करवाकर लोग उनके मालिक बन चुके हैं।

इसमें कोई आपत्ति नहीं कि अतिक्रमण हटना आवश्यक है, मगर इसका विरोध भी जमकर होगा। इसके अतिरिक्त यह तय है कि अतिक्रमण हटाने से सैकड़ों लोग बेघर हो जाएँगे। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकारी तथा शत्रु सम्पत्तियों पर कई-कई पीढिय़ों से लोगों की अधीनता है। कितने ही लोग हैं, जिन्हें यह भी पता नहीं है कि उनके पास जो सम्पत्ति है, वो असल में उनके दादा अथवा परदादा ने किस प्रकार प्राप्त की थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में बसे लोगों के पास तो इसकी कोई रजिस्ट्री तक कई बार नहीं होती है। इसके अतिरिक्त जो लोग सड़कों के किनारे बसे हुए हैं अथवा शत्रु सम्पत्ति पर पिछली दो-तीन पीढिय़ों से रहते आ रहे हैं अथवा व्यवसाय चला रहे हैं, उन्हें अगर अतिक्रमणकारी बताकर उजाड़ा गया, तो वे कहाँ जाएँगे? यह एक अति आवश्यक प्रश्न है। अतिक्रमण हटाने के लिए कुछ साल पहले गाँवों तथा नगरों में निशान लगाये गये थे। इन निशानों से पता चलता है कि अतिक्रमण पर बुलडोजर चलने से अनेक लोग बेघर हो जाएँगे।

नहीं होना चाहिए भेदभाव

अगर उत्तर प्रदेश की योगी आतित्यनाथ सरकार अतिक्रमण हटाना ही चाहती है, तो उसे समरूप से सभी अतिक्रमणकारियों को ही उस सम्पत्ति से हटाना होगा। अगर सरकार अथवा अतिक्रमण हटाने वाले अधिकारी इसमें भेदभाव करते हैं तथा केवल उन्हीं लोगों से सम्पत्ति छीनते हैं, जो सरकार के विरुद्ध हैं या दूसरे वर्ग के हैं, तो यह उन अधिकारियों की तथा योगी आदित्यनाथ सरकार की आलोचना का कारण बन सकता है। अब तक देखा गया है कि कुछ लोगों के घर पर बुलडोजर चलाने में योगी आदित्यनाथ सरकार पर भेदभाव के आरोप लगे हैं कि एक विशेष वर्ग के घरों तथा दुकानों पर बुलडोजर चला है। दलितों के प्रति भी भेदभाव के आरोप योगी आदित्यनाथ सरकार पर लगते रहे हैं। ये आरोप मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर विशेषकर लगते रहे हैं। अत: उन्हें ऐसे आरोपों से बचने के लिए भेदभाव की नीति का त्याग करते हुए सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना होगा।

भू-माफ़िया का बोलबाला

इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत में भू-माफ़िया का बोलबाला है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। प्रदेश का ऐसा कोई जनपद (ज़िला), उप नगर (क़स्बा) अथवा गाँव नहीं होगा, जहाँ भू-माफ़िया का बोलबाला न हो। सबसे पहली आवश्यकता इन भू-माफ़िया से सरकारी तथा शत्रु सम्पत्ति मुक्त कराने की है। इसके अतिरिक्त इन भू-माफ़िया से मिलीभगत करके सरकारी तथा शत्रु सम्पत्ति पर अतिक्रमण कराने वाले अथवा इन सम्पत्तियों को बेचने वाले अथवा इनके फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनाने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

ऐसे लोगों से निपटने के लिए बहुत पहले ही उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एंटी भू-माफ़िया पोर्टल उत्तर प्रदेश बनाया जा चुका है। इस पोर्टल का मुख्य उद्देश्य राज्य में अवैध अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध सरकार तथा प्रशासन से शिकायत करना है। किसी भी व्यक्ति विशेष द्वारा की गयी यह शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी आसानी से पहुँच सकती है। अगर कोई भू-माफ़िया जबरन किसी व्यक्ति की भूमि पर अथवा सरकारी भूमि पर अथवा शत्रु सम्पत्ति पर अतिक्रमण करता है, उस पर अवैध निर्माण करता है, तो उसे तत्काल मुक्त कराया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रत्येक मंडल तथा तहसील में एंटी भू-माफ़िया फोर्स बनायी गयी है। इस एंटी भू-माफ़िया फोर्स का कार्य उत्तर प्रदेश में भूमि से जुड़ी समस्याओं के समाधान के अतिरिक्त भू-माफ़िया के चंगुल से हथियायी हुई भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराना है। इस एंटी भू-माफ़िया फोर्स का कार्य अतिक्रमणकारियों तथा भू-माफ़िया को चिह्नित करके उनके विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करना भी है, ताकि भू-माफ़िया तथा दबंगों पर उचित कार्रवाई की जा सके।

पूँजीपतियों से मिलीभगत का चक्रव्यूह

पिछले दिनों गुजरात की मच्छु नदी पर बना मोरबी का पुल टूटने से क़रीब 150 से ज़्यादा लोग मरे; लेकिन चंद रोज़ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर सियासी बयानबाज़ी के बाद सब कुछ वैसा ही हो गया, जैसा कि हर चुनावी दौर में होता आया है। यह कोई पहली बार नहीं है। आपको याद होगा कि आम चुनाव से पहले सन् 2019 में भी हुई थी, जिसको हम दर्दनाक पुलवामा हमले के रूप में जानते हैं। अगले दिन तमाम पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देखा अपनी रस्म अदायगी कर ली थी। इसी प्रकार सन् 2016 में विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ऐसी ही पुल टूटने की घटना हुई थी, जिसमें 150 से ज़्यादा लोग मरने की ख़बरें आयी थीं। कुछ दिन जाँच-पड़ताल और जाँच समिति बनाने की रस्म अदायगी और सियासी बयानबाज़ी के बाद सब कुछ ठंडा हो गया था और सब सियासतदान चुनाव प्रचार में मदहोश हो गये थे।

इससे पहले भी देश में सरकारों या सरकारों के चहेतों के कारण कई ऐसे हादसे हुए हैं, जिनमें इसी तरह की लीपापोती की गयी है। चाहे वो कांग्रेस के शासनकाल का भोपाल गैस कांड हो, चाहे चाहे उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के दौरान का बनारस पुल हादसा हो, या फिर चाहे जनता पार्टी सरकार के दौरान का मोरवी का ही सन् 1979 का डैम हादसा हो। डेढ़-दो दशक पहले तक नैतिकता यह थी कि ज़िम्मेदार मंत्री इस्तीफ़ा दे देते थे और प्रमुख दोषियों के ख़िलाफ़ भी मुक़दमे दर्ज होते थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश का लाल बहादुर शास्त्री का रेल मंत्री से त्याग-पत्र देना है, जब एक रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने उसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए तत्काल अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। लेकिन आज के शासनकाल में न तो मंत्रियों के इस्तीफ़े होते हैं और न प्रमुख दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होती है। सवाल यह उठता है कि इस निरंकुशता की वजह आख़िर क्या है? क्या जनता सिर्फ़ वोट देने भर के लिए है। उसके बाद लोग जीएँ या मरें, इससे सरकार को क्या कोई मतलब नहीं? या फिर सत्ताधारी दल को यह लगता है कि आम जनता ऐसी घटनाओं को जल्दी भूल जाती है। अगर न भी भूले और विरोध भी करे, तो दोषियों का कुछ नहीं बिगड़ पाता। क्योंकि 15 से 20 साल अदालती कार्यवाही चलती रहती है और धीरे-धीरे मामला कुंद पड़ता चला जाता है।

गुजरात में मोरबी पुल टूटने की घटना पर विपक्ष लगातार सत्ताधारी दल के नेताओं पर आरोप लगा रहा है कि भाजपा के नेता लगातार गुजरात विधानसभा चुनाव में व्यस्त हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी देश और प्रदेश को शोक-सम्बोधन करने के बाद फिर उसी तरह चुनाव प्रचार में लग गये, जबकि न सिर्फ़ बाक़ी राजनीतिक पार्टियों ने, बल्कि गुजरात में अनेक कलाकारों ने दीपावली के अवसर पर गुजराती नये साल बेस्तु बरस पर होने वाले अपने कार्यक्रम स्थगित कर दिये।

दरअसल, लोग भी कुछ दिन ऐसी चर्चाओं पर ध्यान देते हैं और फिर भूल जाते हैं। लेकिन वे ऐसी घटनाओं को किस तरह फूलें, जिन्होंने अपनों को ऐसे हादसों में खोया हो? सवाल यह भी है कि आख़िर चुनाव से ठीक पहले ही ऐसी घटनाएँ क्यों होती हैं? हालाँकि यह माजरा क्या है? इसे समझने और समझाने के लिए दावे तो नहीं किये जा सकते; लेकिन कुछ तथ्य और आँकड़े ज़रूर पेश किये जा सकते हैं। मोरबी हादसे के बाद विपक्ष बड़ा सवाल यह उठा रहा है कि आख़िर गुजरात सरकार ने एक घड़ी और बल्ब बनाने वाली कम्पनी को पुल के रख-रखाव का ठेका दे कैसे दिया? क्योंकि पुलिस ने अदालत में जो बयान दिया, उससे गुजरात सरकार की मंशा और रेवड़ी बाँटने की तस्वीर काफ़ी हद तक साफ़ होती नज़र आती है। कहा जा रहा है कि पुलिस ने अदालत में बयान दिया है कि पुल में जंग लगे हुए टूटे हुए ज्वाइंटर (जोड़ वाले छल्ले) थे। कुछ छल्ले बदले भी गये, तो उन्हें स्टील की जगह एल्युमीनियम का लगाया गया। तारें भी पुरानी ही थीं, जिन पर जंग लग गयी थी। पुल की मरम्मत के लिए कोई अनुभवी इंजीनियर नहीं लगाया गया, बल्कि मकान आदि बनाने वाले, बेल्डिंग करने वाले अनाड़ी कारीगरों से काम कराया गया था, जिन्होंने कभी भी पुल रिपेयर नहीं किया, किसी पुल के बनने में कोई योगदान नहीं दिया। इस प्रकार की चर्चा आम है।

ज़ाहिर है कि 143 साल पुराना पुल क़रीब तीन दशक से बन्द भी पड़ा था। बताते हैं कि इस पुल को मोरबी के राजा वाघजी रावजी ने बनवाया था, जिसका उद्घाटन उनके शासनकाल में ही सन् 1879 में किया गया था। अंग्रेजी शासन के दौरान बना क़रीब 765 फुट लम्बा और चार फुट चौड़ा यह पुल गुजरात टूरिज्म का बेजोड़ नमूना था। यह भी कहा जा रहा है कि इस पुल को विधानसभा चुनाव को देखते हुए आनन-फ़ानन में पुल की मरम्मत (रिपेयरिंग) की खानापूर्ति करते हुए सरकारी करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाकर यह सोचकर इसे खोला गया कि इसे चुनावों में गुजरात मॉडल की तरह पेश किया जाएगा। मरम्मत का काम जयमुख पटेल की कम्पनी मोरवी को दिया गया, जिस परमरम्मत में करोड़ों के गबन के आरोप लग रहे हैं।

ज़ाहिर है कि दीपावली के अवसर पर मनाये जाने वाले गुजराती नये साल बेस्तु बरस के मौक़े पर पुल देखने आयी भीड़ का फ़ायदा उठाकर 17-17 रुपये में टिकट बेचकर भी कम्पनी ने भारी मुनाफ़ा कमाया। इसके बावजूद न तो मोरवी कम्पनी के मालिक के ख़िलाफ़ एफआईआर हुई, न ठेका देने के लिए ज़िम्मेदार गुजरात सरकार और किसी ज़िम्मेदार मंत्री के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की गयी। सत्ता के क़रीबी माने जाने वाले मोरवी कम्पनी के मालिक जयमुख पटेल के मरने वालों के प्रति कोई शोक भी न जताने की चर्चा भी गर्म रही। कथित आरोप तो यहाँ तक है कि जयमुख पटेल के सत्तासीन शीर्ष नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं और इन्हीं नज़दीकियों के कारण जयमुख पटेल को पुल निर्माण और मरम्मत का अनुभव न होने के बावजूद इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी दे दी गयी। गुजरात के सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं के अलावा शीर्ष नेतृत्व के नंबर-1 और नंबर-2 पर भी इस प्रकार के कई व्यापारियों से क़रीबी रिश्ते होने के आरोप विपक्ष द्वारा लगातार लगाये जाते रहे हैं। बहरहाल कुछ लोगों को इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार मानकर गिरफ़्तार कर लिया गया है, जिसमें मोरवी कम्पनी के प्रबंधक समेत नौ लोग शामिल हैं। हैरत की बात यह है कि मोरवी कम्पनी के प्रबंधक दीपक पारेख ने अदालत में घटना पर अफ़सोस जताने के बजाय हादसे को भगवान की इच्छा बताया।

दरअसल सरकार बख़ूबी समझती है कि उसके मंत्रियों की ख़ामोशी और कुछ मीडिया संस्थानों का हर हाल में सरकार के पक्ष में बोलना ही उसका संबल है। सरकारी एजेंसियों की भूमिका पर विपक्ष की तरह सवाल नहीं उठाऊँगा, क्योंकि आज के तमाम किरदारों को आम लोग बख़ूबी समझते हैं और तमाम सोशल मीडिया, काफ़ी हद तक प्रिंट मीडिया और कुछ टीवी चैनल्स पर इस प्रकार की तमाम घटनाओं पर टिप्पणी करने वालों की भरमार है। लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूँगा कि किसी गबन या घोटाले या घपले का पता लगने के बावजूद अगर दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो इसके पीछे सरकार और पूँजीपतियों की मिलीभगत की बू आती है। सरकार और पूँजीपतियों की मिलीभगत होना कोई नयी बात नहीं है। यह परम्परा तो आज़ादी के पहले अंग्रेजों के जमाने से लगातार चली आ रही है और आज भी बदस्तूर जारी है। ज़ाहिर है कि पूँजीपतियों की मिलीभगत के इस चक्रव्यूह में आम जनता हमेशा ही पिसती रही है। यह चक्रव्यूह इतना मज़बूत है कि अगर देश का कोई जागरूक नागरिक, बुद्धिजीवी या फिर कोई पत्रकार सवालों के बार से इसे भेदना चाहे भी, तो या तो उसे जवाब नहीं मिलते या फिर उसे ही सज़ा भुगतनी पड़ती है। ऐसी कई घटनाएँ मुझे अच्छी तरह याद हैं, जिनमें सरकार की ख़ामियों को दिखाने या सवाल करने वालों को जेल या मौत या पिटाई की सज़ा मिली है। यह सजाएँ घोषित आपातकाल में भी देश के जागरूक लोगों को मिलीं और अघोषित आपातकाल में भी मिलती रही हैं।

दरअसल पूँजी के ढेर पर बैठे पूँजीपति और नेता ऐशपरस्ती की इस मलाई को किसी दूसरे को नहीं काटने देना चाहते, ख़ासतौर पर आम जनता को तो इस मलाई से कोसों दूर रखा जाता है, जो इसकी असली हक़दार है। इसी वजह से कुछ पार्टियों को जनता को दी जाने वाली सुविधाएँ रास नहीं आ रही हैं। दूसरी बात किसी हादसे में दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न होने की वजह यह भी है कि आज देश की विधानसभाओं से लेकर संसद तक ज़्यादातर विधायक, सांसद और मंत्री या तो ख़ुद ठेकेदारी प्रथा को भी हथियाये हुए हैं या फिर अपने चहेतों को इसका फ़ायदा पहुँचाते हैं।

अगर केवल संसद की बात करें, तो उसके दोनों सदनों में बैठने वाले सांसद और मंत्रियों में से अधिकतर माफ़िया, उद्योगपति, पूँजीपति और दबंग पृष्ठभूमि से आते हैं। कई बार यह बात उठी है कि ज़्यादातर विधायक, सांसद और मंत्री आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। सोचने वाली बात है कि जब अपराधी ही सत्ता में होंगे, तो उन्हें सज़ा कौन देगा? लेकिन सवाल यह भी है कि जब सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान की ताक़तों से लैस है और सर्वोपरि है, तो भी इन ताक़तवर दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस पर विशेष, पर्यावरण संरक्षण में नाकामी दु:खद

दुनिया भर में किये गये कई अध्ययनों से पता चलता है कि लोगों की शारीरिक क्षमता दिन-ब-दिन कम होती जा रही है और बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। आधुनिक होती दुनिया में स्मार्ट फोन हाथ में लेकर लोग भले ही ख़ुद को स्मार्ट समझते हों; लेकिन इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि आधुनिक होने के साथ-साथ लोग परेशान, दु:खी और तनावग्रस्त होते जा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पर्यावरण का ख़राब होना है। विडम्बना यह है कि आज के आधुनिक स्मार्ट युग में ज़्यादातर लोग पर्यावरण के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं और जाने-अनजाने पर्यावरण को ख़राब कर रहे हैं।

आज ज़्यादातर लोगों को न तो पर्यावरण का मतलब पता है और न ही पर्यावरण से उन्हें कोई मतलब है। इसलिए सबसे पहले यही जानना ज़रूरी है कि पर्यावरण क्या है? पर्यावरण हमारे चारों ओर का वातावरण है, जिसमें सन्तुलन के लिए सभी प्रकार से प्राकृतिक तत्त्वों का सन्तुलन रखने के साथ-साथ धरती पर रहने वाले प्राणियों में भी सन्तुलन ज़रूरी है। आज दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती धरती पर पर्यावरण सुरक्षा को लेकर बनी हुई है।

विडम्बना यह है कि सन् 1992 से हर साल 26 नवंबर को पर्यावरण संरक्षण दिवस मनाया जाता है। सन् 1972 से हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। लेकिन इन दशकों में ही पर्यावरण को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाया गया है। दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमी और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अपनी जेबें भरने वाले लोग हर साल सिर्फ़ 26 नवंबर को विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस के बहाने बिगड़ते जा रहे पर्यावरण को रोना-धोना करके शान्त हो जाते हैं। इसी तरह हर साल करोड़ों रुपये पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पानी की तरह बहाया जाता है। हालात यह हैं कि अपने फ़ायदे के लिए पर्यावरण ख़राब करने की मंशा वाले पूँजीपति पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वालों पर भारी पड़ते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए दवा कम्पनियों के मालिकों को ही लें, तो वे कभी नहीं चाहते कि धरती का पर्यावरण शुद्ध रहे।

साफ़ है कि पर्यावरण ख़राब होगा, तो लोग ज़्यादा-से-ज़्यादा बीमार पड़ेंगे और दवा कम्पनियों का धंधा चलेगा। दवा कम्पनियों की तरह ही प्रदूषण करने वाले कारख़ाने, धरती पर बढ़ती गन्दगी और धरती में लगातार बैठते गन्दे पानी और घटते जंगलों से भी पर्यावरण को विकट नुक़सान हो रहा है। आज हमारा पर्यावरण इस हालत तक ख़राब हो चुका है कि अगर दुनिया के सभी लोग उसे सुधारने का प्रयास करें, तो भी इसे अच्छे स्तर का बनाने में कम-से-कम तीन-चार दशक का समय लग जाएगा।

प्रदूषण से होने वाले नुक़सान

अब तक पर्यावरण को लेकर किये गये अध्ययनों की रिपोट्र्स से यह पता चलता है कि पर्यावरण प्रदूषित होने से पशु-पक्षियों और इंसानों से लेकर हर तरह के जीवन को नुक़सान पहुँच रहा है। हमारा पर्यावरण इतना प्रदूषित हो चुका है कि इसके प्रभाव से समुद्री जीवों और वनस्पतियों का जीवन भी ख़तरे में पड़ता जा रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण से प्राकृतिक असन्तुलन पैदा हो रहा है, जिससे बीमारियाँ बढऩे के साथ-साथ पशु-पक्षियों और लोगों की शारीरिक क्षमता कमज़ोर होती जा रही है। इससे धरती का चक्र बिगड़ रहा है, जिससे वह अपनी पाश्चुरीकृत क्षमता को खोती जा रही है। साथ ही तरह-तरह के प्रदूषणों से कई तरह की विषैली गैसें पैदा हो रही हैं और जीवनदायिनी गैसों की मात्रा घट रही है। कई वैज्ञानिक तो पर्यावरण प्रदूषण के चलते यहाँ तक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर इसी प्रकार धरती पर ऑक्सीजन घटती गयी, तो आने वाले समय में हमारी पीढिय़ों को जीवनदायिनी ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए अपनी पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर लादना पड़ सकता है।

कोरोना महामारी में ऑक्सीजन के लिए हुई मारामारी से इसे समझा जा सकता है। अपने फ़ायदे के लिए लोगों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और दुरुपयोग से ख़ुद के लिए ही मुसीबतें पैदा की हैं। पर्यावरण प्रदूषण के चलते इंसानों के साथ-साथ कई तरह के पशु-पक्षियों का जीवन संकट में है। कई प्रकार के पशु-पक्षी विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं। पर्यावरण में तेज़ी से बढ़ रही क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस (सीएफसी) के चलते ओजोन का विघटन तेज़ी से हो रहा है। सन् 1980 में ही वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि ओजोन स्तर का विघटन धरती के चारों ओर हो रहा है। स्थिति यह है कि दक्षिण ध्रुव के विस्तार में ओजोन स्तर का विघटन 40 से 50 फ़ीसदी तक हो चुका है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों की बढ़ती आबादी के चलते बढ़ते शहरीकरण के चलते ओजोन परत में छेद बढ़ रहे हैं। अब तक के अध्ययनों का निचोड़ बताता है कि इंसानों की बढ़ती आबादी और उसकी ज़रूरतों को पूरा करने की होड़ से पर्यावरण को पहुँचने वाला नुक़सान भी बढ़ता जा रहा है। इंसानी आबादी कम करने के साथ-साथ इंसानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ख़तरनाक चीज़ों पर भी पाबंदी ज़रूरी है, जिसमें प्लास्टिक, मिलावटी खाद्य पदार्थ और नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

पर्यावरण संरक्षण क़ानून

पर्यावरण संरक्षण को लेकर दुनिया भर में कई क़ानून बने हैं; लेकिन उनका कड़ाई से पालन न होने के चलते पर्यावरण को होने वाले नुक़सानों को आज तक नहीं रोका जा सका है। भारत में पर्यावरण संरक्षण को लेकर सन् 1969 में केंद्र सरकार ने एक विधेयक तैयार किया था, जिसे 30 नवम्बर, 1972 को संसद में प्रस्तुत किया गया। दोनों सदनों से पास होने के बाद इस विधेयक को 23 मार्च, 1974 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली।

जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम-1974 के नाम से बना यह क़ानून 26 मार्च, 1974 से पूरे देश में लागू है; लेकिन जल प्रदूषण आज चरम पर है। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण के लिए वायु प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम-1981 बना, जो 16 मई, 1987 से क़ानून के रूप में देश भर में लागू है। इस क़ानून के तहत मुख्यत: वाहनों और कारख़ानों से निकलने वाले धुएँ और गन्दगी का स्तर निर्धारित करना और उसे नियंत्रित करना है।

इसके अलावा सन् 1952 में भारतीय वन्यजीव बोर्ड का गठन किया गया। इस बोर्ड के अंतर्गत वन्य-जीवन पार्क और अभयारण्य बनाये गये। इसके बाद वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम-1972 बना, जिसके तहत शेरों के संरक्षण के लिए सन् 1972 में, बाघों के संरक्षण के लिए 1973 सन् में, मगरमच्छों के संरक्षण के लिए 1984 में और इसी तरह अन्य पशुओं के संरक्षण के लिए अलग-अलग समय पर अधिनियम बने। इसके बाद वन संरक्षण अधिनियम-1980 भी बना। इसके बावजूद भारत में न तो पर्यावरण संरक्षित हो पा रहा है और न ही इसे प्रभावित करने वाले लोगों को सजा दी जा रही है।

कैसे बचेगा पर्यावरण?

पर्यावरण का संरक्षण तभी सम्भव है, जब लोगों में इसके प्रति जागरूकता पनपेगी और ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी निभाएँगे। इसके लिए सबसे पहले लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना होगा और उन्हें पर्यावरण ख़राब होने से होने वाले नुक़सानों को बताना होगा। स्कूल स्तर पर ही पर्यावरण के बारे में बच्चों को पढ़ाना होगा। हर आदमी को पौधे लगाने के लिए प्रेरित करना होगा और बताना होगा कि वह हर साल दो-चार पौधे लगाने का संकल्प लेने के साथ-साथ वृक्षों को काटने से बचाए। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण भागीदारी किसानों की हो सकती है, जो हमेशा से प्रकृति और पर्यावरण प्रेमी रहे हैं। किसानों के साथ-साथ शहरी लोगों को पर्यावरण के प्रति सबसे ज़्यादा जागरूक करने की ज़रूरत है। उन्हें बताना होगा कि वृक्षविहीन कंक्रीट के शहरों में ज़्यादा-से-ज़्यादा पौधरोपण करना होगा।

यह बड़ी सच्चाई है कि शहरी सभ्यता में रहने वाले ख़ुद को आधुनिक और समझदार ज़रूर समझते हैं; लेकिन पर्यावरण को सबसे ज़्यादा नुक़सान शहरी लोग ही पहुँचा रहे हैं। यह कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति सबसे ज़्यादा लापरवाह यही शहरी लोग हैं, जिनकी मूर्खता का नतीजा पूरी दुनिया भुगत रही है। जंगलों को काटकर इन कंक्रीट के जंगलों को बढ़ाने की होड़ ने पर्यावरण को जो नुक़सान पहुँचाया है, उसकी भरपाई करना आसान नहीं है।

इसके अलावा जंगलों को माफिया के साथ-साथ आग से बचाना होगा। इसमें कोई दो-राय नहीं कि आदमी के लिए अब आधुनिक सुविधाओं को छोड़ पाना सम्भव नहीं है; लेकिन आधुनिकता के साथ-साथ पूर्वजों के शिक्षाओं पर भी हर आदमी को चलना होगा, अन्यथा जीवन संकट में पड़ जाएगा। जैसे कि कारख़ानों को ख़त्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि आधुनिक ज़रूरतों को पूरा करने में इनका बड़ा योगदान है; लेकिन कारख़ानों से होने वाले प्रदूषण को कम ज़रूर किया जा सकता है।

इसी तरह धरती पर फैलने वाले प्रदूषणों को रोकने का प्रयास भी किया जा सकता है। आज पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाले सभी तरह के प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, थल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि को कम करने की आवश्यकता है, अन्यथा आने वाली पीढिय़ों के लिए जीवन जीना और भी दुश्वार होता जाएगा। इसका सबसे अच्छा उपाय इंसानों की बढ़ती आबादी को रोकना और पेड़-पौधों की संख्या को बढ़ाना है। इसके अलावा हर किसी को अपने स्तर पर जलवायु शुद्धिकरण में योगदान देना होगा, तभी हमारा पर्यावरण अच्छा होगा और विश्व पर्यावरण दिवस व विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस मनाना सफल हो सकेगा।

जिस्म का जंजाल, कितना बवाल

सुहागसेज पर मेवर की आँखें दरवाज़े पर लगी थीं। रोशनियों की झिलमिल और ढोल की थाप पर रसीले गीतों की गूँज थी। प्रियतम की पदचाप सुनने को बेचैन उसके कान दरवाज़े पर लगे थे। लेकिन फिर भी पिया मिलन की पुलक से रोमांचित मेवर का मन पता नहीं क्यों शंकाओं से भरा था। शादी के बाद अपनी सहेलियों के गुलाब खिले चेहरों को देखकर उसने भी सोचना शुरू कर दिया था कि कब उसके जीवन में भी ऐसी घड़ी आएगी! आज वह दिन आ गया और 19 वर्षीय मेवर का मन कल्पनाओं के आकाश में उड़ान भर रहा था, तभी दरवाज़ा खुला। वह लज्जा और संकोच से अपने आप में सिमटकर रह गयी। भीतर आने वाला उसका ही पति मुंजाल था। उसके हाथों में सूत के धागों से बनी हुई कूकड़ी थी। अब तक पिया मिलन के सपनों में खोई मेवर कूकड़ को देखकर सिहर कर रह गयी।

पति मिलन की आस में पुलकता मन एकाएक चीत्कार कर उठा। इससे पहले कि वह कुछ और सोच पाती, उसका सर्वस्व पति के बाहुपाश में समा चुका था। उसे सिर्फ़ इतना अहसास था कि वह पवन के हिंडोले में सवार आकाश की ऊँचाइयों को छू रही है, तभी उसे लगा जैसे वो धड़ाम से मुँह के बल गिरी। पति मुंजाल उसे धकेलकर बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल गया। परिवार के लोगों के बीच में जाकर उसने तेज़ आवाज़ में कहा कि मेवर चरित्रहीन है। सुहाग सेज पर पति समागम के दौरान मेवर की देह के नीचे रखी कूकड़ी रक्त से नहीं भीगी थी। सुहाग सेज पर यह मेवर का कौमार्य परीक्षण था, जिसमें वह कथित तौर पर फेल हो गयी थी।

आज के आधुनिक युग में अक्षत कौमार्य के परीक्षण की प्रथा बांसवाड़ा के आदिवासी परिवारों में अभी भी क़ायम है। स्त्री सम्मान को आहत करने वाली इस प्रथा पर नारी संगठन बस बोलते भर हैं; लेकिन करते कुछ नहीं। एक घटना फ़िल्मी सी है; लेकिन है सच। एक डॉक्टर को किसी महिला से प्रेम हुआ। राज़ खुला, तो प्रेमिका और उसके पुत्र को उसी विला में जला दिया गया, जो डॉक्टर ने रहने को दिया था। इन हत्याओं का आरोप उसी डॉक्टर की माँ और पत्नी पर लगा। नतीजतन तीनों को जेल भेज दिया गया। प्रेमिका का भाई बदले की ताक में था। आख़िर तीनों को जमानत मिलने के साल भर बाद प्रेमिका का भाई अपने एक साथी के साथ पहुँचा और बीच सड़क पर कार रुकवाकर डॉक्टर दम्पति को गोलियों से भून दिया।

प्रियंका जवान भी थी, और ख़ूबसूरत भी। बेशक वह तीन बच्चों की माँ बन गयी थी; लेकिन उसकी देह के कसाव में कोई कमी नहीं आयी थी। उसकी अपनी भावनाएँ थी। कुछ फ़िल्में भी देख चुकी थी, इसलिए मन करता था कि बुद्धिप्रकाश भी सजीले नौजवान की तरह बन ठन कर रहे। फ़िल्मी हीरो सरीखी दीवानगी की तरह उससे प्यार करे। हालाँकि बुद्धिप्रकाश ने अभी 35 की उम्र ही पार की थी; लेकिन मेहनतकश खेती किसानी के गोरखधंधे में खटने के कारण उस पर थकान हावी हो चली थी। इसलिए पत्नी की इच्छाओं की गहराई भाँपने का उसे कभी ख़याल तक नहीं आया। प्रियंका को अपने मेहनतकश पति से पसीने की दुर्गंध आती थी। चढ़ती उम्र और बढ़ती आकांक्षाओं के साथ प्रियंका में पति के प्रति नफ़रत में इज़ाफ़ा होता चला गया। संयोग ही रहा कि उसके बग़ल वाले मकान में रहने के लिए एक युवक महावीर मीणा आ गया। महावीर छैल-छबीला था और प्रियंका के सपनों के मर्द की तासीर पर खरा उतरता था। प्रियंका अक्सर अपने पति बुद्धिप्रकाश को उसका उदाहरण देते हुए कहती थी, तुम भी ऐसे सजधज कर क्यों नहीं रहते? बुद्धिप्रकाश सीधा-सादा गृहस्थ इंसान था। इसलिए पत्नी की बात को हँसकर टाल देता। अभी महावीर पर गृहस्थी की ज़िम्मेदारी नहीं पड़ी; जब पड़ेगी तो वो भी सजना-सँवरना भूल जाएगा। पड़ोसी के नाते महावीर की बुद्धिप्रकाश से मेल-मुलाकात बढ़ी, तो गाहे-बगाहे महावीर का आना-जाना भी बढ गया। अक्सर प्रियंका के आग्रह पर वहीं खाना भी खा लेता था। असल में महावीर की नज़रें भी प्रियंका पर थीं। उसकी पारखी नज़रों ने प्रियंका के मन को भाँप लिया। लेकिन सवाल था कि पहल कौन आगे बढ़े? महावीर दोपहर में अक्सर वक़्त गुजारने के लिए अपने दोस्त की फल-सब्ज़ी की दूकान पर बैठ जाता था। दोस्त को सहूलियत थी कि अपने ज़रूरी काम निपटाने के लिए महावीर के भरोसे दुकान छोड़ जाता था। एक दिन दुकान पर अकेला बैठा था, तो प्रियंका सब्ज़ी ख़रीदने पहुँची। लेकिन महावीर ने फल-सब्ज़ी के पैसे नहीं लिए। प्रियंका ने पैसे देने चाहे, तो महावीर मुस्कुराकर बोला- ‘तुम्हारी मुस्कुराहट में दाम वसूल हो गये। सारी दुकान ही अपनी समझो। प्रियंका को शायद ऐसे ही मौक़े की तलाश थी। मुस्कुराकर कहा कि ऐसी दोपहरी में दुकान पर बैठने की बजाय घर आओ। प्रियंका ने मुस्कुराकर निमंत्रण दिया, तो महावीर हँसकर बोला कि ख़ातिरदारी का वादा करो, तो आऊँ। मेरी तरफ़ तो मेहमानवाज़ी में कमी नहीं रहेगी, तुम अकेले में आकर देखो तो -प्रियंका ने हँसकर कहा। खुला निमंत्रण देख महावीर आगे बढ़ गया।

मुहाना थाना पुलिस को हाल ही में यूनिक सफायर अपार्टमेंट में रहने वाले पंजाब नेशनल बैंक की मार्केटिंग मैनेजर सुरभि कुमावत के शव के पास एक सुसाइड नोट मिला- ‘मुझे कोई समझता है, हर कोई आहत करना चाहता है। मैं सिर्फ़ ख़ुश रहना चाहती हूँ और मैं किसी की जिन्दगी में परेशानी भी नहीं बनना चाहती। मेरा ख़ुद का पति मुझसे नफ़रत करता है और मुझे छोडऩे की धमकी देता है। मेरा इस्तेमाल स्वार्थ के लिए किया गया। मैं जा रही हूँ सब छोड़कर…। पुलिस ने बताया कि सुरभि कुमावत ने गलता गेट स्थित बासबदनपुरा निवासी साहिद अली से प्रेम विवाह किया था।

एक लड़की शाम को अपने दफ़्तर से लौट रही थी। वह रोज़ की तरह बस से उतरकर अपने घर की ओर जा रही थी। बस स्टेंड और उसके घर के बीच कुछ अधबनी इमारतें थीं। बस से उसके पीछे-पीछे एक और शख़्स उतरा। झुटपुटा हो रहा था। अचानक उस शख़्स ने लड़की को पीछे से दबोच लिया। उसका मुँह दबाकर उसे पास के सुनसान इलाक़े में ले जाकर दुष्कर्म किया और लड़की को बदतर हालत में छोड़कर चलता बना। गर्मी की एक दोपहर एक किशोर युवक पड़ोसी के फ्लैट में गया, जिसका दरवाज़ा खुला था। उसने घर की स्त्री से पीने के लिए पानी माँगा। महिला जब पानी लाने रसोई की ओर गयी। किशोर ने घर का दरवाज़ा धीरे से बन्द कर दिया। किशोर स्त्री के पीछे-पीछे रसोई तक चला आया। वहाँ उस किशोर ने उस प्रौढ़ा स्त्री के साथ दुष्कर्म किया। स्त्री ने बहुत शोर मचाया; लेकिन गर्मी की दोपहर के सन्नाटे में कौन सुनता। दुष्कर्म के बाद युवक उस स्त्री को धमकी देता गया कि यदि वह किसी से कहेगी, तो उसको बेटी के साथ भी यही करेगा और उन लोगों को मार डालेगा।

लेखिका अर्चना वर्मा कहती है कि स्त्री विमर्श का मतलब स्त्री की नज़रों से देखी समूची दुनिया का लेखा-जोखा और उसे गहराई से बदलने का कार्यक्रम है। असल में जब तक हम देह मुक्ति के अर्थ और अभिप्राय परिभाषित नहीं करते, तब तक उन विकट समस्याओं का समाधान क्या? पहचान तक सम्भव नहीं, जिनकी बुनियाद स्त्री देह में है। चर्चित लेखक और वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा स्त्री चरित्र को लेकर रहस्य अनावृत किया है। एक विश्वसनीय पड़ताल में महिलाओं के उत्पीडऩ और यौन शोषण अधिकांश मामले झूठे पाये जाएँ। हाल ही में महिला आयोग की अध्यक्ष रेहाना चिश्ती ने कहा कि आयोग के पास पहुँचे यौन शोषण के अधिकांश मामले झूठे पाये गये है। उन्होंने कहा कि इनमें 51 महिलाओं को तो चिह्नित भी कर लिया है, जो झूठ का पुलिंदा साबित हुई। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री गहलोत भी यह बात कह चुके हैं। लेकिन बावजूद इसके दुष्कर्म के मामलों पर राजनीति का चक्का चलाने वाली भाजपा इसे मानने को तैयार नहीं। यहाँ प्रख्यात लेखक नरेंद्र सैनी की यह टिप्पणी बहुत कुछ कह जाती है कि बोल्डनेस का सन्दर्भ बदला है जिस शरीर की वजह से पुरुष समाज उन्हें चीज़ समझता है, उसी शरीर को हथियार बनाकर स्त्री मर्दों को सबक़ सिखाना जान गयी है।

गोहाटी उच्च न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में कहा है कि सिंदूर लगाने और (शंख से बनी स$फेद चूड़ी पहनने से इनकार करना, इस बात का संकेत है कि पत्नी अपनी शादी को स्वीकार नहीं कर रही है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक पति की ओर से दायर तलाक की अपील को स्वीकार कर पारिवारिक न्यायालय के फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा और न्यायाधीश सौमित्रा सैक्रिया की पीठ ने कहा कि हिन्दू रीति-रिवाज़ों के अनुसार शादी के बाद महिला सिंदूर शाखा से महिला के इन्कार करने से यह प्रतीत होता है कि उसने विवाह को बिल्कुल अस्वीकार कर दिया है। नतीजतन उच्च न्यायालय ने दहेज़ प्रताडऩा के केस में पति को बरी कर दिया।

कोरियोग्राफ एलिसन कानुगो की शादी अजय क़ानूगी से हुई थी। लेकिन शादी के 12 साल बाद वे दो बच्चों के साथ यह कहते हुए अलग हो गयी कि यह रिश्ता दोस्ती पर नहीं शारीरिक आकर्षण पर आधारित था। दोनों के बीच अलगाव रिश्ते में आयी ऊब की वजह से हुआ।

पारम्परिक प्रथाओं, इतर वैवाहिक सम्बन्धों, पेशाचिक हवस, दाम्पत्य जीवन में ऊब अथवा आर्थिक आज़ादी मिलने त्रासद वैवाहिक जीवन से पल्ला झाडऩे की घटनाएँ बढ़ रही हैं। कुल मिलाकर स्त्री के ख़िलाफ़ एक संरचनात्मक हिंसा है। कहीं वे ख़ुद ऐसे हालात पैदा करती हैं, तो कहीं कुचक्र का शिकार होती हैं। स्त्री की योनिकता को बाजारू बनाने की रही-सही कसर स्त्री विमर्ष पर कलम चलाने वाली लेखिकाओं ने पूरी कर दी है। छोटे कपड़े पहनने की वर्जना से इतर उनकी देह-दर्शन की लालसा ने तो कोढ़ में खाज का काम किया है। इसे रोकने की तमाम कोशिशें स्त्री का अपनी आज़ादी में दख़लंदाज़ी मानती हैं। अभिनेत्रियों ने तो अंर्तवस्त्रों को ही तिलांजलि देकर स्त्री हिंसा को प्रेरित करने वाले शोलों को और भड़काऊ बना दिया है।

प्रख्यात चेखिका मैत्रेयी पुष्पा का कथन चौंकाने वाला है कि ‘ये भूचाल उस देश में आया हुआ है, जहाँ कन्याओं का पूजन होता है।’ वह एक कहावत का उल्लेख करती हैं कि एक बुढिय़ा से पूछा गया कि औरत की सच्चाई क्या है? बुढिय़ा ने कहा- ‘औरत की सच्चाई के बारे में जितना ज़्यादा छिपाया जा सके, उतना ही अच्छा है।’ महिलाओं के बारे में असंवैधानिक टिप्पणियाँ करने वाले अधिकारियों को कोसते हुए राजनेता वृंदा करात अदालतों से संज्ञान लेने की बात करती हैं, जो कहते हैं कि बलात्कार से बचना सम्भव न हो, तो उसका आनन्द लेना चाहिए। इस पर एक शे’र आयद होता है-

‘बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल,

कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का।’

दोहरा अत्याचार, दुष्कर्म पीडि़त महिलाओं की टू फिंगर जाँच मामला

सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्य पीठ ने 31 अक्टूबर को एक मामले की सुनवाई के दौरान टू फिंगर टेस्ट को लैंगिकतावादी, प्रतिगामी बताते हुए इसे फिर अनुचित बताया और टिप्पणी की कि दुष्कर्म पीडि़त महिलाओं के लिए यह जाँच दोहरा आघात है। उनका अपमान है और उनकी गरिमा के ख़िलाफ़ है। दरअसल इस बार भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी नौ साल पुरानी स्थिति यानी राय को ही सरकार, चिकित्सिक संस्थाओं, कार्यपालकों व समाज के सामने रखा है। सर्वोच्च न्यायालय इस टू फिंगर टेस्ट को बार-बार अस्वीकार करता है, इस पर रोक लगाता है। लेकिन इसके बावजूद इस अवैज्ञानिक जाँच से यौन-हिंसा या बलात्कार की शिकार महिलाओं को अपमानित किया जाता है। इस नज़रिये के पीछे पुरुष प्रधान समाज एक मज़बूत कारक है।

सवाल यह है कि जब सर्वोच्च न्यायालय इस पर रोक लगा चुका है। स्वास्थ्य मंत्रालय भी इस पर रोक लगाने सम्बन्धी दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। फिर जिनके कन्धों पर इसे अमल में लाने की ज़िम्मेदारी है, वे क्या कर रहे हैं? एक बात यह भी है कि चिकित्सा समुदाय से जुड़े पेशेवर इस जाँच की अवैज्ञानिक प्रवत्ति को लेकर कितने जागरूक हैं। सवाल यह भी है कि समय-समय पर महिलाओं के प्रति जो लैंगिकतावादी, प्रतिगामी टिप्पणियाँ सुनायी देती हैं, उन पर रोक कैसे लगेगी? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने इसी 31 अक्टूबर को चेतावनी दी थी कि ऐसी जाँच करने वाले व्यक्तियों या डॉक्टरों को दोषी ठहराया जाएगा।

दरअसल न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने 18 साल पुराने एक दुष्कर्म के मामले में निचले न्यायालय की दोषसिद्धि वाले फ़ैसले को बहाल रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा बरी किये गये आरोपी को दोषी क़रार देते हुए फ़ौरन हिरासत में लेने का आदेश दिया। दोषी को हत्या के मामले में उम्र क़ैद व दुष्कर्म के मामले में 10 साल सश्रम कारावास की सज़ा दी। मामले को जानने के लिए 18 साल पीछे लौटना होगा। झारखण्ड के नारंगी गाँव में 7 नवंबर, 2004 को शैलेंद्र कुमार नामक एक युवक ने घर में घुसकर एक नाबालिग़ लड़की से दुष्कर्म किया और फिर उस पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। उसका अस्पताल मेडिकल बोर्ड के द्वारा टू फिंगर टेस्ट किया गया। युवती ने पुलिस के समक्ष दिये अपने बयान में आरोपी के बारे में बताया। यह बात दीगर है कि मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान देने से पहले ही पीडि़ता की मौत हो गयी।

इस सन्दर्भ में भी सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि मृत्यु पूर्व पीडि़त का बयान अहम है। इसे केवल इस आधार पर ख़ारिज नहीं कर सकते कि बयान पुलिस ने दर्ज किया। बयान साबित करने वाले तथ्य सत्यता दर्शा रहे हैं, तो पुलिस को दिया अन्तिम बयान भी स्वीकार्य और अहम है। देवघर ज़िला न्यायालय ने इस मामले में आरोपी को दोषी बताते हुए सन् 2006 में उसे उम्र क़ैद की सज़ा सुनायी। आरोपी ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में अपील की और उच्च न्यायालय ने टू फिंगर टेस्ट और सुबूतों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया। राज्य पुलिस ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी को दोबारा दोषी क़रार दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी को हत्या के मामले में उम्र क़ैद और दुष्कर्म के मामले में 10 साल सश्रम कारावास की सज़ा दी। इस सज़ा के अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान टू फिंगर टेस्ट जारी रहने पर जो चिन्ता ज़ाहिर की है, वह वाजिब है। पीठ ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि इस न्यायालय ने बार-बार दुष्कर्म और यौन उत्पीडऩ के आरोपों के मामलों में टू फिंगर टेस्ट के इस्तेमाल को रोका है।

यह टेस्ट अवैज्ञानिक है और पीडि़त महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाता है। यह जाँच यौन उत्पीडऩ व दुष्कर्म पीडि़ता के बारे में यह जानने के लिए किया जाता है कि पीडि़त यौन रूप से सक्रिय है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि एक महिला की गवाही का सम्भावित मूल्य उसके यौन इतिहास पर निर्भर नहीं करता। न्यायालय ने कहा कि वह पहले भी कह चुका है कि किसी व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्धों का पूर्व इतिहास और चरित्र उसे दुष्कर्म करने की मंज़ूरी के रूप में नहीं देखा जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि यह कहना संकुचित सोच को दर्शाता है कि किसी महिला के साथ दुष्कर्म होने की बात पर इसलिए विश्वास नहीं किया जा सकता कि क्योंकि वह यौन रूप से सक्रिय रही है। सन् 2012 में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म के बाद गठित सेवानिवृत्त न्यायाधीश जे. एस. वर्मा समिति ने भी अपनी सिफ़ारिशों में इस जाँच को बन्द करने के लिए कहा था।

ग़ौरतलब है कि इन्हीं सिफ़ारिशों के मद्देनज़र सन् 2013 में आपराधिक क़ानून में संशोधन किया गया था। धारा-53(ए) को साक्ष्य क़ानून में जोड़ा गया था कि पीडि़ता का पूर्व यौन अनुभव यौन अपराध सिद्ध करने के लिए प्रासगिंक नहीं होगा। सन् 2013 में ही सर्वोच्च न्यायालय ने लिलु राजेश बनाम हरियाणा सरकार के मामले में कड़ा रुख़ अपनाते हुए इस पर रोक लगाने सम्बन्धी आदेश जारी किये थे। सन् 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यौन उत्पीडऩ की शिकार महिलाओं की जाँच के लिए कुछ अहम दिशा-निर्देश जारी किये थे। इनमें एक यह भी था कि यौन हिंसा या दुष्कर्म को स्थापित करने के लिए टू फिंगर टेस्ट नहीं होना चाहिए। लेकिन ध्यान देने वाला बिन्दु यह है कि यह महज़ एक दिशा-निर्देश है, इसका पालन करना क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है। सन् 2019 में ही क़रीब 1,500 दुष्कर्म पीडि़त महिलाओं और उनके परिजनों ने सर्वोच्च न्यायालय में शिकायत की थी कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद यह टेस्ट हो रहा है। याचिका में यह जाँच करने वाले डॉक्टरों का लाइसेंस रद्द करने की माँग की गयी थी। यह जाँच महिलाओं की निजता, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों का उल्लघंन है। बीते एक साल में देश की संवैधानिक पीठों यानी न्यायालयों में इस जाँच की आलोचना कर चुकी है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सन् 2013 के बहुचर्चित शक्ति मिल दुष्कर्म के मामले में ऐसी ही राय से अवगत कराया। फिर मद्रास उच्च न्यायालय ने इस साल अप्रैल में यही रुख़ अपनाया और राज्य सरकार को इस जाँच पर प्रतिबंध लगाने के आदेश दिये। तीसरा सर्वोच्च न्यायालय का 31 अक्टूबर वाला आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फ़ैसले में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को इस जाँच को रोकने के लिए कुछ अहम निर्देश दिये हैं कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सन् 2014 में बनाये गये दिशा-निर्देश सभी सरकारी व निजी अस्पतालों में वितरित हो, यह सुनिश्चित करना। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करना, ताकि उन्हें यह बताया जा सके कि यौन हिंसा व दुष्कर्म पीडि़ताओं की जाँच के लिए उचित प्रक्रिया अपनायी जाए। मेडिकल स्कूलों के पाठ्यक्रम की समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि यौन हिंसा और दुष्कर्म पीडि़त महिलाओं की जाँच के लिए निर्धारित प्रणाली में टू फिंगर टेस्ट न हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि उसके फ़ैसले की प्रतियाँ राज्य के स्वास्थ्य सचिवों और डीजीपी के साथ साझा की जाएँ।

इसमें कोई दो-राय नहीं कि क़ानून की अपनी अहमियत होती है। लेकिन सवाल यह है कि टू फिंगर टेस्ट पर रोक पहले भी सर्वोच्च न्यायालय लगा चुका है, तो भी उस पर ठीक तरह से अमल क्यों नहीं हो रहा है? इस दिशा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अधिक गम्भीर क़दम उठाने चाहिए। केंद्र सरकार को इस दिशा में एक केंद्रीय क़ानून बनाने की पहल करनी चाहिए। ऐसा क़ानून बनने से राज्य सरकारें इसे लागू करेंगी। हो सकता है कि इससे ज़मीनी हालात में कुछ सुधार देखने को मिले। वैसे यह कहना भी सही है कि महज़ क़ानून बनाने से क्या होगा? इसके लिए समाज, आर्थिक संस्थाओं, शैक्षणिक संस्थाओं, राजनीति और रोज़गार के अवसरों में महिलाओं को बराबरी के मौक़े देने के साथ-साथ उनके प्रति भेदभाव को दूर करने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों से अधिक हासिल नहीं हो रहा।

हेमंत सोरेन का मास्टर स्ट्रोक या राजनीतिक ब्रेकडाउन!

आजकल अगर झारखण्ड में किसी से पूछो कि आजकल क्या चल रहा, तो लोग कहते हैं- राजनीति। दरअसल झारखण्ड पिछले कई महीनों से अनिश्चितता के भँवर में फँसा है। एक ओर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता पर संकट और दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई ने झारखण्ड को विकास की पटरी से उतार दिया है। इन झंझावतों के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एक के बाद एक ऐसे फ़ैसले लेते जा रहे हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से मज़बूत बना सके। तो विपक्षी भाजपा वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए आन्दोलनरत है और उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रही है।

इसी क्रम में राज्य के सबसे दो महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील मामले को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छेड़ दिया है। उन्होंने स्थानीयता और आरक्षण सम्बन्धित दो विधेयक को 11 नवंबर को विधानसभा से पारित करवा लिया। दोनों ही ऐसा मुद्दा है, जिस पर विपक्षी भी विरोध नहीं कर सके। हालाँकि विपक्ष के साथ-साथ गठबंधन दल के झामुमो, कांग्रेस और राजद में भी कई नेता इसके पक्षधर नहीं हैं। लेकिन राज्य के वोट बैंक को देखते हुए किसी में खुल कर विरोध करने की ताक़त नहीं है। इन दो फ़ैसलों को राजनीतिज्ञ अपने-अपने हिसाब से आकलन कर रहे हैं। कोई इन्हें हेमंत सोरेन का मास्टर स्ट्रोक मान रहा, कोई राजनीतिक करियर में ब्रेक डाउन की सम्भावना जता रहा।

सियासी हथियार

झारखण्ड में पिछले 22 साल से स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण हर दल के लिए सियासी हथियार रहा है। झारखण्ड में सन् 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार मानने की माँग यहाँ के लोग झारखण्ड गठन के बाद से ही करते रहे हैं। यहाँ के आदिवासी और मूलवासी हमेशा से कहते रहे हैं कि झारखण्ड में बाहर से आकर बसे लोगों ने यहाँ के स्थानीय बाशिंदों के अधिकारों का अतिक्रमण किया है, उनका शोषण किया है। लिहाज़ा यहाँ की स्थानीय नीति सन् 1932 के खतियान के आधार पर बनायी जानी चाहिए। सरकारें आती-जाती रहीं और इस मुद्दे पर केवल सियासत होती रही।

अपने बचाव में सरकार

भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी के शासन-काल में 2002 में राज्य की डोमिसाइल पॉलिसी घोषित की गयी थी। उसके तहत भी 1932 के सर्वे सेटलमेंट को स्थानीयता का आधार माना गया था। लेकिन वह फ़ैसला इतना विवादास्पद हो गया कि राज्य हिंसा की आग में जलने लगा और अंतत: बाबूलाल मरांडी को कुर्सी गँवानी पड़ी थी। उसके बाद झारखण्ड उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने इससे सम्बन्धित जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सरकार के उस निर्णय पर तत्काल रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय ने सरकार को कहा था कि वह अपनी स्थानीय नीति लेकर आये।

उसके बाद राज्य में बीते वर्षों में भाजपा के अर्जुन मुंडा, झामुमो के शिबू सोरेन, निर्दलीय मधु कोड़ा, झामुमो के हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकारें बनीं। किसी सरकार ने स्थानीय नीति नहीं बनायी। सरकारें इसे विवादास्पद मान कर इससे बचती रहीं। भाजपा के रघुवर दास के नेतृत्व में सन् 2016 में सरकार बनी, तो उन्होंने सन् 1984 को कटऑफ डेट मानते हुए स्थानीयता को परिभाषित किया। यानी सन् 1984 तक जो भी राज्य में आये उन्हें स्थानीय मान लिया गया। इस पर कोई ख़ास विवाद नहीं हुआ। राज्य में अभी यही लागू है। झामुमो सन् 2019 के विधानसभा चुनाव में सन् 1932 के आधार पर स्थानीयता का वादा करके मैदान में उतरा और सबसे बड़े दल के रूप में आया। झामुमो नेता हेमंत सोरेन के नेतृत्व में कांग्रेस और राजद की मदद से गठबंधन की सरकार बनी। हेमंत सरकार का तीसरा वर्ष पूरा होने वाला है। इस बीच सरकार ने विधानसभा से स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण विधेयक पारित करके एक बार फिर राजनीतिक हल चल बढ़ा दी है। ओबीसी आरक्षण 27 फ़ीसदी करने का मामला भी नया नहीं है। यह भी एक बड़े वोट बैंक का हिस्सा है। झामुमो हमेशा ओबीसी आरक्षण के सवाल पर भी बार-बार भाजपा को घेरता रहा कि उसने इसे घटाकर 14 फ़ीसदी कर दिया। यही कारण था कि ओबीसी आरक्षण को 27 फ़ीसदी तक बढ़ाने का प्रस्ताव भी राजनीतिक तौर पर बहुत आगे बढ़ चुका था, जिसे विधानसभा से पारित कराया गया।

दोहरा संकट

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर दोहरा संकट है। खान लीज मामले में एक ओर जहाँ उनकी विधानसभा की सदस्यता पर संकट है, वहीं उन पर ईडी की दबिश बढ़ती जा रही है। खनन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच में हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा ईडी की हिरासत में हैं। आईएएस पूजा सिंघल हिरासत में है। मुख्यमंत्री के प्रेस सलाहकार अभिषेक कुमार समेत कई लोगों से पूछताछ हो चुकी है। ईडी ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पूछताछ के लिए समन भेजा था। वह नहीं गये और तीन हफ़्ते का मोहलत माँगी थी। ईडी ने तीन हफ़्ते की मोहलत तो नहीं दी, लेकिन समन ज़रूर भेज दिया। उन्हें 17 नवंबर को ईडी कार्यालय पूछताछ के लिए बुलाया गया है। सूत्रों की मानें तो ईडी ने यह भी कहा है कि अगर इस बार नहीं हाज़िर हुए, तो विधि सम्मत कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री की सदस्यता पर राज्यपाल चुनाव आयोग समेत अन्य विधि विशेषज्ञों से राय ले चुके हैं। अब राज्यपाल के फ़ैसले का इंतज़ार किया जा रहा है।

राजनीतिक दाँव

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी आज तक डोमिसाईल पॉलिसी की आग की तपिश से बाहर नहीं निकल पाये हैं। माना जाता है कि सन् 2019 विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की ख़ुद की हार और भाजपा के केवल 24 सीटों पर सिमटने की एक वजह स्थानीयता को परिभाषित करना भी था। हमेशा से 1932 खतियान की वकालत करने वाले शिबू सोरेन अपने कार्यकाल में इसे नहीं छूआ। जिस वक़्त भाजपा और झामुमो के गठबंधन की सरकार थी, उस वक़्त हेमंत सोरेन ने इसी मुद्दे पर अर्जुन मुंडा की सरकार से समर्थन वापस लिया था। हेमंत सोरेन ने सन् 2013 में कांग्रेस की मदद से सरकार बनायी, तो स्थानीय नीति पर सुझाव देने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी और मामले को टाल दिया। वर्तमान हेमंत सरकार दिसंबर में तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने जा रही है। जब सरकार पर संकट बनी, तब स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण का राजनीतिक दाँव खेला और दोनों विधेयकों को विधानसभा से पारित किया, पर राज्य में कब लागू होगा, यह कहना मुश्किल है।

राजनीतिक भविष्य

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का दाँव कितना सटीक बैठेगा, यह तो वक़्त तय करेगा; लेकिन राजनीतिक पंडित इसे राज्य हित के रूप में क़तई मानने को तैयार नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दोनों ही मुद्दे स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण को एक बार फिर से राजनीतिक दाँव-पेंच में फँसा दिया गया है। उनका कहना है कि दोनों ही मामला राज्य का है। जिसे सीधे विधानसभा से पारित कर यहाँ तक की संकल्प जारी कर लागू किया जा सकता था; लेकिन इसे केंद्र के पाले में डाल दिया गया है।

विधेयक में साफ़ लिखा है कि केंद्र द्वारा नौवीं अनुसूची में शामिल करने के बाद यह लागू होगा। हेमंत सोरेन ने विधेयक को क़ानूनी दाँव-पेच से बचाने के नाम पर केंद्र के पाले में डाल दिया है। विपक्षी दल भाजपा भी अपनी रणनीति हर दिन बदल रही है। स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण दोनों ही मुद्दा एक बड़े वोट बैंक का हिस्सा है, इसलिए भाजपा विरोध तो नहीं कर रही; लेकिन इतनी आसानी से केंद्र द्वारा 9वीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाएगा इसकी भी सम्भावना कम है। निश्चित रूप से विधेयक की ख़ामियों को उजागर किया जाएगा। क्योंकि विधानसभा सदन में इस पर चर्चा नहीं हुई है। दो-तीन सदस्यों ने जो संशोधन का प्रस्ताव रखा, उसे ख़ारिज कर विधेयक को पारित कर दिया गया।

लिहाज़ा इसका हल जल्द निकलने वाला नहीं है। राज्य के लिए दोनों मुद्दे सियासी हथियार बने रहेगे। ऐसी स्थिति में हेमंत सोरेन का यह मास्टर स्ट्रोक साबित होगा, या भाजपा उनके राजनीतिक करियर का ब्रेकडाउन करने में सफल हो जाएगी, यह तो आगामी चुनाव के समय जनता को कौन कितना समझाकर अपने पाले में ला पाएगा? इस पर निर्भर ही करेगा। फ़िलहाल राज्य की जनता राजनीतिक दाँव-पेच में फँसी विकास की बाट ही जोह रही है।

हरियाणा आदमपुर उपचुनाव, भाजपा की जीत के मायने

हरियाणा के आदमपुर विधानसभा उपचुनाव में पहली बार ग़ैर-कांग्रेसी विधायक के तौर पर भाजपा के भव्य बिश्नोई ने 67,492 यानी लगभग 51.32 फ़ीसदी वोटों से जीतकर नयी इबारत लिखी है। इस सीट पर कुल 1, 31,523 वोट पड़े और कोई पाँच दशक से ज़्यादा के बाद यहाँ से ग़ैर-कांग्रेसी विधायक बना है। आदमपुर में मुक़ाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा।

मुक़ाबले में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के कुरड़ा राम नंबरदार को कुल 5,248 यानी लगभग चार फ़ीसदी वोट मिले और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्यासी सतेंद्र सिंह को केवल 3,420 यानी लगभग 10 फ़ीसदी वोट ही वोट मिले। दोनों की जमानत ज़ब्त हो गयी। दोनों प्रत्याशी कांग्रेस के सक्रिय नेता रह चुके हैं।

इनमें से कुरड़ाराम ने आदमपुर में टिकट न मिलने की वजह से इनेलो से चुनाव लड़ा, वहीं सतेंद्र सिंह एक बार इसी विधानसभा में कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ चुक हैं। इनेलो के प्रचार में पूर्व उप मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और ऐलनाबाद से पार्टी विधायक अभय चौटाला ने ख़ूब ज़ोर लगाया और प्रचार किया। वहीं आम आदमी पार्टी ने पजाब के बाद हरियाणा में ज़ोरदार आग़ाज़ के लिए कोशिश की।

आदमपुर सीट के लिए पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूरा ज़ोर लगाया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवत मान ने भी यहाँ रोड शो कर दम दिखाने की कोशिश की; लेकिन प्रत्याशी सतेंद्र सिंह को नहीं जिता सके। इसी आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर लगभग 10 फ़ीसदी मत हासिल किये थे। आदमपुर में वैसा प्रदर्शन पार्टी नहीं दोहरा सकी। यह उसके लिए झटके जैसा है। आदमपुर उपचुनाव में भव्य बिश्नोई की जीत के क्या कारण रहे होंगे, जबकि जगह-जगह उन्हें विरोध का सामना करना पड़ रहा था। किसान संगठनों ने प्रचार के दौरान उन्हें काले झण्डे तक दिखाये थे। बावजूद इसके उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश ‘जेपी’ को 15,740 मतों से हरा दिया। सन् 2019 के विधानसभा उपचुनाव में उनके पिता कुलदीप बिश्नोई को कांग्रेस प्रत्याशी क तौर पर इतने फ़ीसदी ही मत मिले जबकि भाजपा प्रत्याशी सोनाली फोगाट को 34,000 से ज़्यादा मत मिले। अब भाजपा प्रत्याशी को लगभग दोगुने मत मिले। इस बार जजपा भी भाजपा के साथ में है; लेकिन उसका वोट बैंक यहाँ ऐसा नहीं कि अन्तर दोगुना हो जाए। यह सब भजनलाल परिवार की विरासत को जाता है।

आदमपुर में मतदान किसी पार्टी विशेष को नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष के लिए हुआ, जिसका फ़ायदा भव्य को मिला। अगर भव्य की जीत नहीं होती, तो कुलदीप बिश्नोई का राजनीतिक भविष्य ख़तरे में पड़ जाता और कांग्रेस इसे विधानसभा आम चुनाव का सेमीफाइनल मान लेती। हार से कांग्रेस को जहाँ एक सीट का नुक़सान हुआ। वहीं इससे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिह हुड्डा के बेटे और उनके राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र हुड्डा को ज़ोरदार झटका लगा है। उपचुनाव में प्रचार से पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला, तोशाम से विधायक किरण चौधरी ने दूरी बनाये रखी।

          

उधर भाजपा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ समेत मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने प्रचार में कहीं कोई कमी नहीं रखी। जजपा का हलक़े में कोई विशेष जनाधार नहीं है, बावजूद इसके उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने प्रचार किया। दुष्यंत हिसार से सांसद रह चुके हैं और इस नाते आदमपुर हलक़े में उनका कुछ प्रभाव तो है। आदमपुर हलक़ा कांग्रेस का नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल परिवार का अभेद दुर्ग है। इसी परिवार के दो सदस्यों ने ग़ैर-कांग्रेसी पार्टी हरियाणा जनहित पार्टी (हजकां) से जीत दर्ज कर बता दिया है कि यहाँ से उनके परिवार के वर्चस्व को तोडऩा आसान नहीं है। पूर्व विधायक कुलदीप बिश्नोई के पुत्र भव्य बिश्नोई को राजनीति का ज़्यादा अनुभव नहीं है। लोकसभा चुनाव में वह हिसार से अपनी क़िस्मत आजमा चुके हैं; लेकिन बुरी तरह से पराजित हुए।

आमदपुर विधानसभा उपचुनाव में उन्होंने जीत दर्ज कर बता दिया है कि यह हलक़ा उनके दादा भजनलाल और पिता कुलदीप की विरासत है, जिसे उन्हें आगे बढ़ाना है। आदमपुर विधानसभा हलक़ा इस परिवार का अभेद दुर्ग है। सन् 1967 से लगातार यहाँ से कांग्रेस प्रत्याशी ही जीतता रहा है। दो बार यहाँ से भजनलाल परिवार के सदस्य विधायक बने; लेकिन वे कांग्रेस की बजाय अपनी गठित पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के थे।

सन् 1967 में एच. सिंह कांग्रेस के विधायक बने, उसके बाद से वर्ष 2022 तक इसी परिवार का विधायक बनता रहा है। सन् 1968 से भजनलाल ने इस सीट पर जीत हासिल की, फिर तो उसक बाद लगातार छ: से ज़्यादा बार वह यहाँ बड़े आराम से जीत दर्ज करते रहे हैं। भजनलाल ने मुख्यमंत्री रहते इस हलक़े में हज़ारों लोगों को नौकरियाँ दीं। उनके कार्यकाल में हलक़े के कुछ गाँवों में तो बहुसंख्यक घरों में कोई-न-कोई सरकारी नौकरी में रहा। ये परिवार आज भी उनके मुरीद और पक्के मतदाता हैं। चाहे परिवार का सदस्य किसी भी पार्टी से खड़ा हो, उनके मत शर्तिया उन्हीं को जाते हैं। आमदपुर उपचुनाव में हार से कांग्रेस को एक सीट का नुक़सान हुआ, वहीं भाजपा के खाते में यह संख्या जुड़ी है; लेकिन इससे राज्य की राजनीति में किसी उलटफेर की कोई सम्भावना नहीं है।

आदमपुर में भजनलाल परिवार की 16वीं जीत के तौर पर भव्य बिश्नोई हैं। कहाँ राजनीति में अनुभवहीन और युवा ने तीन बार के सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और एक दौर में बाहुबली रहे जयप्रकाश ‘जेपी’ को अच्छे-ख़ासे अन्तर से शिकस्त दे दी। चुनाव से पहले भाजपा-जेजेपी के साझे प्रत्याशी भव्य को कमज़ोर आँका जा रहा था और राजनीति के जानकारों की राय में जेपी की जीत के दावे किये जा रहे थे; लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। इसकी एक वजह कांग्रेस की कुछ फूट भी रही। यह चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुलदीप बिश्नोई की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा था। दोनों में 36 का आँकड़ा चल रहा था और इसी के चलते कुलदीप ने विद्रोही तेवर अपना लिये थे। राज्यसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अजय माकन की हार के बाद कुलदीप एक तरह से हुड्डा की आँख की किरकिरी बन गये थे। आलाकमान ने उन्हें पार्टी के सभी पदों से हटा दिया था, ऐसे में कुलदीप के लिए पार्टी बेगानी हो गयी थी। वह अब ऐसी हालत में कांग्रेस में रह भी नही सकते थे।

इससे पहले कुलदीप ने भाजपा से निकटता बढ़ा ली थी। उनके कांग्रेस छोडऩे और और भाजपा में जाने की बातें होने लगी थी और हुआ भी ऐसा ही। सबसे बड़ा सवाल यह कि आख़िर कुलदीप ने खुद की बजाय बेटे को उपचुनाव में मैदान में क्यों उतारा? उनके राजनीतिक भविष्य का क्या होगा? अब कुलदीप कांग्रेस में नहीं, बल्कि भाजपा में है, जहाँ परिवारवाद पर बदिशें हैं। हरियाणा में विधानसभा के आम चुनाव होने हैं, तो क्या कुलदीप किसी दूसरी सीट से मैदान में उतरेंगे या फिर लोकसभा चुनाव में अपनी क़िस्मत आजमाएँगे? कुलदीप की रुचि राज्य की राजनीति में है और वह कई बार मुख्यमंत्री की दावेदरी तक जता चुके हैं। ऐसे में उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा? उन्होंने यह तो साबित करके दिखा दिया है कि आदमपुर उनके परिवार की विरासत है और वह यहाँ से किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

आदमपुर में बेटे की जीत का बड़ा श्रेय पिता कुलदीप बिश्नोई की रणनीति को भी जाता है। आदमपुर में भजनलाल परिवार की मुख़ालफ़त बड़े स्तर पर नहीं होती; लेकिन इस बार यह बहुत देखने को मिला। बावजूद इसके भव्य की जीत हुई। वैसे तो यह भाजपा की जीत ही माना जाएगा; लेकिन हक़ीक़त में यह भजनलाल परिवार के सदस्य की जीत मानी जाएगी। लोकसभा के आम चुनाव में भव्य इसी आदमपुर विधानसभा हलक़े के कई गाँवों में पिछड़े, जबकि उपचुनाव में ऐसा कुछ नहीं हुआ। भव्य भाजपा के सबसे युवा विधायक तो बन गये हैं। उन्हें अब हलक़े में पैठ जमानी होगी। उनके दादा के समय आदमपुर हलक़े का ख़ूब विकास हुआ। सन् 2005 के बाद से आदमपुर हलक़ा उपेक्षित ही रहा है। इस इलाक़े के लोगों को आज भी ऐसे नेता की तलाश है, जो इस इलाक़े का विकास कर सके। भव्य बिश्नोई से लोगों को उम्मीद है कि वह इस इलाक़े का बेहतर विकास करेंगे।

उपचुनाव की हार ने कांग्रेस को बड़ा सबक़ दिया है। केजरीवाल के मुफ्त बिजली और पुरानी पेंशन बहाल के वादे मतदाताओं पर कुछ असर नहीं छोड़ सके। इनेलो का प्रचार खेती से जुड़ों मुद्दों पर ज़्यादा रहा। अगर उपचुनाव का नतीजा उलटा होता, तो निश्चित तौर पर यह कांग्रेस के लिए सेमीफाइनल जीतने जैसा होता और पार्टी में नयी शक्ति का संचार होता लेकिन ऐसा हो नहीं सका। प्रतिष्ठा के इस उपचुनाव में भूपेंद्र सिंह हुड्डा आख़िर कुलदीप बिश्नोई की रणनीति से पार नहीं पा सके।

राज्यों की राजनीति का दस्तावेज़ है सेंसेक्स क्षेत्रीय दलों का

देश में एक दल से कई-कई दलों का उदय होता रहा है। यह राजनीतिक दलों के विखण्डन और उनसे नयी पार्टियों के उदय में भी देखा जाता है। शिक्षाविद् क्षेत्रीय दलों के उदय को एक जटिल और बहुआयामी घटना मानते हैं, जो वास्तव में 19वीं शताब्दी में देश में उभरी क्षेत्रीय चेतना और स्वतंत्रता के बाद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के बीच अंतर्सम्बन्ध का नतीजा है। आज़ादी से पहले भी पूरे देश में राजनीतिक दल बहुतायत में थे; लेकिन तब उनका एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजों के साम्राज्यवाद से आज़ादी हासिल करना था।

सामाजिक सुधार आन्दोलनों से राजनीतिक दल भी उभरे। हिन्दुओं और मुसलमानों के अपने स्वयं के राजनीतिक प्रभुत्व वाले आन्दोलन भी उठे, जिन्होंने बाद में ख़ुद को राजनीतिक दलों में स्थापित किया। संघीय व्यवस्था में लोकतांत्रिक राजनीति के प्रभुत्व के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय दलों का गठन असामान्य नहीं है। साथ ही एक विविध समाज में मतभेद भी क्षेत्रीय राजनीति पर अपना प्रभाव डालते हैं, जो नयी पार्टियों को जन्म देता है।

अकु श्रीवास्तव पत्रकारिता, सम्पादन और लेखन की लम्बी पारी खेल चुके हैं। उनकी नयी किताब ‘सेंसेक्स क्षेत्रीय दलों का’ राज्यों की राजनीति की जानकारी के लिहाज़ से एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।

यह जानना किसी के लिए भी बहुत दिलचस्प हो सकता है कि एक विशेष पार्टी का गठन कब हुआ? किन परिस्थितियों के कारण इसका गठन हुआ? और यह अब कैसे कार्य कर रही है? हिन्दी में अपनी तरह की यह पहली किताब है, जो इन सभी जिज्ञासाओं का समाधान करती है। पुस्तक में क्षेत्रीय दलों की चर्चा है; लेकिन विषय से परे जाकर और कांग्रेस से टूटकर बनी नयी पार्टियों के इतिहास को भी इसमें संजोया गया है, जो पुस्तक को अधिक प्रासंगिक बना देता है।

क्षेत्रीय दलों के उदय ने निर्विवाद रूप से भारत की चुनावी राजनीति की प्रकृति को बदला है। सन् 1990 के दशक की शुरुआत में और अन्त में क्षेत्रीय दलों की स्थिति में अभूतपूर्व वृद्धि के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी प्रतिस्पर्धा में शक्ति का एक नया सन्तुलन उभरा; और यह था- जातिगत और सामुदायिक राजनीति। क्षेत्रीय दलों ने वहाँ न केवल अपने-अपने राज्यों, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करायी। अब राज्यों के भीतर अपनी पसन्दीदा क्षेत्रीय पार्टी को मतदान करने वाले मतदाता लोकसभा चुनाव में अपना नज़रिया बदल लेते हैं। इस नये चलन को रेखांकित करते हुए क्षेत्रीय दलों की दिलचस्प कहानियाँ इस किताब में हैं।

पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पुस्तक के आरम्भ में एक विस्तृत ब्रीफिंग है, जिसमें लेखक ने क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच के अन्तर को स्पष्ट किया है और भारतीय राजनीति पर उनके बढ़ते और गिरते प्रभाव पर प्रकाश डाला है। लेखक क्षेत्रीय दलों के उदय को स्वतंत्रता के बाद के इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानते हैं।

लेखक का मानना है कि असन्तुलित क्षेत्रीय विकास, प्रतिस्पर्धा और जातीयता, जाति और धर्म की बढ़ती भावना आदि ने इस आग में घी डाला। इस पुस्तक में कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक की राजनीति, नेताओं और घटनाओं का व्यापक ब्योरा है। पुस्तक में लेखक ने पक्षों और उनके गठन के पीछे की कहानी के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने इन दलों के गठन, विकास और चुनावी सफलता में प्रमुख हस्तियों की भूमिका को भी रेखांकित किया है।

लेखक : अकु श्रीवास्तव

पुस्तक का नाम : सेंसेक्स क्षेत्रीय दलों का

प्रकाशन : प्रभात प्रकाशन

मूल्य : 400/- रुपये

पश्चिमी देशों में भारतीय विद्यार्थियों से भेदभाव

विदेशों में शिक्षा हासिल कर रहे भारतीय विद्यार्थियों के प्रति नस्लीय तथा आपराधिक हमलों की ख़बरें भारतीय मीडिया में समय-समय पर प्रकाशित होती हैं और चर्चा का विषय बनी रहती हैं। ऑस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे भारतीय छात्र शुभम गर्ग के साथ हाल ही में घटित हिंसक नस्लीय घटना इस ओर इशारा करती है कि विकसित लोकतांत्रिक देशों में भी व्यक्तिगत स्तर पर इस तरह की सोच से उबरने में अभी वक़्त लगेगा। भारतीय विद्यार्थी बड़ी तादाद में कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा ब्रिटेन अध्ययन के लिए जाते हैं। ये वो देश हैं, जहाँ भारतीय मूल के लोग विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा के दम पर प्रभावशाली पदों पर आसीन हैं। यह दु:खद है कि ऐसे लोकतांत्रिक देशों में जहाँ भारतीयों का योगदान बेहद महत्त्वपूर्ण रहा है, वहाँ पर भारतीय विद्यार्थियों तथा वहाँ काम कर रहे भारतीयों को 21वीं सदी में भी समय-समय पर नस्लीय तथा जानलेवा आपराधिक हमलों घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे हमलों की गम्भीरता को देखते हुए कई बार भारतीय विदेश मंत्रालय एडवाइजरी जारी करता है, तो कभी सम्बन्धित देशों के लोकल भारतीय संगठन।

हालाँकि इन देशों की सरकारें तथा लोकल प्रशासन यह नहीं मानते कि उनके देश में किसी पर नस्लीय हमले हो रहे हैं। लेकिन कई भारतीय विद्यार्थी तथा उनके परिजन इन देशों में अपने साथ घटित घटनाओं को नस्लीय तौर पर देखते हैं। यूट्यूब, फेसबुक तथा ट्विटर पर हमें कई ऐसी पूर्व घटनाओं के वास्तविक वीडियोज दिख जाते हैं, जिनसे पता चलता है कि कुछ यूरोपीय देशों- ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका इत्यादि देशों में भारतीय समेत विदेशी छात्रों तथा लोगों के साथ थोड़ी-बहुत नस्लीय घटनाएँ आज भी घटित हो रही हैं। भारत से उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए कैथल, हरियाणा से लंदन (इंग्लैंड) आये पूर्व छात्र रणदीप सिंह का कहना है- ‘शैक्षणिक संस्थान में तो मुझे किसी भी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं दिखा। लेकिन कभी-कभी यहाँ के स्थायी लोगों के व्यवहार में भारतीय विद्यार्थियों तथा लोगों के प्रति नस्लीय व्यवहार दिख जाता है।’ ऐसी घटनाओं के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं- ‘यहाँ के स्थानीय लोगों को लगता है कि हम भारतीय उनकी नौकरियाँ छीन रहे हैं।’

दरअसल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि विदेशी विद्यार्थियों तथा लोगों के कारण कई देशों के प्रवासी निवासियों में आर्थिक, शारीरिक असुरक्षा की भावना पनप रही है और यह नस्लीय भेदभाव के ही कारण है। यह दु:खद है कि पश्चिमी देशों में कभी-कभी विदेशी विद्यार्थियों द्वारा बोली जाने वाली उनकी अपनी भाषा के कारण भारतीय विद्यार्थियों को नस्लीय हमलों या आपराधिक तत्त्वों का सामना करना पड़ता है। किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक देश में विदेशी भाषा बोलने को लेकर किसी व्यक्ति या समूह पर किसी भी तरह का हमला निंदनीय है।

हाल के वर्षों में दुर्भाग्य से कुछ आपराधिक घटनाएँ भारत के अलग-अलग शहरों के विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे अफ्रीकी विद्यार्थियों तथा लोगों के साथ घटित हुई हैं, जो निंदनीय हैं। पूर्व में घटित ऐसी कुछ घटनाओं को कुछ अफ्रीकी छात्र नस्लीय हमले के तौर पर देखते हैं, जबकि यहाँ की सरकार तथा स्थानीय प्रशासन ऐसी घटनाओं को आपराधिक घटनाएँ मानते हैं। यह सच है कि विदेशों में किसी भारतीय विद्यार्थियों या नागरिकों के साथ ऐसे मामले घटित हों या फिर किसी विदेशी विद्यार्थियों या नागरिकों के साथ भारत में हों, पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन ऐसे मामलों को त्वरित गति से निवारण की कोशिश करते हैं।

ऐसे हमले न केवल विदेशी विद्यार्थियों के मन में किसी विशेष देश में जाकर अध्ययन के प्रति निरुत्साहित करते हैं, बल्कि उस विदेशी विद्यार्थियों की प्रताडऩा के लिए बदनाम हो रहे देशों को भी आर्थिक नुक़सान पहुँचते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि ऐसी घटनाओं को किसी देश की सरकार बढ़ावा देती है, यह सोच पूरी तरह से गलत है। चाहे ऐसी घटनाएँ विदेशों में घटें या फिर भारत के किसी शहर में, इसके लिए या तो कोई व्यक्ति ज़िम्मेदार होता है या फिर कुछ समूह। ऐसी घटनाएँ किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक देश में घटित नहीं होनी चाहिए।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)

निजता में ताक-झाँक

सम्भवत: भारत के बेहतरीन बल्ले में से एक विराट कोहली को ईएसपीएन ने दुनिया के सबसे प्रसिद्ध एथलीटों में से एक और टाइम पत्रिका ने दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक के रूप में स्थान दिया है। दो सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके 27 करोड़ से ज़्यादा फॉलोअर्स हैं। उनके क्रिकेट प्रशंसक हिन्दी सिनेमा के प्रशंसकों में से भी हैं, क्योंकि उन्होंने अभिनेत्री अनुष्का शर्मा से विवाह किया है।

फिर भी अन्य की ही तरह कोहली ऑस्ट्रेलिया के पर्थ के एक विशेष होटल में गोपनीयता के हक़दार थे। हालाँकि कोहली की निजता का उल्लंघन तब हुआ, जब कोई (सम्भवत: एक होटल कर्मचारी या होटल प्रबंधन की सहमति वाला कोई व्यक्ति) उनकी अनुपस्थिति में उनके कमरे में प्रवेश कर गया और कमरे में उसने न सिर्फ़ कोहली के सामान की वीडियो रिकॉर्डिंग की, बल्कि इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर दिया। स्वाभाविक रूप से कोहली इस घटना से हैरान थे और उन्होंने अपनी निजता को लेकर चिन्ता जतायी, जबकि उनकी एक्ट्रेस पत्नी अनुष्का शर्मा ने भी इस घटना को एक मुद्दे के रूप में लिया।

क्या मशहूर हस्तियों या आम लोगों को भी निजता का कोई अधिकार है? चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के वीडियो लीक में भी गर्ल हॉस्टल की छात्राओं ने डिजिटल युग में गोपनीयता पर हमले के मुद्दे को ध्यान में लाया था। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (2017) ने माना कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-14, 19 और 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

याद करें कि एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश- न्यायमूर्ति एन.के. सोढ़ी ने कुछ समय पहले मुख्य न्यायाधीश के आवास पर निगरानी कैमरे लगाने के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय का रुख़ किया था। न्यायमूर्ति सोढ़ी ने दावा किया कि लम्बे खम्भे पर लगाये गये उच्च-रेजोल्यूशन और इन्फ्रा-रेड कैमरे उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।

न्यायमूर्ति सोढ़ी ने तर्क दिया था कि आम जनता की जानकारी के लिए एक नोटिस प्रदर्शित करने की आवश्यकता है कि क्षेत्र सीसीटीवी निगरानी में है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। एक सीसीटीवी कैमरा ऐसी जगह पर नहीं लगाया जा सकता है, जहाँ वह ऐसी जानकारी एकत्र करता है, जो किसी व्यक्ति की निजता पर हमला करता है। उन्होंने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश अपने आवास पर अच्छी तरह से सुरक्षित हैं, जबकि उनके वाहन में और उच्च न्यायालय में सीसीटीवी कैमरे किसी अप्रिय घटना को नहीं रोक सकते हैं।

निजता पर हमले से सम्बन्धित मामले सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ के फ़ैसले के बावजूद जारी हैं, कि नागरिकों को निजता का मौलिक अधिकार है, और यह कि यह जीवन और स्वतंत्रता के लिए ज़रूरी है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत आता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 547 पन्नों के फ़ैसले में सन् 1958 में मध्य प्रदेश में एम.पी. शर्मा केस और सन् 1961 में खड़क सिंह मामले के फ़ैसलों को ख़ारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के तहत सुरक्षित नहीं किया गया है। फ़ैसले में दो पन्नों का अन्तिम आदेश भी शामिल है, जिसमें कहा गया है कि एम.पी. शर्मा और खड़क सिंह मामले के आदेश को ख़ारिज किया जाता है और निजता का अधिकार मौलिक है।

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ के मुख्य फ़ैसले और मुख्य न्यायाधीश खेहर, न्यायमूर्ति नज़ीर और न्यायमूर्ति अग्रवाल के सह-हस्ताक्षरित 265 पन्नों के मुख्य फ़ैसले में कहा गया है कि एम.पी. शर्मा का फ़ैसला अनिवार्य रूप से यह मानता है कि अमेरिकी संविधान के चौथे संशोधन के समान प्रावधान के अभाव में निजता के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-20(3) के तहत प्रावधानों में नहीं पढ़ा जा सकता है।

जजमेंट विशेष रूप से इस पर फ़ैसला नहीं करती है कि क्या निजता का अधिकार अनुच्छेद-21 और अनुच्छेद-19 सहित भाग-ढ्ढढ्ढढ्ढ द्वारा गारंटीकृत अधिकारों के किसी अन्य प्रावधान से उत्पन्न होगा। यह अवलोकन कि गोपनीयता भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकार नहीं है, सही स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करता है। एम.पी. शर्मा फ़ैसले को इस हद तक ख़ारिज कर दिया गया है कि यह इसके विपरीत इशारा करता है।

जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अहरणीय अधिकार हैं। ये ऐसे अधिकार हैं, जो एक प्रतिष्ठित मानव अस्तित्व से अविभाज्य हैं। व्यक्ति की गरिमा मनुष्यों के बीच समानता और स्वतंत्रता की खोज भारतीय संविधान के आधारभूत स्तम्भ हैं। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान की रचना नहीं है। इन अधिकारों को संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति में निहित मानवीय तत्व के आंतरिक और अविभाज्य अंग के रूप में मान्यता दी है, जो भीतर रहता है। गोपनीयता एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है, जो मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद-21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी से उभरता है। गोपनीयता के तत्व भी स्वतंत्रता और गरिमा के अन्य पहलुओं से अलग-अलग सन्दर्भों में उत्पन्न होते हैं, जिन्हें भाग-ढ्ढढ्ढढ्ढ में निहित मौलिक अधिकारों द्वारा मान्यता प्राप्त और गारंटी दी जाती है।

गोपनीयता मानव गरिमा का संवैधानिक मूल है। गोपनीयता का एक मानक और वर्णनात्मक कार्य है। मानक स्तर पर गोपनीयता उन शाश्वत् मूल्यों की उप-सेवा करती है, जिन पर जीवन, स्वतंत्रता और स्वतंत्रता की गारंटी की स्थापना की जाती है। एक वर्णनात्मक स्तर पर गोपनीयता अधिकारों और हितों के ढेर को निर्धारित करती है, जो आदेशित स्वतंत्रता की नींव पर निहित हैं; गोपनीयता में इसके मूल में व्यक्तिगत अंतरंगता का संरक्षण, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, विवाह, प्रजनन, घर और यौन अभिविन्यास शामिल हैं। गोपनीयता भी अकेले छोड़े जाने के अधिकार को दर्शाती है। गोपनीयता व्यक्तिगत स्वायत्तता की रक्षा करती है और व्यक्ति की अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को नियंत्रित करने की क्षमता को पहचानती है। जीवन के तरीके को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत विकल्प गोपनीयता के लिए आंतरिक हैं।

गोपनीयता विविधता की रक्षा करती है और हमारी संस्कृति की बहुलता और विविधता को पहचानती है। यह रेखांकित करना महत्त्वपूर्ण है कि गोपनीयता केवल इसलिए नहीं खोती या आत्मसमर्पण करती है; क्योंकि व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर है। गोपनीयता व्यक्तियों से जुड़ती है, क्योंकि यह मनुष्य की गरिमा का एक अनिवार्य पहलू है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि क़ानून के शासन द्वारा शासित लोकतांत्रिक व्यवस्था में उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए संविधान को समय की आवश्यकता के अनुसार विकसित होना चाहिए। संविधान के अर्थ को उस समय मौज़ूद दृष्टिकोणों पर स्थिर नहीं किया जा सकता है, जब इसे अपनाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि तकनीकी परिवर्तन ने उन चिन्ताओं को जन्म दिया है, जो सात दशक पहले मौज़ूद नहीं थीं और प्रौद्योगिकी के तेज़ी से विकास ने वर्तमान की कई धारणाओं को अप्रचलित कर दिया है। इसलिए संविधान की व्याख्या लचीली होनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढिय़ों को इसकी मूल या आवश्यक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए इसकी सामग्री को अनुकूलित करने की अनुमति मिल सके।’

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि निजता का अतिक्रमण करने वाले क़ानून को मौलिक अधिकारों पर अनुमेय प्रतिबंधों की कसौटी का सामना करना होगा। अनुच्छेद-21 के सन्दर्भ में निजता के अतिक्रमण को एक ऐसे क़ानून के आधार पर उचित ठहराया जाना चाहिए, जो न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया को निर्धारित करता है। क़ानून को अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण के सन्दर्भ में भी वैध होना चाहिए। जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अतिक्रमण को (द्ब) वैधता की तीन गुना आवश्यकता को पूरा करना चाहिए, जो क़ानून के अस्तित्त्व को दर्शाता है; (द्ब द्ब) एक वैध राज्य उद्देश्य की आवश्यकता, परिभाषित शर्तें; और (द्ब द्ब) आनुपातिकता जो वस्तुओं और उन्हें प्राप्त करने के लिए अपनाये गये साधनों के बीच तर्कसंगत सम्बन्ध सुनिश्चित करती है।

सूचना के युग में गोपनीयता के ख़तरे न केवल राज्य से, बल्कि $गैर-राज्य तत्त्वों से भी उत्पन्न हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने संघ की सराहना की थी और कहा था कि सरकार को व्यक्तिगत हितों और राज्य की वैध चिन्ताओं के बीच संवेदनशील सन्तुलन सुनिश्चित करके एक मज़बूत शासन की जाँच करने और उसे स्थापित करने की आवश्यकता है।