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भारत बना जी-20 का अध्यक्ष, अगले साल देश में कहीं किया जाएगा इसका शिखर सम्मेलन

बाली में जी-20 की शिखर सम्मलेन ख़त्म होने के साथ ही अब भारत एक साल के लिए जी-20 की अध्यक्षता करेगा। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो ने बुधवार को बैठक के आखिरी दिन आधिकारिक तौर पर भारत को जी-20 की अध्यक्षता सौंपी।

भारत की अध्यक्षता का समय पहली दिसंबर से शुरू हो जाएगा। भारत को जी 20 संगठन की अध्यक्षता एक साल के लिए मिली है और वह अगले साल भारत के किसी हिस्से में शिखर सम्मेलन आयोजित करेगा। इसके स्थान का अंतिम चयन जल्दी होने की संभावना है।

शिखर सम्मेलन के आखिरी दिन आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 सत्र को संबोधित करते हुए तय विषय पर कहा कि हम डिजिटल माध्यमों तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित कर रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल खाई अब भी बहुत गहरी है।

मोदी ने कहा – ‘भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अनुभव किया है कि अगर हम डिजिटल बुनियादी ढांचे को समावेशी बनाएंगे तो इससे सामाजिक-आर्थिक बदलाव हो सकते हैं।’

सर्वोच्च अदालत में जम्मू-कश्मीर परिसीमन पर केंद्र और दस्तावेज देगा, सुनवाई अब 29 को

केंद्र सरकार के इस आग्रह कि वह मामले में कुछ और दस्तावेज दाखिल करना चाहती है, सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर परिसीमन को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई की तारीख अब 29 नवंबर के लिए तय की है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र को इस मामले में अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने की इजाजत दे दी है।

सर्वोच्च अदालत में बुधवार को केंद्र सरकार ने कहा कि वह इस मामले में कुछ और दस्तावेज दाखिल करना चाहती है। अदालत ने उसके आग्रह को स्वीकार कर लिया।
याद रहे 30 अगस्त, 2022 को जम्मू-कश्मीर के चुनाव क्षेत्रों के प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया था।

उस समय सर्वोच्च अदालत ने ने 2020 में जारी अधिसूचना को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता से कहा था कि आप दो साल तक आप कहां थे। हालांकि, अदालत ने मामले पर केंद्र और जम्मू कश्मीर प्रशासन और निर्वाचन आयोग से छह हफ्ते में जवाब तलब किया था।

केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने सर्वोच्च अदालत के नोटिस के जवाब में कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। परिसीमन आयोग की 25 अप्रैल को सौंपी गई फाइनल रिपोर्ट के मुताबिक परिसीमन के जरिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए 83 सीटों की जगह 90 और लोकसभा की चार की जगह पांच सीटें हो जाएंगी। इसी आधार पर विधानसभा और लोकसभा सीटों पर चुनाव होगा।

हरियाणा ने पंजाब को हरा कर जीता दूसरा बलरामजी दास टंडन इंटर स्टेट अंडर 16 मल्टी डेज क्रिकेट टूर्नामेंट

चंडीगढ़: हरियाणा ने पजांब को एक पारी और 16 रनों से हराकर बीसीसीआई मान्यता प्राप्त दूसरा बलरामजी दास टंडन इंटर स्टेट अंडर 16 मल्टी डेज क्रिकेट टूर्नामेंट अपने नाम कर लिया है। आईटी पार्क स्थित महाजन क्रिकेट ग्राउंड में खेले गये फाईनल मैच के अंतिम दिन पंजाब 156 रनों पर आॅल आउट हो गई जिसका श्रेय आदित्य शर्मा (4/42) और पारिश ढिल्लों (4/42) को गया जिन्होनें चार चार विकेट चटकाई। टीम का सर्वाधिक स्कोर राहुल शर्मा (55) ने बनाया। हरियाणा की पहली पारी में बनाये 266 रनों के जवाब में पंजाब मात्र 94 रनों पर ढेर हो गई थी जिसके बाद टीम मंगलवार को दूसरी पारी में 156 रन ही जुटा पाई थी।

विजेता और उपविजेता टीमों को हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर, यूटी प्रशासन के सलाहाकार धर्मपाल और बीसीसीआई के चयन समीति के चैयरमेन चेतन शर्मा ने यूटी क्रिकेट ऐसोसियेशन के अध्यक्ष संजय टंडन और सचिव देवेन्द्र शर्मा की मौजूदगी में किया। अपने संबोधन में यूटीसीए अध्यक्ष संजय टंडन ने बताया कि उनके स्वर्गीय पिता बलरामजी दास टंडन जो कि स्वयं एक खिलाड़ी भी थे, सदैव से ही बच्चों और युवाओं की प्रतिभाओं को बढ़ावा देने में प्रयत्नशील रहे। उनकी स्मृति में आयोजित किये जा रहे इस वार्षिक टूर्नामेंट में अनेको प्रतिभायें निकल कर देश का प्रतिनितिध्तत्व करेंगें जो कि भविष्य की क्रिकेट के लिये शुभ संकेत हैं। उन्होंनें बताया कि यूटीसीए ने इस बार टूर्नामेंट का दायरा इंटर जोनल से बढ़ाकर इंटर स्टेट टूर्नामेंट कर दिया है। टूर्नामेंट का अगला संस्करण पैन इंडिया स्तर पर किया जायेगा।

विज्ञापन बटोरने के लिए टीआरपी

एक पुरानी कहावत है- ‘प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज़ है।” कुछ ऐसी ही हालत टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) के खेल की है। चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाज़ार भारत में है। आज टीवी शायद किसी भी व्यवसाय के लिए किसी भी घर में प्रवेश का सबसे बड़ा ज़रिया है।

यहाँ मंत्र यह है कि जो ख़ुद को दिखा सकता है, वह बिकता है; और जो बिकता है, वह बच जाता है। बच जाने का यह दबाव ही टीआरपी में धाँधली की सबसे बड़ी वजह है। टीआरपी सीधे तौर पर किसी चैनल की विज्ञापनों से होने वाली कमायी से जुड़ी हुई चीज़ है। कुल राजस्व का लगभग 60 फ़ीसदी विज्ञापन और 40 फ़ीसदी सब्सक्रिप्शन से आता है। इसकी दरें भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण नियंत्रित करता है। डाटा बताता है कि भारत में हर हफ़्ते 800 मिलियन से अधिक लोग, जबकि क़रीब 600 मिलियन लोग रोज़ाना टीवी देखते हैं और प्रतिदिन लगभग 3.45 घंटे टीवी देखते हैं। टीआरपी से यह ज़ाहिर होता है कि किस शो को ज़्यादा लोग देख रहे हैं।

किसी चैनल की रेटिंग जानने के लिए चुनिंदा जगहों पर पीपल्स मीटर नाम का एक ख़ास डिवाइस लगायी जाती है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) चुनिंदा घरों में टीवी में बार-ओ-मीटर का इस्तेमाल करके टीआरपी रिकॉर्ड करती है। जो कोई भी एक मिनट से अधिक समय तक टीवी देखता है, उसे दर्शक माना जाता है।

टीआरपी के खेल से पर्दा उठाने वाली मुम्बई पुलिस का दावा था कि टीआरपी में हेरफेर करने के लिए उन घरों में रहने वाले लोगों को पैसे दिये जा रहे थे। कई शीर्ष पत्रकारों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की गयी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चैनल ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) द्वारा टेलीविजन चैनलों को रेट करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली को विकृत करके टीआरपी में हेरफेर कर रहे थे। कुछ परिवारों, जहाँ से दर्शकों की संख्या का डाटा एकत्र किया जाता है; को विशेष चैनलों में ट्यून करने के लिए पैसे देकर टीआरपी में हेराफेरी की गयी। दरअसल इसका मतलब था कि टीआरपी वास्तविक दर्शकों की संख्या नहीं थी। टीआरपी की कार्यप्रणाली को लेकर पहले भी कई मौक़ों पर सन्देह जताया जा चुका है। वास्तव में कोई भी विनियमित नहीं होना चाहता है और चौथा स्तम्भ मानता है कि वह बेहतर आत्म-नियमन कर सकता है।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्रसार भारती के तहत एक वर्किंग ग्रुप भी बनाया था। बार्क ने टीआरपी समिति की रिपोर्ट और ट्राई की सिफ़ारिश की भावना में अपनी प्रक्रियाओं, प्रोटोकॉल, निरीक्षण तंत्र में संशोधन किया है और शासन संरचना आदि में बदलाव शुरू किये हैं। हालाँकि यह सब पर्याप्त नहीं है। इस अंक में विशेष जाँच दल द्वारा ‘तहलका” की आवरण कथा ‘ख़रीदी जाती है टीआरपी” से ज़ाहिर होता है कि मीडिया उद्योग में अनैतिक खिलाड़ी टीआरपी में हेरफेर करने के लिए बेईमान अधिकारियों के साथ कैसे साँठगाँठ करते हैं। एसआईटी ने देश भर में फैले कई खिलाडिय़ों की जाँच की, जो पैसे के बदले चैनल की रेटिंग तय करने के लिए तैयार थे। टीआरपी की इस दौड़ को रोकने की तत्काल ज़रूरत है, क्योंकि अधिकांश चैनल नैतिकता और पत्रकारिता के स्थापित मानकों को धता बताते हुए एक दूसरे से अलग दिखने के लिए उन्माद भड़काने की कोशिश करने से भी पीछे नहीं हटते।

प्रदूषण पर नौटंकी कब तक?

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों में हर साल प्रदूषण अपने चरम पर होता है। हर साल सरकारें बीमारी की तरह फैले इस प्रदूषण पर सियासत, वादे और दावे करती हैं। हर साल ही प्रदूषण इतने गम्भीर स्तर पर पहुँचता है कि दिल्ली-एनसीआर में लोगों का साँस लेना मुहाल हो जाता है। दिल्ली-एनसीआर में तीन-चार महीने तक रहने वाले इस प्रदूषण का आरोप किसानों पर लगता है कि वे पराली जलाते हैं। लेकिन इस प्रदूषण की कोई एक वजह नहीं होती है। अफ़सोस की बात यह है कि जब प्रदूषण ख़तरनाक स्तर पर पहुँचने लगता है, तभी सरकारों को इसकी याद आती है। दिल्ली में तो हाल यह है कि यहाँ केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच प्रदूषण को लेकर हर साल ही टकराव होता है। केंद्र सरकार प्रदूषण की सारी की सारी ज़िम्मेदारी दिल्ली सरकार पर डाल देती है।

हालाँकि कई बार राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्षों में कई बार केंद्र और दिल्ली की सरकारों की फटकार लगायी है। लेकिन इस बार दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने प्रदूषण को लेकर इतना ही कहा कि राज्यों को टायर पायरोलिसिस इकाइयों (टीपीयू) को तुरन्त बन्द करने का निर्देश दिया है। इस बार नवंबर के पहले सप्ताह में ही दिल्ली का एक्यूआई 500 के आसपास पहुँच गया था। यह ख़तरनाक स्तर होता है, जिससे बीमार लोगों को तो ख़तरा होता ही है, सामान्य लोग भी बीमार पडऩे लगते हैं। यही हाल पहले सप्ताह में एनसीआर का भी रहा। हालाँकि नवंबर के सप्ताहांत तक इस प्रदूषण से राहत मिली और दिल्ली में लागू हुए ग्रैप-4 को हटा लिया गया।

ग्रैप-4 लागू होने पर बहुत ज़रूरी सामान ढोने वाले ट्रकों को ही शहर में घुसने दिया जाता है। रजिस्टर्ड मीडियम और हेवी गुड्स व्हीकल्स के चलने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। रजिस्टर्ड डीजल पर चलने वाली कारों पर भी रोक रहती है। फैक्ट्रियाँ बन्द कर दी जाती हैं। भवन निर्माण और उनकी तोडफ़ोड़ को रोक दिया जाता है। सरकारी दफ़्तरों में आधे-आधे कर्मचारियों को ही बुलाया जाता है, बाक़ी को घर से काम करने को कहा जाता है। स्कूल बन्द कर दिये जाते हैं। हालाँकि यह स्थायी समाधान नहीं है। स्थायी समाधान है- प्रदूषण पर स्थायी रोक। इसके लिए सरकारों को दूरगामी सोच के साथ स्थायी इंतज़ाम करने होंगे।

सर्दियों में हर साल वायु की आद्रता बढऩे लगती है। इसके चलते वातावरण में हर रोज़ होने वाला प्रदूषण ऑक्सीजन क्षेत्र (जोन) में ही रह जाता है और जिस हवा को साँस लेने के लिए अधिकतम शुद्ध होना चाहिए, वह प्रदूषित होने लगती है। ऐसा नहीं है कि गर्मियों में शहरों में कम प्रदूषण फैलता है। लेकिन हवा में आद्रता (नमी) कम होने के चलते वह वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर चला जाता है, जिसके चलते ऑक्सीजन क्षेत्र उतना प्रदूषित नहीं होता, जितना कि सर्दियों में हो जाता है। इससे एक्यूआई स्तर थोड़ा ठीक रहता है। बारिश में भी हवा में आद्रता काफ़ी होती है। लेकिन बारिश होने के कारण वायुमंडल में फैला कार्बन धुलकर ज़मीन पर बैठ जाता है और पेड़ों की धुलाई होने के कारण, पानी की अधिकता के कारण ऑक्सीजन की मात्रा वायुमंडल में बढ़ जाती है। लेकिन सर्दियों में प्रदूषण बढ़ जाता है और काफ़ी तकलीफ़देह हो जाता है।

सर्दियों में उच्च एक्यूआई स्तर पर पहुँचने वाला प्रदूषण केवल दिल्ली-एनसीआर की समस्या नहीं है। इस वर्ष ही उत्तर प्रदेश के 20 शहरों में प्रदूषण का स्तर ख़राब और ख़तरनाक स्थिति में पहुँच गया। हरियाणा के भी कई शहरों में भी यही हुआ। दिल्ली सरकार द्वारा पानी का छिड़काव कराना एक छोटी-सी कोशिश हर साल की जाती है, जिससे कुछ हद तक ही राहत मिलती है। लेकिन किसानों द्वारा पराली जलाने को लेकर जिस तरह हर वर्ष राजनीति होती है, उससे सरकारों को बचना चाहिए।

यह सभी जानते हैं कि किसानों के पराली जलाने से प्रदूषण उतना ख़राब नहीं होता, जितना प्रदूषण डीजल-पेट्रोल के वाहनों से, फैक्ट्रियों-उद्योगों से, भवन निर्माण व तोडफ़ोड़ से और सर्दियों में कूड़ा, कोयला आदि के जलाने से होता है। रहा पराली का मसला, तो उसे गलाने का जो तरल पदार्थ दिल्ली सरकार ने ईजाद कराया, उसका उपयोग किया जाना चाहिए। अगर उससे समाधान होता है, तो पंजाब, हरियाणा समेत पूरे देश में जहाँ-जहाँ पराली खेतों में बचती है, उस पर उस तरल पदार्थ का उपयोग किया जाना चाहिए। नहीं तो पराली से कुछ बनाने के लिए कोई समाधान खोजा जाना चाहिए।

हरियाणा के कैथल जिले के कई किसान स्ट्रॉ बेलर, चॉपर जैसी मशीनों और स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से इस पराली से हज़ारों रुपये कमा रहे हैं। ये किसान बेलर मशीन से पराली के बंडल (गाँठें) बनाकर चॉपर मशीन से पराली को जड़ को काटकर खेतों में फैला देते हैं। बंडल बनी पराली को स्ट्रॉ बेलर मशीन और सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम की मदद से बने बंडलों को किसान पराली से गत्ता और दूसरी चीज़ें बनाने वाली फैक्ट्रियों को बेच देते हैं। ये फैक्ट्रियाँ पराली को 130 से 135 रुपये प्रति कुंतल तक ख़रीद लेती हैं। वहीं हरियाणा सरकार पराली के निपटान के लिए प्रति एकड़ 1,000 रुपये अनुदान देती है। इस तरह किसानों को क़रीब 2,700 रुपये प्रति एकड़ तक की आमदनी हो जाती है। खेतों में बचे पराली के जड़ वाले अवशेष को खेतों में जोत दिया जाता है, जिससे ज़मीन को ताक़त मिलती है। यह तरीका पर्यावरण हितैषी (ईको फ्रेंडली) भी है और किसान पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने की तोहमत से भी बच सकते हैं।

किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए उन पर जुर्माना लगाने और उन्हें बदनाम करने की जगह राज्य सरकारों को इस तरह किसान अनुदान की योजनाएँ चलानी चाहिए। साथ ही पराली ख़रीद का इंतज़ाम भी करना चाहिए। शहरों में सर्दियों में कोयला और कूड़ा जलने पर प्रतिबंध होना चाहिए। इसमें भी पॉलिथीन युक्त कूड़ा जलाने पर तो हर हाल में प्रतिबंध होना चाहिए। पराली के समाधान के लिए किसानों की मदद करने में राज्य सरकारों के अलावा केंद्र सरकार को भी आगे आना चाहिए। लेकिन इस मसले पर भी सभी सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी पीठ बचाने के लिए सिर्फ राजनीति ही करती हैं। हैरानी की बात यह है कि इस राजनीति में विज्ञापनों के ज़रिये बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया जाता है। प्रदूषण निपटान में कामयाबी के लिए और ज़िम्मेदार सरकार पर हमले के लिए यह विज्ञापन टीवी चैनलों, अख़बारों से लेकर दीवारों तक दिख जाते हैं। दिल्ली में तो इस तरह के विज्ञापनों की भरमार देखी जा सकती है।

यही सरकारें विज्ञापन पर लगने वाले पैसे का उपयोग अगर काम करने पर ख़र्च कर दें, तो परिणाम ज़्यादा बेहतर दिखायी देंगे। सरकारों को यह भी समझना होगा कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दूसरे प्रकार के प्रदूषणों को भी कम करना ज़रूरी है, क्योंकि एक प्रदूषण दूसरे प्रदूषण को बढ़ाता है।

विधानसभा चुनाव: कसौटी पर लोकप्रियता

हिमाचल और गुजरात में भाजपा, कांग्रेस और आप में टक्कर

अलग-अलग राजनीतिक मिज़ाज वाले गुजरात और हिमाचल में विधानसभा के चुनाव देश भर में चर्चा का केंद्र बन गये हैं। कारण है- इन राज्यों से प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का जुड़े होना। राजनीतिक रूप से इन राज्यों के नतीजे तीन प्रमुख दलों भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) की भविष्य की राजनीति के लिए काफ़ी अहम रहेंगे। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

देश के दो राज्यों के विधानसभा चुनाव अचानक बहुत महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। कारण यह है कि इन चुनावों के सम्भावित नतीजों को लेकर भाजपा में चिन्ता पसरी है। हिमाचल प्रदेश, जहाँ 12 नवंबर को वोट पड़ गये; का चुनाव उसे बहुत चुनौतीपूर्ण लग रहा है। जबकि गुजरात में उसने पूरी ताक़त झोंक दी है, ताकि वहाँ जीत का परचम लहराया जा सके। वहाँ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ज़मीन पर उसे टक्कर देते दिख रहे हैं। इस तरह हाल के चुनावों में मिली जीत के बावजूद भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना बहुत ज़रूरी हो गया है।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य होने के कारण पार्टी की नाक का सवाल बन गया है, तो हिमाचल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का गृह राज्य होने के कारण। दोनों राज्यों में भले भाजपा विकास के लाख ढिंढोरे पीटे, मतों (वोटों) के लिए उसकी उम्मीद आज भी प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा ही है। मोदी ने दोनों राज्यों में प्रचार के लिए प्रधानमंत्री होने की व्यस्तताओं के बावजूद काफ़ी समय दिया है। लिहाज़ा हार-जीत के लिए उनकी लोकप्रियता भी कसौटी पर रहेगी।

गुजरात में भाजपा ने विशेष रणनीति बुनी है। उसने वहाँ जीत के लिए सब कुछ झोंक दिया है। अमित शाह लगातार चुनाव पर नज़र रखे हुए हैं, जबकि पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा हिमाचल में डटे हुए हैं। दोनों राज्य कितने महत्त्वपूर्ण बन गये हैं, यह इस बात से साबित हो जाता है कि भाजपा के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में छ: (हरेक में दो से तीन जनसभाएँ) चुनाव दौरे किये, जबकि गुजरात तो वह पिछले तीन महीने से बार-बार गये हैं।

हिमाचल में कांग्रेस के लिए प्रियंका गाँधी लगातार डटी रहीं, जबकि अशोक गहलोत जैसे दूसरे बड़े नेता भी आये। प्रियंका गाँधी का चूँकि हिमाचल के शिमला ज़िले में घर में भी है; इसलिए भी लोगों में उनके प्रति आकर्षण है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी भी 24 साल पहले हिमाचल में भाजपा के प्रभारी रहे हैं। आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी हिमाचल में चुनाव प्रचार के लिए आये। हालाँकि बाद में पार्टी ने अपना पूरा ध्यान गुजरात पर लगा दिया।

हार-जीत के मायने

यह दोनों विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण हैं। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि यह भाजपा के तीन बड़े नेताओं के गृह राज्य में हो रहे हैं। बल्कि इसलिए भी कि तीन बड़े दलों भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए यह अलग-अलग तरीक़े से अहम हैं। पहले बात भाजपा की जो लगातार चुनावों में जीत का स्वाद चखती आ रही है। अब यदि उसे एक राज्य में भी हार का सामना करना पड़ता है, तो उसकी लय टूट सकती है। भाजपा आलाकमान किसी भी सूरत में हार नहीं देखना चाहते। लगातार जीत हासिल कर भाजपा ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर जो मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल की है, उसका क्रम टूट जाएगा।

भाजपा अपनी जीतों को जनता के बीच लगातार न सिर्फ़ अपने पक्ष में भुनाती रही है, बल्कि इसे कांग्रेस (या विपक्ष) के उसके मुक़ाबले बहुत कमज़ोर होने का सन्देश देने के लिए भी इस्तेमाल करती रही है। उसे पता है कि चुनाव में जीत ही राजनीति में मज़बूत बने रहने की सबसे बड़ी गारंटी है। लोग चुनावी हार-जीत से प्रभावित होते हैं। हाल के वर्षों में भाजपा की जनता में मज़बूत पार्टी होने की छवि में इन जीतों का बहुत बड़ी भूमिका रही है। इसके विपरीत कांग्रेस को इसका बहुत ज़्यादा मनोवैज्ञानिक नुक़सान झेलना पड़ा है।

कांग्रेस की बात करें, तो मल्लिकार्जुन खडग़े पार्टी के नये-नये अध्यक्ष बने हैं। हार से शुरुआत उनकी छवि को नुक़सान पहुँचाएगी। बेशक उन्हें अध्यक्ष बनने के बाद संगठन और चुनाव फ्रंट पर कोई ज़्यादा काम करने का समय अभी नहीं मिला है, एक भी जीत उन्हें ताक़त देगी। यहाँ यह भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव प्रचार में वह अभी तक नहीं गये हैं। हो सकता है गुजरात जाएँ, क्योंकि वहाँ मतदान अगले महीने के शुरू में है। लेकिन इसके बावजूद खडग़े दिल्ली में रहकर लगातार चुनाव रणनीति पर नज़र रखे हैं।

गुजरात में अनुभवी नेता राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पार्टी के विशेष चुनाव प्रभारी हैं और वह लगातार खडग़े को फीडबैक देते हैं। कांग्रेस हाल के चुनावों में लगातार हारी है। पंजाब में भले वह दूसरे स्थान पर रही; लेकिन उसने सरकार गँवायी। उपचुनावों में उसे कुछ सीटों पर जीत हासिल हुई है; लेकिन एक पूरे राज्य में जीत उसके मनोबल को बढ़ा सकती है। कांग्रेस को पता है कि ज़मीन पर उसकी उपस्थिति अभी भी है। लेकिन चुनाव जीते बिना उसकी साख नहीं लौटेगी। राहुल गाँधी ने इन चुनावों से दूरी बना राखी है। हालाँकि प्रियंका गाँधी लगातार प्रचार में दिख रही हैं।

आम आदमी पार्टी (आप) के लिए यह चुनाव कुछ अलग तरह से महत्त्वपूर्ण हैं। उसकी लड़ाई साख की नहीं है। आप की नज़र कांग्रेस का स्थान लेने पर है। आम आदमी पार्टी नेतृत्व का साफ़ लक्ष्य है- कांग्रेस की जगह भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनना। दो राज्यों में उसकी सरकार है और यदि वह एक और राज्य जीतती है, तो उसकी सरकारें कांग्रेस के दो राज्यों के मुक़ाबले तीन राज्यों में हो जाएँगी। ऐसा होने की स्थिति में आम आदमी पार्टी कांग्रेस पर हावी होने की कोशिश करेगी, भले उसका कांग्रेस जैसा देशव्यापी जनाधार अभी न हो।

अरविन्द केजरीवाल इन दोनों राज्यों, ख़ासकर गुजरात में चतुराई से चुनाव अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस के विपरीत हिन्दुत्व कार्ड खेलने से भी परहेज़ नहीं किया है और भाजपा को सीधी चुनौती देने की कोशिश की है। इसका फ़ायदा भी हो सकता है और नुक़सान भी। लेकिन तमाम आरोपों, कि आप और केजरीवाल भाजपा की ‘बी टीम’ हैं; केजरीवाल इससे बेपरवाह अपनी बनाये रास्ते पर चल रहे हैं। उन्होंने पंजाब की तरह गुजरात और हिमाचल में भी खुलकर लोकलुभावन घोषणाएँ की हैं। देखना दिलचस्प होगा कि इसका लाभ उन्हें मिलता है या नहीं।

हिमाचल प्रदेश में 12 नवंबर को वोट पडऩे के बाद अब सारा फोकस गुजरात पर चला गया है। वहाँ दो चरणों में 01 और 05 दिसंबर को मतदान होना है। ज़ाहिर है तमाम बड़े नेता अब गुजरात में ही दिखेंगे। कांग्रेस की तरफ़ से राहुल गाँधी का गुजरात जाना अभी तय नहीं हुआ है, जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में वहाँ जमकर प्रचार किया था। प्रियंका गाँधी जाएँगी, जबकि पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े भी। पार्टी के दो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और भूपेश बघेल भी प्रचार में हैं। भाजपा के लिए मोदी और अमित शाह पहले से डटे हैं। उसके मुख्यमंत्री भी वहाँ जा रहे हैं। आम आदमी पार्टी के सारे प्रचार का जिम्मा पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल पर है, जो पूरी ताक़त वहाँ झोंक रहे हैं। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री सिसोदिया, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के अलावा कोई और नामी चेहरा आम आदमी पार्टी के पास नहीं है।

गुजरात में तिकोना मुक़ाबला

यह तीन महीने पहले की बात है। कुछ चुनाव सर्वे में तीसरे स्थान पर दिखायी जा रही कांग्रेस ने गुजरात के सभी विधानसभा हलक़ों में मतदाता तक एक चिट्ठी भेजने का काम शुरू कर दिया, जिसमें भाजपा सरकार की नाकामियों का ज़िक्र था। देखने में यह आम बात लगती थी; लेकिन चुनावी रणनीति के लिहाज़ से यह वास्तव में यह बड़ी बात थी। इतनी बड़ी कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी कर्ताओं को सम्बोधित करते हुए उन्हें कांग्रेस के इस अंडर ग्राउंड मिशन से सावधान रहने को कहना पड़ा। कांग्रेस ने अभी तक ज़मीनी प्रचार (डोर-टू-डोर अभियान) की रणनीति अपनायी है, और 17 नबंबर के बाद उसके बड़े नेता भी मैदान में उतरेंगे।

चुनाव सर्वे गुजरात में आम आदमी पार्टी की बढ़ती ताक़त का लगातार ज़िक्र कर रहे हैं। उसकी लोकलुभावन घोषणाओं ने भाजपा को भी मजबूर किया है कि तत्काल चुनावी लाभ दे सकने वाली घोषणाएँ की जाएँ।

बेशक प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक भाषण में इस तरह की रेबडिय़ों बाँटने पर सवाल उठाये थे। लेकिन ख़ुद उनकी पार्टी इस तरह की लोकलुभावन घोषणाएँ करने को मजबूर हुई है। केजरीवाल को गुजरात से बहुत उम्मीद है। हालाँकि वह भी यह जानते हैं कि बिना ज़मीनी संगठन के आम आदमी पार्टी को आसानी से सत्ता नहीं मिलेगी। भाजपा चाहती है कि चुनाव तक आम आदमी पार्टी को मुक़ाबले में रखने का प्रचार जारी रहे, ताकि विपक्ष का वोट बँटे और कांग्रेस को इसका लाभ न हो। जितना ज़्यादा वोट आम आदमी पार्टी लेगी, भाजपा को लाभ और कांग्रेस को नुक़सान होगा; क्योंकि यह एंटी-इंकम्बेंसी का वोट होगा।

हालाँकि एक मत यह भी है कि जिस तरह केजरीवाल हिन्दुत्व का कार्ड भी खेल रहे हैं। भाजपा को भी इसका नुक़सान हो सकता है। साथ ही आप की लोकलुभावन घोषणाएँ भाजपा का वोट छीनकर आम आदमी पार्टी की झोली में डाल सकती हैं। एक बात साफ़ है कि इस चुनाव में तिकोना मुक़ाबला है और यदि सबके वोट बँटे, तो नतीजा किसी के भी पक्ष में जा सकता है और यदि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट काटे, तो भाजपा की जीत तय हो जाएगी।

गुजरात के मुद्दे

देखा जाए, तो चुनाव से पहले ही दो बड़े मुद्दे गुजरात में उभरे। इनमें एक था- बिलकिस बानो से दुष्कर्म के आरोपियों को गुजरात सरकार की तरफ़ रिहा कर देना। इसके बाद मोरबी में पुल टूटने 136 लोगों की मौत का मामला भी काफ़ी चर्चा में रहा। कई चीज़ों से साबित हुआ कि जिस कम्पनी को इसकी मरम्मत का काम दिया गया था, उसमें नियमों को ताक पर रखा गया। गुजरात देश का ऐसा राज्य है, जहाँ बिजली की दरें देश में सर्वाधिक दरों में एक हैं।

इसके अलावा कुछ ऐसे भी मुद्दे सामने आये हैं, जिन्हें जनता से जुड़े हुए मुद्दे नहीं कहा सकता; लेकिन जिन पर चर्चा हो रही है। इनमें से एक है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का दावा कि उन्हें गुजरात चुनाव न लडऩे के बदले उनकी पार्टी के लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज न करने का ऑफर दिया गया था। केजरीवाल दिल्ली मॉडल की बात गुजरात में कर रहे हैं।

उधर प्रधानमंत्री मोदी बाहर वालों से जनता को सावधान कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने (मोदी) गुजरात बनाया है। गुजरात उन विभाजनकारी ताक़तों का सफ़ाया कर देगा, जिन्होंने अपने पिछले 20 साल राज्य को बदनाम करने में लगाये हैं। ज़ाहिर है मोदी कांग्रेस और आप दोनों पर आरोप लगाया है। मोदी यह भी कह रहे हैं कि अब गुजरात के युवा कमान सँभाल चुके हैं। गुजरात में नफ़रत फैलाने वालों को कभी नहीं चुना गया है।

हाल के वर्षों में कांग्रेस में एक अलग ही तरह का संकट देखा गया है। उसके बड़े नेता चुनाव के समय पार्टी छोड़कर भाजपा में चले जाते हैं या भाजपा माहौल बनाने के लिए उन्हें अपने पास खींच लेती है। इन नेताओं में हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर से लेकर 11 बार के छोटा उदयपुर के विधायक मोहन सिंह राठवा शामिल हैं। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस, जिसका ग्रामीण गुजरात में ख़ासा जनाधार है; को कम करके नहीं आँका जा सकता। वैसे आम आदमी पार्टी के जनाधार वाले नेता इंद्रनील ज़रूर कांग्रेस में शामिल हुए हैं।

कांग्रेस ने पिछले तीन महीने में ज़मीन पर अपनी पकड़ मज़बूत की है। पार्टी के इस ख़ामोश प्रचार का हवाला प्रधानमंत्री मोदी के बयान से लगता है; जिसमें उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से कहा था कि आम आदमी पार्टी चुनाव में यह मानकर नहीं बैठ सकते कि कांग्रेस चुप है और कुछ नहीं कर रही। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस या बड़े दावों वाले बयान नहीं दे रहे हैं; लेकिन मुझे पता चला है कि वह क्या कर रहे हैं। हमें सतर्क रहना होगा। कांग्रेस बहुत शान्त है; लेकिन यह मत सोचो कि यह ख़त्म हो गयी है। वे (कांग्रेसी) चुपचाप गाँवों में जा रहे हैं और अपना आधार मज़बूत कर रहे हैं। इस भ्रम में न रहें कि वे (चुनाव के लिए) कुछ नहीं कर रहे हैं।

कांग्रेस सरकारी परियोजनाओं में किसानों और भू-स्वामियों की ज़मीन के अधिग्रहण का मुद्दा उठा रही है। पार्टी के मुताबिक, इसमें उनमें असन्तोष है। याद रहे किसान अहमदाबाद-मुम्बई के बीच तीव्रगामी बुलेट ट्रेन परियोजना के भूमि अधिग्रहण का विरोध करते रहे हैं। ऐसा ही विरोध वडोदरा-मुम्बई एक्सप्रेस-वे परियोजना के भूमि अधिग्रहण पर भी दिखा था। आम आदमी पार्टी ने भी यह मुद्दे उठाये हैं। भाजपा इसके जवाब में कह रही है कि यह तो विकास है, यह कांग्रेस को पच नहीं रहा। पार्टी को भरोसा है कि कांग्रेस के इस विरोध का उसे लाभ मिलेगा।

इस चुनाव में गुजरात के चर्चित पुलिस अधिकारी डीजी बंजारा भी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। बंजारा सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में चर्चा में रहे थे। उन्होंने अपनी पार्टी का नाम प्रजा विजया पक्ष रखा है। उनके आने से बहुत फ़र्क़ शायद ही पड़े। इसके अलावा जद(यू) और छोटू भाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी भी हैं, जिन्हें कांग्रेस के साथ माना जा रहा है।

कांग्रेस तामझाम वाले प्रचार और रैलियों में फ़िलहाल भाजपा और आम आदमी पार्टी के पीछे है। बड़े नेता मैदान में नहीं उतरे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में इतना बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद कांग्रेस के इस सुस्त प्रचार पर राजनीति के जानकारों को हैरानी है। वह यह तो कह रहे हैं कि कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर काम कर रही है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि इससे मीडिया में उसकी उपस्थिति नहीं दिख रही। कांग्रेस के एक नेता का कहना था कि वोट गुजरात की जनता ने देना है और हम उसके पास पहुँचे हुए हैं। कुल मिलाकर गुजरात में 15 के बाद प्रचार ज़ोर पकड़ेगा और उसके बाद ही तस्वीर साफ़ होगी। अभी तक यह लगता है कि राज्य में तीनों मुख्य दल एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की कोशिश में हैं।

पहाड़ में पड़े वोट

हिमाचल में एक महीने से भी ज़्यादा समय तक चला तेज़ तर्रार चुनाव अभियान 12 तारीख़ को वोट पडऩे के साथ ही थम गया। वहाँ रिकॉर्ड 75.6 फ़ीसदी वोट पड़े हैं। राज्य का रिकॉर्ड है कि वहाँ हर बार सत्ता बदल जाती है। इसकी काट के लिए भाजपा ने इस बार रिवाज़ बदलो का नारा दिया था। लेकिन लगता नहीं कि वह ज़्यादा चल पाया है। वहाँ मुख्यमंत्री जयराम के नेतृत्व में पार्टी मैदान में लगातार दूसरी जीत हासिल करने के इरादे से उतरी है। हालाँकि चुनाव में पार्टी ने दिग्गज नेता और दो बार के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को टिकट नहीं दिया। काफ़ी लोग मानते हैं कि भाजपा को इसका नुक़सान होगा। हालाँकि धूमल के बेटे और प्रभावशाली केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने जनता को समझाया है कि धूमल हमेशा आपके और पार्टी के साथ खड़े हैं।

चुनाव में पुरानी पेंशन (ओपीएस) का मुद्दा बहुत ज़ोर से चला है, जिसे कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान के मुख्य वादे के रूप में रखा है। चूँकि हिमाचल में सरकारी सेक्टर में ही नौकरियाँ रही हैं और निजी क्षेत्र काफ़ी छोटा है, पुरानी पेंशन का उसका वादा चला होगा, तो वह सत्ता के क़रीब पहुँच सकती है। हिमाचल में हरेक परिवार में कोई-न-कोई सदस्य सरकारी नौकरी में मिलता है। लिहाज़ा वहाँ कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे बहुत अहमियत रखते हैं।

आम आदमी पार्टी शुरू में हिमाचल में बहुत सक्रिय थी; लेकिन यह महसूस करते हुए कि शायद उसके लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं है, उसने गुजरात पर पूरी ताक़त झोंक दी। वैसे यह आप ही थी, जिसने हिमाचल में सबसे पहले सक्रियता दिखायी थी। अरविन्द केजरीवाल से लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान लगातार हिमाचल के दौरों पर आये। लेकिन चुनाव की घोषणा होते-होते माहौल बनता न देखकर उसने रणनीति बदलकर ख़ुद का पूरा फोकस गुजरात पर कर दिया। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है और वोट भी हासिल करेगी। लेकिन ज़मीनी स्थिति से लगता है कि वहाँ वह गुजरात जैसा नुक़सान कांग्रेस को नहीं पहुँचा पाएगी।

हिमाचल भाजपा के वरिष्ठ नेता गणेश दत्त ने ‘तहलक़ा’ से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रदेश की जनसभाओं में उमड़ी भीड़ से साफ़ है कि उनका जादू भाजपा को एक बार फिर सत्ता में ला रहा है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलेगा, क्योंकि सरकार का काम काफ़ी अच्छा रहा है। हिमाचल में चुनाव के बीच एक वीडियो काफ़ी वायरल हुआ, जिसमें भाजपा के वरिष्ठ नेता (अब बा$गी के रूप में चुनाव लड़ रहे) पूर्व सांसद कृपाल परमार की प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत है। इसमें मोदी परमार से चुनाव में न उतरने को कह रहे हैं। हालाँकि परमार भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा पर उन्हें 15 साल तक उपेक्षित करने का आरोप लगते हुए मैदान से नहीं हटने की बात कर रहे हैं। वैसे इस चुनाव में भाजपा को अपने ही बाग़ियों से बड़ी चुनौती मिली है।

चुनाव जीतने की स्थिति में कौन मुख्यमंत्री बनेगा? भाजपा ने इसकी घोषणा नहीं की है। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा था कि चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व और विधायक मिलकर मुख्यमंत्री पद का $फैसला करेंगे। वैसे ख़ुद अनुराग ठाकुर का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आता रहा है। चुनाव के आख़िर में तो जे.पी. नड्डा का नाम भी मुख्यमंत्री पद के लिए कुछ हलक़ों में चर्चा में रहा। प्रदेश में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए यह चुनाव बड़ी चुनौती हैं। उन्हें सबसे बड़ी चुनौती अपने ज़िले मंडी में ही मिल रही है, जहाँ पार्टी पिछले चुनाव में आठ में छ: सीटें जीत गयी थी।

उधर प्रदेश में विपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकेश अग्निहोत्री ने ‘तहलका’ से कहा कि भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ जबरदस्त माहौल है। लोग इसके जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। अग्निहोत्री ने कहा कि कांग्रेस जनता के सहयोग से जबरदस्त बहुमत से सत्ता में आ रही है। निश्चित ही अगली सरकार कांग्रेस की होगी।

प्रदेश में कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री पद का चेहरा सामने नहीं किया। इस पद के लिए वहाँ काफ़ी जंग है। वहाँ आशा कुमारी, मुकेश अग्निहोत्री, सुखविंदर सुक्खू, कर्नल धनीराम शांडिल, कुलदीप राठौर जैसे नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल हैं।

आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री राजन सुशांत को किसी समय तेज़ तर्रार नेता माना जाता है। वह भाजपा से सांसद भी रहे हैं। हालाँकि ख़ुद चुनाव में उतरे सुशांत पार्टी की नैया पार लगा पाएँगे या नहीं, यही बड़ा सवाल है। उन्होंने ‘तहलका’ से कहा कि भाजपा और कांग्रेस को जनता आजमा चुकी है और उसे अब हमसे बहुत उम्मीद है। हम जिन मुद्दों के साथ जनता के बीच गये, वही जनता के असली मुद्दे हैं। हमारा मुक़ाबला भाजपा से था और हम जीत दर्ज करेंगे।

देश के पहले मतदाता का निधन

मास्टर श्याम सरन नेगी को देश के ज़्यादातर लोग नहीं जानते होंगे। लेकिन इसके बावजूद उनका नाम देश के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा, क्योंकि भारत की आज़ादी के बाद देश के लिए हुए पहले चुनाव में वोट डालने वाले वे प्रथम नागरिक थे। हाल में हिमाचल के जनजातीय किनौर ज़िले के रहने वाले नेगी का 106 साल की उम्र में निधन हो गया। नेगी ने अपने पूरे जीवन में 34 बार मतदान किया, जो एक रिकॉर्ड है। वैसे देश के पहले मतदाता के रूप में उनका नाम रिकॉड्र्स में पहले से दर्ज है। स्कूल टीचर रहे नेगी का लोकतंत्र के लिए जज़्बा लाजवाब था।

हिमाचल प्रदेश में किन्नौर ज़िले के कल्पा के रहने वाले नेगी ने 33 साल की उम्र में पहली बार 1951-52 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा लिया था, जो देश का पहला चुनाव था। दरअसल भारत का पहला चुनाव फरवरी, 1952 में हुआ; लेकिन हिमाचल में सुदूर, आदिवासी इलाकों में ख़राब मौसम के कारण सर्दियों के दौरान मतदान कराना असम्भव था। इसे देखते हुए वहाँ मतदान 23 अक्टूबर, 1951 को (पाँच महीने पहले) ही करवा लिया गया। तब श्याम शरण नेगी स्कूल अध्यापक थे और चुनाव ड्यूटी पर थे। इसके कारण वह अपना वोट डालने सुबह 7:00 बजे ही किन्नौर ज़िले के कल्पा प्राथमिक स्कूल में अपने मतदान केंद्र पर पहुँच गये।

नेगी वहाँ पहुँचकर मतदान करने वाले पहले व्यक्ति थे। इसके बाद उन्हें बताया गया कि इलाक़े में कहीं भी सबसे पहले वोट डालने वाले वह ही हैं। इस तरह एक अनोखा रिकॉर्ड उनके नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया। संयोग देखिए, ख़राब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने जीवन का आख़िरी वोट भी चुनाव (12 नवंबर) से नौ दिन पहले ही पोस्टल बैलेट से डाल दिया था। वोट डालने के दो दिन बाद ही उनका निधन हो गया।

कांग्रेस में लौटेंगे आज़ाद?

ग़ुलाम नबी आज़ाद तीन महीने पहले जोश-जोश में जब कांग्रेस से बाहर गये थे, तो उन्हें अनुमान भी नहीं था कि वह जल्दी ही ख़ुद को अकेला महसूस करने लगेंगे। जम्मू-कश्मीर में उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली। उसका झण्डा भी जारी कर दिया और कार्यकर्ता भी उनके साथ जुटे। लेकिन कांग्रेस में जो महत्त्व वे महसूस करते थे, वैसा अब नहीं कर रहे। उन्हें यह भी पक्का भरोसा नहीं है कि उनकी नयी-नवेली डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी राज्य के भविष्य के विधानसभा चुनाव में कुछ ख़ास कर पाएगी।

आज़ाद दुविधा में हैं और इसका कारण यह है कि वह बहुत ज़्यादा धर्म-निरपेक्ष नेता हैं। उनके भाजपा के साथ जाने की बातें भले मीडिया में आती रहें; आज़ाद दिल से कांग्रेसी ही हैं। भाजपा में उन जैसे नेता को चलना लगभग असम्भव है। आज़ाद का कांग्रेस का प्रेम हाल में तब उमड़ता दिखा, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह दिल से चाहते हैं कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जबरदस्त प्रदर्शन करे और उसकी जीत हो।

वह यह कहना नहीं भूले कि ‘मैं भले ही कांग्रेस से अलग हूँ; लेकिन उसके धर्मनिरपेक्षता की नीति के ख़िलाफ़ नहीं था। इसका कारण केवल पार्टी का सिस्टम कमज़ोर होना था। अब जबकि कांग्रेस में ग़ैर-गाँधी के रूप में मल्लिकार्जुन खडग़े कांग्रेस के अध्यक्ष बन गये हैं, और पार्टी की राहुल गाँधी के नेतृत्व में भारत जोड़ो यात्रा को दक्षिण में अच्छा-ख़ासा समर्थन मिलता दिखा है। आज़ाद निश्चित ही दुविधा में हैं और हो सकता है कि अपनी नयी नवेली पार्टी का कांग्रेस में विलय करके वह फिर घर वापसी कर लें। कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में उनके कुछ समर्थकों ने उन्हें इस तरह की सलाह भी दी है। आज़ाद का यह बयान भी ग़ौर करने लायक है कि आम आदमी पार्टी और केजरीवाल केवल दिल्ली तक सीमित हैं। पंजाब को भी वह कुशलता से नहीं चला पा रहे हैं। सिर्फ़ कांग्रेस ही है, जो भाजपा को गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव में कड़ी टक्कर दे सकती है; क्योंकि उसकी एक समावेशी नीति है।

 

निश्चित ही लगता है कि 73 साल के आज़ाद तीन महीने में ही कांग्रेस से बाहर जाकर उदास हो गये हैं और उनका कांग्रेस प्रेम फिर हिलोरे लेने लगा है। कांग्रेस में रहते हुए आज़ाद की राष्ट्रीय मीडिया में हर रोज़ चर्चा होती थी, जबकि पिछले तीन महीने में इक्का-दुक्का ही उनका नाम टीवी चैनल्स या अख़बारों में दिखा या सुना गया है। यह कहा जाता है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला चाहते थे आज़ाद उनके साथ जुड़ जाएँ। लेकिन आज़ाद ने इससे मना कर दिया। हालाँकि यह भी सच है कि आज़ाद कई दशक से फ़ारूक़ के नज़दीक माने जाते रहे हैं; जबकि पीडीपी नेतृत्व से आज़ाद दूर रहे हैं। जब सन् 2005 में उनकी पीडीपी के गठबंधन में सरकार बनी थी, तब भी आज़ाद मन से पीडीपी की साथ नहीं दिखते थे। आज़ाद ने जम्मू-कश्मीर में अपनी पार्टी बनाकर जिस स्तर के समर्थन की उम्मीद की थी, वह उन्हें मिलता नहीं दिखा है; भले राज्य में उन्हें एक बड़ा नेता माना जाता है। कांग्रेस से भी बहुत कम लोग उनके साथ गये। ऐसे में आज़ाद अब कांग्रेस में लौटने की सोचें, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए।

पृथक राज्यों की माँग कितनी सही?

शिवेंद्र राणा

भारत को भाषायी, जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक विविधता के बावजूद एकता का प्रतिमान राष्ट्र माना जाता है। साहित्यिक दृष्टि से इसके लाक्षणिक अर्थ होंगे, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से यह विविधता हमेशा राष्ट्र के लिए चुनौती बनी रही है। पिछले दिनों पुन: ऐसी चुनौती पेश करने का प्रयास हुआ, जब पूर्वी नागालैंड के छ: ज़िलों को मिलाकर अलग राज्य फ्रंटियर नागालैंड की माँग की गयी तथा कर्नाटक के कलबुर्गी में कुछ लोग अलग राज्य की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आये। पहले भी देश भर में अलग राज्यों की माँगें निरंतर उठती रही हैं; जैसे- मणिपुर में कुकीलैंड की, तमिलनाडु में कोंगुनाडु की, उत्तरी बंगाल में कामतापुर की, महाराष्ट्र में विदर्भ की तथा कर्नाटक में तमिलनाडु की माँग।

भारत में पृथक राज्यों के आन्दोलन सदैव दिशा-भ्रम का शिकार रहे हैं। ये मुख्यत: तीन बिन्दुओं पर आधारित रहे हैं- भाषायी, धार्मिक एवं नृजातीय (जाति, वंश और संस्कृति)। आज़ादी के पश्चात् पहले दो दशकों में राज्यों में सबसे प्रमुख विभाजनकारी मुद्दा भाषावाद था। कोई भी समाज अपनी भाषा से भावनात्मक लगाव रखता है तथा उसके रक्षार्थ एवं उसके सम्मान स्थापना हेतु की गयी अपील पर वह त्वरित रूप से एकजुट हो जाता है। दक्षिण में ऐसा ही हुआ, जब तेलुगू भाषियों के दुर्धर्ष आन्दोलन के पश्चात् पृथक आंध्रा की स्थापना हुई।

भारत का नेतृत्व वर्ग अदूरदर्शी नहीं था, वह भविष्य की इन कठिनाइयों को भाँप गया था। इसलिए ऐसे विभाजनकारी मुद्दों के आधार पर राज्यों के गठन को तरजीह नहीं दी गयी। राज्यों के पुनर्गठन हेतु सुझाव के लिए गठित धर आयोग (1948) तथा एस.आर.सी. आयोग (1953) ने प्रशासनिक एवं आर्थिक पहलुओं को समुचित महत्त्व देने की सलाह दी थी। लेकिन बाद में उग्र आन्दोलनों को ध्यान में रखकर तथा विघटनकारी प्रवृतियों को हतोत्साहित करने के लिए दिसंबर,1948 में गठित जे.वी.पी. (जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया) समिति ने तात्कालिक रूप से भाषायी आधार पर राज्य पुनर्गठन की सलाह दी। एक नवगठित हो रहे राष्ट्र के तात्कालिक हित के नाम पर ऐसे मुद्दों पर नरम रुख़ अपनाया गया, जिसका प्रतिफल यह हुआ कि क्षेत्रीय विघटनवादी स्वार्थी तत्त्वों को भविष्य में अपनी अनर्गल माँगों की प्रेरणा मिली और प्रतिफल स्वरूप कश्मीर, नागालैंड, मिजोरम तथा खालिस्तान के विघटनकारी विद्रोह उभरकर सामने आये।

धार्मिक एवं नृजातीय अपील भाषा से कहीं अधिक संकुचित एवं विघटनकारी होती है। इसके केंद्र में स्थित साम्प्रदायिकता का पुट इसकी गति एवं सम्बन्धित समाज के संकेंद्रण भावना को और तीव्र करता है। इन्हीं भावनाओं की तुष्टि हेतु सन् 1966 में पंजाब, सन् 1963 में नागालैंड, सन् 1987 में मिजोरम का गठन हुआ। भाषायी आन्दोलन को छोड़कर धार्मिक एवं नृजातीय आन्दोलन देश के लिए विखंडनवादी रहे हैं। मुस्लिम लीग ने धार्मिक भावना को उभारकर देश का विभाजन कराया और इसी आधार पर ख़ालिस्तान आन्दोलन की नींव पड़ी। पूर्वोत्तर में अलग राज्य के निर्माण आन्दोलन जो पूर्व में अलगाववादी रहे हैं; जैसे नागा (1953) एवं मिजो विद्रोह (1963), नृजातीय आधार पर ही समर्थित थे और इसी आधार पर पृथक राष्ट्रीयता का दावा कर रहे थे।

भाषा क्षेत्रीयता एकता या राज्य गठन का आधार बन सकती है, यह बात पिछले पाँच दशकों में ग़लत सिद्ध हो चुकी है। जिस तेलगु-भाषी एकता के नाम पर आंध्र प्रदेश का गठन (1953) हुआ। एक दशक बीतते-बीतते सन् 1969 में पृथक तेलंगाना की माँग प्रारम्भ हो गयी, जिसकी हिंसक और विभाजनकारी पूर्णाहूति सन् 2014 में हुई।

कहने का तात्पर्य है कि पृथकतावाद की यही समस्या है कि एक बार पैदा होने के पश्चात् यह किसी-न-किसी रूप में जीवित रहती है तथा राजनीतिक स्वार्थ से इसे ऊर्जा मिलती रहती है। अन्यत्र भोजपुरी-भाषी बिहार से अलग हुए झारखण्ड में तो बाक़ायदा बिहारी भगाओ की हिंसक मुहिम शुरू हो गयी। महाराष्ट्र में विदर्भ की माँग भी मराठी तथा गुजरात से पृथक सौराष्ट्र की माँग गुजराती ही कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पृथक उत्तराखण्ड हेतु आन्दोलन का ख़ूनी इतिहास सर्वविदित है। वहीं पूर्वांचल की माँग भी हिन्दी पट्टी का समाज ही कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय भाषा के सम्बन्ध में दक्षिण में उपजा हिन्दी-विरोध आज लुप्त हो चुका है तथा पिछले दो दशकों में हिन्दी की स्वीकार्यता वहाँ बढ़ी है।

हालाँकि कई दफ़ा ऐसे आन्दोलनों को अनावश्यक तरजीह भी मिल जाती है। कुछ अति उत्साही वर्ग द्वारा की गयी उत्तेजक माँगें अक्सर असावधानी एवं राजनीतिक लाभ हेतु सम्पूर्ण राज्य या सम्पूर्ण समुदाय विशेष की आवाज़ मान ली जाती है। नागा विद्रोह का ही उदाहरण लें, तो अपने उत्कर्ष के दिनों में भी पाँच लाख की कुल नागा आबादी में से अधिकतम 10,000 लोग ही अलगाववाद के समर्थन में थे। बल्कि बीतते समय के साथ यह संख्या और न्यून होती गयी। इसका अर्थ है- कुछ मुट्ठी भर भारत विरोधियों को क्षेत्र विशेष का जनप्रतिनिधि मानकर उनके धृष्टतापूर्ण तर्कों के अनुरूप राष्ट्र का विखंडन स्वीकार किया जाना अनुचित होता। यही नहीं, प्रमाणित है कि एक समय के बाद इन विघटनवादियों का अपने क्षेत्र एवं वर्ग में भी काफ़ी विरोध हुआ है, जो कई दफ़ा प्रतिहिंसा का रूप ले लेता है। जैसे- कश्मीरी अलगाववादियों के विरुद्ध स्थानीय मुसलमानों का संगठन इख़्वान तथा वनवासी समुदाय का संगठन सलवा जुडूम द्वारा नक्सलवादियों का हिंसक प्रतिकार करना। वर्तमान में प्रचलित तर्क ‘विकास की दृष्टि से छोटे राज्यों की अनुकूलता’ को स्वीकारना भी कठिन है। अगर ऐसा होता, तो अब तक हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को स्विट्जरलैंड बन जाना चाहिए था, किन्तु यथार्थ यह है कि ये राज्य मानव विकास सूचकांक में ग़रीबी, रोज़गार, शिक्षा, बाल मृत्यु दर, चिकित्सा जैसे कई पैमानों पर दयनीय स्थिति में हैं। नये राज्यों के गठन के साथ जनता के पैसे पर नयी राजधानी का निर्माण, चुनाव, राज्यपाल की नियुक्ति, उनका वेतन व अन्य सुविधाएँ जैसी कई राजनीतिक और आर्थिक दिक़्क़तें भी होंगी, जिनका वहन अंतत: जनता को करना होगा।

छोटे राज्य राजनीतिक दलों की उठापटक और सत्ता परिवर्तन के प्रहसन के प्रदर्शन का माध्यम बन चुके हैं। उत्तराखण्ड में पिछले 20 साल में आठ मुख्यमंत्री बदले गये तथा झारखण्ड में 20 साल में 11 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ हुई। वहीं हिमाचल प्रदेश में कई दशकों से दो परिवारों का राजनीतिक वर्चस्व चला आ रहा है। सन् 1990 के बाद से अब तक ज़्यादातर पृथक राज्य आन्दोलनों का मूल आधार प्रशासनिक भेदभाव, विकास की असमानता एवं आर्थिक पिछड़ापन आदि है। सन् 2000 में उत्तराखण्ड, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ के गठन ने इन मुद्दों पर आधारित आन्दोलनों को अपरोक्ष वैधता प्रदान की। इसी आधार पर बसपा सरकार (2007-12) द्वारा उत्तर प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने की सिफ़ारिश की गयी। अगर इन मुद्दों का अवलोकन करें, तो धर आयोग एवं फ़ज़ल अली आयोग की प्रशासनिक सुलभता का सुझाव उचित ही था। यदि पूर्व में यह सलाह मानी गयी होती, तो परिस्थितियाँ अधिक अनुकूल होतीं। फिर इस पिछड़ेपन के लिए स्थानीय जनता भी प्रत्यक्ष रूप से ज़ाम्मेदार है। उदाहरणस्वरूप, सन् 1949 में मुम्बई (तब बम्बई), जिसमें आज के महाराष्ट्र और गुजरात जैसे उन्नत राज्य शामिल थे; की प्रति व्यक्ति आय 272 रुपये थी। वहीं बिहार में 200 रुपये प्रति व्यक्ति। बाद के दशकों में इन राज्यों ने उन्नति की ओर क़दम बढ़ाये और अवनति की ओर सामाजिक क्रान्ति के नाम पर 80-90 के दशकों में बिहार की जनता ने ऐसे लोगों को सत्ता सौंपी, जिन्होंने सम्भावनाओं से भरे एक राज्य को जंगल में बदल दिया। प्रतिनिधि चयन के समय विकासवाद की सोच छोड़कर जाति, धर्म, क्षेत्रीयता आदि के क्षुद्र मनोभावों पर आधारित मतदान करने वाली जनता को अपनी दुरावस्था के लिए देश की सरकार, राज्यों या शेष भारतीयों पर दोषारोपण करने का नैतिक अधिकार नहीं है।

अब उत्तर-पूर्वी राज्यों का उदाहरण लें, तो भारतीय संविधान सभा आरम्भ से ही वनवासी समुदाय के कल्याण हेतु तत्पर थी। उसने तक़रीबन कुल सात फ़ीसदी आबादी वाले 400 समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया तथा विधायिका (अनुच्छेद-330 एवं 332) व सरकारी नौकरियों (अनुच्छेद-335) में 7.5 फ़ीसदी आरक्षण प्रदान किया। संविधान के भाग-5 केंद्रीय क्षेत्र और भाग-6 पूर्वोत्तर के आदिवासी समाज से सम्बन्धित हैं। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा प्रदान करने के अतिरिक्त योजना एवं नीति आयोग ने केंद्रीय राजस्व से अतिरिक्त धन एवं अन्य सुविधाएँ भी मुहैया करायीं। माना वहाँ परिस्थितियाँ कठिन हैं। किन्तु पिछले 70 वर्षों से अधिक की अवधि में सीमित जनसंख्या की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पायी। जन-असन्तोष के पीछे सबसे प्रमुख कारण राजनीतिक अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार ही हैं। इसकी कुछ ज़ाम्मेदारी स्थानीय जनता की भी है, जिसने प्रतिनिधि चयन में निरंतर ग़लतियाँ की हैं। सबसे मुख्य प्रश्न आत्म-निर्णयन के अधिकार की विकृत व्याख्या का है। ऐसे मूर्खतापूर्ण विश्लेषण अंतत: पृथकतावाद को ही प्रश्रय देते हैं। देश के किसी एक भू-भाग में रहने वाले लोग उसके अधिष्ठाता अथवा स्वयंभू स्वामी नहीं होते, जो जब चाहें राज्य की पृथकता की माँग शुरू कर दें। राष्ट्र भूमि के टुकड़ों से नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत, समान इतिहास जैसे भावनात्मक बंधनों से बनते हैं। देश का हर हिस्सा शेष राष्ट्र से सहजीविता और साहचार्य की भावना से भी जुड़ा हुआ है। आत्म-निर्णयन की असन्तुलित माँगें राष्ट्र की एकता के लिए घातक होती हैं। पृथक राज्यों की माँग कभी भी पृथक राष्ट्र की माँग में परिवर्तित हो सकती है। पंजाब इसका ज्वलंत उदाहरण है, जो ख़ालिस्तान माँग का अखाड़ा बना।

स्वतंत्रता से वर्तमान तक की सभी स्थितियों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि अब तक नये राज्यों का गठन नीतिगत नहीं, बल्कि भावनात्मक आधार पर ही हुआ है। इन भावनात्मक आन्दोलनों के कारण देश ने बहुत कठिन समय का अनुभव किया है। असल में भाषा, धर्म अथवा नृजातीयता के आधार पर नये राज्यों की माँगों से जनित प्रदर्शनों को हिंसक और विघटनकारी स्वरूप प्रदान कर नेतृत्व वर्ग अपने लिए जनाधार बटोरने का लाभ तो ले लेते हैं, परन्तु इससे उत्पन्न नकारात्मकता को लम्बे समय तक राज्य के साथ ही देश को भी भुगतना पड़ता है। समय है कि नित नये राज्यों की माँग से सम्बन्धित आन्दोलनों की परम्परा को हतोत्साहित किया जाए; क्योंकि राजनीति से प्रेरित एवं उसके द्वारा प्रश्रय दिये गये संकुचित क्षेत्रीय स्वार्थी तत्त्व राष्ट्र के लिए विघटनकारी परिस्थितियाँ पैदा करेंगे। फिर भी यदि राज्यों का पुनर्गठन आवश्यक ही हो, तो प्रशासनिक अनुकूलता एवं विकास प्रतिमानों के साथ ही सांस्कृतिक-सामाजिक समन्वय इसकी कसौटी होनी चाहिए।

(लेखक राजनीति और इतिहास के जानकार हैं।)

सुप्रीम कोर्ट का कठुआ रेप मामले में बड़ा फैसला, आरोपी पर अब बालिग की तरह चलेगा मुकदमा

सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू के कठुआ दुष्कर्म मामले में बड़ा फैसला देते हुए आरोपी शुभम सांग्रा को जुवेनाइल मानने से इनकार करते हुए उस पर बालिग की तरह मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। इस तरह सर्वोच्च अदालत ने इस मामले से जुड़े निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है।

इस मामले में बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जुवेनाइल तय करने के लिए दस्तावेजों के अभाव में न्याय के हित में मेडिकल राय पर विचार किया जाना चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोपी शुभम सांग्रा के खिलाफ व्यस्क के तौर पर ही ट्रायल चलेगा।

सांग्रा के जुवेनाइल होने के निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति  जेबी पारदीवाला ने अपने फैसले में कहा कि ‘किसी आरोपी की उम्र तय करने के लिए अगर कोई पुख्ता सबूत नहीं है तो ऐसी स्थिति में ‘मेडिकल राय ‘ को ही सही तरीका माना जाएगा।’ अदालत ने सांग्रा के घटना के समय जुवेनाइल होने से इनकार कर दिया।

बता दें उच्च न्यायालय और कठुआ के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत ने भी आरोपी को जुवेनाइल ही माना था। याद रहे 7 फरवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने कठुआ मामले के एक आरोपी पर जुवेनाइल कोर्ट में चल रही कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। यह रोक जुवेनाइल कानून के तहत लगाई गई थी। यह फैसला
जम्मू-कश्मीर सरकार की उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील के बाद आया था।

चीन पर अंकुश की दरकार

सम्प्रभुता, पड़ोसी देशों की मदद और क्षेत्रीय अखण्डता के मुद्दों पर भारत से अग्रणी देश कोई नहीं है। हमेशा देखा गया है कि भारत ने हर आपदा में पड़ोसी देशों की मदद की है। कोरोना-काल में कई देशों को कोरोना-टीका और दूसरी दवाएँ देने से लेकर नेपाल और श्रीलंका की बुरे समय में मदद करने से भारत पीछे नहीं हटा। लेकिन इससे इतर एक बात यह भी है कि भारत के पड़ोसी देश उससे हमेशा शत्रुता रखते रहे हैं। अकारण ही भारत से शत्रुता करने वाले देशों की अगर लिस्ट तैयार करें, तो भारत का चीन से बड़ा शत्रु कोई दूसरा नहीं निकलेगा।

हालाँकि पाकिस्तान भी भारत का बहुत बड़ा और बँटवारे के समय का ही शत्रु है; लेकिन शत्रुता की हदें पार करते हुए कई मामलों में चीन ने पाकिस्तान को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि चीन कभी नहीं चाहता कि भारत उससे कभी आगे निकल सके। दरअसल चीन जानता है कि अगर एशिया में कोई देश उसे हर क्षेत्र में चुनौती दे सकता है, तो वो इकलौता भारत है। बस यही बात चीन को अखरती है और वो कई दशक से भारत को दबाने की और तबाह करने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है। इसके लिए न केवल चीन स्वयं दबंगई पर उतरा हुआ है, बल्कि उसने भारत के मित्र पड़ोसी देशों को भी साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति से अपने पक्ष में किया हुआ है।

आज की तारीख़ में भारत से ही अलग होकर बने सभी देशों ने भारत को आँखें दिखानी शुरू कर दी हैं। चीन की मुख्य योजना है- पड़ोसी देशों की ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करना। इसी पॉलिसी के तहत उसने न केवल भारत की बहुत सारी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है, बल्कि पाकिस्तान, अफ़ग़निस्तान, म्यांमार, नेपाल, भूटान, क़ज़ाख़िस्तान, किर्ग़िस्तान, लाओस, मंगोलिया, उत्तर कोरिया, रूस, तजाकिस्तान और वियतनाम को भी नहीं बख़्शा है। ताइवान पर भी उसने पिछले दिनों क़ब्ज़ा करने की रणनीति बना ली थी; लेकिन ताइवान की हिम्मत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते चीन ताइवान पर हमला नहीं कर सका। तिब्बत पर तो चीन 23 मई, 1951 से ही अवैध क़ब्ज़ा किये बैठा है।

दरअसल चीन की सीमा से दुनिया के 14 देशों की सीमा लगती है और इन सभी देशों के साथ चीन का सीमा विवाद है। इसकी प्रमुख वजह है चीन की नीयत ख़राब होना। वास्तव में चीन को दुनिया का सबसे ताक़तवर देश बनने का फोबिया है, जिसके लिए वह सबसे पहले अपने पड़ोसी देशों पर दबदबा बनाना चाहता है। जैसा कि पिछले समय में कई रिपोट्र्स आयी हैं कि चीन ने भारत की क़रीब 38,000 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है। फरवरी, 2022 को संसद में सरकार ने ख़ुद स्वीकार किया कि चीन ने भारत की ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर लिया है। हालाँकि अब तक की तमाम बयानों में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर गृह मंत्री शाह तक इस बात को नकारते आये हैं; लेकिन इसी साल फरवरी में एक सवाल के जवाब में विदेश राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन ने लोकसभा में यह बात स्वीकार की कि चीन ने भारत के लद्दाख़ की क़रीब 38,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है। उन्होंने बताया कि चीन लद्दाख़ में पिछले क़रीब छ: दशक से क़ब्ज़ा कर रहा है।

भारत की ज़मीन पर चीन के अवैध क़ब्ज़े को लेकर अब तक प्रकाशित विभिन्न रिपोर्ट बताती हैं कि चीन का भारत की क़रीब 43,180 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा हो चुका है। ऐसे में सरकार के हाथ पर हाथ धरे रहने को लेकर सवाल उठने ही चाहिए। क्योंकि अगर इसी तरह से चीन भारत की ज़मीनें क़ब्ज़ाता रहा, तो हिमालय की सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है, जिसे हड़पने के लिए चीन कई दशक से चालें चल रहा है। चीन ने भारत को कमज़ोर करने के लिए उसके सात पड़ोसी देशों की ज़मीनों पर न केवल काफ़ी हद तक क़ब्ज़ा किया है, बल्कि उन्हें किसी-न-किसी तरह से अपने पक्ष में किया है। इन सात देशों में तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान और अफ़ग़निस्तान हैं। इसके साथ ही चीन हिमालय पर क़ब्ज़े के लिए भारत की पाँच उँगलियों पर पूरी तरह क़ब्ज़ा करना चाहता है, जिन्हें फाइव फिंगर कहा जाता है। इन फाइव फिंगर में दो भारत के पड़ोसी देश नेपाल और भूटान हैं, जबकि तीन भारत के प्रदेश अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख़ और सिक्किम है। चीन जानता है कि अगर ये पाँचों उसके क़ब्ज़े में आ गये, तो उसे हिमालय पर क़ब्ज़ा करने से कोई नहीं रोक सकेगा। पिछले कुछ वर्षों से चीन ने इन फाइव फिंगर पर क़ब्ज़े के प्रयास तेज़ कर दिये हैं।

पिछले ही साल अप्रैल, 2021 में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख लोबसांग सांग्ये ने एक सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा करते हुए चीन की इस चाल का ख़ुलासा किया था। लोबसांग सांग्ये ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि तिब्बत तो बस एक ज़रिया है, चीन का असली मक़सद हिमालय और हिमालयी क्षेत्र में फाइव फिंगर कहे जाने वाले हिस्सों पर क़ब्ज़ा करना है, ताकि वह भारत को अपने पंजे में फँसा सके।

विदित हो कि तिब्बत पर क़ब्ज़े के बाद से ही चीन की नज़र भारत की ओर टिकी हुई है, जिसके लिए वह लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगा हुआ है। ऐसे में भारत को अपनी सैन्य शक्ति को कमज़ोर नहीं करना चाहिए, जिसके कि आरोप भारत सरकार पर लगते रहे हैं। अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की भर्तियाँ निकालने से तो यह आशंका ही बढ़ गयी है कि भारत सरकार अपनी सेनाओं को कमज़ोर कर रही है, जबकि चीन अपनी सेनाओं को लगातार ताक़तवर बना रहा है। दोनों देशों के रक्षा बजट की तुलना ही नहीं है। सन् 2021 में चीन का कुल रक्षा बजट 17,03,559 करोड़ भारतीय रुपये था, जबकि भारत का कुल रक्षा बजट वित्त वर्ष 2022-23 में मात्र 5,25,166.15 करोड़ रुपये ही आवंटित किया गया। यानी की चीन का रक्षा बजट भारत से तीन गुने से भी ज़्यादा है।

भारत के ख़िलाफ़ चीन के हौसले सन् 1962 की लड़ाई के बाद बढ़े हैं। लेकिन सन् 2014 के बाद चीन के हमलों में बहुत ही तेज़ी आयी है। इन आठ वर्षों में चीन ने न केवल भारत पर चहुँतरफ़ा दबाव बनाया है, बल्कि भारतीय सैनिकों और भारत के सीमावर्ती राज्यों के लोगों पर हमले भी तेज़ किये हैं। गलवान घाटी में 16-17 जून, 2020 की रात के भारतीय सैनिकों पर चीनी सैनिकों के हमले को कौन भूल सकता है, जो चीनी सैनिकों ने बॉर्डर कमांडर की बैठक हुए पीपी 14-15-17 के उस समझौते को दरकिनार करते हुए किया था, जिसमें साफ़ तय हुआ था कि चीन और भारत के सैनिक एलएसी को क्रास नहीं करेंगे। भारतीय सैनिकों ने तो इस समझौते का पालन किया; लेकिन चीनी सैनिकों ने बिलकुल नहीं किया। सैटेलाइट से समय-समय पर मिली तस्वीरें बताती हैं कि चीन लद्दाख़, अरुणाचल, उत्तराखण्ड की भारतीय सीमा में लगातार घुसपैठ करके अपने हेलीपैड, सैन्य बंकर बनाने के अलावा गाँव-के-गाँव बसाने में लगा है।

एक समय था, जब नेपाल का सबसे बड़ा दुश्मन चीन था। लेकिन आज उसी चीन के दबाव में या फिर उसकी शय पर नेपाल भारत को आँखें दिखाने तक से गुरेज़ नहीं करता है। यह तब है, जब नेपाल के एक बड़े भू-भाग पर चीन ने क़ब्ज़ा कर रखा है। दरअसल यह सब नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार बनने के बाद हुआ है। इसलिए चीन का कम्युनिज्म नेपाल को गुमराह करके वो सब करा रहा है, जो किसी भी हाल में ख़ुद नेपाल के हित में नहीं है। नेपाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि हर परिस्थिति में भारत ने उसका साथ दिया है। एक समय था, जब चीन से प्रताडि़त नेपाल ने भारत से मदद माँगी थी।

नेपाल को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज भी बड़ी संख्या में भारत में रोज़गार पा रहे हैं और हर रोज़ बड़ी संख्या में उसके नागरिक रोज़गार की तलाश में भारत आते है। अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को कैसे निभाना चाहिए? यह नेपाल को तिब्बत से सीखना चाहिए, जिसने चीन के तमाम दबावों और ज़ुल्मों के बाद भी भारत से अपने सम्बन्धों को मज़बूती से बरक़रार रखा हुआ है। तिब्बत यह अच्छी तरह से जानता है कि अगर कभी चीन ने अति की, तो उससे निपटने की सामथ्र्य केवल भारत में है।

हालाँकि काफ़ी विरोध के बावजूद चीन पड़ोसी देशों की सीमाओं में घुसकर धीरे-धीरे अवैध क़ब्ज़ा करने से बाज नहीं आ रहा है। हाल ही में उसने पाकिस्तान के साथ मिलकर अफ़ग़निस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का विस्तार करने की 60 अरब अमेरिकी डॉलर की परियोजना पर आगे बढऩे का फ़ैसला किया है। यह परियोजना बलूचिस्तान में पाकिस्तान के दक्षिणी ग्वादर बंदरगाह को चीन के पश्चिमी शिनजियांग से जोड़ती है और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर से होकर गुज़रती है। आज निरंकुश चीन पर अंकुश लगाने की दरकार है। भारत ने लगातार इस परियोजना का विरोध किया है। लेकिन अकेले भारत के विरोध से कुछ नहीं होगा, बल्कि हर उस देश को चीन का विरोध करना होगा, जो उसकी अतिक्रमणकारी नीति से परेशान है। ऐसा नहीं कि ये देश चीन से निपटना नहीं चाहते, लेकिन इनमें एकजुटता की बेहद कमी है।

कठिन दौर से गुज़र रहा पाकिस्तान

राजनीतिक तनाव से देश में गृह युद्ध का भी बढ़ रहा ख़तरा

दुनिया भर की निगाह इस बात पर टिकी है कि पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और वहाँ की ताक़तवर सेना में चल रही जंग में किसकी जीत होती है? हाल के दशकों में पाकिस्तान में यह नयी तरह की राजनीतिक जंग है, जिसमें सेना के सामने मुश्किल चुनौती वाली स्थिति है। यह पहली बार दिखा है कि सेना की सत्ता पर पकड़ उतनी मज़बूत नहीं रही। नहीं तो यही होता रहा था कि सेना (एस्टेब्लिशमेंट) मौक़ा मिलते ही सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाती थी। इमरान ख़ान ने निश्चित ही यह ठान लिया लगता है कि वह सेना की सत्ता के सामने हथियार नहीं डालेंगे। बहुत-से लोगों को यह भी लगता है कि वर्तमान स्थितियाँ पाकिस्तान को गृह युद्ध की तरफ़ धकेल सकती हैं। पाकिस्तान में इसी महीने सेना के ताक़तवर जनरल क़मर जावेद बाजवा रिटायर हो रहे हैं, लिहाज़ा पाकिस्तान एक देश के रूप में कठिन दौर में है।

पाकिस्तान में हाल में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान पर हमले के बाद वहाँ की सियासत काफ़ी गरमा गयी है। इमरान ख़ान हमले के बाद भी झुकने को तैयार नहीं और अपनी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) का मार्च जारी रखे हुए हैं। पाकिस्तान की राजनीति समझने से ज़ाहिर होता है कि इमरान ख़ान पर हमला आम हमला नहीं था और यह या तो उनकी जान लेने की कोशिश थी या उन्हें चेतावनी देने की कोशिश कि वह सेना-आईएसआई के ख़िलाफ़ अपनी ज़ुबान बन्द रखें।

इस सारी स्थिति में सत्तारूढ़ शाहबाज़ शरीफ़ की पार्टी पीएमएल (एन) और भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) अजब दुविधा में फँस गये हैं। कारण यह है कि सेना के दबदबे से यह दोनों पार्टियाँ भी छुटकारा पाना चाहती हैं; लेकिन उनके सामने फ़िलहाल सेना से बड़ी चुनौती इमरान ख़ान बन गये हैं। इमरान के मार्च को जनता से मिल रहे समर्थन से शरीफ़ और भुट्टो दोनों हिले हुए हैं। पाकिस्तान की राजनीति के नब्ज़ समझने वाले जानकारों का कहना है कि यदि आज चुनाव हो जाएँ, तो इमरान ख़ान बाज़ी मार सकते हैं। यही कारण है कि इमरान ख़ान लगातार देश में चुनाव करवाने की माँग कर रहे हैं।

 

सेना और सत्तारूढ़ दल की हाल की पीटीआई को तोडऩे की कोशिशें सफल नहीं हुई हैं और समर्थक नेता इमरान ख़ान से जुड़े हुए हैं। इमरान ख़ान की जनता के बीच चल रही रैलियाँ जिस तरह की भीड़ जुटा रही हैं, उनसे ज़ाहिर हो जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री को अगला चुनाव जीतने का पक्का भरोसा है। इमरान ख़ान के साथ लोगों के दिखने की एक बड़ी बजह यह भी है कि पीएमएल(एन)-पीपीपी-अन्य दलों की मिली जुली सरकार कई मोर्चों पर नाकाम साबित हुई है और जनता की अपेक्षाएँ वैसी-की-वैसी ही हैं। इमरान ख़ान इससे उत्साहित हैं।

आज की तारीख़ में पीएमएल(एन)-पीपीपी की प्राथमिकता इमरान ख़ान से निपटने की बन गयी है। लिहाज़ा उन्हें सेना का साथ पड़ रहा है। वहाँ इसी महीने के आख़िर में सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा रिटायर हो रहे हैं और सत्तारूढ़ दल अपना समर्थक सेनाध्यक्ष बनाना चाहता है, ताकि इमरान ख़ान को कमज़ोर किया जा सके। सेना के बीच भी एक बड़ा वर्ग इमरान ख़ान से ख़फ़ा है, क्योंकि सेना अपनी सत्ता को चुनौती को बर्दाश्त नहीं कर पा रही। हालाँकि ऐसा नहीं है कि सेना के बीच सभी इमरान ख़ान के विरोधी ही हैं। सेना का एक वर्ग ऐसा भी है, जो इमरान ख़ान का समर्थन करता है।

इसके अलावा पाकिस्तान की ताक़तवर एजेंसी आईएसआई में भी पदों पर बैठे लोग इमरान ख़ान से ख़फ़ा हैं। इमरान ख़ान ने तो नाम लेकर आरोप लगाया था कि हाल में उन पर जो जानलेवा हमला हुआ था, उसके पीछे आईएसआई और सरकार के दो बड़े लोग शामिल थे। इन सभी ने इसका खण्डन किया था; लेकिन यह तो पाकिस्तान में आम चर्चा है कि सेना इमरान ख़ान को बर्दाश्त नहीं कर पा रही। जनता में सेना का जो रुतबा कभी था, वह अब कम हो चुका है।

इमरान ख़ान चतुर राजनीतिक साबित हुए हैं। वह सेना के राजनीतिक में दख़ल का विरोध करने के लिए भारत का सहारा लेते हैं। उन्हें पता है कि भारत की सेना बहुत अनुशासित है और यह बात पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोगों को पसन्द है। इमरान ख़ान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि भारत का दुनिया में डंका इसलिए बजता है कि वह ठोक-बजाकर अपनी बात कहता है। जबकि पाकिस्तान की छवि तो भीख माँगने वाले देश की बन गयी है, जो अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाता फिरता है।

ऐसा कहकर इमरान ख़ान पाकिस्तान की जनता के स्वाभिमान को जगाना चाहते हैं। साथ ही वह जनता को यह सन्देश देना चाहते हैं कि सेना नहीं, चुनी हुई सरकार ही उनका कल्याण कर सकती है और देश को आगे बढ़ा सकती है। पाकिस्तान में हाल के वर्षों में सेना के प्रति जनता का वह भरोसा नहीं रह गया है, जो कभी होता था। कारण यह है कि युवा रोज़गार चाहते हैं और देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का डंका बजाना चाहते हैं।

वह भारत के युवाओं से अपनी तुलना करते हैं और महसूस करते हैं कि सेना और सरकारों की भूख ने देश के युवाओं को बहुत पीछे धकेल दिया है, जबकि भारत के युवा दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं। वह महसूस करते हैं कि पाकिस्तान में सेना और राजनीति के लोग भारत-पाकिस्तान के बीच दुश्मनी दिखाकर उनकी भावनाओं से खेलते रहे हैं और हक़ीक़त में उन्हें इससे कुछ हासिल नहीं हुआ है, न ही देश का इससे कुछ भला हुआ है।

पाकिस्तान की जनता और युवाओं में जो स्थिति आज बन रही है, वह मोहभंग होने जैसी है। उन्हें रास्ता नहीं दिख रहा; लेकिन वह महसूस कर रहे हैं कि जब तक देश की राजनीति का ढर्रा नहीं बदलता, देश के हालत में बदलाव नहीं आ सकता। सत्ता में बैठे लोगों ने देश के लोगों में भारत के पार्टी नफरत के बीज इतने गहरे बो दिये हैं कि उन्हें इससे बाहर निकलने में वक़्त लगेगा। लेकिन यह भी सच है कि पाकिस्तानी युवा कुछ अलग दिशा में सोचने लगे हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान में जनता के बीच सेना का जो समर्थन एक दशक पहले तक था, वह अब नहीं रहा। जनता पहले यह सोचती थी कि भारत के ख़तरे से उन्हें सेना ही बचा सकती है; लकिन अब लोग यह सवाल करने लगे हैं कि वास्तव में भारत की तरफ़ से उन्हें ख़तरा है? या यह सिर्फ़ सेना और राजनीति के लोगों का खड़ा किया हौवा है?

ऐसे में आज जब इमरान ख़ान सेना के ख़िलाफ़ खड़े दिख रहे हैं, तो जनता सेना की जगह इमरान ख़ान की तरफ़ देख रही है। उन्हें लगता है कि इमरान ख़ान नया पाकिस्तान बना सकते हैं। उन्हें रोज़गार दे सकते हैं और महँगाई से उन्हें बचा सकते हैं। इमरान ख़ान की राजनीति भिन्न है। वह अन्य दलों के भारत के ख़िलाफ़ प्रलाप की जगह भारत और नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करके जनता को बताना यही चाहते हैं कि हमें दूसरे देशों के आगे भीख नहीं माँगनी है, और अगर भारत की तरह अपनी ताक़तवर छवि बनानी है, तो बदलाव करना होगा। इमरान ख़ान भारत की दुनिया में मज़बूत देश की छवि को अपने लिए भुनाना चाहते हैं। पाकिस्तान की जनता को यह रास आ रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इमरान सही कह रहे हैं।

आज़ादी मार्च

इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) ने 10 नवंबर से अपना आज़ादी मार्च फिर शुरू करके यह जता दिया है कि वह झुकने को तैयार नहीं। जानलेवा हमले और कोर्ट के उनके चुनाव लडऩे पर प्रतिबन्ध के बावजूद इमरान ख़ान मैदान में डटे हुए हैं। बहुत-से जानकार मानते हैं कि इमरान ख़ान की जान को अब गम्भीर ख़तरा है। यदि ऐसा होता है, तो पाकिस्तान में गृह युद्ध शुरू होने के ख़तरे से इनकार नहीं किया जा सकता। अभी भी जो हालात हैं, उन्हें बेहतर नहीं कहा जा सकता। अमेरिका सहित कई देशों की नज़र पाकिस्तान पर टिकी है।

लोगों से ज़्यादा-से-ज़्यादा तादाद में मार्च में शामिल होने की इमरान ख़ान की अपील का भी जबरदस्त असर दिखा है। वजीराबाद से शुरू हुआ मार्च बताता है कि इमरान जनता को साथ लाने में सफल रहे हैं। इमरान ख़ान ख़ुद इस मार्च में शामिल हुए। इमरान ख़ान पर हमले के बाद अब पाकिस्तान की शहबाज़ शरीफ़ सरकार को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी होगा; क्योंकि यदि इमरान ख़ान दोबारा किसी हमले का शिकार होते हैं, तो इसका सीधा आरोप सरकार और सेना पर लगेगा। पिछले हमले के बाद भी जब इसे लेकर पाकिस्तान में सर्वे किये गये थे, तो ज़्यादातर लोगों ने यही माना था कि इस हमले के पीछे सेना का हाथ है।

हमले के बाद पीटीआई के कार्यकर्ताओं ने जिस क़दर ज़ोरदार प्रदर्शन पाकिस्तान में किये थे, उससे सरकार और सेना दोनों पर दबाव बढ़ा है। कराची, फ़ैसलाबाद, रावलपिंडी, क्वेटा और लाहौर से लेकर तमाम बड़े शहरों में पीटीआई के कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर जिस तरह हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया, उससे ज़ाहिर हो गया कि सरकार के लिए यह विरोध आसान नहीं है। इमरान ख़ान ने इस हमले के लिए जिस तरह प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के महानिदेशक मेजर जनरल फ़ैसल नसीर का नाम लेकर आरोप लगाया, उससे यह तो साफ़ है कि सरकार के भीतर की सूचनाएँ इमरान ख़ान को मिलती हैं।

वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय के दख़ल के बाद इमरान ख़ान पर हुए हमले को लेकर दर्ज की गयी एफआईआर को पीटीआई ने नकार दिया था। पीटीआई का कहना था कि एफआईआर में वज़ीर-ए-आज़म शहबाज़ शरीफ़, गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के महानिदेशक मेजर जनरल फ़ैसल नसीर का नाम नहीं है; इसलिए वह इस एफआईआर को पूरी तरह ख़ारिज करती है।

इमरान ख़ान का सेना के ख़िलाफ़ यह मोर्चा क्या रंग लाएगा? अभी कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तय है कि अब पीएमएल(एन) और पीपीपी दोनों इमरान ख़ान के लिए मुश्किलें खड़ी करने की कोशिशें करेंगे। यह स्थिति पाकिस्तान को और कठिन हालात की तरफ़ धकेल सकती है। पाकिस्तान की सेना की मीडिया विंग इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस यानी आईएसपीआर भले इमरान ख़ान के लगाये सभी आरोपों को ख़ारिज कर रही हो, हमले को लेकर पाकिस्तान की सियासत ही नहीं सेना-आईएसआई के भीतर जबरदस्त हलचल है। आईएसपीआर का कहना है कि इमरान ख़ान के $फौज और इसके एक बड़े अधिकारी पर लगाये आरोप बेबुनियाद और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हैं और उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता, इमरान ख़ान की पार्टी के तमाम नेता इन आरोपों पर डटे हुए हैं।

इमरान की जंग

इमरान ख़ान आज की तारीख़ में एक से ज़्यादा मोर्चों पर लड़ रहे हैं। उन्हें जनता के समर्थन का एक बड़ा कारण उनका अमेरिका विरोध है। इमरान ख़ान ने अपनी सरकार गिराने का आरोप भी अमेरिका पर ही लगा दिया था। इमरान ख़ान शाहबाज़ शरीफ़ सरकार पर संकटग्रस्त अर्थ-व्यवस्था को सँभालने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहे हैं। वह हाल में सेनाध्यक्ष बाजवा के अमेरिकी जाकर मदद लेने का विरोध कर चुके हैं। सरकार इमरान ख़ान से ख़फ़ा है। लिहाज़ा वह उन पर दबाव बनाने के तरीक़े निकाल रही है। हाल में पीटीआई की सरकार के समय अमेरिका से आये विवादित कूटनीतिक सन्देश के मामले में पूछताछ के लिए फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) ने इमरान ख़ान को तलब किया था।

एफआईए इमरान ख़ान से प्रतिबंधित चंदा लेने के आरोप पर भी पूछताछ कर रही थी और इसके बाद ही पाकिस्तान के निर्वाचन आयोग ने इमरान ख़ान पर चुनाव लडऩे का प्रतिबन्ध लगाया था। इमरान ख़ान की पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद क़ुरैशी को भी अमेरिकी सन्देश मामले में तलब किया गया था। निश्चित ही इससे पाकिस्तान में सियासी टकराव बढ़ा है। इमरान ख़ान इस दौरान राजनीतिक रूप से इसका जवाब देते दिखे थे, जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और मौज़ूदा सत्ताधारी गठबंधन की प्रमुख पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ को चुनौती दी कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्रों में उनके ख़िलाफ़ मैदान में उतरें और चुनाव जीतकर दिखाएँ।

इमरान ख़ान सरकार के साथ-साथ राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खोल चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि अल्वी कभी पीटीआई से जुड़े रहे हैं। हालाँकि बदले हालात में इमरान ख़ान ने हाल में जिस लहजे में अल्वी को पत्र लिखा, उससे संकेत मिलता है कि ख़ान राष्ट्रपति से नाराज़ हैं। इमरान ने कहा है कि देश में झूठे आरोप लगाये जा रहे हैं। लोगों को परेशान किया जा रहा है। गिरफ्तारियाँ हो रही हैं, और पुलिस हिरासत में यातनाएँ दी जा रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से इन सबको रोकने के लिए तुरन्त क़दम उठाने की माँग की थी।

खान की चुनौती से निपटने के लिए शहबाज़ शरीफ़ और उनकी सरकार ने इमरान ख़ान की साख धूमिल करने की रणनीति अपनायी है। ऐसे ख़ुलासे किये जा रहे हैं, जो इमरान की छवि पर विपरीत असर डालें। हालाँकि जनता के इमरान के प्रति समर्थन को देखते हुए लगता नहीं कि इसका ज़्यादा असर हुआ हो। हाँ, इससे राजनीतिक टकराव ज़रूर बढ़ा है और देश में हिंसा और अव्यवस्था की आशंका ज़ोर पकड़ती जा रही है।

कौन बनेगा सेना प्रमुख?

पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष का चयन अब कई कारणों से राजनीतिक हो गया है। इमरान ख़ान की तरफ़ से सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने के बाद अब सबकी नज़र सरकार पर लगी है कि किसे नया सेनाध्यक्ष बनाया जाता है? देश में सेना के सत्ता में फिर क़ाबिज़ होने की भी अटकलें चल रही हैं। वैसे सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी मंशा अपना कार्यकाल और बढ़ाने की नहीं है। हालाँकि पाकिस्तान के हालात में कुछ भी कहना मुश्किल है।

बाजवा 29 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं। सरकार किसे यह ज़िम्मा देगी? यह अभी तक साफ़ नहीं है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ चाहते हैं कि जनरल बाजवा का कार्यकाल बढ़ा देना ज़्यादा बेहतर होगा। हो सकता है कि शरीफ़ ने इस बारे में बाजवा से बात भी की हो। बाजवा पहली ही एक्सटेंशन पर हैं। सन् 2016 में सेना प्रमुख बनने के बाद सन् 2019 में उनका कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ाया गया था।

दिलचस्प यह है कि इमरान ख़ान ने कहा था कि जब तक देश में चुनाव होने और नयी सरकार बनने तक जनरल बाजवा को उनके पद पर बने रहने दिया जाये। सरकार के पास हाल के दिनों में अलग-अलग तरह के सुझाव आये हैं। इनमें बाजवा का कार्यकाल बढ़ाने के अलावा वर्तमान मिली-जुली सरकार और नेशनल असेम्ब्ली को भंग करके अंतरिम सरकार बनाना तक शामिल है। पाकिस्तान में सेना प्रमुख के लिए जो नाम सुनने में आ रहे हैं, उनमें से एक नाम ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख रहे लेफ्टिनेंट जनरल असीम मुनीर भी हैं।

इस $फेहरिस्त में जनरल मुनीर के अलावा लेफ्टिनेंट जनरल साहिर शमशेद और लेफ्टिनेंट जनरल नौमान का नाम भी शामिल है। वरिष्ठता की सूची देखें, तो पहला नाम लेफ्टिनेंट जनरल ज़ुबैर महमूद हयात का आता है। इस समय वे सैन्य मुख्यालय में चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के पद पर हैं। सरकार की तरफ़ से नये सेना प्रमुख के नाम की घोषणा नहीं होने से कई कयास लग रहे हैं। वैसे पाकिस्तान का इतिहास देखें, तो ज़्यादातर मौ$कों पर सेना प्रमुख का नाम आख़िरी दिनों में ही घोषित किया गया है। सिर्फ़ एक बार सन् 1991 में ऐसा हुआ था, जब सरकार ने दो महीने पहले ही सेना प्रमुख का नाम घोषित कर दिया था। उस समय नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे। फ़िलहाल तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में यह मसला ताक़त की जंग बन गया है। इसके त्रिकोण में एक तरफ़ प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ हैं और दूसरी तरफ़ इमरान ख़ान और तीसरी तरफ़ ख़ुद सेना प्रमुख जनरल क़मर बाजवा। वर्चस्व की इस जंग में ऊँट किस करवट बैठता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

 

“अब देश के सामने बैलेट या ब्लड शेड (चुनाव या ख़ून-ख़राबा) में किसी एक को चुनने का विकल्प ही बचा है।”

इमरान ख़ान

पूर्व प्रधानमंत्री, पाकिस्तान

 

“इमरान ख़ान का असली एजेंडा अब बेनक़ाब हो गया है। इमरान ख़ान का मार्च राष्ट्र हित में नहीं है, बल्कि वर्तमान सरकार को अगले सेनाध्यक्ष की नियुक्ति करने से रोकना उनका मक़सद है। शाहबाज़ शरीफ़ सरकार सेनाध्यक्ष की नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी।”

मरियम नवाज़

पीएमएल(एन), नेता

 

“इमरान ख़ान ने पिछले महीने दो मुद्दों पर बातचीत के लिए सरकार से सम्पर्क किया था। इनमें एक मुद्दा सेनाध्यक्ष की नियुक्ति का था। हमने इमरान ख़ान से मिलने से इनकार कर दिया।”

शाहबाज़ शरीफ़

प्रधानमंत्री, पाकिस्तान