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झारखण्ड में राजनीतिक लड़ाई से हो रही जनता की भलाई

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी- दो बिल्लियाँ रोटी के लिए लड़ रही थीं। इसका फ़ायदा बंदर को मिला। झारखण्ड में इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा। केंद्र और राज्य की लड़ाई का लाभ जनता को मिलता जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता पर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में संकट बरक़रार है।

इस मामले में राज्यपाल को फ़ैसला लेना है। अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का शिकंजा कसता जा रहा है। ईडी के अधिकारियों ने 17 नवंबर, 2022 को मुख्यमंत्री को पूछताछ के लिए बुलाया था। उनसे नौ घंटे तक पूछताछ हुई। भविष्य में फिर बुलाये जाने की उम्मीद जतायी जा रही है। वर्तमान राज्य सरकार पर संकट है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण जैसे एक के बाद एक ऐसे फ़ैसले लेते जा रहे हैं, जिससे वह राजनीतिक रूप मज़बूत हो सकें। इसी क्रम में 22 नवंबर को अवैध निर्माण को नियमित करने का फ़ैसला लिया गया है। इस फ़ैसले से निश्चित रूप से शहरी क्षेत्र में रहने वाले हर वर्ग के एक बड़े समूह को लाभ पहुँचेगा। राज्य के शहरी क्षेत्र के लाखों लोगों द्वारा बनाये गये अवैध रूप से घर नियमित हो जाएँगे। बुलडोजर की आवाज़ थम जाएगी। आशियाना उजडऩे से बच जाएगा। पर सवाल है कि आख़िर यह कब तक होता रहेगा? कब तक अवैध निर्माण को राजनीतिक लाभ (वोट बैंक बनाने) के लिए वैध कर शहरों को अस्त-व्यस्त ही रखा जाएगा? कब तक सुन्दर, व्यवस्थित व स्मार्ट शहर के लिए बने मास्टर प्लान की धज्जियाँ उड़ती रहेंगी? जिन लोगों का पूर्व में अवैध निर्माण ढाया गया, उनका क्या दोष था? सरकार के मौज़ूदा फ़ैसले से अवैध निर्माण करने वाले भले ही ख़ुश हों; लेकिन अन्य लोग ऐसे तमाम सवाल तो उठ ही रहे हैं।

मकान होंगे नियमित

झारखण्ड में बिना नक्शे के बने (अनधिकृत) निर्माण को नियमित करने के प्रारूप को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंज़ूरी दी है। इसके मुताबिक, 31 दिसंबर, 2019 के पूर्व निर्मित आवासीय और ग़ैर-आवासीय या व्यावसायिक भवनों का नियमितीकरण किया जाएगा। नियमित किये जाने वाले भवनों पर बिल्डिंग बाइलॉज में किये गये प्रावधान लागू नहीं होंगे। 15 मीटर तक की ऊँचाई वाले जी प्लस थ्री भवनों को इसके तहत नियमित किया जाएगा। इसके लिए 500 वर्ग मीटर से कम प्लॉट का प्लिंथ क्षेत्र 100 प्रतिशत और 500 वर्ग मीटर से बड़े प्लाट का प्लिंथ क्षेत्र 75 प्रतिशत या 500 वर्ग मीटर (दोनों में जो भी कम हो) होना चाहिए।

नियमित कराने के लिए शुल्क भी चुकाना होगा। आवासीय और ग़ैर-आवासीय भवनों को नियमित करने लिए अलग-अलग शुल्क का निर्धारित किया गया है। नगर निगम, नगर परिषद्, नगर पंचायत क्षेत्र के हिसाब से 50 से 150 रुपये प्रति वर्ग मीटर तक तय किया जा रहा है। अवैध भूमि पर किये गये अनधिकृत निर्माण को नियमितीकरण की इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। ग़लत तरीक़े से ख़रीदी या क़ब्ज़ा की गयी आदिवासी या सरकारी भूमि पर किये गये निर्माण को योजना के तहत नियमित नहीं किया जाएगा।

तीसरी बार बनेंगे नियम

राज्य में अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ कार्रवाई हर कुछ महीनों पर चलता रहा है। पिछले वर्ष राजधानी रांची में कई घरों पर बुलडोजर चले थे। कुछ महीने पहले भी अवैध रूप से बने घरों को तोड़ा गया था। राज्य गठन का 22 साल हो चुका है। इस दौरान हज़ारों घर उजाड़े गये हैं। सरकार किसी की भी हो, संकट के समय या फिर चुनाव से ठीक पहले लोगों का आशियाना नहीं उजड़े जैसे मामलों की याद आती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जो अवैध निर्माण को नियमित करने का फ़ैसला लिया है, वह पहली बार नहीं हो रहा है। राज्य के शहरों में किये गये अवैध निर्माण को नियमित करने के लिए तीसरी बार योजना बनायी गयी है।

सबसे पहले सन् 2011 में अनधिकृत निर्माण को नियमितीकरण शुल्क के माध्यम से वैध करने के लिए झारखण्ड अधिनियम अधिसूचित किया गया था। इसके बाद ठीक चुनाव से पहले सन् 2019 में अवैध निर्माण नियमित करने के लिए योजना लागू की गयी। नियमित करने के लिए अधिक शुल्क निर्धारण और नीतिगत ख़ामियों की वजह से दोनों बार योजना सफल नहीं हो सकी। बहुत कम संख्या में लोगों ने निर्माण नियमित कराने के लिए आवेदन किया था। क्योंकि पहले के नियम में कई ख़ामियाँ थीं। नियमित करवाने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। इस बार इन ख़ामियों को दूर कर नयी सरल पॉलिसी सरकार लाने का दावा कर रही है।

योजनाओं की उड़ रहीं धज्जियाँ

झारखण्ड की राजधानी रांची की बात करें, तो यहाँ क़रीब 1.25 लाख अवैध मकान होंगे। अवैध मकानों का आँकड़ा तो सरकार के पास भी नहीं है; लेकिन एक अनुमान और समय-समय पर विभिन्न संगठनों के रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में सात लाख से अधिक अवैध मकान होंगे। झारखण्ड में सभी शहरों का मास्टर प्लान (महायोजना) और जोनल प्लान (आंचलिक योजना) बनकर तैयार हैं।

वर्ष 2037 तक के लिए प्लान बनवाने में करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये। यह मास्टर प्लान या जोनल प्लान फाइलों में धूल फाँक रहा है। इसके अनुसार, शायद ही किसी भी शहर में विकास हो रहा है। अवैध और बेतरतीब रूप से शहर में विकास कार्य हो रहे हैं। न घरों का नक्शा है और न ही व्यावसायिक क्षेत्र का व्यवस्थित विकास। सँकरी गलियों के बीच तीन-चार मंज़िला इमारत खड़ी है। जहाँ लोग रह भी रहे हैं और व्यवसाय भी चल रहा है।

शहर के बीचों-बीच सँकरी गलियों में ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं, जहाँ आपात स्थिति में फायर बिग्रेड की गाडिय़ाँ नहीं पहुँच सकती हैं। समय-समय पर इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती थी। लेकिन जैसे ही चुनाव का समय आता है, इन्हें नियमित करने की क़वायद शुरू हो जाती है। पिछले कुछ महीनों से हेमंत सरकार संकट में है, तो 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण, अवैध भवनों को नियमित करने जैसे जनता से जुड़े ताबड़तोड़ फ़ैसले ले रही है। इसी क्रम में अवैध मकानों को नियमित करने का फ़ैसला भी लिया गया।

ग़लत परम्परा की न हो शुरुआत

अवैध निर्माण की समस्या केवल झारखण्ड में नहीं है। इससे शायद ही कोई राज्य या कोई शहर अछूता हो। यह सही है कि इसका समाधान भी आसान नहीं है। अवैध निर्माण किसी भी सरकार के लिए बड़ा और संवेदनशील मसला है। वह चाहे रिहायशी हो या व्यावसायिक। प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त कर अवैध निर्माण होने से तो रोका जा सकता है; लेकिन जो निर्माण हो चुका है, उसका क्या किया जाए? अगर क़ानून के मुताबिक सख़्त कार्रवाई की जाती है, तो भविष्य के लिए लोगों को कड़ा सन्देश मिलता है और इस पर रोक लगती है; लेकिन राजनीतिक रूप से यह फ़ैसला थोड़ा मुश्किल है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इससे बचते हैं और सरकार में जो हुआ, सो हुआ; लेकिन अब न करें की नीति अपनाती हैं।

यह अच्छी बात है कि झारखण्ड सरकार ने तोडफ़ोड़ की जगह नियमित करने का फ़ैसला लिया है। निर्धारित शुल्क चुकाने पर शहरी क्षेत्र में व्यावसायिक स्थल और रिहायशी भवनों को नियमित कर दिया जाएगा। सरकार के इस कदम से अवैध निर्माण कर चुके लोगों में ख़ुशी है। पर सरकार को यह देखना होगा कि उसकी नरमदिली ग़लत परम्परा न बन जाए। लोग अपनी सुविधानुसार निर्माण कार्य कर लें कि बाद में तो सरकार नियमित कर ही देगी, लोगों में ऐसी धारणा नहीं बन जाए। वरना कभी भी अवैध निर्माण नहीं रुकेगा। इसी तरह बेतरतीब तरीक़े से शहर विकसित होते रहेंगे। प्रदूषण बढ़ता जाएगा। सीवरेज-ड्रेनेज और जल-भराव समेत अन्य समस्याओं से लोग जूझते रहेंगे। इसलिए सरकार को कम-से-कम इस मुद्दे पर राजनीति से हटकर काम करना चाहिए।

कुरुक्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का शंखनाद

4 दिसंबर को 164 तीर्थों पर जलेंगे हज़ारों दीप

देश में धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है। धर्मनगरी कहे जाने वाले कुरुक्षेत्र की 48 कोस भूमि प्राचीन कुरुक्षेत्र की धरोहर है, जहाँ महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। 19 नवंबर से यहाँ अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव शुरू हो चुका है। भारतीय संस्कृति के कई रंग देखने को मिल रहे हैं। धर्म की छटा के साथ-साथ रोज़गार, शिल्प कौशल, मनोरंजन और लोक संस्कृति के दर्शन हो रहे हैं। ज्ञानवर्धन के लिए पुस्तक मेला भी लगाया गया है। विश्व में शान्ति और भाईचारे का वातावरण बने, इसके मद्देनज़र 4 दिसंबर को कुरुक्षेत्र के 164 तीर्थों पर हज़ारों दीप जलाये जाएँगे। गीता महोत्सव में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी शामिल होंगी।

महोत्सव में धार्मिक सौहार्द के लिए ब्रह्मसरोवर पर संध्याकाल में भजन गायन और महाआरती का आयोजन हो रहा है। तो दूसरी तरफ़ देश के प्रतिष्ठित सन्त मोरारी बापू राम कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म-अध्यात्म का दर्शन करा रहे हैं। महोत्सव में ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग आएँ, इसके लिए प्रदेश सरकार ने रोडवेज की बसों के किराये में 50 प्रतिशत की छूट दी है। मेले में 80 प्रतिशत स्टाल मुफ़्त में उपलब्ध कराये गये हैं, जबकि 20 प्रतिशत कॉमर्शियल किये गये हैं। मीडिया सेंटर भी स्थापित किया गया है, जहाँ दिन भर मीडियाकर्मियों के लिए चाय नाश्ते की व्यवस्था की गयी है। साफ़-सफ़ाई और पुलिस की व्यवस्था ठीक-ठाक कही जा सकती है।

वर्ष 2016 से हरियाणा सरकार गीता जयंती समारोह को अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के रूप में मना रही है। इस अवसर पर लाखों लोग कुरुक्षेत्र आते हैं। इसकी सफलता को देखते हुए मॉरिशस में फरवरी 2019, लंदन में अगस्त 2019 और कनाडा में सितंबर 2022 में अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन किया गया। कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सीईओ चंद्रकांत कटारिया द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी के अनुसार मॉरिशस और लंदन में आयोजित हुए महोत्सव में कई अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक नेताओं और गीता मनीषियों ने भाग लिया। यह प्लेटफार्म वास्तव में वैश्विक स्तर पर गीता के आध्यात्मिक सन्देश को फैलाने का एक बड़ा अवसर है।

महोत्सव की विशेषताएँ

सर्वप्रथम गीता मैराथन का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिला-पुरुष और विद्यार्थी भाग लेते हैं। महोत्सव का विधिवत् शुभारम्भ ब्रह्मसरोवर के पुरुषोत्तमपुरा बाग़ में मंत्रोच्चारण और शंखनाद के बीच गीता यज्ञ एवं पूजन से होता है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय गीता संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। एक दिन के लिए सन्त सम्मेलन होता है, जिसमें देश भर के प्रमुख सन्त और विद्वान धर्म और दर्शन पर चर्चा करते हैं। गीता की जन्मस्थली ज्योतिसर और सरोवर के तटों पर सम्पूर्ण गीता पाठ होता है। छ: दिन मुख्य पंडाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनमें देश के प्रसिद्ध कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। कार्यक्रमों का विषय श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत, कुरुक्षेत्र या पौराणिक विषय रहता है।

विश्व को जोडऩे की कोशिश

गीता जयंती के दिन 4 दिसंबर को शहर में शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके अलावा वैश्विक गीता पाठ महोत्सव का ख़ास आकर्षण होता है। इसमें गीता के अठारह अध्यायों में से चुनिंदा श्लोकों का ऑनलाइन उच्चारण किया जाता है। इसका उद्देश्य वैश्विक शान्ति बनाये रखना है। पिछले कई वर्षों से 48 कोस कुरुक्षेत्र की भूमि के सभी तीर्थों पर इस दिन सायंकाल को दीपोत्सव मनाया जाता है।

कुरुक्षेत्र को कहते हैं धर्मक्षेत्र

लगभग 5,159 साल पहले यहाँ लड़े गये महाभारत युद्ध के अन्तिम दौर से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देकर धर्म का जो पाठ पढ़ाया था, वह दुनिया के दार्शनिक और आध्यात्मिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। कुरुक्षेत्र का नामकरण ऋषि राजा कुरु के नाम पर पड़ा था। यहाँ सरस्वती नदी के तट पर वेद-पुराण की रचना और संकलन हुआ था। कुरुक्षेत्र को सूर्य पूजा के प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है।

प्रशासनिक व्यवस्था

गीता महोत्सव की उचित व्यवस्था के लिए लगभग 300 के क़रीब प्रशासनिक अधिकारी और 1,000 के क़रीब पुलिसकर्मी लगे हुए हैं। 29 नवंबर से इनकी संख्या और बढऩे वाली है। कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सीईओ चंद्रकांत कटारिया का कहना है कि व्यवस्था और कामकाज में ट्रांसपेरेंसी लाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। जैसे रेवेन्यू मॉडल ला रहे हैं; लेकिन कई स्तर पर मुश्किल भी हो रही है। उन्होंने कहा कि पुराने ढर्रे को बदलने में समय तो लगेगा ही। बजट की बात पर उन्होंने बताया कि महोत्सव का कुल प्रोजेक्ट तीन से चार करोड़ रुपये का है। सन् 2019 में 6-6.5 करोड़ रुपये का था। इस बार भी उस स्तर पर आने की कोशिश रहेगी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति के दौरे को ध्यान में रखते हुए 19 नवंबर से धारा-144 लागू है।

गीता महोत्सव में दो-तीन दिन तक घूमकर यह जानने का प्रयास किया गया कि आम जनमानस में गीता का सन्देश व्यवहारिक रूप में कितना गूँज रहा है, ज़्यादातर लोगों से बात कर सन्तोषजनक जवाब नहीं मिला।

कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का कार्य

कुरुक्षेत्र की प्राचीन विरासत और सदियों पुरानी परम्पराओं के संरक्षण के लिए हरियाणा सरकार ने 1 अगस्त, 1968 को कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन किया था। बोर्ड के सीईओ चंद्रकांत कटारिया ने बताया कि इस प्रयास में हरियाणा के पाँच ज़िलों कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत, जींद और कैथल में स्थित 164 तीर्थों के दस्तावेज़ तैयार किये जा रहे हैं। इसके अलावा धार्मिक, ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा, रखरखाव। नवीनीकरण और आने वाले तीर्थयात्रियों, पर्यटकों को नागरिक सुविधाएँ प्रदान करना शामिल है।

बदलाव का वक़्त

बिन्नी पर भारतीय क्रिकेट का रोडमैप तय करने का ज़िम्मा

यह हमेशा होता है कि जब सवाल उठते हैं, तो उनके जवाब खोजने की पहल भी होती है। क्रिकेट में इस तरह की पहल सुझावों के ज़रिये सामने आ रही है। इन दिनों सवाल उठे हैं टी-20 विश्व कप में भारत की सेमीफाइनल में हार के बाद। देश के क्रिकेट प्रेमियों, जिनमें से अधिकतर का क्रिकेट प्रेम भारत की जीत तक सीमित होता है; से लेकर क्रिकेट के विशेषज्ञों तक में यह उत्सुकता है कि बीसीसीआई अब क्या फ़ैसला करता है? क्या तीनों फॉर्मेट के कप्तान अलग-अलग बनाये जाएँगे? ज़्यादातर की राय है कि यही किया जाना चाहिए।

बीसीसीआई में अनुभवी और स्वभाव से बेहद ईमानदार माने जाने वाले रोजर बिन्नी अध्यक्ष बने हैं, तो बहुतों को लगता है कि वह बेहतर फ़ैसले लेंगे। उनके आने के बाद चेतन शर्मा के नेतृत्व वाली चयन समिति भंग कर दी गयी है। हालाँकि इसके बाद चेतन ने आरोप लगाया है कि कुछ ख़ास खिलाडिय़ों को चुने जाने का दबाव अधिकारी समिति पर डालते थे। निश्चित ही यह गम्भीर आरोप हैं और इसकी तफ़्तीश होनी चाहिए।

सौरव गांगुली को रिस्क लेने और बदलाव करने वाला प्रशासक माना जाता था और उन्होंने अपने कार्यकाल में कुछ बेहतर निर्णय भी किये। कोरोना-काल में सफलतापूर्वक आईपीएल करवाना उनकी बड़ी उपलब्धि थी। इसके अलावा उनके कार्यकाल में प्रसारण अधिकार सर्वाधिक दाम पर बिके, भारत की अंडर-19 टीम ने विश्व कप जीता, महिला क्रिकेट टीम राष्ट्रमंडल खेलों में फाइनल में पहुँची कुछ और परिवर्तन गांगुली ने किये। अब नज़र रोजर बिन्नी पर है।

बिन्नी के पास अवसर है कि वह भारतीय क्रिकेट में तीनों फार्मेट में अलग-अलग कप्तान बनाकर एक ही खिलाड़ी पर कप्तानी के बोझ को ख़त्म करें। हाल में भारत से जो टीमें विदेश गयी हैं, उनमें यह प्रयोग किया गया है। मसलन, टी-20 में हार्दिक पांड्या को कप्तानी के लिए आजमाया गया है और एक दिवसीय में शिखर धवन कप्तान हैं। लेकिन यह प्रयोग सीनियर खिलाडिय़ों की अनुपस्थिति के कारण किये गये हैं। वह स्थायी कप्तान नहीं हैं। माँग यह हो रही है कि स्थायी रूप से तीनों फार्मेट की राष्ट्रीय टीमों के लिए अलग-अलग कप्तान बनाये जाएँ। यह सही है कि आईपीएल में कप्तानी करने और देश की टीम की कप्तानी करने में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। हाल के मैचों में देखा गया है कि हार्दिक पांड्या ने भारत के लिए सीनियर खिलाडिय़ों की ग़ैर-मौज़ूदगी में बेहतर कप्तानी की है। नतीजे भी दिये हैं और फील्डिंग के दौरान उनकी गेंदबाज़ी के परिवर्तन में भी समझ दिखती है। हार्दिक अभी 29 साल के हैं। उन्हें स्थायी कप्तानी मिलती है और वह सफल रहते हैं, तो और कुछ साल तक यह ज़िम्मा ढो सकते हैं। वह ऑल राउंडर हैं और जीत का जबरदस्त जज़्बा रखते हैं। खिलाडिय़ों से सही तरीक़े से पेश आते हैं और ख़ुद अपने प्रदर्शन से टीम में प्रेरणा जगाते हैं। हाल में उन्होंने कप्तानी करते हुए साबित किया है कि वह दबाव में नहीं आते, जिससे निर्णय लेने में भी वह सहज ही रहते हैं।

यदि बिन्नी और चयन करता यह प्रयोग करते हैं, तो निश्चित ही पंड्या टी-20 की कप्तानी के सबसे मज़बूत दावेदार होंगे। न्यूजीलैंड के दौरे में एक दिवसीय मैच के शिखर धवन कप्तान रहे। लेकिन हैरानी यह है कि उन्हें सीनियर खिलाडिय़ों की उपस्थिति में कई बार तो टीम में ही शामिल नहीं किया जाता। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिसे आप भारत का कप्तान बनने के योग्य मानते हैं, उसे टीम में ही शामिल न करें। हाल की कुछ एक दिवसीय शृंखलाएँ इसका उदाहरण हैं। शिखर धवन ने ओपनर के रूप में बल्ले से कोई ऐसा भी निराश नहीं किया है कि उन्हें सीनियर खिलाडिय़ों की उपस्थिति में टीम में जगह ही नहीं मिले।

शिखर ख़ुद सीनियर खिलाड़ी हैं और अभी 36 साल के हैं। कोई ज़्यादा साल उनके पास नहीं हैं। ऐसे में बेहतर होता कि किसी अन्य खिलाड़ी को आजमाया जाता। विराट कोहली भले कप्तानी छोड़ चुके हैं, अभी भी उपलब्ध खिलाडिय़ों में एक दिवसीय की कप्तानी के लिए वह सबसे बेहतर विकल्प हैं। क़रीब 34 साल के कोहली के पक्ष में उनकी फिटनेस है, जो यह ज़ाहिर करती है कि यदि वह सफल रहे, तो और चार साल तक आसानी से खेलेंगे।

अनुभव और जीत का जज़्बा दोनों उनके पक्ष में जाते हैं। बल्लेबाज़ी की फॉर्म फिर हासिल करने के बाद वह मैदान में जलवा दिखा रहे हैं। उनकी परफार्मेंस भारत की जीत की गारंटी बन जाती है। तीसरे नंबर पर कोहली और चौथे पर सूर्य कुमार यादव भारत के बल्लेबाज़ी क्रम को बहुत मज़बूत बना देते हैं। उनका अनुभव टीम को लाभ देता है और नये खिलाडिय़ों को प्रेरणा भी।

यदि कप्तानी के लिए कोहली के नाम पर विचार नहीं किया जाता, तो ऋषभ पंत बेहतर विकल्प हैं। हाल में टीम में अन्दर-बाहर होने से उनकी फॉर्म पर असर पड़ा है; लेकिन उनके भीतर कप्तानी की नैसर्गिक प्रतिभा है। निश्चित ही एक बल्लेबाज़ के तौर पर इस विकेटकीपर को ख़ुद को साबित करने की ज़रूरत है। लेकिन कम आयु उनके पक्ष में जाती है और प्रतिभा की उनमें कमी नहीं है। महज़ 25 साल के ऋषभ के पास क्रिकेट के लिए काफ़ी समय है। लेकिन उन्हें भटकाव से बचते हुए क्रिकेट पर और गहरे से फोकस करना होगा। इसके लिए वह सचिन तेंदुलकर को एक आदर्श के रूप में सामने रख सकते हैं।

एक दिवसीय के लिए एक और नाम 27 साल के श्रेयस अय्यर हैं। हालाँकि यहाँ भी समस्या यह है कि टीम में उनका स्थान स्थायी नहीं रहता। सिर्फ़ कप्तान होने के कारण टीम में जगह बना लेना किसी अन्य खिलाड़ी के प्रति अन्याय बन जाता है, जो उनकी जगह ले सकते हैं और कप्तान किसी और को बनाया जा सकता है। टेस्ट मैच क्रिकेट का मूल रूप है। दुनिया में टेस्ट क्रिकेट के प्रति लोगों की रुचि घटी है। अब क्रिकेट का यह फार्मेट मैदान में दर्शकों को उस संख्या में नहीं खींच पा रहा, जिस संख्या में वन-डे और टी-20 खींचते हैं। कारण यह भी है कि तेज़ क्रिकेट के यह दोनों फॉर्मेट कॉरपोरेट ने गोद ले लिये हैं और उन्हें पता है कि पैसा कैसे वसूलना है। इस मायने में टेस्ट क्रिकेट को अभागा कहा जाएगा, जिसमें कॉरपोरेट की नाममात्र की ही दिलचस्पी है।

दर्शकों को खींचने के लिए टेस्ट क्रिकेट की सीरीज शुरू की गयी है और सफ़ेद या गुलाबी गेंद के प्रयोग भी इसमें किये गये हैं। लेकिन बांछित नतीजे नहीं निकले हैं। भारत ने हाल में टेस्ट क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन किया है। दूसरे देशों की टीमें भी क्रिकेट की इस असली क्लास को ज़िन्दा रखने में जुटी हैं। हो सकता है भविष्य में टेस्ट क्रिकेट के फार्मेट में कुछ बदलाव किये जाएँ, ताकि इसे दूसरे दो फार्मेट जैसे लोकप्रियता मिल सके। तय है कि ऐसी स्थिति में कॉरपोरेट की ही भूमिका अहम होगी।

भारत के पास टेस्ट की कप्तानी के लिए दो चेहरे तो वहीं हो सकते हैं, जिन्हें हम एक दिवसीय के कप्तान के रूप में देखते हैं। इनमें से एक अगर एक दिवसीय का कप्तान बनता है, तो दूसरा टेस्ट टीम का ज़िम्मा सँभाल सकता है। अर्थात् ऋषभ पंत एक दिवसीय में सफल रहते हैं और कप्तान बनते हैं, तो कोहली टेस्ट के कप्तान बन सकते हैं। कोहली टेस्ट क्रिकेट खेलना पसन्द करते हैं और उनका रिकॉर्ड तो बेहतरीन है ही। अपनी कप्तान के समय में उन्होंने टेस्ट और एक दिवसीय दोनों में भारत को उच्च रैंकिंग तक पहुँचाया था।

बिन्नी उठाएँ नये क़दम

बीसीसीआई के नये अध्यक्ष रोजर बिन्नी के पास मौक़ा है कि वह भारतीय क्रिकेट की बेहतरी के लिए कुछ नये क़दम उठाएँ। इनमें तीनों फार्मेट में अलग अलग कप्तान बनाना भी शामिल है। इसके अलावा जिस सीनियर चयन समिति को उन्होंने भंग किया है, उसके चेयरमैन चेतन शर्मा ने बाहर जाने के बाद गम्भीर आरोप लगाये हैं। हालाँकि ख़ुद चेतन के नेतृत्व वाली चयन समिति सवालों के घेरे में रही है। इनमें सबसे गम्भीर आरोप यह रहा है कि विराट कोहली पर कप्तानी छोडऩे का दबाव बनाया गया था। उनसे बीसीसीआई के कुछ लोगों का व्यवहार अच्छा नहीं था, जबकि कप्तान के रूप में कोहली नाकाम नहीं थे।

बिन्नी अनुभवी हैं। उनके सामने बीसीसीआई और चयन समिति की छवि बेहतर करने की बड़ी चुनौती है। निश्चित ही उन्हें भारतीय क्रिकेट का एक रोड मैप तैयार कर उस पर अमल करना होगा। चेतन शर्मा के इन आरोपों की जाँच होनी भी ज़रूरी है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि बीसीसीआई में कुछ अधिकारी टीम के चयन में हस्तक्षेप करते थे।

पाखण्डियों की धर्मांधता

अब लोग स्वयं को महत्त्वपूर्ण और उपयोगी दिखाने के लिए दिखावे का सहारा लेने लगे हैं। लोग हर उस जगह दिखावा करने के आदी हो चुके हैं, जहाँ से भी उन्हें किसी भी तरह का फ़ायदा मिल रहा होता है। आश्चर्य इस बात का होता है कि जो जितना अज्ञानी और अयोग्य होता है, वह उतना ही ज़्यादा दिखावा करता है। धर्म भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं। बल्कि सच यह है कि आज के दौर में जितना दिखावा और ढोंग धर्मों में हो रहा है, उतना अन्यत्र कहीं नहीं हो रहा है। इसी को आडम्बर, अन्धविश्वास और पाखण्ड कहते हैं। विडम्बना यह है कि इस आडम्बर, अन्धविश्वास और पाखण्ड में पड़े हुए लोग अपना विवेक, तर्क क्षमता और ग़लत चीज़ें को नकारना छोड़ देते हैं। विवेक और तर्क विहीन व्यक्ति प्रश्न नहीं कर सकता।

धर्म का डर दिखाकर ऐसे ही विवेकहीन तथा तर्कहीन लोगों पर पाखण्डी शासन करते हैं। हाल यह है कि ऐसे पाखण्यिों के विवेकहीन तथा तर्कहीन अनुयायियों की एक भीड़ है। इसीलिए आजकल के तथाकथित पाखण्डी स्वयं को धर्माचार्य कहलाने का दम्भ भरते हैं। उन्हें लगता है कि वे धर्म को चला रहे हैं और ईश्वर से जुड़े हुए हैं। जबकि यह एक मिथ्या भाव है, न तो वे किसी भी हाल में धर्म चला रहे हैं और न चलाने के योग्य हैं। न ईश्वर से जुड़े हैं और न उसके बारे में कुछ जानते हैं। ये लोग धर्माचार्य होने का ढोंग करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि धर्म को चलाने के लिए किसी की ज़रूरत ही नहीं है, उसे तो स्वयं लोग अपने-अपने हिसाब से धारण कर लेते हैं। यह अलग बात है कि धर्म को एक स्वरूप में सभी लोग स्वीकार नहीं करते, जैसे परमात्मा को सब लोग एक स्वरूप में स्वीकार नहीं करते। यह भी सच है कि आज किसी भी कथित धर्म के लोग भी धर्म के रास्ते पर पूरी तरह नहीं हैं। क्योंकि या तो लोग धर्म से उतना ही वास्ता रखते हैं, जितना धर्म से उनका रिश्ता बताने के लिए पर्याप्त है। या फिर उतना, जितना त्योहार आदि तक उनके हिसाब से या समाज के हिसाब से आवश्यक है। या फिर उतना, जितने में उन्हें लगता है कि वे ईश्वर की प्रार्थना कर रहे हैं। परन्तु इन सबमें भी किसी एक कथित धर्म के लोग एकमत नहीं दिखते। वे अपने ही धर्म-ग्रन्थ द्वारा बताये रास्तों पर अलग-अलग तरीक़ों से चलते हैं। उनके प्रार्थना करने और त्योहार मनाने के तौर-तरीक़ों में भी समाज और क्षेत्र के हिसाब से अन्तर होता है।

दरअसल धर्म को समझने और उसका निर्वहन करने का लोगों का अपना-अपना नज़रिया होता है। परन्तु सवाल यह है कि वास्तविक धर्म क्या है? क्या मानवता ही सबसे बड़ा और वास्तविक धर्म है? या फिर धर्म-ग्रन्थों में बताये गये रास्ते ही वास्तविक धर्म हैं? अगर धर्म-ग्रन्थों में बताये गये रास्ते धर्म हैं, तो फिर किस धर्म-ग्रन्थ में बताया गया रास्ता वास्तविक धर्म है? अगर सभी धर्म-ग्रन्थों में बताये गये रास्ते वास्तविक धर्म हैं, तो फिर सबके नियम, पद्धतियाँ अलग-अलग किसलिए हैं? किसलिए लोग एक-दूसरे से बैर, द्वेष और ईश्र्या करते हैं? जिन लोगों में बैर, द्वेष और ईश्र्या का भाव भरा हो, वे और उन्हें धर्म के नाम पर गुमराह करने वाले तो वैसे भी धर्म के रास्ते से भटके हुए लोग हैं। फिर ऐसे लोगों को धर्म पर और उनके कथित धर्माचार्यों को धर्म का पथ-प्रदर्शक क्यों माना जाए?

तो क्या अब धर्म अधर्मियों के पाखण्ड का ज़रिया बन चुके हैं? कई धर्मों में देखा गया है कि धर्माचार्यों द्वारा बलात्कार किये गये हैं और यह सिलसिला लागतार जारी है। नफ़रतें फैलायी जा रही हैं। कट्टरता फैलायी जा रही है। ये तथाकथित धर्माचार्य अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कहीं राजनीतिक लोगों के हाथों का खिलौना बने हुए हैं, तो कहीं किसी धन्नासेठ की चौखट पर नाक रगड़ रहे हैं। कहीं ठगी के धन्धे में लगे हुए हैं, तो कहीं अय्याशी में। अर्थात् संसार से मोह-माया छोडक़र ईश्वर की शरण में जाने का दिखावा करके न तो संसार से इनका मोह छूटा है, न ऐश-ओ-आराम के साधन छूटे हैं और न ही दम्भ, प्रमाद, भोग-विलास, लालच, धृष्टता, कामुकता और क्रोध से ये मुक्त हो सके हैं। क्या ऐसे पाखण्डियों, दुराचारियों, अधर्मियों और नीचों को धर्माचार्य कहना उचित होगा? क्या इस तरह के पाखण्यिों का कोई धर्म है? क्या इन पर धर्म की कमान रहनी चाहिए? क्या ऐसे लोग ईश्वर के निकट हो सकते हैं? क्या इन्हें जीने का अधिकार है?

माता-पिता भटके हुए हों, तो सन्तान भटक सकती है या बर्बाद हो सकती है। गुरु भटका हुआ हो, तो उसके अनेक शिष्य भटककर बर्बाद हो सकते हैं; शासक भटका हुआ हो, तो देश मुसीबत में पड़ सकता है; लेकिन अगर धर्माचार्य भटके हुए हों, तो संसार सदियों तक भटकता है। और धर्म से भटका हुआ संसार सुख-सुखविधाएँ तो जुटा सकता है, परन्तु चैन, सुख और शान्ति से जी नहीं सकता। ऐसे संसार में अपराध, झगड़े, बिखण्डन और तनाव का डेरा सदैव रहता है। आज के हालात यही हैं। काश हालात सुधरें और लोग वास्तविक धर्म को समझें।

क्रिकेटर रविंद्र जडेजा की पत्नी भाजपा प्रत्याशी, ससुर और ननद हैं कांग्रेस के कट्टर समर्थक

क्रिकेटर रविंद्र जडेजा की पत्नी रिवाबा जडेजा जहाँ गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार हैं, वहीं रविंद्र के पिता और रिवाबा के ससुर अनिरुद्धसिंह जडेजा ने पहले चरण के मतदान से एक दिन पहले ही साफ़ कहा कि वे कांग्रेस के साथ हैं। अब रिवाबा ने कहा है कि राजनीति अपनी जगह है और परिवार अपनी जगह, लिहाजा इसे लेकर परिवार में कोई मतभेद नहीं हैं।

रीवाबा ने गुरुवार को कहा कि उन्हें परिवार में विपरीत विचारधाराओं के होने से कोई समस्या नहीं होती। यहाँ यह दिलचस्प है कि रवींद्र जडेजा का परिवार दशकों से कांग्रेस समर्थक रहा है लिहाजा उसके सदस्य रिवाबा के बजाए उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। बता दें रिवाबा जडेजा गुजरात की जामनगर उत्तर सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं।

रविंद्र जडेजा के पिता अनिरुद्धसिंह जडेजा ने पहले चरण के मतदान से एक दिन पहले ही साफ़ किया था कि वे कांग्रेस के साथ हैं। उन्होंने कहा था – ‘मैं कांग्रेस के साथ हूं। पार्टी से जुड़े मामले परिवार से अलग होते हैं। हमें अपनी पार्टी के साथ रहना चाहिए। मैं उनके (कांग्रेस) साथ बरसों से जुड़ा हुआ हूं।’

चुनाव के लिए पहले चरण के मतदान के दौरान आज रिवाबा ने पत्रकारों से बातचीत में ससुर के कांग्रेस समर्थक होने को लेकर कहा – ‘कोई दिक्कत नहीं है। एक ही परिवार में अलग-अलग विचारधारा के लोग हो सकते हैं। मुझे जामनगर के लोगों पर भरोसा है, हम सर्वांगीण विकास पर फोकस करेंगे, और इस बार भी भाजपा अच्छे अंतर से जीतेगी।’

यह भी दिलचस्प है कि रिवाबा जडेजा दिग्गज कांग्रेस नेता हरि सिंह सोलंकी की रिश्तेदार हैं। हालांकि, उन्होंने साल 2019 में भाजपा ज्वाइन कर ली थी। रविंद्र से रिवाबा की शादी 2016 में हुई थी और उस परिवार के भी ज्यादातर सदस्य कांग्रेस विचारधारा से जुड़े हैं।

रविंद्र जडेजा के पिता अनिरुद्धसिंह जडेजा का हाल में जारी एक वीडियो काफी वायरल हो गया था जिसमें वे जनता से कांग्रेस को वोट देने की अपील कर रहे हैं। रिवाबा की ननद कांग्रेस नेता नयनाबा जडेजा भी कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार कर रही थीं। अनिरूद्धसिंह ने यह भी कहा था कि वह (रवींद्र जडेजा) जानता है कि यह पार्टी से जुड़ा मामला है। परिवार में इससे कोई समस्या नहीं है।

गुजरात: पहले चरण में 11 बजे तक 19 फीसदी वोटिंग, ग्रामीण से ज्यादा शहरों में हुआ मतदान

गुजरात विधानसभा की कुल 182 सीटों में से 89 सीटों पर पहले चरण के लिए आज हो रहे मतदान में 11 बजे तक 19 फीसदी के करीब वोट पड़े हैं। इन सीटों पर कई दिग्गजों की किस्मत दांव पर है। अभी तक की ख़बरों के मुताबिक तापी और मोरबी में सबसे ज्यादा वोट पड़े हैं।

जानकारी के मुताबिक गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले में आज राज्य की 89 सीटों पर मतदान शुरू हो गया है। तापी में सबसे ज्यादा 26.47 फीसदी जबकि सबसे केम देवभूमी द्वारका में 15.86 फीसदी वोट पड़े थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा के प्रभाव वाले शहरी इलाकों में धीमी वोटिंग हुई है।

पहले चरण की वोटिंग में ग्रामीण क्षेत्र आगे दिख रहे हैं और 11 बजे के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 18.95 फीसदी वोटिंग हुई है। दक्षिण गुजरात में आने वाले डांग जिले में अभी तक सर्वाधिक वोटिंग दर्ज की गई। वहां पर 24.99 प्रतिशत वोट डाले जा चुके हैं तो वहीं मोरबी, नर्मदा और नवसारी में अच्छी वोटिंग हुई है। यहां पर 20 फीसदी से अधिक वोट हो चुकी हैं।

उधर सूरत में सुबह 11 बजे तक 16.99 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई तो वहीं राजकोट में 18.98 फीसद वोटिंग हुई। पहले चरण की सीटें राज्य की 19 जिलों में फैली हुई हैं और इस चरण में कुल 788 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर लगी हुई है। वोटिंग के लिए 14,382 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।

वोटिंग सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे के बीच होगी। पहले चरण में जिन 89 सीटों पर मतदान हो रहा है उनमें से 48 पर भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। वहीं कांग्रेस के खाते में 40 सीटें आई थीं। एक सीट पर निर्दलीय विधायक बना था। इस चुनाव में बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) के अलावा बहुजन समाजवादी पार्टी (बीएसपी), समाजवादी पार्टी (एसपी), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) सहित 36 अन्य दलों ने भी अपने प्रत्याशी पहले चरण की सीटों पर उतारे हैं। भाजपा और कांग्रेस ने सभी 89 सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशी उतारे हैं।

गैंगरेप दोषियों की रिहाई के खिलाफ बिलकिस बानो ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका

वर्ष 2002 के गुजरात दंगों में सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार की हत्या के 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती देते हुए बिलकिस बानो ने सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की हैं। पहली याचिका में 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती दी गई है और सभी दोषियों को तुरंत जेल भेजने की मांग की गई हैं।

वहीं दूसरी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के मई के आदेश पर पुनर्विचार याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट उस फैसले पर फिर से विचार करें जिसमें कहा गया था कि दोषियों की रिहाई पर फैसला गुजरात सरकार करेगी। बिलकिस बानो ने कहा है कि इसके लिए उपयुक्त सरकार महाराष्ट्र सरकार है क्योंकि केस का ट्रायल महाराष्ट्र में चला था।

सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने भरोसा दिया है कि मामले में देखेंगे कि कब सुनवाई की जा सकती है उन्होंने आगे कहा कि, वह इस मुद्दे की जांच करेंगे कि क्या दोनों याचिकाओं को एक साथ सुना जा सकता है।

आपको बता दें, वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके परिवार के नौ सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। बिलकिस बानो उस वक्त वे 21 वर्ष की थी।

पॉलिग्राफी टेस्ट में आफताब ने कबूला अपना गुनाह, 1 दिसंबर को होगा नार्को टेस्ट

श्रद्धा वालकर मर्डर केस में आरोपी आफताब ने पॉलीग्राफी टेस्ट में भी अपना गुनाह कबूल कर लिया हैं। उसने माना है कि, उसने ही श्रद्धा वालकर की हत्या की हैं। साथ ही उसे श्रद्धा की हत्या करने का कोई भी अफसोस नहीं हैं। यह जानकारी आफताब का पॉलीग्राफी टेस्ट करने वाले फॉरेंसिक अधिकारियों के हवाले से प्राप्त हुई हैं।

साथ ही आफताब ने अन्य कई लड़कियों से भी संबंध होने की बात भी कबूल की है और टेस्ट के दौरान उसने यह भी मान लिया है कि श्रद्धा की हत्या करने के बाद उसने शव के टुकड़े जंगल में फेके थे।

सूत्रों के मुताबिक पॉलीग्राफी टेस्ट के दौरान आफताब का व्यवहार बिल्कुल सामान्य रहा। और अब एक्सपर्ट आफताब के पॉलीग्राफी टेस्ट की फाइनल रिपोर्ट बना रहे हैं। यह रिपोर्ट जांच अधिकारी को सौंपी जाएगी। साथ ही इस रिपोर्ट से जांच में पुलिस को मदद मिलने की उम्मीद भी हैं।

बता दें, 1 दिसंबर को आफताब का नार्को टेस्ट होना है। और नार्को टेस्ट से पहले चार राउंड में आफताब का पॉलिग्राफी टेस्ट कराया गया हैं।

आपको बता दें, आफताब ने श्रद्धा की हत्या 18 मई को गला दबा कर की थी। श्रद्धा आफताब की गर्लफ्रेंड थी और वे दोनों मुंबई के रहने वाले थे और लिव इन रिलेशन में रहते थे। बाद में दोनों 8 मई से दिल्ली के महरौली में शिफ्ट हुए थे। किंतु 18 मई को दोनों में झगड़ा होने के बाद आफताब ने श्रद्धा की हत्या कर दी और उसके शव के 35 टुकड़े कर फ्रिज में रखे। उन टुकड़ो को ठिकाने लगाने के लिए आफताब रोज महरौली के जंगल में जाता था। पुलिस ने आफताब को 12 नवंबर को गिरफ्तार किया था।

 

 

 

पेंटागन रिपोर्ट में खुलासा- चीन ने अमेरिका को दी धमकी सीमा विवाद पर भारत संग हमारे संबंधों में न दे दखल

चीन ने अमेरिकी अधिकारियों को चेतावनी दी है और कहा कि वे भारत के साथ उसके संबंधों में दखल नहीं दें। यह जानकारी मंगलवार को अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन ने कांग्रेस में पेश एक रिपोर्ट में दी गर्इ हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत के साथ अपने टकराव के बीच चीनी अधिकारियों ने संकट की गंभीरता को कमतर दिखाने की कोशिश की हैं। और जोर दिया गया है कि बीजिंग की मंशा सीमा पर स्थित कायम करने की रही और चीन भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों के अन्य क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने वाले तनाव से बचना चाहता था।

पेंटागन ने रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि, चीनी गणराज्य (पीआरसी) तनाव कम करना चाहता है जिससे की भारत अमेरिका के करीब नहीं जा सके। पीआरसी के अधिकारियों ने अमेरिकी अधिकारियों को चेतावनी दी है कि वे भारत के साथ पीआरसी के संबंधों में हस्तक्षेप न करें।

चीन की सैन्य निर्माण क्षमता पर कांग्रेस को दी गर्इ अपनी हालिया रिपोर्ट में पेंटागन में कहा गया है कि, चीन-भारत सीमा पर एक खंड में 2021 के दौरान पीएलए ने सैन्य बलों की तैनाती को बनाए रखा और एलएसी के पास बुनियादी ढांचे का निर्माण जारी रखा। भारत और चीन के बीच वार्ता में न्यूनतम प्रगति हुर्इ हैं क्योंकि दोनों पक्ष सीमा पर कथित अपने-अपने स्थान से हटने का विरोध करते हैं।

आपको बता दें रिपोर्ट मे आगे कहा गया है कि साल 2020 की गलवान घाटी की झड़प के बाद दोनों देशों के बीच 46 साल का सबसे गंभीर तनाव बन गया था। 15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत और चीन के निगरानी दस्ते आपस में भिड़ गए थे, जिसमें 20 भारतीय जवानों ने जान गंवाई थी। चीन के अधिकारियों के अनुसार गलवान घाटी की झड़प में 4 चीनी सैनिक भी मारे गए थे।

दिल्ली आबकारी नीति मामले में गुरुग्राम के कारोबारी अमित अरोड़ा गिरफ्तार

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को दिल्ली आबकारी नीति मामले में कारोबारी अमित अरोड़ा को गिरफ्तार कर लिया है। वह गुरुग्राम का रहने वाला है।

जानकारी के मुताबिक अरोड़ा बड्डी रिटेल प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा कारोबारी है।  अरोड़ा पर सीबीआई ने कुछ महीने पहले शराब मामले में एफआईआर दर्ज की थी। इसमें मनीष सिसोदिया का नाम अभियुक्तों की सूची में पहले नंबर पर था, हालांकि अब उनका नाम चार्जशीट में नहीं है।

एफआईआर में अमित अरोड़ा, दिनेश अरोड़ा और अर्जुन अरोड़ा को मनीष सिसोदिया का करीबी सहयोगी बताया गया था। सीबीआई ने एफआईआर में आरोप लगाया था कि ये तीनों शराब लाइसेंस धारियों से इकट्ठा किए गए पैसे को मैनेज करने और इसे डाइवर्ट करने के काम में शामिल थे।

ईडी पहले ही शराब कारोबारी समीर महेंद्रू, अरबिंदो फार्मा के चीफ शरद रेड्डी और विनय बाबू को गिरफ्तार कर चुकी है। सीबीआई ने इस मामले में इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ऑनली मच लाउडर के पूर्व सीईओ विजय नायर को भी गिरफ्तार किया है।