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जी-20 और एशिया में उभरते दबाव

पाकिस्तान से लेकर नेपाल तक चीन की गतिविधियों पर नज़र ज़रूरी

नवंबर का दूसरा पखवाड़ा एशिया क्षेत्र में काफ़ी हलचल लेकर आया है। जी-20 शिखर सम्मलेन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने (रूस-यूक्रेन) युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी, तो अमेरिका सहित उसके समर्थक देशों ने उनकी ख़ूब तारीफ़ की। मोदी इंडोनेशिया में सम्पन्न हुए जी-20 सम्मलेन से वापस भारत पहुँचे ही थे कि उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर (पीओके) पर बड़ा बयान देते हुए कह दिया कि सरकार जब आदेश देगी, सेना पीओके पर कार्रवाई करने को तैयार है। भारत से बाहर देखें, तो पाकिस्तान में नया सेनाध्यक्ष बन गया और उनकी नियुक्ति होते ही पाक सेना में बग़ावत की स्थिति बन गयी है; क्योंकि दो बड़े जनरल विरोध में इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कुछ और दे सकते हैं। उधर चीन में पहली बार किसी विरोध-प्रदर्शन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जो एक महीना पहले ही तीसरी बार इस पद के लिए चुने गये हैं; के मुर्दाबाद के नारे लगे।

जी-20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए इस लिहाज़ से अच्छा रहा कि अमेरिका ने मुक्त कण्ठ से भारत, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की। एक फोटो में वह मोदी को सैल्यूट करते भी दिख रहे हैं, जो भारत में मोदी के समर्थकों को निश्चित ही आह्लादित करने वाला रहा। अमेरिका के भारत के पक्ष में इस तरह बोलने का एक कारण रूस से भारत के रिश्ते भी हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस के साथ खड़ा न दिखे।

रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम लामबंद हुआ है और वह चाहता है कि एशिया के देश या तटस्थ देश रूस नहीं, अमेरिका के साथ खड़े दिखें। अमेरिका ऐसा करके अपनी लॉबी को मज़बूत करना चाहता है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मुक्तकंठ से प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ इसलिए की, क्योंकि मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के सन्दर्भ में कहा था कि युद्ध समस्या का हल नहीं है। अमेरिका के अपने निहित स्वार्थ हैं। वह ऐसी हर चीज़ को भुनाने की कोशिश करता है, जिससे उसे आर्थिक और कूटनीतिक लाभ मिलता है। भारत की तारीफ़ करना भी भी इसका ही हिस्सा है। लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारत सरकार ने रूस-अमेरिका के बीच इस जंग में ख़ुद को तटस्थ दिखने में सफलता हासिल की है। भले बड़े मंचों पर अमेरिका के रूस विरोधी प्रस्तावों का भारत ने समर्थन नहीं किया है। युद्ध का समर्थन नहीं करके भारत ने ख़ुद की छवि युद्ध विरोधी देश की बनाने की कोशिश की है।

मोदी का युद्ध-विरोध

हालाँकि ‘आज का युग युद्ध का नहीं होना चाहिए’ कहकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लिए भी एक लक्ष्मण रेखा बाँध ली है। यह इस सन्दर्भ में काफ़ी अहम है, जब सेना की चिनार कॉप्र्स के कमाण्डर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी जैसे बड़े सेनाधिकारी ने कहा कि केंद्र सरकार आदेश तो सेना पीओके में कार्रवाई के लिए तैयार है। पीओके भारत का अटूट हिस्सा है, इससे जुड़ा प्रस्ताव भारतीय संसद ने नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय 22 फरवरी, 1994 को ध्वनिमत से पास किया था। यही नहीं, जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में 24 सीटें दशकों से इसलिए ख़ाली रखी जाती हैं, क्योंकि यह सीटें पीओके की हैं।

दरअसल वृहद् कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाला कश्मीर (पाकिस्तान इसे आज़ाद कश्मीर कहता है) ही नहीं हैं। पाकिस्तान ने अपने क़ब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर को तीन हिस्सों में विभाजित कर रखा है, जिसमें पीओके के अलावा गिलगिट-बाल्टिस्तान भी है। इसके अलावा उसने एक बड़ा हिस्सा चीन को भेंट कर दिया था, जिसमें चीन अब सडक़ों और रेल लाइनों का जाल बिछा चुका है। इसके अलावा चीन ख़ुद एक बड़े हिस्से को हथिया चुका है। उधर बलूचिस्तान भी है, जहाँ के नागरिकों पर चीन के सहयोग से पाकिस्तान ज़ुल्म कर रहा है। पाकिस्तान और उसकी सेना के ख़िलाफ़ बलूच जनता में नफ़रत का सैलाब है।

जी-20 शिखर सम्मलेन के बाद अमेरिका ने कहा कि सम्मेलन की बाली घोषणा पत्र सम्बन्धी बातचीत में भारत ने अहम भूमिका निभायी। वैसे भी भारत 2023 में जी-20 की अध्यक्षता करने वाला है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरेन ज्यां पियरे ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ में कहा- ‘प्रधानमंत्री मोदी के सम्बन्ध इस नतीजे के लिए महत्त्वपूर्ण थे और हम भारत की अगले साल जी-20 अध्यक्षता के दौरान सहयोग करने के लिए तत्पर हैं. हम अगली बैठक की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’

निश्चित ही अमेरिका ने जी-20 सम्मलेन का इस्तेमाल रूस के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए भी किया है। भारत की तारीफ़ उसकी रणनीति का बड़ा हिस्सा है। क्योंकि भारत ने ख़ुद को इस स्थिति में खड़ा कर दिया है, जहाँ वह महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता दिखता है। वह न तो अमेरिका और न ही रूस के साथ खड़ा दिखता है और सही पक्ष सामने रखकर अपने एक अलग छवि दुनिया के सामने लाना चाह रहा है, जिसका सन्देश यह है कि वह सिर्फ़ सही के साथ है।

भारत विरोधी सेनाध्यक्ष

भले जी-20 में भारत ने अपनी कूटनीति से ख़ुद को भीड़ से अलग खड़ा करने में सफलता हासिल की है, दक्षिण एशिया की घटनाएँ उसे सावधान रहने का सन्देश दे रही हैं। इनमें सबसे बड़ी घटना पाकिस्तान में नया सेनाध्यक्ष बनना है। नये जनरल आसिम मुनीर भारत विरोधी सेनाधिकारी माने जाते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान विरोधी भी। चूँकि वह आईएसआई के चीफ रहे हैं, उनके आने से जो सबसे बड़ा ख़तरा है, वह यह कि जम्मू और कश्मीर में आंतकवाद तेज़ हो सकता है।

यह आरोप लगाये जाते हैं कि फरवरी, 2019 के जिस पुलवामा आतंकी हमले में 40 से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हो गये थे, उस हमले के पीछे मुनीर का ही हाथ था। उस समय मुनीर आईएसआई के प्रमुख थे। जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद-370 ख़त्म होने के बाद आतंकी वारदात में कुछ कमी तो आयी है; लेकिन वहाँ स्थिति अभी भी बेहतर नहीं कही जा सकती। चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगते जम्मू और कश्मीर सूबे में पिछले महीनों में हुई घटनाएँ बताती हैं कि वहाँ आतंकवाद पर पूरी नकेल नहीं डाली जा सकी है। यही नहीं, स्थानीय युवकों की आतंकी संगठनों में भर्ती की बातें भी सामने आयी हैं।

हालाँकि पाकिस्तान सेना में मुनीर की नियुक्ति के बाद विद्रोह जैसी स्थिति बन गयी है। वहाँ इमरान समर्थक दो बड़े जनरल इस्तीफ़ा दे चुके हैं। इनमें से एक लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद को इमरान ख़ान ने आईएसआई का प्रमुख बनाया था। हालाँकि तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल क़मर जावेद बाजवा ने उन्हें इस पद से हटा दिया था। एक और अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल अजहर अब्बास हैं, जिन्होंने इस्तीफ़ा दिया है। वह भी इमरान ख़ान के पसंदीदा रहे हैं। पाकिस्तान मीडिया में आयी रिपोट्र्स पर भरोसा करें, तो आने वाले समय में कुछ और वरिष्ठ अधिकारी इस्तीफ़े दे सकते हैं। निश्चित ही यह शाहबाज़ शरीफ़ और नये आर्मी चीफ मुनीर के लिए चुनौती की बात है। पाकिस्तान में अस्थिरता भारत के लिए भी बेहतर नहीं कही जा सकती।

भारत के लिए चिन्ता की बात यह भी है हाल में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में चीन के ड्रोन देखे गये हैं। माना जाता है कि पाकिस्तानी सेना से लोहा ले रहे बलूच विद्रोहियों (बलूच मिलिशिया) का दमन करने के लिए पाकिस्तानी सेना चीनी मूल के लड़ाकू सीएच-4 बी ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रान्त के अख़बार बलूचिस्तान पोस्ट ने नवंबर के आख़िर में इस तरह की रिपोर्ट छापी हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में पाकिस्तान ने एसएसजी कमांडो के साथ मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी), लड़ाकू जेट और गनशिप हेलीकॉप्टर्स को तैनात किया है, जिसका मक़सद बलूच विद्रोहियों को ख़त्म करना है। बता दें बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से मुक्ति के लिए भारत की तरफ़ देखते रहे हैं। हाल के महीनों में बलूच मिलिशिया और पाकिस्तान सेना के बीच कई बार भीषण संघर्ष देखे गये हैं। बलूचिस्तान पोस्ट ने दावा किया कि चीन और तुर्की ने पाकिस्तान को लड़ाकू यूएवी के विभिन्न मॉडलों की आपूर्ति की है।

उधर पाकिस्तान में सेना पर इमरान ख़ान के पार्टी के हमले बढ़े हैं। आर्मी प्रमुख के पद से रिटायर होने वाले क़मर जावेद बाजवा को जाते-जाते बहुत फ़ज़ीहत झेलनी पड़ी, जब यह ख़ुलासा हुआ कि रिटायर होने से पहले बाजवा और उनका परिवार मालामाल हो गया है।

आरोप के मुताबिक, आर्मी चीफ बाजवा ने ख़ुद के लिए अरबों की दौलत इकट्ठा की। इसके बाद इमरान के नज़दीकी नेता आजम ख़ान स्वाति ने बाजवा पर जबरदस्त हमला करते हुए कहा कि हमारे दुश्मन (भारत) का एक जनरल पांडे, जो आर्मी प्रमुख बनता है, उसकी टोटल सम्पत्ति 29 लाख रुपये है। इस क़ौम को बताकर जाओ तुम्हारी (बाजवा) सम्पत्ति कितनी है? कहाँ से लाये हैं ? मैं पाकिस्तान का शहरी हूँ। तुमसे पूछ रहा हूँ और पूछता रहूँगा उस वक़्त जब तक मुझे जवाब नहीं मिलता। हालाँकि इसका जवाब यह मिला कि बाजवा ने उन्हें गिरफ़्तार करवा दिया।

पाकिस्तान में हालात लगातार ख़राब होते दिख रहे हैं। इमरान ख़ान ने अपनी पार्टी के तमाम सदस्यों के असेम्बली से इस्तीफ़े करवा दिये हैं, ताकि नये चुनाव का दबाव शाहबाज़ सरकार पर बनाया जा सके। यह स्थिति पाकिस्तान को किसी भी तरफ़ ले जा सकती है। लिहाज़ा भारत को चौकन्ना रहना पड़ेगा। पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर होने की सम्भावना अब कम दिखती है। शाहबाज़ शरीफ़ पिछले डेढ़ साल में इस दिशा में कुछ नहीं कर पाये हैं। अब मुनीर के सेनाध्यक्ष बनने के बाद भारत बेहतर होने की सम्भावना लगभग न के बराबर है।

नेपाल में घुसपैठ

चीन पाकिस्तान के साथ तो पहले से ही क़दम-से-क़दम मिलाकर चलता रहा है, अब नेपाल में भी उसकी गतिविधियाँ काफ़ी तेज़ होती दिख रही हैं। भारत के लिए चिन्ता की नयी बात नेपाल की ज़मीन पर चीन के निर्माण हैं। नेपाल के कृषि मंत्रालय के एक सर्वे दस्तावेज़ में इस बात का ख़ुलासा हुआ है कि चीन ने उत्तरी नेपाल की सीमा पर 10 जगहों पर 36 हेक्टेयर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। रिपोट्र्स के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पहली बार सन् 2016 में नेपाल के एक ज़िले में एक पशु चिकित्सा केंद्र बनाया था। ये रिपोट्र्स भी आयी हैं कि फरवरी, 2022 में चीन ने नेपाल पर साझा सीमाओं के अतिक्रमण का आरोप जड़ा था।

नेपाल के आधिकारिक दस्तावेज़ ज़ाहिर करते हैं कि उसके सुदूर पश्चिमी हुमला ज़िले में सीमा चौकी के आसपास चीन नहरें और सडक़ें बनाने का प्रयास कर रहा है। नेपाल चीन पर चीनी सीमा और लालुंग सोंग सीमा क्षेत्र में निगरानी गतिविधियों का आरोप लगा चुका है। चीन की गुंडागर्दी इतनी है कि उसने सीमा पर नेपाली किसानों के पशु चराने का प्रतिबंध लगा दिया है। यही नहीं, आरोप यहाँ तक हैं कि उसने सीमावर्ती क्षेत्रों में हिन्दू और बौद्ध मन्दिरों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के नेपाल में अतिक्रमण की यह हालत है कि चीनी सीमा पर नेपाल के दोलखा, गोरखा, दारचुला, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासा और रसुवा ज़िलों की ज़मीन पर चीन घुसपैठ कर चुका है। दार्चुला और गोरखा ज़िलों में कुछ गाँव चीन के क़ब्ज़े में हैं। हुम्ला ज़िले और रुई गाँव में तो चीन के दर्जन भर निर्माण खड़े कर दिये हैं। नेपाल के एक बड़े अधिकारी के नेतृत्व ने सरकारी टीम ने अपने गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट पिछले साल सौंपी थी, जिसमें चीन के अतिक्रमण का ज़िक्र है। ज़ाहिर है यह स्थिति भारत के लिए सुखद नहीं है।

चीन में शी का विरोध

इसमें कोई दो-राय नहीं कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन के साथ भारत की हाल के महीनों में काफ़ी तल्ख़ी रही है। अब जिनपिंग अपने ही देश में विद्रोह जैसी स्थिति झेल रहे हैं। उनकी चीन में शून्य-कोविड नीति के विरोध में नवंबर के आख़िर में कई प्रमुख शहरों में हजारों लोग सडक़ों पर उतर आये। लोगों में शी के प्रति जबरदस्त ग़ुस्सा दिखा। यह पहली बार है, जब विरोध-प्रदर्शनों में राष्ट्रपति जिनपिंग के मुर्दाबाद के नारे लगे। चीन में ऐसा होना बहुत आश्चर्यजनक बात है। इससे संकेत मिलता है कि लोग घुटन में जीते को तैयार नहीं और उनके तेवर तल्ख़ हो रहे हैं। इससे पहले छात्रों ने बीजिंग के इलीट सिंघुआ विश्वविद्यालय में तालाबंदी के विरोध में रैली की थी और वे ‘लोकतंत्र और क़ानून का शासन’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ जैसे नारे लगा रहे थे।

 

“भारत सरकार जब आदेश देगी, सेना पीओके पर कार्रवाई करने को तैयार है। पीओके के विषय पर संसद में प्रस्ताव पास हो चुका है। भारतीय सेना सरकार के हर आदेश के लिए पूरी तरह से तैयार है। सरकार जब भी आदेश देगी, सेना अपनी पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ेगी। भारत में घुसपैठ के लिए पाकिस्तानी लॉन्चपैड पर क़रीब 160 आतंकी मौज़ूद हैं। हम उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने देंगे।’’

ले. ज. उपेंद्र द्विवेदी

उत्तरी कमांड प्रमुख

कम्पनी ने तलाशा आपदा में अवसर

पैसा लेकर अन्तिम संस्कार करने को बनाया मोटी कमायी वाला व्यवसाय

कोरोना महामारी में एक जुमला ख़ूब चर्चा में आया था, आपदा में अवसर। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना-काल में देशवासियों को राय दी थी कि वे आपदा में अवसर तलाशें। इसकी कोई जानकारी नहीं कि कोरोना-काल में आपदा में अवसर कितने लोगों ने तलाशे, मगर यह सच है कि आम लोगों को तो इस आपदा ने कहीं का नहीं छोड़ा। वैसे भी कोई आपदा जब आती है, तो सबसे अधिक समस्या सामान्य लोगों को ही होती है। मगर इस कोरोना-काल में कुछ लोगों ने वास्तव में आवदा में अवसर ढूँढ लिया तथा मरते, तड़पते लोगों की बेबसी का लाभ उठाते हुए जमकर कमायी की। मास्क से लेकर दवा, इंजेक्शन से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक के कई-कई गुना दाम जमकर वसूले गये। दो रुपये का मास्क 20 से 25 रुपये में बेचा गया, 2,000 से 2,500 का रेमडेसिवीर इंजेक्शन 20,000 से लेकर 50,000 रुपये तक का बिका। उसमें भी मिलावट करने वालों ने पैरासिटामोल का घोल भरकर बेचा। 500 रुपये वाला ऑक्सीजन सिलेंडर 10,000 से लेकर 30,000 रुपये तक में चोरी-छिपे बेचा गया। कोरोना-काल में ही एक अन्य दृश्य देखने को मिला कि लोग कोरोना से मरे अपने ही घर के सदस्य के शव को हाथ लगाने तक से बचते दिखे।

आपदा के इसी दृश्य को देखते हुए सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट नाम की कम्पनी ने आपदा में अवसर की तलाश की। बीते नवंबर में कम्पनी ने दावा किया कि वह 50 लाख रुपये का लाभ कमा चुकी है तथा आने वाले समय में 2,000 करोड़ रुपये का लाभ उसे होगा। सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट नाम की यह कम्पनी नवंबर महीने के समाप्त होने से पहले ही 5,000 अन्तिम संस्कार करा चुकी थी। एक अन्तिम संस्कार के लिए कम्पनी का शुल्क 37,000 रुपये है। जबकि एक मुर्दे के अन्तिम संस्कार में 8,000 से 10,000 रुपये तक का व्यय होता है।

हमारी संस्कृति और समाज के संस्कार हैं कि कोई भी कार्य मिलजुलकर किया जाता है। मगर जैसे-जैसे बाज़ारवाद हावी होता जा रहा है, अपने ही अपनों से दूरी बनाते जा रहे हैं। इसकी वजह बाज़ारवाद के इस समय में हर वस्तु का मूल्य केवल पैसे से है। इसी बाज़ारवाद ने हर किसी को स्वार्थी और लालची बना दिया है, जिसके चलते अब बिना स्वार्थ के अपने भी साथ नहीं देते। बुढ़ापे में या पैसा पास न होने पर तो अपने भी साथ छोडऩे में समय नहीं लगाते। आजकल तो विदेशों में रहने वाले अनेक लोग अपने बड़े माता-पिता को लौटकर भी नहीं देखते। इसी माहौल को देखते हुए सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट कम्पनी ने अन्तिम संस्कार का काम शुरू किया। यह कम्पनी किसी के मरने पर उसके घर वालों या रिश्तेदारों द्वारा बुलाने पर अन्तिम संस्कार का पूरी व्यवस्था करती है। इसके लिए वह शव को कांधा देने वाले चार लोग, क़फ़न, फूल, अरथी, लकड़ी और अन्य सामग्री की व्यवस्था कम्पनी ही करती है। अर्थात् अब अगर कोई किसी अपने का अन्तिम संस्कार करना नहीं चाहता या दूर है, तो वो इस कम्पनी को किसी की मृत्यु पर 37,000 रुपये में उसका अन्तिम संस्कार का ठेका देकर छुटकारा पा सकता है।

भारत में इस पाश्चात्य संस्कृति से टूटते परिवारों में और दरार आएगी। हमारी संस्कृति मिलजुलकर रहने और सुख-दु:ख में एक-दूसरे के काम आने की है। मगर किसी कम्पनी द्वारा किराये के अन्तिम संस्कार करने वालों को बुलाने की यह परम्परा टूटते-बिखरते रिश्तो के बीच आग में घी का काम करेगी, जिससे एक-दूसरे के प्रति प्रेम और त्याग की भावना समाप्त होगी। धीरे-धीरे सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट कम्पनी की तरह देश में अन्तिम संस्कार भी एक पेशेवर काम होता जाएगा और दर्ज़नों कम्पनियाँ इसी तरह खुलेंगी। हो सकता है कि हर धर्म के लोगों के अन्तिम संस्कार के लिए इस तरह की कम्पनियाँ खुलने लगें, जिससे पारिवारिक रिश्तों में अन्तिम संस्कार तक अपने फ़र्ज़ निभाने का ट्रेंड ख़त्म होने लगे। इस देश के धर्माचार्यों, विचारकों, बुद्धिजीवियों को इस तरह की परम्परा पर ध्यान देकर समाज में बढ़ रहे विखंडन को एकता तथा सामंजस्य का पाठ पढ़ाना होगा, अन्यथा ऐसी परम्पराओं से समाज टूटने लगेगा। कम्पनी से अपने ही लोगों का अन्तिम संस्कार कराने वालों को भी सोचना होगा कि क्या यह उचित है? ऐसे लोगों को कोरोना-काल के उन दृश्यों को नहीं भूलना चाहिए, जब मानवतावादी लोग दूसरे धर्म के कोरोना से मरे लोगों का अन्तिम संस्कार भी मरे हुए व्यक्ति के धर्म के अनुरूप अपनत्व की उसी भावना से कर रहे थे, जिस भावना से कोई अपना करता है।

अराजकता में तब्दील होता नारीवाद

पिछले दिनों इंदौर में नशे में धुत चार लड़कियों ने सडक़ पर एक लडक़ी को बेरहमी से पीटा। आज कभी लड़कियों द्वारा मारपीट करने, कभी शराब पीकर लोगों पर गाड़ी चढ़ाने, कभी डिलीवरी बॉय को मारने, कभी कैब ड्राइवरों से बदतमीज़ी करने, कभी ड्रग्स और मानव तस्करी करने, तो कभी किसी लडक़े पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाने जैसे अपराध लड़कियों द्वारा किये जा रहे हैं। अभी पंजाब के जालंधर में एक पुरुष को चार महिलाओं द्वारा अगवा करके यौन उत्पीडऩ करने का मामला प्रकाश में आया। सम्भवत: देश बदल रहा है। एक लम्बी प्रक्रिया के बाद पुरुषवाद की तरह नारी सशक्तिकरण अब नारीवाद (फेमिनिज्म) में तेज़ी से तब्दील हो रहा है।

भारत में 70 का दशक नये दौर के आन्दोलन काल का था, जिसके केंद्र पर्यावरण, मानवाधिकार, सहकारिता और नारीवाद जैसे विषय थे। इन्होंने अपने चयनित लक्ष्यों के लिए प्रशंसनीय कार्य किये। लेकिन बीतते समय के साथ इनका अति उत्साह नकारात्मकता में परिवर्तित होता गया। 90 के दशक में हुए उदारीकरण ने भारत में एक अधिक उन्मुक्त समाज को आकार देना शुरू किया, जिसमें संचार माध्यमों ने बड़ी भूमिका निभायी। इसी समय पश्चिमी मूल्यों की पैठ और स्वीकृति बढऩे लगी। यही वह समय था, जब यूरोप-अमेरिका में नारीवाद दुराग्रह की दिशा में मुड़ चुका था। अमेरिकी नारीवादी केट मिलेट, जिन्हें 1970 में टाइम पत्रिका ने नारीवाद का कार्ल माक्र्स करार दिया; की किताब सेक्सुअल पॉलिटिक्स को नारीवाद का धर्म ग्रंथ माना गया। इसमें मिलेट लिखती हैं- ‘परिवार शोषण का तंत्र है, जिसमें पुरुष स्त्री और बच्चों का शोषण करता है। विवाह स्त्री के लिए एक व्यक्ति हेतु वेश्यावृत्ति है, बल्कि वेश्यावृत्ति का पेशा स्त्री के लिए मुक्ति-मार्ग है। यह स्त्री को शक्ति तथा उसके शरीर पर अधिकार देता है और उसे पुरुषों की दासता से मुक्त करता है।’

मिलेट ने बाक़ायदा महिलाओं का एक जागरूकता समूह बनाया था, जिसका घोषित लक्ष्य सांस्कृतिक क्रान्ति करना और मोनोगैमी (एकल समागम) को ख़त्म करना था। मिलेट के लिए व्यवहार्य नीति थी- स्वच्छंदता, अश्लीलता, वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता का प्रचार-प्रसार करना। आश्चर्य है कि ऐसी विकृत मानसिकता की महिला अमेरिका के एंटी-साइकाइट्री (मनोविकार नाशक) आन्दोलन की नेत्री और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट मानी जाती थी। ऐसे ही लेखिका और फ़िल्मकार कैरोल लीड थीं, जो वेश्यावृत्ति को यौनकर्म, एक प्रकार का रोज़गार और उद्योग मानती थीं।

पश्चिम में फेमिनिज्म को समर्थित एक क़दम स्लटवॉक आन्दोलन है, जिसकी शुरुआत अप्रैल, 2011 को ओंटारियो में टोरंटो पुलिस के एक अधिकारी द्वारा महिलाओं को गरिमामय परिधान पहनने के सुझाव पर हुआ। इसे महिला अधिकारों पर हमला माना गया। महिलाओं द्वारा स्लटवॉक का ध्येय माई बॉडी, माई च्वाइस के सिद्धांत की दृढ़ता को दिखाना था। प्रदर्शनकारी महिलाओं ने बिकनी पहने, तो कुछ ने बिलकुल नग्न होकर मार्च निकाला। तबसे यूरोपीय देशों में ऐसे कई मार्च हो चुके हैं। कैसी अजीब विडम्बना है, सभ्यता के इतिहास में मानव को हज़ारों साल लगे कपड़े पहनना सीखने में और अपने अधिकार सिद्ध करने के नाम पर यह उपलब्धि पाँच मिनट में गँवा दी जाती है। समझना होगा कि नारीवाद को किस तरह वीभत्स मार्ग पर धकेल दिया गया है कि ख़ुद का वजूद साबित करने के लिए नग्नता उचित प्रतीत हो रही है। पश्चिम का यही रोग अब भारत को भी लग रहा है।

इसके पीछे एक बड़ी वजह वामपंथ भी है, जिसके संबल से नारीवाद की सनक में इज़ाफ़ा हुआ है। यह कुछ और नहीं, बल्कि आधी आबादी के लिए विकृत साम्यवाद है। इनका कोई दृढ़ सैद्धांतिक आधार भी नहीं है। ये वही हैं, जो बलात्कार हेतु मृत्युदण्ड पाने वाले अपराधियों को प्रश्रय भी देते हैं। यही लोग मानवाधिकार के मसीहा कोलकाता की 15 साल की बच्ची हेतल पारेख के बलात्कार और हत्या के अपराधी धनंजय चटर्जी को सन् 2004 में दी जा रही फाँसी का विरोध करते हुए न्यायिक प्रक्रिया को कोस रहे थे। जहाँ एक तरफ़ हैदराबाद की पशु चिकित्सक और दिल्ली की नृभया, हाथरस की गुडिय़ा और अब मुम्बई की श्रद्धा जैसी महिलाएँ जघन्य अपराधों की शिकार होती हैं, तो वहीं मोहम्मद आरिफ़, मोहम्मद शारिक, अरमान अंसारी, आफ़ताब, चिंताकुंटा चेन्नाकेशवुलु, संपीप उर्फ़ चंदू, लवकुश, रामकुमार उर्फ़ रामू, अक्षय ठाकुर, मुकेश सिंह, विनय शर्मा और पवन गुप्ता जैसे घृणित अपराधियों के प्रति मानवीय आधार पर न्यायिक प्रक्रिया की माँग करने वाले भी हैं।

कई दफ़ा तथाकथित महिला अधिकारों के ये रक्षक अति उत्साह में स्वयंभू न्यायाधीश बन बैठते हैं, जिससे निर्दोष प्रताडि़त होते हैं। जैसे 2020 का दिल्ली का बॉयज लॉकर रूम मामला, जिसमें एक स्कूली छात्रा ने अपने सहपाठी पर सोशल मीडिया द्वारा यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया था, जबकि पुलिस जाँच के अनुसार, वह लडक़ी स्वयं उस लडक़े की फेक आईडी से यह सब कर रही थी। किन्तु सच सामने आने से पूर्व आरोपी बनाये गये उस नाबालिग़ लडक़े ने इस प्रताडऩा के कारण आत्महत्या कर ली। ऐसा ही उदाहरण वर्तमान में चर्चित जॉनी डेप और एम्बर हर्ड के तलाक़ का मामला है, जहाँ हर्ड के आरोपों ने डेप का निजी जीवन और फ़िल्मी करियर बर्बाद कर दिया। ऊपर से उन्होंने सामाजिक जीवन में जो प्रताडऩा झेली, वो अलग। हालाँकि न्यायालय ने हर्ड (झुण्ड) का षड्यंत्री और क्रूर चेहरा उजागर करके डेप को आरोपमुक्त किया। लेकिन उस मानसिक प्रताडऩा का क्या, जो डेप ने झेली?

समस्या यही है, किसी भी परिस्थिति में पुरुष को दोषी मानना। काफ़ी संख्या में पुरुष ग़लत होते हैं; लेकिन महिलाएँ भी काफ़ी संख्या में ग़लत हो चुकी हैं। लव जिहाद के ख़िलाफ़ महिला अधिकारों के समर्थक भी एकपक्षीय दोषारोपण कर रहे हैं। स्वच्छंदता के आवेश में पारिवारिक अपनापन व रिश्तों को तिलांजलि देतीं तथा सामाजिक क़ायदों एवं पुलिस-प्रशासन की चेतावनियों की धज्जियाँ उड़ातीं ये महिलाएँ माई बॉडी-माई च्वाइस के आधुनिक अधिकारों के साथ ऐसे रिश्तों में पड़ती हैं। फिर ऐसे मामलों के लिए उन्हें भी कुछ हद तक दोषी क्यों न ठहराया जाए? राजनीतिशास्त्री एंटोनियो ग्राम्सी के अनुसार, ‘किसी समाज में लोगों को स्थापित मूल्यों के विरुद्ध खड़ा नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर लोगों को अपने साथ लाना हो, तो सबसे पहले समाज के स्थापित मूल्यों को बदलना चाहिए।’

दिग्भ्रमित नारीवाद की दुर्दशा के पीछे भी यही सिद्धांत काम कर रहा है, जो उसे मूल्यहीनता की तरफ़ धकेल रहा है। जब स्थापित मूल्य बदलेंगे, तो भारतीय समाज की नींव में स्थित नारी गरिमा के प्रति नज़रिया भी बदलेगा और जब इसे नकारात्मक स्वरूप प्रदान किया जाएगा, तो परिणाम भी विघटनकारी होगा। पुरुषवाद की समाप्ति के नाम चलने वाले दुराग्रही प्रगतिशील आन्दोलन वास्तव में सामाजिक विध्वंस को तत्पर स्वार्थी तत्त्वों के मध्य की दुरभिसंधि है। पितृसत्ता के विरोध के नाम पर खलनायक बनाया गया एक पिता ही अपने परिवार का रक्षक होने के साथ-साथ अपनी सन्तति के भविष्य निर्धारण में और समाज निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस पितृसत्ता को अपमानित करके चुनौती देने का प्रयास वास्तव में एक पिता के पुरुषार्थ को समाप्त करने का षड्यंत्र है, ताकि उसे अपने सन्ततियों के सुदृढ़ भविष्य हेतु संघर्ष में कमज़ोर करके इसकी समाधि पर सामाजिक अराजकता की नींव डाली जाए। किसी में भी कमियाँ स्वाभाविक हैं; पितृसत्ता में भी हैं। कोई भी समाज व्यक्ति या वर्ग यहाँ तक कि कई दार्शनिक तो ईश्वरीय विधान को भी दोषमुक्त नहीं मानते। लेकिन जब एक विचारधारा की प्रवृत्ति किसी लक्षित वर्ग या समाज पर केवल दोषारोपण की हो, तो समस्याएँ पैदा होंगी ही। जैसे किसी आवश्यकता को अधिकार के रूप में परिभाषित किये जाने का अर्थ यह हुआ कि जब भी इस आवश्यकता की आपूर्ति बाधित होगी, तब यह सारी प्रक्रिया अधिकार हनन प्रतीत होगी।

एक पुरुष जो पत्नी, बहन या बेटी के जीवन में हस्तक्षेप करता है, वही हस्तक्षेप अपने छोटे भाई या बेटे के जीवन में भी करता है। क्योंकि वह अपने परिवार की सुरक्षा के भाव से संचालित होता है। उसका ध्येय दमन नहीं, बल्कि बाहरी संकटों से उनकी हिफ़ाज़त होता है। इस ज़िम्मेदार भावना को लिंगाधारित-चयनित स्वरूप देकर कलंकित करना अनुचित है। अपनी शारीरिक क्षमता पर आधारित पौरुष द्वारा अगर कोई पुरुष महिला का दमन-शोषण करता है, तो उसी पौरुष के दम पर दूसरा पुरुष ऐसे अत्याचार का प्रतिकार भी करता है।

इस विकृत अधिकारवाद के नाम पर विवाह नामक संस्था को लगभग नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है। अब तो पश्चिम की मोनोगैमी (ख़ुद से विवाह) प्रथा भी भारत (गुजरात) से प्रारम्भ हो गयी है। भारतीय संस्कृति के विशिष्ट षोडश संस्कारों में विवाह भी है, और यही समाज का आधार भी है। आश्रम व्यवस्था में गृहस्थ आश्रम का आधार नारी है और चारों आश्रमों में इसे ही प्रधान माना गया है (गृहस्थ समाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रम: -मनुस्मृति 3/77)।

दिक़्क़त यह है कि जो आज नारी-मर्यादा की बात करते हैं, पिछड़े और दकियानूसी लगते हैं। लेकिन वे जो नारीवाद के नाम पर पुरुषों के विरुद्ध घृणा फैलाते हैं, महिलाओं को पारम्परिक सामाजिक सुरक्षा कवच से निकालकर भोगवाद का आसान शिकार बनने की तरफ़ धकेल रहे हैं, और स्वयं को प्रगतिशील कहते हैं। यही वर्ग वैवाहिक सम्बन्धों को असमानता, आजीवन बन्धन आदि का पर्याय बता उसको विद्रूप बनाने के लिए आतुर है। हालाँकि ऐसे विचार भ्रामक हैं। केवल विवाह संस्था ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी सामाजिक बन्धन में 100 फ़ीसदी समानता नहीं हो सकती। वैवाहिक सम्बन्धों की नियति में कहीं पुरुष प्रधान हो सकता है, कहीं स्त्री किसी विषय पर स्त्री पक्ष की प्रबलता हो सकती है। लेकिन बिलकुल नपी-तुली समानता तो असम्भव है। उचित हो कि स्त्री-पुरुष दोनों ही समानता की होड़ करने के बजाय समन्वय, साहचर्य या सहजीविता से निर्वाह करें।

जिस तरह पुरुषवाद ने स्त्रियों पर अत्याचार किये हैं, उसी प्रकार नारीवाद एकल जीवनशैली के नाम पर उपभोक्तावादी-बाज़ारवादी संस्कृति को बढ़ावा दिया गया है और तलाक़ की दर बढ़ायी है। नारी को सहधर्मिणी, सहयोगी से उपभोग की वस्तु एवं प्रतिद्वंद्वी में तब्दील किया है। उन्हें य$कीन दिलाया गया है कि नग्नता में स्वतंत्रता निहित है। जब एक पुरुष का चारित्रिक पतन होता है, तो मात्र एक परिवार बर्बाद होता है; लेकिन जब एक स्त्री पतित होती है, तो पूरी नस्ल का पतन हो जाता है। सर्वविदित है कि समाज का अस्तित्व नारीत्व और पुरुषत्व दोनों से है। लेकिन समाज निर्माण में नारीत्व की भूमिका पुरुषत्व से कहीं बड़ी है। किन्तु एक सशक्त समाज के लिए दोनों की समन्वित और सामंजस्यपूर्ण भूमिका आवश्यक है। आज जहाँ पुरुष आगे बढक़र अपनी नयी भूमिकाएँ स्वीकार कर रहे हैं, वहीं महिलाएँ सकारात्मक प्रगति करने के साथ-साथ अपनी परम्परागत भूमिका को तिरस्कृत कर रही हैं। यही समाज के विखण्डन और पतन का कारण है।

(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

क्रिप्टो करेंसी का ग़ुब्बारा

Frankfurt, Hesse, Germany - April 17, 2018: Many coins of various cryptocurrencies

अचानक तेज़ी से चलन में आयी क्रिप्टो करेंसी पर संकट मंडरा रहा है। क्रिप्टो करेंसी का मतलब है- प्रच्छन्न अर्थात् गुप्त मुद्रा। यह एक डिजिटल करेंसी है, जो बटुए में नहीं है; परन्तु है। फिर भी कुछ देशों में इस क्रिप्टो करेंसी से सब कुछ ख़रीदा और बेचा जा रहा है। परन्तु अक्टूबर के पहले पखवाड़े के अन्त में असली क्रिप्टो करेंसी बिटकॉइन में 75 प्रतिशत की गिरावट ने इस डिजिटल करेंसी की अस्थिरता का भाँडा फोड़ दिया। क्रिप्टो करेंसी की इस बड़ी गिरावट ने कई अमीरों की अमीरी छीन ली। कुछ की भारी-भरकम अमीरी का तो स$फाया ही हो गया, जबकि क्रिप्टो करेंसी के कई निवेशकों को जबरदस्त घाटा हुआ है।

इस गिरावट से एक झटके में बाज़ार में टिके रहने का और अमीरी का भ्रम टूट गया। एक समय ऐसा भी था, जब बिटकॉइन को गोल्ड या यूएस डॉलर से भी अधिक मूल्यवान बताया जा रहा था। उस समय समझदार अर्थ शास्त्रियों ने इस करेंसी को लेकर चेतावनी दी थी कि यह एक भ्रामक करेंसी है, जो कभी भी घाटे का सौदा हो सकती है। कुछ अर्थ शास्त्रियों ने तब इसके नुक़सान गिनाते हुए कहा था कि क्रिप्टो करेंसी आने वाले समय में नुक़सानदायक साबित होगी, क्योंकि इसकी क़ीमतें बेहद अस्थिर हैं। क्रिप्टो करेंसी पर किसी बैंक या सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, क्योंकि यह एक पीयर-टू-पीयर व्यवस्था है, जो किसी को भी, कहीं भी भुगतान करने और भुगतान प्राप्त होने को तो सक्षम बनाती है, परन्तु ये किसी के बटुए में नहीं है, बस डिजिटल खाते में है। इसलिए सभी देशों की सरकारें क्रिप्टो करेंसी को लेकर एकमत नहीं हैं। कुछ देशों ने क्रिप्टो करेंसी को करेंसी माना ही नहीं है, तो कुछ देशों में सरकारों ने इसे वैधानिक करार दे दिया है।

बड़े अपराधी मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध ख़रीदारी जैसी अवैध गतिविधियों में क्रिप्टो करेंसी का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ रिपोट्र्स ने तो दावा किया है कि ड्रग्स माफ़िया डार्क वेब के माध्यम से क्रिस्टो करेंसी का इस्तेमाल ड्रग्स बेचने और ख़रीदने के लिए भी कर रहे हैं। नोटों की तरह दिखायी न देने वाली यह क्रिप्टो करेंसी हैकर्स की पसन्दीदा है। क्रिप्टो करेंसी का एक बड़ा नुक़सान यह है कि इंटरनेट कनेक्शन वाले कम्प्यूटर की मदद से कोई भी इसे हासिल कर सकता है। इस प्रक्रिया को क्रिस्टो करेंसी की माइनिंग यानी खनन कहते हैं। परन्तु इसके लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हालाँकि क्रिप्टो करेंसी ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी की वजह से सुरक्षित भी है, परन्तु इसके क्रिप्टो एक्सचेंज और वॉलेट को हैक करने के मामले भी कम नहीं हैं। कई बार हैकर्स ने लाखों डॉलर की क़ीमत की क्रिस्टो करेंसी उड़ा ली है। बिटकॉइन के अतिरिक्त दूसरी क्रिप्टो करेंसी का तो और भी बुरा हाल है, जिनमें से कई एक ही साल में 80 से 90 प्रतिशत तक गिर गयी हैं।

अमेरिका में रहने वाली भारतीय मूल की अर्थशास्त्री अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भारत सरकार को क्रिप्टो करेंसी को नियामक बनाने की सलाह दी थी। उन्होंने क्रिस्टो करेंसी को विश्व की उभरती अर्थ-व्यवस्थाओं के हित में बताते हुए इसे रेगुलेट करने की सलाह दी थी। क्रिस्टो करेंसी पर एक वैश्विक नीति बनाने का सुझाव देते हुए गीता गोपीनाथ ने कहा था कि क्रिप्टो करेंसी के कई एक्सचेंज ऑफशोर हैं और वे किसी विशेष देश के नियमों के अधीन नहीं हैं। उन्होंने वैश्विक नीति वैश्विक नीति की वकालत करते हुए गीता गोपीनाथ ने कहा था कि कोई भी देश इस समस्या को अपने दम पर हल नहीं कर सकता है, क्योंकि क्रिप्टो करेंसी ट्रांजेक्शन आसानी से सीमा पार से किया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि इस पर तत्काल एक वैश्विक नीति की ज़रूरत है।

सन् 2021 में भारतीय रिजर्व बैंक ने तैयारी तेज़ कर दी और 17 दिसंबर, 2021 को देश के इस सबसे बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने एक बैठक की, जिसमें क्रिप्टो करेंसी नियामकीय दायरे में लाने को लेकर गम्भीरता से चर्चा हुई थी। इस बैठक में क्रिप्टो करेंसी के दुरुपयोग की आशंका जतायी गयी थी। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास कई बार ज़ोर देकर कहा है कि क्रिप्टो करेंसी के दाम में उतार-चढ़ाव और इसमें छोटे निवेशकों की बढ़ती हिस्सेदारी चिन्ता के विषय हैं। हालाँकि आरबीआई ने 1 दिसंबर को डिजिटल करेंसी का पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च कर दिया है। पिछला आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्रिप्टो करेंसी को डिजिटल रुपया कहते हुए इशारे-इशारे में इसे आम लोगों के लिए उपयोगी साबित करने की कोशिश की थी और कहा था कि क्रिप्टो करेंसी पर सरकार 30 प्रतिशत टैक्स लेगी। उन्होंने कहा था कि डिजिटल करेंसी आने से फ़िलहाल जो करेंसी मैनेजमेंट का सिस्टम है, वो का$फी आसान और सस्ता हो जाएगा।

हालाँकि भारत में अभी क्रिप्टो करेंसी को क़ानूनी मान्यता नहीं मिली है। फिर भी लाखों भारतीयों में क्रिप्टो करेंसी को लेकर का$फी उत्साह है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके लिए कई बार विचार कर चुके हैं और बोल भी चुके हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रिप्टो करेंसी बिल बनाने को लेकर कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की थी, जिसमें उन्होंने क्रिप्टो करेंसी को रेगुलेट करने के लिए और मज़बूत क़दम उठाने के संकेत दिये। भारत सरकार का मानना है कि क्रिप्टो करेंसी बिल लाने के लिए इसके उपभोक्ताओं के रुझान को भी देखा जाना चाहिए, परन्तु क्रिप्टो करेंसी के रेगुलेट न होने से इसका उपयोग टेररिस्ट फीडिंग और काला धन की आवाजाही में हो सकता है।

अब अगर कोई क्रिप्टो करेंसी में निवेश करने वाला हो, तो सोच-समझकर और पूरी छानबीन के बाद ही करे। अन्यथा बड़ी आसानी से ठगों का शिकार बन सकता है और पैसा गँवा सकता है। ये लोगों के लिए क्रिप्टो करेंसी नयी है, जिसकी बाज़ार में उपयोगिता तो बढ़ी है, परन्तु इसमें अस्थिरता है। रातोंरात अमीर बनने का सपना देखने वाले युवाओं को क्रिप्टो करेंसी में दिलचस्पी है, तो उन्हें और भी सोच-समझकर इसमें पैसा लगाना चाहिए। ध्यान रखना होगा कि क्रिप्टो करेंसी को ऑनलाइन या ऑफलाइन वॉलेट में ही रखी जाती है। अत: नये इन्वेस्टर ऑनलाइन वॉलेट का उपयोग करें, तो उनके लिए अच्छा होगा। यह सलाह अर्थ शास्त्रियों की है। नये इन्वेस्टर को क्रिप्टो करेंसी के इस्तेमाल के बारे में भी अच्छी तरह समझना होगा, ताकि उन्हें कोई कंगाल न कर दे।

सुरक्षा मानकों के दिशा-निर्देशों का पालन करें और मोबाइल वॉलेट में क्रिप्टो करेंसी को न रखें, क्योंकि साइबर ठगों द्वारा मोबाइल पर यह करेंसी आसानी से हैक करके माइनिंग कर ली जाती है। किसी के लिए क्रिप्टो करेंसी सबसे सुरक्षित करेंसी तभी बन सकती है, जब उसे उसके इस्तेमाल और बाज़ार के रुख़ का सही से पता हो। ध्यान रखना होगा कि क्रिप्टो करेंसी क्रिप्टोग्राफी और ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी से मिलकर बनी है। इसी के चलते क्रिप्टो करेंसी बिना दिखने वाले पैसे से दिखने वाले पैसे और एसेट्स के लिए एक नया सेंट्रलाइज्ड सिस्टम डिफाइन करती है। परन्तु इस व्यवस्था में ट्रांजेक्शन को वैरिफाई करने के लिए किसी भी बैंक, क्रेडिट कार्ड कम्पनी अथवा किसी क़रार करने की आवश्यकता नहीं होती है, जिसके चलते इसमें धोखा होने का डर भी अधिक रहता है।

यह सच है कि क्रिप्टो करेंसी के इस्तेमाल से समय और रिसोर्स की ख़ूब बचत होती है, परन्तु ख़तरा भी उतना ही अधिक रहता है। क्योंकि यह थर्ड-पार्टी मिडिएटर का उपयोग नहीं करती है, दो ट्रांजेक्शन करने वाली पार्टियों के बीच क्रिप्टो करेंसी ट्रांसफर हो जाती है। क्रिप्टो करेंसी के उछाल को देखकर पहले जिन लोगों में बहुत उत्साह था, अब इसके नुक़सान और एक साथ गिरने से उन्हीं लोगों में डर भी बैठ गया है। इसमें ऋणदाताओं की बाढ़ भी बहुत तेज़ी से आयी है, जो रातोंरात अमीर बनने का सपना देखने वालों को तेज़ी क़र्ज़दार बना रहे हैं। क्रिप्टो करेंसी की कमियाँ और नुक़सान जानने के बावजूद लोगों का इसके प्रति रुझान कुछ समय पहले तक देखने लायक था।

क्रिप्टो एक ग़ुब्बारे की तरह फटाफट फूला और एक ही झटके में पलक झपकते ही फूट गया। सारी हवा निकल गयी और इसके प्रशंसकों की बोलती बन्द हो गयी। कुछ लोग इसे अब भी बढ़ावा देने में लगे हैं। कई सेलेब्रिटी ब्रांड एम्बेसेडर बनकर क्रिप्टो करेंसी को मज़बूती देने के लिए मैदान में उतारे गये। एचओडीएल (होल्ड ऑन टु डियर लाइफ) जैसे टर्म बनाये गये, जिसका मक़सद यही था कि लोगों को समझाया जाए कि बाज़ार चाहे जितना भी गिरे, मंदी कितनी भी हो, परन्तु करेंसी मत बेचो। इसी चक्कर में पडक़र जिन लोगों ने इस न दिखने वाली करेंसी में अपना सब कुछ लगा दिया था, ऐसे हज़ारों लोग एक ही झटके में अपना दाँव हार गये और आज खाली हाथ बैठे हैं। आज बाज़ार में इस डिजिटल करेंसी को लगाने के लिए बहुत गम्भीरता से विचार करने की ज़रूरत है। अन्यथा पछताना भी पड़ सकता है।

नयी व्यवस्था की कोशिश में लगे योगी

उत्तर प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विकास की राह में नित नये आयाम गढऩे के प्रयास में लगे हैं। पिछले महीनों में उन्होंने ग्रामीण विकास को लेकर कई योजनाओं का शुभारम्भ किया। अब वे कई ऐसे कार्य कर रहे हैं, जिससे प्रदेश का विकास हो सके। हालाँकि उनकी योजनाओं के भ्रष्टाचार की भेंट चढऩे के आरोप भी लगते रहे हैं। अब प्रदेश पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की जा रही है। हाल ही में ग़ाज़ियाबाद, आगरा तथा प्रयागराज में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की गयी है। इस प्रणाली से पुलिस को अतिरिक्त अधिकार एवं बल मिलने की आशा है।

हाल ही में मंत्रिमंडल की बैठक में इन जनपदों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने के अतिरिक्त अन्य 16 प्रस्तावों को स्वीकृति सरकार ने दी। पुलिस आयुक्त प्रणाली का गठन भारतीय पुलिस अधिनियम-1861 व दंड प्रक्रिया-1973 के तहत किया जा रहा है। इसके तहत 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने का प्रावधान है। अब गृह विभाग से अधिसूचना जारी होते ही आयुक्त मानकों के अनुसार इन जनपदों में अधिकारियों की तैनाती होगी। मंत्रिमंडल बैठक में निर्णय तीनों जनपदों को 3-3 क्षेत्रों में बाँटने का निर्णय लिया गया है। इसके अनुसार, प्रयागराज में 41 थाने, 14 सर्किल और 3 क्षेत्र होंगे। आगरा में 44 थाने, 14 सर्किल और 3 क्षेत्र होंगे। ग़ाज़ियाबाद में 23 थाने, 9 सर्किल और 3 क्षेत्र होंगे। शीघ्र ही सभी जनपदों को मेट्रो पोलिटन सिटी घोषित किया जाएगा। तीनों जनपदों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होने के उपरांत प्रदेश में पुलिस आयुक्त की संख्या सात हो गयी है।

विदित हो इसके पूर्व में योगी सरकार ने 13 जनवरी, 2020 को लखनऊ एवं नोएडा में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की थी। फिर 26 मार्च, 2021 को कानपुर एवं वाराणसी यही प्रणाली लागू की। इसी प्रकार 4 नवंबर, 2022 को लखनऊ, कानपुर एवं वाराणसी जनपदों में भी पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की गयी। इससे पूर्व इन तीनों जनपदों के ग्रामीण क्षेत्रों को इस प्रणाली से अलग रखा गया था, मगर 4 नवंबर को उन्हें भी इसके तहत जनपदों की नगरीय प्रणाली में मिला लिया गया।

पुलिस को अतिरिक्त शक्तियाँ

पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होने से इन सभी जनपदों की पुलिस को अब अतिरिक्त शक्तियाँ मिल गयी हैं। अब इन जनपदों की पुलिस 15 न्यायालयी अधिकार मिलने से वह और बलशाली हो गयी है। अब पुलिस गुंडों और माफ़िया पर गैंगस्टर जैसी धारा के तहत स्वयं कार्रवाई कर सकेगी। अब पुलिस प्रदेश में अशान्ति होने पर सीधे दण्डात्मक एवं निरोधात्मक कार्रवाई का त्वरित निर्णय ले सकेगी। भाजपा कार्यकर्ता अमन ने कहा कि सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि अपराध पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। इससे आम लोगों की सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होगी तथा प्रदेश में अपराध कम होंगे तथा अपराधियों को अपने विवेक एवं स्वनिर्णय से दण्डित कर सकेगी। अब तक सभी प्रकार के आपराधिक मामले ज़िला मजिस्ट्रेट अर्थात् ज़िला न्यायालय में जाते रहे हैं। इससे ज़िला मजिस्ट्रेट के अधीन मुक़दमों की संख्या अधिक रहते हैं। इससे अपराधी लम्बे समय तक बचे रहते हैं तथा कई बार वे सुबूतों के आधार पर दण्ड प्रक्रिया से भी बच जाते हैं। न्यायालय की इस प्रक्रिया में पुलिस को भी बहुत भाग दौड़ करनी पड़ती है, जिससे सरकारी पैसे तथा समय दोनों की विकट हानि होती है। अब पुलिस को अतिरिक्त शक्तियाँ मिलने से कई लाभ मिलेंगे।

पुलिस के अधिकार

अब नयी आयुक्त प्रणाली के तहत पुलिस आयुक्त को अभी तक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास 15 अधिकार मिल गये हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि पुलिस आयुक्त के पास ज़िला मजिस्ट्रेट की तरह कई शक्तियाँ होंगी। अब तक पुलिस की रिपोर्ट पर अधिकतर मामलों में केवल मजिस्ट्रेट ही जमानत दे देते थे, मगर अब नयी प्रणाली के तहत मामले की संवेदनशीलता, गम्भीरता को जाँच-परखकर पुलिस आयुक्त कार्रवाई करने से लेकर किसी की जमानत अथवा जेल भेजने का निर्णय ले सकेंगे। इसके अतिरिक्त सीआरपीसी की धारा-107/116 के तहत गयी कार्रवाई केवल खानापूर्ति ही होती थी, जिससे नज़रबंद किये गये तथा पाबंदी लगाये गये लोग भी कई घटनाओं और अपराधों में संलिप्त रहते थे, मगर अब ऐसा नहीं हो सकेगा। अब किसी घटना में संलिप्तता सामने आने पर पूर्व में लगी पाबंदियों तथा नज़रबंदी के निर्णयों के अनुरूप कार्रवाई का निर्णय स्वयं ले सकेगी। इसी प्रकार गुंडा अधिनियम के तहत अब तक एक लम्बी प्रक्रिया होती रही है, जिस पर पुलिस को अभी तक ज़िला प्रशासन का अनुमोदन लेना होता था। मगर नयी आयुक्त प्रणाली के तहत पुलिस सीधे इस कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होगी। इसी प्रकार गैंगस्टर जैसे संगठित अपराध के ख़ात्मे के लिए गिरोहबंद अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए अब तक ज़िला अधिकारी की अनुमति पुलिस को लेनी पड़ती थी, मगर अब पुलिस आयुक्त गैंगस्टर पर सीधे कार्रवाई का पुलिस को आदेश दे सकेंगे। इसी प्रकार फायर विभाग से एनओसी का अधिकार भी ज़िला अधिकारी के पास ही होता था, मगर अब यह शक्ति पुलिस कमिश्नर के पास होगी।

इसके अतिरिक्त पशु क्रूरता के मामलों में भी पुलिस को सीधे कार्रवाई का अधिकार होगा। वहीं पुलिस के हाथों से आतिशबाज़ी व विस्फोटक सामग्री के लिए लाइसेंस देने का अधिकार वापस लिया जाएगा। अब शस्त्र लाइसेंस भी ज़िला अधिकारी द्वारा दिए जाएंगे। इसी प्रकार इन जनपदों में बार, हुक्का बार के लाइसेंस देने, सराय अधिनियम के तहत होटलों पर कार्रवाई के लिए पुलिस को अब ज़िला अधिकारी से अनुमति लेनी होगी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम-1970, विष अधिनियम-1919, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-1956, पुलिस (द्रोह उद्दीपन) अधिनियम-1922, पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम-1960, विस्फोटक अधिनियम-1844, कारागार अधिनियम-1894, शासकीय गुप्त बात अधिनियम-1923, विदेशियों विषयक अधिनियम-1946, ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम-1967, पुलिस अधिनियम-1861, उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम-1944, उत्तर प्रदेश अग्नि निवारण एवं अग्नि सुरक्षा अधिनियम-2005, उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम-1986 के तहत पुलिस विभाग को सीधे कार्रवाई के अधिकार होंगे।

शासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, उक्त ज़िलों में पुलिस आयुक्त का पद आईजी या उससे ऊपर की रैंक का होगा। इसके अलावा तीनों में ज़िलों में एक-एक अपर पुलिस आयुक्त या संयुक्त पुलिस आयुक्त का पद होगा। पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त व संयुक्त पुलिस आयुक्त को ज़िला मजिस्ट्रेट का दर्जा मिलेगा। इसके अलावा इन तीनों पुलिस कमिश्नरेट में हर क्षेत्र में एक पुलिस उपायुक्त के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त यातायात, मुख्यालय, महिला सुरक्षा और इंटेलिजेंस का पद होगा। कुल मिलाकर संयुक्त पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त, अपर पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस आयुक्त को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के विधिक अधिकार धारा-21 के तहत दिये जाएँगे। इसके अतिरिक्त शान्ति तथा क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार धारा-58 के तहत पुलिस विभाग को दिये जाएँगे।

वाहन निक्षेप प्रमाण पत्र

उत्तर प्रदेश सरकार ने बेकार हो चुके वाहनों के निस्तारण के लिए रद्दी माल (स्क्रैप) पर निक्षेप प्रमाण पत्र जारी करने का निर्णय भी लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल ने यह निर्णय पुराने वाहनों के संचालन से वातावरण में फैल रहे धुएँ के कारण लिया है। परिवहन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर सिंह ने इस बारे में पत्रकारों को बताया कि भारत सरकार ने 5 अक्टूबर, 2021 को ही इस बाबत अधिसूचना जारी की थी। अब यदि कोई व्यक्ति अथवा संस्था पंजीकृत वाहन निस्तारण स्क्रैपिंग सुविधा केंद्र द्वारा अपने पुराने वाहन को स्क्रैप कराकर निक्षेप प्रमाण पत्र लेकर उसके आधार पर नया वाहन $खरीदता है तो उसे निक्षेप प्रमाण पत्र की तिथि से एक वर्ष की अवधि तक नये वाहन के पंजीकरण के कर में छूट दी जाएगी। इसके तहत ग़ैर-व्यावसायिक वाहन पर 15 प्रतिशत तथा व्यावसायिक वाहन पर 10 प्रतिशत की छूट दी जाएगी। इसके लिए कोई व्यक्ति अथवा फर्म अथवा संस्था अथवा ट्रस्ट अपने पुराने वाहन को स्क्रैप घोषित करने के लिए परिवहन विभाग की वेबसाइट 222.श्चश्चद्ग.ठ्ठह्य2ह्य.द्दश1.द्बठ्ठ/ह्यष्ह्म्ड्डश्चश्चड्डद्दद्गश्चशद्यद्बष्4 पर आवेदन कर सकता है।

इसके अतिरिक्त परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए बस अड्डों की ख़ाली पड़ी या कुछ भूमि पर सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी मॉडल) के तहत कॉम्प्लेक्स, दुकानें आदि विकसित किये जाएँगे। परिवहन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर सिंह ने बताया कि इस योजना के तहत पहले चरण के 23 बस अड्डों पर यह बदलाव किया जाएगा। साथ ही इन बस अड्डों को विशेष ढंग से विकसित किया जाएगा, जिसके लिए निजी कम्पनियों को अवसर प्रदान किया जाएगा।

चिकित्सालयों में परिवर्तन

उत्तर प्रदेश सरकार ज़िला चिकित्सालयों की सम्पत्तियाँ तथा कर्मचारियों को अब चिकित्सा शिक्षा विभाग को हस्तांतरित करने का भी मन बना चुकी है। इस योजना के तहत पहले चरण में प्रदेश के 14 ज़िला चिकित्सालयों और रेफरल अस्पतालों की सम्पत्तियों एवं चिकित्सकों तथा अन्य कर्मचारियों को चिकित्सा शिक्षा विभाग को हस्तांतरित किया जाएगा। इससे पहले इन सभी 14 ज़िला चिकित्सालयों और रेफरल अस्पतालों को उच्चीकृत कर राज्य चिकित्सा महाविद्यालय बनाया गया था।

इस योजना के तहत कौशाम्बी, बुलंदशहर, पीलीभीत, बिजनौर, अमेठी, औरैया, कानपुर देहात, सोनभद्र, कुशीनगर, गोंडा, चंदौली, लखीमपुर खीरी, ललितपुर तथा सुल्तानपुर जनपदों में स्थित ज़िला चिकित्सालय या रेफरल अस्पताल उच्चीकृत किये गये हैं तथा इन्हें स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय के रूप में संचालित किए जाने का निर्णय लिया गया है।

गहलोत, पायलट में और बढ़ी तल्ख़ी

राजस्थान में पिछले एक साल से चल रहा सियासी ड्रामा 24 नवम्बर को तब चरम पर पहुँच गया, जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को पूरी बेबाक़ी से ग़द्दार बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रदेश का अध्यक्ष रहते हुए, जिसने बग़ावत का बिगुल फूँका, उसे कैसे मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है? टकराव को आग देने वाला यह हमला गहलोत ने उस वक़्त बोला, जब सचिन राहुल की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल थे।

प्रियंका गाँधी भी उसी दौरान यात्रा में शिरकत कर रही थीं। अब तक की ख़बरों के मुताबिक, एक साक्षात्कार में गहलोत ने सचिन पायलट के प्रति काफ़ी आक्रामक नज़र आये। गहलोत ने आक्रामक तेवर ख़बरिया चैनल के उस सवाल पर उठाये, जब सितंबर की घटना कुरेदते हुए रिपोर्टर ने कहा कि विधायकों ने भी तो आपके कहने पर बग़ावत की? सचिन की वजह से कड़वे अनुभवों से गुज़र चुके गहलोत ने करारा जवाब देते हुए कहा कि यह कहना बिलकुल बकवास है। मुझे क्या ज़रूरत थी, ऐसा करने की? उन्होंने चुनौतीपूर्ण लहज़े में कहा कि ऐसा एक भी विधायक कह दे, तो मैं राजनीति छोड़ दूँ? उन्होंने तल्ख़ लहज़े में कहा कि पूरा हिन्दुस्तान मेरी प्रकृति और सियासी अंदाज़ से वाक़िफ़ है। इस सवाल पर कि पायलट को मुख्यमंत्री बनाने में क्या दिक़्क़त थी? गहलोत का तीखा प्रतिप्रश्न था कि क्या इतिहास में ऐसा कभी हुआ कि पार्टी का अध्यक्ष ख़ुद अपनी सरकार गिराने के लिए विपक्ष की झोली में जा गिरे? विधायकों के बिफरने की यही बड़ी वजह थी। गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट चाह कर भी इस सच्चाई से मुँह नहीं चुरा सकते कि पूरा खेल ही उनका था। मेरे पास इस बात के साक्ष्य हैं कि पायलट समर्थकों को 10-10 करोड़ रुपये बाँटे गये। सभी ने दिल्ली स्थित भाजपा के कार्यालय से रक़म उठायी। इसके बाद कहने को क्या रह जाता है? गहलोत ने कहा कि मेरे राजनीतिक जीवन की यह पहली घटना है, जब किसी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बर्ख़ास्त किया। मैंने उन्हें नायब मुख्यमंत्री पद से भी बर्ख़ास्त किया। पायलट अगर माफ़ी माँग लेते, तो यह नौबत नहीं आती। पायलट को हाईकमान और प्रदेशवासियों से माँगनी चाहिए थी। विधायक दल से भी ख़ुद को बख़्शवाने की अपील करनी चाहिए थी। लेकिन कहा किया ऐसा? गहलोत ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि अगर पायलट माफ़ी माँग लेते, तो मुझे आलाकमान से माफ़ी माँगने की नौबत नहीं आती।

उधर सचिन यह कहते हुए अपनी ढिठाई पर अड़े रहे कि गहलोत जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता को इस तरह की बयानबाज़ी शोभा नहीं देती। मुझे नहीं पता उन्हें इस तरह की सलाह कौन दे रहा है? उन्होंने पहले भी मुझे नाकारा, निकम्मा और ग़द्दार कहा है। सचिन ने माफ़ीनामे से उलट गहलोत को नसीहत देने की हिमाक़त करते हुए कहा कि इतना असुरक्षित महसूस करने की ज़रूरत नहीं है। राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि दबी हुई चिंगारी को हवा सचिन ने दी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मानगढ़ यात्रा के दौरान कहा कि गहलोत सबसे सीनियर मुख्यमंत्री है। मुख्यमंत्रित्व के दौरान हम साथ-साथ काम करते रहे हैं। मोदी ने अपने भाषण में सबसे पहले मुख्यमंत्री गहलोत का ही नाम लिया। लेकिन गहलोत की प्रशंसा सचिन को इस क़दर अखरी कि अपच से बोखलाकर कह बैठे कि मोदी जब भी किसी की प्रसंशा करते हैं, वह पार्टी छोडक़र बग़ावत पर उतर आता है। अब गहलोत भी ग़ुलाम नबी आज़ाद की राह पर चल पड़े हैं। कहने की ज़रूरत नहीं सचिन की इतनी ओछी बयानबाज़ी ने गहलोत को कितना मर्माहत किया। ख़बरिया चैनल के रिपोर्टर के इस प्रश्न पर कि सम्भवत: हाईकमान भी पायलट के हक़ में विधायकों का समर्थन चाहता था।

गहलोत ने दो-टूक कहा कि जिस आदमी के पास 10 विधायक नहीं, जिसने बग़ावत की पार्टी से ग़द्दारी की उसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है? वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा की मानें, तो गहलोत ने जिस तरह पहली बार सचिन को खुलेआम निशाने पर लिया है, उससे सचिन की बची-खुची साख भी मटियामेट हुई है। इसके साथ ही जिस तरह प्रतिपक्षी नेता राजेन्द्र राठौड़ सचिन के बचाव में उठ खड़े हुए, इस बात की तस्दीक़ करने को काफ़ी है कि सचिन और भाजपा के बीच कुछ तो खिचड़ी पकी है। गहलोत ने जिस तरह आत्मविश्वास के साथ सचिन पर तंज किया है, इसका सीधा मतलब है कि खडग़े, सोनिया और राहुल की नज़रों से सचिन का पत्ता साफ़ हो चुका है। विश्लेशकों का कहना है कि गहलोत जब भी कोई बड़ी बात करते हैं, तो उसके पीछे ठोस साक्ष्य होते हैं। अवश्य ऐसी कोई बड़ी बात है, जो सिर्फ़ गहलोत जानते हैं और अब उसके सार्वजनिक करने में देर नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा सवाल करते हैं कि अगर सचिन सही हैं, तो सन् 2020 में मानेसर क्यों गये थे? क्यों अमित शाह से मिलने उनके घर गये? क्यों बार-बार गहलोत से तकरार होने पर भाजपा नेता उसके रक्षक बनकर बयान देने लगते हैं? कहीं-न-कहीं, तो दाल में काला है। मौज़ूदा वक़्त में सचिन की मिट्टी पलीद करने में सबसे बड़ा हाथ गुर्जर संघर्ष समिति का है। गुर्जर संघर्ष समिति का सचिन को मुख्यमंत्री बनाने का दुराग्रह और राहुल की यात्रा को राजस्थान में प्रवेश नहीं करने की धमकी देना सीधे-सीधे आलाकमान को चेतावनी और मुख्यमंत्री को धमकी देना हुआ। ऐसे में गहलोत कहते हैं कि तो ग़लत नहीं कहते कि सोनिया, राहुल, प्रियंका तथा खडग़े ने सचिन को नकार दिया है। विश्लेषकों की मानें, तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का सचिन पर सीधा-सीधा हमला कर बवंडर खड़ा कर दिया है। इससे साफ़ लगता है कि पायलट के बाद गहलोत भी अब आलाकमान से सीधा निर्णय चाहते हैं। अब तक गहलोत नज़दीकी नेता ही पायलट पर हमलावर करे रहे हैं। इस बार गहलोत का सचिन पर सीधा हमला आला कमान को सन्देश देने की कोशिश है। उधर गहलोत के बयान पर हैरानी जताते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने ऐसे शब्द इस्तेमाल किये, जो ख़ुद मुझे अप्रत्याशित लगे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को गहलोत और सचिन पायलट दोनों की ज़रूरत है। मुझे भरोसा है कि हमारा नेतृत्व मुनासिब हल निकालेगा, जो संगठन को प्राथमिकता देते हुए गहलोत और पायलट दोनों का सही इस्तेमाल करेगा। इस बीच सूत्रों का कहना है कि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा को लेकर कांग्रेस के महासचिव सी. वेणुगोपाल ने 29 नवंबर को जयपुर में समन्वय समिति की बैठक में भाग लिया। बैठक में गहलोत और पायलट के बीच चल रही तकरार का हल निकालने की कोशिश की गयी। हालाँकि पहले भी गहलोत और पायलट को बयानबाज़ी से बचने के कहा गया था। लेकिन हालात तब और तल्ख़ हुए, जब बुधवार 2 नवंबर को सचिन पायलट ने ऐसे बयान दिये, जिससे साफ़ लगा था कि बासी कढ़ी में उबाल आने लगा है। पायलट ने जब कहा कि राजस्थान में चुनाव होने में 13 महीने बाक़ी हैं, अभी तक निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा? तो लगता था कि उनका सब्र टूट रहा है। उन्होंने हाईकमान को भी यह कहते हुए निशाने पर लिया कि अनुशासनहीनता करने वालों पर अभी तक कार्र्यवाही क्यों नहीं हुई?

पायलट के बयान पर पलटवार करते हुए गहलोत $खेमे के माने जाने वाले जलदायमंत्री महेश जोशी ने दो-टूक शब्दों में कहा कि पहले पायलट अपने गिरहबान में तो झाँक लें, और अपना इतिहास पढ़ लें, इसके बाद उन्हें सवाल उठाने चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार अनंत मिश्रा गहलोत और पायलट के बीच छत्तीस के आँकड़े की गिरह खोलते हुए कहते हैं कि सचिन पायलट ने गहलोत को अपना नेता नहीं माना, बल्कि अपना सहयोगी माना। यह शब्द गहलोत को इतना नागवार गुज़रा कि चुभी हुई फाँस निकलने का नाम ही नहीं ले रही। कोढ़ में खाज तब हुई, जब पायलट ने बग़ावत कर अपनी ग़द्दारी का ठीकरा ख़ुद अपने ही सिर पर फोड़ लिया। सवाल यह है कि 3 दिसंबर को भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान में प्रवेश करेगी। देखना होगा कि इस दौरान गहलोत और पायलट के बीच इस दौरान कैसे सम्बन्ध रहते हैं? क्या इस यात्रा को दोनों नेता मिलकर आगे बढ़ाएँगे?

महिला हिंसा का साम्प्रदायीकरण ख़तरनाक

क्रूर तरीक़े से की गयी श्रद्धा वालकर की हत्या के सन्दर्भ में हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि एक महिला के लिए घर कितना सुरक्षित है? क्या मायके से परे उसका कोई जीवन है? सामाजिक सोच से ज़्यादा आरोपी का धर्म और लिव-इन शब्द सुर्ख़ियों में क्यों है? यह बहुत पहले की बात नहीं है, जब अदालतों ने लिव-इन रिलेशनशिप को क़ानूनी ठहराया। हालाँकि इस मामले में कहानी को लिव-इन रिलेशनशिप पर दोष डालने के इर्द-गिर्द बुना गया है।

यह केवल मोरल (नौतिक) पुलिसिंग और अपराध के लिए महिला पीडि़तों को ज़िम्मेदार ठहराने जैसा है। अर्थात युवती के प्रति थोड़ी हमदर्दी दिखाना, मगर समाज के विवेक को न जगाना; बल्कि एकतरफ़ा दोष तय करना। श्रद्धा वालकर और आफ़ताब अमीन पूनावाला को एक-दूसरे से प्यार हुआ। इसके बाद श्रद्धा दिल्ली आ गयी; लेकिन पाया कि वह अपने चुने इस घर में भी सुरक्षित नहीं है। उसके प्यारे साथी ने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी, उसके शरीर के 35 टुकड़े कर दिये, उन्हें फ्रिज में रख दिया और शहर की रातों की $खामोशी का इस्तेमाल लुटियन दिल्ली में उसके शरीर के हिस्सों को फेंकने के लिए किया।

एक ही तरीक़ा

कुछ और उदाहरण देखें, तो मामलों में एक ही तरीक़ा दिखता है। दिल्ली में इस भयानक अपराध का पता चला, तो उधर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक युवती को उसके पूर्व प्रेमी ने मार डाला और उसके शरीर को छ: भागों में काट दिया। सीतापुर ज़िले में भी एक अन्य महिला की उसके पति ने हत्या कर दी और उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके खेत में फेंक दिया।

भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का साम्प्रदायीकरण एक बेहद ख़तरनाक हथियार है, जो न्यायिक प्रक्रिया और न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया को उलट देगा। जब केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर ने सुझाव दिया कि पढ़ी-लिखी महिलाओं को लिवइन रिलेशनशिप में रहने से पहले अपना पंजीकरण कराना चाहिए, तो यह हमारी पुरुष प्रधान मान्यताओं जैसा ही था। अगर वे पंजीकृति हो गयी होतीं, तो क्या वह अपनी जान बचा पातीं? राष्ट्रीय महिला आयोग के आँकड़ों के अनुसार घरेलू हिंसा की शिकायतें तालाबंदी लागू होने से पहले मार्च के पहले हफ़्ते में 30 थी, तालाबंदी होने के पहले सप्ताह (23 मार्च से 1 अप्रैल) में बढक़र 69 हो गयी।

बढ़ती शिकायतों के कारण राष्ट्रीय महिला आयोग ने शिकायत दर्ज करने के लिए एक व्हाट्स ऐप नंबर शुरू किया। हिंसा की जड़ पितृसत्तात्मक पारिवारिक संरचना है। यह समझा जाना चाहिए कि घरेलू हिंसा महिलाओं के ख़िलाफ़ एक अघोषित युद्ध है, जिसने पिछले वर्षों में किसी भी पारम्परिक युद्ध की तुलना में अधिक जानें ली हैं। पाँच साल पहले, हैजटैग मी टू (प्तरूद्गञ्जशश) आन्दोलन का जो विस्फोट हुआ, उसने महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकने और उसका जवाब देने के लिए वैश्विक लामबंदी बनायी; लेकिन उसके बाद स्थितियाँ फिर वहीं आ गयीं।

भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का साम्प्रदायीकरण एक बेहद ख़तरनाक हथियार है, जो न्यायिक प्रक्रिया और न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया को और बिगाड़ देगा। बिलकिस बानो मामले में सामूहिक बलात्कारियों और हत्यारों की रिहाई का विरोध करने वाली याचिका में गुजरात सरकार के हलफ़नामे में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि उनकी रिहाई से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसकी मंज़ूरी दी थी।

वास्तव में नारी-विरोधी समूहों में वृद्धि हुई है और महिला मानवाधिकार रक्षकों और कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ हमले बढ़े हैं। इसका उत्तर स्त्री-द्वेष से ग्रस्त मौज़ूदा सामाजिक ढाँचे में निहित है, जब महिलाओं को अक्सर अपने माता-पिता के बिना अपनी पसन्द चुनने और परिवार की संरचना द्वारा निर्धारित सीमाओं को पार करने के लिए सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाता है। नि:संदेह, दुराचारी मुक्त हो जाता है, और पीडि़त पीडि़त होता रहता है।

श्रद्धा के बारे में हालिया रहस्योद्घाटन कि वह 2020 में चोटों के साथ मुम्बई के अस्पताल में भर्ती हुई थी, दिल्ली आने से बहुत पहले यह इंगित करता है कि वह लम्बे समय से इस अपमानजनक रिश्ते में रही है। पता चलता है कि उसने पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज की; लेकिन बाद में जब पुलिस जोड़े के पास जाँच करने आयी, तो इसे वापस ले लिया गया।

हर 11 मिनट में एक हत्या

25 नवंबर को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस से पहले, संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने विश्व नेताओं से 2026 तक महिला अधिकार संगठनों और आन्दोलनों के लिए धन में 50 फ़ीसदी की वृद्धि करने का आग्रह किया। अपने सन्देश में उन्होंने कहा कि हर 11 मिनट में एक लडक़ी या एक महिला को उसके किसी अंतरंग साथी के द्वारा या परिवार के सदस्य / सदस्यों द्वारा मार दिया जाता है। महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को समाप्त करने की दिशा में सामूहिक कार्रवाई का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा- ‘अब परिवर्तनकारी कार्रवाई का समय है, ताकि महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा को ख़त्म किया जा सके। चलिए, गर्व से घोषणा करते हैं कि हम सभी नारीवादी हैं।’

इस साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महिला और संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग द्वारा प्रकाशित ‘प्रोग्रेस आन दि सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स : द जेंडर स्नैपशॉट 2022’ शीर्षक वाली एक रिपोर्ट ने महिलाओं के ख़िलाफ़ लिंग आधारित हिंसा की पहचान उन कारकों में से एक के रूप में की थी, जो 286 साल तक वैश्विक लैंगिक समानता प्राप्त करने में देरी के ज़िम्मेदार हैं। रिपोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि दुनिया भर में 15-49 वर्ष की प्रत्येक 10 महिलाओं और लड़कियों में से एक को 2021 में एक अंतरंग साथी द्वारा यौन / या शारीरिक हिंसा का शिकार बनाया।

भारत में पतियों और उसके परिजनों द्वारा क्रूरता के कथित मामलों की दर में 2001 और 2018 के बीच 53 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी। इसमें मध्य सामाजिक-जनसांख्यिकीय सूचकांक राज्यों में इस अपराध का सबसे अधिक हिस्सा है। सन् 2001 से सन् 2018 तक 18 साल में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के तहत कुल 15,48,548 मामले दर्ज किये गये, जिनमें महज़ चार साल में सन् 2014 से सन् 2018 के बीच 5,54,481 (35.8 फ़ीसदी) मामले दर्ज हुए थे।

भारत में इस अपराध की रिपोर्ट दर प्रति 1,00,000 महिलाओं (15-49 आयु) पर 2001 में 18.5 और 2018 में 28.3 फ़ीसदी थी। इस अवधि में 53 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो 2021 की रिपोर्ट बताती है कि औसतन हर दिन 86 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, जिसकी रिपोर्ट दर्ज होती है। हर घंटे आईपीसी के तहत पंजीकृत महिलाओं के ख़िलाफ़ 49 अपराध होते हैं, हर दिन औसतन 18 महिलाएँ दहेज़ सम्बन्धी घरेलू हिंसा में अपनी जान गँवाती हैं और एक साल में 6,589 दहेज़ मौतें दर्ज होती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 दर्शाता है कि सर्वेक्षण में शामिल सभी महिलाओं में से एक-तिहाई ने कहा कि उन्होंने घरेलू या यौन हिंसा का सामना किया है।

इन आँकड़ों से किसी भी देश का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। लेकिन भारत में सरकार की ओर से एक भी शब्द इस बारे में नहीं आया है। इसका एक कारण हिंसा के अपराधियों को जातिवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा प्रदान की गयी प्रतिरक्षा है, जिसके कारण महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के 75 प्रतिशत अपराधियों को सज़ा नहीं मिलती है। सज़ा की यह कम दर सीधे तौर पर पुलिस द्वारा पक्षपातपूर्ण जाँच, अदालती व्यवस्था में लम्बी देरी और हिंसा से बचे लोगों पर समझौता करने के लिए सामाजिक दबाव का परिणाम है।

संविधान में प्रदत्त महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष को तेज़ करने की ज़रूरत है और महिलाओं पर होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों को नये जोश के साथ लागू करने की ज़रूरत है।

परीक्षा भर्ती घोटाला, पंजाब सरकार की साख पर बट्टा

नायब तहसीलदार परीक्षा में धाँधली के बाद पहले से बदनाम पब्लिक सर्विस कमीशन पर फिर उठीं उँगलियाँ

पंजाब में नायब तहसीलदार परीक्षा (भर्ती) धोखाधड़ी से राज्य की आम आदमी पार्टी की सरकार और पब्लिक सर्विस कमीशन (पीपीएससी) की साख को बट्टा लगा है। नक़ल गिरोह से 11 ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्यूनिकेशन (जीएसएम) सात मिनी ब्लूटूथ ईयरप्लग, 12 मोबाइल, एक लैपटॉप और दो पेन ड्राइव मिली हैं, जिनसे की बरामदगी से जाँच दल को नक़ल गिरोह के सुराग़ ढूँढने हैं। इन्हीं के माध्यम से गिरोह ने न जाने कितने अभ्यर्थियों की मदद की, जिनमें से काफ़ी मैरिट सूची में हो सकते हैं। अभी तीन ऐसे सफल अभ्यर्थियों को पकड़ा जा चुका है। उन्होंने माना है कि इसके लिए उन्होंने मोटी रक़म अदा की है।

पटियाला क्षेत्र के जिन परीक्षा केंद्रों में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर सामूहिक नक़ल हुई, वहाँ जैमर आदि की व्यवस्था नहीं थी। यह ज़िम्मेदारी पीपीएससी की है और इस पर निगरानी रखना सरकार के उच्चाधिकारियों की ड्यूटी है। इसे चूक नहीं, बल्कि घोर लापरवाही माना जाएगा। जब नक़ल रहित सफलतापूर्वक परीक्षा कराने पर मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर इसका श्रेय लेते हैं, तो अब अपयश के लिए कोई ज़िम्मेदारी लेने को क्यों तैयार नहीं है?

कड़ी मेहनत और ईमानदारी से परीक्षा देकर सफल होने वालों को मामले का ख़ुलासा होने के बाद धक्का लगा है। उन्हें डर है कि कहीं सरकार परीक्षा को रद्द ही न कर दे। उनकी माँग है कि पूरी जाँच के बाद नक़ल से मैरिट में आये अभ्यथियों को निकालकर फिर से वरीयता सूची तैयार की जाए। व्यवस्था में किसी ख़ामी के लिए वे दोषी नहीं है। परीक्षा के लिए उन्होंने दिन रात कड़ी मेहनत कर सफलता हासिल की है। अभी इस बाबत सरकारी तौर पर कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है। असफल अभ्यर्थियों की माँग परीक्षा फिर से कराने और सफल की माँग रद्द करने की रहेगी।

किसी को एक मौक़ा चाहिए और किसी को हाथ आयी नौकरी जाने का डर सता रहा है। पुलिस ने इस मामले में राज्य सरकार और पीपीएससी को शुरुआती जाँच के बाद क्लीन चिट देने की कोशिश की, जो तर्कसंगत नहीं। कैसे शुरुआती जाँच में ही पुलिस ऐसा कर सकती है। जिस तरह से बड़े स्तर पर इस परीक्षा में अत्याधुनिक तकनीक और लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे हुए हैं वह व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला है। सरकार और आयोग कठघरे में है और उनकी जवाबदेही भी है, जिससे दोनों ही बच रहे हैं। पीपीएससी की ओर से इस मामले में किसी की संलिप्तता से इनकार किया गया है।

विपक्ष ने नक़ल के इस मामले की न्यायिक या केंद्रीय एजेंसी से कराने की माँग की है। उनकी राय में बड़े स्तर पर हुई गड़बड़ी में किसी का संरक्षण ज़रूर है और इसका ख़ुलासा पुलिस की जाँच में सम्भव नहीं है। विपक्ष ने यही नहीं आयोग की पूर्व परीक्षाओं की भी विस्तृत जाँच की माँग की है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। अभी तक तीन चयनित अभ्यर्थियों के अलावा नक़ल गिरोह के पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया है। नक़ल गिरोह की मदद से रैंक हासिल करने वालों की और किसी कारणवश असफल रहने वालों की भी गिरफ़्तारी होगी।

नक़ल गिरोह के बाक़ायदा कंट्रोल सेंटर हैं और वहाँ तैनात विषय विशेषज्ञ प्रश्नों के उत्तर तैयार करते हैं। एक ऐसे ही सेंटर के जींद (हरियाणा) में पाया गया। गिरोह के पाँच सदस्यों में नवराज चौधरी, गुरप्रीत सिंह और जतिंदर सिंह पंजाब के हैं, जबकि सोनू कुमार और वरिंदरजीत सिंह हरियाणा हैं। इस काम को अंजाम दोनों राज्यों के कुछ लोगों ने सयुक्त तौर पर दिया है। गिरफ़्तार नक़ल गिरोह के सदस्यों के मोबाइल डेटा से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। सम्पर्क साधने, लेन-देने की बात करने, पैसे अग्रिम तौर पर लेने और अन्य बहुत-से काम में कुछ दलालों की भूमिका भी हो सकती है।

नक़ल गिरोह के लोग बाक़ायदा तौर पर ऐसे अभ्यर्थियों के आनलाइन फार्म भराकर उन्हें मदद के लिए भेजते हैं। ये लोग आधुनिक डिवाइस (वायरलैस कैमरे) से पेपर की फोटो कंट्रोल सेंटर भेजने का काम करते हैं। आगे का ज़िम्मा केंद्र और वहा तैनात लोगों का होता है। वहाँ हर विषय के विशेषज्ञ उनके हाथों हाथ जवाब तैयार करते और फिर अपने लोगों को मिनी जीएसएस या ब्लूटूथ के ज़रिये भिजवा दिये जाते हैं। बहु विकल्प पेपर के जवाब काफ़ी हद तक सही होते थे। यही वजह है कि नक़ल गिरोह के लोग शर्तिया नौकरी का वादा कर मोटी राशि वसूल करता था।

शर्तिया चयन के इस खेल में करोड़ों के वारे-न्यारे हुए हैं। बिना मिलीभगत के इतने बड़े काम को अंजाम देना नामुमकिन है। तृतीय श्रेणी के कर्मचारी की परीक्षा में पूरी जाँच के बाद ही अभ्यर्थी को परीक्षा केंद्र में जाने दिया जाता है, जबकि नायब तहसीलदार की परीक्षा में अभ्यर्थी बिना ऐसी ठोस जाँच के परीक्षा केंद्र में गये और नक़ल गिरोह की मदद से सफल भी हुए। यह संख्या कितनी है अभी इसका ख़ुलासा नहीं हुआ है; लेकिन एक के बाद एक कडिय़ां जुड़ते जाने के बाद एक दर्ज़न के आसपास हो सकती है। परीक्षा में पेपर लीक, नक़ल और अन्य अनैतिक तरी$के न केवल बोर्ड या आयोग, बल्कि सरकार की सीधी ज़िम्मेदारी होती है। सितंबर में घोषित नतीजों में चुने गये अभ्यर्थियों में ऐसे नाम प्रमुख रहे जिनको मैरिट में काफ़ी ऊपर स्थान मिला है। सूची में दूसरी रैंक पर बलराज चौधरी, 12वीं रैंक पर लवप्रीत सिंह और 21वीं रैंक पर आया वरिंदरपाल चौधरी पुलिस की गिरफ़्त में है। बलराज पीपीएसी की दो परीक्षाओं में असफल रहा है; लेकिन इस बार मैरिट में उसे दूसरा स्थान मिला है। मैरिट में आये लोगों को दस्तावेज़ आदि पीपीएससी में जमा कराने थे। इस प्रक्रिया की तिथि भी घोषित हो चुकी थी।

अच्छी बात यह रही कि नियुक्ति से पहले पुलिस के पास शिकायत पहुँच गयी और जाँच के बाद इसे सही पाया गया। पटियाला पुलिस ने विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई को अंजाम दिया। भर्ती पंजाब में हो रही थी; लेकिन इसे अंजाम देने में हरियाणा के कुछ लोगों की संलिप्तता है। राज्य की कई परीक्षाओं में यहाँ के गिरोह ऐसे काम को अंजाम दे चुके हैं। नौकरी भर्ती के समय ऐसे गिरोह सक्रिय हो जाते हैं। दूसरे की जगह पेपर देने, पेपर लीक करने और अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल करने में कुख़्यात है। आप सरकार के दौरान हुए इस भर्ती घोटाले से उसकी प्रतिष्ठा गिरी है। अगर न्यायिक आयोग या किसी केंद्रीय एजेंसी से जाँच की माँग ज़ोर पकड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए; क्योंकि संरक्षण के आरोप तो लग ही रहे हैं।

भर्ती का पैमाना

वर्ष 2022 में नायब तहसीलदार के 78 पदों के लिए आवेदन माँगे गये थे। 300 नंबर के पेपर में 120 प्रश्न दिये गये। हर प्रश्न 2.5 अंक का था। सभी प्रश्न बहुविकल्प के थे। इनमें सामान्य ज्ञान के 80 प्रश्न (200 अंक) और मेंटल एबिलिटी-रीजनिंग के 40 प्रश्न (100 अंक) थे। बेरोज़गारी के इस दौर में सम्मानजनक पद के लिए काफ़ी उत्सुकता रही। अधिसूचना जारी होने, फार्म जमा कराने, परीक्षा होने और मैरिट सूची जारी होने में क़रीब आठ माह से ज़्यादा लग गया। मामला उजागर होने के बाद कड़ी मेहनत के बूते मैरिट में आये लोग ऊहापोह की स्थिति में आ गये हैं। जब तक जाँच पूरी नहीं होती तब तक कुछ भी कहना मुश्किल है।

बदनाम रहा है पीपीएससी

पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन (पीपीएससी) एक दौर में काफ़ी बदनाम रहा है। वर्ष 2002 में पैसों के बदले नौकरी देने के बड़े मामले में तत्कालीन अध्यक्ष रवि सिद्धू और सचिव की गिरफ़्तारी हुई थी। रवि सिद्धू से काफ़ी बड़ी राशि की बरामदगी भी हुई थी। सतर्कता (विजिलेंस) ब्यूरो ने इस मामले को उजागर किया था। कभी पत्रकार रहे सिद्धू की नियुक्ति राजनीतिक थी, जिसका बेजा इस्तेमाल उस दौरान हुआ था। पटियाला के न्यायालय ने रवि सिद्धू को सात साल की क़ैद और एक करोड़ रुपये के ज़ुर्माने की सज़ा सुनायी थी। उनके अलावा सचिव प्रीतपाल सिंह और बिचौलिये परमजीत सिंह पम्मी को चार-चार साल की क़ैद के अलावा पाँच-पाँच हज़ार रुपये ज़ुर्माने की सज़ा सुनायी थी।

सतर्कता ब्यूरो ने पूरी जाँच के बाद पाया कि रवि सिद्धू के पीपीएसी अध्यक्ष रहते 32 नियुक्तियाँ ग़लत तरीक़े से हुईं। इनमें कुछ पद सिविल सर्विस (न्यायिक) भी थे। इससे उस दौरान पीपीएसी की साख जैसे मिट्टी में मिल गयी थी। उसके बाद से हर सरकार कम-से-कम राजनीतिक नियुक्तियों से परहेज़ करने लगी। तब कहीं जाकर इस संस्था के प्रति लोगों में कुछ भरोसा पैदा हुआ। नायब तहसीलदार भर्ती घोटाले की वजह से फिर भरोसा घटा है।

जाँच माँग की पर दारोमदार

कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल ने नायब तहसील परीक्षा भर्ती घोटाले की जाँच के लिए सीबीआई या न्यायिक आयोग से कराने की माँग की है। मामले की विस्तृत और सही जाँच होती है, तो बड़ा पर्दाफाश हो सकता है। बिना संरक्षण के इतना बड़ा काम नहीं हो सकता है। पुलिस जाँच में ऐसे नामों का ख़ुलासा होना सम्भव नहीं है।

हिंसा सहती महिलाओं को मिले सुरक्षा

क़रीब दो साल पहले इटली के मशहूर शहर मिलान के एक बड़े अस्पताल में एक महिला ट्रामा सर्जन डॉ. मारिया ग्रेजिया ने महिलाओं की अस्त-व्यस्त हड्डियाँ दिखाने वाले ब्लैक ऐंड व्हाइट एक्स-रे की प्रदर्शनी लगाकर जनता को महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के प्रति जागरूक करने की कोशिश की। डॉ. मारिया कहती हैं कि मानव की हड्डियाँ एक जैसी होती हैं; लेकिन इन एक्स-रे में हड्डियों की हालत साफ़ कहती है कि ये महिलाओं की हैं। उनके साथ होने वाली हिंसा इसकी प्रमुख वजह है।

भारत में श्रद्धा हत्याकांड मामले ने महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा वाले मुददे को एक बार फिर मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया है। तुर्की में भी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले को लेकर वहाँ एक तबक़ा फ़िक्रमंद नज़र आता है। कोरोना महामारी के दौरान भी कई देशों में महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा के मामलों में वृद्धि दर्ज की गयी है। दरअसल महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा एक वैश्विक मुद्दा है। महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा चाहे शारीरिक हो या मानसिक, आर्थिक हो या सामाजिक या चाहे भावात्मक हो, उसके तात्कालिक व दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होते हैं। इसकी क़ीमत न केवल पीडि़त महिलाएँ ही चुकाती हैं, बल्कि उनके बहुत क़रीबी परिजन व बच्चे भी चुकाते हैं।

महिलाएँ हिंसा मुक्त ज़िन्दगी जीएँ, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। विश्व भर में महिलाओं के प्रति हिंसा, शोषण एवं उत्पीडऩ की बढ़ती घटनाओं के उन्मूलन हेतु संयुक्त राष्ट्र के द्वारा प्रति वर्ष 25 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस के तौर पर मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के प्रति विभिन्न देशों की सरकारों को आगाह करता है कि आधी आबादी यानी महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उनकी प्राथमिकताओं में ऊपर होना चाहिए। सरकारों को इस दिशा में निवेश को बढ़ाकर उनको हिंसा मुक्त ज़िन्दगी जीने के लिए मज़बूत संस्थागत व संगठानात्मक सुधार की ओर क़दम उठाने चाहिए। महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को नियंत्रित करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। 25 नवंबर को यह दिवस क्यों मनाया जाता है? यह जाने के लिए पीछे लौटना होगा।

दरअसल 25 नवंबर, 1960 को डोमिनिकन शासक राफेल ट्रुजिलो के आदेश पर तीन बहनों- पैट्रिया, मारिया तथा एंटोनिया मिराबैल की क्रूरता से हत्या कर दी गयी थी। इन तीनों बहनों ने तत्कालीन ट्रुजिलों की तानाशाही का कड़ा विरोध करने की हिम्मत दिखायी थी। उन्होंने स्त्री विरोधी कट्टर नज़रिया रखने वाले इस तानाशाह के ख़िलाफ़ विद्रोह में हिस्सा लिया और इस विरोध की सज़ा उन्हें मौत के रूप में मिली। लेटिन अमेरिका और केरिबियन महिलाओं ने सन् 1981 से ही 25 नवंबर को स्मृति दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। सन् 1999 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एकमत से प्रस्ताव पारित कर हर वर्ष 25 नवंबर को महिलाओं के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने का फ़ैसला लिया। इस दिवस को मनाने का मक़सद महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा को रोकना व उसका उन्मूलन करना है। इस दिन का एक लक्ष्य यह भी है कि इस दिशा की ओर उठाये जाने वाले क़दमों के लिए जितने फंड की ज़रूरत है।

सवाल यह है कि सरकारें इस पर जितना ख़र्च करती हैं, उसमें और ज़रूरी फंड में जो $फासला है, उसे कैसे दूर किया जाए? हिंसा पीडि़तों को ज़रूरी सेवाएँ मुहैया कराना सुनिश्चित किया जाए। यह दिवस इस पर भी ध्यान केंद्रित कराता है कि ऐसे आँकड़े एकत्र किये जाएँ, जिनके आधार पर महिलाओं व लड़कियों के लिए जीवन-रक्षक सेवाओं को बेहतर बनाया जा सके। इस वर्ष को मनाने की शुरुआत 2000 में हुई और इस साल 22वाँ अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस का थीम ‘यूनाइट : एक्टिजम टू एंड वायलेंस अगेंस्ट वीमेन ऐंड गल्र्स’ है। वहीं सन् 2021 का थीम ‘ऑरेंज : द वल्र्ड एंड वॉयलेंस अगेंस्ट वीमेन नाउ’ थी, यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा फ़ौरन ख़त्म हो। दरअसल ऑरेंज रंग रोशनी, उज्ज्वलता का प्रतीक माना जाता है। महिलाओं की ज़िन्दगी में रोशनी फैलानी होगी।

ग़ौरतलब है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस जागरूकता कार्यक्रम की शुरुआत 25 नवंबर से होती है और यह 10 दिसंबर तक चलता है। 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। 16 दिन लोगों को लिंग आधारित हिंसा का विरोध करने के लिए एकजुट होने का सन्देश दिया जाता है। विश्व भर में महिला अधिकारों को लेकर काम करने वाले संगठनों ने अब तक इस अवधि का इस्तेमाल शारीरिक व यौन हिंसा, भावात्मक उत्पीडऩ और मानव तस्करी जैसे घरेलू मामलों व बाहरी मामलों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए किया है। सरकारों व नीति निर्धारकों पर भी इसका असर देखा गया है। महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा को ख़त्म करने के लिए सन् 2008 में यू.एन. वीमेन एवं तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव बॉन मून की अगुवाई में उद्यमिता कार्यक्रम की शुरुआत की गयी, जिसका मक़सद हिंसा के उन्मूलन के लिए पूरी दुनिया को एकजुट करने की कोशिश था। उसके बाद से हर साल 25 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस की जो भी थीम तय होती है, उसके आगे यूनाइट (एकजुट) लगा होता है।

विश्व में महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा बहुत व्यापक व भयानक स्तर पर है; लेकिन अभी भी इस मुद्दे को लेकर ज़्यादातर ख़ामोशी दिखती है। पीडि़त व उसके परिवारजन इसकी रिपोर्ट दर्ज कराने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं और इसे कंलक के तौर पर देखते हैं। यह नज़रिया सही नहीं है। इससे सही आँकड़े सामने नहीं आते, ज़मीनी हक़ीक़त का पता नहीं चलता। बहरहाल विश्व नेताओं को यह चिन्ता सता रही है कि स्थायी विकास लक्ष्य को वर्ष 2030 तक हासिल करने की जो समय सीमा है, उस अवधि तक लैंगिक समानता वाला लक्ष्य हासिल हो सकेगा। क्योंकि बिना लैंगिक समानता हासिल किये बिना महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन वाला टारगेट कैसे पूरा होगा? हाल ही में जारी रिपोर्ट ‘प्रोग्रेस ऑन द सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स : द जेंडर स्नेपशॉट 2022’ बताती है कि वर्ष 2030 तक विश्व लैंगिक बराबरी को हासिल करने वाले ट्रैक पर नहीं है।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की ऊँची दर बनी हुई है, वैश्विक स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानवीय संकटों ने हिंसा के ख़तरे को और बढ़ा दिया है, विशेषतौर पर सबसे संवेदनशील महिलाओं व लड़कियों के लिए और महिलाएँ अब कोरोना महामारी के बाद ख़ुद को अधिक असुरक्षित महसूस करने लगी हैं, जितनी वे इस महामारी से पहले महसूस नहीं करती थीं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर 11वें मिनट में एक महिला या लडक़ी अपने अंतरंग साथी या परिजनों के द्वारा मार दी जाती है। यह रिपोर्ट इस पर भी रोशनी डालती है कि बीते साल विश्व में 15-49 आयु वर्ग की हर 10वीं महिला या लडक़ी अंतरंग साथी की यौन हिंसा अथवा शारीरिक हिंसा की शिकार हुई। हर चौथी महिला ने बताया कि जबसे महामारी शुरू हुई, तबसे घरेलू झगड़े बार-बार होने लगे हैं। यह रिपोर्ट इस सच्चाई को भी सामने रखती है कि बेशक महिलाओं व महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा को रोकने के लिए जो क़ानून बने हैं, उनमें प्रगति हुई है। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि इस सन्दर्भ में जो प्रगति की दर है, उसके मद्देनज़र ये क़ानून हर जगह स्थापित हों, इसके लिए 21 साल और लगेंगे। जहाँ तक भारत का सवाल है, इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-2021) के अनुसार, 18-49 आयुवर्ग की लगभग 30 प्रतिशत महिलाएँ ऐसी हैं, जिन्हें 15 साल की उम्र के बाद से शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है। लेकिन केवल 14 प्रतिशत महिलाओं ने ही अपने साथ हुई इस हिंसा के बारे में बताया।

अक्सर शराब पीने वाले 70 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जो पत्नियों के साथ शारीरिक व यौन हिंसा करते हैं। शारीरिक हिंसा के 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में पति ही ज़िम्मेदार देखा गया है। अक्सर महिलाएँ घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकार होती हैं। मानव तस्करी के जाल में भी उन्हें आसानी से फँसा लिया जाता है। कम उम्र की लड़कियों को नौकरी का झाँसा देकर उनका कई तरह से शोषण करने वाली ख़बरें अक्सर सामने आती रहती हैं। अब सवाल यह है कि महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा को प्रभावी तरी$के से रोकने व उन्मूलन के लिए विश्व नेताओं को अधिक प्रभावशाली रणनीतियाँ बनाने व उनके आशानुरूप नतीजों पर फोकस करने की दरकार है।

झारखण्ड में राजनीतिक लड़ाई से हो रही जनता की भलाई

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी- दो बिल्लियाँ रोटी के लिए लड़ रही थीं। इसका फ़ायदा बंदर को मिला। झारखण्ड में इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा। केंद्र और राज्य की लड़ाई का लाभ जनता को मिलता जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता पर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में संकट बरक़रार है।

इस मामले में राज्यपाल को फ़ैसला लेना है। अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का शिकंजा कसता जा रहा है। ईडी के अधिकारियों ने 17 नवंबर, 2022 को मुख्यमंत्री को पूछताछ के लिए बुलाया था। उनसे नौ घंटे तक पूछताछ हुई। भविष्य में फिर बुलाये जाने की उम्मीद जतायी जा रही है। वर्तमान राज्य सरकार पर संकट है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण जैसे एक के बाद एक ऐसे फ़ैसले लेते जा रहे हैं, जिससे वह राजनीतिक रूप मज़बूत हो सकें। इसी क्रम में 22 नवंबर को अवैध निर्माण को नियमित करने का फ़ैसला लिया गया है। इस फ़ैसले से निश्चित रूप से शहरी क्षेत्र में रहने वाले हर वर्ग के एक बड़े समूह को लाभ पहुँचेगा। राज्य के शहरी क्षेत्र के लाखों लोगों द्वारा बनाये गये अवैध रूप से घर नियमित हो जाएँगे। बुलडोजर की आवाज़ थम जाएगी। आशियाना उजडऩे से बच जाएगा। पर सवाल है कि आख़िर यह कब तक होता रहेगा? कब तक अवैध निर्माण को राजनीतिक लाभ (वोट बैंक बनाने) के लिए वैध कर शहरों को अस्त-व्यस्त ही रखा जाएगा? कब तक सुन्दर, व्यवस्थित व स्मार्ट शहर के लिए बने मास्टर प्लान की धज्जियाँ उड़ती रहेंगी? जिन लोगों का पूर्व में अवैध निर्माण ढाया गया, उनका क्या दोष था? सरकार के मौज़ूदा फ़ैसले से अवैध निर्माण करने वाले भले ही ख़ुश हों; लेकिन अन्य लोग ऐसे तमाम सवाल तो उठ ही रहे हैं।

मकान होंगे नियमित

झारखण्ड में बिना नक्शे के बने (अनधिकृत) निर्माण को नियमित करने के प्रारूप को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंज़ूरी दी है। इसके मुताबिक, 31 दिसंबर, 2019 के पूर्व निर्मित आवासीय और ग़ैर-आवासीय या व्यावसायिक भवनों का नियमितीकरण किया जाएगा। नियमित किये जाने वाले भवनों पर बिल्डिंग बाइलॉज में किये गये प्रावधान लागू नहीं होंगे। 15 मीटर तक की ऊँचाई वाले जी प्लस थ्री भवनों को इसके तहत नियमित किया जाएगा। इसके लिए 500 वर्ग मीटर से कम प्लॉट का प्लिंथ क्षेत्र 100 प्रतिशत और 500 वर्ग मीटर से बड़े प्लाट का प्लिंथ क्षेत्र 75 प्रतिशत या 500 वर्ग मीटर (दोनों में जो भी कम हो) होना चाहिए।

नियमित कराने के लिए शुल्क भी चुकाना होगा। आवासीय और ग़ैर-आवासीय भवनों को नियमित करने लिए अलग-अलग शुल्क का निर्धारित किया गया है। नगर निगम, नगर परिषद्, नगर पंचायत क्षेत्र के हिसाब से 50 से 150 रुपये प्रति वर्ग मीटर तक तय किया जा रहा है। अवैध भूमि पर किये गये अनधिकृत निर्माण को नियमितीकरण की इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। ग़लत तरीक़े से ख़रीदी या क़ब्ज़ा की गयी आदिवासी या सरकारी भूमि पर किये गये निर्माण को योजना के तहत नियमित नहीं किया जाएगा।

तीसरी बार बनेंगे नियम

राज्य में अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ कार्रवाई हर कुछ महीनों पर चलता रहा है। पिछले वर्ष राजधानी रांची में कई घरों पर बुलडोजर चले थे। कुछ महीने पहले भी अवैध रूप से बने घरों को तोड़ा गया था। राज्य गठन का 22 साल हो चुका है। इस दौरान हज़ारों घर उजाड़े गये हैं। सरकार किसी की भी हो, संकट के समय या फिर चुनाव से ठीक पहले लोगों का आशियाना नहीं उजड़े जैसे मामलों की याद आती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जो अवैध निर्माण को नियमित करने का फ़ैसला लिया है, वह पहली बार नहीं हो रहा है। राज्य के शहरों में किये गये अवैध निर्माण को नियमित करने के लिए तीसरी बार योजना बनायी गयी है।

सबसे पहले सन् 2011 में अनधिकृत निर्माण को नियमितीकरण शुल्क के माध्यम से वैध करने के लिए झारखण्ड अधिनियम अधिसूचित किया गया था। इसके बाद ठीक चुनाव से पहले सन् 2019 में अवैध निर्माण नियमित करने के लिए योजना लागू की गयी। नियमित करने के लिए अधिक शुल्क निर्धारण और नीतिगत ख़ामियों की वजह से दोनों बार योजना सफल नहीं हो सकी। बहुत कम संख्या में लोगों ने निर्माण नियमित कराने के लिए आवेदन किया था। क्योंकि पहले के नियम में कई ख़ामियाँ थीं। नियमित करवाने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। इस बार इन ख़ामियों को दूर कर नयी सरल पॉलिसी सरकार लाने का दावा कर रही है।

योजनाओं की उड़ रहीं धज्जियाँ

झारखण्ड की राजधानी रांची की बात करें, तो यहाँ क़रीब 1.25 लाख अवैध मकान होंगे। अवैध मकानों का आँकड़ा तो सरकार के पास भी नहीं है; लेकिन एक अनुमान और समय-समय पर विभिन्न संगठनों के रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में सात लाख से अधिक अवैध मकान होंगे। झारखण्ड में सभी शहरों का मास्टर प्लान (महायोजना) और जोनल प्लान (आंचलिक योजना) बनकर तैयार हैं।

वर्ष 2037 तक के लिए प्लान बनवाने में करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये। यह मास्टर प्लान या जोनल प्लान फाइलों में धूल फाँक रहा है। इसके अनुसार, शायद ही किसी भी शहर में विकास हो रहा है। अवैध और बेतरतीब रूप से शहर में विकास कार्य हो रहे हैं। न घरों का नक्शा है और न ही व्यावसायिक क्षेत्र का व्यवस्थित विकास। सँकरी गलियों के बीच तीन-चार मंज़िला इमारत खड़ी है। जहाँ लोग रह भी रहे हैं और व्यवसाय भी चल रहा है।

शहर के बीचों-बीच सँकरी गलियों में ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं, जहाँ आपात स्थिति में फायर बिग्रेड की गाडिय़ाँ नहीं पहुँच सकती हैं। समय-समय पर इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती थी। लेकिन जैसे ही चुनाव का समय आता है, इन्हें नियमित करने की क़वायद शुरू हो जाती है। पिछले कुछ महीनों से हेमंत सरकार संकट में है, तो 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण, अवैध भवनों को नियमित करने जैसे जनता से जुड़े ताबड़तोड़ फ़ैसले ले रही है। इसी क्रम में अवैध मकानों को नियमित करने का फ़ैसला भी लिया गया।

ग़लत परम्परा की न हो शुरुआत

अवैध निर्माण की समस्या केवल झारखण्ड में नहीं है। इससे शायद ही कोई राज्य या कोई शहर अछूता हो। यह सही है कि इसका समाधान भी आसान नहीं है। अवैध निर्माण किसी भी सरकार के लिए बड़ा और संवेदनशील मसला है। वह चाहे रिहायशी हो या व्यावसायिक। प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त कर अवैध निर्माण होने से तो रोका जा सकता है; लेकिन जो निर्माण हो चुका है, उसका क्या किया जाए? अगर क़ानून के मुताबिक सख़्त कार्रवाई की जाती है, तो भविष्य के लिए लोगों को कड़ा सन्देश मिलता है और इस पर रोक लगती है; लेकिन राजनीतिक रूप से यह फ़ैसला थोड़ा मुश्किल है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इससे बचते हैं और सरकार में जो हुआ, सो हुआ; लेकिन अब न करें की नीति अपनाती हैं।

यह अच्छी बात है कि झारखण्ड सरकार ने तोडफ़ोड़ की जगह नियमित करने का फ़ैसला लिया है। निर्धारित शुल्क चुकाने पर शहरी क्षेत्र में व्यावसायिक स्थल और रिहायशी भवनों को नियमित कर दिया जाएगा। सरकार के इस कदम से अवैध निर्माण कर चुके लोगों में ख़ुशी है। पर सरकार को यह देखना होगा कि उसकी नरमदिली ग़लत परम्परा न बन जाए। लोग अपनी सुविधानुसार निर्माण कार्य कर लें कि बाद में तो सरकार नियमित कर ही देगी, लोगों में ऐसी धारणा नहीं बन जाए। वरना कभी भी अवैध निर्माण नहीं रुकेगा। इसी तरह बेतरतीब तरीक़े से शहर विकसित होते रहेंगे। प्रदूषण बढ़ता जाएगा। सीवरेज-ड्रेनेज और जल-भराव समेत अन्य समस्याओं से लोग जूझते रहेंगे। इसलिए सरकार को कम-से-कम इस मुद्दे पर राजनीति से हटकर काम करना चाहिए।