तहलका विशेष।
ओडिशा। केओंझार जिले से आई वह खौफनाक तस्वीर, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, आखिरकार एक भावुक अंजाम तक पहुंच गई है। एक बेबस भाई का अपनी बहन के अवशेषों (कंकाल) को कंधे पर लादकर बैंक की चौखट तक पहुंचने का संघर्ष रंग लाया और System को झुकना पड़ा। हालांकि अब Jeetu Munda को उनकी हक की राशि सौंप दी गई है, लेकिन यह जीत उस कड़वे सच को भी उजागर करती है कि ‘Viksit Bharat के दावों के बीच आज भी एक आम आदमी का हक कागजों की भेंट चढ़ जाता है।
Odisha ओडिशा के केओंझार जिले से आई वह खौफनाक तस्वीर, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, आखिरकार एक भावुक अंजाम तक पहुंच गई है। एक बेबस भाई का अपनी बहन के अवशेषों (कंकाल) को कंधे पर लादकर बैंक की चौखट तक पहुंचने का संघर्ष रंग लाया और System को झुकना पड़ा। हालांकि अब Jeetu Munda को उनकी हक की राशि सौंप दी गई है, लेकिन यह जीत उस कड़वे सच को भी उजागर करती है कि ‘Viksit Bharat के दावों के बीच आज भी एक आम आदमी का हक कागजों की भेंट चढ़ जाता है।
Keonjhar के दियानाली गांव के रहने वाले जीतू मुंडा के लिए अपनी दिवंगत बहन कालरा मुंडा के खाते में जमा करीब 20,000 रुपये पाना किसी पहाड़ तोड़ने जैसा कठिन था। अनपढ़ और जटिल नियमों से अनजान जीतू कई दिनों तक बैंक के चक्कर काटते रहे, लेकिन हर बार उन्हें ‘लीगल हेयर सर्टिफिकेट’ जैसे पेचीदा शब्दों के जाल में उलझाकर खाली हाथ लौटा दिया गया। त्रासदी यह थी कि खाते में दर्ज Nominee की भी मौत हो चुकी थी।
जब उम्मीद के सारे दरवाजे बंद हो गए, तो बेबसी और गुस्से में डूबे जीतू ने वह आत्मघाती कदम उठाया जिसकी कल्पना मात्र से सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाता है। वह अपनी बहन के अवशेषों को कब्र से निकालकर बैंक ले आए, ताकि निर्जीव कागजों के बजाय वह मौत के साक्षात सच से प्रशासन को जगा सकें।
जब यह हृदयविदारक वीडियो Viral हुआ और सिस्टम की चौतरफा किरकिरी हुई, तब जाकर प्रशासनिक अमला जागा। जो कागजी कार्रवाई हफ्तों से अटकी थी, वह चंद घंटों में पूरी कर ली गई। तहसीलदार और बैंक अधिकारी खुद जीतू के घर पहुंचे और कालरा के खाते में जमा ₹19,402 की राशि का Cheque उन्हें सौंपा। साथ ही रेड क्रॉस सोसाइटी की ओर से भी आर्थिक मदद दी गई ताकि बहन का अंतिम संस्कार ससम्मान हो सके।
पैसे हाथ में आने के बाद जीतू की आंखों में संतोष के आंसू तो हैं, लेकिन यह घटना बैंकिंग प्रणाली और ग्रामीण प्रशासन पर एक गहरा जख्म छोड़ गई है। RBI के स्पष्ट निर्देश हैं कि छोटी राशि के दावों के लिए प्रक्रियाओं को सरल रखा जाए, फिर भी एक गरीब को अपना हक पाने के लिए इस हद तक गिरना पड़ा। आज सवाल यह नहीं है कि पैसे मिल गए, सवाल यह है कि क्या हक पाने के लिए हर बार ‘वायरल’ होना ही एकमात्र रास्ता बचेगा? आजादी के इतने दशकों बाद भी अगर एक इंसान को अपनी पहचान और गरिमा साबित करने के लिए लाशों का सहारा लेना पड़े, तो यह किसी बैंक की तकनीकी हार नहीं, बल्कि एक समाज के तौर पर हमारी सामूहिक Moral Failure है। जब तक नियम मानवीय संवेदनाओं से ऊपर रहेंगे, तरक्की के सारे आंकड़े बेमानी ही रहेंगे।




