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आईएसवाईएफ का स्वयंभू मुखिया आतंकी हरप्रीत सिंह गिरफ्तार, लुधियाना कोर्ट परिसर ब्लास्ट में था हाथ

फरार आतंकवादी और आईएसवाईएफ के स्वयंभू मुखिया हरप्रीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उसे एक दिन पहले मलेशिया के कुआलालंपुर से आने पर गिरफ्तार कर लिया। एनआईए ने हरप्रीत सिंह पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित किया हुआ था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक एनआईए ने इसकी जानकारी दी है। एनआईए ने कहा कि पाकिस्तान स्थित इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन आईएसवाईएफ का स्वयंभू प्रमुख हरप्रीत, लखबीर सिंह रोडे का सहयोगी है।

वह दिसंबर 2021 लुधियाना कोर्ट बिल्डिंग ब्लास्ट के साजिशकर्ताओं में से एक था जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गयी थी जबकि कई अन्य घायल हो गए थे। उसपर  एनआईए ने 10 लाख रुपये का इनाम घोषित किया हुआ था। उसके खिलाफ विशेष एनआईए अदालत से गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था और एक लुक आउट सर्कुलर भी निकाला गया था।

एनआईए के मुताबिक, रोड के निर्देश पर काम करते हुए हरप्रीत ने विशेष रूप से निर्मित आईईडी की डिलीवरी का समन्वय किया, जिसे पाकिस्तान से उसके भारत स्थित सहयोगियों को भेजा गया था। इसका उपयोग लुधियाना कोर्ट कॉम्प्लेक्स विस्फोट में किया गया था।

एनआईए के मुताबिक हरप्रीत, लखबीर सिंह रोड का सहयोगी है जो पाकिस्तान स्थित इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन का स्वयंभू मुखिया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उसे मलेशिया के कुआलालम्पुर से दिल्ली आने पर गिरफ्तार कर लिया

आपको बता दें, लुधियाना कोर्ट परिसर में 23 दिसंबर 2021 को ब्लास्ट हुआ था। इसमें बम लगाने वाले गगनदीप सिंह व अन्य 6 नागरिक घायल हो गए थे। एनआर्इए ने इस वर्ष जनवरी में भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, विस्फोटक अधिनियम और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथान अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले को अपने हाथ में ले लिया था।

 

सिंगर सिद्धू मूसेवाला की हत्या का आरोपी गोल्डी बराड़ अमेरिका में ट्रेस, हिरासत में

अमेरिका में ट्रेस होने के बाद जाने माने पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला की हत्या के मास्टरमाइंड गोल्डी बराड़ को कुछ दिन पहले वहां की पुलिस ने हिरासत में ले लिया गया है। भारत अमेरिका से उसे भारत भेजने का आग्रह कर सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पेशे से ट्रक ड्राइवर गोल्डी बरार को 20 नवंबर के आसपास कैलिफोर्निया में हिरासत में ले लिया गया था। भारत की एजेंसियों को इसकी जानकारी मिली है। वैसे कैलिफोर्निया की तरफ से कोई आधिकारिक जानकारी या बयान भारत से अभी साझा नहीं किया गया है।

गोल्डी बरार को भारतीय एजेंसियां शिद्दत से तलाश कर रही थीं। भारतीय एजेंसियों को इनपुट्स मिले हैं कि कैलिफ़ोर्निया में गोल्डी बरार को लेकर हलचल है और उसे वहां पर ट्रेस किया गया और फिर हिरासत में ले लिया गया। वह कैलिफोर्निया कैसे पहुंचा अमेरिका की एजेंसियां यह भी जानने की कोशिश कर रही हैं।

यही खबर पहले भी आई थी कि गोल्डी कनाडा से कैलिफ़ोर्निया चला गया है और वहीं रह रहा है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि उसे कैलिफ़ोर्निया के शहर सैक्रामेंटो, फ़्रिज़ो,   और सॉल्ट लेक में ट्रेस किया गया जहाँ उसने अपना नया ठिकाना बना लिया है।

एजेंसियों का मानना है कि दबाव के चलते बराड़ कनाडा में खुद के लिए खतरा महसूस का रहा था। कनाडा ऐसी जगह है जहाँ दिवंगत सिंगर मूसेवाला के हजारों फैन हैं। लिहाजा उसे खुद के पहचान लिए जाने का खतरा लग रहा था।

शादी के लिए धर्मांतरण

मुस्लिम युवकों से विवाह करने वाली कुछ हिन्दू युवतियों पर धर्मांतरण के लिए डाला जाता है दबाव!

देश में सख़्त क़ानून के बावजूद धर्मांतरण के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। भले ही मुस्लिम बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि इस्लाम इस तरह की हिंसा और विवाह के लिए धर्मांतरण की इजाज़त नहीं देता; लेकिन कुछ मौलवी ऐसी गतिविधियों में लिप्त हैं। ये मौलवी हिन्दू युवतियों द्वारा मुस्लिम युवकों से विवाह करने के पहले अथवा बाद में उन पर धर्मांतरण के लिए ज़ोर देते हैं और इसका विरोध करने पर उन पर क्रूर अत्याचार करने की भी सलाह देते हैं। हो सकता है कि यह व्यापक स्तर पर न होता हो; लेकिन दो मौलवियों से ‘तहलका’ की बातचीत ज़ाहिर करती है कि अंतर्धार्मिक विवाह यानी मुस्लिम युवक से शादी करने के बाद कुछ हिन्दू युवतियों की राह आसान नहीं होती। तहलका एसआईटी की जाँच रिपोर्ट :-

‘शादी करने से पहले हिन्दू लडक़ी का धर्म इस्लाम में परिवर्तित कर दो। शादी के बाद अगर लडक़ी इस्लाम छोडक़र अपने हिन्दू धर्म में वापस चली जाती है, तो पहले विनम्रता से उसे ऐसा न करने के लिए कहें। अगर वह नहीं सुनती है, तो उसे थप्पड़ से समझाएँ। उसे इस तरह पीटें कि उसके शरीर से ख़ून न बहे। उसके शरीर पर थप्पड़ का कोई निशान नहीं रहना चाहिए, और उसकी हड्डियाँ नहीं टूटनी चाहिए। यदि आप घरेलू हिंसा के लिए पुलिस कार्रवाई से बचना चाहते हैं, तो आपको अपनी पत्नी के शरीर पर हिंसा का कोई सुबूत नहीं छोडऩा चाहिए।’ -मौलाना मोहम्मद मुक़ीम ने यह बात ‘तहलका’ के रिपोर्टर से कही। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने मुस्लिम के रूप में ख़ुद को पेश करते हुए मौलाना मोहम्मद मुक़ीम से अपने 29 वर्षीय काल्पनिक भतीजे के एक हिन्दू लडक़ी से उसकी मर्ज़ी से शादी (प्रेम विवाह) करने की इच्छा को ज़ाहिर करते हुए एक काल्पनिक चरित्र के रूप में उनसे सम्पर्क किया था, जिसके जवाब में मौलाना मुक़ीम ने रिपोर्टर को यही सलाह दी। मदरसे में अपनी वर्तमान नौकरी में आने से पहले मौलाना मुक़ीम उत्तर प्रदेश के एक शहर में एक मस्जिद के इमाम के रूप में काम कर रहे थे।

मौलाना मुक़ीम ने कहा- ‘उसे पीटने के बाद भी, यदि आपकी पत्नी हिन्दू धर्म का पालन करना जारी रखती है और इस्लाम में वापस नहीं आती है, तो आप उसे शरिया अदालत में ले जाएँ, जहाँ उसका धर्मांतरण कराया गया था। उन्हें बताएँ कि लडक़ी शादी के बाद हिन्दू धर्म में वापस चली गयी है। शरिया अदालत के सदस्य उसे ऐसा न करने के लिए कहेंगे। अगर वह उनकी भी नहीं सुनती है, तो शरिया अदालत उन्हें एक-दूसरे को तलाक़ देने के लिए कहेगा।’

दरअसल भारत के कई राज्यों के धर्मांतरण विरोधी क़ानून पारित करने के बाद ‘तहलका’ ने मौलाना मुक़ीम से सम्पर्क किया। लेकिन नये धर्मांतरण विरोधी क़ानून के तहत, अंतर्धार्मिक जोड़ों को अब शादी करने से पहले एक ज़िला अधिकारी को दो महीने का समन (नोटिस) देना होगा। वर्तमान में विशेष विवाह अधिनियम-1954 के तहत, जो भारत में अंतर्धार्मिक विवाहों को नियंत्रित करता है; जोड़ों को 30 दिन का नोटिस देना होगा। नये क़ानून में आपराधिक पहलू भी हैं कि यदि एक पति या पत्नी को अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर करने के लिए शादी का उपयोग करने का दोषी पाया जाता है, तो उसमें 10 साल तक की जेल की सज़ा शामिल है। माता-पिता, भाई-बहन और कोई भी रिश्तेदार विवाह और गोद लेने से धर्मांतरण के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकते हैं। ऐसे विवाहों को निरस्त भी किया जा सकता है। यह साबित करने के लिए कि धर्मांतरण मजबूर करके नहीं किया है, इसके सुबूत देने का ज़िम्मा धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों या जो लोगों को धर्मांतरण के लिए परामर्श देते हैं; उनका होता है।

भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी क़ानून पारित होने के बाद भी मौलाना मुक़ीम जैसे लोग हैं, जो धर्मांतरण पर अपने फ़ैसलों को सही समझते हैं। इसी वास्तविकता की जाँच ‘तहलका’ ने की। मौलाना मुक़ीम ने तो सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने रिपोर्टर को सलाह दी कि यदि उसकी पत्नी इस्लाम धर्म अपनाने और उससे शादी करने के बाद अपने हिन्दू धर्म में वापस जाती है और इस्लाम धर्म छोड़ देती है, तो उसे मारो। उसे इस्लाम में लौटने के लिए मजबूर करो। और अगर वह फिर भी ऐसा नहीं करती है, तो तलाक़ ही एकमात्र विकल्प है।

रिपोर्टर : आप कह रहे हैं न! अगर वह अपने मज़हब पर नहीं क़ायम रहती है और हिन्दू धर्म पर चली जाती है; इस्लाम पर नहीं रहती है…।

मुक़ीम : हाँ।

रिपोर्टर : लडक़ा पहले उसे समझाये, फिर तमाचा मारे?

मुक़ीम : हाँ।

रिपोर्टर : अगर तमाचा मारे, तो वह थाने में इल्जाम लगा सकती है।

मुक़ीम : हाँ।

रिपोर्टर : …कि मेरे साथ मार-पीट की है। डोमेस्टिक वायलेंस हुआ है।

मुक़ीम : तमाचा? …नहीं उसमें यह एहतियात है। समझाएँगे, तब कि तमाचा ऐसा मारना कि चूड़ी टूट के हाथ में ख़ून न निकले। या गाल पर न मारकर मुँह चाप जाए। या घूँसा न मारकर कि हड्डी टूट जाए। समझाएँगे कि तमाचा मरने से मतलब यह है कि हल्का-फुल्का मारना। उसे मारना, ऐसा मारना कि ख़ून न निकले। हड्डी न टूटे। निशान न पड़े। तुम्हारी शिकायतें करे, तो कोई निशान न दिखा सके।

रिपोर्टर : सुबूत न हो कोई?

मुक़ीम : सुबूत न हो कोई। हाँ ऐसा मत मारना। और फिर समझाएँ नहीं मान रही, हल्का-फुल्का मार दिया। शरिया अदालत जहाँ कलमा पढ़ाया गया है, वहाँ लेकर जाएँ। जी, मैंने निकाह किया। मुसलमान थी। अब यह नहीं मान रही। अब यह हिन्दू बने जा रही है। अब मुझे क्या करना है? तो वो समझाएँगे अपने तरीक़ै से। बात करेंगे उससे। वो मान जाती है, तो ठीक है। नहीं मानती, तो वो फिर अलग कर देंगे।

रिपोर्टर : तलाक़ हो जाएगा?

मुक़ीम : तलाक़ हो जाएगा।

रिपोर्टर : अगर लडक़ा-लडक़ी तलाक़ के लिए तैयार नहीं हुए?

मुक़ीम : वो तलाक़ हो जाएगा।

दरअसल ‘तहलका’ पत्रकार ने मौलाना मुक़ीम से मुलाक़ात पर अपने एक काल्पनिक भतीजे के अंतर्धार्मिक विवाह को लेकर सवाल किये। इस पर मौलाना मुक़ीम ने रिपोर्टर को नसीहत दी कि पहले हिन्दू लडक़ी को इस्लाम में धर्मांतरित करवाओ; अन्यथा उनकी शादी नाजायज़ मानी जाएगी।

मुक़ीम : बिलकुल साफ़ मना कर दिया। मुसलमान बच्चे का निकाह हिन्दू बच्चे से नहीं हो सकता। बिलकुल नहीं हो सकता। यह है कि लडक़ी दीन-ईमान में आये पहले।

मौलाना मुक़ीम ने ‘तहलका’ पत्रकार को हिन्दू लडक़ी को शादी के लिए इस्लाम में बदलने की तरकीब बतायी।

मुक़ीम : अच्छा यह तो जो हो गया, उसूल की बात है। दूसरी एक बात वो है, जो बहुत मुश्किल से मिलती है। तावीज़ के ज़रिये से। एक दुआ, झाड़ कुछ चीज़ करके उसे खिला दिया जाए।

रिपोर्टर : लडक़ी को?

मुक़ीम : हाँ; लडक़ी को। वो उधर माइल हो जाए।

रिपोर्टर : माइल हो जाए, मतलब?

मुक़ीम : उसकी तरफ़ झुक जाए। लडक़े की तरफ़।

रिपोर्टर : मतलब मुसलमान हो जाए?

मुक़ीम : हाँ।

 

मौलाना मुक़ीम ने हमें बताया कि वह हिन्दू लडक़ी को मेरठ में रहने वाले इस्लामिक स्कॉलर कलीम सिद्दीक़ी के पास धर्मांतरण के लिए भेजेगा। मुक़ीम के मुताबिक, कलीम सिद्दीक़ी के पास सरकार से लोगों का धर्मांतरण कराने की इजाज़त है। मुक़ीम ने कहा कि उन्हें लोगों के धर्मांतरण की अनुमति नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कोई हिन्दू लडक़ी उसके पास धर्मांतरण के लिए आती है, तो वह उसकी अर्ज़ी नहीं मान सकता। और अगर उसने ऐसा करने की कोशिश की, तो उसे गिरफ़्तार कर लिया जाएगा।

यह पाठकों को याद दिलाने के लिए है कि इस्लामिक विद्वान मौलाना कलीम सिद्दीक़ी, जिनके बारे में मौलाना मुक़ीम धर्मांतरण के लिए बात कर रहे थे; को उत्तर प्रदेश आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने मेरठ से कथित रूप से सबसे बड़ा धर्मांतरण सिंडिकेट चलाने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। ख़बर लिखे जाने तक वह जेल में बन्द था।

रिपोर्टर : लडक़ी को अगर हम आपके पास लेकर आएँगे, तो आप करवा देंगे लडक़ी को इस्लाम क़ुबूल?

मुक़ीम : मैं भेजूँगा मेरठ। मेरठ में फुलत में हमारे उस्ताद के उस्ताद हैं- कलीम सिद्दीक़ी साहब। जिनको सरकार से ऐसी परमीशन हासिल है। अगर कोई कलमा पढ़ सकता है, तो आप उसे पढ़ाएँ। उनको यह अनुमति है, सरकार से। यहाँ कोई लडक़ी मेरे पास आती है। मुझे अनुमति नहीं है। मुझे पुलिस वाले पकड़ लेंगे कि क्यों कलमा पढ़ा आपने। उनके पास अनुमति है।

रिपोर्टर : कलीम सिद्दीक़ी के पास?

मुक़ीम : कलीम सिद्दीक़ी साहब।

रिपोर्टर : मेरठ में कहाँ रहते हैं?

मुक़ीम : वह फुलत में रहते हैं?

 

मौलाना मुक़ीम ने अब बताया कि कैसे लव-जिहाद क़ानून की शुरुआत ने उत्तर प्रदेश में परिदृश्य को बदल दिया था।

मुक़ीम : अब यह भाजपा सरकार न हो। यह क़ानून पास करवा लेंगे। क़ानून पास हो गया, लव-जिहाद का…।

रिपोर्टर : ऑर्डिनेंस (अध्यादेश) लाये हैं यह।

मुक़ीम : अगर यह न पास हुआ होता, तो ये ही कलमा, यहीं पढ़वा देता। पकड़ो निकाह हुआ भाई। मैं ये कहता हूँ कि कलमा पढ़वाया है, निकाह पढ़वाया है। कोई दिक़्क़त नहीं, कुछ नहीं।

रिपोर्टर : आप ही करवा देते?

मुक़ीम : हाँ।

 

मौलाना मुक़ीम से पहली मुलाक़ात एक मस्जिद में हुई थी, जहाँ वह इमाम के तौर पर काम कर रहे थे। महीनों के बाद हम मौलाना मुक़ीम से फिर मिले, इस बार उनके नये कार्यस्थल पर, जो शहर के दूसरे इलाक़ै में स्थित है। दूसरी मुलाक़ात में मौलाना मुक़ीम ने हमें क़ानून की आँखों में धूल झोंककर एक हिन्दू लडक़ी से शादी करने के दो तरीक़ै बताये। उन्होंने कहा कि वह दोनों विकल्पों के लिए खुले हैं।

रिपोर्टर : कोर्ट मैरिज अपने-अपने मज़हब पर होगी?

मुक़ीम : हाँ।

रिपोर्टर : भाँजा हमारा मुस्लिम रहेगा, लडक़ी हिन्दू रहेगी?

मुक़ीम : अपने-अपने मज़हब पर।

रिपोर्टर : लेकिन आप तो कह रहे हो, वो शादी इस्लाम में जायज़ नहीं है?

मुक़ीम : कोर्ट में होने का मतलब सरकार की तरफ़ से सर्टिफिकेट है। लेकिन आपस में साथ रह सकते हैं। उधर से हमें सर्टिफिकेट मिल जाएगा। इधर हम उनका फ़ौरन निकाह करवा देंगे।

रिपोर्टर : उधर सर्टिफिकेट मिलेगा…।

मुक़ीम : इधर हम फ़ौरन निकाह करवा देंगे।

रिपोर्टर : निकाह और कन्वर्जन तो आप ही करवाएँगे?

मुक़ीम : हाँ।

रिपोर्टर : आप ही करवाएँगे?

मुक़ीम : हाँ।

मुक़ीम ने अब हमें दूसरा विकल्प दिया, जिसके तहत वह ख़ुद चुनिंदा लोगों की मौज़ूदगी में अज्ञात स्थान पर हिन्दू लडक़ी को चुपके से इस्लाम में परिवर्तित कर देंगे और निकाह कराएँगे।

मुक़ीम : ऐसे हो सकता है कि लडक़ा-लडक़ी एक जगह जमा हों, कहीं भी। वहाँ मैं पहुँच जाऊँ। वो मेरे पास आ गये लडक़ा-लडक़ी या मैं उनके पास चला जाऊँगा। फिर मैं उनके अपने हाथ पर हराब भरके उनको कन्वर्ट करवा दूँगा। जो इस्लाम के क़ानून हैं, फ़र्ज़ हैं, वो उनको बता दूँगा। क़ुबूल करवा दूँगा। और फिर वहीं निकाह पढ़वा दूँगा। और मैं जो लिखकर सर्टिफिकेट दूँगा, …मैंने तुम्हें कन्वर्ट (धर्मांतरित) कर लिया है और निकाह पढ़वा दिया। फिर जो है मेरी पकड़ है। तुमने कैसे पढ़ा निकाह इनका? तुमने कैसे सर्टिफिकेट दिया इसको?

रिपोर्टर : नहीं, ये आप दोनों तरीक़ै पर तैयार हैं?

मुक़ीम : हाँ।

मौलाना मुक़ीम ने अब हमें बताया कि एक मुस्लिम मौलवी धर्मांतरण और निकाह के लिए कितना शुल्क लेता है? वह उन्हें ‘वर्दी वाला’ कहते हैं।

मुक़ीम : जो वर्दी वाले होते हैं।

रिपोर्टर : जी?

मुक़ीम : जो वर्दी वाले होते हैं। जो दो नंबर कह लीजिए …11,000, कोई 21,000, 30,000 वो माँगते हैं।

रिपोर्टर : ये वर्दी वाले…? पुलिस वाले?

मुक़ीम : नहीं, नहीं। हमारी नीयत ख़राब हो जाती है भाई! काम तो कर देंगे। काम तो हो जाएगा। ख़र्चा इतना आएगा।

रिपोर्टर : आपको कितना नज़र कर दिया जाए?

मुक़ीम : वो आपकी मर्ज़ी है। मेरा कुछ नहीं है।

रिपोर्टर : फिर भी एक थोड़ा-सा आइडिया, अंदाज़ा?

मुक़ीम : कुछ नहीं।

रिपोर्टर : 10,000, …15,000?

मुक़ीम : कुछ नहीं। जो भी आप चाहते हैं।

 

इसके बाद हम मौलाना अल्ताफ़-उर-रहमान से मिलते हैं, जो उत्तर प्रदेश के दूसरे शहर में मस्जिद और मदरसा चलाते हैं। वह कहते हैं- ‘मेरा मुख्य काम धर्मांतरण है। मैं लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करता हूँ। इसी काम से मेरी रोज़ी-रोटी चलती है और मदरसा भी चलता है। उत्तर प्रदेश में लव-जिहाद क़ानून के कारण मैंने अपना धर्मांतरण कार्य फ़िलहाल के लिए स्थगित कर दिया है। मैंने प्रत्येक धर्मांतरण और निकाह से 35 से 40 हज़ार रुपये कमाये। मैं धर्मांतरण और निकाह के लिए पूरे भारत में घूम रहा हूँ। मैं न केवल हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण कर रहा हूँ, बल्कि ईसाइयों और यहूदियों को भी इस्लाम में परिवर्तित कर रहा हूँ। हाल ही में मैंने बेंगलूरु में ईसाई को इस्लाम में परिवर्तित किया। इसके ज़रिये मैंने एक लाख रुपये कमाये। अब तक मैंने 300 धर्मांतरण किये हैं।

दरअसल हमने मुक़ीम से मिलने के बाद उसी काल्पनिक सौदे के साथ रहमान से सम्पर्क किया कि हमारे मुस्लिम भतीजे को एक हिन्दू लडक़ी से प्यार हो गया है और वह उससे शादी करना चाहता है। और इसके लिए हमें उनकी सलाह की ज़रूरत है। मौलाना अल्ताफ़-उर-रहमान ने खुले तौर पर क़ुबूल किया कि वह पूरे भारत में धर्मांतरण करता है, और अंतर्धार्मिक जोड़ों का निकाह भी करता है। हमारे केस के लिए उन्होंने कहा कि लव-जिहाद क़ानून के चलते उनके वकील ने उन्हें धर्मांतरण और निकाह सर्टिफिकेट के रूप में कोई सुबूत नहीं देने की सलाह दी है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू लडक़ी को इस्लाम में परिवर्तित किये बिना निकाह सम्भव नहीं है।

अल्ताफ़ : दूसरे मज़हब में निकाह नहीं होता है। इसलिए हम सबसे पहले दूसरे मज़हब वालों को इस्लाम मज़हब में लाने का सिस्टम है एक। एप्लिकेशन लगाना। कलमा पढ़ाना।

रिपोर्टर : क्या करा करके?

अल्ताफ़ : कलमा पड़ते हैं। समझौता बिना किसी की बुराई के। उसके बाद हम उसे देते हैं सर्टिफिकेट।

रिपोर्टर : धर्मांतरण का?

अल्ताफ़ : हाँ, धर्मांतरण का।

रिपोर्टर : निकाह भी करवा देते हैं?

अल्ताफ़ : निकाह भी करवा देते हैं। कोर्ट में भी करवा देते हैं। तीनों काम करवा देते हैं।

रिपोर्टर : तो यह अभी तक करवा रहे थे?

अल्ताफ़ : अभी तक करवा रहा था मैं। क्योंकि यह क़ानून निकल गया है। क़ानून तक जाने से पहले हमारे साथ कोई बदतमीज़ी हो जाए। है-हुल्लड़ मच जाए। उस बात के लिए हमें वकील साहब ने मना कर दिया है। अब निकाह भी पढ़ते हैं, तो बस बिना काग़ज़ के।

 

अब अल्ताफ़ ने ‘तहलका’ को बताया कि इस्लाम क़ुबूल कर मुस्लिम लडक़े से शादी करने के बाद अगर लडक़ी इस्लाम से नफ़रत करने लगे, तो उसकी सज़ा मौत है। उसका सिर क़लम कर देना चाहिए।

अल्ताफ़ : इस्लाम क़ुबूल करने के बाद अगर नफ़रत के साथ कह दे, ये दीन मुझे पसन्द नहीं है; तो उसकी सज़ा है- गर्दन उड़ा दी जाए।

रिपोर्टर : कौन काटेगा गर्दन?

अल्ताफ़ : इस्लामी, इस्लामी या उसकी अदालत।

रिपोर्टर : शौहर?

अल्ताफ़ : शौहर नहीं। अगर शौहर करेगा, तो मुल्ज़िम हो जाएगा न वो तो। हिन्दुस्तान के क़ानून से भी और शरीयत से भी। सज़ा-ए-मौत जो है, वो देने का अख़्तरियार वो क़ाज़ी को है।

रिपोर्टर : आप भी तो क़ाज़ी हैं?

अल्ताफ़ : नहीं, …मैं तो रजिस्टर्ड हूँ ना! यहाँ देखिए, हम इस्लामिक मुल्क में नहीं हैं। अगर हम इस्लामिक मुल्क में होते, तो हमारा फ़ैसला चलता।

 

अल्ताफ़ एक हिन्दू लडक़ी की काउंसलिंग करने के लिए तैयार हो गया, ताकि वह मुस्लिम लडक़े से शादी करने से पहले इस्लाम क़ुबूल कर ले। इस उदाहरण में भी हमारा (‘तहलका’ रिपोर्टर का) एक काल्पनिक भतीजा एक हिन्दू लडक़ी से शादी करना चाहता है; ऐसा ही कहा गया। अल्ताफ़ ने कहा कि वह लडक़ी के लिए कुछ तावीज़ का इस्तेमाल करेगा, ताकि वह इस्लाम धर्म को पसन्द करने लगे और अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़ुबूल करे।

रिपोर्टर : हाँ, तो उस लडक़ी को मैं आपके पास पहले भेज देता हूँ। ऐसा हो जाए कि पूरी तरीक़ै से इस्लाम में आ जाए। आप जहाँ ऐसा कर दें।

अल्ताफ़ : बात करते हैं।

रिपोर्टर : हो जाएगा सर! जहाँ ऐसा?

अल्ताफ़ : मुझे पूरी उम्मीद है अल्लाह पर। कुछ पढक़र भी खिला देंगे, मीठे में। पर उस में लडक़ी को लडक़ी की माँ का नाम याद होना ज़रूरी है। चारों का नाम रहेगा न, तो कुछ रूहों का भी असर रहता है। हम सबके साथ करते हैं। बड़े-बड़े तिलकधारी आते हैं मेरे पास।

अल्ताफ़ ने उत्तर प्रदेश के लव जिहाद क़ानून को चुनौती दी और ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा कि आप (सरकार) कितने भी क़ानून बना लो, कोई काम नहीं रुकेगा।

रिपोर्टर : यह जो लव जिहाद क़ानून बन गया उत्तर प्रदेश में, तो अब इसकी वजह से आगे भी नहीं हो पाएगा?

अल्ताफ़ : काम सारे होने हैं। काम सारे होने हैं; चाहे कितने ही क़ानून बना दो।

 

अल्ताफ़ ने कहा कि लव जिहाद क़ानून के कारण वह हमें हमारे भतीजे की अंतर्धार्मिक शादी के पिछली तारीख़ के काग़ज़ात दे देंगे।

अल्ताफ़ : इस वक़्त जो है, लोहा गरम है। लोहा जब गरम हो, चोट का असर जल्दी होता है। जब लोहा ठंडा हो जाता है न, तो चोट का असर उतना नहीं होता। इस वक़्त उसे टालने में फ़ायदा है। बाक़ी मैं काम कर दूँगा आपका। जितना बैक डेट में हम आपको काग़ज़ देंगे, उतना आप कोर्ट में इस्तेमाल करेंगे। उतना आपको फ़ायदा रहेगा।

रिपोर्टर : अच्छा, तो बैक डेट के काग़ज़ मिल जाएँगे?

अल्ताफ़ : हाँ।

रिपोर्टर : धर्मांतरण और निकाह दोनों का?

अल्ताफ़ : हाँ, धर्मांतरण और निकाह दोनों का।

 

अल्ताफ़ ने क़ुबूल किया कि धर्मांतरण कराना और निकाह कराना उसके व्यवसाय के मुख्य भाग हैं, जिसके माध्यम से वह अपने परिवार का पालन-पोषण करता रहा है और अपना मदरसा भी चलाता रहा है। उसने स्वीकार किया कि वह अब तक भारत में 300 लोगों का धर्मांतरण करा चुका है।

अल्ताफ़ : बहरहाल मैं कन्वर्जन (धर्मांतरण) भी कराता हूँ। मैं निकाह भी पढ़ता हूँ। घर-घर तक हिन्दुस्तान के हर सूबे में जाता हूँ।

रिपोर्टर : तो आप कन्वर्जन हिन्दू लडक़ों का भी करते हैं या लड़कियों का ही?

अल्ताफ़ : सबका करते हैं।

रिपोर्टर : जो भी आ जाए?

अल्ताफ़ : जो भी आता है, चाहे इसाई हो, यहूदी हो, ईरानी हो। अभी मैंने एक ईसाई का किया है, बेंगलूरु में। उसने कम-से-कम मेरे ऊपर एक लाख रुपये ख़र्च किया है।

रिपोर्टर : तो अपने कितने धर्मांतरण करवा दिये होंगे अभी तक?

अल्ताफ़ : 300 से ज़्यादा।

 

अल्ताफ़ ने कहा कि उत्तर प्रदेश में उस लव जिहाद क़ानून के कारण उन्होंने लोगों को धर्म बदलने के अपने काम को अस्थायी रूप से बन्द कर दिया है।

रिपोर्टर : तो कन्वर्जन किस टाइप (तरह) का कराते हैं?

अल्ताफ़ : मुसलमान बनाता हूँ।

रिपोर्टर : अच्छा! हिन्दू से?

अल्ताफ़ : अभी लव-जिहाद का चक्कर चल रहा है अभी, इसलिए थोड़ा-सा रुक गया हूँ अभी। मेरा काम वही है। उसी से मैं अपना घर भी चलाता हूँ; मदरसा भी।

 

यह बात भी सामने आयी कि अल्ताफ़ को अपने मदरसे के लिए दक्षिण अफ्रीका और दुबई से काला धन लेने में कोई दिक़्क़त नहीं है।

रिपोर्टर : मेरी एक बात समझ लीजिए। वो बैंक के थ्रू (ज़रिये) नहीं देना चाह रहा है।

अल्ताफ़ : कोई बात नहीं।

रिपोर्टर : उनका वो लीगल मनी (वैध मुद्रा) नहीं है।

अल्ताफ़ : ठीक है।

रिपोर्टर : जैसे वो ब्लैक मनी होता है न! उस टाइप का है। तो वो बैंक के थ्रू देना नहीं चाह रहे हैं। वो देना इंडिया में, रहते वो साउथ अफ्रीका में हैं।

अल्ताफ़ : इंडिया में देना चाह रहे हैं न?

रिपोर्टर : और एक दुबई में, तो उस पैसे को आप विदेशी मुल्क से हिन्दुस्तान मैं कैसे लाओगे?

अल्ताफ़ : हम जाकर आएँगे न! हम कोई रास्ता निकालेंगे।

रिपोर्टर : आप ऐसे कोई पैसा थोड़े ही लाएँगे; हवाई जहाज़ में। पकड़े जाओगे कस्टम में पकड़े जाओगे।

अल्ताफ़ : कितना पैसा देंगे?

रिपोर्टर : इंडिया के हिसाब से होगा 10-20 लाख रुपये।

अल्ताफ़ : कुछ नहीं होता, 10-20 लाख रुपये। आप क्या समझ रहे हो? करोड़ रुपये भी देगा, तो हम लेकर आएँगे।

रिपोर्टर : तो आप कैसे लाओगे, तरीक़ै तो बता दो?

अल्ताफ़ : उसका तरीक़ा तो साथ-की-साथ बताएगा। …जो हमारे आदमी हैं, वो उनसे मशविरा लेंगे। …देखिए बिजनेस है उनका। इमरान है थाईलैंड में, उसका वो लडक़ी लेकर आया निकाह पढ़ा मैंने। वो पूरी दुनिया में जाता है, बिजनेस करने जींस-पैंट्स का। वो ऐसा ताना-बाना बुनेगा। अपना बिजनेस दिखाकर लेकर आएगा।

धर्मांतरण पर ‘तहलका’ के सच की जाँच पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान डॉ. मौलाना मक़सूद-उल-हसन क़ासमी ने इस्लाम में शादी के लिए धर्मांतरण को अवैध बताया। उनके अनुसार, इस्लाम शादी के लिए धर्मांतरण का समर्थन नहीं करता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई अपनी मर्ज़ी से बिना किसी जबरदस्ती के अपनी शादी से पहले इस्लाम में परिवर्तित हो गया है, तो यह इस्लाम में क़ानूनी है। लेकिन अगर कोई सिर्फ़ शादी के लिए धर्मांतरित हो रहा है और वह भी शादी से कुछ दिन पहले, तो ऐसा कृत्य ग़ैर-इस्लामी और देश के क़ानून के ख़िलाफ़ है। ‘तहलका’ की जाँच के दौरान मुक़ीम और अल्ताफ़ ने जो कहा, उस पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना मक़सूद ने कहा- ‘ऐसे लोग पागल होते हैं। उन्हें इस्लाम का कोई ज्ञान नहीं है। और ये ख़ुद को मौलवी कहते हैं।’

एक अन्य प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान ख़ालिद सलीम ने ‘तहलका’ के ख़ुलासे पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा- ‘ऐसे लोग, जो इस्लाम में धर्मांतरण से इनकार करने वाली महिलाओं को मारने की बात करते हैं और इस्लाम को नापसन्द करने पर उनके सिर को काटने की बात करते हैं, तो उन्हें तुरन्त जेल भेज देना चाहिए। वे न केवल ग़ैर-इस्लामी हैं, बल्कि देश-विरोधी भी हैं। इस्लाम शान्ति का धर्म है। यह किसी भी रूप में हिंसा का समर्थन नहीं करता है।

धर्मांतरण के ख़तरे

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने जबरन धर्मांतरण को जब राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाला बहुत गम्भीर मामला बताया, तो उसने एक बार फिर धर्मांतरण विरोधी क़ानूनों को सुर्ख़ियों में ला दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की माँग वाली एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि संविधान के तहत धर्मांतरण क़ानूनी है। लेकिन जबरन धर्मांतरण की अनुमति नहीं है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि हिन्दू जल्द ही हमारे अत्यधिक आबादी वाले देश की आबादी का एक छोटा हिस्सा बन जाएँगे। संविधान में धर्म की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान की गयी है। फिर भी दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगे, कश्मीर में 1990 के हिन्दू विरोधी दंगे, 2002 के गुजरात दंगे और 2008 के ईसाई विरोधी दंगे हुए।

‘तहलका’ की विशेष जाँच टीम (एसआईटी) की इस बार की आवरण कथा ‘धर्मांतरण में क्रूरता’ से पता चलता है कि कैसे कुछ मौलवियों ने लोगों का धर्मांतरण करने और अंतर्धार्मिक विवाह का मार्ग प्रशस्त करने के लिए धर्मांतरण विरोधी क़ानून के बावजूद चोरी-छिपे एक रास्ता खोज लिया है। ‘तहलका’ के एसआईटी पत्रकार ने उत्तर प्रदेश की एक मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद मुक़ीम से सम्पर्क किया और ख़ुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में ज़ाहिर किया, जो अपने काल्पनिक मुस्लिम भतीजे द्वारा एक हिन्दू लडक़ी से शादी करने को लेकर जानकारी चाह रहा था। उसने सारी बातचीत को छिपे कैमरों में रिकॉर्ड कर लिया। इमाम ने कहा कि हिन्दू लडक़ी से शादी करने से पहले उसका इस्लाम में धर्मांतरण करें। शादी के बाद अगर लडक़ी कहे कि वह इस्लाम छोडक़र वापस हिन्दू धर्म में जाना चाहती है, तो पहले विनम्रता से ऐसा न करने के लिए कहें। और अगर वह न माने, तो उसके मुँह पर तमाचे मारें। उसे इस तरह से मारें कि इससे कोई बाहरी चोट न लगे और न ही हड्डी टूटे। यदि आप घरेलू हिंसा के लिए पुलिस कार्रवाई से बचना चाहते हैं, तो आपको अपनी हिन्दू पत्नी के शरीर पर हिंसा का कोई सुबूत नहीं छोडऩा चाहिए। इसी तरह एसआईटी रिपोर्टर ने उत्तर प्रदेश की ही एक मस्जिद के मौलाना अल्ताफ़-उर-रहमान के सामने भी अपने काल्पनिक भतीजे की हिन्दू लडक़ी से शादी की बात रखी, तो निकाह के बाद इस्लाम $कुबूल न करने पर मौलाना ने क़ाग़ज़ी द्वारा लडक़ी का सिर क़लम कराने तक को कहा।

कुछ समय पहले एक प्रमुख इस्लामिक विद्वान मौलाना कलीम सिद्दीक़ी और आठ अन्य को उत्तर प्रदेश आतंकवाद विरोधी दस्ते ने सबसे बड़ा धर्मांतरण सिंडिकेट चलाने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। सिद्दीक़ी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख मौलवियों में से एक हैं और ग्लोबल पीस सेंटर के साथ-साथ जामिया इमाम वलीउल्लाह ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं। एटीएस ने दावा किया था कि ट्रस्ट को बहरीन से 1.5 करोड़ रुपये सहित विदेशी फंडिंग में तीन करोड़ रुपये मिले थे। ये लोग शादी, पैसा, रोज़गार जैसे प्रलोभनों के माध्यम से रैकेट चलाते थे।

अब कुछ राज्यों ने विवाह के उद्देश्य से धर्मांतरण रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी क़ानून बनाये हैं, जबकि सभी राज्यों ने ताक़त, धोखाधड़ी, लालच या धन प्रलोभन से धर्मांतरण कराने पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालाँकि क़ानून गोपनीय तरीकों में काम नहीं कर सकते हैं। लेकिन धर्म व अंतरात्मा की स्वतंत्रता को नकारने वाले प्रेरित धार्मिक सिद्धांतों, जबरदस्ती और प्रलोभनों की जाँच करने की आवश्यकता है। ‘तहलका’ द्वारा सच की जाँच पर पहले से ही प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान डॉ. मौलाना मक़सूद-उल-हसन क़ासमी और खालिद सलीम ने इस्लाम में शादी के लिए धर्मांतरण को अवैध बताया और उन लोगों को फटकार लगायी, जो इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर महिलाओं से हिंसा करने का प्रचार करते हैं।

विधानसभा चुनाव, नतीजों पर नज़र

गुजरात और हिमाचल के चुनावों का है राष्ट्रीय महत्त्व

गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर देश भर की निगाह है। दोनों राज्यों के चुनावी नतीजे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों और 2024 में होने वाले लोकसभा के चुनाव पर असर डालने की क्षमता रखते हैं। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

राष्ट्रीय राजनीति पर असर डालने की क्षमता रखने वाले गुजरात के विधानसभा चुनाव में पहले दौर का मतदान हो गया है। मतदान प्रतिशत को लेकर अनुमान लगने शुरू हो गये हैं। हालाँकि 5 दिसंबर को दूसरे दौर का मतदान अभी बाक़ी है। केंद्र और गुजरात दोनों में सत्ता में बैठी भाजपा ने जिस पैमाने पर गुजरात के चुनाव में इस बार प्रचार में केंद्रीय नेतृत्व को झोंका, उससे दो संकेत मिलते हैं। एक यह कि भाजपा गुजरात में इस बार ख़ुद के लिए चुनौती को गम्भीर मान रही है। और दूसरा यह कि हिमाचल में उसे सत्ता खोने की आशंका है। लिहाज़ा गुजरात में वह अधिकतम सीटें लेकर इसकी भरपाई करना चाहती है, ताकि जनता में उसकी लोकप्रियता घटने जैसा कोई संकेत न जाए। सही मायने में साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात और हिमाचल के नतीजों का अपना राजनीतिक महत्त्व होगा।

वादों की भरमार

पहले चरण के मतदान से एक हफ़्ता पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब चुनाव प्रचार के बीच यह कहा कि ‘2002 में कुछ लोगों को सबक़ सिखा दिया गया था’, तो काक़ी लोगों ने इस बयान को राज्य के चुनाव में हिन्दू मतदाता के ध्रुवीकरण की कोशिश से जोडक़र देखा। इसके एक दिन बाद ही एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रया आ गयी। भाजपा यही चाहती थी कि इस पर प्रतिक्रिया आये। आमतौर पर धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश यह संकेत करती है कि भाजपा अन्य मुद्दों के आधार पर जनता को लुभा नहीं पा रही है; लिहाज़ा यह कार्ड खेल रही है। शाह का कहना मायने रखता है, क्योंकि यह उनका गृह राज्य है और वे जनता की नब्ज़ बेहतर समझते हैं।

शाह ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचार के दौरान जनता से भावुक संवाद करते दिखे। उन्होंने एक से ज़्यादा बार यह कहा कि विपक्ष के लोग उन्हें गालियाँ देते है और उनके लिए घटिया शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा कहकर मोदी की कोशिश निश्चित ही अपने प्रति जनता की सहानुभूति लेना था। उनकी यह कोशिश इसलिए हैरानी भरी है कि भाजपा गुजरात ही नहीं देश के अन्य चुनावों में भी मोदी की छवि के भरोसे ही चुनाव जीतने की कोशिश करती है। पार्टी में उनके समर्थक इसे मोदी की विराट छवि बताते हैं, जिसके आगे, बक़ौल उनके, विपक्ष का कोई नेता नहीं ठहरता।

मतदाता पर अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए भाजपा ने अपना चुनाव घोषणा पत्र (संकल्प पत्र) भी सबसे आख़िर में मतदान से एक हफ़्ता पहले 26 नवंबर को जारी किया। कांग्रेस ने महीने के शुरू में ही घोषणा पत्र जारी कर दिया था, जबकि आम आदमी पार्टी ने भी महीने के बीच में ऐसा कर दिया था। भाजपा ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का वादा किया है, जिसे ध्रुवीकरण की कोशिश कह सकते हैं।

राज्य में सभी दलों के घोषणा पत्रों में वादों की भरमार है। हज़ारों-हज़ार करोड़ के वादे हैं। यह दल इसके लिए पैसा कहाँ से जुटाएँगे, इसका कोई ज़िक्र नहीं है। कांग्रेस की ग्रामीण गुजरात में पकड़ को देखते हुए किसान मुद्दों पर फोकस रखा गया है, जबकि आम आदमी पार्टी के लोक-लुभावन वादों की काट की कोशिश भी की गयी है।

अमित शाह का दावा है कि भाजपा इस चुनाव में पहले से कहीं ज़्यादा बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटेगी और यह भी कि पार्टी का मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस के साथ है। आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल तो बार-बार अपनी पार्टी की सरकार बनने का दावा कर चुके हैं। यहाँ तक कि किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी, इसका दावा भी केजरीवाल कर चुके हैं। शान्त दिख रही कांग्रेस के नेताओं के सरकार बनाने के दावों वाले इक्का-दुक्का बयान ही आये। कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी रही जिसने सरकार बनाने को लेकर वादों की जगह ज़मीन पर लगातार लोगों तक पहुँचने पर ज़्यादा ध्यान दिया।

भाजपा की चुनावी फ़ौज

इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा के पास पैसे के साथ-साथ केंद्रीय सत्ता की भी ताक़त है और उसने बिना किसी हिचक के साथ केंद्रीय मंत्रियों से लेकर अपने मुख्यमंत्रियों तक को एक महीने तक प्रचार में झोंके रखा। अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के अलावा पार्टी के अन्य बड़े नेता तो ख़ैर मैदान में थे ही। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बहुत सघन प्रचार किया। दोनों ने केंद्रीय स्तर पर अपनी व्यस्तताओं के बावजूद जितना वक़्त चुनाव के लिए निकाला, उतना पहले कभी नहीं देखा गया था।

आमतौर कभी भी देश के प्रधानमंत्री मोदी अपनी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय व्यस्तताओं के चलते किसी राज्य के चुनाव में इतना समय नहीं देते; लेकिन इस बार मोदी कमोबेश हर हफ़्ते गुजरात का चुनावी दौरा करते दिखे। कई बार तो हफ़्ते में दो बार भी। अमित शाह को लेकर तो यह कहा जा सकता है कि गुजरात के चुनाव प्रबंधन का सारा ज़िम्मा उन्होंने ही देखा। रणनीति बुनने से लेकर विपक्ष के ख़िलाफ़ मुद्दों को उठाने तक। कांग्रेस के लिए पार्टी के सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी पहले चरण तक सिर्फ़ एक बार गुजरात आये। उनके अलावा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ज़रूर ख़ूब सक्रिय दिखे। कांग्रेस के एक बड़े नेता ने ‘तहलका’ को बताया- ‘गुजरात में राहुल गाँधी का नहीं आना इस चुनाव को मोदी बनाम राहुल बनाने से बचाना था। राहुल जी और कांग्रेस की नज़र 2024 पर है। पार्टी उसी रणनीति पर काम कर रही है।’

बड़े चेहरे के तौर पर आम आदमी पार्टी का प्रचार अरविन्द केजरीवाल के कन्धों तक सीमित रहा। हालाँकि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी भूमिका निभायी। भाजपा ने जिस बड़े स्तर पर अपने नेताओं को प्रचार में झोंका, उससे यह तो साबित हो जाता है कि वह दोनों विपक्षियों कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का दबाव महसूस कर रही थी। उसकी रणनीति प्रचार को इस तरीक़े से चलाने की रही कि चुनाव में पडऩे वाले वोटों का बँटवारा समान रूप से न हो। शाह जानते हैं कि ऐसा होने पर किसी भी पार्टी की लॉटरी निकल सकती है।

पिछले चुनाव की बात

गुजरात में सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में भले भाजपा ने सबसे ज़्यादा 99 सीटें जीती थीं; लेकिन एक सच यह भी था कि उस चुनाव में सात ऐसे ज़िले थे, जिनमें भाजपा एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। उस चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 41.4 था, जिसे मज़बूत कहा जाएगा। अमरेली, नर्मदा, डांग्स, तापी, अरावली, मोरबी और गिर सोमनाथ ज़िलों में भाजपा का खता तक नहीं खुला था। उस चुनाव में कांग्रेस ने बेशक भाजपा से 22 सीटें कम (77 सीटें) जीती थीं; लेकिन उसे सिर्फ़ दो ज़िलों में $खाली हाथ रहना पड़ा था। यह ज़िले पंच महल और पोरबंदर थे, जिन्हें भाजपा का गढ़ माना जाता है।

गुजरात के कुल 33 में 13 ज़िलों में भाजपा को कांग्रेस से, जबकि 15 ज़िलों में कांग्रेस को भाजपा से ज़्यादा सीटें मिली थीं। पाँच ज़िलों में टक्कर बराबर की रही थी। अहमदाबाद में सबसे ज़्यादा 21 सीटें हैं, जबकि सूरत 16 और वडोदरा 10 दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। इन ज़िलों में अहमदाबाद में 15, सूरत में 15 और वडोदरा में 10 सीटें भाजपा ने जीती थीं। नौ सीटों वाले बनासकांठा और 8 सीटों वाले राजकोट ज़िले में भाजपा को 64 में से 47, जबकि कांग्रेस को सिर्फ़ 16 सीटें ही मिली थीं। यहीं कांग्रेस मार खा गयी थी और उसकी सरकार नहीं बन पायी थी।

गुजरात की कुल 182 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस के अलावा बची छ: सीटें निर्दलीय और अन्य ने जीती थीं। यह कहा जा सकता है कि भाजपा उस चुनाव में संकट में फँस गयी थी। गुजरात राजनीतिक रूप से चार मुख्य भागों में बँटा है। एक मध्य गुजरात, जिसमें सबसे ज़्यादा 61 सीटें आती हैं। दूसरा सौराष्ट्र और कच्छ का हिस्सा है, जिसमें 54 सीटें हैं। तीसरे नंबर पर 35 विधानसभा सीटों वाला दक्षिण गुजरात है; जबकि चौथा उत्तर गुजरात है, जहाँ 32 सीटें हैं।

भाजपा ने सबसे ज़्यादा प्रभाव मध्य गुजरात में दिखाया था, जिसकी 61 में 37 सीटें उसकी झोली में गयी थीं; जबकि 22 सीटें कांग्रेस के खाते में। इस बार मध्य गुजरात में भाजपा अपनी इस बढ़त को बनाये रखने के लिए मेहनत करती दिखी है। वैसे मध्य गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा जैसे ज़िले भाजपा की मज़बूत पकड़ वाले ज़िले हैं। भाजपा ने दूसरी बड़ी जीत दक्षिण गुजरात में हासिल की थी। वहाँ की 35 में से 25 सीटों पर भाजपा जीत गयी थी, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ़ आठ सीटें ही आयी थीं।

कांग्रेस का सबसे बेहतर प्रदर्शन कच्छ-सौराष्ट्र में दिखा था, जहाँ 54 में 30 सीटें उसने जीत ली थीं। भाजपा को 23 सीटें मिली थी। दक्षिण गुजरात कांग्रेस की कमज़ोर नस रही है, हालाँकि इस बार कांग्रेस ने घर-घर पार्टी की योजनाओं और भाजपा की नाकामियों वाली चिट्ठी भेजने का काम यहाँ ख़ूब किया है। जहाँ तक उत्तर गुजरात की बात है, वहाँ भाजपा और कांग्रेस में जबरदस्त भिड़ंत दिखी थी। कुल 32 में 17 सीटें कांग्रेस के, तो 14 सीटें भाजपा के खाते में गयी थीं। कांग्रेस समर्थित निर्दलीय जिग्नेश मेवाणी भी इसी क्षेत्र से जीते थे। सौराष्ट्र का राजकोट, जिससे कांग्रेस को काक़ी उम्मीद थी; में कांग्रेस मनमाफिक सीटें नहीं जीत पायी थी। कुल मिलाकर इस चुनाव में केजरीवाल कांग्रेस के वोटों पर नज़र गढ़ाये वैठे हैं।

हिमाचल में भाजपाई शान्त, कांग्रेसी उत्साहित

गुजरात के विपरीत आम आदमी पार्टी ने नतीजों से पहले ही मान लिया है कि हिमाचल प्रदेश में उसकी दाल नहीं गलने वाली। न तो चुनाव के बाद प्रदेश से आम आदमी पार्टी के किसी नेता ने दिल्ली जाकर नेतृत्व को फीडबैक देने की ज़हमत की और न नेतृत्व ने इसके बारे में जानने की कोई कोशिश की। यही नहीं, पहाड़ी राज्य में वोट पड़े तीन हफ़्ते हो गये; लेकिन भाजपा के नेता भी शान्त बैठे हैं। भाजपा ने अपने स्तर पर फीडबैक लिया; लेकिन कहते हैं कि वे उत्साहजनक नहीं है। उधर कांग्रेस के एक के बाद एक बड़े नेता दिल्ली जाकर आ गये। आलाकमान को चुनाव का फीडबैक दे आये। और लगे हाथ अपने-अपने तरीक़े से मुख्यमंत्री बनने का दावा भी जता आये।

क्या हिमाचल में कांग्रेस के नेता अति उत्साह में हैं या ज़मीनी स्थिति कांग्रेस के हक़ में दिख रही है? इसका जवाब तो 8 दिसबंर को मतगणना पर हई लगेगा; लेकिन अन्दर की ख़बर यह है कि भाजपा का अपना गुना-भाग उसकी बड़ी हार दिखा रहा है। कांग्रेस में अभी से मुख्यमंत्री पद का घमासान शुरू हो गया है। एक-दो नहीं आध दर्ज़न वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। यह भी हो सकता है कि इनकी लड़ाई में कहीं पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह की लॉटरी न लग जाए।

प्रतिभा सिंह दिल्ली जाकर आयी हैं। अपने विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह को भी साथ ले गयी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से लेकर अन्य नेताओं तक मिलकर आयी हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री, जिन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है, भी कुछ दिन तक दिल्ली में रहे। हाल के महीनों में जी-23 के साथ रहे आठ बार के विधायक कौल सिंह कहाँ पीछे रहते। वह भी दिल्ली में अपना दावा संकेतों में कर आये। कौल सिंह इन सभी दावेदारों में सबसे वरिष्ठ हैं। मुकेश अग्निहोत्री पिछले पाँच साल तक कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे हैं और बतौर नेता प्रतिपक्ष उनका काम अच्छा रहा है। भाजपा सरकार को हर मौक़े पर उन्होंने विधानसभा के भीतर और बाहर घेरा है। चार विधानसभा चुनाव जीत चुके मुकेश पत्रकार से नेता बने हैं और प्रदेश कांग्रेस में उन्हें सबसे सक्रिय माना जाता है। कौल सिंह वर्तमान दावेदारों में सबसे वरिष्ठ हैं। प्रदेश कांग्रेस रहने के अलावा कई बार मंत्री रह चुके हैं। कहा जा सकता कि सबसे अनुभवी वही हैं। अब तक आठ चुनाव उन्होंने जीते हैं। हालाँकि पिछली बार हार गये थे। अगर वरिष्ठता को पैमाना बनाया गया, तो सिंह मुख्यमंत्री बन सकते हैं।

अभी तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री पद का गम्भीर दावेदार नहीं माना जा रहा था। लेकिन यदि इस पद के लिए ज़्यादा दावेदार हुए, तो उनका रास्ता भी बन सकता है। प्रतिभा सिंह तीन बार की सांसद हैं और कुछ महीने पहले हुए उपचुनाव में उन्होंने मंडी की वह लोकसभा सीट भाजपा से छीन ली थी, जो उसने सन् 2019 में चार लाख के अन्तर से जीती थी। दिवंगत वीरभद्र सिंह के साथ रहे काक़ी विधायक अभी भी प्रतिभा सिंह का समर्थन करते हैं। वरिष्ठ विधायक आशा कुमारी भी इस पद की बड़ी दावेदार हैं। एआईआईसी की सचिव रहीं आशा पंजाब की प्रभारी रही हैं और आलाकमान में उनकी पैठ है। हालाँकि वह कभी प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहीं; लेकिन प्रदेश सरकार में मंत्री रही हैं। पिछले पाँच चुनाव उन्होंने जीते हैं। हालाँकि सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में वह 556 मतों के अन्तर से ही जीतीं थीं; लेकिन समर्थकों को उम्मीद है कि इस बार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में होने के कारण उनके पक्ष में जमकर मतदान हुआ है। हमीरपुर से ताल्लुक़ रखने वाले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह ‘सुक्खू’ मुख्यमंत्री पद की दौड़ को ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं’ की तरह ले रहे हैं। लिहाज़ा दिल्ली में अपने सम्पर्कों को सक्रिय किये हुए हैं। उन्होंने भी जनता से भविष्य के मुख्यमंत्री कहकर ही वोट माँगे थे। इन नेताओं के अलावा पूर्व सांसद और मंत्री ओबीसी नेता चौधरी चंद्र कुमार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर, हर्षवर्धन सिंह, कर्नल धनी राम शांडिल और राजेंद्र राणा भी दौड़ में हैं।

यह माना जा रहा है कि यदि भाजपा जीती, तो सबसे बड़े दावेदार मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ही होंगे। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का नाम भी हमेशा सुर्ख़ियों में रहता है। उन्हें पिछले काक़ी समय से हिमाचल का भावी मुख्यमंत्री माना जाता है। इस बार अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को टिकट न मिलने के कारण वह भावुक दिखे। हालाँकि उन्होंने जमकर प्रचार में हिस्सा लिया। वैसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का नाम भी राजनीतिक गलियारों में सुना जाता है। हालाँकि फ़िलहाल तो इसकी सम्भावना कम ही दिखती है।

उत्तर प्रदेश में करोड़ों का घोटाला!

चीनी मिलों के आवंटन बजट में योगी की शून्य भ्रष्टाचार योजना को लगाया जा रहा पलीता

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शून्य भ्रष्टाचार योजना को पलीता कैसे लगाया जाता है और क़ायदे-क़ानून की धज्जियाँ कैसे उड़ायी जाती हैं, इसका यदि जीता-जागता कोई उदाहरण देखना हो, तो यह आपको उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ में देखने को मिल जाएगा।

यहाँ भाजपा की सरकार के विगत छ: वर्षों के कार्यकाल में चाहे नियुक्तियों की जाँच हो या फिर चाहे चीनी बिक्री घोटाला, चीनी निर्यात घोटाला हो, चाहे भ्रष्टाचार में लिप्त सेवानिवृत्त अधिकारियों को संविदा पर रखकर चीनी तथा शीरा विक्रय कराने का कार्य, चीनी मिलों के अपग्रेडेशन का घोटाला हो, चाहे शून्य तरल निर्वहन (ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज) के नाम पर भट्टियों (डिस्टिलरीज) में हुआ घोटाला हो, या फिर नयी चीनी मिल परियोजना में हुआ घोटाला हो, आज तक किसी भी प्रकरण की सही जाँच नहीं होने के कारण सारे घोटाले चीनी मिल संघ की फाइल में ही दबे हुए हैं। संघ के अधिकारी सरकार की जीरो भ्रष्टाचार पॉलिसी की धज्जियाँ उड़ाते हुए मलाई खाने और अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश की सहकारी चीनी मिल संघ में केंद्रीय क्रय एवं आवंटन बजट में करोड़ों के घोटाले की ख़बरें आ रही हैं। प्रधान प्रबंधक क्रय तथा प्रधान प्रबंधक तकनीकी के पद एक ही अधिकारी के पास होने से करोड़ों के घोटाले की आशंका जतायी जा रही है। ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश की सहकारी चीनी मिलों के मरम्मत तथा रख-रखाव के तकनीकी बजट आवंटन में भी करोड़ों के वारे-न्यारे किये जा रहे हैं। बताते हैं कि अपर मुख्य सचिव गन्ना तथा प्रबंध निदेशक के चहेते अधिकारी प्रधान प्रबंधक तकनीकी एवं क्रय विनोद कुमार के पास कुल चार प्रमुख प्रधान प्रबंधक का प्रभार और सभी तकनीकी पाँच विभागों का प्रभार में से तीन विनोद कुमार के अधीन हैं।

ख़बरों के मुताबिक, ताज़ा घोटाला केंद्रीय क्रय पद्धति के अंतर्गत तक़रीबन सभी सहकारी चीनी मिलों की मरम्मत के लिए ख़रीदे जाने वाले सामानों की दर संविदा जारी करने में प्रकाश में आया है। इसमें विगत कई वर्षों से प्रधान प्रबंधक क्रय तथा प्रधान प्रबंधक तकनीकी के दोनों पदों पर जमे प्रधान प्रबंधक द्वारा पार्टियों से साँठ-गाँठ करके कई इंजीनियरिंग सामानों की दरें तय करने में एक और जहाँ करोड़ों रुपये का नुक़सान चीनी मिल संघ को पहुँचाया है। वहीं दूसरी ओर सप्लायर्स से करोड़ों रुपये की रिश्वत लेकर अपनी जेबें भरने का काम किया है। जानकारी के मुताबिक, विनोद कुमार ने करोड़ों की सम्पत्ति मेरठ तथा गुरुग्राम सहित अन्य जगहों पर भी है। अगर प्रधान प्रबंधक क्रय तथा प्रधान प्रबंधक तकनीकी के भ्रष्टाचार तथा आय से अधिक सम्पत्ति की निष्पक्ष जाँच सरकार करा ले, तो दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाएगा।

सूत्र बताते हैं कि प्रधान प्रबंधक क्रय तथा प्रधान प्रबंधक तकनीकी लगातार अपने भ्रष्ट कला कौशल के आधार पर सभी प्रबंध निदेशक के चहेते अधिकारी बने रहे हैं, जिसके कारण ही पिछली समाजवादी की अखिलेश सरकार में भी यह तत्कालीन प्रबंध निदेशक डॉ. बी.के. यादव के चहेते अधिकारी रहे तथा कई मलाईदार चीनी मिलों के प्रधान प्रबंधक भी रहे। बताते हैं कि सन् 2016 में सहारनपुर ज़िले की सहकारी चीनी मिल नानौता में प्रधान प्रबंधक रहते हुए इन्होंने तत्कालीन प्रबंध निदेशक के कहने पर मिल में लगभग 70 फ़र्ज़ी भर्तियाँ भी की थीं। इनकी कोई भी जाँच आज तक नहीं करायी गयी, जबकि हैरानी की बात है कि डॉ. बी.के. यादव के कार्यकाल में सहकारी चीनी मिल संघ में हुई भर्तियाँ की जाँच भी हुई, जिसमें भर्तियाँ को लखनऊ मंडल के आयुक्त ने फ़र्ज़ी पाया तथा सरकार द्वारा अब यही जाँच सीबीआई से करायी जा रही है। इन्होंने दोनों महत्त्वपूर्ण पद का प्रभार होने के कारण ई-टेंडर में इतनी सफ़ाई से तकनीकी शर्तों में मनमाने तरीक़े से सप्लायर्स से साँठगाँठ करके परिवर्तन किये, ताकि किसी अन्य अधिकारी को इसकी कोई जानकारी न हो पाए तथा टेंडर में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के दिशा निर्देशों के विपरीत कई इंजीनियरिंग सामानों में एल-1 के साथ-साथ एल-2, एल-3 की सभी पार्टियों को भी उनकी ही मूल्य सूची (प्राइस लिस्ट) पर विभिन्न छूटें (डिस्काउंट) दिखाकर दर संविदा जारी कर दी। इन आइटम में प्रमुख रूप से मिलों में भारी मात्रा में उपयोग होने वाले वेल्डिंग इलेक्ट्रोड, इलेक्ट्रिक आइटम, सेंट्रीफ्यूगल पम्प, मिलों में उपयोग होने वाली बियरिंग आदि है। इसका परिणाम यह हुआ कि मिलों द्वारा मनमाने तरीक़े से महँगा-महँगा सामान ख़रीदा गया, जिससे आवंटित बजट में वृद्धि हुई तथा मिलों को अनावश्यक घाटा उठाना पड़ा। प्रधान प्रबंधक क्रय तथा प्रधान प्रबंधक तकनीकी के पद पर बैठे अधिकारी ने पम्प की दर संविदा में सन् 2014 में निम्न गुणवत्ता के पम्प आपूर्ति करने वाली मेरठ ज़िले की फर्म अम्बा प्रसाद जैन को अम्बा मेक के पम्प को ई-टेंडर में भाग लेने पर रोक लगा दी थी तथा सभी चीनी मिलों को उच्च गुणवत्ता के पम्प ख़रीदने के निर्देश दिये गये थे। परन्तु प्रधान प्रबंधक तकनीकी एवं क्रय ने सन् 2018 में दोनों पदों का प्रभार लेकर बड़ी सफ़ाई से पुन: ई-टेंडर में अम्बा मेक के पम्प को शामिल कराकर अम्बा प्रसाद जैन की अपनी ही प्राइस लिस्ट पर छूट दिखाकर दर संविदा जारी करा दी। उसका प्रभाव यह हुआ कि सन् 2014 में संघ द्वारा जारी आदेश कि किर्लोस्कर कम्पनी के उच्च गुणवत्ता के पम्पों के स्थान पर चीनी मिलों में पुन: निम्न गुणवत्ता के अम्बा मेक के पम्प पार्टी द्वारा संघ तथा मिलों के अधिकारियों को भारी कमीशन देकर आपूर्ति करा दिये। यदि सन् 2018 से 2022 तक की मिलों को आपूर्ति पम्पों की निष्पक्ष जाँच हो, तो सारी स्थिति स्वयं ही साफ़ हो जाएगी। बहरहाल सहकारी चीनी मिल संघ में घोटाले और अनियमितता के सम्बन्ध में बात करने के लिए हमने उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी, गन्ना मंत्री के निजी सचिव, जन सम्पर्क अधिकारी, गन्ना आयुक्त एवं अपर मुख्य सचिव गन्ना से सम्पर्क साधने की कोशिश की, उनके द्वारा फोन नहीं उठाने पर उनके व्हाट्स ऐप नम्बर सवालों को भी भेजा गया; लेकिन क़रीब सप्ताह भर तक इंतज़ार करने के बाद भी इनमें से किसी का भी कोई जवाब हमें प्राप्त नहीं हुआ।

ख़बरों के मुताबिक, यह कम्पनी केवल सहकारी चीनी मिलों को ही निम्न गुणवत्ता के पम्प सप्लाई करती रही है। अधिकतर निजी चीनी मिलों का प्रशासन अम्बा मेक के पम्प नहीं ख़रीदता है। विभागीय कर्मचारियों की मानें, तो इस तथ्य की जानकारी किसी भी निजी चीनी मिलों के अधिकारियों से की जा सकती हैं। लेकिन प्रधान प्रबंधक तकनीकी एवं क्रय पर अपने चहेते सजातीय मेरठ के ही पम्प सप्लायर्स अम्बा प्रसाद जैन को हर साल एक करोड़ से ऊपर के निम्न गुणवत्ता के पम्पों का बिजनेस दिलवाकर लाखों रुपये कमीशन लेने की भी चर्चा है। इलेक्ट्रॉनिक सामानों में भी एलएंडटी तथा सीमेंस कम्पनी को ई-टेंडर में न बुलाकर दिल्ली की अपनी चहेती कम्पनी जेड (5द्गस्र) कंट्रोल को उनकी ही तीन टेंडर पर मनमाने तरीक़े से दर संविदा जारी करने की बात सामने आ रही है। विभागीय सूत्रों के दावे के मुताबिक, यदि वर्तमान प्रधान प्रबंधक तकनीकी एवं क्रय के कार्यकाल की क्रय सम्बन्धित सामानों की दर संविदा फाइनल करने की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जाँच शासन से करा ली जाए, तो इस जाँच में करोड़ों रुपये के घोटाले और गबन का पर्दाफाश हो जाएगा। विभागीय सूत्र यह भी बताते हैं कि सन् 2017 में भाजपा की योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अपर मुख्य सचिव, चीनी मिल उद्योग गन्ना विकास विभाग, संजय आर. भूसरेड्डी को प्रदेश के गन्ना विकास विभाग तथा चीनी मिलों के प्रबंधन की कमान सौंपी गयी।

 

ग़ौरतलब है कि उस समय तक चीनी मिल संघ द्वारा अपनी चीनी मिलों को मरम्मत हेतु अलग प्रारूप से वार्षिक तकनीकी बजट आवंटन करता था। भूसरेड्डी ने विभाग का प्रभार सँभालने के बाद सन् 2018 से निजी चीनी मिलों की भाँति मिलों के मरम्मत कार्यों हेतु चार रुपये प्रति कुंतल गन्ना पेराई पर बजट का निर्धारण कर दिया है, जिसमें बॉयलर तथा टर्बाइन की मरम्मत शामिल नहीं थी। लेकिन प्रधान प्रबंधक तकनीकी एवं क्रय ने संजय भूसरेड्डी द्वारा बनाये गये, तकनीकी बजट के फार्मूला को दर किनारे करके मनचाहे तरीक़े से रुपये आठ रुपये से 12 रुपये प्रति कुंतल की दर से बजट आवंटन करके मिलों के अधिकारियों से लाखों रुपये कमीशन के ले लिए।

कुछ जानकार बताते हैं कि इन्होंने बड़ी चालाकी से तकनीकी बजट आवंटन में हेरा-फेरी करके जिन मदों का बजट भूसरेड्डी के फार्मूले से रुपये चार प्रति कुंतल में होना चाहिए था, उसे मिल की आवश्यकता दिखाकर क्रिटिकल आइटम में स्वीकृत कर दिया। यहाँ तक की सामान्य मरम्मत के कई आइटम को तो कैपिटल आइटम दिखाकर स्वीकृत कर दिया, जबकि वो आइटम वास्तव में कैपिटल के न होकर मरम्मत के बजट के थे। इस प्रकार इस अधिकारी ने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने हेतु तथा अपनी जेबें भरने हेतु तकनीकी मरम्मत के बजट आवंटन में पिछले छ: वर्षों में भारी हेरा-फेरी की है। शासन के निर्देशों की खुली धज्जियाँ भी उड़ायी हैं। इसलिए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी के तहत इस मामले की तत्काल निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, ताकि करोड़ों के घोटाले का सच सामने आ सके।

हाल ही में मोहिउद्दीन (मोदीनगर) चीनी मिल में लगी भीषण आग मिलों में भ्रष्टाचार का एक और सुबूत है। इस चीनी मिल में प्रधान प्रबंधक के पद पर एक सेवानिवृत्त रसायनविद् को नियुक्त हैं। हैरानी की बात है कि चीनी मिल में लगी आग की भनक मिल के अधिकारियों को तब लगी, बड़ा नुक़सान हो गया। इस हादसे में कई सवाल उठ रहे हैं। एक रसायनविद् को सेवानिवृत्ति के बावजूद दो पद ऊपर कैसे बतौर प्रधान प्रबंधक रखा गया? उन्हें कौन-से नियमों के तहत वित्तीय अधिकार दिये गये? समय-समय पर चीनी मिल की तकनीकी जाँच क्यों नहीं हुई? इस आग से कितना नुक़सान हुआ? क्या पॉवर प्लांट की मरम्मत के बाद यह पेराई सत्र शुरू हो सकेगा? मिल की तकनीकी मरम्मत किसके ज़िम्मे थी? इस भ्रष्टाचार की जाँच कब होगी? इन सवालों के जवाब शायद तब मिल सकें, इस जाँच में स्थानीय किसानों को भी प्रतिनिधि के रूप में शामिल किया जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

क्या लापरवाही के चलते हुआ एम्स का डेटा चोरी?

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली में स्थित देश के सबसे बड़े केंद्रीय अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के ऑनलाइन सिस्टम से चार करोड़ मरीज़ों का डेटा चोरी होना अब तक की डेटा चोरी की सबसे बड़ी घटना है। इस साइबर अटैक पर केंद्र सरकार को गम्भीर होना चाहिए। हालाँकि डेटा चोरी की देश की इस सबसे बड़ी घटना की जाँच में सीबीआई, एनआईसी, आईबी, जीआरडीओ और दिल्ली पुलिस की टीमें लगी हुई हैं। साथ ही सावधानी बरतने के लिए एम्स में सारा काम पुराने समय की तरह ऑफलाइन हो रहा है, जिससे मरीज़ों को धीमी गति जैसी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एम्स के एक कर्मचारी ने बताया कि एम्स में कभी डेटा चोरी नहीं हुई, यह पहली घटना है। तेज़ी से मामले की जाँच हो रही है, जिसकी सही जाँच के लिए कई दिनों तक एम्स का सर्वर बन्द रखा गया। सवाल यह उठता है कि क्या एम्स से इतनी बड़ी डेटा चोरी सीधे तौर पर लापरवाही का नतीजा है?

विदित हो कि कुछ ही दिन पहले एम्स में अचानक साइबर अपराधियों ने चार करोड़ मरीज़ों का डेटा चोरी कर लिया। इस घटना मे एम्स में इलाज करा चुके कई पूर्व प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों, उपराष्ट्रपतियों, सोनिया गाँधी, कई नेताओं, सांसदों और विधायकों समेत कई बड़े अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और आम लोगों का डेटा भी चोरी हुआ है। आननफानन में इस मामले की जाँच के लिए सेंट्रल क्राइम ब्रांच, नेशनल इंफार्मेटिक सेंटर, इंटेलिजेंट ब्यूरो, डिफेंस रिसर्च एंड डवलपमेंट आर्गेनाइजेशन, दिल्ली पुलिस और इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स को तत्काल प्रभाव से जाँच में लगा दिया गया। मेडिकल सेक्टर में हुई अब तक की सबसे बड़ी डेटा चोरी में नेशनल साइबर के अतिरिक्त इंटरनेशनल साइबर क्राइम के कनेक्शन का हाथ होने की भी आशंका जतायी जा रही है। जाँच एजेंसियाँ इसे रैंसमवेयर अटैक मान रही हैं और एम्स के ऑनलाइन सेंट्रलाइज्ड सिस्टम से जुड़े कंप्यूटर्स को खंगाल रही हैं। जाँच एजेंसियाँ साइबर एक्सपर्ट और सॉफ्टवेयर इंजीनियर डेटा हैक के सोर्स और रिसीवर की तलाश में जुटी हैं और फ़िलहाल अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गयी है। एम्स के दो सिस्टम एनालिस्ट को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

सवाल यह है कि जब देश में डेटा चोरी की घटनाएँ आम हो चली हैं और इस मामले को लेकर सरकार को भी अच्छी तरह पता कि देश के नागरिकों का डेटा चोरी हो रहा है, तो फिर लापरवाही क्यों बरती गयी? फेसबुक डेटा लीक होने के बाद से विश्व के कई देशों ने फेसबुक पर प्रतिबंध लगा दिया। कई देश अपने नागरिकों के डेटा को सुरक्षित करने के लिए निगरानी रख रहे हैं, तो भारत सरकार अपने नागरिकों को लेकर इतनी लापरवाह क्यों है? कई बार डेटा आधार से लिंक होने को लेकर सवाल उठाये जा चुके हैं। क्या भारत सरकार देश के नागरिकों की निजता को सँभालने में नाकाम है? या फिर चोरी हुए चार करोड़ के डेटा का इस्तेमाल मिलीभगत से कहीं हो रहा है? विशेषज्ञ तो यह तक मानते हैं कि स्मार्ट फोन उपभोक्ताओं को सबसे ज़्यादा ख़तरा है।

किसी भी व्यक्ति के डेटा की पूरी जानकारी ऐप कम्पनियों, व्हाट्स ऐप, फेसबुक आदि को होती है। ये कम्पनियाँ उस डेटा को थर्ड पार्टी तक पहुँचाने के गम्भीर आरोपों से घिर चुकी हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय भी संज्ञान ले चुका है; लेकिन अभी तक भारत सरकार की नींद नहीं टूटी है। एक अध्ययन के अनुसार, स्मार्ट फोन में चलने वाले 70 $फीसदी से अधिक ऐप स्मार्ट फोन के उपभोक्ताओं की जानकारी ये ऐप कम्पनिया थर्ड पार्टी को बेच रही हैं। थर्ड पार्टी इस डेटा का इस्तेमाल फ़र्ज़ी लाइक्स बेचने, लोन लेने, व्यक्ति की अपनी निजी और गोपनीय जानकारी चुराने, बैंक से पैसे उड़ाने, व्यक्ति के निजी जीवन पर नज़र रखने, मोबाइल में चल रही गतिविधियों पर नज़र रखने, अंडरवर्ड और आतंकवादी संगठनों तक जानकारी पहुँचाने तक का काम कर सकती हैं। इसलिए जिन लोगों ने एम्स में कभी अपना रजिस्ट्रेशन कराया हो, वे गैर-ज़रूरी ऐप एक्सेस डिसेबल करें। दो ईमेल आईडी रखें। बैंक कम्यूनिकेशन वाले आईडी को मोबाइल से कनेक्ट न करें। साइबर कैफे या किसी अन्य के कम्प्यूटर पर अपने डाक्यूमेंट न रखें।

बढ़ते जा रहे ठगी के मामले, बेरोज़गारों से लेकर आम लोग तक हो रहे ठगी का शिकार

कोई युवा बेरोज़गार हो, तो उसे दिन-रात एक ही चिन्ता सताती रहती है कि किसी भी तरह से उसकी नौकरी लग जाए। लेकिन दुर्भाग्य से नौकरी पाने की इच्छा रखने वाले बेरोज़गार युवाओं में बड़ी संख्या में ठगी का शिकार हो जाते हैं। ठगों द्वारा नौकरी दिलाने के झाँसे में आने वालों में विदेशों में नौकरी पाने के नाम पर ठगी का ज़्यादा युवा शिकार होते हैं।

दुर्भाग्य से न तो बेरोज़गारों से ठगी करने वालों के आँकड़े किसी के पास होते हैं और न ही इन ठगों में से अधिकतर के असली नाम और असली पते ही पुलिस और क्राइम ब्रांच के हाथ लग पाते हैं। नतीजतन ऐसे ठगों पर कार्रवाई भी ठीक से नहीं हो पाती। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि बेरोज़गार युवाओं में हर 11वाँ युवा ठगी का शिकार हो जाता है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र से नौकरी की तलाश में शहर आने वाला हर छठा-सातवाँ युवा ठगी का शिकार हो जाता है। हैरानी की बात है कि बेरोज़गार युवाओं से ठगी करने वाले ठग ख़ुद को बड़ी-बड़ी कम्पनियों से ताल्लुक़ रखने वाले एजेंट (अभिकर्ता) अथवा कर्मचारी बताते हैं और कई बार कुछ ठग मिलकर फ़र्ज़ी प्लेसमेंट सेंटर से लेकर फ़र्ज़ी कम्पनियाँ तक बना लेते हैं, जिनके जाल में बेरोज़गार युवा आसानी से ठगी का शिकार हो जाते हैं। हर महीने बीसियों मामले बेरोज़गारों से ठगी के सामने आते हैं। बेरोज़गारों के अतिरिक्त अच्छे ब्याज का झाँसा देकर भोले-भाले लोगों से ठगी के मामले भी ख़ूब सामने आते रहते हैं।

हाल ही में बिहार में इसी तरह अच्छा ब्याज देने के नाम पर 321 निधि कम्पनियों द्वारा नौकरी देने के नाम पर भोले-भाले लोगों से ठगी के मामले सामने आये हैं। अब तक प्राप्त अनुमानित डाटा बताता है कि इन कम्पनियों ने भोले-भाले लोगों से फंड जमा करने के नाम पर अब तक 200 करोड़ रुपये से अधिक रुपये रख लिये हैं। दो साल पहले भी बिहार के 34 जिलों में 342 निधि कंपनियों द्वारा लोगों के 250 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि जमा कराये जाने का मामला सामने आया था। दरअसल पूरे बिहार राज्य में ऐसी निधि कम्पनियों का जाल फैला हुआ है। जैसे ही केंद्र सरकार के संज्ञान में यह बात आयी, उसने बिहार सरकार को इन कम्पनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आदेश दिया है। केंद्र सरकार के आदेश के बाद राज्य सरकार के वित्त विभाग ने ज़िलाधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि वे अपने-अपने ज़िले की निधि कम्पनियों का सर्वे करके उन पर उचित कार्रवाई करें।

बता दें कि किसी भी निधि कम्पनी को स्थापित करने के लिए उसका निबंधन अर्थात् नियमों के तहत एक प्रकार का रजिस्ट्रेशन कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) में ऑनलाइन होता है। इस रजिस्ट्रेशन के लिए निधि कम्पनी बनाने वालों को निधि (संशोधन) अधिनियम-2019 के तहत एनडीएच-4 फॉर्म भरना अनिवार्य होता है, जो एक प्रकार का घोषणा-पत्र है। एनडीएच-4 फॉर्म इसलिए भरना होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो कम्पनी बनायी जा रही है, वो असली तरीक़े से सही लोगों द्वारा बनायी जा रही है और कम्पनी केंद्र सरकार के नियम-क़ानूनों का अक्षरश: पालन कर रही है और करती रहेगी। एनडीएच-4 फॉर्म में कम्पनी के सभी संचालकों का सही नाम और सही पता दर्ज किया जाता है, जिससे ये लोग कम्पनी के ज़रिये कोई ठगी अथवा हेराफेरी न कर सकें। ऐसे में जिन लोगों ने बग़ैर एनड़ीएच-4 फॉर्म भरे बग़ैर निधि कम्पनियाँ स्थापित कर रखी हैं, उन्हें लोगों का पैसा जमा करने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन बिहार में लगभग 321 कम्पनियों का नाम सामने आया है, जिन्होंने एनडीएच-4 फॉर्म नहीं भरे हैं, लेकिन बिना किसी डर के क़ानून और केंद्र सरकार के निर्देशों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से भोले-भाले लोगों का पैसा जमा कर रही हैं। इसके अतिरिक्त निधि कम्पनी शुरू करने के लिए न्यूनतम 10 लाख रुपये की सुरक्षा राशि कम्पनी के पास होनी चाहिए और एक साल में कम्पनी के 200 सदस्य होने चाहिए।

भले ही इन कम्पनियों को भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती; लेकिन इन्हें केंद्र सरकार के कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के लाइसेंस के बग़ैर भी नहीं चलाया जा सकता। साथ ही मंत्रालय ही इन कम्पनियों को संचालित करने के निर्देश जारी करता है। लेकिन बिहार में चल रही 321 निधि कम्पनियों ने न तो इस मंत्रालय से लाइसेंस लिया है और न ही इन्होंने मंत्रालय से कोई निर्देश मिला है। ये निधि कम्पनियाँ स्थायी निधि, लाभ निधि, म्युचुअल बेनिफिट फंड और म्यूचुअल बेनिफिट का झाँसा लोगों को देकर ठगी के नये-नये रास्ते निकालती रहती हैं। हालाँकि ध्यान रहे कि ऐसी कम्पनियाँ केवल शेयरधारकों और कम्पनी के सदस्यों के बीच ही लेन-देन का अधिकार रखती हैं। इन कम्पनियों को आम लोगों से सीधे पैसे लेने का अधिकार ही नहीं होता।

हैरानी की बात यह है कि इन कम्पनियों में से अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हैं। भोले-भाले लोगों से अधिक धन जमा कराने के लिए ये अवैध निधि कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों के ही पढ़े-लिखे युवाओं को कमीशन पर रखती हैं और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित करती हैं कि वे लोगों से अधिक-से-अधिक पैसा जमा कराएँ, ताकि उनका कमीशन ज़्यादा बन सके। कमीशन के लालच में फँसे ये युवा बिना किसी तय वेतन के दिन-रात लोगों को यही समझाने में लगे रहते हैं कि किस प्रकार उनकी कम्पनी लोगों का पैसा जमा करके कम समय में उस पर मोटा ब्याज दे रही है। इन कम्पनियों में लगे ये युवा अपने रिश्तेदारों, पास-पड़ोसियों, अपने घर के लोगों और जान-पहचान वालों का ही पैसा जमा कराते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इन अवैध निधि कम्पनियों की नीयत के बारे में न तो इनमें नौकरी करने वाले युवा जानते हैं और न ही वे भोले-भाले लोग, जो इन युवाओं के कहने और समझाने पर अपनी ज़रूरतों को रोककर पैसा इकट्ठा करने की सोच से इन कम्पनियों में पैसा जमा करते जाते हैं। इन निधि कम्पनियों ने छोटी-से-छोटी राशि जमा करने तक की लुभावनी योजनाएँ बनायी होती हैं, जो कम आय वाले लोगों को भी लालच में फँसाकर पैसे जमा करने के लिए प्रेरित करती हैं। पिछले कुछ दशकों में अगर ऐसी कम्पनियों के रिकॉर्ड जाँचने पर पता चलता है कि देश में ऐसी कई दर्ज़न कम्पनियाँ लोगों का पैसा लेकर भाग चुकी हैं। बिहार में ही बक्सर, समस्तीपुर और मुज़फ़्फ़रपुर ज़िलों में ऐसी ही कई फ़र्ज़ी कम्पनियाँ भोले-भाले लोगों की कई-कई वर्षों की जमा पूँजी लेकर भाग चुकी हैं।

हाल ही में केंद्र सरकार के संज्ञान में आयीं 321 फ़र्ज़ी निधि कम्पनियों में से सबसे अधिक 85 कम्पनियाँ अकेले पटना ज़िले में स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त समस्तीपुर और मुज़फ़्फ़रपुर में अधिक कम्पनियाँ स्थापित हैं। बिहार में खुली इन फ़र्ज़ी निधि कम्पनियों का मामला केवल केंद्र सरकार के ही संज्ञान में नहीं आया है, बल्कि पटना उच्च न्यायालय ने भी इसे संज्ञान में लिया है। पटना उच्च न्यायालय इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के कॉरपोरेट मामले के सचिव से जवाब तलब भी कर चुका है।

ग़ौरतलब है कि इन दिनों पूरी दुनिया की अर्थ-व्यवस्था डाँवाडोल है। मंदी की आशंका पूरी दुनिया को डराये हुए हैं। इसी आशंका से बेरोज़गारी का $खतरा और मँडराने लगा है। कोरोना महामारी के दौरान यह माना जा रहा था कि जल्द ही बाज़ार खुलेंगे और बेरोज़गार हुए लोगों को बेरोज़गार मिल सकेगा। लेकिन हाल ही में ट्विटर, फेसबुक और कई बड़ी कम्पनियों द्वारा अपने कर्मचारियों की गयी छँटनी से यह साफ़ हो गया है कि बेरोज़गार बढऩे की जगह घट रहे हैं। हालाँकि ऐसा नहीं है कि कोरोना महामारी के समय से अब तक नये बेरोज़गार सृजित नहीं हुए हैं। लेकिन इनकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है, जबकि बेरोज़गारी बढऩे के आँकड़े तेज़ी से बढ़ रहे हैं। मौज़ूदा समय में विकट वैश्विक बेरोज़गारी दर है।

संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग 47 करोड़ लोग या तो बेरोज़गार हैं या फिर उनके पास ज़रूरतें पूरी करने भर की आय नहीं है। आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक से बेरोज़गारी दर स्थिर है; लेकिन बेरोज़गारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुस्त होती अर्थ-व्यवस्था के चलते बेरोज़गारों की संख्या बढ़ती जा रही है। ध्यान रहे साल 2019 में दुनिया भर में बेरोज़गारों की संख्या लगभग 18.80 करोड़ थी।

बेरोज़गारों से ठगी होने के मामले ज़्यादा भी इसलिए ही हैं, क्योंकि कोई भी बेरोज़गार युवा किसी भी हालत में एक ऐसी नौकरी चाहता है, जो उसका और उसके परिवार का भरण-पोषण करने के अतिरिक्त उसके जीवन स्तर को बेहतर बना सके। लेकिन बेरोज़गार दिलाने का झाँसा देकर कुछ ठग ऐसे युवाओं से ठगी कर लेते हैं, जिसके चलते कई युवा तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। ठगी का शिकार होने वालों में ग्रामीण क्षेत्रों के युवा और युवतियों की संख्या काफ़ी अधिक होती है। कई युवा तो नौकरी की आस में अपने घर की चल-अचल सम्पत्ति तक बेच देते हैं। किसी भी प्रकार ऐसे ठगों पर रोक लगनी ही चाहिए।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)

जी-20 और एशिया में उभरते दबाव

पाकिस्तान से लेकर नेपाल तक चीन की गतिविधियों पर नज़र ज़रूरी

नवंबर का दूसरा पखवाड़ा एशिया क्षेत्र में काफ़ी हलचल लेकर आया है। जी-20 शिखर सम्मलेन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने (रूस-यूक्रेन) युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी, तो अमेरिका सहित उसके समर्थक देशों ने उनकी ख़ूब तारीफ़ की। मोदी इंडोनेशिया में सम्पन्न हुए जी-20 सम्मलेन से वापस भारत पहुँचे ही थे कि उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर (पीओके) पर बड़ा बयान देते हुए कह दिया कि सरकार जब आदेश देगी, सेना पीओके पर कार्रवाई करने को तैयार है। भारत से बाहर देखें, तो पाकिस्तान में नया सेनाध्यक्ष बन गया और उनकी नियुक्ति होते ही पाक सेना में बग़ावत की स्थिति बन गयी है; क्योंकि दो बड़े जनरल विरोध में इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कुछ और दे सकते हैं। उधर चीन में पहली बार किसी विरोध-प्रदर्शन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जो एक महीना पहले ही तीसरी बार इस पद के लिए चुने गये हैं; के मुर्दाबाद के नारे लगे।

जी-20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए इस लिहाज़ से अच्छा रहा कि अमेरिका ने मुक्त कण्ठ से भारत, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की। एक फोटो में वह मोदी को सैल्यूट करते भी दिख रहे हैं, जो भारत में मोदी के समर्थकों को निश्चित ही आह्लादित करने वाला रहा। अमेरिका के भारत के पक्ष में इस तरह बोलने का एक कारण रूस से भारत के रिश्ते भी हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस के साथ खड़ा न दिखे।

रूस के ख़िलाफ़ पश्चिम लामबंद हुआ है और वह चाहता है कि एशिया के देश या तटस्थ देश रूस नहीं, अमेरिका के साथ खड़े दिखें। अमेरिका ऐसा करके अपनी लॉबी को मज़बूत करना चाहता है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मुक्तकंठ से प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ इसलिए की, क्योंकि मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के सन्दर्भ में कहा था कि युद्ध समस्या का हल नहीं है। अमेरिका के अपने निहित स्वार्थ हैं। वह ऐसी हर चीज़ को भुनाने की कोशिश करता है, जिससे उसे आर्थिक और कूटनीतिक लाभ मिलता है। भारत की तारीफ़ करना भी भी इसका ही हिस्सा है। लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारत सरकार ने रूस-अमेरिका के बीच इस जंग में ख़ुद को तटस्थ दिखने में सफलता हासिल की है। भले बड़े मंचों पर अमेरिका के रूस विरोधी प्रस्तावों का भारत ने समर्थन नहीं किया है। युद्ध का समर्थन नहीं करके भारत ने ख़ुद की छवि युद्ध विरोधी देश की बनाने की कोशिश की है।

मोदी का युद्ध-विरोध

हालाँकि ‘आज का युग युद्ध का नहीं होना चाहिए’ कहकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लिए भी एक लक्ष्मण रेखा बाँध ली है। यह इस सन्दर्भ में काफ़ी अहम है, जब सेना की चिनार कॉप्र्स के कमाण्डर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी जैसे बड़े सेनाधिकारी ने कहा कि केंद्र सरकार आदेश तो सेना पीओके में कार्रवाई के लिए तैयार है। पीओके भारत का अटूट हिस्सा है, इससे जुड़ा प्रस्ताव भारतीय संसद ने नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय 22 फरवरी, 1994 को ध्वनिमत से पास किया था। यही नहीं, जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में 24 सीटें दशकों से इसलिए ख़ाली रखी जाती हैं, क्योंकि यह सीटें पीओके की हैं।

दरअसल वृहद् कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाला कश्मीर (पाकिस्तान इसे आज़ाद कश्मीर कहता है) ही नहीं हैं। पाकिस्तान ने अपने क़ब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर को तीन हिस्सों में विभाजित कर रखा है, जिसमें पीओके के अलावा गिलगिट-बाल्टिस्तान भी है। इसके अलावा उसने एक बड़ा हिस्सा चीन को भेंट कर दिया था, जिसमें चीन अब सडक़ों और रेल लाइनों का जाल बिछा चुका है। इसके अलावा चीन ख़ुद एक बड़े हिस्से को हथिया चुका है। उधर बलूचिस्तान भी है, जहाँ के नागरिकों पर चीन के सहयोग से पाकिस्तान ज़ुल्म कर रहा है। पाकिस्तान और उसकी सेना के ख़िलाफ़ बलूच जनता में नफ़रत का सैलाब है।

जी-20 शिखर सम्मलेन के बाद अमेरिका ने कहा कि सम्मेलन की बाली घोषणा पत्र सम्बन्धी बातचीत में भारत ने अहम भूमिका निभायी। वैसे भी भारत 2023 में जी-20 की अध्यक्षता करने वाला है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरेन ज्यां पियरे ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ में कहा- ‘प्रधानमंत्री मोदी के सम्बन्ध इस नतीजे के लिए महत्त्वपूर्ण थे और हम भारत की अगले साल जी-20 अध्यक्षता के दौरान सहयोग करने के लिए तत्पर हैं. हम अगली बैठक की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’

निश्चित ही अमेरिका ने जी-20 सम्मलेन का इस्तेमाल रूस के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए भी किया है। भारत की तारीफ़ उसकी रणनीति का बड़ा हिस्सा है। क्योंकि भारत ने ख़ुद को इस स्थिति में खड़ा कर दिया है, जहाँ वह महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता दिखता है। वह न तो अमेरिका और न ही रूस के साथ खड़ा दिखता है और सही पक्ष सामने रखकर अपने एक अलग छवि दुनिया के सामने लाना चाह रहा है, जिसका सन्देश यह है कि वह सिर्फ़ सही के साथ है।

भारत विरोधी सेनाध्यक्ष

भले जी-20 में भारत ने अपनी कूटनीति से ख़ुद को भीड़ से अलग खड़ा करने में सफलता हासिल की है, दक्षिण एशिया की घटनाएँ उसे सावधान रहने का सन्देश दे रही हैं। इनमें सबसे बड़ी घटना पाकिस्तान में नया सेनाध्यक्ष बनना है। नये जनरल आसिम मुनीर भारत विरोधी सेनाधिकारी माने जाते हैं और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान विरोधी भी। चूँकि वह आईएसआई के चीफ रहे हैं, उनके आने से जो सबसे बड़ा ख़तरा है, वह यह कि जम्मू और कश्मीर में आंतकवाद तेज़ हो सकता है।

यह आरोप लगाये जाते हैं कि फरवरी, 2019 के जिस पुलवामा आतंकी हमले में 40 से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हो गये थे, उस हमले के पीछे मुनीर का ही हाथ था। उस समय मुनीर आईएसआई के प्रमुख थे। जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद-370 ख़त्म होने के बाद आतंकी वारदात में कुछ कमी तो आयी है; लेकिन वहाँ स्थिति अभी भी बेहतर नहीं कही जा सकती। चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगते जम्मू और कश्मीर सूबे में पिछले महीनों में हुई घटनाएँ बताती हैं कि वहाँ आतंकवाद पर पूरी नकेल नहीं डाली जा सकी है। यही नहीं, स्थानीय युवकों की आतंकी संगठनों में भर्ती की बातें भी सामने आयी हैं।

हालाँकि पाकिस्तान सेना में मुनीर की नियुक्ति के बाद विद्रोह जैसी स्थिति बन गयी है। वहाँ इमरान समर्थक दो बड़े जनरल इस्तीफ़ा दे चुके हैं। इनमें से एक लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद को इमरान ख़ान ने आईएसआई का प्रमुख बनाया था। हालाँकि तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल क़मर जावेद बाजवा ने उन्हें इस पद से हटा दिया था। एक और अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल अजहर अब्बास हैं, जिन्होंने इस्तीफ़ा दिया है। वह भी इमरान ख़ान के पसंदीदा रहे हैं। पाकिस्तान मीडिया में आयी रिपोट्र्स पर भरोसा करें, तो आने वाले समय में कुछ और वरिष्ठ अधिकारी इस्तीफ़े दे सकते हैं। निश्चित ही यह शाहबाज़ शरीफ़ और नये आर्मी चीफ मुनीर के लिए चुनौती की बात है। पाकिस्तान में अस्थिरता भारत के लिए भी बेहतर नहीं कही जा सकती।

भारत के लिए चिन्ता की बात यह भी है हाल में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में चीन के ड्रोन देखे गये हैं। माना जाता है कि पाकिस्तानी सेना से लोहा ले रहे बलूच विद्रोहियों (बलूच मिलिशिया) का दमन करने के लिए पाकिस्तानी सेना चीनी मूल के लड़ाकू सीएच-4 बी ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रान्त के अख़बार बलूचिस्तान पोस्ट ने नवंबर के आख़िर में इस तरह की रिपोर्ट छापी हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में पाकिस्तान ने एसएसजी कमांडो के साथ मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी), लड़ाकू जेट और गनशिप हेलीकॉप्टर्स को तैनात किया है, जिसका मक़सद बलूच विद्रोहियों को ख़त्म करना है। बता दें बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से मुक्ति के लिए भारत की तरफ़ देखते रहे हैं। हाल के महीनों में बलूच मिलिशिया और पाकिस्तान सेना के बीच कई बार भीषण संघर्ष देखे गये हैं। बलूचिस्तान पोस्ट ने दावा किया कि चीन और तुर्की ने पाकिस्तान को लड़ाकू यूएवी के विभिन्न मॉडलों की आपूर्ति की है।

उधर पाकिस्तान में सेना पर इमरान ख़ान के पार्टी के हमले बढ़े हैं। आर्मी प्रमुख के पद से रिटायर होने वाले क़मर जावेद बाजवा को जाते-जाते बहुत फ़ज़ीहत झेलनी पड़ी, जब यह ख़ुलासा हुआ कि रिटायर होने से पहले बाजवा और उनका परिवार मालामाल हो गया है।

आरोप के मुताबिक, आर्मी चीफ बाजवा ने ख़ुद के लिए अरबों की दौलत इकट्ठा की। इसके बाद इमरान के नज़दीकी नेता आजम ख़ान स्वाति ने बाजवा पर जबरदस्त हमला करते हुए कहा कि हमारे दुश्मन (भारत) का एक जनरल पांडे, जो आर्मी प्रमुख बनता है, उसकी टोटल सम्पत्ति 29 लाख रुपये है। इस क़ौम को बताकर जाओ तुम्हारी (बाजवा) सम्पत्ति कितनी है? कहाँ से लाये हैं ? मैं पाकिस्तान का शहरी हूँ। तुमसे पूछ रहा हूँ और पूछता रहूँगा उस वक़्त जब तक मुझे जवाब नहीं मिलता। हालाँकि इसका जवाब यह मिला कि बाजवा ने उन्हें गिरफ़्तार करवा दिया।

पाकिस्तान में हालात लगातार ख़राब होते दिख रहे हैं। इमरान ख़ान ने अपनी पार्टी के तमाम सदस्यों के असेम्बली से इस्तीफ़े करवा दिये हैं, ताकि नये चुनाव का दबाव शाहबाज़ सरकार पर बनाया जा सके। यह स्थिति पाकिस्तान को किसी भी तरफ़ ले जा सकती है। लिहाज़ा भारत को चौकन्ना रहना पड़ेगा। पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर होने की सम्भावना अब कम दिखती है। शाहबाज़ शरीफ़ पिछले डेढ़ साल में इस दिशा में कुछ नहीं कर पाये हैं। अब मुनीर के सेनाध्यक्ष बनने के बाद भारत बेहतर होने की सम्भावना लगभग न के बराबर है।

नेपाल में घुसपैठ

चीन पाकिस्तान के साथ तो पहले से ही क़दम-से-क़दम मिलाकर चलता रहा है, अब नेपाल में भी उसकी गतिविधियाँ काफ़ी तेज़ होती दिख रही हैं। भारत के लिए चिन्ता की नयी बात नेपाल की ज़मीन पर चीन के निर्माण हैं। नेपाल के कृषि मंत्रालय के एक सर्वे दस्तावेज़ में इस बात का ख़ुलासा हुआ है कि चीन ने उत्तरी नेपाल की सीमा पर 10 जगहों पर 36 हेक्टेयर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। रिपोट्र्स के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पहली बार सन् 2016 में नेपाल के एक ज़िले में एक पशु चिकित्सा केंद्र बनाया था। ये रिपोट्र्स भी आयी हैं कि फरवरी, 2022 में चीन ने नेपाल पर साझा सीमाओं के अतिक्रमण का आरोप जड़ा था।

नेपाल के आधिकारिक दस्तावेज़ ज़ाहिर करते हैं कि उसके सुदूर पश्चिमी हुमला ज़िले में सीमा चौकी के आसपास चीन नहरें और सडक़ें बनाने का प्रयास कर रहा है। नेपाल चीन पर चीनी सीमा और लालुंग सोंग सीमा क्षेत्र में निगरानी गतिविधियों का आरोप लगा चुका है। चीन की गुंडागर्दी इतनी है कि उसने सीमा पर नेपाली किसानों के पशु चराने का प्रतिबंध लगा दिया है। यही नहीं, आरोप यहाँ तक हैं कि उसने सीमावर्ती क्षेत्रों में हिन्दू और बौद्ध मन्दिरों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के नेपाल में अतिक्रमण की यह हालत है कि चीनी सीमा पर नेपाल के दोलखा, गोरखा, दारचुला, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासा और रसुवा ज़िलों की ज़मीन पर चीन घुसपैठ कर चुका है। दार्चुला और गोरखा ज़िलों में कुछ गाँव चीन के क़ब्ज़े में हैं। हुम्ला ज़िले और रुई गाँव में तो चीन के दर्जन भर निर्माण खड़े कर दिये हैं। नेपाल के एक बड़े अधिकारी के नेतृत्व ने सरकारी टीम ने अपने गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट पिछले साल सौंपी थी, जिसमें चीन के अतिक्रमण का ज़िक्र है। ज़ाहिर है यह स्थिति भारत के लिए सुखद नहीं है।

चीन में शी का विरोध

इसमें कोई दो-राय नहीं कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन के साथ भारत की हाल के महीनों में काफ़ी तल्ख़ी रही है। अब जिनपिंग अपने ही देश में विद्रोह जैसी स्थिति झेल रहे हैं। उनकी चीन में शून्य-कोविड नीति के विरोध में नवंबर के आख़िर में कई प्रमुख शहरों में हजारों लोग सडक़ों पर उतर आये। लोगों में शी के प्रति जबरदस्त ग़ुस्सा दिखा। यह पहली बार है, जब विरोध-प्रदर्शनों में राष्ट्रपति जिनपिंग के मुर्दाबाद के नारे लगे। चीन में ऐसा होना बहुत आश्चर्यजनक बात है। इससे संकेत मिलता है कि लोग घुटन में जीते को तैयार नहीं और उनके तेवर तल्ख़ हो रहे हैं। इससे पहले छात्रों ने बीजिंग के इलीट सिंघुआ विश्वविद्यालय में तालाबंदी के विरोध में रैली की थी और वे ‘लोकतंत्र और क़ानून का शासन’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ जैसे नारे लगा रहे थे।

 

“भारत सरकार जब आदेश देगी, सेना पीओके पर कार्रवाई करने को तैयार है। पीओके के विषय पर संसद में प्रस्ताव पास हो चुका है। भारतीय सेना सरकार के हर आदेश के लिए पूरी तरह से तैयार है। सरकार जब भी आदेश देगी, सेना अपनी पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ेगी। भारत में घुसपैठ के लिए पाकिस्तानी लॉन्चपैड पर क़रीब 160 आतंकी मौज़ूद हैं। हम उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने देंगे।’’

ले. ज. उपेंद्र द्विवेदी

उत्तरी कमांड प्रमुख

कम्पनी ने तलाशा आपदा में अवसर

पैसा लेकर अन्तिम संस्कार करने को बनाया मोटी कमायी वाला व्यवसाय

कोरोना महामारी में एक जुमला ख़ूब चर्चा में आया था, आपदा में अवसर। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना-काल में देशवासियों को राय दी थी कि वे आपदा में अवसर तलाशें। इसकी कोई जानकारी नहीं कि कोरोना-काल में आपदा में अवसर कितने लोगों ने तलाशे, मगर यह सच है कि आम लोगों को तो इस आपदा ने कहीं का नहीं छोड़ा। वैसे भी कोई आपदा जब आती है, तो सबसे अधिक समस्या सामान्य लोगों को ही होती है। मगर इस कोरोना-काल में कुछ लोगों ने वास्तव में आवदा में अवसर ढूँढ लिया तथा मरते, तड़पते लोगों की बेबसी का लाभ उठाते हुए जमकर कमायी की। मास्क से लेकर दवा, इंजेक्शन से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक के कई-कई गुना दाम जमकर वसूले गये। दो रुपये का मास्क 20 से 25 रुपये में बेचा गया, 2,000 से 2,500 का रेमडेसिवीर इंजेक्शन 20,000 से लेकर 50,000 रुपये तक का बिका। उसमें भी मिलावट करने वालों ने पैरासिटामोल का घोल भरकर बेचा। 500 रुपये वाला ऑक्सीजन सिलेंडर 10,000 से लेकर 30,000 रुपये तक में चोरी-छिपे बेचा गया। कोरोना-काल में ही एक अन्य दृश्य देखने को मिला कि लोग कोरोना से मरे अपने ही घर के सदस्य के शव को हाथ लगाने तक से बचते दिखे।

आपदा के इसी दृश्य को देखते हुए सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट नाम की कम्पनी ने आपदा में अवसर की तलाश की। बीते नवंबर में कम्पनी ने दावा किया कि वह 50 लाख रुपये का लाभ कमा चुकी है तथा आने वाले समय में 2,000 करोड़ रुपये का लाभ उसे होगा। सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट नाम की यह कम्पनी नवंबर महीने के समाप्त होने से पहले ही 5,000 अन्तिम संस्कार करा चुकी थी। एक अन्तिम संस्कार के लिए कम्पनी का शुल्क 37,000 रुपये है। जबकि एक मुर्दे के अन्तिम संस्कार में 8,000 से 10,000 रुपये तक का व्यय होता है।

हमारी संस्कृति और समाज के संस्कार हैं कि कोई भी कार्य मिलजुलकर किया जाता है। मगर जैसे-जैसे बाज़ारवाद हावी होता जा रहा है, अपने ही अपनों से दूरी बनाते जा रहे हैं। इसकी वजह बाज़ारवाद के इस समय में हर वस्तु का मूल्य केवल पैसे से है। इसी बाज़ारवाद ने हर किसी को स्वार्थी और लालची बना दिया है, जिसके चलते अब बिना स्वार्थ के अपने भी साथ नहीं देते। बुढ़ापे में या पैसा पास न होने पर तो अपने भी साथ छोडऩे में समय नहीं लगाते। आजकल तो विदेशों में रहने वाले अनेक लोग अपने बड़े माता-पिता को लौटकर भी नहीं देखते। इसी माहौल को देखते हुए सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट कम्पनी ने अन्तिम संस्कार का काम शुरू किया। यह कम्पनी किसी के मरने पर उसके घर वालों या रिश्तेदारों द्वारा बुलाने पर अन्तिम संस्कार का पूरी व्यवस्था करती है। इसके लिए वह शव को कांधा देने वाले चार लोग, क़फ़न, फूल, अरथी, लकड़ी और अन्य सामग्री की व्यवस्था कम्पनी ही करती है। अर्थात् अब अगर कोई किसी अपने का अन्तिम संस्कार करना नहीं चाहता या दूर है, तो वो इस कम्पनी को किसी की मृत्यु पर 37,000 रुपये में उसका अन्तिम संस्कार का ठेका देकर छुटकारा पा सकता है।

भारत में इस पाश्चात्य संस्कृति से टूटते परिवारों में और दरार आएगी। हमारी संस्कृति मिलजुलकर रहने और सुख-दु:ख में एक-दूसरे के काम आने की है। मगर किसी कम्पनी द्वारा किराये के अन्तिम संस्कार करने वालों को बुलाने की यह परम्परा टूटते-बिखरते रिश्तो के बीच आग में घी का काम करेगी, जिससे एक-दूसरे के प्रति प्रेम और त्याग की भावना समाप्त होगी। धीरे-धीरे सुखांत फ्यूनरल मैनेजमेंट कम्पनी की तरह देश में अन्तिम संस्कार भी एक पेशेवर काम होता जाएगा और दर्ज़नों कम्पनियाँ इसी तरह खुलेंगी। हो सकता है कि हर धर्म के लोगों के अन्तिम संस्कार के लिए इस तरह की कम्पनियाँ खुलने लगें, जिससे पारिवारिक रिश्तों में अन्तिम संस्कार तक अपने फ़र्ज़ निभाने का ट्रेंड ख़त्म होने लगे। इस देश के धर्माचार्यों, विचारकों, बुद्धिजीवियों को इस तरह की परम्परा पर ध्यान देकर समाज में बढ़ रहे विखंडन को एकता तथा सामंजस्य का पाठ पढ़ाना होगा, अन्यथा ऐसी परम्पराओं से समाज टूटने लगेगा। कम्पनी से अपने ही लोगों का अन्तिम संस्कार कराने वालों को भी सोचना होगा कि क्या यह उचित है? ऐसे लोगों को कोरोना-काल के उन दृश्यों को नहीं भूलना चाहिए, जब मानवतावादी लोग दूसरे धर्म के कोरोना से मरे लोगों का अन्तिम संस्कार भी मरे हुए व्यक्ति के धर्म के अनुरूप अपनत्व की उसी भावना से कर रहे थे, जिस भावना से कोई अपना करता है।