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चाटुकारिता का नवयुग

शिवेंद्र राणा

देश में नये राष्ट्रपिता उदित हुए हैं। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उप मुख्यमंत्री फडणवीस साहब की पत्नी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में देश को इस तथ्य से परिचित करवाया। उन्होंने कहा था कि महात्मा गाँधी पुराने भारत के राष्ट्रपिता हैं, जबकि नरेंद्र मोदी नये भारत के राष्ट्रपिता। सामान्यत: संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के परिवार से ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानों की अपेक्षा नहीं होती है। किन्तु छिछले एवं निम्न कोटि के वैचारिक काल में ऐसे वक्तव्य कोई बहुत बड़ी घटना नहीं है, फिर भी इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि सभ्य समाज का मौन ऐसे विकृत मानसिकता के लोगों को और अधिक असभ्यता के लिए उकसाता है।

फडणवीस की पत्नी की इस चाटुकारितापूर्ण बयान पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक जीवन में ऐसे लोग आसानी से उपलब्ध हैं, जो जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने एवं सस्ती प्रसिद्धि पाने हेतु ऐसी ऊल-जुलूल बातें करते हैं। आश्चर्य है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का दावा करने वाली पार्टी के किसी भी नेता ने अब तक ऐसे अमर्यादित बयान की भत्र्सना क्यों नहीं की? ऐसा वक्तव्य एक बारगी तो प्रधानमंत्री को प्रसन्न कर सकता है, किन्तु अंतत: उन्हें और उनके समर्थकों को आलोचना और उपहास का पात्र ही बनाता है। समझना कठिन है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय की परम्परा इतनी भ्रष्ट कैसे हो सकती है?

वह पं. दीनदयाल, जिन्होंने जीवन भर अपने नाम को प्रचारित करने के बजाय परदे के पीछे काम किया। उनकी परम्परा में ऐसे बकवादी एवं प्रचार-जीवी नेता कैसे पैदा हो गये हैं? जनसंघ-भाजपा में चाहे जो भी बुराई रही हो, किन्तु चाटुकारिता की परम्परा कभी भी नहीं रही थी। यह पुरानी परम्पराएँ तूट रही हैं, क्योंकि नयी परम्परा स्थापित कर रही इस पार्टी में अब कुछ भी सम्भव दिखता है। सम्भवत: यह सत्ता की निकटता का दोष हो, क्योंकि सत्ता का विकट आकर्षण कभी भी व्यक्ति के सिद्धांतों को पतित कर सकता है। देश में कट्टरपंथ का आसन्न संकट दिख रहा है। बेरोज़गारी चरम पर है। उधर कश्मीर में रोज़ हिन्दुओं की हत्याएँ हो रही हैं, और इधर साहेब देश-विदेश में अपनी छवि चमकाने में लगे हैं।

दरअसल असल में समस्या कुछ और है। कांग्रेस एवं नेहरू-इंदिरा की आलोचना करते हुए मोदी के नेतृत्व में भाजपा उसी राह पर चल पड़ी है। व्यवहार में मोदी भले ही जताते न हो; लेकिन नेहरू-इंदिरा की भाँति उन्हें भी चाटुकारों से घिरे रहना ख़ूब भाता है। वैसे ही उनका अहंकार उनकी कार्यशैली में दिखता है।

हालाँकि प्रधानमंत्री की निर्णयन क्षमता प्रशंसनीय है। उन्होंने जिस तरह कश्मीर मामले और अनुच्छेद-370 से निपटा, सीएए-एनआरसी के माध्यम से अवैध घुसपैठ को चिह्नित करने का प्रयास किया, डीबीटी (डायरेक्ट मनी ट्रांसफर) जैसे सफल प्रयोग, भारतीय विदेश नीति की प्रभावशीलता स्थापित करने इत्यादि के लिए वह नि:संदेह साधुवाद के पात्र हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह सर्वाधिकारवाद को प्रश्रय देने लगे। कुछ यही स्थिति इंदिरा गाँधी की भी थी। कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा ‘एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं’ में लिखते हैं- ‘इंदिरा गाँधी की निर्णय क्षमता उनकी बहुत बड़ी ख़ूबी थी। लेकिन धीरे-धीरे उनके कामकाज के तौर-तरीक़ों में अधिकारवाद की झलक दिखायी देने लगी।’

जैसा कि पूर्व में इंदिरा गाँधी और उनकी कांग्रेस स्वयं को लोकतांत्रिक संस्थाओं ही नहीं, बल्कि आलोचनाओं तक से ऊपर मानती थीं। उसी प्रकार मोदी और भाजपा भी ख़ुद को आलोचना से परे समझते हैं। अपने आलोचकों को अमेरिकी एजेंट और भारत विरोधी बताना इंदिरा गाँधी के प्रत्युत्तर का तरीक़ा था। उसी प्रकार किसी भी नेता, लेखक या पत्रकार तथ्यात्मक समालोचना पर भी भाजपा अपने मंत्री-नेताओं, पार्टी काडर और समर्थकों के साथ उस पर टूट पड़ती हैं। उसे तुरन्त देशद्रोही, विदेशियों का एजेंट और ग़द्दार बताया जाने लगता है। आधिकारिक आँकड़ों के जवाब में साहेब अपने त्याग एवं भावुकता के तर्कों से संवाद का रुख़ परिवर्तित कर देते हैं और फिर देश भर के उनके समर्थकों के लानत-मलानत तथा गालियों के बीच आलोचक नितांत अकेला रह जाता है। यह राजतंत्र अथवा अधिनायकवादी देश के लिए तो ठीक है; लेकिन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के भविष्य के लिए ऐसा व्यवहार अनैतिक एवं निंदात्मक है। ध्यातव्य है कि कांग्रेस द्वारा नेहरू परिवार की चरण वंदना की पुरातन परम्परा अब तक अनवरत गतिशील रही है। सोनिया गाँधी को राजमाता और राहुल गाँधी को युवराज कहने वाले कांग्रेसी अपनी निरंतर राजनीतिक दुर्गति के बावजूद अब भी सुधरने को तैयार नहीं हैं। अब पूर्व विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने राहुल गाँधी की तुलना भगवान श्रीराम से करते हुए उन्हें योगी और तपस्वी बता दिया।

डॉ. आंबेडकर ने कभी व्यक्ति पूजन की इसी विकृत मानसिकता को लोकतंत्र के लिए घातक रोग कहकर भत्र्सना की थी, जिसे कांग्रेस के पश्चात् भाजपा ने अपना लिया है। भाजपा में व्यक्ति आधारित सर्वसत्तावाद का दौर वर्तमान से पूर्व कभी नहीं रहा था, तब भी नहीं जब अटल-आडवाणी युग शिखर पर था। अत: मोदी जितनी भी पं. नेहरू-इंदिरा की मुखर आलोचना करें; लेकिन वास्तविक यह है कि उनके विभाजित व्यक्तित्व में नेहरू भी हैं और इंदिरा भी। यथार्थ यही है कि अब भाजपा की कार्यशैली भी कांग्रेस से भिन्न नहीं रह गयी है। जैसा कि प्रो. शंकर शरण अपनी किताब ‘संघ परिवार की राजनीति’ में लिखते हैं- ‘भाजपा केवल बेहतर कांग्रेस बनने में लगी हुई है, जो वस्तुत: उसकी पुरानी चाह भी थी।’

देश अपने अतीत से सीखने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है। आपातकाल के दौर में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरुआ एवं बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जैसे चाटुकारों के ‘इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया’ जैसे नारों ने इंदिरा गाँधी की तानाशाही प्रवृत्ति को लोकतंत्र के लिए विध्वंसक बना दिया। उन्होंने आपातकाल के दौरान घोषणा की थी- ‘देश बिना विपक्ष के चल सकता है। भारत के इतिहास में विपक्ष अप्रासंगिक है।’

उसी प्रकार मोदी के नेतृत्व में भाजपा भी भारतीय राजनीति को विपक्ष-विहीन करने की मुहिम पर निकल चुकी है। वैसे भी कांग्रेस मुक्त भारत पिछले नौ वर्षों में पार्टी का सबसे लोकप्रिय नारा है। कांग्रेस में एकाधिकार के विपरीत संघ-भाजपा में नेता विशेष के स्वेच्छाचारी निर्णयन का दौर कभी भी नहीं रहा है। अगर ऐसा होता, तो गुजरात दंगों के पश्चात् अटल जी के इच्छानुरूप मोदी मुख्यमंत्री पद से हटाकर नेपथ्य में फेंक दिये गये होते, क्योंकि भाजपा का एक प्रभावशाली गुट उन्हें अपदस्थ करने पर तुला हुआ था। तब आडवाणी मोदी की ढाल बन गये।

उस दौर में भी पार्टी लाइन से इतर विचार रखने वालों की कमी नहीं थी, बल्कि खुलेआम वाद-प्रतिवाद भी होते थे। इससे पहले भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में शामिल कुछ नेताओं का निष्कासन हुआ। जैसे कि बलराज मधोक, जब उन्होंने पार्टी विचारधारा के सार्वजनिक ख़िलाफ़त की अति कर दी, तब जाकर सामूहिक निर्णयन से उनका निष्कासन हुआ। लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा ‘माय कंट्री माय लाइफ’ में इसका विस्तृत विवरण देते हैं। वही अटल बिहारी वाजपेयी, जिनके व्यक्तित्व और पार्टी धर्म की राजनीति में क़समें खायी जाती हैं; से व्यक्तिगत टकराव में जब कल्याण सिंह जैसे क़द्दावर नेता ने अटल के ख़िलाफ़ निरंतर अभद्र सार्वजनिक टिप्पणियाँ कीं, तब पार्टी ने उन्हें निष्कासित किया। लेकिन आज परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि मोदी-शाह से असहमति रखने वालों को एक पल में नेपथ्य में फेंक दिया जाएगा। नेहरू परिवार की कांग्रेस की ही भाँति अब भाजपा में भी कोई भी ‘साहेब और उनके चाणक्य’ के एकाधिकार के विरुद्ध प्रतिवाद करने का साहस नहीं कर सकता।

वैसे भी साहेब का अतीत रहा है कि जिससे भी उनको चुनौती मिली है या मिलने की सम्भावना रही है, उसको उन्होंने नेस्तनाबूत करके ही दम लिया है। संजय जोशी, प्रवीण तोगडिय़ा जैसे प्रतिबद्ध संघियों ही नहीं, बल्कि आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार जैसे भाजपा नेताओं के साहेब और उनकी सेना ने क्या हाल किया, यह सर्वविदित है। वही व्यापक जनाधार वाले नितिन गडकरी एवं शिवराज चौहान जैसे लोकप्रिय नेताओं को पहले राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर किया गया, अब धीरे-धीरे नेपथ्य में धकेला जा रहा है।

हाँ, इसी बीच मोदी-शाह के चरणवंदक चाटुकार लॉबिस्टों, दूसरे दलों से भाजपा में आये पूर्व के घोर संघ-भाजपा विरोधियों, नौकरशाहों एवं फ़र्ज़ी बुद्धिजीवियों आदि विभिन्न वर्ग के अवसरवादियों की पौ-बारह है। भारतीय राजनीति में व्याप्त जिस नेहरूवाद की भाजपा कटु आलोचक रही थी, उसकी सरकार में वही सब दोगुनी तीव्रता से हो रहा है।

मुख्य मुद्दे पर लौटें, फडणवीस की पत्नी का प्रधानमंत्री को राष्ट्रपिता के रूप में संबोधित करना भाजपा नेताओं एवं समर्थकों की उसी आलोचना प्रक्रिया का भाग है, जो निकट कुछ वर्षों से प्रचलन में है। आख़िर गाँधी की समालोचना में समस्या कहाँ है? नेतृत्व, सिद्धांत, विचार, कार्यशैली, व्यक्तिगत व सार्वजनिक व्यवहार के आधार पर उनकी आलोचना होनी भी चाहिए और निरंतर होती भी रही। आख़िर यह किसी व्यक्ति का संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है (अनुच्छेद-9,क)। समीक्षा और आलोचना की कसौटी मानव जीवन में कभी भी अपवाद स्वरूप नहीं होनी चाहिए। एक बौद्धिक समाज के लिए समीक्षा के अधिकार से परे तो ईश्वर भी नहीं होता, फिर मत्र्य मानव को कैसे परे रखा जा सकता। लेकर दिक्क़त भाषा और अभिव्यक्ति की मर्यादा बनाये रखने की। निकट कुछ वर्षों में गाँधी की आलोचना के लिए उद्धत वर्ग छिछले स्तर पर उतर आया।

इसी का प्रभाव है कि पिछले दुर्गा पूजा महोत्सव के दौरान कोलकाता में महिषासुर की जगह महात्मा गाँधी की तरह दिखने वाली प्रतिमा रखी गयी। सम्भवत: अपने सम्पूर्ण जीवन-काल में गाँधी जी के कुछ विचार, सिद्धांत, कार्य-व्यवहार किसी व्यक्ति, वर्ग या समाज विशेष को अनुचित प्रतीत हो सकते हैं। परन्तु उन्हें एक राक्षस के रूप में प्रदर्शित करने जैसे कृत्यों को मानसिक विक्षिप्तता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। भावनाओं के ज्वार में मर्यादाओं के मानक ध्वस्त नहीं होने चाहिए।

यह तब और आवश्यक हो जाता है, जब आपके आलोचनाओं का केंद्र एक ऐसा व्यक्ति हो, जिसका देश राष्ट्रपिता के रूप में सम्मान करता हो। वैसे भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की विरासत के उत्तराधिकार का दावा करने वालों से इतनी उम्मीद की ही जा सकती है कि जिन सुभाष बाबू ने गाँधी जी को राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था, कम-से-कम उनकी भावना का सम्मान करते हुए सार्वजनिक मर्यादा तो बनाये रखी ही जा सकती है।

(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

सुक्खू की चुनौतियाँ, हिमाचल मंत्रिमंडल के गठन में क्षेत्र से ज़्यादा जातिवाद पर किया गया फोकस

हिमाचल में नया सरकार बन गयी, मंत्री भी बन गये। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने और उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के अलावा सात ही मंत्री बनाये हैं। चाहते, तो 10 मंत्री बना सकते थे। कुल 68 की विधानसभा में क़ानून के मुताबिक, 12 मंत्री बनाये जा सकते हैं। कांग्रेस ने चुनाव में 40 सीटें जीती थीं। लिहाज़ा किसी के नाराज़ होने से पहले सुक्खू ने मंत्रियों से पहले छ: मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिलाकर उन्हें शान्त रखने की रणनीति अख़्तियार की। इस तरह तीन मंत्रियों के जगह बची है। लिहाज़ा नाराज़गी की सम्भावना नहीं रहेगी, क्योंकि विधायकों को मंत्री बनने की उम्मीद रहेगी। शायद सुक्खू अब 2024 के लोकसभा चुनाव का गुना भाग देखकर यह तीन मंत्री पद भरेंगे। वैसे यह मंत्रिमंडल क्षेत्रीय सन्तुलन के  लिहाज़ से बहुत सही नहीं कहा जा सकता। सुक्खू ने शायद क्षेत्रवाद से बाहर निकलने की कोशिश की है। लेकिन वह जातिवाद के भँवर में फँस गये हैं; क्योंकि अभी तक बने कुल नौ मंत्रियों में से छ: राजपूत हैं, जिनकी आबादी प्रदेश में सबसे ज़्यादा है। ख़ुद सुक्खू भी राजपूत हैं।

चुनाव के दौरान पार्टी की स्टार प्रचारक महासचिव प्रियंका गाँधी, जिनका शिमला में घर भी है; ने महिलाओं के लिए 1,500 रुपये मासिक भत्ता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में डलवाया था। लेकिन दुर्भाग्य से एक भी महिला पार्टी के टिकट पर नहीं जीती। इस तरह बिना महिला के मंत्रिमंडल बना है। लेकिन प्रियंका गाँधी सम्भवता सुक्खू से कहेंगी कि इसका कोई रास्ता निकाला जाए और महिलाओं को किसी और जगह बेहतर प्रतिनिधित्व दिया जाए। यदि मंत्रिमंडल पर नज़र दौड़ाएँ, तो साफ़ है कि मुख्यमंत्री सुक्खू ने लोकसभा चुनाव पर फोकस किया है।

कांगड़ा ज़िला प्रदेश में सबसे बड़ा ज़िला है और वहाँ से कांग्रेस ने 15 में से 10 सीटें  जीती हैं। कांगड़ा ज़िला से अभी सिर्फ़ एक- चंद्र कुमार, जो ओबीसी वर्ग से हैं; मंत्री बनाये गये हैं। इससे कांगड़ा में नाराज़गी फ़ैल सकती है। लेकिन सन् 2014 से पहले वहाँ से एक या दो मंत्री और बना सकते हैं। काफ़ी लोगों को लगता है कि कांगड़ा और मंडी संसदीय क्षेत्र में 2024 के चुनाव में इससे मुश्किल आ सकती है। इसी 8 जनवरी को बने मंत्रिमंडल में शिमला संसदीय क्षेत्र को सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व मिला है। वहाँ से पाँच मंत्री बने हैं। इनमें से ज़्यादातर सुक्खू समर्थक या कह लीजिए कि वीरभद्र सिंह के विरोधी हैं। माना जाता है कि अगले चुनाव में पार्टी इस आरक्षित सीट से कर्नल धनी राम शांडिल को मैदान में उतार सकती है, जो विधानसभा चुनाव में सोलन सीट से जीते हैं और सुक्खू सरकार में मंत्री बनाये गये हैं। वह दो बार इस सीट से सांसद भी रहे हैं।

वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह मंडी लोकसभा हलक़े से सांसद हैं। उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह को भी केबिनेट मंत्री बनाया गया है। लेकिन सुक्खू ने इस लोकसभा सीट से सिर्फ़ एक मंत्री बनाया है। ज़ाहिर है कांग्रेस को अगले चुनाव में इससे दिक़्क़तत आ सकती है। वैसे सन्तुलन के लिए मंडी संसदीय क्षेत्र के तहत पडऩे वाले कुल्लू ज़िले से सुन्दर सिंह ठाकुर को मुख्य संसदीय सचिव बनाया गया है। हैरानी नहीं होगी, यदि भाजपा यहाँ से 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को मैदान में उतार दे, जो चुनाव में पार्टी की हार के बाद पार्टी विधायक दल के नेता बनाये गये हैं। मंडी जयराम ठाकुर का गृह ज़िला है। अपने ज़िले में जयराम 10 में से 8 सीटें पार्टी की झोली में डालने में सफल रहे थे, जबकि पूरे संसदीय हलक़े में भाजपा ने 12 सीटें जीती हैं। सुक्खू ने पूरे कांगड़ा संसदीय क्षेत्र को भी एक ही मंत्री दिया है; लेकिन भटियात से जीतने वाले विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया, भी इसी संसदीय क्षेत्र से हैं। एक मुख्य संसदीय सचिव (सीपीएस) भी कांगड़ा से बनाया गया है। वैसे पूरे कांगड़ा संसदीय क्षेत्र की 17 विधानसभा सीटों में से 12 कांग्रेस के हिस्से आयी हैं।

सबसे बेहतर हालत में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र माना जा सकता है। केंद्र में मंत्री अनुराग ठाकुर इसी सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री सुक्खू और उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री दोनों इसी संसदीय हलक़े से हैं। हालाँकि इस हलक़े के तहत राजेश धर्माणी को मंत्री न बनाये जाने पर कई को हैरान हुई है। धर्माणी इस समय एआईसीसी के सचिव हैं और ब्राह्मण हैं। मंत्रिमंडल के गठन के बाद कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या मंडी और कांगड़ा सनासदीय क्षेत्र अभी से मुख्यमंत्री सुक्खू ने भाजपा के लिए खुले छोड़ दिये हैं? क्या कांग्रेस सिर्फ़ शिमला और हमीरपुर पर फोकस करना चाहती है? पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की हवा के सहारे भाजपा राज्य की सभी चार सीटें जीत गयी थी। हालाँकि बाद में मंडी से भाजपा सांसद रामस्वरूप शर्मा की मौत के कारण उपचुनाव हुआ, जिसमें प्रतिभा सिंघी ने भाजपा उम्मीदवार को हरा दिया। अब शिमला, हमीरपुर और कांगड़ा सीटें ही भाजपा के पास हैं। यदि 2024 की बात की जाए कांग्रेस के लिए चुनौती कई ज़िलों में है। मसलन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मंडी में 10 में दो, चम्बा में पाँच में दो, बिलासपुर में चार में एक, और सिरमौर में पाँच में से तीन सीटें मिली थीं। इन ज़िलों में भाजपा का प्रभाव ख़त्म करने के लिए कांग्रेस को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। मंत्रिमंडल गठन इसमें काम आ सकता था; लेकिन समस्या यह है कि छोटा राज्य होने के कारण 10 ही मंत्री बन सकते हैं। शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री सुक्खू ने क्षेत्रीय सन्तुलन की जगह जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखा।

चूँकि राज्य में राजपूतों की संख्या सबसे ज़्यादा 33 फ़ीसदी है। उनके बाद ब्राह्मण हैं, जिनकी संख्या 18 फ़ीसदी के क़रीब है। हालाँकि अनुसूचित जाति की संख्या 25 फ़ीसदी है, जबकि अन्य पिछड़ा वरह (ओबीसी) 14 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति पाँच फ़ीसदी हैं। हिमाचल में अब तक छ: मुख्यमंत्री बने, जिनमें सिर्फ़ शांता कुमार ही ब्राह्मण थे, बाक़ी सभी राजपूत रहे। ऐसे में हिमाचल की राजनीति को राजपूत दबदबे वाली कहा जा सकता है। शायद सुक्खू ने मंत्रिमंडल गठन में इसी तथ्य को ध्यान में रखा।

जो पहली बार में ही मंत्री 

यह दिलचस्प है कि सुक्खू सरकार में छ: ऐसे विधायक हैं, जो पहली बार मंत्री बने हैं। ख़ुद सुक्खू कभी मंत्री नहीं रहे और अब सीधे मुख्यमंत्री बने हैं। उनके अलावा हर्षवर्धन चौहान, रोहित ठाकुर, विक्रमादित्य सिंह, अनिरुद्ध सिंह जगत सिंह नेगी भी पहली बार मंत्री बने हैं। हालाँकि यह सभी एक से ज़्यादा बार विधायक बन चुके हैं। अनुभव के  लिहाज़ से देखा जाए उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री सभी पर भारी पड़ते हैं। एक पत्रकार से मंत्री बनने तक मुकेश का सफ़र अफ़सरशाही से बेहतर तालमेल के लिए जाना जाता है।

यह माना जाता है कि केंद्रीय सरकार में भी अफ़सरों से मुकेश का तालमेल बेहतरीन रहा है और दिवंगत वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार के समय दिल्ली से पैसा और परियोजनाएँ, दोनों ही लाने में उनकी बड़ी भूमिका रही थी। उन्हें हमेशा से वीरभद्र सिंह (अब प्रतिभा सिंह) ख़ेमे का नेता माना जाता रहा है, जिन्होंने प्रदेश कांग्रेस में कभी अपना कोई गुट नहीं बनाया।

सत्ता से बाहर होने वाली भाजपा सरकार के समय नेता प्रतिपक्ष के नाते मुकेश ने दर्ज़नों बार सरकार को घेरा और कांग्रेस को मज़बूत विपक्ष के रूप में खड़ा किया। हालाँकि यह माना जाता है कि उन्हें मिलने वाले विभागों से उनके समर्थक ख़ुद नहीं हैं, क्योंकि वीरभद्र सरकार में उनके पास उद्योग जैसा बड़ा महकमा था। यहाँ यह बता दें कि सुक्खू ख़ुद वीरभद्र सिंह के कट्टर विरोधी रहे हैं। हालाँकि उन्हें राहुल गाँधी का क़रीबी नेता माना जाता है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि वह राहुल के कारण ही मुख्यमंत्री बने हैं। अन्यथा चुनाव के बाद ज़्यादातर लोग मान रहे थे कि मुकेश ही मुख्यमंत्री बनेंगे।

नये मंत्रियों के सामने लोकसभा चुनाव से पहले बेहतर काम करने की चुनौती रहेगी, ताकि पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सके। सुक्खू को भी प्रशासन की बारीकियाँ सीखनी होंगी और अफ़सरशाही पर नकेल कसकर रखनी होगी। साथ ही पार्टी के विधायकों की नाराज़गी का भी उन्हें ख़याल रखना होगा।

लोकतंत्र पर कुठाराघात

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली नगर निगम में बहुमत प्राप्त करने के बावजूद आम आदमी पार्टी अपना मेयर नहीं बना पा रही है। भाजपा इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है। इससे साफ़ होता है कि भाजपा हर हाल में लोकतंत्र की हत्या करके सत्ता चाहती है।

दिल्ली नगर निगम के मेयर चुनाव को लेकर जो बवाल भाजपा मचा रही है, वह सीधे तौर पर बिना जन समर्थन के लोकतंत्र की हत्या करके किसी भी तरह सत्ता हथियाने का ही प्रयास है। दिल्ली नगर निगम के चुनाव के एक महीने के अन्तराल में मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव 6 जनवरी को होना था। दिल्ली नगर निगम की बैठक में लगातार हो रहा हंगामा और मेयर चुनाव का टलना दिल्ली के उपराज्यपाल की भूमिका और कार्यशैली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अगर उपराज्यपाल की इस नाकामी को वह स्वयं भी व$क्त रहते समझ लें, तो यह उनके और जनता के हित में होगा।

दिल्ली नगर निगम में मेयर का पद कोई छोटा-मोटा पद नहीं, बल्कि एक छोटी सरकार के मुखिया के बराबर है। लेकिन दिल्ली में नगर निगम के मेयर के पास कई शक्तियाँ मुख्यमंत्री से भी ज्यादा होती हैं। ऐसे में भाजपा की सुपर पॉवर कभी नहीं चाहती कि यह ताक़त उसके अलावा किसी और के हाथ में जाए। वैसे भी राजनीति में सारा खेल ही अब ताक़त का हो गया है, जिसे खोना कोई भी नहीं चाहता। दिल्ली नगर निगम के मेयर के पास इतनी ताक़त आज से नहीं है। जब दिल्ली मुख्यमंत्री नहीं होता था, तब दिल्ली का मेयर ही दिल्ली का बॉस होता था। आज भी दिल्ली नगर निगम का मेयर नगर निगम के अधिकार से जुड़ा कोई भी फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र होता है। उसके लिए किसी भी फ़ैसले की स्वीकृति के लिए फाइल को दिल्ली के उप राज्यपाल के पास या केंद्र सरकार के पास भेजने की अनिवार्यता अथवा बाध्यता नहीं होती है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री को कोई भी फाइल पास करने के लिए उप राज्यपाल से स्वीकृति लेनी होती है। कई कामों के लिए मुख्यमंत्री को केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है।

केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते दिल्ली के मुख्यमंत्री के लगभग हर काम में केंद्र सरकार और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उप राज्यपाल पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं मेयर के पास निगम के किसी भी अधिकारी व कर्मचारी का तबादला करने की शक्ति होती है। कई बड़े फ़ैसले लेने की शक्ति होती है।

वास्तव में किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री ही क्षेत्र का प्रशासक होता है, परन्तु दिल्ली देश की राजधानी है और केंद्र सरकार की सत्ता दिल्ली से ही चलती है, इस वजह से दिल्ली में मुख्यमंत्री के पास ज्यादा अधिकार हैं ही नहीं। साथ ही जो कुछ अधिकार दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास थे भी, पिछले आठ वर्षों में केंद्र सरकार ने उनमें से अधिकतर अधिकार छीन लिए हैं। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर उप राज्यपाल को दिल्ली का बॉस भी घोषित कर दिया है। अब मुख्यमंत्री को अपने सभी फ़ैसलों की फाइल उप राज्यपाल के पास भेजना अनिवार्य हो चुका है। इसके विपरीत मुख्यमंत्री के फ़ैसलों को मानने के लिए उप राज्यपाल बाध्य नहीं है। वहीं दिल्ली के मेयर की तरह मुख्यमंत्री अपनी सरकार के अधीन अधिकारियों व कर्मचारियों का तबादला तक नहीं कर सकता। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री को सरकार से जुड़े फ़ैसले लेने के लिए भी उप राज्यपाल अथवा केंद्र सरकार की अनुमति लेनी आवश्यक है।

मेयर व मुख्यमंत्री की ताक़तों में अन्तर से साफ़ हो चुका है कि आख़िर भाजपा मेयर पद पर आम आदमी पार्टी के किसी पार्षद को क्यों नियुक्त नहीं होने देना चाहती? भाजपा के बवाल से साफ़ हो गया है कि उसने भले ही नगर निगम चुनाव में हार के बाद अपना मेयर बनाने वाले बयान से पलटी मार ली थी, परन्तु भाजपा नेताओं में अंदरख़ाने यह तय हो चुका था कि मेयर अपना ही बनाना है, चाहे किसी भी तरह सही।

अगर देखा जाए, तो आम आदमी पार्टी का ही नैतिक मूल्यों के आधार पर मेयर बनना चाहिए, क्योंकि उसने नगर निगम की 250 सीटों में से 234 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जो कि दिल्ली नगर निगम में जीत के लिए पर्याप्त सीटें हैं तथा अपना मेयर बनाकर इस छोटी सरकार को चला सकती है। वहीं भाजपा ने 104 सीटें जीती हैं। मेयर के चुनाव में मतदान के लिए भाजपा के पास दिल्ली के लोकसभा सदस्य हैं।

परन्तु भाजपा के पास कुल पार्षदों की संख्या बहुमत से काफ़ी कम है। कांग्रेस के नौ पार्षदों में से दो आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस के बाक़ी सात सदस्य मेयर चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे। ऐसे में अब मेयर बनाने के लिए 133 पार्षदों के बहुमत की आवश्यकता है, जो भाजपा के पास किसी भी जोड़तोड़ के बाद भी नहीं हैं। परन्तु भाजपा बड़े नेताओं की जुबान से सत्ता के नशे का स्वाद नहीं जा रहा है, इसीलिए वे मेयर अपना ही बनाना चाहते हैं। पेंच इसी में फँसा हुआ है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली नगर निगम की सत्ता की हक़दार है व भाजपा इसे हड़पना चाहती है। अगर आम आदमी पार्टी का मेयर बन जाता है, तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और ताक़तवर हो जाएँगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही केजरीवाल भी अपनी मुट्ठी में सभी ताक़तों को समेटकर रखना चाहते हैं। परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि अरविंद केजरीवाल जनहित से जुड़े फ़ैसलों में जनहित कार्यों के लिए चर्चा में हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई वादों की नाकामी के चलते लोगों का निशाना बनते जा रहे हैं।

वहीं अगर भाजपा ने अपना मेयर बना लिया, तो उसकी नीतियों तथा सत्ता हड़प नीति पर सवाल उठेंगे। यह अलग बात है कि भाजपा नेता इसकी परवाह नहीं करते। भाजपा कई राज्यों में पूर्ण समर्थन के बिना ही सरकार पहले भी बना चुकी है, यहाँ तक कि उसने कई राज्यों में कांग्रेस की सरकार तोडक़र सत्ता हथियायी है। कई राज्यों में वह इस तरह की नाकाम कोशिश भी कर चुकी है। फिर भी अगर दिल्ली नगर निगम में भाजपा का मेयर बना, तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ताक़त नहीं बढ़ सकेगी। परन्तु नगर निगम में भाजपा के पास पार्षदों की संख्या इतनी है कि अगर उसके पाले में 19-20 पार्षद आ जाएँ, तो वह दिल्ली नगर निगम में अपनी सत्ता चला सकती है। वहीं अगर नहीं बना सकी, तो उसके पार्षद आम आदमी पार्टी की निगम सत्ता को हर रोज़ हंगामेदार व प्रभावित करने के लिए पर्याप्त हैं।

सर्वविदित है कि दिल्ली नगर निगम के चुनाव जीतने के लिए केंद्र सरकार ने चुनाव टालने से लेकर हर तिकड़म भिड़ायी थी, परन्तु उसकी कोई योजना उसके काम नहीं आ सकी। वैसे उसने जो कोशिश की, उससे उसकी बड़ी हार छोटी हार में बदल गयी। अब अगर नगर निगम में उप राज्यपाल वीके सक्सेना की भूमिका की बात करें, तो वह पहले ही आम आदमी पार्टी के रास्ते में रोड़े बिछा चुके हैं। उप राज्यपाल ने बड़ी ही चतुराई से मेयर के चुनाव के लिए भाजपा पार्षद सत्या शर्मा को पीठासीन अधिकारी नामित कर दिया। इस तरह से पक्षपातपूर्ण पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति आम आदमी पार्टी ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए भाजपा पर कई आरोप लगाये। उप राज्यपाल को आम आदमी पार्टी की सरकार ने पीठासीन अधिकारी के लिए मुकेश गोयल का नाम भेजा था, परन्तु उप राज्यपाल ने उनके स्थान पर भाजपा पार्षद को नियुक्त कर दिया। और फिर वही हुआ, जिसकी आशंका थी। मेयर चुनाव के दिन भाजपा पार्षदों के विकट हंगामे के बाद पीठासीन अधिकारी ने मेयर चुनाव की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। साफ़ है कि भाजपा इस दौरान शान्त नहीं बैठेगी और दिल्ली नगर निगम में अपनी सत्ता बनाने के लिए अंदरख़ाने हर खेल खेल रही होगी।

सवाल उठ रहे हैं कि क्या उपराज्यपाल ने नगर निगम में भाजपा की हार के बावजूद उसकी सत्ता वापसी के लिए यह चाल जानबूझकर चली है? क्या इस पक्षपातपूर्ण व अवसरवाद की चाल से आम आदमी पार्टी के पार्षद भाजपा की ओर मुड़ जाएँगे। यह बात पहले से ही चल रही है कि आम आदमी पार्टी के पार्षदों को भाजपा तोडऩे की ताक में लगातार लगी हुई है। परन्तु वह एक चालाक बिल्ले की तरह संत मुद्रा में बैठी है, ताकि जनता में यह चर्चा गर्मी न पकड़ सके कि भाजपा अनैतिक रूप से दिल्ली नगर निगम की सत्ता हथियाने की कोशिश कर रही है। उप राज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा नियुक्त 10 मनोनीत पार्षदों को पहले शपथ दिलाना भी कहीं न कहीं इसी चतुराई का नतीजा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस पर काफ़ी नाराज़ हैं। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद-243(आर) का उल्लंघन बताते हुए कहा है कि नगर निगम सदन में मनोनीत सदस्यों के मतदान करने पर रोक है व उनसे मत डलवाने का प्रयास करना असंवैधानिक है। आम आदमी पार्टी के तीन राज्यसभा सदस्य व दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष की ओर से नामित 14 विधायक भी मेयर व डिप्टी मेयर के लिए होने वाले चुनाव में मतदान कर सकते हैं। जानकार कह रहे हैं कि दिल्ली नगर निगम में मेयर व डिप्टी मेयर की चुनाव प्रक्रिया को भाजपा जबरन जटिल बना रही है। पहले भी राजनीतिक पार्टियों को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसकी वजह दिल्ली नगर निगम अधिनियम द्वारा उप राज्यपाल को दी गयी शक्तियाँ हैं। दिल्ली नगर निगम डीएमसी अधिनियम के अनुसार काम करता है, क्योंकि नगर निगम विधायिका नहीं है। भारतीय संविधान में केवल विधायिका, जैसे विधानसभा, लोकसभा व राज्यसभा के लिए ही नियम हैं, जहाँ $कानून बनाये जाते हैं। नगर निगम अधिनियम में अलग तरह के नियम हैं। संशोधित डीएमसी अधिनियम, 2022 ने केंद्र अथवा उपराज्यपाल को सभी शक्तियाँ दे दी हैं। उपराज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होता है। उपराज्यपाल वीके सक्सेना भाजपा समर्थक पहले ही हैं, जिससे आम आदमी पार्टी अपनी जीत के बाद भी नगर निगम में सत्ता हासिल कर पाने में अड़चनों का सामना कर रही है। कहने को उप राज्यपाल को संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली नगर निगम की सत्ता में आम आदमी पार्टी को ही सत्ता चलाने का अवसर देना चाहिए।

ख़ामोश हुई समाजवाद की बुलंद आवाज़

इंजीनियरिंग से लेकर समाजवाद और राजनीति तक का शरद यादव का सफ़र अद्भुत था। राजनीति की उनकी भाषा-शैली में तंज भी होता था, उपदेश भी, गम्भीरता भी, तहज़ीब भी और ईमानदारी भी। शरद यादव लोहिया के विचार से प्रभावित थे; लेकिन वर्तमान राजनीति में भी काफ़ी प्रासंगिक रहे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई का ही असर था कि उन्होंने अपने राजनीतिक विचार और उच्च मूल्यों को हमेशा जीवित रखा। शरद यादव का जाना देश की राजनीति में एक ख़ालीपन भरता है क्योंकि उनके तेवर और ईमानदारी वाले नेता अब इक्के-दुक्के ही बचे हैं।

शरद यादव से मोहब्बत करने वाले हर व्यक्ति को उनका जाना बहुत पीड़ा देकर गया है। शरद 11 बार सांसद रहे। और भी दिलचस्प यह है कि वह तीन अलग-अलग राज्यों- बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की विभिन्न सीटों से चुने गये। यादव पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े तो उनकी उम्र सिर्फ़ 25 साल थी। वह जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन का दौर था। शरद यादव मीसा क़ानून के तहत तब जेल में थे। जेल में उन्हें डालने का कारण था- सरदार सरोवर डैम की ऊँचाई बढ़ाये जाने विरोधी आन्दोलन में हिस्सा लेना। आपातकाल के दौरान शरद एक बार सात महीने (आपातकाल लागू होने से पहले ही) और दूसरी बार 11 महीने जेल में रहे।

यही वह समय था, जब शरद जेल में सर्वोदय विचारधारा के विचारक दादा धर्माधिकारी के सम्पर्क में आये, जो जयप्रकाश नारायण (जे.पी.) के $करीबी मित्र थे। उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सेठ गोविंद दास के निधन से ख़ाली हुई, जबलपुर सीट से जेपी ने शरद को पीपुल्स पार्टी का उम्मीदवार बना दिया। हालाँकि तब शरद यादव जेल में बन्द थे। लेकिन शरद कांग्रेस के गढ़ से एक लाख से भी ज़्यादा वोट से जीते। इस तरह उनका संसदीय राजनीति का सफ़र शुरू हुआ।

शरद समाजवाद की एक बुलंद आवाज़ थे। शरद यादव का जन्म भले मध्य प्रदेश में हुआ था; लेकिन उनकी आवाज़ छात्र राजनीति में कॉलेज से लेकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत संसद तक ख़ूब और पूरी मज़बूती से गूँजती रही। भले शरद मूल रूप से मध्य प्रदेश के थे, उनकी राजनीति का केंद्र बाद में बिहार और उत्तर प्रदेश बने। वैसे उनका राजनीतिक दबदबा मध्य प्रदेश से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश तक था। राष्ट्रीय राजनीति में तो वह अलग मुक़ाम पर रहे ही।

01 जुलाई, 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के बंदाई गाँव में उनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ। पढ़ाई में होशियार शरद की इच्छा इंजीनियर बनने की थी। लिहाज़ा इस सपने को पूरा करते हुए जबलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज से बीई की डिग्री गोल्ड मेडल के साथ हासिल ली। इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र संघ के वे अध्यक्ष भी रहे। राजनीति में उनकी रुचि तभी सामने आ गयी थी, जब उन्होंने कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव लड़ा और जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज (रॉबर्टसन मॉडल साइंस कॉलेज) के छात्र संघ अध्यक्ष बने।

राममनोहर लोहिया के समाजवाद के विचार से वह बहुत ज़्यादा प्रभावित थे। यह वही दौर था, जब देश पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण के लोकतंत्र वाद और राम मनोहर लोहिया के समाजवाद की क्रान्ति की लहरों से ओतप्रोत था। युवा नेता के रूप में शरद यादव ने कई आन्दोलनों में हिस्सा लिया। आपातकाल में मीसा बंदी के रूप में जेल में रहे और 27 साल की उम्र में लोकसभा का चुनाव जीता। मध्य प्रदेश की जबलपुर सीट के अलावा वह उत्तर प्रदेश की बदायूँ लोकसभा सीट और बाद में बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट से भी सांसद चुने गये। राज्यसभा के सदस्य भी वे रहे।

शरद यादव जनता दल के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। वह सन् 1989-1990 में केंद्रीय टेक्सटाइल और फूड प्रोसेसिंग मंत्री भी रहे। उन्हें सन् 1995 में जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। सन् 1996 में बिहार से वह पाँचवीं बार लोकसभा सांसद बने। सन् 1997 में जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और सन् 1998 में जॉर्ज फर्नांडिस के सहयोग से जनता दल यूनाइटेड पार्टी (जदयू) बनायी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों में शामिल होकर केंद्र सरकार में फिर से मंत्री बने। सन् 2004 में शरद यादव राज्यसभा गये। सन् 2009 में सातवीं बार सांसद बने; लेकिन सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्हें मधेपुरा सीट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालाँकि जीवन के अन्तिम पड़ाव में अपने घनिष्ठ सहयोगी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मन-मुटाव भी हुआ। इसलिए, शरद यादव ने जदयू से नाता तोड़ लिया था। उनकी बेटी सुभाषिनी यादव कांग्रेस की नेता हैं।

राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ लड़ा चुनाव

शरद यादव ने एक चुनाव अमेठी से राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ था। इसका क़िस्सा भी काफ़ी मशहूर है। संजय गाँधी की एक हवाई हाडे में मौत हो चुकी थी और अमेठी में लोकसभा का उपचुनाव था। कांग्रेस ने संजय के बड़े भाई राजीव गाँधी को मैदान में उतारा था। चौधरी चरण सिंह ने शरद यादव को राजीव गाँधी के मुक़ाबले अपना उम्मीदवार बनाया। तब यह चर्चा थी कि चरण सिंह और नानाजी देशमुख ने ऐसा किसी ज्योतिष की सलाह पर किया था। ज्योतिष का दावा था कि राजीव गाँधी हार जाएँगे। दोनों को लगा कि ऐसा हुआ, तो इंदिरा गाँधी सरकार को दबाव में लाया जा सकता है। शरद $खुद यह चुनाव नहीं लडऩा चाहते थे। चरण सिंह, नाना जी देशमुख और विपक्ष के तमाम दिग्गजों को प्रचार में उतारने के बावजूद शरद जीत नहीं पाये।

एक बार तो शरद यादव लालू प्रसाद यादव से ही भिड़ गये थे। मामला तब का है, जब कोर्ट की निगरानी में पार्टी अध्यक्ष का चुनाव हुआ। सन् 1998 में इस चुनाव में शरद यादव जनता दल के अध्यक्ष का चुनाव जीते; लेकिन लालू यादव उनसे ख़फ़ा हो गये। कारण यह था कि उन्होंने चारा घोटाले में जेल जाने से पहले जनता दल को तोड़ अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बना ली थी। संगठन के उस चुनाव में मधु दंडवते पर्यवेक्षक थे। लालू यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री थे; लेकिन पार्टी अध्यक्ष भी बने रहना चाहते थे। लेकिन चुनाव हुआ और लालू की इच्छा के विपरीत शरद चुनाव जीत गये।

वैसे सच यह भी है कि 1990-95 के काल में शरद यादव का लालू यादव को भरपूर राजनीतिक समर्थन रहा। शरद पार्टी टूटने से दु:खी थे और उसके बाद भी इस बात से ग़म में रहे कि मुलायम सिंह यादव, चमन भाई, लालू प्रसाद यादव जैसे नेता क्यों जनता दल से अलग हो गये? साल 1990 के दशक में नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे समाजवादी दिग्गज लालू यादव और कांग्रेस के विरोध में भाजपा से जुड़ रहे थे, तब भी शरद इसके ख़िलाफ़ थे। हालाँकि दिवंगत रामविलास पासवान और अन्य के दबाव के बाद वह मान गये। शरद यादव के वैसे उस समय भाजपा के कई नेताओं के साथ अच्छे निजी रिश्ते थे। लिहाज़ा शरद यादव भी भाजपा नीत एनडीए से जुड़ गये।

उस दौरान उनका एक इंटरव्यू काफ़ी मशहूर हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार ने कभी नरेंद्र मोदी (अब प्रधानमंत्री) को पसन्द नहीं किया। यही कारण था कि सन् 2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया, तो नीतीश कुमार ने बिहार में एनडीए से अलग होने का फ़ैसला लिया। उस वक़्त शरद यादव एनडीए के संयोजक थे। शरद यादव एनडीए से अलग होने के पक्ष में नहीं थे; लेकिन नीतीश कुमार की ज़िद के आगे हार गये। शरद ने एक बार कहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी और एलके आडवाणी संविधान के दायरे में रहकर काम करना पसन्द करते थे।

दिल्ली में जब सन् 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बन गयी, तो उनकी कार्यशैली से असहमत शरद यादव ने तमाम समाजवादी नेताओं को साथ जोडऩे की इच्छा जतायी। साथ ही लालू यादव और नीतीश कुमार को साथ लाने की कोशिश की। शरद के मुताबिक, सन् 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन नीतीश कुमार की पहल से ही बना था। लालू यादव, जो शुरू में साथ नहीं थे; भी बाद में जुड़ गये। नीतीश ने लालू को भरोसा दिलाया था कि अगर दोनों मिल गये, तो नरेंद्र मोदी को रोका जा सकता है। यह बात सच साबित हुई, जब 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत हुई।

शरद का मानना था कि यदि 2015 वाला यह महागठबंधन बना रहता तो सन् 2019 के आम चुनाव के नतीजे अलग होते। सन् 2017 में नीतीश कुमार ने फिर पलटी मार ली और दोबारा एनडीए में चले गये। इससे शरद यादव बहुत ख़फ़ा हुए। उन्होंने इसे नीतीश कुमार का आत्मघाती क़दम बताया था। नीतीश ने भाजपा के साथ सरकार तो बना ली; लेकिन कुछ ही साल में उनका मोहभंग हो गया और पिछले साल 2022 में भाजपा से अलग होकर फिर महागठबंधन की सरकार बना ली। सभी उम्मीद कर रहे थे कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले शरद यादव बड़ी भूमिका निभाकर विपक्ष को एकजुट करेंगे; लेकिन उनके अचानक चले जाने से देश की राजनीति में एक ख़ालीपन भर गया है। उनके परिवार से शोक संवेदना जताने गये कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा भी कि शरद के जाने से देश ही नहीं विपक्ष को भी बहुत नुक़सान हुआ है।

महिला सशक्तिकरण की पहल

सऊदी अरब और दूसरे मुस्लिम देश अपने सख़्त क़ानूनों के लिए जाने जाते हैं। इन देशों में महिलाओं पर पाबंदियों की अक्सर चर्चा रहती है। आज भी कई मुस्लिम देशों में महिलाओं को पुरुषों की तरह खुलकर जीने के अधिकार नहीं हैं। वे परदे के बाहर भी नहीं आ सकतीं। लेकिन सऊदी अरब ने क़रीब पाँच साल पहले महिलाओं को स्टेडियम में बैठकर मैच देखने पर से पाबंदी हटायी थी और आज वहाँ महिलाएँ दुनिया की सबसे तेज़ चलने वाली बुलेट ट्रेन चलाएँगी।

इसके लिए सऊदी अरब रेलवे कम्पनी सार ने पिछले साल महिला पायलटों की भर्तियाँ निकाली थीं, जिसके लिए 28,000 महिलाओं ने आवेदन किया था। इन महिलाओं में से 32 महिलाओं की नियुक्ति हुई और अब उन्हें ट्रेनिंग देकर तैयार कर लिया गया है। बड़ी बात यह है कि ये महिलाएँ जो हाई स्पीड ट्रेन चलाएँगी, वो कोई मामूली ट्रेनें नहीं हैं, बल्कि दुनिया की सबसे तेज़ गति से चलने वाली ट्रेनें हैं। इन ट्रेनों में से एक का नाम हारमिआन एक्‍सप्रेस है, जिसकी रफ़्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटे से लेकर 450 किलोमीटर प्रति घंटे तक है। ये ट्रेनें सऊदी अरब के पवित्र शहरों मक्का से मदीना के बीच में चलेंगी। इन्हें साल 2018 में लॉन्च किया गया था। सऊदी अरब में यह पहली बार होगा कि महिलाएँ बुलेट ट्रेन चलाने जा रही हैं और यह पश्चिम एशिया में भी पहली बार ही हुआ है। अभी तक पश्चिम एशिया में इतनी हाई स्पीड ट्रेनों को महिलाओं ने नहीं चलाया है। इससे यह साफ़ पता चलता है कि सऊदी अरब महिलाओं के प्रति सोच को बदल रहा है। हालाँकि इससे पहले से पूरी दुनिया में महिलाओं की हर क्षेत्र में एंट्री हो चुकी है; लेकिन मुस्लिम देश महिलाओं को आगे बढ़ाने के मामले में पीछे रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि इस छूट से क्या मुस्लिम देश महिलाओं को छूट देंगे? क्या महिलाओं को पुरुषत्व की ग़ुलामी से मुक्ति मिल सकेगी? आज भारत में भी महिलाएँ क्या पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं? इस आधी आबादी को अभी पूर्ण स्वतंत्रता कब मिलेगी? कब अबला का सही मायने में नारी शक्ति का दर्जा मिलेगा और कब वह पुरुष प्रताडऩा से आज़ाद हो सकेगी? 21वीं सदी में महिलाओं की एंट्री सेनाओं से लेकर हवाई जहाज़ उड़ाने और अंतरिक्ष में परचम लहराने तक हुई है और आज महिलाओं से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है और उन्होंने हर कार्य क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है। लेकिन पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चलने वाली महिलाओं के प्रति क्या लोगों का नज़रिया बदला है? क्या वे पूरी तरह सुरक्षित हैं?

सऊदी अरब की अगर बात करें, तो वहाँ पर महिलाएँ काफ़ी हद तक इस मायने में सुरक्षित हैं कि वहाँ महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा दी जाती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि वहाँ पर अपराधियों को सज़ा देने में ज़्यादा समय नहीं लगाया जाता है। न्याय देने के मामले में भारत जितना पीछे है, उससे यहाँ ज़्यादातर लोगों को क़ानून पर उतना भरोसा नहीं हो पाया है, जितना कि होना चाहिए। आज भी लाखों बलात्कार पीडि़ताएँ न्याय के लिए अदालतों के चक्कर लगा रही हैं। हाल ही में दिल्ली में एक युवती को कार से 12 किलोमीटर घसीटे जाने की घटना इस बात का सुबूत है कि भारत में अपराधी अदालतों और पुलिस की कार्रवाई से डरते नहीं हैं।

ऐसी ही कितनी ही घटनाएँ हैं, जिनके बारे में सोचने भर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आख़िर किसके संरक्षण के चलते हमारे देश में अपराधों पर रोक नहीं लग पाती है? आज दुनिया भर के हर क्षेत्र में महिलाएँ सफलतापूर्वक काम कर रही हैं; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएँ अपने कार्यक्षेत्र में बाधाओं और प्रताडऩा से मुक्त हो चुकी हैं। पुलिस जैसे विभाग में महिला पुलिसकर्मियों की दुर्दशा के क़िस्से कितनी ही बार हमारे सामने आ चुके हैं। हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अवसर हासिल होने के बावजूद उन्हें ज़्यादातर जगह पर भोग की वस्तु की नज़र से देखा जाता है। वर्क प्लेस पर महिलाओं को अपने करियर ग्राफ को बेहतर बनाने के लिए हर दिन अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अगर वे अपने क्षेत्र में बहुत बेहतर प्रदर्शन भी करती हैं, तो उनकी तरक़्क़ी पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी कम होती है।

इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन महिलाओं की है, जो राजनीति में होते हुए भी महिलाओं के हित में क़दम नहीं उठाती हैं। केवल चुनावों के दौरान महिलाओं की तक़दीर का रोना रोने वाले नेता ही महिलाओं के सबसे बड़े शोषक बने हुए हैं। अदालतों और पुलिस को अपनी जेब में रखने वाले नेताओं के ख़िलाफ़ महिला नेता भी एक शब्द नहीं बोलतीं। कोई विरला उदाहरण किसी विपक्षी दल के नेता के ख़िलाफ़ हो, तो अलग बात है।

डॉक्टर सीमा कहती हैं कि अगर आप दफ़्तरों का रुख़ करें, तो महिलाओं के साथ भेदभाव करने और उन्हें सेक्स के लिए प्रोत्साहित करने के कितने ही मामले मिल जाएँगे। ज़्यादातर दफ़्तरों उन्हें तब तक प्रताडि़त और परेशान किया जाता है, जब तक कि वे अपने बॉस को अपना जिस्म नहीं सौंप देतीं। हालाँकि हर जगह ऐसा नहीं है; लेकिन तक़रीबन 35 से 40 फीसदी तक महिलाओं के साथ यह होता है कि वे सेक्स के लिए अपने सीनियर या सीनियर्स का आमंत्रण स्वीकार करें या कर रही हैं।

वूमन आइकॉन नेटवर्क नाम की संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि दफ़्तरों में प्रेग्‍नेंट महिला के साथ भेदभाव करना क़ानूनन जुर्म है। अगर कोई महिला प्रेगनेंसी में काम करना चाहती है, लेकिन उसे जबरन छुट्टी पर जाने के लिए बाध्य किया जाता है, तो इसे क्‍या कहा जाए?

सामाजिक कार्यकर्ता चेतना सिंह कहती हैं कि जिस तरह से घरों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ होती है, उसी तरह दफ़्तरों में भी उनके साथ किसी-न-किसी रूप में हर दिन छेड़छाड़ होती रहती है। यही वजह है कि महिलाओं में पहले से ज़्यादा बोल्डनेस आयी है और वे भी पुरुषों की तरह इसमें शामिल हो रही हैं। उनका ध्यान इस बात से बिलकुल हटने लगा है कि आख़िरकार वे एक महिला ही हैं और उन्हें सेक्स सम्बन्धी कुछ गोपनीय पहलुओं पर हर किसी से बात नहीं करनी चाहिए। गृहणी कल्पना शर्मा कहती हैं कि उनकी बेटी दो साल से नौकरी कर रही है। उसने एक लडक़े की कई बार शिकायत की, तब हमने उसके बॉस से शिकायत की, जिसके बाद मेरी बेटी पर ही कई तरह के आरोप लगने लगे। जैसे कि वह ख़ुद लडक़ों के मुँह लगती है, वग़ैरह-वग़ैरह। इसके बाद मेरी बेटी ने अपनी नौकरी बदल दी। अब वह वहाँ शान्ति से काम कर रही है।

गुजरात की कपड़ा मिलों में काम करने वाली लड़कियाँ और महिलाएँ अपने चरित्र को बमुश्किल ही बचाकर रख पाती हैं। हालाँकि बहुत-सी महिलाएँ और लड़कियाँ एक्स्ट्रा लव अफेयर में पड़ी हुई यहाँ मिल जाएँगी। फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं और लड़कियों का भी यही हाल है।

दरअसल हर क्षेत्र में महिला कर्मचारियों की बढ़ती माँग ने पुरुषों के प्रति उनके झुकाव को भी हवा दी है। हालाँकि जहाँ का मैनेजमेंट सख़्त होता है, वहाँ यह सब नहीं चलता। लेकिन अगर मैनेजमेंट, बॉस या मालिक ही ख़राब हों, तो उनसे टक्‍कर लेना महिला कर्मचारियों के लिए भारी पड़ता है, जिसके आगे बहुत-सी महिलाएँ सरेंडर कर देती हैं और यह सोचकर कि यह सब तो चलता है, अपने को उसी आग में झोंक देती हैं, जिसके लिए उन्हें समाज का एक बड़ा पुरुष वर्ग देखता है। ऐसे में महिलाओं के लिए अच्छे मैनेजमेंट वाली कम्पनियों में नौकरी ढूँढना एक चुनौतीपूर्ण विषय है।

जिस्मानी तौर पर सुरक्षा के अलावा महिलाओं के लिए पुरुषों के समान वेतन पाने की चुनौती भी हमेशा बनी रहती है। लीडरशिप का मौक़ा भी उनके पास कम ही होता है। अगर कहीं महिलाओं को लीडरशिप का मौक़ा मिल भी जाता है, तो वहाँ वो अपने जूनियर पुरुष को भी वर्चस्व वाला मान लेती हैं, क्योंकि वे पहले से ही समर्पण के भाव से घिरी होती हैं, जो उन्हें संस्कारों में घर के अंदर से ही परोस दिया जाता है। हालाँकि हर महिला इस तरह की नहीं होती। कई महिलाएँ लीडरशिप हाथ में आते ही उसी लहज़े से लवरेज हो जाती हैं, जो किसी लीडर पुरुष का होता है। भारत में तो राष्ट्रपति भी इस समय एक महिला ही हैं। इससे पहले भी महिला राष्ट्रपति और महिला प्रधानमंत्री हमारे देश में रही हैं; लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या इससे सही मायने में महिलाओं को सुरक्षा और सशक्तिकरण मिल सका है? कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ के कितने ही मामले हर रोज़ होते होंगे; लेकिन ज़्यादातर महिलाएँ इसे हर रोज़ की गतिविधि मानकर इसे सहज स्वीकार कर लेती हैं। यही महिलाओं की सबसे बड़ी कमी होती है।

उनकी दूसरी कमी यह होती है कि वो उन कुलिग पुरुषों से कम बात करती हैं, जो सीधे और अच्छे होते हैं, कम बात करते हैं और काम पर ध्यान देते हैं। महिलाओं को ध्यान रखना चाहिए कि उनके इस प्रवृत्ति के पुरुष सहकर्मी महिलाओं के सम्मान और उनकी गरिमा का ख़याल रखते हैं। उनके साथ ही महिलाओं को तालमेल बिठाना चाहिए, क्योंकि ऐसे पुरुष उनकी मदद भी करने में अपना कोई लालच नहीं देखते, ताकि उनकी बेहतर मदद हो सके।

सम्मेद शिखर जी मामला: आस्था में राजनीतिक घुसपैठ

झारखण्ड का हिमालय कहे जाने वाले पारसनाथ पहाड़ी पर गिरिडीह ज़िले में सम्मेद शिखर जी नामक पर्वत जैनियों का सर्वोच्च तीर्थ स्थल है। इस पुण्य क्षेत्र में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष की प्राप्ति की। यहाँ पर 23वें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ ने भी निर्वाण प्राप्त किया था। बीते कुछ दिनों से सम्मेद शिखर पर सरकार के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ जैन समुदाय झारखण्ड से लेकर दिल्ली, मुम्बई, जयपुर व अन्य जगहों पर आन्दोलन किया। केंद्र सरकार ने फ़ैसले में संशोधन किया। राज्य सरकार ने भी सहमति जतायी। इसके बाद भी सम्मेद शिखर जी की पवित्रता को लेकर जैन समाज चिन्तित है। इस बीच आदिवासी समुदाय ने भी सम्मेद शिखर पर अपनी आस्था जताते हुए दावा ठोक दिया है और आन्दोलन का ऐलान किया है।

सम्मेद शिखर मामले ने लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि यह आस्था का टकराव है या फिर राजनीतिकरण का प्रयास हो रहा? लगता है आने वाले दिनों में विवाद और गहराएगा। क्योंकि जैन और आदिवासी समाज अपनी-अपनी आस्था जताते हुए एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। वहीं, राजनीतिक बयानबाज़ी, केंद्र और राज्य सरकार का एक-दूसरे पर आरोप, फ़ैसले का श्रेय लेने की होड़, जैसी तमाम बातें दर्शा रही हैं कि आस्था के टकराव के बीच वोट बैंक के लिए इस मामले को राजनीतिक रूप देने का प्रयास जारी है।

तीर्थ स्थल बनाम पर्यटन स्थल

रघुवर दास के मुख्यमंत्रित्व-काल में 22 अक्टूबर, 2018 को झारखण्ड सरकार के पर्यटन, कला संस्कृति और खेलकूद विभाग ने एक कार्यालय आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया है कि पारसनाथ सम्मेद शिखर जी सदियों से जैन धर्मावलंबियों का पवित्र और पूजनीय स्थल है। इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। रघुवर सरकार ने ही 26 फरवरी, 2019 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें गिरिडीह के पारसनाथ मधुवन का उल्लेख पर्यटन स्थल के तौर पर किया गया है।

यह गजट अधिसूचना अकेले पारसनाथ मधुवन के बारे में नहीं, बल्कि इसमें राज्य के सभी 24 ज़िलों के पर्यटन स्थलों का उल्लेख किया गया है। इसके बाद भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 26 फरवरी, 2019 को एक गजट जारी किया, जिसमें इसे वन्य जीव अभयारण्य, इको सेंसेटिव जोन पर्यटन स्थल के रूप में चिह्नित किया गया है। झारखण्ड की हेमंत सोरेन की नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने वर्ष 2021 में नयी पर्यटन नीति घोषित की। इसका गजट नोटिफिकेशन 17 फरवरी, 2022 को जारी किया गया। इस नोटिफिकेशन में धर्मस्थल की पवित्रता बरक़रार रखते हुए इसके विकास की बात कही गयी है। जैन समाज ने इन सभी नोटिफिकेशन का विरोध किया। समाज के धर्मगुरुओं का कहना है कि इसे धार्मिक स्थल रहने दिया जाए, अन्यथा पर्यटन क्षेत्र बनाने से इस स्थान की पवित्रता भंग हो जाएगी।

आन्दोलन तेज़

बीते वर्ष फरवरी में हुए नोटिफिकेशन का विरोध धीरे-धीरे सुलग रहा था। इस बीच पारसनाथ पहाड़ी पर पर्यटन गतिविधियाँ बढ़ी। सम्मेद शिखर के आसपास के इलाक़े में मांस-मदिरा की ख़रीदी-बिक्री और सेवन प्रतिबंधित है। इसके बावजूद कुछ दिन पहले यहाँ शराब पीते युवक का वीडियो वायरल हुआ था।

इसके बाद विवाद तेज़ हो गया। धर्मस्थल से जुड़े लोगों का मानना है कि पर्यटन स्थल घोषित होने के बाद से जैन धर्म का पालन नहीं करने वाले लोगों की भीड़ यहाँ बढ़ी। यहाँ मांस-मदिरा का सेवन करने वाले लोग आने लगे हैं। जैन समाज का आन्दोलन तेज़ हो गया। बीते वर्ष दिसंबर से अब तक देश-विदेश के कई शहरों में जैन धर्मावलंबियों ने मौन जुलूस निकाला। धीरे-धीरे मामला तूल पकड़ा और झारखण्ड से लेकर दिल्ली, मुम्बई, जयपुर तक जैन समाज के लोग सडक़ों पर उतर आये। इस बीच जयपुर में दो जैन मुनियों ने सम्मेद शिखर को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने के विरोध में अनशन शुरू किया और प्राण त्याग दिये। जैन मुनी सुज्ञेय सागर महाराज ने 3 जनवरी को और 7 जनवरी को मुनी समर्थ सागर ने प्राण त्यागे।

केंद्र ने फ़ैसला लिया वापस

जैन समाज के विरोध को देखते हुए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मंत्री भूपेंद्र यादव ने समाज के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। इसके बाद केंद्र सरकार ने फ़ैसला लिया कि सम्मेद शिखर अब पर्यटन क्षेत्र नहीं होगा। केंद्र सरकार ने तीन साल पहले जारी किये गये अपने आदेश को वापस ले लिया। पर्यावरण मंत्रालय ने इसे लेकर 5 जनवरी को दो पेज की चिट्ठी राज्य सरकार को भजी। इसमें लिखा कि इको सेंसेटिव जोन अधिसूचना के खंड-3 के प्रावधानों के कार्यान्वयन पर तत्काल रोक लगायी जाती है, जिसमें अन्य सभी पर्यटन और इको-टूरिज्म गतिविधियाँ शामिल हैं। राज्य सरकार को तत्काल सभी आवश्यक क़दम उठाने का निर्देश दिया गया। साथ रही केंद्र सरकार ने निगरानी समिति बनायी।

राज्य सरकार से कहा गया है कि वह इस समिति में शामिल होने के लिए जैन समुदाय से दो सदस्यों और स्थानीय जनजातीय समूह से एक सदस्य को स्थायी सदस्य के रूप में आमंत्रित करे। इसके अलावा इस क्षेत्र में शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री, तेज़ संगीत या लाउडस्पीकर बजाना, पालतू जानवरों के साथ आना, अनधिकृत कैम्पिंग और ट्रैकिंग, मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गयी। केंद्र सरकार का फ़ैसला आने से पहले उसी दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरने ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को सम्मेद शिखर मामले में पत्र लिखा था और 2019 के फ़ैसले पर विचार करने का आग्रह किया था।

नया विवाद हुआ शुरू

केंद्र सरकार के फ़ैसले और राज्य सरकार के आश्वासन पर जैन समाज का विरोध थोड़ा कम हुआ; लेकिन साथ ही एक नया विवाद उठ गया। झारखण्ड के आदिवासी संथाल समुदाय ने दावा किया है कि पूरा पहाड़ उनका है। आदिवासियों का कहना है कि यह उनका मरांग बुरु (बूढ़ा पहाड़) है। यह उनकी आस्था का केंद्र है। यहाँ वे हर साल आषाढ़ी पूजा में सफ़ेद मुर्ग़े की बलि देते हैं। इसके साथ छेड़छाड़ उन्हें मंज़ूर नहीं होगी। आदिवासी समाज का 10 जनवरी को पारसनाथ में महा जुटान हुआ।

समाज ने 25 जनवरी तक राज्य सरकार को इस पर फ़ैसला लेने का अल्टीमेटम दिया है। उनका कहना है कि हमारी माँग पूरी नहीं हुई तो 30 जनवरी को उलिहातू से केंद्र और राज्य सरकार के ख़िलाफ़ बड़ा आन्दोलन शुरू करेंगे। इस आन्दोलन में झामुमो के विधायक लोबिन हेब्रम, पूर्व विधायक गीता कोड़ा समेत कई आदिवासी नेता साथ दे रहे हैं।

श्रेय लेने वाले ख़ामोश

सम्मद शिखर को लेकर विवाद शुरू हुआ, तो राजनीति भी शुरू हो गयी। राज्य सरकार ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह सब भाजपा के शासनकाल में हुआ है। केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी की है, वही रद्द कर सकती है। प्रदेश भाजपा और झामुमो आमने-सामने थी। केंद्र ने 2019 की अधिसूचना को संशोधित करते हुए राज्य सरकार को पत्र लिखा और निर्देश दिया। केंद्र ने जैन समाज का हित की बात करते हुए श्रेय लिया। वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को लिखे अपने पत्र का हवाला देते हुए इस फ़ैसले का श्रेय लेने का प्रयास किया।

झामुमो और भाजपा नेता भी जैन समाज के हित में तीर्थ स्थल घोषित किये जाने का श्रेय लेने में जुट गये। अब जब इस विवाद में ख़ुद गठबंधन सरकार के एक विधायक (झामुमो के) लोबिन हेब्रम शिखर सम्मद पर आदिवासियों का अधिकार को लेकर आन्दोलन खड़ा कर रहे, तो सरकार और पार्टी ने चुप्पी साध ली है। केंद्र की तरफ़ से भी कुछ नहीं कहा जा रहा। मौज़ूदा राजनीति में कोई आदिवासी समाज को भी नाख़ुश नहीं करना चाहता। वह भी राज्य में एक बड़ा वोट बैंक है। लिहाज़ा भविष्य में यह आन्दोलन क्या रुख़ लेता है और केंद्र व राज्य सरकार क्या क़दम उठाती है, इसका फ़िलहाल इंतज़ार किया जा रहा है।

निकालना होगा रास्ता

यह सही है कि तीर्थ और पर्यटन स्थल में अन्तर होता है। तीर्थ स्थल का जुड़ाव आस्था से होती है। श्रद्धालु कष्ट को भूल कर उस स्थल को पूजते हैं। यहाँ खानपान समेत सभी चीज़ें भिन्न होती हैं। वहीं पर्यटन स्थल में वह भाव नहीं आता है। यहाँ न ही खानपान पर कोई पाबंदी होती, और न ही किसी अन्य बात की। इसे पिकनिक स्पॉट के रूप में देखा जाता है। हालाँकि जैन समाज हो या आदिवासी समाज, दोनों ही इसे अपना धर्म स्थली बता रहे; लेकिन हर धर्म की अपनी-अपनी आस्था होती है। अपनी मान्यता होती है। जैन समाज में जहाँ बलि की प्रथा नहीं है, वहीं आदिवासी समाज में बलि की प्रथा है। दोनों ही समाज की मान्यताएँ अलग-अलग हैं। पूजा-पाठ, भक्ति के तरीक़े अलग-अलग हैं।

उधर, स्थानीय लोग केवल शान्ति चाहते हैं। क्योंकि यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, जिनसे उनका रोज़गार चलता है। केंद्र और राज्य सरकार को इस मामले पर गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है। केवल नोटिफिकेशन कर देने या धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर बचाने के प्रयास को दिखाते हुए श्रेय लेने से सम्मेद शिखर का मान, सम्मान और आस्था बरक़रार नहीं रहेगा। इसके लिए राजनीतिक चश्मे को उतारकर एकजुटता से सभी को साथ लेकर ठोस निर्णय लेने की ज़रूरत है। नहीं तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में विवाद और बढ़ेगा, जिसकी आग की चपेट में झारखण्ड ही नहीं पूरा देश आएगा।

खसरा व रूबेला के ख़तरे से निपटेगा भारत

भारत सरकार जी-20, 2023 की अध्यक्षता में व्यस्त है। भारत सरकार का जी-20 का जो एजेंडा है, उसमें स्वास्थ्य पर भी फोकस है। इसमें भारत ऐसी वैश्विक स्वास्थ्य संरचना का नज़रिया सामने रखेगा, जो अमीर और ग़रीब देशों को एक साथ वैश्विक स्वास्थ्य संरचना का लाभ मिले और वे बीमारियों व महामारियों से पैदा आपात स्थितियों का सामना कर सके। एक स्वस्थ पृथ्वी का भारत का सिद्धांत वसुधैव कुटुम्बकम के उस दृष्टिकोण से निकलता है, जिसका अर्थ है- एक धरती, एक भविष्य।

इस एजेंडे के लिए जी-20 स्वास्थ्य समूह व्यस्त है। अंतत: जी-20 के देशों के बीच क्या सहमति बनती है, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। लेकिन बहरहाल भारत के सामने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती खसरा व रूबेला का दिसंबर 2023 तक उन्मूलन करना है। भारत सरकार ने पहले यह लक्ष्य वर्ष 2019 तक हासिल करने का रखा था; लेकिन बाद में कोरोना महामारी के चलते इसे आगे बढ़ा दिया और अब 11 महीने ही भारत सरकार के पास है। 11 महीने का वक़्त और बीते कुछ महीनों में देश के कई राज्यों में खसरा व रुबेला के बढ़ते मामलों ने सरकार की चिन्ता बढ़ा दी है।

ग़ौरतलब हैं कि बीते माह जूनियर स्वास्थ्य मंत्री भारती परवीन पवार ने संसद में एक सवाल के जवाब में देश को सूचित किया कि चालू वर्ष (2022) में देश में खसरा से क़रीब 10,000 बच्चे प्रभावित हुए और 40 बच्चों की मौत हो गयी। मंत्री भारती परवीन ने यह भी बताया कि महाराष्ट्र में सबसे अधिक मामले (3,075) दर्ज किये गये और 13 बच्चों ने खसरे के कारण अपनी जान गँवा दी। इसके बाद झारखण्ड राज्य आता है, जहाँ 2,683 मामले सामने आये और आठ बच्चों की मौत हो गयी। इसके अलावा खसरे के बिहार में 1,650, गुजरात में 1,537, हरियाणा में 1,276 और केरल में 196 मामले दर्ज किये गये। बिहार, गुजरात, हरियाणा में भी खसरे से बच्चे मरे। देश में सिर्फ़ खसरे के ही मामले नहीं बढ़े, बल्कि रूबेला के मामलों में भी वृद्वि दर्ज की गयी है।

ग़ौरतलब है कि खसरा सबसे संक्रामक मानव विशाणुओं में से एक है। यदि खसरे से पीडि़त व्यक्ति खाँसता या छींकता है तो उस व्यक्ति के थूक के कणों में वायरस आ जाते हैं ओर हवा में फैल जाते हैं। ये किसी स्वस्थ व्यक्ति को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह रूबेला भी एक वायरस से फैलने वाला संक्रमण है। यह बच्चों को भी हो सकता है और गर्भवती महिलाओं को भी। खसरा व रूबेला के लिए टीके उपलब्ध हैं और वैज्ञानिक व शोध इस पर रोशनी डालते हैं कि इन दो जानलेवा बीमारियों को टीके से रोका जा सकता है।

भारत के नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बच्चों की 12 बीमारियों से बचाव के लिए लगने वाले टीकों में खसरा-रूबेला युक्त वैक्सीन भी शामिल है। खसरा-रूबेला वैक्सीन की पहली ख़ुराक नौ माह से लेकर 12 माह की उम्र वाले बच्चों को व दूसरी ख़ुराक 16 माह से 24 माह तक के आयु वाले बच्चों को दी जाती है। भारत ने अगले वर्ष दिसंबर, 2023 तक खसरा-रूबेला उन्मूलन का लक्ष्य रखा है।

अब सवाल यह है कि क्या भारत इस लक्ष्य को तय समय सीमा के भीतर हासिल कर बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक और उपलब्धि हासिल करेगा? सवाल इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि कोरोना महामारी ने इस दिशा में हुई प्रगति को प्रभावित किया है। अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2017-2021 के दरम्यान खसरे के मामलों में 62 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गयी और रूबेला के मामलों में गिरावट की यह दर 48 फ़ीसदी है।

‘खसरा और रूबेला उन्मूलन की दिशा में प्रगति – भारत 2005-2021’ शीर्षक की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017-2021 के दौरान खसरा से पीडि़त नये मामलों की संख्या प्रति 10 लाख आबादी पर 4 रह गयी है, जबकि पहले यह 10.4 थी। रूबेला के मामले प्रति 10 लाख आबादी पर 2.3 से घटकर 1.2 रह गये हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालाँकि भारत ने खसरा और रूबेला उन्मूलन की दिशा में काफ़ी प्रगति की है; लेकिन 2023 तक खसरा और रूबेला के उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेज़ प्रयासों की ज़रूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नियमों के अनुसार, एक देश को खसरा और रूबेला मुक्त तब माना जाता है, जब वहाँ कम-से-कम तीन वर्ष से अधिक समय तक खसरा और रूबेला वायरस के स्थानिक संचरण का कोई भी मामला सामने नहीं आता है।

भारत में इस टीकाकरण कवरेज की पहली ख़ुराक की दर 2019 में 95 फ़ीसदी थी, जो कि 2021 में 89 फ़ीसदी हो गयी और दूसरी ख़ुराक की दर भी इस अवधि में 84 फ़ीसदी से घटकर 82 फ़ीसदी हो गयी है। यह चिन्ता का सबब है, क्योंकि टीकाकरण की दर में गिरावट व टीके नहीं लगाने से प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो सकती है। टीके ऐसे जानलेवा रोगों से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। वैसे कोरोना महामारी ने दुनिया भर में दूसरी बीमारियों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि इसके चलते दुनिया भर में क़रीब 4 करोड़ बच्चे खसरे के टीकाकरण से छूट गये। इस संगठन ने कहा है कि खसरा से बचाव के लिए 95 फ़ीसदी आबादी के टीकाकरण की आवश्यकता होती है; लेकिन वर्तमान में यह दर दुनिया भर में 81 फ़ीसदी से कम हो गयी है। यह चिन्ता का विषय है। भारत के लिए और भी चिन्ता बढ़ जाती है, क्योंकि इसी साल भारत चीन को पछाड़ दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।

भारत में हर साल क़रीब तीन करोड़ महिलाएँ गर्भधारण करती हैं और हर साल 2.7 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। बीते कुछ महीनों से देश के कई हिस्सों से खसरा के मामले सामने आने पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रषासन को संवेदनशील इलाकों में नौ महीने से पाँच साल के बच्चों को खसरा और रूबेला युक्त वैक्सीन की एक अतिरिक्त ख़ुराक देने की सलाह दी है। दरअसल वैक्सीन दर में गिरावट, निगरानी तंत्र का कमज़ोर पडऩा, लोगों के मन में टीके को लेकर झिझक, कोरोना से पैदा रुकावटों का असर फ़िक्र पैदा करता है। इसके चलते खसरा के मामले फिर सामने आ रहे हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और यूनिसेफ ने बीते दिनों एक कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें खसरा व रूबेला सम्बन्धित ऐसे सभी बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गयी।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव (टीकाकरण) डॉ. वीणा धवन ने कार्यशाला में कहा कि हमें समुदायों को शिक्षित करने और उन्हें अपने बच्चों को खसरे के साथ-साथ सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत लगने वाले सभी टीकों के लिए प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है। यूनिसेफ इंडिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आशीष चौहान ने कहा कि खसरा प्रतिरक्षण प्रणाली की ताक़त को जाँचने का एक ट्रैसर है। जहाँ टीकाकरण कवरेज कम होता है, वहाँ खसरे का ख़तरा बढ़ जाता है। खसरे की बीमारी फिर से न लौटे, इसे खसरे के टीकाकरण में तीव्रता लाकर रोका जा सकता है।’ भारत में टीके को लेकर झिझक भी एक बहुत बड़ी रुकावट है। इस झिझक को दूर करने की चौतरफ़ा कोशिशें की जा रही हैं। भारत सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस संदर्भ में एक पुस्तिका भी निकाली है, जिसमें खसरा व रूबेला को लेकर आमजन के मन में जो ग़लत धारणाएँ हैं, उनके बाबत तथ्यात्मक जानकारी दी गयी है। जैसे- वैक्सीन की सुरक्षा व प्रभावशीलता बाबत जो मिथ है, उसका ज़िक्र है। खसरा व रूबेला के टीके के प्रतिकूल प्रभाव होते हैं। इससे बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और उनकी एकाग्रता की क्षमता पर भी इसका असर होता है।

इसके बारे में सरकार की ओर से यह तथ्य दिया गया है कि यह एक सुरक्षित व प्रभावशाली वैक्सीन है, और 40 वर्षों से अधिक समय से विश्व के बहुत से देशों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। अन्य वैक्सीन की तरह इस लगवाने की जगह पर हल्का दर्द हो सकता है या वह जगह लाल हो सकती है। हल्का बु$खार व मांसपेशियों में दर्द हो सकता है। लेकिन वक़्त के साथ यह अपने आप ख़त्म हो जाता है।

अब अहम सवाल यह है कि क्या भारत दिसंबर 2023 तक खसरा व रूबेला उन्मूलन के महत्त्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल कर पाएगा?  ग़ौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक घोषणा के अनुसार, मालदीव व श्रीलंका वर्ष 2023 के निर्धारित लक्ष्य से पूर्व ही दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में खसरा व रूबेला का उन्मूलन करने वाले दो देश बन गये हैं। इस सम्बन्ध में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन देशों को अपने बधाई संदेश में कहा- ‘इस प्रकार के रोगों के विरुद्ध बच्चों की रक्षा करना, स्वस्थ आबादी प्राप्त करने के वैश्विक प्रयास का एक महत्त्वपूर्ण क़दम है।’

पैसे के लिए स्वास्थ्य से खिलवाड़

स्वास्थ्य पर हम ज़ोर तो देते हैं, पर हमने देश में स्वास्थ्य सेवाओं को कितना खड़ा किया और कितने मेडिकल कॉलेज देश में आज चल रहे हैं? इस पर एक नज़र दौड़ाएँ, तो पता चलेगा कि हमें स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने की ज़रूरत है।

यदि हम देश की आज़ादी के समय के सरकारी मेडिकल कॉलेज और निजी मेडिकल कॉलेज में आज तक वृद्धि तो हुई है; लेकिन यह वृद्धि पर्याप्त नहीं है। सन् 1947 में भारत में कुल 22 सरकारी मेडिकल कॉलेज थे। सन् 1960 तक 35 और सरकारी मेडिकल कॉलेज तथा तीन निजी मेडिकल कॉलेज खुले। सन् 1970 में 34 नये सरकारी और छ: निजी कॉलेज खुले। अगले एक दशक (सन् 1980) तक सरकारी आठ और निजी तीन, फिर सन् 1990 तक सरकारी सात, निजी 25, सन् 2000 तक सरकारी 13 और निजी 29 मेडिकल कॉलेज खुले। सन् 2001 से सन् 2005 के बीच सरकारी 10 और निजी 43 मेडिकल कॉलेज खुले। अगले पाँच वर्षों में 25 सरकारी और 47 निजी कॉलेज सामने आये। फिर सन् 2011 से सन् 2015 तक सरकारी 55 और निजी 48 मेडिकल कॉलेज खुले। और सन् 2016 से 2022 तक 146 सरकारी और 90 निजी मेडिकल कॉलेज देश में खुले। यानी 31 दिसंबर, 2022 तक देश में कुल 355 सरकारी और 295 निजी मेडिकल कॉलेज बन चुके हैं। वहीं सरकारी कॉलेजों में कुल 52,048 सीटें और निजी कॉलेजों में 46,965 सीटें हैं।

यदि हम सन् 1980 से सन् 2010 के बीच के समय को देखें, तो इन 30 वर्षों में कुकुरमुत्ते की तरह 144 निजी मेडिकल कॉलेज उगे हैं। दूसरी तरफ़ सरकारी मेडिकल कॉलेज सिर्फ़ 55 ही खुले। निजी कॉलेजों की पड़ताल से पता चलता है कि इनके खुलने में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा है। कॉलेजों के खुलने के लिए निर्धारित शर्तों की अनदेखी कर पैसों के बल पर मापदंडों को नकारकर काम हुआ है। एक-एक सीट को छात्रों ने पैसे देकर ख़रीदा है। मतलब मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की जो योग्यता है, उसकी अनदेखी की गयी है। जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सही पारदर्शिता रही और योग्य छात्रों को प्रवेश मिला। इसी की वजह से सरकारी कॉलेज से पूर्ण प्रशिक्षित डॉक्टरों ने अपने व्यवसाय में क़दम रखा। इस तरह से देखें, तो निजी कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों की कुशलता को प्रामाणिकता के आधार पर खरा नहीं कहा जा सकता। सरकारी मेडिकल कॉलेजों को खोलने में सरकार ने 2011 के बाद दौड़ लगायी। विशेषकर देश के राज्यों के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुले। कोरोना के दो वर्षों के दौरान मेडिकल कॉलेजों के खोलने के लिए नियमों में बहुत ढील दी गयी, जिसमें ज़िला अस्पताल तक को नयी नीति के तहत मेडिकल कॉलेजों के तौर पर शुरू किया गया।

सन् 2014 के बाद कुल 270 नये मेडिकल कॉलेज खुले, जिनमें 164 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं। इनमें सीटों की संख्या लगभग 19,400 है। बा$की 106 निजी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 15,500 सीटें हैं। इसके अलावा जो मेडिकल कॉलेज पहले से चले आ रहे हैं, उनमें 12,500 सीटें बढ़ायी गयी हैं। जबकि ढाँचे में कोई विशेष तब्दीली नहीं की गयी है। कई सरकारी मेडिकल कॉलेज निजी मेडिकल कॉलेजों की तरह ढीले-ढाले हैं। पढ़ाई की कोई विशेष सुविधा नहीं है। सरकार ने इनमें सुधार का कोई विशेष प्रयास नहीं किया है। उपकरणों की कमियों से लेकर ढाँचागत व्यवस्था भी लचर है। ऐसी स्थिति में मेडिकल कॉलेज खोलकर नंबर बढ़ाने से बेहतर शिक्षा मेडिकल के छात्रों को मिल पानी कठिन है। फिर अच्छे डॉक्टर जन सेवा के लिए कैसे उपलब्ध हो सकते हैं? चिकित्सा के क्षेत्र की शिक्षा में खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए। एक प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले छात्र को थ्योरी और प्रैक्टिस का सम्पूर्ण ज्ञान होना चाहिए, तभी वह रोगी को सही उपचार देकर स्वस्थ करने में सफल हो पाएगा। नये डॉक्टरों में इतना तो आत्मविश्वास पैदा हो, जिससे कठिन-से-कठिन रोगों के उपचार में वह सहायक बन सके।

इन मेडिकल कॉलेजों में उचित स्टाफ हो, उचित अनुसंधान की व्यवस्था हो, जो भविष्य की नयी बीमारियों को पकडऩे में माहिर हों। यह तभी हो सकता है, जब नये डॉक्टरों को बेहतर प्रशिक्षण मिले और उपचार करने का आत्मविश्वास उनमें हो। ख़ाली मेडिकल कॉलेज खोलकर सीटों की व्यवस्था करने से दुनिया के सामने खड़ा होने वाला चिकित्सक नहीं बन सकता। कॉलेजों के लिए संसाधन जुटाने की विशेष आवश्यकता है। निजी कॉलेजों में छात्र को भारी-भरकम फीस देकर डॉक्टर बनाकर आम जनता के दर्द को कम नहीं किया जा सकता। क्योंकि जिस डॉक्टर ने पढ़ाई में क़र्ज़ लेकर आधी-अधूरी शिक्षा ली है, वह उस क़र्ज़ को उतारने के लिए उपचार करने के ख़र्चे में रोगी को पीसेगा।

भारत के 11 लाख डॉक्टरों में से महाराष्ट्र और दिल्ली में लगभग 2,40,000 डॉक्टर हैं। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से भारत में पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं। अधिकांश डॉक्टर शहरों के पास ही रहना चाहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र अच्छी चिकित्सा सुविधा के अभाव में अभी भी हैं। इसलिए सरकार का ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं को आम नागरिक के लिए सरल ढंग से उपलब्ध कराने में होना चाहिए।

योगी राज में महँगाई की मार

उत्तर प्रदेश में एक महीने पहले जीएसटी को लेकर हुई छापेमारी से व्यापारियों में हडक़ंप मचा था। अब महँगाई को लेकर जनता में हाहाकार मचा हुआ है। व्यापारियों तथा दुकानदारों ने जीएसटी के नाम पर कई उपयोगी वस्तुओं के भाव बढ़ा दिये हैं। दुकानदारों का कहना है कि ऊपर से ही महँगाई बढ़ गयी है। उपभोक्ता क्या करे उसे तो रोटी खानी ही पड़ेगी। महँगाई के चलते एक आम उपभोक्ता की थाली से धीरे-धीरे पौष्टिक आहार छिनते जा रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ जनपदों में अभी भी जीएसटी टीमें अचानक छापेमारी करने पहुँच रही हैं। जनवरी के पहले सप्ताह में मकरंदापुर मधवापुर में अचानक जीएसटी टीमों की छापेमारी से खलबली मच गयी। दुकानदारों ने फटाफट दुकानों के शटर बन्द कर दिये। जीएसटी टीमें किसी भी प्रकार के व्यापारियों को नहीं छोड़ रही हैं, चाहे वो एमआरपी वाली वस्तुओं का विक्रेता हो, चाहे खुली वस्तुओं का विक्रेता हो। यहाँ तक कि लकड़ी तथा कोयला बेचने वालों को, टेंट की दुकान चलाने वालों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है। इस डर से खोखे तथा खोमचे वाले भी सहमे रहते हैं।

बिजली पर रार

उत्तर प्रदेश में बिजली सप्लाई की दो व्यवस्थाएँ हैं। नगरीय व्यवस्था तथा ग्रामीण व्यवस्था। नगरों में बिजली कटौती कम होती है, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती बड़े पैमाने पर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सात से बाहर घंटे ही बिजली रहती है। इस समय में बिजली के बार बार लगते कट परेशान किये रहते हैं। उत्तर प्रदेश में बिजली महँगी भी बहुत है।

अब खलबली इस बात को लेकर मची है कि बिजली और अधिक महँगी होने जा रही है। उत्तर प्रदेश की बिजली कम्पनियों ने वित्त वर्ष 2023-24 के लिए बिजली दरों में औसतन 15.85 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव राज्य विद्युत नियामक आयोग के पास भेजा है। अगर इस प्रस्ताव को राज्य विद्युत नियामक आयोग मान लेता है तथा विधानसभा में भी इस प्रस्ताव पर मुहर लग जाती है, तो बिजली बिलों में 18 से 23 प्रतिशत तक बढ़ोतरी निश्चित है। इसमें उद्योगों की बिजली दरों में 16 प्रतिशत तथा कृषि उपयोग के लिए बिजली की दरों में 10 से 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाएगी।

इस बढ़ोतरी से बिजली कम्पनियों को इस वित्त वर्ष की तुलना में आगामी वित्त वर्ष में लगभग 9,140 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। इस वित्त वर्ष में बिजली कम्पनियों को बिल के माध्यम से लगभग 65,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलना चाहिए, जो कि सरकार द्वारा अनुमति ज्ञापित है।

इस आधार पर वित्त वर्ष 2022-23 में बिजली कम्पनियों को लगभग 74,140 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होगा। बिजली कम्पनियों ने अपने प्रस्ताव में वित्त वर्ष 2023-24 के कुल $खर्चों के लिए वार्षिक राजस्व की आवश्यकता 92,547 करोड़ रुपये बतायी है। प्रस्ताव में वार्षिक राजस्व की आवश्यकता के ब्योरे में एक वित्त वर्ष का नुक़सान 14.90 प्रतिशत दिखाया गया है,। इसका अर्थ यह है कि राजस्व में लगभग 9,140 करोड़ रुपये घाटा बिजली कम्पनियों ने राज्य विद्युत नियामक आयोग को बताया है।

जानकारी के अनुसार, बिजली कम्पनियों का उपभोक्ताओं पर लगभग 25,133 करोड़ रुपये शेष हैं। भौजीपुरा निवासी सत्यवीर का कहना है कि बिजली तो पहले से ही बहुत महँगी है। अब अगर बिजली और महँगी की जाएगी, तो महँगाई के इस दौर में आम जनता पिस जाएगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आम जनता का दर्द समझना चाहिए। विदित हो प्रदेश में बिजली दरों में बढ़ोतरी वित्त वर्ष 2014-15 में हुई थी। इसके बाद वित्त वर्ष 2017-18 में फिर अन्तिम बार वित्त वर्ष 2019-20 में बिजली बिलों में बढ़ोतरी हुई थी। कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता,समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तथा आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह बिजली दलों में बढ़ोतरी के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। विदित हो बीते चुनाव में भाजपा ने किसानों को सिंचाई के लिए मुफ़्त बिजली देने का वादा अपने घोषणा पत्र में किया था, मगर अब वह तरह तरह से महँगाई बढ़ाकर किसानों की आर्थिक दशा बिगाडऩे पर तुली हुई है।

भारतीय छात्रों को मिलेगा सुनहरा मौक़ा!

भारत हितैषी

अब यह सपना नहीं, बल्कि हक़ीक़त है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की तरफ़ से हरी झंडी मिलने के बाद भारत में कैंपस स्थापित करने के लिए विदेशी विश्वविद्यालय वास्तविक प्राप्ति से एक क़दम ही दूर रह गये हैं। नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद इस प्रतिमान बदलाव का परिणाम क्या होगा, इस पर सभी नज़रें टिकी हैं।

सम्भावित असर पूँजी और बहुमूल्य मानव संसाधनों की उड़ान में मंदी आ सकती है। कम संख्या में छात्र उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने का विकल्प चुन सकते हैं। विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 2016 में 4.4 लाख से बढक़र 2019 में 7.7 लाख हो गयी, जो 2024 तक लगभग 18 लाख तक पहुँचने के लिए तैयार है। इसके परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा पर अधिक विदेशी व्यय होगा। विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का तत्त्व भी आएगा, जो भारतीय विश्वविद्यालयों को अपने स्वयं के मानकों को बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा। भारत दुनिया के विभिन्न हिस्सों से छात्रों को आकर्षित करते हुए उच्च शिक्षा के एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है। विदेशी विश्वविद्यालय सरकार के ‘स्टडी इन इंडिया’ कार्यक्रम को और गति प्रदान करेंगे, जो विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहता है।

केंद्र सरकार ने जुलाई, 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति दस्तावेज़ में विदेशी विश्वविद्यालयों को प्रवेश देने की अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की थी। अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी अपनी स्वीकृति दे दी है। जिन पाठ्यक्रमों ने वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त की है, शिक्षण और मूल्यांकन के नये तरीक़े, संकाय और छात्रों से अपेक्षित उच्च मानक, अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान देना; ये सभी पहलू इच्छुक युवा भारतीयों के लिए शुभ संकेत हैं।

यूजीसी के अध्यक्ष एम. जगदीश कुमार ने कहा- ‘पूर्णकालिक, ऑफलाइन कार्यक्रमों की पेशकश करने वाले विदेशी विश्वविद्यालयों को 10 साल की लम्बी मंज़ूरी दी जाएगी, पारदर्शिता और गुणवत्ता बेंचमार्क के अधीन प्रवेश प्रक्रिया, शुल्क संरचना और संकाय भर्ती को तैयार करने की स्वतंत्रता दी जाएगी।’

उनके मुताबिक, मसौदा नियमों ने संस्थान पर यह भी सुनिश्चित करना ज़रूरी कर दिया कि कोई विशेष कार्यक्रम बन्द कर दिया जाता है, तो छात्र प्रभावित नहीं होते हैं। संकाय उचित समय के लिए भारतीय परिसर में रहते हैं और कोई भी कार्यक्रम राष्ट्रीय हित, भारत की संप्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, विदेशी सम्बन्ध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता को ख़तरे में नहीं डालता है। कुमार ने कहा कि भारतीय छात्रों के साथ-साथ विदेशी छात्र भी उन परिसरों में अध्ययन कर सकेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय अपनी स्वयं की प्रवेश प्रक्रियाओं का विकल्प चुन सकते हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया के शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों में शामिल संस्थानों को ही यहाँ परिसर खोलने की अनुमति दी जाएगी। कुमार के मुताबिक, ‘जैसा कि वे नियमित पाठ्यक्रम संचालित करेंगे, उनके संकाय भी नियमित होंगे। शिक्षक एक सेमेस्टर के बीच में नहीं जा सकेंगे। इसके अलावा कैंपस में महिला सुरक्षा और रैगिंग को लेकर राज्य और यूजीसी के दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। उन्हें केवल भारतीय क़ानूनों को लागू करना है।’

यूजीसी प्रमुख ने दोहराया कि भारत में शिक्षा प्रदान करने वाले शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी शिक्षा की गुणवत्ता उनके मुख्य परिसर जैसी ही रहे। उन्होंने कहा- ‘छात्रों को इससे लाभ होगा।’ उन्होंने कहा कि इस क़दम से नयी शिक्षा नीति, 2020 (एनईपी) को बढ़ावा मिलेगा। ये संस्थान ऐसे किसी भी अध्ययन कार्यक्रम की पेशकश नहीं करेंगे, जो भारत के राष्ट्रीय हित या यहाँ उच्च शिक्षा के मानकों को ख़तरे में डालता हो। सभी हितधारकों से फीडबैक पर विचार करने के बाद अंतिम मानदंड महीने के अंत तक अधिसूचित किये जाएँगे। जबकि इन विश्वविद्यालयों को अपने प्रवेश मानदण्ड और शुल्क संरचना तय करने की स्वतंत्रता होगी, आयोग ने फीस को उचित और पारदर्शी रखने की सलाह दी है।

उच्च रैंक वाले विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश की अनुमति देने वाला नियामक ढाँचा उच्च शिक्षा को एक अंतरराष्ट्रीय आयाम प्रदान करेगा, भारतीय छात्रों को सस्ती क़ीमत पर विदेशी योग्यता प्राप्त करने में सक्षम करेगा और भारत को एक आकर्षक वैश्विक अध्ययन गंतव्य बनाएगा। फंड और फंडिंग से जुड़े मामलों में फंड्स का क्रॉस-बॉर्डर मूवमेंट फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के मुताबिक होगा। धन की सीमा पार आवाजाही और विदेशी मुद्रा खातों का रखरखाव, भुगतान का तरीक़ा, प्रेषण, प्रत्यावर्तन, और आय की बिक्री, यदि कोई हो तो फेमा, 1999 के अनुसार होगी। एक लेखा परीक्षा रिपोर्ट वार्षिक रूप से आयोग को यह प्रमाणित करते हुए प्रस्तुत की जाएगी कि भारत में एफएचईआई के संचालन अधिनियम और सम्बन्धित नियमों के अनुपालन में हैं।

भारत में अपने कैंपस स्थापित करने के लिए आवेदन करने के लिए पात्र विदेशी संस्थानों की दो श्रेणियाँ होंगी- एक वो विश्वविद्यालय, जिन्होंने समग्र या विषय-वार वैश्विक रैंकिंग के शीर्ष 500 में स्थान हासिल किया है और दूसरे अपने गृह क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्थान।

यूजीसी भारत में परिसरों की स्थापना और संचालन से सम्बन्धित मामलों की जाँच के लिए एक स्थायी समिति का गठन करेगा। विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने भर्ती मानदंडों के अनुसार, भारत और विदेश से संकाय और कर्मचारियों की भर्ती करने की स्वायत्तता होगी। यह संकाय और कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए योग्यता, वेतन संरचना और सेवा की अन्य शर्तें तय कर सकता है।

हालाँकि एफएचईआई यह सुनिश्चित करेगा कि नियुक्त संकाय की योग्यता मूल देश के मुख्य परिसर के बराबर होगी। विदेशी उच्च शिक्षा संस्थान आयोग की पूर्व स्वीकृति के बिना किसी भी पाठ्यक्रम या कार्यक्रम को बन्द नहीं करेगा और न ही परिसर को बन्द करेगा। बुनियादी ढाँचे, शैक्षणिक कार्यक्रमों और समग्र गुणवत्ता और उपयुक्तता का पता लगाने के लिए आयोग को हर समय परिसर और उसके संचालन का निरीक्षण करने का अधिकार होगा। पता चला है कि यूरोप के कई देशों ने भारत में अपने परिसर स्थापित करने में रुचि दिखायी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (एनआईईपीए) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, आठ विदेशी विश्वविद्यालयों ने भारत में अपने अंतरराष्ट्रीय परिसर स्थापित करने में रुचि दिखायी है। इनमें से पाँच अमेरिकी विश्वविद्यालय हैं और एक-एक इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से है। यूजीसी मसौदा नियमों पर अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने के लिए सभी देशों के दूतावासों और प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को लिखेगा।

भारत 2023 में विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों के परिसरों की स्थापना और संचालन पर यूजीसी के मसौदा नियम देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बदलाव भी है। एनईपी-2020 में केवल शीर्ष-100 क्यूएस रैंकिंग वाले विश्वविद्यालय ही विदेशी डिग्री हासिल करने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए भारत में अपने शाखा परिसरों की स्थापना कर सकते हैं। यूजीसी मसौदा नियम-2023 में शीर्ष 500 विदेशी विश्वविद्यालय हैं और रैंकिंग यूजीसी द्वारा समय-समय पर तय की जाएगी। मसौदा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (भारत में विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों के परिसरों की स्थापना और संचालन) विनियम, 2023 भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) और विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच जुड़वाँ, संयुक्त डिग्री और दोहरी डिग्री कार्यक्रम प्रदान करने के लिए अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने का वादा करता है।

उच्च रैंक वाले विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश की अनुमति देने वाला एक नियामक ढाँचा, जैसा कि एनईपी, 2020 में परिकल्पित हुआ, और उच्च शिक्षा को एक अंतरराष्ट्रीय आयाम प्रदान करेगा, भारतीय छात्रों को सस्ती क़ीमत पर विदेशी योग्यता प्राप्त करने में सक्षम करेगा और भारत को एक आकर्षक विदेशी उच्च शिक्षा संस्थान बनाएगा।

प्रवेश शुरू होने से कम-से-कम 60 दिन पहले फीस संरचना, रिफंड नीति, कार्यक्रम में सीटों की संख्या, पात्रता योग्यता और प्रवेश प्रक्रिया सहित विवरणिका को अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराएगा।