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पंजाब में कांग्रेस को झटका, पूर्व मंत्री मनप्रीत बादल भाजपा में शामिल हुए

पंजाब में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। पार्टी की अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में वित्त मंत्री रहे मनप्रीत बादल ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। वे भाजपा में शामिल हो गए हैं। यह प्रतीत होता है कि भाजपा पंजाब में कद्दावर नेताओं को अपने साथ जोड़ रही है ताकि लोकसभा के अगले चुनाव में पंजाब में अधिक सीटें जीती जा सकें।

एक ट्वीट में मनप्रीत बादल, जो पूर्व उपमुख्यमंत्री और अकाली नेता सुखबीर सिंह बादल के चचेरे भाई हैं, कांग्रेस में शामिल होने से पहले अकाली दल से अलग होकर अपनी पार्टी पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब चला रहे थे। कांग्रेस ने उन्हें पार्टी में शामिल होते ही अपनी सरकार में वित्त मंत्री बनाया था।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ के पार्टी छोड़ने बाद मनप्रीत बादल ऐसे पहले बड़े नेता हैं जो भाजपा में गए हैं। दिल्ली में भाजपा नेताओं केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हुए। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह पहले ही अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर चुके हैं, हालांकि, उनकी पत्नी परनीत कौर अभी कांग्रेस की ही सांसद हैं।

मनप्रीत बादल ने राहुल गांधी को लिखे सन्देश में पार्टी छोड़ने की बात कही है। इसे उन्हें ट्वीट करके सार्वजनिक किया है। मनप्रीत बादल आज ही भाजपा का दामन थाम सकते हैं। मनप्रीत पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे हैं, हालांकि मतभेदों के चलते 2011 में उन्होंने बादलों की पार्टी शिरोमणि अकाली दल से इस्तीफा दे दिया था।

इसके बाद 2011 में मनप्रीत ने अपनी पार्टी पंजाब पीपुल्स पार्टी बनाई और 2016 में पार्टी का कांग्रेस में विलय करके वे उसमें शामिल हो गए। मनप्रीत लंदन से कानून के ग्रैजुएट हैं। वे 1995, 1997, 2002 और 2007 में गिद्दड़बाहा से विधायक और 2010 तक बादल सरकार में वित्त मंत्री रहे। मनप्रीत 2012 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गए, हालांकि, कांग्रेस की टिकट पर वे 2017 में जीत गए थे। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में भी बठिंडा शहरी सीट से उन्हें हार झेलनी पड़ी।

राहुल गांधी की यात्रा हिमाचल के कांगड़ा पहुँची, काठगढ़ शिव मंदिर में पूजा की

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान हिमाचल में कांगड़ा जिले के इंदौरा के मीलवां में पहुँची। फ्लैग एक्सचेंज सेरेमनी के बाद राहुल गांधी काठगढ़ महादेव मंदिर पहुंचे और शिव-पार्वती की आराधना की। पंजाब में उनकी सुरक्षा में सेंध के बाद हिमाचल में उनकी सुरक्षा डबल कर दी गयी है।

बता दें इस मंदिर में विराजमान शिवलिंग दुनिया भर में इकलौता शिवलिंग है, जो दो हिस्सों में विभाजित है। अष्टकोणीय इस शिवलिंग का एक भाग को शिव और दूसरा आदिशक्ति मां पार्वती का रूप है।

राहुल गांधी आज दिन भर करीब 24 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद हिमाचल के ही इंदौरा के मलोट में एक जनसभा को संबोधित करेंगे। इस दौरान वे कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए जनता का आभार भी जता सकते हैं।

आज सुबह राहुल गांधी ने यात्रा आरम्भ करते हुए कहा – ‘हमने नफरत के खिलाफ यात्रा शुरू की है। देश में बेरोजगारी और महंगाई दो मुद्दों को भी लेकर यह यात्रा शुरू की है। ‘तीन-चार लोगों के लिए सरकार चल रही है। देश के युवा, किसान और गरीबों के लिए कुछ नहीं कर रही। सब देश के सबसे बड़े अरबपतियों की मदद के लिए यह सब करती है।

राहुल ने साथ ही जोड़ा कि यात्रा के जरिये वे जनता के दिल को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा – ‘हम हिमाचल से निकल रहे हैं, हमने हिमाचल के लिए रूट बदल दिया। दुख है कि हम हिमाचल में कम रुक पाए। लेकिन जम्मू कश्मीर 30 जनवरी तक पहुंचना है। हिमाचल में आशाएं और प्यार लेने के लिए आया हूं।’

मलौट में जनसभा के बाद यात्रा पंजाब के पठानकोट में प्रवेश करेगी और वहीं रात्रि विश्राम होगा। वहां से कल जम्मू कश्मीर के कठुआ में प्रवेश करेगी जहाँ कांग्रेस के नेताओं ने बड़ी संख्या में उनका स्वागत करने की तैयारी की है। यात्रा के कश्मीर जाने को लेकर देश भर में चर्चा है और राहुल की इस यात्रा को काफी सुर्खियां मिल रही हैं।

इस बीच कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर की प्रवक्ता दीपिका पुष्कर नाथ ने पार्टी से नाराजगी के बाद इस्तीफा दे दिया। दीपिका पूर्व मंत्री लाल सिंह को राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में शामिल होने की ‘अनुमति’ देने से नाराज हो गई हैं।
नाथ के मुताबिक लाल सिंह आठ साल की एक बच्ची के बलात्कारियों का बेशर्मी से बचाव किया था। लाल सिंह दो बार सांसद और तीन बार विधायक और मंत्री रहे हैं और 2014 में कांग्रेस से दल बदलकर भाजपा में चले गए थे।

चुनाव आयोग आज करेगा तीन पूर्वोत्तर राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा

चुनाव आयोग तीन पूर्वोत्तर राज्यों नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव की आज घोषणा करने जा रहा है। मार्च में इन तीन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है लिहाजा वहां चुनाव होने हैं।

आयोग आज दोपहर ढाई बजे एक मीडिया कांफ्रेंस करने जा रहा है जिसमें इन राज्यों के लिए चुनाव तारीखों का ऐलान किया जाएगा। चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही इन राज्यों में आचार संहिता लागू हो जाएगी।

हाल में चुनाव आयोग के अधिकारी नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा का दौरा कर वहां के हालत का जायजा ले चुके हैं। साथ ही सुरक्षा के मद्देनजर चुनाव आयोग ने केंद्रीय सुरक्षाबल से भी संपर्क किया है। तीनों राज्यों की स्थिति में चुनाव की माकूल स्थितियों के बाद अब आयोग ने वहां चुनाव करवाने का फैसला किया है।

नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल क्रमश: 12 मार्च, 22 मार्च और 15 मार्च को पूरा हो रहा है। चुनाव के बाद वहां नई सरकारों का गठन होना है।

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष के बेटे के खिलाफ साथी छात्र से मारपीट पर हुआ मामला दर्ज

हैदराबाद में तेलंगाना भाजपा के अध्यक्ष के बेटे पर कॉलेज में एक छात्र को पीटने का आरोप लगा है। पिटाई करने का उसका वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने उसके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

यह घटना हैदराबाद के एक निजी कॉलेज की है जहाँ भाजपा नेता संजय कुमार के बेटे भागीरथ साई ने इसी कॉलेज के अपने सहयोगी छात्र के मारपीट की। कथित मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद महिंद्रा विश्वविद्यालय के प्रशासन ने एक शिकायत की जिसके आधार पर भागीरथ के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

वायरल वीडियो में भागीरथ, कॉलेज परिसर में दूसरे छात्र श्रीराम को बार-बार थप्पड़ मारते दिख रहे हैं। भागीरथ का दोस्त भी छात्र के साथ मारपीट करता हुआ दिखाई दे रहा है। एक अन्य वीडियो में भागीरथ और पांच-छह अन्य छात्र श्रीराम को उसके छात्रावास के कमरे में गाली देते और पिटाई करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वीडियो में दोस्तों से घिरा हुआ भागीरथ श्रीराम के चेहरे पर मुक्के मारते हुए दिखाई देता है। बाद में अन्य लोगों ने भी छात्र के साथ मारपीट की। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि भागीरथ का दावा है कि श्रीराम ने उसके सहपाठी साथी की बहन के साथ दुर्व्यवहार किया था।

देर शाम बंदी संजय कुमार के कार्यालय ने एक वीडियो भी जारी किया, जिसमें श्रीराम कबूल करते नजर आ रहे हैं कि उन्होंने लड़की के साथ गलत व्यवहार किया था, इसलिए उन्हें भागीरथ और कुछ अन्य छात्रों ने पीटा था।

जोशीमठ से उभरे ख़तरे

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की प्रारम्भिक रिपोर्ट से पता चलता है कि पूरा जोशीमठ शहर, जो हिमालय में धार्मिक स्थलों का प्रवेश द्वार माना जाता है और जो सामरिक दृष्टि से काफ़ी महत्त्व रखता है; डूब सकता है। यहाँ सेना छावनी चीन सीमा के क़रीब है। इसरो की तरफ़ जारी सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि जोशीमठ-औली सडक़ धँसने वाली है।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ देहरादून में काफ़ी साल पहले रिपोर्टिंग करते हुए मैंने विस्तार से लिखा था कि दशकों से वैज्ञानिकों और भू-वज्ञानिकों की तरफ़ से जारी ख़तरे की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया गया है। शुरुआती ख़तरे की घंटी मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के रूप में सामने आयी थी, जिसमें चेतावनी दी गयी थी कि पर्यावरण की दृष्टि से यह संवेदनशील क्षेत्र उच्च दर की भवन निर्माण गतिविधि नहीं सह सकता है। हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में इसके ठीक विपरीत हुआ है। बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब और शंकराचार्य मन्दिर की ओर जाने वाले सैलानियों का केंद्र बनने के कारण यहाँ हुए बेतरतीब निर्माण और पनबिजली परियोजनाओं के जारी रहने से गम्भीर ख़तरे उत्पन्न हो गये हैं।

देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने अध्ययनों में पाया कि ‘आज की स्थिति प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों कारणों का नतीजा है, क्योंकि यहाँ की मिट्टी कमज़ोर है; जिसमें ज़्यादातर भूस्खलन से पैदा हुआ मलवा है और यह क्षेत्र अत्यधिक भूकम्पीय प्रभाव वाला क्षेत्र भी है।’ यह क्षेत्र कभी ग्लेशियरों के अधीन था और सतह के नीचे नरम क्रिस्टल युक्त चट्टानों में पानी के रिसाव ने चट्टानों को और कमज़ोर कर दिया है।

हाल के महीनों में भूमि धँसने से चमोली से जोशीमठ तक के क़रीब 10,000 निवासियों में दहशत फैल गयी है, जिनके घरों में दरारें आ गयी हैं। इसरो के उपग्रह चित्रों से ज़ाहिर होता है कि 2 जनवरी को ज़मीन धँसने की एक घटना के बाद यह हिमालयी शहर केवल एक पखवाड़े में 5.4 सेंटीमीटर से ज़्यादा धँस गया। इससे पहले भी अप्रैल और नवंबर, 2022 के बीच जोशीमठ 8.9 सेमी तक धँस गया था। उभरता हुआ संकट विकासात्मक परियोजनाओं और उन्हें क्रियान्वित करने के दौरान नाज़ुक हिमालय पर्वत प्रणाली की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा है। प्रभावित इलाक़ों से लोगों को निकालने के बाद क़स्बे को कैसे बचाया जाए? यह बड़ा सवाल है। क्योंकि इसमें मानवीय जीवन भी जुड़ा है। यह घटना समस्या के स्थायी समाधान की आवश्यकता को उजागर करती है। यह समान स्थिति का सामना कर रहे अन्य सभी पहाड़ी क़स्बों की मैपिंग करने की ज़रूरत का संकेत भी देती है।

‘तहलका’ के इस अंक में एक खोजी रिपोर्ट ‘टैक्स बचाने के रास्ते’ है। ‘तहलका एसआईटी’ की जाँच रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे क्रिकेट के दिग्गज तेंदुलकर ने कथित तौर पर टैक्स में एक बड़ी राहत पाने के लिए $खुद को ‘अभिनेता’ की भूमिका में प्रस्तुत किया। कितने ही क्रिकेट खिलाडिय़ों में कर क़ानून (टैक्स लॉ) के $गलत पक्ष में जाने की अनोखी आदत है। क्रिकेटरों को तो भूल ही जाइए, भारत में क्रिकेट चलाने वाली संस्था बीसीसीआई भी टैक्स चोरी के मामले में कथित रूप से फँस चुकी है। क्योंकि राजस्व विभाग ने 462 करोड़ रुपये की वसूली के बाद बीसीसीआई से 1,303 करोड़ रुपये का एक और बक़ाया आयकर भुगतान करने को कहा है। संसद में वित्त मंत्रालय की तरफ़ से प्रस्तुत विवरण में यह जानकारी दी गयी है। निश्चित ही यह एक विचारणीय और गम्भीर विषय है!

 

भारतीय फ़िल्में और ऑस्कर

किसी भी देश के फ़िल्म जगत के लिए अपनी किसी भी फ़िल्म पर ऑस्कर अवॉर्ड जीतना फ़िल्म की सबसे बड़ी कामयाबी का मापदण्ड होता है। हालाँकि ऑस्कर देने वाली अमेरिकी संस्था एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आट्र्स एंड साइंसेस (एएमपीएएस) पक्षपात के आरोपों से घिरी रही है। इस बार 24 जनवरी को 95वें ऑस्कर अवॉर्ड की घोषणा होगी। भारतीय फ़िल्म जगत की कई फ़िल्में अब तक ऑस्कर में शामिल हो चुकी हैं, पर कोई फ़िल्म ऑस्कर जीत नहीं सकी हैं। पर ऐसा भी नहीं है कि भारत के हिस्से में ऑस्कर अवॉर्ड नहीं आये हैं। भारतीय फ़िल्म जगत में कुछ डायरेक्टर, लेखक, कॉस्ट्यूम डिजाइनर, एक्टर ऑस्कर अवॉर्ड अपने नाम कराने में सफल रहे हैं। सबसे ज़्यादा ऑस्कर अवॉर्ड हॉलीवुड फ़िल्मों ने जीते हैं। इस बार ऑस्कर में 10 भारतीय फ़िल्में शामिल की गयी हैं। इनमें से दो फ़िल्मों- छेल्लो शो को इंटरनेशनल फीचर फ़िल्म कैटेगरी में और आरआरआर को म्यूजिक (ओरिजनल सॉन्ग) की कैटेगरी में शामिल कर लिया गया है। इसके अलावा दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों- ऑल दैट ब्रीद्स को डॉक्यूमेंट्री फीचर फ़िल्म की कैटेगरी में और द एलीफेंट विस्परर्स को डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फ़िल्म की कैटेगरी में लिस्टिड किया गया है। इसके चलते भारतीय फ़िल्म को ऑस्कर मिलने की उम्मीद बढ़ी है। ऑस्कर अवॉर्ड जीतने के लिए किसी भी फ़िल्म को हर एंगल से देखा जाता है और इसके लिए ऑस्कर अवॉर्ड में शामिल हर फ़िल्म को फ़िल्म जगत की बड़ी-बड़ी हस्तियों और एएमपीएएस की विशेष टीम की पैनी नज़रों से परखा जाता है।

ऑस्कर अवॉर्ड को ऑस्कर अकादमी पुरस्कार भी कहा जाता है। फ़िल्म जगत के इस सबसे बड़े अवॉर्ड से फ़िल्म जगत से जुड़े प्रोफेशनल्स को उनके बेहतरीन काम के लिए सम्मानित किया जाना अपने आप में गर्व की बात है। सन् 1927 में एमजीएम स्टूडियो में दुनिया के कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने फ़िल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए संगठन बनाने की योजना बनायी, ताकि फ़िल्म उद्योग के मुख्य क्रिएटिव कामों से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके। 11 जनवरी, 1927 को लॉस एंजिल्स के एंबेसेडर होटल में एक डिनर पार्टी में शामिल सभी 36 प्रतिष्ठित लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। मार्च, 1927 में डॉग्लास फेयरबैंक्स की अध्यक्षता में संगठन के अधिकारी चुने गये। 11 मई, 1927 को बिल्ट मोर होटल में एकेडमी में 300 लोगों को दावत दी गयी, जिनमें से 230 ने 100 डॉलर की फीस देकर एएमपीएएस की सदस्यता ली। एकेडमी की अलग-अलग शाखाएँ बनायी गयीं। इस सफलता के लिए थॉमस एडीसन को एकेडमी की पहली मानद सदस्यता से सम्मानित किया गया। इसके दो साल बाद 16 मई, 1929 को पहले ऑस्कर अवॉर्ड में सिर्फ़ हॉलीवुड फ़िल्मों को शामिल किया गया। इसके लिए रूजवेल्टू होटल के ब्लॉसम रूम 270 लोग 5-5 डॉलर का टिकट लेकर शामिल हुए। इस दौरान सन् 1927 से सन् 1928 तक बनी फ़िल्मों से जुड़े लोगों को ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया। इस पहले ऑस्कर अवॉर्ड की कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई। पर अब दुनिया भर में इस अवॉर्ड की चर्चा होती है और हर डायरेक्टर का सपना होता है कि उसकी फ़िल्म ऑस्कर जीत सके।

ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भारतीय फ़िल्मों का चयन करने की ज़िम्मेदारी फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की होती है। फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की टीम उसी फ़िल्म को ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भेजती है, जो पिछले एक साल के दौरान देश के किसी भी सिनेमा हॉल में रिलीज हुई हो। ऑस्कर अवॉर्ड 2023 के लिए इस बार 10 भारतीय फ़िल्मों और दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों को भेजा गया है। इसमें से आठ फ़िल्मों को पुनर्विचार के लिए भेजा गया, जो रिमाइंडर लिस्ट में हैं। भारतीय सिनेमा घरों में साउथ फ़िल्म आरआरआर इस साल सुपर-डुपर हिट रही, पर उसे पछाडक़र गुजराती फ़िल्म छेल्लो शो ऑस्कर अवॉर्ड में आगे चल रही है। आरआरआर फ़िल्म का नाटू-नाटू गाना ही शॉर्टलिस्ट किया गया है।

एएमपीएएस ने फाइनल राउंड से ठीक पहले ऑस्कर अवॉर्ड की रिमांइडर लिस्ट में इस साल 301 फ़िल्मों को शामिल किया है। फाइनल में ऑस्कर के 6,000 जूरी मेंबर इन फ़िल्मों को देखते हैं। ये जूरी मेंबर हर फ़िल्म के लिए वोटिंग करते हैं। वोटिंग के हिसाब से ही फ़िल्मों की अलग-अलग कैटेगरी बनायी जाती हैं। इसमें डॉक्यूमेंट्री फीचर फ़िल्म, डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फ़िल्म, इंटरनेशनल फीचर फ़िल्म, मेकअप एंड हेयर स्टाइलिंग, म्यूजिक (ओरिजिनल स्कोर), म्यूजिक (ओरिजिनल सॉन्ग), एनिमेटेड शॉर्ट फ़िल्म, लाइव एक्शन शॉर्ट फ़िल्म, साउंड और विजुअल इफेक्ट्स कैटेगरी होती हैं। इन 10 कैटेगरी में से हर एक कैटेगरी में पाँच सिलेक्टेड फ़िल्मों को फाइनल लिस्ट में जगह मिलती है। वोटिंग के आधार पर पाँच सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों के अलावा फ़िल्म जगत के हर क्षेत्र के टॉप कलाकारों का चयन भी किया जाता है। फ़िल्मों को देखने के बाद हर साल 11 से 17 जनवरी तक वोटिंग होती है और 24 जनवरी को पाँच फ़िल्मों और कलाकारों को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। 12 मार्च, 2023 ऑस्कर अवॉर्ड के लिए चयनित एक फ़िल्म और कलाकारों के नाम की घोषणा लॉस एंजिल्स के डॉल्बी थियेटर में होगी। इस घोषणा के अगले दिन 13 मार्च को 95वीं ऑस्कर सेरेमनी के दौरान विजेता फ़िल्म और कलाकारों को ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा।

ऑस्कर अवॉर्ड में ट्रॉफी के रूप में 13.5 इंच (34 सेमी) लम्बी, 8.5 पाउंड (3.85 किलो) की ताँबे से बनी और सोने की परत चढ़ी आर्ट डेको में बनी पाँच तिल्लियों वाली फ़िल्म रील पर तलवार लेकर खड़े एक योद्धा की मूर्ति दी जाती है। ऑस्कर अवॉर्ड में किसी भी विजेता फ़िल्म या कलाकार को नकद पुरस्कार नहीं दिया जाता। लेकिन चयनित फ़िल्म के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और अन्य कलाकारों, दूसरी फ़िल्मों के चयनित कलाकारों की फ़िल्म जगत में अहमियत बहुत बढ़ जाती है।

 

किसी फ़िल्म के ऑस्कर अवॉर्ड में शामिल होने के लिए निर्धारित शर्तें :-

  1. फ़िल्म 40 मिनट से ज़्यादा की होनी चाहिए।
  2. फ़िल्म को अमेरिकी मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों- लॉस एंजिल्स, न्यूयॉर्क, शिकागो, इलिनोयस, मियामी, फ्लोरिडा या अटलांटा, जॉर्जिया में से किसी एक में कम-से-कम एक बार दिखाया गया हो।
  3. फ़िल्म एक साल में यानी 1 जनवरी से 31 दिसंबर के बीच शोकेस की गयी हो।
  4. फ़िल्म एक ही थियेटर में कम-से-कम लगातार सात दिन तक चली हो।
  5. किसी देश के फ़िल्म जगत की हिट अथवा सुपरहिट फ़िल्म को भी हर साल ऑस्कर के लिए फ़िल्म जगत को भेजना पड़ता है।
  6. फ़िल्म देश की किसी भी आधिकारिक भाषा में भी होनी चाहिए।
  7. फ़िल्म के सबटाइटल्स अंग्रेजी में होने चाहिए।
  8. इस अवॉर्ड के फाइनल राउंड में दुनिया की टॉप पाँच फ़िल्में जाती हैं, जिनमें से एक को ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित किया जाता है।

 

ऑस्कर अवॉर्ड-2023 में शामिल भारतीय फ़िल्में

फिल्म का नाम       डायरेक्टर

छेल्लो शो           पान नलिन

आरआरआर          एसएस राजामौली

गंगूबाई काठियाबाड़ी   संजय लीला भंसाली

 

रॉकेट्री : द नंबी इफेक्ट आर. माधवन

विक्रांत रोणा   अनूप भंडारी

द कश्मीर फाइल्स    विवेक अग्निहोत्री

इराविन निझल आर. परथीवन

मी वसंतराव   निपुन अविनाश धर्माधिकारी

तुझ्या साठी काही ही  डॉ. संजय माधवराव गायकवाड

दो डाक्यूमेंट्री फ़िल्में

ऑल दैट ब्रीद्स शौनक सेन

द एलीफेंट व्हिस्परर्स  कार्तिक गोन्जाल्विस

क्या इतिहास बन जाएगा जोशीमठ?

7 फरवरी 2021 को उत्तराखण्ड में ऋषिगंगा नदी पहाड़ से उफनती हुई हज़ारों टन गाद व भारी भरकम पत्थर धकेलते हुए बढ़ी तथा मार्ग में सब कुछ तहस-नहस करती गयी। तपोवन परियोजना में ऋषिगंगा का पानी जल प्रलय करते हुए धौली गंगा में जा मिला, जिससे और तबाही मची। ऋषिगंगा के इस प्रकोप से तपोवन परियोजना के अतिरिक्त न जाने कितने ही लोग तबाह हो गये। तपोवन परियोजना में काम कर रहे लोगों का अभी तक कोई अता पता नहीं है।

अब जोशीमठ तबाह होने की हालत में है। प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या तपोवन परियोजना की सुरंग में घुसा ऋषिगंगा का पानी ही रिस रिसाकर जोशीमठ में निकल रहा है। यह प्रश्न भू-वैज्ञानिकों के लिए पहेली बन चुका है। जोशीमठ में भूस्खलन व पहाड़ दरकने की आँखों देखी घटनाओं के कई वृतांत इन दिनों हवा में तैर रहे हैं। समझदार लोग इसे प्रकृति का प्रकोप बता रहे हैं और पहाड़ों पर तीव्रता से हो रहे मानव अतिक्रमण की दुहाई दे रहे हैं। जोशीमठ व उसके आसपास बसे स्थानीय लोग घबराये हुए हैं। लोगों की रातों की नींद व दिन का चैन उड़ा हुआ है। कई मकानों के दरकने के समाचार प्रकाशित हो रहे हैं, मगर समाधान किसी के पास नहीं है। जानकार बता रहे हैं कि जोशीमठ में निकल रहे पानी में मिट्टी का रंग बाँध निर्माण के समय की मिट्टी की तरह है। पुष्टि किसी भी बात की नहीं हो रही है। चिन्तित सरकार भी है, मगर उसके पास भी इस आपदा को रोकने के उपाय नहीं हैं। कहा जा रहा है कि धौली गंगा के पानी में रसायन की जाँच नहीं होती है।

जोशीमठ में बचे हुए स्थानीय लोग सहमे हुए हैं तथा भगवान से जीवनदान की प्रार्थना कर रहे हैं। जोशीमठ क्षेत्र में बने घर फट रहे हैं। घरों के अतिरिक्त खेतों, सडक़ों एवं पहाड़ों में दरारें पड़ भी रही हैं तथा बढ़ भी रही हैं। ऐसा लगता है कि कुछ अनर्थ घटने को है। कुछ लोग आशंका कर रहे हैं कि कहीं जोशीमठ पूरी तरह पाताल में न समा जाए। जोशीमठ के नीचे खिसकने की आशंका भी लोग व्यक्त कर रहे हैं। अगर यह पहाड़ नीचे खिसका, तो दूसरे कई पहाड़ भी निश्चित ही खिसकेंगे तथा नीचे बसे लोगों के लिए भी मुसीबत बनेंगे। पिछले कई महीनों से जोशीमठ में बन रही इस तबाही की स्थिति को लेकर सरकार असहाय साबित हो रही है। चिन्ता की बात यह है कि जोशीमठ के साथ-साथ उत्तराखण्ड के क़रीब 600 गाँवों की भूमि भी दरकने लगी है।

टिप्पणीकार कह रहे हैं कि 7 फरवरी, 2021 को ऋषिगंगा में आयी बाढ़ के बाद ही पूरे क्षेत्र की जाँच सरकार को करनी चाहिए थी, मगर उसने इस घटना को प्रकृति का प्रकोप तथा भगवान का विधान मानकर आँखें मूँद लीं। अब जब दरारें पड़ती तथा बढ़ती जा रही हैं, तब सरकार तथा सरकारी विभागों की तंद्रा टूटी है। प्रदेश सरकार किसी भी हाल में तबाही से बचने के उपायों की खोज में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस संकट से चिन्तित हैं तथा उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए बैठक भी की है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जोशीमठ क्षेत्र की सुरक्षा का प्रयास में लगे हैं। सरकार के निर्देश पर जोशीमठ निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया है।

प्रश्न यह है कि क्या जोशीमठ क्षेत्र को किसी भी तरह दरकने से बचाया जा सकेगा? कहावत है कि फूँस के घर में एक चिंगारी पूरा घर जला देती है तथा रेत के घर को हल्की-सी आहट गिरा देती है। प्रकृति के लिए भी सब कुछ तहस-नहस करना इसी प्रकार सरल है। प्रकृति की एक करवट से सैकड़ों जीवन तथा करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। उत्तराखण्ड सरकार अच्छी तरह जानती थी कि तपोवन परियोजना के कार्य के दौरान ऋषिगंगा में आयी बाढ़ के बाद इस क्षेत्र में $खतरे की आशंका बढ़ गयी है। यही नहीं जोशीमठ क्षेत्र में 7 फरवरी, 2021 के बाद से ही दरारें पडऩे लगी थीं, मगर उसने कोई ठोस उपाय इससे निपटने के लिए नहीं किये। हर साल हज़ारों की संख्या में आने वाले सैलानियों के अतिरिक्त जोशीमठ क्षेत्र में स्थानीय लोगों का घनत्व लगातार बढ़ रहा था। सन् 2011 में जोशीमठ की आबादी 16,709 थी, जो अब बढक़र लगभग 22,000 से अधिक हो चुकी है। भारत-चीन सीमा के निकट स्थित जोशीमठ से सडक़ नीती घाटी की ओर जाती है, जो चीन का सीमावर्ती क्षेत्र है। भारत का बाड़ाहोती क्षेत्र भी यहीं है, जिसे चीन अपना बताता रहता है। इस क्षेत्र में चीनी सैनिक घुसपैठ का प्रयास करते रहते हैं, जिसके चलते भारतीय सैनिकों और चीनी सैनिकों के बीच तनाव बना रहता है। सामरिक रूप से अहम जोशीमठ के ऊपर ही पृथ्वी समतल से 4,000 मीटर ऊँचाई पर विख्यात पर्यटन स्थल औली है। अगर किसी भी तरह जोशीमठ भूमिगत हुआ, तो चीन बाड़ाहौती से लेकर औली क्षेत्र तक को हड़पने का दबाव बढ़ाने का प्रयास करेगा। जोशीमठ पहाड़ी ढलान पर बसा हुआ है। इसके सामने ही हाथी पर्वत है तथा इसके सामने से घाटियों से ही जाने वाले दो-तीन रास्ते बद्रीनाथ, फूलों की घाटी तथा हेमकुंड पहुँचाते हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की प्रारम्भिक रिपोर्ट से पता चलता है कि पूरा जोशीमठ शहर डूब सकता है। एक भू वैज्ञानिक की सन् 1939 की रिपोर्ट कहती है कि जोशीमठ एक भूस्खलन के बाद बने पहाड़ पर बसा हुआ है, जो भूकम्प, भूस्खलन के हिसाब से बहुत संवेदनशील तथा अस्थिर है। 7वीं शताब्दी में उत्तराखण्ड के कत्यूरी राजवंश की राजधानी जोशीमठ को बनाया। तभी से यहाँ लोग बसने लगे तथा बढ़ते गये। अब यहाँ हज़ारों घर तथा बहुमंज़िला इमारतें हैं। अब जब तबाही की स्थिति है, विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यहाँ बने घर पारम्पिक शैली से नहीं बने हैं। वैसे भू-वैज्ञानिक कई बार स्थानीय लोगों को चेता चुके थे, मगर सरकार तथा जनता किसी ने भी उनकी चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। जनसंख्या घनत्व बढऩे के साथ ही पहाड़ को काट-काटकर समतल किया गया, सडक़ें बनायी गयी। भूमि तथा वृक्षों का कटान किया गया। नदियों में मलबा डाला जाता रहा। पहले जोशीमठ से केवल एक ही सडक़ बद्रीनाथ, फूलों की घाटी तथा हेमकुंड जाती थी, मगर अब जोशीमठ को बायपास करके नीचे से एक अन्य सडक़ भी बन रही है, जिसके लिए पहाड़ के तलहटी को विस्फोट करके निरंतर काटा जा रहा है। भू-वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जोशीमठ की भूमि के अंदर पहले ही एक बहुत बड़ी प्राकृतिक दरार है, जो हेलंग से तपोवन तक है। यह दरार जोशीमठ के ठीक नीचे तथा औली के पीछे से निकलती है। इसके अतिरिक्त वैक्रता थ्रस्ट तथा पिंडारी थ्रस्ट नाम की दो अन्य प्राकृतिक दरारें भी जोशीमठ के नीचे से निकलती हैं। प्रश्न यह है कि इतना सब पता होने के उपरांत भी उत्तराखण्ड की सरकार तथा जोशीमठ का प्रशासन चैन की नींद कैसे सोते रहे?

हालाँकि जोशीमठ में दरारें पडऩे तथा भूस्खलन के ठोस कारणों का अभी भी पता नहीं लगा है। इस जानकारी की खोज के लिए भू वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों के कई दल लगे हुए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह कि बीते 47 वर्षों में सामने आयी रिपोर्ट पर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया?

कई बार जोशीमठ की संवेदनशीलता की जाँच भी हुई, भू-वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी, मगर उसका लाभ क्या हुआ? कई जाँच समितियों ने नगर बन चुके जोशीमठ क्षेत्र पर मँडराते संकट के प्रति अब तक की प्रदेश सरकारों को लगातार सचेत किया था, मगर किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। सन् 2013 के जल प्रलय के बाद भी वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी। 2022 में भी विशेषज्ञों ने जोशीमठ पर मँडराते संकट के प्रति सरकार को आगाह किया था, मगर इसका भी कोई लाभ नहीं हुआ। सन् 1976 से 2022 तक चार बार इस क्षेत्र की जाँच हुई, मगर सरकार तथा प्रशासन की नींद नहीं खुली। अब जब सब कुछ तबाह हो रहा है, तो हड़बड़ी मची हुई है। फिर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न कि क्या भविष्य में जोशीमठ भारत के नक्शे पर बचा रह सकेगा?

इधर, बा$गपत के ठाकुरद्वारा मोहल्ले में लगभग दो दर्ज़न मकानों में दरार आने से इस क्षेत्र में भी हडक़ंप मच गया है। अलीगढ़ में भी लगभग एक दर्ज़न मकान फट चुके हैं। दोनों ही स्थानों पर लोगों में डर व्याप्त है। लोगों में तरह-तरह के शंकाएँ कानाफूसी के माध्यम से तैर रही हैं। कुछ लोग इसे जोशीमठ से जोड़ रहे हैं, तो कुछ एक अलग आपदा से। मगर मकानों में दरारें पडऩे का सही कारण नहीं पता चला है।

राहुल की ललकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुक़ाबले के लिए तैयार हो रहे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी

राहुल गाँधी अचानक चर्चा के केंद्र में हैं। यह चर्चा लगातार जारी है। अगले साल के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और विपक्ष के एक हिस्से में राहुल गाँधी के नेतृत्व को लेकर शुरू हुई चर्चा अब गम्भीर बहस की तरफ़ बढ़ती दिख रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में राहुल गाँधी की स्वीकार्यता का दायरा सँकरी गली से निकलकर व्यापक होने लगा है। राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा यह होने लगी है कि क्या भारत जोड़ो यात्रा देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव करने की तरफ़ जा रही है? तीन महीने पहले तक राजनीति के बियाबान में खड़ी दिख रही कांग्रेस पार्टी में रौनक़ और इसके नेताओं के चेहरे पर मुस्कराहट बताती है कि उसमें उम्मीद की बड़ी किरण जगी है। राहुल गाँधी की पद यात्रा को लोगों का इस स्तर पर समर्थन मिलने से $खुद कांग्रेस भी हैरान है। उसे लगता है कि जनता के बीच जाकर विपक्ष के मुद्दों को व्यापक बनाया जा सकता है। कांग्रेस 23-24 फरवरी, 2023 को रायपुर में विस्तारित अधिवेशन भी करने जा रही है, जिसमें विपक्षी एकता और 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति पर गहन चर्चा हो सकती है।

नीतीश कुमार जैसे नेता प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हाल के महीनों तक राहुल गाँधी के नाम पर सहमति जताने से परहेज़ करते थे; लेकिन अब उनकी राय बदली हुई है। नीतीश ने जनवरी के शुरू में कहा कि बिहार में उनकी सहयोगी कांग्रेस के अगले आम चुनाव में राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर ज़ोर देने से उन्हें कोई समस्या नहीं है। दक्षिण के राज्यों के काफ़ी विपक्षी दल राहुल गाँधी के नाम पर सहमत दिखते हैं, जिनमें यूपीए के सहयोगी तो हैं ही।

उत्तर भारत में भी राहुल गाँधी के प्रति जनसमर्थन से भाजपा में बेचैनी दिखी है, भले उसके नेता आये दिन राहुल की यात्रा का मज़ाक़ उड़ाते हों। यह यात्रा इस महीने ख़त्म हो जाएगी; लेकिन इसकी गूँज अभी रहेगी। शायद यही कारण है कि कांग्रेस राहुल गाँधी की उत्तर भारत में एक और यात्रा का कार्यक्रम बना रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कांग्रेस इस यात्रा के ज़रिये भाजपा को सीधे चुनौती देने के मूड में है।

कांग्रेस लोकसभा के 2024 के चुनाव तक अपने कार्यक्रमों से राजनीति की ज़मीन को तपाये रखना चाहती है। उसे पता चल गया है कि राहुल गाँधी के ज़मीन पर उतरने से भाजपा ने बेचैनी महसूस की है और उसे टक्कर देने के लिए यही करना ज़रूरी है। छोटे-छोटे दल जिस तरह कांग्रेस को आँखें दिखाने लगे थे, उससे कांग्रेस नेता भी शर्म महसूस कर रहे थे। अब जबकि कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा सामने होने के बावजूद भाजपा को धूल चटा दी और भाजपा दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भी हार गयी, कांग्रेस का थिंक टैंक समझ गया है कि ज़मीन पर उतरकर भाजपा की चुनौती को धवस्त किया जा सकता है।

भारत जोड़ो यात्रा के दिल्ली पहुँचने पर राहुल गाँधी ने संकेत दिया था कि वह आने वाले समय में विपक्ष के नेताओं से बातचीत कर सकते हैं। यह बातचीत किस तरह की और किन दलों से होगी, यह अभी साफ़ नहीं है। कारण यह है कि विपक्ष में ऐसे दल भी हैं, जो कांग्रेस का समर्थन नहीं करते। भले समय-समय पर भाजपा के ख़िलाफ़ कांग्रेस के साथ खड़े हो जाते हों। पार्टी इन दलों को साथ जोडऩे की कोशिश कर सकती है। उसके नेतृत्व वाला यूपीए कमोवेश कांग्रेस के साथ है। हालाँकि ममता बनर्जी की टीएमसी जैसे दल अलग खड़े दिखते हैं और वामपंथी दल भी कांग्रेस से कई मसलों पर परहेज़ करते हैं। कांग्रेस के लिए ममता और वामपंथियों को साथ लाना टेढ़ी खीर है। कांग्रेस का लक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव हैं, यह साफ़ है।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हाल में कहा कि राहुल गाँधी आम चुनाव में कांग्रेस और यूपीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे और नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगे। कांग्रेस अब हिम्मत और भरोसे के साथ यह बात कहने लगी है, जिससे ज़ाहिर होता है कि भारत जोड़ो यात्रा ने उसे संजीवनी दी है। लेकिन कांग्रेस के लिए अपने दम पर भाजपा के ख़िलाफ़ मोर्चा फ़तेह करना आसान नहीं। कांग्रेस में आने वाले एक महीने में काफ़ी चीज़ें होने वाली हैं। सीडब्ल्यूसी का गठन होना है और लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए कमेटियाँ भी बनेंगी। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के रोल भी तय होंगे।

पहली चुनौती

राहुल गाँधी या कांग्रेस को भारत जोड़ो यात्रा से चुनावी लाभ मिला या नहीं, इसकी पहली परीक्षा इसी साल हो जाएगी। इस साल 10 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें तहत में 93 लोकसभा सीटें पड़ती हैं। यह कुल लोकसभा सीटों का 17 फ़ीसदी है। इनमें राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम शामिल हैं। भारत जोड़ो यात्रा इनमें से कई राज्यों में नहीं गयी; लेकिन सम्भावना है कि चुनाव से पहले कांग्रेस इन राज्यों में भी यात्रा निकालेगी। इनमें से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चार साल पहले कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनायी थी।

दिसंबर में जब चीन में कोरोना महामारी का नया वेरियंट आने पर जब मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री ने आनन-फ़ानन में भारत जोड़ो यात्रा रोकने का राहुल गाँधी को पत्र लिख दिया, तो बहुतों को यह लगा कि भाजपा यात्रा को दिल्ली आने से पहले ही रोक देना चाहती है; क्योंकि वह नहीं चाहती कि दिल्ली में उसका इम्पैक्ट दिखे और देश भर में इसकी चर्चा हो। राहुल को चिट्ठी लिखने के अलावा सरकार ने कोरोना को लेकर और कोई और गतिविधि नहीं की, तो इस आरोप को बल मिला कि भाजपा राहुल गाँधी की यात्रा से बेचैन है।

काफ़ी लोग मानते हैं कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के राहुल को यात्रा रोकने के लिए कहने के पीछे राजनीतिक कारण थे। कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी रणनीति में बदलाव किये हैं। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े अब संगठन को मज़बूत करने में जुट गये हैं, जबकि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को जनता के बीच माहौल बदलने का ज़िम्मा दिया गया है। प्रियंका गाँधी ने जिस तरह हिमाचल प्रदेश में सघन चुनाव प्रचार किया और पार्टी की रणनीति पर काम किया, उससे उसे वहाँ भाजपा को पराजित करने में मदद मिली।

एआईसीसी के सचिव और हिमाचल चुनाव में घुमारवीं से तीसरी बार विधायक बने राजेश धर्माणी ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘सच कहूँ, तो प्रियंका गाँधी के चुनाव अभियान के तरीक़े से मैं हैरान था। उन्होंने एक दृढ़ संकल्प कमांडर की तरह पार्टी का नेतृत्व किया और कार्यकर्ताओं के भीतर यह भरोसा मज़बूती से भरा कि कांग्रेस भाजपा को परास्त कर सकती है, और ऐसा हुआ भी।’

धर्माणी के मुताबिक, प्रियंका ने पहाड़ी राज्य के मुद्दों को बहुत अच्छे से समझा और उन पर मज़बूती से टिके रहने का मंत्र वरिष्ठ नेताओं को दिया। राहुल गाँधी भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये यह जान चुके हैं कि जनता के बीच जाकर वह अनुभव बटोर सकते हैं, जनता और देश के मुद्दों को और बेहतर तरीक़े से समझ सकते हैं और पार्टी और ग़ैर भाजपा विपक्ष में अपनी नेतृत्व क्षमता के प्रति भरोसा जगा सकते हैं। राहुल तमाम मुद्दों पर पहले भी बोलते थे; लेकिन यात्रा के दौरान उनके जनसभाओं में सीधे जनता से संवाद करने से अलग ही माहौल बनता है। राहुल के नज़दीकी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस और गाँधी इसे जारी रखना चाहते हैं।

राज्यों पर नज़र

कांग्रेस के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती राज्यों में जीत हासिल करने की है। भाजपा अपने पक्ष में सारा माहौल राज्यों में जीत हासिल करके बनाती है। जीत के बाद वह कहती है कि उसके और उसके नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी) के सामने कोई गम्भीर चुनौती नहीं है। लेकिन हिमाचल में भाजपा को हराने के बाद कांग्रेस ने समझा लिया है कि उसे भी राज्यों में और जीत हासिल करनी होगी, तभी उसके लिए 2024 की राह से काँटे हट जाएँगे।

कांग्रेस के बड़े नेताओं की मानें, तो पार्टी नेतृत्व राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे इस साल के बड़े चुनावी राज्यों में अपने बूते पूरी ताक़त झोंकने की तैयारी कर रही है; जबकि तेलंगाना, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में वह अपनी स्थिति सुधारने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ सहयोग कर ज़मीन मज़बूत करना चाहती है। पंजाब से सबक़ सीखते हुए कांग्रेस ने राजस्थान में अशोक गहलोत को बनाये रखा है और इसके पीछे कारण चुनाव से पहले पार्टी को भीतरी लड़ाई से बचाना है। सचिन पायलट को भरोसा दिया गया है कि वह धीरज बनाये रखें, उन्हें बड़ा अवसर अवश्य मिलेगा। सचिन इससे सन्तुष्ट दिखते हैं, भले गहलोत के कुछ बोल उन्हें पीड़ा दे गये थे। मल्लिकार्जुन खड़े के अलावा प्रियंका और राहुल गाँधी ने भी सचिन और गहलोत की दूरियों को कम किया है।

पार्टी को कर्नाटक में बहुत उम्मीद है। राहुल को भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राज्य में काफ़ी जनसमर्थन मिला था। वहाँ भाजपा की सरकार है और कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री बनाये गये बसवराज सोमप्पा बोम्मई भाजपा को उस ऊँचाई पर नहीं ले जा सके हैं, जहाँ पार्टी उनके भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद करे। इसके अलावा वहाँ कई विवाद देखने को मिले हैं, जिनसे भाजपा को नुक़सान हो सकता है। कांग्रेस कर्नाटक में इस कारण से भी बेहतरी की उम्मीद कर रही है, क्योंकि उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े कर्नाटक से ही हैं।

भाजपा कर्नाटक में आरक्षण के चक्रव्यूह में फँसी है। दो बड़े समुदाय लिंगायत और वोक्कालिगा आरक्षण बढ़ाने की माँग कर रहे हैं। माँग पूरी नहीं हुई, तो भाजपा के लिए राजनीतिक संकट बढ़ेगा। एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार वहाँ भाजपा के लिए मुश्किल बन सकते हैं। लिहाज़ा कांग्रेस अपना रास्ता खुलता देख रही है। हालाँकि राज्य कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच लड़ाई है। के. चंद्रशेखर राव अपनी पार्टी बीआरएस का देवेगौड़ा के जेडीएस को समर्थन दे चुके हैं। कांग्रेस को इन सबसे रास्ता निकलना पड़ेगा।

मध्य प्रदेश कांग्रेस के लिए चुनौती है, जहाँ उसने 2018 के आख़िर में विधानसभा चुनाव जीता था; लेकिन माधवराव सिंधिया पार्टी छोड़ भाजपा में चले गये, जिसके बाद भाजपा ने दलबदल करवाकर कांग्रेस की सत्ता छीन ली थी। कांग्रेस के बड़े नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, अजय सिंह आदि पर पार्टी को जीत दिलाने का ज़िम्मा रहेगा।

छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2018 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर काफ़ी मश$क्क़त झेली। हालाँकि भूपेश बघेल ने इन चार वर्षों में अपने नेतृत्व से सरकार और पार्टी को मज़बूत बनाये रखा है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अगले चुनाव में बघेल के चेहरे के साथ ही आगे बढ़ेगी। हालाँकि टी.एस. सिंह देओ, महंत चरण दास और ताम्रध्वज साहू जैसे नेता भी ज़मीन पर काफ़ी मज़बूत हैं। बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले चार साल में भाजपा वहाँ विपक्ष के रूप में ज़्यादा सक्रिय नहीं रही है।

तेलंगाना सीटों के लिहाज़ से बड़ा राज्य है; लेकिन कांग्रेस वहाँ अपनी जड़ें मज़बूत नहीं कर पा रही है। कांग्रेस से निकले केसीआर ज़मीन पर अपने पाँव जमाये हुए हैं और उन्हें चुनौती देने के लिए भाजपा कांग्रेस से आगे दिखती है। कांग्रेस और केसीआर का वोट बैंक चूँकि एक ही है, उनके कमज़ोर होने से ही कांग्रेस बेहतरी की उम्मीद कर सकती है।

राहुल गाँधी ने हाल के महीनों में तेलंगाना के दौरे किये हैं। उनकी भारत जोड़ो यात्रा के बाद पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव से पहले पार्टी लय हासिल कर लेगी। वहाँ तेलुगु देशम (टीडीपी) से आये रेवंथ रेड्डी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के ख़िलाफ़ पार्टी में नाराज़गी थी, जिसे दूर करने का ज़िम्मा दिग्विजय सिंह को दिया गया था। पूर्व अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी रेवंथ के विरोधी हैं। उनके अलावा कार्यकारी अध्यक्ष के जग्गा रेड्डी, वरिष्ठ नेता वी हनुमंत राव और सीएलपी लीडर मल्लू भट्टी विक्रमार्क भी रेवंथ के पक्ष में नहीं। हालाँकि यह माना जाता है कि राहुल गाँधी रेवंत के साथ हैं और उन्हें हटाये जाने की उम्मीद नहीं।

पार्टी अब चुनाव पर फोकस कर रही है और चाहती है कि सब मिलकर काम करें। दिसंबर में जब पीसीसी का गठन हुआ था, तब वरिष्ठ नेता और सांसद वेंकटा रेड्डी को बाहर रखा गया था। फ़िलहाल वहाँ पार्टी में शान्ति दिखती है और चुनाव की राणनीति बनाने का काम शुरू हो गया है। हालाँकि उसका रास्ता आसान नहीं है और उसे टीआरएस और भाजपा के अलावा राज्य में पैठ रखने वाले असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमएम से भी पार पाना होगा। कांग्रेस का कभी उत्तर पूर्व में एकछत्र राज था। अब उसे वहाँ क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ भाजपा की भी मुश्किल चुनौती झेलनी पड़ रही है।

इस साल उत्तर पूर्व के त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में विधानसभा के चुनाव हैं, जहाँ कांग्रेस की राह चुनौती भरी है। उत्तर पूर्व में त्रिपुरा की लड़ाई सबसे दिलचस्प है, जहाँ भाजपा सत्ता बनाये रखने के लिए जूझ रही है। वहाँ वामपंथी दल माकपा और भाकपा अपने गढ़ को वापस पाना चाहते हैं। कुल 60 सीटों वाले त्रिपुरा में माकपा और कांग्रेस धुर विरोधी रहे हैं। अब भाजपा की चुनौती दोनों के सामने है, जबकि क्षेत्रीय दल भी हैं। हालाँकि वहाँ इस बार कांग्रेस ने माकपा से गठबंधन कर लिया है। ऐसा होने से दोनों की साझी राजनीतिक ताक़त भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है। प्रोग्रेसिव रीजनल एलायंस (टिपरा मोथा) भी इन डॉन के साथ जुड़ सकता है। कांग्रेस को वहाँ अपने पुराने नेता भाजपा छोडक़र आये सुदीप रॉय बर्मन से उम्मीद है।

मेघालय में कांग्रेस पिछली बार के चुनाव में 21 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी; लेकिन 2023 में होने वाले चुनाव से पहले एक तरह से उसका सफ़ाया हो गया है। उसके पास एक भी विधायक नहीं है।

मुकुल संगमा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता थे; लेकिन अब टीएमसी में हैं। राज्य में 2018 चुनाव नतीजों के बाद एनपीपी की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी, जिसमें एनपीपी, यूडीपी, पीडीएफ, एचएसपीडीपी और भाजपा सहयोगी हैं। हालाँकि अगले चुनाव में यह एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में उतरेंगे। भाजपा सभी 60 सीटों पर लडऩे का ऐलान कर चुकी है। कांग्रेस वहाँ खोयी ताक़त फिर पाने की जंग लड़ रही है। जहाँ तक नागालैंड की बात है, वहाँ 2018 के चुनाव में एनडीपीपी 18 सीटें जीतकर आयी एनडीपीपी ने 12 सीटें जीतने वाली भाजपा की मदद से गठबंधन सरकार बनायी।

कांग्रेस को दिसंबर में तब झटका लगा, जब मेघालय के पूर्वी शिलांग से विधायक एंपरीन लिंगदोह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी वहाँ भाजपा की सहयोगी है और सत्ता में है। कांग्रेस के लिए वहाँ चुनौती है। मिजोरम में भी इसी साल चुनाव हैं, जहाँ मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता में है। पिछले चुनाव में उसने 40 में से 26 सीटें जीतकर जोरामथांगा के नेतृत्व में सरकार है। कांग्रेस को फिर सरकार बनाने के लिए एमजेएफ से पार पाना होगा। कांग्रेस की लाल थनहवला के नेतृत्व में लगातार 10 साल सरकार रहने के बाद मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता में आयी है। लिहाज़ा कांग्रेस की मुख्य लड़ाई उसी से होनी है। उम्मीद है कि कांग्रेस पूर्वोत्तर के पार्टी नेताओं के साथ इन राज्यों में राहुल गाँधी की जनसभाएँ करेगी।

चम्पत राय भी हुए राहुल के मुरीद

राहुल गाँधी के निशाने पर यदि कोई सबसे ज़्यादा रहता है, तो वह है आरएसएस। इसी आरएसएस के नेता और श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने भारत जोड़ो यात्रा और राहुल गाँधी की तारीफ़ की, तो कई को आश्चर्य हुआ। अयोध्या राम मन्दिर के मुख्य पुजारी ने भारत जोड़ो यात्रा के स्वागत में बा$कायदा राहुल गाँधी को एक पत्र लिखा। विहिप नेताओं के राहुल गाँधी की तारीफ़ करने के बाद बागपत के बड़ौली में भाजपा कार्यालय में पार्टी नेताओं ने राहुल और यात्रियों का अभिवादन किया।

राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा की ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने भी खुलकर सराहना की। चम्पत राय ने कहा- ‘वह (राहुल गाँधी) इस ख़राब मौसम में चल रहे हैं। इसकी सराहना की जानी चाहिए। मुझे कहना होगा कि हर किसी को देश की यात्रा करनी चाहिए।’

उधर गोविंद देव गिरी ने कहा- ‘राम का नाम लेकर कोई भी कुछ कार्य करे, तो हम तो उसकी सराहना ही करेंगे। भगवान श्री राम उनकी बुद्धि में वही प्रेरणा दें, जिससे राष्ट्र एक और समर्थ बना रहे। एक 50 साल का नौजवान पैदल चल रहा है देश में, प्रशंसा की बात है। इसमें ख़राब बात कौन-सी है? आलोचना किसने की है?’ राहुल यात्रा के दौरान मन्दिरों में भी जा रहे हैं। ऐसे में विहिप / आरएसएस नेता भला क्यों तारीफ़ न करें।

कांग्रेस में आएँगे वरुण?

वरुण गाँधी काफ़ी महीनों से चर्चा में हैं। भाजपा के सांसद हैं; लेकिन भाजपा से ही उनकी पटरी नहीं बैठ रही। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के उत्तर प्रदेश में जाने के समय वरुण गाँधी ने एक ऐसा बयान दे दिया, जिससे कांग्रेसी तो चहक पड़े; लेकिन भाजपा की भृकुटि तन गयीं। दरअसल वरुण ने कांग्रेस और पंडित जवारलाल नेहरू को लेकर एक बयान वीडियो के ज़रिये दिया, जो जल्दी ही वायरल हो गया। वरुण गाँधी इस वीडियो में कह रहे हैं- ‘मैं न कांग्रेस के ख़िलाफ़ हूँ और न पंडित नेहरू के ख़िलाफ़। देश की राजनीति देश को जोडऩे की होनी चाहिए।

गृहयुद्ध पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। आज जो लोग केवल धर्म और जाति के नाम पर वोट ले रहे हैं, उनसे हमें रोज़गार, शिक्षा और हेल्थ से सम्बन्धित सवाल पूछना चाहिए। हमें वह राजनीति नहीं करनी, जो लोगों को दबाये। हमें वह राजनीति करनी है, जो लोगों को उठाये।’ यह वही बातें जो राहुल गाँधी कह रहे हैं। इसके बाद राहुल गाँधी का भी एक बयान सुर्ख़ियाँ बन गया।

उन्होंने कहा- ‘वरुण गाँधी के पार्टी में शामिल होने या नहीं होने का सवाल खडग़े जी से करिये। वैसे तो भारत जोड़ो यात्रा में उनका या सबका स्वागत है; लेकिन वो भाजपा में हैं, उनको दि$क्क़त हो जाएगी। स्वागत तो सबका है। लेकिन वह भाजपा में हैं, तो प्रॉब्लम तो होगी ही उनको।’ अब सवाल यह है कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वरुण गाँधी और राहुल गाँधी एक मंच पर आ रहे हैं? बहुत चर्चा है कि भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में वरुण को टिकट नहीं देगी। वरुण लगातार अपनी पार्टी भाजपा के ख़िलाफ़ हमलावर हैं। महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर वरुण गाँधी के सभी बयान पार्टी लाइन से अलग हैं। वरुण गाँधी अब कोई राजनीतिक फ़ैसला लेने के मूड में दिखते हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश की बाग़डोर वरुण गाँधी को दे सकती है। और इसका कारण हैं कांग्रेस की उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गाँधी।

इनके नज़दीकी लोगों का दावा है कि प्रियंका की परिवार को लेकर वरुण से बातचीत होती रहती है। हाल में वरुण गाँधी ने बेरोज़गारी, अग्निवीर योजना से लेकर किसान आन्दोलन तक पर भाजपा के ख़िलाफ़ रुख़ दिखाया है। योगी सरकार से लेकर मोदी सरकार पर वह बेहिचक निशाना साध रहे हैं। फिर भी भाजपा के नेता उनके ख़िलाफ़ बयान नहीं देते हैं।

हाल में जब वरुण ने कहा कि भाई को बाँटो और भाई को काटो की राजनीति हम नहीं होने देंगे। ज़ाहिर है यह भाजपा पर सीधा निशाना है। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे को लेकर मीडिया पर भी निशाना साधा, वैसे ही जैसे राहुल गाँधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान दिल्ली के लाल क़िले के भाषण में साधा था।

वरुण भाजपा के कमज़ोर नस ‘किसान मुद्दे’ पर भी बोल रहे हैं। वरुण का कहना है कि किसान इस समय कितने संकट में है। कोई टीवी चैनल और अख़बार इस पर बोलने या लिखने को तैयार नहीं है। केवल हिन्दू-मुस्लिम, ज़ात-पात की बात हो रही है। तोते की तरह रटाया गया है।

नेता वह होना चाहिए जो ग़रीब जनता को अपने कंधे पर उठाकर चले, न कि अपने जूते पर बिठाये। अपनी आवाज़ उठाओ। लेकिन इस सबके बीच यह सवाल उठता है कि क्या मेनका गाँधी बेटे वरुण को कांग्रेस में जाने देंगी?

मेनका की नाराज़गी इंदिरा गाँधी से थी, जिनके रहते उन्हें घर छोडऩा पड़ा था; वो अब हैं नहीं। सोनिया गाँधी इन चीज़ों में ज़्यादा पड़ती नहीं दिखी हैं। प्रियंका लगातार वरुण से बात करती हैं। ऐसे में हो सकता है, मेनका पुरानी बातें भूलकर वरुण को उनका फ़ैसला करने दें।

उत्तर-दक्षिण के प्रियंका-राहुल!

क्या कांग्रेस राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को देश के दो अहम राजनीतिक हिस्सों में ज़िम्मेदारी देने जा रही है? चर्चा है कि प्रियंका गाँधी को हिन्दी बेल्ट में पार्टी को मज़बूत करने, जबकि राहुल गाँधी की दक्षिण में लोकप्रियता को देखते हुए पार्टी को 2024 चुनाव से पहले ज़मीन पर उतारा जा सकता है। वैसे तो राहुल और प्रियंका की छवि देशव्यापी है; लेकिन पार्टी को लगता है छवि के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर दोनों लोकप्रिय नेताओं की क्षमता और लोकप्रियता का लाभ संगठन को मज़बूत करने में लगाया जाए। एक रणनीति बनाकर चलने को पार्टी बेहतर विकल्प मान रही है, $खासकर भारत जोड़ो यात्रा की सफलता को देखते हुए। उत्तर प्रदेश में दलित, किसान और मुस्लिन जिस तरह राहुल की यात्रा में जुटे उससे पार्टी को लगता है कि एक साल तक मेहनत करने भाजपा के लिए संकट पैदा किया जा सकता है। प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं और यदि वरुण गाँधी कांग्रेस में आ जाते हैं, तो उन्हें इस सबसे बड़े राज्य में पार्टी मज़बूती से साथ जोड़ लेगी। प्रियंका गाँधी दक्षिण भारत में राहुल की यात्रा के दौरान शामिल नहीं हुई थीं। यात्रा जब उत्तर भारत (मध्य प्रदेश) में प्रवेश कर गयी तब जाकर प्रियंका जुड़ीं।

राहुल गाँधी ने वायनाड (केरल) के संसद के रूप में जैसा काम किया है, उसकी काफ़ी तारीफ़ हुई है। कोरोना से लेकर बाढ़ तक वो अपने लोगों के बीच दिखे हैं और विकास के काम भी उन्होंने करवाये हैं। हालाँकि यह चर्चा है कि क्या वह अमेठी से लड़ेंगे? कहा जाता है कि अमेठी में मिली हार से राहुल गाँधी बहुत आहत हुए थे, क्योंकि उन्हें पिता के इस लोकसभा हलक़े से उन्हें भावनात्मक लगाव था।

उन्होंने वहाँ काम भी किये थे। प्रियंका गाँधी को लेकर कहा जाता है कि वह माँ सोनिया गाँधी की रायबरेली सीट से चुनाव लड़ सकती हैं, यदि पार्टी सोनिया गाँधी को मैदान में नहीं उतारती हैं।

“देश में भाजपा के विरोध में लहर बन रही है। अगर सभी विपक्षी दल एक साथ आते हैं, तो भाजपा के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा। भारत जोड़ो यात्रा में लोगों की बड़ी भागीदारी ने साबित किया है कि उन्हें भारत की वर्तमान स्थिति को लेकर चिन्ता है। भाजपा-आरएसएस देश को बाँट रहे हैं और हमारी यात्रा इसके विरोध में और देश को एकजुट करने के लिए है। यात्रा सफल रही है और देश समझने लगा है कि उन्हें तोडऩे की कोशिश हो रही है, जिससे देश को नुक़सान होगा।“

राहुल गाँधी

कांग्रेस नेता

 

“मैं प्रधानमंत्री के तौर पर खुद को उम्मीदवार नहीं मानता हूँ। राहुल की दावेदारी पर हमें कोई एतराज़ नहीं है। राज्य में हमारी सहयोगी कांग्रेस अगले आम चुनाव में राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर ज़ोर दे रही है, तो हमें कोई समस्या नहीं है।“

नीतीश कुमार

मुख्यमंत्री, बिहार

 

 

ऑक्सीजन की कमी पर लापरवाही

चाँद पर ऑक्सीजन खोजने के बजाय देश में ऑक्सीजन आपूर्ति पर ध्यान दे सरकार

कोरोना महामारी की तबाही के बारे में सोचकर आज भी दिल घबरा जाता है। ऑक्सीजन की कमी से मरते लोग, दवाओं का अभाव और कोरोना पीडि़तों से अपनों के भी दूरी बनाने के बावजूद डॉक्टरों कई दिन-रात चिकित्सा सेवा, समाजसेवियों की सेवा को कौन भूल सकता है? पूरा संसार में इस वैश्विक महामारी कोरोना से सिर उठाने की कोशिश में है; लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकल सका है। इस महामारी में इंसान के लिए प्राणवायु यानी ऑक्सीजन का महत्त्व समझ में आ गया। हालाँकि हम अभी तक इसके प्रति उतने सजग नहीं हैं, जितना होना चाहिए। यह प्राणवायु, जिसकी पृथ्वी पर लगातार कमी होती जा रही है; के न मिलने से इंसान की चार से पाँच मिनट में मृत्यु निश्चित है।

केंद्र सरकार यानी हिन्दुस्तान चाँद पर ऑक्सीजन उपलब्धता की तैयारी में है; लेकिन देश के पर्यावरण में ऑक्सीजन मापने के यंत्र उपलब्ध नहीं हैं। दिल्ली और दिल्ली की तरह प्रदूषित शहरों में, जिनकी स्थिति लगातार ख़राब होती जा रही है; ऐसा कोई यंत्र नहीं है, जो प्राणवायु को माप सके। इसके लिए न तो केंद्र की मोदी सरकार चिन्तित है और न ही राज्य सरकारें। देश की राजधानी दिल्ली में तो जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, जिसके चलते फ्लैट बढ़ रहे हैं और ऑक्सीजन घट रही है। यह आश्चर्यचकित करने वाला है कि बावजूद इसके न तो दिल्ली सरकार के पास और न ही केंद्र सरकार के पास पर्यावरण में प्राणवायु नापने का न कोई यंत्र उपलब्ध है और न ही नापने के लिए कोई केंद्र ही स्थापित है। सबसे आश्चर्य की बात है कि पर्यावरण वन एवं मंत्रालय भारत सरकार के पास ऑक्सीजन का प्राकृतिक स्रोत की जानकारी और पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से पायी जाने वाली अन्य गैसों तक की जानकारी उपलब्ध नहीं है। सरकारों के पास प्राणी मात्र के जीवन में प्राणवायु का महत्त्व और आवश्यकता, पर्यावरण में मापने की सुविधा, पर्यावरण में प्राणवायु का स्रोत और उपलब्धता की जानकारी उपलब्ध नहीं है, जो बहुत ही चिन्ताजनक है। आज दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण जितना अधिक बढ़ रहा है और उससे जनजीवन को ख़तरा उत्पन्न हो रहा है। ऑक्सीजन के बिना कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। यह प्राणवायु प्राणियों के लिए दूसरी ज़रूरी चीज़ों से 1,000 गुना अधिक आवश्यक और उपयोगी है।

 

सन् 2021 में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान केंद्र की मोदी सरकार ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में बहुत कम कामयाब रही, जिसके लिए उसे ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए न सि$र्फ विदेशी मदद लेनी पड़ी, बल्कि उद्योगों की ऑक्सीजन आपूर्ति भी कम करनी पड़ी। पिछले कुछ महीनों में भारत ने मेडिकल ऑक्सीजन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक मध्यम अवधि की रणनीति बनायी थी और केंद्र और राज्य सरकारों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की कोशिश भी की है। लेकिन सवाल यह है कि इसमें सफलता कितनी मिली है? ज़ाहिर है कि ऑक्सीजन की ज़रूरत, बढ़ती माँग और कम सरकारी आपूर्ति के चलते ही प्राइवेट सेक्टर इस धंधे में कूद पड़े हैं। यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यही उठता है कि क्या प्राकृतिक रूप से ईश्वर के वरदान के रूप में मिल रही प्राणवायु को ख़त्म करके हम कृत्रिम ऑक्सीजन से स्वस्थ जीवन पा सकेंगे। ज़ाहिर है कि यह कृत्रिम ऑक्सीजन वैसे ही काम करेगी, जैसे नवजात के लिए सप्लीमेंट वाला दूध।

सामाजिक कार्यकर्ता और चिन्तक चौधरी हरपाल सिंह राणा के द्वारा शासन प्रशासन को लिखे पत्र, सूचना आवेदन और अपील करने के बाद दी गयी आधी-अधूरी जानकारी के नीचे लिखा गया कि ऊपर दी गयी जानकारी इंटरनेट के माध्यम से ली गयी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा गयी जानकारी पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से पायी जाने वाली गैस निम्नलिखित है- मुख्यत: हरे पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण हवा में ऑक्सीजन गैस का प्राकृतिक स्रोत है। नाइट्रोजन (हृ2) 78 फ़ीसदी ऑक्सीजन (ह्र2) 21 फ़ीसदी, अक्रिय गैस आर्गन (रह्म्) 0.93 फ़ीसदी, अन्य गैस जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (ष्टह्र2), नियॉन (हृद्ग), हीलियम (॥द्ग), मेथेन (ष्ट॥4), क्रिप्टन (यह्म्), हाइड्रोजन (112), नाइट्रस ऑक्साइड (हृह्र), क्सीनन (ङ्गद्ग), ओजोन वातावरण में (03), आयोडीन (12), कार्बन मोनोऑक्साइड (ष्टह्र) और अमोनिया (हृ॥3) पर्यावरण में पायी जाती है।

जवाब में लिखा गया कि यह जानकारी इस प्रभाग के पास उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, आगे बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाली बात और लिखी गयी है कि आपको सूचित किया जाता है कि यह प्रभाग इस जानकारी का पुष्टिकरण भी नहीं करता है। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार के पास ऑक्सीजन से सम्बन्धित किसी प्रकार की कोई जानकारी ही उपलब्ध नहीं है और सरकार के द्वारा ऑक्सीजन जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर कार्य ही नहीं किया जा रहा है। सरकार का कर्तव्य समय की माँग और आवश्यकता के अनुरूप वह प्राणी मात्र की हर प्रकार स्वास्थ्य की देखभाल सहित सभी प्रकार के आवश्यक विषयों, कार्यों का ध्यान रखें, उसकी जाँच और समस्या होने पर उसके उचित समाधान की व्यवस्था करें। वर्ष 2009 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राष्ट्रीय परिवेश ई-वायु गुणवत्ता मानकों को अधिसूचित किया था, जिसमें मानव स्वास्थ्य पर आधारित 12 प्रकार के पैरामीटर (प्रदूषक) बनाये थे। इसमें ऑक्सीजन को प्रदूषक नहीं माना गया था। वर्ष 2009 से पहले प्रदूषण पर भी शायद ही कोई कार्य हो रहा हो, इसलिए समस्त देश में प्राणवायु ऑक्सीजन की जाँच करने की और समस्या होने पर समाधान का प्रयास करने की सख़्त आवश्यकता है।

इससे भी हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार और सभी राज्यों को लिखे गये पहले पत्रों का तो जवाब ही नहीं दिया गया। पर्यावरण मंत्रालय केंद्र सरकार में किये गये सूचना के आवेदन को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में स्थानांतरित किया गया और बोर्ड के द्वारा 21 अक्टूबर को दी गयी जानकारी में यह बात कही गयी। इससे पहले भी फरवरी और सितंबर के जवाब में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा कहा गया था कि ऑक्सीजन प्रदूषक नहीं है, इसलिए बोर्ड के द्वारा ऑक्सीजन नहीं नापा जाता और दिल्ली में बोर्ड ने कोई भी ऑक्सीजन नापने का यंत्र स्थापित नहीं किया है। प्राणवायु से सम्बन्धित जानकारी का महत्त्व इसलिए और बढ़ जाता है कि समस्त संसार में बहुत तेज़ी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है और उसके समाधान के प्रयास किये जा रहे हैं। समस्त संसार में दो वर्षों तक कोरोना का अत्यधिक कहर रहा है, जिसमें ऑक्सीजन की अत्यधिक आवश्यकता के बावजूद अत्यधिक कमी भी रही और सरकार के द्वारा हर ज़िले में ऑक्सीजन संयंत्र लगाने का प्रयास किया गया। लेकिन इसके बावजूद पर्यावरण में ऑक्सीजन नापने की सुविधा, ऑक्सीजन की व्यक्ति के जीवन में आवश्यकता और पर्यावरण में उपलब्धता की जानकारी पर्यावरण मंत्रालय के पास उपलब्ध न होना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और प्राणी मात्र के जीवन के लिए बहुत बड़ी लापरवाही है। वह कहते हैं कि यह जवाब देखकर मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ और इस जवाब पर यकीन नहीं हुआ कि देश ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि चाँद पर ऑक्सीजन की खोज करके इंसानों के रहने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं; लेकिन पृथ्वी पर अभी तक ऑक्सीजन नापने के यंत्र नहीं लगे होंगे, मुझे इसकी कल्पना भी नहीं थी। इसलिए मैंने केंद्र सरकार और सभी राज्यों को 8 अक्टूबर को दोबारा से पत्र भेजा। केंद्र सरकार और राज्यों को लिखे गये पत्र पर अलग-अलग प्रकार से कार्यवाही की गयी है। अधिकतर राज्यों ने जवाब नहीं दिया है। कुछ राज्यों ने इसे सुझाव बताया है। भारत सरकार को लिखे गये पत्र में इस विषय को राज्य सरकार से सम्बन्धित बताया गया है। गृह सचिव के द्वारा कहा गया कि यह प्रकरण दिल्ली सरकार से सम्बन्धित है।

दिल्ली सरकार के द्वारा आवेदन को और शिकायत पत्र को मौलाना आज़ाद कॉलेज, पर्यावरण विभाग दिल्ली सचिवालय अलग-अलग विभागों में कई बार स्थानांतरित किया गया। हैरानी की बात तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें या तो इस गम्भीर विषय पर मौन हैं या फिर $गलत जवाब दिये जा रहे हैं। एक जवाब में कहा गया है कि पुडुचेरी प्रदूषण नियंत्रण समिति मैनुअल और सतत परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों के माध्यम से परिवेश में वायु प्रदूषकों की निगरानी कर रही है। चूँकि ऑक्सीजन वायु प्रदूषकों में से एक नहीं है, इसलिए सीपीसीबी ने परिवेश में ऑक्सीजन स्तर की निगरानी की अनुशंसा नहीं की है। हालाँकि आपके सुझावों पर विचार किया जाता है। केंद्र गृह सचिव भारत सरकार के द्वारा कहा गया की प्रकरण दिल्ली से सम्बन्धित है। सूचना आवेदन स्थानांतरित होकर दिल्ली नगर निगम को भी भेजा गया जिसके द्वारा भी कोई सही जवाब नहीं दिया गया।

मेरा मानना है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए आम जनता को सरकारों से सवाल करने चाहिए और पूछना चाहिए कि इस गम्भीर विषय पर यह चुप्पी क्यों? साथ ही इससे पहले कि कृत्रिम ऑक्सीजन पर निर्भरता बढ़े, आम जनता को ज़्यादा से ज़्यादा पौधारोपण करना चाहिए, ताकि ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत न हो। केंद्र सरकार को भी इस गम्भीरता को समझते हुए चाँद पर ऑक्सीजन खोजने की बजाय देश में घट रही ऑक्सीजन को गम्भीरता से लेते हुए उसे बढ़ाना चाहिए। बहरहाल मुझे यहाँ पर पंडित प्रेम बरेलवी एक गीत की ये पंक्तियाँ सटीक बैठती नज़र आती हैं- ‘चाँद पर इंसान पहुँचा, पर कहाँ पर ज़िन्दगी है।’ आज हम सबको और ख़ासकर सरकारों को इसका महत्त्व समझने की ज़रूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

आकाशवाणी पर संकट

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

आज के बहुत कम युवा ही रेडियो सुनते हैं। सुनते भी हैं, तो निजी रेडियो चैनल ज़्यादा सुनते हैं। अब आकाशवाणी नाम कम सुनने को मिलता है। दो दशक पहले तक रेडियो खोलते ही सुनाई देता था यह आकाशवाणी का दिल्ली केंद्र है। अब वह आवाज़ कहीं खो गयी है। 23 जुलाई, 1927 को स्थापित हुए भारतीय प्रसारण सेवा को सन् 1936 में ऑल इंडिया रेडियो नाम दिया गया। इसी साल मैसूर के विद्वान एम.वी. गोपालस्वामी ने आकाशवाणी कहा था। देश के स्वतंत्र होने के बाद सन् 1957 में इसे यही नाम दिया गया। महाभारत व पंचतंत्र की कथाओं में वर्णित आकाशवाणी शब्द का मतलब आकाश से आने वाली आवाज़ है।

भारत में रेडियो प्रसारण का पहला कार्यक्रम सन् 1923 में रेडियो क्लब ऑफ मुम्बई द्वारा किया गया था। इसके बाद सन् 1927 में प्रसारण सेवा का गठन हुआ। सन् 1936 में इसे ऑल इंडिया रेडियो का नाम दिया गया। आज इसके 200 से ज़्यादा केंद्र हैं। लेकिन कई देशी-विदेशी भाषाओं में विभिन्न सेवाएँ प्रसारित करने वाला इसी आकाशवाणी की कई यूनिट आज बन्द हो चुकी हैं और कई बन्द होने के कगार पर हैं। किसानों, मज़दूरों, विद्यार्थियों और वाहन चालकों को ध्यान में रखकर स्थापित किया गया रेडियो जब हर तरह की प्रसारण सेवाएँ देने लगा, तब सरकार इसे घाटे का सौदा बताकर बन्द कर करने का काम कर रही है, जबकि कई निजी रेडियो चैनल इन्हीं पिछले दो दशक में खुले हैं और अच्छी-ख़ासी कमायी कर रहे हैं। आकाशवाणी का संचालन करने वाला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ही आज इसकी यूनिटों को एक-एक करके बन्द करता जा रहा है।

सन् 2014 में केंद्रीय सत्ता में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार बनी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद 3 अक्टूबर, 2014 से उन्होंने इसी आकाशवाणी के माध्यम से देशवासियों से मन की बात कहनी शुरू की। प्रधानमंत्री का मन की बात कार्यक्रम आज भी अनवरत चल रहा है। लेकिन मोदी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने आकाशवाणी पर आघात करना शुरू किया, जिसके बाद से आज तक एक-एक करके आकाशवाणी की कई यूनिट बन्द हो चुकी हैं और कई यूनिट पर बन्द होने का ख़तरा मँडरा रहा है।

सन् 1987 में शुरू हुए ऑल इंडिया रेडियो के राष्ट्रीय चैनल और पाँच शहरों में रीजनल ट्रेनिंग एकेडमी को तत्काल प्रभाव से बन्द करने के लिए 24 दिसंबर, 2018 को प्रसार भारती ने आज से ठीक चार वर्ष पहले इनके ख़र्चों में कटौती करनी शुरू कर दी। कहा यह गया कि फ़िज़ूलख़र्ची को कम किया जा रहा है, ताकि कार्यक्रमों को स्तरीय बनाया जा सके। इसके बाद सन् 2019 को इन्हें बन्द करने का निर्णय लिया गया। इन चैनलों पर शाम 6 से सुबह 6 बजे तक हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में कई कार्यक्रम प्रसारित होते थे। इस कार्यक्रमों की पहुँच देश के 64 फ़ीसदी क्षेत्र की 76 फ़ीसदी आबादी तक थी। इस राष्ट्रीय चैनल को बन्द करने के अलावा अहमदाबाद, हैदराबाद, लखनऊ, शिलॉन्ग और तिरुवनंतपुरम स्थित रीजनल ट्रेनिंग एकेडमी (आरएबीएम) को भी बन्द कर दिया गया। दिल्ली के डोडापुर स्थित राष्ट्रीय चैनल को अचानक बन्द करने से कई अस्थायी (कैजुअल) कर्मचारी सडक़ पर आ गये।

32 साल तक चले इस राष्ट्रीय चैनल के पास राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का समृद्ध ख़ज़ाना है। एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1988 में नागपुर में मीडियम वेव ट्रांसमीटर 10.74 करोड़ रुपये में लगा था। राष्ट्रीय चैनल के बन्द होने से यह मीडियम वेव ट्रांसमीटर किस काम का? इस चैनल के बन्द होने से स्थायी कर्मचारियों की तो नौकरी नहीं गयी, परन्तु अनुबंध पर नियुक्त कर्मचारी दर-ब-दर हो गये, जो पक्की नौकरी की आस में काम करते थे। सन् 2018 में नई दिल्ली स्थित आकाशवाणी के नेपाली समाचार एकांश में स्टाफ के नाम पर एक संविदा कर्मचारी और पाँच अस्थायी कर्मचारी ही थे। नेपाली भाषा के समाचार वाचक की कमी के चलते इस चैनल पर संस्कृत समाचार वाचक के नेपाली समाचार पढऩे की ख़बरें सामने आयीं।

आकाशवाणी के एक कर्मचारी ने चर्चा के दौरान बताया कि ईएसडी हिन्दी चैनल को बन्द कर दिया गया है। ज़्यादातर चैनलों पर कार्यक्रम कम दिये गये हैं। सभी चैनल्स का बजट कम कर दिया गया है। कर्मचारियों को निर्देश मिला हुआ है कि वे फ्रीलांसर्स से कार्यक्रम बहुत कम कराएँ, ख़ुद कार्यक्रम करें। कुछ एक फ्रीलांसर की शिकायतें भी सामने आयी हैं। इन शिकायतों में कार्यक्रम करने के बावजूद पैसा न मिलने और अगर मिल जाए, तो उसमें देरी होने जैसी शिकायतें शामिल हैं।

आकाशवाणी की तरह दूरदर्शन की भी हालत पहले जैसी नहीं रही। यहाँ कई यूनिट ऐसी हैं, जिनमें पहले से कम लोग काम करते हैं। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय अगर इसी तरह निर्णय लेता रहा, तो वह समय दूर नहीं, जब आकाशवाणी का नाम ही मिट जाएगा। इससे इस विभाग से मिलने वाला रोज़गार तो कम होगा ही, तमाम तरह के कलाकारों, पत्रकारों का प्रसारण माध्यम और पैसा कमाने का जरिया भी विलुप्त होगा।

 

आईसीयू में हरियाणा दूरदर्शन केंद्र कमलेश भारतीय

हरियाणा दूरदर्शन केंद्र को केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने 15 जनवरी को हिसार से चंडीगढ़ स्थानांतरित (शिफ्ट) करने के आदेश जारी कर दिये हैं। यानी इन दिनों हरियाणा दूरदर्शन केंद्र हिसार में एक प्रकार से आईसीयू में है।

20 साल पहले शुरू हुए इस दूरदर्शन केंद्र का उद्घाटन हरियाणा की बेटी और भाजपा की तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज इसका उद्घाटन करने आयी थीं। विडम्बना देखिए कि भाजपा के ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर इसे स्थानांतरित करने का फ़रमान सुना रहे हैं, जबकि एक माह पहले ही वह इस दूरदर्शन केंद्र का दौरा करने आये थे। उन्होंने इसे राहत देने के बजाय उलटा बन्द करने का हुक्म जारी कर दिया।

इतने पुराने दूरदर्शन केंद्र को अपग्रेड करने के लिए कोई राशि जारी न करके इसे बन्द करने के फ़ैसले सराहनीय नहीं कहा जा सकता। इस केंद्र की स्थापना हरियाणा के कृषि में योगदान को देखते की गयी थी। यहीं हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय भी है और इसके विशेषज्ञ किसान कार्यक्रम में प्रदेश के किसानों को मौसम के अनुरूप फ़सलों की आवश्यक जानकारी देते थे। इस केंद्र पर यह भी बताया जाता था कि पशुओं का कैसे पालन-पोषण करें। दुर्भाग्यवश इस किसान वाणी कार्यक्रम को चार साल पहले ही बन्द कर दिया गया और किसी ने इसका विरोध भी नहीं किया। इसी तरह दूरदर्शन के इस मंच पर हरियाणवी संस्कृति के के कार्यक्रम होते थे, जिससे अनेक हरियाणवी कलाकारों को अवसर मिलता रहा है, जो अब छीना जा रहा है। अभी तक ये कलाकार भी दूरदर्शन केंद्र के बाहर चल रहे धरने में अपना योगदान देने नहीं पहुँचे, जो अपने आप में एक हैरान कर देने वाली बात है। यह बहुत बड़ा सवाल है कि इस केंद्र को यदि हरियाणवी किसान और कलाकार ही बचाने आगे नहीं आएँगे, तो कौन आएगा?

कभी नववर्ष के उपलक्ष्य में इस केंद्र में बहुत ख़ूबसूरत सांस्कृतिक संध्या आयोजित की जाती थी। कुरुक्षेत्र जैसे पावन नगर की दस्तावेज़ी फ़िल्म बनायी गयी थी। इसी प्रकार संविधान निर्मात्री समिति के सदस्य चौधरी रणबीर हुड्डा और प्रसिद्ध रचनाकार विष्णु प्रभाकर पर भी दस्तावेज़ी फ़िल्मों का निर्माण किया गया। ये कार्यक्रम अब चंडीगढ़ में कहाँ बनाये जाएँगे? समाचार बुलेटिन में हरियाणा की ख़बरों को प्राथमिकता दी जाती थी। अब ये समाचार कहाँ मिलेंगे? अनेक फीचर कार्यक्रम बने, अब कहाँ बनेंगे? जहाँ तक इसे शिफ्ट करने की बात है, तो यहाँ बहुत सारे संसाधन कबाड़ की तरह कूड़ा बनकर रह जाएगा। इतनी बड़ी आवासीय कॉलोनी किसके काम आएगी? इसमें बने मकान खण्डहर हो जाएँगे। इसे स्थानांतरित करने की इतनी जल्दी क्यों?

हरियाणा के नेता प्रतिपक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और इनेलो विधायक अभय चौटाला इसे बचाने के लिए आगे आये हैं। लेकिन क्या हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला भी कोई कोशिश करेंगे? वह यहाँ से सांसद भी रह चुके हैं और यह केंद्र इनके परदादा चौधरी देवीलाल की स्मृति से जुड़ा है। तो क्या उन्हें इसकी कोई चिन्ता नहीं?

वैसे तो अनुराग ठाकुर से कोई पूछे कि यदि धर्मशाला में आपकी कोशिश से बने क्रिकेट स्टेडियम को ठप कर दिया जाए, तो कैसा महसूस होगा? हमें भी दूरदर्शन केंद्र ठप करने पर बहुत दु:ख है। अभी समय है। उन्हें इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करके इसके लिए अनुदान जारी करना चाहिए, न कि इसे स्थानांतरित करने के आदेश जारी करने चाहिए। अनुराग  ठाकुर युवा हैं और उन्हें युवा सोच से ही काम करना चाहिए।

(लेखक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष हैं।)