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आर्थिक तंगी में पाकिस्तान

क्या भारत इसका फ़ायदा उठाकर पीओके और अन्य इलाक़ों को ले सकेगा वापस?

आज़ादी के शुरुआती वर्षों में भारत से बेहतर आर्थिक स्थिति वाले पाकिस्तान में आजकल हाहाकार मचा है। चीज़ें महँगी हो रही हैं और देश के श्रीलंका जैसी स्थिति में पहुँच जाने का अंदेशा जताया जा रहा है। इन हालात की सच्चाई पाकिस्तान के केंद्रीय योजना और विकास मंत्री एहसान इक़बाल के एक बयान से ज़ाहिर हो जाती है, जिन्होंने देश की अपील की कि वह चाय की एक-एक प्याली, दो-दो प्यालियाँ कम कर दें; क्योंकि देश में चाय आयात करके और वह भी उधार आती है।

इक़बाल के बयान पर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पूर्व पत्नी रेहम ख़ान ने तंज़ कसते हुए ट्वीट में लिखा कि ‘पहले रोटी आधी, अब चाय भी कम कर दें?’ आर्थिक तंगी के इस दौर के बीच पाकिस्तान के नये सेना प्रमुख आसिम मुनीर अहमद जहाँ भारत के ख़िलाफ़ जम्मू-कश्मीर को लेकर ख़ुद और सत्तारूढ़ नेताओं की तरफ़ से ज़हर उगलवा रहे हैं, वहीं अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर मुक्तदर ख़ान का कहना है कि पाकिस्तान के इस बुरे दौर का फ़ायदा उठाकर भारत चाहे तो जंग करके पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) और अन्य इलाक़ों को भारत में मिला सकता है।

पाकिस्तान की यह बुरी हालत राजनीतिक अस्थिरता और बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण हुई है। महँगाई का आलम यह है कि कुछ जगह खाने की चीज़ों को लेकर छीनाझपटी और चोरी हो रही है। पाकिस्तान से आने वाले सोशल मीडिया के संदेशों और वीडियो से भी साफ़ हो जाता है कि वहाँ आर्थिक स्थिति से बदहाली हो रही है।

लोग रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए मशक्त करते दिखते हैं। खाद्य वस्तुओं की कमी से उनकी क़ीमतें भी आसमान छू चुकी हैं और लोग उन्हें हासिल करने के लिए लम्बी कतारों में खड़े होने को मजबूर हैं। पाकिस्तान में ख़राब आर्थिक हालत को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी शाहबाज़ शरीफ़ सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी आक्रामक रुख़ अपनाये हुए हैं। ख़ैर, वह तो विपक्ष के नेता हैं। ख़ुद प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ का बयान ज़ाहिर कर देता है कि पाकिस्तान की क्या हालत है? शरीफ़ का कहना है कि एक परमाणु ताक़त सम्पन्न देश के लिए यह काफ़ी शर्म की बात है कि उसे आर्थिक मदद के लिए भीख माँगनी पड़ रही है। शरीफ़ का यह भी कहना है कि आर्थिक संकट से जूझते देश के लिए क़र्ज़ कोई स्थायी समाधान नहीं है। इमरान ख़ान की पार्टी के लोग सोशल मीडिया पर पाक प्रधानमंत्री के इस बयान को ख़ूब शेयर कर रहे हैं। यह अलग बात है कि ख़ुद इमरान ख़ान के समय में पाकिस्तान कोई सोने की चिडिय़ा नहीं था।

ख़राब आर्थिक स्थिति से बाहर आने के लिए पाकिस्तान इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मदद का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। ख़ुद प्रधानमंत्री शरीफ़ की ही बात मानें, तो पाकिस्तान इस समय सबसे बड़े आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। महँगाई 25 फ़ीसदी के आसपास है, तो राजकोषीय घाटा 115 फ़ीसदी से ज़्यादा हो गया है। देश को इस समय सऊदी अरब और यूएई से ही 350 अरब रुपये की मदद मिल रही है।

माली हालत ख़राब होने की बात स्वीकारते हुए शाहबाज़ शरीफ़ यह कहना भी नहीं भूले कि देश को तीन युद्धों से कुछ हासिल नहीं हुआ सिर्फ़ बर्बादी ही हाथ लगी। उनका यह बयान इस लिहाज़ से काफ़ी महत्त्वपूर्ण है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिफ़ मुनीर जम्मू-कश्मीर को लेकर तनाव बनाये रखना चाहते हैं, साथ ही वहाँ आतंकवाद को भी तेज़ करना चाहते हैं; जबकि शाहबाज़ कह रहे हैं कि भारतीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करता हूँ कि हमें बातचीत की मेज पर बैठकर हर मुद्दे को हल करने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन ग़रीबी और उधार की बात करते हुए अपने देश के नाम के साथ परमाणु सम्पन्न देश भी कहना नहीं भूलते।

पाकिस्तानी के अधिकतर अर्थशास्त्री मानते हैं कि पाकिस्तान के वर्तमान हालात ये हैं कि उसे क़र्ज़ के लिए आईएमएफ की हर बात माननी पड़ेगी। और कोई चारा नहीं है। पाकिस्तान पर दुनिया का 16-17 अरब डॉलर का क़र्ज़ है। पाकिस्तान के आर्थिक जानकार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि देश की प्राथमिकता अपने आयात के 70 अरब डॉलर के ख़र्च को 65 अरब डॉलर तक नीचे लाने की होनी चाहिए, क्योंकि देश 70 अरब डॉलर का आयात ख़र्च बर्दाश्त नहीं कर सकता। हालाँकि कुछ विशेषज्ञ इससे उलट राय रखते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में मिडिल क्लास बहुत कंफर्टेबल है। उनके मुताबिक, भले पाकिस्तान की कमायी का 80 फ़ीसदी पैसा क़र्ज़ चुकाने में खप जाता है, बावजूद इसके पाकिस्तान डिफॉल्ट नहीं करेगा।

क्या भारत युद्ध करेगा?

सेना के एक बड़े अधिकारी ने हाल में पीओके को लेकर कहा था कि सेना आतंकवाद को कुचलने के लिए सीमा पार कोई भी कार्रवाई करने को तैयार है। भले उन्होंने आतंकवाद के बहाने यह बात कही थी; लेकिन मक़सद सत्तारूढ़ राजनीतिक हलक़ों की इस चर्चा को हवा देना ही था कि पीओके को वापस लिया जाएगा। तत्काल ऐसा होगा, इसकी अभी सम्भावना नहीं दिख रही। कारण चीन भी है। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि चीन भारत के पाकिस्तान पर हमला करने की सूरत में ख़ुद भी मैदान में कूद सकता है। कारण ख़ुद उसकी नज़र पीओके सहित पाकिस्तान के इन इलाक़ों पर होना है।

पाकिस्तान को पहले ही चीन आर्थिक दबाव में ला चुका संसाधनों का मनमर्ज़ी से लिहाज़ा युद्ध की स्थिति में वह पाकिस्तान की मदद करेगा। भारत के साथ सीमा पर चीन पहले ही उकसावे वाली कार्रवाइयाँ कर रहा है। लिहाज़ा भारत बहुत सोच-समझकर ही पीओके को लेकर कोई क़दम उठाएगा। यह सही है कि पाकिस्तान की बेहद कमज़ोर हालत उसे युद्ध की स्थिति में एक कमज़ोर स्थिति में खड़ा करती है; लेकिन उसके एक परमाणु सम्पन्न देश होने के कारण भारत मिनिमम रिस्क फैक्टर के आधार पर ही कोई क़दम उठाएगा, क्योंकि भारत भी आर्थिक मोर्चे पर फ़िलहाल कठिन चुनौतियों का सामना कर रहा है।

अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज प्रोग्राम के निदेशक प्रोफेसर मुक्तदर ख़ान तो पाकिस्तान के विभाजन और भारत के लिए आक्रमण का सबसे सही समय की बात कह ही रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद तत्काल लगता नहीं कि भारत कोई बड़ा क़दम उठा सकता है। हाँ, चूँकि पीओके को भारत में वापस मिलाने की बात गृह मंत्री अमित शाह संसद में कह चुके हैं कि यह कोरी भभकी नहीं हो सकती। इसका मतलब यह है कि एक तरह से भाजपा इसे भी अपना राजनीतिक एजेंडा बना चुकी है।

पाक स्कॉलर का दावा

पाकिस्तान वर्तमान में बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा है। वह वास्तव में छ: तरह के संकट से रू-ब-रू है और ऐसी स्थिति में देश विभाजित हो सकता है। यह कहना है अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज प्रोग्राम के निदेशक प्रोफेसर मुक्तदर ख़ान का। उनके बयान में चौंकाने वाली जो बात है, वह यह है कि पाकिस्तान की इस ख़राब स्थिति में भारत चाहे, तो युद्ध कर पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) और अन्य इलाक़ों को अपने में मिला सकता है। ख़ान का दावा है कि फ़िलहाल पाकिस्तान बेहद ख़राब दौर से दो-चार है और वह जिन संकटों का सामना कर रहा है, वह देश के टुकड़े भी कर सकते हैं। मुक्तदर इस यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज प्रोग्राम के संस्थापक निदेशक हैं।

पाकिस्तान के सामने खड़े जिन संकटों की बात वह कर रहे हैं उनमें आर्थिक और राजनीतिक के अलावा सुरक्षा संकट भी शामिल है। उनके मुताबिक, पाकिस्तान इनके अलावा व्यवस्था, पहचान और पर्यावरण का भी गम्भीर संकट झेल रहा है। बतौर मुक्तदर, इन संकटों से पाकिस्तान के विभाजन का ख़तरा भी पैदा हो सकता है। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान को तो भारत का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने पड़ोसी देश के इतने गम्भीर हालत का कोई फ़ायदा नहीं उठाया है। उन्होंने यह बात सम्भवत: पाकिस्तान के एक मंत्री के भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान के जवाब में ‘जैसे को तैसा’ वाले बयान के सन्दर्भ में कही।

शहबाज़ शरीफ, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री

“यह बड़े अफ़सोस की बात है कि आज़ादी के 75 साल में कई सरकारें आयीं; लेकिन देश की स्थिति नहीं बदली। राजनीति नेतृत्व या सैन्य तानाशाही आर्थिक चुनौतियों से पार नहीं पा सकी। विदेशी क़र्ज़ कोई स्थिर समाधान नहीं है, क्योंकि इसे वापस भी करना पड़ता है।’’

गुजरात के विकास में चुनौतियाँ

गुजरात में इस बार रिकॉर्ड जीत हासिल कर लगातार 27 साल से सत्ता में आयी भाजपा के आगे अब अपने वादों को पूरा करने की चुनौती है। दूसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने भूपेंद्र भाई पटेल को इन सभी चुनौतियों का सामना करना होगा। गुजरात विधानसभा चुनावों में प्रचंड जीत के बाद दोबारा राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी यह ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भूपेन्द्र भाई पटेल की सरकार इन चुनौतियों से कैसे निपटेगी, इसके लिए उनके इस सरकार के पहले बजट को देखना होगा, जिसकी तैयारी गुजरात विधानसभा में शुरू हो गयी है। गुजरात सरकार का यह पहला बजट विधानसभा का बजट सत्र में पेश होगा, जिसके शुरू होने की उम्मीद 15 फरवरी के बाद की है। कहा जा रहा है कि गुजरात का बजट भूपेंद्र सरकार 20 फरवरी को पेश कर सकती है। वित्त मंत्री कनु देसाई ने राज्य का बजट पेश करने की तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि गुजरात पर क़रीब 3,00,000करोड़ से ज़्यादा का क़र्ज़ भी है, जो गुजरात के विकास में एक बड़ी चुनौती है।

कहा जा रहा है कि इस बार गुजरात विधानसभा का बजट सत्र थोड़ा लम्बा, क़रीब मार्च तक चलने वाला है। राज्य के वित्त विभाग ने दूसरे विभागों के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं, जिसके तहत रोज़गार और आर्थिक मंदी जैसे मुद्दों पर सरकार कुछ घोषणाएँ कर सकती है। लोगों को उम्मीद है कि उनके द्वारा एक बार फिर भाजपा को इतना बड़ा मौक़ा देने के बाद चुनी गयी गुजरात सरकार उनके हित में काम ज़रूर करेगी। हालाँकि पुराने अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि गुजरात में विकास को लगा ब्रेक अब लगा नहीं रह सकेगा और सरकार चहुँ तरफ़ा विकास करने के लिए काम करेगी। इसकी एक वजह इस बार चुनावों में सरकार के ख़िलाफ़ मुखर आवाज़ों का होना है। प्रदेश में एक तीसरी पार्टी आम आदमी पार्टी ने जिस तरह विधानसभा में एंट्री की है, उससे सरकार को इसे गम्भीरता से लेते हुए काम तो करना ही होगा।

हालाँकि कहा जा रहा है कि सरकार के पहले बजट से लोगों की बड़ी राहत की उम्मीद कम ही है। लेकिन महँगाई के मोर्चें पर राहत की उम्मीद लोग कर रहे हैं। राज्य में हाल ही में सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जिससे महँगाई से तिलमिलाई जनता और भी परेशान है। हालाँकि दूसरी तरफ़ वित्त विभाग से जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे माना जा रहा है कि बजट के गुलाबी होने की उम्मीद काफ़ी कम है। लेकिन इसके लिए कुछ अलग से बड़ा बजट पेश होगा, इसकी उम्मीद नहीं है, क्योंकि सरकार इसके लिए आर्थिक बोझ वाली योजनाओं को बन्द कर सकती है। हालाँकि भूपेंद्र सरकार अब चाहे जैसा बजट पेश करे, विरोध कम ही होगा, क्योंकि इस बार उसने कुल 182 में से 156 सीटें जीती हैं, जिससे विधानसभा में विपक्षी दल काफ़ी कमज़ोर पड़े हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि गुजरात सरकार हर साल की तरह इस बजट में भी लोकलुभावन वादे ही करेगी, क्योंकि उसे भी पता है कि विकास के लिए योजनाएँ बनाने और उन्हें पूरा करने में बहुत फ़र्क़ होता है, तो आश्वासन से काम चलता रहा है, चलता रहेगा। लेकिन वहीं कुछ लोग मान रहे हैं कि इस बार लोकलुभावन बजट की सम्भावना कम ही है। इस बार भूपेंद्र सरकार रोज़गार के मुद्दे पर अच्छे निर्णय ले सकती है। हालाँकि यह भी कहा जा रहा है कि सरकार आउटसोर्सिंग के कर्मचारियों की संख्या घटाकर नियमित भर्तियाँ बढ़ा सकती है। चतुर्थ श्रेणी वर्ग के लिए आउटसोर्सिंग चालू रहने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर भाजपा की गुजरात सरकार के आगे अब अपने चुनावी वादों को पूरा करने की एक चुनौती है, जिसे अब बिना भेदभाव के करना होगा। इससे पहले गुजरात सरकार के सामने अभी अपने कुछ विधायकों को सन्तुष्ट करने की चुनौती बनी हुई है, जिसका वे इंतज़ार कर रहे हैं। किसी भी सरकार में सभी जातियों के विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह देना पहली चुनौती होती है। इस बार चुनाव में भाजपा को जिताने में पिछड़ों, $खासकर पाटीदार और पटेल समुदायों ने बड़ा रोल निभाया, जिसे सरकार को नहीं भूलना चाहिए। लेकिन ऐसी शिकायतें बाहर आ रही हैं कि कुछ लोगों को मनमाफिक मंत्रिमंडल नहीं मिला है, तो कुछ अभी इसका इंतज़ार कर रहे हैं कि उन्हें भी कोई ज़िम्मेदारी मिले।

भूपेंद्र पटेल को बतौर मुख्यमंत्री चुनावी वादों को पूरा करने के साथ-साथ अपने विधायकों को साधने की भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। इससे भी बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें भाजपा के बड़े नेताओं के दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा, तो फिर वह अपनी मर्ज़ी हर काम में नहीं चला सकेंगे। अभी तक यही माना जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में जाने के बावजूद गुजरात का रिमोट कंट्रोल अपने ही हाथ में रखते हैं, जो शायद उन्होंने अमित शाह को दे रखा है। गुजरात के विकास के लिए हज़ारों करोड़ रुपये सालाना ख़र्च करने की ज़रूरत गुजरात सरकार को पड़ेगी; लेकिन पैसे का इंतज़ाम तब ही हो सकेगा, जब आमदनी होगी।

गुजरात में इन दिनों सबसे बड़ी चुनौती है मंदी से उभरना और उद्योगों को दोबारा उसी गति से चालू रख पाना, जो गति कोरोना से पहले थी। कोरोना के अलावा जीएसटी ने जिस तरह गुजरात के उद्योग धंधे पर हथौड़ा चलाया है, उससे राज्य की आमदनी घटी है, रोज़गार घटे हैं और व्यापार में कमी आई है। कपड़ा उद्योग इससे बहुत प्रभावित हुआ है। क़र्ज़ के बोझ में गले तक डूबा गुजरात भाजपा के ही शासन में लगातार मूव कर रहा है। इसलिए सरकार यह भी नहीं कह सकती कि इसमें उसकी कोई $गलती नहीं है।

इस समय गुजरात सरकार को जो काम करने हैं, उनमें प्रमुख काम हैं गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड कमेटी की सिफारिशों को लागू करना, गुजरात को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना, पश्चिमी भारत के सबसे बड़े आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए देवभूमि द्वारका कॉरिडोर का निर्माण करना, एग्री-मार्केटिंग इन्फ्रा के लिए 10,000 करोड़ रुपये का इंतज़ाम करना, गुजरात ओलंपिक मिशन और गुजरात में 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के उद्देश्य से विश्व स्तरीय खेल बुनियादी ढाँचा तैयार करना, केजी से पीजी तक राज्य में सभी लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा देना, राज्य में 20 लाख नए रोज़गारों का सृजन करना, महिलाओं के लिए एक लाख सरकारी नौकरियाँ देना, मोरबी पुल जैसी घटनाओं को रोकना, ग्रामीण विकास की ओर ध्यान देना, स्कूलों और अस्पतालों की दशा में सुधार करना आदि-आदि।

सवाल यह है कि क्या साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के क़र्ज़ में डूबी सरकार के लिए क्या यह सब इतना आसान है? भाजपा ने गुजरात चुनाव के दौरान राज्य में 20 लाख नए रोज़गार देने का वायदा लोगों से किया था। गुजरात सरकार के आर्थिक सर्वे के मुताबिक, अक्टूबर 2021 तक 3.72 लाख बेरोज़गारों ने रोज़गार दफ्तर में पंजीकरण कराया था, जिनमें से 3.53 लाख लोग ग्रेजुएट थे। पिछले साल भी अक्टूबर तक 2.60 लाख लोगों ने रोज़गार दफ्तर में अपना नाम रजिस्टर्ड करवाया था। इसके अलावा एक लाख महिलाओं को सरकारी नौकरी देने का वादा भी सरकार को पूरा करना होगा। भूपेंद्र सरकार के सामने एक महिलाओं को सरकारी नौकरी देना एक बड़ी चुनौती है। एक लाख महिलाओं को नौकरी देने के लिए भूपेंद्र सरकार को हर साल एवरेज 20 हज़ार नौकरियाँ महिलाओं को देनी होंगी। इसके अलावा भूपेंद्र सरकार को उच्च शिक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा। साल 2017 में गुजरात में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 24 थी, जबकि साल 2021 में 31 मेडिकल कॉलेज राज्य में हो गये थे। लेकिन स्वास्थ्य बजट को सरकार को बढ़ाना होगा। साल 2022-23 में गुजरात का स्वास्थ्य बजट 12.2 हज़ार करोड़ रुपये था, जो कि काफ़ी कम है।

इसके अलावा गुजरात सरकार को बाहर से आकर बसे लोगों के लिए भी रोज़गार, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में राहत देनी होगी। गुजरात में दूसरे राज्यों से आकर बसे लोगों को अभी भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसके चलते वे कमज़ोर आर्थिक हालात से गुज़रते हैं। बाहरी लोगों को राज्य सरकार की कोई सुविधा भी नहीं मिलती, जिससे उनके खर्चे ज़्यादा होते हैं और आमदनी कम ही रहती है।

गुजरात में प्राइवेट नौकरी करने वाली की औसत सैलरी 6-7 हज़ार रुपये महीना होती है, जो इस महँगाई में एक घर चलाने के लिहाज़ से बहुत कम है। अगर गुजरात सरकार इस तरह की चुनौतियों से निपट सकती है, तो गुजरात का दोबारा बेहतर विकास हो सकता है। वहाँ रहने वालों की अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। जनता ने जिस तरह एक बड़ा मौक़ा गुजरात में भाजपा को दिया है, उसे ध्यान में रखते हुए भूपेंद्र सरकार को जनता के हित में काम करने ही चाहिए।

उत्तर प्रदेश में आएँगे बाहरी निवेशक!

मुख्यमंत्री योगी ने पंजाब के बाद गुजरात के निवेशकों को उत्तर प्रदेश में किया आमंत्रित

यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-23 में शामिल होंगे देश-विदेश के बड़े उद्योगपति

फिल्म उद्योग को उत्तर प्रदेश में लाने के प्रयास के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दूसरे प्रदेशों के उद्योगपतियों को इस बड़े प्रदेश में व्यवसाय स्थापित करने के लिए निमंत्रण दे रहे हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंजाब के उद्योगपतियों को आमंत्रित करने के बाद अब गुजरात के उद्योगपतियों को निमंत्रण दिया है। इसके लिए उत्तर प्रदेश में अगले माह इन्वेस्टर समिट होना है। इसकी तैयारी गुजरात के अहमदाबाद स्थित एक होटल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने एक दल के साथ गुजरात के निवेशकों से मिले।

इन निवेशकों के साथ योगी आदित्यनाथ ने एक-एक करके बैठक की और एक रोड शो भी किया। इसके बाद उन्होंने गुजरात के 22 निवेशकों ने 40,790 करोड़ रुपये के समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किये।

इन समझौता ज्ञापनों में कहा गया है कि गुजरात के ये निवेशक उत्तर प्रदेश में कई नये उद्योग खोलकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 50,000 से अधिक बेरोज़गारों को रोज़गार के अवसर सृजित करेंगे। सरकारी सूत्रों का कहना है कि इन निवेशकों के अतिरिक्त कई अन्य निवेशक भी उत्तर प्रदेश में हज़ारों करोड़ का निवेश करना चाहते हैं। ये निवेशक आगामी 10 से 12 फरवरी तक प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होने वाले यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-23 में सम्मिलित होकर अपनी निवेश प्रक्रिया को अन्तिम रूप देंगे।

गुजरात के निवेशकों में से लगभग 14,00 करोड़ रुपये का निवेश आगरा में होगा। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी बड़ा निवेश होगा। अमूल इंडिया ने उत्तर प्रदेश के बा$गपत में नया मिल्क प्लांट लगाने के लिए 900 करोड़ रुपये के एमओयू समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।

इस निवेश नीति के तहत मिल्क प्रोसेसिंग यूनिट्स, नवीनीकृत ऊर्जा, सोलर सिटी, डेयरी फार्म, होटल इंडस्ट्री, पर्यटन, फूड एंड बेवरेज इंडस्ट्री, रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब, ट्रेनिंग ऑफ हेरडसमैन, फार्मा पार्क, ग्रीन हाइड्रोजन, मेडिकल डिवाइस पार्क, ड्रग्स, हेल्थकेयर प्रोडक्ट, केमिकल सेक्टर, स्पोट्र्स इंडस्ट्री, वेस्ट मैनेजमेंट सॉल्यूशन, मल्टीस्पेशल्टी हॉस्पिटल, हाइड्रो पॉवर प्लांट, पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री, डाटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स एंड वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों के लिए गुजरात की कम्पनियाँ निवेश करना चाहती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के निवेशकों में इतनी सामथ्र्य नहीं कि वह उत्तर प्रदेश में उद्योगों को बढ़ा सकें? क्या वजह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कभी पंजाब के निवेशकों से, तो कभी गुजरात के निवेशकों से उत्तर प्रदेश में उद्योग स्थापित करने के लिए कहना पड़ रहा है? इसे जानने के लिए सबसे पहले उत्तर प्रदेश के उद्योगपतियों की पीड़ा को समझना पड़ेगा।

जीएसटी की मार

उत्तर प्रदेश के व्यापारियों, उद्योगपतियों की इस समय जीएसटी को लेकर योगी सरकार से तकरार चल रही है। जीएसटी के नाम पर 28 प्रतिशत तक की कर वसूली से परेशान व्यापारी वर्ग उसी व्यवसाय को नहीं चला पा रहा है, जो चल रहा है। जीएसटी को लेकर अभी प्रदेश की योगी सरकार तथा व्यापारियों के बीच तनाव बना हुआ है। इसके अतिरिक्त बिजली महँगी हो गयी है, जिसे अब और महँगा करने की चर्चा है। ढुलाई, मज़दूरी पर व्यय बढ़ गया है।

एक व्यापारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि व्यापारियों को जब भी कोई चाहे धमका देता है, उनके प्रतिष्ठानों को दबंग लोग, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और नेता बन्द करा देते हैं। अवैध रूप से भी व्यापारियों से वसूली होती है। जब भी किसी नेता का कोई कार्यक्रम होता है, तो उसमें सहयोग के लिए व्यापारियों पर दबाव बनाया जाता है।

बन्द होते जा रहे उद्योग

उत्तर प्रदेश में व्यापारियों की कोई कमी नहीं है, मगर योगी सरकार के राम राज्य में व्यापारियों पर हर ओर से मार पड़ती है। जिस व्यापारी का व्यापार थोड़ा भी ठीक चलता है, उस पर अराजक तत्त्वों से लेकर पुलिस प्रशासन और नेताओं तक की नज़र लगी रहती है। उसमें हिस्सेदारी का दावा, कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों के चलते कई उद्योग उत्तर प्रदेश में बन्द हो चुके हैं। कई उद्योगों पर मंदी तथा बंदी का संकट मँडरा रहा है। इन उदयोंगों में लकड़ी उद्योग, पंतंग उद्योग, खिलौना उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि संकट में हैं।

बनारस के हथकरघा उद्योग, खिलौना उद्योग पर संकट के बादल लगातार छाये हुए हैं। वहीं छिटपुट कम्पनियों के बन्द होने की स्थितियाँ बनी हुई हैं। उत्तर प्रदेश के अनेक व्यापारी उनकी समस्याओं का समाधान न होने के चलते बाहर निवेश कर रहे हैं। बड़े व्यापारी तो बड़े व्यापारी, छोटे-छोटे दुकानदारों को भी दुकान चलाने में कई तरह की दिक़्क़तें आ रही हैं।

देवेंद्र नाम के एक दुकानदार ने कहा कि हर वस्तु इतनी महँगी हो गयी है कि उसकी बिक्री घट गयी है। ग्राहकों को लगता है कि हम उन्हें ठग रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि प्रदेश में महँगाई चरम पर है। हर वस्तु का मूल्य बहुत हो चुका है, जिससे उसे बेचने पर लाभ कम होता है। फिर भी ग्राहकों को हम ही ठग नज़र आते हैं। देवेंद्र ने बताया कि कुछ वस्तुओं में तो घाटा होने का डर लगा रहता है, क्योंकि उनमें लाभ से कम हानि का जोखिम रहता है।

काम कम, शोर अधिक

उत्तर प्रदेश में पहले भी एक शोर मचाया गया था कि विदेशी निवेशक इस प्रदेश में हज़ारों करोड़ रुपये का निवेश करना चाहते हैं। लेकिन अभी तक उत्तर प्रदेश में कोई विदेशी निवेशक नहीं आया। एक-सवा महीने पहले ही शोर मचाया गया था कि उत्तर प्रदेश में 16 देश 7.12 लाख करोड़ का निवेश करेंगे।

इसके लिए टीम-यूपी, जिसमें कई मंत्री और नेता शामिल रहे ने 16 देशों का दौरा भी किया तथा दावा किया कि उत्तर प्रदेश में विदेशों से 4,00,000 करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव मिले हैं। हालाँकि अभी यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-23 में सब कुछ शीशे की तरह साफ़-साफ़ दिख जाएगा। इसलिए अभी से नकारात्मक बात करने का कोई अर्थ नहीं है।

सकारात्मक पहलू

उत्तर प्रदेश में उद्योग और व्यापार के लिए सकारात्मकता की कमी नहीं है। अगर व्यापार के हिसाब से देखें, तो इस राज्य की एक सीमा नेपाल से जुड़ती है, जो विदेश व्यापार की दृष्टि से अति उत्तम है। अपने सीमावर्ती प्रदेशों से भी उत्तर प्रदेश व्यापारिक रिश्ते बनाकर उद्योग के लिए अनुकूल स्थान है। आबादी के हिसाब से यहाँ कर्मचाचारियों की भी कमी नहीं है। श्रमशीलता के निचले पायदान पर खड़े लोगों से लेकर यहाँ एक से बढक़र एक उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की कमी नहीं है। निवेशकों को श्रमिकों के मिलने की चिन्ता नहीं करनी होगी। इसके अतिरिक्त उपयुक्त जलवायु भी उत्तर प्रदेश में है। सडक़ मार्ग, रेल मार्ग और वायु मार्ग सभी कुछ उत्तर प्रदेश में सुलभ और सुगम है। कच्चे माल की प्राप्ति भी अधिकतर उत्तर प्रदेश में ही सम्भव है, जिससे उद्योपतियों का व्यय कम होगा।

उत्तर प्रदेश में उद्योगों की स्थापना का एक लाभ यह होगा कि यहाँ के लोगों को दूसरे शहरों में रोज़गार के लिए नहीं जाना पड़ेगा। कहा जा रहा है कि यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-23 में देश-विदेश की दर्ज़नों कम्पनियाँ हिस्सा लेने वाली हैं, जो उत्तर प्रदेश में लाखों करोड़ का निवेश करने की इच्छुक हैं। प्रश्न यह है कि अगर बाहरी कम्पनियाँ उत्तर प्रदेश में निवेश करना चाहती हैं, तो उसके लिए सरकार के पास क्या योजनाएँ हैं? किन-किन शहरों में निवेश के लिए उन्हें भूमि, इमारतें आदि उपलब्ध कराने की योजना सरकार के पास है? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-23 में उत्तर प्रदेश के व्यापारियों को भी वरीयता मिलेगी? कहावत है- घर का जोगी जोगिया, बाहर का है सिद्ध।

इसका अर्थ यही है कि उत्तर प्रदेश के व्यापारियों को घर की मुर्गी दाल बराबर समझ लेने तथा बाहर के निवेशकों को बहुत वरीयता देने से प्रदेश के निवेशकों का मनोबल टूटेगा ही टूटेगा। इसलिए योगी आदित्यनाथ सरकार को बाहरी निवेशकों के स्वागत के बीच प्रदेश के निवेशकों को भी वरीयता देनी चाहिए। इससे लाभ यह होगा कि बाहरी निवेशक तो प्रदेश में निवेश करेंगे ही, प्रदेश के निवेशकों का मनोबल भी नहीं टूटेगा। इससे भी आवश्यक है कि प्रदेश में जितने उद्योग बन्द हो चुके हैं अथवा बन्द होने की स्थिति में हैं, उन्हें फिर से जीवित करने का काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को करना चाहिए। इससे प्रदेश में रोज़गार भी सृजित होंगे, प्रदेश के मायूस व्यापारी भी प्रसन्न होकर व्यापारिक क्षेत्रों में निवेश बढ़ाएँगे।

मुसीबतों से लडऩे की बारी

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

देश गणतंत्र दिवस मना चुका है और अमृत महोत्सव भी मना रहा है। लेकिन साल की शुरुआत जोशीमठ के धँसने जैसी दु:खद घटना से हुई। यह भारत के हिमायली और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक चिन्ताजनक घटना है। हालाँकि इससे निपटने की क्षमता किसी में नहीं है; लेकिन दूसरी ओर चीन द्वारा अवैध अतिक्रमण जारी है। इसके साथ ही अभी कोरोना महामारी का प्रकोप गया नहीं है। बढ़ती आबादी देश के लिए अगल मुसीबत बनी हुई है। जनगणना न कराने के पीछे भी कई राज़ छिपे हुए हैं।

जनवरी की शुरुआत में ही भारत की ओर चीन ने कुछ क़दम और बढ़ाकर यह संकेत दिया है कि वह छोटी-मोटी हूलों से मानने वाला नहीं है। यह कोई सामान्य बात नहीं है कि चीन लगातार भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करता जा रहा है, जिसे सामान्य तौर पर लेना अब ठीक नहीं है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कई बार चीन के नापाक इरादों के बारे में स्पष्ट बयान दे चुके हैं। वह चीन के साथ भारत के द्विपक्षीय सम्बन्धों को असामान्य कहते रहे हैं और साफ़ कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के दौरान हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा में गम्भीर बदलाव हुए हैं। बेशक इसमें काफ़ी कुछ उस प्रचंड चुनौती पर केंद्रित है, जिसका हम चीन से लगने वाली अपनी उत्तरी सीमाओं पर सामना कर रहे हैं। जनवरी के मध्य में आये विदेश मंत्री के इस बयान को भी केंद्र सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि चीन ने भारत की उत्तरी सीमाओं पर सैन्य ताक़त के बूते और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का उल्लंघन कर यथास्थिति को बदलने की कोशिश की है।

ज्ञात रहे कि इसके पहले भी चीन कई बार भारत की सीमा में घुसपैठ कर चुका है। केंद्र सरकार को 5 मई 2020 की रात की वह घटना नहीं भूलनी चाहिए, जिसमें चीन के सैनिकों ने लद्दाख़ के पैंगॉन्ग लेक पर भारतीय जवानों पर हमला किया था। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश के एक युवक को चीनी सैनिकों द्वारा उठाया जाना भी छोटी बात नहीं है। सैटेलाइट ने चीन द्वारा भारत के क्षेत्र में गांव बसाने वाली ख़बरों और क़ब्ज़े वाली तस्वीरों को जब जारी किय जा चुका है। इसके बावजूद लंबे समय तक केंद्र सरकार की ओर से यह कहा जाना कि चीन से भारत को कोई ख़तरा नहीं है, काफ़ी हैरान करता है।

कोरोना महामारी के दौरान जिस प्रकार चीन ने इसका फ़ायदा उठाकर भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़े की नीति को बरकरार रखा है, उससे साफ़ है कि चीन किसी बड़े जबाव के बग़ैर मानने वाला नहीं। सीमा पर सैन्य शक्ति, टैंक, और बंकर बनाने के बाद चीन एलएसी बॉर्डर के पास 60,000 मेगावॉट की क्षमता वाले डैम का निर्माण भारत पर हमले की नीयत और तैयारी के उद्देश्य से कर रहा है। तबाही मचाने की क्षमता रखने वाले इस डैम को चीन मैडोग एलएसी बॉर्डर पर बना रहा है, जिसका काम काफ़ी तेज़ी से चल रहा है। ख़बरों के मुताबिक, यह डैम अरुणाचल प्रदेश के नज़दीक है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार इससे अनजान है।

इस पानी से किये जाने वाले युद्ध की आशंका के चलते ही केंद्र सरकार भी पूरी तैयारी कर रही है, ताकि अगर चीन डैम का पानी भारत में छोड़ता है, तो उससे निपटने की तैयारी भारत ने कर ली है। क्योंकि इसके जवाब में केंद्र सरकार ने भी अरुणाचल प्रदेश में कई बेहतरीन डैम बनाने शुरू कर दिये हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से नेशनल हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट ने 2,000 मेगा वाट के सुबंसीरी लोअर हाइड्रो प्रोजेक्ट तैयार कर लिया गया है। साथ ही चीन को जवाब देने के लिए अरुणाचल प्रदेश में दूसरे आठ प्रोजेक्ट एनएचपीसी के चल रहे हैं, जो चीन को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए पर्याप्त हैं।

चीन अपना 60,000 मेगावाट क्षमता वाला ही डैम वहाँ की यारलुंग त्सांगपो नदी पर बना रहा है; लेकिन केंद्र सरकार कई ऐसे अन्य प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, जिससे चीन द्वारा एलएसी बॉर्डर पर बनाये जा रहे इस डैम का जवाब दिया जा सके। अरुणाचल प्रदेश के नज़दीक डैम बनाकर चीन सोच रहा है कि वह डैम के फाटक खोलकर अरुणाचल प्रदेश को बहाने की सोच पाले बैठा है।

हालाँकि इसमें कोई संशय नहीं कि अगर चीन अपने इस डैम से पानी छोड़ता है, तो अरुणाचल प्रदेश का कई किलोमीटर हिस्सा तो पानी में बहेगा ही बहेगा, इसके अलावा असम में भी भयंकर बाढ़ के हालात होंगे। इसलिए चीन की ओर से बनाया जा रहा यह डैम भारत के लिए चिन्ता का विषय है। यह कहा जा रहा है कि यह डैम बनाने के बाद चीन इसके पानी को ब्रह्मपुत्र नदी की ओर मोड़ सकता है। अगर चीन इस डैम के पानी को अचानक छोड़ देता है, तो भारतीय सेना को सँभलने का भी मौक़ा नहीं होगा।

हालाँकि केंद्र सरकार जिस तरह से इस डैम का जवाब देने की तैयारी कर रही है, उससे चीन को भी डर है कि कहीं भारत से पंगा लेना उसे भारी न पड़ जाए। इसकी एक वजह यह भी है कि चीन ने पाकिस्तान और श्रीलंका के माध्यम से भारत को घेरने की जो योजना बनायी है, उसका जवाब भी भारत के पास है, लेकिन भारत अगर चीन पर हमला करता है, तो चीन के पास अपने बचाव के लिए दूसरे देशों की ज़मीन के इस्तेमाल के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अफ़ग़ानिस्तान की ओर से भारत चीन के पाकिस्तान वाले बंदरगाहों और हवाई अड्डों को नष्ट कर सकता है, तो वहीं श्रीलंका वाले क्षेत्र की ओर से चीनी सेना से निपटने के लिए भारत की ख़ुद की अपनी मज़बूती काफ़ी है।

जहाँ तक डैम की बात है, तो पर्यावरणीय आधार से यह भारत के लिए चिन्ता का विषय है। लेकिन अभी भारत के पास इसका तोड़ निकालकर इससे निपटने के लिए इतना समय है कि वह इससे आसानी से निपट सकता है। क्योंकि 2000 मेगावाट की क्षमता वाला सुबंसीरी लोअर हाइड्रो प्रोजेक्ट इस साल में ही पूरा हो जाएगा। इसके अलावा आठ अन्य प्रोजेक्ट्स पर भी तेज़ी से काम चल रहा है।

इन प्रोजेक्ट्स का केंद्र सरकार का मक़सद पानी की क़िल्लत से निपटने के साथ-साथ चीन को मुँह तोड़ जबाव देना है। अगर चीन पानी को सामान्य रूप से भारत में आने से रोकता है तो भी पानी की क़िल्लत सीमा पर रहने वाले लोगों को न हो।  वास्तव में पानी की क़िल्लत उत्तर-पूर्वी भारत में ही नहीं, पूरे देश के कई हिस्सों में भी है। जानकारों का कहना है कि चीन मेडोग डैम का उपयोग एक हथियार के रूप में करने की योजना बना चुका है। यह बात भारत के अलावा बांग्लादेश के लिए भी चिन्ता का विषय है। हालाँकि भारत चीन की इस गीदड़ भभकी से डरने वाला नहीं है। लेकिन फिर भी मुश्किल घड़ी कब आ जाए, इस बारे में कहना मुश्किल होता है। चीन पर तो भरोसा करना ही बड़ी भूल होगी।

दूसरी ओर उत्तराखण्ड के जोशीमठ के अलावा कई जगहों पर दरारें आने और जोशीमठ के बैठ जाने की आशंका गहराती जा रही है। अग जोशीमठ बैठ जाता है, तो भारत के लिए यह अपूर्णीय क्षति होगी। इससे जोशीमठ तो बर्बाद हो ही जाएगा, चार धाम यात्रा में कई परेशानियाँ पैदा होंगी। माना यह जा रहा है कि अगर पहाड़ों पर मानसून ख़राब हुआ या फिर कहीं बाढ़ जैसे हालात बने या फिर कोई और पहाड़ खिसका तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है। हालाँकि इंसानों से ख़ाली जगहों पर ख़तरा कम रहता है; लेकिन पहाड़ों पर बिना इंसानी दबाव के भी एक तरह का दबाव बना रहता है, जो कि जोशीमठ में बहुत ज़्यादा है। जोशीमठ में तो पहले ही नीचे कई-कई दरारें पड़ी हुई हैं। जोशीमठ का धँसना चीन को रास आ सकता है, क्योंकि वह उससे ऊपर वाले इलाकों पर क़ब्ज़े की योजना में और सफल होगा। पहले भी वह उत्तराखण्ड में कई बार घुसपैठ करने की कोशिश कर चुका है।

जहाँ तक चीन की बात है, तो अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर बसे तवांग सेक्टर में 9 और 11 दिसंबर 2022 को चीनी सैनिकों द्वारा हिंसक हमले के बाद उन्हें भारतीय सैनिकों द्वारा खदेड़ दिए जाने के बाद देश में एक आक्रोश पनपा है, जिसे केंद्र सरकार भी ख़ूब समझ रही है। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने चीन से साफ़ कहा है कि यह 1962 का नहीं, 2022 का भारत है। यहाँ ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि भारतीय सैनिक ईंट का जवाब लोहे से देते हैं। केंद्र सरकार के इस जवाब से चीन समझ चुका होगा कि अब अगर वह भारत पर हमला करता है, तो उसे इसके परिणाम भुगतने ही होंगे।

झारखण्ड में घूम रहा आदमख़ार तेंदुआ

क्या जंगल में मानव की दख़लंदाज़ी से बढ़ रही परेशानी?

झारखण्ड में इन दिनों एक आदमख़ार तेंदुआ ने प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सभी को परेशान कर रखा है। पिछले डेढ़ महीने से झारखण्ड के गढ़वा ज़िले के लोग दहशत में जी रहे हैं। चार बच्चों और कई मवेशियों को आदमख़ार तेंदुआ अपना शिकार बना चुका है। वन विभाग की टीम तेंदुआ को पकडऩे या मारने की कोशिश में लगी है; लेकिन कामयाबी अभी तक नहीं मिली है।

कब मिलेगी यह भी कहना मुश्किल है। हाथियों का आतंक भी पूरे राज्य में पहले से बढ़ा हुआ है। इस बीच एक भालू ने गढ़वा में ही आंतक मचा रखा है। भालू ने शौच करने गयी एक महिला को घायल कर दिया। सवाल उठता है आख़िर मानव और वन्यजीव संघर्ष क्यों बढ़ गया है? ऐसा हम क्या कर रहे हैं कि देश के कई हिस्सों में इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं।

100 गाँवों के लोग दहशत में

पलामू प्रमंडल के गढ़वा ज़िले के प्रादेशिक वन क्षेत्र में बीते वर्ष 15 दिसंबर से एक आदमख़ार तेंदुआ का आतंक है। इस क्षेत्र के लगभग 100 गाँव के लोग दहशत में जी रहे हैं। आदमख़ार तेंदुआ ने अब तक गढ़वा ज़िले में तीन बच्चों की जान ली है। वहीं लातेहार ज़िले में एक को मारा है। अधिकारियों के मुताबिक, लातेहार ज़िले के अंतर्गत पलामू ब्याघ्र आरक्ष (पीटीआर) के छिपादोहर वन क्षेत्र में एक 12 वर्षीय लडक़ी तथा गढ़वा ज़िले के भंडरिया, रंका एवं रमकंडा प्रखंड क्षेत्र में एक-एक बच्चे की जान तेंदुआ ने ली है। तेंदुआ ने अंतिम बार 28 दिसंबर को रमकंडा प्रखंड क्षेत्र में हमला कर बच्चे को मार डाला था। इसके बाद से किसी व्यक्ति पर हमले की बात सामने नहीं आयी है।

हालाँकि बीच-बीच में पशुओं पर हमले और मारने की बात आ रही है। तेंदुआ के आतंक और हो रहे हमले के विरोध में ग्रामीणों ने सडक़ जाम किया। सरकार की तरफ़ से मृतक के परिजनों को मुआवज़ा दिया गया और फिर तेंदुआ को पकडऩे के लिए वन विभाग ने प्रयास शुरू किया।

तेंदुआ को मारने की अनुमति

आदमख़ार तेंदुआ को पकडऩे के लिए वन विभाग ने पूरा प्रयास किया। हैदराबाद के चर्चित जंगली जानवरों के शूटर नवाब शपथ अली ख़ान से सम्पर्क किया गया। ख़ान 5 जनववरी से गढ़वा में कैंप किये हुए हैं। तेंदुआ को पकडऩे का पूरा प्रयास किया गया।

शूटर ख़ान समेत वन विभाग के अधिकारी गढ़वा के भंडरिया वन क्षेत्र के अधीन रमकंडा प्रखंड के कुशवार गाँव से तेंदुआ की तलाश का अभियान शुरू किया था। इसके बाद आसपास के क्षेत्र में तलाशी अभियान जारी है। इसी समय सेट्रेंकुलाइजर बंदूक में हर दिन बुलेट डालकर बंदूक को अभियान के लिए तैयार किया जाता रहा। आधा दर्ज़न बार इस क्षेत्र में तेंदुआ के रेंज से बाहर होने के कारण उसे ट्रेंकुलाइज नहीं किया जा सका।

ऐसे में ट्रेंकुलाइजर बंदूक की बुलेट रोज़ बर्बाद होती चली गयी। बुलेट में मिलायी गयी दवा 24 घंटे बाद एक्सपायर हो जाती है। ऐसे में तेंदुआ को पकडऩे के लिए अभियान में हर दिन 2.5 हज़ार रुपये की दवा बर्बाद होती जा रही थी। फिर भी तेंदुआ पकड़ से बाहर रहा। अंतत: इसे मारने की अनुमति दी गयी।

चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन शशिकर सामंता ने 18 जनवरी को तेंदुआ को मारने का आदेश जारी किया। इसके लिए उन्होंने अधिकृत शूटर नवाब शपथ अली ख़ान की टीम को अधिकृत किया है। तेंदुआ को पकडऩे या मारने के लिए शूटर ख़ान की टीम के अलावा वन विभाग की 10 टीम के 60 से अधिक कर्मी दिन-रात जंगल की ख़ाक छान रहे हैं। अब तक दो दर्ज़न से अधिक गाँवों में 60 कैमरे लगाये जा चुके हैं। कई जगह पिंजरे लगाये गये हैं।

एक- दो जगह आदमख़ार तेंदुआ दिखा भी; लेकिन रेंज के बाहर होने के कारण ट्रेंकुलाइज नहीं किया जा सका। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि तेंदुआ को अभी भी पकडऩे का ही प्रयास होगा, अगर यह सम्भव नहीं होगा, तभी मारा जाएगा। इस बीच संजय टाइगर रिजर्व के एक्सपर्ट को भी बुलाया गया है। वह भी तेंदुआ को पकडऩे में लग गये हैं। वार्डन शशिकर सामंता ने अपने आदेश में आगामी 31 जनवरी तक ही आदमख़ार तेंदुआ को मारने की अनुमति दी है। अगर तब तक तेंदुआ को नहीं मारा जा सका, तो क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। जानकारों का कहना है कि समय सीमा पूरी होने के बाद फिर से मारने की अनुमति लेनी होगी। उधर तेंदुआ को प्राधिकृत एजेंसी ही मारेगी। यदि अन्य कोई मारेगा, तो उसके विरुद्ध आपराधिक प्राथमिकी दर्ज होगी। ऐसी स्थिति में आगे क्या निर्णय होता है, यह देखने वाला होगा।

भालू और हाथियों का भी कहर

राज्य में जंगली हाथियों का कहर आम बात है। हर दिन किसी न किसी इलाक़े से हाथियों द्वारा घर ध्वस्त किये जाने, किसानों का फ़सल नष्ट किये जाने या किसी को मारने की सूचना मिलती रहती है। अभी हाल में 23 जनवरी को धनबाद क्षेत्र में एक वृद्ध को हाथी ने पटक कर मार डाला। इसी तरह 23 जनवरी को ही गढ़वा ज़िले के भंडरिया थाना क्षेत्र के पर्रो गाँव निवासी आँगनबाड़ी सहायिका रामचंद्र सिंह की 50 वर्षीय पत्नी पनकुरी देवी भालू ने घायल कर दिया। वह घर से थोड़ी दूर पर शौच करने लिए गयी थी। इसी दौरान भालू ने हमला किया। वह गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती है।

राज्यों में टकराव

झारखण्ड समेत देश के कई राज्यों से मानव और वन्यजीव संघर्ष की सूचना मिलती रहती है। अभी कुछ महीने पहले नोएडा, गुरुग्राम, जयपुर और बेंगलूरु जैसे शहरों के रिहायशी इलाक़ों में तेंदुए जैसे जानवरों के देखे जाने की घटनाएँ सामने आयी थीं। बीते साल नवंबर में मैसूर में रिहायशी इलाक़े में तेंदुआ घुस आया था। जिसे बाद में पकड़ा गया। भोपाल में कई बार बाघ-तेंदुआ लोगों पर हमला कर चुके हैं। हाल में छत्तीसगढ़ में एक आदमख़ार तेंदुआ को पकडऩे में सफलता मिली है। इसी तरह देश के विभिन्न हिस्सों से वन्यजीव के हमले की जानकारी आती रहती है। आख़िर यह हो क्यों रहा है? क्यों जंगली जानवर इस क़दर हिंसक हो रहे?

संघर्ष कर रहे वन्यजीव

वन्य जीव से जुड़े जानकारों के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कम ही मतभेद है। सभी की बातों में कई तरह की समानताएँ हैं। वाशिंगटन विश्वविद्यालय और पारिस्थितिकी तंत्र केंद्र में जीव विज्ञान के सहायक प्रोफेसर ब्रियाना अब्राहम की अगुवाई में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर शोध किया गया है। इस शोध में जलवायु में हो रहे बदलावों के चलते लोगों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढऩे की जानकारियाँ सामने आयी हैं।

मानव-वन्यजीव संघर्ष तब होते हैं, जब लोग और वन्यजीव एक ही इलाक़े में चले जाते हैं या भोजन जैसे समान संसाधनों के लिए मुक़ाबला करते हैं। साथ ही जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक तंत्र को तनावपूर्ण बना रहा है। जिसके चलते वहाँ रहने वाले जीवों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है। जो मानव-वन्यजीव संघर्षों को अंजाम दे रहा है। इसी तरह अन्य जानकारों का कहना है कि वन क्षेत्र में धीरे-धीरे अतिक्रमण हो रहा। वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं। मानव बस्तियाँ वन क्षेत्र में बसती जा रही हैं।

भोजन और आश्रय की तलाश अब जंगली जानवरों को उन जगहों पर जाने को मजबूर कर रहा है, जहाँ पर मनुष्यों की रिहाइश है। इसका परिणाम है कि वन्यजीव रिहायशी क्षेत्रों तक पहुँच रहे। मानव और वन्यजीव में संघर्ष बढ़ रहा। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल क्षेत्र में मनुष्य की दख़लंदाज़ी बढ़ गयी है। इससे जंगली जानवर तनावग्रस्त होते हैं, जिस वजह से संघर्ष बढ़ रहा।

समझदारी की ज़रूरत

देश में शेर, बाघ की तुलना में तेंदुओं की स्थिति बेहतर है। भारत में तंदुए की संख्या में 2014 के मुक़ाबले इज़ाफ़ा हुआ है। 2014 में जहाँ तेंदुआ 8,000 थे, वहीं अब लगभग 14,000 हैं। देश में सबसे अधिक तेंदुआ मध्य प्रदेश में पाया जाता है। देश में बाघ की संख्या काफ़ी कम है। इन विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के लिए ठोस क़दम और नियम बनाये गये हैं। 2011 में भारत के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने मानव-तेंदुए संघर्ष के प्रबंधन को लेकर दिशा-निर्देश शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट में कहा गया कि तेंदुए आमतौर पर मनुष्यों पर अकारण हमला नहीं करते।

वो अधिकतर आत्मरक्षा में मनुष्यों पर हमला करते हैं। तेंदुए आमतौर पर मनुष्यों से दूर भागते हैं। इसी तरह हाथियों और अन्य जीवों के बारे में शोध सामने आये हैं। वह भी अधिकतर भोजन की तलाश में ही रिहायशी क्षेत्र तक पहुँचते हैं। इन संघर्षों को रोकने के लिए केवल नियम ही काफी नहीं है। इसके लिए पूर्व के शोध और नये शोध के ज़रिये ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है, तभी मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोका जा सकेगा।

लोकप्रियतावाद के ख़तरे

शिवेंद्र राणा

प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप राजनीतिज्ञ शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित करतें हैं- ‘हमें उस व्यक्ति को राजनीतिज्ञ कहना चाहिए, जो राजनीति में सक्रिय भाग लेता हो, भले ही उसे राजनीति विज्ञान के प्राथमिक सिद्धांतों का भी ज्ञान न हो।’

भारतीय राजनीति के वर्तमान नेतृत्व वर्ग के लिए यह सटीक परिभाषा है। भाजपा की राजनीतिक समायोजन की परम्परा के अंतर्गत एक नयी कड़ी जुड़ी है। चर्चा है कि कवि कुमार विश्वास और लोक गायिका मालिनी अवस्थी को भाजपा अपने कोटे से उत्तर प्रदेश विधान परिषद् भेजेगी। यूनानी दार्शनिक प्लेटो आदर्श राज्य की प्राप्ति के लिए शासन योग्य, कुशल, ज्ञानी एवं स्वार्थहीन दार्शनिक शासकों की परिकल्पना की है। राजनीति एक प्रकार की साधना है। परन्तु भारतीय राजनीति की दशा विचित्र है। यहाँ नेतृत्व-योग्यता का कोई प्रतिमान ही तय नहीं है। सिनेमाई कलाकार, व्यवसायी, क्रिकेट खिलाडिय़ों और उनकी पत्नियाँ ही नहीं, बल्कि सोशल मिडिया इंफ्लूएंसर से लेकर नेताओं के चारण, भाट तक जनप्रतिनिधि बनने को उद्यत हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के उच्च नेतृत्व द्वारा ऐसे आसमानी नेताओं के लिए ज़मीनी स्तर के नेताओं, कार्यकर्ताओं को हटाकर नेपथ्य में धकेला जा रहा है। अत: देश में राजनीतिक नेतृत्व के गिरते बौद्धिक स्तर पर बहुत आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है।

इसका बेहतर विश्लेषण पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में करते हैं- ‘अपने राजनीतिक जीवन में मैं बहुत जल्दी ही समझ गया था कि राजनीति भारत में एक ऐसा उद्यम है, जिसमें लिप्त लोगों को मिलने वाली ख्याति, शक्ति, सम्मान और पहचान का अकसर उसके नैसर्गिक गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं होता। किसी व्यक्ति के राजनीति में प्रवेश करते ही उसे नेता मान लिया जाता है। शीघ्र ही मीडिया में उसकी इतनी चर्चा होने लगती है कि अन्य पेशों में लगे व्यक्तियों, जो उनसे कहीं अधिक प्रतिभाशाली हैं और समाजसेवा में जिनका रिकॉर्ड उनसे श्रेष्ठतर रहा हो; की ईष्र्या का कारण बन जाए। यदि कोई व्यक्ति एक नेता होने के साथ-साथ भीड़ को उकसाने या दंगा-फ़साद कराने की क्षमता भी रखता है, तो उसका और अधिक प्रसिद्ध हो जाना निश्चित है; क्योंकि कुख्याति दुर्भाग्यवश राजनीति में सुनिश्चित लाभ देती है।’

जैसे रजाकर गैंग के उत्तराधिकारी ओवैसी बंधु। अफ़सोस कि इस देश में चपरासी से लेकर अफ़सर तक बनने के कड़े मानक तय हैं; लेकिन नेता बनने के लिए कोई मानक नहीं है। इसके लिए किसी राजनीतिक या धनवान परिवार में पैदा होना ज़रूरी नहीं है; लेकिन चरम-प्रसिद्धि पाने के अलावा किसी भी तरह धनवान होना ज़रूरी है। भले ही उसका तरीक़ा सही हो या ग़लत हो, सभ्य हो या भौंडा हो।

लोकप्रियतावाद की इस क्षुद्रता ने राजनीति को हास्यास्पद बना दिया है। किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसकी सामाजिक संवेदनशीलता, गम्भीर राजनीतिक विमर्श, मूलभूत सामाजिक मुद्दों पर चिन्तन एवं उसकी नेतृत्व योग्यता का प्रमाण नहीं हो सकती। लेकिन वर्तमान दौर की भारतीय राजनीति ज़मीनी काम के बजाय हवाई लोकप्रियता से अधिक प्रभावित है। नेतृत्व की योग्यता जनकार्य की निष्ठा नहीं, बल्कि फेसबुक-ट्विटर के फॉलोवर से निर्धारित होती है। वैसे भी यह भाजपा का शीर्षस्थ-काल है, जिसने बर्बादियों में भी यूरोप-अमेरिका के सपने दिखाये हैं। हालाँकि उसका दावा है कि वह एकमात्र भारतीय धर्म-संस्कृति की रक्षक है।

सिनेमाई कलाकारों का चुनावी राजनीति में प्रचार कार्य को समझा भी जा सकता है; लेकिन जनप्रतिनिधित्व की ज़िम्मेदारी देना उचित नहीं, जब तक कि वे पूर्ण समर्पण से एक निर्धारित समय तक जनसेवा में गम्भीर और वास्तविक योगदान न करें। देश जहाँ पहले से ही नौकरशाही की ख़ामियों से परेशान है, वहीं अब ऐसे बाचाल प्रकृति के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व थमाकर राजनीतिक दल क्या संदेश देना चाहते हैं। सिर्फ़ पार्टी नेतृत्व की गणेश परिक्रमा कीजिए, उनके सही-ग़लत कार्यों का बचाव कीजिए और मौक़ा मिलते ही उन्हें महानतम् शख़्सियत बताइए। अगर आलोचना से परे दिव्य व्यक्ति साबित कर सके, तो और बेहतर। असल में भारत की राजनीति पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस जैसी हो गयी है, बस टिकट के पैसे हों, तो हाथ दीजिए और चढ़ जाइए। न योग्यता साबित करने की ज़रूरत है और न ही श्रेष्ठ गुणों से परिपूर्ण होने की आवश्यकता है। बस नकारात्मक तरीक़ों से चर्चा में बने रहने की कला में माहिर होना ज़रूरी है।

राजनीति में इस अनीतिपूर्ण भर्ती से अतीत में कई प्रभावशाली जननेताओं को अपमानित होना पड़ा है। हेमवती नंदन बहुगुणा और राम नाईक जैसे ज़मीनी क़द्दावर नेता क्रमश: अमिताभ बच्चन और गोविंदा अभिनेताओं से हार गये; लेकिन यह परम्परा अब भी गतिशील है। अभिनेता धर्मेंद्र बीकानेर से सांसद निर्वाचित हुए फिर कार्यकाल समाप्त होते ही वापस अपने मुंबइया जीवन में लौट गये। ऐसे ही गोविंदा आये और ग़ायब हो गये। पर इन महानुभावों का राजनीतिक जनसेवा में क्या योगदान रहा है? ये अब भी जानना, समझना बाक़ी है। कई नेता चुने जाने के बाद ऐश-ओ-आराम और फोटो शूट के कारण अधिक सुर्ख़ियों में रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी यही आरोप लगते रहते हैं। वह कभी चुनावी सभाओं में, तो कभी विदेश यात्राओं में दिखायी देते रहते हैं। गुरुदासपुर से सांसद सनी देओल मुंबई प्रवासी हैं और गम्भीरता से अपने सिनेमा करियर में व्यस्त रहते हैं, उनके संसदीय क्षेत्र में गुमशुदगी के पर्चे तक लगाये गये थे। समझ नहीं आता कि ये लोग अपनी सामाजिक-राजनीतिक ज़िम्मेदारियाँ कैसे पूर्ण करते होंगे?

राज्यसभा के लिए चयनित सचिन तेंदुलकर और अभिनेत्री रेखा ने तो सदन में अनुपस्थित रहने का रिकॉर्ड क़ायम कर दिया। इन्हें न सदन की कार्यवाहियों में रुचि थी, न लोकनीतियों में योगदान की। उस दौरान उपजे विवाद में बहुत-से लोगों ने इन्हें सदस्यता से हटाने की माँग की। प्रश्न है कि जिन्हें सदन में उपस्थित होने में ही रुचि न हो, उन्हें जनसरोकार की ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी जाती है? ये लोग जनता के पैसों पर ऐश करते हैं, सांसद, विधायक बनने पर भी और बाद में मुफ़्त की पेंशन व अन्य सुविधाएँ लेकर। पंजाब सरकार ने इस मामले में बिलकुल ठीक ही किया। बौद्धिक जनप्रतिनिधित्व के नाम पर जनता की गाढ़ी कमायी का लुफ़्त उठाने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जानी चाहिए। दूसरे, ऐसे सदस्यों की नियुक्ति के पश्चात् इनके कार्य का मूल्यांकन किया जाना चाहिए और कर्तव्य निर्वहन में कोताही पर वापस बुलाया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा  करे कौन, सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं।

लोक गायिका मालिनी अवस्थी

राजनीतिक दलों के पास अपने कृत्यों के लिए तर्क सदैव उपलब्ध होते हैं। अगर तर्क संवैधानिक नियमों से परिपुष्ट होता हो, तब इनकी ढिठाई और बढ़ जाती है। भारतीय संविधान बग़ैर निर्वाचन चयनित प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है। संविधान के अनुच्छेद-80(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति राज्यसभा के लिए 12 ऐसे व्यक्तियों को नामनिर्दिष्ट करता है, जिन्होंने साहित्य, कला, विज्ञान और सामाजिक विषयों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव अर्जित किया है। इसी प्रकार अनुच्छेद-168 के तहत राज्यों में विधान परिषद् के सृजन का प्रावधान है। यह भी राज्यसभा की भाँति आंशिक नामनिर्दिष्ट निकाय है। इसके छठे भाग के लिए वे सदस्य राज्यपाल द्वारा चयनित होते हैं, जिन्हें साहित्य, कला सहकारिता आन्दोलन और समाज सेवा का अनुभव हो। हालाँकि इसका अस्तित्व राज्य विधानसभाओं के निर्णय पर आधारित है (अनुच्छेद 169। इसे ऐक्षिक रखने के पीछे संविधान सभा का तर्क था कि निर्धन राज्यों को अपने राजकोष से अनावश्यक व्यय नहीं करना पड़ेगा। वैसे भी इसे देरी कराने वाला और ख़र्चीला सदन कहा जाता है। इसी के चलते बंगाल और पंजाब ने सन् 1969 में तथा आंध्र प्रदेश ने सन् 1985 में और तमिलनाडु ने सन् 2005 में अपने विधान परिषदों को नष्ट कर दिया। लेकिन सन् 2005 में आंध्र प्रदेश सन् 2010 में तमिलनाडु ने पुन: इसका सृजन कर लिया।

मनोनीत सदस्यों के राज्यसभा अथवा विधान परिषद् भेजने का संवैधानिक पहलू इस विचार पर आधारित है कि ऐसे लोग जो प्रत्यक्ष चुनाव का सामना नहीं कर सकते, उन्हें संवैधानिक प्रमुखों द्वारा उपरोक्त सदनों हेतु मनोनीत किया जाता है, ताकि वे देश और राज्य संचालित करने वाली पंचायतों को अपने बौद्धिकता एवं अनुभव से क़ानून और नीतियाँ निर्धारण करने में योग्य सलाह दे सकें। लेकिन यथार्थ का सैद्धांतिक पहलू से कोई मेल नहीं। राजनीतिक दल अपनी जो भी संवैधानिक मजबूरियाँ बताते हों, किन्तु यथार्थ में इसके पीछे इस लोकप्रिय वर्ग के सहारे येन-केन प्रकारेण जन-भावनाओं को रिझाकर वोट बटोरकर सत्ता सुख पाने की चाहत होती है।

योग्यता के बजाय लोकप्रियता के माध्यम से उभरे नेतृत्व द्वारा राष्ट्रीय हितों के लिए कितना बड़ा संकट पैदा हो सकता है, इसका बेहतरीन उदाहरण भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी हैं। उनका उभार अमेरिकी राजनीति में रॉक स्टार की तरह हुआ। उनके पिता जोसफ केनेडी एक समय राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार थे; लेकिन रूजवेल्ट के लम्बे राजनीतिक करियर और व्यक्तित्व के सामने वह दबकर रह गये। द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन में अमेरिका के राजदूत रहते हुए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से हिटलर का समर्थन किया था, जिसके कारण उनका राजनीतिक जीवन समाप्त हो गया। अपनी उसी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने छोटे बेटे जैक को सुनियोजित तरीक़े से राजनीति में लॉन्च किया। यही जॉन केनेडी मीडिया और हॉलीवुड के बीच बड़ा लोकप्रिय था। केनेडी राष्ट्रपति चुने जाने से पूर्व भी मीडिया के प्रभाव से बड़े लोकप्रिय थे, किन्तु राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठते ही इस अनुभवहीन ग्लैमर बॉय अमेरिकी प्रशासन का बंटाधार कर दिया। शीतयुद्ध के दौरान रूसी राष्ट्रपति ख़ुश्चेव ने उसे अपने राजनीतिक कुशलता से बिलकुल बौना साबित किया। सन् 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट के समय केनेडी ने दुनिया के सामने चाहे जितने तेवर भरे बयान जारी किये; लेकिन परदे के पीछे चल रहे कूटनीतिक युद्ध में ख़ुश्चेव ने उसे घुटने पर ला दिया। केनेडी ने किसी भी तरीक़े से रूस से गुपचुप समझौता करके मामले को रफ़ा-दफ़ा किया गया। अमेरिकी राजनीतिक इतिहास की वास्तविकता यही है कि केनेडी देश के सबसे अयोग्य राष्ट्र प्रमुख रहे हैं। आज भी एक बड़ा बौद्धिक वर्ग ऐसा मानता है कि अमेरिकी हितों के लिए केनेडी ने जो विघटन पैदा किया, उसकी वजह से सी.आई.ए. ने ही उनकी हत्या करायी होगी। ऐसा दूसरा उदाहरण तो प्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ही है। एक मसख़रे के रूप में अर्जित लोकप्रियता से राष्ट्रपति पद तक पहुँचने में सफल रहे जेलेंस्की का सामना जब रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन जैसे तपे-परखे और कठोर निर्णयन के लिए प्रसिद्ध नेता से हुआ, तो यूक्रेन अपना अस्तित्व गँवाने के कगार तक पहुँच गया। राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध अनुभवहीन फ़ैसले लेने वाले जेलेंस्की ने यह मुसीबत ख़ुद बुलायी है। विदेश नीति में उनकी स्तरहीनता का एक पक्ष देखिए कि भारत से मदद की गुहार लगाने वाले यूक्रेन ने वैश्विक मोर्चे पर भारतीय हितों के विरुद्ध सदैव पाकिस्तान और उसके अधिप्रचार का साथ दिया है।

कहने का तात्पर्य यह है कि चुनाव जिताऊ एवं लोकरंजकता के आधार पर नेतृत्व की कसौटी निर्धारित करना राष्ट्र को अंधे रास्ते की तरफ़ धकेल सकता है। टीवी-मीडिया, सिनेमा, संगीत, सामाजिक गतिविधियों आदि से अर्जित प्रसिद्धि राष्ट्रीय नेतृत्व हेतु चयन का आधार नहीं हो सकता। राज्यकर्म संचालन की योग्यता से हीन उम्मीदवार राजनीतिक नेतृत्व हेतु अयोग्य होते हैं। देश की राजनीति ही नहीं, बल्कि आम भारतीय जनता को भी समझना होगा कि शासन-सत्ता का कार्य एवं जनप्रतिनिधित्व विवेकशीलता चिन्तन पर आधारित कार्य है, जिसे लोकप्रियता की कसौटी पर संचालित करना राष्ट्र के प्रति अक्षम्य अपराध है।

(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

शिक्षा की ज़मीनी हक़ीक़त

हर साल भारत से हज़ारों छात्र विदेशी विश्वद्यिालयों में पढऩे के लिए विभिन्न देशों में जाते हैं, इनमें ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा प्रमुख हैं। विदेशों में जाकर पढऩे वाले छात्रों की इच्छा पूरा करने के लिए बीते दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ऐलान किया कि वह विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस बनाने की अनुमति दे रहा है। भारत में कैंपस स्थापित करने के इच्छुक विदेशी विश्वविद्यालयों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। इसके पक्ष व विपक्ष में अलग से चर्चा हो रही है; लेकिन इस चर्चा के साथ यह जानना भी ज़रूरी है कि देश के स्कूलों में शिक्षा के स्तर की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है।

हाल ही में जारी एक रिपोर्ट इस ज़मीनी हक़ीक़त से रूबरू कराती है। प्रथम फाउंडेशन नामक संगठन की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन-2022 यानी असर रिपोर्ट बताती है कि देश के ग्रामीण इलाक़ों में कक्षा 3 और कक्षा 5 में छोटे बच्चों की बुनियादी शिक्षा एवं अंकगणितीय कौशल में गिरावट आयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में बच्चों की पढऩे सम्बन्धी क्षमता 2012 से पहले के स्तर तक गिर गयी है, जबकि बुनियादी गणित कौशल 2018 के स्तर तक गिर गया है। यह रिपोर्ट इस पर भी रोशनी डालती है कि इन मध्यवर्ती वर्षों में जो धीमी प्रगति हुई थी, उसके उलट होने के संकेत भी मिलते हैं। सरकार के पास सन्तुष्ट होने या अपनी पीठ थपथपाने के लिए इस रिपोर्ट में एक बिंदु यह है कि स्कूलों में बच्चों की नामांकन दर में वृद्धि हुई है और वो भी सरकारी स्कूलों में।

ग़ौरतलब है कि असर-2022 रिपोर्ट जिस सर्वेक्षण पर आधारित है, उस सर्वे में देश के 616 ज़िलों के 19,060 गाँवों के सात लाख बच्चों को शामिल किया गया। सर्वे की प्रक्रिया के तहत गाँवों में घरों को आकस्मिक ढंग से चुना जाता है और चुने हुए घरों में तीन से 16 साल तक के बच्चों का सर्वे होता है। तीन से 16 साल की आयुवर्ग के बच्चों की नामांकन स्थिति और 5-16 आयु वर्ग के बच्चों के बुनियादी कौशल (पढऩा और सरल गणित) की जाँच की जाती है। वर्ष 2005 से यह प्रक्रिया जारी है; लेकिन वर्ष 2018 के बाद अब यानी चार साल बाद 2022 रिपोर्ट चालू महीने की 18 (जनवरी 2023) को जारी की गयी।

इस रिपोर्ट में वर्णित आँकड़े बताते हैं कि कोरोना महामारी की वजह से दो साल तक स्कूल बन्द रहने का असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा है। यह बात दीगर है कि महामारी का स्कूलों में पढऩे आने वाले बच्चों की संख्या पर असर नहीं पड़ा है, बल्कि यह संख्या बढ़ी है। दरअसल आँकड़ों से भरपूर यह रिपोर्ट देश के शिक्षा मंत्रालय, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और निजी स्कूल संचालन सीमितियों के लिए एक आईना है। बच्चे जो किसी भी समाज व राष्ट्र के भविष्य हैं, उन्हें गुणवत्ता शिक्षा मुहैया कराना हर सरकार का दायित्व है। आँकड़ों पर निगाह डालें, तो पता चलता है कि देश के ग्रामीण इलाक़ों में सरकारी व निजी स्कूलों को मिलाकर अब 6-14 आयुवर्ग के 98.4 फ़ीसदी बच्चे स्कूल जाते हैं। पहली बार आँकड़ा 98 फ़ीसदी से ऊपर है। यानी देश में इस आयुवर्ग के दो फ़ीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिनका स्कूल में नामांकन नहीं हुआ है। साल 2009 में शिक्षा का अधिकार लागू होने के बाद इस साल सरकारी स्कूलों में नामांकित 6-14 आयुवर्ग के बच्चे सबसे अधिक बढ़े हैं।

सन् 2018 में स्कूलों में नामांकित बच्चों की दर 97.2 फ़ीसदी थी। 4 साल पहले अर्थात् 2018 में 30.9 फ़ीसदी बच्चे निजी स्कूलों में थे; लेकिन 2022 में यह आँकड़ा घटकर 25 फ़ीसदी रह गया। सरकारी स्कूलों में दाख़िला लेने वाले 6714 आयु वर्ग के बच्चे 72.9 फ़ीसदी हो गये, जो कि 2018 में 66 फ़ीसदी ही थे। सरकारी स्कूलों में नामांकन बढऩे की ठोस वजह पर कोई मुहर तो नहीं लगी है; लेकिन इतना साफ़ है कि कोरोना महामारी ने जिस तरह लोगों की रोज़ाना कमायी, मासिक कमायी पर चोट की थी, उस हालात में निम्न आय वर्ग के लिए बच्चों की निजी स्कूलों में फीस भरना बहुत मुश्किल हो गया था। गाँवों के कई निजी स्कूलों की कमज़ोर आर्थिक हालत भी उनके बन्द होने की वजह रही। इधर सरकारी स्कूलों ने तालाबंदी के बावजूद अपने छात्रों के घरों तक पाठ्य पुस्तकें वितरित करने की व्यवस्था की, फोने के ज़रिये उन्हें पाठ्य सामग्री मुहैया करायी व मिड-डे मील उन तक पहुँचाने का भी बंदोबस्त किया। अभिभावकों को सरकारी स्कूलों से जुड़े रहने के फ़ायदे दिखे।

दरअसल यह एक अध्ययन का विषय है। लेकिन यह साफ़ दिखायी देता है कि महामारी के दौरान सरकारी स्कूलों में इस आयु वर्ग के बच्चों के नामांकन दर में वृद्धि हुई है और इस रुझान को सरकार अपने पक्ष में भुना सकती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्ष 2006 से 2014 तक निजी स्कूलों में नामांकन दर में वृद्धि हो रही थी और सरकारी स्कूलों के नामांकन दर में गिरावट देखी गयी।

सन् 2018 में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और यह दर 65.6 फ़ीसदी हो गयी और नवीनतम आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2022 में यह दर 72.9 फ़ीसदी हो गयी है। चार साल पहले सन् 2018 में निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की तादाद 30.9 फ़ीसदी थी, जो घटकर 2022 में 25 फ़ीसदी रह गयी। यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि 11-14 आयुवर्ग की सिर्फ़ दो फ़ीसदी लड़कियों का ही स्कूल में नामांकन नहीं हुआ है। जबकि 2018 में यह आँकड़ा 4.1 फ़ीसदी था और वर्ष 2006 में 10.3 फ़ीसदी था। देश में इस आयु वर्ग की स्कूल नहीं जाने वाली लड़कियों का अनुपात वर्ष 2022 में अब तक की सबसे कम दर दो फ़ीसदी पर आ गया है।

इस उल्लेखनीय समग्र गिरावट के बावजूद चिन्ता बराबर बनी हुई है; क्योंकि देश में तीन सूबों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 10 फ़ीसदी से अधिक लड़कियाँ स्कूल नहीं जा रही हैं। इसके साथ ही इस ओर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि देश में कक्षा एक से 8वीं तक के 30.5 फ़ीसदी बच्चे निजी ट्यूशन लेते हैं, जबकि 2018 में यह दर 26.4 फ़ीसदी थी। उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखण्ड में 2018 के मुक़ाबले 2022 में निजी ट्यूशन लेने वाले बच्चे 8 फ़ीसदी बढ़ गये हैं। बिहार में यह संख्या 71.5 फ़ीसदी है।

इन राज्यों में ऐसे बच्चों की संख्या क्यों बढ़ रही है, यह अध्ययन का विषय है। 2018 के मुक़ाबले ग्रामीण इलाक़ों में 6-14 आयुवर्ग के स्कूली बच्चों के बुनियादी शिक्षा और अंकगणितीय कौशल में गिरावट दर्ज की गयी है। राजस्थान में 5वीं के सिर्फ़ 6.3 फ़ीसदी बच्चे ही भाग कर पाते हैं और सिर्फ़ 4.9 फ़ीसदी को ही घटाना आता है, जो देश में सबसे बुरी स्थिति है। सन् 2018 से कक्षा तीन के छात्र जो दूसरी कक्षा के स्तर की पाठ्य पुस्तक पढऩे वालों की संख्या में गिरावट सन् 2022 में 24 राज्यों में दर्ज की गयी। इसी तरह गणित में भी भाग करने व घटाने वाले बच्चों की संख्या कम हुई है। मध्य प्रदेश में कक्षा 3 के 9.5 फ़ीसदी, झारखण्ड-छत्तीसगढ़ में 16 फ़ीसदी, गुजरात में 23 फ़ीसदी, बिहार में 21 फ़ीसदी और पंजाब में 31 फ़ीसदी बच्चे ही घटाना जानते हैं। जहाँ तक कक्षा पाँच का सवाल है, वहाँ भी भाग करने वाले बच्चों की संख्या में इन चार वर्षों में गिरावट साफ़ नज़र आती है। मिजोरम में वर्ष 2018 में ऐसे बच्चों की संख्या 35.8 फ़ीसदी थी, जो 2022 में घटकर 14.8 फ़ीसदी रह गयी है। पंजाब में यह दर 50.1 फ़ीसदी से घटकर 33.3 फ़ीसदी पर आ गई है। कक्षा 8 के 23 फ़ीसदी बच्चे ही घटाना जानते हैं। कोरोना महामारी का असर बच्चों की स्कूली शिक्षा पर पड़ा है।

जो बच्चे छोटी कक्षाओं में हैं, उनके पास सीखने और फ़ासलों को भरने का वक़्त है; लेकिन जो बच्चे पाँचवीं व आठवीं कक्षा में पढ़ाई में पिछड़ गये हैं, उनकी संघर्ष करने की सम्भावना अधिक है। राज्य सरकारों को इस और अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है। वैसे भारत सरकार स्कूली शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए निपुण भारत ओर फंक्शनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी मिशन सरीखी योजनाएँ चला रही हैं। निपुण भारत का लक्ष्य यह है कि तीसरी कक्षा में पढऩे वाला हर बच्चा पढ़ सके और बुनियादी गणित कर सके।

सरकार ने इस बाबत स्कूलों को दिशा-निर्देश भेजे हें और अध्यापकों को प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। सरकार अपनी तरह से प्रयासरत है कि बच्चों को गुणात्मक बुनियादी शिक्षा मुहैया करायी जाए, इसके लिए स्कूली ढाँचे में पेयजल, लड़कियों के लिए शौचालय और खेल के मैदान की व्यवस्था में सुधार जारी है और उधर निजी स्कूल गाँवों में अभिभावकों, बच्चों को अपनी ओर खींचने के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं? यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

विराट से उम्मीदें

क्या कोहली 100 शतक के पार जाकर तोड़ेंगे तेंदुलकर का रिकॉर्ड?

टेस्ट क्रिकेट में दर्शकों की रुचि कम हो गयी है, जबकि अब एक दिवसीय मैच देखने भी स्टेडियम में अपेक्षाकृत कम दर्शक आने लगे हैं। ऐसे में क्या बल्लेबाज़ की बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा पर असर पड़ता है? यह अध्ययन का एक दिलचस्प विषय है। भले ताबड़तोड़ भीड़ सिर्फ़ टी-20 में ही दिखती हो। हाल के इन वर्षों को देखें, तो बल्लेबाज़ों के बल्ले से एक दिवसीय और टेस्ट के दोनों ही फॉर्मेट में ख़ूब रन और शतक निकले हैं। इतने कि क्रिकेट की दुनिया के कई बड़े रिकॉर्ड या तो टूट गये या ख़तरे में पड़ गये हैं। विराट कोहली को ही लें। कुछ महीने की ख़ामोशी के बाद उनका बल्ला जमकर बोल रहा है और इससे शतक भी ख़ूब निकल रहे हैं। किंग कोहली इतनी अच्छी फार्म हैं कि लाखों क्रिकेट प्रेमी पूछ रहे हैं कि क्या विराट महान् सचिन तेंदुलकर का 100 अंतरराष्ट्रीय शतक का रिकॉर्ड तोड़ देंगे? विराट कोहली के बल्ले की गूँज कह रही है कि वह ऐसा कर सकते हैं।

देखें तो तेंदुलकर और विराट में एक अन्तर है। तेंदुलकर के शतक कहीं ज़्यादा पारियों में बने हैं, जबकि कोहली के उनसे कहीं कम पारियों में। ऐसे में यदि विराट और चार-पाँच साल क्रिकेट खेल लेते हैं तो उनके शतकों की संख्या आश्चर्यजनक आँकड़ा पार कर सकती है। अकेले जनवरी में ही यह कॉलम लिखने तक विराट एक दिवसीय और टेस्ट मैचों में 73 शतक बना चुके हैं। शतकों के इस सिलसिले की दौड़ लम्बी चली, तो रिकॉर्डों का महल तो खड़ा होना ही है।

विराट को कई क्रिकेट प्रेमी रन मशीन कहते हैं। उनकी शतकों की भूख असीमित है। वह शानदार एथलीट हैं और अपनी ऊर्जा से मैदान में एक अलग माहौल बनाते हैं। टीम के खिलाड़ी उनसे प्रेरणा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि विराट की तरह बनना खेल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। हाल के महीनों में जब वह अपनी लय में नहीं थे, तब भी मैदान में उनकी ऊर्जा देखते बनती थी। इस मुश्किल दौर में भी उनका हर कैच और विकेट पर एग्रेशन के साथ जोश दिखाने वाला ट्रेड मार्क हमेशा जीवंत रहा।

अब जबकि शतकों के मामले में वे तेंदुलकर के रिकॉर्ड 100 के आँकड़े की तरफ़ बढ़ते दिख रहे हैं, तब भी उन पर इसे लेकर कोई दबाव नहीं दिखता। हो सकता है वह इस लक्ष्य को दिमाग़ में ही न रखें हों, क्योंकि जैसा कि कोहली ख़ुद भी कहते हैं कि मैदान में उनकी नज़र कभी आँकड़ों पर नहीं रहती, बल्कि इस बात पर रहती है कि कैसे भारत को यह मैच जिताना है। उनकी इसी जज़्बे को उनके प्रशंसक प्यार करते हैं।

सम्भव है रिकॉर्ड बनाना

कोहली के लिए तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोडऩा बिलकुल सम्भव है। तेंदुलकर और धोनी सहित कई बड़े खिलाड़ी 40 साल की उम्र तक देश के लिए खेलते रहे हैं, क्योंकि वह परफॉर्म कर रहे थे और फिट भी थे। विराट फिटनेस और वर्तमान फार्म में उनसे भी आगे दिखते हैं। ख़ुद विराट ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर जाने का कोई भी संकेत नहीं दिया है। इसकी ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि वह शानदार तरीक़े से खेल रहे हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार वह कम-से-कम पाँच-छ: साल और देश के लिए खेलने की क्षमता रखते हैं।

विराट कोहली ने अंतरराष्ट्रीय करियर का 70वाँ शतक महज़ 31 साल की उम्र में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ 2019 के कोलकाता टेस्ट में ही बना दिया था। लेकिन इसके बाद उनके 30 महीने बिना शतक के निकल गये। यहीं सारा खेल ख़राब हो गया। यहाँ तक कि कई विशेषज्ञ उन्हें रिटायर होने तक की सलाह देने लगे। नहीं तो जैसी उनकी फार्म चल रही थी, उसके हिसाब से वह अब तक 90 शतकों के आसपास होते। ख़ैर, यह अफ़सोस करने की चीज़ नहीं, क्योंकि किसी का समय हमेशा एक-सा नहीं रहता। खिलाड़ी की फार्म भी हमेशा एक-सी नहीं रहती और कोहली भी इस मानवीय चक्र के अपवाद नहीं। हाँ, उनके प्रशंसक और क्रिकेट के रिकॉर्डों में रुचि रखने वाले इस बात से सन्तुष्ट हो सकते हैं कि कुछ देरी से ही सही, विराट फार्म में लौट आये हैं और उनका पुराना रंग दिखने लगा है।

सचिन तेंदुलकर ने 40 साल की उम्र तक क्रिकेट खेली और 100 शतक जमाये। विराट 34 साल की उम्र में 74 शतक बनाकर उन्हें पकडऩे की कोशिश कर रहे हैं। दावा नहीं किया जा सकता कि वे 100 का आँकड़ा पार करेंगे या नहीं; लेकिन विराट में वो मादा है कि वह ऐसा कर सकते हैं। वर्तमान फार्म जारी रही और जो उनका रुतवा है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि कोई और उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर करेगा। इसका फ़ैसला ख़ुद कोहली ही करेंगे।

कोहली के हाल के वर्षों पर नज़र दौड़ाएँ, तो ज़ाहिर होता है कि सन् 2017 और सन् 2018 के दो वर्षों में खेली 99 पारियों में उन्होंने 22 शतक ठोक दिये थे। यही गति वह बनाते हैं, तो तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोडऩे में उन्हें तीन साल ही लगेंगे। ज़्यादा-से-ज़्यादा से चार साल। वैसे उन्होंने औसतन हर 7.33 पारी में शतक बनाया है। लेकिन इन दो वर्षों में यह 4.5 पारी प्रति शतक तक पहुँच गया था।

विराट फ़िलहाल टी-20 टीम में नहीं खेल रहे। उन्होंने अपनी तरफ़ से टी-20 से संन्यास नहीं लिया है। हो सकता है कि चयनकर्ता दूसरे खिलाडिय़ों को अवसर देना चाहते हों। हालाँकि ज़्यादातर क्रिकेट विशेषज्ञ मानते हैं कि विराट को टी-20 टीम में होना चाहिए। यदि वह तीनों फॉर्मेट में खेलते हैं, तो टी-20 के इक्का-दुक्का शतक उन्हें और मदद कर सकते हैं। भले इस फॉर्मेट में उनका एक ही अंतरराष्ट्रीय शतक है। यदि वह सिर्फ़ एकदिवसीय और टेस्ट मैच ही खेलते हैं, तो भी उनके लिए इस साल बहुत सारी क्रिकेट खेलने को है। बीसीसीआई के चार्ट के मुताबिक, इस साल भारतीय टीम को फरवरी से लेकर दिसंबर तक कम-से-कम छ: टेस्ट खेलने हैं। इसके अलावा टेस्ट चैंपियनशिप भी होनी है, जिसमें भारत के फाइनल खेलने की पूरी सम्भावना है। ऑस्ट्रेलिया पहले ही फाइनल में पहुँच चुका है।

जहाँ तक एक दिवसीय मैचों की बात है, भारत को दो सीरीज में छ: एक दिवसीय खेलने हैं। इसके अलावा भारत में पुरुषों का एक दिवसीय विश्व कप भी होना है, जिसमें काफी मैच होंगे। यदि वर्तमान फार्म के आधार पर कोहली को टी-20 टीम में भी ले लिया गया, तो दर्ज़न भर मैच इस फॉर्मेट के भी उन्हें खेलने का अवसर मिल जाएगा।

देखा जाए, तो कोहली को तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोडऩे के लिए 170 से 200 के बीच पारियों की ज़रूरत रहेगी। पाँच-छ: साल में उनके इतनी क्रिकेट खेलने की पक्की सम्भावना है। हाँ इसके लिए विराट को बीच में ब्रेक लेने की संख्या घटानी होगी। हाल के 36 महीनों में भारत ने जो 137 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले उनमें से विराट ने सिर्फ़ 86 मैच खेले। यदि वह टेस्ट और एक दिवसीय लगातार खेलते हैं, तो रिकॉर्ड तोडऩे का सफ़र जल्दी पूरा होगा।

सचिन बनाम विराट

यदि एक दिवसीय में 259 पारी का पैमाना ही रख लें, तो सचिन और विराट के रन और शतकों का अन्तर साफ़ दिखता है। विराट सचिन से कहीं आगे दिखते हैं। सचिन ने 259 पारी में 22 बार नॉटआउट रहकर 10,105 रन बनाये, जिसमें 186 उच्चतम स्कोर रहा, और 42.63 की औसत और 86.51 के स्ट्राइक रेट के साथ उन्होंने 28 शतक और 50 अर्धशतक लगाये। उधर विराट ने 259 पारी में 40 नॉटआउट रहते हुए 12,754 रन बनाये, जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 183 रहा और 58.23 की औसत और 93.68 स्ट्राइक रेट के साथ उन्होंने 46 शतक और 64 अर्धशतक भी लगाये।

धर्मों का चक्कर

सत्य की हिमायत तो लोग करते हैं; लेकिन सत्य से साक्षात्कार करना कोई नहीं चाहता। सत्य पर चलना कोई नहीं चाहता। हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि कोई सत्य पर नहीं चलता; लेकिन कितने लोग? एक या दो प्रतिशत ही होंगे। उनके भी पूर्णत: सत्य पर टिके होने में सन्देह है। क्योंकि किसी भी व्यक्ति में अच्छाई या बुराई का स्तर 100 प्रतिशत नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि दिन भर झूठ बोलने वाला व्यक्ति भी 24 घंटे में एक बार सत्य ज़रूर बोलता है। अधिकतर लोग धर्म की परिक्रमा तो करना चाहते हैं; लेकिन उसे स्वयं में आत्मसात् नहीं करना चाहते। यही कारण है कि लोग सत्य पर टिके नहीं रह पाते।

धर्म के पालन करने वालों का भी यही हाल है। ज़्यादातर लोग धर्म के चक्कर में तो रहते हैं; लेकिन धर्म को आत्मसात् नहीं करते। इसी वजह से वे भटके रहते हैं। हर धर्म में भेड़ चाल से चलने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा है। जिस कुएँ में आगे वाला गिर रहा है, उसी में एक-एक करके सब गिरते जा रहे हैं। किसी को न अपनी सुध है और न धर्म का ज्ञान। सब गोल-गोल घूम रहे हैं। यह सब ठीक वैसे ही हो रहा है, जैसे कि किसी घड़े के चारो ओर चींटियाँ घूम रही हों और ऐसा लग रहा हो, मानो चींटियाँ नहीं, बल्कि घड़ा घूम रहा हो। लेकिन ऐसा होता नहीं है। यह किसी भी धर्म को बिना आत्मसात् किये उसकी अंधभक्ति जैसा ही होता है। इसका परिणाम कितना ख़तरनाक हो सकता है, इसे समझने के लिए घड़े के चारो ओर घूम रही चींटियों की गति (अन्त) को समझना होगा।

चींटियाँ हमेशा एक गंध भर रास्ता बनाकर चलती हैं, जिसे फेरोमोन ट्रैक कहते हैं। इस ट्रैक पर चलने वाली हर चींटी अपने से आगे चलने वाली चींटी अथवा आगे वाली दो-चार चींटियों का ही अनुसरण करती करती है। उस चींटी को बिना इधर-उधर देखे, सीधे उसके पीछे-पीछे चलने में ही अपनी मंज़िल दिखायी देती है। अगर किसी वजह से फेरोमोन ट्रैक खो जाए या कोई चींटी रास्ते से भटक जाए, तो उसके पीछे वाली चींटी उसी के पीछे-पीछे भटक जाती है और उसके पीछे वाली चींटियाँ भी इसी तरह भटक जाती हैं।

अंतत: भेड़ों की ही तरह चींटियों का भटकना तय होता है और ये चींटियाँ एक डेथ स्पायरल में घूमने लगती हैं। इस घटना को एंट मिल कहते हैं, जो अन्त में चींटियों की मौत की वजह बनती है। क्योंकि चींटियाँ बदहवास होकर एक-दूसरे के पीछे चलती रहती हैं और अपनी मंज़िल पर पहुँचने की चाह में बस केवल घूमती रहती हैं। इस तरह वे फिर थककर चूर हो जाती हैं। इसके बाद भी वे चलती रहती हैं और भूख-थकान के चलते उनकी मौत हो जाती है। इसीलिए इसे डेथ स्पायरल कहा जाता भूख में चलते-चलते जब थककर चूर हो जाती हैं, तो स्वत: ही मरने लगती हैं।

आज दुनिया भर में बन चुके तमाम धर्मों के लोगों का भी यही हश्र हो रहा है। हर कोई धर्म के मर्म को समझे बिना ही अपने से आगे वाले के पीछे चल रहा है। इस तरह सब आँखें मूँदे बस एक-दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं। सब अपने-अपने धर्म की एक भीड़ बनाकर एक-दूसरे के पीछे-पीछे चल रहे हैं। इस तरह ईश्वर प्राप्ति की जगह सभी को एक अन्धी मौत मिल रही है। इसे अंधभक्ति कहना अनुचित नहीं होगा। अंधभक्ति के नु$कसान बड़े-बड़े हैं; लेकिन दिखते किसी को नहीं। इन नु$कसानों को जो समझ जाता है, उसे लोगों की इस मूर्खता पर हँसी आती है और वह ख़ुद को इस धर्मांधता पर भटकने वाली भीड़ से ख़ुद को अलग कर लेता है। ऐसे लोगों का विरोध भी होता है; लेकिन बहुत लम्बे समय तक नहीं। आने वाली पीढिय़ाँ उसके तर्क को समझने का प्रयास करती हैं। लेकिन ऐसे लोगों का अनुसरण करने वालों के पीछे चलने वाले भी आख़िर वही काम करने लगते हैं, जो किसी धर्म या विचार के अनुयायी कर रहे होते हैं। इसी के चलते संसार में एक-एक करके कई धर्म और कई पंथ तैयार हो चुके हैं। अगर यह सिलसिला नहीं थमा, तो भविष्य में कई नये धर्म और पंथ और बनेंगे। ध्यान रहे, संसार में जितने धर्म और पंथ बनेंगे, मानवता को उतना ही ख़तरा बढ़ेगा। भेदभाव और बँटवारे की खाई उतनी ही गहरी होगी।

लोगों को समझना होगा कि धर्म एक व्यवस्था है, जो लोगों को $गलत करने से रोकने के लिए है। धर्म का मार्ग लोगों को मानवता की ओर अग्रसर करता है। लेकिन लोगों ने धर्म को अपना पथ-प्रदर्शक न मानकर उसे आस्था के स्वरूप में स्वीकार कर लिया है। इसका परिणाम यह है कि लोग स्वयं का लोक-परलोक सुधारने के लिए जिस धर्म की शरण में आते हैं, उसका झण्डा ऊँचा करने के लिए उसी धर्म की व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने में संकोच नहीं करते। इन लोगों को धर्म की रक्षा का ठीक वैसा ही भ्रम होता है, जैसा भ्रम बैलगाड़ी के नीचे चल रहे कुत्ते को होता है कि बैलगाड़ी तो उसी के दम पर चल रही है।

बलात्कार के आरोप में आसाराम को उम्र कैद की सजा

ताउम्र रहना होगा सलाखों के पीछे , भक्तों में छाया निराशा

गुजरात : अहमदाबाद, सूरत की एक महिला से रेप के मामले में 81 वर्षीय धर्मगुरु आसाराम को मंगलवार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। गुजरात के गांधीनगर सेशन कोर्ट ने आसाराम को सोमवार को दोषी करार दिया था। इससे अब आसाराम बापू को ताजिंदगी जेल के सलाखों के पीछे अपनी जीवन व्यतीत करनी पड़ेगी। सजा सुनाए जाने के बाद आसाराम बापू के भक्तों में काफी हताशा देखी गई है। वे बहुत मायूस है और अपने गुरु को मिले सजा को अन्याय के रूप में बता रहे हैं। इससे पहले जोधपुर कोर्ट ने 25 अप्रैल, 2018 को आसाराम को यूपी की एक नाबालिग से रेप के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस केस में आसाराम की पत्नी समेत छह अन्य आरोपी थे।कोर्ट ने आसाराम को दोषी माना। आरोपियों में से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। कोर्ट ने बाकी पांच आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।सरकारी वकील आरसी कोड़ेकर ने बताया कि आसाराम को आईपीसी की धारा 376, 377 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
कोर्ट ने यह आदेश भी दिया है कि पीड़ित महिला को 50 हजार रुपए मुआवजा दिया जाए।2013 में केस दर्ज हुआ था करीब 10 साल पहले आसाराम पर सूरत की एक महिला ने अहमदाबाद के मोटेरा स्थित उसके आश्रम में बार-बार दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। इस मामले में अहमदाबाद के चांदखेड़ा पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। प्राथमिकी के अनुसार महिला के साथ अहमदाबाद शहर के बाहर बने आश्रम में कई 2001 से 2006 के बीच कई बार दुष्कर्म किया गया था। महिला तब आसाराम के आश्रम में रह रही थी। दूसरी कोर बापू के अनुयाई हरि ओम ,महेंद्र अग्रवाल, सुनील कुमार सहित अनेक भक्तों ने बताया कि उनके गुरु को षड्यंत्र के तहत फसाया गया है। यह उनके साथ अन्याय हो रहा है ।वे अपने गुरु और भगवान पर विश्वास रखते हैं ।अब भगवान ही उनका कल्याण करेंगे।