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भारतीय खेलों में मी टू

पहलवानों के विरोध का डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष पर नहीं असर

ग्लैमर की दुनिया में गन्दगी इस दर हावी हो जाती है कि पर्दे के अन्दर झाँककर देखने पर नफ़रत होने लगती है। खेलों का ग्लैमर इन दिनों इतना हावी है कि करोड़ों लोग खेलों और खिलाडिय़ों के दीवाने हो चुके हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए युवा-युवतियाँ लालायित रहते हैं। इस क्षेत्र में मैडल जीतकर लाने का मक़सद हर खिलाड़ी का सपना होता है। लेकिन खेलों के लिए बनी संस्थाओं और मंत्रालयों में मठाधीश बनकर बैठे लोग, जिनकी बिना इच्छा के कोई खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ सकता; इन खिलाडिय़ों का शोषण करते हैं। महिला खिलाड़ी इनका आसान शिकार होती हैं। आजकल कुश्ती की महिला खिलाडिय़ों के शरीरिक शोषण को लेकर देश भर में हंगामा मचा हुआ है। इसी को लेकर अमित अग्निहोत्री की रिपोर्ट :-

पूरा देश तब हतप्रभ हैरान रह गया, जब जनवरी में बजरंग पुनिया, साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, रवि दहिया और दीपक पुनिया जैसे नामी पहलवानों ने राजधानी दिल्ली में खेलों में भारत के सबसे बड़े ‘मी टू’ विरोधी धरने का नेतृत्व किया। भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह और कोचों के ख़िलाफ़ यौन दुराचार के आरोपों को लेकर यह खिलाड़ी सडक़ों पर उतरे। दबाव ऐसा था कि सरकार को इस मामले में जाँच के आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

नई दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध करने वाले पहलवानों ने आरोप लगाया कि डब्ल्यूएफआई प्रमुख और उसके कोच वर्षों से युवा महिला खिलाडिय़ों का यौन और मानसिक शोषण कर रहे हैं। पहलवानों ने डब्ल्यूएफआई में वित्तीय कुप्रबंधन का भी आरोप लगाया और खेल निकाय में बदलाव की माँग की।

खेलों में यौन शोषण का मामला देश में कोई नया नहीं है। हाल में पूर्व हॉकी कप्तान और हरियाणा के खेल मंत्री संदीप सिंह पर एक जूनियर कोच ने यौन शोषण का आरोप लगाया था। काफ़ी विरोध के बाद उन्हें खेल मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। हालाँकि उनके पास अभी मुद्रण तथा लेखन सामग्री (स्वतंत्र कार्यभार) है।

सन् 1990 में 14 वर्षीय रुचिका गिरहोत्रा, जो एक होनहार टेनिस खिलाड़ी थी; की तरफ़ से उस समय हरियाणा टेनिस संघ के प्रमुख एसपीएस राठौड़ पर उनसे छेड़छाड़ के आरोप लगे थे। राठौड़ उस समय राज्य के पुलिस महानिरीक्षक भी थे। रुचिका ने आत्महत्या कर ली; लेकिन प्रभावशाली पुलिस अधिकारी को पदोन्नति मिल गयी।

पिछले वर्षों में हरियाणा ने एक ऐसा राज्य होने का गौरव अर्जित किया है, जो पहलवानों सहित विश्व स्तर के खिलाड़ी पैदा करता है, जिन्होंने देश के लिए कई पदक और पुरस्कार जीते हैं। इस वजह से डब्ल्यूएफआई प्रमुख और उसके कोचों पर पहलवानों के लगाये गये आरोपों ने देश भर के खेल प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया।

आरोपी भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह, जो भाजपा के सांसद भी हैं; ने आरोपों को ग़लत बताया और विरोध-प्रदर्शन को हरियाणा कांग्रेस के नेताओं की रची गयी साज़िश क़रार दिया। घटनाक्रम से नाराज़ कांग्रेस पहलवानों के समर्थन में उतर आयी और इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाया।

प्रधानमंत्री मोदी के इस दावे के बीच कि खेल के लिए बेहतर माहौल बनाने के लिए पिछले आठ वर्षों में काम किया गया है, स्थिति से निपटने में सरकार के लिए यह कठिन समय था। प्रधानमंत्री ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि कई प्रतिभाएँ मैदान से दूर रहीं। लेकिन पिछले आठ वर्षों में देश इस पुरानी सोच को पीछे छोड़ चुका है। खेलों के लिए बेहतर माहौल बनाने का काम किया गया है और अब ज़्यादा बच्चे और युवा खेल को करियर के विकल्प के रूप में देख रहे हैं।’

विवाद पर जनता के मूड को भाँपते हुए केंद्र ने तब केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर को मोर्चे पर तैनात किया, जिन्होंने दो दौर में पहलवानों से बात करने के बाद घोषणा की कि ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज़ मैरी कॉम की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय समिति आरोपों की पड़ताल करेगी और चार हफ़्ते में रिपोर्ट पेश करेगी। मंत्री ने यह भी कहा कि बृजभूषण शरण सिंह जाँच पूरी होने तक डब्ल्यूएफआई के प्रमुख के पद पर नहीं रहेंगे।

इस भरोसे के बाद पहलवानों ने अपना धरना समाप्त कर दिया। बजरंग पुनिया ने कहा- ‘हमें सम्मानित मंत्री से आश्वासन मिला है। धन्यवाद! हमने केवल अन्तिम उपाय के रूप में विरोध किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वास्तव में हमारे खेल में मदद की है।’

आईओए की जाँच

खिलाडिय़ों ने भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) की प्रमुख पीटी उषा से भी आरोपों की जाँच करने का आग्रह किया था, एसोसिएशन ने डब्ल्यूएफआई प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ आरोपों की जाँच करने और 10 दिन में एक रिपोर्ट पेश करने के लिए मुक्केबाज़ मैरी कॉम की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति का गठन किया।

पैनल में भारतीय भारोत्तोलन महासंघ के अध्यक्ष सहदेव यादव, तीरंदाज़ डोला बनर्जी और ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त शामिल हैं। कमेटी में दो वकील भी होंगे। आईओए की आपातकालीन कार्यकारी परिषद् की बैठक के दौरान यह निर्णय किया गया, जिसमें शीर्ष निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा, योगेश्वर दत्त के साथ आईओए अध्यक्ष पीटी उषा और संयुक्त सचिव कल्याण चौबे ने भाग लिया।

पीटी उषा को लिखे पत्र में पहलवानों ने डब्ल्यूएफआई में धन की हेराफेरी का आरोप लगाया था और दावा किया था कि राष्ट्रीय शिविर में कोच और खेल विज्ञान कर्मचारी बिलकुल अक्षम थे।

ओलंपिक कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त ने कहा कि यौन उत्पीडऩ के आरोपों के मामले में कोई समझौता नहीं हो सकता। अगर ऐसा हुआ है, तो इसकी जाँच होनी चाहिए और आरोपियों को सज़ा मिलनी चाहिए। अगर आरोप झूठे हैं, तो इसकी जाँच की जानी चाहिए कि उन्हें क्यों लगाया गया और इसके पीछे क्या मक़सद था? हम खेल मंत्रालय और गृह मंत्रालय दोनों के साथ-साथ प्रधानमंत्री को भी रिपोर्ट भेजेंगे।’

सवाल और आरोप

राष्ट्रमंडल स्वर्ण पदक विजेता विनेश फोगाट ने नई दिल्ली के जंतर मंतर पर कई शीर्ष पहलवानों की उपस्थिति में आरोप लगाये। फोगाट ने आरोप में कहा कि महिला पहलवानों का राष्ट्रीय शिविरों में प्रशिक्षकों और डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह द्वारा यौन उत्पीडऩ किया गया है। राष्ट्रीय शिविरों में नियुक्त कोचों में से कुछ वर्षों से महिला पहलवानों का यौन उत्पीडऩ कर रहे हैं। डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष भी यौन उत्पीडऩ में शामिल हैं।

उन्होंने आरोपों में आगे कहा कि यह शोषण हर दिन हो रहा है। लखनऊ में ही क्यों होता है राष्ट्रीय शिविर? हमने प्रधानमंत्री और खेल मंत्री को लिखा है। वहाँ ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि वहाँ उसका घर है और इसलिए लड़कियों का शोषण करना आसान है। वे हमें बहुत परेशान करते हैं। वे हमारे निजी जीवन और रिश्तों में दख़ल देते हैं। वे सब कुछ जानना चाहते हैं।

हरियाणा की रहने वाली विनेश ने कहा कि आरोप लगाने के बाद उन्हें अपनी जान का ख़तरा महसूस हो रहा है। उन्होंने आरोप में आगे कहा- वे (प्रशिक्षक और मंत्री) बहुत शक्तिशाली हो गये हैं। मैंने आज बोला है और मुझे नहीं पता कि इस वजह से मैं कल ज़िन्दा रहूँगा या नहीं। मैं ऐसी 10-20 लड़कियों को जानती हूँ, जिनका पिछले 10 साल में नेशनल कैंप में शोषण हुआ है। वह लड़कियाँ अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर डरी हुई हैं। वे उनके ख़िलाफ़ नहीं लड़ सकतीं, क्योंकि वे शक्तिशाली नहीं हैं। मैं ऐसा कर सकती हूँ, क्योंकि मुझे कोई आपत्ति नहीं है अगर वे मुझे कुश्ती से रोकते हैं। मेरे पास घर है, मेरे पास रोज़ी-रोटी का ज़रिया है। मैं यहाँ इसलिए हूँ, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आने वाली पीढिय़ाँ इस दु:ख और दर्द से गुज़रें। कुश्ती ही हमारी रोज़ी-रोटी का ज़रिया है। वे हमारी रोज़ी-रोटी छीन रहे हैं। हमारा एकमात्र विकल्प मौत है, इसलिए अच्छा कर सकते हैं और मर सकते हैं।’

फोगाट ने बीबीएस सिंह की कथित मनमानी पर कहा- ‘वह मुझे हर चीज़ के लिए मानसिक रूप से प्रताडि़त करता है। कोई भी अनुमति प्राप्त करने के लिए हमें उनके सामने और यहाँ तक कि सहायक सचिव से भीख माँगनी पड़ती है। खिलाड़ी उसे राष्ट्रीय शिविर में जाने के लिए उपहार देते हैं। राष्ट्रीय शिविर में जाने के लिए कोच भी ऐसा ही करते हैं।’

भारत की एकमात्र ओलंपिक पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक ने विनेश के आरोपों का समर्थन किया। उन्होंने कहा- ‘हम सिर्फ़ युवा पहलवानों को बचाने आये हैं। हम उनके लिए लड़ रहे हैं। जब समय आएगा, हम बोलेंगे। हम उन लोगों के नाम देंगे, जिनका शोषण हुआ है और जो भी जाँच कर रहे हैं। विनेश और साक्षी के अलावा विश्व चैंपियनशिप विजेता सरिता मोर, संगीता फोगाट, अंशु मलिक, सोनम मलिक, सत्यव्रत मलिक, जितेंद्र किन्हा, अमित धनखड़ और राष्ट्रमंडल खेलों के पदक विजेता सुमित मलिक भी धरना स्थल पर मौज़ूद थे। क़रीब 30 पहलवान वहाँ विरोध के इकट्ठे हुए थे।

विनेश फोगाट ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी भी इस तरह के शोषण का सामना नहीं किया; लेकिन दावा किया कि जंतर मंतर पर धरने में एक पीडि़ता मौज़ूद थी। उसने कहा कि पीडि़तों के नाम का ख़ुलासा करने से उन्हें ख़तरा होगा और कहा कि यह अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के कारणों में से एक था।

फोगाट ने कहा- ‘अगर हम पीडि़तों के नाम का ख़ुलासा करते हैं, तो यह उनके परिवारों सहित उन्हें ख़तरे में डाल देगा। हम उनकी पहचान का ख़ुलासा नहीं कर सकते, क्योंकि कुछ भी काग़ज़ पर नहीं रखा गया है और इसे अभी तक आधिकारिक नहीं बनाया गया है। हम यहाँ लडऩे के लिए आये थे। हमारी गरिमा ही अगर हमसे छीन ली गयी, तो हमारे विरोध करने का क्या मतलब है? हम सभी जटिल विवरण साझा नहीं कर सकते, क्योंकि यह महिला पहलवानों के स्वाभिमान से जुड़ा एक संवेदनशील मामला है। हम आपके साथ सभी विवरण साझा करेंगे एक बार सब कुछ हमारे लिए आश्वस्त हो जाए।’

उन्होंने कहा कि हम सभी मुद्दों को सामने ला रहे हैं। यदि यह केवल कुश्ती के बारे में होता, तो चर्चा के बाद मामला हल हो जाता। लेकिन यह एक बड़ा मुद्दा है। यह सिर्फ़ एक नहीं, बल्कि कई लड़कियों का मामला है। हम उनकी पहचान का ख़ुलासा नहीं कर सकते हैं और अगर हम करते हैं, तो यह उनके जीवन और परिवारों के लिए ख़तरा होगा।

एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता और अर्जुन पुरस्कार विजेता विनेश ने कहा कि उन्होंने डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बृजभूषण सरन सिंह से टोक्यो ओलंपिक से लौटने के बाद उनसे मिलने का अनुरोध किया था; लेकिन उन्होंने उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। विनेश ने कहा- ‘जब मैं टोक्यो ओलंपिक से वापस आयी तबसे वह मुझसे नहीं मिला है। कई खिलाडिय़ों ने महासंघ को अपने साथ हुए उत्पीडऩ के बारे में लिखा; लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। अगर हम अपने मुद्दे को सार्वजनिक करते हैं, तो डब्ल्यूएफआई प्रमुख अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करेंगे।’

आरोपों से इनकार

जैसा कि अपेक्षित था कि फरवरी, 2019 में लगातार तीसरी बार डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुने गये बीबीएस सिंह ने आरोपों से इनकार किया। क्या कोई कह रहा है कि डब्ल्यूएफआई ने एक पहलवान का यौन उत्पीडऩ किया? विनेश ने ही कहा है। क्या किसी ने आगे आकर कहा है कि उनका व्यक्तिगत रूप से यौन उत्पीडऩ किया गया है? यहाँ तक कि अगर एक पहलवान भी सामने आती है और कहती है कि उसका यौन उत्पीडऩ किया गया है, तो उस दिन मुझे फाँसी दे दें। सिंह ने 21 जनवरी को उत्तर प्रदेश के गोंडा में अपने जवाब देने के लिए एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया था। हालाँकि खेल मंत्री के सुझाव के बाद उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा। उन्होंने मामले को राजनीतिक बताया और कहा कि वह इसका भंडाफोड़ करेंगे।

हालाँकि उस दिन उनके बेटे और गोंडा सदर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा विधायक प्रतीक ने कहा कि डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष 22 जनवरी को खेल निकाय की वार्षिक आम बैठक के बाद उनके ख़िलाफ़ यौन उत्पीडऩ के आरोपों पर एक बयान जारी करेंगे। आरोपों पर प्रतीक ने 22 जनवरी को खेल निकाय की वार्षिक आम बैठक के बाद अपने ब्यान में कहा- ‘मैं यहाँ अपने पिता की ओर से हूँ और मैं आप सभी को सूचित करना चाहता हूँ कि हम 22 जनवरी को डब्ल्यूएफआई की एजीएम के बाद ही एक लिखित बयान जारी करेंगे। हम पूरे भारत के सदस्यों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं और फिर कोई फ़ैसला लेंगे। हम जो भी निर्णय लेंगे, हम एक लिखित बयान के माध्यम से प्रेस को सूचित करेंगे।’

हालाँकि अयोध्या में आयोजित होने वाली एजीएम को खेल मंत्रालय के एक स$ख्त संदेश के बाद रद्द कर दिया गया था, जिसमें डब्ल्यूएफआई को तत्काल प्रभाव से चल रही सभी गतिविधियों को निलंबित करने के लिए कहा गया था। इसमें सिंह के गढ़ उत्तर प्रदेश के गोंडा में रैंकिंग टूर्नामेंट भी शामिल था। मंत्रालय ने निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने के लिए डब्ल्यूएफआई के सहायक सचिव विनोद तोमर को भी निलंबित कर दिया।

डब्ल्यूएफआई कर रहा आरोपी का बचाव

आरोपों का संज्ञान लेते हुए खेल मंत्रालय ने डब्ल्यूएफआई से स्पष्टीकरण माँगा था और उसे अगले 72 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया था। इसके जवाब में भारतीय कुश्ती महासंघ ने कहा कि जिन एथलीटों ने उसके प्रमुख के ख़िलाफ़ यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाये थे, उनका एक छिपा हुआ एजेंडा था।

कुश्ती निकाय ने युवा मामलों के मंत्रालय को एक पत्र में कहा- ‘विरोध पहलवानों के सर्वोत्तम हित में नहीं है और न ही भारत में अच्छी कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए है; लेकिन डब्ल्यूएफआई के मौज़ूदा निष्पक्ष और स$ख्त प्रबंधन को ख़त्म करने के लिए और इस तरह के प्रतिकूल माहौल बनाने की साज़िश के लिए कुछ व्यक्तिगत और साथ ही छिपे हुए एजेंडे हैं, जिनका मक़सद सार्वजनिक रूप से अनुचित दबाव बनाना है।’

कुप्रबंधन के आरोपों का जवाब देते हुए कुश्ती संघ ने कहा कि उसने हमेशा पहलवानों के हित को ध्यान में रखकर काम किया है। संघ ने कहा- ‘डब्ल्यूएफआई को उसके संविधान के अनुसार एक निर्वाचित निकाय द्वारा मैनेज किया जाता है, और इसलिए अध्यक्ष सहित व्यक्तिगत रूप से किसी के द्वारा डब्ल्यूएफआई में मनमानी और कुप्रबंधन की कोई गुंजाइश नहीं है।’

संघ ने आगे कहा- ‘धरने पर बैठ कर और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रदर्शनकारियों / पहलवानों द्वारा अपने आरोप को हवा देने का तरी$का निश्चित रूप से निहित स्वार्थ के लिए कुछ कमज़ोर पहलवानों पर दबाव डालकर या अपने लिए ज़मीन हासिल करने और संघ या उसके अध्यक्ष या कोचों के प्रबंधन को बदनाम और बदनाम करना निहित स्वार्थों की गहरी और बड़ी साज़िश का हिस्सा है और कुछ नहीं।

उसने कहा कि यौन उत्पीडऩ का एक भी आरोप स्वीकार नहीं किया गया है और न ही कभी देखा गया है और न ही पाया गया है और न ही अब तक शिकायत की गयी है और न ही डब्ल्यूएफआई की यौन उत्पीडऩ समिति को सूचित किया गया है। इसलिए इस आशय के आरोप समान रूप से दुर्भावनापूर्ण और निराधार हैं, सिवाय इसके कि मामले में कोई सच्चाई नहीं है। डब्ल्यूएफआई के वर्तमान प्रबंधन के साथ-साथ डब्ल्यूएफआई के मौज़ूदा अध्यक्ष की जनता के बीच प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाने के लिए मीडिया के माध्यम से यह सब किया गया है। डब्ल्यूएफआई ने कहा कि उसने हमेशा खिलाडिय़ों के हित में काम किया है। डब्ल्यूएफआई विशेष रूप से मौज़ूदा अध्यक्ष के तहत डब्ल्यूएफआई ने हमेशा भारत के सर्वोत्तम हित के साथ-साथ पहलवानों के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए काम किया है और मौज़ूदा अध्यक्ष के तहत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती की छवि को बेहतर किया है।

बीबीएस सिंह के कुक विक्की ने कथित तौर पर दिल्ली उच्च न्यायालय में पहलवानों के ख़िलाफ़ एक याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि विनेश विरोध प्रदर्शनों को लेकर डब्ल्यूएफआई प्रमुख को ब्लैकमेल कर रही थी और खिलाड़ी अदालत के बजाय मीडिया के पास गये थे; लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया गया था।

आरोपों पर राजनीति

उत्तर प्रदेश के कैसरगंज से भाजपा सांसद, डब्ल्यूएफआई प्रमुख बीबीएस सिंह के आसपास के विवाद ने जल्द ही राजनीतिक रूप ले लिया क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने उन पर हमला बोला था। सिंह छ: बार सांसद रहे हैं, जिनमें से पाँच बार भाजपा और एक बार सपा के टिकट पर। वे सन् 2009 में समाजवादी पार्टी के साथ थे। सिंह ने पूर्व में गोंडा और बलरामपुर का प्रतिनिधित्व किया है, और अब कैसरगंज से सांसद हैं।

सिंह ने अपनी ओर से विवाद की साज़िश रचने के लिए हरियाणा के राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र हुड्डा को दोषी ठहराया और कहा कि उन पर आरोप लगाने वाले सभी पहलवान एक ही समुदाय से थे। उन्होंने कहा कि दीपेंद्र ने हरियाणा चुनाव में फ़ायदा उठाने के लिए साज़िश रची थी। हालाँकि कांग्रेस नेता ने यह कहते हुए पलटवार किया कि सिंह कहानियाँ गढ़ रहे हैं, क्योंकि उन पर यौन दुराचार का आरोप लगा है। हुड्डा ने विवाद में उनका नाम घसीटने के लिए सिंह पर मानहानि का मुक़दमा करने की भी धमकी दी।

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस प्रभारी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी विरोध कर रहे पहलवानों का समर्थन किया। एक ट्वीट में उन्होंने कहा- ‘हमारे खिलाड़ी देश का गौरव हैं। वे विश्व स्तर पर अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन करते हैं। खिलाडिय़ों ने भारतीय कुश्ती महासंघ और उसके अध्यक्ष पर शोषण के गम्भीर आरोप लगाये हैं और उनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए।’

मीडिया प्रभारी कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मामले पर आश्चर्य जताते हुए कहा- ‘महिलाओं पर अत्याचार करने वाले सभी लोग भाजपा के सदस्य क्यों हैं। कुलदीप सेंगर, चिन्मयानंद, पिता-पुत्र की जोड़ी विनोद आर्य और पुलकित आर्य और अब यह नया मामला! महिलाओं पर अत्याचार करने वाले भाजपा नेताओं की सूची अंतहीन है।’

कांग्रेस नेता ने ट्वीट करके कहा- ‘मिस्टर पीएम! क्या बेटी बचाओ भाजपा नेताओं से बेटियों को बचाने की चेतावनी थी? भारत जवाब का इंतज़ार कर रहा है। आपने कहा था कि पिछले आठ साल में खेलों के लिए एक बेहतर वातावरण बनाया गया है। क्या यह बेहतर माहौल है, जिसमें देश का नाम रोशन करने वाली हमारी बेटियाँ भी असुरक्षित हैं?

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने कहा कि बीबीएस सिंह का इस्तीफ़ा विरोध के पहले दिन ही आना चाहिए था। उन्होंने कहा- ‘यह पहला क़दम होना चाहिए था। अगर कोई और संवेदनशील सरकार होती, तो यह तत्काल हो गया होता। फिर प्रधानमंत्री को एक बयान जारी करना चाहिए और इन परिवारों के विश्वास को बहाल करना चाहिए। हमारे परिवार रूढि़वादी हैं, यह एक कठिन विकल्प है। बच्चों को ट्रेनिंग के लिए भेजना, देश के लिए लडऩा और पदक जीतना।’

कांग्रेस की तरफ़ से प्रमुख मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह और चक्का फेंक खिलाड़ी कृष्णा पूनिया भी भारतीय कुश्ती महासंघ को भंग करने, उसके प्रमुख बीबीएस सिंह को बर्ख़ास्त करने और खेल निकाय में हाल के विवाद पर प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाने के लिए आगे आये।

इन लोगों ने कहा कि डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का आरोप है। यह आरोप एक महिला खिलाड़ी की तरफ़ से लगा है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बेटी बताया था। आज वही बेटी कह रही है कि इस देश में लड़कियाँ पैदा नहीं होनी चाहिए। इससे ज़्यादा दर्दनाक और क्या हो सकता है?

उन्होंने कहा कि एक तरफ़ देश खिलाडिय़ों से पदक की उम्मीद करता है। वहीं दूसरी ओर हमारी बेटियाँ यौन शोषण का शिकार होती हैं। क्या माता-पिता अब अपनी बेटियों को खेलकूद में भेजेंगे? जब हम पदक जीतते हैं तो हर कोई हमारे साथ फोटो खिंचवाना चाहता है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं। डब्ल्यूएफआई को भंग कर देना चाहिए।

याद रहे कृष्णा पूनिया का एक खिलाड़ी के रूप में भारत में एक विशिष्ट रिकॉर्ड था और वह राजस्थान में कांग्रेस के विधायक भी हैं। वह 2008 और 2012 के ओलंपिक में भाग लेने के अलावा पद्म श्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हैं।

उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएफआई पर गम्भीर आरोप हैं। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी शर्मनाक है। आईपीसी के प्रावधानों के तहत मामले में तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। सिर्फ़ खिलाड़ी ही दूसरे खिलाडिय़ों की भावनाओं को समझ सकते हैं। जब मुक्केबाज़ी पर बैठक होती है, तो खिलाडिय़ों को नहीं बुलाया जाता है।

कांग्रेस प्रव$क्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा- ‘विनेश फोगाट ने अक्टूबर 2021 में पूरे मामले से प्रधानमंत्री को अवगत कराया था। उन्होंने अपनी जान को ख़तरे की बात भी कही थी। मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री यह सब जानते थे; लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। वह अभी भी चुप हैं। सर्वोच्च न्यायालय को आरोपों का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और डब्ल्यूएफआई को भंग कर देना चाहिए। राष्ट्रीय महिला आयोग क्या कर रहा है, जो आमतौर पर एक ट्वीट पर कार्रवाई करता है। नेताओं पर इस तरह के कई आरोप लगे हैं; लेकिन उन्होंने कभी कोई कार्रवाई नहीं की।’

कांग्रेस नेता ने विभिन्न खेल निकायों पर शासन करने वाले राजनेताओं के मुद्दे पर भी केंद्र से सवाल किया। श्रीनेत ने कहा कि वह कहते थे कि खेल निकायों में नेताओं का दख़ल नहीं होना चाहिए लेकिन उनके कई नेता ऐसे पदों पर हैं। उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा बैडमिंटन संघ के प्रमुख हैं, रणिंदर सिंह राइफल संघ के प्रमुख हैं, अर्जुन मुंडा तीरंदाज़ी संघ के प्रमुख हैं, जय शाह सचिव बीसीसीआई हैं, दिलीप तिर्की हॉकी महासंघ के प्रमुख हैं और मेघना चौटाला टेबल टेनिस फेडरेशन की अध्यक्ष हैं।

आम आदमी पार्टी के संस्थापक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गयी, जिन पर महिला पहलवानों ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। गम्भीर आरोप लगाये गये हैं; लेकिन न तो इस्तीफ़ा दिया गया है और न ही कोई कार्रवाई हुई है। यह पार्टी और इसकी सरकार महिला खिलाडिय़ों की सुरक्षा के मामले में अपने नेताओं को बचाने में लगी है। यह बेहद शर्मनाक है।

घटनाओं पर प्रतिक्रिया करते हुए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल भाजपा सांसद और कुश्ती महासंघ अध्यक्ष सिंह के ख़िलाफ़ एक नोटिस जारी किया, जिसमें पुलिस उपायुक्त और खेल सचिव से मामले की जाँच करने और विवरण प्रदान करने को कहा।

उधर कांग्रेस के हमले के बाद भाजपा भी सक्रिय हुई। पूर्व पहलवान और भाजपा नेता बबीता फोगाट ने विरोध प्रदर्शनों का राजनीतिकरण करने के ख़िलाफ़ कांग्रेस को चेतावनी दी। एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि पहलवानों की लड़ाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और भाजपा के ख़िलाफ़ नहीं है।

बबीता फोगाट ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए ट्वीट में आगे कहा कि खिलाड़ी फेडरेशन और एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं कांग्रेस पार्टी से कहना चाहती हूँ कि वह अपने फ़ायदे के लिए खिलाडिय़ों के आन्दोलन पर ओछी राजनीति करना बन्द करे। पहलवान बजरंग पुनिया और साक्षी मलिक ने भी इसी तरह की भावनाओं को प्रतिध्वनित किया। हालाँकि उन्होंने किसी विशेष पार्टी का नाम नहीं लिया। पुनिया ने हिंदी में अपने ट्वीट में कहा कि हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है। हम खिलाड़ी महासंघ और उसके अध्यक्ष के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। कोई भी राजनीतिक दल इस आन्दोलन पर राजनीति न करे।

साक्षी मलिक ने कहा कि मी टू आन्दोलन खिलाडिय़ों और खेल के भविष्य के बारे में था। उन्होंने कहा- ‘हमारा आन्दोलन महासंघ और उसके अध्यक्ष के ख़िलाफ़ है। किसी भी राजनीतिक दल को अपने फ़ायदे के लिए इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।’

खिलाडिय़ों से अनैतिकता

सरकार जब ‘खेलो इंडिया’, जो कि खेल के विकास के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है , जिसमें बड़े पैमाने पर भागीदारी और खेलों में उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना है, भारतीय कुश्ती महासंघ एक बदसूरत लड़ाई में उलझा है। तूफ़ान की केंद्र में और कोई नहीं, बल्कि डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह हैं, जो केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद भी हैं। यह बेहद गम्भीर मुद्दा है, क्योंकि ओलंपिक पदक विजेता बजरंग पुनिया, साक्षी मलिक और राष्ट्रमंडल खेलों के पदक विजेता विनेश फोगाट ने आरोप लगाया है कि डब्ल्यूएफआई के ताक़तवर बॉस और कुछ अन्य कोच शिविरों में कई युवा महिला एथलीटों का यौन उत्पीडऩ कर रहे हैं। कुश्ती एक ऐसा खेल है, जो वैश्विक प्रतियोगिताओं में देश के लिए सबसे अधिक पदक ला रहा है। इस तरह की घटनाएँ देश के लिए पदक जीतने की उम्मीद रखने वाली युवा महत्त्वाकांक्षी महिला एथलीटों के सपनों को हमेशा के लिए चकनाचूर कर सकती हैं।

लगातार तीन बार के महासंघ के सांसद अध्यक्ष के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर खेल जगत के दिग्गजों के नेतृत्व में सैकड़ों नवोदित पहलवानों ने प्रदर्शन किया था। अनुभवी पहलवान अपने युवा समकक्षों को समर्थन दे रहे थे, जो शक्तिशाली लॉबी का सामना करने से बहुत डरते थे। दु:खद सच यह है कि अतीत में भी कोचों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोप लगते रहे हैं। हाल में एक जूनियर महिला कोच द्वारा यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाये जाने के बाद हरियाणा के मंत्री संदीप सिंह को खेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था। उन्हें खेल मंत्रालय के प्रभार से वंचित कर दिया गया है; लेकिन विडंबना यह है कि वह मुद्रण और स्टेशनरी पोर्टफोलियो रखने वाले मंत्री बने हुए हैं। पिछले साल एक साइकिलिस्ट ने आरोप लगाया था कि आईओए के कोषाध्यक्ष चाहते थे कि वह अपना कमरा साझा करे और वह विदेशी शिविर छोडक़र चली गयी।

भारतीय ओलंपिक संघ, जिसके साथ डब्ल्यूएफआई संबद्ध है; ने पहलवानों द्वारा अपने अध्यक्ष को एक पत्र भेजे जाने और धरना शुरू करने के बाद आरोपों की जाँच के लिए एक समिति का गठन किया है। इस मामले को संवेदनशीलता के साथ सँभालने की ज़रूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इच्छुक महिला एथलीट जो पहले से ही पीडि़त हैं, उन पर निजता का हनन न हो। अपनी ताक़त के बल पर पहले तो सिंह ने कहा कि वह पद नहीं छोड़ेंगे, केंद्र के दबाव के बाद आख़िर डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष को पद से हटना पड़ा।

हालाँकि खेल प्रशासन में सड़ांध को रोकने के लिए यह पर्याप्त क़दम नहीं है। नवोदित महिला एथलीटों और उनके माता-पिता के बीच अधिक आत्मविश्वास पैदा करने के लिए, भारतीय खेलों को प्राधिकरण के पदों पर अधिक महिलाओं की आवश्यकता है, जो कोच और खेल संघों के प्रमुख के रूप में हों। संरक्षकों के ही यौन शोषण जैसे जघन्य अपराध में शामिल होने से ज़्यादा डरावना और क्या हो सकता है? यौन शोषण एक मनोवैज्ञानिक आघात देता है, जो पीडि़तों को हमेशा के लिए ज़ज़ख़्म दे देता है। खेलों के मामले में यह स्थिति एक दु:खद टिप्पणी है। समय आ गया है कि सभी हितधारक सामने आएँ और इस सड़ी व्यवस्था से छुटकारा पाने के लिए हाथ मिलाएँ। आरोप पुलिस जाँच की माँग करते हैं। ऐसे अपराधों के लिए जीरो टॉलरेंस का आदर्श होना चाहिए। ‘खेलो इंडिया’ जैसी कोई भी पहल तब तक वास्तव में सफल नहीं होगी, जब तक व्यवस्था में सुधार नहीं हो जाता।

                                                                                               

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर केंद्र विफल

दीपक बल्यूटिया

आईएमएफ और वल्र्ड बैंक जैसे संस्थान विश्व भर के देशों के लिए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ‘कंट्री आउटलुक’ जारी करते हैं। इसी व्यवस्था के तहत वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए आईएमएफ और विश्व बैंक द्वारा जो कंट्री आउटलुक जारी किये गये हैं, उसको लेकर भाजपा द्वारा ढोल पीटा जा रहा है कि मोदी सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रबंधन बहुत अच्छे तरीक़े से कर रही है। लेकिन अगर बिना किसी वैमनस्य के भ्रम की परत उठाकर देखा जाए, तो वास्तविकता काफ़ी जटिल नज़र आती है। इसलिए सच्चाई को समझने के लिए हमें अन्य महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर भी नज़र डालनी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व में भाजपा सरकार के पास एक लम्बा कार्यकाल है, इस पहलू को देखकर भी विश्लेषण करने की ज़रूरत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार मई, 2014 में सत्ता में आयी थी, और अगले साल (2024 में) सत्ता में एक दशक पूरा कर लेगी। मोदी सरकार के पास अपने दोनों कार्यकाल में लोकसभा में पूर्ण बहुमत रहा है। अगर देखा जाए, तो मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल में राजनीतिक रूप से कोई बाधा नहीं थी। जब एक दशक तक कोई पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्तासीन है, तब देश की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का आकलन करने का उचित समय है। यह तब और ज़रूरी हो जाता है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सत्ता पर मज़बूत नियंत्रण रहा है, और उन्होंने अपने एकतरफ़ा फ़ैसलों से इसे साबित भी कर दिया है। ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन के लिए सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है।

वित्त वर्ष 2022-23 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ोतरी के पहले अधिकारिक अग्रिम अनुमान को इस वर्ष के लिए सही आँकड़ा मानकर और अगले वर्ष सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर 6 प्रतिशत (वैश्विक सहमति इसी आँकड़े के आस-पास हैं) मान लें, तो मोदी सरकार की औसत विकास दर मात्र 5.5 प्रतिशत प्रति वर्ष होगी। जब सन् 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी थी, तब मोदी से लेकर सरकार में तमाम मंत्री और नेता बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे कि देश की विकास दर जल्द ही 10 प्रतिशत के पार होगी। लेकिन ऐसा कहीं देखने को नहीं मिला; बल्कि इसके उलट हो रहा है।

सरकार की ग़लत आर्थिक नीतियों का बचाव करने वाले कहते हैं कि कोरोना महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। इस तर्क से सरकार के आर्थिक नीतियों का बचाव करने वाले लोगों को याद दिलाने की आवश्यकता है कि 2019-20 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना से अछूती थी, तब भारत के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 3.74 प्रतिशत पर आ गयी थी। मोदी सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए घरेलू आर्थिक चुनौतियों के लिए वैश्विक कारकों को दोष देती है। सरकार को ईमानदार होने की ज़रूरत है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के पहले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन का मुख्य कारण कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट से सरकार को अप्रत्याशित लाभ हासिल हुए थे। कच्चे तेल के दाम अत्यधिक कम होने के बावजूद भी इसके लाभ जनता को नहीं दिये गये थे; बल्कि पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा सरकार ने अपने ख़ज़ाने भर लिये थे।

हमें यहाँ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आँकड़ों पर नज़र डाल लेनी चाहिए, भारत ने कांग्रेस नीत यूपीए दो के शासनकाल 2013-14 में 314.41 बिलियन अमरीकी डॉलर का निर्यात किया था। वहीं 2021-22 भारत का निर्यात 422 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जो पिछले आठ वर्षों में 3.75 प्रतिशत प्रति वर्ष की बेहद कम विकास दर है। इसकी तुलना वियतनाम के साथ की जा सकती है। यदि हम सन् 2014 और सन् 2021 के लिए भारत और वियतनाम से व्यापारिक वस्तुओं के निर्यात पर विश्व बैंक के आँकड़ों को देखें, तो हमें पता चलता है कि वियतनाम के वैश्विक निर्यात को प्रति वर्ष 12.18 प्रतिशत बढ़ोतरी हो रही थी। वहीं भारत केवल 2.95 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से अपने निर्यात को बढ़ा पा रहा था।

इसके अलावा देश में बेरोज़गारी एक विकराल समस्या है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के सामने एक बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार किसी भी सार्थक तरीक़े से रोज़गार पैदा करने में विफल रही है और सरकार की बिना सिर-पैर वाली नीतियों की कारण से भारतीय जनसांख्यिकीय लाभांश को बर्बाद किया जा रहा है और मोदी सरकार भारत के युवाओं की ऊर्जा का इस्तेमाल देश के विकास और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में नहीं कर पा रही है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही स्पष्ट कर दिया था कि वह मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के ख़िलाफ़ है; लेकिन अब कई देशों से मुक्त व्यापार समझौतों के लेकर बात चल रही है।

इस सबसे पता चलता है कि केंद्र की मोदी सरकार के पास देश की आर्थिक नीतियों को लेकर कोई स्पष्ट समझ नहीं है। सरकार देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने से अधिक ध्यान हेडलाइन प्रबंधन में दे रही है। हालाँकि यहाँ हमने आर्थिक विफलता के केवल दो घटकों बात की है; सही मायने में सरकार की विफलता और भी व्यापक है।

मोदी सरकार जवाबदेही से बचने के लिए चतुराई से गोलपोस्ट बदल रही है और लोगों की ध्यान को भटका रही है। सभी को याद है कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था; लेकिन अब जब 2022 समाप्त हो गया है, सरकार यह नहीं बता रही कि देश के कितने किसानों की आय दोगुनी हो गयी है? सरकार ने किसानों की दोगुनी आय पर बात करने के बजाय अमृत-काल पर बात कर रही है और देश का अधिकांश मीडिया सरकार के मूलभूत समस्याओं से ‘ध्यान भटकाओ कार्यक्रम’ में साथ दे रहा है।

केंद्र की मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को सँभालने में विफल रही है, इसकी स्वीकारोक्ति हमें सरकार की हाल में ही शुरू की गयी मुफ़्त खाद्यान्न वितरण योजना से मिलती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में अभी भी एक बड़ा वर्ग बहुत ग़रीब है, और मुफ़्त खाद्यान्न उनके लिए बहुत मायने रखता है। परन्तु प्रधानमंत्री का सार्वजनिक मंच से ‘रेवड़ी कल्चर’ से भारत को नुक़सान की बात करना उनकी विफलता की स्वीकारोक्ति है।

सरकार की विफलता की दूसरी स्वीकारोक्ति गृह मंत्री अमित शाह द्वारा कुछ सप्ताह पहले त्रिपुरा राज्य में दिया गया भाषण है, जिसमें उन्होंने लोगों से अयोध्या में साल 2024 के लिए श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर जाने के लिए टिकट करवाने के लिए कहा। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर बनकर तैयार हो जाएगा। इससे स्पष्ट है कि भाजपा और मोदी सरकार 2024 के आम चुनावों में धार्मिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगी और पिछले एक दशक में आर्थिक उपलब्धियों पर ज़ोर नहीं देगी; क्योंकि उसके पास ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है, जिसको दिखाकर वो आम चुनावों में जा सके।

(लेखक स्तंभकार एवं उत्तराखण्ड कांग्रेस कमेटी के प्रव€ता हैं।)

वर्चस्ववाद की भूख और बढ़ती ग़रीबी

भारत में आर्थिक असमानता की कहानी – ग़रीबों पर बोझ, अमीरों पर मेहरबानी

ऊँचे कहे जाने वाले लोगों का बोझ नीचे के लोगों को कुचल रहा है। आज ज़रूरत इस बात की है कि ऊपर के लोग नीचे दबाने वाले लोगों की पीठ से उतर जाएँ। -महात्मा गाँधी (30 जून, 1944 ई.)

आज जब हम आज़ादी के 75वें वर्ष का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तब भारत के सम्बन्ध में ऑक्सफैम इंटरनेशनल की हालिया रिपोर्ट यह बता रही है कि भारत की 90 फ़ीसदी आबादी को 10 फ़ीसदी अमीरों का बोझ कुचल रहा है। भारत के मात्र 21 सबसे बड़े अरबपतियों के पास देश के 70 करोड़ लोगों की सम्पत्ति से भी ज़्यादा दौलत है। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक बैठक लाओस में 16 जनवरी, 2023 को सम्पन्न हुई, जिसमें ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट : द इंडिया स्टोरी’ शीर्षक रिपोर्ट में यह जानकारी दी।

क्या है ऑक्सफैम इंटरनेशनल?

ऑक्सफैम इंटरनेशनल लगभग 21 स्वतंत्र ग़ैर-सरकारी संगठनों का एक समूह है, जिसका गठन वर्ष 1942 में हुआ था। ऑक्सफैम भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता विषय पर 70 वर्षों से काम कर रही है। ऑक्सफैम का पूरा नाम ऑक्सफैम कमिटी फॉर फेमिन रिलीफ (अकाल राहत के लिए ऑक्सफोर्ड समिति) है। यह लगभग 70 देशों में काम कर रही है।

ऑक्सफैम ने अपनी रिपोर्ट में भारत में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर असमानता की लगातार बढ़ती खाई को विस्तृत ढंग से रेखांकित किया है, जिसके लिए सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। ऑक्सफैम का कहना है कि रिपोर्ट में उल्लेखित आँकड़ों और तथ्यों की पुष्टि अध्येताओं और सरकारी निकायों ने भी की है।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की 60 फ़ीसदी से ज़्यादा सम्पत्ति देश के केवल पाँच फ़ीसदी अमीर लोगों के पास है, वहीं निचले 50 फ़ीसदी लोगों के पास देश की केवल तीन फ़ीसदी सम्पत्ति है। पिछले दो वर्षों में भारत में 64 अरबपतियों का इज़ाफ़ा हुआ है और अरबपतियों की संख्या 102 से बढक़र 166 हो गयी। भारत के 100 अरबपतियों की सम्पत्ति 54.12 लाख करोड़ रुपये हो गयी है, जिससे लगभग डेढ़ साल तक देश के केंद्रीय बजट की पूर्ति की जा सकती है।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में पिछले 10 वर्षों में देश में पैदा हुई सम्पत्ति के ग़ैर-बराबर बँटवारे को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सन् 2012 से सन् 2021 के बीच भारत में जितनी भी सम्पत्ति अस्तित्व में आयी, उसका 40 फ़ीसदी हिस्सा देश के सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोगों के हाथ में गया, जबकि 50 फ़ीसदी जनता के हाथ में केवल तीन फ़ीसदी सम्पत्ति ही आयी।

यह वाक़ई भारत सरकार के आर्थिक स्थिरीकरण के नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जिसमें अमीर अधिक अमीर हो रहे हैं और ग़रीबों को जीवित रहने के लिए अपनी ज़रूरी खपत को कम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सन् 1980 के दशक भारत के टॉप एक फ़ीसदी के हाथों में देश की कुल आय का 6 फ़ीसदी हुआ करता था, आज यह 40 फ़ीसदी से भी ज़्यादा हो चुका है। जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और लिंग के आधार पर बँटे भारत में आर्थिक असमानता बहुत ज़्यादा चिन्ता का विषय होना चाहिए। ऑक्सफैम की रिपोर्ट पर सरकार ने कोई टिप्पणी नहीं की है; लेकिन विपक्ष हमलावर हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ट्वीट कर सरकार को घेरा- ‘भाजपा ने आर्थिक असमानता की खाई को इतना गहरा कर दिया है कि देश का आम इंसान उसमें धँसता जा रहा है। भारत में सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोगों के पास देश की कुल सम्पत्ति का 40 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा है, जबकि आधी आबादी के पास तीन फ़ीसदी ही हिस्सा बचा है! भारत जोड़ो आन्दोलन आर्थिक असमानता की खाई को भरने का आन्दोलन है।’

वहीं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा- ‘भारत जोड़ो यात्रा सरकार की उन नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों की आवाज़ है, जिनसे ग़रीबी बढ़ी है।’ संप्रग ने 20 करोड़ से ज़्यादा लोगों को ग़रीबी से निकाला। प्रधानमंत्री की ग़रीबी बढ़ाओ नीतियों ने उन्हें फिर ग़रीबी में धकेल दिया। मोदी सरकार केवल मुट्ठी भर लोगों के लिए काम कर रही है। भारत जोड़ो यात्रा इन नीतियों के ख़िलाफ़ देश की हुंकार है।’

प्रतिगामी कर प्रणाली

ऑक्सफैम का मानना है कि आर्थिक असमानता तेज़ी से बढऩे के लिए प्रतिगामी कर प्रणाली मुख्य रूप से ज़िम्मेदार है। इस कर प्रणाली में ग़रीब आदमी अधिक टैक्स दे रहा है, जबकि अमीरों से कम टैक्स लिया जा रहा है। 2021-22 में जीएसटी से भारत सरकार ने 14.83 लाख करोड़ रुपये अर्जित किये हैं, जिसमें 64 फ़ीसदी हिस्सा 50 फ़ीसदी सबसे ग़रीब लोगों का है, जबकि मात्र तीन फ़ीसदी हिस्सा 10 फ़ीसदी सबसे अमीर लोगों का है।

सरकार द्वारा उद्योगों को कॉरपोरेट कर के रूप में लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये से 2,00,000 करोड़ रुपये छूट मिलने के पश्चात् उद्योगों ने लोगों को रोज़गार देने के बजाय इस छूट की राशि को आसानी से अपनी जेब में ले लिया, नतीजतन प्रत्यक्ष करों में 5 फ़ीसदी की गिरावट आयी और राजकीय ख़र्च की निर्भरता कॉरपोरेट्स से आयकरदाताओं पर और अप्रत्यक्ष करों पर आ गया। अप्रत्यक्ष कर जैसे जीएसटी और ईंधन कर की बढ़ोतरी से हाशिये के लोगों पर अधिक बोझ पड़ा और ग़रीबों को जीवित रहने के लिए अपनी ज़रूरी खपत को कम करने को मजबूर होना पड़ा, जिससे वे भुखमरी, बेरोज़गारी, महँगाई और स्वास्थ्य आपदाओं का सामना कर रहे हैं। पिछले वर्ष 2021-22 में कॉरपोरेट्स ने रिकॉर्ड 70 फ़ीसदी मुनाफ़ा दर्ज किया, जबकि 84 फ़ीसदी परिवारों की आय में गिरावट आयी।

भेदभाव से बढ़ रही असमानता

वर्ष 1971 के बाद से ही विश्व के अधिकतर देशों में राष्ट्रीय आय में मज़दूरों का योगदान लगातार घटा है, जबकि इसी दौरान मज़दूरों की उत्पादक क्षमता से अमीरों की आय तेज़ी से बढ़ी है। अमीर-ग़रीब असमानता का यह प्रमुख कारण है। लेकिन भारत में इस असमानता के पीछे पूँजीवाद के साथ-साथ भारतीय सामाज का सदियों से शास्त्रगत धार्मिक ढाँचे में रहना भी एक प्रमुख कारण है, जिसके कारण बड़ी आबादी को जातिभेद और अस्पृश्यता का दंश झेलना पड़ा तथा व्यापार करने, शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार से वंचित होना पड़ा।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अभी भी दुनिया के सबसे ज़्यादा 22.89 करोड़ ग़रीब हैं। विरासती सम्पत्ति प्राप्त तथा विशेषाधिकार प्राप्त जातियों से आने वाले सबसे धनी अभिजात वर्ग का नीति निर्माण, शक्ति के केंद्रों और राजनीति पर अनुचित प्रभाव है, जो उन्हें और भी अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। जबकि ऐतिहासिक रूप अस्पृश्य और हाशिये पर धकेले गये लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी ग़रीबी में फँसे हुए हैं। भौतिक दूरस्थता से पीडि़त अनुसूचित जनजाति वर्ग सबसे ज़्यादा ग़रीब है। भारत में अमीर और ग़रीब के बीच स्पष्ट वर्ग अंतर से परे, लिंग, जाति और भौगोलिक स्तरों पर पर्याप्त आय असमानता बनी हुई है।

नतीजतन महिला श्रम को पुरुष श्रम से 37 फ़ीसदी कम वेतन मिलता है, उसी तरह दलित श्रमिक को सवर्ण श्रमिक से 45 फ़ीसदी कम वेतन मिलता है। लैंगिक हाशियाकरण की शिकार महिलाओं एवं थर्ड जेंडरों को समाज में भूमिका स्थापित करने के लिए दोहरी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। थर्ड जेंडर और घुमंतू जातियों / जनजातियों को काम नहीं मिलता है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे क़ानून के बावजूद आज भी अधिकतर महिलाओं को विरासत की सम्पत्ति से वंचित रखा जाता है। ग़रीब महिलाओं, विशेष रूप से हाशिये की जातियों को अक्सर ऐसे काम में लगाया जाता है, जिसमें सम्मान की कमी होती है और जो अमानवीय है। उदाहरण के लिए मैला ढोने के अपमानजनक व्यवसाय में धकेले जाने वाले लोगों में दलित महिलाओं की एक बड़ी संख्या है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की हाल की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में कुल बेरोज़गारों की संख्या पाँच करोड़ पार कर चुकी है। एनसीआरबी की सन् 2021 रिपोर्ट के अनुसार भारत में 115 दिहाड़ी मज़दूर प्रति दिन आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। साल भर में 41,975 दिहाड़ी मज़दूर अपने उन हाथों से अपना ही गला घोटने पर मजबूर कर दिये गये जिन्हें अपने हाथों से इस दुनिया को ख़ूबसूरत बनाना था। भारत किसानों की आत्महत्या के मामले में अच्छा-ख़ासा नाम कमा चुका है। भारत बढ़ती ग़रीबी और एक सम्पन्न अभिजात वर्ग के साथ दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक है। इस दुष्चक्र को तोड़े बिना आर्थिक असमानता को ख़त्म करना मुश्किल होगा।

जनहित कार्यक्रमों के बजट में कटौती

सरकार ने आर्थिक-सामाजिक असमानता दूर करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को धता बताकर उचित शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचा प्रणाली तथा सामाजिक न्याय के उद्देश्यों से जुड़ी योजनाओं के बजटीय आवंटन में कठोरतापूर्वक लगातार कटौती की है।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन को देखें, तो यह 2017-18 के 3.30 फ़ीसदी से घटकर 2022-23 के बजट अनुमान में 2.35 फ़ीसदी हो गया है। 2021-22 में कक्षा 1 से 8 तक जाने वाले छोटे बच्चों की ड्रॉपआउट दर लगभग दोगुनी हो गयी है और हाशिये के तब$के के बच्चों के लिए दर अधिक है, ख़ासकर माध्यमिक शिक्षा स्तर पर। बस्ती के 5 किलोमीटर के दायरे में माध्यमिक विद्यालयों की अनुपलब्धता के कारण लड़कियों के लिए विद्यालय जाना वास्तव में कठिन हो जाता है। हाल के एक भाषण में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि 15 करोड़ बच्चें स्कूली शिक्षा हासिल करने से वंचित हैं। ड्रॉपआउट की उच्च दर और स्कूली बच्चों की भारी संख्या के बावजूद, पिछले 10 वर्षों में माध्यमिक शिक्षा पर सरकारी व्यय बिना किसी बढ़ोतरी के सकल घरेलू उत्पाद के एक फ़ीसदी पर स्थिर है। देश में स्कूलों में कुल 19 फ़ीसदी शिक्षकों के पद ख़ाली हैं। इनमें से 69 फ़ीसदी रिक्तियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। प्राथमिक विद्यालय में ही 837592 पद रिक्त हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मार्च 2022 की रिपोर्ट के अनुमानों के अनुसार, स्वास्थ्य पर उच्च ओओपी व्यय (लोगों के जेब से ख़र्च) हर साल लगभग 5.5 करोड़ भारतीयों को ग़रीब बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय परिवारों ने ओओपी व्यय के तहत स्वास्थ्य सेवाओं पर 2,87,573 करोड़ रुपये ख़र्च किये, जो कुल स्वास्थ्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा है और सरकार के स्वास्थ्य बजट से लगभग 45,000 करोड़ रुपये अधिक है। भारतीय अपने चिकित्सा व्यय का 63 फ़ीसदी ओओपी देते हैं, जो विश्व में सबसे अधिक माना जाता है।

ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार, भारत सबसे कम सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च वाले देशों में शामिल है। 2020-21 के अनुमानों से पता चलता है कि जीडीपी के फ़ीसदी के रूप में सरकारी स्वास्थ्य व्यय 2.1 फ़ीसदी है, जो नीतिगत बेंचमार्क 2.5 फ़ीसदी और वैश्विक औसत 6 फ़ीसदी से बहुत कम है। यह कम बजट व्यय न केवल भारत में समग्र स्वास्थ्य की निम्न स्थिति में बल्कि विभिन्न आर्थिक और सामाजिक समूहों में स्वास्थ्य सम्बन्धी असमानताओं को प्रकट करता है।

हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि जाति और जीवन प्रत्याशा भी गहन रूप से जुड़े हुए हैं। उच्च जाति की महिला की तुलना में औसत दलित महिला की मृत्यु 14.6 वर्ष पहले हो जाती है। भारत में आदिवासियों की जीवन प्रत्याशा भी ग़ैर-आदिवासी आबादी की तुलना में लगभग तीन वर्ष कम है। रिपोर्ट में बताया गया है कि देश की 75 फ़ीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है; लेकिन 31.5 फ़ीसदी अस्पताल ही वहाँ उपलब्ध हैं, और वहाँ के सिर्फ़ 16 फ़ीसदी अस्पतालों में बिस्तर है। ग्रामीण क्षेत्रों के 21.8 फ़ीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं हैं, जबकि 67.96 फ़ीसदी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य सेवा में कम बजट आवंटन का विभिन्न स्तरों पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए भारत में बाल कुपोषण का एक बड़ा बोझ है। भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु के लिए कुपोषण को प्रमुख जोखिम कारक पाया गया है। यह निराशाजनक है कि देश में लगभग 42 फ़ीसदी जनजातीय बच्चे कुपोषित हैं। भारत में जनजातीय स्वास्थ्य पर सरकार की समिति के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जनजातीय स्वास्थ्य देखभाल के लिए प्रति व्यक्ति व्यय को बढ़ाकर 2447 रुपये किया जाना चाहिए। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने पुष्टि की है कि भारत में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें 17.7 लाख गम्भीर रूप से कुपोषित हैं। हालाँकि ग़ैर-सरकारी संगठनों का अनुमान सरकारी अनुमान से बहुत अधिक है।

महँगाई अनियंत्रित

अनियंत्रित महँगाई के कारण भारत में ग़रीब अपने आवश्यक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्षरत हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, अक्टूबर 2021 में पेट्रोल की क़ीमत में 54 फ़ीसदी टैक्स था, जबकि डीजल में 49 फ़ीसदी, जिससे आवश्यक वस्तुएँ असमान रूप से महँगी हो गयीं, जो ग़रीबों और वंचितों के लिए अभिशाप बन गया।

ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार, महँगाई बढऩे से अमीरों की तुलना में ग़रीबों पर अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय बोझ होता है, जिसके परिणामस्वरूप समाज का ध्रुवीकरण होता है, अमीर अधिक अमीर हो जाते हैं और ग़रीब अधिक शक्तिहीन हो जाते हैं। धन की कमी के कारण 70 फ़ीसदी भारतीय संतुलित आहार नहीं ले पाते, पोषण-रहित आहार लेने से बीमार होने के कारण हर साल 17 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। देश का औसत वेतन केवल बुनियादी जीविका प्रदान करने के लिए पर्याप्त है और एक सप्ताह की आय खोने से अधिकतर आबादी भुखमरी की कगार पर चली जाती है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश की सहरिया जनजाति, जो पहले से ही गम्भीर कुपोषण से ग्रस्त है; वस्तुओं की क़ीमतों में लगातार वृद्धि के कारण बेहद कमज़ोर हो गयी है।

आर्थिक असमानता से कैसे लड़ें?

हमारे राष्ट्र निर्माता आंबेडकर, गाँधी, नेहरू देश की ग़रीबी के प्रति सचेत थे। आज़ादी के समय से ही वे जानते थे कि अगर देश में ग़रीबी अपनी जड़ें जमाये रही, तो भारत एक ख़ुशहाल देश कभी नहीं बन पाएगा और इस तरह आज़ादी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसीलिए उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों के ज़रिये आर्थिक-सामाजिक असमानता दूर करने के उपाय किये। आंबेडकर मानते थे कि ग़रीबी ईश्वरीय प्रकोप नहीं है, सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों द्वारा ग़रीबी का अन्त सम्भव है। गुन्नार मिर्डल, अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी जैसे अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि राजकीय प्रयासों से ग़रीबी हटाया जा सकता है।

ऑक्सफैम का मानना है कि यदि सरकार आर्थिक असमानता को कम करना चाहती है तो प्रतिगामी कर प्रणाली को बदलना होगा। सबसे अमीर एक फ़ीसदी की सम्पत्ति पर अधिक कर लगाना होगा, क्योंकि सबसे धनी अभिजात वर्ग का नीति निर्माण और राजनीति पर अनुचित प्रभाव है, जो उन्हें और भी अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दुष्चक्र को तोडऩे के लिए सबसे अमीर एक फ़ीसदी अमीरों की शुद्ध सम्पत्ति पर अलग से कर लगाने से देश के शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण जैसे कार्यक्रमों को निर्बाध रूप से संचालित किया जा सकता है। साथ ही आवश्यक वस्तुओं एवं ईंधन पर जीएसटी और वैट जैसे अप्रत्यक्ष करों को कम करना होगा, ताकि ग़रीबों और वंचितों पर कर का बोझ कम हो सके।

ऑक्सफैम के अनुसार, भारत सरकार को स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को सार्वभौमिक बनाने के लिए जीडीपी का 3.8 फ़ीसदी (5.5 लाख करोड़ रुपये) ख़र्च करने की आवश्यकता है। शीर्ष 100 भारतीय अरबपतियों पर 10 फ़ीसदी कर लगाने से यह राशि पूरी हो जाएगी। भारत के शीर्ष 10 अरबपतियों पर 5 फ़ीसदी कर लगाने से पाँच वर्षों के लिए जनजातीय स्वास्थ्य देखभाल की पूरी लागत को कवर करने में मदद मिलेगी। वित्त वर्ष 2022-23 में समग्र शिक्षा के लिए फंड 2021-22 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा माँगी गयी राशि (58,585 करोड़ रुपये) की तुलना में बहुत कम (37,383 करोड़ रुपये) था। सबसे धनी 10 अरबपतियों पर एक फ़ीसदी कर लगाना इस कमी को 1.3 वर्षों के लिए पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। केवल एक अरबपति, गौतम अडानी पर 2017-2021 के बीच एकमुश्त कर लगाकर 1.79 लाख करोड़ रुपये जुटाया जा सकता था, जो प्राथमिक विद्यालयों के 50 लाख से अधिक शिक्षकों को एक वर्ष के लिए तनख़्वाह देने के लिए पर्याप्त था।

इधर हिंडनबर्ग ने एक ट्वीट में लिखा है कि अडानी ने हमारे द्वारा उठाये गये एक भी मुद्दे को सम्बोधित नहीं किया है, हमने उनसे 88 सवाल पूछे थे, जिसमें से एक का भी जवाब अडानी ग्रुप ने नहीं दिया है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद भारत में अडानी की सात सूचीबद्ध समूह कम्पनियों के निवेशकों का दो ही दिन में लाखों करोड़ का नुक़सान हुआ, जो लगातार हो रहा है। लेकिन फिर भी अडानी ग्रुप कह रहा है कि अमेरिकी निवेश फर्म की रिपोर्ट दुर्भावनापूर्ण और चुनिंदा ग़लत जानकारी पेश कर रही है। इस बयान पर हिंडलबर्ग ने अडानी ग्रुप को यूएस कोर्ट में आने की चुनौती दी है।

अतीत में आर्थिक असमानता और बेरोज़गारी को दूर करने के लिए अमेरिका में ऐसा क़दम उठाया जा चुका है, जब अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने पूँजीपतियों के शुद्ध आय पर कुल 94 फ़ीसदी का कर लगा दिया। और इस राशि से बेरोज़गारों को रोज़गार देने तथा असमानता ख़त्म करने वाले कार्यक्रम चलाने में ख़र्च किया गया, जिसका आगे चलकर सकारात्मक परिणाम देखने को मिले।

(लेखक सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

चुनाव, यात्रा और विपक्षी एकता

तीन पूर्वोत्तर राज्यों में चुनाव के साथ ही राजनीतिक दल सक्रिय

नये साल की शुरुआत तीन पूर्वोत्तर राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ हुई है। इसमें दो बड़े इम्तिहान होंगे। एक भाजपा को जीत के सिलसिले को उन राज्यों में आगे बढ़ाना है, जहाँ उसके लिए बड़ी चुनौतियाँ हैं।

दूसरे कांग्रेस को जो अपने नेता राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद पार्टी के मज़बूत होने का दावा कर रही है; भले यात्रा इन राज्यों में नहीं गयी थी। धीरे-धीरे देश में भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरे मोर्चे की भी हल्की-सी सक्रियता दिखने लगी है, जिसके लिए फ़िलहाल तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव सक्रिय हैं। भले उन्हें टीएमसी की ममता बनर्जी और जद(यू) के नीतीश कुमार का समर्थन नहीं मिला है। हालाँकि यह भी सच है कि के.सी.आर. के साथ दिख रहे दलों का चुनाव वाली इन तीन राज्यों में कोई वजूद नहीं है और उनकी सक्रियता 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर अधिक दिखती है।

भाजपा ने जनवरी के तीसरे हफ़्ते दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर चुनावी रणनीति बनाने की शुरुआत कर दी है। पार्टी ने एक और बड़ा फ़ैसला वर्तमान अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के कार्यकाल को एक साल और बढ़ाने का किया है।

सक्रिय कांग्रेस भी है, जिसने चुनाव की घोषणा के साथ ही त्रिपुरा में माकपा के साथ गठबंधन किया है। इन तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में क्षेत्रीय दलों के साथ दो बड़े दलों भाजपा और कांग्रेस की भी जंग होगी। दिलचस्प यह है कि तीनों ही राज्यों में 60-60 सीटें हैं और वहाँ अक्सर बहुमत का काँटा फँस जाता है।

तीन राज्यों में चुनाव जल्द

चुनाव आयोग के मुताबिक, त्रिपुरा में 16 फरवरी, जबकि नागालैंड और मेघालय में 27 फरवरी को मतदान होगा। त्रिपुरा में भाजपा सत्ता में है, तो नागालैंड में एनडीपीपी की नेफ्यू रियो के नेतृत्व वाली, जबकि मेघालय में एनपीपी के कोनराड संगमा की सरकार है। इन दोनों राज्यों में भाजपा सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है। नागालैंड विधानसभा का कार्यकाल 12 मार्च, मेघालय विधानसभा का 15 मार्च और त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल 22 मार्च को पूरा हो जाएगा।

त्रिपुरा में भाजपा ने पहली बार सन् 2018 में सत्ता पर क़ब्ज़ा किया था। तब भाजपा ने वहाँ पिछले 25 साल से सत्तारूढ़ वामपंथी सरकार को बाहर किया था। भाजपा सरकार का नेतृत्व बिप्लब देब को मिला। हालाँकि चार साल बाद 2022 में भाजपा ने देब को हटाकर मानिक साहा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। साह पर अब कांग्रेस-माकपा गठबंधन की चुनौती का सामना करके भाजपा को दोबारा सत्ता में लाने की ज़िम्मेदारी है।

यदि त्रिपुरा का क्षेत्रीय गुणाभाग देखें, तो पश्चिम त्रिपुरा में सर्वाधिक 14 सीटें हैं और भाजपा का यह गढ़ कहा जा सकता है, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में इसी इलाक़े में भाजपा ने अपने सहयोगी के साथ मिलकर सभी सीटों पर क़ब्ज़ा कर लिया था। इनमें भाजपा 12 सीटों पर, जबकि दो पर सहयोगी आईपीएफटी जीती थी। उधर सिपाहीजाला में माकपा और भाजपा में मुक़ाबला तो हुआ था; लेकिन माकपा ने नौ में से पाँच सीटें जीतकर अपना दबदबा बनाया था। भाजपा ने भी वहाँ तीन, जबकि आईपीएफटी ने एक सीट जीती थी।

त्रिपुरा का तीसरा इलाक़ा गोमती है, जहाँ सात सीटें हैं। इनमें पाँच भाजपा ने जीत ली थीं, जबकि दक्षिण त्रिपुरा की सात में से तीन सीटें उसके हिस्से आयी थीं। धलाई क्षेत्र में भाजपा छ: में से पाँच पर क़ब्ज़ा करने में सफल रही, जिससे वह राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। सिर्फ़ उत्तरी हिस्से उनाकोटी में भाजपा और माकपा ने बराबर सीटें जीती थीं; लेकिन इससे माकपा भाजपा को पहली बार राज्य में सत्ता में आने से नहीं रोक पायी।

उस चुनाव में भले भाजपा बहुत मज़बूत होकर उभरी थी; लेकिन समय के साथ वहाँ उसके ताक़तवर क़िले में दरारें आती दिखी हैं। सियासी उथल-पुथल ने भाजपा की चिन्ता बढ़ायी है। भाजपा ने जब उसे सत्ता में लाने वाले बिप्लब कुमार देब को हटाया, तो उसके बाद कई बड़े नेता पार्टी से अलग हो गये। इनमें हंगशा कुमार शामिल हैं, जो पिछले साल अगस्त में अपने आदिवासी समर्थकों के साथ टिपरा मोथा में चले गये। आदिवासी अधिकार पार्टी भाजपा विरोधी राजनीतिक मोर्चा बना रही है। त्रिपुरा में सबसे बड़ी राजनीतिक घटना जनवरी में माकपा और कांग्रेस के बीच हुआ चुनावी गठबंधन है। दोनों दल एक-दूसरे के घोर विरोधी रहे हैं; लेकिन भाजपा की ताक़त कमज़ोर करने के लिए साथ आ गये हैं। निश्चित ही इससे दोनों की ताक़त बढ़ी है और भाजपा के लिए चुनौती बनेंगे।

राज्य में ग्रेटर टिपरालैंड का मुद्दा भी काफ़ी गर्म रहा है। हाल में त्रिपुरा के राजनीतिक दल इंडिजनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के प्रमुख देबबर्मा ने अलग राज्य ग्रेटर टिपरालैंड की माँग के लिए समर्थकों के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना देने की बात कही थी। देबबर्मा एनईडीई के संयोजक हिमंत बिस्वा सरमा के साथ बैठक कर चुके हैं। इसमें देबबर्मा ने ग्रेटर टिपरालैंड की माँग से कोई भी समझौता करने से इनकार किया था।

अभी तक पूर्वोत्तर में भाजपा की रणनीति सँभाल रहे किरण रिजिजू, जो मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री और अरुणाचल प्रदेश से हैं; के अलावा असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को भाजपा नेतृत्व ने काफ़ी सक्रिय किया है। पार्टी ने उन्हें एनईडीए का संयोजक बनाया है। भाजपा ने त्रिपुरा के लिए नेताओं की अलग टीम बनायी है, जबकि मेघालय में पार्टी ने अकेले लडऩे का फ़ैसला किया है। दिल्ली में रणनीति को लेकर हाल में हिमंत बैठक कर चुके हैं। हिमंत हाल के महीनों में भाजपा नेतृत्व के बीच अपना क़द ऊँचा करने में सफल रहे हैं, जिसका विशेष कारण यह भी है कि वह कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ बहुत तीखे बयान देते रहे हैं, जिनमें एक यह भी था कि राहुल गाँधी की सूरत आजकल ईराक के दिवंगत तानाशाह सद्दाम हुसैन से कई थी, जिसकी विपक्ष ने काफ़ी आलोचना की थी। सरमा लगातार भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और अमित शाह को फीडबैक देते हैं, जो ख़ुद भी चुनावी राज्यों का दौरा कर रहे हैं। सरमा के मुताबिक, एनडीए के हिस्से के रूप में भाजपा और एनडीपीपी ने नागालैंड चुनाव के लिए सीटों को अन्तिम रूप दे दिया है। एनडीपीपी 40 सीटों, जबकि भाजपा 20 सीटों पर लड़ेगी। अमित शाह के साथ साथ भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा नागालैंड का दौरा कर चुके हैं। उसी दौरान एनडीपीपी के साथ 20:40 के वोट शेयर के साथ चुनावी मैदान में उतरने की बात हुई थी। नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो की एनडीपीपी पार्टी भाजपा के साथ कैसा प्रदर्शन करेगी, यह तो नतीजों से पता चलेगा।

साल 2018 के चुनाव से पहले नागालैंड में सत्तारूढ़ नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) दो-फाड़ हो गयी थी। एक गुट (बाग़ी) ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) बना ली। वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री रहे नेफ्यू रियो बाग़ी गुट के साथ गये जिससे वह मज़बूत हो गया। चुनाव से पहले एनपीएफ ने वहाँ भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया और भाजपा-एनडीपीपी मिलकर चुनाव में उतरे। एनडीपीपी को 17 और भाजपा को 12 सीटें मिलीं। सत्ता में नेफ्यू को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद बड़े घटनाक्रम में नेफ्यू रियो के मुख्यमंत्री बनने के बाद 27 सीट जीतने वाली एनपीएफ के ज़्यादातर विधायक एनडीओपीपी में दलबदल कर गये, जिससे सरकारी पक्ष की संख्या 42 हो गयी। एनपीएफ के पास महज़ चार विधायक बचे। लिहाज़ा उसने भी सत्तारूढ़ गठबंधन को समर्थन दे दिया। अब जो सरकार वहाँ हैं, उसके 60 में 60 विधायक सत्ता में हैं। देश में किसी राज्य में ऐसा नहीं है। इस बार देखना है कि एनपीएफ का क्या रोल रहता है? क्योंकि वह सूबे की सबसे बड़ी पार्टी रही है। उसके नेता कुझोलुजो निएनु ने हाल में कहा था कि एनपीएफ अपने दम पर चुनाव लडऩे में सक्षम है।

तीसरे पूर्वोत्तर मेघालय में भाजपा अकेले मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में कांग्रेस वहाँ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। बहुमत से दूर रहने के कारण वह सरकार नहीं बना पायी, जिसके बाद भाजपा ने नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के साथ गठबंधन कर लिया और सरकार बना ली। वैसे चुनाव में दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़े थे। ज़्यादा सीटें होने के कारण एनपीपी के कोनराड संगमा मुख्यमंत्री बने। इस बार चुनाव से पहले राज्य में राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ है, क्योंकि वहाँ गठबंधन सहयोगियों एनपीपी और भाजपा में जंग चली हुई है। एनपीपी भाजपा से स$ख्त नाराज़ है; क्योंकि उसके दो विधायक हाल में पार्टी छोडक़र भाजपा में चले गये हैं। अब दोनों सहयोगी अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। भाजपा नेतृत्व ने हाल के महीनों में पार्टी संगठन को राज्य में मज़बूत किया है। एक अन्य घटना चक्र में चुनाव की घोषणा से ऐन पहले पाँच विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्ती$फा दे दिया था। ये सभी नेता यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीएफ) में शामिल हो गये हैं।

मेघालय में भी 60 विधानसभा सीटें हैं। सन् 2018 में यहाँ 59 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 21 सीटें सीटों पर जीत हासिल हुई है। एनपीपी दूसरी बड़ी पार्टी के रूप में सामने आयी, जिसके खाते में 19 सीटें थीं। भाजपा को महज़ दो सीटें मिली थीं, जबकि यूडीपी को छ: सीटें। राज्य में कांग्रेस के अलावा तृणामूल कांग्रेस (टीएमसी) की भी मज़बूत ज़मीन है। क्षेत्रीय दलों में नेशनल पीपुल्स पार्टी, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट, हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, गारो नेशनल काउंसिल, खुन हैन्नीवट्रेप राष्ट्रीय जागृति आन्दोलन, नार्थ ईस्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, मेघालय डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे दल हैं। भाजपा यहाँ ख़ुद को और मज़बूत करने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने पिछली बार कांग्रेस के सरकार न बना पाने के कारण नेशनल पीपुल्स पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार बनायी थी। कांग्रेस के लिए वहाँ चुनौती बनी हुई है। उसके कई विधायक हाल के महीनों में ममता बनर्जी की टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। टीएमसी कितना ज़ोर मार पाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। हालाँकि यह नहीं कहा जा सकता है कि कांग्रेस अपने विरोधियों के लिए मैदान खुला छोड़ देगी।

यह दिलचस्प ही है कि पूर्वोत्तर राज्यों में आज जो भी मुख्यमंत्री हैं, वह सभी कांग्रेस में ही रहे हैं। सात में से पूर्वोत्तर के पाँच राज्यों के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (असम), माणिक साहा (त्रिपुरा), एन. बीरेन सिंह (मणिपुर), पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश), नेफियू रियो (नागालैंड) कांग्रेस के पूर्व नेता हैं। अब यह सभी नेता भाजपा के नेतृत्व में हैं। कांग्रेस के विधायकों के एनपीपी और टीएमसी में जाने से उसकी स्थिति कमज़ोर हुई है, क्योंकि चुनाव में जाते हुए उसके पास सिर्फ़ दो विधायक ही हैं। दिलचस्प यह है कि पार्टी इस बार अकेले मैदान में उतर रही है।

सक्रिय रहेंगे राहुल गाँधी

राहुल गांधी, भारत जोड़ो यात्रा

राहुल गाँधी भारत जोड़ो यात्रा के बाद चुप होकर नहीं बैठने वाले। भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस ने अपना अगला कार्यक्रम घोषित कर दिया है। दूसरे अभियान में कांग्रेस ने हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने इसके लिए बाक़ायदा दिल्ली में ‘हाथ से हाथ जोड़ो’ अभियान का लोगो और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एक चार्जशीट जारी की है।

कांग्रेस प्रव$क्ता जयराम रमेश ने कहा- ‘हाथ से हाथ जोड़ो अभियान भारत जोड़ो अभियान का दूसरा चरण है। भारत जोड़ो अभियान में विचारधारा के आधार पर राहुल गाँधी ने मुद्दे उठाये। उसका चुनाव से लेना-देना नहीं था। हाथ से हाथ जोड़ो अभियान में हमारा निशाना मोदी सरकार की विफलताएँ हैं, ये 100 फ़ीसदी राजनीतिक अभियान होगा। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के मुताबिक, भारत जोड़ो यात्रा के ऐतिहासिक कार्यक्रम के 130 दिनों में कांग्रेस को देश की जनता से पर्याप्त इनपुट मिला।

उन्होंने कहा- ‘पैदल चलते हुए लाखों लोगों ने राहुल गाँधी से बात की। हम उनके दर्द को समझ सकते हैं, जो वह मोदी सरकार के कुशासन के कारण झेल रहे हैं।’

घोषणा के मुताबिक, कांग्रेस का ‘हाथ से हाथ जोड़ो’ अभियान 26 जनवरी से शुरू हो गया। पार्टी नेताओं भारत जोड़ो यात्रा का संदेश आम लोगों तक पहुँचाने के लिए ये घर-घर अभियान चलाया जाएगा। उनके मुताबिक, ज़रूरत पडऩे पर संबंधित प्रदेश कांग्रेस समितियाँ भी भाजपा या अन्य राज्य सरकारों के ख़िलाफ़ चार्जशीट जारी करेंगी। इसके बाद भी कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा बड़ा चरण शुरू करने की तैयारी कर रही है, जो देश के कई हिस्सों से गुज़रेगी। ज़ाहिर है कांग्रेस ने ठान लिया है कि अगले चुनाव में किसी भी तरह अपनी वापसी करनी है।

क्या तीसरा मोर्चा बनेगा?

चंद्रशेखर राव, पिनरार्इ विजयन, भगवंत मान, अखिलेश यादव, डी राजा, अरविंद केजरीवाल

अभी तक ठंडे पड़े तीसरे मोर्चे में भी जान आने लगी है। शुरुआती कोशिश है; लेकिन शुरुआत हुई है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के प्रमुख के चंद्रशेखर राव (के.सी.आर.) आंध्र प्रदेश की सीमा से लगते ने राज्य के सीमावर्ती खम्मम में जनवरी के तीसरे हफ़्ते रैली की। ख़ास बात यह रही कि इसमें उन दलों के बड़े नेता भी शामिल हुए, जिन्होंने अपने इलाक़ों में आने पर राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से दूरी बनायी थी। इनमें प्रमुख नाम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का माना जा सकता है। लेकिन भले के.सी.आर. ने अपनी पार्टी का नाम राज्य से राष्ट्रीय कर लिया हो, उनकी राह आसान नहीं। उनकी महत्त्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है, यह तभी ज़ाहिर हो गया था जब कुछ महीने पहले उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति की जगह भारत राष्ट्र समिति रख लिया था। दरअसल राव तेलंगाना के अलावा पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में भी अपनी पार्टी की उपस्थिति बढ़ाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरने का है। इसलिए उन्होंने रैली के लिए आंध्र प्रदेश की सीमा से लगते खम्मम को चुना।

दरअसल खम्मम बहुत पहले वामपंथियों का गढ़ था। धीरे-धीरे वामपंथी वहाँ से निपट गये तो यह कांग्रेस का मज़बूत क़िला बन गया। दिलचस्प यह है कि राव की इस रैली में वामपंथी दलों के नेता भी शामिल हुए। जब वृहद आंध्र प्रदेश का अस्तित्व था, तब राव ही राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरा थे। लेकिन आंध्र प्रदेश से जब तेलंगाना को अलग राज्य बना दिया गया, तब राव ने कांग्रेस छोडक़र अपनी पार्टी टीआरएस बना ली। कांग्रेस अब दोनों राज्यों में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

सन् 2018 की बात करें, तो साझे खम्मम ज़िले में 10 सीटों में से राव की टीआरएस को सिर्फ़ एक सीट विधानसभा चुनाव में मिली थी। वहाँ कांग्रेस छ: सीटें जीतने में सफल रही थी; लेकिन उसके यह विधायक और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के वहाँ से जीते दो विधायक टीआरएस (अब बीआरएस) में शामिल हो गये। अब राव यहाँ अपना अपना जनाधार बढ़ाना चाहते हैं। दिलचस्प यह है कि तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी दिसंबर के दूसरे पखवाड़े में वहाँ दो रैलियाँ की थीं। नायडू ख़ुद को ताक़तवर करने के लिए तेलंगाना में प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने जनता से अपनी पार्टी के लिए समर्थन माँगा था। एक समय नायडू अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। लिहाज़ा कहा जा सकता है कि अन्य दलों को साथ जुटाकर राव ने नायडू को जवाब देने की कोशिश भी की है।

खम्मम आजकल इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआरसी अध्यक्ष वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की बहन वाई.एस. शर्मिला खम्मम के पालेयर हलक़े से विधानसभा चुनाव लडऩे का ऐलान कर चुकी हैं। तीसरे मोर्चे के लिए राव की पहली बड़ी कोशिश खम्मम की रैली को माना जा सकता है। राव अपनी रैली में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, केरल के मुख्यमंत्री और माकपा नेता पिनराई विजयन, सपा नेता व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता डी. राजा को बुलाने में सफल रहे। उधर कभी कांग्रेस के साथ कर्नाटक की सत्ता में सहयोगी रहे जनता दल (सेक्युलर) के नेता एच.डी. कुमारस्वामी की पार्टी की तरफ़ से राव को कहा गया कर्नाटक में ‘पंचरत्न रथ यात्रा’ के चलते उनके नेता रैली में शामिल नहीं हो पाये।

आंध्र और तेलंगाना की राजनीति को समझने वाले जानकारों का मानना है कि राव वास्तव में भाजपा की बढ़ती ताक़त से मुक़ाबला करने के लिए राज्य के लोगों के बीच अपनी छवि राष्ट्रीय नेता की बनाना चाहते हैं। गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा लगातार तेलंगाना के दौरे कर रहे हैं और पार्टी को उम्मीद है कि वह वहाँ अपना आधार बनाने में सफल होगी। राव के लिए वैसे अपनी पार्टी के भीतर उभरे मतभेद और गुटबाज़ी से भी परेशानी है। हाल में खम्मम इलाक़े के ताक़तवर नेता श्रीनिवास रेड्डी की भाजपा में जाने की जबरदस्त चर्चा रही है। वह 10 जनवरी को दिल्ली में भाजपा दिग्गज अमित शाह से मिले थे। रेड्डी सांसद रह चुके हैं और जनता में उनकी अच्छी पैठ है। कहा जा सकता है कि भाजपा गहन रणनीति अपनाकर चल रही है। हालाँकि राव देश के बड़े नेताओं में से एक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी को अपने मंच पर नहीं ला पाये। ममता बनर्जी ख़ुद विपक्ष की धुरी बनने की दिशा में काम करती रही हैं। लिहाज़ा उनके साथ नहीं आने से राव को झटका लगा है। वैसे राव ने इस रैली में कांग्रेस को नहीं बुलाया था, जिससे ज़ाहिर होता है कि वह गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस गठबंधन बनाना चाहते हैं।

शरद पवार जैसा दिग्गज भी राव से दूर रहा, जबकि कश्मीर के नेता $फारूक़ अब्दुल्ला, जो अक्सर विपक्ष की सभी रैलियों में नज़र आते हैं, भी नहीं पहुँचे। हाँ, वह राहुल गाँधी की यात्रा में ज़रूर शामिल हुए और उनकी जमकर तारीफ़ भी की। राव कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के घटक दलों के नेताओं को भी साथ लाने में नाकाम रहे। वामपंथी नेता, जो केरल में राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के 10 दिन तक रहने के कारण उनसे नाराज़ चल रहे हैं, ज़रूर राव के साथ मंच पर दिखे। केरल में माकपा की सरकार है और वह वहाँ भारत जोड़ो यात्रा के इतने दिन रहने से वह कांग्रेस से $ख$फा रही है। उसके नेताओं ने कांग्रेस की इसके लिए आलोचना भी की थी और कहा था कि उन्हें भाजपा से लडऩा चाहिए, न कि वामपंथियों और दूसरे सम विचारों वाले दलों से।

देखा जाए, तो राव भाजपा विरोध कर रहे हैं; लेकिन वह कांग्रेस को भी मज़बूत नहीं देखना चाहते। लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना में इस साल के आख़िर में विधानसभा चुनाव हैं और अभी तक तो वहाँ कांग्रेस ही बीआरएस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। भाजपा यहाँ अपना क़द बढ़ाने की कोशिश में, जबकि असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमएम का भी मुस्लिम वोट बैंक यहाँ है।

बेशक रैली में शामिल चार बड़े नेताओं की राजनीति भले भाजपा विरोधी हो; लेकिन इन सभी दलों की ज़मीन वास्तव में कांग्रेस की ही ज़मीन है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी से लेकर दिल्ली-पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के वोट बैंक से ही ताक़तवर हुए हैं। यही नहीं केरल में भी सत्तारूढ़ लेफ्ट की असली प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस ही है। साफ़ है कि भाजपा का विरोध करते हुए भी यह सभी दल वास्तव में कांग्रेस से $खौफ़ कहते हैं और उन्हें लगता है कि कांग्रेस के आने से उन्हें ही नुक़सान होगा।

नीतीश का राग

नीतीश कुमार

क्या नीतीश कुमार गुपचुप कुछ राजनीति पका रहे हैं? नीतीश तेलंगाना के नेता के.सी.आर. की रैली में नहीं गये। वह बोले कि बुलाया भी जाता, तो नहीं जाता। भाजपा के ख़िलाफ़ वह लगातार बोल रहे हैं। बची कांग्रेस जो बिहार में उनके नेतृत्व वाली साझा सरकार में शामिल है। कांग्रेस के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ‘तहलका’ को बताया कि नीतीश कुमार ज़मीन से जुड़े नेता हैं और कांग्रेस आने वाले चुनावों में उनसे घनिष्ठ सहयोग की उम्मीद कर रही है। बहुत चर्चा है कि नीतीश बिहार की राजनीति में मज़बूत बने रहने के लिए कांग्रेस का साथ चाहते हैं। कुछ नेता तो यह भी मानते हैं कि भविष्य में नीतीश कांग्रेस के साथ पार्टी का विलय कर सकते हैं या कांग्रेस के लिए बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

नीतीश तेलंगाना में विपक्ष (राव के तीसरे मोर्चे) की रैली को लेकर कहते हैं कि उनकी तो सिर्फ़ यही इच्छा है और इसका ख़ुद से कोई लेना-देना नहीं है। ब$कौल नीतीश- ‘मैं कहता रहता हूँ, मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। मेरा केवल एक ही सपना है- विपक्षी नेताओं को एकजुट होकर आगे बढ़ते हुए देखना। इससे देश को लाभ होगा।’  लेकिन नीतीश ने जो महत्त्वपूर्ण बात की वह यह थी कि उन्हें के.सी.आर. (चंद्रशेखर राव) की रैली के बारे में पता नहीं था। उन्होंने इसे लेकर यह कहा- ‘मैं किसी और काम में व्यस्त था, जिन्हें उनकी पार्टी की रैली में आमंत्रित किया गया था, वह गये होंगे।’ काफ़ी दिलचस्प बात है कि कुछ महीने राव ख़ासतौर पर बिहार आये थे और नीतीश के साथ एक रैली की थी। नीतीश को लेकर बहुत कहा जाता रहा है कि वह प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश रखते हैं। उनकी पार्टी के नेता इसे लेकर बार-बार बयान देते रहे हैं कि नीतीश विपक्ष में सर्वमान्य नेता की हैसियत रखते हैं। हालाँकि अब नीतीश ख़ुद को इस दौड़ में नहीं बताते। ऐसे में नीतीश का रोल अगले चुनाव से पहले निश्चित ही महत्त्वपूर्ण होगा।

नड्डा की अध्यक्षता बरक़रार

भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अटकलों को $खत्म करते हुए अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल कम-से-कम 18 महीने के लिए आगे बढ़ा दिया। ऐसा नहीं होता, तो 20 जनवरी को भाजपा को नया अध्यक्ष चुनना पड़ता। अब सम्भावना है कि नड्डा जून 2024 तक पार्टी के मुखिया रहेंगे और अगला लोकसभा चुनाव और उससे पहले 10 विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में होंगे। नड्डा से पहले अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारू लक्ष्मण, के. जना कृष्णमूर्ति, एम. वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अमित शाह जैसे दिग्गज भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं।

मेरा अहंकार टूट गया : राहुल

भारत जोड़ो यात्रा के समापन समारोह में 21 में से 9 पार्टियों ने की शिरकत

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली भारत जोड़ो यात्रा तमिलनाडु के कन्याकुमारी से 7 सितंबर को शुरू होकर 12 राज्यों से होती हुई 30 जनवरी को कुल 146 दिन में क़रीब 3,570 किलोमीटर का सफ़र तय करके जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में ख़त्म हुई। भारत जोड़ो यात्रा के समापन समारोह में शामिल होने के लिए कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने लिखित पत्र भेजकर कुल 21 पार्टियों को आमंत्रण भेजा गया था, जिनमें सिर्फ़ 9 राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने ही समापन समारोह में शिरकत की, जो कि द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके), झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा), नेशनल कांफ्रेंस पार्टी (एनसीपी), जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (भाकपा), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी), विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) आदि पार्टियों से ही थे। कहा जा रहा है कि कुछ दल भारी बर्फ़बारी के कारण और सुरक्षा कारणों से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के समापन समारोह में शामिल नहीं हो पाये। हालाँकि भारत जोड़ो यात्रा के समापन समारोह में आमंत्रित 21 पार्टियों में से 12 ने कहा था कि वे समारोह में शामिल होंगी। किन्तु बीएसपी की तरफ़ से समारोह में शामिल होने वाले श्याम सिंह यादव अपनी इच्छा से व्यक्तिगत रूप से इस समारोह में शामिल हुए। उन्हें पार्टी प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।

बता दें कि, कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पूरी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान कहते आये हैं कि उनकी यह यात्रा बेरोज़गारी, महँगाई, और नफ़रत के ख़िलाफ़ है और इसको राजनीतिक रूप न दिया जाए। किन्तु जिस प्रकार इस यात्रा के अंतिम समारोह में समान विचारधारा वाली सभी विपक्षी पार्टियों को आमंत्रित किया गया, उससे यही कयास लगाये गये कि राहुल की यह रणनीति 2024 लोकसभा चुनावों से पहले सेमी फाइनल का हिस्सा है। हालाँकि राहुल गाँधी ने यात्रा के समापन के अवसर पर शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में 35 मिनट के अपने भावुक भाषण में प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस का भी ज़िक्र करते हुए भाजपा पर हमला बोला। राहुल गाँधी ने कहा कि, मैं जम्मू-कश्मीर के लोगों और सेना के बलों से कहना चाहता हूँ कि मैं हिंसा को समझता हूँ। मैंने हिंसा सही भी है, और देखी भी है। जिसने हिंसा नहीं देखी, उसे यह बात समझ नहीं आएगी। जैसे मोदीजी हैं, अमित शाह हैं, संघ के लोगों ने हिंसा नहीं देखी है। डरते हैं। यहाँ पर हम चार दिन पैदल चले। और मैं गारंटी देता हूँ कि भाजपा का कोई नेता ऐसे नहीं चल सकता है। इसलिए नहीं कि जम्मू-कश्मीर के लोग उन्हें चलने नहीं देंगे, इसलिए क्योंकि वे (भाजपा और आरएसएस वाले) डरते हैं। कश्मीरियों और $फौजियों की तरह मैंने अपनों को खोने का दर्द सहा है। मोदी-शाह यह दर्द नहीं समझ सकते। जो विचारधारा इस देश की नींव को तोडऩे की कोशिश कर रही है, उसके ख़िलाफ़ हम मिलकर खड़े हों। नफ़रत हमारा तरीक़ा नहीं, मोहब्बत से खड़े हों। हम मोहब्बत से खड़े होंगे, प्यार से बात करेंगे, तो हमें सफलता मिलेगी। उनकी विचारधारा को हराएँगे नहीं, उनके दिलों से ही निकाल देंगे। मुझे उम्मीद है कि गोडसे की विचारधारा ने जम्मू-कश्मीर से जो छीन लिया, वह इस देश से वापस मिल जाएगा। राहुल गाँधी ने कहा कि मुझे थोड़ा अहंकार था, वह टूट गया। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक पूरे देश के लोग मेरे साथ चले।

इधर, झारखण्ड में 26 जनवरी को कांग्रेस के हाथ से हाथ जोड़ो अभियान का शुभारंभ करने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने झारखण्ड में कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर सहमति प्रदान कर दी है। वह 11 फरवरी को झारखण्ड से इस कार्यक्रम का शुभारंभ करेंगे। पार्टी का साफ़ कहना है कि हाथ से हाथ जोड़ो अभियान पूर्ण रूप से राजनीतिक अभियान है। बता दें कि हाथ से हाथ जोड़ो अभियान का प्रारम्भ राष्ट्रीय स्तर पर 26 जनवरी, 2023 से ही हो गया है; लेकिन इस अभियान की औपचारिक शुरुआत फरवरी के दूसरे सप्ताह में होने की सम्भावना है। भारत जोड़ो यात्रा के ही दूसरे चरण इस अभियान में पार्टी का चुनाव चिह्न अभय मुद्रा है। इस अभियान के तहत दो महीने में हर गाँव और मतदान केंद्रों को कवर करना इस दूसरी यात्रा का लक्ष्य बनाया गया है। इस अभियान का लक्ष्य बेरोज़गारी, महँगाई जैसे मुद्दों से आम लोगों को जोडऩा भी है।

बढ़ती जा रही भिखारियों की संख्या

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

केंद्र सरकार को इन दिनों जनसंख्या से लेकर अन्य तमाम तरह के सर्वेक्षण कराने चाहिए। इससे बेरोज़गारी, भिक्षावृत्ति तथा लोगों की आजीविका के संसाधनों के आँकड़े स्पष्ट होंगे। कोरोना-काल ने इस देश के सामान्य वर्ग से जो कुछ छीना है, उसने तमाम परिवर्तन ऐसे हुए हैं, जो दु:खी करते हैं। अगर देश में भिक्षावृत्ति पर एक नज़र डालें, तो पता चलता है कि इसमें बेतहाशा बढ़ोतरी होती जा रही है। केवल दिल्ली के मन्दिरों के आगे भिखारियों की स्थिति देखें, तो पता चलता है कि अक्षरधाम मन्दिर, कनॉट प्लेस के हनुमान मन्दिर, करोल बाग़ के झण्डेवाला मन्दिर, कालका मन्दिर, यहाँ तक कि गली-मोहल्लों में बने छोटे-छोटे मन्दिरों पर भिखारियों का जमावड़ा लगा रहता है। हाल यह है कि किसी श्रद्धालु के मन्दिर में घुसने और निकलने के दौरान भिखारी उसे चारों ओर से घेर लेते हैं। इसी तरह दिल्ली में बनी मज़ारों के आगे भिखारियों का जमावड़ा देखा जा सकता है। गुरुद्वारों में भी भिखारियों का क़ब्ज़ा कम नहीं है; लेकिन वहाँ उन्हें दोनों वक़्त का खाना आसानी से मिल जाता है, इसलिए इनकी संख्या गुरुद्वारों के बाहर कम ही दिखायी देती है।

लक्ष्मी नगर के साईं मन्दिर के पंडित संदीप कहते हैं कि चार-पाँच साल पहले तक हर बृहस्पतिवार को भिखारी और श्रद्धालु मन्दिर के आगे प्रसाद पाने आते थे; लेकिन अब भिखारी यहाँ हर रोज़ ख़ूब देखे जा सकते हैं। हम लोग इन्हें परेशान देखकर नहीं भगाते, पर यह पूजा-पाठ करने आने वालों को अब परेशान करने लगे हैं। बच्चे, जवान, बूढ़े, हर उम्र के भिखारी यहाँ देखे जा सकते हैं। कोरोना जबसे आया है, यह संख्या बहुत बढ़ गयी है। इसी तरह अक्षरधाम मन्दिर पर बच्चे को गोद में लिए फुटपाथ पर ठण्ड में बैठी एक महिला भिखारी से पूछा कि वह यहाँ क्यों बैठी है? तो उसने जवाब न देते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। यह पूछने पर कि उसका पति कहाँ है और क्या करता है? महिला ने ख़ामोशी से एक तरफ़ इशारा कर दिया। एक दूसरी महिला, जो कुछ दूरी पर बैठी थी; से पूछने पर उसने बताया- ‘बाबूजी का करीं, हमार घर नाहीं है। यहीं से जो पावत हैं, उसी से ये पापी पेटवा भरत हैं।’ यह कहते-कहते महिला का गला रुँध गया और रुँधे गले से उसने मुझसे भी भीख माँगी।

यह दशा किसी एक मन्दिर के बाहर की नहीं है, बल्कि मेट्रो स्टेशनों के बाहर से लेकर बस स्टैण्डों और बाज़ारों तक की है। हर रोज़ गली में दरवाज़े पर आकर आवाज़ लगाने वाले दर्ज़नों भिखारियों को देखा जा सकता है। भिखारियों की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि इनकी क्षेत्र और जगह भी बँट चुके हैं। स्थिति यह है कि अगर कोई व्यक्ति इन भिखारियों को कुछ बाँटने के लिए पहुँचता है, तो उसे भीख माँगने वालों की एक भीड़ घेर लेती है। भीख माँगने वालों में युवाओं और बच्चों के बारे में सोचने की ज़रूरत है, क्योंकि इनका जीवन बर्बाद हो रहा है। बच्चों से लेकर किशोर और युवा होते युवा-युवती जिस तरह मन्दिरों, मज़ारों के बाहर हाथ फैलाकर दिन भर बैठे रहते हैं, वह बढ़ती भुखमरी और बेरोज़गारी का स्पष्ट उदाहरण है। इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्यथा बाढ़ की तरह बढ़ रही भिक्षावृत्ति देश में अराजक और आलसी लोगों की एक फ़ौज खड़ी कर देगी।

 2011 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि उस दौरान देश में चार लाख से ज़्यादा भिखारी और बिना किसी काम और आय के साधन वाले लोग थे। कई लोगों के लिए तो भीख माँगना एक व्यवसाय बन चुका है और भिक्षावृत्ति को आजीविका का साधन बना चुके लोग इसे किसी भी हाल में छोडऩा नहीं चाहते। ऐसा नहीं है कि पढ़े-लिखे लोग ही भीख माँग रहे हैं, बल्कि डिग्रीधारी लोगों ने भी कई जगह भीख माँगने को पेशा बनाया हुआ है। इनमें कुछ मजबूर भी होंगे, तो कुछ शौक़िया भी यह धंधा पकड़े हुए हैं। कई बार ऐसी ख़बरें सामने आयी हैं कि भिखारियों के संगठन बने हुए हैं, जो भिक्षावृत्ति से करोड़ों रुपये सालाना कमाते हैं। लेकिन केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें इस मामले पर ख़ामोश बैठी हुई हैं और बढ़ती भिक्षावृत्ति पर किसी को कोई चिन्ता नहीं है।

देश में बढ़ती भिक्षावृत्ति देश की आर्थिक दशा का वह आईना है, जो हर किसी को साफ़-साफ़ बेरोज़गारी, भुखमरी और देश की आर्थिक हालत की तस्वीर दिखा रहा है। पता नहीं क्यों सरकारों को यह तस्वीर दिखायी नहीं देती। जाने कितने ही लोग भीख माँगने को रोज़गार का विकल्प बनाते जा रहे हैं, जो उन लोगों के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है, जिनके सामने कोई हाथ अचानक भीख माँगने के लिए उठता है। इसमें एक बात जो अक्सर नज़रअंदाज़ की जाती है, वह भिक्षावृत्ति में लिप्त माफ़िया राज है। सन् 2011 में सामाजिक न्याय एवं सशक्ति की ‘शिक्षण स्तर और प्रमुख गतिविधि के तौर पर $गैर कामगारों’ के आँकड़ों में पुष्टि हुई थी कि उस दौरान के 4,13,670 भिखारियों में से 2,21,673 भिखारी पुरुष और 1,91,997 भिखारी महिलाएँ थीं। हैरानी की बात है इन भिखारियों में उच्च शिक्षा प्राप्त भी थे। इनमें 21 प्रतिशत 12वीं पास थे। सन् 2011 के राज्यवार आँकड़े बताते हैं कि उस समय सबसे ज़्यादा 81,244 भिखारी पश्चिम बंगाल में थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 65,000 से ज़्यादा, बिहार और आंध्र प्रदेश में 30,000, मध्य प्रदेश में 28,000 भिखारी थे। इसी तरह दिल्ली में 23,000 भिखारी थे। आँकड़ों से पता चलता है कि आईटी हब बेंगलूरु जैसे शहर में सन् 2011 में 80 भिखारी स्नातक और 30 डिप्लोमाधारी थे। केरल जैसे शिक्षित राज्य में भी सन् 2011 में 42 प्रतिशत भिखारी शिक्षित थे।

मार्च, 2018 में भिखारियों को लेकर लोकसभा में सामाजिक कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत द्वारा जारी केंद्र सरकार के आँकड़े बताते हैं कि इस समय तक देश में कुल 4,13,760 भिखारी थे, जिनमें 2,21,673 पुरुष और 1,91, 997 महिला भिखारी थे। इस रिपोर्ट में भी पश्चिम बंगाल को सबसे ज़्यादा भिखारियों का राज्य बताया गया है। इस रिपोर्ट में सबसे कम केवल दो भिखारी लक्षद्वीप में बताये गये हैं। लेकिन कोरोना-काल के बाद से जिस तरह भिखारियों की संख्या बढ़ी है, उससे ऐसा लगता है कि देश में 10,00,000 से कम भिखारी नहीं होंगे। भिक्षावृत्ति के आँकड़े सर्वे न होने के कारण खुलकर हमारे सामने नहीं आ पा रहे हैं। यही कारण है कि भिक्षावृत्ति रोकने के लिए बने क़ानून किसी काम के नहीं हैं।

भिक्षावृत्ति को रोकने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या में माना है कि जीवन के अधिकार का अर्थ मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, जो शोषणकारी स्थिति से होना है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार की अभिव्यक्ति में आजीविका का अधिकार शामिल है। लेकिन अनुच्छेद-23 कहता है कि जीवन का अधिकार शोषण से मुक्त हो। भिक्षावृत्ति विरोधी क़ानूनों को संविधान के अनुच्छेद-19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर जबरदस्त आक्रमण कहा जा सकता है और यह भीख माँगने वाली आबादी के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लंघन करता है। ऐसे ही देश के विभिन्न राज्यों में भिक्षावृत्ति क़ानून बने। मुख्य रूप से बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट-1959, मध्य प्रदेश भिक्षावृत्ति निवारण अधिनियम-1973, उत्तर प्रदेश भिक्षावृत्ति प्रतिषेध अधिनियम-1975 है। इसी क़ानून की तर्ज पर उत्तराखण्ड सरकार ने कुछ वर्ष पहले ऑपरेशन मुक्ति बनाया था, जो पूरी तरह सफल नहीं हो सका। ऐसे ही राजस्थान की गहलोत सरकार ने बीती 26 जनवरी तक राजस्थान को भिक्षावृत्ति मुक्त राज्य बनाने की बात कही थी; लेकिन इसका कोई बड़ा असर राज्य में देखने को नहीं मिला।

रेलवे अधिनियम-1989 की धारा-144 के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति भारतीय रेलवे के किसी परिसर या रेलगाड़ी में भीख माँगता पकड़ा जाता है, अर्थात् भिक्षावृत्ति से संबन्धित गतिविधियों में संलग्न पाया जाता है, तो उस पर 1,000 रुपये तक का ज़ुर्माना या एक वर्ष तक की जेल या फिर दोनों ही हो सकते हैं। इस अधिनियम की धारा-167 में यह प्रावधान है कि रेलगाड़ी / रेलवे प्लेटफॉर्म / अन्य रेलवे परिसर में धूम्रपान करने पर जेल की सज़ा हो सकती है। लेकिन रेलवे स्टेशन से लेकर रेलवे परिसर में भिखारियों का मिलना कोई दुर्लभ बात नहीं है।

वास्तव में भिक्षावृत्ति की आड़ में वेश्यावृत्ति, नशे का धंधा, बच्चा चोरी और अपहरण जैसे जघन्य अपराध पनप रहे हैं। बढ़ती महँगाई और जनसंख्या, घटते रोज़गार और कम पड़ते संसाधन भिक्षावृत्ति बढऩे के प्रमुख कारण हैं, जिनसे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को साफ़ नीयत से कई ठोस क़दम उठाने होंगे।

अगर भिक्षावृत्ति को रोकना है, भिक्षावृत्ति बढऩे के कारणों और इसे रोकने में आड़े आने वाली चुनौतियाँ। सरकार के पास भिक्षावृत्ति के आँकड़े भले ही मौज़ूद नहीं हैं; लेकिन फिर भी इसे बढऩे से रोका जा सकता है। जिन राज्यों में भिक्षावृत्ति निरोधक क़ानूनों को राज्य सरकारों को सही तरीक़े से अमल में लाना होगा। लोगों में नाकारापन, आलस्य और कामचोरी की प्रवृत्ति को ख़त्म करते हुए विकास कार्यों पर ध्यान देना होना। तरह-तरह से रोज़गार बढ़ाने होंगे। सरकार और विभिन्न संगठनों का दावा है कि भिक्षावृत्ति को ख़त्म करने हेतु अनेक उपाय किये गये हैं और यह कुछ हद तक सफल रहे हैं। लेकिन भीख माँगना अभी भी जारी है, जिसके लिए भिक्षा माँगने वालों की ही तरह भिक्षा देने वाले भी दोषी हैं और सरकारें भी।

चीन की घटती आबादी भारत के लिए सबक़

एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम में, भारत दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में चीन को पीछे छोड़ सकता है। विश्व जनसंख्या समीक्षा (डब्ल्यूपीआर) के अनुमानों के अनुसार, 2022 के अन्त तक भारत की जनसंख्या 141.7 करोड़ थी। यह इसी 17 जनवरी को चीन द्वारा घोषित 141.2 करोड़ से 50 लाख अधिक है। चीन की आबादी में 1960 के दशक के बाद पहली गिरावट आयी थी। भारत, जहाँ डब्ल्यूपीआर के अनुसार 50 प्रतिशत आबादी 30 वर्ष से कम है, 18 जनवरी तक इसकी जनसंख्या बढक़र 142.3 करोड़ हो गयी। डब्ल्यूपीआर की भविष्यवाणी है कि, हालाँकि भारत की जनसंख्या वृद्धि धीमी हो गयी है, यह अभी भी कम-से-कम 2050 तक ऊपर जाएगी।

राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनएसबी) की सार्वजनिक की गयी जानकारी के अनुसार, चीन की जनसंख्या पिछले वर्ष की तुलना में 2022 में 8.5 लाख घट गयी है। चीन की आबादी छ: दशक में पहली बार 2022 में घटने लगी। चीन की आबादी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण मील का पत्थर है, जो अब गम्भीर रूप से जनसांख्यिकीय संकट का सामना कर रही है।

एनएसबी के जनवरी की तीसरे पखवाड़े जारी आँकड़ों के अनुसार, चीन में पिछले साल के अन्त में 1.41 बिलियन लोग थे, जो सन् 2021 के अन्त की तुलना में 850,000 कम हैं। यह सन् 1961 के बाद से पहली गिरावट का प्रतीक है, जो पूर्व नेता माओत्से तुंग के तहत गम्भीर अकाल का आ$िखरी साल था। साल 2022 में क़रीब 9.56 मिलियन बच्चों का जन्म हुआ, जो एक साल पहले के 10.62 मिलियन से कम था। यह कम-से-कम सन् 1950 के बाद से सबसे कम स्तर है, और यह सब सरकार द्वारा परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयासों के बावजूद हुआ है। जनसंख्या में कमी सोची गयी गति से कहीं तेज़ी से हुई, और यह आर्थिक विकास में रोड़े अटका सकती है क्योंकि इससे उत्पादों जैसे कि नये घरों की माँग धीमी होने की आशंका है। आबादी की गिरावट के कारण, चीनी अर्थव्यवस्था के आकार को अमेरिका से आगे निकलने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है और राष्ट्र इस वर्ष भारत के मुक़ाबले दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में अपना दर्जा खो सकता है।

सन् 2019 तक संयुक्त राष्ट्र भविष्यवाणी कर रहा था कि चीन की आबादी साल 2031 में चरम पर होगी और फिर घट जाएगी; लेकिन पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने उस अनुमान को संशोधित किया था और 2022 की शुरुआत में आबादी का शिखर होने का अनुमान लगाया था। श्रम बल पहले से ही सिकुड़ रहा है, दीर्घकालिक घरों की माँग में और गिरावट आने की सम्भावना है, और सरकार को अपनी कम निधि वाली राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के भुगतान के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है। देश पूर्वी एशिया में जापान या दक्षिण कोरिया जैसे अन्य देशों के नक़्श-ए-क़दम पर चल रहा है, जिन्होंने अपनी जन्म दर में गिरावट देखी और जैसे-जैसे वे अमीर और विकसित होते गये हैं, सिकुडऩे लगे हैं।

चीन की जन्म दर या प्रति 1,000 लोगों पर नवजात शिशुओं की संख्या, पिछले साल घटकर 6.77 हो गयी, जो कि कम-से-कम 1978 के बाद का सबसे निचला स्तर है। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो की तरफ़ से जारी किये गये आँकड़ों से पता चलता है कि 62 फ़ीसदी जनसंख्या कामकाजी है, जिसे चीन 16 से 59 वर्ष की आयु के लोगों के रूप में परिभाषित करता है और जो एक दशक पहले के क़रीब 70 फ़ीसदी से नीचे है, देश की आबादी की आयु के रूप में चुनौतियों पर प्रकाश डालती है।

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की आबादी हाल ही में पहली बार आठ अरब से पार निकली है; लेकिन सबसे अधिक आबादी वाले चीन सहित कुछ देशों में आबादी कम हो रही है। यह गिरावट जारी रहने के आसार हैं क्योंकि बढ़ती लागत, कार्यबल में अधिक महिलाओं के आने और बाद में बच्चे होने के चलते कुछ देशों में लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। चीन की आबादी पिछले साल छ: दशक से अधिक समय में पहली बार कम हुई है और उम्मीद है कि इस साल भारत सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में आगे निकल जाएगा। पिछले साल जुलाई में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, अन्य देश जिनमें ज़्यादातर यूरोप और एशियाई हैं, में आने वाले दशकों में जनसांख्यिकीय मंदी की सम्भावना है, जो संकेत देता है कि दुनिया की आबादी अब और 2100 के बीच कैसे विकसित होगी।

उधर अफ्रीका में एक अलग तस्वीर उभर रही है, जहाँ जनसंख्या 2100 तक 1.4 से 3.9 अरब तक बढऩे की उम्मीद है। वहाँ धरती की क़रीब 38 फ़ीसदी आबादी रहती है। यह आज की आबादी के मुक़ाबले क़रीब 18 प्रतिशत अधिक होगा। 10 मिलियन से अधिक निवासियों वाले आठ राष्ट्रों, जिनमें से अधिकांश यूरोप में हैं; ने पिछले एक दशक में अपनी आबादी को कम होते देखा है। उनमें युद्ध से पीडि़त यूक्रेन के अलावा ग्रीस, इटली, पोलैंड, पुर्तगाल और रोमानिया भी हैं, जिनकी जन्म दर विशेष रूप से कम है; विश्व बैंक के अनुसार प्रति महिला 1.2 और 1.6 बच्चों के बीच। यूरोप के बाहर, जापान जैसे देशों में उम्र बढऩे की आबादी के कारण भी गिरावट देखी जा रही है। वहाँ महिलाओं के औसतन 1.3 बच्चे हैं, साथ ही आप्रवासन का स्तर भी निम्न है। इस प्रकार देखें तो जापान ने 2011 और 2021 के बीच 30 लाख से अधिक निवासियों को खो दिया है। अन्त में सीरिया में जनसंख्या 2011 के बाद से युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुई है। सीरिया के अपवाद के साथ इन आठ देशों में यह क्रम जारी रहने की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, उनकी जनसंख्या में गिरावट देखी जाएगी। विशेष रूप से 2100 तक अपनी लगभग आधी आबादी खोने की सम्भावना चीन को है, जो 1.4 बिलियन से अधिक से 771 मिलियन निवासियों तक गिर जाएगी। जर्मनी, दक्षिण कोरिया और स्पेन के साथ रूस की आबादी 2030 तक कम होने लगेगी। थाईलैंड, फ्रांस, उत्तर कोरिया और श्रीलंका में 2050 तक यह क्रम बने रहने का अनुमान है।

भारत, इंडोनेशिया, तुर्की और ब्रिटेन सहित कई अन्य देशों के लिए गिरावट का सिलसिला इस सदी के दूसरे छमाही में शुरू होने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस बीच पूरे ग्रह की आबादी 2090 के दशक में केवल 10.4 बिलियन के चरम पर पहुँचने के बाद ही घटने की उम्मीद है। साल 2100 तक यूरोपीय, अमेरिकी और एशियाई आबादी घटने की राह पर होगी; लेकिन अफ्रीका की आबादी में वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है।

सन् 2022 में चीन की तरफ़ से दिखायी गयी जनसंख्या में गिरावट चीन और दुनिया के लिए स्थायी परिणामों के साथ एक ऐतिहासिक क्षण है। बीजिंग ने 17 जनवरी को घोषणा की कि पिछले साल चीन में जन्म दर 10 फ़ीसदी से अधिक घटकर 9.56 मिलियन हो गयी, जबकि इस दौरान 10.41 मिलियन मौतें हुईं।

चीन की जनसंख्या की कहानी उन देशों के लिए सबक़ है, जिन्होंने सोशल इंजीनियरिंग में मज़बूत हस्तक्षेप की कोशिश की है। सन् 1980 में सरकार द्वारा बनायी एक बच्चा नीति जैसी सख़्त नीति आने के बाद घट रही जन्म दर को बढ़ाने के लिए चीन ने दो दशक का बड़ा हिस्सा ख़र्च किया है; लेकिन असफल रहा है। बाल नीति निश्चित रूप से उस नतीजे को हासिल नहीं कर पायी, जिसकी योजनाकारों ने उम्मीद की थी।

चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही जनसांख्यिकीय परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रही है। वहाँ 16-59 कामकाजी उम्र की आबादी (2022 में), 875 मिलियन थी और सन् 2010 के बाद से वहाँ क़रीब 75 मिलियन की गिरावट आयी है। मज़दूरी (दिहाड़ी) बढ़ रही है, और श्रम आधारित नौकरियाँ मुख्य रूप से दक्षिणपूर्व एशिया में जा रही हैं। इस बीच 60 से ऊपर की आबादी 30 मिलियन बढक़र 280 मिलियन हो गयी है। साल 2050 तक बुज़ुर्गों की संख्या 487 मिलियन (जनसंख्या का 35 फ़ीसदी) तक पहुँच जाएगी। उम्र बढऩे पर चीन के राष्ट्रीय कार्य आयोग का अनुमान है कि 2050 तक बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य देखभाल पर ख़र्च सकल घरेलू उत्पाद का 26 फ़ीसदी हो जाएगा।

इस बात के संकेत हैं कि चीन पहले से ही घटते हुए कार्यबल और घटती वृद्धि के जापान के उदाहरण का अनुसरण करने के लिए उसी राह पर है। जापान के रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमी, ट्रेड एंड इंडस्ट्री के एक शोध दस्तावेज़ के अनुसार, सन् 2020 तक चीन में बच्चों और बुज़ुर्गों की आबादी का अनुपात सन् 1990 में जापान के समान था। पूर्ववर्ती चार दशक की अवधि में 2.74 से 1.28, जबकि जापान का 1.75 से 1.29 तक गिर गया। दस्तावेज़ में बताया गया है कि सन् 2020 में भारत में बच्चों और बुज़ुर्गों की आबादी का अनुपात सन् 1980 में चीन के समान था, जब वहाँ आर्थिक तेज़ी आयी थी।

ग़ुलामी का षड्यंत्र

यह कोई नयी बात नहीं है कि कुछ चालाक और शातिर लोग दूसरे इंसानों को ग़ुलाम समझते हैं और उसी तरह उनका इस्तेमाल करते हैं। सियासत को व्यापार समझने वाले लोग इस तरह की ग़ुलाम व्यवस्था के सबसे बड़े पैरोकार होते हैं। यह ग़ुलामी धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र और शिक्षा के आधार पर तय की जाती है। दुर्भाग्यवश हिंदुस्तान में इस ग़ुलामी की पराकाष्ठा सदियों-सदियों रही है। इन दिनों भी राजनीतिक पार्टियों द्वारा इसी तरह की कोशिशें आम जनता के ख़िलाफ़ लगातार की जा रही हैं, ताकि इन पार्टियों की सत्ता लगातार बनी रहे।

सदियों से चली आ रहे इस ग़ुलामी के षड्यंत्र को आज तक लोगों से इस तरह छिपाकर रखा गया है जैसे आभूषणों को किसी पात्र में भरकर मनों मिट्टी के अंदर दबाकर रखा जाता है, ताकि किसी को उसकी भनक तक न लग सके। इस ग़ुलामी को बरक़रार रखने के लिए शब्दों के जाल बुने गये हैं और इन्हीं शब्दों की जादूगरी से आम लोगों को मानसिक ग़ुलाम बनाकर रखा जाता है, ताकि वे शारीरिक ग़ुलामी को सहज ही स्वीकार कर लें। आम लोगों को ग़ुलाम बनाने की कोशिश में लगे ये आका किस तरह शब्दों की जादूगरी करते रहे हैं, सबसे पहले इस बारे में बताना ज़रूरी होगा।

दरअसल, पूरी दुनिया में अंग्रेजी के दो शब्दकोश हैं; एक है- ‘ब्लैक लॉ डिक्शनरी’ जिसका उपयोग शासक यानी गवर्नमेंट के लिए किया जाता है। गवर्न यानी शासन करना, मेंट यानी माइंड पर यानी मन, मस्तिष्क को कन्ट्रोल करने वाला। इसी व्यवस्था में आज पूरी दुनिया चल रही है। बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी इस ग़ुलामी की छत के नीचे रहकर भी ख़ुद को बुद्धिजीवी समझते हैं, जबकि सच यह है कि वे सोयी हुई ग़ुलाम जनता को जगाने में नाकाम ही दिखते हैं।

बहरहाल गवर्नमेंट शब्द की गहराई के बारे में जानने वाले आज पूरी दुनिया में न के बराबर ही लोग हैं। क्योंकि समान्य स्तर पर आमजन को इसकी शिक्षा नहीं दी जाती है। इसके अलावा एक दूसरी डिक्शनरी है- ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’, जो कि आम लोगों को पढ़ायी जाती है और साथ में यह कहा जाता है कि इससे बढिय़ा डिक्शनरी अंग्रेजी की कहीं नहीं है। लेकिन आम लोग नहीं जानते कि यह डिक्शनरी ग़ुलामी की ज़ंजीरों में बाँधने के लिए है, जो बहुत कम और समझदार लोगों को ही ग़ुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने देती है। शब्दों का मायाजाल समझने का प्रयत्न करें, तो पता चलता है कि एक ही शब्दों का अर्थ ‘ब्लैक लॉ डिक्शनरी’ में कुछ और होता है, जिससे कुछ चालाक लोगों ने तमाम आम लोगों तथा प्राकृतिक संसाधनों को क़ब्ज़े में लेकर सरकार रूप में संजोकर रखा है। उसी शब्दों का अर्थ ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में कुछ और होता है, जो आम लोगों को बताया जाता है, जिस कारण लोग उस प्रभाव से अलग सोचते भी नहीं और ग़ुलामी को ही स्वतंत्रता मान कर बैठे होते हैं।

उदाहरण के लिए एक शब्द अंडरस्टैंड (understand) का अर्थ ब्लैक लॉ में मजिस्ट्रेट या पुलिस के आधीन स्वीकार करना है, जबकि सामान्य स्तर पर इसका अर्थ समझना होता है। दिमा$ग को झंकृत करने वाले शब्दों के मायाजाल का एक और उदाहरण स्पैल (spell) होता है, जिसका मतलब सामान्य जनों में उच्चारण समझा जाता है, वहीं शासन व्यवस्था में स्पैल का मतलब जादू है। इसी प्रकार डिलीवरी (Delivery) का मतलब सामान्य जनों को कोई चीज़ या उत्पाद प्राप्त होना समझाया गया है। किसी के द्वारा भेजी गयी कोई चीज़ देना या भेजना डिलीवरी के अर्थ में है। अब सोचना होगा कि डिलीवरी निर्जीव चीज़ों के लिए है, तो फिर जन्म लेने वाले शिशु को डिलीवरी क्यों कहा जाता है? डिलीवरी शब्द जीवित प्राणी के लिए है या एक निर्जीव (मृत) उत्पाद के लिए? यह कहाँ से आया? तुरन्त जन्मे बच्चे की आत्मा सामान के निशान लेकर कैपिटल लेटर में माँ नाम के साथ क्यों बनायी जाती है? जन्म यानी बर्थ, जो माँ के माध्यम से ही होता है, उसे मृत वस्तु से कैसे तौला जाए?

वास्तव में ग़ुलामी की शुरुआत बर्थ सर्टिफिकेट से लेकर वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस आदि जितने पहचान पत्र गवर्नमेंट द्वारा जारी किये जाते हैं।

समझने की बात यह है कि ये सबके सब दस्तावेज़ एक तरह का समझौता यानी कॉन्ट्रैक्ट होते हैं, जो लोगों को उनकी पहचान के लिए दिये जाते हैं, ताकि पता चल सके कि आप कौन हैं? कहाँ से हैं? और क्या करते हैं? दरअसल यह एक सस्टुई क्वे वाई एक्ट-1666 (Cestui Que Vie Act-1666) के तहत उस समय के हुक्मरानों द्वारा शुरू कराया गया, ताकि लोगों को उनके धर्म, जाति, क्षेत्र और कार्य के आधार पर पहचाना जा सके। इससे पहले न तो किसी के पास उसकी पहचान का कोई दस्तावेज़ होता था और न ही जातिवाद, धर्मवाद इस क़दर हावी था कि लोग एक-दूसरे से उसकी जाति और धर्म देखकर व्यवहार करें।

इस मामले में द इंडियन एविडेंस एक्ट-1872 (The Indian Evidence Act-1872) कहता है कि किसी समझौते में दोनों पक्षों में सभी शर्तों के ख़ुलासे होने के बाद स्वीकृति दिनों पक्षों की हस्ताक्षर के साथ होनी चाहिए। परन्तु सरकार किसी को भी पूरी जानकारी किसी के साथ साझा नहीं करती और न ही किसी के दस्तावेज़ों पर अपनी कोई ऐसी सहमति देती है कि उसने दस्तावेज़ के रूप में कोई समझौता किया है, भले ही वह उस व्यक्ति की एक पहचान रखती है। इसलिए पूरा का पूरा समझौता एकतरफ़ा ही है और अमान्य माना जाना चाहिए है। लेकिन सरकार जानती है कि आज की तारी$ख में कोई भी व्यक्ति अपनी बिना पहचान के एक क़दम भी नहीं चल सकता, तो फिर उससे समझौता क्यों करना चाहिए? यानी आज के दौर में लोग इतने मजबूर हो चुके हैं कि उन्हें ख़ुद ही अपनी पहचान के दस्तावेज़ बनवाने पड़ते हैं, भले ही उसका कितना भी दुरुपयोग हो। दस्तावेज़ों के लिए हुए समझौते के आधार पर गवर्नमेंट की पूरी व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि पूरी की पूरी व्यवस्था एक काल्पनिक (Fiction) है और एक तरह का झाँसा यानी फ्रॉड है। यह सारी व्यवस्था यूनिफॉर्म कॉमर्शियल कोड (Uniform Commercial Code) की तरह है। यूनिफॉर्म कॉमर्शियल कोड के अनुसार, पूरा विश्व तंत्र एचएम गवर्नमेंट (HM Government) नाम की एक कम्पनी के तहत होता है, जिसका ज़िक्र द इंडियन एविडेंस एक्ट-1872, ब्रिटिश नेशनलिटी एक्ट-1948  और अन्य कई जगहों पर मिलता है। ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था को चलाने वालों की पहचान के दस्तावेज़ नहीं बनते; लेकिन उनका दुरुपयोग होने का $खतरा कम ही होता है। वहीं आम लोगों के दस्तावेज़ों में सेंध लगना एक आम बात है।

हाल ही में एम्स में चोरी हुए चार करोड़ लोगों के डेटा की कहीं-न-कहीं यही कहानी है कि आम लोगों की गोपनीय जानकारी आजकल बन रहे दस्तावेज़ों में सुरक्षित नहीं है। $खासतौर पर आधार बनने और सोशल मीडिया के बाद तो यह और भी मुश्किल हो चुकी है। यह बात लोगों को नहीं बताकर सरकारें लीगल माइनर बनाकर ग़ुलामी के टोकनों के रूप इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि विभिन्न दस्तावेज़ों के माध्यम से आम आदमी टैक्स, चालान, ज़ुर्माना आदि तो भरता ही है, कई अन्य तरी$कों से पैसा चुकाकर सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता रहता है कि उसे सरकार द्वारा सुरक्षा मिली हुई है। हालाँकि यह कोई नयी बात नहीं है, राजा-महाराजाओं के दौर में भी ऐसा ही होता था; लेकिन तब लोगों को पास दस्तावेज़ों के नाम पर उसके पिता का नाम और पहचान के लिए निवास वाली जगह का नाम हुआ करता था। और नागरिक के तौर पर राजा द्वारा जारी एक टोकन, जिसे मुद्रा या प्रमाण पत्र भी माना जाता था। सभी जीवित मानव जो इस पृथ्वी पर निवास कर रहे हैं, गवर्नमेंट पॉलिसी से अलग जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। हालाँकि बहुत-से आदिवासियों के साथ यह नियम लागू नहीं है। आज भी दुनिया में न जाने कितने ही लोग हैं, जिनकी पहचान का कोई दस्तावेज़ कहीं मौज़ूद नहीं है; लेकिन उन लोगों की गिनती किसी जानवर से ज़्यादा कहीं नहीं होती है, क्योंकि अगर अपनी पहचान रखनी है और आम समाज में रहना है, तो पहचान भी रखनी ही होगी।

लॉ फर्म एडमिलोर्टी लॉ एंड मेरीटाइम लॉ के अनुसार, सभी देशों की गवर्नमेंट ने आम लोगों को समुद्री कानूनों के तहत ग़ुलाम बना रखा है। लेकिन क्या इस ग़ुलामी से लोग कभी बाहर निकल सकेंगे? क्या लोग सरकारों की इस चाल को समझ सकेंगी। क्यों नहीं किसी को नौकरी करने के लिए एक पढ़ाई का सर्टिफिकेट ही पर्याप्त हो सकता? क्यों किसी को अपना सब कुछ बताने की ज़रूरत है? कानून के कुछ जानकार मानते हैं कि लोगों की पहचान के लिए उनका पता, पिता का नाम और उनका ख़ुद का नाम पर्याप्त हो सकता है, जिसके लिए उसके पास वोटर आईडी कार्ड ही पर्याप्त है। टैक्स देने के लिए अधिक से अधिक पैन कार्ड होना चाहिए। लेकिन अब लोगों को आधार भी रखना पड़ता है, जिसके अंदर आधार कार्ड धारक की पूरी की पूरी पहचान, उसका पेशा, उसकी आमदनी, उसके बैंक बैलेंस और न जाने किस-किस तरह की गोपनीय जानकारी तक का पता चल जाता है। इसी प्रकार राशन कार्ड की बात है, क्या उसके बगैर सबको राशन नहीं दिया जा सकता। लेकिन सरकार राशन कार्ड के माध्यम से यह उजागर कर देती है कि कौन महा$गरीब है? कौन गरीब है? कौन मध्यमवर्गीय है और कौन अमीर है। मेरे कहने का मतलब यह है कि इससे लोगों में गरीबी-अमीरी के भेदभाव की खाई बढ़ती है, जो एक उन्नत समाज के लिए ठीक नहीं है। आख़िरी सवाल, क्या कभी लोग इस ग़ुलामी के षड्यंत्र से बाहर निकल सकेंगे?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

माननीयों के ख़िलाफ़ जाँच में आएगी तेज़ी!

मौज़ूदा और पूर्व सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों पर दर्ज मामलों में धीमा जाँच और अनावश्यक देरी पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने तल्ख़ टिप्पणी की है। इन मामलों में पुलिस के रुख़ पर नाराज़गी जताते हुए दोनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को फरवरी में होने वाली सुनवाई के दौरान निजी तौर पर पेश होकर पूरी स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया।

न्यायालय के अनुसार, आख़िर पूर्व और मौज़ूदा सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ जाँच तय समय में पूरी क्यों नहीं हो पा रही है। ये जनप्रतिनिधि क्या आम लोगों से अलग है? जब क़ानून सभी के लिए बराबर है, तो फिर इनके मामलों में अनावश्यक देरी की कुछ तो वजह होगी। सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के ख़िलाफ़ मामलों में सरकारी स्तर पर मंज़ूरी तय समय में हासिल कर ली जाती है, तो फिर जनप्रतिनिधियों के मामले में लम्बा समय क्यों लगता है। विभिन्न राज्यों में मौज़ूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों में लेट-लतीफ़ी पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख़ अपनाया था। देश के सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों से अपने अधिकार क्षेत्र के ऐसे मामलों की पूरी सूची उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। इसे देखते हुए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान के आधार पर वर्ष 2021 में इस मामले की सुनवाई शुरू की। तब पंजाब में 96 पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों पर प्राथमिकी दर्ज थी। तब तक 12 प्रतिशत मामलों का ट्रायल भी नहीं हुआ था और 88 प्रतिशत मामलों की जाँच जारी थी। कुल 163 में से 118 मामलों की जाँच ही चल रही थी। लगभग दो साल के बाद स्थिति में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है; लेकिन जनवरी 2023 में सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में इसे असंतोषजनक पाया।

न्यायालय ने कहा कि दोनों राज्यों की ओर से पेश किये गये हलफ़नामे में बहुत कुछ स्पष्ट नहीं था, जबकि उन्हें पूरी स्टेट्स रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था। बार-बार समय माँगने और स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करना बिलकुल $गलत है। टिप्पणी में कहा गया कि आख़िर जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामले अन्तिम निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुँच पा रहे हैं? हलफ़नामे में जो कुछ बताया गया है, वह हक़ीक़त में तर्कसंगत क्यों साबित नहीं हो रहा। फरवरी में होने वाली सनवाई के दौरान पंजाब के पुलिस महानिदेशक को जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों की न केवल पूरी सूची और स्थिति के बारे में बताना होगा, बल्कि उन कारणों का भी हवाला देना होगा; जिसके चलते जाँच अधूरी है। पंजाब में पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों के लगभग 99 मामले विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं; जबकि 42 मामलों की जाँच चल रही है, जबकि हरियाणा में 11 ऐसे मामले लम्बित हैं। जनप्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों की बढ़ती संख्या, राज्य सरकारों, राज्य पुलिस और जाँच एजेंसियों की निष्क्रियता पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लिया था। विभिन्न राज्यों से सूचियाँ मिलने के बाद कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों ने निर्देश और मामले की गम्भीरता को देखते हुए कड़ा रुख़ अपनाने पर मजबूर कर दिया है।

ऐसे मामलों में जाँच किस तरह से होती है, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। हरियाणा में ऐसे ही जनप्रतिनिधि के ख़िलाफ़ वर्ष 2005 में नौकरी के लिए चयन में अनियमितताओं और धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ, जबकि यह संदर्भ 2001-2002 का था। यानी तीन साल से ज़्यादा प्राथमिकी दर्ज करने में ही लग गया। इस मामले की जाँच में ही बरसों लग गये, ज़ाहिर है लम्बे समय तक अदालतों में भी चलेगा। जनप्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों में ज़्यादातर की जाँच राज्य पुलिस की एजेंसियाँ ही कर रही है, इसलिए पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना लाज़िमी ही है। पर क्या सभी मामलों मे पुलिस ही एकमात्र निर्णायक की भूमिका में होती है। बहुत-से मामलों में पुलिस को मामला दर्ज करने से पहले सरकारी मंज़ूरी लेनी पड़ती है। ऐसी अड़चनों के चलते कुछ मामलों में देरी हो सकती है; लेकिन आपराधिक मामलों में पूरे साक्ष्य मिलने के बाद भी जाँच सुस्त रफ़्तार से चलती है, तो संदेह होना स्वाभाविक ही है।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की तल्ख़ टिप्पणी पुलिस और सरकारी सिस्टम पर है। इसमें सुधार करना ही होगा, शायद इसीलिए न्यायालयों की टिप्पणियाँ काफ़ी तल्ख़ होती हैं। पंजाब में एक पूर्व विधायक के ख़िलाफ़ जाँच पूरी हो गयी; लेकिन ट्रायल के लिए गृह मंत्रालय से मंज़ूरी लेनी पड़ी। ऐसे ही जनप्रतिनिधि सिमरजीत सिंह बैंस और उनके भाई बलविंदर सिंह बैंस के ख़िलाफ़ विभिन्न मामलों में एक दर्ज़न के क़रीब प्राथमिकियाँ दर्ज हैं। जनप्रतिधियों के ख़िलाफ़ देशद्रोह जैसी संगीन धाराओं के तहत दर्ज मामले की जाँच चल ही रही है, किसी निष्कर्ष पर कब पहुँचेगी क्या पता?

हर राज्य में पूर्व या मौज़ूदा सांसदों और विधायकों पर मामले दर्ज होते हैं। इनमें काफ़ी कुछ राजनीतिक भी होते हैं। मामला बहुत संगीन न हो, तो उनकी जाँच राज्य पुलिस ही करती है। विरोधी को सबक़ सिखाना हो, तो सरकार का समर्थन होने पर ऐसे मामलों की जाँच त्वरित गति से चलती है और तय समय में सब कुछ हो जाता है; लेकिन यही बात सत्तापक्ष से जुड़े किसी जनप्रतिनिधि के ख़िलाफ़ हो तो जाँच की दिशा और दशा क्या होगी? इसे समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है।

पंजाब सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा है कि राज्य के पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों पर 99 मामले राज्य की अलग-अलग अदालतों में लम्बित हैं। 42 मामलों में जाँच जारी है, जिसे जल्द पूरा किया जाएगा। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि फरवरी में होने वाली अगली सुनवाई के दौरान अगर दोनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों ने माँगी गयी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं करायी, तो दोनों राज्यों पर भारी ज़ुर्माना भी लगाया जा सकता है।

वहीं हरियाणा की तरफ़ से स्टेट विजिलैंस ने बताया कि पहले प्रदेश में 12 पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले विचाराधीन हैं। इसमें एक और मामला जुड़ गया है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व विधायक रामकिशन फौजी विनोद भ्याना, जरनैलसिंह, नरेश सेलवाल, राव नरेंद्र सिंह, रामनिवास, धर्मपाल छोक्कर, सुखबीर कटारिया और बलराज कुंडू आदि हैं। इसी तरह पंजाब में पूर्व और मौज़ूदा विधायकों के ख़िलाफ़ मामलों की सूची में सुखबीर बादल, रवनीत सिंह विट्टू, सुखपाल सिंह खैरा, सुच्चा सिंह लंगाह, प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सिकंदर सिंह, मोहन लाल, गुलजार रणिके, वीर सिंह लोपोके, बिक्रम सिंह मजीठिया और परमिंदर सिंह ढीढसा प्रमुख हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार राज्य सरकारें अब पहले की तरह जनप्रतिनिधियों पर दर्ज मामले आसानी से वापस नहीं ले सकेंगी। इसके लिए केंद्र सरकार को राज्यों में विशेष अदालतें गठित करने के लिए धन मुहैया कराने का भी निर्देश है; लेकिन इसे अभी तक पूरी तरह से अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। पंजाब और हरियाणा में ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में जनप्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ मामलों में सम्बन्धित पुलिस और एजेंसियाँ ढीला रुख़ अपनाये हुए हैं। झारखण्ड में दर्ज ऐसे मामलों की जाँच पाँच साल से जारी है, जबकि सामान्य मामलों में ऐसा नहीं होता। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की फटकार केवल पुलिस को नहीं, बल्कि अपरोक्ष तौर पर राज्य सरकार को भी है; क्योंकि पुलिस सरकार के नियंत्रण में ही है। जहाँ तक बात केंद्रीय एजेंसियों की है, उनकी जाँच राज्य की एजेंसियों के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर रही है।

बढ़ते मामले, धीमी जाँच

पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों के ख़िलाफ़ कुल 3096 मामले दर्ज हैं। इनमें से लगभग 962 मामले लगभग पाँच साल से लम्बित चल रहे हैं। इन मामलों की जाँच सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और एनआईए आदि कर रही हैं। सबसे ज़्यादा लम्बित मामलों में प्रवर्तन निदेशालय के हैं।

पाँच साल से ज़्यादा समय से लम्बित मामलों में ओडिशा ऊपर है। वहाँ 454 में से 323 का यह हाल है। महाराष्ट्र में कुल 482 में से 169, दिल्ली में कुल 93 में 27 ऐसे मामले हैं। महाराष्ट्र में ऐसे मामलों की संख्या 482, इसके बाद ओडिशा 454, केरल 384, मध्य प्रदेश 329 और तमिलनाडू में 260 हैं।

न्यायालय ने दिखायी सख़्ती

पंजाब एंड हरियाणा कोर्ट

पंजाब और हरियाणा ने जिस तरह से पूर्व और मौज़ूदा सांसदों-विधायकों पर दर्ज मामलों में क़ा रुख़ अपनाया है उसे देखते हुए जल्द ही दोनों राज्यों की सरकारें इस दिशा में सक्रिय होंगी। राज्य स्तर पर होने वाली जाँचों में न केवल तेज़ी आएगी वरन जाँच के बाद ट्रायल के लिए ज़रूरी मंज़ूरी के लिए गम्भीर प्रयास किये जाएँगे। उच्च न्यायालय के दोनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को ही पेश होने के समन नहीं समझा जाना चाहिए। यह दोनों राज्य सरकारों को भी एक तरह से नसीहत है।

चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश है। लिहाज़ा यहाँ के पुलिस महानिदेशक को भी अपने क्षेत्र से जुड़े मामलों की स्टेट्स रिपोर्ट आगामी सुनवाई के दौरान दाख़िल करनी है। जनप्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ बढ़ते मामले और लम्बित जाँच गम्भीर मामला है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर जिस तरह से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख़ अपनाया है उसे देखते हुए अन्य राज्यों में निकट भविष्य में हलचल हो सकती है। बरसों से बचते आ रहे कई जनप्रतिनिधि अब कठघरे में आएँगें।