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ब्लास्ट के आरोपी बरी, अफ़सरों पर कार्रवाई!

जयपुर में 13 मई, 2008 को एक के बाद एक आठ धमाकों से पूरा देश दहल गया था। 80 बेक़सूरों की मौत हुई, जबकि 176 घायल हो गये थे। लोअर कोर्ट ने मामले में 4 आतंकियों की फाँसी की सज़ा सुनायी थी। लेकिन अब राजस्थान हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद राजस्थान फिर दहल गया। जयपुर को ज़ख़्म देने वाले चारों आतंकी दोषमुक्त क़रार दिये गये। पीडि़तों के ज़ख़्म फिर से हरे हो गये। विशेष कोर्ट ने एक अन्य आरोपी शाहबाज़ हुसैन को दोषमुक्त क़रार दिया गया, तो पीडि़तों के ज़ख़्म फिर से हरे हो गये।

जयपुर ब्लास्ट के चार दोषियों सैफ़ुर उर्फ़ सैफ़ुर्रहमान मोहम्मद सरवर आज़मी, मोहम्मद सैफ़ उर्फ़ करीऑनव मोहम्मद सलमान की हाई कोर्ट से फाँसी रुकने और उन्हें बरी करने के फ़ैसले से हर कोई स्तब्ध है। बड़ा सवाल यही है कि 80 लोगों की जान लेने वाले और 176 से अधिक परिवारों को ज़ख़्मी करने वाले दोषी आख़िर बच कैसे गये? हाई कोर्ट उने जाँच एजेंसी एटीएस की जाँच पर सवाल खड़े करते हुए डीजीपी को कार्रवाई के निर्देश दिये हैं।

राजस्थान हाई कोर्ट ने जयपुर सीरियल बम ब्लास्ट मामले की जाँच में गम्भीर ख़ामियाँ गिनाते हुए दोषियों की फाँसी की सज़ा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने डीजीपी और अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिये हैं। साथ ही कहा कि जाँच एजेंसी कड़ी से कड़ी जोडऩे में नाकाम रही है और लगता है, जाँच अधिकारियों को क़ानून की जानकारी ही नहीं थी। कोर्ट ने इस मामले में मुख्य सचिव से भी निगरानी रखने को कहा है।

इस घटना का अतीत खंगालते तो दहशत की वो तारीख़ 13 मई, 2008 थी। ढलते सूरज के साथ ही जयपुर दहल उठा। 13 मिनट में हुए आठ बम विस्फोटों ने ऐसी चीख-पुकार मचायी कि संगदिल $िकस्म के श$ख्स भी काँप गये। आरती से सजी थालियाँ ही नहीं उड़ी। उन्हें उठाये हुए हाथ भी उड़ गये। आरती के स्वर आर्तनाद में बदल गये। बम विस्फोटों की ज़द में जो भी आया, अपंग हो गया अथवा जान गँवा बैठा। जयपुर के सबसे •यादा रौनक़ वाले ठोर-ठिकाने धुएँ और आग की लपटों में घिर गये। मंदिरों और बाज़ारों का नज़ारा तो बुरी तरह खौफ़ज़दा करने वाला था, जिसने 1993 के मुंबई विस्फोटों के दर्दनाक मंज़र की यादें ताज़ा कर दी। इस आतंकवादी हमले ने गुलाबीनगर के परकोटे की दीवारों को खून से सुर्ख कर दिया। आतंकवादियों के निशाने पर जयपुर के मुख्य हनुमान मंदिर चांदपेाल स्थित पूर्वामुखी और सांगानेरी गेट स्थित हनुमान मंदिर रहे। बम ब्लाट के छर्रों, भगदड़ और जबरदस्त अफ़रातफ़री भी कइयों के लिए जानलेवा बनी। आतंक का कहर 80 लोगों को निगल गया। घायल हुए कोई 170 लोग आज भी अपंगता का अभिशाप भोग रहे हैं। 20 दिसंबर को विशेष न्यायालय ने सिलसिलेवार बम धमाके में चार आतंकवादियों को मौत की सज़ा सुनायी। न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा ने दोषियों को सज़ा का ऐलान करते हुए सबसे पहले सैफ़ुर्रहमान को सज़ा सुनायी। फिर मोहम्मद सरवर मोहम्मद सैफ़ और सलमान को अलग-अलग धाराओं में सज़ा सुनायी। कोर्ट ने सभी दोषियों को भा.द.स. की धारा-302 और धारा-16(1) में मृत्यु दंड से दंडित किया। न्यायाधीश ने चारों आरोपियों को बम प्लांट करने के लिए चार मामलों में जहाँ मुख्य तौर पर दोषी ठहराया, वहीं चार मामलों में बम रखने में सहयोग करने और आपराधिक षड्यंत्र रचने के लिए दंडित किया। चारों आरोपियों के चेहरों पर मृत्यु दंड सरीखी सज़ा का लेशमात्र भी रंज नहीं था। इसके विपरीत अपनी दरिंदगी पर वे हँसते-खिलखिलाते नज़र आये। उनका कहना था- ‘हम हाई कोर्ट में सज़ा को चुनौती देंगे। इस मामले में बरी किये गये शाहबाज़ की नज़ीर देते हुए उनका कहना था- ‘जिस आधार पर शाहबाज़ को बरी किया गया। उन्हीं में दूसरों को सज़ा मिली है। हम इसी तर्क पर हाई कोर्ट में अपील करेंगे।

हालाँकि विशेष लोक अभियोजक चंद का कहना था कि न्यायालय ने दस्तावेज़ और साक्ष्य के आधार पर फ़ैसला किया है। इसमें कहीं कोई ख़ामी नहीं है। उनका कहना था- ‘शाहबाज़ को बरी किये जाने को हम हाई कोर्ट में चुनौती देंगे।

हालाँकि इससे पहले 19 दिसंबर को मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी दलीले देते गिड़गिड़ाते नज़र आये कि ‘हम प्रतिष्ठित परिवार के हैं। हमारा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन विद्वान जज ने कहा- ‘अभी सज़ा के बिन्दु पर बहस है, जो अपील करनी है, हाई कोर्ट में करना। अगले दिन अपने फ़ैसले में न्यायाधीश अपने फ़ैसले में लिखा कि अभियुक्तों के कम उम्र होने, स्टूडेंट होने या कुलीन परिवार का होने से छूट नहीं मिल जाती कि वे निर्दोष लोगों की हत्या करें। न्यायाधीश ने कहा- ‘इनका सम्बन्ध इंडिया मुजाहिदीन से होना पाया गया है। अभियुक्तों का अपराध विरल से विरलतम श्रेणी में आता है। ऐसे अपराध के लिए मृत्युदंड के अलावा और कोई दंड नहीं हो सकता। आतंक फैलाकर लोगों की हत्या करने वाले अभियुक्तों के जीवित रहने से समाज को ख़तरा है।

इस मामले में एसआईटी की चार्जशीट का ब्योरा खंगाले, तो मोहम्मद सैफ़ अपने आठ साथियों के साथ दिल्ली से ज़िन्दा बम थैलों में रखकर बस से जयपुर आया था। जयपुर में अलग-अलग जगह से नो साइकिलें ख़रीदी। बम पलांट करने के बाद इन्हें अलग अलग जगह खड़ा किया। विस्फोटों का वीडियो बनाया और ट्रेन से दिल्ली लौट गये।

जयपुर बम ब्लास्ट मामलों के विशेष न्यायालय ने 20 दिसंबर, 2019 को हत्या और राजद्रोह के साथ विस्फोटक अधिनियम के अंतर्गत दोषी मानते हुए मोहम्मद सैफ़, सैफ़ुर्रहमान सरवर आज़मी और मोहम्मद सलमान को फाँसी की सज़ा सुनायी थी। न्यायमूर्ति पंकज भंडारी और न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने फाँसी की सज़ा के निर्णय के ख़िलाफ़ चारों अपीला करने वालों की 15 अपीलें मज़ूर कर ली। कोर्ट ने चारों अपील करने वालों के डेथ रेफरेंस की पुष्टि भी नहीं की। कोर्ट ने शाहबाज़ को बरी करने के ख़िलाफ़ राज्य सरकार की अपीलों को ख़ारिज कर दिया। जिन साक्ष्यों और दलील के आधार पर उन्हें जयपुर बम ब्लास्ट की विशेष अदालत ने क़रीब सवा तीन साल पहले फाँसी सुनायी थी, हाई कोर्ट ने उन्हीं आधारों की पुन: विवेचना की तो आरोप साबित नहीं हो सके। नतीजतन सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।

अब सवाल यह उठता है कि फिर सिलसिलेवार आठ बम ब्लास्ट में जान गँवाने वाले 71 लोगों के हत्यारे कौन है? उन्हें कब पकड़ा जाएगा और कब 71 आत्माओं को शान्ति व परिजन को न्याय मिलेगा? ब्लास्ट हुआ, आरोपी पकड़े, अदालत में दलीलें रखीं और फिर फाँसी की सज़ा सुनायी। यह सब सच है, तो फिर झूठ क्या है? झूठ है, उन मृतकों के परिजन और 185 लोगों को अब तक दिया गया दिलासा कि एक न एक दिन उन्हें न्याय ज़रूर मिलेगा। जयपुर बम ब्लास्ट में चार आरोपियों की फाँसी की सज़ा हाई कोर्ट से रद्द होने के पीछे सबसे बड़ा कारण वकीलों की फ़ौज थी। आरोपियों की ओर से 18 वकीलों ने मुक़दमा लड़ा, जिनमें कई सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के वकील है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि ये 18 वकील आख़िर कौन थे और इनका ख़र्च किसने उठाया?

पड़ताल में सामने आया कि वकीलों की इस फ़ौज के पीछे एनएलयू (नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी) दिल्ली के वकीलों का ग्रुप ‘प्रोजेक्ट-39 ए’ है। इस ग्रुप ने बिना कोई फीस लिये यह मुक़दमा लड़ा। इसी के वकीलों की फ़ौज ने राजस्थान एटीएस की जाँच के सभी मुद्दों को तथ्यहीन साबित कर दिया। ‘प्रोजेक्ट-39ए’ की टीम फाँसी के 80 मामलों में देश भर में वकील मुहैया कराती है। लोअर कोर्ट में फाँसी की सज़ा मिलने के बाद परिजनों ने विधिक सेवा क़ानून के तहत प्रदेश सरकार की ओर से मुहैया कराये गये न्याय मित्रों की जगह ‘प्रोजेक्ट-39ए’ से मुक़दमा लडऩे का आग्रह किया था। इसके बाद ‘प्रोजेक्ट-39ए’ के विभेर जैन, निशांत व्यास, मुजाहिद अहमद व रजत आदि ने मुक़दमा लड़ा। इनकी वकालत मात्र 5-7 साल की है।

ब्लास्ट की ज़िम्मेदारी लेने के लिए जहाँ से ईमेल भेजी गयी, उस कैफे के कम्प्यूटर व रजिस्टर ज़ब्त नहीं किये। अन्य सुबूत जुटाने के लिए स्थानीय पुलिस को जाँच में शामिल नहीं किया। मीडिया हाउस को मिले ओरिजिनल ईतमेल की जगह फॉरवर्ड फाइल पेश की। साबित नहीं हुआ कि मेल शाहबाज़ ने किया। कोर्ट में ‘65बी’ सर्टिफिकेट भी नहीं दिया गया, जिससे ईमेल की वैद्यता साबित होती। मीडिया हाउस के एडिटर व तत्कालीन एडीजी जैन की गवाही नहीं करायी। जाँच एजेंसी अहमदाबाद बम ब्लास्ट के तथ्य जुटाने वहाँ गयी। बताया कि इसके तार इन्हीं आरोपियों से जुड़े हैं। लेकिन पाँच साल बाद बताया कि अहमदाबाद में किससे मिले और क्या सुबूत लाये?

प्रताडऩा के शिकार आदिवासी-वनवासी

आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन आश्रित समुदायों का सदियों से जंगलों से रिश्ता है। वे सदियों से वनों एवं वनों में निवास करने वाले सभी जीव-जंतुओं से सामंजस्य के साथ जी रहे हैं और अपने अधिकतर ज़रूरतों की पूर्ति भी जंगलों से ही करते रहे हैं। लेकिन जबसे वन क्षेत्र वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आया है, तबसे अनेक प्रकार के औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक क़ानूनों के ज़रिये वन विभाग आदिवासियों और वन आश्रित समुदायों का, उनके सामाजिक-आर्थिक प्रथाओं, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों का अपराधीकरण करता रहा है। सामान्य गतिविधियों के लिए भी वन विभाग आदिवासियों को दंडित किया, मामले दर्ज कर जेलों में ठूँस दिया, जहाँ वे वर्षों से विचाराधीन क़ैदी हैं। आज वन विभाग जिन वनों पर दावा कर रहा है और वन्य जीवों का संरक्षक होने का दंभ भरता है, वह प्रकृति के प्रति, जंगलों एवं वन्य जीवों के प्रति आदिवासियों एवं वन आश्रित समुदायों की आस्था का ही परिणाम है। फिर भी वन विभाग आदिवासियों और वन आश्रित समुदायों को अपराधी घोषित कर दंडित करने से पीछे नहीं हटता। मध्य प्रदेश में वन विभाग द्वारा आदिवासियों एवं वन आश्रित समुदायों पर अत्याचार की हदें पार करते हुए सामान्य गतिविधियों के लिए भी गंभीर रूप से दण्डित किया है।

पिछले दिनों भोपाल स्थित क्रिमिनल जस्टिस एवं पुलिस एकाउंटेबिलिटी (सीपीए) प्रोजेक्ट द्वारा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मध्य प्रदेश में दर्ज मुक़दमों से जुड़े पुलिस और वन विभाग द्वारा सार्वजनिक किये गये आँकड़ों का विश्लेषण किया गया और मंडला तथा बालाघाट ज़िले में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास के क्षेत्र में अभियुक्त और उनके परिवार, वकील (अभियोजन और बचाव पक्ष), वन विभाग और पुलिस अधिकारियों, जन संगठनों के प्रतिनिधियों और संरक्षणवादियों से संवाद के आधार पर अध्ययन कर ‘वाइल्ड इन पुलिसिंग : मध्य प्रदेश के जंगलो में अपराधिकरण का राज’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की गयी, जो आदिवासियों और वन आश्रित समुदायों के नज़रिये से काफ़ी चिन्ताजनक है। इस रिपोर्ट को देख मध्य प्रदेश के कई आदिवासी संगठनों एवं जनप्रतिनिधियों ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को विगत माह पत्र भी लिखा। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में मछली पकडऩे, सूखी लकड़ी, मशरूम, शहद और अन्य वन उपज एकत्रित करने के मामले आदिवासियों और वन आश्रित समुदायों पर दर्ज किये गये हैं, जबकि वन अधिकार अधिनियम-2006 की धारा-3(1) (ब), (स) और (ड) के तहत इन लोगों को स्थानीय जल स्रोतों से मछली पकडऩे और अन्य उत्पादों को एकत्र करने का अधिकार दिया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, मंडला और बालाघाट ज़िले में मछली पकडऩे के 2010-20 के बीच 134 मामले, 2016-2020 के बीच जंगली सूअर के 1,414 मामले दर्ज किये गये। रिपोर्ट में जंगली सूअर को भी एक समस्या के रूप में रेखांकित करते हुए कहा गया है कि जंगली सूअर की वजह से फ़सल का नुक़सान और आजीविका का संकट आदिवासी और वन आश्रित किसानों के साथ संघर्ष का कारण बनता है। किसानों के आत्मरक्षा अधिनियम को दरकिनार कर वन विभाग उन पर आपराधिक कार्रवाई करता है। जबकि तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश एवं उत्तराखण्ड जैसे राज्यों ने अनेक बार यह माँग उठायी है कि जंगली सूअर को वर्मिन प्रजाती (पीडक़ जन्तु) घोषित किया जाए, ताकि फ़सल एवं जान माल की सुरक्षा की जा सके और वन आश्रित समुदायों का अपराधीकरण न हो। उक्त रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत मध्य प्रदेश के जंगलों में बड़े पैमाने पर अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन आश्रित समुदायों का अपराधीकरण हो रहा है। साथ ही अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 के तहत जिन अधिकारों को मान्यता प्राप्त हुई है, उनका भी वन विभाग द्वारा अपराधीकरण हो रहा है।’

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का भाग-4 आदिवासियों और वनाश्रित समुदायों को जंगल में निवास के आधार पर ही अपराधी बना देता है, जो संज्ञेय और ग़ैर-जमानती हैं। अधिनियम का अध्याय-4 (अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान) जंगल को संरक्षित क्षेत्रों की एक श्रेणी बनाता है और इन क्षेत्रों में सामान्य गतिविधियों, जैसे- किसी भी व्यक्ति को किसी सीमा चिह्न को बदलने, नष्ट करने या विरूपित करने की अनुमति नहीं है। आग लगाना और किसी भी विस्फोटक पदार्थ का उपयोग करना; किसी भी जंगली जानवर को चिढ़ाना, छेडऩा या संरक्षित क्षेत्रों के मैदान में गंदगी फैलाना, अनुमति के बिना इन क्षेत्रों में प्रवेश करना; वन उपज सहित किसी भी वन्य जीवन को नष्ट करना, उसका दोहन करना या हटाना; किसी वन्य प्राणी के आवास को नष्ट करना, क्षति पहुँचाना या मोडऩा या क्षेत्र में पानी के प्रवाह को मोडऩा, रोकना या बढ़ाना है; किसी हथियार के साथ संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करना, ये सभी अपराध हैं। इन मामलों पर कार्रवाई करते समय, क्षेत्रों में पहले से मौज़ूद किसी भी आजीविका के मामले, फ़सल इत्यादि को ध्यान रखना ज़रूरी नहीं माना गया है और यह पूरी तरह से सरकार के विवेक पर छोड़ दिया गया है। इसलिए यदि आप ऐसे जंगल के अंदर रहने वाले एक ऐसे समुदाय से संबंधित हैं, जो अब अधिनियम के तहत संरक्षित क्षेत्र के रूप में घोषित है, तो आप केवल निवास के आधार पर अपराधी होंगे। इन अपराधों की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम धारा-50 अन्य सभी प्रावधानों को ओवरराइड करती है। यह वनाधिकारियों को अधिकार देता है कि वे किसी भी समय लोगों को कहीं भी रोक सकते हैं। किसी भी सामान को ज़ब्त कर सकते हैं। निरीक्षण की आवश्यकता समझकर कोई भी जाँच या पूछताछ कर सकते हैं। धारा-50(8) अधिभावी प्रभाव के साथ फिर से वारंट जारी करने और गवाहों की उपस्थिति की माँग करने के लिए अधिकारियों को सशक्त बनाती है।

हालाँकि ये दोनों प्रावधान आपराधिक न्यायशास्त्र में असामान्य नहीं हैं: लेकिन उनके कार्यवाही और संचालन की प्रक्रिया गंभीर हैं। वे प्रक्रिया का एक ऐसा ढाँचा तैयार करते हैं, जो एक आदिवासी के सामान्य गतिविधियों को भी सख़्त ढंग से दंडित करने का अधिकार दे देता है। किसी क्षेत्र में प्रवेश करने या यहाँ तक कि कूड़ा डालने जैसी मामूली चीज़ का संदेह भी अधिकारियों को कार्यवाही करने की सभी शक्तियाँ प्रदान करता है।

विदित हो कि आदिवासियों एवं पारंपरिक वनाश्रित समुदायों पर देश की संसद ने 150 वर्षों से ऐतिहासिक अन्याय होना स्वीकार करते हुए उन अन्यायों को दूर करने के लिए वन अधिकार अधिनियम-2006 पारित किया, जो जनवरी, 2008 से लागू है। वन अधिकार अधिनियम-2006 आदिवासियों एवं अन्य पारंपरिक वनाश्रित समुदायों के वन संसाधन सम्बन्धी उन अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है, जिन पर ये समुदाय विभिन्न प्रकार की ज़रूरतों के लिए निर्भर थे, जिनमें आजीविका, निवास और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताएँ शामिल हैं। वन अधिकार अधिनियम-2006 के लागू होने के पश्चात् केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय एवं राज्य सरकारों द्वारा आदिवासियों एवं अन्य पारंपरिक वन आश्रित समुदायों पर दर्ज ऐसे आपराधिक मामलों की समीक्षा कर उन्हें $खारिज किया जाना था, जिसका वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत अधिकार प्रदान किया गया है। लेकिन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय एवं राज्य सरकारों की उदासीनता के चलते लगभग 170 वर्षों से अन्याय झेल रहे आदिवासियों / परंपरागत वनाश्रित समुदायों को आज भी वन विभाग अपराधी मानकर उनके साथ अन्याय और अत्याचार कर रहा है।

पिछले 50 वर्षों से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जंगल-ज़मीन के मामलों पर कार्य करने वाले वरिष्ठ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अनिल गर्ग कहते हैं कि व्यापक पैमाने पर जंगलों, जैव विविधता, वन्य प्राणियों का विनाश स्वयं वन विभाग एवं वानिकी प्रबंधकों ने ही किया है और दुष्प्रचार कर इसके लिए आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन आश्रित समुदायों को ज़िम्मेदार ठहराने की साज़िश करते हैं। अनिल गर्ग कहते हैं कि ‘वन विभाग एवं वानिकी प्रबंधकों ने म.प्र. आखेट अधिनियम-1935 के तहत अक्टूबर, 1971 तक शेर, चीता, बाघ, तेंदुआ, हिरण, चीतल, सांभर एवं अन्य वन्य प्राणियों के शिकार का लाइसेंस बाँटता रहा जो धनाढ्य वर्ग, पूँजीपति वर्ग, राजा महाराजा के मनोरंजन के साधन थे और 11 नवंबर, 1971 को वन्य प्राणियों के शिकार पर प्रतिबंध की अधिसूचना प्रकाशित कर ख़ुद को वन्य प्राणियों का सबसे बड़ा संरक्षणकर्ता बताने लगा तथा जंगलों पर आश्रित समुदायों के विरुद्ध नये-नये दुष्प्रचार, साज़िश एवं षड्यंत्र प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार वन विभाग एवं वानिकी प्रबंधक सदियों से अन्याय सह रहे जंगलों पर आश्रित समुदायों के साथ बार-बार ऐतिहासिक अन्याय को दोहराये जा रहा है।’

जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. इंद्रपाल मरकाम ने पिछले महिने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिखकर अवगत कराया कि ‘वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम-1972 में हाल ही में हुए 2022 के संशोधन के माध्यम से वन्य जीव के संरक्षित प्रजातियों की सूची को और बढ़ा दिया गया है और इस क़ानून के प्रावधनों का उल्लंघन करने पर दंड की राशि भी बढ़ा दी गयी है। यह बहुत चिन्ता का विषय है कि कुछ अपवादों को छोडक़र, संसद में भी अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन आश्रित समुदायों पर इस अधिनियम के वास्तविक प्रभाव पर गंभीर चर्चा नहीं हुई और न ही 2022 संशोधन ने इस चिन्ताजनक विषय पर $गौर किया है। इस सन्दर्भ में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत दर्ज आपराधिक मामले और वन आश्रित समुदायों और हमारे वन अधिकारों पर प्रभाव की चर्चा संरक्षण की बहस से बाहर रह जाती है, क्योंकि इस विषय पर अधिनियम-1972 के 50 वर्ष के बाद भी कोई पुख़्ता शोध नहीं की है। मध्य प्रदेश में हमारा अनुभव यह दर्शाता है कि इस संशोधन और साथ ही वन संरक्षण नियमों (जिस पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी अपनी आपत्ति दर्ज की) में आये 2022 के संशोधन से आदिवासी एवं वनाश्रित समुदायों के वन अधिकारों को क्षति पहुँचेगी और उनका अपराधीकरण और बढ़ेगा।’

तमाम क़ानूनों को आधार बनाकर आदिवासियों एवं परंपरागत वनाश्रित समुदायों को अलग-थलग कर दिया जाता है, उन्हें उनके जंगलों से भगा दिया जाता है और क़ानूनी प्रणाली के तहत न्याय-अन्याय की एक ऐसी खायी बनायी जाती है, जिससे सदियों से अन्याय सहने वाले वनाश्रित लोगों को ही अपराधी मान लिया जाता है। वनों में रह रहे आदिवासी और वनाश्रित समुदाय सदियों से वनों और वन्य जीवों के साथ सामंजस्य बिठाकर उनका संरक्षण कर रहे हैं। जंगलों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर वहाँ निवास कर रहे लोगों को नियमों के तहत अपराधी मान लेना उचित नहीं है।

आमतौर पर आदिवासियों एवं वनाश्रित समुदायों को प्रकृति का सबसे अच्छा संरक्षणवादी माना जाता है, क्योंकि वे आध्यात्मिक रूप से प्रकृति से सबसे अधिक क़रीब रहते हैं। आदिवासियों और वनाश्रित समुदायों पर सदियों से चले आ रहे ऐतिहासिक अन्यायों का $खत्मा हो तथा उन्हें उनके असल हक मिले उनके तमाम परंपरागत अधिकारों को क़ानूनी मान्यता मिले, वन अधिकार अधिनियम-2006 का सही ढंग से कार्यान्वयन हो यह केंद्र सरकार, वन विभाग और राज्य सरकारों की मंशा होनी चाहिए, तभी वनों और वन्य जीवों को संरक्षण होगा और आदिवासियों तथा अन्य परंपरागत वनाश्रित समुदायों को न्याय मिल सकेगा।

नक्सलवाद से जूझता झारखण्ड

झारखण्ड में हर दिन नक्सल हमले, नक्सलियों के मारे जाने, तो जवानों के घायल होने की सूचनाएँ अलग-अलग ज़िलों से मिलती रहती हैं। एक दिन नक्सलियों के सरेंडर और मुठभेड़ में मरने की जानकारी मिलती है, तो दूसरे दिन नक्सलियों के तांडव की सूचना आती है। 3 अप्रैल 2023- पाँच नक्सली ढेर। 19 जनवरी, 2023- एक नक्सली ढेर। 17 फरवरी, 2023- नक्सलियों ने पंचायत भवन उड़ाया। 08 अप्रैल, 2023- नक्सलियों ने तीन जगहों पर 10 ट्रैक्टर और हाईवा को आग के हवाले किया। 11 जनवरी 2023- सर्च के दौरान आईईडी ब्लास्ट, पाँच जवान घायल हुए। 10 फरवरी, 2023- 15 लाख का इनामी नक्सली ने सरेंडर किया। एक-दूसरे को काटती ये ख़बरें सोचने को मजबूर करती हैं कि क्या वार्क़ राज्य में नक्सल प्रभाव कम हो रहा है? क्या राज्य नक्सल समस्या से मुक्ति की ओर बढ़ रहा? या सुरक्षा बल और पुलिस कार्रवाई करती है, तो वह उसका जवाब देते हैं। नक्सली अब भी अपनी धमक को बरक़रार रखने में कामयाब हैं? क्या राज्य नक्सल समस्या से मुक्त नहीं हो पाएगा?

नक्सलवाद की शुरूआत

नक्सलवाद शब्द पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव के नाम से निकला है। क्योंकि सर्वप्रथम नक्सलवादी विद्रोह यहीं हुआ था। यह विद्रोह स्थानीय ज़मींदारों के ख़िलाफ़ उत्पन्न हुआ, जिन्होंने भूमि विवाद को लेकर एक खेत मज़दूर को पीटा था। नक्सली आन्दोलन पश्चिम बंगाल में 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ। देश में सन् 1968 से 1972 के बीच कई नक्सलाबाड़ी दिखने लगे। यह धीरे-धीरे छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखण्ड तक फैलता चला गया। 60 और 70 के दशक में भले ही यह क्रान्ति कामयाब नहीं हुआ हो; लेकिन जो मुद्दे ये उठा रहे थे, वे बने रहे। इस वजह से आन्दोलन फिर से मज़बूत होने लगा। उसे बौद्धिक वर्ग का भी समर्थन मिलने लगा। वर्ष 1977 से 2003 के बीच नक्सल आन्दोलन का दूसरा चरण चला। इस दौरान कई संगठन उठ खड़े हुए। बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में नक्सलवाद बेहद मज़बूत हुआ। इस विस्तार को देखते हुए सरकार ने इन्हें ख़त्म करने के लिए सघन अभियान शुरू कर दिया। हालाँकि इनसे निपटना आसान नहीं था। यही वजह है कि झारखण्ड समेत कई राज्य आज भी नक्सली साये में हैं। उनकी धमकी समय-समय पर देखने के लिए मिल जाती है।

गम्भीर समस्या

झारखण्ड में वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद सन् 1980 में शुरू हुई। इसके बाद कई संगठन नक्सलवाद में सक्रिय हो गये। मौज़ूदा में माओवादी, टीपीसी, जेपीसी, पीएलएफआई समेत अन्य संगठन सक्रिय हैं। एक समय था, जब राज्य के 24 में 22 ज़िले नक्सल प्रभावित थे। केंद्र और राज्य सरकार लगातार प्रयास से धीरे-धीरे कुछ ज़िले नक्सल मुक्त हुए हैं।

मौज़ूदा समय में 16 ज़िले गुमला, लातेहार, लोहरदगा, पलामू, रांची, सरायकेला-खरसावां, बोकारो, चतरा, धनबाद, दुमका, पूर्वी सिंहभूम, गढ़वा, गिरिडीह, हज़ारीबाग़, खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम नक्सल प्रभावित माने जाते हैं। हालाँकि इनमें से कुछ ज़िलों में धीरे-धीरे प्रभाव कम होता दिख रहा है। इसकी मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लगातार नक्सल विरोधी अभियान चलाना है।

पाँच नक्सली ढेर

झारखण्ड पुलिस ने नक्सल विरोधी अभियान में हाल के दिनों में सबसे बड़ी कामयाबी 3 अप्रैल 2023 को मिली। चतरा ज़िला के लावालौंग इलाके में हुई मुठभेड़ में पाँच माओवादियों को मार गिराया। मारे गये माओवादियों में पाँच से 25 लाख तक के इनामी शामिल हैं। उनके पास से दो एके 47 और दो इंसास राइफल समेत कई हथियार बरामद किये गये हैं। मारे गये माओवादियों की पहचान गौतम पासवान, चार्लीस उरांव, नंदू, अमर गंझू और संजीत उर्फ़ सुजीत गुडिय़ा के रूप में की गयी। इनमें गौतम और चार्लीस माओवादियों की स्पेशल एरिया कमेटी (सैक) के सदस्य थे। उन पर 25-25 लाख रुपये का इनाम था। नंदू, अमर गंझू और संजीत सब जोनल कमांडर थे और उन पर 5-5 लाख रुपये का इनाम था। इन पर झारखण्ड और बिहार के विभिन्न थानों में 247 मामले दर्ज हैं। इस मुठभेड़ के एक दिन बाद पुलिस ने पलामू ज़िले से पाँच लाख का इनामी माओवादी कमांडर नंदकिशोर यादव उर्फ़ ननकुरिया को ज़ख़्म हालत में गिरफ़्तार किया। वह मुठभेड़ के बाद फ़रार हो गया था। उसके पास कई हथियार बरामद किये गये हैं।

साल भर की कार्रवाई का नतीजा

झारखण्ड में राज्य की पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की ओर से नक्सलियों के ख़िलाफ़ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। जनवरी, 2022 से फरवरी, 2023 तक 12 नक्सली मारे गये। इस महीने चतरा में पाँच नक्सलियों को मारा गया। यानी 15 महीनों में कुल 17 नक्सली ढेर हुए। बीते एक साल में 390 नक्सलियों को गिरफ़्तार किया गया। इन पर कुल 72 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इनमें 3 सैक मेंबर, 4 जोनल कमांडर, 7 सब जोनल कमांडर और 16 एरिया कमांडर भी शामिल हैं। पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाई के बीच नक्सली सरेंडर पॉलिसी के तहत आत्मसमर्पण भी किया।

वर्ष 2022 के जनवरी से अब तक विभिन्न नक्सली संगठनों के छोटे-मोटे के अलावा 15 हार्डकोर नक्सलियों ने सरेंडर किया है। विमल यादव, महाराज प्रमाणिक, सुरेश सिंह मुंडा, भवानी सिंह खेरवार, विमल लोहरा, अभयजी जैसे कुख्यात नक्सलियों का आत्मसमर्पण हुआ। इन सब पर मिलाकर कुल 49 लाख का इनाम भी घोषित था। बीते एक साल के अभियान में एके-47 समेत 171 हथियार बरामद हुए। वहीं रेग्यूलर वेपन के साथ साथ कंट्री मेड कुल 94 हथियार के अलावा पुलिस से लूटे हुए 45 हथियार, 17,000 किलो से अधिक के विस्फोटक, आईईडी-800 किलो, बारूद-530 किलो और एक करोड़ तीन लाख रुपये भी नक्सलियों के पास से पुलिस ने बरामद किये हैं।

नक्सली धमक और धमकी

एक ओर पुलिस और सुरक्षा बल की कार्रवाई चल रही, तो दूसरी ओर नक्सली भी अपनी धमक दिखाने से बाज़ नहीं आ रहे। हाल में 7 अप्रैल को नक्सलियों ने राज्य के तीन इलाक़ों बोकारो, गोला और लोहरदगा में निर्माण कार्य में लगे आठ ट्रैक्टर और जेसीबी को आग के हवाले कर दिया। मज़दूरों की पिटाई की। बम विस्फोट कर दहशत फैलाने का प्रयास किया। पुलिस एक ओर जंगल में नक्सलियों का कैंप ध्वस्त कर रही, दूसरी ओर नक्सली नयी जगह पर पनाह ले रहे और अपनी मौज़ूदगी दर्ज करा रहे हैं, जिसका सबूत 10 अप्रैल को बिशुनपुर क्षेत्र की है। यहाँ वर्षों बाद नक्सलियों ने एक बार फिर अपनी मौज़ूदगी दिखा दी है। सडक़ निर्माण में लगे रोड रोलर और पेवर मशीन को आग लगा दी।

अभियान के साथ बढ़तीं घटनाएँ

आंतरिक सुरक्षा और नक्सल अभियान के जानकारों का कहना है कि जब नक्सलियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बल अभियान तेज़ करते हैं तो घटनाओं का बढऩा लाज़िमी है। नक्सली मुठभेड़ में मारे जाएँगे। उनकी गिरफ़्तारी होगी। वह सरेंडर करने के लिए मजबूर होंगे। नक्सलियों के कैंप  ध्वस्त किये जाएँगे। तो ऐसी स्थिति में वह नयी जगह पर पनाह लेने का प्रयास के साथ-साथ अटैकिंग मोड थोड़ा बहुत बढ़ा देते हैं।

लैंड माइंस बिछाकर सुरक्षा बल को रोकने का प्रयास। दहशत फैलाने के लिए ट्रैक्टर और जेसीबी जलाना। लेवी के लिए दबाव डालना। यह सब नक्सली करेंगे ही। इसलिए जब भी सुरक्षा बल अभियान चलाते हैं, तो थोड़ी-बहुत घटनाएँ देखने को मिलती हैं। इसका अर्थ कतई यह नहीं निकाला जा सकता है कि नक्सली घटनाएँ बढ़ गयी हैं। या नक्सल समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। अगर ग़ौर किया जाए, तो दिखेगा कि कई क्षेत्रों में नक्सलियों का प्रभाव कम हो रहा है।

बढ़ रही जागरूकता

जानकारों का कहना है राज्य में नक्सलियों के सबसे बड़े और दुर्गम गढ़ बूढ़ा पहाड़ पर अब सुरक्षा बलों और पुलिस का क़ब्ज़ा है। यहाँ 22 साल में पहली बार नक्सलियों के कैंप पूरी तरह ध्वस्त कर दिये गये। पुलिस और सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के ख़िलाफ़ बीते एक साल में तीन ऑपरेशन चलाये। इनके नाम ऑपरेशन डबलबुल, ऑपरेशन ऑक्टोपस और ऑपरेशन थंडर स्ट्रॉम थे। पुलिस को इसमें सफलता हासिल हुई है। नक्सलियों से मुक्त कराये गये क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के 22 नये कैंप स्थापित किये गये हैं। जानकारों का कहना है कि टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया से लोग ख़ासकर युवा वर्ग जागरूक हो रहे हैं। अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार होने के कारण नयी पीढ़ी को भ्रमित करना आसान नहीं रह गया है। कार्य में बाधा डालने वालों को क्षेत्र की जनता माफ़ नहीं करेगी। केंद्र और राज्य सरकार हो या पुलिस और सुरक्षा बल के अधिकारी उनके द्वारा नक्सलियों के सफाए के दावों में दम है। हमें उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य नक्सल समस्या से पूरी तरह मुक्त होगा और इससे प्रभावित क्षेत्र की जनता के लिए विकास और संपन्नता की नयी शुरुआत होगी।

आफ़त की बारिश से किसान बेहाल

बेमौसम बारिश, तेज़ अंधड़ और ओले गिरने से पंजाब, हरियाणा समेत राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में गेहूँ और सरसों आदि की फ़सलों को व्यापक स्तर पर नुक़सान पहुँचा है। पंजाब और हरियाणा के ज़्यादातर ज़िलों में 25 प्रतिशत से लेकर 75 प्रतिशत तक गेहूँ की फ़सलें ज़मीन पर बिछ गयी हैं। इससे गेहूँ का दाना न केवल पतला होगा, वरन् वह काला पड़ जाएगा।

दोनों राज्यों के कुछ ज़िलों में गेहूँ की फ़सल न केवल ज़मीन पर गिर गयी, बल्कि कुछ दिनों तक पानी में डूबी रही। यह एक तरह से पूरी बर्बादी ही है। रबी की फ़सल के दौरान जनवरी से मार्च अंत तक बेमौसम बारिश आती ही है; लेकिन इस बार वह अपने साथ आँधी और ओलावृष्टि लेकर आयी। दो से तीन दिन तक रुक-रुक हुई बारिश ने फ़सल को धूप भी नहीं लगने दी।

जनवरी के दौरान बारिश गेहूँ और सरसों की फ़सल वरदान की तरह होती है। लेकिन उस दौरान यह कम हुई; लेकिन इससे दोनों फ़सलों में जैसे जान आ गयी थी। उस दौरान कृषि विभाग ने बंपर उत्पाद की संभावना जतायी थी। फरवरी में बारिश और तेज़ आँधी के बावजूद फ़सलों को आंशिक नुक़सान हो रहा था। सोचा यह जा रहा था कि इसके बाद लगातार धूप रहने से सब कुछ ठीक हो जाएगा; लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर मध्य मार्च के बाद और अप्रैल के पहले सप्ताह तक दोनों राज्यों में जैसे प्राकृतिक आपदा ने पाँव ही पसार लिये।

मार्च के अन्त और अप्रैल के पहले सप्ताह में ज़ोरदार बारिश, अंधड़ और ओलावृष्टि ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। ज़रूरत के समय जो किसान आसमान की ओर टकटकी लगाकर बादलों के छाने का इंतज़ार करता है वह किसान इस दौरान उनक छँटने का इंतज़ार करता दिखा। प्राकृतिक आपदाएँ कृषि के लिए हमेशा आफ़त ही बनती रही हैं। बहुत बार रबी या ख़रीफ़ की पूरी फ़सल ही चौपट होती रही है। पर अब स्थिति कुछ बदली है।

केंद्र और राज्य सरकारों की फ़सल बीमा योजना से आंशिक भरपाई की उम्मीद जगी है। पंजाब और हरियाणा सरकारों ने 100 प्रतिशत फ़सल ख़राब पर 15,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवज़े की घोषणा की है। राशि बढ़ाने के लिए दोनों राज्यों में किसान संगठनों ने ब्लाक, ज़िला और राज्य स्तर पर प्रदर्शन भी किये। मुआवज़ा राशि में पिछले साल से कुछ बढ़ोतरी की है; लेकिन किसान की लागत के मुक़ाबले यह बहुत कम है। साथ ही कई जगह बीमा राशि के न मिलने या बहुत ही कम मिलने के मामले सामने आये हैं। किसान संगठन 100 प्रतिशत फ़सल ख़राब पर 50,000 रुपये प्रति एकड़ की माँग कर रहे थे।

दोनों राज्यों में इसके लिए विशेष सर्वेक्षण हो रहा है। सीधी भाषा में इसे गिरदावरी कहा जाता है जहाँ राजस्व विभाग के पटवारी, क़ानूनगो और गिरदावर आपदा में फ़सल ख़राब की खेतों में जाकर जाँच करते हैं और पूरी रिपोर्ट सरकार को देते हैं। इसके बाद सरकारी स्तर पर घोषणा के मुताबिक, मुआवज़ा राशि तैयार होकर बाँटी जाती थी।

प्राकृतिक आपदाएँ पहले भी आती रही हैं। फ़सल ख़राब पर सर्वे आदि भी हुए; लेकिन जब मुआवज़ा मिला तो वह हज़ारों तक ही सीमित रहा। पहले मुआवज़ा राशि का वितरण की कोई समय सीमा नहीं होती थी। कहने को सरकार समय बताती थी; लेकिन वेसा होता नहीं था। महीनों बाद किसान को यह राशि मिल पाती थी। एक तरह से कहें तो ज़्यादातर किसानों का सरकारी मुआवज़े से भरोसा ही उठ चुका था। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने वादा किया है कि 15 अप्रैल तक ख़राब फ़सलों का पूरा सर्वेक्षण करा लिया जाएगा। मई में मुआवज़ा राशि किसानों के खाते में पहुँचने लगेगी। छोटे और मझोले किसानों का हिसाब किताब फ़सल बेचने के बाद ही चलता है। रबी के बाद ख़रीफ़ फ़सल की तैयारी के लिए उसे पैसे चाहिए। फ़सल ठीक हुई तो बात ठीक, अगर आपदा में फ़सल बर्बाद हो गयी, तो वह मुआवज़ा राशि के इंतज़ार में नहीं बैठ सकता। आढ़ती या अन्य किसी से ब्याज पर राशि उठाएगा। यह क्रम दशकों से चला आ रहा है और यही मुख्य वजह है कि किसान उभर नहीं पा रहा है। बिना प्राकृतिक आपदा के किसान क़र्ज़ के बोझ में दबे हैं।

आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से पंजाब देश का सबसे ज़्यादा अन्न उत्पादन करने वाला है; लेकिन विडंबना यह कि सबसे ज़्यादा ख़ुदकुशी की घटनाएँ इसी प्रदेश में हुई है। पंजाब के किसान सुखचैन सिंह ने बताया बेमौसम बारिश से उनकी आधी से ज़्यादा फ़सल बर्बाद हो गयी। सरकारी टीम ने पूरा ब्योरा बनाकर भेजा। उम्मीद थी सरकार से अच्छी राशि मिलेगी; लेकिन चेक मिला 4,500 रुपये का। सरकारे वादा करती है, सार्वजनिक मंचों से घोषणाएँ करती हैं; लेकिन किसान को हक़ीक़त में बहुत कुछ मिलता नहीं है।

कुछ प्रभावशाली लोगों को भले ठीक मुआवज़ा मिल जाए, छोटे और सीमांत किसान तो मुआवज़े के मामले में भगवान भरोसे ही रहते हैं। गेहूँ जैसा ही हाल सरसों का रहा बारिश और तेज़ आँधी ने फूलों पर मार की, जिससे उत्पाद में कमी आएगी। कुछ स्थानों पर सरसों की कटाई होने के बाद ढेरियाँ सूखने कें लिए खेतों में लगायी हुई थी। लगातार बारिश से वे भीग गयीं और काफ़ी नुक़सान हो गया। सरसों के रेट नमी और तेल की मात्रा के हिसाब से तय होते हैं। बारिश से भीगी सरसों सरकारी मानकों पर खरी नहीं होगी। लिहाज़ा निजी व्यापारी कम दामों पर ख़रीद करेंगे।

किसानों के पास बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हरियाणा के कई गाँवों में सरसों की फ़सल की हालत कुछ ऐसी ही हुई। दोनों राज्यों में ज़्यादातर रक़बा (क्षेत्रफल) गेहूँ का है। पंजाब में 130 लाख टन और हरियाणा में 85 लाख टन गेहूँ उत्पाद होने की उम्मीद लगायी गयी थी; लेकिन आपदा से यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। केंद्र और दोनों राज्य सरकार को ख़रीद में कुछ रियायत देनी होगी, वरना किसान लुट जाएगा। जो गेहूँ दो माह पहले 3,000 प्रति कुंतल तक पहुँच गया था वह अब सरकारी ख़रीद भाव 2,150 से भी कम पर आसानी से बिक नहीं सकेगा। ऐसे उत्पाद को सरकारी एजेंसियाँ समर्थन मूल्य पर नहीं ख़रीद सकती लिहाज़ा औने पौने दामों पर बिकेगा। प्राकृतिक आपदा को देखते हुए सरकारी ख़रीद में कुछ नरमी बरते जाने की बातें चल रही हैं; लेकिन ऐसा होगा इसकी संभावना धरातल पर बहुत कम है।

इस बार पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्ट्रबेंस) ने उत्तर भारत की ज़्यादातर खेती को तबाह करके रख दिया है। इसकी मार महाराष्ट्र जैस राज्यों में भी पड़ी; लेकिन ज़्यादा मार हर बार की तरह उत्तर क्षेत्र ही रहा। हरियाणा के रोहतक ज़िले के गाँव करोर के महिपाल के मुताबिक, गेहूँ और सरसों की फ़सल आपदा ने चौपट कर दी है। छोटे बड़े सभी किसान बारिश, आँधी और ओलावृष्टि से प्रभावित हुए है। ज़िले के बड़े क्षत्र में 100 प्रतिशत तक फ़सलें ख़राब हुई है। धरती पर बिछी गेहूँ दो दिन तक पानी में भीगी रही उसमें अंकुरित होने लगे हैं। वह किसी काम नहीं रही। सरसों की ढेरियाँ पानी में पड़ी रही लिहाज़ा दाना काला हो गया। जनवरी से अप्रैल के पहले सप्ताह तक आयी इस प्राकृतिक आपदा से नुक़सान का अंदाज़ा इस बात से लग सकता है कि हरियाणा में 17 लाख एकड़ से ज़्यादा फ़सल के नुक़सान का इंद्राज हो चुका है। अभी यह संख्या और बढ़ सकती है। राज्य सरकार का ई-फ़सल क्षतिपूर्ति पोर्टल अभी खुला है। जो किसान इस विधि से नुक़सान का ब्योरा नहीं दे सकते वे सेवा केंद्र पर इसकी जानकारी सरकार तक पहुँचा सकते हैं। राज्य के पंचकुला और हिसार में आपदा से आंशिक नुक़सान हुआ वहीं अन्य सभी ज़िलों में 25 से 75 प्रतिशत तक गेहूँ और सरसों की फ़सलें ख़राब हुई हैं। राज्य सरकार ने स्टाफ की कमी को देखते हुए क्षतिपूर्ति सहायकों की नियुक्ति की हैं। ये सहायक गाँव के पढ़े-लिखे युवक होंगे, जिन्हें 500 एकड़ में राजस्व टीम के साथ काम करना होगा। इन्हें इसके लिए 5,000 रुपये मानदेय देने की व्यवस्था भी की गयी है। ऐसा नहीं कि सरकार तुरन्त प्रभाव से मुआवज़ा राशि का वितरण शुरू कर देगी। जिन किसानों ने ख़राब हुई फ़सल का ब्योरा दिया है, तो मुआवज़ा राशि उनके खातों में पहुँच जाएगी। किसान उत्पाद को मंडी में बेचेगा, वह कितना प्रतिशत होगा और सर्वे में उसका नुक़सान क्या आँका गया है इसका मिलान किया जाएगा। इसके बाद वास्तव में जो अंतर आएगा मुआवज़ा उसी हिसाब से मिलेगा। सरकारी प्रयासों के बावजूद भी रबी फ़सल पर आयी प्रकृतिक आपदा से किसानों पर बड़ी आर्थिक मार पड़ी है।

चक्रवाती तूफ़ान

पंजाब के फ़ाज़िल्का ज़िले में चक्रवाती तूफ़ान ने गाँव बकेनवाला और आसपास में भयंकर तबाही मचायी। इससे क़रीब तीन दर्ज़न कच्चे, अधपक्के मकान धराशायी हो गये, जिससे एक दर्ज़न लोग घायल हो गये। 10 से 15 मिनट के इस बवंडर ने लोगों को दहला दिया। इसकी तीव्रता इतनी ज़्यादा थी कि गाँव का ढाई एकड़ का पूरा बाग़ ही तहस-नहस हो गया। राज सिंह के सैकड़ों पेड़ ज़मीन से उखड़ गये। उन्हें छ: से सात लाख रुपये का आर्थिक नुक़सान हुआ है। दो से तीन किलोमीटर के क्षेत्र में तूफ़ान रास्ते में जो भी आया उसे उड़ा ले गया।

सोच बदलें घाटा सहते किसान

इस बार जिस तरह से पूरे देश के किसानों को बेमौसम वर्षा एवं ओलावृष्टि से हानि हुई है उससे हर किसान बेहाल है। किसानों के साथ इस तरह की प्राकृतिक घटनाएँ कोई नई बात नहीं हैं। वे हर साल कई बार ऐसी आपदाओं का आसान शिकार होते हैं। मगर इनसे बचने के उपाय किसी के पास नहीं हैं। इसीलिए कृषि को जुए की तरह ही सबसे कच्चा धंधा माना गया है।

भौजीपुरा के कमुआं गाँव के मास्टर नंदराम कहते हैं कि ये भारतीय किसानों का दुर्भाग्य ही है कि कृषि प्रधान देश में सबसे अधिक हानि सहने वाले किसान हैं, जो कभी प्रकृति का प्रकोप तो कभी सरकारों के सौतेले व्यवहार का शिकार होते हैं। दिनोंदिन खेती करना महँगा होता जा रहा है एवं फ़सलों के सही दाम भी किसानों को नहीं मिलते हैं।

भारत देश में सबसे अधिक मेहनती और सबसे अधिक दु:खी अगर कोई है, तो वो किसान ही हैं। मगर किसानों में भी जो समझदार हैं एवं उत्तम खेती करने वाले किसान हैं, वो सुखी भी हैं।

लाभ की खेती करें किसान

कृषि जानकार नरेश गंगवार कहते हैं कि यह सच है कि दुर्दिनों में सरकारें किसानों का साथ नहीं देतीं। अगर देती भी हैं, तो दिखावे भर के लिए। ऐसे में किसानों को सोचना होगा कि भले ही सरकारें किसानों के साथ न हों, मगर वे लाभ की खेती कैसे करें। क्योंकि लाभ की खेती ही अब किसानों के आँसू पोंछ सकती है।

उदाहरण के लिए अगर किसान कुछ ऐसी फ़सलें उगाएँ, जो बेमौसम वर्षा होने से, सूखा पडऩे से भी ख़राब नहीं होतीं। इससे किसान पूरी तरह हानि से भले ही न बचें, मगर बहुत बड़ी हानि से बच सकते हैं। जैसे हल्दी, अलसी, लहसुन, मिर्च, अरहर, गन्ना, अदरक, सेम, बींस, ग्वार, मकई, ज्वार, तोरी, कटहल, आंवला आदि। इसी प्रकार फलों में अंगूर, आड़ू, पपीता, अनार, नींबू, अंजीर, बेर आदि। बिना फल वाली फ़सलों में  पटसन, शीशम, सागौन, महोगनी, कीकर, नीम, तुन आदि के पेड़ों को भी उगाया जा सकता है। ये सभी फ़सलें वो फ़सलें हैं, जो न तो सूखा पडऩे से ख़राब होती हैं एवं न अत्यधिक वर्षा होने से शीघ्र ख़राब होती हैं। आज देश के कई ऐसे किसान हैं, जो उत्तम एवं लाभ की खेती कर रहे हैं। आज दुनिया भर के समझदार किसान उनसे खेती-बाड़ी करने की विधियाँ सीखने जाते हैं। उत्तम खेती करने वाले ये किसान प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों रुपये कमा रहे हैं।

छोटे किसान क्या करें?

किसान सदैव कहते दिखते हैं कि छोटी खेती वाले किसान दु:खी ही रहते हैं। यह सच है कि बड़ी जोत के किसान संपन्न होते हैं मगर प्राकृतिक आपदा में बड़ी जोत वाले किसानों को हानि भी बड़ी ही होती है। उनकी लागत भी अधिक लगती है। उनके पास फ़सलों की विविधता होती है, जिससे एक तरह की फ़सल में हुआ घाटा दूसरी फ़सल से पूरा हो जाता है। छोटे किसान के पास कई प्रकार की फ़सलें उगाने के भूमि नहीं है एवं एक फ़सल सदैव उसे डर में रखती है कि पता नहीं वो कब नष्ट हो जाए। छोटा किसान छोटे वेतन के कर्मचारी की तरह सदैव हिसाब जोड़ता रहता है कि इस बार अगर इतनी फ़सल हो गयी, तो वो ये काम करेगा वो काम करेगा, ये ऋण देगा, वो आवश्यकता पूरी करेगा आदि आदि। मगर कभी भी छोटा किसान अभाव की दलदल से बाहर नहीं आ पाता एवं सदैव दु:खी ही रहता है।

छोटी जोत के किसान रामेश्वर कहते हैं कि किसी के पास कम भूमि हो, तो वो उसे खींचकर तो बढ़ा नहीं सकता, मगर उसमें अच्छी खेती करके लाभ कमा सकता है। रामेश्वर कहते हैं कि उनके पास मात्र चार बीघा खेत है मगर वे सब्ज़ियाँ उगाते हैं एवं उन्हें सीधे अपने हाथ से बाज़ारों में बेचते हैं। इससे उन्हें सही भाव भी मिल जाता है एवं पैसा भी हाथ में आता रहता है। वो अधिकतर दो-दो फ़सलें एक साथ करते हैं। चार बीघा खेत में चार-पांच तरह की सब्ज़ियाँ एक साथ उगाते हैं।

जैविक खेती सबसे उत्तम

जैविक खेती भारतीय जलवायु के लिए सबसे उत्तम होती है। जैविक खेती करने से पौधों की जड़ें भी गहरी एवं तने मोटे होते हैं, जिससे कम पानी में भी फ़सलें उगायी जा सकती हैं, अधिक पानी में भी वे ख़राब नहीं होतीं एवं आँधी में भी उनके गिरने का खतरा कम रहता है।

किसानों को यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जैविक खेती से उगायी गयी फ़सलों की बाज़ार में बहुत माँग है। इन फ़सलों की माँग इतनी अधिक है कि इनकी आपूर्ति नहीं हो पा रही है। साथ ही जैविक फ़सलों के दाम भी किसानों को उर्वरक खादों से उगाई फ़सलों से कई गुना अधिक मिलते हैं। इन फ़सलों की माँग स्थानीय स्तर पर भले ही कम हो, मगर बड़े शहरों में एवं विदेशों में इनकी माँग बहुत अधिक है, जिसकी आपूर्ति भारतीय किसान ही कर सकते हैं।

जलवायु के हिसाब से खेती

कृषि के जानकार नरेश गंगवार कहते हैं कि किसानों को अपने भौगोलिक क्षेत्र में मानसून एवं जलवायु के आधार पर खेती करने से अच्छा लाभ भी हो सकता है एवं प्राकृतिक आपदाओं की मार से भी वे बच सकते हैं। उदाहरण के तौर पर जहाँ कम वर्षा होती है, वहाँ के किसान कम पानी में पैदा होने वाली फ़सलों को उगा सकते हैं तथा जहाँ अधिक वर्षा होती है वहाँ के किसान अधिक पानी को सहन करने वाली फ़सलें उगा सकते हैं। आवश्यक नहीं है कि किसान केवल फ़सलों पर ही निर्भर रहें, उन्हें खेतों के चारों ओर ऐसे पेड़ भी लगाने चाहिए, जिनसे फ़सलों को नुक़सान भी न हो एवं वे लाभ भी दे सकें। जहाँ मौसम सामान्य रहता है वहाँ मौसम के आधार पर फ़सलें उगानी चाहिए। 

पशुपालन व बीज संयोजन ज़रूरी

भारतीय परंपरा में उत्तम खेती पशुओं के बिना नहीं की जा सकती। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार पशुओं को खेती के बिना नहीं पाला जा सकता। अब कम ही किसान पशुपालन करते हैं, जिससे उन्हें जैविक खाद नहीं मिल पाती एवं चारा भी पशुपालन न करने वाले अधिकतर किसान खेत में ही नष्ट कर देते हैं। इससे फ़सलों को उतना लाभ नहीं हो पाता क्योंकि अगर चारे को खेत में जोत दिया जाएगा, तो वो अगली फ़सल उगाने तक पूरी तरह नष्ट नहीं हो सकेगा एवं उसे जला देने पर खेती में लाभ से अधिक नुक़सान होगा। क्योंकि खेतों में फ़सल जलाने से ऊपर की मिट्टी पक जाती है, जिससे वह उपजाऊ नहीं रहती। इसके अतिरिक्त भूमि के जैविक तत्व एवं कृषि में लाभकारी कीड़े भी नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए पशुपालन करना किसानों के लिए अति आवश्यक है। दूसरी परंपरा भारतीय किसानों की बीज संयोजन होती थी, जो अब लगभग लुप्त हो चुकी है। अब किसान खाद की दुकानों से फर्टिलाइजर बीज क्रय कर फ़सलें बो देते हैं। यह बीज विषैले होते हैं। बिना कीटनाशकों के इनसे फ़सलें तैयार नहीं होतीं एवं इन बीजों से उगायी गयी फ़सलें अधिक खाद-पानी की माँग करती हैं। साथ ही ये बीज जैविक नहीं होते। जबकि खाद-बीज की दुकानों पर इन्हें जैविक बीज के नाम पर बेचा जाता है। अगर किसान अपने पास बीज संयोजन करें, तो उनके पास इसके पैसे बचेंगे।

अधिक बीज होने पर किसान उसे बेचकर भी लाभ कमा सकते हैं। पशु पालने से खाद के पैसे बचेंगे। फ़सलें भी विषैली होने से बचेंगी एवं उनका भाव भी अच्छा मिलेगा। जैविक खेती करने से पैसे, खाद, पानी सबकी बचत होगी, जिससे खेती की लागत भी घटेगी। छोटी खेती वाले किसान बैलों से खेती करें, तो उनकी बचत और अधिक होगी। इससे किसान पारंपरिक खेती की ओर भी लौट सकेंगे एवं बीजों, खादों एवं कीटनाशक दवाओं की कालाबाज़ारी समाप्त होगी, क्योंकि उनकी बिक्री ही अधिक नहीं होगी, तो कालाबाज़ारी का प्रश्न ही नहीं उठेगा।

लुप्त होतीं फ़सलें बचाएँ

भारतीय कृषि परंपरा में जबसे अधिक लाभ कमाने की होड़ लगी है, कई ऐसी फ़सलें हैं जिन्हें किसानों ने उगाना ही छोड़ दिया है। इससे एक परिवर्तन तो यह आया है कि उन फ़सलों के भाव अच्छे मिलने लगे हैं। दूसरा परिवर्तन यह आया है कि जो फ़सलें अधिक पैदा हो रही हैं उनका भाव महँगाई के हिसाब से नहीं बढ़ रहा है। इसलिए किसानों को चाहिए कि जिन फ़सलों की माँग अधिक है तथा वो कम हो रही हैं उन्हें भी उगाने का कार्य करें। किसानों को लकीर का फ़क़ीर होने से बचना चाहिए, जो कि अधिकतर किसान करते हैं। अधिकतर क्षेत्रों में देखा जाता है कि किसान एक या दो फ़सलों की अधिक पैदावार करते हैं, जबकि खेती विविधता में ही लाभकारी होती है।

उदाहरण के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं, धान, गन्ने की सबसे अधिक पैदावार होती है। अगर यहाँ के कुछ किसान उन फ़सलों को उगाएँ, जो कम उगायी जा रही हैं, तो उन्हें अच्छा लाभ भी मिलेगा एवं गेहूँ, धान, गन्ने की पैदावार भी आवश्यकता से अधिक नहीं होगी, जिससे उनके भाव भी अच्छे मिलेंगे।

अपराधी बनते प्यार में असफल युवा

छत्तीसगढ़ के कवर्धा के रेंगाखार के चमारी गाँव के एक मकान में 3 अप्रैल को सुबह 9:00 बजे विस्फोट हुआ। शुरू में गैस सिलेंडर के फटने की आशंका जतायी गयी; लेकिन पुलिस जाँच में पता चला कि घर में बारात के सामान में आये नये होम थिएटर में धमाका हुआ था। होम थिएटर म्यूजिक सिस्टम को चालू करने में दूल्हा हेमेंद्र मरावी और उसके भाई राजकुमार मरावी की मौक़े पर ही मौत हो गयी। हेमंत मेरावी की 30 मार्च को शादी हुई थी।

जाँच से सामने आया कि शादी से पहले नव विवाहिता के बालाघाट जिले के छपला गाँव के सरजू मरकाम के साथ प्रेम सम्बन्ध थे। लेकिन दोनों के बीच झगड़ा हो गया और बातचीत तक बंद हो गयी। शादी से कुछ दिन पहले भी दोनों के बीच झगड़ा हुआ और लडक़े ने बदला लेने का मन बना लिया। उसने एक होम थिएटर ख़रीदा और उसे शादी वाले दिन लडक़ी के घर रख आया। शादी का सब सामान जब ससुराल जाने लगा तो वह होम थिएटर भी उसी में चला गया। आरोपी प्रेमी सरजू ने उस होम थिएटर म्यूजिक सिस्टम में बारूद इस तरह डाल रखा था कि सिस्टम ऑन करते ही ब्लास्ट हो जाए, और वही हुआ। आरोपी पहले एक खदान में काम करता था और उसने उसी दौरान वहाँ से अमोनियम नाइट्रेट चोरी कर अपने घर में रखा हुआ था। इस दर्दनाक घटना के वक़्त दुल्हन अपने मायके किसी रस्म के लिए गयी हुई थी।

कबीरधाम के पुलिस अधीक्षक लाल उमेद सिंह ने बताया कि आरोपी सूरज को धारा-307 और धारा-302 आईपीसी के तहत गिरफ़्तार किया गया है और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के अंतर्गत भी जुर्म दर्ज किया गया है। छत्तीसगढ़ की इस दर्दनाक ख़बर को राष्ट्रीय अख़बारों के अलावा अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने भी छापा। यह ख़बर चौंकाने वाली है। दरअसल अपराध के लिए विस्फोटक पदार्थों का इस्तेमाल नया नहीं है; लेकिन प्रेम प्रसंग में असफल रहने पर विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल यह बताता है कि अपराधी मानसिकता वाले प्रेम के मामलों में भी इसका इस्तेमाल करने से नहीं हिचकचाते। प्रेम प्रसंग के ममलों में कटुता आने पर नाराज़ प्रेमी तेज़ाब का इस्तेमाल लडक़ी,उसके रिश्तेदारों पर किया करते हैं। कई तरह की प्रताडऩाएँ भी देने वाली ख़बरें अक्सर सामने आती रहती हैं। अब आशंका यह भी जतायी जा रही है कि कहीं आने वाले दिनों में नाराज़ प्रेमी इस तरह की घटनाओं को अंजाम न देने लगे। अपराधी फ़िल्मों, यूट्यूब व आपराधिक घटनाओं से अपराध करने के तरीक़े बहुत जल्दी सीखते हैं और उनका इस्तेमाल भी करते हैं।

सवाल यह है कि प्रौद्योगिकी दिन-ब-दिन उन्नत तो हो रही है; लेकिन उसके साथ ही साथ उसका इस्तेमाल अपराध को अंजाम देने के लिए भी किया जा रहा है। इसे महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए एक औज़ार के तौर पर किया जाने लगा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और इससे सम्बन्धित औज़ार ने महिलाओं व लड़कियों के जीवन को कहीं-न-कहीं असुरक्षित भी बना दिया है। वर्ष 2020 में एक विदेशी एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू कम्पनी को 15 प्राइवेट फोटो के स्क्रीनशॉट मिले। इनमें एक एक युवा महिला का था, जो टॉयलेट में बैठी हुई थी। उसका चेहरा ढका हुआ था; लेकिन उसकी तस्वीर उसकी मध्य जाँघ तक ली गयी थी। और यह तस्वीर किसी इंसान ने न लेकर, बल्कि आईरोबेटस के विकसित वर्जन रूंबा जे7 सीरीज वैक्यूम ने लिया है। यह रूंबा चलती फिरती छोटी मशीने होती हैं। इसमें इंटरनेट से जुड़े उपकरण फोटो लेते हैं और आगे सिस्टम को भेज देते हैं और उनके साथ अभिगम नियंत्रण भी लिखा होता है, यानी हरेक तक उसे देखने की पहुँच नहीं होती।

आईरोबेटस कम्पनी ने यह तो माना कि जिनके फोटो सोशल मीडिया पर आये हैं, वे इस बात से सहमत थे कि रूंबा उनकी निगरानी कर सकता है। एमआईटी रिवयू ने जब इस कम्पनी से सहमति समझौता के दस्तावेज़ दिखाने के लिए माँगे, तो कम्पनी ने ऐसा करने से मना कर दिया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रफ़्तार ने ख़तरे की घंटी बजायी है। टेक कम्पनियों पर पारदर्शिता नहीं बरतने के आरोप बराबर लगते रहते हैं। एआई इमेजस के साथ तोड़-मरोड़ भी करता है। महिलाएँ और लड़कियाँ भी इसकी शिकार हो जाती हैं। एआई टूल की ताकत का इस्तेमाल महिलाओं व लड़कियों की कमज़ोर छवि दिखाने के लिए भी किया जाता है। दरअसल विज्ञान ने प्रगति कर ली और प्रोद्योगिकी की गति भी बहुत तेज़ है; लेकिन समाज की मानसिकता उस रफ़्तार से तालमेल नहीं बिठा रही।

महिलाओं-लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा का सम्बन्ध है, तो यह सदियों पुरानी सामंती मानसिकता की उपज है और आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति इसे खाद-पानी दे रही है। यही नहीं प्रौद्योगिकी के टूल भी महिलाओं के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रहे हैं। सदियों साल पुरानी महिला विरोधी मानसिकता आज भी जिंदा है, महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा एक जटिल मुद्दा है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। निराशा, पागलपन, हताशा। महिलाओं को अपनी संपत्ति मानना और उस पर नियंत्रण रखने वाली मानसिकता। महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा एक सामाजिक अपराध है और इसे रोकने में एक समाज के तौर पर हम सब विफल रहे हैं। महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा अक्सर महिलाओं को अधीनस्थ स्थिति में रखने के लिए सामाजिक नियंत्रण का एक औज़ार है। इसकी जड़ें गहरी हैं। बेशक देश में महिलाओं, लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकने के लिए कई क़ानून हैं; लेकिन उनका सख़्ती से पालन ज़मीन पर दिखायी नहीं देता।

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली ऐनी राजा का मानना है कि तकनीक महिलाओं को आगे बढऩे के मौक़े भी प्रदान करती है; लेकिन तकनीक से उत्पन्न असुरक्षा से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता के साथ-साथ महिलाओं को तकनीक के इस्तेमाल में भी प्रशिक्षित करने की बहुत ज़रूरत है।’ प्रौद्योगिकी जैसे-जैसे उन्नत हो रही है, वैसे-वैसे दुनिया सिमट रही है। पल भर में सूचनाएँ विश्व के साथ साझा हो जाती हैं। लेकिन इससे महिलाओं व बच्चों की ज़िन्दगी को मुश्किल भी बना दिया है। पूर्व प्रेमी, पूर्व पति इसी उन्नत तकनीक के ज़रिये महिलाओं व लड़कियों को कई तरह से परेशान भी करते रहते हैं। महिलाओं को ऑनलाइन परेशान करने के मामलों ने सबका ध्यान खीचा हैं। कोरोना महामारी ने इस तरह की हिंसा को और बढ़ाया, वजह तालाबंदी के कारण घरों से बाहर पुरुष नहीं निकल पाये, घर से ही काम करने की मजबूरी व वेतन में कटौती आदि कई कारकों ने पुरुषों के व्यवहार को हिंसक बनाने में अपनी भूमिका निभायी। नतीजतन महिलाओं व महिलाओं-लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ गयी। यही नहीं जो महिलाएँ-लड़कियाँ घरों से बाहर नहीं निकल पायी उनके प्रेम प्रंसगों में दूरी आयी और कई को उनके साथियों ने ऑनलाइन हिंसा का शिकार बनाया। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मीडिया को बताया कि तालाबंदी के दौरान महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा की अनेक शिकायतें उन्हें मिली। यही नहीं, महिलाओं के लिए फोन पर शिकायत दर्ज कराना आसान नहीं था। पति सारा दिन घर पर ही रहते थे।

फ्रांस सरकार ने तालाबंदी के दौरान हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए बाहर होटल में ठहरने का बंदोबस्त अपने ख़र्च पर किया था। ऑनलाइन हिंसा महिलाओं व लड़कियों के मानसिक, मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हिंसा उनकी गरिमा पर चोट करती है। वे ख़ुद को कमतर आँकने लगती है। लैंगिक हिंसा का डिजिटल पहलू भी महिलाओं को बहुत क्षति पहुँचाता है। यह उनकी जीविका, पारिवारिक सम्बन्धों और प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करता है। यही नहीं डिजिटल मंचों पर महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा में रंग भेदभाव भी साफ़ झलकता है।

एक अध्ययन के अनुसार, ट्विटर पर अपमानजनक टिप्पणियों की शिकार होने की सम्भावना अश्वेत महिलाओं की अपेक्षा श्वेत महिलाओं में 84 प्रतिशत अधिक होती है। धार्मिक व विशिष्ट संस्कृति की अल्पसंख्यक महिलाओं को भी आसानी से हिंसा का शिकार बना लिया जाता है। मानवाधिकारों पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पाया कि समलैंगिक स्त्रियाँ, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर महिलाएँ आदि ने ट्विटर पर अधिक अपमानजनक टिप्पणियों का सामना किया। महिला अधिकारों, बराबरी के नारे लगाये जाते हैं, इसे लेकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलन भी हुए और कई सम्मेलन भी आयोजित किये गये। महिला अधिकार मानवाधिकार है, इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनी। लेकिन क्या हक़ीक़त में महिलाएँ सुरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ की नवीनतम घटना चौंकाने वाली ही नहीं है, बल्कि सचेत करती है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकील राजेश त्यागी को आशंका है कि आने वाले वक़्त में एकतरफ़ा प्यार में विफल हताश, मानसिक सन्तुलन खोने वाले पुरुष, युवक कहीं ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न करने लगें। यह घटना समाज के लिए एक नये ख़तरे का आभास दिलाती है।

उम्र और खिलाड़ी

‘जब तक जीऊँगी, तब तक खेलूँगी’ -यह दिल्ली के पास नजफगढ़ की 95 वर्षीय एथलीट भगवानी देवी डागर के शब्द हैं। वह मार्च में पोलैंड के टोरून में हुई वल्र्ड मास्टर्स एथलेटिक्स इंडोर चैंपियनशिप से भारत के लिए तीन गोल्ड मेडल जीतकर लायीं। ज़िन्दगी को जीवटता से जीने के लिए इससे ज़्यादा प्रेरणादायी शब्द भला और क्या हो सकते हैं?

भगवानी देवी यानी एथलीट दादी की इस उपलब्धि से कुछ ही दिन पहले भारत की चार युवा वीरांगनाएँ विश्व चैंपियन बन गयीं, वह भी बॉक्सिंग जैसे खेल में। भारत में जिन महिलाओं को ‘चूल्हे-चौके की रानियाँ’ और ‘नाज़ुक’ कहा जाता था, उनकी यह उपलब्धि भारतीय खेल के इतिहास की बड़ी घटना है।

एथलीट भगवानी देवी डागर

भगवानी देवी की बात करें, तो उनका विवाह सिर्फ़ 12 साल की उम्र में हो गया था। और महज़ 30 साल की उम्र में वे विधवा हो गयीं। उन्होंने अपना सारा वक़्त और ऊर्जा अपनी बेटी और पेट में पल रहे बच्चे के लिए लगा दिया। चार साल बाद उनकी बेटी भी असमय दुनिया छोड़ गयी। ज़िन्दगी में मिले ऐसे झटकों से कोई भी टूट सकता है; लेकिन भगवानी देवी ने इस ग़म को ही अपनी शक्ति बना लिया। आज वह तीन बड़े युवाओं की दादी हैं। सिर्फ़ देशी घी में बना खाना खाने की शौक़ीन भगवानी रोज़ पार्क में सैर करती हैं।

मूलत: हरियाणा के खेकड़ा गाँव की भगवानी देवी का एक पोता विकास डागर, पारा एथलेटिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका है और खेल रत्न अवॉर्ड उन्हें मिला है। वे एशियन गेम्स चैंपियन रहे हैं। यहाँ दिलचस्प यह है कि विकास के ही कारण भगवानी देवी स्पोट्र्स की दुनिया में पहुँची और आज 95 साल की उम्र में भी ऊर्जा से भरी दिखती हैं।

जीवनयापन के लिए भगवानी देवी दिल्ली नगर निगम में क्लर्क की नौकरी कर चुकी हैं। साल 2022 में फिनलैंड में भी दादी भगवानी तीन मेडल जीतकर लौटी थीं। भगवानी देवी की उपलब्धि और भी बड़ी इसलिए हो जाती है कि इस साल पोलैंड के जिस टोरून शहर में उन्होंने यह मेडल जीतकर इतिहास रचा, वहाँ का न्यूनतम तापमान आजकल शून्य से भी काफ़ी नीचे चला जाता है। पोलैंड के टोरून जाने से पहले भगवानी देवी एक कार्यक्रम में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में थीं।

पोलैंड की 9वीं वल्र्ड मास्टर्स एथलेटिक्स इंडोर चैंपियनशिप के लिए उन्हें सामाजिक संगठन ‘अपराजिता’ ने स्पांसर करने के लिए यह कार्यक्रम रखा था। दिलचस्प यह भी है कि ‘सन्मार्ग अपराजिता’ की जूरी ने भगवानी देवी ‘अपराजिता यू इंस्पायर-स्पोट्र्स जूरी अवॉर्ड-2022’ से नवाज़ा है। इस उम्र में भी उनकी ऊर्जा देखते बनती थी। कार्यक्रम में उनकी बस एक ही ज़िद थी- ‘पीला मेडल ले के आऊँगी।’ और भगवानी देवी ने अपनी ज़िद एक नहीं तीन पीले मेडल जीतकर पूरी की; -60 मीटर दौड़, चक्का फेंक और गोला फेंक में। पोलैंड की एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भगवानी देवी 60 मीटर की दौड़ इतनी गति से दौड़ीं कि अन्य प्रतियोगी उनसे पीछे छूट गये।

भगवानी देवी जहाँ उम्रदराज़ हैं। वहीं नीतू घणघस, स्वीटी बूरी, निकहत ज़रीन और लवलीना बोरगोहेन युवा हैं, जिन्होंने मार्च की महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत की झोली में चार स्वर्ण पदक डाले। उम्र हर जगह अपना काम करती है, क्योंकि बॉक्सिंग ताक़त का खेल है। हाँ; जज़्बा एक ऐसा कारक है, जो हर जगह काम करता है। -भगवानी देवी से लेकर निकहत और नीतू तक। महिला मुक्केबाज़ों की इस सफलता से प्रधानमंत्री मोदी भी प्रभावित दिखे, जिन्होंने उन्हें अपने बधाई सन्देश में कहा- ‘आपको बधाई! आपने देश का सिर गर्व से ऊँचा किया है।’ 

निश्चित रूप से महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारतीय महिला मुक्केबाज़ों ने लाजवाब प्रदर्शन किया है; चाहे घरेलू दर्शकों के सामने ही। नीतू ने 45 से 48 किलोग्राम भारवर्ग में एक रोमांचक मु$काबले में मंगोलियाई की लुत्साइखान को मात दी। अंत तक विजेता का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। स्वीटी बूरा ने 75-81 किलोग्राम भारवर्ग में चीन की लिना वोंग को पटखनी दी। दो राउंड में स्वीटी की 3-2 की बढ़त के बाद तीसरे राउंड के बाद फ़ैसला रिव्यू के लिए गया, जिसमें नतीजा स्वीटी के हक़ में रहा।

पिछली विश्व चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीतने वाली निकहत ज़रीन ने 48 से 50 किलोग्राम भारवर्ग में वियतनाम की न्यूगेन थी ताम को फाइनल में हराया। निकहत शुरू से शानदार और अपने रुतबे के मुताबिक खेली। तीसरे राउंड में वियतनाम की मुक्केबाज़ के चेहरे पर उनका पंच इतना ज़ोरदार था कि रेफरी ने मैच रोककर वियतनामी मुक्केबाज़ का हाल-चाल पूछना पड़ा। उनकी 5-0 की जीत निकहत के दबदबे की कहानी ख़ुद कहती है। लवलीना बोरगोहेन ने 70-75 किलोग्राम भारवर्ग में ऑस्ट्रेलिया की कैटलिन एन. पार्कर को 3-2 से हराया। आख़िरी राउंड में दोनों की टक्कर काँटेदार थी और अन्त में रिव्यू में लवलीना विजयी रहीं। इससे पहले 2006 में दिल्ली की विश्व चैम्पियनशिप में भारत ने एक साथ 4 स्वर्ण पदक जीते थे।

हालाँकि तब महिला मुक्केबाज़ी ओलम्पिक में शामिल नहीं की गयी थी। इसे 2012 में ओलम्पिक में शामिल किया गया था। इनसे पहले छ: बार विश्व चैम्पियन रहीं एमसी मैरीकॉम के अलावा सरिता देवी, जेनी आरएल और लेखा सी भारत के लिए विश्व ख़िताब जीत चुकी हैं।

ज़ाहिर है निकहत ज़रीन, नीतू घणघस, स्वीटी बूरी और लवलीना बोरगोहेन ने 2024 में पेरिस में होने वाले ओलम्पिक खेलों के लिए बेहतरीन उम्मीदें जगायी हैं। तकनीक और समझ के लिहाज़ से निकहत ज़रीन की दिल्ली की विश्व चैम्पियनशिप के दौरान काफ़ी तारीफ़ हुई है और उन्हें ओलम्पिक मेडल का ‘स्टफ’ बताया गया है। ऐसी ही उम्मीद अन्य महिला मुक्केबाज़ों से भी है। उम्मीद है अगले साल भारत का महिला मुक्केबाज़ी में मेडल का सूखा ख़त्म होगा !

सलीम दुर्रानी

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में जन्मे भारतीय खिलाड़ी सलीम दुर्रानी ने इसी 2 अप्रैल को 88 साल की उम्र में देह त्याग दी। उम्र एक पड़ाव पर आपका साथ छोड़ देती है। सलीम की दो ख़ासियतें थीं। एक, वह जिस भी शहर में क्रिकेट खेलने गये, वहीं उन्होंने दोस्त बना लिये। दूसरी, वह स्टेडियम के उसी दिशा में छक्का मार देते थे, जहाँ दर्शक माँग कर रहे होते थे। वह हैंडसम तो थे ही, दोस्त बनाने में भी माहिर थे। वह बेहतरीन ऑफ स्पिनर होने के साथ शानदार आलराउंडर थे।

क्रिकेट प्रेमियों में उनका इतना क्रेज था कि 1972 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ईडन गार्डन्स पर अर्धशतक मारने के बाद जब उन्हें कानपुर टेस्ट में नहीं चुना गया, तो लोगों ने वहाँ पोस्टर चिपका दिये थे, जिन पर लिखा था- ‘नो सलीम, नो टेस्ट।’

ईडन गार्डन्स, जिसमें तब भी क़रीब 90,000 दर्शक बैठने की क्षमता थी; में जब दर्शक ‘वे वांट सिक्सर’ चिल्लाते थे, तो सलीम अपने बल्ले से अगली ही गेंद को वहाँ पहुँचा देते थे। सुनील गावस्कर ने एक बार कहा था कि सलीम दुर्रानी आत्मकथा लिखेंगे, तो उसका शीर्षक होगा- ‘आस्क फॉर अ सिक्स।’

हस्तियों पर अपनी अद्भुत जानकारी रखने वाले लेखक विवेक शुक्ला सलीम दुर्रानी को लेकर कहते हैं- ‘सलीम दुर्रानी यारबाश क़िस्म के इंसान थे। उनकी शामें प्रेस क्लब में गुजरतीं। वहाँ पर उन्हें दोस्त घेरे रहते। वे कैरम भी खेलते और आमतौर पर जीत जाते। दोस्तों के साथ ड्रिंक्स कर रहे होते थे। रात को कोई उन्हें उनके घर छोड़ देता। उनके पास क्रिकेट की दुनिया से जुड़े तमाम क़िस्से थे।’

एक शानदार इंसान और बेहतरीन खिलाड़ी को श्रंद्धाजलि!

रिकॉर्ड

टेस्ट 29, रन 1202, एक शतक

(7 अर्धशतक बनाने के अलावा 75 विकेट भी सलीम दुर्रानी ने लिए)

नादान दुनिया

जब समझदारी की बात आती है, तो हर व्यक्ति ख़ुद को अग्रिम पंक्ति में खड़ा देखता है। अगर उसे कहीं लगता है कि कोई उससे ज़्यादा ज्ञानी है, तो वह पहले तो उसे ज्ञानी मानता नहीं, और अगर मान भी ले, तो अपने से कम ज्ञानी के आगे अपने ज्ञान का पिटारा ऐसे खोलता है, जैसे उससे बड़ा ज्ञानी कोई और संसार में हो ही न। कहने का अर्थ यह है कि किसी को यह नहीं लगता कि वह मूर्ख है; भले ही वह कितना भी बड़ा मूर्ख क्यों न हो।

सही मायने में यह पूरा संसार ही मूर्खों से भरा पड़ा है। धर्म और ईश्वर के मामले में तो यही सत्य है। अगर धर्म और ईश्वर के बारे में सभी लोग जान जाएँ, तो संसार के कई सारे झगड़े ख़त्म हो जाएँ, कई मसले हल हो जाएँ। हर ओर सत्य, अहिंसा, प्यार का वातावरण हो और लोग शान्ति, सुख, चैन से जी सकें।

लोग मूर्खतावश ही तो झगड़ा करते हैं। धर्मों का ज्ञान बघारने वाले, को जानने का दावा करने वाले, दोनों पर ही लोगों को लड़ाने वाले सब मूर्ख ही तो हैं। सबके पास रटंत विद्या है। अपना ज्ञान किसी के पास नहीं है। लेकिन असल में ज्ञानी वही है, जिसके पास स्वयं का ज्ञान हो। स्वयं के तर्क हों। हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किताबी ज्ञान निरर्थक है। लेकिन अगर किताबें पढक़र भी अपना ज्ञान नहीं उपजा, तो सब व्यर्थ है। इसका मतलब यह हुआ कि आपके अंतर्मन में जागृति पैदा ही नहीं हुई। किताबें तो मूर्ख भी रट सकता है। तोते को भी रटाओ, तो वह भी इंसानों की भाषा बोलने लगता है। लेकिन केवल रटने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता।

को जानने का दावा करने वाले, दोनों पर ही लोगों को लड़ाने वाले सब मूर्ख ही तो हैं। सबके पास रटंत विद्या है। अपना ज्ञान किसी के पास नहीं है। लेकिन असल में ज्ञानी वही है, जिसके पास स्वयं का ज्ञान हो। स्वयं के तर्क हों। हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किताबी ज्ञान निरर्थक है। लेकिन अगर किताबें पढक़र भी अपना ज्ञान नहीं उपजा, तो सब व्यर्थ है। इसका मतलब यह हुआ कि आपके अंतर्मन में जागृति पैदा ही नहीं हुई। किताबें तो मूर्ख भी रट सकता है। तोते को भी रटाओ, तो वह भी इंसानों की भाषा बोलने लगता है। लेकिन केवल रटने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता।

संसार में जितने धर्म आज तक बने, उनसे इसलिए ही किसी का भला नहीं हो सका, क्योंकि उन्हें सिर्फ़ रटा गया। उनके सार में कोई नहीं उतर पाया। यह ठीक वैसे ही, जैसे किसी अपच के रोगी को मेवे पड़ी शुद्ध दूध की खीर खिला दो या देशी घी पिला दो, तो उसे ये दोनों ही पौष्टिक चीज़ें फ़ायदा करने के बजाय अपच को और बढ़ा देंगी। धर्मों के मामले में भी ऐसा ही है। यहाँ सब अपच के रोगी धर्मों की पौष्टिक खीर खा रहे हैं। बुद्धि विकसित करने वाला देशी घी खा रहे हैं। इससे उनका हाज़मा और बिगड़ रहा है, जिसके चलते वे अज्ञान के उल्टी-दस्त कर रहे हैं। किसी को कुछ नहीं मालूम। मालूम होता, तो धर्मों में ये अराजकता नहीं होती। अंधविश्वास नहीं होता। कुरीतियाँ नहीं होतीं। भेदभाव नहीं होता। वैमनस्य नहीं होता। छुआ-छूत नहीं होती। घृणा नहीं होती। आडम्बर नहीं होते। पाखण्ड नहीं होता। धर्मों में चंद लोगों की ठेकेदारी नहीं होती। लेकिन यह गन्दगी सब धर्मों में है, जो लगातार बढ़ रही है। इसी गन्दगी के चलते अब सभी धर्मों में उपद्रवी, अराजक, उग्र, झगड़ालू, झूठे, बेईमान और मूर्ख लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसी कारण के चलते सब दु:खी हैं। किसी को शान्ति नसीब नहीं हो रही। हालाँकि इसमें धर्मों का दोष नहीं है। लेकिन धर्मों को इन बुराइयों के जो ग्रहण लगे हैं, उससे आने वाली पीढिय़ाँ उनसे लाभ लेने से वंचित हो रही हैं। ये धर्म उन्हें सही मार्ग दिखाने-में असमर्थ-से हो चुके हैं।

ज़ाहिर है कि पढ़ाने वाले न हों, तो किताबें लोगों के लिए बेकार हैं। अगर पढ़ाने वाले $गलत हों, तो पढऩे वालों को कभी सही ज्ञान नहीं होगा। धर्मों को भी पढ़ाने वाले योग्य होने चाहिए। वे अज्ञानी नहीं होने चाहिए। वे पाखण्डी, घमण्डी, अराजक, धूर्त, कामी, लोभी, भोगी, अपराधी, अन्यायी, अनैतिक, मन, मस्तिष्क और तन से कुत्सित, ईष्र्या, वैमनस्य, घृणा से भरे हुए भी नहीं होने चाहिए। वे ज्ञानी होने के अतिरिक्त प्रेमी, समभाव वाले, नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले, न्यायिक व्यवहार वाले, स्वयं को भी $गलती पर दण्डित करने वाले, लोभ रहित, निष्पाप, नि:स्वार्थ भाव वाले, परमहंस प्रवृत्ति वाले, अल्पाहारी, काम- वासना से मुक्त तन-मन वाले और संसार से विरक्त होने चाहिए। अगर किसी धर्म में इन लक्षणों वाले धर्म गुरु न हों, तो उन्हें न केवल धर्मों और समाज से निकाल फेंकना चाहिए, बल्कि अपराधियों की तरह दण्डित भी करना चाहिए। क्योंकि एक धर्म गुरु उस धर्म के सभी लोगों का लोक-परलोक सुधरवा सकता है और उन्हें भटकाकर बर्बाद भी कर सकता है।

आजकल हर धर्म में भटकाने वाले अधर्मी गुरुओं की भरमार है। ये तथाकथित धर्म गुरु न केवल लोगों का यह लोक, बल्कि परलोक भी ख़राब कर देते हैं। विचार करने की आवश्यकता है कि जिस वैद्य के पास कोई बीमारी का इलाज कराने जाए, वह इलाज न कर पाये, तो फिर उसके पास इलाज कराने का क्या मतलब? और अगर कोई वैद्य मरीज़ों को उलटा ज़हर दे रहा हो, तो कौन जाएगा उसके पास? धर्मों की शिक्षा देने वाले ज़्यादातर लोग अपने-अपने धर्म के लोगों औषधि की जगह ज़हर ही दे रहे हैं। फिर भी लोग अगर उनके ज़हर को औषधि समझकर ले रहे हैं और यह समझ रहे हैं कि इससे उन्हें कोई लाभ होगा, तो उनसे बड़ा मूर्ख कौन हो सकता है? वे सम मरेंगे ही मरेंगे। ऐसे में अच्छा हो लोग स्वयं धर्म को समझें।

राहुल गांधी ने सरकारी आवास खाली किया, मां सोनिया गांधी के साथ रहेंगे

कुछ दिन से चल रही कवायद के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तुगलक रोड स्थित अपना सरकारी आवास लगभग खाली कर दिया है। गांधी को सूरत कोर्ट ने मोदी सरनेम टिप्पणी मामले में 23 मार्च को दो साल की सजा सुनाई थी जिससे अगले ही दिन उनकी लोकसभा की सदस्यता ख़त्म कर दी गयी थी और एक दिन बाद ही उन्हें सरकारी महकमे से घर खाली करने का फरमान जारी हो गया था।

गांधी के सरकारी आवास से शुक्रवार को काफी सामान ले जाया गया था। अभी यह कर्म जारी है। जानकारी के मुताबिक आवास खाली करने के बाद राहुल की तरफ से पूरा रेकार्ड सरकारी महकमे को दिया जाएगा। साथ ही घर की पूरी वीडियोग्राफी भी करवाए जाने की संभावना है ताकि बाद में सामान आदि को लेकर कोई सवाल न उठे। ऐसा ही प्रियंका गांधी ने भी किया था, जब उनसे उनका सरकारी आवास वापस ले लिया गया था।

राहुल गांधी दिल्ली के इस 12 तुगलक लेन में स्थित सरकारी आवास में पिछले 19 साल से रह रहे थे जो उन्हें बतौर एक सांसद सरकार की तरफ से अलॉट हुआ था। राहुल, जो पहले भी ज्यादातर मां सोनिया गांधी के आवास पर रहते थे अब अगली व्यवस्था तक स्थायी रूप से मां के घर रहेंगे।

उन्हें 22 अप्रैल तक यह आवास खाली करने को कहा गया था, हालांकि, वे इससे पहले ही घर खाली कर रहे हैं। हाउस कमेटी ने 27 मार्च को राहुल गांधी को नोटिस दिया था कि वो एक महीने में अपना घर खाली कर दें। इस पर उन्होंने लोकसभा सेक्रेटरी को लेटर लिखकर कहा था कि ‘जो भी आपने जो भी कहा मैं उसका पालन करूंगा।’

बिहार के मोतिहारी में जहरीली शराब पीने से 8 लोगों की मौत

बिहार में जहरीली शराब ने फिर कहर ढाया है। राज्य के मोतिहारी इलाके में जहरीली शराब पीने से 8 लोगों की मौत हो गयी जबकि 25 लोगों को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जहरीली शराब से कई लोगों की आंख की रोशनी चली गयी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक अवैध रूप से बनी शराब पीने वालों की संख्या काफी थी। मोतिहारी और मुजफ्फरपुर अस्पताल में चिकित्सकों को पहले डायरिया की आशंका थी लेकिन जब मरीजों ने शराब पीने और आंख से कुछ न दिखने की बात बताई तो डॉक्टरों का शक गहरा गया। कुछ मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है।

कम से कम 25 लोगों को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उनका इलाज किया जा रहा है। इनमें से कुछ की हालत गंभीर है। घटना के बाद प्रशासन में हड़कंप मचा है। पुलिस जांच में जुट गयी है। अस्पताल में भर्ती मरीजों ने स्वीकार किया कि उन्होंने शराब पी थी, इसके बाद उनकी हालत खराब हुई।

प्रशासन पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बिसरा जांच रिपोर्ट आने का इंतजार कर रहा है।
जानकारी के मुताबिक मोतिहारी के लक्ष्मीपुर पहाड़पुर, हरसिद्धि में जहरीली शराब पीने से इन लोगों की मौत हुई है।