मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा और ‘सीलबंद लिफ़ाफ़ा’ प्रक्रिया पर प्रहार कर सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर प्रेस की आज़ादी के बचाव में उतर आया है। यह देखा गया है कि एक लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि यह राज्य के कामकाज पर प्रकाश डालता है। प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल लोकतंत्र के लिए गंभीर ख़तरा पैदा करेगा। सरकारी नीतियों पर अलग-अलग या आलोचनात्मक विचारों को प्रतिष्ठान-विरोधी नहीं कहा जा सकता। बिना किसी तथ्यात्मक आधार के राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे का हवाला देना अनुचित प्रतिबंध लगाने जैसा है, जिसका प्रेस की स्वतंत्रता पर भयावह प्रभाव पड़ेगा।
यह फ़ैसला ताज़ा हवा के झोंके के रूप में आया, जब सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया वन (रूद्गस्रद्बड्ड ह्रठ्ठद्ग) चैनल पर लगे प्रतिबंध को ख़ारिज कर दिया और कहा कि सरकार की नीति की आलोचना संविधान के लिए अनुच्छेद-19(2) के तहत यह उचित प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निम्न न्यायालयों में सीलबंद लिफ़ाफ़े में रिपोर्ट दाख़िल करने को भी प्राकृतिक और खुले न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताते हुए ख़ारिज कर दिया। इस मामले में मीडियावन चैनल पर प्रतिबंध लगाने का औचित्य इस आधार पर प्रदान नहीं किया गया था कि ऐसा करने से राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा होगा। इसके बजाय न्यायालय को सीलबंद लिफ़ाफ़े में सहायक साक्ष्य प्रदान किये गये, इसलिए मीडिया हाउस को यह नहीं पता था कि क्या विरोध करना है। न्यायालय ने कहा कि जाँच से लेकर साक्ष्य प्रस्तुत करने तक हर मामले में पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही होनी चाहिए। न्यायालय एक क़दम आगे बढ़ी और मीडिया वन चैनल पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार के औचित्य को छिपाने वाले सीलबंद लिफ़ाफ़े को अनसील कर दिया और इसे वांछित पाया।
उम्मीद है कि सवोच्च न्यायालय के फ़ैसले से मीडिया को पूरा सच बोलने का हौसला मिलेगा। लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सबसे ज़्यादा मायने रखती है, क्योंकि एक स्वतंत्र प्रेस सच्चाई को उजागर करता है। एक लोकतांत्रिक गणराज्य के मज़बूत कामकाज के लिए एक स्वतंत्र प्रेस महत्त्वपूर्ण है और प्रेस का कर्तव्य है कि वह सच बोले, ताकि वह नागरिकों को सूचित विकल्प देने और इसे लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए सत्ता पर प्रहरी के रूप में काम करे।
इससे जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी (आईएनएस) ने केंद्र से 6 अप्रैल को अधिसूचित आईटी नियमों के संशोधन वापस लेने के लिए कहा है। आईएनएस ने कहा है कि यह क़दम सरकार या उसकी नामित एजेंसी को कोई ख़बर $फर्ज़ी है या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए ‘पूर्ण’ और ‘मनमानी’ शक्ति प्रदान करेगा। आईएनएस ने किसी भी अधिसूचना के साथ आने से पहले मीडिया संगठनों और प्रेस निकायों जैसे हितधारकों के साथ व्यापक और सार्थक परामर्श की माँग की, क्योंकि इस क़दम मीडिया और इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इससे पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी नये आईटी (संशोधन) नियमों को लेकर चिन्ता ज़ाहिर की थी। गिल्ड का कहना था कि इन संशोधनों का देश में प्रेस की स्वतंत्रता पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एडिटर्स गिल्ड ने कहा था कि नये नियमों से केंद्र सरकार को खुद की एक ‘फैक्ट-चेक इकाई’ गठित करने की शक्ति दी है, जिसके पास केंद्र सरकार के किसी भी कामकाज आदि के सम्बन्ध में क्या फर्ज़ी या ग़लत या भ्रामक है, यह निर्धारित करने की व्यापक शक्तियाँ होंगी और वह मध्यस्थों (सोशल मीडिया मंच, इंटरनेट सेवा प्रदाताओं और अन्य सेवा प्रदाताओं सहित) को ऐसी सामग्री को हटाने के निर्देश दे सकेगी।
सियासी पत्ते आसानी से नहीं खुलते। इसके चलते तमाम अनुमान और कयास लगते हैं। राजस्थान के सियासी पत्ते भी खुले नहीं हैं, परन्तु राज्य के विधानसभा सदस्य सचिन पायलट की मंशा पर संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। कयास लग रहे हैं कि सचिन पायलट राजस्थान का ताज चाहते हैं, जिसके लिए वह कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा के पहलू में जाकर भी बैठने को तैयार हैं। बहाना है राजस्थान के मुख्यमंत्री का भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार में हुए घोटालों की जाँच न करने का। हो सकता है कि सचिन पायलट वास्तव में इसी मुद्दे को लेकर विरोध पर उतरे हों, परन्तु कुछ संकेत इस पर विश्वास नहीं होने दे रहे हैं।
कुछ ही महीने पहले की बात है, जब राजस्थान के विधायक सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार को ठिकाने लगाने की पहली कोशिश की थी और अपने कुछ समर्थक विधायकों के साथ फ़रीदाबाद के एक होटल में चले गये थे। परन्तु सियासत के खिलाड़ी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सारे पत्ते खोल दिये और इस साज़िश का पर्दा$फाश करते हुए सचिन पायलट को बैकफुट पर ला दिया। उस समय सचिन पायलट से राजस्थान के उप मुख्यमंत्री का पद भी छिन गया और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी छिन गया। तब भी यही आरोप लगे थे कि सचिन पायलट भाजपा से मिले हुए हैं और अपनी सरकार गिराकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते हैं, क्योंकि वह राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, जिसके लिए वह शुरू से ही अपने वरिष्ठ अशोक गहलोत से टकराव करते आ रहे हैं। माना जा रहा है कि सचिन पायलट भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं, क्योंकि वे सचिन को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त मंजूर कर चुके हैं, बिलकुल महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे की तरह।
पहली बार असफल रहने के बाद अब दूसरी बार सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बग़ावत पर उतरे, तो उन्होंने एक दिन की अनशन भी की। परन्तु इस अनशन में गाँधी परिवार का विरोध दिखा, क्योंकि जिस बैनर के नीचे पायलट अनशन पर बैठे, उस बैनर में महात्मा गाँधी की तस्वीर तो थी, परन्तु गाँधी परिवार के किसी सदस्य की तस्वीर तक नहीं थी। इस तरह बैनर से गाँधी परिवार को ग़ायब कर देने से कयास लगने लगे कि सचिन गाँधी परिवार की ही बग़ावत कर रहे हैं।
अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री राजस्थान
कहा जा रहा है कि इस बग़ावत में कांग्रेस के कुछ विधायक खुलकर तो कुछ दबी ज़ुबान से पायलट के समर्थन में खड़े हैं। वहीं अलवर ज़िले के बहरोड से निर्दलीय विधायक बलजीत यादव खुलकर पायलट के समर्थन में आ खड़े हुए हैं। यह वही विधायक हैं, जो पेपर लीक, बेरोज़गारी, वादे करके उन्हें पूरा न करने, निजी क्षेत्र में 75 प्रतिशत रिक्तियों पर स्थानीय युवाओं को आरक्षण देने, छ: महीने में पाँच लाख सरकारी नौकरियाँ देने, प्रश्न पत्रों का लेवल सेट करने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, भ्रष्टाचार रोकने और किसानों के साथ न्याय करने जैसे कई मुद्दों को लेकर काले कपड़े पहनकर लम्बे समय से गहलोत सरकार का विरोध कर रहे हैं। हालाँकि इससे अशोक गहलोत सरकार को कोई $खतरा नहीं है, क्योंकि अभी भी उनके साथ संख्याबल ज़्यादा है। वहीं सचिन पायलट इतने भी कमज़ोर नहीं हैं कि उनकी आवाज़ का राजस्थान में असर न हो। वह इकलौते क़द्दावर गुर्जर नेता हैं। यही वजह है कि कांग्रेस ने उनकी नकेल कसी तो, परन्तु उनके ख़िलाफ़ कोई बड़ी कार्यवाही नहीं कर सकी है; भले ही पार्टी आलाकमान सचिन से काफ़ी नाराज़ बतायी जा रही हैं।
वास्तव में सचिन अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की मिलीभगत को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जो भाजपा के लिए एक तीर से दो निशाने जैसा है। क्योंकि वसुंधरा राजे से प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की बनती नहीं है, जिसके चलते उन्हें राजस्थान की भाजपा इकाई से अलग-थलग सा कर दिया गया है। वहीं भाजपा किसी भी हाल में राजस्थान में अपनी सरकार चाहती है। ऐसे में वसुंधरा के बहाने गहलोत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर पायलट ने भाजपा की राज्य में सत्ता की भूख की आग में आहूतियाँ डालनी शुरू कर दी हैं। हालाँकि सभी जानते हैं कि वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के सियासी रिश्ते खटास भरे नहीं हैं। वहीं सचिन पायलट और अशोक गहलोत के सियासी रिश्तों में हमेशा तकरार रही है। हालाँकि ऐसा नहीं कि सचिन पायलट अशोक गहलोत का विरोध हर मामले में करते हैं, परन्तु वह ऐसे मुद्दे खोजते रहे हैं, जिनका बहाना लेकर उन्हें विरोध का मौ$का मिले। प्रश्न उठ रहा है कि क्या पायलट आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के ख़िलाफ़ जाकर भाजपा के साथ जाएँगे? क्योंकि राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री 2020 में अपनी प्रतिष्ठा और पद खोने के चलते तिलमिलाये हुए तो हैं, परन्तु भाजपा की जीत के आसार भी राजस्थान में नज़र नहीं आ रहे हैं। यही वजह है कि सचिन अभी खुलकर भाजपा ख़ेमे में कूद भी नहीं सकते। हो सकता है कि बग़ावत करके वह अपने समर्थकों की नब्ज़ टटोल रहे हों और भाजपा को यह दिखा रहे हों कि देखिए मेरे दम पर ही राजस्थान में आप सरकार बना सकते हैं।
फ़िलहाल तो सचिन पायलट ने अपना विरोध पत्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और राजस्थान कांग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा को मिलकर सौंप चुके हैं। लेकिन रंधावा बोल चुके हैं कि सचिन पायलट के ऊपर कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि वह राजस्थान को पंजाब नहीं बनने देंगे। हालाँकि उन्होंने सचिन पायलट द्वारा उठाये गये मुद्दों को सही बताया, परन्तु उनके तरीक़े को ग़लत बताया। अब सचिन पायलट ने सीधे कांग्रेस को ही धमकी दे दी है कि अगर उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, तो वह पार्टी विरोधी गतिविधि चलाएँगे।
पायलट की इस बग़ावत के बीच राजस्थान को वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन की सौगात दी मिली, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल तरीक़े से हरी झंडी दी, जिसमें जयपुर प्लेटफॉर्म पर अशोक गहलोत मौज़ूद थे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान सियासी माहौल को लेकर गहलोत पर चुटकी लेते हुए कहा कि गहलोत जी का मैं विशेष रूप से आभार व्यक्त करता हूँ कि इन दिनों वह राजनीतिक आपाधापी में हैं। अनेक संकटों से गुज़र रहे हैं। बावजूद इसके वह विकास के काम के लिए समय निकालकर आये, रेलवे के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। मैं उनका स्वागत भी करता हूँ। अभिनंदन भी करता हूँ। मैं गहलोत जी से कहना चाहता हूँ कि आपके तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। रेल मंत्री राजस्थान के हैं और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन भी राजस्थान के हैं।
प्रधानमंत्री की इस चुटकी पर राजस्थान के मुख्यमंत्री ने सचिन को लेकर सीधे-सीधे भाजपा और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा है। उन्होंने पायलट पर निशाना साधते हुए कहा कि एक ग़द्दार मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। हाईकमान सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बना सकता। एक ऐसा शख्स, जिसके पास 10 विधायक भी नहीं हैं। ऐसा शख़्स, जिसने विद्रोह किया, उन्होंने पार्टी को धोखा दिया, वह ग़द्दार हैं। इस बग़ावत को भाजपा ने फंड किया था और इसके पीछे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सहित भाजपा के वरिष्ठ नेता शामिल थे।
देखना यह है कि राजस्थान में सियासी खिलाड़ी अशोक गहलोत को चंद विधायकों के समर्थन और भाजपा की विपक्षी सरकार गिराओ, अपनी सरकार बनाओ नीति कितनी दिक़्क़त आएगी? क्या वह अपनी सरकार बचाने और दोबारा राजस्थान जीतने में सफल रह सकेंगे?
रामनवमी पर कई राज्यों में हुई हिंसा के असली कारणों को जानना भी ज़रूरी
इस साल रामनवमी से एक दिन पहले देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था- ‘देश के लोग यह संकल्प क्यों नहीं करते कि वे दूसरे समुदायों के प्रति सहिष्णुता वाला रवैया अपनाएँगे।’
सर्वोच्च न्यायालय की इस बात पर अमल किया गया होता, तो शायद इस त्योहार के दौरान तीन राज्यों में हिंसा नहीं होती और लोगों की जान नहीं जाती। देश में जब भी साम्प्रदायिक तनाव बनता है, आगजनी और धमाके होना मामूली बात हो जाती है और कई लोगों को जान गँवानी पड़ती है। साथ ही बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुक़सान भी होता है। ढेरों आरोप भी हैं।
लिहाज़ा रामनवमी पर हुई हिंसा के कारणों के भीतर जाना और यह जानना भी ज़रूरी है कि इनमें राजनीति का कितना बड़ी भूमिका है।
दुर्भाग्य से हिंसा रामनवमी के दिन या इसके एक दिन बाद हुई। त्योहार जो भारत में एक दूसरे को जोडऩे का काम करते रहे हैं, अब राजनीति की गंदी चालों का औज़ार बना दिये गये हैं। देश में अचानक साम्प्रदायिक तनाव हो जाना अब आम हो गया है। बंगाल, बिहार और अन्य राज्यों में हाल में जो तांडव दिखा, उससे ज़ाहिर है कि कुछ शक्तियाँ हैं, जो यह सब करवाती हैं। क्या इसके पीछे राजनीतिक मंशा है?
तनाव के कारक देखने से लगता है कि परदे के पीछे से खेल किसी और का होता है और सामने दिखने वाले चरित्र कोई और होते हैं। वैसे सरकारी आँकड़े देखें, तो केंद्र और राज्यों में भाजपा की सरकार आने के बाद सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं। ख़ुद केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि 2017 से 2021 के बीच सांप्रदायिक या धार्मिक दंगों से जुड़े 2,900 से अधिक मामले दर्ज किये गये हैं।
इन धार्मिक तनावों का इतिहास देखें, तो ज़ाहिर होता है कि त्योहारों के आसपास हिंसा बढ़ जाती है। हाल के वर्षों में यह कुछ ज़्यादा ही होने लगा है। इस बार दिल्ली के जहाँगीरपुरी में रामनवमी के दिन हिंसा हुई। जहाँगीरपुरी में रामनवमी के दिन शोभायात्रा निकाले जाने की कोशिश की गयी, पुलिस ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी। इस पर वहाँ हिंसा भडक़ी और कुछ लोगों को छतों से पत्थर बरसाते हुए भी देखा गया।
राजधानी से सैकड़ों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के पीछे ममता बनर्जी ने भाजपा का हाथ बताया। वहाँ हिंसा के बाद दो समुदायों के बीच तनावपूर्ण माहौल बना रहा। बिहार के सासाराम और बिहारशरीफ़ में भी यही हुआ। बिहार में रामनवमी के त्योहार के बाद इसके शहरों सासाराम और बिहारशरीफ़ से लगातार साम्प्रदायिक तनाव की ख़बरें आयीं। बिहारशरीफ़ में रामनवमी के जुलूस के दौरान पथराव हुआ था। दोनों तरफ़ से किये गये हमलों में दो लोगों को गोली लगी थी, जबकि पथराव में तीन लोग घायल हुए।
रोहतास ज़िले के सासाराम क़स्बे में रामनवमी के बाद दो बार धमाके हुए। पहले ब्लास्ट में एक और दूसरे में छ: लोग घायल हुए। इन सभी जगहों पर हिंसा रामनवमी और रमजान के अवसर पर हुई। देश में जब भी हिंसा होती है, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर हमला शुरू कर देते हैं। यह कोशिश नहीं होती कि आग को ठंडा किया जाए। राजनीति का चरित्र बहुत बदल गया है और इंसानी ज़िन्दगियों के मुक़ाबले राजनीतिक मुनाफ़े पर पार्टियों की नज़र ज़्यादा रहती है। रामनवमी पर देश के विभिन्न हिस्सों में हुई हिंसा की घटनाएँ सवाल खड़े करती हैं।
सवाल यह उठता है कि साम्प्रदायिक माहौल बिगाडऩे के पीछे क्या कोई साज़िश होती है और क्या राजनीति से इसका कोई लेना देना है? सवाल यह भी है कि राज्यों में पुलिस बल होने के बावजूद यह हिंसा क्यों होती है? पथराव, आगजनी सब होती है फिर भी उस पर क़ाबू पाने में वक़्त लग जाता है। हाँ, राजनीतिक बयानबाज़ी ज़रूर शुरू हो जाती है।
उधर रामनवमी के मौक़े पर पश्चिम बंगाल के हावड़ा और हुगली में हुई हिंसा में छ: सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में दावा किया है कि यह हिंसा पूर्व नियोजित थी। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश नरसिम्हा रेड्डी के नेतृत्व वाली इस कमेटी ने अंतरिम रिपोर्ट में कहा कि रामनवमी के जुलूस के दौरान हुए दंगे सुनियोजित तरीक़े से उकसाये गये थे। पैनल ने हिंसा की राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) से कराने की सिफ़ारिश भी की है।
पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे तौर पर भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराया। ममता ने कहा- ‘वे सांप्रदायिक दंगों के लिए राज्य के बाहर से गुंडे बुलाते रहे हैं। उनके जुलूसों को किसी ने नहीं रोका; लेकिन उन्हें तलवारें और बुलडोजर लेकर मार्च करने का अधिकार नहीं है।’
बिहार के सासाराम और बिहारशरीफ़ में रामनवमी के जुलूस के बाद हुई हिंसा को लेकर बिहार के पुलिस प्रमुख आर.एस. भट्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई है और हालात नियंत्रण में है। उन्होंने कहा कि हिंसा के आरोप में कुल 109 लोगों को गिर$फ्तार किया गया है।
उन्होंने कहा कि उपद्रवियों की लगातार पहचान की जा रही है और किसी भी असामाजिक तत्त्व को ब$ख्शा नहीं जाएगा, क़ानून की पूरी ताक़त के साथ उनसे निपटा जाएगा। डीजीपी ने कहा कि राज्य की अमन शांति को भंग करने का यह निश्चित तौर पर एक प्रयास था, जिसको पुलिस और ज़िला प्रशासन ने विफल किया है और पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है।
महाराष्ट्र के संभाजीनगर से 31 मार्च की जो तस्वीरें सामने आयीं, उनमें हाथों में डंडे लिए चेहरे पर नक़ाब पहने कुछ लोग एक साथ जाते हुए दिखायी पड़ते हैं। कौन हैं? पता नहीं। नक़ाब पहने दंगाइयों ने कई वाहनों पर हमला किया। एक अन्य वीडियो में दिखता है कि कुछ लोगों ने पुलिस वैन को आग के हवाले कर दिया। दो गुटों के बीच झड़प से हालात तनावपूर्ण हुए और दंगाइयों ने बे$खौफ़ पत्थरबाज़ी, आगजनी, तोडफ़ोड़ और हिंसा की। हिंसा में आधा दर्ज़न से ज़्यादा लोग घायल हुए। गुजरात में भी दो जगह तनाव बना। हिंसा भी हुई और कुछ लोग घायल भी हुए।
सर्वोच्च न्यायालय में मामला
देश में रामनवमी की शोभायात्रा के दौरान देश के कई राज्यों में हुई हिंसा का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गया है। शोभायात्रा के दौरान हुई हिंसा पर सर्वोच्च न्यायालय 17 अप्रैल को सुनवाई करेगा। इसे लेकर याचिका ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की ओर से दायर की गयी है। याचिका में जुलूस के दौरान हुए दंगों की जाँच समेत कई माँगें की गयी हैं। याद रहे रामनवमी के दिन 30 मार्च को पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखण्ड, तेलंगाना और गुजरात में हिंसा हुई थी। कई जगह शोभायात्रा के दौरान आगजनी की घटनाएँ सामने आयी थीं, जिनमें काफ़ी लोग घायल हुए थे।
फ्रंट की याचिका में माँग है कि हिंसा प्रभावित राज्यों के मुख्य सचिवों से रिपोर्ट तलब की जाए। इस हिंसा में काफ़ी नुक़सान हुआ था। फ्रंट की याचिका में बात है कि घायल हुए लोगों और संपत्ति को नुक़सान का हर्ज़ाना दिया जाए। याचिका में माँग है कि जिन भी लोगों पर हिंसा फैलाने और संपत्ति को नुक़सान का आरोप है, उनसे ही हर्ज़ाना वसूला जाए।
दंगों का काला इतिहास
देश में धर्म आधारित दंगों का लम्बा इतिहास रहा है। अफ़सोस की बात यह है कि दंगों से प्रभावित लोगों को दशकों तक न्याय नहीं मिल पाता। इतिहास की बात करें, तो रामनवमी के अवसर पर पहला बड़ा दंगा देश में जनता पार्टी के राज के दौरान सन् 1979 में हुआ था, जब जमशेदपुर में 108 बेक़सूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। जान गँवाने वालों में 79 मुस्लिम और 25 हिन्दुओं की पहचान सरकारी तरफ़ से की गयी थी। उस समय की मीडिया रिपोट्स के मुताबिक, आरएसएस ने रामनवमी जुलूस निकालने की साल भर की योजना बनायी। इसकी शुरुआत दिमनाबस्ती की एक आदिवासी बस्ती से की गयी, जिसके साथ मुस्लिम-बहुल साबिर नगर पड़ता था।
अधिकारियों ने जुलूस वहाँ से ले जाने का मंज़ूरी नहीं दी; लेकिन आरएसएस का तर्क था कि अपने ही देश में स्वतंत्र रूप से जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी जा रही। इसके बाद गतिरोध बढऩे से इलाक़े का माहौल ख़राब हो गया। सन् 1979 में आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस जमशेदपुर गये और ध्रुवीकरण वाला बयान दिया, जिसके बाद स्थिति ख़राब हो गयी। श्री रामनवमी केंद्रीय अखाड़ा समिति नाम के संगठन ने 7 अप्रैल को हिंसा वाला एक विवादित पर्चा जारी किया। जुलूस निकलते ही बड़ा दंगा भडक़ गया और 108 लोगों की जान चली गयी। इसका इतना असर हुआ कि 10 दिन के भीतर ही कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिर गयी।
एक और काला दिन सन् 1984 में आया जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की 31 अक्टूबर, 1984 को उनके सुरक्षा कर्मियों के ही हाथों हत्या के बाद दंगे भडक़ गये। सिखों को चिह्नित कर उन्हें निर्दयता से मारा गया और उनकी सम्पत्तियाँ जला दी गयीं। यह भी आरोप है कि उनकी बेटियों से दुव्र्यवहार किया गया। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, इन दंगों में 410 लोगों की हत्या की गयी और 1,180 घायल हुए। हालाँकि ग़ैर-सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, मरने वालों की संख्या कहीं ज़्यादा थी और इसमें खुलेआम राजनीति से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया था और उनके ख़िलाफ़ मामले भी बने।
इसके बाद सन् 1987 में देश में राजीव गाँधी और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान मलियाना का दंगा है, जिसे सबसे भयानक दंगों में गिना जाता है। मई में मेरठ शहर में दो दंगे हुए, 22 मई को हाशिमपुरा और उसके बाद 23 मई को मलियाना के होली चौक का सांप्रदायिक दंगा। मलियाना में 63 लोगों की हत्या कर दी गयी और 100 से ज़्यादा लोग गंभीर घायल हुए। यह दंगे शब-ए-बारात के दिन शुरू हुए और इनकी आग तीन महीने तक जलती रही। घटना यह है कि 23 मई को पीएसी की 44वीं बटालियन और मेरठ पुलिस की बड़ी फोर्स मलियाना पहुँची और दंगे के नियंत्रण के लिए गोलियाँ चलायीं। इन दंगों में मरे लोगों के शव कुएँ तक से मिले और सरकार ने इसकी न्यायिक जाँच की घोषणा की।
सन् 1989 भागलपुर का दंगे को कौन भूल सकता है, जिसमें 1100 से ज़्यादा लोग मारे गये थे। दो महीने से ज़्यादा तक दंगे जारी रहे। सन् 2005 में प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने इन दंगों की जाँच का ज़िम्मा न्यायमूर्ति एन.एन. सिंह के नेतृत्व वाले आयोग को सौंपा, जिनकी रिपोर्ट में 125 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफ़ारिश के अलावा उस समय की कांग्रेस सरकार को भी ज़िम्मेदार ठहराया गया था। सिपोट्स के मुताबिक, इस दंगे में न्यायालय से 346 लोगों को सज़ा मिली, जिनमें 128 को उम्र क़ैद थी।
गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार के समय 2002 में दंगा हुआ। गोधरा स्टेशन पर 27 फरवरी, 2002 को 23 पुरुषों, 15 महिलाओं और 20 बच्चों समेत 58 लोग (रिपोर्ट्स में इन्हें हिन्दू कारसेवक बताया गया है) साबरमती एक्सप्रेस में ज़िन्दा जला दिये गये। इस घटना के बाद पूरा गुजरात सुलग उठा। चारों तरफ़ दंगे भडक़ उठे। हिंदू-मुस्लिम हिंसक टकराव में फँस गये। इसके बाद हुई हिंसा को ‘राजनीतिक हिंसा’ माना जाता है। गुलबर्ग सोसायटी पर बेक़ाबू भीड़ का हमला हुआ, जिसमें कांग्रेस के एक सांसद एहसान ज़ाफ़री सहित 69 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इन दंगों में 1,000 से ज़्यादा लोग मारे गये, जिनमें 790 मुस्लिम और 254 हिन्दू शामिल थे।
चार साल बाद अप्रैल, 2006 में अलीगढ़ का दंगा रामनवमी उत्सव के दौरान हुआ, जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा हुई। पाँच लोगों की मौत हो गयी। सन् 2009 में महाराष्ट्र के पुसद में भी रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा हुई। पथराव के बाद हिंसा भडक़ गयी। दंगाइयों ने दर्ज़नों दुकानों को आग के हवाले कर दिया। हज़ारीबाग़ में 2015 में मुहर्रम के जुलूस में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर दंगा भडक़ा, जिसमें कई लोगों की जान चली गयी। अगले सन् 2016 में झारखण्ड के हज़ारीबाग़ की हिंसा भी रामनवमी उत्सव पर हुई। इसमें सम्पति को नुक़सान पहुँचा।
पश्चिम बंगाल, जिसमें दंगों और हिंसा का लम्बा इतिहास रहा है; में 2018 में रानीगंज में रामनवमी के जुलूस के दौरान मुस्लिम समुदाय की तरफ़ से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर आपत्ति के बाद दो समुदायों के बीच हिंसा हुई। इस दौरान बम हमले में पुलिस उपायुक्त अरिंदम दत्ता चौधरी का दाहिना हाथ उड़ गया। हिंसा में काफ़ी नुक़सान हुआ।
साल 2019 में पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक रामनवमी रैली पर पथराव किया गया, जिसके बाद हिंसा बढ़ गयी। इसी साल राजस्थान के जोधपुर में 13 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस के दौरान सांप्रदायिक हिंसा हुई। सन् 2022 में गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। अप्रैल में रामनवमी पर हुई इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई, जबकि पुलिस के लोगों समेत कई घायल हुए। अब 2023 भी अछूता नहीं रहा और फिर तीन राज्यों में पाँच जगह हिंसक झड़पें हुईं और लोगों को अपनी जान और सम्पति का नुक़सान झेलना पड़ा।
दंगों की बढ़ती संख्या
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने संसद में बताया था कि साल 2017 से 2021 के बीच सांप्रदायिक या धार्मिक दंगों से जुड़े 2,900 से अधिक मामले दर्ज किये गये हैं। राय ने राज्यसभा के एक सवाल के लिखित जवाब में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि सन् 2021 में सांप्रदायिक या धार्मिक दंगों के 378, सन् 2020 में 857, सन् 2019 में 438, सन् 2018 में 512 और सन् 2017 में 723 मामले दर्ज किये गये।
आँकड़ों की जंग
सन् 2020 में सांप्रदायिक हिंसा की कुल 857 घटनाएँ हुईं। यह 2019 की तुलना में 94 फ़ीसदी ज़्यादा थीं। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं का केंद्र इस दौरान राजधानी दिल्ली रहा है। सन् 2014 और सन् 2019 के बीच दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों की महज़ दो घटनाएँ हुईं। लेकिन सन् 2020 में दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों की 520 घटनाएँ हुईं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के संसद में दिये आँकड़ों के मुताबिक, देश में सन् 2016 और सन् 2020 के बीच सांप्रदायिक और धार्मिक दंगों से जुड़ीं 3,399 घटनाएँ हुईं। एनसीआरबी के रिकॉर्ड के मुताबिक, देश में भाजपा की सरकार आने के बाद 2014 से 2020 के बीच सांप्रदायिक दंगों की 5417 घटनाएँ दर्ज की गईं। देश में अक्सर दंगों के लिए कांग्रेस और भाजपा में ठनी रहती है।
दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ यह लगाते हैं कि उनके शासनकाल में सांप्रदायिक हिंसा ज़्यादा हुई। वैसे तो ऐसी तुलना करना दंगों से होने वाले भीषणता को नज़रअंदाज़ करने जैसा है। लेकिन गृह मंत्रालय के मुताबिक, सन् 2008 में केंद्र में यूपीए सरकार के समय सबसे 943 साम्प्रदायिक घटनाएँ हुईं। उधर एनसीआरबी के मुताबिक, सन् 2014 में देश में 1,227 सांप्रदायिक घटनाएँ हुईं। यदि दोनों बड़ी पार्टियों (यूपीए और एनडीए) की सरकार की तुलना ही करें, तो सन् 2006 से सन् 2012 के यूपीए (कांग्रेस) के छ: साल के कार्यकाल में सांप्रदायिक हिंसा की कुल 5,142 घटनाएँ दर्ज की गयीं।
उधर एनडीए (भाजपा) के 2014-2020 के छ: साल के दौरान सांप्रदायिक हिंसा की इससे कुछ ज़्यादा 5,417 घटनाएँ दर्ज की गयीं। सरकारी आँकड़े ज़ाहिर करते हैं कि सन् 2014 में जो 1,227 सांप्रदायिक घटनाएँ हुईं, उनमें 2,001 लोग; जबकि सन् 2018 की 512 घटनाओं में 812 लोग पीडि़त हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या होने वाली घटनाओं से लगभग दोगुनी रहती है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं की पहली बैठक से मिले सकारात्मक संकेत
विपक्ष एकता की तैयारी में जुट गया है। अप्रैल के दूसरे हफ़्ते वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने विपक्ष के बड़े नेताओं से अपील की कि 2024 के आम चुनाव में भाजपा का मुक़ाबला करने वाले किसी भी गठबंधन के केंद्र में कांग्रेस को होना चाहिए।
अभी तक कांग्रेस से विदक रहे दल या नेता कांग्रेस को लेकर अपने तेवर बदलते दिख रहे हैं। सिब्बल की सलाह के तीन दिन के ही भीतर 12 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद नेता तेजस्वी यादव सहित कई नेता दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के घर राहुल गाँधी की उपस्थिति में जुटे। एकता का मुद्दा केंद्र में रहा। ज़ाहिर है बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया है।
नीतीश कुमार की राहुल गाँधी से यह मुलाक़ात इसलिए भी मायने रखती है कि गाँधी की लोकसभा सदस्यता जाने के बाद देश की राजनीति अचानक नयी करवट लेती दिख रही है। यह मुलाक़ात कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर हुई, जिसमें जद(यू) अध्यक्ष ललन सिंह के अलावा बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, मंत्री संजय झा, कांग्रेस नेता सलमान ख़ुर्शीद और मुकुल वासनिक भी मौज़ूद रहे। मुलाक़ात का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार की अगवानी खडग़े और राहुल गाँधी ने दरवाज़े पर आकर की।
अभी यह तय नहीं है कि क्या आने वाले समय में टीएमसी प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी इस तरह की बैठकों का हिस्सा बनेंगे? लेकिन नीतीश कुमार की राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खडग़े के साथ बैठक से एक बात तो ज़ाहिर हो जाती है कि एकता के प्रयासों की शुरुआत हो गयी है और कांग्रेस की भूमिका आने वाले समय में एकता के केंद्र के रूप में हो सकती है। इस दौरान कर्नाटक के चुनाव भी हैं और यदि कांग्रेस वहाँ भाजपा को हराने में सफल हो जाती है, तो न सिर्फ़ कांग्रेस, बल्कि विपक्ष के लिए भी यह संजीवनी का काम करेगी।
बैठक को लेकर राहुल गाँधी ने कहा- ‘विपक्ष को एक करने में एक बेहद ऐतिहासिक क़दम उठाया गया है। यह एक प्रक्रिया है। विपक्ष का देश के लिए जो विजन है, हम उसे विकसित करेंगे। जितनी भी विपक्षी पार्टियाँ हमारे साथ चलेंगी, हम उन्हें साथ लेकर चलेंगे और लोकतंत्र और देश पर जो आक्रमण हो रहा है, हम उसके ख़िलाफ़ एक साथ खड़े होंगे और लड़ेंगे।’
इस बैठक के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बयान भी काफ़ी मायने रखता है। उन्होंने कहा- ‘अभी बात हो गयी है। हमने काफ़ी देर चर्चा की है। अधिक-से-अधिक पार्टियों को पूरे देश में एकजुट करने का प्रयास करना है। हम आगे एक साथ काम करेंगे, यह तय हो गया है।’
अभी तक विपक्ष को लेकर जो तस्वीर काफ़ी धुँधली दिख रही थी, उस पर से थोड़ा कोहरा इस बैठक के बाद छँटा ही है। निश्चित ही अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के प्रयास के लिहाज़ से इस मुलाक़ात को अहम माना जा सकता है। देखा जाए, तो हाल के महीनों में यह इस तरह की पहली ही बैठक है।
अप्रैल के पहले हफ़्ते में खडग़े ने नीतीश कुमार, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की थी। माना जाता है कि इसमें राहुल गाँधी का सन्देश उन्हें दिया गया था। बैठक को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष खडग़े ने कहा- ‘हमने यहाँ ऐतिहासिक बैठक की है। बहुत-से मुद्दों पर चर्चा हुई है। हमने तय किया कि सभी पार्टियों को एकजुट कर और एक होकर आगे के चुनाव लड़ेंगे। हम सभी उसी रास्ते पर आगे चलेंगे।’
‘तहलका’ को मिली जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस और अन्य दल आने वाले समय में ऐसी और बैठकें करने वाले हैं। कर्नाटक के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस और ये विपक्षी दल एक साझा रैली कर एकता का सन्देश देंगे। कांग्रेस के एक नेता ने इस संवाददाता को बताया कि खडग़े के आवास पर हुई बैठक में यह माना गया कि अभी तक भाजपा एकतरफ़ा दबाव बनाये हुए थी; लेकिन अब समय आ गया है कि उस पर साझा विपक्ष का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाए। यह पहली ऐसी बैठक है, जिसमें देश के मौज़ूदा राजनीतिक हालात और अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र विपक्षी दलों को एकजुट करने के संदर्भ में चर्चा की गयी। तेजस्वी यादव और बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह भी बैठक में अपनी बात कही।
याद रहे नीतीश कुमार हाल के महीनों में कांग्रेस से एक से ज़्यादा बार कह चुके हैं कि उसे विपक्ष की एकता की पहल करनी चाहिए। अब इसके शुरुआत हो गयी है। नीतीश कुमार को भरोसा है कि एकजुट विपक्ष भाजपा को मात दे सकता है। फरवरी में नीतीश कुमार ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि यदि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल 2024 का लोकसभा चुनाव एकजुट होकर लड़ते हैं, तो भाजपा 100 सीटों से कम पर सिमट जाएगी।
आगे क्या होगा?
यह सभी विपक्षी दल अप्रैल के आख़िर में एक और बैठक करेंगे। इस दौरान खडग़े और नीतीश सभी से बात करेंगे और उन्हें साझा मंच में जुटने की अपील करेंगे। जानकारी के मुताबिक, बैठक में यह कहा गया कि जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करके एक ठोस आधार बनाकर विपक्ष को जोड़ा जाये। खडग़े ने कहा कि सभी पार्टियों को एकजुट करना और एक होकर आगे जो चुनाव आएँगे, उस चुनाव में एकजुटता दिखाकर लडऩा, यही निर्णय हुआ है। उन्होंने कहा- ‘हम सब उसी रास्ते पर काम करेंगे। तेजस्वी जी, नीतीश जी सभी हमारे नेतागण जो यहाँ बैठे हैं। हम सब उसी लाइन पर काम करेंगे।’
इन नेताओं की रणनीति यह है कि जो नेता अगले एक पखवाड़े सहमत होते हैं, उनके साथ भी बात की जाए। बैठक में जिस तरह राहुल गाँधी ने नीतीश की तारीफ़ की उसके भी कई मायने हैं। राहुल ने कहा कि नीतीश जी विपक्ष को जोडऩे के लिए जो कर रहे हैं, उसके अच्छे नतीजे निकलेंगे। राहुल का कहना यह एक प्रक्रिया है और इसे आने वाले समय में विकसित किया जाएगा। साझे मंच के ज़रियेे विपक्ष का जो नज़रिया है, उसे विकसित करने की योजना पर विपक्ष काम कर रहा है।
हाल के दिनों में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कुछ ऐसी बातें कही हैं, जिनसे विपक्ष की एकता पर भाजपा सवाल उठा रही है। शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के मंत्री रहे अजीत पवार ने हाल में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ की थी। इसके बाद ईडी ने उनका और उनकी पत्नी सुनेत्रा का नाम एमएससी बैंक घोटाले की चार्जशीट में नहीं रखा है। ख़ुद शरद पवार ने कांग्रेस और विपक्ष की 19 पार्टियों की गौतम अडानी मामले में जेपीसी की माँग को $गलत बताया था। इसके बाद पवार को लेकर कई तरह की चर्चाएँ शुरू हो गयी थीं। हालाँकि पवार भाजपा के साथ जाएँगे, यह नहीं कहा जा सकता।
PM visits new Parliament House, in New Delhi on March 30, 2023.
देश में एक आलीशान और आधुनिक लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद भवन जो सेंट्रल विस्टा का ही एक भाग होगा लगभग बनकर लगभग तैयार हो चुका है। पिछले दिनों, जिसका जायज़ा भी प्रधानमंत्री ने लिया था, आशा की जा रही है कि आगामी संसद सत्र इसी नये और भव्य संसद भवन में होगा। लेकिन विपक्षी दल शुरू से ही केंद्र की मोदी सरकार के इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं।
इसके पीछे उनके दो तर्क हैं- पहला यह कि मोदी सरकार ने सेंट्रल विस्टा को, जिसमें संसद भवन, उप राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास शामिल है, को 20,200 करोड़ से ज़्यादा की लागत से ऐसे समय में अति आवश्यक कार्यों की सूची में डालकर बनवाना शुरू किया, जब पूरा देश कोरोना महामारी से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा था। इसे लेकर सेंट्रल विस्टा का विरोध जताने वालों का सवाल यह है कि ऐसे समय में जब लोगों को मदद की ज़रूरत थी, ऑक्सीजन की ज़रूरत थी, रोज़गार जा रहे थे, भयंकर तरीक़े से मौतें हो रही थीं, तब इतनी बड़ी रक़म से नया संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास और उप राष्ट्रपति आवास बनवाने की क्या ज़रूरत थी? विरोध जताने वालों का दूसरा तर्क और सवाल यह है कि अभी पुराना संसद भवन इतनी ख़राब स्थिति में भी नहीं है कि वहाँ पर संसद की कार्यवाही न चलायी जा सके? दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहाँ आज भी हमसे भी पुरानी संसद की इमारतें हैं और उनमें आज भी कार्यवाही बदस्तूर जारी है, तो नया संसद भवन बनाने की क्या ज़रूरत थी?
दरअसल मैं पिछले क़रीब ढाई दशक से संसद की गतिविधियों को कवर कर रहा हूँ। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि नये संसद भवन की देश को बहुत ज़रूरत थी। हर चीज़ पर राजनीति करना राजनीतिक दलों का काम है। लेकिन अगर हम निष्पक्ष तरीक़े से देखें, तो पिछले समय पुरानी संसद में जगह को लेकर तमाम राजनीतिक दलों को परेशानियाँ होती रही हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के अलावा एक अच्छा कार्यालय तक किसी अन्य राजनीतिक दल के पास संसद भवन की इमारत में नहीं है। इसके अलावा तमाम दूसरे कार्यालय संसद भवन की पुरानी इमारत में खस्ताहाल में है, जगह कम होने के वजह से ही नयी लाइब्रेरी बिल्डिंग बनाने और एनेक्सी भवन के विस्तार किया गया था। इसलिए देखना होगा कि क़रीब 100 साल पहले जब हिन्दुस्तान का संसद भवन अंग्रेजी हुकूमत के दौरान जब बना था, तो हिन्दुस्तान की आबादी 35 से 40 करोड़ के अन्दर थी। लेकिन आज के समय में देश की आबादी क़रीब 140 करोड़ के आसपास है। ऐसे में न सिर्फ़ देश में लोकसभा की सीटें पहले की अपेक्षा बढ़ चुकी हैं, बल्कि राज्यसभा की सीटें भी बढ़ चुकी हैं और इनमें आगे भी इज़ाफ़ा हो सकता है। दूसरी बात, ख़ुद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक बार पत्र लिखकर कहा था कि देश को नये संसद भवन की ज़रूरत है। लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बड़ा फ़ैसला लेने की हिम्मत दिखायी और जब वह नये संसद भवन में उसका जायज़ा लेने पहुँचे, तो इस पर फिर राजनीति होने लगी। अब जयराम रमेश ही कह रहे हैं कि ये फ़िज़ूलख़र्ची है।
हालाँकि मेरा मानना है कि एक चीज़ जो विरोध के लायक है और मैं भी उस पर सहमत हूँ, वो यह है कि सरकार को नया संसद भवन बनाने से पहले इस गम्भीर विषय पर फ़ैसला करने के लिए एक सलाहकार समिति बननी चाहिए थी, जो एक रिपोर्ट देती कि किस प्रकार से नया संसद भवन बनना चाहिए। ज़ाहिर है इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में भी कुछ लोगों ने याचिका डाली है, जिसमें कहा गया है कि किस तरह से नया संसद भवन बनवाने के लिए पेड़ काटे गये और पर्यावरण का ध्यान नहीं रखा गया है।
तो इस प्रकार के विरोध तो जायज़ माने जा सकते हैं। लेकिन यह कहना कि संसद भवन ही नहीं बनाना चाहिए था, बिलकुल ग़लत है। क्योंकि पुराने संसद भवन में मैंने अपनी आँखों से संसद की छत से पत्थर के टुकड़े गिरते देखें है। उसके बाद अस्थायी तौर पर छतों पर जाल लगाने का काम किया गया था। आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के दिशा-निर्देश के मुताबिक, पुराने संसद भवन में से एक पत्थर भी आप हटा नहीं सकते और एक पत्थर भी वहाँ लगा नहीं सकते, तो इन परिस्थितियों में उस संसद भवन को चलाना काफ़ी मुश्किल हो रहा था और एक नये संसद भवन की आवश्यकता तो थी।
मेरा मानना है कि देश को नया संसद भवन मिलने से कोई नुक़सान नहीं है, बल्कि अच्छा ही है। संसद भवन का डिजाइन साल 1912-13 में उस वक़्त के मशहूर ब्रिटिश वास्तुविद एडविन लुटियन ने बनाया था। इसका निर्माण 1921 से 1927 के बीच हुआ था। अंग्रेजों ने दिल्ली में नयी प्रशासनिक राजधानी बनाने के लिए इसे बनवाया, जिसे आज़ादी के बाद संसद भवन के रूप में इस्तेमाल में लाया गया। 566 व्यास मीटर में बने 144 खंभों वाले संसद भवन में 340 कमरे हैं। इसमें कुल अभी लोकसभा में 543 और राज्यसभा में 245 सीटें हैं। अब अगर नये संसद भवन की बात करें, तो इसका शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तालाबंदी में 2020 में किया। इसके निर्माण की जिम्मेदारी सरकार ने टाटा को 2020 में 861.9 करोड़ रुपये में दी। कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी लागत क़रीब 1,200 करोड़ रुपये तक बढ़ गयी है। इस नये संसद भवन में लोकसभा में 888 सीटें हैं, जबकि राज्यसभा में 384 सीटें हैं। नये संसद भवन के बनकर पूरे होने की मियाद दिसंबर 2020 थी; लेकिन इसमें अभी एक-डेढ़ महीने का समय और लग सकता है और उम्मीद है कि अगला संसद सत्र लोकतंत्र के इसी नये मंदिर में लगेगा।
बहरहाल सवाल यह भी है कि जब विपक्ष से सवाल करने की स्वतंत्रता को छीन लेना चाहती है। अगर कोई सवाल पूछ ले, तो या तो उसके सवालों के जवाब नहीं देती या फिर उसके ख़िलाफ़ बदले की भावना से कार्रवाई करती है। ऐसे में नये संसद भवन को लोकतंत्र का मंदिर कैसे कहा जाए? जब लोकतंत्र बचेगा ही नहीं, तो इस लोकतंत्र के मंदिर की आवश्यकता ही क्या है? यह कोई किसा राजा का दरबार नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र देश के लोकतंत्र का मंदिर है, जहाँ न सिर्फ़ विपक्ष की, बल्कि पत्रकारों की, बुद्धिजीवियों की और जनता की आवाज़ न सिर्फ़ सुनी जानी चाहिए, बल्कि उस पर संज्ञान भी लिया जाना चाहिए। साफ़ ज़ाहिर है कि लोकतंत्र में जिस विपक्ष के होने को लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी माना गया है, उस लोकतंत्र में जब विपक्ष ही नहीं रहेगा, तो फिर सत्ता पर जबरन क़ब्ज़ा होने में वक़्त नहीं लगेगा, जो कि देश के लिए भी ख़तरनाक है और देश की जनता के लिए भी।
मेरा मानना है कि अगर सरकार ऐसा करती है, तो इसके ख़िलाफ़ जो आवाज़ उठ रही है, वो जायज़ है। लेकिन जो पत्रकार, बुद्धिजीवी और विपक्षी नेता अब भी ख़ामोशी से यह तमाशा देख रहे हैं या फिर सरकार के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं, उन्हें न तो पत्रकार कहलाने का हक़ है, न बुद्धिजीवी कहलाने का हक़ है और न ही नेता बने रहने का हक़ है। क्योंकि सरकार की ग़लत नीतियों के विरोध का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि कोई सरकार विरोधी हो गया, बल्कि उसका मतलब साफ़तौर पर यह है कि वह सरकार को सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर रहा है, जो कि हर लोकतांत्रिक देश के हित में है और ज़रूरी भी है। यहाँ अगर हम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के ही शब्दों को याद करें, तो उन्होंने ख़ुद संसद में इस बात का ज़िक्र किया था कि जब वो राजनीति में नये थे और संसद में सबसे पीछे बैठते थे, तो एक बार उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा कि साउथ ब्लाक में नेहरू जी का एक चित्र लगा रहता था। मैं आते-जाते देखता था। नेहरू जी के साथ सदन में नोकझोंक भी हुआ करती थी। मैं नया था पीछे बैठता था। कभी-कभी तो बोलने के लिए मुझे वॉकआउट करना पड़ता था। लेकिन धीरे-धीरे मैंने जगह बनायी, मैं आगे बढ़ा और जब मैं विदेश मंत्री बन गया, तो मैंने देखा कि गलियारे में टंगा हुआ नेहरू जी का फोटो कहाँ है? मैंने कहा यह चित्र कहाँ गया, कोई जवाब नहीं मिला; लेकिन चित्र वहाँ फिर से लगा दिया गया।
अटल जी ने कहा था कि ऐसा नहीं था कि नेहरू जी से मतभेद नहीं थे, और मतभेद गम्भीर रूप से उभर सामने आते थे। मैंने एक बार पंडित जी से कह दिया था कि आपका मिलाजुला व्यक्तित्व है और आप में चर्चिल भी है और चेम्बरलेन भी। वो नाराज़ नहीं हुए। शाम को किसी बैंक्वेट में मुलाक़ात हो गयी और उन्होंने कहा कि आज तो बड़ा ज़ोरदार भाषण दिया और हँसते हुए चले गये। अटल बिहारी वाजपेई ने कहा कि आजकल ऐसी आलोचना करना दुश्मनी को दावत देना है। लोग बोलना बन्द कर देंगे।
यह वाक़िया सरकार को सिखाता है कि विपक्ष को किस तरह से साथ लेकर चलना चाहिए और उसकी सुननी चाहिए। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। और यह देश के लोकतंत्र के लिए ख़तरे की सायरन है, जो लगातार बज रहा है; लेकिन उसे बन्द करने की हिम्मत किसी में नहीं है। अगर लोकतंत्र को बचाना है, तो देश के सभी तब$कों को जागना होगा और लोकतंत्र के ख़तरे वाले इस सायरन को बन्द करना होगा।
एक वैचारिक द्वंद्व में फँसा देश का लोकतंत्र कश्मकश के दौर से गुज़र रहा है। संसद सरकार और विपक्ष के सैद्धांतिक संघर्ष का अखाड़ा बनी है, जिसमें न्यायधीश भारतीय जनतंत्र ने अपने नेत्रों पर न्याय की पट्टी बाँध रखी है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ भी नहीं है, बल्कि ग़लत मार्ग पर है। उपरोक्त वक्तव्य का विशेष संदर्भ राहुल गाँधी के संसदीय सदस्यता गँवाने से सम्बन्धित है। जनता का एक बड़ा वर्ग उन्हें अनैतिक तथा नासमझ कहकर कोस रहा है। लेकिन क्यों और कैसे? इसे समझना होगा।
राहुल गाँधी 2019 के मोदी सरनेम मानहानि मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद संसद सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिये गये। जनप्रतिनिधि अधिनियम-1951 की धारा-8(3) के अनुसार, यदि किसी सांसद या विधायक को दो वर्ष या उससे अधिक सज़ा होती है, तो उसकी सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त सज़ा पूरी होने के छ: साल तक वह चुनाव नहीं लड़ सकेगा। इसी क़ानून की धारा-8(4) के अनुसार, न्यायालय द्वारा किसी जनप्रतिनिधि के दोषी ठहराये जाने पर उसकी अपील लम्बित रहने या उक्त निर्णय को उच्च अदालत में चुनौती दिये जाने पर उसकी सदस्यता बनी रहेगी। इस मसले से अनैतिकता और मूर्खता का क्या सम्बन्ध?
दरअसल जुलाई, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय अपने एक फ़ैसले में उक्त धारा को असंवैधानिक कर दिया। इस आदेश के विरुद्ध तत्कालीन संप्रग सरकार संसद में अध्यादेश लेकर आयी, जो कैबिनेट से पास भी हो चुका था। तब राहुल गाँधी ने सार्वजनिक रूप से इस अध्यादेश की प्रति फाड़ते हुए कहा कि यह सरासर बकवास है और इसे फाडक़र फेंक देना चाहिए।
मतलब, राहुल ने जिस अध्यादेश को पारित होने से रोका और न्यायपालिका के आदेश का सम्मान बने रहने दिया, उसी के कारण अपनी सदस्यता गँवा बैठे। अत: देश के तथाकथित राजनीतिक-सामाजिक जागरूक वर्ग के लिए राहुल गाँधी उपहास और आलोचना का केंद्र बने हुए हैं। उन्हें समझदारी और नैतिकता की उलाहना दी जा रही है। किन्तु सदस्यता जाने पर राहुल गाँधी का मज़ाक़ उड़ाने या कोसने वाले किसी भी व्यक्ति को क्या देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत करने का नैतिक अधिकार है? क्योंकि ये लोग एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस विचार को अपमानित कर उसका उपहास उड़ा रहे हैं, जो राजनीतिक लाभ से प्रेरित सही; लेकिन चुनावी भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास कर रहा था।
यदि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के विरुद्ध लाये गये अध्यादेश को रोकना, भ्रष्टाचारियों-अपराधियों के संसद तथा विधानमंडलों में प्रवेश को प्रतिबंधित करना अनैतिकता एवं नासमझी है, तो फिर नैतिकता और समझदारी क्या है? किसी स्वकेंद्रित सत्ता को तर्कहीन, विचारहीन समर्थन देना? विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार को बढ़ाना? सरकारी संस्थानों में मनमाने ढंग से नियुक्तियाँ करना? शिक्षा का बाज़ारीकरण करना? सनातन धार्मिक स्थलों, ईश्वर के दर्शन के रेट तय करना? मेहुल चोकसी जैसे भगोड़े के ख़िलाफ़ जारी रेड कार्नर नोटिस पर लापरवाही बरतना? सुशासन के नाम पर देश को कार्यपालिका की गिरफ़्त में जकडऩा? निष्पक्ष पत्रकारों, मीडिया संस्थानों का गला घोंटने का प्रयास करना? डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2022 द्वारा आरटीआई क़ानून को कमज़ोर करना? कृषि और किसान हितों के ख़िलाफ़ क़ानूनों का निर्धारण करना? अनावश्यक आवास से लेकर अनावश्यक सरकारी सुरक्षा देना? परिवारवाद, वंशवाद को प्रश्रय देना? भ्रष्टाचारियों के बचाव करना? नौकरशाही को प्रश्रय देना? भ्रष्टाचार पर आँखें मूँदे रहना? विभिन्न केंद्रीय विभागों में रिक्त पड़े पदों पर भर्ती न करना? बेरोज़गारी बढऩे देना? और ऐसे ही न जाने क्या-क्या राष्ट्रवादी निर्णय करना क्या नैतिकता और समझदारी है?
क्या हम यूटोपिया के युग में जी रहे हैं, जहाँ विरोध और समर्थन के नैतिक-अनैतिक पक्ष का बोध ही नहीं रहा? यदि ऐसा है, तो देश का मानस पटल विकृत हो रहा है। जो लोग आज राहुल गाँधी को अपमानित करने के लिए असंसदीय भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें संभवत: लोकनीति का ज्ञान नहीं है। अमर्यादित भाषा-शैली पतनशीलता का प्रतीक है। किसी व्यक्ति या समाज की भाषा का विकृत होना उसके विखंडन का प्रमाण है। जब कोई समाज नैतिक पतनशीलता की ओर बढऩे लगता है, तो सबसे पहले उसकी भाषायी मर्यादा ढहती है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि किसी के अंधविरोध या अंध-समर्थन में इतने उग्र और व्यग्र मत हो जाइए कि शुभ-अशुभ, नीति-अनीति का भान ही न रहे।
कांग्रेस की आलोचना कीजिए। मुस्लिम तुष्टिकरण, चीन के साथ सन् 1962 के युद्ध में हार, हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं को अपमानित करने, देश में भ्रष्टाचार की शृंखला आयोजित करने के लिए भारतीय राजनीति में वंशवाद के विषबीज का रोपण करने, सिख दंगों और ऐसे ही कितने दुष्कृत्यों के लिए बिलकुल उसकी आलोचना कीजिए। किन्तु उसके सकारात्मक कार्यों की प्रशंसा का नैतिक बल भी रखिए। सोचिए, यदि कांग्रेस खाद्य सुरक्षा विधेयक और मनरेगा क़ानून नहीं लायी होती, तो कोरोना-काल में तालाबंदी के समय देश की आधी आबादी मर गयी होती। उसके काल में ही प्रवर्तित आरटीआई क़ानून ने आम आदमी के साथ में लोकतांत्रिक अधिकारों की कुँजी सौंप दी। कांग्रेस द्वारा देश के हित एवं विकास में दिये गये योगदानों की एक लम्बी सूची है, जिसे ज़ोर से चिल्लाकर झुठलाया नहीं जा सकता।
राहुल गाँधी की राजनीतिक अपरिपक्वता का मज़ाक़ उड़ाइए। विदेश में लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले वक्तव्यों के लिए उनकी कटु आलोचना कीजिए। क्योंकि भारत के लोकतंत्र और जनता के आत्मबल को अपमानित करते हुए दूसरे देशों से राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की माँग करके उन्होंने वीभत्स अपराध किया है। किन्तु भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके प्रयासों के लिए उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा भी कीजिए। हो सकता है सत्तापक्ष राहुल गाँधी को एक अपरिपक्व नेता मानता हो; लेकिन चुनावी सुधार के लिए वह एक विशिष्ट व्यक्ति हैं। क्या इसके लिए वह उपहास योग्य हैं?
स्वयं के अयोग्य घोषित होने पर राहुल गाँधी की प्रतिक्रिया थी- ‘मैं भारत की आवाज़ के लिए लड़ रहा हूँ। मैं हर क़ीमत चुकाने को तैयार हूँ।’ उनके इस बयान को समर्थन दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपराधी, भ्रष्ट तत्त्वों के विधानमण्डलों में प्रवेश पर भारत की आवाज़ सुनी भी और उठायी भी। लेकिन अपनी भी सदस्यता गँवाकर इसकी क़ीमत चुकायी। इस विवाद में एक पक्ष ऐसा भी है, जो इसे राजनीतिक वर्ग की भाषायी अशिष्टता के लिए एक चेतावनी मान रहा है। सही भी है। यदि इस अदालती निर्णय से राजनीति में भाषायी मर्यादा स्थापित होती है, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। क्योंकि आज राहुल गाँधी की सदस्यता समाप्त होने पर तालियाँ पीटते हुए बल्लियों उछलने वालों के दामन भी पाक-साफ़ नहीं है। कुछ सबक़ उनके लिए भी ज़रूरी हैं।
पिछले कांग्रेस से आज़ाद एक नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री बदले से प्रेरित होकर कोई काम नहीं करते। वास्तव में ऐसा है क्या? दूसरे उदाहरण क्यों तलाशना? राहुल गाँधी के अयोग्य घोषित होते ही उन्हें तुरन्त सरकारी आवास ख़ाली करने का नोटिस थमा दिया गया। नियमानुसार तो यह कार्यवाही बिलकुल उचित है; लेकिन सार्वजनिक जीवन में कुछ समयानुकूल विकल्प भी होते हैं और कुछ मर्यादाएँ भी। यदि देश में क़ानूनन-कार्यशैली की ही बात हो, तो फिर वर्तमान ‘सदाचारी सरकार’ के लिए मुँह छुपाना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि अनैतिक कार्यों की सूची बड़ी लम्बी हो जाएगी, जिससे उसे असहज स्थिति का सामना करना पड़ जाएगा। सत्तापक्ष द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति असंवेदनशील एवं कठोर रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में सरकारें परिवर्तनशील होती हैं। सत्ता का यह खेल तो चलता रहेगा। लेकिन सामाजिक, राजनीतिक मर्यादाएँ ध्वस्त नहीं की जानी चाहिए और न ही कोई कलुषित परम्परा स्थापित की जानी चाहिए। मैं राहुल गाँधी का कठोर आलोचक रहा हूँ। उनके प्रति मेरी यह धारणा निजी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। वर्तमान राजनीतिक दौर में देश को एक सशक्त विपक्ष और सबसे बढक़र मज़बूत विपक्षी नेता की ज़रूरत है। कांग्रेस वह विपक्ष दल बन सकती है; लेकिन राहुल गाँधी विपक्ष के मज़बूत नेतृत्वकर्ता बन सकते हैं, इसमें संशय है। समस्या यह है कि वह अपनी ज़िद में वास्तविक जननेता के उभार का मार्ग बन्द करके बैठे हैं। देश के जनतांत्रिक हितों को नेहरू परिवार की महत्त्वाकांक्षा पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।
लेकिन जिस दिन राहुल गाँधी ने अध्यादेश की प्रति सार्वजनिक रूप से फाड़ी थी, उस दिन वह साहसी राजनेता प्रतीत हुए थे। उनके विरोध के कारण ही संप्रग सरकार अध्यादेश को पारित करने से पीछे हट गयी। राहुल ने अकेले वो कर दिखाया, जो नैतिकता का दम्भ रखने वाली सरकारों और नेताओं के बूते की बात नहीं है। उस दृश्य को याद करिए, जब सर्वोच्च न्यायालय के आलोच्य आदेश के विरुद्ध सर्वदलीय सम्मेलन में देश ने राजनीतिक दलों की एकता का अद्भुत दृश्य देखा। क्या दक्षिणपंथी, क्या वामपंथी-समाजवादी, सभी इकट्ठे हो गये थे। ऐसे में अगर किसी को यह भ्रम है कि इस देश में सत्तापक्ष और विपक्ष एकमत नहीं हो सकते, तो वह ग़लत है।
हालाँकि इस पूरे मामले में सर्वाधिक दोषी जनता है। प्रतीत होता है जैसे कुएँ में ही भाँग पड़ी है। यह अंध-राष्ट्रभक्ति का नशा ऐसा है, जहाँ उचित-अनुचित, सत्य-असत्य की कोई विभाजक रेखा ही नहीं रह गयी है। जैसा कि प्रो. जॉन क्लेनिंग लिखते हैं- ‘राजभक्ति का एक वास्तविक $खतरा यह होता है कि यह झुण्ड-सोच, अंध-राष्ट्रवाद, देशाहंकार की ख़ास क़िस्मों से जुड़ जाती है और सामाजिक तौर पर इतने तरीक़ों से विध्वंसक हो जाती है, जितना कि कोई भी गुण भ्रष्ट होने के बाद नहीं हो पाता। राष्ट्रवाद और देशभक्ति के अन्दर पथभ्रष्ट अतिरेक का शिकार हो जाने की प्रवृत्ति विशेष तौर पर मौज़ूद रहती है।’
इसे भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझने की विशेष ज़रूरत है। किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के समर्थक होने का अर्थ यह नहीं कि कोई उसके कुकृत्यों, कुप्रवृत्तियों के अनुपालन का समर्थन करने लगे। कोई भी नेतृत्व या दल राष्ट्र से श्रेष्ठ नहीं हो सकता। किसी भी सत्ता के कार्य यदि तर्क की कसौटी पर सही सिद्ध न हों, तो इसका तात्पर्य है कि वह राष्ट्र के लिए शुभ नहीं है। ऐसी सत्ता का तर्कहीन समर्थन और सहयोग जो भी हो, राष्ट्रवाद तो कदापि नहीं हो सकता।
उपरोक्त विवेचना समझने के लिए देश में सरकार के सहयोग से मीडिया के विशेष वर्ग द्वारा बनाये हुए आभासी वातावरण पर मत जाइए। स्वयं तथ्यों को खोजिए, मुद्दों को समझने व उनके विश्लेषण का प्रयत्न कीजिए। आप ख़ुद को सत्य के निकट पाएँगे। प्रसंगवश भारतीय जनमानस की वर्तमान मनोदशा को देखकर ब्राजीलियन कवयित्री मार्था मेदेइरोस की कविता ‘धीमी मौत’ की कुछ पंक्तियाँ स्मृति में उभर आयी हैं :-
‘जो बन जाते हैं आदत के ग़ुलाम,
चलते रहे हैं हर रोज़ उन्हीं राहों पर,
बदलती नहीं जिनकी कभी रफ़्तार,
जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,
और बात नहीं करते अनजान लोगों से,
वे मरते हैं धीमी मौत।’
भारत के तथाकथित जागरूक राजनीतिक-सामाजिक वर्ग को समझना होगा कि उसकी नैतिकता एक धीमी मौत मर रही है। स्वयं पर एक एहसान करिए और सोचिए कि वास्तव में नैतिकता क्या है और नासमझ कौन है? अपना मूल्यांकन कीजिए, तब शायद क़रीब आती धीमी मौत से बचने का मार्ग मिल जाए।
दक्षिण में भाजपा और कांग्रेस की पैठ का संकेत देंगे नतीजे
साल 2024 के आम चुनाव का पहला बड़ा इम्तिहान कर्नाटक में होगा। चुनाव आयोग ने 10 मई को वहाँ मतदान तय किया है और कांग्रेस और भाजपा वहाँ मुख्य दौड़ में दिख रहे हैं। चुनाव सर्वे पर भरोसा न भी करें, तो भाजपा जहाँ प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर निर्भर दिख रही है, वहीं कांग्रेस स्थानीय मुद्दों, जिनमें 40 फ़ीसदी कमीशन का मुद्दा शामिल है; के भरोसे अपनी नैया पार लगने की उम्मीद कर रही है।
इस साल प्रधानमंत्री मोदी आठ बार कर्नाटक का दौरा कर चुके हैं और कांग्रेस ने अपना नया अध्यक्ष कुछ ही महीने पहले मल्लिकार्जुन खडग़े के रूप में कर्नाटक से चुना है। राज्य में तीसरी मज़बूत पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की जनता दल (एस) है, जिसे सिर्फ़ यह चिन्ता है कि किसी एक पार्टी के पक्ष में नतीजा गया तो सबसे ज़्यादा नुक़सान उसी को झेलना पड़ सकता है। दक्षिण में पाँव जमाने की भाजपा की कोशिशों की परीक्षा कर्नाटक के नतीजों से तय हो जाएगी। यह भी पता चल जाएगा कि क्या 2024 से पहले दक्षिण में कांग्रेस फिर अपने पाँव जमा रही है?
कर्नाटक के चुनाव में हाल के महीनों में स्थानीय मुद्दे काफ़ी तेज़ी से उभरे हैं। भाजपा वहाँ राष्ट्रीय मुद्दे उभारने की कोशिश में है, ताकि कांग्रेस को बढऩे से रोका जा सके। प्रधानमंत्री मोदी के काफ़ी चुनावी दौरे भाजपा ने रखे हैं। उसका भरोदा मोदी पर ही टिका है। यह माना जाता है कि मुख्यमंत्री के रूप में बसवराज बोम्मई बहुत प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं कर पाये हैं और उनकी सरकार भी कई बार विवादों में घिरी है, जिसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार का है। इसे ही कांग्रेस सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाये हुए है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी इज़्ज़त का चुनाव है, क्योंकि उसके नये अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े कर्नाटक से हैं। खडग़े ने राहुल गाँधी से मिलकर कर्नाटक के टिकट तय किये हैं। वैसे भी कांग्रेस जब 166 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी थी, तब जाकर भाजपा ने उम्मीदवार घोषित करने शुरू किये। कांग्रेस की इस पहल का लाभ प्रचार के रूप में उन उम्मीदवारों को मिला, जिनके नाम घोषित हो चुके थे। कर्नाटक का चुनाव राहुल गाँधी के लिए भी व्यक्तिगत रूप से बहुत अहम है। उनकी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ काफ़ी दिन तक कर्नाटक में रही थी और उसे जनता का ख़ासा समर्थन भी मिला था। यह पहला ऐसा चुनावी राज्य होगा, जहाँ से राहुल गाँधी की यात्रा गुज़री है। ज़ाहिर है जीत की स्थिति में कांग्रेस इसका श्रेय राहुल गाँधी को देगी। कांग्रेस ने दिसंबर में हिमाचल विधानसभा चुनाव भी जीता था; लेकिन राहुल तब तक यात्रा के लिए वहाँ नहीं गये थे।
राहुल गाँधी अब कर्नाटक में प्रचार कर रहे हैं। प्रियंका गाँधी की जनसभाएँ भी कांग्रेस ने वहाँ रखी हैं। प्रियंका गाँधी का कांग्रेस में रोल धीरे-धीरे विस्तार ले रहा है, इसमें कोई दो-राय नहीं है। हो सकता है 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रियंका गाँधी को बड़े रोल के रूप में जनता के सामने करे। फ़िलहाल तो राहुल गाँधी ही पार्टी के प्रधानमंत्री का चेहरा हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ गृह मंत्री अमित शाह भी कर्नाटक में भाजपा की चुनावी कमान संभाले हुए हैं। पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा रणनीति के अलावा संगठन की ज़िम्मेदारियाँ तय कर रहे हैं।
भाजपा का उभार
इस साल अब तक उत्तर पूर्व के तीन राज्यों में चुनाव हुए हैं। इनमें त्रिपुरा में भाजपा ने बहुमत हासिल किया था और अन्य दो मेघालय और नागालैंड में उसे क्रमश: तीन और 12 सीटें ही मिलीं थीं। अब कर्नाटक की चुनौती उसके सामने है। जानकारों का मानना है कि कांग्रेस उसे वहाँ कड़ी टक्कर देने की स्थिति में है। भाजपा कर्नाटक में अपनी पूरी ताक़त दक्षिण भारत के इस राज्य में झोंक रही है। कर्नाटक उन छ: बड़े राज्यों में शामिल है, जहाँ 2024 लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं।
कर्नाटक में लोकसभा के 543 सदस्यों में से 28 (कुल सदस्यों का 5.35 फ़ीसदी) चुने जाते हैं। देखा जाए, तो कर्नाटक देश के सबसे सांसदों वाले राज्यों की सूची में सातवें नंबर पर है। इतिहास पर नज़र दौड़ाएँ, तो ज़ाहिर होता है कि राज्य में कांग्रेस को दबदबे को भाजपा ने अपने गठन के ही सन् 1980 में चुनौती दी और 110 सीटों पर चुनाव लडक़र 18 पर जीत हासिल की। पाँच साल बाद सन् 1985 में भाजपा लड़ी, तो 116 सीटों पर; लेकिन उसे दो ही सीटें नसीब हुईं। इसका कारण था रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में जनता पार्टी का 139 सीटें जीतना, जिसने कांग्रेस भी ठिकाने लगा दिया।
सन् 1989 में भी भाजपा को चार ही सीटें मिलीं। हालाँकि राममंदिर आन्दोलन के बाद नब्बे के दशक में भाजपा का प्रभाव बढ़ा। सन् 1994 के चुनाव में उसे 40 और सन् 1999 में 44 सीटें मिलीं। सन् 2004 में वह 79 सीटों पर पहुँच गयी और आख़िर सन् 2007 में पार्टी को बी.एस. येदियुरप्पा के रूप में अपना पहला मुख्यमंत्री भी मिल गया। लेकिन एक हफ़्ते में ही सहयोगी जेडीएस ने हाथ खींच लिये और येदियुरप्पा को इस्तीफ़ा देना पड़ा।
सन् 2008 में विधानसभा के चुनाव हुए और भाजपा को इस बार 110 सीटें हासिल हुईं। पार्टी ने दोबारा येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी सौंपी। वह अगस्त, 2011 तक मुख्यमंत्री रहे, क्योंकि उनकी जगह पार्टी ने सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनाया, जो एक साल से पहले ही चलते बने और भाजपा ने इस बार जगदीश शेट्टार सौंपा। लेकिन सन् 2013 के चुनाव में भाजपा की सीटें घटकर 40 पर आ गयीं और कांग्रेस ने सरकार बनायी। येदियुरप्पा भ्रष्टाचार के मामलों में उलझे, जिससे उन्हें और पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ा है।
सन् 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और इसके बाद सन् 2018 में हुए चुनाव में भाजपा को 104 सीटें मिलीं; लेकिन उसका बहुमत नहीं हुआ। लिहाज़ा कांग्रेस और जेडीएस ने गुपचुप समझौता करके सरकार बना ली। हालाँकि भाजपा ने कांग्रेस के लोगों को फोडक़र सरकार गिरा दी और येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने; लेकिन एक साल पहले पार्टी ने उनकी जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया।
मज़बूत रही है कांग्रेस
हार हो या जीत, कर्नाटक में कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है, जिसने कभी भी 26 फ़ीसदी से कम मत हासिल नहीं किये। अब तक के आख़िरी चुनाव में उसे सन् 2018 में 38.09 फ़ीसदी वोट हासिल हुए थे, जो भाजपा के मुक़ाबले दो फ़ीसदी ज़्यादा थे। भले कांग्रेस को भाजपा को सीटें कम मिली थीं। सन् 1983 में पहली बार कर्नाटक में गैर कांग्रेस मुख्यमंत्री बना था। एक ज़माना वह भी था जब कई सीटों पर कांग्रेस के विधायक निर्विरोध ही चुन लिये जाते थे।
जेडीएस के उभार से भी कांग्रेस को नुक़सान पहुँचा है, क्योंकि उनका वोट बैंक कई जगह एक-सा है। पिछले लोकसभा चुनाव में भले भाजपा ने राज्य में 25 सीटें जीत ली थीं; लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मज़बूत दिख रही है। कर्नाटक की राजनीति को गहराई से देखने पर ज़ाहिर होता है कि भाजपा कभी भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट शेयर को पार नहीं कर पायी।
कांग्रेस इस बार कर्नाटक में ख़ास ज़ोर लगा रही है। उसे उम्मीद है कि भाजपा सरकार के प्रति जनता में ग़ुस्सा है और इसका कारण भ्रष्टाचार है। कांग्रेस के कर्नाटक के कार्यकारी अध्यक्ष बी.एन. चंद्रप्पा ने फोन पर ‘तहलका’ से बात करते हुए कहा- ‘जनता कांग्रेस को सत्ता में ला रही है। कमीशन वाली सरकार जा रही है। हमारे मुद्दे साफ़ हैं और कांग्रेस जनता का लड़ाई लड़ रहा है।’ कांग्रेस इस बार पूरी तरह अपने दम पर चुनाव मैदान में डटी है। कांग्रेस के लिए कर्नाटक एक मज़बूत गढ़ रहा है। हालाँकि हाल के दशकों में कांग्रेस का राज्य में आधार खिसका है। सन् 1952 से सन् 1983 तक राज्य, जिसे पहले मैसूर कहा जाता है, में कांग्रेस लगातार सत्ता में रही। हालाँकि सन् 1983 के चुनाव में कांग्रेस को झटका लगा जब जनता दल ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया। लेकिन सन् 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की। वह भी रिकॉर्ड सीटों के साथ।
सन् 1989 में कांग्रेस की जीती 178 सीटों का रिकॉर्ड आज तक नहीं टूट पाया है। कांग्रेस ने न सिर्फ़ यह चुनाव जीता, बल्कि पाँच साल बाद सन् 1999 में 132 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनायी। लेकिन उसका जादू सन् 2004 में टूट गया और उठापटक के दौर के बाद सन् 2006 में हुए चुनाव में उसने जेडीएस के साथ सरकार में हिस्सेदारी की, जिसका नेतृत्व उसके हाथ में नहीं था।
कांग्रेस ने सत्ता का सूखा ज़्यादा साल नहीं चलने दिया और सन् 2013 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर सत्ता में वापसी की। पिछले चुनाव सन् 2018 में हुआ, जिसमें भाजपा; लेकिन कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनायी, जो कुछ ही समय में टूट गयी और भाजपा ने सत्ता हासिल की। इसमें कोई दो-राय नहीं कि कांग्रेस इस बार चुनाव में काफ़ी मज़बूत दिख रही है। काफ़ी कुछ अगले 23 दिन में होने वाले चुनाव प्रचार पर निर्भर करेगा। इस दौरान पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से लेकर राहुल गाँधी तक कर्नाटक में डेरा जमाएँगे। कांग्रेस की योजना तेज़ तरार अभियान जारी रखने की है, जिसमें उसका सबसे बड़ा मुद्दा राज्य सरकार का भ्रष्टाचार है।
जेडीएस की स्थिति
जेडीएस दो राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के वोटों का हमेशा बँटवारा करती रही है। इस बार उसकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं दिख रही। पार्टी के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इस संवाददाता से बातचीत में स्वीकार किया कि भाजपा सरकार की नाकामी को भुनाने में कांग्रेस जेसीएड से आगे रही है। उन्होंने कहा- ‘हमारा अपना जनाधार है। लेकिन यदि कांग्रेस 100 से आगे निकल जाती है, तो उसका काफ़ी नुक़सान जेडीएस को होगा। ऐसा नहीं कि हम जीरो हो जाएगा; लेकिन हमारा सीट काफ़ी घट जाएगा।’
जेडीएस की एक क्षेत्रीय दल के नाते कर्नाटक में अच्छी पकड़ रही है। देश के प्रधानमंत्री रहे एचडी देवेगौड़ा ने सन् 1999 में जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) का गठन किया और सन् 2006 में पहली बार उसने अपनी सरकार बनायी। देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस के साथ मिलकर बनायी इस सरकार के मुख्यमंत्री बने। देखा जाए, तो प्रदेश में यह पहली मिली-जुली सरकार थी।
इसके बाद जेडीएस को सन् 2018 में सत्ता में आने का अवसर मिला और इस बार फिर कांग्रेस के साथ। लेकिन कुछ ही महीनों में कुमारस्वामी ने कांग्रेस के रवैये की निंदा की और बाद में यह सरकार टूट गयी और भाजपा की सरकार बनी। आज की तारीख़ में देखें, तो मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस और भाजपा में है; लेकिन चर्चा है कि जेडीएस असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से गठबंधन कर सकता है। ओवैसी 25 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर मुस्लिम वोट साधना चाहते हैं। इन दलों के अलावा कर्नाटक में महेश गौड़ा की कर्नाटक प्रगन्या पन्था जनता पार्टी (केपीजेपी) और कन्नड़ अभिनेता उपेंद्र राव की उत्तम प्रजाकीया पार्टी (यूपीपी) भी हैं। महेश गौड़ा ने अभिनेता उपेंद्र राव के साथ अक्टूबर, 2017 में केपीजेपी गठित की थी; लेकिन सन् 2018 में राव ने अलग होकर यूपीपी बना ली।
पिछला चुनाव
सन् 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 82 दल मैदान में उतरे थे। इस चुनाव में कुल 224 सीटों में से भाजपा 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि कांग्रेस ने भाजपा से ज़्यादा 39 वोट फ़ीसदी वोट शेयर के साथ 80 सीटें जीतीं, जो भाजपा से 24 कम थीं। जेडीएस के हाथ 37 सीटें आयीं, जबकि छ: सीटें अन्य ने जीती थीं। बाद में दलों में टूट फूट हुई, जिससे यह सारे आँकड़े बदल गये। इस बार 2.5 करोड़ महिलाओं के साथ 5.21 करोड़ मतदाता नयी सरकार का चयन करेंगे।
डी.के. बनाम सिद्धारमैया
कर्नाटक में कांग्रेस जहाँ सत्ता में आने की उम्मीद कर रही है, वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि उसके दो बड़े नेताओं प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया में से पार्टी की स्थिति में मुख्यमंत्री कौन बनेगा? कांग्रेस ने मार्च के आख़िर में ही क़िस्तों में उम्मीदवार घोषित करने शुरू कर दिये थे। कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद वोक्कालिंगा समुदाय के डी.के. शिवकुमार और कुरुवास (अनुसूचित जाति) समुदाय के सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। कर्नाटक में वोक्कालिंगा की तरह लिंगायत भी बड़ा समुदाय है, जो स्वर्ण और दलित में विभाजित है।
डी.के. शिवकुमार ने हाल में यह बयान देकर कि यदि पार्टी के सत्ता में आने के बाद पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं तो वह उनका समर्थन करेंगे। डी.के. के इस बयान को सिद्धारमैया की राह रोकने की कोशिश बताया जा रहा है क्योंकि ख़ुद डी.के. मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। वह कह चुके हैं कि उन्हें भरोसा है कि पार्टी उनकी मेहनत और वफ़ादारी को पुरस्कृत ज़रूर करेगी। उधर सिद्धारमैया के समर्थक भी अपने नेता को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।
यह कांग्रेस की रणनीति भी हो सकती है, क्योंकि वह बिना चेहरे के चुनाव में उतरेगी, यह तय है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री वोक्कालिगा या लिंगायत से बनता रहा है और सिद्धारमैया अनुसूचित जाति से बने हैं। डी.के. ने प्रदेश अध्यक्ष बनकर पार्टी को काफ़ी सक्रिय किया है, इसमें कोई दो-राय नहीं। इसके अलावा डी.के. पार्टी के सबसे बड़े फंड प्रबंधकों में माने जाते हैं। देखना दिलचस्प होगा कि ऊँट किस करवट बैठेगा।
भाजपा का चेहरा कौन?
भाजपा के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा उम्र की बात कहकर चुनाव नहीं लडऩे का ऐलान कर चुके हैं। हालाँकि सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने की उनकी चाहत कभी ख़त्म नहीं हुई। पार्टी के पास मुख्यमंत्री वासवराज बोम्मई का चेहरा है। हालाँकि कांग्रेस की तरह वह भी शायद बिना किसी घोषित चेहरे के चुनाव लड़ेगी। येदियुरप्पा को कर्नाटक में लिंगायत समुदाय का बड़ा नेता माना जाता है। कर्नाटक भाजपा में बगावत भी दिखी, जब पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता जगदीश शेट्टार ने कहा कि पार्टी आलाकमान ने उन्हें चुनाव नहीं लडऩे के लिए कहा है। पार्टी के फ़रमान के बावजूद हुबली के 67 साल के विधायक शेट्टार चुनाव में उतरने के लिए प्रतिबद्ध दिखे। उन्होंने बाक़ायदा शीर्ष नेताओं को अपने फ़ैसले से अवगत भी करवा दिया। शेट्टार के मुताबिक, सर्वे में उनकी पॉपुलैरिटी अच्छी है और वे कोई चुनाव भी नहीं हारे हैं।
भाजपा के उम्मीदवारों की घोषणा करने से पहले ही येदियुरप्पा ने बिना आलाकमान की परवाह किये अपनी सीट अपने बेटे के नाम करने का ऐलान कर दिया था। येदियुरप्पा को भाजपा ने कुछ महीने पहले केंद्रीय बोर्ड में शामिल किया था। हालाँकि कुछ लोग मानते हैं कि वे पार्टी से नाराज़ हैं। उनकी नाराज़गी का कारण उन्हें आनन-फ़ानन हटाकर बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाना रहा है। फ़िलहाल येदियुरप्पा ने बेटे विजयेंद्र को वारिस घोषित कर दिया है, जो उनकी सीट शिकारीपुरा से चुनाव लड़ सकते हैं।
क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे
कर्नाटक में क्षेत्रीय मुद्दे चलेगे या राष्ट्रीय? कांग्रेस स्थानीय मुद्दों पर अभियान चला रही है, जबकि भाजपा राष्ट्रीय मुद्दों पर उतर रही है। प्रधानमंत्री मोदी के हाल के कर्नाटक दौरों में उनके भाषण देखें, तो वह राष्ट्रीय मुद्दों की ही बात कर रहे हैं। इसका कारण भाजपा का यह डर भी है कि उसकी सरकार की कारगुज़ारी उतनी अच्छी नहीं रही है कि वह उसके सहारे वोट ले सके। इसके अलावा भाजपा हिन्दुत्व का एजेंडा छूने से भी नहीं हिचक रही। हाल के महीनों में कर्नाटक में हिजाब का मुद्दा चलाने की काफ़ी कोशिश की गयी है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। कर्नाटक की राजनीति में क्षेत्र बड़े कारक हैं। चिकमंगलूर में वोक्कालिगा और लिंगायत बहुलता है, जबकि उडुपी इला$के में हिन्दू क्षत्रिय प्रभावी भूमिका में हैं। मैसूर में जहाँ जेडीएस प्रमुख पार्टी रही है, वहीं चिकमंगलूर और उडुपी में भाजपा-कांग्रेस में टक्कर है। कर्नाटक में इस बार मुस्लिम वोटर भी एक बड़ा कारक होगा। भले ओवैसुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम मैदान में उतरेगी।
जानकारों का मानना है कि इस बार मुस्लिम वोट में बड़ा बँटवारा नहीं होगा और इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। कांग्रेस इस चुनाव में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया हुए है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। कांग्रेस भ्रष्टाचार और बोम्मई सरकार की विफलताओं को मुद्दा बना रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने 12 मार्च को राहुल गाँधी के लंदन के भाषण में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले और लोकतंत्र बचाने के लिए यूरोपीय देशों और अमेरिका से हस्तक्षेप की अपील का मुद्दा उठाकर साफ़ कर दिया कि भाजपा इस बार विधानसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय मुद्दों को ज़्यादा तरजीह देगी। देखा जाए, तो भाजपा का सारा प्रचार मोदी पर निर्भर है।
चालाक चीन को भारत ने इसी महीने संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग अर्थात् यूएन स्टैटिस्टिकल कमीशन के चुनाव जीतकर एक बड़ी मात दी है। परन्तु यह चीन जैसे धूर्त देश को सबक़ सिखाने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग के चुनाव जीतने में भारत की जीत इसलिए बड़ी है, क्योंकि यह चुनाव चीन और यूएई हार गये हैं।
विदित हो कि यूएन स्टैटिस्टिकल कमीशन अर्थात् संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग में कुल 53 मतदाता थे, जिसमें से भारत को 46 मत प्राप्त हुए। इस चुनाव में भारत, चीन, संयुक्त अरब अमीरात अर्थात् यूएई और साउथ कोरिया मैदान में थे। इस अंतरराष्ट्रीय जीत के बाद भारत सरकार में विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने देशवासियों को बधाई भी दी।
दूसरी ओर चीन ने अरुणाचल प्रदेश में 11 जगहों के नाम बदलकर उन पर अपना दावा जताया है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक़्ता माओ लिंग ने अरुणाचल प्रदेश का चीनी नाम भी रख दिया है। उसने अरुणाचल प्रदेश को ज़ेननेन कहा है। माओ लिंग ने दावा किया है कि राज्य परिषद् के भौगोलिक नामों के प्रशासन की प्रासंगिक शर्तों के अनुसार, चीन की सरकार के सक्षम अधिकारियों ने ज़ेननेन (अरुणाचल प्रदेश) के कुछ हिस्सों के नामों का मानकीकरण किया है। क्योंकि ज़ेननेन है और चीन का हिस्सा है। यह चीन का सम्प्रभु अधिकार है।
चीन के इस दावे और चालाकी के बीच भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक़्ता अरिंदम बागची ने जवाब में कहा है कि हमने ऐसी ख़बरें देखी हैं। यह पहली बार नहीं है, जब चीन ने ऐसी कोशिश की है। हाल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के लिए चीनी, तिब्बती और पिनयिन अक्षरों में नामों की तीसरी सूची जारी की है। हम इसे सिरे से ख़ारिज करते हैं। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। मनगढ़ंत नाम रखने से यह हक़ीक़त बदल नहीं जाएगी। इस मामले में अमेरिका भारत के साथ खड़ा है। अमेरिका ने भी कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। अमेरिका अरुणाचल प्रदेश को लम्बे समय से भारत के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता देता रहा है। अमेरिका जगहों का नाम बदलकर क्षेत्रीय दावों को आगे बढ़ाने के किसी भी एकतरफ़ा प्रयास का कड़ा विरोध करता है।
वास्तव में चीन ने अरुणाचल प्रदेश में नाम बदलने की यह तीसरी मानकीकृत भौगोलिक नामों की सूची जारी की है। वह हर हाल में दबाव बनाकर भारत को कमज़ोर करना चाहता है। परन्तु इससे चीन को ही नुक़सान होगा। क्योंकि उसकी अतिक्रमणवादी नीति से कई और देश भी परेशान हैं और अगर सभी देश भारत के नेतृत्व में चीन पर हमला करें, तो उसे इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। अगर भारत सुनियोजित तरीक़े से चीन पर चीन विरोधी देशों के साथ मिलकर हमला करता है, तो ताइवान और तिब्बत भी इस युद्ध में भारत का साथ देंगे। ऐसे में इन दो देशों से चीन को तबाह करने में आसानी होगी। इधर भारत नेपाल का भी साथ ले सकता है। बाकी सिक्किम, अरुणाचल, लद्दाख़, उत्तराखण्ड तो भारत के मोर्चे वाले क्षेत्र हैं ही।
चीन की ग़ुस्ताख़ी यह है कि उसने अभी तक अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने की सूची पहली बार 14 अप्रैल, 2017 में जारी की थी। उसने रोमन लिपि में इन छ: जगहों के नाम वोग्यानलिंग, मिला री, क्वाइडेंगार्बो री, मेनकुका, बुमो ला और नामकापुब री रखे थे। इस दौरान जब तिब्बती धार्मिक गुरु दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश गये थे, तो चीन ने उनके दौरे का भी विरोध किया था। इसके बाद 2021 में चीन ने अरुणाचल के 15 स्थानों का नाम बदला था। इन नामों की सूची चीनी, तिब्बती और रोमन लिपि में जारी की, जिसमें उसने आठ आबादी वाले क्षेत्रों के नाम सेंगकेंगजोंग, मिगपेन, गोलिंग, डांबा, मेजाग, डागलुंग जोंग, मनी गैंगे और डूडिंग रखे। चार पर्वतों के नाम वामो री, देउ री, कुनमिंगजिंगजे फेंग और ल्हुनजुब री रखे। दो नदियों के नाम जेनयोंगमो हे, दुलेन हे रखे। जबकि एक पहाड़ों से निकलने वाले रास्ते का नाम से ला-दर्रा रखा। वहीं अब 2023 में उसने 11 जगहों के नाम और बदल दिये हैं। चीन ने अरुणाचल प्रदेश में ही जगहों के नाम नहीं बदले हैं, बल्कि वह पूर्वी लद्दाख़ को भी क़ब्ज़ाने की लगातार कोशिशें कर रहा है। इनमें दो रिहायशी क्षेत्र हैं, पाँच पर्वतों की चोटियाँ हैं, दो नदियाँ हैं और दो अन्य क्षेत्र हैं।
विदित हो कि चीन अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को अपनी ज़मीन बताता है। वह अरुणाचल प्रदेश को साउथ तिब्बत बताता है। प्रश्न यह है कि उसने सन् 2014 के बाद जिस प्रकार से चीन के सीमावर्ती भारतीय क्षेत्रों को अपना बताना और उन पर क़ब्ज़ा जमाना शुरू किया है, उस पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कुछ बोलते क्यों नहीं? चीन के इस दुस्साहस के पीछे आख़िर किसका समर्थन है? चीन का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि अक्टूबर, 2021 में तत्कालीन उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर आपत्ति तक जतायी थी। चीन की इस आपत्ति पर केंद्र सरकार ने इतना ही कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में भारतीय नेताओं के दौरे पर आपत्ति का कोई तर्क नहीं है। प्रश्न यह है कि भारत का चीन के प्रति इतना नर्म रुख़ क्यों रहता है? कड़ा जवाब देने का साहस पूर्व सेना अध्यक्ष (तत्कालीन) जनरल बिपिन रावत ने दिया था। लेकिन कुछ ही महीनों में उनकी एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। जनरल विपिन रावत की इस दुर्घटना को लेकर भी कई प्रश्न उठे, जिनके उत्तर अभी तक नहीं मिल सके हैं।
भारत के पूर्वी क्षेत्र को तिब्बत की सीमा को मैकमोहन लाइन कहते हैं। भारत और चीन के बीच विवाद भी इसी मैकमोहन लाइन को लेकर है। सन् 1914 से पहले तक ब्रिटिश शासन में तिब्बत और भारत के बीच कोई तय सीमा रेखा नहीं थी। उस व$क्त की भारत सरकार, चीन और तिब्बत की सरकारों के बीच शिमला में समझौता हुआ। भारत में मैकमोहन लाइन दर्शाता हुआ मैप पहली बार सन् 1938 में ही आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया गया। शिमला समझौते में चीन का प्रतिनिधित्व रिपब्लिक ऑफ चीन के अधिकारी ने किया था। सन् 1912 में किंग राजवंश को उखाड़ फेंकने के बाद रिपब्लिक ऑफ चीन बना था। यह कम्युनिस्ट सरकार सन् 1949 तक ही सत्ता में रह पायी।
इसके बाद चीन में नयी सरकार आती है और देश का नाम पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन हो जाता है। सन् 1951 में चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया और पहली बार भारत और चीन के बीच रिश्ते तब ख़राब हुए जब कर लिया। चीन का कहना था कि वो तिब्बत को आज़ादी दिला रहा है। इसी दौरान भारत ने तिब्बत को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दी।
तिब्बत आज भी भारत के साथ रहना चाहता है और चीन से मुक्ति चाहता है। लेकिन चीन तिब्बत के अलावा अरुणाचल प्रदेश को भी अपना हिस्सा बताने का दुस्साहस कर रहा है और इसे साउथ तिब्बत कहता है। चीन अरुणाचल पर अपने दावे के समर्थन में तवांग मठ और तिब्बत में ल्हासा मठ के बीच ऐतिहासिक सम्बन्धों का हवाला देता है। चीन 400 साल पुराने तवांग के मठ पर क़ब्ज़ा कर बौद्ध धर्म को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। पाँचवें दलाई लामा के सम्मान में सन् 1680-81 में मेराग लोद्रो ग्यामत्सो ने इस मठ की स्थापना की थी। तिब्बत के छठे दलाई लामा का जन्म भी तवांग के पास सन् 1683 में हुआ था।
भारत की पूर्वोत्तर का सुरक्षा कवच कहा जाने वाला अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य है। अरुणाचल प्रदेश नॉर्थ और नॉर्थ वेस्ट में तिब्बत, वेस्ट में भूटान और ईस्ट में म्यांमार के साथ यह अपनी सीमा साझा करता है। तवांग में चीन की दिलचस्पी सामरिक वजहों से है, क्योंकि यह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्ट्रैटेजिक एंट्री दिलाता है। तवांग तिब्बत और ब्रह्मपुत्र वैली के बीच कॉरिडोर का एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। सन् 1962 में चीनी सैनिकों ने भारत पर हमला करने के लिए इसी दर्रे का इस्तेमाल किया था। यह दुनिया में तिब्बती बौद्ध धर्म का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। चीन का दावा है कि मठ इस बात का सुबूत है कि यह ज़िला कभी तिब्बत का था। सन् 1959 में चीन से भागने के बाद वर्तमान दलाई लामा हफ़्तों तक तवांग मठ में रुके थे।
चीन का दावा तो पूरे अरुणाचल पर है, लेकिन उसकी जान तवांग ज़िले पर अटकी है। तवांग अरुणाचल के नॉर्थ-वेस्ट में हैं, जहाँ पर भूटान और तिब्बत की सीमाएँ हैं। चीन जानता है कि तिब्बत में यदि कभी चीन सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह होगा तो तवांग इसका प्रमुख केंद्र होगा। विदेश मामलों के जानकार मानते हैं कि चीन बार-बार ऐसी हरकतें करके भारत और अपने लोगों को बताना चाहता है कि अरुणाचल उसका हिस्सा है। लेकिन फिर भी चीन 20 से 25 बार ऐसी हरकतें कर चुका है। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह बात ख्यात है कि अरुणाचल प्रदेश क़ानूनी रूप से भारत का हिस्सा है और भारत के साथ ही रहेगा। चीन जी-20 में हिस्सा नहीं लेगा।
यानी अरुणाचल में अगर कोई बड़ी मीटिंग या समिट होगी या दोनों देशों के बीच कोई वार्तालाप होगा, तो वह इस तरह का इरिटेटिंग इश्यू लाएगा। अगर आप इतिहास देखेंगे तो चीन काफ़ी कोशिशों के बावजूद अभी तक ताइवान को अपने अधिकार में नहीं ले पाया है, तो भारत के राज्यों पर क़ब्ज़ा करना तो उसके लिए और मुश्किल है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि केंद्र सरकार ख़ामोश बैठा रहे, उसे चीन को मुँहतोड़ जवाब तो देना ही पड़ेगा, भले आज नहीं तो कल, राज़ी से नहीं तो जबरन, क्योंकि चीन ऐसे मानने वाला नहीं है। भारत सरकार को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत कई सीमावर्ती देशों की ज़मीन अपने क़ब्ज़े में ले रखी है।
चीन का 14 देशों के साथ 22,240 किलोमीटर लम्बी सीमा है। चीन का इन सभी देशों के साथ विवाद है। चीन जिस ज़मीन पर ग़ैर-क़ानूनी रूप से अपना हक़ जताता है, उसकी जगहों के अपनी ओर से नाम बदल देता है और 15 से 20 साल बाद जारी अपने नक्शों में इन जगहों को दिखाता है। रूस और कनाडा के बाद चीन सबसे बड़ा देश है। इसका कुल एरिया 97,6,961 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 43 प्रतिशत ज़मीन दूसरों से हड़पी हुई है। इसी नीति के तहत चीन भारत पर ही नहीं, ताइवान पर भी अपना आधिपत्य चाहता है। अपनी इस चाल के समर्थन के लिए अब चीन रूस को अपने साथ लेने की कोशिश में लगा है। विपक्ष चीन की अतिक्रमणवादी नीति और भारत सरकार की ख़ामोशी पर लगातार मोदी सरकार को घेरता रहा है, लेकिन भारत सरकार इसे ख़ुद के ख़िलाफ़ विपक्ष की साज़िश मानती है, जो कि ग़लत और व्यर्थ की बात है।
हिन्दू पौराणिक कथाओं में जब भी कोई असुर अमरता का वरदान माँगते हैं, तो ब्रह्मा उन्हें कहते हैं कि वे जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं, सिवाय अमर होने के। चतुर असुर तब एक ऐसा वरदान माँगते हैं, जो उन्हें सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए अमर कर देगा। लेकिन वरदान में एक बचाव का रास्ता फिर भी रहता है, जिसका लाभ उठाकर देवता उसका संहार कर सकते हैं। इस प्रकार हमें याद दिलाया जाता है कि दुनिया में कोई भी अमर नहीं है।
हालाँकि गूगल के एक पूर्व इंजीनियर रे कुर्जवील, जिनकी 147 भविष्यवाणियों में 86 फ़ीसदी की सफलता दर है; ने अपने दावे से एक सनसनी पैदा कर दी है। कुर्जवील ने कहा है कि प्रौद्योगिकी में प्रगति जल्दी से उम्र-उलटने वाले ‘नैनोबॉट्स’ की ओर ले जाएगी और मनुष्य अगले आठ साल या 2030 तक अमरत्व प्राप्त कर लेंगे। भविष्यवाणी की ही बात करें, तो एक प्रमुख भविष्यवादी डॉ. इयान पियर्सन ने भविष्यवाणी की है कि मानव बुद्धि, स्मृति या इंद्रियों को बाहरी तकनीक से जोड़ा जा सकता है।
दोनों की साख इतनी विश्वसनीय है कि संदेह की सुई उठाना मुश्किल है, जबकि रे कुर्जवील वही कम्प्यूटर वैज्ञानिक और पूर्व गूगल इंजीनियर हैं, जिन्होंने सन् 1999 में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पदक हासिल किया था। उधर डॉ. इयान पियर्सन के आविष्कारों में टेक्स्ट मैसेजिंग और सक्रिय सम्पर्क लेंस शामिल हैं।
अपने दिमाग़ को कम्प्यूटर पर अपलोड करने के विचार को कई वर्षों से सिद्धांत बद्ध किया गया है; लेकिन यह ज़्यादातर विज्ञान कथाओं तक सीमित है। यूएस-आधारित स्टार्ट-अप, नेक्टोम, मानव मस्तिष्क को संरक्षित करने का एक तरीक़ा ईजाद करके इसे बदलने की कोशिश कर रहा है, ताकि इसकी यादों को क्लाउड पर अपलोड किया जा सके। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) टेक्नोलॉजी रिव्यू के मुताबिक फर्म ने ‘हाई-टेक इम्बलिंग प्रोसेस’ का उपयोग करके सूक्ष्म विस्तार में मानव मस्तिष्क को संरक्षित करने का एक तरीक़ा निकाला है।
यूके के मेल ऑनलाइन में 8 अप्रैल, 2023 को टिप्पणियों को संकलित करते हुए, फियोना जैक्सन ने लिखा- ‘क्या आप हमेशा के लिए जीवित रह सकते हैं? विशेषज्ञों का दावा है कि मनुष्य 2030 तक अमरत्व प्राप्त कर सकता है और एक भविष्यवादी तो यह भी कहता है कि हम मस्तिष्क को फिर से जीवंत करके और अपने दिमाग़ को क्लाउड पर अपलोड करके एक नये शरीर में अपने स्वयं के अंतिम संस्कार में शामिल होने में सक्षम होंगे। हालाँकि तकनीक के काम करने के लिए प्रतिभागियों को इच्छामृत्यु के लिए तैयार रहना होगा।’ प्रतिष्ठित संस्थान ने दावा किया कि तकनीक अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे चेतना को फिर से बना सकते हैं।
प्रमुख भविष्यवादी डॉ. इयान पियर्सन ने भविष्यवाणी की थी कि मानव बुद्धि, स्मृति या इंद्रियों को बाहरी तकनीक से जोड़ा जा सकता है। पियर्सन एक फ्यूचर इंस्टीट्यूट फ्यूचरिजन चलाते हैं। वह दावा करता है कि 10-15 साल आगे देखने पर 85 फ़ीसदी सटीकता सिद्ध होती है। उनके आविष्कारों में टेक्स्ट मैसेजिंग और एक्टिव कॉन्टैक्ट लेंस शामिल हैं। वह गणित और भौतिकी स्नातक हैं, डॉक्टर ऑफ साइंस हैं, और उन्होंने इंजीनियरिंग की कई शाखाओं में काम किया है, जिसमें वैमानिकी और हथियार डिजाइन से लेकर साइबरनेटिक्स, टिकाऊ परिवहन से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सौंदर्य प्रसाधन शामिल हैं।
अपने दिमाग़ की एक बैकअप प्रतिलिपि बनाने के बजाय आपकी अधिकांश बुद्धि आपके भौतिक मस्तिष्क के बाहर एक जगह से चल रही होगी। एक ब्लॉग पोस्ट में उन्होंने लिखा- ‘एक दिन, आपका शरीर मर जाता है और इसके साथ आपका दिमाग़ रुक जाता है। लेकिन कोई बड़ी समस्या नहीं है, क्योंकि आपका 99 प्रतिशत दिमाग़ अभी भी ठीक है, आईटी और क्लाउड पर पर ख़ुशी से चल रहा है।’
यह मानते हुए कि आपने पर्याप्त चीज़ें सेव की हैं और ख़ुद को अच्छी तरह से तैयार किया है, आप अब से अपने शरीर के रूप में उपयोग करने के लिए एक एंड्रॉयड से जुड़ते हैं, अपने अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं, और फिर आप एक युवा, अत्यधिक उन्नत शरीर के साथ पहले की तरह आगे बढ़ते हैं।
अतीत में रे कुर्जवील की भविष्यवाणी सटीक साबित हुई हैं, जो भविष्य के अन्य विचारकों के बीच एक सोच को प्रेरित करती हैं, जबकि उनकी कई भविष्यवाणियाँ सच हो गयी हैं। कुर्जवील की 2005 की पुस्तक ‘द सिंगुलरिटी इज नियर’ में किया गया दावा फिर से ऑनलाइन रूप में सामने आया है, जब यूट्यूब चैनल एडैगियो ने पुस्तक से अंतर्दृष्टि साझा करते हुए दो-भाग की क्लिप साझा की। इसने सोशल मीडिया पर अमरता पर एक बहस शुरू कर दी है और अगर ऐसा हुआ भी तो इंसान इसे हासिल कर ही लेंगे।
अपनी पुस्तक में वैज्ञानिक ने भविष्यवाणी की कि प्रौद्योगिकी 2030 तक मनुष्यों को हमेशा के लिए जीवन का आनंद लेने का रास्ता खोलेगी। उन्होंने आनुवंशिकी, नैनो प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और अन्य के बारे में भी बात की। कुर्जवील ने 2017 में फ्यूचरिस्म को बताया था- ‘सन् 2029 वह तारीख़ है, जिसके लिए मैंने भविष्यवाणी की है कि कब कोई एआई एक वैध ट्यूरिंग टेस्ट पास करेगा और इसलिए मानव स्तर की बुद्धिमत्ता हासिल करेगा। मैंने सिंगुलैरिटी के लिए 2045 की तारीख़ निर्धारित की है, जब हम हमारे द्वारा बनायी गयी बुद्धिमत्ता के साथ विलय करके अपनी प्रभावी बुद्धिमत्ता को एक अरब गुना बढ़ा देंगे।’ -उनकी इस बात को न्यूयॉर्क पोस्ट ने उद्धृत किया था।
कुर्जवील ने नैनो टेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स के बारे में बात की, जिसके बारे में उनका मानना है कि यह उम्र को उलटने वाले ‘नैनोबोट्स’ को जन्म देगा। पूर्व गूगल इंजीनियर के अनुसार, ये छोटे रोबोट लगातार क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और ऊतकों को ठीक करते रहेंगे, जो उम्र बढऩे के साथ ख़राब होने लगते हैं, जिससे हम घातक बीमारियों से प्रतिरक्षित हो जाते हैं।
एआई इंसानों से ज़्यादा स्मार्ट?
आम आदमी की नज़र में सिंग्युलॅरिटी उस समय का एक काल्पनिक भविष्य बिंदु है, जब प्रौद्योगिकी में सभी प्रगति- विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) में उन मशीनों के उदय की ओर ले जाती है, जो मनुष्यों की तुलना में अधिक स्मार्ट हैं। कुर्जवील अकेले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने विलक्षणता के बारे में बात की है। सॉफ्टबैंक के सीईओ मसायोशी सोन ने भी अतीत में 2047 तक सुपर-इंटेलिजेंट मशीनों की शुरुआत की भविष्यवाणी की थी। टेक मुगल मसायोशी सोन ने 2017 में सऊदी अरब के रियाद में फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव में कहा था- ‘अब से 30 साल बाद वे (साइबरबर्ग) ख़ुद से सीखने जा रहे हैं, वे शायद आप और हम पर हँसने वाले हैं।’
बता दें सॉफ्टबैंक रोबोटिक्स पहले से ही पेप्पर है, जो एक अर्ध-ह्यूमनॉइड रोबोट है जिसे भावनाओं को पढऩे की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है। इसे जून, 2014 में एक सम्मेलन में पेश किया गया था और बाद में जापान में सॉफ्टबैंक मोबाइल फोन स्टोर में प्रदर्शित किया गया था।
साल 2023 में अभी कुछ ही महीने हुए हैं और हमने पहले ही गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी तकनीकों को अपने सम्बन्धित एआई-संचालित चैटबॉट्स को पेश करते हुए देखा है। इसके परिणामस्वरूप भविष्य के लिए एक और ख़तरनाक सवाल भी पैदा हो गया है कि क्या मानव जाति वास्तव में एआई के लिए तैयार है?
जो भविष्यवाणियाँ हुईं सच
यह पहली बार नहीं है, जब इस वैज्ञानिक ने भविष्यवाणी की है। सन् 1990 में कुर्जवील ने भविष्यवाणी की थी कि दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ी सन् 2000 तक एक कम्प्यूटर से हार जाएगा। भविष्यवाणी सन् 1997 में सच हुई जब डीप ब्लू ने गैरी कास्परोव को हरा दिया। सन् 1999 में उन्होंने एक और भविष्यवाणी करते हुए कहा कि सन् 2023 तक 1,000 डॉलर के लैपटॉप में भंडारण क्षमता और मानव मस्तिष्क की क्षमता के समान होगी। ख़ुद को भविष्यवादी कहने वाले लेखक कुर्जवील ने भी भविष्यवाणी की थी कि सन् 2010 तक दुनिया के अधिकांश हिस्सों में हाई-बैंडविड्थ वायरलेस इंटरनेट की पहुँच होगी।
एसएक्सएसडब्ल्यू के साथ एक साक्षात्कार में कुर्जवील ने कहा था- ‘सन् 2029 तक कम्प्यूटरों में मानव-स्तर की बुद्धि होगी।’ फिर सन् 2023 की बात करें, तो सिलिकॉन वैली शीर्ष तकनीकी दिग्गजों के बीच एक कठिन जंग देख रही है, क्योंकि वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर दौड़ रहे हैं कि कैसे इसे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल किया जा सकता है।
इंसानों का अस्तित्व कई चीज़ों के होने पर निर्भर करता है, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है पृथ्वी। अगर पृथ्वी रहने लायक नहीं बचेगी, तो जीवन भी नहीं बचेगा। पृथ्वी पर लगातार घट रही आपदाएँ साफ़ संकेत दे रही हैं कि प्रकृति इंसानों के विनाशकारी अभियानों से पीडि़त है, जिसका नतीजा भूकंप, भूस्खलन, भयंकर तूफ़ानों और अन्य कई आपदाओं के रूप में हमारे सामने बार-बार आ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि पृथ्वी पर लगातार हो रहे विनाशकारी उजाड़ को रोका कैसे जाए? 22 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस है। सन् 1970 से पृथ्वी और पर्यावरण की चिंता करने वाले हर साल लगातार दुनिया 22 अप्रैल को पृथ्वी को बचाने के लिए जगह-जगह मंचों पर इकट्ठे होते आ रहे हैं।
सन् 2009 में एक प्रस्ताव के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस के रूप में प्रस्तावित किया। यानी पिछले पाँच दशक से ज़्यादा समय से मनाये जा रहे अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस में हर साल करोड़ों रुपये की बर्बादी करके पृथ्वी को बचाने पर चिन्ता ज़ाहिर की जाती है, संकल्प लिया जाता है; लेकिन पृथ्वी का बचाव तो दूर साल दर साल विनाश के बीज इंसानों द्वारा बोये जाते रहते हैं। वैसे तो 21 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस को संयुक्त राष्ट्र का समर्थन हासिल है; लेकिन इसका वैज्ञानिक और पर्यावरण महत्त्व ही है। सही मायने में उद्घाटन पृथ्वी दिवस की शुरुआत विस्कॉन्सिन के सेन गेलॉर्ड नेल्सन ने सन् 1970 में की थी। नेल्सन ने पर्यावरण मुद्दों को लेकर जो चिन्ता ज़ाहिर की थी, उसके मायने लोग आज बार-बार की प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद नहीं समझ रहे हैं। उन्होंने एक ऐसी टीम बनाने में मदद की, जिसने प्राकृतिक संरक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया।
एक अनुमान के मुताबिक, पिछले 80 वर्षों में इंनानों ने क़रीब 27 प्रतिशत जंगल ख़त्म कर दिये हैं। क़रीब 40 प्रतिशत शहरीकरण बढ़ाया है। क़रीब 12 से 13 प्रतिशत पेयजल नष्ट किया है। क़रीब 17 प्रतिशत पेयजल दूषित कर दिया है। क़रीब 30 प्रतिशत नदियों के पानी को दूषित किया है। क़रीब 20 प्रतिशत समुद्रों के पानी को दूषित किया है। क़रीब 40 प्रतिशत कृषि भूमि को दूषित कर दिया है। $खाली पड़े मैदानों का क़रीब 60 से 62 प्रतिशत हिस्सा अपने क़ब्ज़े में ले लिया है। एक इंसान ही है, जो प्रकृति को अपने फ़ायदे के लिए लगातार उजाड़ रहा है। इंसान ही इसे रोक सकता है। बाकी जीव तो प्रकृति के अनुरूप ही हैं, क्योंकि वो सिर्फ़ भोजन और रहने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। प्रकृति में ख़ुद हरी-भरी होने की सामथ्र्य है। वह हवा, पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को संजोने और सँवारने में ख़ुद समर्थ है; लेकिन तभी, जब उसे उजाड़ा न जाए और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हद से ज़्यादा न हो।
महासागर प्लास्टिक, कूड़े और ज़हरीले केमिकलों से भरते जा रहे हैं और उनमें लगातार अम्ल बढ़ रहा है। जंगल घटते जा रहे हैं। कृषि क्षेत्र भी कम हो रहा है। कई दूसरे जीवन समाप्त हो चुके हैं और लगातार इंसानों की आबादी बढ़ रही है, जिसका नतीजा गर्मी, बाढ़, मौसम परिवर्तन. ग्लेशियर पिघलने, पहाड़ खिसकने और रिकॉर्ड तोडऩे वाले अटलांटिक तूफ़ानों का आना है। आजकल हर तरह का प्रदूषण बढऩा, तेल रिसाव बढऩा, नुक़सानदायक गैसों में बढ़ोतरी, नुक़सानदायक केमिकल का लगातार उत्पादन, जीव हत्या में बढ़ोतरी, इंसानों की आबादी में लगातार बढ़ोतरी और कंकरीट में बढ़ोतरी से पृथ्वी का ही नहीं, इंसानों के साथ-साथ दूसरे प्राणियों के लिए भी घातक है। जलवायु परिवर्तन, प्रकृति में मानवजनित परिवर्तन के साथ-साथ ऐसे अपराध जो जैव विविधता को नुक़सान पहुँचा रहा है। इसके अलावा जंगलों की लगातार अवैध कटाई, ज़मीन का ग़लत इस्तेमाल, ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव, चीज़ों में मिलावट, अवैध वन्यजीव तस्करी और वैज्ञानिकों द्वारा लगातार विनाशकारी प्रयोग होने से पृथ्वी को बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुँच रहा है।
अब पारिस्थितिकी तंत्र बदहाल हो चुका है, जिसे बहाल करने की ज़रूरत है। पारिस्थितिकी तंत्र का मतलब है पृथ्वी पर सभी के लिए जगह और उन्हें जीने की आज़ादी, जो कि प्रकृति ने तैयार किया है। लेकिन इंसानों ने इस तंत्र को इस हद तक बिगाडक़र रख दिया है कि कई तरह के जीवन पृथ्वी से विलुप्त हो चुके हैं। लेकिन विचार करना होगा कि हमारा पारिस्थितिकी तंत्र जितना बेहतर और स्वस्थ होगा, इंसान और दूसरे प्राणी उतने ही स्वस्थ और निर्भय होकर जी सकेंगे। इसलिए आज क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने की ज़रूरत बहुत ज़्यादा हो चुकी है, जिसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है पुराने समय के हिसाब से रहन-सहन को बढ़ावा देना। जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश में छटपटाने की बजाय जलवायु परिवर्तन के कारणों पर रोक लगाने की ज़रूरत है, ताकि प्रकृति की तरफ़ से ही ख़तरा कम हो सके। वर्ना असहाय होने के सिवाय इंसानों के पास और कोई चारा नहीं होगा, क्योंकि प्रकृति की ताक़त के आगे इंसान एक कीड़े से ज़्यादा कुछ नहीं है, भले ही वह कितनी भी मज़बूत और आलीशान इमारतें बना ले, चाहे कितने भी संसाधन अपने फ़ायदे के लिए जुटा ले।
एक अच्छा पर्यावरण बीमारियों से बचाव करता है और स्वस्थ ज़िन्दगी के लायक होता है। इसके लिए जन जागरूकता की ज़रूरत है, क्योंकि लोग मिलकर ही पृथ्वी को संरक्षित कर सकते हैं। दूसरे जीवों की तरह ही इंसानी स्वभाव भी गंदगी करना है। हालाँकि इंसानों द्वारा फैलायी जा रही गंदगी दूसरे जीवों द्वारा फैलायी जा रही गंदगी में मूल अंतर यह है कि दूसरे जीव केवल मल-मूत्र करके गंदगी फैलाते हैं, जिसे पृथ्वी अपशिष्ट करके उसका उपयोग पेड़-पौधों और फ़सलों के लिए खाद तैयार करने में कर लेती है। इंसानों के मल-मूत्र को भी खाद में परिवर्तित करके पृथ्वी उसका उपयोग कर लेती है; लेकिन इसके अलावा जो गंदगी इंसान फैला रहे हैं, उससे पृथ्वी को बहुत ज़्यादा नुक़सान हो रहा है।
इंसानों में इतनी अक्ल है कि वह इस गंदगी को साफ़ भी कर सके, लेकिन कुछ ऐसी गंदगी इंसानों ने फैला रखी है, जिसका समाधान इंसानों के पास भी नहीं है। क्योंकि उसे एक केमिकल को नष्ट करने के लिए दूसरे केमिकल का इस्तेमाल करना ही होगा। इस तरह से हर नये प्रयोग के लिए, हर नये उत्पादन के लिए एक ऐसा केमिकल या पदार्थ पैदा हो जाता है, जो और घातक साबित होता है। पृथ्वी पर केमिकल और प्लास्टिक बढऩे का सिलसिला इतना तेज़ है कि हर रोज़ दुनिया में लाखों टन प्लास्टिक और हज़ारों गैलन केमिकल पैदा हो रहा है। इस प्लास्टिक से करोड़ों लीटर पानी ख़राब हो रहा है और हवा दूषित हो रही है।
पृथ्वी को संरक्षित कैसे किया जाए? इस सवाल का जवाब तो ऊपर मिल ही चुका होगा; लेकिन मुख्य सवाल यह है कि यह काम ऐसे समय में कौन आगे बढक़र करे, जब पृथ्वी को बचाने की कोशिशों में लगे लोगों को लकड़ी तस्करों, पशु और पशु अंग तस्करों, केमिकल पैदा करने वालों, फैक्ट्री चलाने वालों की ओर से धमकियाँ मिलती रहती हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ग्लोबल विटनेस ने एक अध्ययन की रिपोर्ट में ख़ुलासा किया है कि जलवायु परिवर्तन पर लोगों को चेताने वाले वैज्ञानिकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। ये धमकियाँ पुरुष वैज्ञानिकों को जान से मारने की, उनके परिवार को नुक़सान पहुँचाने की मिल रही हैं, तो महिला वैज्ञानिकों को बलात्कार की और उन्हें जान से मारने, नुक़सान पहुँचाने और उनके परिवार को नुक़सान पहुँचाने की मिल रही हैं। इन धमकियों की वजह से अनेक वैज्ञानिक तनाव में हैं, अनेक बीमार हो चुके हैं और अनेक अपने काम को लेकर डरे हुए हैं। यही हाल भू-संरक्षण पर काम करने वाले वैज्ञानिकों और वन संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, जल संरक्षण, ऑक्सीजन संरक्षण, रेत संरक्षण और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में लगे लोगों का है। यानी सभी प्रकार से अच्छे कामों में लगे लोगों को या तो धमकियाँ मिलती रहती है, उन पर हमले होते रहते हैं और कई की तो हत्याएँ हो चुकी हैं।
पृथ्वी के संसाधनों के दोहन में लगे लोग इस काम को अंजाम देते हैं और उनका कुछ नहीं होता। इसकी वजह यह है कि बड़े-बड़े माफ़ियाओं और तस्करों के सिर पर बड़े-बड़े पूँजीपतियों का हाथ होता है, बड़े-बड़े नेताओं का हाथ होता है, जो ख़ुद सत्ता में बैठे होते हैं। इस तरह दोहरी नीति के तहत काम होता है, एक तरफ़ सरकारी पैसे पर संरक्षण के दिखावे के लिए काम कराया जाता है और दूसरी तरफ़ पर्दे के पीछे पैसा कमाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन माफ़िया, तस्करों और दूसरे प्रकार के अपराधियों से प्रकृति के ख़िलाफ़ काम करवाये जाते हैं।
सन् 2018 में अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस पर पृथ्वी को प्लास्टिक प्रदूषण से बचाने का अभियान चलाया गया था; लेकिन तब से अब तक 12 फ़ीसदी प्लास्टिक धरती पर बढ़ चुका है। इस प्लास्टिक को ख़त्म करने के लिए कई कंपनियाँ और फैक्ट्रियाँ काम कर रही हैं, जो या तो एक प्लास्टिक की चीज़ को नष्ट करके उससे दूसरी प्लास्टिक की चीज़ बना रही हैं या फिर प्लास्टिक नष्ट करने के नाम पर उससे ज़्यादा ख़तरनाक केमिकल पैदा कर रही हैं, जिससे पृथ्वी और पृथ्वी पर मौज़ूद प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ पृथ्वी पर मौज़ूद सभी प्रकार की ज़िन्दगियों को बेहद नुक़सान पहुँच रहा है। दुनिया भर की सरकारें प्लास्टिक और केमिकल को नष्ट करने के लिए हर साल अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं; लेकिन बढ़ते प्लास्टिक कचरे और केमिकल में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे समस्या और विकराल होती जा रही है। इसलिए पृथ्वी संरक्षण के लिए कई उत्पादनों को रोकना होगा, जंगलों का क्षेत्रफल बढ़ाना होगा, पानी और हवा को साफ़-सुथरा रखना होगा।
प्राकृतिक संसाधनों की तस्करी रोकनी होगी और प्रकृति से हर तरह के खिलवाड़ को रोकना होगा, जिसके लिए दुनिया भर की सरकारों को बुरे लोगों से, माफ़ियाओं से और तस्करों से एक बड़ी लड़ाई लडऩी होगी और अच्छे लोगों का साथ देना होगा, जो कि संभव नहीं लगता। लेकिन संकल्प लेने से सब कुछ सम्भव है और पृथ्वी तथा प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का संकल्प सिर्फ़ दुनिया के सभी देशों की सरकारों को ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों को भी लेना होगा।