दिल्ली शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी के नेता व राज्यसभा सांसद राघव चड्डा का भी नाम सामने आया है। मनीष सिसोदिया के बाद प्रवर्तन निर्देशालय (ईडी) की दूसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में राघव चड्ढा का नाम है।
ईडी की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में कहा गया है कि, जाली लेनदेन की साजिश रची गई। मनीष सिसोदिया के पूर्व सचिव सी अरविंद ने जांच एजेंसी को बताया कि मनीष सिसोदिया के घर पर हुई बैठक में राघव चड्डा भी मौजूद थे।
सी अरविंद के बयान के अनुसार बैठक में पंजाब के आबकारी आयुक्त वरूणा रूजम, मामले के आरोपी विजय नायर और पंजाब आबकारी निदेशालय के अन्य अधिकारी भी शामिल थे।
बता दें, दिल्ली शराब घोटाला मामले में पहले दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री का नाम आ चुका है और सिसोदिया दिल्ली की नई शराब पॉलिसी से संबंधित मामले में बंद है।
आपको बता दें, दिल्ली सरकार ने 17 नवंबर 2021 को नई शराब नीति लागू की थी। दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव ने जुलाई 2022 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव ने एलजी वीके सक्सेना को रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में मनीष सिसोदिया पर शराब कारोबारियों को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया गया था।
भाजपा सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वे संभल कर चलते हुए दिखाई दे रही है किंतु इसी बीच उनका पैर फिसलने से वे जमीन पर गिर पड़ी है। हालांकि उनके सुरक्षाकर्मी उन्हें बचाने का प्रयास करते हैं लेकिन तब तक वे गिर जाती हैं।
मेनका गांधी सोमवार की शाम यूपी के सुल्तानपुर में नगर निकाय चुनाव का प्रचार कर रही थीं। बारिश के चलते कीचड़ की वजह से उनकी गाड़ी कार्यक्रम स्थल से कुछ दूरी पर खड़ी थी, मेनका गाड़ी से उतरकर कार्यक्रम स्थल की ओर जाने लगी ही थी और इसी दौरान बारिश की वजह से हुई कीचड़ के चलते वे गिर गई।
बता दें, मेनका गांधी को गंभीर चोट नहीं आई हैं। और इस सबके बाद वे कार्यस्थल पर पहुंची और लोगों को भी संबोधित किया। भाजपा ने सुल्तानपुर से पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष प्रवीण अग्रवाल को नगर पालिका का प्रत्याशी बनाया है। और उनका समर्थन करने सोमवार को एक सभा को संबोधित करने के लिए मेनका पहुंची थी। उनके साथ भाजपा विधायक विनोद सिंह समेत कई गाड़ियों का काफिला भी था।
आपको बता दें, उत्तर प्रदेश में दो चरणों में नगर निकाय चुनाव कराए जाएंगे। 18 में से नौ मंडलों में 4 मई को पहले चरण में मतदान होना है वहीं बचे हुए 9 मंडलों में दूसरे चरण में 11 मई को मतदान होना है। और मतगणना 13 मई को एक साथ होगी।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 के लिए कांग्रेस ने आज अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। पार्टी के अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्य के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में घोषणा पत्र जारी किया। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष के साथ पूर्व सीएम सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी मौजूद रहे।
घोषणापत्र में तमाम बड़े चुनावी वादे
गृह ज्योति योजना के तहत 200 यूनिट मुफ्त बिजली, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बस में मुफ्त यात्रा, अन्ना भाग्य योजना में 10 किलो चावल की गारंटी, अगले 5 सालों के अंतर्गत किसान कल्याण के लिए 1.5 लाख रुपये, फसल नुकसान की भरपाई के लिए 5 हजार करोड़ रुपये (हर साल 1 हजार करोड़ रुपये), दूध पर सब्सिडी को 5 रुपये से बढ़ाकर 7 रुपये किया जाएगा, नारियल किसानों और अन्य के लिए MSP सुनिश्चित की जाएगी, पुरानी पेंशन बहाल की जाएगी, 2 हजार रुपये प्रत्येक माह सभी महिलाओं को, 3 हजार रुपये सभी बेरोजगार स्नातक को, बेरोजगार डिप्लोमा धारकों को दो साल तक 1500 रूपये प्रति माह इत्यादि वादे किये गए है। साथ ही बजरंग दल और पीएफआई का हवाला देते हुए नफरत फैलाने वाले संगठनों पर प्रतिबंध सहित कार्रवाई का वादा किया गया है।
आरक्षण
कांग्रेस ने समाज कल्याण के लिए अहम बताते हुए वादा किया है कि यदि पार्टी यह चुनाव जीतती है तो राज्य में आरक्षण को 50 फीसदी से बढ़ाकर 75 फीसदी कर दिया जाएगा और प्रत्येक पंचायत में समरसता समिति गठित की जाएगी।
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण को 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए 3 फीसदी से 7 फीसदी और अल्पसंख्यक आरक्षण को 4 फीसदी बहाल करने और लिंगायत, वोक्कालिगा व अन्य समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने, नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भी काम करेगी।
आपको बता दें, बीते सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपना कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया था। जिसमें एनआरसी से लेकर समान नागरिक संहिता का जिक्र किया गया था।
कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटों के लिए 10 मई को वोटिंग होनी है और इसके नतीजे 13 मई को घोषित होंगे। और इसी बीच सभी चुनावी पार्टियां कांग्रेस, भाजपा, जेडीएस इत्यादि चुनाव प्रचार में लगे हैं।
सड़कों पर गैंगवार तो होता है, लेकिन राजधानी दिल्ली में मंगलवार तड़के तिहाड़ जेल में ही गैंगवार हो गया, जिसमें एक गुट के बदमाशों ने दूसरे गैंग के बदमाश टिल्लू ताजपुरिया की हत्या कर दी। जानलेवा हमले के बाद टिल्लू को अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज करते हुए ही उसकी मौत हो गयी।
जानकारी के मुताबिक गैंगस्टर टिल्लू पर जेल नंबर 8 में कैद दूसरे गुट के गुंडे योगेश टुंडा ने लोहे की ग्रिल से साथ वाली जेल नंबर 9 में कैद टिल्लू पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया। बुरी तरह घायल टिल्लू को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल ले जाया गया। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
बताया गया है कि टिल्लू पर चार कैदियों ने हमला किया जिनमें दीपक तीतर, योगेश टुंडा, राजेश और रियाज खान हैं जो जितेंद्र गोगी गैंग से हैं। टिल्लू पर सुबह 6:15 बजे हमला हुआ। आरोपियों ने लोहे की ग्रिल तोड़कर उसे नुकीला किया और हमला कर दिया जिससे टिल्लू की मौत हो गई, जबकि एक कैदी रोहित घायल है।
बता दें टिल्लू ताजपुरिया पर 11 मामले दर्ज हैं जिनमें तीन हत्या के हैं। साल 2018 में उस पर और उसकी गैंग के लोगों पर मकोका लगा दिया गया था। टिल्ली नीरज बवाना, सुनील राठी गैंग से भी जुड़ा हुआ था और साल 2016 से वो जेल में बंद था। उसे 2016 में सोनीपत पुलिस ने हत्या के आरोप में रोहतक से गिरफ्तार किया था।
बाहरी दिल्ली के ताजपुर गांव के रहने वाले टिल्लू पर हत्या, अवैध कब्जे और जबरन वसूली सहित अपराध के कई मामले दर्ज हैं। टिल्लू 24 सितंबर, 2021 में दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में हुए शूटआउट का भी मास्टरमाइंड था। कोर्ट में गैंगस्टर जितेंद्र गोगी, जो कभी उसका दोस्त हुआ करता था, की हत्या के लिए टिल्लू ने दोनों शूटरों को ट्रेनिंग दिलाई थी। यह दोनों शूटर मारे गए थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आईपीएल ने क्रिकेट को लोकप्रियता के नये शिखर पर पहुँचाया है; लेकिन परदे के पीछे इस खेल का एक काला चेहरा भी है। आईपीएल में सट्टे, मैच फिक्सिंग के बाद अब इसके टिकटों की कालाबाज़ारी और मुफ़्त में मिलने वाले मैच-पास बेचने की बात सामने आयी है। तहलका एसआईटी ने इसकी तह में जाकर इसका कच्चा चिट्ठा खोला है। पढि़ए इस रिपोर्ट में :-
इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) यक़ीनन दुनिया की सबसे प्रसिद्ध टी20 लीग है। हालाँकि यह हमेशा क्रिकेट से ज़्यादा विवादों के कारण ज़्यादा चर्चा में रही है। सन् 2008 में इसकी स्थापना के बाद से ही, इसे लेकर ख़ूब हंगामे हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि क्रिकेट व्यापार का केंद्र बन चुका है, विवादों ने जाने-अनजाने आईपीएल को लोकप्रियता की लम्बी छलांग लगाने में मदद की है।
स्पॉट फिक्सिंग से लेकर खिलाडिय़ों पर प्रतिबंध, फ्रैंचाइजी का निलंबन, ललित मोदी को आईपीएल अध्यक्ष पद से बर्ख़ास्त करना, लीग में काले धन की संलिप्तता आदि कुछ ऐसे बड़े विवाद हैं, जिन्होंने बीते वर्षों में आईपीएल प्रेमियों को हिलाकर रख दिया है।
अब कॉम्प्लिमेंट्री पास, जिस पर साफ़ लिखा है- ‘नॉट फॉर सेल’ (बिक्री के लिए नहीं)। बावजूद इसके दलाल इस मुफ़्त पास की कालाबाज़ारी करके बिक्री कर रहे हैं, जो कि आईपीएल घोटाले का एक नया स्वरूप है। विभिन्न शहरों से ख़बरें आ रही हैं कि आईपीएल पास की कालाबाज़ारी करने वाले और दलाल ख़ूब चाँदी काट रहे हैं। हाई प्रोफाइल मैचों के टिकट ब्लैक में बेचे जा रहे हैं। मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, पिछले आईपीएल के संस्करणों में 500 रुपये का टिकट 3,000 रुपये से 7,000 रुपये में बिका है। इसी तरह पिछले आईपीएल के फाइनल के टिकट 3,000 रुपये से 2,00,000 रुपये तक में बिके।
कालाबाज़ारी करने वालों ने होटलों, रेलवे स्टेशनों और स्टेडियम के निकट की कॉलोनियों में भी फ़र्ज़ी टिकट बेचने शुरू कर दिये हैं। हाल के दिनों में विभिन्न शहरों की पुलिस ने कालाबाज़ारी करने वालों, आईपीएल मैचों के नक़ली टिकट बेचने वाले दलालों को गिरफ़्तार किया है। अप्रैल, 2023 में जब आईपीएल का 16वाँ सीजन चल रहा है, दिल्ली में सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट पुलिस ने आईपीएल मैचों के लिए नक़ली टिकट छापने वाले एक रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इसके साथ ही पुलिस ने तीन नाबालिग़ समेत पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया है। भारत के विभिन्न शहरों में इन तमाम गिरफ़्तारियों के बावजूद आईपीएल के फ़र्ज़ी और टिकटों की कालाबाज़ारी बदस्तूर जारी है।
कालाबाज़ारी और फ़र्ज़ी टिकटों के कारोबार की तो क्या ही कहें, ‘नॉट फॉर सेल’ (बिक्री के लिए नहीं) चेतावनी वाले आईपीएल के मुफ़्त पास भी बाज़ार में दलाल 15,000 रुपये प्रति पास के हिसाब से बेच रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने 2010 में दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान एक महिला सहित दो लोगों को ‘मुफ़्त पास’ ब्लैक में बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। महिला पर एथलेटिक्स के 50 ऐसे मुफ़्त पास (टिकट) ब्लैक में बेचने का आरोप है।
नक़ली आईपीएल टिकटों, असली टिकटों की कालाबाज़ारी, और ‘बिक्री के लिए नहीं’ लिखे मुफ़्त आईपीएल पास बेचने की इन सभी ख़बरों के बाद ‘तहलका’ को इस कारोबार की जाँच करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सूत्रों के मुताबिक, यह एक और आईपीएल घोटाला है, जो धड़ल्ले से चल रहा है। इस लीग में ‘तहलका’ के पत्रकार ने दिल्ली में मुकुल गुप्ता से मुलाक़ात की, जो वर्षों से हरियाणा के फ़रीदाबाद में अपनी क्रिकेट अकादमी चला रहा है। मुकुल दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम, फ़िरोज़शाह कोटला मैदान में होने वाले 2023 के आईपीएल मैचों के ‘बिक्री के लिए नहीं’ मुफ़्त के पास 15,000 रुपये प्रति पास की निश्चित क़ीमत पर बेच रहा है।
मुकुल के मुताबिक, वह जो कॉम्प्लिमेंट्री पास बेच रहा है, वो दिल्ली ज़िला क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) मेंबर्स के हैं; जो दिल्ली में क्रिकेट गतिविधियों का आधिकारिक निकाय है। मुकुल का दावा है कि वह डीडीसीए के उन मेंबर्स से कॉम्प्लिमेंट्री पास ख़रीद रहे हैं, जिन्हें उनकी एसोसिएशन से ये पास मिलते हैं। मुकुल 20 अप्रैल, 2023 को दिल्ली में खेले जाने वाले दिल्ली कैपिटल्स और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच मैच के कॉम्प्लिमेंट्री पास, जो ‘बिक्री के लिए नहीं’ हैं; बेचने के लिए हमसे मिलने आया। इस भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए मैच देखने का शौक़ीन बताकर हमने ख़ुद को कॉम्प्लिमेंट्री पास ख़रीदार (काल्पनिक) के रूप में पेश किया।
मुकुल : एक्चुअली कॉम्प्लिमेंट्री, जिनसे हमको मिलता है ना! उनसे भी हम पैसा देकर ही लेते हैं, …क्योंकि मेंबर मैं हूँ नहीं…।
रिपोर्टर : ये तो प्लेयर्स के होते होंगे…?
मुकुल : नहीं, नहीं; …प्लेयर्स के नहीं, मेंबर्स के।
रिपोर्टर : जो डीडीसीए के मेंबर्स हैं…?
मुकुल : हाँ; उन्हीं को मिलते हैं। बाक़ी किसी को नहीं मिलते कॉम्प्लिमेंट्री पास…।
रिपोर्टर : डीडीसीए के मेंबर्स को मिलते हैं…?
मुकुल : ओनली मेंबर्स।
रिपोर्टर : ये जो तू मुझे कॉम्प्लिमेंट्री पास दे रहा है, ये डीडीसीए वालों का है?
मुकुल : हाँ; डीडीसीए वालों का…।
रिपोर्टर : इस पर लिखा है- ‘बिक्री के लिए नहीं’
मुकुल : एग्क्जैक्टली (बिलकुल सही)।
रिपोर्टर : तो भाई पैसे कम ले ले…?
मुकुल : फिर वही, बच्चों वाली बात मत करो मेरे से…।
मुकुल ये ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाले आईपीएल पास (टिकट) 15,000 रुपये प्रति पास की निश्चित क़ीमत पर बेच रहा था। जब हमने उसे छूट देने के लिए कहा, तो वह कहता है कि वह पैसे अपने पास नहीं रख रहा है, बल्कि अपने अन्य सहयोगी सदस्यों को दे रहा है।
रिपोर्टर : भाई 15 के (हज़ार) से कम करवा दियो, …इस बार ज़्यादा ले रहा है।
मुकुल : भैया! मैं नहीं ले रहा, …आपको मैंने पहले ही बता दिया …ये तो बस देने हैं, आगे किसी को।
रिपोर्टर : तेरा कुछ नहीं इसमें…?
मुकुल : अपना कुछ नहीं है…।
रिपोर्टर : तू फ़रीदाबाद से चलकर पास देने आ रहा है, …तेरा कुछ नहीं है?
मुकुल : एक मिलना भी तो होता है…।
रिपोर्टर : हाँ; मिलना है, तो यू आर ऑलवेज वेलकम…।
यह जानने के बावजूद कि यह कॉम्प्लिमेंट्री आईपीएल पास ‘बिक्री के लिए नहीं’ हैं, मुकुल प्रति पास 15,000 रुपये में बेच रहा था। उसने पत्रकारों से कहा कि वह उन्हें नहीं बेच रहा है, बल्कि हमें प्रेम स्वरूप देने आया है। जब हमने उससे कहा कि यह पास तो बिक्री के लिए नहीं है, तो उसने कहा कि वह हमसे प्रेमवश मिलने आया है।
रिपोर्टर : कॉम्प्लिमेंट्री पास ‘नॉट फॉर सेल’, इस पर लिखा हुआ है भाई साहब…।
मुकुल : हाँ; तो सेल थोड़ी न कर रहा हूँ…।
रिपोर्टर : फिर क्या कर रहा है…?
मुकुल : मैं तो आपको देने आया हूँ मोहब्बत में…।
रिपोर्टर : इसको पैसे मत दो…, फिर…।
मुकुल : देने आया हूँ मोहब्बत में…।
रिपोर्टर : थोड़े तो कम कर दे भाई…।
20 अप्रैल के मैच से पहले मुकुल ने हमें 4 अप्रैल, 2023 को दिल्ली में दिल्ली कैपिटल्स और गुज़रात टाइटंस और 11 अप्रैल, 2023 को दिल्ली कैपिटल्स और मुंबई इंडियंस के बीच हुए मैचों के ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाले आईपीएल पास की पेशकश की। लेकिन हमने इसे ख़रीदने से मना कर दिया। लेकिन उसने हमारा पीछा करना जारी रखा और 20 अप्रैल के मैच पास की पेशकश की, जो दिल्ली में तीसरा आईपीएल मैच था। हमने उससे मिलने का फ़ैसला किया। बैठक में मुकुल ने हमें आश्वासन दिया कि वह हमें भविष्य के मैचों के लिए आईपीएल कॉम्प्लिमेंट्री पास भी पैसे के लिए प्रदान करेगा।
रिपोर्टर : अच्छा, ये कौन-सा मैच है दिल्ली में?
मुकुल : फोर्थ मैच है…।
रिपोर्टर : थर्ड मैच है, …तीसरा; एक तो तू 7 को दे रहा था मुझे…।
मुकुल : हाँ।
रिपोर्टर : 7 अप्रैल, 2023 का दे रहा था मुझे, ऑफर किया था मुझे…, एक 11 का… और अब 20 का…, तीसरा मैच है ये दिल्ली का…, 2023 अप्रैल…। आगे मैचिज का सीन क्या है पासिज का…?
मुकुल : जैसे-जैसे आएगी, मैं बता दूँगा…।
रिपोर्टर : वही कॉम्प्लिमेंट्री होंगे न वो…‘नॉट फॉर सेल’?
मुकुल : हाँ।
रिपोर्टर : कितना रेट?
मुकुल : देखते हैं।
मुकुल के भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए और यह साबित करने के लिए कि वह डींग नहीं मार रहा है, बल्कि वास्तव में ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाले आईपीएल पास बेच रहा है। हमने मुकुल से 14,000 रुपये में दिल्ली में आयोजित 20 अप्रैल, 2023 के मैच का एक आईपीएल ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाला पास ख़रीदा। इस एक पास के लिए 15,000 रुपये की उसकी अपनी मूल माँग से 1,000 रुपये कम में।
रिपोर्टर : पूरे 14 हज़ार हो गये ये आईपीएल के पास के (मुकुल ने कैमरे के सामने पैसे लिए)।
मुकुल : हाँ, हाँ; आईपीएल के पास के नहीं, …मोहब्बत के।
‘तहलका’ ने आईपीएल में उभर रहे इस भ्रष्टाचार को साबित करने और अपनी रिपोर्ट के लिए यह ‘नॉट फॉर सेल’ आईपीएल पास ख़रीदा। ख़रीदे गये फ्री पास का उपयोग नहीं किया गया। फ्री पास ख़रीदने का मक़सद मैच देखना नहीं, बल्कि दलालों को उजागर करने के लिए था। बता दें कि सन् 2011 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने डीडीसीए को फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम में खेले जाने वाले चार विश्व कप क्रिकेट मैचों में से प्रत्येक के लिए 10,000 से अधिक कॉम्प्लिमेंट्री पास जारी नहीं करने का निर्देश दिया था।
न्यायालय ने डीडीसीए मेंबर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया, जिन्होंने कॉम्प्लिमेंट्री पास जारी करने में संघ की कार्यकारी समिति के ‘मनमाने तरीक़े’ को चुनौती दी थी और इस तरह की पास जारी करने की एक सीमा तय करने की माँग की थी। जिस तरह से नक़ली आईपीएल टिकट और ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाले आईपीएल पास वर्षों से भारत के सभी आईपीएल स्थलों पर कालाबाज़ारी करते हुए मुकुल जैसे दलालों द्वारा बेचे जाते हैं। क्रिकेट प्रेमी मानने लगे हैं कि यह एक और आईपीएल घोटाला है। लेकिन इसे पहली बार ‘तहलका’ ने कैमरे में क़ैद करके उजागर किया है।
आईपीएल से जुड़े विवाद
आईपीएल के कॉम्प्लिमेंट्री पास की अवैध बिक्री पर ‘तहलका’ के इस ख़ुलासे से पहले भी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट 2008में अपनी स्थापना के बाद से ही कई विवादों से घिरा रहा है। यहाँ हम आईपीएल के इतिहास के सबसे बड़े विवादों की सूची दे रहे हैं :-
श्रीनिवासन का बेटा सट्टेबाज़ी में गिरफ़्तार : चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) के शीर्ष अधिकारी और बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद और क्रिकेट के शौक़ीन गुरुनाथ मयप्पन को आईपीएल के 2013 के संस्करण में सट्टेबाज़ी में कथित संलिप्तता के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। जाँच के दौरान राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा ने भी सट्टेबाज़ी की बात क़ुबूल की। दोनों फ्रेंचाइजी को टूर्नामेंट से दो साल (2016 और 2017 सीजन) के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था।
टॉवल काण्ड : सन् 2013 में दिल्ली पुलिस ने स्पॉट फिक्सिंग के लिए राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाडिय़ों- एस. श्रीसंत, अजीत चंदिला और अंकित चव्हाण को गिरफ़्तार किया। श्रीसंत ने एक ओवर में 13 रन देने से पहले, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर 14 रन देने का वादा किया था; सट्टेबाज़ों के लिए संकेत के रूप में एक टॉवल का इस्तेमाल किया।
रवींद्र जडेजा पर प्रतिबंध : रवींद्र जडेजा, जो वर्तमान में देश के प्रमुख ऑलराउंडरों में से एक हैं; को सन् 2010 में आईपीएल में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने अपनी टीम राजस्थान रॉयल्स को सूचित किये बिना एक अन्य फ्रेंचाइजी (कथित रूप से मुंबई इंडियंस) के साथ एक नये अनुबंध पर हस्ताक्षर करने की कोशिश की थी, जिसकी तरफ़ से उन्होंने पहला सीजन खेला था।
श्रीलंकाई खिलाडिय़ों को नहीं खेलने दिया: एक सीजन में तब बड़ा विवाद खड़ा हो गया था, जब तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता, जो प्रधानमंत्री पद पर नज़र गड़ाये हुए थीं; ने चेन्नई में खेले जाने वाले आईपीएल मैचों में श्रीलंका के खिलाडिय़ों से मिलने से मना कर दिया था। यह विवादित क़दम श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे के जवाब में उठाया गया था, जो तमिल राजनीति पर हमेशा हावी रहा है। हालाँकि आश्चर्यजनक बात यह थी कि सर्व-शक्तिशाली आईपीएल गवर्निंग काउंसिल को इस फ़ैसले पर सहमत होना पड़ा। कुमारा संगकारा और महेला जयवर्धने जैसे दिग्गजों सहित कुल 13 श्रीलंकाई खिलाडिय़ों को सुरक्षा चिन्ताओं का हवाला देते हुए चेन्नई में खेलने की अनुमति नहीं दी गयी।
राहुल शर्मा, पार्नेल पर ड्रग का दाग़: पुणे वारियर्स, जो अब एक निष्क्रिय फ्रेंचाइजी है; के दो खिलाड़ी राहुल शर्मा और वेन पार्नेल को 2012 में मुंबई में एक रेव पार्टी में ड्रग्स लेने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। क्रिकेटर्स, जो फ़िल्म और टीवी उद्योग की कई अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के साथ पाये गये थे; को हिरासत में लिया गया। लेकिन मादक परीक्षणों से गुज़रने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया।
पाकिस्तान की खिलाडिय़ों पर रोक : नवंबर, 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान सरकार ने अपने खिलाडिय़ों के अगले साल होने वाले आईपीएल के लिए भारत की यात्रा करना असुरक्षित माना। शाहिद अफ़रीदी, शोएब अख़्तर, यूनुस ख़ान, शोएब मलिक, सोहेल तनवीर और उमर गुल जैसे शीर्ष खिलाड़ी, जो विभिन्न फ्रेंचाइजी के लिए खेल रहे थे; को अन्य के साथ अनुमति नहीं दी गयी थी।
जब ललित मोदी हुए निलंबित : वित्तीय गड़बड़ी के आरोप सामने आने के बाद 2010 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने आईपीएल के संस्थापक और अध्यक्ष ललित मोदी को उनके पद से निलंबित कर दिया था।
चीयरलीडर का ख़ुलासा : दक्षिण अफ्रीका की गैब्रिएला पासक्वालोटो, जो मुम्बई इंडियंस (एमआई) की चीयरलीडर थीं; के मैच के बाद की पार्टियों में क्रिकेटरों के संदिग्ध आचरण के बारे में ब्लॉग लिखने के बाद आईपीएल के चौथे संस्करण में काफ़ी हलचल मच गयी। उन्हें आईपीएल द्वारा चीयरलीडर के रूप में उनकी भूमिका से बर्ख़ास्त कर दिया गया था; लेकिन इससे विवाद कम नहीं हुआ।
केकेआर ने सौरव गांगुली को हटाया : आईपीएल के चौथे सीजन में केकेआर ने सौरव गांगुली का आधार मूल्य कथित तौर पर 2,00,000 डॉलर (लगभग 9 मिलियन रुपये) से बढ़ाकर 4,00,000 डॉलर (18 मिलियन रुपये) होने के बाद उन्हें टीम से हटा दिया। इस खब्बू बल्लेबाज़ को बाद में पुणे वारियर्स ने अंतिम समय में घायल आशीष नेहरा के स्थानापन्न के रूप में ख़रीद लिया। लेकिन केकेआर के उन्हें हटाने के बाद गांगुली का आईपीएल करियर लगभग समाप्त ही हो गया था। हालाँकि ‘प्रिंस ऑफ कोलकाता’ के नाम से मशहूर गांगुली बाद में बीसीसीआई के अध्यक्ष बने।
कोच्चि टस्कर्स का अनुबंध समाप्त: इस फ्रैंचाइजी ने 2011 में अपनी शुरुआत की थी; लेकिन उसी वर्ष 26 मार्च, 2015 की निर्धारित तिथि तक अपनी बैंक गारंटी प्रस्तुत करने में विफल रहने के कारण इसे समाप्त कर दिया गया था। टीम ने मध्यस्थता की चुनौती में विजय हासिल की, जिसके मुताबिक बीसीसीआई को 18 प्रतिशत वार्षिक ज़ुर्माने के साथ मुआवज़े के रूप में 550 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया था। यह मामला तबसे अनसुलझा ही है।
शाहरुख़ के लिए स्टेडियम के दरवाज़े बंद: बॉलीवुड स्टार और केकेआर के सह-मालिक मुंबई इंडियंस पर अपनी टीम की जीत के बाद मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में सुरक्षा गार्ड के साथ विवाद में उलझे थे। ख़ान पर आरोप लगा कि वह खेल समाप्त होने के बाद मैदान में पहुँचे और अधिकारियों को गाली दी। मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन ने ख़ान पर पाँच साल के लिए स्टेडियम में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया था; लेकिन 2015 में इसे रद्द कर दिया।
डेक्कन चार्जर्स का अनुबंध समाप्त: आईपीएल फ्रेंचाइजी डेक्कन चार्जर्स का अनुबंध बीसीसीआई ने 100 करोड़ रुपये की निर्धारित बैंक गारंटी का भुगतान करने में विफल रहने के बाद रद्द कर दिया था। टीम मामले को अदालत में ले गयी और आरोप लगाया कि कारण बताओ नोटिस की समाप्ति से एक दिन पहले ही उनका अनुबंध रद्द कर दिया गया। सन् 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट की तरफ़ से नियुक्त मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने बीसीसीआई को दोषी ठहराया और उसे फ्रेंचाइजी के मालिक डेक्कन क्रॉनिकल्स होल्डिंग्स लिमिटेड (डीसीएचएल) को नुक़सान की भरपाई के लिए 4,800 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। दिलचस्प यह है कि डेक्कन चार्जर्स ने 2009 का आईपीएल सीजन जीता जो दक्षिण अफ्रीका में आयोजित किया गया था।
छेड़छाड़ का आरोपी खिलाड़ी गिरफ़्तार : आरसीबी के बल्लेबाज़ ल्यूक पॉमर्सबैक को एक अमेरिकी महिला की तरफ़ से दायर छेड़छाड़ की शिकायत पर नई दिल्ली में गिरफ़्तार किया गया था। शिकायतकर्ता महिला ने यह भी दावा किया था कि जब उसके मंगेतर ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो उसे भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ने पीटा। आरसीबी ने पॉमर्सबैक की लम्बित जाँच को निलंबित कर दिया; लेकिन बाद में शिकायतकर्ताओं के मामला वापस लेने के बाद सभी आरोप हटा दिये गये।
कोहली-गंभीर टकराव : एक मैच में जब विराट कोहली के आउट होने के बाद कोहली और गंभीर ने एक-दूसरे पर आरोप लगाये, तो मामला काफ़ी गंभीर हो गया। टिप्पणियों का आदान-प्रदान हुआ, और दिल्ली के खिलाड़ी रजत भाटिया को दोनों को शान्त करना पड़ा। हालाँकि जब दोनों 2016 के संस्करण में मिले, तब चीज़ें बहुत शान्त थीं। लेकिन 2023 के संस्करण में एक बार फिर लखनऊ सुपर जायंट्स और आरसीबी के मैच में नवीन-उल-हक़ के साथ विवाद के बाद कोहली और गंभीर के बीच मैच के बाद जबरदस्त बवाल हुआ। अन्य खिलाडिय़ों को बीच बचाव करना पड़ा। हालाँकि इस प्रकरण के चलते दोनों पर 100 प्रतिशत मैच फीस, जबकि नवीन-उल-हक़ पर 50 फ़ीसदी मैच फीस का ज़ुर्माना लगाया गया।
प्रीति जिंटा-वाडिया विवाद : जहाँ नेस वाडिया और प्रीति जिंटा का बहुचर्चित रोमांस कथित तौर पर कुछ साल पहले ख़त्म हो गया, वहीं व्यवसायी-अभिनेत्री की जोड़ी ने अपने पेशेवर रिश्ते को जारी रखने का फ़ैसला किया। हालाँकि दोनों के बीच चीज़ें ख़राब हो गयीं, जब जिंटा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर वाडिया पर मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक आईपीएल खेल के दौरान उन्हें धमकाने और छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया।
आईपीएल पर बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश : एक एनजीओ की तरफ़ से दायर जनहित याचिका पर कार्रवाई करते हुए, बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीसीसीआई को 30 अप्रैल के बाद होने वाले सभी आईपीएल मैचों को राज्य के बाहर स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य में सूखे के दौरान पिचों को ठीक रखने के लिए पानी का इस्तेमाल संसाधनों की बर्बादी है। इसके बाद महाराष्ट्र फाइनल सहित 13 मैचों की मेज़बानी करने से चूक गया।
दरअसल आईपीएल में पहला विवाद टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही शुरू हो गया था। पहला आईपीएल टूर्नामेंट इंग्लिश काउंटी चैंपियनशिप के सीजन के साथ-साथ न्यूजीलैंड के इंग्लैंड दौरे के साथ हुआ। यही वजह थी कि ईसीबी और काउंटी क्रिकेट क्लबों ने खिलाडिय़ों की उपलब्धता को लेकर बीसीसीआई के सामने अपनी चिन्ता जतायी। ईसीबी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह खिलाडिय़ों को आईपीएल में खेलने के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि देश के प्रति खिलाडिय़ों का कर्तव्य पहले है। नतीजतन, दिमित्री मैस्करेनहास 2008 के सत्र के लिए आईपीएल के साथ हस्ताक्षर करने वाले इकलौते अंग्रेज खिलाड़ी थे।
केंद्र सरकार के भारत में आयोजित विश्व कप पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद् (आईसीसी) को 45 करोड़ रुपये की कर छूट देने के बाद मनोरंजन कर वसूलने के लिए आईपीएल और उसकी फ्रेंचाइजी के ख़िलाफ़ एक जनहित याचिका दायर की गयी थी। इस मामले को वित्त मंत्रालय में ले जाया गया, क्योंकि यह आरोप लगाया गया था कि आईपीएल टिकट अत्यधिक ऊँची क़ीमतों पर बेचे जा रहे थे और केवल अमीर ही उन्हें ख़रीद सकते थे। आईपीएल के कॉम्प्लिमेंट्री पास की बिक्री क्रिकेट में भ्रष्टाचार का सिर्फ़ एक हिस्सा भर है। ‘तहलका’ के पास भविष्य के लिए और भी बहुत कुछ है!
एक कहावत है- ‘मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता।’ अर्थात् बिना कुछ दिये कुछ प्राप्त करने की सोचना बेवक़ूफ़ी है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कॉम्प्लिमेंट्री पास के मामले में यह कहावत सटीक बैठती है। आईपीएल के यह पास सरकारी अधिकारियों, सलाहकारों और अन्य लोगों के प्रति सद्भावना के संकेत के रूप में बाँटे जाते हैं। जब भी अधिकारी इन मुफ़्त टिकटों (पास) पर जीएसटी लगाने का निर्णय लेते हैं, तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की आईपीएल फ्रैंचाइजी यह तर्क देते हुए तुरन्त इसका विरोध करती है कि इसमें विचार करने लायक कुछ नहीं; क्योंकि ये पास केवल व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए हैं। लेकिन मुफ़्त, कितना मुफ़्त है? यह अक्सर एक सवाल रहा है। क्योंकि ऐसे उदाहरण भी सामने आये हैं, जब यह मुफ़्त टिकट (पास) भी बहुत ऊँची दरों पर बेचे गये और बेचे जा रहे हैं। इस समय चल रहे आईपीएल मैचों के दौरान पुलिस ने तीन अलग-अलग मामले दर्ज किये, जब 18 अप्रैल को सनराइजर्स हैदराबाद और मुंबई इंडियंस के बीच हुए आईपीएल मैच के दौरान हैदराबाद के राजीव गाँधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में बारकोड के साथ कॉपी किये गये नक़ली आईपीएल टिकट ले जाने वाले लोग घुस गये। दिल्ली कैपिटल्स बनाम मुंबई इंडियंस के बीच मैच के दौरान अरुण जेटली क्रिकेट स्टेडियम में अवैध प्रवेश के लिए मामला भी दर्ज किया गया था। इससे पहले मरीन ड्राइव पुलिस ने आईपीएल मैचों के लिए वानखेड़े स्टेडियम के बाहर फ़र्ज़ी टिकट बेचने के मामले में धोखाधड़ी और जालसाज़ी का मामला दर्ज किया था।
जैसा कि आईपीएल एक के बाद एक विवादों में उलझा हुआ है, ‘तहलका एसआईटी’ के इस अंक में एक विशेष रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे नक़ली टिकट, कालाबाज़ारी और ‘बिक्री के लिए नहीं’ लिखे पास की बिक्री एक और घोटाला साबित हो रही है। ‘तहलका’ के पत्रकार ने कैमरे में एक दलाल को रिकॉर्ड किया, जो फ़रीदाबाद में अपनी क्रिकेट अकादमी चलाता है; लेकिन ‘बिक्री के लिए नहीं’ वाले कॉम्प्लिमेंट्री आईपीएल पास बेचने में माहिर है। उसने ‘तहलका’ रिपोर्टर, जिन्होंने यह पास ख़रीदने के लिए ख़ुद को एक नक़ली ग्राहक के रूप में प्रस्तुत किया था; को एक दलाल ने दिल्ली कैपिटल्स और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच 20 अप्रैल को दिल्ली में खेले जाने वाले मैच के ‘बिक्री के लिए नहीं’ लिखे कॉम्प्लिमेंट्री आईपीएल पास बेचने की पेशकश की। हमने वास्तव में ऐसा एक आईपीएल पास ख़रीदा, ताकि अपनी रिपोर्ट और ऐसे दलालों को पकडऩे के लिए उनकी सच्चाई को सत्यापित कर सकें। ‘तहलका एसआईटी’ ने अपना काम कर दिया है और अब गेंद सम्बन्धित अधिकारियों के पाले में है कि वे इस पर कार्रवाई करें।
इस अंक में दो और रिपोट्र्स हैं- एक, कैसे पानी दुनिया में सामूहिक विनाश का अगला नया हथियार बन रहा है। दूसरी, पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के विस्फोटक ख़ुलासे। जब हम इस अंक के प्रकाशन की तैयारी में हैं, शीर्ष पहलवानों का दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारतीय कुश्ती महासंघ प्रमुख के ख़िलाफ़ यौन उत्पीडऩ और डराने-धमकाने के आरोपों पर धरना जारी है और मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद पुलिस आरोपी अधिकारी पर एफआईआर दर्ज कर चुकी है। उधर दु:खद ख़बर यह रही कि 25 अप्रैल को पंजाब के पाँच बार मुख्यमंत्री रहे राजनीति के पॉवरहाउस माने-जाने वाले प्रकाश सिंह बादल का निधन हो गया; लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। दूसरी ओर लेखक और पत्रकार, तारिक फ़तेह, जिन्होंने इस्लाम में पुनर्जागरण का प्रतिनिधित्व किया था; दुनिया से रुख़सत कर गये। उनके निधन के बाद एक ट्वीट में उनकी बेटी नताशा फ़तेह ने अपने पिता को ‘पंजाब का शेर, हिंदुस्तान का बेटा और मजलूमों की आवाज़’ बताया।
भारत की जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है, जो कि शायद हम दो – हमारे दो का सबक़ याद न रखने का नतीजा है। एक बार फिर भारत में दो ही बच्चे पैदा करने का क़ानून बनाने की बात की जा रही है। जनसंख्या में सबसे अग्रणी उत्तर प्रदेश से यह आवाज़ उठी है। इसकी वजह भारत में लगातार हो रहा जनसंख्या विस्फोट है।
भारत की जनसंख्या के सही-सही आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यहाँ कुल कितनी जनसंख्या है, इसके अनुमान ही सबके पास हैं। परन्तु हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की स्टेट ऑफ वल्र्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट, 2023 ने सबको चौंका दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने अपनी इस रिपोर्ट में कहा है कि भारत इस साल के मध्य तक दुनिया का सबसे जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। कुछ जानकार कहते हैं कि बनेगा नहीं, बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की आबादी अप्रैल के मध्य में ही 142.86 करोड़ (1.4286 बिलियन) हो चुकी है, जबकि चीन की कुल जनसंख्या अप्रैल के मध्य तक 142.57 करोड़ (1.4257 बिलियन) ही थी। संयुक्त राष्ट्र ने दावा किया है कि इस साल के मध्य तक यानी जून, 2023 तक भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। भारत अप्रैल के मध्य तक चीन से क़रीब 29 लाख ज़्यादा जनसंख्या हो चुकी है। यूएनएफपीए की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 0 से 14 साल तक के बच्चों की जनसंख्या 25 प्रतिशत है। वहीं 65 से ज़्यादा आयु के बुजुर्गों की जनसंख्या 7 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि 15 से 65 साल तक की आयु-सीमा वाले लोगों की जनसंख्या 68 प्रतिशत है। हालाँकि यह अनुमानित आँकड़े हैं; लेकिन यूएनएफपीए यूँ ही आँकड़े जारी नहीं करता।
भारत सरकार ने साल 2011 के बाद जनगणना नहीं करायी है। भारत सरकार द्वारा तय समयावधि के मुताबिक देश में हर 10 साल में जनगणना होनी चाहिए थी; लेकिन साल 2021 में कोरोना संक्रमण के चलते इसे टाल दिया गया था और अब मोदी सरकार इस ओर ध्यान भी नहीं दे रही है। ऐसा लगता है कि वह जिस तरह बेरोज़गारी दर, अशिक्षा दर और आत्महत्या दर की गणना कराने से ख़ुद को बचा रही है, उसी तरह जनगणना करने से भी ख़ुद को बचा रही है। लेकिन यूएनएफपीए के जनसांख्यिकीय आँकड़ों ने मोदी सरकार को शर्मिंदा किया है।
संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के मुताबिक, जनसंख्या के मामले में पहले नंबर पर भारत, दूसरे नंबर पर चीन और तीसरे नंबर पर अमेरिका है। लेकिन अमेरिका की जनसंख्या भारत की जनसंख्या के मुक़ाबले एक-चौथाई से भी कम सिर्फ़ 34 करोड़ है। पिछले साल छ: दशकों में चीन की जनसंख्या वृद्धि पहली बार भारत की जनसंख्या वृद्धि से कम दिखी है। बता दें कि चीन ने तीन दशक पहले एक बच्चा क़ानून लागू किया था; लेकिन वहाँ पिछले साल जनगणना में पाया गया कि युवाओं की जनसंख्या तेज़ी से घटी है, तब चीन ने वहाँ ज़्यादा बच्चे पैदा करने की छूट दी गयी।
भारत सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, साल 2011 के बाद से भारत की जनसंख्या वृद्धि दर औसतन 1.2 प्रतिशत थी, जो 2011 से पहले 10 वर्षों में अनुमानित 1.7 प्रतिशत थी। थी। यूएनएफपीए इंडिया के प्रतिनिधि एंड्रिया वोजनार का कहना है कि लगातार बढ़ती जनसंख्या से आम लोगों पर असर पड़ रहा है।
ज़्यादा जनसंख्या से भारत की आर्थिक स्थिति बिगडऩे के साथ-साथ बेरोज़गारी, भुखमरी, अशिक्षा और ग़रीबी बढ़ेगी। ये वो समस्याएँ हैं, जो युवाओं को नशा, अपराध और झूठ बोलने जैसे ग़लत रास्तों पर भटकाती हैं। हमें आबादी बढ़ाने के लिए किसी एक समुदाय को दोष देने की बजाय अपने आप को ज़्यादा बच्चे पैदा करने से रोकना होगा। जनसंख्या बढ़ाने के लिए अक्सर अशिक्षित लोगों को ज़्यादा दोषी माना जाता है; लेकिन यह बात भी 100 प्रतिशत सच नहीं है। कई पढ़े-लिखे और पैसे वाले लोगों के भी दो से ज़्यादा बच्चे हैं, यहाँ तक कि कई के दो आधा दर्ज़न के आसपास या उससे भी ज़्यादा बच्चे हैं। ऐसे लोगों में कई नेता भी शामिल हैं। इसलिए बच्चे पैदा करने के मामले में भारत सरकार को सभी के लिए एक समान क़ानून बनाना चाहिए।
इसके साथ-साथ भारत सरकार को चीन से सीख लेने की ज़रूरत है, क्योंकि चीन ने हर हाथ में काम देने की मुहिम को पिछले तीन दशक में जिस प्रकार से आगे बढ़ाया है, उसके विपरीत भारत सरकार ने हाथों से रोज़गार-स्वरोज़गार छीनने का काम किया है। यह बात कड़वी है; लेकिन सच्ची है। इसके बाद महँगी होती शिक्षा और बंद होते सरकारी स्कूल, मिड-डे मील में लगातार होती कमी कई समस्याओं को निमंत्रण दे रहे हैं। कोरोना काल में कुछ अनुमानित रिपोट्र्स सामने आयी थीं, जिनमें कहा गया था कि कोरोना काल में बच्चे ज़्यादा पैदा हुए। यह वो दौर था, जब ज़्यादातर लोग घरों में क़ैद थे। साफ़ है कि जब लोगों के पास रोज़गार, स्वरोज़गार नहीं होगा, तो वो घरों में सिमटने लगेंगे और कैसे भी गुजारा करेंगे; लेकिन स्वाभाविक तौर पर जनसंख्या वृद्धि होने लगेगी।
वर्तमान में अनुमानित तौर पर भारत में क़रीब 100 करोड़ से ज़्यादा हिन्दू हैं। वहीं 32 करोड़ से ज़्यादा मुस्लिम हैं। बाक़ी 10.5 करोड़ से ज़्यादा अन्य समुदायों की जनसंख्या है। आज़ादी मिलने पर बँटवारे के बाद साल 1947 में भारत की अनुमानित जनसंख्या 33 करोड़ थी। इसमें हिन्दुओं की जनसंख्या क़रीब 27.72 करोड़ (84 प्रतिशत) थी, जबकि मुस्लिम जनसंख्या क़रीब 3.3 करोड़ (10 प्रतिशत) थी। इसी तरह ईसाई 60.3 लाख (1.83 प्रतिशत), सिख 65 लाख (1.97 प्रतिशत) और बाक़ी अन्य धर्मों के लोग थे। इस तरह साल 1947 से लेकर 2023 तक हिन्दुओं की जनसंख्या क़रीब 67 करोड़ यानी दोगुनी से ज़्यादा बढ़ी है, तो मुस्लिमों की जनसंख्या इस दौरान क़रीब 29 करोड़ यानी क़रीब 10 गुना बढ़ी है।
इस साल भारत ने फिजी में 12वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेज़बानी की। यह भले जितना भी अटपटा लगे; लेकिन फिजी बिना सोचे-समझे चुना गया विकल्प नहीं था। फिजी में भारतीयों का इतिहास और ‘फिजी बात’ नामक स्थानीय बोली में हिन्दी का विकास फिजी को वैश्विक हिन्दी सम्मेलन-2023 की मेज़बानी के लिए एक दिलचस्प विकल्प बनाता है।
सन् 1834 में गुलामी के उन्मूलन के बाद भारतीय गिरमिटिया (अवैतनिक) मज़दूरों की माँगों में अत्यधिक वृद्धि हुई। उन्हें गन्ना जैसी महँगी फ़सलों का उत्पादन करने वाले बाहरी देशों में अस्थायी या स्थायी कॉलोनियों में ले जाया जाने लगा। फिजी के पहले गवर्नर सर आर्थर गार्डन द्वारा 1800 के दशक के शुरू में भारतीय गिरमिटिया श्रम की शुरुआत इस द्वीप राष्ट्र के विकास में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय का प्रतीक है।
सन् 1879 से सन् 1916 तक की 37 वर्षों की अवधि में भारतीय उपमहाद्वीप से लगभग 87 जहाज़ों से 60,538 से अधिक मज़दूरों को फिजी द्वीपों में पौधरोपण का काम करने के लिए ले जाया गया। इसने फिजी में हरियाली की आर्थिक व्यवहार्यता में काफ़ी वृद्धि की और औपनिवेशिक प्रशासन को इस भूमि से फिजियन अलगाव कम करने में सक्षम बनाया। इन घटनाओं के अतिरिक्त इसने तत्कालीन युवा उपनिवेश के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया।
राजधानी सुवा से $करीब 10 किलोमीटर दूर नुकुलाऊ द्वीप का उपयोग एक पृथक बंदरगाह के रूप में किया गया था, जहाँ से मज़दूरों को तब द्वीप शृंखला में उनसे सम्बन्धित नियोक्ताओं के लिए तैनात किया गया था। इसमें उपनिवेश चीनी रिफाइनरी कम्पनी (सीएसआर), स्टेनलेक ली और अन्य तक सीमित नहीं था। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा गन्ना श्रमिकों के रूप में फिजी में ले जाये गये हज़ारों भारतीयों ने अपने (अवैतनिक) अनुबंधों के अन्त में द्वीपों पर रहना जारी रखा, जिससे दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में एक भारतीय केंद्र की शुरुआत हुई।
आख़िरकार सभी सभ्यताओं की उन्नति के अनुरूप सन् 1912 में डॉ. मणिलाल इन गिरमिटिया मज़दूरों की स्वतंत्रता की अग्रणी आवाज़ बन गये और उन्होंने भारतीय इंपीरियल एसोसिएशन की नींव रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
सन् 1920 में कई लोगों के घायल होने के कारण हुई हड़ताल ने प्रवासियों के बीच एक अन्य प्रमुख व्यक्ति के रूप में संध्या नाम की महिला समाजसेवी का उदय देखा। सन् 1900 के दशक में फिजी द्वीपों के भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के ऐसे प्रतिष्ठित प्रतिनिधि ने फिजी की कॉलोनी में भारतीयों की स्थिति पर भारत सरकार को सूचना दी और आख़िरकार, सन् 1920 में गिरमिटिया श्रम को समाप्त कर दिया गया।
भारतीय प्रवासी मुख्य रूप से दो मुख्य द्वीपों- विटी लेवू और वनुआ लेवू पर बने रहे। यही भारतीय सन् 1940 के दशक तक इंडो-फिजियंस आबादी का प्रमुख हिस्सा बन गये और स्वदेशी फिजियों को पछाड़ दिया। इंडो-फिजियन, जिन्हें किसी भी व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है और जिनके पास गिरमिट वंश है, फिजी के 9,10,000 लोगों में से 38 फ़ीसदी हैं। लेकिन दो फ़ीसदी से भी कम ज़मीन के मालिक हैं।
बता दें कि 14 मई को गिरमिट स्मरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन भारतीय कामगारों को ले जाने वाला पहला जहाज़ फिजी पहुँचा था। फिजी में भारतीयों की कुल जनसंख्या 3,15,198 है, जो फिजी की कुल जनसंख्या का लगभग 40 फ़ीसदी है। फिजी की आबादी कई द्वीपों में फैली हुई है, और अधिकांश आबादी के बीच आना-जाना नहीं है।
प्रशांत द्वीप राष्ट्र का $करीब 85 फ़ीसदी स्वदेशी भू-स्वामी इकाइयों से सम्बन्धित है। इसे सरकार के नेटिव लैंड ट्रस्ट बोर्ड के माध्यम से प्रशासित किया जाता है, जिसे अब आईटॉकी (द्बञ्जड्डह्वद्मद्गद्ब) लैंड ट्रस्ट बोर्ड के रूप में जाना जाता है। शेष या तो फ्री होल्ड या सरकारी स्वामित्व वाली भूमि है। इंडो-फिजियन 20-30 साल के कृषि पट्टों और 50-99 साल के आवासीय पट्टों के माध्यम से भूमि का उपयोग कर सकते हैं।
महेन्द्र चौधरी (सन् 1999 से सन् 2000 के बीच) फिजी के पहले और अब तक एकमात्र भारत-फिजी प्रधानमंत्री रहे। बाद में 2007 से सन् 2008 तक वह वित्त मंत्री रहे।
वास्तव में भारत आज उन कुछ देशों में से एक है, जिनके नागरिकों को वीजा के लिए पहले से आवेदन करने की ज़रूरत नहीं है। वे फिजी में आगमन पर फिजी वीजा प्राप्त कर सकते हैं, बशर्ते उनके पास वैध यात्रा दस्तावेज़ होने चाहिए। वीजा आवेदन तब किया जाता है, जब कोई भारतीय जहाज़ से उड़ान भरकर फिजी में उतरता है। फिजी में बसे उत्तर और दक्षिण भारतीयों के बीच एक आम भाषा खोजने की आवश्यकता के साथ-साथ बच्चों को डे-केयर सेंटर्स में छोड़े जाने के लिए एक आम भाषा की भी आवश्यकता थी।
हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू दोनों बोलने वालों के लिए एक सामान्य शब्द) द्वीपों की प्रशांत शृंखला पर नये बसने वालों के लिए संचार की सुविधाजनक भाषा के रूप में उभरी। हिन्दी अब फिजी में एक आधिकारिक भाषा है। सन् 1997 के संविधान में इसे ‘हिन्दुस्तानी’ के रूप में संदर्भित किया गया था। लेकिन सन् 2013 के फिजी के संविधान में इसे ‘हिन्दी’ कहा जाता है।
इस फिजी हिन्दी भाषा को फिजी हिन्दुस्तानी या फिजियन हिन्दी के रूप में भी जाना जाता है। यह फिजी में भारतीय मूल के अधिकांश फिजियन नागरिक की बोले जाने वाली भाषा है। यह मुख्य रूप से अवधी और भोजपुरी भाषा या हिन्दी की बोलियों से ली गयी है और इसमें कुछ अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द भी शामिल हैं।
फिजी की पहली भाषा वास्तव में फिजियन का मिश्रण है और और कुछ अंग्रेजी शब्दों के साथ-साथ वहाँ बोली जाने वाली हिन्दी के शब्द भारत में बोली जाने वाली हिन्दी और उर्दू के शब्दों से धीरे-धीरे अलग हो गये। संचार की इस मिली-जुली भाषा को लोकप्रिय रूप से ‘फिजी बात’ के रूप में जाना जाने लगा।
समय-चक्र
1879 – 1916 : क़रीब 60,553 भारतीय पंजीकृत हुए, जिनमें मज़दूर और बच्चों जैसे आश्रित शामिल हैं; इन्हें पाँच साल के लिए गिरमिट का दर्जा दिया गया।
1917 में भारतीयों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खुले।
1919 में फिजी में भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों पर विचार किया गया।
1920 में साल के पहले दिन संविदा प्रणाली को समाप्त किया गया।
1929 में सांप्रदायिक मताधिकार के तहत विधान परिषद् में तीन प्रतिनिधि चुने गये।
1997 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया गया; लेकिन संविधान में इसे ‘हिन्दुस्तानी’ के रूप में संदर्भित किया गया।
1999 में फिजी में पहली बार और अब तक के इकलौते भारतीय प्रधानमंत्री चुने गये।
2013 में फिजी के संविधान में ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग किया गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के आरोपों से राजनीति गर्म
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी, 2019 को आत्मघाती आतंकी हमले में देश के 40 जवान शहीद हो गये थे। अब चार साल बाद उस समय जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्य पाल मलिक ने इसे लेकर कुछ गम्भीर आरोप लगाये हैं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि सीआरपीएफ की तरफ़ से जवानों को हवाई जहाज़ से श्रीनगर ले जाने का केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा गया आग्रह नहीं माना गया।
‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, इस घटना से पहले एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में किसी बड़ी आतंकी वारदात के 11 इनपुट्स केंद्र को दिये थे; लेकिन इसके बावजूद यह घटना हुई। विरोधी दल इसे लेकर मोदी सरकार को घेर रहे हैं; क्योंकि मलिक के अपने बयान में जो बातें कहीं हैं, उनसे सुरक्षा चूक के साथ-साथ कई गम्भीर राजनीतिक सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा भाजपा के गले की फाँस बन सकता है। मलिक एक ज़िम्मेदार पद पर रहे हैं और उनके आरोपों को यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। दूसरे जम्मू-कश्मीर में बतौर राज्यपाल उनकी नियुक्ति केंद्र में मोदी सरकार ने ही की थी, जिससे ज़ाहिर होता है कि केंद्र को मलिक की क़ाबिलियत पर पूरा भरोसा था। मलिक के घटना के दिन के टीवी चैनलों से बातचीत के अंश सुनने से भी ज़ाहिर हो जाता है कि उन्होंने 14 फरवरी को ही इसे एक सरकारी सुरक्षा चूक बताया था और इसकी ज़िम्मेदारी लेने की बात कही थी।
सत्यपाल मलिक का यह आरोप भी बहुत गम्भीर है कि उनकी घटना के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी से बात हुई थी और उन्हें यह बताया था कि यह हमारी चूक से हुआ है, तो उन्हें प्रधानमंत्री की तरफ़ से कथित तौर पर ‘चुप रहने’ को कहा गया था। क्यों कहा गया, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। प्रधानमंत्री उस समय सफारी में शूटिंग कर रहे थे। मलिक के पुलवामा को लेकर आरोप न सिर्फ़ एक गम्भीर सुरक्षा चूक की तरफ़ संकेत देते हैं, बल्कि उन्होंने ढके-छिपे शब्दों में कुछ राजनीतिक बातें भी कहीं हैं, जिन्हें शायद आने वाले समय में कोई डी-कोड करे। यदि ऐसा होता है, तो यह एक बड़ा राजनीतिक तूफ़ान भी ला सकता है।
पूर्व राज्यपाल मलिक के आरोप कितने गम्भीर हैं, यह इस बात से साबित हो जाता है कि पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल शंकर रॉय चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और एनएसए अजित डोवल को पुलवामा हमले की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा- ‘पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ जवानों की मौत की पहली ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार की है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल सलाह देते हैं।’ राजनीतिक नेताओं की तरफ़ से भी आरोपों की बौछार हुई है। एनसीपी प्रमुख और नरसिम्हा राव सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके शरद पवार ने भी केंद्र सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला किया। उन्होंने कहा- ‘जो सरकार अपने सैनिकों की सुरक्षा नहीं करती, उसे सत्ता में रहने का हक़ नहीं है।’ पवार का यह बयान महाराष्ट्र के पुणे ज़िले की पुरंदर तहसील में एक किसान सभा को संबोधित करने के वक़्त आया।
वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इसे लेकर कहा- ‘केंद्र को सत्यपाल मलिक की पुलवामा हमले पर कही बातों को गम्भीरता से लेना चाहिए। वह बहुत वरिष्ठ नेता हैं और मैंने उन्हें कभी झूठ बोलते नहीं सुना। पुलवामा एक दर्दनाक घटना थी और यदि हमारी ओर से हुई कुछ चूक के कारण यह हादसा हुआ, तो इस मामले में कार्रवाई की जानी चाहिए।’
सत्यपाल मलिक यह आरोप लगाने के बाद चुप नहीं बैठे हैं। वह लगातार सक्रिय हैं और ख़ास से लेकर किसान जत्थेबंदियाँ उनके साथ खड़ी दिखती हैं। मलिक राजनीति में रहे हैं। लिहाज़ा आरोपों के बाद उनके सक्रिय रहने में कुछ भी अनोखा नहीं है। हाँ, एक चीज़ ज़रूर है कि सत्यपाल मलिक अपने आरोपों से फिरे नहीं हैं और लगातार केंद्र सरकार पर हमले कर रहे हैं। वे संगठनों के साथ कार्यक्रम कर रहे हैं और किसानों की आवाज़ उठा रहे हैं। दिल्ली में जब घर के सामने पार्क में मलिक ने कार्यक्रम करने की कोशिश की तो पुलिस ने यह कहकर इसकी इजाज़त देने से इनकार कर दिया कि उन्होंने इसकी मंज़ूरी नहीं ली है। बाद में मलिक ने कहा- ‘मुझे पुलिस कर्मियों ने बताया था कि मेरा कार्यक्रम रुकवाने के लिए ऊपर से दबाव है।’
ज़ाहिर है मलिक मैदान से हटने वाले नहीं लग रहे। यह सिलसिला भाजपा की बेचैनी बढ़ा रहा है, क्योंकि मलिक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के हैं और 2009 में उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष रहने के अलावा भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के कुछ साल के बाद मलिक को बिहार जैसे अहम राज्य का राज्यपाल बनाया गया था। इसके बाद सन् 2018 में उन्हें जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल का ज़िम्मा दिया गया। मलिक भाजपा में ही नहीं रहे हैं, बल्कि समाजवादी पार्टी में भी रहे हैं। किसानी मुद्दों को मलिक हमेशा से उठाते रहे हैं। ऐसे में उनका केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आना महत्त्वपूर्ण तो है ही; लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मलिक किसी ख़ास राजनीतिक दल में आने की तैयारी में हैं ?
फिर चर्चा में पुलवामा
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी, 2019 को जब आतंकी हमला हुआ था और उसके बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में कार्रवाई की थी, तब देश में लोकसभा चुनाव का माहौल बनना शुरू हो चुका था। लेकिन पुलवामा और उसके बाद जो कुछ हुआ, उसने चुनाव की पूरी दिशा बदल दी और भाजपा ने बेहिचक इस मुद्दे को चुनाव का मुद्दा बना दिया। मलिक के पुलवामा हमले को लेकर जो सवाल हैं, उनमें उन्होंने ढके-छिपे रूप से राजनीतिक बातें भी कही हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि पुलवामा हमले को लेकर जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बयान ने देश की राजनीति में गर्मी पैदा कर दी है। मलिक ने और भी बहुत-सी बातें कहीं हैं जो राजनीतिक रूप से 2024 से पहले भाजपा के लिए दिक़्क़त पैदा कर सकती हैं, क्योंकि विपक्ष ने पहली बार इस तरह के मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार पर इस तरह का हमला बोला है। पुलवामा को लेकर पहले भी कई आरोप लगते रहे हैं, जिनमें मुख्य यह है कि सीआरपीएफ के जवानों को सडक़ के रास्ते क्यों भेजा गया, जबकि उनकी तरफ़ से हवाई जहाज़ के लिए लिखित आग्रह आया था। मलिक ने भी यह स्वीकार किया है कि ऐसा लिखित आग्रह सीआरपीएफ की तरफ़ से पुलवामा की घटना से पहले ही भेजा गया था।
‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय एजेंसियों ने इस घटना से पहले के दो महीनों में एक के बाद एक 11 अलर्ट जारी करके आतंकियों की तरफ़ से किसी बड़ी वारदात की तैयारी को लेकर जारी किये थे। एजेंसियों के यह अलर्ट आतंकियों की पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगनाओं से बातचीत के इंटेरसेप्टस में सामने आये थे। पुलवामा की को घटना हुई थी उस समय जम्मू से 78 वाहनों में 2500 के क़रीब सीआरपीएफ के जवान बसों में श्रीनगर जा रहे थे। इससे पहले भी सीआरपीएफ ने एंटी-टेररिस्ट ट्रेनिंग में ख़ामियों को लेकर गृह मंत्रालय को कई बार लिखा था। पुलवामा आतंकी हमले को लेकर मलिक ने कहा कि कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों के क़ाफ़िले पर हुआ आतंकी हमला, जिसमें 40 जवान शहीद हुए थे; सरकारी ग़लती के चलते हुआ था। मलिक के मुताबिक, ‘जब उन्होंने इसके बारे में प्रधानमंत्री और एनएसए अजित डोवल को बताया, तब उन लोगों ने उन्हें (मलिक) चुप रहने को कहा।’
मलिक ने दावा किया कि सीआरपीएफ ने उनके लोगों को लाने-ले जाने के लिए एयरक्राफ्ट माँगा था, क्योंकि इतना बड़ा क़ाफ़िला कभी रोड से नहीं जाता। उनके मुताबिक, सीआरपीएफ ने गृह मंत्रालय से पूछा था; लेकिन उन्होंने एयरक्राफ्ट देने से मना कर दिया था। मलिक के मुताबिक, ‘अगर वे (सीआरपीएफ) मुझसे पूछते, तो मैं उनको (सीआरपीएफ) एयरक्राफ्ट देता; कैसे भी देता। सिर्फ़ पाँच एयरक्राफ्ट की ज़रूरत थी। उनको एयरक्राफ्ट नहीं दिया गया।’ निश्चित ही मलिक का यह आरोप बेहद गम्भीर है। यदि यह सच है तो साफ़ है कि सैनिकों की जान दाँव पर लगायी गयी। मलिक का इसके बाद का ख़ुलासा और ज़्यादा चौंकाने वाला है। मलिक ने दावा किया कि ‘प्रधानमंत्री मोदी ने इस हमले के बाद जिम कार्बेट पार्क से जब मुझे कॉल की, तो मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि ये हमारी ग़लती से हुआ है। इस पर उन्होंने मुझसे कहा कि तुम चुप रहो और किसी से कुछ न कहो।’ यदि मलिक का दावा सच है, तो सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों कहा? यही नहीं, मलिक ने अपने बयान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल का भी ज़िक्र किया। देखा जाए, मलिक के इस सारे बयान (इंटरव्यू) में जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण है वह यह है जब उन्होंने कहा- ‘मुझे समझ आ गया था कि सरकार पूरा ठीकरा पाकिस्तान पर फोडऩे वाली है, ताकि 2019 के लोकसभा चुनाव में फ़ायदा मिल सके। अजित डोवल ने भी मुझसे चुप रहने को कहा। मैं समझ गया था कि मामला पाकिस्तान की ओर जाना है।’ हालाँकि भाजपा नेता अमित मालवीय ने कहा- ‘कोई उनको (सत्यपाल मलिक) सीरियसली नहीं लेता। यहाँ तक कि तब भी, जब वो अपने आरोप वापस ले लेते हैं। यह उनकी विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल है।’
भ्रष्टाचार के भी लगाये आरोप
मलिक ने सिर्फ़ पुलवामा की ही बात नहीं की है। उन्होंने भ्रष्टाचार की बात भी कही है। उनके सनसनीख़ेज़ आरोपों के बाद कई घटनाएँ हुईं। सीबीआई ने मलिक को समन भेजा। 28 अप्रैल को सीबीआई मलिक के घर पूछताछ के लिए पहुँची। हालाँकि बाद में मलिक ने साफ़ किया कि सीबीआई उनके यहाँ आएगी, न कि वह सीबीआई के यहाँ जाएँगे। दरअसल सीबीआई मलिक से बीमा घोटाले में भ्रष्टाचार को लेकर कुछ स्पष्टीकरण चाहती है और दूसरी बार मलिक से पूछताछ कर रही है। हालाँकि इसे मलिक पर दबाव डालने की रणनीति के रूप में देखा गया।
सीबीआई ने जम्मू-कश्मीर में दो परियोजनाओं में गड़बडिय़ों को लेकर मामला दर्ज किया था। इस मामले को लेकर पूर्व राज्यपाल मलिक ने दावा किया था कि दो फाइलें साइन करने के लिए 150-150 करोड़ रुपये रिश्वत की पेशकश की गयी थी। सीबीआई ने पिछले साल अक्टूबर में भी उनसे पूछताछ की थी। अब सीबीआई के उन्हें बुलाने को लेकर मलिक ने कहा- ‘मैंने सच बोलकर कुछ लोगों के पाप उजागर किये हैं। शायद, इसलिए बुलावा आया है। मैं किसान का बेटा हूँ। घबराऊँगा नहीं। सच्चाई के साथ खड़ा हूँ।’
मलिक ने आरोप लगाया है कि उनके राज्यपाल रहते 23 अगस्त, 2018 से 30 अक्टूबर, 2019 के बीच उनके पास मंज़ूरी के लिए दो फाइलें आयी थीं। इनमें से एक फाइल अंबानी की और दूसरी आरएसएस से जुड़े व्यक्ति की थी, जो पिछली महबूबा मुफ़्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री थे और प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) का बहुत क़रीब होने का दावा करते थे। पूर्व राज्यपाल ने अपने दावे में कहा- ‘मुझे दोनों विभागों के सचिवों ने सूचित किया था कि ये एक घोटाला है और मैंने उसके अनुरूप ही दोनों डील्स को रद्द कर दिया था। सचिवों ने मुझसे कहा था कि आपको हर फाइल को पास करने के लिए 150 करोड़ रुपये मिलेंगे।’
हालाँकि मलिक के आरोपों के बाद माधव ने इसे निराधार बताया और मलिक के ख़िलाफ़ मानहानि का नोटिस भी भेजा है। यह सारा घटनाक्रम के बीच सत्यपाल मलिक को जब सीबीआई ने रिलायंस इंश्योरेंस केस में तलब किया, तो कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा- ‘आख़िरकार प्रधानमंत्री मोदी से रहा न गया। सत्यपाल मलिक ने देश के सामने उनकी कलई खोल दी। अब सीबीआई ने मलिक जी को बुलाया है। ये तो होना ही था।’ यही नहीं मलिक ने यह भी दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर से जब धारा-370 हटायी गयी, तो उससे पहले उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। हालाँकि वे जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे। मलिक का कहना है कि वे व्यक्तिगत रूप से धारा-370 हटाये जाने के तो हक़ में थे; लेकिन जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा $खत्म करने के पक्ष में नहीं थे।
राहुल गाँधी पर मलिक की राय
‘‘संसदीय लोकतंत्र में उन्हें बोलने नहीं देने से ज़्यादा ग़लत कभी नहीं हुआ था। वे (सत्ताधारी) राहुल गाँधी के बारे में बहुत असहज हो गये हैं, क्योंकि वह (राहुल) पिछले कुछ समय से बहुत प्रासंगिक बातें कह रहे हैं। अडानी सही मुद्दा है, जिसे उन्होंने उठाया है। वे (मोदी) उनके (राहुल) सवालों का जवाब नहीं दे सकते। एक बेचैनी उनमें है। मैं देश को नहीं समझता; लेकिन (भारत जोड़ो) यात्रा के बाद लोग उन्हें पसन्द करने लगे हैं। वे 3,500 किलोमीटर पैदल चले और लोगों से मिले। जब वे (राहुल) श्रीनगर आये, तो पूरा श्रीनगर उन्हें देखने के लिए बाहर आ गया और उन्होंने (राहुल) बिना छाते के बर्फ़बारी में लोगों को सम्बोधित किया।’’ याद रहे सत्यपाल मलिक कह चुके हैं कि वह कोई राजनीतिक दल ज्वाइन नहीं करेंगे। न चुनाव लड़ेंगे। हालाँकि उन्होंने 2024 के चुनाव में किसान की राजनीति करने वालों के अलावा सपा, कांग्रेस और अजीत सिंह के बेटे के लिए प्रचार करने की बात ज़रूरी कही है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति से मिलने वालों की लिस्ट पीएमओ से मंज़ूर होती है।
कांग्रेस के सवाल
इसमें कोई दो-राय नहीं कि पुलवामा हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, जिसमें देश के 40वीर सैनिक शहीद हुए थे। अब चार साल बाद फिर उस पर सियासत शुरू हो गयी है। मलिक के आरोपों को लेकर कांग्रेस ने मोदी सरकार से पाँच सवाल किये हैं :-
मोदी सरकार ने सीआरपीएफ जवानों को एयरक्राफ्ट क्यों नहीं दिये?
ख़ुफ़िया इनपुट और जैश की धमकी को अनदेखा क्यों किया?
आतंकियों को भारी मात्रा में आरडीएक्स कैसे मिला? पुलवामा हमले की जाँच कहाँ तक पहुँची?
एनएसए अजित डोवल और तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह की क्या ज़िम्मेदारी तय की गयी?
पुलवामा हमले के बाद संवैधानिक पद पर बैठे गवर्नर को प्रधानमंत्री मोदी ने ‘चुप रहने’ की धमकी क्यों दी?
“पुलवामा हमले के समय सैनिकों को आवश्यक उपकरण और विमान उपलब्ध नहीं कराये गये थे, इसलिए उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी। जब सत्यपाल मलिक ने देश के एक बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति से इस बारे में बात की, तो उन्हें इस बारे में बात नहीं करने के लिए कहा गया। देश के सैनिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है और अगर सरकार सैनिकों की सुरक्षा नहीं करने का स्टैंड ले रही है, तो हम सभी को यह स्टैंड लेना होगा कि सरकार को सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है।’’
शरद पवार
एनसीपी प्रमुख
“जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल ने इस डर के समय में बहुत साहस दिखाया है और पूरा देश उनके साथ है।’’
अरविंद केजरीवाल
मुख्यमंत्री, दिल्ली
“आपको उनसे (मलिक से) यह भी पूछना चाहिए कि उनको ये सारी बातें हमारा साथ छोडऩे के बाद ही क्यों याद आ रही हैं? उनकी अंतरात्मा उस वक़्त क्यों जागृत नहीं होती, जब लोग सत्ता में होते हैं? मलिक की विश्वसनीयता पर जनता को सोचना चाहिए। सत्यपाल मलिक की बात सही है, तो वे गवर्नर रहते हुए चुप क्यों रहे? गवर्नर रहते हुए ही इस विषय पर बोलना चाहिए था। जो उन्होंने कहा, ये सब सार्वजनिक चर्चा के विषय नहीं हैं।’’
अमित शाह
गृह मंत्री
“यह (हमला) एक धक्का था। हमले के पीछे ख़ुफ़िया विफलता के लिए एनएसए को भी उनके हिस्से का दोष मिलना चाहिए। क़ाफ़िले को ऐसे राजमार्ग से नहीं जाना चाहिए था, जो पाकिस्तान सीमा के इतने क़रीब हो। सैनिकों ने हवाई यात्रा की होती, तो जानमाल के नुक़सान को टाला जा सकता था। जिस क्षेत्र में पुलवामा आतंकी हमला हुआ था, वह हमेशा एक बहुत ही जोखिम भरा क्षेत्र रहा है। यह एक ग़लती है, जिससे सरकार अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश कर रही है। विफलता का कोई दावेदार नहीं होता है।’’
जनरल (सेवानिवृत्त)
शंकर रॉय चौधरी
पूर्व आर्मी चीफ
“प्रधानमंत्री मोदी को भ्रष्टाचार से कोई ख़ास नफ़रत नहीं है। अगस्त 2020 में मुझे गोवा से हटाकर मेघालय इसलिए भेजा गया था, क्योंकि मैंने वहाँ भ्रष्टाचार को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को प्रदेश सरकार की ओर से कई मामलों को नज़रअंदाज़ किये जाने वाले बातें बतायी थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कश्मीर के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं होता। प्रधानमंत्री कश्मीर को लेकर ग़फ़लत में हैं। फरवरी, 2019 में पुलवामा में जो कुछ हुआ था, उसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय की बहुत बड़ी ग़लती थी। मैंने केंद्र सरकार से सीआरपीएफ जवानों के लिए विमान माँगा था; लेकिन गृह मंत्रालय ने इससे इनकार कर दिया, जिसके बाद सीआरपीएफ के जवानों को सडक़ मार्ग से भेजा गया। सडक़ की पहले जाँच पड़ताल नहीं की गयी। इसी का नतीजा है कि पुलवामा हमला हुआ। हमले के तुरन्त बाद प्रधानमंत्री मोदी से मेरी फोन पर बातचीत हुई थी और इस मामले को लेकर ज़्यादा नहीं बोलने की मुझे हिदायत दी गयी थी। अजित डोवल ने भी मुझे पुलवामा हमले पर चुप रहने को कहा था।’
सत्यपाल मलिक
पूर्व राज्यपाल
“सत्यपाल मलिक जी ने जो कहा, वह डरावना है। केंद्र सरकार ने केवल मतदाताओं के ध्रुवीकरण और नक़ली राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने के लिए सीआरपीएफ जवानों की सुरक्षा की अनदेखी की। हमने 2019 में भी इस मुद्दे को उठाया था। हालाँकि आज सच्चाई सामने आ गयी है।’’
प्रयागराज के माफ़िया, नेता अतीक अहमद एवं उसके भाई अशरफ़ की हत्या पर चर्चा, बहस एवं विरोध का बाज़ार गर्म है। इस हत्या को लेकर विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश के बीच तगड़ी नोकझोंक हो चुकी है। योगी के मंत्री धर्मपाल सिंह विपक्ष पर अतीक एवं अशरफ़ की हत्या का आरोप लगा चुके हैं। स्पष्ट है उत्तर प्रदेश में विपक्ष का तात्पर्य समाजवादी पार्टी है। मगर प्रश्न यह है कि अगर ऐसा ही है, तो फिर अतीक अहमद के बेटे असद को क्यों मार दिया गया? उसे अतीक के दूसरे बेटों की तरह जेल में रखा जा सकता था। क्या यह अतीक एवं उसके परिवार में दहशत फैलाने के लिए किया गया?
वास्तविकता यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वालों के घर पर बुलडोजर चलने से लेकर माफ़िया को मिट्टी में मिला देने तक की घटनाएँ इन दिनों उत्तर प्रदेश का एक नया चलन बन चुकी हैं। क़ानून व्यवस्था मानो मुख्यमंत्री योगी ने अपने हाथ में ले रखी है। न्यायालय हैं, मगर केवल अपराधियों की उपस्थिति दर्ज करवाने एवं उन्हें दिखावे के लिए दण्ड दिलाने हेतु। यह पुलिस कभी एनकाउंटर करने में अग्रणी भूमिका निभा रही है, तो कभी अपराधियों की हत्या की तमाशबीन बनी दिखायी दे रही है।
इधर, सर्वोच्च न्यायालय दायर याचिका में कहा गया है कि 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश में पुलिस ने 183 मुठभेड़ों को अंजाम दिया है, जिसकी जाँच होनी चाहिए। पुलिस की ऐसी हरकतें लोकतंत्र तथा क़ानून के शासन के लिए गम्भीर $खतरा हैं। न्यायालय ने योगी सरकार से अतीक-अशरफ़ मामले में लापरवाही को लेकर प्रश्न किये हैं। इससे पहले न्यायालय ने सरकार से कहा था कि भारत जैसे धर्मनिर्पेक्ष देश में धर्म के आधार पर हेट क्राइम की कोई जगह नहीं है।
मुठभेड़ में एनकाउंटर
अतीक-अशरफ़ की हत्या से पहले ही अतीक के बेटे असद की पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई। इस एनकाउंटर में असद का एक साथी उस्मान भी मारा गया। इससे पहले अतीक गैंग के दो अन्य सदस्य मोहम्मद ग़ुलाम तथा अरबाज़ भी एनकाउंटर में मारे गये थे। अभी पुलिस को अतीक की गैंग के दो शातिर अपराधियों गुड्डू मुस्लिम तथा साबिर की तलाश है।
अपराधियों ने अपराधियों को मारा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भले ही उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश तथा कथित राम राज्य के तमगों से स्वयं ही नवाज़ रखा हो, मगर सच यही है कि उत्तर प्रदेश अपराध में आज भी अग्रणी प्रदेश बना हुआ है। स्वयं योगी आदित्यनाथ के मंत्रीमंडल में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों तथा नेताओं की भरमार है। मुख्यमंत्री बनने से पहले योगी आदित्यनाथ पर भी कई आपराधिक मुक़दमे चलते रहे हैं। गोरखधाम मठ भूमि विवाद में उन पर हत्या तक के आरोप लग चुके हैं। उनके कई निकटतम नेता आपराधिक आरोपों से घिरे हुए हैं। उनके कई मंत्रियों तथा नेताओं पर मुक़दमे दर्ज हैं।
माफ़िया अतीक अहमद तथा उसके भाई अशरफ़ के हत्याकांड को जिस प्रकार से अंजाम दिया गया, उससे प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है। मगर उत्तर यहाँ स्पष्ट है कि यह हर स्वरूप में अपराधियों से अपराधियों की हत्या का मामला है। अतीक तथा अशरफ़ की हत्या के बाद अपराधी जय श्रीराम के नारे लगाते रहे। ऐसा लगा कि वे इन माफ़िया को मारकर भागना नहीं चाहते थे। पुलिस ने आसानी से इन्हें पकड़ लिया। सनी सिंह, अरुण मौर्य, लवलेश तिवारी नाम के जिन तीन युवकों ने अतीक अहमद तथा अशरफ़ की हत्या की, उनकी भी आपराधिक पृष्ठभूमि है। इस हत्याकांड में अपराधियों ने इंसास पिस्तौल का इस्तेमाल किया था, जो कि दुर्लभ है तथा विदेशी है। उनके साथ दो और अपराधी बताये जाते हैं। सभी अपराधी बड़े प्रसन्न बताए जाते हैं, जिससे कई प्रश्न खड़े होते हैं। पहला तो यही कि कहीं इन अपराधियों के सिर पर कोई राजनीतिक हाथ तो नहीं। इस समय सभी अपराधी जेल में हैं।
अतीक का आपराधिक इतिहास
अतीक का जन्म उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में 10 अगस्त, 1962 को फ़िरोज़ के घर हुआ, जो इलाहाबाद रेलवे स्टेशन (अब प्रयागराज) क्षेत्र में तांगा चलाते थे। कोई 43 साल पहले 17 साल की उम्र में अतीक ने एक हत्या करके अपराध की दुनिया में क़दम रखा। धीरे-धीरे अतीक का भय क्षेत्र में फैल गया और उसके साथ उसका भाई अशरफ़ भी अपराध की दुनिया में कूद गया। फिर पत्नी, फिर बेटे भी। इस गैंग का हिस्सा गुड्डू मुस्लिम भी बना। अतीक विरुद्ध 102 मुक़दमे दर्ज हुए। अशरफ़ के विरुद्ध 54 मुक़दमे दर्ज हुए। अतीक के कई गुर्गों पर भी दर्ज़नों मुक़दमे दर्ज हुए। अशरफ़ का हाल यह था कि पुलिस उसे तथा उसके गुर्गों को छूने से भी डरती थी। अतीक जब राजनीति में आया, तो उसका एक रुतबा क्षेत्र में स्थापित हो गया।
राजनीतिक इतिहास
अतीक ने पहला चुनाव निर्दलीय इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से 1989 में लड़ा एवं जीत प्राप्त की। फिर इसी सीट 1991 एवं 1993 में भी निर्दलीय रूप से चुनाव जीता। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने 1996 में टिकट दिया, जिस पर अतीक ने जीत प्राप्त की। तीन साल में अतीक ने सपा छोड़ दी तथा 1999 में अपना दल पार्टी के टिकट पर प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा, जिसमें उसे हार मिली। मगर 2002 में अपना दल के ही टिकट पर इलाहाबाद की पश्चिम सीट पर पुन: जीत प्राप्त की। 2003 में सपा की प्रदेश में सरकार बनी, तो अतीक का पुन: प्रवेश उसमें हो गया। 2004 में फूलपुर सीट से उसने सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता।
मायावती ने कसी थी नकेल
बसपा की 2007 में सरकार बन गयी, जिसकी मुखिया मायावती मुख्यमंत्री बनीं। मायावती ने अतीक की नाक में नकेल डाल दी थी। उसके विरुद्ध एक दर्ज़न के लगभग मुक़दमे दर्ज किये गये। 20,000 का इनाम घोषित किया गया। मायावती सरकार की सख़्ती देख अतीक ने उत्तर प्रदेश छोड़ दिया। मगर पुलिस ने इतना दबाव बना दिया कि अतीक को दिल्ली में गिरफ़्तारी देनी पड़ी। मायावती सरकार ने अतीक की करोड़ों की सम्पत्तियाँ कुर्क कीं, कई अवैध क़ब्ज़े छुड़वाये। मायावती ने अतीक की ही तरह राजा भैया के साथ भी यही किया। मगर 2012 में प्रदेश में पुन: समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तथा इस बार अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। जनता को विश्वास था कि अखिलेश गुंडों का साथ नहीं देंगे, मगर अतीक को जमानत मिल गयी तथा राजा भैया को भी मंत्री बनाया गया।
योगी ने की सबसे बड़ी कार्रवाई
मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सरकार दो के दूसरे कार्यकाल के दूसरे वर्ष तक अर्थात् अब तक अतीक तथा उसके गैंग पर बड़ी कार्रवाई हुई। अतीक अहमद तथा उसके परिवार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत का कारण बनी अधिवक्ता उमेश पाल की हत्या, जो कि प्रयागराज में 24 फरवरी को हुई। 25 फरवरी को ही उमेश पाल की पत्नी ने अतीक, अशरफ़, शाइस्ता, असद, गुड्डू मुस्लिम, उस्मान समेत लगभग एक दर्ज़न से अधिक लोगों के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करायी। मामले में कार्रवाई आगे बढ़ी, तो अतीक परिवार की अन्य आपराधिक फाइलें खुलती गयीं।
अब तक अतीक परिवार एवं उसके गुर्गों की कुल 1168 करोड़ रुपये की सम्पत्तियों पर कार्रवाई की जा चुकी है। गैंगस्टर एक्ट के तहत लगभग 417 करोड़ रुपये की सम्पत्ति कुर्क की जा चुकी है। 751.52 करोड़ रुपये की सम्पत्तियों को अतीक के अवैध क़ब्ज़े से मुक्त करा दिया गया है। अतीक के कई पड़ोसी तथा कुछ रिश्तेदार आरोप लगा चुके हैं कि उनकी सम्पत्ति तक पर अतीक ने अवैध क़ब्ज़ा किया था। मुख़्तार अंसारी पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। प्रश्न यह है कि राजा भैया भी एक माफ़िया है, मगर उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?
पाकिस्तानी रिश्ता
जब अतीक-अशरफ़ को पुलिस पकड़ लिया, उसके उपरांत यह समाचार चला कि अतीक तथा अशरफ़ के पाकिस्तान से तार जुड़े हैं। उनके पास से दो पिस्तौल तथा पाँच पाकिस्तानी कारतूस सहित कुल 58 कारतूस बरामद हुए। टीवी चैनलों पर उनके एक पाकिस्तानी आतंकी संगठन से रिश्ते भी तय किये गये। मगर इस बात के कोई पुख़्ता सुबूत नहीं मिले हैं कि अतीक तथा अशरफ़ के पाकिस्तान से किसी भी प्रकार के रिश्ते थे। प्रश्न यह है कि अब जब अतीक-अशरफ़ नहीं रहे, इस मामले में चल रही जाँच का क्या होगा?
माफ़ियाओं की पत्नियों की तलाश
अतीक तथा अशरफ़ की मृत्यु के बाद अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन तथा अशरफ़ की पत्नी जैनब की तलाश उत्तर प्रदेश पुलिस लगातार कर रही है। इन दोनों के बारे में कई तरह की अफ़वाहें भी उड़ी हैं। जैनब के ज़हर खाने की अफ़वाह भी उड़ी थी, मगर अभी दोनों जेठानी-देवरानी का कुछ पता नहीं है। इनके बारे में कभी कुछ समाचार सुर्ख़ियाँ बनकर छपते हैं, तो कभी कुछ समाचार। इन्हें छुपाने तथा भगाने वालों पर भी कार्रवाई की जा रही है। मुख़्तार अंसारी की पत्नी अफ़शां अंसारी की भी पुलिस तलाश कर रही है।
शाइस्ता के चलते नष्ट हुआ परिवार
अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन एक भले परिवार में पैदा हुई, मगर उसने अतीक की राह पकड़ी तथा अपराध को गले गलाया। 1986 में अतीक अहमद तथा शाइस्ता परवीन का निकाह हुआ। इसके पहले शाइस्ता का अपराध से कोई नाता नहीं था। अतीक ने शाइस्ता को अपराध के गुर सिखाये। स्थिति यह हुई कि मायावती शासन में जब अतीक को जेल की सज़ा हुई, तब उसकी आपराधिक सत्ता शाइस्ता ने सँभाली।
अतीक को भी शाइस्ता के अतिरिक्त किसी पर इतना भरोसा नहीं था। अतीक की अनुपस्थिति में शाइस्ता के निर्णय गैंग के लिए मान्य होते थे। पैसों के लेन-देन भी वही देखती थी। उमेश पाल हत्याकांड के दौरान तो अतीक तथा अशरफ़ जेल में थे। राजू पाल हत्याकांड का इकलौता गवाह अधिवक्ता उमेश पाल था। इसी के चलते उमेश पाल की हत्या हुई। यही हत्या अतीक तथा उसके पूरे परिवार के लिए काल बन गयी। अतीक-अशरफ़ की हत्या में कई पुलिसकर्मी नौकरी गँवा वैठे। वैसे तो अतीक तथा उसके परिवार के आपराधिक साम्राज्य के आरम्भ से अन्त तक को लेकर कई किताबें लिखी जा सकती हैं, मगर यहाँ इतना ही।