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राजनीति की अंतिम रथयात्रा

काली छाया लगातार अपना विस्तार बढ़ाती जा रही है और लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन का सूरज अस्ताचल के पार लपकता देखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी दुनिया से कटे कुछ-कुछ एकांतवासियों जैसा व्यवहार कर रहे 81 वर्षीय आडवाणी निश्चित तौर पर पिछले साल छपी अपनी आत्मकथा मेरा देश मेरा जीवन के उन पन्नों को उलट-पुलट रहे होंगे.

मुहम्मद अली जिन्ना पर मेरी टिप्पणी पर पार्टी में जो उथल-पुथल मची उसका जिक्र मैंने अपनी जिंदगी के सबसे दुखद समय के रूप में किया है. मेरे खुद के सहयोगियों ने उस समय मेरा साथ नहीं दिया

जिनको उन्होंने चुनावों में हार [2004], पार्टी में उथल-पुथल नाम दिया था. आत्मकथा का ये अध्याय काफी बेबाकी से लिखा गया है और इसमें चुनावों के बाद भारतीय राजनीति के इस महायोद्धा की मानसिक स्थिति का विस्तार से वर्णन है. वे लिखते हैं: ‘हम 2004 का संसदीय चुनाव क्यों हारे?..ये सवाल मुझे और मेरे साथियों को काफी समय तक मथता रहा. हार का कड़वा स्वाद मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है. बल्कि मेरे जीवन के शुरुआती दशकों में हार एक नियम और जीत एक अपवाद जैसी हुआ करती थी. इसने और किसी भी परिस्थिति में अपना धैर्य और खुद पर नियंत्रण न खोने के मेरे स्वाभाविक गुण ने मेरे भीतर चुनाव के परिणामों के प्रति एक किस्म का दार्शनिक दृष्टिकोण विकसित कर दिया था – हार से हताश और जीत में अतिउत्साही न होने का का गुण. इसके बावजूद 2004 के परिणामों ने मुझ पर पिछली असफलताओं से कहीं अधिक गहरा प्रभाव डाला..’

इस दार्शनिक दृष्टिकोण ने उनकी आगे की यात्रा जारी रखने में थोड़ी मदद तो की मगर उस समय आडवाणी ये नहीं जानते थे कि उन पर बहुत जल्दी ही इससे भी गहरा प्रभाव पड़ने वाला है. अगले साल ही वे पाकिस्तान की यात्रा पर गए और वहां उन्होंने कराची में मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर उनकी प्रशंसा से भरा एक भाषण दे डाला.

इस बारे में उनकी किताब में जो लिखा है वो एक बार फिर से हमें उस मनोदशा की झलक  दे सकता है जिससे अमेरिका की तर्ज पर लड़े गए चुनावी समर में हार के बाद भारतीय राजनीति का ये पुरोधा गुजर रहा होगा. 2005 में उनकी पार्टी खुलेआम उनकी खून की प्यासी हो रही थी और उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया. ये वही पार्टी थी जिसे अपने खून से सींचा था और अकेले ही 1984 में दो सीटों से 1999 में 182 तक लेके गए थे. जिन्ना विवाद पर उन्होंने लिखा – ‘मेरे पाकिस्तान में रहते ही उथल-पुथल होना शुरू हो गई..इसके बाद की घटनाओं ने पार्टी की एकजुटता पर अभूतपूर्व प्रभाव डाला और उसके करोड़ों समर्थकों के मन में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी. इससे मुझे बहुत गहरे और न खत्म होने वाले दर्द का एहसास हुआ. ये निश्चित ही मेरे जीवन में सबसे ज्यादा दुख देने वाला समय था, उससे भी ज्यादा दुखदायी जब मुझ पर 1996 में हवाला मामले में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे. उस समय मेरे मन में इसलिए शांति थी क्योंकि मेरी पार्टी दृढ़ता से मेरे साथ खड़ी हुई थी..इसके विपरीत 2005 में मेरी पाकिस्तान यात्रा पर उठे विवाद के दौरान पार्टी के मेरे कई सहयोगियों ने मेरा साथ छोड़ दिया था..’

‘2005 के मध्य में एक दिन मुझसे पार्टी की अध्यक्षता छोड़ देने के लिए कह दिया गया..ये सब मुझे अत्यधिक दुख देने वाला था. मैं दुविधा की स्थिति में था..मेरी दुखद स्थिति ने मुझे कई बार ये सोचने के लिए मजबूर किया कि क्या मुझे अब शांति से पारिवारिक जीवन का आनंद नहीं उठाना   चाहिए..मेरी मानसिक स्थिति अनिश्चितता से जूझ रहे अर्जुन से अलग नही थी. किंतु जब भी मेरे दिमाग में पलायनवादी विचार आते तो मुझे भगवान कृष्ण का स्मरण हो आता..’

मैं कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी छवि को बदलकर एक उदारवादी, ज्यादा लचीली सोच रखने वाली छवि में तब्दील करना चाहता था

2009 के चुनावों ने आडवाणी को एक बार फिर से उसी स्थिति में ला खड़ा किया है. मगर इस बार कोई भी उनसे ये नहीं कह रहा है कि उन्हें नेता विपक्ष के पद को संभाले रहना चाहिए – उन्हें सिर्फ इसलिए थोड़ा ठहरने के लिए बोला गया है ताकि बिना किसी अंदरूनी झगड़े को दावत दिए आसानी से सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी की जा सके.

इसलिए ऐसे में जब आडवाणी अपने भविष्य के बारे में सोचने के साथ-सात अपने चिर-परिचित दार्शनिक दृष्टिकोण से 2009 के चुनावों में पार्टी को मिली पराजय का विश्लेषण करने में लगे हों वे ये भी निर्णय ले सकते हैं कि क्यों न अपनी आत्मकथा मेरा देश मेरा जीवन में एक अध्याय और जोड़ दिया जाए. अगर 2004 की हार पर लिखे अध्याय का शीर्षक चुनावों में हार, पार्टी में उथल-पुथल था तो इस बार की हार के अध्याय का शीर्षक होगा चुनावों में करारी हार, पार्टी में घमासान. हो सकता है उनकी पार्टी के ही कुछ लोग इसे शायद मैं ये चुनाव क्यों हारा का नाम देना चाहें मगर वह शायद ऐसा लिखा होगा.

‘2004 में चुनावी परिणामों को निर्धारित करने वाला राष्ट्रीय महत्व का कोई अकेला कारक नहीं था. बल्कि कई चीजों ने मिलकर उस समय मतदाताओं को प्रभावित किया था. भारत उदय और ‘फील गुड फैक्टर’ जैसा वाक्यों ने भी हमें नुकसान पहुंचाया. इस बार पार्टी, संघ परिवार और हमारे गठबंधन के दूसरे सहयोगियों ने मुझ पर अपना विश्वास जताया और मुझे अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. मुझे, मेरे ऊपर उनके इस विश्वास और इस कार्य की विशालता का एहसास था और मैंने बड़ी विनम्रता से इस चुनौती को स्वीकार करके इस विश्वास पर खरा उतरने के प्रयत्न करने आरंभ कर दिए. मैं चिलचिलाती धूप में बिना थके, बिना रुके एक के बाद एक चुनावी सभाएं करने लगा.

ये देख कर मुझे गहरा दुख होता है कि पिछली बार की 138 सीटों के मुकाबले इस बार भाजपा को लोकसभा की सिर्फ 116 सीटों से ही संतोष करना पड़ा और मुझे पता है कि मेरे कई वरिष्ठ सहयोगी मुझ पर राष्ट्रपति प्रणाली के लोकतंत्र सरीखा चुनावी अभियान चलाने का और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर हमले करने के आरोप लगा रहे हैं. मगर ये सत्य है कि परमाणु करार के मसले पर अपनी सरकार की बाजी लगाने से पहले के साढ़े चार सालों तक मनमोहन सिंह एक मनोनीत प्रधानमंत्री भर थे जो अपने हर छोटे-बड़े निर्णय के लिए 10 जनपथ की ओर निहारा करते थे. तो अगर मैंने उन्हें कमजोर कह दिया तो इसमें गलत ही क्या है?

बहुतों को मेरा चुनावी अभियान अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के जैसा लगा मगर हमारी हार के मूलभूत कारण हमारी देश में भौगौलिक उपस्थिति का सीमित होना है. भाजपा का कई महत्वपूर्ण राज्यों जैसे कि पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में कोई वजूद ही नहीं है. चंद्रबाबू नायडू के हमसे विलगाव का कारण भी यही रहा.

पार्टी में गुपचुप ऐसी चर्चाएं भी चल रही हैं कि मैं उम्र में काफी बड़ा होने के कारण आज के युवा भारत के तौर-तरीकों से सामंजस्य बिठाने के योग्य नहीं हूं. मुझे देश भर से कार्यकर्ताओं और समर्थकों के पत्र और ईमेल मिल रहे हैं जिनमें मेरे प्रति सहानुभूति रखने वाली तरह-तरह की बातें हैं लेकिन ये एक सच्चाई है कि बिना किसी संशय के मतदाता इस बार स्थायी सरकार चाहते थे. वे एक ऐसी सरकार नहीं बनाना चाहते थे जिसमें जरा-जरा सी बात पर भी उठा-पटक होती रहे. इसलिए काफी सोच-विचार के बाद मुझे लगता है कि कांग्रेस के 145 से 206 सीटों पर पहुंचने के पीछे मतदाताओं की स्थायित्व की चाह और उसकी पूरे देश में उपस्थिति रही.

मुहम्मद अली जिन्ना पर मेरी टिप्पणी पर पार्टी में जो उथल-पुथल मची उसका जिक्र मैंने अपनी जिंदगी के सबसे दुखद समय के रूप में किया है. मेरे खुद के सहयोगियों ने उस समय मेरा साथ नहीं दिया. मगर वे उस समय ये समझने में असफल रहे कि भाजपा के लिए मेरी उस टिप्पणी का बहुत बड़ा राजनीतिक महत्व था. मैं इसे, राम मंदिर अभियान के बाद के दौर में अपनी हार से तारतम्य बिठाने के लिए जद्दोजहद करती एक पार्टी के जीवन में बदलाव का मोड़ बनाना चाहता था.

उस समय तक ये साफ हो चुका था कि वाजपेयीजी अब सिर्फ हमारे संरक्षक और दिग्दर्शक का काम करने वाले हैं और ऐसी स्थिति में मुझे और पार्टी को एक नयी छवि की आवश्यकता है, एक ऐसी छवि जो आज के भारत से मेल खाती हो. मैं कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी छवि को बदलकर एक उदारवादी, ज्यादा लचीली सोच रखने वाली छवि में तब्दील करना चाहता था. पार्टी में किसी को इस बात से कोई शिकायत नहीं थी कि वाजपेयी जी स्वभावत: अपने में ही और अपने परिवार के साथ खामोशी में समय बिताने और अकेले में कविताएं लिखने के शौकीन थे. मगर मैं ये जानकर हैरान हूं कि मेरे सहयोगी आज ये कह रहे हैं कि मैं अपनी पार्टी की कीमत पर अपने परिवार के साथ ज्यादा समय बिताता था. और ये भी कि मेरे कुछ विश्वस्त साथियों ने सुधींद्र कुलकर्णी के नेतृत्व में मेरे लिए एक समानांतर प्रचार अभियान चलाया जबकि इसके लिए पहले से मेरे सहयोगी अरुण जेतली के नेतृत्व वाली अभियान कमेटी मौजूद थी. आलोचना इस बात की हो रही है कि मैंने कुलकर्णी की टीम, जिसमें ब्लॉगर्स, तकनीकी विशेषज्ञ और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स शामिल थे, की ज्यादा सुनी. मगर यहां विरोधाभास साफ झलकता है. मेरे बारे में कहा जा रहा है कि मैं आज के भारत से तालमेल बिठाने के योग्य नहीं हूं और यहां मेरी उसी भारत के नुमाइंदों का साथ देने और लेने के लिए आलोचना की जा रही है.

पिछली साल के विधानसभा चुनावों में दिल्ली और राजस्थान में मिली हार के बाद पूरी पार्टी को बैठकर गंभीर विचार-विमर्श करना चाहिए था. ये सच है कि मुंबई पर हुए आतंकी हमलों से पहले हम प्रगति की राह पर अग्रसर थे. इसके बाद आर्थिक मंदी का दौर शुरू हो गया और जहां हम आतंकवाद के मुद्दे पर जोर दे रहे थे वहीं लोग अब स्थायित्व की चाह रखने लगे थे.

2005 के विपरीत, जब मेरी मानसिक स्थिति अनिश्चितता से जूझ रहे अर्जुन से अलग नही थी, इस बार मैंने तुरंत ही अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफे का प्रस्ताव रख दिया. मगर पार्टी में खींचतान के चलते ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा है.

मुझे नेता विपक्ष बनने से बिल्कुल ही इनकार कर देना चाहिए या अपने सहयोगियों की बात मान कर इस पद को स्वीकार कर लेना चाहिए, मैं इस बात को लेकर दुविधा में हूं. मुझे इस तरह के पदों के साथ मिलने वाले लाभों और ताकत ने कभी इतना आकर्षित नहीं किया. मैं जल्दी ही ये जिम्मेदारी किसी और को सौंप दूंगा.’                          

ईलम के स्वप्न का उत्थान और पतन

मुझे आज भी वह लम्हा अच्छी तरह से याद है जब मैंने पहली बार उससे हाथ मिलाया था. उसका हाथ मुलायम था और पकड़ नाजुक जिसमें कुछ हिचकिचाहट भी झलक रही थी. ये मुलाकात मद्रास में हुई थी. इस मुलाकात में उसने जाफना के तमिल मेयर और बाद में 13 श्रीलंकाई सैनिकों की हत्या की उस घटना की जिम्मेदारी ली थी जिसके बाद 1983 में पूरे श्रीलंका में तमिलविरोधी दंगे भड़क उठे थे.ये शख्स था वेल्लुपिल्लई प्रभाकरन जिसका हाथ मिलाने का नाजुक अंदाज उसकी आवाज की कोमलता से बखूबी मेल खाता था.

प्रभाकरन ने शुरुआत से ही एक दोहरी रणनीति अपनाई. इसके तहत एक तरफ उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष में एक राजनीतिक अभियान चलाया और दूसरी ओर आतंकी कार्रवाइयों द्वारा अर्थव्यवस्था और राज्य सत्ता को कमजोर किया

प्रभाकरन से जुड़ी एक और स्मृति तब की है जब मैंने ईलम पर दिए गए उसके एक लंबे भाषण के खत्म होने के बाद उसे पिता बनने की बधाई दी थी. उसके चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभर आए और कुछ क्षणों के लिए उसने चुप्पी साध ली. थोड़ी ही देर में ऐसा लग रहा था मानो ईलम यानी एक अलग देश के अपने सपने की अंतहीन सी यात्रा में उसकी अब कोई दिलचस्पी ही नही रह गई है. उसमें पहले से कम उत्साह नजर आने लगा और लग रहा था जैसे वह अपने में ही खो सा गया हो. फिर वह अचानक ही कमरे से बाहर चला गया और उसका खास सिपहसालार एंटन बालसिंघम सतर्कता से मुझसे पूछताछ करने लगा कि प्रभाकरन के परिवार में आए नए मेहमान के बारे में मुझे कहां से पता चला और इस बारे में मुझे और क्या-क्या जानकारी है.

हालांकि श्रीलंका में 25 सालों के दौरान मेरे तरह-तरह के अनुभव रहे और इनके अलावा भी प्रभाकरन से मेरी कुछ और मुलाकातें हुईं मगर ये दो वाकये लिट्टे के उस मुखिया के व्यक्तित्व को सबसे बढ़िया तरीके से दर्शाते हैं जो एक अलग तमिल देश के अपने सपने को साकार करने के काफी नजदीक पहुंच गया था. प्रभाकरन से जुड़ी ये दोनों यादें उसके व्यक्तित्व की दो खासियतों को बताती हैं. पहली ये कि सब के मन में अपनी असल क्षमताओं के उलट धारणाएं बनाओ – गौरतलब है कि छल प्रभाकरन की हर रणनीति के केंद्र में रहा है. दूसरी ये कि अपनी परछाई पर भी भरोसा मत करो. प्रभाकरन के व्यवहार में उसकी वहमी सोच की झलक मिलती है. इन खासियतों ने प्रभाकरन को शिखर पर पहुंचाया और यही दुनिया के सबसे क्रूर आतंकवादी संगठन के नेता के पतन और मौत का कारण भी बनीं.

1987 में जब मैं भारतीय शांतिरक्षक बल (आईपीकेएफ) या शांति सेना के खिलाफ लिट्टे की लड़ाई की रिपोर्टिग कर रहा था, उस दौरान एक बार लिट्टे लड़ाकों ने शांति सैनिकों पर घात लगाकर हमला किया. इस घटना की तस्वीरें लेने की कोशिश में मेरी नजर एक ऐसे सैनिक पर पड़ी जिसके सिर में गोली लगी थी. उसके निर्जीव शरीर से बहता खून जाफना की मिट्टी में मिल रहा था. इस दृश्य को देखकर मैं जड़ हो गया. मेरे मन में प्रभाकरन से हुई मेरी पहली मुलाकात के पल कौंध गये.

प्रभाकरन ने शुरुआत से ही एक दोहरी रणनीति अपनाई. इसके तहत एक तरफ उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष में एक राजनीतिक अभियान चलाया और दूसरी ओर आतंकी कार्रवाइयों द्वारा अर्थव्यवस्था और राज्य सत्ता को कमजोर किया. अपनी चालाकी और नेतृत्व के बूते वह इस संघर्ष को 25 साल तक खींचने में सफल रहा.

प्रचार का हथियार

अगर प्रचार से लड़ाइयां जीती जा सकती हैं तो श्रीलंका को दूसरा लेबनान बनने से बचाने वाली भारतीय शांति सेना प्रभाकरन के इसी घातक प्रचाररूपी हथियार का शिकार बन गई. मीडिया की असल ताकत का अहसास दुनिया को पिछले कुछ समय से हो रहा है मगर प्रभाकरन को दो दशक पहले ही इसका बखूबी अहसास था और वह बिना शक अपने हिसाब से मीडिया को साधने की कला में पारंगत था. उसकी गुरिल्ला रणनीति के केंद्र में एक भरोसेमंद और शक्तिशाली संचार नेटवर्क और उससे सहानुभूति रखने वाला मीडिया था. 1980 के दशक के दौरान मद्रास में भारत सरकार के मेहमान के तौर पर वह अपनी मनमर्जी से चुनिंदा प्रकाशनों को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देता था और शुरुआत से ही उसके लिए मीडिया का समर्थन जीतना कोई मुश्किल काम नहीं था, खासकर पश्चिमी मीडिया का. उसने बहुत ही चालाकी से शोषित समुदाय का कार्ड खेला और इस काम में उसे अपने सलाहकार एंटन बालसिंघम, ऑस्ट्रेलियाई मूल की उसकी पत्नी एडेल बालसिंघम और लंदन स्थित लिट्टे के मीडिया मुख्यालय से जबर्दस्त मदद मिली.

एक हफ्ते बाद कोलंबो पहुंचकर मैंने जब इस खास खबर को अपने अखबार तक पहुंचाने के लिए फोन लगाया तो ये जानकर मुझे निराशा और हैरत हुई कि मीडिया में ये घटना पहले ही सुर्खियां बन चुकी थीनवंबर 1986 में बेंगलौर में सार्क सम्मेलन हुआ. इसकी पूर्वसंध्या पर पुलिस ने तमिलनाडु से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहे ईलम गुटों पर छापा मारा और अत्याधुनिक हथियार और संचार उपकरण जब्त कर लिए. ऐसा मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन के निर्देश पर किया गया था. प्रभाकरन मद्रास में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गया. उसने कहा कि वह महात्मा गांधी की तरह शांतिपूर्ण विरोध जताते हुए अपने उपकरणों को वापस करने की मांग कर रहा है. दिलचस्प बात ये है कि उसने रॉकेट लांचर, मिसाइल या एके 47 नहीं बल्कि उसके दो वायरलेस सेटों को फौरन वापस लौटाने की मांग की थी जो दुनिया से उसके संपर्क का जरिया थे. इस समय तक मीडिया उसके हिसाब से चलने लगा था और प्रभाकरन का महिमामंडन कर उसे भगवान बनाने की प्रक्रिया चल रही थी. आखिर में उसे उसकी हर चीज जूस से भरे एक गिलास के साथ लौटा दी गई जिसे पीकर उसने अपनी जीत की घोषणा की थी.

इसके तकरीबन एक साल बाद जाफना प्रायद्वीप में मेरे हाथ एक बड़ी खबर लगी. शांति सेना के एमआई-24 हेलीकॉप्टर्स ने लिट्टे के गढ़ छवाकच्छेरी पर हमला बोला था. मेरे चारों तरफ लोग मर रहे थे जिनमें से ज्यादातर निर्दोष आम नागरिक थे. मैं इस दौरान इस इलाके में मौजूद अकेला रिपोर्टर था. एक हफ्ते बाद कोलंबो पहुंचकर मैंने जब इस खास खबर को अपने अखबार तक पहुंचाने के लिए फोन लगाया तो ये जानकर मुझे निराशा और हैरत हुई कि मीडिया में ये घटना पहले ही सुर्खियां बन चुकी थी. प्रभाकरन इस मामले में मुझसे ज्यादा तेज साबित हुआ था. जंगल में स्थित उसके शिविरों में बिजली तक नहीं थी और अभी शवों की गिनती का काम भी पूरा नहीं हुआ था मगर इसके बावजूद उसके सिपहसालारों ने इस बमबारी की खबर लंदन स्थित अपने मीडिया मुख्यालय तक रेडियो के जरिए पहुंचा दी थी. वहां से हर बड़े अंतर्राष्ट्रीय अखबार को इस घटना पर एक टेलेक्स भेजा गया था. चूंकि असल तस्वीरें तो थी नहीं इसलिए यहां पर छल से काम लिया गया था. लिट्टे ने श्रीलंकाई सेना द्वारा छवाकच्छेरी हमले के सबूत के तौर पर एक दूसरी जगह वदामराई पर किए गए हमले के पुराने फोटो भेजे थे.

लिट्टे का ताकतवर संचार तंत्र हालात की रिपोर्ट रोज ही जाफना से लंदन के मीडिया मुख्यालय भेजता था जहां से इसे प्रेस विज्ञप्ति के तौर पर टेलेक्स और बाद में फैक्स और इंटरनेट के जरिए पश्चिमी देशों की सरकारों और वहां के अखबारों को भेज दिया जाता था. 1990 के दशक की शुरुआत तक लिट्टे का प्रचार मुख्य रूप से प्रकाशित सामग्री के द्वारा होता था. इस दौरान इस संगठन ने कई भाषाओं में रंगीन पुस्तिकाएं और पर्चे प्रकाशित करने पर काफी पैसा खर्च किया. ये सामग्री स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया व चुनिंदा सरकारी संगठनों को भेजी जाती थी.

संचार की आधुनिकतम तकनीकें सीखने के मामले में लिट्टे का कोई जवाब नहीं था और इसी वजह से ये संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतनी सुर्खियां बटोर सका. बावजूद इसके कि इसका ताल्लुक एक छोटे से दक्षिण एशियाई देश से था जिसका महत्व पश्चिमी जगत में  न के बराबर था और इसकी हिंसक गतिविधियां श्रीलंका और यदा-कदा भारत तक ही सीमित थीं.

अगर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद आतंकवाद से लड़ने वाले रणनीतिकारों का ध्यान श्रीलंका की तरफ भी गया तो इसकी एक वजह प्रभाकरन का विश्वव्यापी असर भी था. देखा जाता है कि आतंकी संगठन एक दूसरे की रणनीतियों से सीख लेते हुए उन्हें अपनाते रहते हैं. दुनिया भर के आतंकी संगठनों ने बंधक बनाने से लेकर आत्मघाती हमलों तक नए तरीकों की तेजी से नकल कर उन्हें अपनाया है. तालिबान का ही उदाहरण लीजिए जिसने बुनेर जिले में पाकिस्तानी सेना के हमले के खिलाफ आम नागरिकों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया.

सालों पहले जब किसी ने ओसामा का नाम भी नहीं सुना था प्रभाकरन गुरिल्ला लड़ाई के नये-नये तरीके विकसित कर रहा था. आत्मघाती हमला, आईईडी का इस्तेमाल, बच्चों के हाथों में बंदूकें पकड़ाना और मीडिया के मामले में अत्याधुनिक तकनीक से लैस होना आदि लिट्टे द्वारा अपनाए गए ऐसे तरीके थे जिनका बाद में दूसरे आतंकी संगठनों ने भी इस्तेमाल किया.

गिरगिट सा गुण

हालात को भांपते हुए प्रभाकरन वक्त के साथ बदलता रहा. उसकी यही खासियत इस संगठन को न सिर्फ जिंदा रखे रही बल्कि उसका लगातार विस्तार भी करती रही. उसकी जिंदगी में एक ही चीज स्थायी रही है और वह है इस द्वीप को दो भागों में बांटने की उसकी तीव्र महत्वाकांक्षा. तीस साल तक इस महत्वाकांक्षा को जिंदा रखने के लिए लगातार कुछ नया करना और तमिल समाज पर एक मजबूत पकड़ जरूरी थी और ऐसा करने के लिए प्रभाकरन ने अपनी सुविधानुसार हर तरह के तरीके अपनाए. इनमें से कुछ का संबंध धर्म से होता था तो कुछ का राजनीति से. उदाहरण के तौर पर 1980 के दशक में प्रभाकरन की पसंद मार्क्स हुआ करते थे. मगर बार-बार अपने सपनों के ईलम में एकदलीय समाजवादी सरकार बनाने की उसकी बात से जब लोग थोड़ा सशंकित होने लगे तो उसके ठिकाने पर लगा लेनिन का पोट्रेट तुरंत हटा लिया गया. इसके बाद उसकी बातचीत में मार्क्स का जिक्र तक नहीं होता था. अब प्रभाकरन ने दूसरों की विचारधारा को छोड़ दिया और अपने ही व्यक्तित्व के इर्दगिर्द एक आभामंडल रचना शुरू कर दिया. उसके प्रशंसक मीडिया ने उसके अनुयायियों जितने उत्साह से ही इस प्रक्रिया में उसका साथ दिया. प्रभाकरन किसी पौराणिक चरित्र के स्वरूप में परिवर्तित होने लगा था और उसकी बुद्धिमत्ता और वीरता की कहानियां तेजी से फैलने लगीं थी. जल्द ही कैडरों के लिए उसके नाम पर शपथ लेना, उसका जन्मदिन मनाना और उसके पोस्टर हर जगह लगाना जरूरी हो गया. एडेल ने नारीवाद के नाम पर संगठन में लड़कियों को भर्ती करने की परंपरा शुरू की. उसके शब्दों में – ‘दुनिया में कहीं भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को पूरी तरह से नहीं मिटाया जा सका है और तमिल समाज में भी ये मौजूद है. इसके बावजूद हमारे पुरुष कैडर, महिला कैडरों की उपलब्धियों के प्रति बेहद सम्मान और गर्व की भावना रखते हैं.’

प्रभाकरन बेहद चतुर था. उस पता था कि चारों तरफ फैली घबराहट और नाउम्मीदी के माहौल के चलते लड़कों और लड़कियों को आसानी से नफरत और मशीनगन का पाठ पढ़ाया जा सकता है

शहीद हुए अपने लड़ाकों की याद में स्मारक बनाकर उन्हें पूज्य बनाने की परंपरा प्रभाकरन ने हिंदू धर्म से सीखी. इन स्थलों पर किसी पवित्र या विशेष दिन लोग प्रार्थना करते और तरह-तरह की वस्तुएं अर्पित करते. पश्चिम की सैन्य परंपराओं से उसने सेना के निर्माण का मॉडल अपनाया. हॉलीवुड की एक्शन फिल्मों का इस्तेमाल उसने अपने लड़ाकों में जोश भरने के लिए तो किया ही साथ ही उनसे ये भी सीखा कि ऐसे बढ़िया आडियो-वीडियो प्रेजेंटेशन किस तरह बनाए जाते हैं जिनसे फायदा और सहानुभूति दोनों कमाए जा सकें.

मैं ही मैं

प्रभाकरन को प्रचार और अपनी छवि में छिपी ताकत का अंदाजा था और वह जानता था कि ये उसके जखीरे के सबसे घातक हथियार हैं. उसने ये सुनिश्चित किया कि संगठन में सबको पता हो कि इस हथियार का सबसे बढ़िया इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. उसके कैडर किसी बाहरी आदमी के साथ बात नहीं कर सकते थे और लिट्टे के नियंत्रण वाले क्षेत्र में लोग अपने घरों में सिर्फ एक ही तस्वीर लगा सकते थे जो कि प्रभाकरन की होती थी. गलियों में लगे लाउडस्पीकरों में या तो उसके भाषण बजते रहते थे या फिर ईलम से जुड़े गाने. जब भी मुझे बालसिंघम के साथ उसकी वातानुकूलित जीप में जाफना प्रायद्वीप के भ्रमण का प्रस्ताव मिलता तो इसका एक मतलब ये भी होता था कि ड्राइविंग सीट संभाल रही एडेल यात्रा के दौरान म्यूजिक प्लेयर में प्रभाकरन के भाषण का कैसेट लगा देंगी और मुझे वह सुनना ही होगा.

अलकायदा से सालों पहले प्रभाकरन ने कैलेंडर्स, पोस्टर्स, सीडी, डीवीडी, अखबार, मैगजीन, रेडियो और टीवी स्टेशन के जरिए प्रचार की कला में कुशलता हासिल कर ली थी. दिलचस्प ये भी है कि 1993 में जब इस उपमहाद्वीप के ज्यादातर लोगों को वेब शब्द के जिक्र से मकड़ी के जाले का ध्यान आता होगा तब लिट्टे अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के सर्वर पर अपनी वेबसाइट चला रहा था. ये वह दौर था जब राजीव गांधी की हत्या के बाद ज्यादातर मीडिया लिट्टे के खिलाफ हो गया था इसलिए संगठन के लिए ये नया माध्यम बहुत उपयोगी साबित हुआ. अप्रवासियों द्वारा वान्नी इलाके में चलाई जा रही एक कंप्यूटर अकेडमी ने ये सुनिश्चित किया कि लिट्टे नई-नई तकनीकों से हमेशा आगे रहे.

कम ही लोगों को मालूम होगा कि इंटरनेट ब्लैक टाइगर्स जिसे दुनिया के पहले साइबर हमले के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लिट्टे की ही एक इकाई है. 1997 में हुए इस हमले की वजह से 15 दिनों तक दुनिया भर में श्रीलंकाई दूतावासों का नेटवर्क डाउन हो गया था. इसी साल इसने ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी की वेबसाइट में सेंध लगाई. कुछ दिन पहले ही खुद को कालई अम्मान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर यूनिट बताने वाले  एक समूह ने श्रीलंकाई सेना की वेबसाइट पर हमला बोला और इसके मुखपृष्ठ की शक्ल बिगाड़ दी. सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी लिट्टे ने खूब इस्तेमाल किया है और यूट्यूब पर अगर सर्च किया जाए तो संगठन के सैकड़ों वीडियो देखने को मिल जाएंगे.

प्रभाकरन ने अपनी मीडिया यूनिट तैयार करने में जरा भी देर नहीं लगाई. इसमें फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर शामिल थे और इन्होंने संगठन द्वारा लड़ी गई हर लड़ाई और हर हत्या को अपने कैमरों में कैद किया

1980 के दशक की शुरुआत में जब मैं प्रभाकरन की तस्वीरें (फोटो सेशंस) लेता था तो उसके व्यवहार में असहजता साफ नजर आती थी. उसे समझ में नहीं आता था कि उससे किस तरह की फोटो की अपेक्षा की जा रही है. उन दिनों वह फोटो खींचने वाले के निर्देश मान लेता था. एक बार जब उसे ये सुझाव दिया गया कि वह युद्ध के दौरान पहनी जाने वाली पोशाक पहन ले तो वह इससे भी एक कदम आगे चला गया और अपनी पिस्टल पूरी तरह से लोड करके कैमरे के सामने खड़ा हो गया. पृष्ठभूमि में लेनिन और बाघ की तस्वीर थी और अपने अंगरक्षकों से घिरा हुआ लिट्टे मुखिया फोटो खिंचवाने के लिए तैयार था. तब फोटो सेशंस को लेकर उसे इतनी उत्सुकता रहती थी कि एक घंटे बाद ही वह ये देखना चाहता कि फोटो कैसी आई हैं.

मगर बाद में वह इस सब का अभ्यस्त हो गया. जाफना में भारतीय शांति सेना के खिलाफ लड़ाई के दौरान हुए सभी फोटो सेशंस में वह एक्टर भी खुद ही होता था और डायरेक्टर भी और उसे इसमें बड़ा आनंद भी आता था. प्रभाकरन को अब पता था कि कैमरे के सामने कैसा चेहरा और मुद्रा बनानी है. उसकी आवाज में गरज होती, सवालों के जवाब पूरी तैयारी से दिए गए होते और बातचीत में बनावट का आभास होता. वह लोगों को अच्छी लगने वाली बातें कहता, अंग्रेजी के इस्तेमाल से बचता, कोई कहावत कहने से पहले थोड़ा सोचता और ऐसी मुद्रा में फोटो खिंचवाता जो उस मौके के लिए उसे सबसे अनुकूल लगती. मुझे याद है कि शांति सेना के अभियान के दौरान जब मैं उसके एक ठिकाने पर उसका इंटरव्यू ले रहा था तभी उसने एक आवाज लगाई और चीते का एक बच्चा कमरे में आ गया जो उसका पालतू था. फिर अपने दोस्त और संगठन में दूसरा स्थान रखने वाले योगरत्नम योगी के साथ हंसी-मजाक करते हुए उसने चीते की पीठ सहलाते हुए फोटो खिंचवाई जिसमें वह शिकार से लौटे किसी अमीर जमींदार की तरह लग रहा था.मगर उन दिनों भी हाथ मिलाने के दौरान उसकी पकड़ की कोमलता अपनी जगह बरकरार थी.

प्रभाकरन की रणनीति के लिए ये बहुत जरूरी था कि वह ये संदेश बाहर भेजे कि उसके पास प्रतिबद्ध अनुयायी हैं और इनमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे तक शामिल हैं. सायनायड की गोली इस प्रतिबद्धता का एक प्रतीक थी. उसने बड़ी उदारता से मुझे इन गोलियों की फोटो लेने की इजाजत दी जिसे उसके लड़ाके अपनी गर्दन में पहने रहते थे. ये बात अलग है कि लड़ाइयों में तमिल टाइगर्स द्वारा सायनायड की गोली गटकने की घटनाएं तो सुर्खियां बनती थीं मगर उन घटनाओं का कोई जिक्र तक नहीं होता था जब वे डर के मारे इन गोलियों को फेंक देते थे.

प्रभाकरन को अपने चीतों के साथ फोटो खिंचवाना बहुत अच्छा लगता था मगर खाना खाते हुए फोटो खिंचवाना उसे जरा भी पसंद नहीं था. इसके अलावा महिला कैडरों और मृत लड़ाकों की तस्वीरें लेने पर भी पाबंदी थी. राजीव गांधी की हत्या के बाद मीडिया को खुश करने के लिए ये पाबंदियां हटा ली गईं.

प्रभाकरन ने अपनी मीडिया यूनिट तैयार करने में जरा भी देर नहीं लगाई. इसमें फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर शामिल थे और इन्होंने संगठन द्वारा लड़ी गई हर लड़ाई और हर हत्या को अपने कैमरों में कैद किया. इससे दो मकसद हल हुए. एक तो इससे नए लड़ाकों को प्रशिक्षण देने में मदद मिली क्योंकि अब लड़ाई के मैदान में होने वाली चीजों को नए रंगरूटों को दिखाया जा सकता था. इसके अलावा ईलम के अलग राष्ट्र बनने के बाद ये रिकॉर्ड इतिहास तैयार करने में मददगार साबित होता. मगर इस तरह के रिकॉर्ड के लिए प्रभाकरन की सनक ही उसके लिए विनाशकारी साबित हुई क्योंकि इसकी ही वजह से राजीव गांधी की हत्या के जांचकर्ता लिट्टे तक पहुंच पाए.

राजीव गांधी की हत्या के बाद जब मेरा प्रायद्वीप में चल रहे लिट्टे के प्रशिक्षण शिविरों में जाना हुआ तो मैंने एक खास बात नोट की. अब इनमें बच्चों को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा था. उनकी ट्रेनिंग अपने नेता के नाम पर शपथ लेने से शुरू होती थी जो इस तरह थी – ‘तमिल ईलम को पाने के लिए मैं अपनी जिंदगी और आत्मा समर्पित करता हूं. हम अपने बड़े भाई और अपने क्रांतिकारी संगठन के नेता प्रभाकरन के प्रति आस्थावान और उसके विश्वासपात्र रहेंगे. अब मैं अपने प्रशिक्षण की शुरुआत कर रहा हूं. टाइगर्स की भूख तमिल ईलम है.’ दिन के अंत में भी यही शपथ दोहराई जाती थी जब झंडे को आधा झुका दिया जाता था.

इस दौरान कभी-कभी मुझे न्यूयॉर्क की सड़कों पर या लंदन की किसी शादी में या फिर पेरिस के किसी रेस्टॉरेंट में बढ़िया कपड़े पहने हुए कोई अजनबी मिलता और बताता कि लिट्टे से फलां मुलाकात के समय वो मेरे साथ था

रंगरूटों के लिए इतिहास के सबक दुश्मन से नफरत पैदा कराने वाले होते थे जिनमें दुश्मन बलात्कारी, हत्यारा और नस्लवादी होता था. ये सबक प्राचीन तमिल साम्राज्यों और राजाओं को महिमामंडित करते थे. क्लासरूम में दिए जाने वाले निर्देश रणनीतिक योजनाओं के बारे में होते थे. कक्षाओं में एक ब्लैकबोर्ड, युद्ध पर आधारित फिल्में और पुरानी लड़ाइयों की केस स्टडीज होती थीं जिन्हें वीडियो और तस्वीरों की मदद से तैयार किया जाता था. और आखिर में एक फिल्म दिखाई जाती थी जो हॉलीवुड की बी ग्रेड एक्शन फिल्मों के भंडार में से एक होती थी. इनमें भी रैंबो सबकी पसंद होती थी.

प्रभाकरन बेहद चतुर था. उस पता था कि चारों तरफ फैली घबराहट और नाउम्मीदी के माहौल के चलते लड़कों और लड़कियों को आसानी से नफरत और मशीनगन का पाठ पढ़ाया जा सकता है. दुश्मन से नफरत, एक मकसद, कुछ बड़ा कर अमर होने की भावना और एक्शन फिल्मों की खुराक पर पले-बढ़े किसी किशोर के हाथ में यदि बंदूक थमा दी जाए तो इसका नशा जन्नत में 72 हूरों के वादे से कहीं ज्यादा गहरा होना ही था.

रैंबो बनने की हसरत पाले किसी 12 साल के किशोर के लिए खतरे का रोमांच एक सम्मोहित कर देने वाला अनुभव होता है. हाथ में बंदूक उसे एक ऐसी ताकत से भर देती है जिसके बारे में वह कभी सोच भी नहीं सकता. एक बार मुझे भी एक क्लाश्निकोव परखने का निर्देश दिया गया. मैंने समुद्र में दूर नजर आते क्षितिज की तरफ गोलीबारी की. कुछ राउंड गोलियां चलाने के बाद जब हम वापस आ रहे थे तो अचानक मुझे ध्यान आया कि मेरी चाल में एक विशेष अकड़ आ गई थी और मैं अजेय महसूस कर रहा था. मुझे ये भी अहसास हुआ कि भले ही राइफल के झटके की वजह से मुझे कंधों में अकड़न महसूस हो रही थी मगर मेरी चाल बिल्कुल रैंबो नाम की फिल्म के उसी नाम वाले नायक जैसी हो गई थी. गौर कीजिए कि मैं 30 साल से ऊपर की उम्र का आदमी था जिसने दुनिया देख रखी थी. जब मैं इस तरह का व्यवहार करने लगा था तो 12 साल के उस बच्चों की क्या बिसात जिसने प्रभाकरन के ट्रेनिंग कैंप के परे दुनिया ही न देखी हो. लिट्टे में भर्ती होने का एक और आकर्षण ये भी था कि बंदूक लहराते हुए कैडर जिस भी गांव में जाता था उसके लिए सोने और रहने की व्यवस्था प्राथमिकता के तौर पर की जाती थी. और इससे भी बड़ी प्रेरणा का काम करता था अमरत्व का आकर्षण. जो लोग मकसद के लिए अपनी जान देते थे उन्हें कविताओं और स्मृतिस्थलों के जरिए हमेशा याद किया जाता था.

परदे के पीछे

श्रीलंका में लिट्टे को नजदीक से देखने की कोशिश के दौरान संगठन के लड़ाकों से बातचीत और मेल-जोल एक अनिवार्य गतिविधि होती थी. फटे-पुराने कपड़े पहने, कुछ-कुछ जंगली से दिखते और अक्सर नंगे पैर रहने वाले ये लड़ाके सीमावर्ती और युद्धग्रस्त इलाकों में आपके साथी, मार्गदर्शक और साथ ही अभिभावक भी बन जाते थे. लगातार उनके साथ रहते और युद्धग्रस्त इलाकों में इनके साथ खाते और सोते मुझे इनसे एक जुड़ाव सा महसूस होने लगता था लेकिन ऐसा कभी नहीं होता था कि अगली यात्रा के दौरान भी आपकी उन्हीं लड़ाकों से मुलाकात हो. तब तक या तो वे संघर्ष के दौरान मारे जा चुके होते या फिर उन्हें किसी दूसरी जगह पर तैनात कर दिया जाता था. हर नई यात्रा में नए लड़ाके मिलते जिनसे पुरानों के बारे में कुछ भी पता लगा पाना बेहद मुश्किल होता क्योंकि उनमें से हर एक छद्म नाम के साथ लड़ रहा होता था. शहीदों के पोस्टरों और कटआउट्स से भरे पड़े प्रायद्वीप में मैं किसी परिचित चेहरे की तलाश करता. अपनी यात्राओं के दौरान मैंने पाया कि वहां शहीदों के सम्मान में बने स्मृतिस्थलों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही थी. लोग उन पर अगरबत्ती, फूल चढ़ाते और प्रार्थना करते.

इस दौरान कभी-कभी मुझे न्यूयॉर्क की सड़कों पर या लंदन की किसी शादी में या फिर पेरिस के किसी रेस्टॉरेंट में बढ़िया कपड़े पहने हुए कोई अजनबी मिलता और बताता कि लिट्टे से फलां मुलाकात के समय वो मेरे साथ था. ऐसे लोग आपको तंजावुर-मंदिरों के गलियारों में भी मिल जाया करते थे. कभी-कभी उनकी फोटो किसी अखबार में भी नजर आती जो इस खबर के साथ छपी होती थी कि जिस देश ने उन्हें नागरिकता दी वे उसी देश में कोई गैरकानूनी काम कर रहे थे.

लड़कियों की भर्ती

लिट्टे में शामिल लड़कियों को फ्रीडम बर्ड्स कहा जाता था. ये प्रभाकरन की तुरुप का इक्का थीं. भारतीय शांति सेना लगातार इस संगठन को विभिन्न स्तरों पर बड़ा नुकसान पहुंचाती जा रही थी. प्रभाकरन को लड़ाकों की संख्या बढ़ानी थी और इसके लिए उसे और भी ज्यादा लड़कियों और बच्चों की भर्ती करनी पड़ी. लिट्टे में लड़कियों को शामिल करने की जिम्मेदारी ‘आंटी’ यानी एडेल बालसिंघम को सौंपी गई. इस समय तक लड़कियां लिट्टे की छात्र शाखा जिसे सोल्ट (स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ लिबरेशन टाइगर्स) के नाम से जाना जाता है, के तहत काम करती थीं. वे आयोजनों के लिए भीड़ जुटातीं, पर्चे बांटती और प्रभाकरन या हाल ही में अपनी जान गंवाने वाले किसी आत्मघाती हमलावर की वीरता के गीत गातीं थीं. समाज में जातिगत भेदभाव और शांति सेना की तथाकथित ज्यादतियों ने एडेल का काम आसान बना दिया था. वे लड़कियों को परंपरागत तमिल महिला की छवि से मुक्त करने आश्वासन देती थीं. इस नई भूमिका में लड़कियां, लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ने वाली थीं. राजीव गांधी की हत्या के कुछ ही महीनों बाद जाफना में बातचीत के दौरान एडेल ने कहा था कि जाफना की महिलाओं में आया आत्मविश्वास पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है. एडेल के पति एंटन बालसिंघम को लिट्टे का स्वयंभू विचारक, प्रभाकरन का राजनैतिक सलाहकार और लिट्टे का मुख्य वार्ताकार माना जाता था. 2007 में कैंसर से एंटन की मृत्यु के बाद एडेल लिट्टे के लंदन स्थित मुख्यालय चली गईं और वहीं से अपने नेता के काम को आगे बढ़ाना जारी रखा.

मुख्य सिपहसालार

प्रभाकरन का बेहद करीबी और महाथया के छद्म नाम से पहचाने जाने वाला गोपालस्वामी महेंद्रराजा लिट्टे के कैडरों के बीच खासा लोकप्रिय था. जिन लोगों ने प्रभाकरन को सिर्फ तस्वीरों में देखा है यदि उनके सामने महाथया आ जाता तो वे उसे आसानी से प्रभाकरन समझने की भूल कर सकते थे. क्योंकि उनका डीलडौल काफी मिलता था. यहां तक कि दोनों की मूंछें भी एक जैसी थीं. प्रभाकरन की उपस्थिति में महाथया बिल्कुल चुप रहता था, जब तक कि उससे कुछ बोलने को न कहा जाए. हालांकि लड़ाई के मोर्चे पर उसका कायापलट देखने लायक होता था जहां वो एक बेहतरीन कमांडर होता था.

राजीव गांधी हत्याकांड की वजह से दुनिया भर में लिट्टे के खिलाफ मत बनने से उसकी छवि आतंकी संगठन की बनने लगी थीचुप रहने वाले महाथया के उलट योगी था जो अक्सर तेज आवाज में बात करता था. योगी को प्रभाकरन के उन चुनिंदा करीबियों में माना जाता है जिनसे वह सहज होकर बात किया करता था. इस बातचीत में हंसी-मजाक भी शामिल होता था. एक साथ खाना खाते समय वे दोनों दोस्तों की तरह लगते थे. कान्वेंट स्कूल में पढ़ा योगी अक्सर बातचीत से लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करता था. लेकिन इसके उलट महाथया प्रभाकरन की उपस्थिति में संकोच और शालीनता से पेश आता था. मगर सेना के खिलाफ लड़ाकों की अगुवाई करने वाले महाथया को युद्ध के मोर्चे पर देखना एक अलग ही अनुभव होता था. वह एक लोकप्रिय और कर्तव्यनिष्ठ आर्मी कमांडर था जबकि योगी मंझा हुआ राजनीतिज्ञ.

मार्च 1990 में शांति सेना के  आखिरी जत्थे की श्रीलंका से वापसी हो रही थी. इस मौके पर महाथया अपने लड़ाकों की सेना के मुखिया के तौर पर योगी के साथ त्रिंकोमाली कस्बे में आया था. उन दोनों ने यहां स्थित स्टेडियम में जमा भारी भीड़ और मीडिया का आभार व्यक्त किया था. योगी ने इस दौरान हम मीडियाकर्मियों में से भी कुछ का उनके नाम लेकर आभार व्यक्त किया. योगी ने कहा कि इन मीडियाकर्मियों ने भी उनके संघर्ष में उन जितनी ही लड़ाई लड़ी है.

इसके एक साल के भीतर ही राजीव गांधी की हत्या कर दी गई. जांच के नतीजों से साफ था कि इसमें लिट्टे का हाथ है. इस घटना के बाद जब जाफना में मेरी योगी से मुलाकात हुई तो उसके मन में मेरे लिए बेहद कड़वाहट नजर आ रही थी. अपनी पहली प्रतिक्रिया में मेरी ओर थूकते हुए उसने कहा ‘येलो जर्नलिस्ट’. इस समय एंटन और एडेल एक डरावनी सी चुप्पी साधे हुए थे. राजीव गांधी हत्याकांड की वजह से दुनिया भर में लिट्टे के खिलाफ मत बनने से उसकी छवि आतंकी संगठन की बनने लगी थी.

प्रभाकरन ने राजीव हत्या कांड में अपना हाथ होने से इनकार किया और साथ में ये सिद्ध करने की कोशिश भी की कि धनु (राजीव गांधी की हत्या की मुख्य आरोपी) का लिट्टे से कोई संबंध नहीं था. ये साबित करने के लिए मेरी धनु के ‘अभिभावकों’, पड़ोसियों और ‘दोस्तों’ से मुलाकातें करवाई गईं. इस दौरान एक बार जाफना में लिट्टे के घासफूस से बने छप्पर वाले मुख्यालय में लिट्टे सदस्यों के साथ मेरी एक बैठक हो रही थी. गर्म वड़ा खाते हुए मैं बार-बार उनके इस दावे पर शंका प्रकट कर रहा था. अचानक बालसिंघम और योगी ने  बैठक खत्म होने की घोषणा कर दी. इसके बाद उन्होंने जो कहा उससे मैं चौंक गया. उनके शब्द थे, ‘आपने अभी जो वड़ा खाया है उसके पैसे चुका दें.’ अगली सुबह मेरी साइकिल गायब हो चुकी थी जो प्रायद्वीप की यात्रा के लिए मेरा एकमात्र साधन थी.

इस समय तक लिट्टे का जनसंपर्क तंत्र कमजोर होने लगा था. संगठन में भीतर ही भीतर उथल-पुथल चल रही थी जिससे दुनिया अनजान थी. मगर ऐसा लंबे वक्त तक नहीं रहा और एक साल बाद प्रभाकरन ने महाथया के पर कतर डाले जबकि शांतिसेना के खिलाफ लड़ाई के दौरान उसे संगठन में दूसरे नंबर के नेता का दर्जा दिया गया था. महाथया पर गद्दार और भारतीय लोगों के साथ मिलकर अपने खिलाफ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाते हुए प्रभाकरन ने उसे हिरासत में ले लिया. महाथया के लड़ाकों में से ज्यादातर को मार कर प्रभाकरन ने भविष्य में अपने नेतृत्व को चुनौती देनेवाली ताकत को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था. लंबे समय तक हिरासत में रखने और लगातार शारीरिक यातना देने के बाद दिसंबर 1994 में महाथया की हत्या कर दी गई.

बाद में लिट्टे के एक और बड़े नेता योगी की वफादारी भी शक के घेरे में आई. योगी का हश्र भी कुछ-कुछ महाथया जैसा हुआ. उसे कई सालों तक गुमनामी के अंधेरे में रहना पड़ा. सालों बाद 2006 में वो लिट्टे के इतिहास से संबंध रखने वाली इकाई ब्लैक टाइगर्स डे के मुखिया के तौर पर दोबारा प्रकट हुआ. इसी समय एक आयोजन में उसने कहा था, ‘क्या बम, धमाका करने और लोगों को मारने के लिए नहीं बनाए जाते? तो लोग इंसानों के बम बनने पर इतना शोर क्यों मचा रहे हैं?’

हालांकि योगी को धीरे-धीरे अपने पहले की स्थिति में लाने की कोशिश की गई, उसे वान्नी में लिट्टे-सेना का सलाहकार बना दिया गया. लिट्टे के इन दो खास लोगों के विपरीत एंटन और एडेल का कद संगठन में लगातार बढ़ता रहा. एंटन बालसिंघम-जिससे प्रभाकरन को कोई खतरा नहीं था, पश्चिमी दुनिया में लिट्टे का चेहरा और मुख्य वार्ताकार बन गया.

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ईलम के स्वप्न का उत्थान और पतन-2

 

मनमोहन उवाच

 चक्र सुदर्शन

तेरा हुलसेगा हिया, कुर्सी पर तो बैठ,

हर प्रकार से राज पर, अब है अपनी पैठ.

अब है अपनी पैठ, देश ने मान लिया है,

बा तू सा है, सबने जान लिया है.

चक्र सुदर्शन, सब हैं कुर्सी को व्याकुल से,

आजा प्यारे! मनमोहन कहते राहुल से. 

 अशोक चक्रधर

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99 : नई बयार की कॉमेडी

यह मुश्किल रहा होगा कि मैच फिक्सिंग जैसे गंभीर मुद्दे पर सच्ची घटनाओं के हवाले से एक थ्रिलर फिल्म बनाई जाए और वह अपराध-कथा न होकर एक अच्छी कॉमेडी बने. विदेश से आई राज-कृष्णा की निर्देशक जोड़ी इसमें कामयाब रही है. फिल्म में 1999 से मार्च, 2000 तक की कहानी है, जब भारत-दक्षिण अफ्रीका की पूरी श्रंखला फिक्स थी और बाद में उसका पर्दाफाश कई दिग्गजों को ले डूबा था. फिल्म न तो उन दिग्गजों की है और न ही फिक्सिंग के सूत्नधार की. निर्देशकों को यह जिम्मेदारी भी बखूबी याद है कि वे दर्शकों को कहानी के समय का अहसास सिर्फ स्क्रीन पर तारीखें लिखकर नहीं, उस समय की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल करके करवाएं.

मोबाइल फोन तब नए थे और उनसे होने वाले नुक्सान की खबरें भी. बॉलीवुड अपनी जड़ें भूल रहा था और भोजपुरी सिनेमा उसे पकड़ रहा था. भारतीय क्रिकेट टीम खराब खेलती थी और एक किरदार कहता भी है कि हमारे खिलाड़ियों के लिए पचास ओवर ओवरडोज हो जाते हैं इनके लिए बीस ओवर के मैच शुरु किए जाने चाहिए. इसी तरह फिल्म कई चीजों पर व्यंग्य करती है. जैसे कुणाल और सायरस दिल्ली नहीं आना चाहते क्योंकि वहां मार्च में सर्दी और अक्टूबर में गर्मी पड़ती है, लोग कारों के शीशे खोलकर भांगड़ा रीमिक्स बजाते हैं, लड़कियों के दो ही नाम होते हैं- पूजा और नेहा, और दिल्ली में सब चोर हैं. वे एक और सीख देते हैं कि पीछा कर रही पुलिस से बचकर भागो तो पीछे नोट बिखेर जाओ, कभी नहीं पकड़े जाओगे.

छायांकन कहीं कहीं कार्टून फिल्मों जैसा है और वह कॉमेडी के प्रभाव को बढ़ाता है. दृश्य वहां खत्म होते हैं, जहां आप इनके खत्म होने की सबसे कम उम्मीद कर रहे होते हैं. कुदरत के इशारों में सट्टे की किस्मत ढूंढ़ते बोमन ईरानी और उनसे अपने पैसे की उगाही के लिए भटकते अमित मिस्त्नी नि:संदेह सारा श्रेय ले जाते हैं. अमित का अभिनय शानदार है. बोमन सूक्ष्मताओं पर मेहनत करते हैं इसलिए स्थूल प्रभाव छोड़ते हैं. कुणाल और सोहा की प्रेम कहानी फिल्म की कमजोरी है लेकिन बोमन-सिमोन का परतदार रिश्ता काफी हद तक उस पर पर्दा डालता है. कुणाल ठीक अभिनय करते हैं लेकिन कहीं कुछ कमी है कि उनकी फिल्म देखने के बाद वे याद नहीं रहते. आखिर में सौ बात की एक बात. ट्रक और कार की भिड़ंत या गोली से घायल होने के दृश्य में कोई फिल्म आपको हंसा सकती है तो वह जरूर देखी जानी चाहिए. सुना है कि मल्टीप्लेक्स वाले टिकट सस्ती करने वाले हैं. ऐसा हो तो बधाई.

गौरव सोलंकी  

गठबंधन शाश्वत हैं

हर चुनाव नतीजा अंधों का हाथी होता है. और हर अंधा उसके विशाल शरीर का एक अंग पकड़ कर बताता है कि हाथी कैसा है. जैसा कि कहानी में होता है कोई अंधा बता नहीं पाता कि समूचा हाथी वास्तव में है कैसा. चुनाव नतीजे का मतलब बताने वाले पंडित भी दरअसल हाथी के अंधे हैं. वे कोशिश कर के और सब मिल कर समूचे हाथी को जब तक बता पाते हैं तब तक दूसरा चुनाव और दूसरा नतीजा आ जाता है. इसलिए हर नतीजा अंधों के हाथी की तरह अधूरा ही व्याख्यायित हो पाता है और वैसा ही होने के लिए अभिशप्त है.

आप किसी भी कसौटी पर घिसें यह चुनाव कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के पुनरोदय और क्षेत्रीय पार्टियों के पराभव का चुनाव था

यही हाल जनादेश का अर्थ समझने और समझाने का है. लोग महीनों लगे रहते हैं जनादेश का अर्थ बताने में. तब तक सरकार और उसके मंत्री सत्ता की अपनी जरूरतों के मुताबिक और अपने दबावों के अनुसार जो करना होता है करते चले जाते हैं. लोग भूल ही जाते हैं कि जनादेश जब मिला था तब उसका क्या अर्थ बताया गया था. जनादेश पाने या उसके पाने का दावा करने वालों ने भी सत्ता संभालते समय उसका जो अर्थ समझकर उसके मुताबिक अजंडा बनाया था वह देखते ही देखते गायब हो जाता हे. होता वही है जो परिस्थितियां उनसे करवाती हैं या जो वे किसी को बताए बिना करना चाहते हैं. कार्यकाल समाप्त होने पर झूठी रिपोर्ट दी जाती है. आप पाएंगे कि स्पष्ट से स्पष्ट जनादेश भी अच्छी से अच्छी यानी माकूल परिस्थितियों में भी आठ-दस प्रतिशत से ज्यादा अमल में नहीं लाया जाता.

इसलिए जैसा कि यक्ष के पूछने पर युधिष्ठिर ने बताया था कि सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि हर लोकतंत्र के चुनाव में नतीजे का मतलब समझाया जाता है और जनादेश का अर्थ बताया जाता है. यह कैसी ही और कितनी ही फालतू कवायद हो पर हर लोकतंत्र में लगातार चलती रहती है. वैसे करने वाले मानते हैं कि इस उट्ठक-बैठक से लोकतंत्र का हाजमा ठीक रहता हैं. इस बार अभी तक चुनाव के एक निष्कर्ष पर लगभग सभी सहमत हैं कि वोट देने वाले छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों की बंदरबांट से तंग आ गए थे और वे सत्ता किसी राष्ट्रीय पार्टी को सौंपना चाहते थे. उनके सामने कांग्रेस और भाजपा थे जिनमें से लोगों ने कांग्रेस को ज्यादा समर्थन दिया.

किसी सर्वे, एग्जिट पोल बल्कि खुद कांग्रेस ने भी कहा नहीं था कि उसे 206 सीटें मिल जाएंगी. यूपीए की बाकी की आठ पार्टियों को कुल 55 सीटें मिलीं. इसी तरह भाजपा को 116 तो उसकी एनडीए की सहयोगी पार्टियों को सिर्फ 43 सीटें मिलीं. मुलायम, लालू और पासवान ने अपनी अलग ताकत दिखाने और केंद्र को अपने इशारों पर चलाने के लिए अपना चौथा मोर्चा बना लिया था. इसमें पासवान तो साफ हो गए और लालू को सिर्फ चार सीटें मिलीं. मुलायम कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी ले कर आए लेकिन उनकी भी समाजवादी पार्टी को कुल 23 सीटें मिलीं. तीसरे मोर्चे की बात तो और भी बेमानी हो गई क्योंकि उसमें तो छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियां ही आई थीं जिनमें वाम मोर्चे को 24 और मायावती की बसपा को 21 सीटें मिलीं. यानी किसी पार्टी को तीस से भी ज्यादा सीटें नहीं मिलीं. कांग्रेस और भाजपा की 322 के बाद बची 229 सीटें 35 पार्टियों और 9 निर्दलीय उम्मीवारों को मिलीं.

जब राजीव गांधी की कांग्रेस को 415 सीटें मिली थीं तब भी उनकी पार्टी गठबंधन ही थी. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की कांग्रेस भी कई दलों और गुटों और हितों का गठबंधन थी

फिर भी आप कहें कि यह क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों का खात्मा और राष्ट्रीय पार्टियों का पुनरोदय है तो आंकड़ेबाज कहते हैं कि गलत. वे कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत को मिला कर बताते हैं कि 2004 के चुनाव में इन दो पार्टियों को जितने वोट मिले थे लगभग उतने ही इस बार मिले हैं. पिछली बार 48.7 प्रतिशत थे इस बार 48.9 प्रतिशत. अब मजा अपनी चुनाव पद्धति का यह है कि 0.02 प्रतिशत ज्यादा वोट मिलने से 39 सीटें इन दोनों पार्टियों को मिल गईं. अपने चुनाव में वोट प्रतिशत सीटों की गिनती को बहुत प्रभावित नहीं करता. उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा वोट बसपा को मिले. पर सीट मिलने के मामले में वह तीसरे नंबर पर रह गई. वोट प्रतिशत सीटों की गिनती और उनके राजनैतिक असर पर ज्यादा हावी नहीं होता. इसलिए वोट प्रतिशत पार्टियों के उभरने और गिरने का सही पैमाना नहीं हो सकता.

अगर और कोई पार्टी 25 सीटें भी नहीं ले पाई तो 116 सीटें पाने वाली भाजपा और 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस उनसे निश्चित ही कई गुना बड़ी हैं. फिर कांग्रेस और भाजपा की सीटें निकाल दो तो सभी पार्टियां और निर्दलीय भी मिल कर 272 का आंकड़ा नहीं छूते और इसलिए सरकार नहीं बना सकते. कांग्रेस और भाजपा की सीटों से मजे का बहुमत बनता है और वे सरकार चला सकती है. यानी आप किसी भी कसौटी पर घिसें यह चुनाव कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के पुनरोदय और क्षेत्रीय पार्टियों के पराभव का चुनाव था. सही है कि भाजपा ने पिछले चुनाव की तुलना में 22 सीटें गंवाई हैं और कांग्रेस ने 61 सीटें ज्यादा पाई हैं. मगर कांग्रेस की बढ़त सिर्फ भाजपा के कारण तो हुई नहीं है. क्षेत्रीय पार्टियों से भी तो उसने 39 सीटें छीनी हैं. इसलिए कहना तो यही ठीक होगा कि पुनरोदय कांग्रेस का हुआ है. लेकिन तीसरी पार्टी – समाजवादी से भाजपा की 93 सीटें ज्यादा हैं. यह आंकड़ा भी क्षेत्रीय पार्टियों की तुलना में राष्ट्रीय पार्टी के उदय का उदाहरण देता है.

फिर भी भाई लोग बिहार में जनता दल (एकी) ओडीशा में बीजू जनता दल, तमिलनाडु में डीएमके और महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस की साटें दिखा कर कहते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियां खत्म नहीं हो रही हैं. बीजू जनता दल ने लोकसभा की 14 सीटें ही नहीं जीतीं विधानसभा में भी 147 में से 103 सीटें जीत कर उसने राज्य में भी सरकार बनाई है. बिहार में नीतिश कुमार की सरकार पहले से है फिर भी लोकसभा में उन्हें 12 सीटें और मिल गईं. डीएमके की भी तमिलनाडु में सरकार है और वह भी पहले की तुलना में दो सीटें ज्यादा पा गई है. शिवसेना ने सिर्फ एक सीट गंवाई है और राष्ट्रवादी कांग्रेस को महाराष्ट्र में फिर 9 सीटें मिल गईं. अगर ये क्षेत्रीय पार्टियां जमी हुई हैं तो इस चुनाव को क्षेत्रीय पार्टियों का पराभव कैसे माना जा सकता है?

इसलिए माना जाना चाहिए क्योंकि इन में एक भी पार्टी अपनी सहयोगी राष्ट्रीय पार्टी की केंद्र में सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका नहीं खेल सकती. जद (एकी) एनडीए की सरकार नहीं बनवा सकती. बीजू जनता दल तीसरे मोर्चे को खड़ा नहीं कर सकता. और राष्ट्रवादी कांग्रेस केंद्र की यूपीए सरकार में बहुत छोटी सी हैसियत में है. उसके आने-जाने से काग्रेस की सरकार बनती-बिगड़ती नहीं. क्षेत्रीय पार्टियों की सरकार बनाने की क्षमता ऐसी घटी है कि सपा, राजद आदि बिना मांगे ही मनमोहन सरकार को समर्थन दे रही हैं. वे बाहर और विपक्ष में रह कर बेकार नहीं होना चाहतीं. प्रासंगिक बने रहने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को जब ऐसे काम करने पड़ें तो मान लेना चाहिए कि वे केंद्र में निर्णायक नहीं रह गई हैं. भारत जितनी विविधताओं और स्थानीयताओं का देश है उसमें क्षेत्रीय पार्टियां तो रहेंगी ही. स्थानीय अभिव्यक्ति और लोकतंत्र की मजबूती के लिए वे अनिवार्य भी हैं. लेकिन वे केंद्र में मिल कर उसे मजबूत तो करती हैं उसे बना या बिगाड़ नहीं सकतीं. यही भारतीय परिस्थिति में उनके होने का औचित्य है. हुआ यह था कि बीस साल से जो गठबंधन राजनीति दिल्ली में चल रही थी उसमें एक ही पार्टी सरकार गिरा सकती थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भाजपा ने गिराई, चंद्रशेखर की कांग्रेस ने बनवाई और गिराई.

नरसिंह राव की अल्पमत सरकार झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद खरीद कर चलाई गई. देवेगोडा और गुजराल की सरकारें भी कांग्रेस ने बनाईं गिराईं. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिरी और जयललिता ने अपनी ताकत बताई. फिर चंद्रबाबू की टीडीपी को लगातार रिश्वत दे कर अटल जी की दूसरी सरकार प्रमोद महाजन ने चलवाई. वाम मोर्चे ने मनमोहन की सरकार से ताताथैया करवाया और अमेरिका से अणु करार के मामले में गच्चा दिया तो समाजवादी पार्टी और बहुमत की खरीदी ने उसे बचाया. बीस साल से गठबंधन की यह अस्थिरता करने वाली राजनीति, मोल भाव से चल रही थी. इस बार के चुनाव में इसका अंत हुआ. कांग्रेस अपने बहुमत से अब भी 66 कम है और यूपीए की पार्टियों को उसने साथ लिया ही है. फिर भी व्यावहारिक अर्थ में यह एक पार्टी का राज है.

गठबंधन की राजनीति गई लेकिन गठबंधन तो भारत में अनिवार्य है. जब राजीव गांधी की कांग्रेस को 415 सीटें मिली थीं तब भी उनकी पार्टी गठबंधन ही थी. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की कांग्रेस भी कई दलों और गुटों और हितों का गठबंधन थी. भाजपा ऐसा गठबंधन नहीं बन पाती इसलिए सत्ता में नहीं आती. वाम पार्टियां तो गठबंधन हो ही नहीं सकतीं. एक ढीला-ढाला सर्वग्राही गठबंधन ही भारत की सहज स्वाभाविक सत्तारूढ़ पार्टी हो सकती है.

यह मुझ अंधे का हाथी है. मायावती का बहुजन समाज नहीं.      

श्रीमती गांधी और उनका एक और आराध्य

आदरणीय श्रीमती सोनिया गांधी जी,

मेरे इन शब्दों में कुछ नया नहीं है कि भारत एक ऐसा देश है जो आस्था पर चलता है. हम अपने देवी-देवताओं को पूजते हैं और अपनी सफलताओं और विफलताओं को उनके चरणों में अर्पित कर देते हैं. इस में यकीन और आपसे विरोध रखने वाले लोग जोर देकर कह सकते हैं कि इस मामले में आप अनुचित तरीके से लाभ की स्थिति में हैं. शादी और उसके बाद भारतीय परंपराओं में ढलकर आपने उन सभी -देवी देवताओं को अपना लिया जो दूसरे भारतीय नेताओं के भी होते हैं. मगर वह देवता तो आपके पास पहले से था ही जिसे आप अपने सुदूर मूल देश से अपने साथ लाई थीं.

आपको दलितों की महारानी और यादवों के सरदारों की चिंताएं भी समझनी होंगी. ये असहाय लोगों के मुखिया हैं भले ही वे कर उनके लिए कुछ नहीं रहे हों. मकसद महान हैं पर नेता क्षुद्र 

चूंकि हमारी आपसे कोई लड़ाई तो है नहीं इसलिए हमें खुशी है कि आपके पास एक अतिरिक्त देवता है. जैसा कि आप जानती हैं भारत में इतने सारे आराध्य केवल इसलिए हैं क्योंकि यहां इतनी सारी समस्याएं हैं. हालांकि हमारे यहां धुर वामपंथी और दक्षिणपंथी ऐसे लोग भी हैं जिनके दिमाग में स्वयं ईश्वर ही एक समस्या है. पहला वर्ग ये सोचता है कि ईश्वर को लोगों की सोच से किस तरह निकाला जाए तो दूसरे की चिंता ये है कि ईश्वर को लोगों के दिमाग में किस तरह भरा जाए. पर फिलहाल इन लोगों की बात छोड़ देते हैं क्योंकि जब जनता ने ही उनकी नहीं सुनी तो हम क्यों सुनें.

तो हमें खुशी है कि आपके पास एक अतिरिक्त ईश्वर है. कोई चीज अधिक होना हमेशा काम ही आता है. हमारे देवताओं के कई पहलू हैं. वे रसिया भी हैं और दार्शनिक भी. अक्सर उनकी नैतिकताएं समझना मुश्किल होता है क्योंकि वे भी कर्म, धर्म, मोक्ष और माया के वशीभूत होते हैं. मगर आप जो ईश्वर अपने साथ लाई हैं वह सही-गलत, पाप-पुण्य और दया और करुणा के बारे में कहीं ज्यादा साफगोई से अपनी बात कहता है. हम इसका स्वागत करते हैं. धर्म की मतलबी व्याख्याओं से पैदा हुए भौतिकतावाद की अति के बीच यदि कहीं थोड़ी स्पष्टता देखने को मिल जाए तो इसमें आखिर बुरा ही क्या है.

अब जब कि हम इससे सहमत हैं कि आपके पास हमारी तुलना में एक अतिरिक्त देवता है तो इसका ये मतलब है कि आपकी जिम्मेदारियां भी हमसे ज्यादा होनी चाहिए. अधिकारों की प्राप्ति के साथ कर्तव्यों के पालन की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है और आपका अतिरिक्त ईश्वर इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट कहता है कि इसका पालन कैसे किया जाना चाहिए. हम आपके आभारी होंगे अगर आप उसकी बात पर ध्यान दें. अपने लिए नहीं बल्कि दूसरे दसियों करोड़ लोगों की खातिर.

इसका मतलब ये है कि आपको ये नहीं सोचना है कि आपकी जी-तोड़ मेहनत के दिन अब खत्म हुए. इसमें कोई शक नहीं कि आपने उस सेना का नेतृत्व करते हुए शानदार प्रदर्शन किया है जिसके सिपहसालारों को ये तक नहीं पता था कि असल में ये लड़ाई हो कैसे रही है. बल्कि इन सिपहसालारों को तो सबसे ज्यादा महारत आपस में ही तलवारें भांजने में थी. व्यक्तिगत हमलों के बावजूद कई सालों तक आप अपना काम करती रहीं. किसी जनरल को ये बताया जाना अच्छा नहीं लगता कि बंदूक कैसे पकड़नी है या सिपाहियों से किस जबान में बात करनी है. पर किसी अज्ञात प्रेरणा के चलते आपको मालूम था कि इस तरह के ओछे अपमान अच्छी और महान विभूतियों को अच्छे और महान कामों से दूर रख सकते हैं. आपको ये बात समझ में आ गई थी कि लड़ाइयां आखिर में बंदूक की गोली के आकार या बिगुल की गूंज की तेजी से नहीं बल्कि दिल की मजबूती से जीती जाती हैं. 13 साल में सिर्फ अपने रास्ते पर टिके रहकर आपने लड़ाई के मायने बदल कर रख दिए.

अपनी लड़ाई में आप सफल साबित हुई हैं. 1996 में खस्ताहाल आपकी सेना 2009 में नई ऊर्जा और उत्साह से लैस है. इस प्रक्रिया में आपने बड़ी चतुराई और खूबसूरती से अपने अतिरिक्त ईश्वर की दो आज्ञाओं का पालन किया है. बाइबल में कहा गया है कि लालच नहीं करना चाहिए. इस आदेश को आपने इस कुशलता से त्याग के रूप में प्रस्तुत किया कि आपके विरोधियों की हवा निकल गई. बाइबल ये भी कहती है, धन्य हैं वे जो नम्र हैं क्योंकि वे ही पृथ्वी के वारिस होंगे. मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाकर आपने उस नम्रता का सम्मान किया है जो ईश्वर को भी अच्छी लगती है.

इसके बावजूद मैं साफ तौर पर एक बात कहना चाहता हूं. 2009 के मनमोहन को आपकी उतनी ही जरूरत है जितनी 2004 के मनमोहन को थी. वे खरपतवार को साफ करने वाली दरांती हो सकते हैं मगर आप अब भी वह हाथ हैं जो इस दरांती को पकड़ने का काम करता है. खर-पतवार की सफाई अच्छे से हो इसके लिए जरूरी है कि हाथ और दरांती का तालमेल अच्छा हो.

बाइबल ये भी कहती है, ‘बीमारों का उपचार करो, कोढ़ियों के जख्म साफ करो, मुर्दों को जिलाओ, बुराई को बाहर करो : उदारता से तुम्हें मिला है, उदारता से बांटो.

हम सबसे ज्यादा आप कहीं बेहतर तरीके से जानती हैं कि मुश्किलों से घिरे इस देश में बीमारों का उपचार करने और बुराई को भगाने के क्या मायने हैं.

सत्ता अपने साथ एक चमक भी लाती है. हो सकता है कि आप इससे चौंधियाएं नहीं क्योंकि आपने लंबे समय से इसे करीब से देखा है और इसका अनुभव भी किया है. मगर आपके चारों ओर, मौजूद लोगों में अब घमंड से फूलने की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है. वे भूल सकते हैं कि उन्होंने सिर्फ एक मोर्चा जीता है और कई लड़ाइयां अब भी हमारे    चारों ओर चल रही हैं. हमें बांटने वाले कट्टरपंथी अब भी दरवाजे पर खड़े हैं. वे अपने घावों को सहला रहे हैं, फिर से गोला बारूद इकट्ठा कर रहे हैं. वे अभी चुके नहीं हैं. देश की एक चौथाई जनता को वे अपने प्रभाव में ले चुके हैं. इसमें कोई शक नहीं रखिएगा कि वे फिर से भीतर घुसने की कोशिश करेंगे. तब आपकी सेना के काम गर्व नहीं बल्कि वह विनम्रता और उससे उपजी लोहे जैसी मजबूती ही आएगी जिसने आपको यहां तक पहुंचाया है. पूरे भारत में हमने डींग हांकने वालों के खिलाफ वोट किया है. सबको पता चल जाना चाहिए कि हम अपने मंत्रियों का पतन बर्दाश्त कर लेंगे मगर बेकार का घमंड हमें स्वीकार नहीं.

जैसा कि मैंने कहा लड़ाइयां अब भी कई हैं. सभ्यता से जुड़े विचारों की, देश को पंगु करते अभावों की, मरते बच्चों की..सूची बहुत लंबी है. मेरे शहर, जो आपका भी शहर और इस देश की राजधानी है, की हर ट्रैफिक लाइट पर चिथड़ों में लिपटे सात-आठ साल के बच्चे चंद सिक्कों की आस में हमारी कारों का शीशा खटखटाते हैं. जब तक हम अपने बच्चों को खाना नहीं दे सकते, उनका तन नहीं ढक सकते और उन्हें  शिक्षा मुहैया नहीं करवा सकते तब तक शाइनिंग इंडिया और विश्वशक्ति भारत जैसे जुमले न सिर्फ मजाक बल्कि एक गाली भी हैं. मुझे पता है आप ये जानती हैं कि आज पांच साल से कम उम्र के 46 फीसदी बच्चे कुपोषण और इसके चलते होने वाली शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकलांगता के शिकार हैं.

मेरी जानकारी में सबसे महान एक व्यक्ति ने हमें एक जंत्री दी थी, ‘कोई भी कदम उठाते हुए उस सबसे गरीब या कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो और अपने आप से पूछो कि क्या तुम्हारा ये कदम किसी भी तरह से उस व्यक्ति का कुछ भला करेगा.

इस घड़ी भविष्य की अंधेरी राह पर चलते हुए हमें रोशनी के लिए अतीत के अनुभवों की मशाल लेकर चलना होगा. हमारे देश की बुनियाद डालने वालों की मानवीय दीप्ति ही हमें ये राह सबसे अच्छी तरह से दिखा सकती है.

आपकी अनुमति से मैं एक और बात कहना चाहूंगा. आप वाम के दबाव से भले ही छुटकारा पा गई हों मगर बेहतर होगा कि आप उनकी चिंताओं को ध्यान में रखें. आपको दलितों की महारानी और यादवों के सरदारों की चिंताएं भी समझनी होंगी. ये असहाय लोगों के मुखिया हैं भले ही वे कर उनके लिए कुछ नहीं रहे हों. मकसद महान हैं पर नेता क्षुद्र. इंसानों को खारिज कीजिए और मकसद को अपनाइए. सदियों के नुकसान की मरम्मत का काम तेजी से आगे बढ़ाना होगा.

सोनिया जी, ये सब बातें लिखते हुए मैं खुद को अमीरों का जिक्र करने से नहीं रोक पाता. पैसा अच्छी चीज है. और ये सबको पता है कि हम सभी अमीरों को पसंद करते हैं. नेता भी अपवाद नहीं हैं. मगर क्या आप ये सुनिश्चित करेंगी कि वे अपना सार्वजनिक जीवन गरीबों के लिए रखें. भारत में जनप्रतिनिधियों को सिर्फ गरीबों की बात करनी चाहिए. अमीरों के पास उनका पैसा है. उनके पास मीडिया भी है जो उनकी बात करता है. जिनके पास पैसा पैदा करने का मौका है उनको ऐसा करने के लिए अकेला छोड़ दें और उनके रास्ते में कोई बाधा न डालें. मगर अपने सिपहसालारों से उन पर ध्यान केंद्रित करने को भी कहें जिनकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं है. उनसे कहिए कि उनके जीवन में आशाओं का संचार करें.

अब मुझे रुकना चाहिए. मुझे ये कतई शोभा नहीं देता कि मैं आपको उपदेश दूं. वह भी इतनी बड़ी जीत के मौके पर. चलिए मैं आपकी तारीफ में भी कुछ कह देता हूं. कोई शक नहीं कि अपने अतिरिक्त ईश्वर की मदद से आपने अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से पाला है. उसके पास विनम्रता है, शिष्टाचार है. वह परिश्रमी है, बड़े संदर्भ में सोचता है और सबके बारे में सोचता है. हमें वंशवाद पसंद नहीं मगर उससे ज्यादा हमें बांटने वाली राजनीति नापसंद है. एक आदर्श दुनिया में हमारे यहां ऐसी कोई भी चीज नहीं होनी चाहिए जो सामंती और अलोकतांत्रिक हो. मगर फिलहाल नफरत पैदा करने वाले लोगों से मुक्ति पाने पर ध्यान केंद्रित किया जाए.

राहत की बात ये है कि आपका बेटा उन लोगों से कहीं ज्यादा भारत की आत्मा के संपर्क में है जो भगवान के नाम पर वोटों का व्यापार करते हैं. आपकी पार्टी के ही एक नेता ने मुझसे कभी व्यंग्य भरे स्वर में कहा था, ‘निश्चित रूप से उनके इरादे नेक हैं. वो वृद्ध महिलाओं को सड़क पार करने में मदद करना चाहते हैं. मगर इसका कोई फायदा नहीं.मुझे हैरत है कि अब ये सज्जन क्या सोचते होंगे. बूढ़ी औरतों को सड़क पार कराने वाले नौजवान परिपक्व होकर देश को पथरीली राहों से पार लगाने में भी मदद कर सकते हैं.

क्या मैं आपका ध्यान एक और प्रसिद्ध कथन की तरफ खींच सकता हूं. हालांकि मुझे उम्मीद है कि आपने भी इसे कई बार पढ़ा और सुना होगा. अच्छी नैतिक स्थिति में होने के लिए कम से कम उतने ही प्रशिक्षण की जरूरत होती है जितनी अच्छी शारीरिक स्थिति में होने के लिए.ये बात कहने वाली महान आत्मा का नाम था जवाहर लाल नेहरू. नेहरू के ये शब्द आपकी सेना और राहुल की नैतिकता को मजबूत बनाएंगे. आखिर आज देश के लिए हम जो सपने देखते हैं उनके लिए बुनियाद इसी महान आत्मा ने ही तो डाली थी.

आपको गति और शक्ति मिले आखिर में यही कामना है.

आपका,

तरुण जे तेजपाल 

बदले वक्त की बदलियां

समय का चक्र भी अजीब ही होता है. 1999 में जब जयललिता ने वाजपेयी की सरकार गिराई थी तब सोनिया गांधी ने सरकार बनाने का दावा किया था. उस समय मुलायम ने सोनिया का साथ नहीं दिया और सरकार बनते-बनते रह गई. जुलाई 2008 में जब परमाणु समझते पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया तब कांग्रेसनीत सरकार के तारणहार बने वही मुलायम सिंह, जो उससे पहले तक परमाणु करार के धुर विरोधी भी थे. आज सपा समर्थन देने के लिए मरी जा रही है किंतु कांग्रेस है कि हां भर के नहीं दे रही.

राहुल के कद का कोई व्यक्ति मलाई छोड़ कर धूल-धूप में भटकने जैसे महत्वपूर्ण सांकेतिक कदम उठाता है तो इससे कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना लाजमी है

2004 के चुनाव में बिहार में राजद और लोजपा ने कांग्रेस को महज चार सीटें दी थीं और इस बार लालू उसे तीन सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं थे. मामला जब थोड़ा खिंचा तो लालू और पासवान ने कांग्रेस को छोड़ कर आपस में तालमेल कर लिया. लालू ने मखौल उड़ा कर ये भी जताया कि संगठन खड़ा करने के नाम पर उनकी शर्तें न मान कर कांग्रेस ने अपने पैरों पर तबियत से कुल्हाड़ी मारी है. आज लालू कांग्रेसी नेताओं के बयानों से आहत होकर अपने सम्मान की रक्षा की याचना करते नजर आ रहे हैं.

और तो और मुंबई शेयर बाजार का जो सूचकांक 2004 में चुनावी नतीजे आते ही 500 अंक लुढ़क गया था वो भी इस बार आर्थिक महामंदी के बावजूद दुनिया के सभी बाजारों का अब तक का रिकॉर्ड तोड़ गया.

मगर वक्त के इस कदर बदलने की वजह क्या है? कांग्रेस के वे सयाने जो कुछ भी पूछे जाने पर समीक्षा और सामूहिक निर्णय जैसे जुमले उछालने में सिद्धहस्त हैं, इस बार बिना हिचके इसे राहुल गांधी का करिश्मा मान रहे हैं. उनके मुताबिक, कनिष्ठ गांधी का उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने का साहसी निर्णय बड़ा काम कर गया. मगर यदि ये इतना ही साहसी था तो बीच चुनाव राहुल को वामदलों और नीतिश कुमार की पैरवी करने और चुनाव बाद सोनिया को अपने पुराने सहयोगियों को खुश करने के लिए टेलिफोन खटकाने की कौन सी आवश्यकता आन पड़ी थी?

अगर उत्तर प्रदेश की ही बात की जाए तो वहां कांग्रेस के उत्थान में उसकी खुद की कोशिशों के योगदान के अलावा कल्याण और मुलायम की भाईबंदी, सपा और भाजपा में घाल-मेल का भ्रम, वरुण गांधी का सांप्रदायिक दुराग्रह, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार के रूप में मोदी का नाम उछाला जाना और बसपा का अपने नये और पुराने मतदाताओं को हद दर्जे तक निराश करना भी शामिल है.

इसमें शक नहीं कि संगठन किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी धरोहर होता है. ये न केवल जनता की भावनाओं को नेतृत्व तक पहुंचाता है बल्कि उसकी नीतियों और योजनाओं को लेकर जनता में अनुकूल माहौल बनाने का काम भी करता है. अगर नेहरू के समय से ही मृतप्राय रहे कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने की राहुल गांधी ने ठानी है तो ये देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए शुभ संकेत है. यदि राहुल के कद का कोई व्यक्ति मलाई छोड़ कर धूल-धूप में भटकने जैसे महत्वपूर्ण सांकेतिक कदम उठाता है तो इससे कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना लाजमी है. मगर ये उत्साह इतना ज्यादा और इसका परिणाम इतनी जल्दी इतना बड़ा हो सकता है, ये सोचना तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.

संजय दुबे  

कितनी लंबी यात्रा

Tarun J pal(तहलका की पांच वर्षों की सरोकारी पत्रकारिता पर विशेष)

हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें स्मरण करने की कोई अहमियत ही नहीं रही है. हमारे चारों ओर तमाम पुरस्कार समारोह, सालाना समारोह, गोष्ठियां और दूसरे किस्म के ‘इस या उस स्मृति में’ वाले आयोजन हो रहे हैं. सभी का दावा है कि ऐसा करके वो इतिहास के किसी-न-किसी हिस्से को समृद्ध करने का कार्य कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि मानो जानकारी की सूनामी में दबीं स्मृतियों को झड़ने-पोंछने के बाद इन आयोजनों की खूंटियों से टांगकर उन्हें थोड़ा जीने का मौका दिया जा रहा है. मगर दुखद सच्चाई ये है कि हो ऐसा भी नहीं रहा है. इनमें से कोई ही आयोजन शायद ऐसा हो जो वर्तमान को संवारने और बेशकीमती भूत को संरक्षित करने का काम करता हो. ज्यादातर समारोह विशुद्ध व्यावसायिक हैं जो कुछ ऐसा करने के प्रयास में लगे होते हैं जिससे फायदा उठाया जा सके.जाहिर है कि कैमरे के फ्लैश के जैसे एक क्षण तो इनकी उपस्थिति आंखों में चौंध पैदा करती है और दूसरे ही क्षण घटाटोप छा जाता है. बाजार द्वारा हर चीज को अमूल्य, अनोखा और ऐतिहासिक बनाने की कोशिश, ये सुनिश्चित करती है कि कुछ भी वैसा नहीं बन पाता.

[box]भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है[/box]

ऐसे में तहलका की अंग्रेजी पत्रिका के पांच साल का होने का आयोजन (हिंदी तो अभी महज 6 महीने पुरानी ही है), भी कुछ-कुछ इन्ही आयोजनों जैसा ही लगकर दंभ भरने का सा आभास दे सकता है. लेकिन तहलका के इतिहास पर नजर डालें तो ये नितांत जरूरी प्रतीत होता है. दुनिया को अचंभित करने के लिए नहीं बल्कि खुद को ये विश्वास दिलाने के लिए कि हम तय रास्तों पर न चलकर सही रास्तों पर चलते रहे हैं.

यदि आपने तहलका के किन्हीं दो अंकों को भी पढ़ा है तो आपको ये बताने की जरूरत ही नहीं कि तहलका किस चीज में यकीन रखता है मगर यदि आप इसे पहली बार देख रहे हैं तो मैं इसका एक रेखाचित्र बनाने का प्रयास करता हूं.

मूलत: तहलका, खुद को, हमारे देश के निर्माताओं की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और उदार भारत की सोच से जुड़ा हुआ पाता है. इसी मोटी सी परिभाषा के दायरे में इसकी प्रतिबद्धताएं बिल्कुल साफ हैं. इसको अपने काम के लिए धनी और अभिजात्य लोगों के संसाधन तो चाहिए मगर उनके हितों को साधने की इसकी मंशा कभी नहीं रही. ये तो चुपचाप सब-कुछ झेल रहे, दबे-कुचलों के साथ खड़े होने की मंशा रखता है. ये, जो हमारी पत्रिका कभी नहीं पढ़ सकते या पढ़ेंगे, उनकी कहानियों को उन तक पहुंचाने के प्रयास करता है, जो इसे पढ़ते हैं. इसलिए नहीं कि ये मंदिर में मंच पर बैठकर उपदेश देने का इरादा रखता है बल्कि ये बताने के लिए कि भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है. इस रिश्ते की मर्यादा निभाए जाने पर ही भारत राष्ट्र के होने का मौलिक विचार टिका हुआ है. इस बात को लगातार ध्यान में रखने पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है. कुलीनों के पास भी अंतत: तभी एक देश रह सकता है जब वो इसमें औरों की हिस्सेदारी को स्वीकार कर सकते हैं.

तहलका, वर्ग, जाति, भाषा, धर्म या किन्हीं ऐसी ही दूसरी चीजों पर आधारित हर तरह की कट्टरता की खिलाफत करता है. हमारे उपमहाद्वीप में मौजूद तरह-तरह की असंख्य दरारों में से एक सबसे नुकसानदेह हिंदू और मुसलमानों के बीच शत्रुता की भावना है. इसने हमें कई बार बुरी तरह तबाह किया है और ये हमारे टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता रखती है. इसे दुनिया के सामने कुछ और एकांत में कुछ जैसे किसी दोगलेपन की नहीं बल्कि एक सीधी और मजबूत नजर से देखे जाने की जरूरत है. पूर्वाग्रह और अन्याय का हल ढूंढ़ने और आधुनिकता के वरदानों, जो कि नई तकनीक वाले नये-नये खिलौने नहीं बल्कि सहिष्णुता और शांतचित्त वाली समझ है, को फिर से मजबूत किए जाने की आवश्यकता है. मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा. इन परिस्थितियों के कोलाहल में विवेक और समझदारी के लिए लड़ते तहलका का तंबू मजबूती से तना हुआ है.

एक पत्रिका जिसका अंग्रेजी संस्करण – यदि सब कुछ ठीक रहे तो – मात्र 1 लाख ही बिकता हो और संसाधनों को गवारा न हो तो महज 50 हजार से कुछ ज्यादा तथा जिसका हिंदी संस्करण अभी हर 15 दिन में करीब 50 हजार की संख्या ही पार कर पाता हो, उसके द्वारा ये सब कहा जाना काफी बड़े बोल लग सकता है. किंतु विनम्रता के साथ में इतना जरूर कह सकता हूं कि इतनी कम क्षमताओं के साथ तहलका ये अच्छे से समझता है कि इसका काम हर व्यक्ति को हिलाना नहीं बल्कि उन्हें हिलाना है जो जनता को गति, दिशा और बेहतर भविष्य दे सकने की क्षमता रखते हैं. तरह-तरह के रहस्यों को सामने लाकर, आम लोगों में तर्क-वितर्क की स्थितियां और बुद्धिजीवियों में उद्वेलन उत्पन्न कर तहलका समाज की दो सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों – राजनीतिक और आर्थिक – को उनके सुंदरतम रूपों में सीमित रखने के प्रयास में लगा रहता है. ये शक्तियां एक हाथी की तरह हैं और मीडिया एक अंकुश की तरह जिसका मुख्य काम इस हाथी को सही रास्ते पर चलने को विवश करते रहने का है.

इससे कुछ और आगे जाते हैं. हो सकता है कि अब तक ये भी कुछ स्पष्ट हो गया हो कि तहलका केवल एक निरपेक्ष इतिहासकार की भूमिका निभाने में विश्वास नहीं रखता. जैसा कि चलन है कि किसी स्टोरी के लिए दोनों तरफ के संस्करणों को लिया और उनकी सत्यता जांचने की कड़ी मेहनत किए बिना उन्हें छाप डाला. तहलका अपने निर्णय और राय को किसी भी स्टोरी में शामिल करने से गुरेज नहीं करता. उदाहरण के तौर पर अर्थ और व्यापार जैसे एक ऐसे क्षेत्र में जिसमें तहलका को कोई विशेषज्ञता हासिल नहीं है, तहलका पहली समाचार पत्रिका थी, जिसने शेयर बाजार में कुछ बहुत ज्यादा गड़बड़झाला चल रहा है, ऐसी घोषणा कर दी थी. और ये सब बाजार के ढह जाने के काफी पहले किया गया था. हालांकि तहलका ने कभी भी निजी प्रकृति के अभियान चलाने में भरोसा नहीं किया परंतु मगर हर सार्वजनिक लड़ाई में ये किस जगह खड़ा है इसे लेकर कभी संदेह की कोई गुंजाइश भी इसने कभी नहीं छोड़ी. तहलका मानता है कि एक पत्रकार का काम केवल जानकारी देना भर नहीं बल्कि जनहित के लिए एक योद्धा की तरह लड़ने का भी है जो हर सभ्य कदम, हर मानवीय मूल्य को अपना कंधा देता रहता है.

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो निस्संदेह इससे लड़ने की जरूरत है मगर ये असमानता और अन्याय के साथ लड़े जाने वाले एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण युद्ध का एक छोटा सा हिस्सा ही है. भ्रष्टाचार एक असमान और अन्यायी समाज का लक्षण भर है और बिना झिझक ये कहा जा सकता है कि ये आकलन संपूर्ण विश्व में सत्य साबित हो चुका है. अगर सबको बराबरी का अधिकार और विरोध करने की क्षमता मिल जाती है तो भ्रष्टाचार झेली जा सकने वाली हदों में सीमित किया जा सकता है.

[box]हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा[/box]

इससे पहले कि हम अत्यधिक गंभीर सुनाई-दिखाई पड़ने लगें, मैं कहना चाहता हूं कि तहलका को कला और संस्कृति पर किए गए अपने काम पर भी खूब मान है. यहां पर उद्देश्य सिर्फ इतना ही रहा है कि चाटुकारिता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार से बचा जाए जिससे आज शायद ही कोई अछूता हो. जैसे कि किसी के काम की समीक्षा उसके मित्र या उससे अतिरिक्त सहानुभूति रखने वाले किसी व्यक्ति से करवाना या फिर किसी ऐसे से करवाना जो लेखक या कलाकार के प्रति हद दर्जे की दुर्भावना या शत्रुता रखता हो. तहलका हमेशा बिल्कुल ही हवाई चीजों की अनदेखी और तथ्यात्मक आलोचना में विश्वास रखने के साथ जन-संस्कृति से जुड़ी चीजों को भी सारगर्भित बनाने का प्रयास करता रहा है. सिनेमा से जुड़े इसके कई साक्षात्कार नई जमीन ढूंढ़ने वाले साबित हुए. हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा.

जो कुछ ऊपर लिखा है वो पांच साल पहले और भी ज्यादा बड़बोलापन और डींग हांकना कहलाता. मगर 250 से ज्यादा अंग्रेजी और 12 हिंदी के संस्करणों की वजह से हमारे दावे में लोगों को अब सच्चाई की एक छोटी सी झलक जरूर दिख रही होगी. एक ओर जहां हमें अपनी गुजरात 2002, सिमी, जेसिका, निठारी की इन्वेस्टिगेशंस पर गर्व है वहीं दूसरी ओर अपने काम की सामाजिक प्रतिबद्धता पर गहरा संतोष भी है. चाहे वो दलितों और जनजातियों से जुड़े मुद्दे हों या विकास और पुनर्वास से जुड़े या भोपाल, सिंगूर, बंत सिंह और अरावली में अवध खनन या फिर बांधों और किसानों की आत्महत्याओं की दिल दहलाने वाली सच्चाइयां, तहलका हमेशा इनमें अपनी जिम्मेदारियां को तलाशने और उन्हें निबाहने की कोशिश में लगा रहा.

हालांकि तहलका के बढ़िया काम का श्रेय इसके संपादकों को जाता है. मगर इसको सही मायनों में प्रेरणा देने वाले इसमें काम कर रहे युवा पत्रकार हैं – जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं – जो बेहद प्रतिभाशाली, ईमानदार, मजबूत और तहलका की सरोकारी पत्रकारिता से पूरी तरह जुड़ा हुआ महसूस करने वाले हैं.

हर उम्मीद जगाने वाली कहानी में एक अंधेरा कोना भी होता ही है. पांच साल पहले कोई भी हमसे उबरने और पत्रिका निकालने की जरा भी उम्मीद नहीं कर रहा था. जब हमने ऐसा कर लिया तो लोगों का कहना था कि हम ज्यादा से ज्यादा एक साल के मेहमान हैं. मैं ये कहना चाहता हूं कि उनकी आशंका बिल्कुल सही थी. ये एक बेहद दुर्गम यात्रा रही है – सप्ताह दर सप्ताह, महीना दर महीना. प्रशंसाएं और शाबाशी तो दुनिया भर से खूब मिलीं लेकिन संसाधनों का हमेशा टोटा पड़ा रहा.

मीडिया के इस स्वर्णिम काल में हर कोई सोचता होगा कि निवेशक हमसे जुड़ने के लिए कुछ भी कर सकने को तैयार होंगे जिससे हम और भी भाषाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें, एक टेलिविजन चैनल ला सकें. हालांकि कुछ अद्भुत लोग आगे आए भी किंतु कहते हुए दुख सा होता है कि ये नाकाफी से भी कुछ कम ही रहे. शायद ऐसा हमारी कारोबारी अक्षमताओं या देश के धनी लोगों की ऐसे कामों के प्रति अनिच्छाओं या फिर जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं उसकी प्रकृति की वजह से हुआ होगा.

फिर भी अगर आज मैं कुछ कह सकता हूं तो ये कि हम अब न केवल पांच साल के हो गए हैं बल्कि आगे बढ़ने के लिए दृढ़निश्चयी भी हैं. हो सकता है आगे हम आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंच जाएं और हो सकता है कि हम औंधे मुंह गिरकर ढ़ेर हो जाएं. मगर उम्मीद है कि हम कभी अपनी सोच और विश्वास को पैदा करने वाली मशीनरी में कोई बदलाव नहीं करेंगे.

जनादेश या धनादेश?

हरे-भरे पेड़ों और नेताओं के भव्य बंगलों की कतार वाली फीरोजशाह रोड को देखकर कोई नहीं कह सकता कि यहां किसी तरह की निगरानी की जरूरत है. मगर पिछले दिनों खुफिया अधिकारी यहां स्थित एक इमारत की तीसरी मंजिल पर बने एक फ्लैट पर निगाह रखे हुए थे. 34, फीरोजशाह रोड पर स्थित इस फ्लैट के बारे में विश्वसनीय सूचना मिली थी कि इसमें रहने वाले हवाला के जरिए दक्षिण-पूर्व एशिया की किसी जगह से 380 करोड़ रुपये की रकम जुटा रहे हैं. अधिकारियों के मुताबिक ये पैसा आम चुनाव में खर्च करने के लिए आ रहा था और खुफिया सूत्रों की मानें तो इसमें शामिल लोगों में कोलकाता का एक कारोबारी और अवैध शराब के धंधे में सक्रिय उसका एक सहयोगी शामिल था.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस)द्वारा देश भर में किए गए सर्वे के दौरान 20 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि बीते दशक में नेता या पार्टियां उन्हें वोट के बदले नोट की पेशकश करती रही हैं

पर्व का दूसरा नाम होता है खर्च. और फिर ये तो लोकतंत्र का महापर्व है इसलिए आमचुनाव के इस महासमर में उतरा हर योद्धा अपनी पूरी ताकत झोंक देना चाहता है. इस ताकत का ज्यादातर हिस्सा काले धन से मिलकर बनता है. दरअसल चुनाव जीतने की कवायद में किया जा रहा खर्च समुद्र में तैरते किसी विशाल हिमखंड की तरह है जिसका वह दसवां हिस्सा ही नजर आता है जो पानी से ऊपर होता है.

चाहे वह उम्मीदवार हो या पार्टी, ऊपरी तौर पर तो हर कोई यही दिखा रहा है कि वह चुनावी खर्च के लिए चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 25 लाख रुपए प्रति उम्मीदवार की सीमा के भीतर ही बंधा हुआ है मगर देखा जाए तो हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. उधर, आयोग भी जानता है कि अवैध तरीके से खर्च किए जा रहे पैसे के मामले में उसके हाथ बंधे हुए हैं. मसलन जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 कहती है कि शुभचिंतकों की तरफ से किसी उम्मीदवार पर खर्च की जाने वाली रकम उसके चुनाव खर्च में शामिल नहीं की जाएगी. यही वह वजह है जिसके चलते उम्मीदवार खर्च की तय सीमा के परे जाकर बिना चिंता किए पैसा पानी की तरह बहा सकता है. शायद इसीलिए चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि चुनाव के दौरान अनाधिकारिक तरीके से खर्च किए जा रहे पैसे का वे कुछ नहीं कर सकते. उनके ऐसा कहने के कुछ ही दिन बाद खबर आई कि बिहार के बेतिया से लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे फिल्मकार प्रकाश झा के दफ्तर की दराजों से 10 लाख रुपये बरामद हुए. बेतिया के एसपी के एस अनुपम पत्रकारों को बता रहे थे, ‘ये पैसा वोटरों में बांटने के लिए था.’ अब देखना है कि ये आरोप साबित हो पाता है कि नहीं. सबूत तो कोई है नहीं और चुनाव में पैसा कितनी अहमियत रखता है ये सबको पता है. पूर्व वित्त सचिव एस नारायण तहलका से कहते हैं, ‘मैं आजकल चेन्नई में हूं और मोटा-मोटा अनुमान भी लगाया जाए तो मेरे हिसाब से अकेले मदुरै के तीन निर्वाचन क्षेत्रों में ही 700 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं. चुनावों के दौरान दक्षिण भारत में हमेशा उत्तर भारत से ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है.’ कई और जानकार भी ये बात कहते हैं जिनके मुताबिक जहां जितनी ज्यादा समृद्धि होगी वहां उतना ज्यादा खर्च भी होगा.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस)द्वारा देश भर में किए गए सर्वे के दौरान 20 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि बीते दशक में नेता या पार्टियां उन्हें वोट के बदले नोट की पेशकश करती रही हैं. कर्नाटक, त्रिपुरा, प. बंगाल, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जसे राज्यों में तो करीब 50 फीसदी मतदाताओं ने ऐसा कहा था. यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी करीब एक चौथाई मतदाताओं ने ये माना कि उन्होंने कभी न कभी अपना वोट देने के लिए पैसा लिया है.

जानकारी रखने वाले सूत्र तहलका को बताते हैं कि वोटों को ‘खरीदने’ के लिए पार्टियों ने कुल मिलाकर करीब 10 से 15 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम किया है

सीएमएस का अनुमान है कि चुनाव बजट का एक चौथाई हिस्सा इस तरह की अवैध गतिविधियों में खर्च होता है.  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के एक पूर्व प्रोफेसर जगदीप छोक्कर कहते हैं, ‘भारत में राजनीतिक पार्टियों का मुख्य मकसद होता है किसी भी कीमत पर जीतना.’

चर्चित पुस्तक डर्टी मनी एंड हाउ टु रिन्यू फ्री मार्केट के लेखक रेमंड बेकर लिखते हैं कि 1970 से लेकर आज तक गरीब देशों से कम से कम 10 खरब डॉलर की राशि पश्चिमी देशों की बैंकिंग व्यवस्था में पहुंच चुकी है. पैसे की अवैध आवाजाही पर निगाह रखने वाले अमेरिका स्थित संगठन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी ने उन 160 विकासशील देशों की कतार में भारत को पांचवें स्थान पर रखा है जहां से भारी मात्रा में अवैध तरीके से पूंजी बाहर चली जाती है. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 2002 से 2006 के दौरान भारत से हर साल 22 से 27 अरब डॉलर की पूंजी बाहर गई. लेकिन चुनाव के समय इस पैसे का एक हिस्सा वापस भारत आ जाता है. कहने की जरूरत नहीं कि जैसे ये जाता है उसी तरह इसके वापस आने की प्रक्रिया भी अवैध ही होती है और इसे मुख्य तौर पर हवाला के जरिए अंजाम दिया जाता है. पैसे के स्थानांतरण की इस प्रक्रिया की एक खास बात ये भी है कि ये इस तरह की सरकारी प्रक्रियाओं से कहीं बेहतर तरीके से संचालित होती है.

जानकारी रखने वाले सूत्र तहलका को बताते हैं कि वोटों को ‘खरीदने’ के लिए पार्टियों ने कुल मिलाकर करीब 10 से 15 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम किया है. इसके अलावा दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में ज्यादा से ज्यादा वोट अपने पक्ष में करने के लिए नेता हवाई यात्राओं के जरिए करोड़ों रुपये खर्च कर देश के करीब तीस लाख वर्ग किलोमीटर इलाके की खाक छान रहे हैं. हर चुनाव में प्रचार की लागत दोगुनी हो रही है और विश्लेषकों को लगता है कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर मतदाता की समझ की बजाय पैसे की ताकत हावी हो रही है. ऐसा अक्सर अमेरिकी चुनावों में देखने को मिलता है. इससे भी बुरी बात ये है कि अमेरिका की तरह ही ये पैसा कहां से आता है और कहां जाता है इसका हिसाब-किताब पूछने वाला कोई नहीं. ऐसे में चुनाव आयोग की चिंता स्वाभाविक ही है.

हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को कलर टीवी बांटने और वोटर्स के लिए एक स्पेशल कैश स्कीम का एलान करने के लिए चुनाव आयोग की झिड़की खानी पड़ी. मगर रैलियों में नोट या सोने की चेन बांटना या फिर नायडू जैसे मामले तो चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के उन चंद उदाहरणों में से कुछ हैं जो पकड़ में आ जाते हैं. इस तरह के ज्यादातर काम तो आचार संहिता लागू होने से पहले ही हो जाते हैं.

नतीजतन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल कई किस्से दौड़ लगा रहे हैं. जैसे कि फलां-फलां टीवी चैनल को पार्टी के प्रचार से संबंधित खबरें चलाने के लिए 200 करोड़ रुपए दिए गए हैं. या फिर एक बड़ी कंपनी के सीईओ माकपा के दिल्ली स्थित दफ्तर आए और उन्हें बड़ा राजनीतिक चंदा देने की पेशकश की बशर्ते कि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाली एक बड़ी नेता किसी भी तरह इस पद पर बैठने न पाए. ये भी कहा जा रहा कि तंबाकू उत्पाद बनाने वाली एक कंपनी के मालिक, जो उत्तर प्रदेश में रहते हैं, अपनी अकूत संपत्ति के कारण एक पार्टी की राज्य इकाइयों में पैसा भेजने का जरिया बने हुए हैं. कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि मुंबई स्थित पड़ी कंपनियां अब उन राज्यों में चुनाव प्रचार पर अपना पैसा लगा रही हैं जहां उनके व्यावसायिक हित हैं.

2004 से 2008 के दौरान महज 21 दलों ने अपने चंदे का ब्यौरा आयोग को सौंपा जबकि इस देश में 6 राष्ट्रीय और 36 क्षेत्रीय दलों सहित 1000 से भी ज्यादा पार्टियां हैंपूर्व वित्त सचिव एस नारायण कहते हैं, ‘इस बार पूरे भारत में पैसे की जितनी ताकत दिखेगी वैसी शायद पहले कभी नहीं देखी गई होगी. सिर्फ शहरी और ऊंचे पढ़े-लिखे लोगों से (अगर युवा वर्ग वोट देने को निकला तो उससे भी) चुनाव में पारदर्शी वोटिंग और सही मायने में लोकतांत्रिक चुनाव की उम्मीद की जा सकती है.

सूत्र बताते हैं कि पिछले दो महीने से लेन-देन संबंधी गतिविधियां रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं. बिचौलिये सौदों में कमीशन की पेशकश कर रहे हैं और पैसा राज्यों में सत्ता में बैठीं राजनीतिक पार्टियों की झोलियों में पहुंच रहा है. कॉरपोरेट जगत के एक भीतरी सूत्र के शब्दों में ‘आपको पेपर पर कुछ नहीं मिलेगा मगर ये सच है कि हजारों करोड़ रुपए के सरकारी टेंडरों का कुछ हिस्सा नियमित रूप से सत्तासीन पार्टी की तिजोरी में पहुंचता रहता है.’ सूत्र आगे जोड़ता है कि जैसे ही चुनाव का ऐलान होता है राज्यों में पैसा जुटाने की जुगत शुरू हो जाती है. अनौपचारिक रूप से इसे मुख्यमंत्री कोष कहा जाता है और वैसे तो ये राज्य में होने वाले खर्च के लिए होता है किंतु अगर जरूरी हुआ तो पैसे को पार्टी की केंद्रीय वित्त इकाई को भेजा जाता है. यहां से इस पैसे को उन राज्यों में इस्तेमाल के लिए भेजा जाता है जहां पार्टी सत्ता में नहीं है. जैसा कि एक सूत्र कहता है, ‘दिल्ली के अलावा कुछ और ऐसे पॉकेट्स हैं जो दूसरे क्षेत्रों का ख्याल रखते हैं. ये ऐसा है जैसे पार्टी की महाराष्ट्र इकाई, गुजरात और आंध्र प्रदेश इकाई, कर्नाटक को फंड कर रही हो.’

उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में रूरल रोड डिवेलपमेंट एजेंसी में काम कर रहे जनरल मैनेजरों का मामला ही लीजिए जिन्हें एक मंत्री के दफ्तर से फोन आया जिसमें उनसे पांच लाख रुपए की मांग की गई थी. बार-बार की जा रही कॉलों से परेशान होकर उन्होंने कुछ दिन पहले चुनाव आयोग से इसकी शिकायत कर दी. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आयोग इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है. वैसे जानकार बताते हैं कि इस तरह की मांगें हर राज्य में आम बात है. समाजवादी पार्टी ने तो चुनाव प्रचार के तहत बसपा सुप्रीमो मायावती की चार सीडी बनाई थीं जिनमें उन्हें राज्य के नौकरशाहों से पैसे की मांग करते दिखाया गया था. सपा ने ये सीडी चुनाव आयोग को भी सौंपीं मगर आयोग ने उन्हें खारिज कर दिया. मगर सीडी में जो कुछ भी था शायद ही कोई उसकी सच्चाई से इत्तेफाक न रखता हो क्योंकि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के बारे में इस तरह की बातें सुर्खियां बनती ही रहती हैं.

उगाही की गाज अकेले सरकारी कंपनियों पर नहीं गिरती. देश के कॉरपोरेट जगत के कई मुखिया भी कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों की तरफ से पैसे का दबाव बहुत ज्यादा रहता है. कॉरपोरेट्स चाहते हैं कि इस व्यवस्था में फौरन बदलाव कर इसे बेहतर बनाया जाए ताकि राजनीतिक फंडिंग की प्रक्रिया में पारदर्शिता आ सके. सीआईआई की हालिया सालाना बैठक में भी ये मसला उछला था जहां टाटा कम्युकेशंस के चेयरमैन सुबोध भार्गव और बजाज ऑटो के मुखिया राहुल बजाज ने चुनाव में बह रही काले धन की नदी पर चिंता व्यक्त की थी. बजाज का कहना था, ‘स्वच्छ धन से फर्क पड़ता है. आज तो 60 फीसदी कंपनियां राजनीतिक पार्टियों को काले धन की मार्फत फंडिंग कर रही हैं.’

बिरला और टाटा जैसे व्यापारिक समूहों ने चुनाव के लिए अलग से एक इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाया हुआ है जिसके जरिए वे राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं. टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि पंजीकृत पार्टियों को चंदा देता है

जन प्रतिनिधित्व कानून(1951) में 2003 में एक संशोधन कर एक नियम बनाया गया था कि राजनीतिक दल हर वित्तीय वर्ष के दौरान मिलने वाले चंदे और उसके स्रोत की जानकारी चुनाव आयोग को देंगे.  ये नियम बीस हजार रुपये से अधिक की रकम के लिए लागू होता है. मगर 2004 से 2008 के दौरान महज 21 दलों ने अपने चंदे का ब्यौरा आयोग को सौंपा जबकि इस देश में 6 राष्ट्रीय और 36 क्षेत्रीय दलों सहित 1000 से भी ज्यादा पार्टियां हैं. सूचना के अधिकार को अपनी अहम उपलब्धियों में से एक बताने वाले राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और डीएमके जैसे यूपीए के घटक दल अपने चंदे का ब्यौरा देने की जरूरत नहीं समझते. विडंबना देखिए कि जिन्होंने ये जानकारी दी भी है उनके चंदे और खर्च को देखकर आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया वाली कहावत याद आती है. मसलन समाजवादी पार्टी को 2007-08 के दौरान सिर्फ 11 लाख रुपये का चंदा मिला.

जानकारों के मुताबिक कॉरपोरेट कंपनियां राजनीतिक दलों को फंडिंग के रूप में जो चंदा देती हैं उसका 60 फीसदी काला धन होता है. औसतन देखा जाए तो एक उम्मीदवार अपने चुनावी क्षेत्र में तीन से 15 करोड़ रुपए तक खर्च करता है.  फिक्की के महासचिव अमित मित्रा कहते हैं कि समस्या नेता या उद्योगपति नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘चुनावों में चंदा तो देना ही होगा मगर ये तय होना चाहिए कि एक व्यक्ति अधिकतम कितना पैसा दे सकता है. भारत या तो अमेरिका के रास्ते पर चल सकता है जहां कंपनियां चुनाव में जमकर चंदा देती हैं या फिर यूरोप के जहां चुनाव का सारा खर्च सरकार उठाती है.’

बिरला और टाटा जैसे व्यापारिक समूहों ने चुनाव के लिए अलग से एक इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाया हुआ है जिसके जरिए वे राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं. टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि पंजीकृत पार्टियों को चंदा देता है जिसका आधार लोकसभा में उन पार्टियों के सदस्यों की संख्या होती है. स्विस बैंकों में जमा भारतीय रकम का मुद्दा उठा रहे भाकपा के उप महासचिव सुधाकर रेड्डी फंडिंग के लिए साफ तौर पर कायदे-कानून बनाए जाने की जरूरत बताते हैं. वे कहते हैं, ‘साफ है कि राजनीतिक दलों को चंदा देने वाली कंपनियां सोचती हैं कि पार्टी के सत्ता में आने पर उन्हें इसका फायदा मिलेगा.’

निवेश पर फायदे की यही सोच चुनाव के दौरान कॉरपोरेट फंडिंग को प्रोत्साहन देती है. चुनाव दर चुनाव प्रचार का खर्च बढ़ता जा रहा है और पार्टियों के लिए भी ज्यादा से ज्यादा चंदा जुटाना जरूरी हो गया है. चुनाव प्रचार में किए जा रहे खर्च की निगरानी के लिए कई गैर सरकारी संगठनों से मिलकर बनी एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स से जुड़े अनिल बेरवाल कहते हैं, ‘राजनीति वास्तव में पैसे का बड़ा खेल है. जो लोग जमकर खर्च कर रहे हैं उनके लिए ये सिर्फ निवेश है जिसके एवज में वे दस गुना फायदे की उम्मीद करते हैं.’ बेरवाल के मुताबिक अतीत में उम्मीदवार और पार्टियां सामूहिक विवाह जैसे आयोजन करती थीं और वहां पर वोट के बदले नोट बांटा करती थीं मगर राजनीतिक परिदृश्य में चलन लगातार बदल रहा है. वे कहते हैं, ‘एक दशक पहले एक वोट की कीमत जहां 100 रुपए होती थी वहीं आज ये 1500 से 2000 रुपये तक पहुंच गई है.’

ऐसा नहीं कि चुनाव आयोग को पैसे के इस अंधाधुंध इस्तेमाल की जानकारी नहीं. हाल ही में रिटायर हुए मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के शब्दों में ‘हमारा जोर चुनाव के दौरान पैसे की ताकत पर अंकुश रखने पर होगा.’ गोपालस्वामी का ये भी कहना था कि चुनाव से जुड़े खर्च पर खास तौर से निगाह रखने के लिए चुनाव आयोग ने 2000 पर्यवेक्षक तैनात किए हैं जिनमें से कई सीनियर टैक्स रेवेन्यू अधिकारी हैं.

मगर उम्मीदवारों की संख्या और उनके द्वारा खर्च किए जा रही रकम के आंकड़ों को देखते हुए ये काफी दुरुह काम नजर आता है. अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी आधिकारिक रूप से इस चुनाव में 1500 करोड़ रुपए खर्च करने जा रही है. भाजपा का बजट 1000 करोड़ रुपए का है जिसमें से 200 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च करने के लिए रखे गए हैं. बसपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का बजट 700 करोड़ और डीएमके का 400 करोड़ रुपए का है जिसका श्रेय केंद्रीय संचार मंत्री ए राजा की हालिया चंदा कवायदों को भी जाता है. एआईएडीएमके का बजट करीब 300 करोड़ रुपए का है जबकि माकपा और उसके सहयोगियों के लिए ये आंकड़ा 250 करोड़ रुपए है.

वैसे हर खर्च अवैध नहीं होता. कई खर्चे वैध तरीके से भी होते हैं हालांकि तब भी सवाल फिजूलखर्ची पर तो उठाया ही जा सकता है. मिसाल के तौर पर हैलीकॉप्टर और प्राइवेट जेट्स के इस्तेमाल पर होने वाला खर्च जो  2004 में हुए चुनावों की तुलना में इस बार दोगुना हो गया है. वर्तमान में राजनीतिक पार्टियों ने 45 से 50 हैलीकॉप्टर और 22 छोटे हवाई जहाज किराए पर ले रखे हैं. एयर चार्टर्स इंडिया के मुखिया आर पुरी कहते हैं, ‘मांग बहुत ज्यादा है और राजनीतिक दल पैसे के मामले में कोई संकोच नहीं करते.’ उनकी कंपनी ने अपने सभी हैलीकॉप्टर्स और जेट्स किराए पर दे दिए हैं और ये किराया पचहत्तर हजार से डेढ़ लाख रुपए प्रति घंटा तक है. भारत की सबसे पुरानी एयर चार्टर फर्म हाई फ्लाइंग एविएशन की आर्डर बुक भी पूरी तरह भर चुकी है. सरकारी स्वामित्व वाले पवनहंस के पास विशाल बेड़ा तो है मगर उसे अपने विमान राजनीतिक पार्टियों को देने की इजाजत नहीं है. हालांकि राजनीतिक दल उन हैलीकॉप्टर्स को किराए पर ले सकते हैं जिन्हें कॉरपोरेशंस को लीज पर दिया गया हो. इसके अलावा अपना निजी हैलीकॉप्टर रखने वाले कई धनकुबेर भी हैं जो अपने करीबी नेताओं को बिना शुल्क इनकी सेवाएं देने के लिए तैयार रहते हैं. हालांकि ये बात अलग है कि इसका शुल्क वे बाद में वसूलने की अपेक्षा रखते हैं. साथ ही राज्य सरकारों के अधीन 17 हेलीकॉप्टर्स भी हैं जिन्हें चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

ऊंची उड़ान भरने के लिए पैसा चाहिए और लगता है कि भारत के नेताओं को ये आसानी से और इफरात में मिल रहा है.

(विकास बहुगुणा के योगदान के साथ)   

खाने

 बचपन से देखा था, ढेरों खाने थे

खानों के बाद खाने, बड़े-छोटे, पतले-मोटे

अनगिनत

और इन्हीं खानों से तय होते थे रिश्ते

इन्हीं के आकार के नापे काटे जाते थे संबंध

इससे जिम्मेदारी का सरोकार है

‘‘तो फिर यह बेटा हुआ’’

यह जन्म का जिम्मेदार है ‘‘जाहिर है पिता है’’

इसे देखकर बदन चीखता है ‘‘शौहर है और भला कौन’’

इसे देखकर मन भीगता है  ‘‘चलो महबूब सही’’

शौहर के खाने में महबूब के नाप की इच्छाएं

‘‘दीवानी हो क्या?’’

 भाई में दोस्त का चेहरा ‘‘हटाओ इसे’’

पाला करो सिर्फ उतने ही जज्बात जो इन खानों में आयें

और जो उगे बढ़े जरा भी कुछ ज्यादा तो

 क़तर दो, ये बग़ावत है

और बगावतें भले घरों की लड़कियां नही करती

सोचती हूं खानों के इस गणित में कहां जाते होंगे वोरिश्ते

जिनकी शकल ही पहचान में नहीं आती

जो या तो बिना आकार के अमीबा की तरह मन में पलते हैं

या गर्म पारे की तरह लहू मांस में घुलते है

कब से लिए बैठी हूं तेरा नाम हाथों में

कोई खाना मिले तो रखूं. 

                                                       भावना पांडे

 

 

(लेखिका एक टीवी चैनल में कार्यरत हैं) 

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