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श्रीमती गांधी और उनका एक और आराध्य

आदरणीय श्रीमती सोनिया गांधी जी,

मेरे इन शब्दों में कुछ नया नहीं है कि भारत एक ऐसा देश है जो आस्था पर चलता है. हम अपने देवी-देवताओं को पूजते हैं और अपनी सफलताओं और विफलताओं को उनके चरणों में अर्पित कर देते हैं. इस में यकीन और आपसे विरोध रखने वाले लोग जोर देकर कह सकते हैं कि इस मामले में आप अनुचित तरीके से लाभ की स्थिति में हैं. शादी और उसके बाद भारतीय परंपराओं में ढलकर आपने उन सभी -देवी देवताओं को अपना लिया जो दूसरे भारतीय नेताओं के भी होते हैं. मगर वह देवता तो आपके पास पहले से था ही जिसे आप अपने सुदूर मूल देश से अपने साथ लाई थीं.

आपको दलितों की महारानी और यादवों के सरदारों की चिंताएं भी समझनी होंगी. ये असहाय लोगों के मुखिया हैं भले ही वे कर उनके लिए कुछ नहीं रहे हों. मकसद महान हैं पर नेता क्षुद्र 

चूंकि हमारी आपसे कोई लड़ाई तो है नहीं इसलिए हमें खुशी है कि आपके पास एक अतिरिक्त देवता है. जैसा कि आप जानती हैं भारत में इतने सारे आराध्य केवल इसलिए हैं क्योंकि यहां इतनी सारी समस्याएं हैं. हालांकि हमारे यहां धुर वामपंथी और दक्षिणपंथी ऐसे लोग भी हैं जिनके दिमाग में स्वयं ईश्वर ही एक समस्या है. पहला वर्ग ये सोचता है कि ईश्वर को लोगों की सोच से किस तरह निकाला जाए तो दूसरे की चिंता ये है कि ईश्वर को लोगों के दिमाग में किस तरह भरा जाए. पर फिलहाल इन लोगों की बात छोड़ देते हैं क्योंकि जब जनता ने ही उनकी नहीं सुनी तो हम क्यों सुनें.

तो हमें खुशी है कि आपके पास एक अतिरिक्त ईश्वर है. कोई चीज अधिक होना हमेशा काम ही आता है. हमारे देवताओं के कई पहलू हैं. वे रसिया भी हैं और दार्शनिक भी. अक्सर उनकी नैतिकताएं समझना मुश्किल होता है क्योंकि वे भी कर्म, धर्म, मोक्ष और माया के वशीभूत होते हैं. मगर आप जो ईश्वर अपने साथ लाई हैं वह सही-गलत, पाप-पुण्य और दया और करुणा के बारे में कहीं ज्यादा साफगोई से अपनी बात कहता है. हम इसका स्वागत करते हैं. धर्म की मतलबी व्याख्याओं से पैदा हुए भौतिकतावाद की अति के बीच यदि कहीं थोड़ी स्पष्टता देखने को मिल जाए तो इसमें आखिर बुरा ही क्या है.

अब जब कि हम इससे सहमत हैं कि आपके पास हमारी तुलना में एक अतिरिक्त देवता है तो इसका ये मतलब है कि आपकी जिम्मेदारियां भी हमसे ज्यादा होनी चाहिए. अधिकारों की प्राप्ति के साथ कर्तव्यों के पालन की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है और आपका अतिरिक्त ईश्वर इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट कहता है कि इसका पालन कैसे किया जाना चाहिए. हम आपके आभारी होंगे अगर आप उसकी बात पर ध्यान दें. अपने लिए नहीं बल्कि दूसरे दसियों करोड़ लोगों की खातिर.

इसका मतलब ये है कि आपको ये नहीं सोचना है कि आपकी जी-तोड़ मेहनत के दिन अब खत्म हुए. इसमें कोई शक नहीं कि आपने उस सेना का नेतृत्व करते हुए शानदार प्रदर्शन किया है जिसके सिपहसालारों को ये तक नहीं पता था कि असल में ये लड़ाई हो कैसे रही है. बल्कि इन सिपहसालारों को तो सबसे ज्यादा महारत आपस में ही तलवारें भांजने में थी. व्यक्तिगत हमलों के बावजूद कई सालों तक आप अपना काम करती रहीं. किसी जनरल को ये बताया जाना अच्छा नहीं लगता कि बंदूक कैसे पकड़नी है या सिपाहियों से किस जबान में बात करनी है. पर किसी अज्ञात प्रेरणा के चलते आपको मालूम था कि इस तरह के ओछे अपमान अच्छी और महान विभूतियों को अच्छे और महान कामों से दूर रख सकते हैं. आपको ये बात समझ में आ गई थी कि लड़ाइयां आखिर में बंदूक की गोली के आकार या बिगुल की गूंज की तेजी से नहीं बल्कि दिल की मजबूती से जीती जाती हैं. 13 साल में सिर्फ अपने रास्ते पर टिके रहकर आपने लड़ाई के मायने बदल कर रख दिए.

अपनी लड़ाई में आप सफल साबित हुई हैं. 1996 में खस्ताहाल आपकी सेना 2009 में नई ऊर्जा और उत्साह से लैस है. इस प्रक्रिया में आपने बड़ी चतुराई और खूबसूरती से अपने अतिरिक्त ईश्वर की दो आज्ञाओं का पालन किया है. बाइबल में कहा गया है कि लालच नहीं करना चाहिए. इस आदेश को आपने इस कुशलता से त्याग के रूप में प्रस्तुत किया कि आपके विरोधियों की हवा निकल गई. बाइबल ये भी कहती है, धन्य हैं वे जो नम्र हैं क्योंकि वे ही पृथ्वी के वारिस होंगे. मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाकर आपने उस नम्रता का सम्मान किया है जो ईश्वर को भी अच्छी लगती है.

इसके बावजूद मैं साफ तौर पर एक बात कहना चाहता हूं. 2009 के मनमोहन को आपकी उतनी ही जरूरत है जितनी 2004 के मनमोहन को थी. वे खरपतवार को साफ करने वाली दरांती हो सकते हैं मगर आप अब भी वह हाथ हैं जो इस दरांती को पकड़ने का काम करता है. खर-पतवार की सफाई अच्छे से हो इसके लिए जरूरी है कि हाथ और दरांती का तालमेल अच्छा हो.

बाइबल ये भी कहती है, ‘बीमारों का उपचार करो, कोढ़ियों के जख्म साफ करो, मुर्दों को जिलाओ, बुराई को बाहर करो : उदारता से तुम्हें मिला है, उदारता से बांटो.

हम सबसे ज्यादा आप कहीं बेहतर तरीके से जानती हैं कि मुश्किलों से घिरे इस देश में बीमारों का उपचार करने और बुराई को भगाने के क्या मायने हैं.

सत्ता अपने साथ एक चमक भी लाती है. हो सकता है कि आप इससे चौंधियाएं नहीं क्योंकि आपने लंबे समय से इसे करीब से देखा है और इसका अनुभव भी किया है. मगर आपके चारों ओर, मौजूद लोगों में अब घमंड से फूलने की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है. वे भूल सकते हैं कि उन्होंने सिर्फ एक मोर्चा जीता है और कई लड़ाइयां अब भी हमारे    चारों ओर चल रही हैं. हमें बांटने वाले कट्टरपंथी अब भी दरवाजे पर खड़े हैं. वे अपने घावों को सहला रहे हैं, फिर से गोला बारूद इकट्ठा कर रहे हैं. वे अभी चुके नहीं हैं. देश की एक चौथाई जनता को वे अपने प्रभाव में ले चुके हैं. इसमें कोई शक नहीं रखिएगा कि वे फिर से भीतर घुसने की कोशिश करेंगे. तब आपकी सेना के काम गर्व नहीं बल्कि वह विनम्रता और उससे उपजी लोहे जैसी मजबूती ही आएगी जिसने आपको यहां तक पहुंचाया है. पूरे भारत में हमने डींग हांकने वालों के खिलाफ वोट किया है. सबको पता चल जाना चाहिए कि हम अपने मंत्रियों का पतन बर्दाश्त कर लेंगे मगर बेकार का घमंड हमें स्वीकार नहीं.

जैसा कि मैंने कहा लड़ाइयां अब भी कई हैं. सभ्यता से जुड़े विचारों की, देश को पंगु करते अभावों की, मरते बच्चों की..सूची बहुत लंबी है. मेरे शहर, जो आपका भी शहर और इस देश की राजधानी है, की हर ट्रैफिक लाइट पर चिथड़ों में लिपटे सात-आठ साल के बच्चे चंद सिक्कों की आस में हमारी कारों का शीशा खटखटाते हैं. जब तक हम अपने बच्चों को खाना नहीं दे सकते, उनका तन नहीं ढक सकते और उन्हें  शिक्षा मुहैया नहीं करवा सकते तब तक शाइनिंग इंडिया और विश्वशक्ति भारत जैसे जुमले न सिर्फ मजाक बल्कि एक गाली भी हैं. मुझे पता है आप ये जानती हैं कि आज पांच साल से कम उम्र के 46 फीसदी बच्चे कुपोषण और इसके चलते होने वाली शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकलांगता के शिकार हैं.

मेरी जानकारी में सबसे महान एक व्यक्ति ने हमें एक जंत्री दी थी, ‘कोई भी कदम उठाते हुए उस सबसे गरीब या कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो और अपने आप से पूछो कि क्या तुम्हारा ये कदम किसी भी तरह से उस व्यक्ति का कुछ भला करेगा.

इस घड़ी भविष्य की अंधेरी राह पर चलते हुए हमें रोशनी के लिए अतीत के अनुभवों की मशाल लेकर चलना होगा. हमारे देश की बुनियाद डालने वालों की मानवीय दीप्ति ही हमें ये राह सबसे अच्छी तरह से दिखा सकती है.

आपकी अनुमति से मैं एक और बात कहना चाहूंगा. आप वाम के दबाव से भले ही छुटकारा पा गई हों मगर बेहतर होगा कि आप उनकी चिंताओं को ध्यान में रखें. आपको दलितों की महारानी और यादवों के सरदारों की चिंताएं भी समझनी होंगी. ये असहाय लोगों के मुखिया हैं भले ही वे कर उनके लिए कुछ नहीं रहे हों. मकसद महान हैं पर नेता क्षुद्र. इंसानों को खारिज कीजिए और मकसद को अपनाइए. सदियों के नुकसान की मरम्मत का काम तेजी से आगे बढ़ाना होगा.

सोनिया जी, ये सब बातें लिखते हुए मैं खुद को अमीरों का जिक्र करने से नहीं रोक पाता. पैसा अच्छी चीज है. और ये सबको पता है कि हम सभी अमीरों को पसंद करते हैं. नेता भी अपवाद नहीं हैं. मगर क्या आप ये सुनिश्चित करेंगी कि वे अपना सार्वजनिक जीवन गरीबों के लिए रखें. भारत में जनप्रतिनिधियों को सिर्फ गरीबों की बात करनी चाहिए. अमीरों के पास उनका पैसा है. उनके पास मीडिया भी है जो उनकी बात करता है. जिनके पास पैसा पैदा करने का मौका है उनको ऐसा करने के लिए अकेला छोड़ दें और उनके रास्ते में कोई बाधा न डालें. मगर अपने सिपहसालारों से उन पर ध्यान केंद्रित करने को भी कहें जिनकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं है. उनसे कहिए कि उनके जीवन में आशाओं का संचार करें.

अब मुझे रुकना चाहिए. मुझे ये कतई शोभा नहीं देता कि मैं आपको उपदेश दूं. वह भी इतनी बड़ी जीत के मौके पर. चलिए मैं आपकी तारीफ में भी कुछ कह देता हूं. कोई शक नहीं कि अपने अतिरिक्त ईश्वर की मदद से आपने अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से पाला है. उसके पास विनम्रता है, शिष्टाचार है. वह परिश्रमी है, बड़े संदर्भ में सोचता है और सबके बारे में सोचता है. हमें वंशवाद पसंद नहीं मगर उससे ज्यादा हमें बांटने वाली राजनीति नापसंद है. एक आदर्श दुनिया में हमारे यहां ऐसी कोई भी चीज नहीं होनी चाहिए जो सामंती और अलोकतांत्रिक हो. मगर फिलहाल नफरत पैदा करने वाले लोगों से मुक्ति पाने पर ध्यान केंद्रित किया जाए.

राहत की बात ये है कि आपका बेटा उन लोगों से कहीं ज्यादा भारत की आत्मा के संपर्क में है जो भगवान के नाम पर वोटों का व्यापार करते हैं. आपकी पार्टी के ही एक नेता ने मुझसे कभी व्यंग्य भरे स्वर में कहा था, ‘निश्चित रूप से उनके इरादे नेक हैं. वो वृद्ध महिलाओं को सड़क पार करने में मदद करना चाहते हैं. मगर इसका कोई फायदा नहीं.मुझे हैरत है कि अब ये सज्जन क्या सोचते होंगे. बूढ़ी औरतों को सड़क पार कराने वाले नौजवान परिपक्व होकर देश को पथरीली राहों से पार लगाने में भी मदद कर सकते हैं.

क्या मैं आपका ध्यान एक और प्रसिद्ध कथन की तरफ खींच सकता हूं. हालांकि मुझे उम्मीद है कि आपने भी इसे कई बार पढ़ा और सुना होगा. अच्छी नैतिक स्थिति में होने के लिए कम से कम उतने ही प्रशिक्षण की जरूरत होती है जितनी अच्छी शारीरिक स्थिति में होने के लिए.ये बात कहने वाली महान आत्मा का नाम था जवाहर लाल नेहरू. नेहरू के ये शब्द आपकी सेना और राहुल की नैतिकता को मजबूत बनाएंगे. आखिर आज देश के लिए हम जो सपने देखते हैं उनके लिए बुनियाद इसी महान आत्मा ने ही तो डाली थी.

आपको गति और शक्ति मिले आखिर में यही कामना है.

आपका,

तरुण जे तेजपाल 

बदले वक्त की बदलियां

समय का चक्र भी अजीब ही होता है. 1999 में जब जयललिता ने वाजपेयी की सरकार गिराई थी तब सोनिया गांधी ने सरकार बनाने का दावा किया था. उस समय मुलायम ने सोनिया का साथ नहीं दिया और सरकार बनते-बनते रह गई. जुलाई 2008 में जब परमाणु समझते पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया तब कांग्रेसनीत सरकार के तारणहार बने वही मुलायम सिंह, जो उससे पहले तक परमाणु करार के धुर विरोधी भी थे. आज सपा समर्थन देने के लिए मरी जा रही है किंतु कांग्रेस है कि हां भर के नहीं दे रही.

राहुल के कद का कोई व्यक्ति मलाई छोड़ कर धूल-धूप में भटकने जैसे महत्वपूर्ण सांकेतिक कदम उठाता है तो इससे कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना लाजमी है

2004 के चुनाव में बिहार में राजद और लोजपा ने कांग्रेस को महज चार सीटें दी थीं और इस बार लालू उसे तीन सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं थे. मामला जब थोड़ा खिंचा तो लालू और पासवान ने कांग्रेस को छोड़ कर आपस में तालमेल कर लिया. लालू ने मखौल उड़ा कर ये भी जताया कि संगठन खड़ा करने के नाम पर उनकी शर्तें न मान कर कांग्रेस ने अपने पैरों पर तबियत से कुल्हाड़ी मारी है. आज लालू कांग्रेसी नेताओं के बयानों से आहत होकर अपने सम्मान की रक्षा की याचना करते नजर आ रहे हैं.

और तो और मुंबई शेयर बाजार का जो सूचकांक 2004 में चुनावी नतीजे आते ही 500 अंक लुढ़क गया था वो भी इस बार आर्थिक महामंदी के बावजूद दुनिया के सभी बाजारों का अब तक का रिकॉर्ड तोड़ गया.

मगर वक्त के इस कदर बदलने की वजह क्या है? कांग्रेस के वे सयाने जो कुछ भी पूछे जाने पर समीक्षा और सामूहिक निर्णय जैसे जुमले उछालने में सिद्धहस्त हैं, इस बार बिना हिचके इसे राहुल गांधी का करिश्मा मान रहे हैं. उनके मुताबिक, कनिष्ठ गांधी का उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने का साहसी निर्णय बड़ा काम कर गया. मगर यदि ये इतना ही साहसी था तो बीच चुनाव राहुल को वामदलों और नीतिश कुमार की पैरवी करने और चुनाव बाद सोनिया को अपने पुराने सहयोगियों को खुश करने के लिए टेलिफोन खटकाने की कौन सी आवश्यकता आन पड़ी थी?

अगर उत्तर प्रदेश की ही बात की जाए तो वहां कांग्रेस के उत्थान में उसकी खुद की कोशिशों के योगदान के अलावा कल्याण और मुलायम की भाईबंदी, सपा और भाजपा में घाल-मेल का भ्रम, वरुण गांधी का सांप्रदायिक दुराग्रह, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार के रूप में मोदी का नाम उछाला जाना और बसपा का अपने नये और पुराने मतदाताओं को हद दर्जे तक निराश करना भी शामिल है.

इसमें शक नहीं कि संगठन किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी धरोहर होता है. ये न केवल जनता की भावनाओं को नेतृत्व तक पहुंचाता है बल्कि उसकी नीतियों और योजनाओं को लेकर जनता में अनुकूल माहौल बनाने का काम भी करता है. अगर नेहरू के समय से ही मृतप्राय रहे कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने की राहुल गांधी ने ठानी है तो ये देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए शुभ संकेत है. यदि राहुल के कद का कोई व्यक्ति मलाई छोड़ कर धूल-धूप में भटकने जैसे महत्वपूर्ण सांकेतिक कदम उठाता है तो इससे कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना लाजमी है. मगर ये उत्साह इतना ज्यादा और इसका परिणाम इतनी जल्दी इतना बड़ा हो सकता है, ये सोचना तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.

संजय दुबे  

कितनी लंबी यात्रा

Tarun J pal(तहलका की पांच वर्षों की सरोकारी पत्रकारिता पर विशेष)

हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें स्मरण करने की कोई अहमियत ही नहीं रही है. हमारे चारों ओर तमाम पुरस्कार समारोह, सालाना समारोह, गोष्ठियां और दूसरे किस्म के ‘इस या उस स्मृति में’ वाले आयोजन हो रहे हैं. सभी का दावा है कि ऐसा करके वो इतिहास के किसी-न-किसी हिस्से को समृद्ध करने का कार्य कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि मानो जानकारी की सूनामी में दबीं स्मृतियों को झड़ने-पोंछने के बाद इन आयोजनों की खूंटियों से टांगकर उन्हें थोड़ा जीने का मौका दिया जा रहा है. मगर दुखद सच्चाई ये है कि हो ऐसा भी नहीं रहा है. इनमें से कोई ही आयोजन शायद ऐसा हो जो वर्तमान को संवारने और बेशकीमती भूत को संरक्षित करने का काम करता हो. ज्यादातर समारोह विशुद्ध व्यावसायिक हैं जो कुछ ऐसा करने के प्रयास में लगे होते हैं जिससे फायदा उठाया जा सके.जाहिर है कि कैमरे के फ्लैश के जैसे एक क्षण तो इनकी उपस्थिति आंखों में चौंध पैदा करती है और दूसरे ही क्षण घटाटोप छा जाता है. बाजार द्वारा हर चीज को अमूल्य, अनोखा और ऐतिहासिक बनाने की कोशिश, ये सुनिश्चित करती है कि कुछ भी वैसा नहीं बन पाता.

[box]भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है[/box]

ऐसे में तहलका की अंग्रेजी पत्रिका के पांच साल का होने का आयोजन (हिंदी तो अभी महज 6 महीने पुरानी ही है), भी कुछ-कुछ इन्ही आयोजनों जैसा ही लगकर दंभ भरने का सा आभास दे सकता है. लेकिन तहलका के इतिहास पर नजर डालें तो ये नितांत जरूरी प्रतीत होता है. दुनिया को अचंभित करने के लिए नहीं बल्कि खुद को ये विश्वास दिलाने के लिए कि हम तय रास्तों पर न चलकर सही रास्तों पर चलते रहे हैं.

यदि आपने तहलका के किन्हीं दो अंकों को भी पढ़ा है तो आपको ये बताने की जरूरत ही नहीं कि तहलका किस चीज में यकीन रखता है मगर यदि आप इसे पहली बार देख रहे हैं तो मैं इसका एक रेखाचित्र बनाने का प्रयास करता हूं.

मूलत: तहलका, खुद को, हमारे देश के निर्माताओं की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और उदार भारत की सोच से जुड़ा हुआ पाता है. इसी मोटी सी परिभाषा के दायरे में इसकी प्रतिबद्धताएं बिल्कुल साफ हैं. इसको अपने काम के लिए धनी और अभिजात्य लोगों के संसाधन तो चाहिए मगर उनके हितों को साधने की इसकी मंशा कभी नहीं रही. ये तो चुपचाप सब-कुछ झेल रहे, दबे-कुचलों के साथ खड़े होने की मंशा रखता है. ये, जो हमारी पत्रिका कभी नहीं पढ़ सकते या पढ़ेंगे, उनकी कहानियों को उन तक पहुंचाने के प्रयास करता है, जो इसे पढ़ते हैं. इसलिए नहीं कि ये मंदिर में मंच पर बैठकर उपदेश देने का इरादा रखता है बल्कि ये बताने के लिए कि भारत के 30 करोड़ भरे-पूरे लोग यहां के 80 करोड़ भूखे-प्यासों के साथ एक जटिल डोर से बंधे हुए हैं, और इस जुड़ाव का अपनी बुद्धिमत्ता और दयालुता के साथ आदर करने की जिम्मेदारी भरे पेट वालों की है. इस रिश्ते की मर्यादा निभाए जाने पर ही भारत राष्ट्र के होने का मौलिक विचार टिका हुआ है. इस बात को लगातार ध्यान में रखने पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है. कुलीनों के पास भी अंतत: तभी एक देश रह सकता है जब वो इसमें औरों की हिस्सेदारी को स्वीकार कर सकते हैं.

तहलका, वर्ग, जाति, भाषा, धर्म या किन्हीं ऐसी ही दूसरी चीजों पर आधारित हर तरह की कट्टरता की खिलाफत करता है. हमारे उपमहाद्वीप में मौजूद तरह-तरह की असंख्य दरारों में से एक सबसे नुकसानदेह हिंदू और मुसलमानों के बीच शत्रुता की भावना है. इसने हमें कई बार बुरी तरह तबाह किया है और ये हमारे टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता रखती है. इसे दुनिया के सामने कुछ और एकांत में कुछ जैसे किसी दोगलेपन की नहीं बल्कि एक सीधी और मजबूत नजर से देखे जाने की जरूरत है. पूर्वाग्रह और अन्याय का हल ढूंढ़ने और आधुनिकता के वरदानों, जो कि नई तकनीक वाले नये-नये खिलौने नहीं बल्कि सहिष्णुता और शांतचित्त वाली समझ है, को फिर से मजबूत किए जाने की आवश्यकता है. मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा. इन परिस्थितियों के कोलाहल में विवेक और समझदारी के लिए लड़ते तहलका का तंबू मजबूती से तना हुआ है.

एक पत्रिका जिसका अंग्रेजी संस्करण – यदि सब कुछ ठीक रहे तो – मात्र 1 लाख ही बिकता हो और संसाधनों को गवारा न हो तो महज 50 हजार से कुछ ज्यादा तथा जिसका हिंदी संस्करण अभी हर 15 दिन में करीब 50 हजार की संख्या ही पार कर पाता हो, उसके द्वारा ये सब कहा जाना काफी बड़े बोल लग सकता है. किंतु विनम्रता के साथ में इतना जरूर कह सकता हूं कि इतनी कम क्षमताओं के साथ तहलका ये अच्छे से समझता है कि इसका काम हर व्यक्ति को हिलाना नहीं बल्कि उन्हें हिलाना है जो जनता को गति, दिशा और बेहतर भविष्य दे सकने की क्षमता रखते हैं. तरह-तरह के रहस्यों को सामने लाकर, आम लोगों में तर्क-वितर्क की स्थितियां और बुद्धिजीवियों में उद्वेलन उत्पन्न कर तहलका समाज की दो सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों – राजनीतिक और आर्थिक – को उनके सुंदरतम रूपों में सीमित रखने के प्रयास में लगा रहता है. ये शक्तियां एक हाथी की तरह हैं और मीडिया एक अंकुश की तरह जिसका मुख्य काम इस हाथी को सही रास्ते पर चलने को विवश करते रहने का है.

इससे कुछ और आगे जाते हैं. हो सकता है कि अब तक ये भी कुछ स्पष्ट हो गया हो कि तहलका केवल एक निरपेक्ष इतिहासकार की भूमिका निभाने में विश्वास नहीं रखता. जैसा कि चलन है कि किसी स्टोरी के लिए दोनों तरफ के संस्करणों को लिया और उनकी सत्यता जांचने की कड़ी मेहनत किए बिना उन्हें छाप डाला. तहलका अपने निर्णय और राय को किसी भी स्टोरी में शामिल करने से गुरेज नहीं करता. उदाहरण के तौर पर अर्थ और व्यापार जैसे एक ऐसे क्षेत्र में जिसमें तहलका को कोई विशेषज्ञता हासिल नहीं है, तहलका पहली समाचार पत्रिका थी, जिसने शेयर बाजार में कुछ बहुत ज्यादा गड़बड़झाला चल रहा है, ऐसी घोषणा कर दी थी. और ये सब बाजार के ढह जाने के काफी पहले किया गया था. हालांकि तहलका ने कभी भी निजी प्रकृति के अभियान चलाने में भरोसा नहीं किया परंतु मगर हर सार्वजनिक लड़ाई में ये किस जगह खड़ा है इसे लेकर कभी संदेह की कोई गुंजाइश भी इसने कभी नहीं छोड़ी. तहलका मानता है कि एक पत्रकार का काम केवल जानकारी देना भर नहीं बल्कि जनहित के लिए एक योद्धा की तरह लड़ने का भी है जो हर सभ्य कदम, हर मानवीय मूल्य को अपना कंधा देता रहता है.

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो निस्संदेह इससे लड़ने की जरूरत है मगर ये असमानता और अन्याय के साथ लड़े जाने वाले एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण युद्ध का एक छोटा सा हिस्सा ही है. भ्रष्टाचार एक असमान और अन्यायी समाज का लक्षण भर है और बिना झिझक ये कहा जा सकता है कि ये आकलन संपूर्ण विश्व में सत्य साबित हो चुका है. अगर सबको बराबरी का अधिकार और विरोध करने की क्षमता मिल जाती है तो भ्रष्टाचार झेली जा सकने वाली हदों में सीमित किया जा सकता है.

[box]हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा[/box]

इससे पहले कि हम अत्यधिक गंभीर सुनाई-दिखाई पड़ने लगें, मैं कहना चाहता हूं कि तहलका को कला और संस्कृति पर किए गए अपने काम पर भी खूब मान है. यहां पर उद्देश्य सिर्फ इतना ही रहा है कि चाटुकारिता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार से बचा जाए जिससे आज शायद ही कोई अछूता हो. जैसे कि किसी के काम की समीक्षा उसके मित्र या उससे अतिरिक्त सहानुभूति रखने वाले किसी व्यक्ति से करवाना या फिर किसी ऐसे से करवाना जो लेखक या कलाकार के प्रति हद दर्जे की दुर्भावना या शत्रुता रखता हो. तहलका हमेशा बिल्कुल ही हवाई चीजों की अनदेखी और तथ्यात्मक आलोचना में विश्वास रखने के साथ जन-संस्कृति से जुड़ी चीजों को भी सारगर्भित बनाने का प्रयास करता रहा है. सिनेमा से जुड़े इसके कई साक्षात्कार नई जमीन ढूंढ़ने वाले साबित हुए. हमने कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा इकट्ठा कर लेख की इमारत बनाने और नितंब और वक्षस्थल वाली पत्रकारिता औरों के लिए ही छोड़े रखी. क्योंकि हमारे पास पहले से ही इतना कुछ करने को हमेशा ही रहा.

जो कुछ ऊपर लिखा है वो पांच साल पहले और भी ज्यादा बड़बोलापन और डींग हांकना कहलाता. मगर 250 से ज्यादा अंग्रेजी और 12 हिंदी के संस्करणों की वजह से हमारे दावे में लोगों को अब सच्चाई की एक छोटी सी झलक जरूर दिख रही होगी. एक ओर जहां हमें अपनी गुजरात 2002, सिमी, जेसिका, निठारी की इन्वेस्टिगेशंस पर गर्व है वहीं दूसरी ओर अपने काम की सामाजिक प्रतिबद्धता पर गहरा संतोष भी है. चाहे वो दलितों और जनजातियों से जुड़े मुद्दे हों या विकास और पुनर्वास से जुड़े या भोपाल, सिंगूर, बंत सिंह और अरावली में अवध खनन या फिर बांधों और किसानों की आत्महत्याओं की दिल दहलाने वाली सच्चाइयां, तहलका हमेशा इनमें अपनी जिम्मेदारियां को तलाशने और उन्हें निबाहने की कोशिश में लगा रहा.

हालांकि तहलका के बढ़िया काम का श्रेय इसके संपादकों को जाता है. मगर इसको सही मायनों में प्रेरणा देने वाले इसमें काम कर रहे युवा पत्रकार हैं – जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं – जो बेहद प्रतिभाशाली, ईमानदार, मजबूत और तहलका की सरोकारी पत्रकारिता से पूरी तरह जुड़ा हुआ महसूस करने वाले हैं.

हर उम्मीद जगाने वाली कहानी में एक अंधेरा कोना भी होता ही है. पांच साल पहले कोई भी हमसे उबरने और पत्रिका निकालने की जरा भी उम्मीद नहीं कर रहा था. जब हमने ऐसा कर लिया तो लोगों का कहना था कि हम ज्यादा से ज्यादा एक साल के मेहमान हैं. मैं ये कहना चाहता हूं कि उनकी आशंका बिल्कुल सही थी. ये एक बेहद दुर्गम यात्रा रही है – सप्ताह दर सप्ताह, महीना दर महीना. प्रशंसाएं और शाबाशी तो दुनिया भर से खूब मिलीं लेकिन संसाधनों का हमेशा टोटा पड़ा रहा.

मीडिया के इस स्वर्णिम काल में हर कोई सोचता होगा कि निवेशक हमसे जुड़ने के लिए कुछ भी कर सकने को तैयार होंगे जिससे हम और भी भाषाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें, एक टेलिविजन चैनल ला सकें. हालांकि कुछ अद्भुत लोग आगे आए भी किंतु कहते हुए दुख सा होता है कि ये नाकाफी से भी कुछ कम ही रहे. शायद ऐसा हमारी कारोबारी अक्षमताओं या देश के धनी लोगों की ऐसे कामों के प्रति अनिच्छाओं या फिर जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं उसकी प्रकृति की वजह से हुआ होगा.

फिर भी अगर आज मैं कुछ कह सकता हूं तो ये कि हम अब न केवल पांच साल के हो गए हैं बल्कि आगे बढ़ने के लिए दृढ़निश्चयी भी हैं. हो सकता है आगे हम आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंच जाएं और हो सकता है कि हम औंधे मुंह गिरकर ढ़ेर हो जाएं. मगर उम्मीद है कि हम कभी अपनी सोच और विश्वास को पैदा करने वाली मशीनरी में कोई बदलाव नहीं करेंगे.

जनादेश या धनादेश?

हरे-भरे पेड़ों और नेताओं के भव्य बंगलों की कतार वाली फीरोजशाह रोड को देखकर कोई नहीं कह सकता कि यहां किसी तरह की निगरानी की जरूरत है. मगर पिछले दिनों खुफिया अधिकारी यहां स्थित एक इमारत की तीसरी मंजिल पर बने एक फ्लैट पर निगाह रखे हुए थे. 34, फीरोजशाह रोड पर स्थित इस फ्लैट के बारे में विश्वसनीय सूचना मिली थी कि इसमें रहने वाले हवाला के जरिए दक्षिण-पूर्व एशिया की किसी जगह से 380 करोड़ रुपये की रकम जुटा रहे हैं. अधिकारियों के मुताबिक ये पैसा आम चुनाव में खर्च करने के लिए आ रहा था और खुफिया सूत्रों की मानें तो इसमें शामिल लोगों में कोलकाता का एक कारोबारी और अवैध शराब के धंधे में सक्रिय उसका एक सहयोगी शामिल था.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस)द्वारा देश भर में किए गए सर्वे के दौरान 20 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि बीते दशक में नेता या पार्टियां उन्हें वोट के बदले नोट की पेशकश करती रही हैं

पर्व का दूसरा नाम होता है खर्च. और फिर ये तो लोकतंत्र का महापर्व है इसलिए आमचुनाव के इस महासमर में उतरा हर योद्धा अपनी पूरी ताकत झोंक देना चाहता है. इस ताकत का ज्यादातर हिस्सा काले धन से मिलकर बनता है. दरअसल चुनाव जीतने की कवायद में किया जा रहा खर्च समुद्र में तैरते किसी विशाल हिमखंड की तरह है जिसका वह दसवां हिस्सा ही नजर आता है जो पानी से ऊपर होता है.

चाहे वह उम्मीदवार हो या पार्टी, ऊपरी तौर पर तो हर कोई यही दिखा रहा है कि वह चुनावी खर्च के लिए चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 25 लाख रुपए प्रति उम्मीदवार की सीमा के भीतर ही बंधा हुआ है मगर देखा जाए तो हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. उधर, आयोग भी जानता है कि अवैध तरीके से खर्च किए जा रहे पैसे के मामले में उसके हाथ बंधे हुए हैं. मसलन जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 कहती है कि शुभचिंतकों की तरफ से किसी उम्मीदवार पर खर्च की जाने वाली रकम उसके चुनाव खर्च में शामिल नहीं की जाएगी. यही वह वजह है जिसके चलते उम्मीदवार खर्च की तय सीमा के परे जाकर बिना चिंता किए पैसा पानी की तरह बहा सकता है. शायद इसीलिए चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि चुनाव के दौरान अनाधिकारिक तरीके से खर्च किए जा रहे पैसे का वे कुछ नहीं कर सकते. उनके ऐसा कहने के कुछ ही दिन बाद खबर आई कि बिहार के बेतिया से लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे फिल्मकार प्रकाश झा के दफ्तर की दराजों से 10 लाख रुपये बरामद हुए. बेतिया के एसपी के एस अनुपम पत्रकारों को बता रहे थे, ‘ये पैसा वोटरों में बांटने के लिए था.’ अब देखना है कि ये आरोप साबित हो पाता है कि नहीं. सबूत तो कोई है नहीं और चुनाव में पैसा कितनी अहमियत रखता है ये सबको पता है. पूर्व वित्त सचिव एस नारायण तहलका से कहते हैं, ‘मैं आजकल चेन्नई में हूं और मोटा-मोटा अनुमान भी लगाया जाए तो मेरे हिसाब से अकेले मदुरै के तीन निर्वाचन क्षेत्रों में ही 700 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं. चुनावों के दौरान दक्षिण भारत में हमेशा उत्तर भारत से ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है.’ कई और जानकार भी ये बात कहते हैं जिनके मुताबिक जहां जितनी ज्यादा समृद्धि होगी वहां उतना ज्यादा खर्च भी होगा.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस)द्वारा देश भर में किए गए सर्वे के दौरान 20 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि बीते दशक में नेता या पार्टियां उन्हें वोट के बदले नोट की पेशकश करती रही हैं. कर्नाटक, त्रिपुरा, प. बंगाल, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जसे राज्यों में तो करीब 50 फीसदी मतदाताओं ने ऐसा कहा था. यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी करीब एक चौथाई मतदाताओं ने ये माना कि उन्होंने कभी न कभी अपना वोट देने के लिए पैसा लिया है.

जानकारी रखने वाले सूत्र तहलका को बताते हैं कि वोटों को ‘खरीदने’ के लिए पार्टियों ने कुल मिलाकर करीब 10 से 15 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम किया है

सीएमएस का अनुमान है कि चुनाव बजट का एक चौथाई हिस्सा इस तरह की अवैध गतिविधियों में खर्च होता है.  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के एक पूर्व प्रोफेसर जगदीप छोक्कर कहते हैं, ‘भारत में राजनीतिक पार्टियों का मुख्य मकसद होता है किसी भी कीमत पर जीतना.’

चर्चित पुस्तक डर्टी मनी एंड हाउ टु रिन्यू फ्री मार्केट के लेखक रेमंड बेकर लिखते हैं कि 1970 से लेकर आज तक गरीब देशों से कम से कम 10 खरब डॉलर की राशि पश्चिमी देशों की बैंकिंग व्यवस्था में पहुंच चुकी है. पैसे की अवैध आवाजाही पर निगाह रखने वाले अमेरिका स्थित संगठन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी ने उन 160 विकासशील देशों की कतार में भारत को पांचवें स्थान पर रखा है जहां से भारी मात्रा में अवैध तरीके से पूंजी बाहर चली जाती है. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 2002 से 2006 के दौरान भारत से हर साल 22 से 27 अरब डॉलर की पूंजी बाहर गई. लेकिन चुनाव के समय इस पैसे का एक हिस्सा वापस भारत आ जाता है. कहने की जरूरत नहीं कि जैसे ये जाता है उसी तरह इसके वापस आने की प्रक्रिया भी अवैध ही होती है और इसे मुख्य तौर पर हवाला के जरिए अंजाम दिया जाता है. पैसे के स्थानांतरण की इस प्रक्रिया की एक खास बात ये भी है कि ये इस तरह की सरकारी प्रक्रियाओं से कहीं बेहतर तरीके से संचालित होती है.

जानकारी रखने वाले सूत्र तहलका को बताते हैं कि वोटों को ‘खरीदने’ के लिए पार्टियों ने कुल मिलाकर करीब 10 से 15 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम किया है. इसके अलावा दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में ज्यादा से ज्यादा वोट अपने पक्ष में करने के लिए नेता हवाई यात्राओं के जरिए करोड़ों रुपये खर्च कर देश के करीब तीस लाख वर्ग किलोमीटर इलाके की खाक छान रहे हैं. हर चुनाव में प्रचार की लागत दोगुनी हो रही है और विश्लेषकों को लगता है कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर मतदाता की समझ की बजाय पैसे की ताकत हावी हो रही है. ऐसा अक्सर अमेरिकी चुनावों में देखने को मिलता है. इससे भी बुरी बात ये है कि अमेरिका की तरह ही ये पैसा कहां से आता है और कहां जाता है इसका हिसाब-किताब पूछने वाला कोई नहीं. ऐसे में चुनाव आयोग की चिंता स्वाभाविक ही है.

हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को कलर टीवी बांटने और वोटर्स के लिए एक स्पेशल कैश स्कीम का एलान करने के लिए चुनाव आयोग की झिड़की खानी पड़ी. मगर रैलियों में नोट या सोने की चेन बांटना या फिर नायडू जैसे मामले तो चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के उन चंद उदाहरणों में से कुछ हैं जो पकड़ में आ जाते हैं. इस तरह के ज्यादातर काम तो आचार संहिता लागू होने से पहले ही हो जाते हैं.

नतीजतन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल कई किस्से दौड़ लगा रहे हैं. जैसे कि फलां-फलां टीवी चैनल को पार्टी के प्रचार से संबंधित खबरें चलाने के लिए 200 करोड़ रुपए दिए गए हैं. या फिर एक बड़ी कंपनी के सीईओ माकपा के दिल्ली स्थित दफ्तर आए और उन्हें बड़ा राजनीतिक चंदा देने की पेशकश की बशर्ते कि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाली एक बड़ी नेता किसी भी तरह इस पद पर बैठने न पाए. ये भी कहा जा रहा कि तंबाकू उत्पाद बनाने वाली एक कंपनी के मालिक, जो उत्तर प्रदेश में रहते हैं, अपनी अकूत संपत्ति के कारण एक पार्टी की राज्य इकाइयों में पैसा भेजने का जरिया बने हुए हैं. कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि मुंबई स्थित पड़ी कंपनियां अब उन राज्यों में चुनाव प्रचार पर अपना पैसा लगा रही हैं जहां उनके व्यावसायिक हित हैं.

2004 से 2008 के दौरान महज 21 दलों ने अपने चंदे का ब्यौरा आयोग को सौंपा जबकि इस देश में 6 राष्ट्रीय और 36 क्षेत्रीय दलों सहित 1000 से भी ज्यादा पार्टियां हैंपूर्व वित्त सचिव एस नारायण कहते हैं, ‘इस बार पूरे भारत में पैसे की जितनी ताकत दिखेगी वैसी शायद पहले कभी नहीं देखी गई होगी. सिर्फ शहरी और ऊंचे पढ़े-लिखे लोगों से (अगर युवा वर्ग वोट देने को निकला तो उससे भी) चुनाव में पारदर्शी वोटिंग और सही मायने में लोकतांत्रिक चुनाव की उम्मीद की जा सकती है.

सूत्र बताते हैं कि पिछले दो महीने से लेन-देन संबंधी गतिविधियां रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं. बिचौलिये सौदों में कमीशन की पेशकश कर रहे हैं और पैसा राज्यों में सत्ता में बैठीं राजनीतिक पार्टियों की झोलियों में पहुंच रहा है. कॉरपोरेट जगत के एक भीतरी सूत्र के शब्दों में ‘आपको पेपर पर कुछ नहीं मिलेगा मगर ये सच है कि हजारों करोड़ रुपए के सरकारी टेंडरों का कुछ हिस्सा नियमित रूप से सत्तासीन पार्टी की तिजोरी में पहुंचता रहता है.’ सूत्र आगे जोड़ता है कि जैसे ही चुनाव का ऐलान होता है राज्यों में पैसा जुटाने की जुगत शुरू हो जाती है. अनौपचारिक रूप से इसे मुख्यमंत्री कोष कहा जाता है और वैसे तो ये राज्य में होने वाले खर्च के लिए होता है किंतु अगर जरूरी हुआ तो पैसे को पार्टी की केंद्रीय वित्त इकाई को भेजा जाता है. यहां से इस पैसे को उन राज्यों में इस्तेमाल के लिए भेजा जाता है जहां पार्टी सत्ता में नहीं है. जैसा कि एक सूत्र कहता है, ‘दिल्ली के अलावा कुछ और ऐसे पॉकेट्स हैं जो दूसरे क्षेत्रों का ख्याल रखते हैं. ये ऐसा है जैसे पार्टी की महाराष्ट्र इकाई, गुजरात और आंध्र प्रदेश इकाई, कर्नाटक को फंड कर रही हो.’

उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में रूरल रोड डिवेलपमेंट एजेंसी में काम कर रहे जनरल मैनेजरों का मामला ही लीजिए जिन्हें एक मंत्री के दफ्तर से फोन आया जिसमें उनसे पांच लाख रुपए की मांग की गई थी. बार-बार की जा रही कॉलों से परेशान होकर उन्होंने कुछ दिन पहले चुनाव आयोग से इसकी शिकायत कर दी. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आयोग इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है. वैसे जानकार बताते हैं कि इस तरह की मांगें हर राज्य में आम बात है. समाजवादी पार्टी ने तो चुनाव प्रचार के तहत बसपा सुप्रीमो मायावती की चार सीडी बनाई थीं जिनमें उन्हें राज्य के नौकरशाहों से पैसे की मांग करते दिखाया गया था. सपा ने ये सीडी चुनाव आयोग को भी सौंपीं मगर आयोग ने उन्हें खारिज कर दिया. मगर सीडी में जो कुछ भी था शायद ही कोई उसकी सच्चाई से इत्तेफाक न रखता हो क्योंकि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के बारे में इस तरह की बातें सुर्खियां बनती ही रहती हैं.

उगाही की गाज अकेले सरकारी कंपनियों पर नहीं गिरती. देश के कॉरपोरेट जगत के कई मुखिया भी कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों की तरफ से पैसे का दबाव बहुत ज्यादा रहता है. कॉरपोरेट्स चाहते हैं कि इस व्यवस्था में फौरन बदलाव कर इसे बेहतर बनाया जाए ताकि राजनीतिक फंडिंग की प्रक्रिया में पारदर्शिता आ सके. सीआईआई की हालिया सालाना बैठक में भी ये मसला उछला था जहां टाटा कम्युकेशंस के चेयरमैन सुबोध भार्गव और बजाज ऑटो के मुखिया राहुल बजाज ने चुनाव में बह रही काले धन की नदी पर चिंता व्यक्त की थी. बजाज का कहना था, ‘स्वच्छ धन से फर्क पड़ता है. आज तो 60 फीसदी कंपनियां राजनीतिक पार्टियों को काले धन की मार्फत फंडिंग कर रही हैं.’

बिरला और टाटा जैसे व्यापारिक समूहों ने चुनाव के लिए अलग से एक इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाया हुआ है जिसके जरिए वे राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं. टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि पंजीकृत पार्टियों को चंदा देता है

जन प्रतिनिधित्व कानून(1951) में 2003 में एक संशोधन कर एक नियम बनाया गया था कि राजनीतिक दल हर वित्तीय वर्ष के दौरान मिलने वाले चंदे और उसके स्रोत की जानकारी चुनाव आयोग को देंगे.  ये नियम बीस हजार रुपये से अधिक की रकम के लिए लागू होता है. मगर 2004 से 2008 के दौरान महज 21 दलों ने अपने चंदे का ब्यौरा आयोग को सौंपा जबकि इस देश में 6 राष्ट्रीय और 36 क्षेत्रीय दलों सहित 1000 से भी ज्यादा पार्टियां हैं. सूचना के अधिकार को अपनी अहम उपलब्धियों में से एक बताने वाले राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और डीएमके जैसे यूपीए के घटक दल अपने चंदे का ब्यौरा देने की जरूरत नहीं समझते. विडंबना देखिए कि जिन्होंने ये जानकारी दी भी है उनके चंदे और खर्च को देखकर आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया वाली कहावत याद आती है. मसलन समाजवादी पार्टी को 2007-08 के दौरान सिर्फ 11 लाख रुपये का चंदा मिला.

जानकारों के मुताबिक कॉरपोरेट कंपनियां राजनीतिक दलों को फंडिंग के रूप में जो चंदा देती हैं उसका 60 फीसदी काला धन होता है. औसतन देखा जाए तो एक उम्मीदवार अपने चुनावी क्षेत्र में तीन से 15 करोड़ रुपए तक खर्च करता है.  फिक्की के महासचिव अमित मित्रा कहते हैं कि समस्या नेता या उद्योगपति नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘चुनावों में चंदा तो देना ही होगा मगर ये तय होना चाहिए कि एक व्यक्ति अधिकतम कितना पैसा दे सकता है. भारत या तो अमेरिका के रास्ते पर चल सकता है जहां कंपनियां चुनाव में जमकर चंदा देती हैं या फिर यूरोप के जहां चुनाव का सारा खर्च सरकार उठाती है.’

बिरला और टाटा जैसे व्यापारिक समूहों ने चुनाव के लिए अलग से एक इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाया हुआ है जिसके जरिए वे राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं. टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि पंजीकृत पार्टियों को चंदा देता है जिसका आधार लोकसभा में उन पार्टियों के सदस्यों की संख्या होती है. स्विस बैंकों में जमा भारतीय रकम का मुद्दा उठा रहे भाकपा के उप महासचिव सुधाकर रेड्डी फंडिंग के लिए साफ तौर पर कायदे-कानून बनाए जाने की जरूरत बताते हैं. वे कहते हैं, ‘साफ है कि राजनीतिक दलों को चंदा देने वाली कंपनियां सोचती हैं कि पार्टी के सत्ता में आने पर उन्हें इसका फायदा मिलेगा.’

निवेश पर फायदे की यही सोच चुनाव के दौरान कॉरपोरेट फंडिंग को प्रोत्साहन देती है. चुनाव दर चुनाव प्रचार का खर्च बढ़ता जा रहा है और पार्टियों के लिए भी ज्यादा से ज्यादा चंदा जुटाना जरूरी हो गया है. चुनाव प्रचार में किए जा रहे खर्च की निगरानी के लिए कई गैर सरकारी संगठनों से मिलकर बनी एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स से जुड़े अनिल बेरवाल कहते हैं, ‘राजनीति वास्तव में पैसे का बड़ा खेल है. जो लोग जमकर खर्च कर रहे हैं उनके लिए ये सिर्फ निवेश है जिसके एवज में वे दस गुना फायदे की उम्मीद करते हैं.’ बेरवाल के मुताबिक अतीत में उम्मीदवार और पार्टियां सामूहिक विवाह जैसे आयोजन करती थीं और वहां पर वोट के बदले नोट बांटा करती थीं मगर राजनीतिक परिदृश्य में चलन लगातार बदल रहा है. वे कहते हैं, ‘एक दशक पहले एक वोट की कीमत जहां 100 रुपए होती थी वहीं आज ये 1500 से 2000 रुपये तक पहुंच गई है.’

ऐसा नहीं कि चुनाव आयोग को पैसे के इस अंधाधुंध इस्तेमाल की जानकारी नहीं. हाल ही में रिटायर हुए मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के शब्दों में ‘हमारा जोर चुनाव के दौरान पैसे की ताकत पर अंकुश रखने पर होगा.’ गोपालस्वामी का ये भी कहना था कि चुनाव से जुड़े खर्च पर खास तौर से निगाह रखने के लिए चुनाव आयोग ने 2000 पर्यवेक्षक तैनात किए हैं जिनमें से कई सीनियर टैक्स रेवेन्यू अधिकारी हैं.

मगर उम्मीदवारों की संख्या और उनके द्वारा खर्च किए जा रही रकम के आंकड़ों को देखते हुए ये काफी दुरुह काम नजर आता है. अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी आधिकारिक रूप से इस चुनाव में 1500 करोड़ रुपए खर्च करने जा रही है. भाजपा का बजट 1000 करोड़ रुपए का है जिसमें से 200 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च करने के लिए रखे गए हैं. बसपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का बजट 700 करोड़ और डीएमके का 400 करोड़ रुपए का है जिसका श्रेय केंद्रीय संचार मंत्री ए राजा की हालिया चंदा कवायदों को भी जाता है. एआईएडीएमके का बजट करीब 300 करोड़ रुपए का है जबकि माकपा और उसके सहयोगियों के लिए ये आंकड़ा 250 करोड़ रुपए है.

वैसे हर खर्च अवैध नहीं होता. कई खर्चे वैध तरीके से भी होते हैं हालांकि तब भी सवाल फिजूलखर्ची पर तो उठाया ही जा सकता है. मिसाल के तौर पर हैलीकॉप्टर और प्राइवेट जेट्स के इस्तेमाल पर होने वाला खर्च जो  2004 में हुए चुनावों की तुलना में इस बार दोगुना हो गया है. वर्तमान में राजनीतिक पार्टियों ने 45 से 50 हैलीकॉप्टर और 22 छोटे हवाई जहाज किराए पर ले रखे हैं. एयर चार्टर्स इंडिया के मुखिया आर पुरी कहते हैं, ‘मांग बहुत ज्यादा है और राजनीतिक दल पैसे के मामले में कोई संकोच नहीं करते.’ उनकी कंपनी ने अपने सभी हैलीकॉप्टर्स और जेट्स किराए पर दे दिए हैं और ये किराया पचहत्तर हजार से डेढ़ लाख रुपए प्रति घंटा तक है. भारत की सबसे पुरानी एयर चार्टर फर्म हाई फ्लाइंग एविएशन की आर्डर बुक भी पूरी तरह भर चुकी है. सरकारी स्वामित्व वाले पवनहंस के पास विशाल बेड़ा तो है मगर उसे अपने विमान राजनीतिक पार्टियों को देने की इजाजत नहीं है. हालांकि राजनीतिक दल उन हैलीकॉप्टर्स को किराए पर ले सकते हैं जिन्हें कॉरपोरेशंस को लीज पर दिया गया हो. इसके अलावा अपना निजी हैलीकॉप्टर रखने वाले कई धनकुबेर भी हैं जो अपने करीबी नेताओं को बिना शुल्क इनकी सेवाएं देने के लिए तैयार रहते हैं. हालांकि ये बात अलग है कि इसका शुल्क वे बाद में वसूलने की अपेक्षा रखते हैं. साथ ही राज्य सरकारों के अधीन 17 हेलीकॉप्टर्स भी हैं जिन्हें चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

ऊंची उड़ान भरने के लिए पैसा चाहिए और लगता है कि भारत के नेताओं को ये आसानी से और इफरात में मिल रहा है.

(विकास बहुगुणा के योगदान के साथ)   

खाने

 बचपन से देखा था, ढेरों खाने थे

खानों के बाद खाने, बड़े-छोटे, पतले-मोटे

अनगिनत

और इन्हीं खानों से तय होते थे रिश्ते

इन्हीं के आकार के नापे काटे जाते थे संबंध

इससे जिम्मेदारी का सरोकार है

‘‘तो फिर यह बेटा हुआ’’

यह जन्म का जिम्मेदार है ‘‘जाहिर है पिता है’’

इसे देखकर बदन चीखता है ‘‘शौहर है और भला कौन’’

इसे देखकर मन भीगता है  ‘‘चलो महबूब सही’’

शौहर के खाने में महबूब के नाप की इच्छाएं

‘‘दीवानी हो क्या?’’

 भाई में दोस्त का चेहरा ‘‘हटाओ इसे’’

पाला करो सिर्फ उतने ही जज्बात जो इन खानों में आयें

और जो उगे बढ़े जरा भी कुछ ज्यादा तो

 क़तर दो, ये बग़ावत है

और बगावतें भले घरों की लड़कियां नही करती

सोचती हूं खानों के इस गणित में कहां जाते होंगे वोरिश्ते

जिनकी शकल ही पहचान में नहीं आती

जो या तो बिना आकार के अमीबा की तरह मन में पलते हैं

या गर्म पारे की तरह लहू मांस में घुलते है

कब से लिए बैठी हूं तेरा नाम हाथों में

कोई खाना मिले तो रखूं. 

                                                       भावना पांडे

 

 

(लेखिका एक टीवी चैनल में कार्यरत हैं) 

इस वर्ग की अन्य रचनाएं

‘साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.  

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

इस गरमी में

 चक्र सुदर्शन

नारे जिंदाबाद के, लो ये झंडे थाम,

रोटी दोनों वक्त की, खूब मिलेंगे दाम.

खूब मिलेंगे दाम, गूंज होवे आकाशी,

रट लो इसका नाम यही अपना प्रत्याशी.

चक्र सुदर्शन, झुग्गी वाले करें मना रे,

इस गरमी में केवल दो सौ, ना रे ना रे.

 अशोक चक्रधर

इस वर्ग की अन्य रचनायें

न आवाज के मायने न वोट के

चुनाव का दौर है और हर तरह के वोटरों को लुभाने की हर मुमकिन कोशिशें हो रही हैं. मगर एक तबका ऐसा भी है जिसकी परवाह किसी राजनीतिक दल को नहीं. शायद ऐसा इसलिए क्योंकि वोटरों का ये तबका बहुत छोटा है और इस पर ध्यान देना नेताओं को समय की बर्बादी लगता है. ये हैं देश के 12 लाख किन्नर या आमभाषा में कहें तो हिजड़े जिनमें लोकतंत्र का ये महापर्व कोई उम्मीद नहीं जगाता. 1994 में वोट का अधिकार मिलने के पंद्रह साल और पांच आम चुनावों के बाद भी वे भेदभाव का व्यवहार झेलने को मजबूर हैं.

अपनी पहचान स्थापित करने की जी-तोड़ कोशिशों के तहत इस साल 20 जनवरी को किन्नर अपने शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा जैसे मुद्दे लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे 

पुरानी दिल्ली के राजेंद्र मार्केट में रहने वाली किन्नर बिजली बताती हैं, ‘चुनाव अधिकारी दुविधा में थे, वे हमारा असली नाम पूछ रहे थे.दरअसल बिजली के वोटर आईडी कार्ड के मुताबिक वे पुरुष हैं और उनका नाम महेश है. लोकसभा चुनावों में वे वोट नहीं डालेंगी क्योंकि उनके ही शब्दों में इसका कोई फायदा नहीं.

अपनी पहचान स्थापित करने की जी-तोड़ कोशिशों के तहत इस साल 20 जनवरी को किन्नर अपने शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा जैसे मुद्दे लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. अजमेर की किन्नर सोनम सिंह ने एक याचिका दायर करके केंद्र सरकार से दलित, अल्पसंख्यक और महिला आयोग की तर्ज पर एक राष्ट्रीय किन्नर आयोग स्थापित करने की मांग की थी. लेकिन फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सिंह की याचिका निरस्त करते हुए उन्हें गृहमंत्रालय से संपर्क करने की सलाह दी.

मंत्रालय में ये मामला अभी भी विचाराधीन है. इससे किन्नरों में बेहद निराशा का माहौल है. कठोर सामाजिक रूढ़ियों के चलते ये राजनीति की मुख्य धारा में भी शामिल नहीं हो सकते. 40 वर्षीय प्रेमा का ही उदाहरण लीजिए. उत्तर प्रदेश के हापुड़ में जन्मी और 12वीं तक पढ़ाई कर चुकी प्रेमा का नाम कभी प्रेम हुआ करता था. वे पिछले 25 सालों से दिल्ली में रह रही हैं लेकिन आज तक उसके पास स्थाई नौकरी नहीं है. प्रेमा बताती हैं,‘मेरी पहली नौकरी एक होटल में बैरे की थी. कुछ ही हफ्तों में मैनेजर को पता चल गया कि मैं किन्नर हूं और उसने मुझे नौकरी से निकाल दिया. उसने कहा कि ग्राहकों को बैरे के किन्नर होने पर एतराज है.तब से आज तक प्रेमा को कई नौकरियों से इसी वजह से निकाला जाता रहा है. उनका व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं है. वे कहती हैं, ‘मेरे वोट डालने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

प्रेमा की तरह ही कुछ किन्नरों ने व्यवस्था का हिस्सा बनने की कोशिश की थी. वे चुनावों में खड़े भी हुए. मगर हालात जस के तस रहे. अब तक तीन किन्नर जनप्रतिनिधि बन चुके हैं जिनमें शबनम मौसी भी शामिल हैं जिन्होंने 2000 में मध्य प्रदेश की सोहागपुर विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी. हालांकि अगले ही चुनाव में शबनम मौसी को हार का मुंह देखना पड़ा. 7 सितंबर 2002 को मध्य प्रदेश में कटनी की मेयर बनी किन्नर कमला जान को राज्य हाईकोर्ट ने तीन साल तक पद पर रहने के बाद हटा दिया. कोर्ट ने उनके चुनाव को ही अवैध ठहरा दिया क्योंकि उन्होंने जो सीट जीती थी वह महिलाओं के लिए आरक्षित थी जबकि उन्होंने खुद को एक पुरुष के रूप में रजिस्टर्ड करवा रखा था. इसी तरह मई 2003 में गोरखपुर की महापौर किन्नर आशा देवी को भी स्थानीय कोर्ट ने इसी आधार पर पद से हटा दिया. उनका नामांकन अमरनाथ के नाम से था.

वर्तमान चुनावी घमासान में कोई भी किन्नर प्रत्याशी मैदान में नहीं है. किसी तरह के सहयोग या सलाह के अभाव में किन्नर पूरी तरह से दुविधा में फंसे हुए हैं. वे अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते, उन्हें जबर्दस्ती पुरुष या महिला का तमगा दिए जाने से भी नफरत है. पर उन्हें उम्मीद की कोई रोशनी नजर नहीं आ रही. किन्नरों के लिए काम करने वाले एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ी मालती कहती हैं, ‘मुझसे मिलने वाले बहुत से किन्नर पुरुषों द्वारा बार-बार बलात्कार का शिकार होने की बात कबूल करते हैं पर उनका नाम बताने में झिझकते हैं.कुल मिलाकर यही लगता है कि नेताओं के लिए न तो किन्नरों की आवाज का कोई महत्व है और न ही उनके वोट के कोई मायने.    

माटी के सुरों की साधिका

2008 की सर्दियों में एक फिल्म रिलीज हुई जिसके संगीत में घुली ठेठ पंजाब और हरियाणा की महक ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. ये फिल्म थी ओए लकी लकी ओए और इसमें संगीत दिया था 24 साल की स्नेहा खानवलकर, जगत बाई और ऊषा खन्ना के बाद स्नेहा, बॉलीवुड के इतिहास में सिर्फ तीसरी महिला संगीतकार हैं. ये बात उन्हें भी कुछ अजीब लगती है क्योंकि उनका मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री महिलाओं के लिए आदर्श जगह है.

 ‘अपनी यात्रा के दौरान मुझे जो लोग मिले उनकी मेरी उम्र और शादी की योजनाओं में ज्यादा दिलचस्पी थी.’इंदौर के एक मराठी परिवार में जन्मी स्नेहा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने मुंबई आई थीं. पर 18 साल की उम्र में ही उन्हें अहसास हो गया कि इंजीनियरिंग की बजाय उनकी दिलचस्पी फिल्मी दुनिया में ज्यादा है. वे बताती हैं, ‘मेरी मां के परिवार में ग्वालियर घराने से ताल्लुक रखने वाले संगीतकार रहे हैं इसलिए मैंने छोटी उम्र से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था. परिवार में कोई भी आयोजन होता तो हमसे गाना गाने को कहा जाता था इसलिए कुछ समय तक मैं संगीत की काफी विरोधी भी रही. मगर मुझे फिल्में बहुत पसंद थीं. स्कूल बस में जाते हुए मेरे दिमाग में रंगीला का संगीत गूंजता रहता था. मैं कल्पना करती जैसे मैं उर्मिला जैसी ड्रेस पहने हेलीकॉप्टर से स्कूल पहुंची हूं. जब मैंने संगीतकार बनने का फैसला किया तो इसके बारे में अपने दोस्तों को कुछ नहीं बताया. दरअसल मेरी योजनाएं कई बार बदलती रहती थीं.’

स्नेहा को सबसे पहला मौका मिला फिल्म हासिल से सुर्खियों में आए निर्देशक तिगमांशु धूलिया के साथ जो द किलिंग नाम की फिल्म बना रहे थे. मगर ये प्रोजेक्ट कुछ समय बाद ठंडे बस्ते में चला गया. इसके बाद उन्होंने रुचि नारायण की फिल्म कल में संगीत दिया. फिर अचानक किस्मत उन पर मेहरबान हुई और उन्हें रामगोपाल वर्मा कैंप की फिल्म गो मिल गई. जब स्नेहा को पता चला कि खोसला का घोंसला के निर्देशक अपनी नई फिल्म के लिए संगीतकार की तलाश में हैं तो उन्होंने अपनी किस्मत आजमाने की सोची. उन्होंने बनर्जी को इतना परेशान कर दिया कि वे स्नेहा से मिलने और फिल्म के बारे में बात करने पर सहमत हो गए. बनर्जी उनसे प्रभावित हुए और इस तरह स्नेहा को मौका मिल गया. उन्होंने सोचा कि वे बिल्कुल ही अलग तरह का संगीत खोजेंगी जो फिल्म के लिए प्रासंगिक हो. इसके लिए उन्होंने उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों की खाक छानने की सोची.

मगर ये उनके लिए बड़ा ही दिग्भ्रमित करने वाला अनुभव रहा. जैसा कि स्नेहा कहती हैं, ‘कहीं हमें बिल्कुल कूड़ा सुनने को मिलता और कभी-कभी कोई असाधारण चीज सुनाई देती जिससे हम अभिभूत हो जाते जैसे कि देसराज लखानी का संगीत जिन्होंने फिल्म में जुगनी नामक गाना गाया था.’

स्नेहा आगे बताती हैं, ‘अपनी यात्रा के दौरान मुझे जो लोग मिले उनकी मेरी उम्र और शादी की योजनाओं में ज्यादा दिलचस्पी थी.’ उन्होंने हरियाणा के गांवों में रात में होने वाली कई रागिनी प्रतियोगिताएं देखीं. वे कहती हैं, ‘मेरे मन में ख्याल आता था कि काश मुझमें गायब होने की शक्ति होती क्योंकि वहां पर मैं अकेली लड़की होती थी.’

स्नेहा ने जो संगीत तैयार किया उसमें लोक और आधुनिक संगीत की कई परतें थीं. उन्होंने लोकगायकों का बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया. 72 साल के देसराज लखानी से उन्होंने ठेठ पंजाबी जुगनी गवाया तो 11 साल के राजबीर से रागिनी में डूबा तू राजा की राजदुलारी.

अपने प्रयोगों के लिए काफी तारीफ बटोरने वाली स्नेहा चाहती हैं कि बॉलीवुड की पहचान रही गानों की पारंपरिक शैली(सॉन्ग एंड डांस सीक्वेंस) भी बरकरार रहे. वे उत्साह के साथ बताती हैं कि इंडस्ट्री में उनके जैसे युवा संगीतकारों के लिए अथाह संभावनाएं हैं और अगर आपमें प्रतिभा है तो आपको कोई नहीं रोक सकता.  

जीत की चाह में सितारों की थाह

साठ साल पहले की बात है. देश आजाद होने वाला था. तारीख तय हुई थी 14 अगस्त. इस दिन भारत और पाकिस्तान नाम के दो देशों का जन्म होना था. मगर कुछ ज्योतिषियों ने जवाहर लाल नेहरू को चेतावनी दी कि किसी देश के जन्म के लिए 14 अगस्त का दिन शुभ नहीं है. नेहरू ने आजादी के समझौते पर दस्तखत करने का समय आधा घंटा आगे बढ़ा दिया और इस तरह देश 15 अगस्त 1947 की रात ठीक 12 बजे वजूद में आया.

बोगोला देवी मंदिर के मुख्य पुजारी पंकज शर्मा इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी पार्टियों के नेता यहां शक्ति का वरदान मांगने आते हैं और कई ऐसे भी होते हैं जो आधी रात के बाद साधना करते हैं किस्सा कितना सा है ये तो पक्के तौर पर कोई नहीं बता सकता मगर ये जरूर है कि केवल एक तिथि के अंतराल पर पैदा हुए भारत और पाकिस्तान का सफर बीते साठ साल के दौरान असाधारण रूप से अलग रहा है. ज्योतिषियों की मानें तो सिर्फ आधा घंटा पहले अस्तित्व में आने से पाकिस्तान की जन्म कुंडली बदल गई और इसलिए उसे लगातार ग्रह-नक्षत्रों का प्रकोप झेलना पड़ रहा है.

और बात अगर सच्ची है तो समझना मुश्किल नहीं कि क्यों चुनाव आते ही नेता ज्योतिष और कर्मकांड की तरफ भागने लगते हैं. इन दिनों भी ऐसा ही हो रहा है. ज्योतिषियों की भारी मांग है. वोटरों को लुभाने से बड़ी चिंता कई नेताओं को इस बात की है कि भगवान और ग्रह नक्षत्रों को कैसे प्रसन्न किया जाए. कहीं बकरों की बलि दी जा रही है तो कहीं 1000 पंडित अनुष्ठान में आहुति दे रहे हैं. कोई उम्मीदवार इस बात का ध्यान रख रहा है कि नामांकन के वक्त उस पर सूरज की रोशनी पड़ रही हो तो कोई अपनी कलाई घड़ी पर नजरें गड़ाए ठीक उस मिनट का इंतजार कर रहा है जब उसे नामांकन दाखिल करना है. भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इसके लिए दोपहर 12:39 का वक्त चुना क्योंकि कहा जाता है कि ये वही समय है जब राम ने रावण का वध किया था. उधर, एक नेता ने चुपके से अपने नाम की अंग्रेजी वर्तनी में एक अतिरिक्त ‘ए’ जोड़ लिया है ताकि उनके सितारे चमक जाएं. कहीं गरीबों को भोजन कराया जा रहा है तो कहीं भैरों बाबा और मां काली के मंदिर में शराब का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में भिखारियों में बांटा जा रहा है. ज्योतिषी नेताओं को बता रहे हैं कि चुनाव कार्यालय या मंदिर में प्रवेश करते हुए पहले कौन सा कदम भीतर रखना है और नेता किसी कठपुतली की तरह ऐसा ही कर रहे हैं. बल्कि देखा जाए तो कई नेताओं के तो हर कदम पर ही ज्योतिष और कर्मकांड का असर दिख रहा है.

चटख केसरिया कुरता पहने और माथे पर लंबा टीका लगाए आचार्य राज ज्योतिषी शुक्ला दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड में नजर आ रहे हैं. उनका यहां दिखना आश्चर्य है क्योंकि उनके मुताबिक भाजपा के पूर्व महासचिव संजय जोशी की तरफ से उन्हें 2006 में पार्टी का राजगुरू मनोनीत किया गया था. शुक्ला कहते हैं, ‘भाजपा के लोगों को मैं पसंद आया क्योंकि मैं कट्टर हिंदुत्व की बात करता था.’

मगर अब शुक्ला अपनी सलाह को सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं रखते. वे ‘दलगत ज्योतिष’ से ऊपर उठ चुके हैं. चुटकी लेते हुए वे कहते हैं, ‘कोई नेता नहीं जानता कि मैं और कहां-कहां जाता हूं.’ शुक्ला बताते हैं कि पिछले दो महीनों में वे 40 सांसदों के लिए पूजाएं कर चुके हैं जिनकी अवधि दो से लेकर 12 घंटे तक रही है. पूजा कितनी बड़ी हो ये इस बात पर निर्भर करता है कि उम्मीदवार के सितारे कितने कुंद और इरादे कितने बुलंद हैं.

कुछ महत्वाकांक्षी नेता तो एक कदम आगे जाकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की कुंडली ज्योतिषियों के पास लेकर चले आते हैंआस्था और अंधविश्वास के पैमाने पर नेता कहां ठहरते हैं इस बारे में उनसे तो कुछ जान पाना बड़ा मुश्किल है मगर 2004 में बिजनेस इंडिया नामक पत्रिका ने एक अध्ययन कर बताया था कि भारत में ज्योतिष करीब 40,000 करोड़ रुपये का कारोबार है और आम चुनाव के दौरान इस आंकड़े में 600 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हो जाती है.

उपाय कैसे कैसे

  •  कहा जाता है कि तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने हाल ही में अपने असिस्टेंट के जरिए मशहूर अंकशास्त्री श्वेता जुमानी से ये जानने के लिए संपर्क किया कि माकपा से किस तरह पार पाया जाए. जुमानी ने उन्हें सलाह दी कि वे अपने नाम की अंग्रेजी वर्तनी में एक और ‘ए’ जोड़ दें. प. बंगाल में हालात जिस तरह से बदल रहे हैं उससे लगता है कि चुनावों में ममता वाम के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती हैं.
  • पिछले साल जब परमाणु समझौते पर संसद में घमासान मचा था और इस पर होने वाले विश्वास मत में सरकार के गिरने की संभावनाएं तक बन गई थीं तो समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने सरकार के ऊपर मंडरा रहे संकट को टालने के लिए 302 बकरियों और 17 भैंसों की बलि दे डाली. विधायकों की खरीद-फरोख्त के साथ मिलकर ये कुर्बानी काम कर गई.
  • एक वक्त था जब दिल्ली में जालंधरी बाबा का जलवा हुआ करता था. बाबा के दरवाजे पर नेताओं की भीड़ लगी रहती थी जो उन्हें अपना गुरू मानते थे और हर काम उनकी सलाह से ही करते थे. बाबा के भक्त कहते हैं कि अगर कोई बाबा से करीब से जुड़ा हो तो उसे ये बताने की जरूरत भी नहीं होती थी कि वह क्या चाहता है. प्रणव मुखर्जी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेता कई मौकों पर उनसे सलाह लेने के लिए आते थे. पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ति ने भी मुख्यमंत्री के रूप में अपने पिता का कार्यकाल बढ़ाने के लिए उनसे मदद मांगी थी. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने भी उनसे अपने कैंसर के इलाज के बारे में पूछा था. बाबा अब इस दुनिया में नहीं हैं.
  • तमिलनाडु की राजनीति की बात की जाए तो यहां एआईएडीएमके की मुखिया जयललिता पार्टी से जुड़ी हर बात पर ज्योतिष का ख्याल रखती हैं. एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने तहलका को बताया कि जिन लोगों की लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा थी उन सभी ने अपने आवेदन के साथ अपनी एक जन्मकुंडली भी जमा की थी. इस नेता का कहना था, ‘किसी निर्वाचन क्षेत्र के लिए संभावित उम्मीदवारों में से किसी एक का नाम तय करने के लिए अध्यक्ष को जन्मकुंडली से मदद मिल सकती है.’ राजनीतिक टिप्पणीकार आर बालसुब्रमण्यम कहते हैं, ‘ज्योतिष में अपने विश्वास को लेकर जयललिता में कोई झिझक नहीं है.’ 20 अप्रैल को एआईएडीएमके सभी 23 लोकसभा उम्मीदवारों ने एक साथ दोपहर 12.20 से 1.50 बजे के बीच ‘खास समय में’ नामांकन दाखिल किया. हरे रंग के प्रति जयललिता का लगाव जगजाहिर है. पोएस गार्डन स्थित अपने घर से निकलते हुए वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि उनकी कार घर के पास बने भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर के सामने से जरूर गुजरे. बताया जाता है कि एक बार जयललिता समर्थकों को संबोधित करने जा रही थीं तो उन्होंने पाया कि एक मंदिर उनके बाईं तरफ पड़ रहा है और भीड़ दाईं तरफ. उन्होंने फौरन यू टर्न लिया ताकि मंदिर दाईं तरफ हो और भीड़ बाईं तरफ और तब जाकर वे सहज हो पाईं.
  • 1992 के मुंबई दंगों में दोषी करार दिए गए शिवसेना नेता गजानन किरीटकर ये जानने के लिए ज्योतिषियों के पास जा पहुंचे कि उत्तर-पश्चिम मुंबई से पर्चा दाखिल करने के लिए तय दिनों में कौन सा दिन ऐसा होगा जब चंद्रमा अपनी पूर्ण या अधिकतम कला में हो. उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका भाग्य राजकुमार पटेल की तरह नहीं होगा. गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में विदिशा से कांग्रेस के उम्मीदवार पटेल को उनके ज्योतिषी ने बताया था कि वे अपना नामांकन बिल्कुल आखिरी वक्त पर भरें. दुर्भाग्य से तकनीकी कारणों की वजह से उन्हें कुछ अतिरिक्त दस्तावेज लेने के लिए घर वापस जाना पड़ा और जब तक वे वापस नामांकन केंद्र पर आए तब तक इसकी समय सीमा खत्म हो चुकी थी. शायद सुषमा स्वराज के ज्योतिषी बेहतर रहे होंगे क्योंकि पटेल के अयोग्य घोषित होने से विदिशा में उनके सामने कोई चुनौती नहीं रह गई थी.
  • गुजरात में एक बड़े नेता ने एक विशेष यज्ञ के लिए आसाराम बापू की मदद मांगी है जो 30 अप्रैल को उनके घर पर किया जाएगा. शायद ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें अपने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने 17 पुजारियों से रुद्राभिषेक करवाया था.

जाने-माने ज्योतिषी बेजान दारूवाला की वेबसाइट गणोशस्पीक्सडॉटकॉम के सीईओ हेमांग अरुण पंडित कहते हैं, ‘सभी इसमें यकीन रखते हैं पर कई इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करते.’ दारूवाला कहते हैं, ‘देश भर से कई लोग रोज ही मेरे पास आते हैं और नामांकन दाखिल करने की सबसे शुभ तारीख पूछते हैं. वे ये भी जानना चाहते हैं कि उनके प्रतिद्वंदियों ने मुझसे क्या सलाह ली है.’

राजस्थान में अजमेर शरीफ दरगाह पर वसे तो सालभर ही श्रध्दालुओं का तांता लगा रहता है मगर चुनाव के दिनों में इस भीड़ में नेता भी शामिल हो जाते हैं

कुछ महत्वाकांक्षी नेता तो एक कदम आगे जाकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की कुंडली ज्योतिषियों के पास लेकर चले आते हैं. उत्तर प्रदेश में सक्रिय ज्योतिषी पंडित रमेश दुबे तहलका से कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में एक विरोधी पार्टी ने मुझसे मायावती की कुंडली पढ़ने के लिए कहा.’

एक और मशहूर ज्योतिषी अजय भांबी कहते हैं, ‘सभी किसी न किसी तरह जीतना चाहते हैं और वे सबसे ज्यादा परेशान चुनावों से पहले रहते हैं.’ इन दिनों भांबी से सलाह लेने वालों की तादाद इतनी ज्यादा है कि उन्होंने दिल्ली से बाहर के अपने सभी दौरे रद्द कर दिए हैं. उनके पास सबसे ज्यादा लोग टिकट बंटने से पहले आते हैं. भांबी कहते हैं, ‘एक बार तो हाल ये हो गया कि मेरे घर पर इकट्ठा नेताओं में कई अलग-अलग पार्टियों के थे जो एक दूसरे को मेरे घर पर पाकर झेंप रहे थे.’ जिनके पास दो पार्टियों के टिकट पर लड़ने का विकल्प होता है वे भांबी से पार्टी और पार्टी मुखिया की कुंडली का अध्ययन करने को भी कहते हैं ताकि ये जान सकें कि उनके नक्षत्रों के साथ किस पार्टी का मेल बेहतर बैठता है.

भांबी का नियति में प्रबल विश्वास है और वे इसे बदलने के लिए कोई उपाय करने से इनकार कर देते हैं. जरूरी नहीं कि ऐसा करना फायदेमंद ही हो. राजनीतिक हलकों में सक्रिय आचार्य किशोर कहते हैं, ‘मैंने माधवराव सिंधिया की कुंडली देखी और उन्हें बताया कि वे कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे. उनकी पत्नी फौरन मुझे एक तरफ ले गईं और कहा इस तरह की बात मत कीजिए, वे नाराज हो जाएंगे.’

भांबी और आचार्य किशोर उन कुछ लोगों में से हैं जो भविष्यवाणी करने तक ही सीमित रहते हैं. कुछ दूसरे यज्ञ करते हैं. मगर भविष्य को बदलने का दावा करने वाले कुछ ऐसे लोगों का वर्ग तेजी से उभर रहा है जो किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं. रात को की जाने वाली विशेष तंत्र साधना इनमें से एक है. इसमें उम्मीदवार के पास चार विकल्प होते हैं -विरोधी को अपने पक्ष में करना, उसे अस्थिर करना, पागल कर देना और उसकी मौत. हेमांग पंडित कहते हैं, ‘नेता सिर्फ प्रार्थना नहीं चाहते वे अपने सितारे बदलना चाहते हैं. हम उनसे कहते हैं कि ये हमारे लिए संभव नहीं है. स्वाभाविक है कि उनमें से ज्यादातर तंत्र साधकों के पास चले जाते हैं.’

इसलिए हैरत की बात नहीं कि कुछ हफ्ते पहले उड़ीसा के वित्त मंत्री प्रफुल्ल चंद्र घडई ने कुछ ही दिन पहले राज्य के जयपुर जिले में स्थित बिरोजा मंदिर में रात में एक तंत्र साधना करवा रहे थे. मगर ये पूरी होती इससे पहले ही घडई को भागना पड़ा क्योंकि तांत्रिक और उन पर धनुष-बाण लिए आदिवासियों ने हमला बोल दिया. ये आदिवासी इस तंत्र साधना का विरोध कर रहे थे.

मगर तंत्र साधना के जरिए शत्रु पर विजय पाने के लिए सबसे प्रसिद्ध है असम की राजधानी गुवाहाटी में स्थित कामाख्या शक्तिपीठ. इन दिनों यहां के बोगोला देवी मंदिर में हर तरफ पीला रंग छाया हुआ है. बोगोला देवी कामाख्या देवी के दस रूपों में से एक हैं. जहां से मंदिर की सीढ़ियां शुरू होती हैं वहां पर पीले फूल बेचती एक बच्ची आवाज देती है, ‘देवी के लिए फूल ले लो. सारे बड़े मंत्री मेरी दुकान से फूल लेते हैं.’

बात करने पर वह बताती है कि नेता वहां पर देर रात आते हैं. मान्यता है कि बोगोला देवी शत्रुओं का नाश करती हैं. जनता की निगाहों से बचकर नेता यहां यही मनोकामना पूरी करवाने के लिए आते हैं. कामाख्या देबुत्तर मंदिर के राजीव शर्मा तो खुलेआम कहते हैं कि कामाख्या मंदिर ज्योतिषियों का नहीं बल्कि तंत्र साधकों का घर है. वे कहते हैं, ‘मगर ज्यादातर नेता ऐसे होते हैं जो ज्योतिषियों की सलाह पर यहां आते हैं.’

बोगोला देवी मंदिर के मुख्य पुजारी पंकज शर्मा इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी पार्टियों के नेता यहां शक्ति का वरदान मांगने आते हैं और कई ऐसे भी होते हैं जो आधी रात के बाद साधना करते हैं. मगर शर्मा किसी का नाम बताने से इनकार कर देते हैं. हालांकि कुछ दूसरे सूत्र तहलका को बताते हैं कि कांग्रेस उम्मीदवार मणिकुमार सुब्बा कामाख्या देवी के बड़े भक्त हैं. उनके दिल्ली स्थित फार्महाउस में एक मंदिर है जहां एक ज्योतिषी नियमित रूप से बैठता है. सूत्रों के मुताबिक सुब्बा दूसरे ज्योतिषियों से सलाह लेने के लिए ऋषिकेश और हरिद्वार भी जाते हैं.

रास्ते और भी हैं. राजस्थान में अजमेर शरीफ दरगाह पर वसे तो सालभर ही श्रध्दालुओं का तांता लगा रहता है मगर चुनाव के दिनों में इस भीड़ में नेता भी शामिल हो जाते हैं. यहां के मुख्य मौलवी कुतुबुद्दीन साकी कहते हैं, ‘कई नेता मुझे फोन और ईमेल करते हैं और अपने लिए दुआ मांगने को कहते हैं.’ वैसे नेता अगर खुद न जा पाएं तो यहां अपनी पत्नी और बच्चों को भेज देते हैं. दरगाह में आने वाले जायरीन पवित्र पत्थर के चारों तरफ एक धागा बांधते हैं और मन्नत मांगते हैं. अगर उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो उन्हें वापस आकर इस धागे की गांठ खोलनी होती है. अतीत में यहां आने वालों में गोविंदा, संजय दत्त और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत रह चुके हैं. गहलोत यहां विधानसभा चुनाव से पहले आए थे और अपनी जीत के 15 दिन बाद ही गांठ खोलने के लिए वापस आए थे. हाल ही में यहां आने वाले नेताओं में मुलायम सिंह, वसुंधरा राजे, श्रीप्रकाश जायसवाल, शाहनवाज हुसैन और सचिन पायलट हैं. साकी को अब ये उत्सुकता है कि इनमें से कौन यहां गांठ खोलने और अजमेर दरगाह का शुक्रिया अदा करने वापस आता है.

उधर, मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक में भी पुजारियों और सुरक्षा गार्डों की चिंताएं बढ़ गई हैं. यहां भी देश के कोने से कोने से नेता अपनी मनोकामना पूरी होने की आस में पहुंचते हैं. अपने पिता सुनील दत्त की राजनीतिक विरासत संभालने वाली प्रिया दत्त ज्यादा धार्मिक भले ही न हों पर अपने पिता की सीट बचाए रखने की चिंता ने उनके भीतर एक नई आध्यात्मिकता का उदय कर दिया है. अपना नामांकन दाखिल करने से पहले प्रिया ने शहर के सभी मुख्य धार्मिक स्थलों का फेरा लगाया जिनमें सिद्धिविनायक मंदिर, द माउंट मैरी चर्च और हाजी अली दरगाह शामिल है. प्रिया अकेली नहीं हैं जिनमें आस्था का नया-नया उदय हुआ हो. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया और प्रधानमंत्री पद की लालसा पाले शरद पवार भी उनके हमराह हैं. 1970 के दशक के समाजवादी आंदोलन की अहम शख्सियतों में से एक और खुद को नास्तिक बताने वाले पवार ने पिछले महीने तब सबको चौंका दिया जब नामांकन दाखिल करने से पहले वे ओस्मानाबाद जिले में स्थित तुलजा भवानी मंदिर पहुंच गए. दरअसल देखा जाए तो महाराष्ट्र में शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो चुनाव से पहले इस मंदिर में दर्शन करने न गया हो.

कोलकाता में कालीघाट मंदिर एक धारा के पास स्थित है जिसके बारे में लोग कहते हैं कि यह असली गंगा है. कहा जाता है कि कुछ दिन पहले जब घड़ी ने रात के बारह बजाए और बंगाली नववर्ष शुरू हुआ तो अपने दो सहायकों के साथ तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी का चुपचाप यहां आगमन हुआ और उन्होंने यहां विशेष पूजा की. अगली सुबह उनके कुछ समर्थकों ने एक भोज के लिए 50 बकरों की बलि दे डाली. ढोल-मंजीरे बजाते वे नारे लगा रहे थे, ‘दीदी को जीतना होगा.’ कहा जाता है कि कोलकाता में माकपा नेता मोहम्मद सलीम तक एक हनुमान मंदिर में जाकर जीत की प्रार्थना कर आए.

उधर, दिल्ली में ज्योतिषी आरबी धवन अपने लैपटाप के साथ बैठे हैं जिसमें कई कुंडलियां रखी हुई हैं. वे कहते हैं, ‘कर्मों की ऊर्जा आपके ऊर्जाचक्र को प्रभावित कर सकती है.’ हालांकि ज्योतिषी कहते हैं कि उपायों द्वारा बुरे समय को टाला जा सकता है और अच्छे समय को जल्दी लाया जा सकता है.

इसलिए धवन के मुताबिक ये संयोग नहीं है कि भाजपा ने अचानक ही स्विस बैंकों में जमा धन को चुनावी मुद्दा बना लिया है. वर्तमान में ग्रहों की जो स्थिति है वह राहु, बृहस्पति और शनि के बीच संयोग बना रही है. राहु अंधेरे या काले का प्रतीक है. शनि विदेश यात्रा को दर्शाता है. बृहस्पति धन और धर्म से जुड़ा हुआ है. इसलिए एक चतुर ज्योतिषी को मालूम होगा कि धर्म से जुड़ी कोई पार्टी ग्रहों के इस संयोग को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है. सूत्र बताते हैं कि आडवाणी को सलाह देने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखने वाले कम से कम पांच ज्योतिषी हैं. धवन को लगता है कि आडवाणी की अचानक स्विस बैंकों में जमा धन के प्रति जिस तरह की दिलचस्पी पैदा हुई है वह इसी का नतीजा है.

मेनका गांधी के बेटे वरुण के ग्रह भले ही खराब चल रहे हों मगर उनके अपने सितारे बढ़िया हैं. उन्हें ज्योतिषियों की बजाय जालंधरी बाबा पर विश्वास है. एक बार उनके एक समर्थक ने उन्हें बताया कि उसने अपनी एक एकड़ जमीन पर इस बात पर दांव पर लगा दी है कि मेनका एक लाख वोटों से जीतेंगी. मतगणना खत्म होने के बाद पता चला कि मेनका अस्सी हजार वोटों से जीती हैं. मेनका ने मन ही मन जालंधरी बाबा से शिकायत की कि उनकी वजह से एक आदमी की एक एकड़ जमीन चली गई और उन्होंने ऐसा होने दिया. वे मन ही मन सोच रही थीं कि गुरूजी ने ऐसा क्यों होने दिया. यूपी बॉर्डर तक आते-आते उनके फोन की घंटी बजी. खबर सुनकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. पता चला कि वोटों की फिर से गिनती हुई थी और मेनका ठीक एक लाख वोटों से जीत गई थीं.

ज्योतिषियों पर नेताओं के इस यकीन की हंसी उड़ाना आसान है पर ये सच है कि नेता भी उसी समाज से आते हैं जिसमें धर्म और अलौकित ताकत पर विश्वास बहुत गहरा है और जब मौका दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे बड़ी परीक्षा का हो तो मामला लौकिक हो या पारलौकिक, वे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते.

शांतनु गुहा रे, टेरेसा रहमान, राना अय्यूब और पीसी विनोज कुमार के योगदान के साथ  

गवाही की कीमत – चुकती और मिलती

1984 में हुए सिखों के कत्लेआम के मामले में आज से करीब 15 साल पहले हर किशन लाल भगत और सज्जन कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले चलाने की सिफारिश कर चुके डी के अग्रवाल (रिटायर्ड उप पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश) को आज इस मामले पर बोलना ही बेमतलब जान पड़ता है. वे कहते हैं, ‘फैसला तो नेताओं को करना है.’ थोड़ा और कुरेदने पर वे कहते हैं, ‘उनकी मिलीभगत साफ दिखती है. लेकिन हमारा न्याय तंत्र ऐसा है कि एक बार लंबा समय बीता नहीं कि सबूत कमजोर पड़ जाते हैं या उनमें फेरबदल किये जाने से उनकी विश्वसनीयता जाती रहती है.’

दंगों में अपने पति को खो चुकीं अनेक कौर ने एक शपथपत्र दाखिल करके सज्जन कुमार और उनके दो सहयोगियों जय सिंह और जय किशन के खिलाफ तमाम जानकारियां दी थी

अग्रवाल और दिल्ली हाईकोर्ट के सेवा निवृत्त जज जेडी जैन को 1990 में सिख नरसंहार मामले की जांच के लिए गठित एक समिति का मुखिया बनाया गया था. दंगों के बाद ये छठवीं जांच समिति थी जिसने अपनी रिपोर्ट 1993 में सरकार को सौंप दी थी जिसके बाद इस रपट का जो होना था वही हुआ यानी ये अपनी परमगति को प्राप्त हो गई.

अगस्त 2005 में जीटी नानावती आयोग (इस मामले की दसवीं जांच) की सिफारिशों के बाद कहीं जा कर सज्जन कुमार के खिलाफ तीन मामले दर्ज हुए. पहला मामला दिल्ली छावनी इलाके के राजनगर में 18 सिखों की हत्या के मामले में दर्ज हुआ. इस मामले में पांच गवाहों ने सीबीआई के समक्ष ये बयान दिया कि उन्होंने सज्जन कुमार को भीड़ की अगुवाई करते हुए देखा था. सीबीआई के  सामने सज्जन कुमार के खिलाफ गवाही दे चुकी निरप्रीत कौर तहलका को बताती हैं कि 2 नवंबर की सुबह उसने देखा कि सज्जन कुमार पुलिस की जीप में सवार होकर एलान कर रहे थे- ‘कोई भी सिख जिंदा नहीं रहना चाहिए. किसी ने अगर सिखों को अपने घर में छिपाया तो उसे जला दिया जाएगा.’

दूसरा मामला उत्तर पश्चिम दिल्ली के सुल्तानपुरी का है, यहां छह लोगों ने सज्जन कुमार की पहचान भीड़ की अगुवाई करने वाले के तौर पर की. लेकिन पुलिस अभी तक दोनों मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर सकी है. तीसरे मामले की जांच ही रोक दी गई. ‘पुलिस किस चीज का इंतजार कर रही है? सज्जन कुमार को सजा दिलाने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं’ पीड़ितों के वकील एचएस फूल्का कहते हैं.

8 अक्टूबर 2005 के अंग्रेजी संस्करण में तहलका ने उन बिचौलियों का खुलासा किया था जो सज्जन कुमार और एचकेएल भगत की तरफ से चश्मदीद गवाहों और पीड़ितों के परिजनों को बहला-फुसला और धमका रहे थे.

दंगों में अपने पति को खो चुकीं अनेक कौर ने एक शपथपत्र दाखिल करके सज्जन कुमार और उनके दो सहयोगियों जय सिंह और जय किशन के खिलाफ तमाम जानकारियां दी थी. उनके शपथपत्र के मुताबिक पुलिस भी भीड़ को सिखों की हत्या के लिए उकसा रही थी. लेकिन 1994 में अनेक ने सज्जन कुमार के खिलाफ दिया अपना बयान वापस ले लिया.

सतनामी बाई और दर्शन कौर ने भगत की पहचान की थी लेकिन उनके खिलाफ मामला 1995 में औंधे मुंह गिर पड़ा क्योंकि सतनामी कोर्ट में अपने बयान से पलट गईं 

बाद में उनकी सास साहिबजादी ने तहलका के एक स्टिंग ऑपरेशन में स्वीकार किया कि राठी नाम का कोई आदमी किसी कागजात पर अनेक के अंगूठे का निशान ले गया था. इसके बाद अनेक की ननद मिशरी कौर भी छिपे हुए कैमरे पर ये कहते हुए पाई गईं कि सज्जन कुमार ने अनेक के आरोप वापस लेने की सूरत में उसे फ्लैट दिलाने का प्रस्ताव दिया था. उसने ये भी कहा कि सज्जन कुमार ने उनका जीवन भर का खर्च उठाने का प्रस्ताव भी दिया था. दो साल तक परिवार को ये खर्च मिला भी. ‘2001 में अपनी मृत्यु से पहले अनेक ने मुझसे और अपनी बेटी से कहा कि सज्जन कुमार से पैसा लेते रहना वरना पुलिस में गवाही दे देना,’ मिशरी याद करके बताती है. अनेक ने उनसे ये भी कहा- ‘याद रखना वो तुम्हारे बाप का कातिल है.’ दर्जन भर के करीब समितियां बनाने के बावजूद सबकी सिफारिशें राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ठंडे बस्ते में डाल दी गईं.

समय-समय पर सरकार ने जांच में सामने आए तथ्यों को झुठलाने की कोशिश भी की. उदाहरण के तौर पर नानावती आयोग ने खेर सिंह नाम के एक आदमी का नाम लिया था जो 84 के एक मामले का गवाह था. खेर सिंह ने अपने शपथ पत्र में कहा था, ‘स्थानीय सांसद सज्जन कुमार भीड़ को संबोधित करते हुए कह रहे थे सिखों ने हमारी मां को मार डाला इसलिए इस इलाके में एक भी सिख बचने न पाए.’

लेकिन तहलका ने अपने खुफिया जांच में पाया कि सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट में बिल्कुल उल्टी बात कही गई है ‘कोई भी ऐसा चश्मदीद गवाह सामने नहीं आया जिसके पास घटना से संबंधित कोई विशिष्ट सबूत या सुराग हो. लिहाजा मामले को रद्द करने के लिए भेज दिया गया और संबंधित कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया.’

सतनामी बाई और दर्शन कौर ने भगत की पहचान की थी लेकिन उनके खिलाफ मामला 1995 में औंधे मुंह गिर पड़ा क्योंकि सतनामी कोर्ट में अपने बयान से पलट गईं. दर्शन आपनी जान का खतरा होने के बावजूद भी अपने बयान पर अटल रही और भगत का नाम लेती रही. लेकिन जो नुकसान होना था वो हो चुका था. नानावती ने कहा कि सिर्फ एक गवाह के आधार पर एक पूर्व केंद्रीय मंत्री को आरोपी नहीं ठहराया जा सकता. उन्हें सजा दिलवाने के लिए ये पर्याप्त नहीं है.

तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में साफ हुआ कि पश्चिमी दिल्ली के तिलक विहार इलाके के  प्रतिष्ठित सिख नेता आत्मा सिंह लुभाना ने सतनामी को बयान बदलने के एवज में 12 लाख रूपए देने का सौदा किया था. 1996 में तिलक विहार स्थित शहीदगंज गुरुद्वारे में एक पंचायत के दौरान सतनामी से इस लेन देन से संबंधित सवाल भी पूछे गए थे.

इसके दस्तावेज सिखों के धार्मिक मामलों की प्रभावशाली संस्था दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के पास आज भी मौजूद हैं. 1984 नरसंहार की तमाम पीड़ित विधवाओं की उपस्थिति में उसने गुरु ग्रंथ साहिब की शपथ लेकर स्वीकार किया कि डीएसजीएमसी के पूर्व सदस्य लुभाना ने उसे 12 लाख रूपए देने का प्रस्ताव दिया था जिसके चलते वो अपने बयान से पलट गई. बाद में तहलका के खुफिया कैमरे पर सतनामी ने माना कि उसने अपना बयान इसलिए बदला क्योंकि उसे जान का खतरा था, लेकिन उसने पैसा लेने से इनकार किया. ‘भगत के गुंडो ने मुझे धमकाया कि अगर मैंने अपना बयान नहीं बदला तो वो मेरे भाई और बच्चों को मार देंगे’ उसने कहा, ‘हम पहले से ही डरे हुए थे, इस दबाव के आगे मैं झुक गई.’

दूसरी पीड़िता दर्शन कौर ने तहलका को बताया कि लुभाना ने उसे बयान से पलटने के एवज में 25 लाख रूपए देने का प्रस्ताव दिया था. जब उसने इनकार किया तो लुभाना ने उसकी पिटाई की (इस आरोप के बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अमृतसर की अकाल तख्त ने 1998 में लुभाना को सम्मन जारी किया था). तहलका के खुफिया कैमरे पर लुभाना ने स्वीकार किया कि उसने पंचायत द्वारा लगाए गए 5.28 लाख रूपए का दंड भुगता है लेकिन उसने दर्शन कौर को धमकाने के आरोप को नकार दिया.

29 अक्टूबर 2005 को भगत अपनी मृत्यु के साथ ही पूर्वी दिल्ली के अपने निर्वाचन क्षेत्र में सिखों के सबसे बड़े नरसंहार से जुड़ी तमाम जानकारियां भी हमेशा के लिए अपने साथ लेते गए. शायद 1984 के सिख नरसंहारों की स्मृतियां दिनोंदिन और धूमिल ही पड़ती जाती अगर पत्रकार जरनैल सिंह ने जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीनचिट के विरोध में गृहमंत्री पी चिदंबरम के ऊपर अपना जूता न उछाला होता.

टाइटलर और सज्जन कुमार के लोकसभा टिकट आनन-फानन में काटने के कांग्रेस के फैसले से सिखों में उत्साह फैला है लेकिन पीड़ितों के वकील फूल्का चेतावनी देते हैं कि टिकट काटना एक वक्ती राहत भर है. ‘ये कोई निर्णायक अंत नहीं है. लड़ाई जारी है क्योंकि मूल मुद्दे पर ध्यान दिया जाना अभी बाकी है’ वे चेताते हैं.