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भविष्य की रेखाओं में उलझे भविष्यदृष्टा

2009 के आम चुनावों से ठीक पहले ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की मानो चांदी हो गई थी और उनके कहे-सुने पर चलने वाले नेताओं में भी मानो होड़ सी मची हुई थी मसलन कोई गायों को तो कोई भिखारियों को खाना खिला रहा था, कुछ बकरियों की बलि दे रहे थे, कोई महीने भर के भीतर 200 हवन करने में लगा हुआ था तो कोई एक विशेष रंग के कपड़े दान कर रहा था. बहरहाल नतीजे सामने आ चुके हैं और ढेर सारी चर्चा बटोर चुके भविष्य की रेखाएं पढ़ने में माहिर इन खिलाड़ियों की चमक अब फीकी पड़ गई है. (अपवाद सिर्फ ममता बनर्जी के अंकशास्त्री रहे जिनकी सलाह पर ममता ने अंग्रेजी स्पेलिंग में एक अतिरिक्त ए जोड़ा और बंगाल में लाल झंडे की लुटिया डुब गई).

दिल्ली में रहने वाले ज्योतिषशास्त्री आरबी धवन को अचानक ही अहसास हो रहा है कि अपनी भविष्यवाणियों के लिए उन्होंने ज्योतिष की गलत शाखा को चुन लिया था

‘जीवन में किसी चीज का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता.’ गलत पूर्वानुमानों के बाद गंभीर चिंतन में डूबे बेजान दारूवाला दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, ‘अगर हम गलत सिद्ध होते हैं तो हमें ये मानना चाहिए कि आखिर हम भी इंसान हैं.’

चुनाव नतीजों से पहले तहलका से बात करते हुए दारूवाला ने बताया था कि नतीजे 23 जून से पहले स्पष्ट नहीं होंगे. कांग्रेस के जीतने की स्थिति में प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी का भविष्य उनके शपथ ग्रहण समारोह पर निर्भर होगा और अगर आडवाणी सत्ता में आते हैं तो उनकी पारी ज्यादा लंबी नहीं चलेगी क्योंकि इस देश की किस्मत में कांग्रेस का शासन लिखा है. ‘मेरी भविष्यवाणियां पूरी तरह से सही नहीं रहीं. मैं कांग्रेस के लिए और ज्यादा कठिनाइयों की उम्मीद कर रहा था,’ वो स्वीकार करते हैं, ‘फिर भी मैं कहता रहा था कि कांग्रेस ही सत्ता में आएगी. मैं 85 फीसदी सही था’. 

इस मामले में चेन्नई के भविष्यदृष्टा सेल्वी अपने व्यावहारिक ज्ञान का बेहद चतुर प्रदर्शन करते नजर आते हैं. श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंहे जैसे हाई प्रोफाइल लोगों का भविष्य बताने वाले सेल्वी ने बताया था कि प्रधानमंत्री का पद किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाएगा जो इस दौड़ में नहीं होगा जैसे कि कोई दलित, ईसाई या मुस्लिम. जब तहलका ने उनसे दोबारा संपर्क किया तो वो छूटते ही बोल पड़े, ‘मेरा कहना था कि प्रधानमंत्री का पद किसी अल्पसंख्यक के पास ही जाएगा.’

दिल्ली में रहने वाले ज्योतिषशास्त्री आरबी धवन को अचानक ही अहसास हो रहा है कि अपनी भविष्यवाणियों के लिए उन्होंने ज्योतिष की गलत शाखा को चुन लिया था. उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बनेगी मगर वो गठबंधन की सरकार बनाने से इनकार कर देगी जिसकी वजह से पहले तीसरे मोर्चे की एक अल्पायु सरकार बनेगी और इसके बाद आडवाणी प्रधानमंत्री बनेंगे. उन्होंने तो ये भी कहा था कि एआर अंतुले को राष्ट्रपति मनोनीत किया जा सकता है. अंतुले के मामले में धवन अभी भी अपनी भविष्यवाणी पर कायम हैं.

उनका ये भी मानना है कि पूरे देश की सम्मिलित कुंडली व्यक्तिगत कुंडली पर भारी पड़ जाते हैं. ‘मेरी भविष्यवाणी एक व्यक्ति की कुंडली पर आधारित थी. आडवाणीजी की कुंडली कह रही थी कि वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं पर हो सकता है किसी और की कुंडली उनसे भी ज्यादा ताकतवर रही हो,’ धवन कहते हैं. ‘बड़े पैमाने पर कोई सटीक भविष्यवाणी करने के लिए ज्योतिषशास्त्र की एक अन्य शाखा का उपयोग किया जा सकता है जिसे ‘संहिता’ कहते हैं, इसमें सम्मिलित गुणों को ध्यान में रखा जाता है. भारत में बहुत कम लोग इसका अध्ययन करते हैं. मैंने भी संहिता का उपयोग नहीं किया इसीलिए मेरी चुनावी भविष्यवाणियां गलत हो गईं,’ वो कहते हैं.

दूसरे भविष्यवक्ता काफी सावधानी बरत रहे हैं. दिल्ली के ही एक और भविष्यवक्ता अजय भाम्बी ने गठबंधन सरकार के लक्षण देखे थे जो तीन सालों से ज्यादा चलती नहीं दिख रही थी. ‘मैंने जो कहा था उसे बदल नहीं सकता हूं. पर इस समय मैं कुछ भी नहीं कहूंगा क्योंकि मैं फिर से गलत सिद्ध हो सकता हूं’ इस बारे में पूछने पर भाम्बी कहते हैं.

ऐसा लगता है कि देश की बड़बोली भाविष्यक्ताओं की टोली को मुंह की खानी पड़ी है, पर सवाल ये उठता है कि क्या इसके बाद भी 2014 के चुनावों में राजनेता इन चक्करों से उबर पाएंगे?    

मां ने कहा था

 

मां ने कहा था

चार साल का होने पर

रोटी का कौर

मुंह में रखा ही था

मां कह उठी

अजी सुनते हो

देखो तो इस जितिया को

पूरा एकलखोर है

इसकी चट्टी अंगुली

कैसे उठ रही है

मेरी तरफ

नासपीटा बड़ा होकर

कौन देस जाकर रहेगा

अपनी जैसी जोरू के साथ

तिरालीस की उमर में

अपने हाथ से बेली-सिकी

रोटी खाते हुए

चट्टी अंगुली को

अपनी ओर देख

पांच सौ मील दूर गांव में

मां के अंतिम स्थान को

याद करते हुए

आंसुओं से भीग जाता हूं

भरी बरसात में

पिता के दिए घर में

निपट अकेला.

 

मां तो यही समझती है

मां अब भी यही समझती है

मैं अंगुली पकड़कर

स्कूल जाता हुआ बच्चा हूं

मां को नहीं दिखते

मेरी कनपटी के सफेद बाल

चेहरे पर बढ़ते हुए सल

जब भी आता है गांव से

मां का पत्र

हिदायतों की बरसात कर जाता है

मुझ पर

मैं

तरबतर

हो जाता हूं

उसकी हिदायतों से 

जितेन्द्र चौहान 

                                                     

 

 

 

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‘साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.  

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

आपराधिक लापरवाही के बेलौस साक्ष्य

उस दिन क्या हुआ ये देश में सबको पता है. 26 नवंबर की उस रात भारी-भरकम हथियारों से लैस 10 आतंकी एक नौका से गेटवे ऑफ इंडिया के पास उतर कर दो-दो लोगों के समूह में बंट गए. हर तरह के आधुनिक जेहाद के लिए प्रशिक्षित आतंकियों के ये समूह यहां से अपने लिए नियत अलग-अलग स्थानों की ओर बढ़ चले. इसके बाद पहली गोली कोलाबा में स्थित लियोपोल्ड कैफे में चली और आखिरी इसके तीन दिन बाद होटल ताज में. इस दौरान करीब पौने दो सौ निर्दोष लोग मारे गए और 400 के करीब घायल हुए.

दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं था 

मगर जो हुआ, उसको न होने देने या उसकी भयंकरता कम रहे, ऐसा करने के लिए क्या किया गया ये सबको नहीं पता. पुलिस को की गईं कॉल्स के रिकॉर्ड्स, जो कि तहलका  के पास मौजूद हैं, बताते हैं कि जब आतंकी अपने नापाक इरादे पूरा करने में लगे हुए थे, तब पूरी तरह से मतिभ्रम की शिकार मुंबई पुलिस, अपने ही अफसरों की जान के प्रति लापरवाह बनी हुई थी. देखा जाए तो मुंबई एक ऐसा शहर है जो इससे पहले भी कई बार आतंक की गिरफ्त में आ चुका है. इसकी शुरुआत 1993 में हुए बम धमाकों से हुई थी. इसके चलते आर्थिक गतिविधियों के केंद्र वाले इस इलाके में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड द्वारा प्रशिक्षित 50 कमांडो भी मौजूद रहते हैं मगर उनकी सेवाएं लेने का ख्याल किसी के दिमाग में आया ही नहीं. एक तथ्य ये भी है कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मुंबई पुलिस ने एक निर्धारित प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर) बना रखा है जो कि पुलिस आयुक्त के निर्देश पर अमल में लाई जाती है पर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका.

पुलिस की ट्रांस्क्रिप्ट्स – पुलिस के द्वारा या उसको की गई हर कॉल रिकॉर्ड की जाती है – एक दिल दहला देने वाली सच्चाई बयान करती हैं. आतंकियों में से दो – अजमल कसाब और अबू इस्माइल – को सबसे पहले अत्यधिक भीड़भाड़ वाले छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) में के प्लेटफॉर्म नंबर 13 में जाते हैं और वहां से तभी बाहर निकलते हैं जब वे वहां मौजूद 37 लोगों को अपने आतंक की भेंट चढ़ा चुके होते हैं. इसके बाद दोनों टाइम्स ऑफ इंडिया की इमारत की ओर रुख करते हैं और कुछ ही मिनटों में कामा हॉस्पिटल में प्रवेश कर जाते हैं.

मुंबई पर हमला हुआ था और पुलिस कंट्रोल रूम में अफरा-तफरीका आलम था. रात में ठीक 10:29 बजे कामा हॉस्पिटल के बिल्कुल बगल में मौजूद आजाद मैदान पुलिस स्टेशन से साउथ कंट्रोल (मुंबई पुलिस कई इलाकों और जोनों में बंटी हुई है) में एक फोन किया जाता है जिस पर वहां मौजूद कॉल रिकॉर्ड्स के मुताबिक ये बताया जाता है कि ‘सीएसटी से निकले दो आतंकवादी आजाद मैदान की ओर जा रहे हैं’.

ऐसे संदेश बार-बार आते रहते हैं:

10:38 रात्रि: आजाद मैदान टू साउथ कंट्रोल अगेन: वे विशेष शाखा 1 के आफिस की ओर जाने वाली गली में पैदल जा रहे हैं.

10:39 रात्रि: बीट मार्शल टू साउथ कंट्रोल: हम पीठ पर बैग लादे जाते संदिग्ध व्यक्तियों को देख सकते हैं.

10:40 रात्रि: क्या आपको हमारा संदेश मिल गया कि यहां दो संदिग्ध लोग हैं.

10:54 रात्रि: पीटर एमआरआर टू कंट्रोल: टीओआई (टाइम्स ऑफ इंडिया) लेन में गोलियां चल रही हैं.

10:59 रात्रि: एलटी मार्ग टू कंट्रोल: आतंकवादी कामा (हॉस्पिटल) में पहुंच गए हैं.

एक विचित्र तथ्य ये भी है कि कसाब और इस्माइल ने आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के अहाते में घुसकर एक पुलिस उपायुक्त, बृजेश के घर में प्रवेश करने की भी कोशिश की थी. ये दोनों जितनी आसानी से सीएसटी में मौत का खेल खेलने में कामयाब रहे थे शायद उसने इनकी हिम्मत को कई गुना ज्यादा कर दिया था. रिकॉर्ड्स से ये साफ है कि कंट्रोल रूम को रात 10:29 से (जब आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ने उसे इस बारे में आगाह किया था) 10:59 तक (जब कसाब और इस्माइल कामा हॉस्पिटल में घुसे थे) आतंकवादियों के बारे में पल-पल की खबर थी. मगर इस दौरान सुव्यवस्थित तरीके से कुछ भी नहीं किया गया.

हालांकि कुछ पुलिस के अफसर इस बीच कोशिशें करते जरूर दिखे मगर ये उनकी खुद की पहल पर की गईं कोशिशें थीं, ऊपर से आए स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं. ऐसे ही अफसरों में से एक थे मुंबई सेंट्रल इलाके के प्रभारी अतिरिक्त पुलिस आयुक्त सदानंद दाते. हालांकि आतंकी हमले उनके इलाके में नहीं हो रहे थे फिर भी वर्ली डिवीजन से सूचना मिलने पर उन्होंने तुरंत कंट्रोल से संपर्क साध कर इस बाबत और जानकारी ली. इसके बाद उन्होंने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (दक्षिण) और संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून और व्यवस्था) को एक एसएमएस भेजा. उनसे सीएसटी जाने को कहा गया.

दाहिनी ओर से हमारी कार के ऊपर गोलियों की जबर्दस्त बौछार होने लगी. मैंने दो लोगों को एके-47 लिए हुए देखा. करकरे, काम्टे और सालस्कर सर ने भी फायरिंग शुरू कर दी26/11 के आरोप पत्र और दाते की बातचीत के विवरणों से हमें हैरान करने वाली जानकारियां मिली हैं. इसमें अधिकारियों की बदहवासी और जड़ता की झलक मिलती है. उस रात दाते ने जो अनुभव किया वो न केवल भयावह था बल्कि अति लापरवाही भी थी.

कसाब और इस्माइल रात के 10.59 बजे कामा पहुंचे थे जबकि दाते 11.05 बजे वहां पहुंचे. सीएसटी जाने का निर्देश मिलने के बाद वो पहले मालाबार हिल स्थित थाने पहुंचे जहां से उन्होंने एक कार्बाइन ली. वहा उन्होंने अपनी टीम के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट्स की मांग की पर वे वहां उपलब्ध नहीं थी (सिर्फ दाते और उनके ऑपरेटर के पास बुलेट प्रूफ जैकेट थीं). सीएसटी के रास्ते में दाते की मुलाकात पुलिस इंसपेक्टर मोरे से हुई जिसने उन्हें स्पेशल ब्रांच-1 के पास हो रही फायरिंग और कामा अस्पताल में आतंकियों के घुसने की जानकारी दी. मोरे ने ये भी बताया कि आतंकियों ने अस्पताल की चौथी मंजिल पर मरीजों और नर्सो को बंधक बना लिया है.

जैसे ही दाते कामा अस्पताल में घुसे उन्होंने मुख्य दरवाजे पर दो लाशें पड़ी हुई देखीं. वहां चौकीदार ने उन्हें बताया कि चौथी मंजिल पर नर्सिग स्टाफ बार-बार मदद की गुहार लगा रहा है. दाते ने अपने ऑपरेटर को आदेश दिया कि वो कंट्रोल रूम को ताजा हालात की जानकारी दे दे. इसके बाद वो अपने साथियों के साथ छठवीं मंजिल पर पहुंच गए. वहां से उन्होंने लोहे की कोई चीज उठा कर उस छत की ओर उछाल दी जहां कसाब और इस्माइल पोजीशन लिए हुए थे. जैसे ही टुकड़ा छत पर गिरा वहां गोलियों की बौछार होने लगी. दाते और उनकी टीम ने छठवीं मंजिल के गलियारे में मोर्चा संभाल लिया और कंट्रोल रूम को आतंकियों की स्थिति और फायरिंग के बारे में ताजा जानकारी भी दे दी. रात 11.19 पर पहली बार सहायता भेजने का संदेश भेजा गया. उससे पहले दाते का विचार था कि वो और उनके साथी ये काम अकेले ही कर सकते हैं. अब पुलिस की लॉगबुक को ध्यान से पढ़िए, आपको पता चलेगा कि 11.19 पर पहली बार सहायता मांगे जाने के बाद क्या-क्या हुआ.

11:19 रात्रि: कामा अस्पताल में फायरिंग जारी है. तुरंत कमांडो भेजिए. सेंट्रल रीजन के सर यहां मौजूद हैं.

कंट्रोल: नोटेड

11:20 रात्रि: छठवें तल पर फायरिंग चल रही है. तुरंत सहायता भेजें.

11:20 रात्रि: सेंट्रल रीजन के वाकी टाकी से एक संदेश भेजा जाता है: बुलेट प्रूफ जैकेट की व्यवस्था करें.

कंट्रोल: नोटेड

11:23 रात्रि: दो-तीन धमाके हुए हैं. तुरंत सहायता पहुंचाएं.

11:25 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू कंट्रोल: कामा के छठवें तल पर गोलीबारी हो रही है. सहायता की जरूरत है. नजदीकी स्ट्राइकिंग टीम को भेजें.

11:26 रात्रि: कामा के आस-पास स्ट्राइकिंग टीम की कमी है.

11:27 रात्रि: कामा पर स्ट्राइकिंग भेजें, आदमियों की कमी पड़ रही है.

11:28 रात्रि: (अब तक दाते काफी परेशान हो गए थे. वो और उनकी टीम घायल हो गई थी) सेंट्रल रीजन वॉकी टॉकी आपात संदेश भेजता है: भारी फायरिंग हो रही है.हम सभी घायल हैं. हमें सहायता चाहिए. कृपया सहायता भेजें.

तो छठें तल पर आखिर हुआ क्या जहां दाते और उनकी टीम ने पोजीशन ले रखी थी?

दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं थाछठें तल के गलियारे में पोजीशन लेने के कुछ ही देर बाद आतंकियों ने एक ग्रेनेड फेंका. सब इंस्पेक्टर मोरे और दो जवान बुरी तरह से घायल हो गए. दाते की दाहिनी आंख में भी एक छर्रा लगा जिससे उन्हें उस आंख से दिखना बंद हो गया. दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं था. 11.25 बजे दाते ने अपने ऑपरेटर और घायल जवानों को नीचे जाकर इलाज करवाने और साथ ही अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था करने के लिए भी कहा.

मोरे और पीसी खांडेकर को नीचे नहीं भेजा जा सका क्योंकि वो जमीन पर बेहोश पड़े हुए थे. अगले 25 मिनटों तक दाते और आतंकियों (कसाब, इस्माइल) के बीच फायरिंग होती रही. एक बार फिर दाते को गोली लगी, उनका बायां पैर बुरी तरह से घायल हो गया. अब तक मध्य रात्रि हो चली थी. इसके बाद आतंकियों ने दाते की दिशा में एक और ग्रेनेड फेंका और वहां से कूच कर गए.

यहां कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं जिसका जवाब मुंबई पुलिस को देना होगा.

पहला सवाल: आखिर समय से सहायता क्यों नहीं पहुंची? अगर सहायता समय पर पहुंच गई होती तो कसाब और इस्माइल कामा हॉस्पिटल से भागने में सफल हो ही नहीं सकते थे.

सवाल बेहद अहम है क्योंकि अगर कसाब और इस्माइल यहां से बाहर नहीं निकले होते तो एटीएस मुखिया हेमंत करकरे, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (पूर्वी क्षेत्र) अशोक काम्टे और एनकाउंटर विशेषज्ञ विजय सालस्कर आज जीवित होते.

दाते के बारे में थोड़ा और जान लें. जब उन्होंने दोनों आतंकियों को जाते हुए देखा तो उन्होंने संयुक्त आयुक्त (कानून व्यवस्था) और उपायुक्त पंचम जोन को ठीक बारह बजे एक एसएमएस भेजा जिसमें उन्होंने आतंकियों के जाने और उनके पास स्वचालित हथियार और ग्रेनेड होने की जानकारी उन्हें दी. उन्होंने आतंकियों के जाने के रास्ते के बारे में बताने के साथ अपने लिए सहायता की गुहार भी लगाई. खांडेकर और मोरे को भी सहायता की जरूरत थी क्योंकि वो अभी भी वहां अचेत पड़े हुए थे.

दाते बारह बजे से 12.45 मिनट तक इंतजार करते रहे पर न तो उन्हें कोई जवाब मिला न ही कोई उनकी सहायता के लिए ही आया. तब उन्होंने अपने यानी सेंट्रल रीजन के पुलिस उपायुक्त को फोन किया जो आकर उन्हें अस्पताल ले गए. खांडेकर और मोरे तब तक अपनी जान गंवा चुके थे. साउथ रीजन से कोई भी घायलों और मृतकों की सहायता के लिए नहीं आया था. किसी ने सहायता तक नहीं भेजी. 

जब दाते, कसाब और इस्माइल से मोर्चा ले रहे थे करकरे, काम्टे और सालस्कर कामा अस्पताल की ओर आ रहे थे. वो दाते की सहायता के लिए नहीं आ रहे थे बल्कि दाते की तरह ही उन्हें भी किसी से पता चला था कि कामा में फायरिंग चल रही है इसलिए वो उधर आ गए थे.

पहले काम्टे को मुंबई के पुलिस आयुक्त हसन गफूर ने होटल ओबेरॉय जाने का आदेश दिया था मगर बाद में जेसीपी क्राइम राकेश मारिया, जो कि कंट्रोल रूम में थे, ने उन्हें कामा जाने को कहा. करकरे सीएसटी गए और वहां से पैदल ही कामा की ओर आ गए थे. सालस्कर के रास्तों का पूरा विवरण अरुण जाधव ने आरोप पत्र में दिया है – करकरे, काम्टे और सालस्कर के साथ जो कुछ हुआ उसका आंखो देखा विवरण जाधव ने दिया है क्योंकि वो भी उसी कार में था जिसमें बाकी तीनों थे. कसाब और इस्माइल ने कार पर फायरिंग करके तीनों की हत्या कर दी पर जाधव बच गया).

अपने प्राणों की आहुति देने वाले जवानों के परिजन इस बात से बेहद निराश और व्यथित है कि उनके तमाम आपात संदेशों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गईजाधव के बयान के मुताबिक उसे रात के 09.45 बजे कोलाबा में फायरिंग की सूचना उसके साथी अलक नूर ने दी. उसने उसे सालस्कर को सूचना देने के लिए भी कहा. सालस्कर ने जाधव से हथियार जारी करवा कर कोलाबा पुलिस स्टेशन पहुंचने को कहा. उसने एक कार्बाइन और 35 राउंड गोलियां ली और स्टेशन पहुंच गया. सालस्कर और नूर पहले से ही वहां थे. उन्हें कंट्रोल रूम से सूचना मिली थी कि कुछ लोग सीएसटी पर फायरिंग करके स्पेशल ब्रांच की ऑफिस की ओर जा रहे हैं, फिर वो लोग कामा में घुस गए. तीनों लोग एक कार में सवार होकर कामा की ओर चल पड़े, वहां उनकी मुलाकात काम्टे और करकरे से हुई जिन्होंने पहले से ही पोजीशन ले रखी थी. वो सभी कामा के पिछले गेट पर थे.

जल्द ही उन्हें एक घायल पुलिसवाला आता हुआ दिखाई दिया. इसी वक्त उनके ऊपर कामा की छत से जोरदार फायरिंग हुई. जाधव के मुताबिक काम्टे ने अपनी एके-47 से जवाबी फायर किया. पुलिसवाले ने बताया कि घायल दाते छठी मंजिल पर पड़े हुए हैं. करकरे, काम्टे और सालस्कर ने तुरंत ही मुख्य गेट की ओर जाने का फैसला किया. उन्हें पता था कि कसाब और इस्माइल मुख्य दरवाजे से भागने की कोशिश करेंगे (पूरे कामा परिसर में निकासी के कई रास्ते हैं लेकिन कसाब और इस्माइल जिस जगह पर थे वहां से सिर्फ मुख्य दरवाजे के रास्ते ही निकला जा सकता था).

मुख्य गेट की ओर जाने से पहले ही उनकी नजर पुलिस की कैलिस जीप पर पड़ी जो कि पैधुनी पुलिस स्टेशन की थी. सालस्कर ड्राइवर की सीट पर बैठे, काम्टे उनके बाएं और करकरे पीछे की सीट पर. जाधव और तीन दूसरे लोग पिछले दरवाजे से पीछे की सीटों पर जा बैठे. जब उनकी कार स्पेशल ब्रांच-1 की तरफ बढ़ रही थी उसी वक्त कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि दोनो आतंकी रंग भवन लेन के पास लाल रंग की कार की ओट में हैं. काम्टे ने सालस्कर को गाड़ी लेन की तरफ ले चलने के लिए कहा. रंग भवन लेन में जो कुछ घटनाक्रम हुआ उससे पहले हम ये जान लें कि उस वक्त क्या हुआ था जब करकरे, काम्टे और सालस्कर कामा के पिछले दरवाजे पर थे. दाते के बयान और उसके कॉल रिकॉर्ड से ये बात तो साफ हो गई कि कसाब और इस्माइल आधी रात के बाद कामा से बाहर निकले जब दाते ने एसएमएस किया था.

उसके पहले 11.19 बजे एटीएस के मुखिया करकरे (जिनका कूट नाम था विक्टर) ने एक आपात संदेश जारी किया था.

11.19 रात्रि

विक्टर टू कंट्रोल: हम कामा हॉस्पिटल पर हैं.

यहां फायरिंग चल रही है. पिछले पांच मिनटों में हमारे सामने तीन-चार ग्रेनेड फटे हैं. घेराबंदी करना जरूरी है. हम स्पेशल ब्रांच ऑफिस के पास ही हैं. एक टीम कामा अस्पताल के मुख्य दरवाजे पर भेजी जाए और उन्हें हमसे संपर्क में रहने के लिए कहा जाए ताकि आपस में क्रॉस फायरिंग न हो. प्रसाद (जेसीपी कानून व्यवस्था, ये भी मारिया के साथ कंट्रोल रूम में ही थे) वहां होंगे. उन्हें सेना से बात करने का आदेश दिया जाए और यहां कमांडो भेजे जाएं. कंट्रोल रूम संदेश को सुनिश्चित करते हुए पूछता है, ‘सर, बिल्डिंग के सामने, राइट ?’ इसके कुछ ही मिनट बाद एक और आपात संदेश भेजा गया

वो बड़ी मुश्किल से जेसीपी राकेश मारिया को इस बात के लिए राजी कर पायीं कि वो एक बयान जारी कर ये स्वीकार करें कि उनके पति ने ही कसाब को घायल किया था

11.28 रात्रि, विक्टर टू कंट्रोल रूम: एटीएस, त्वरित प्रतिक्रिया बल और क्राइम ब्रांच की टीमें स्पेशल ब्रांच के पास हैं. हमें कामा को घेरना होगा. प्रसाद को सेना से बात करने के लिए कहा जाए.

11.30 रात्रि: नोटेड

दाते को बचाने के लिए सहायता नहीं पहुंची. न ही करकरे, काम्टे और सालस्कर को बचाने कोई पहुंचा.

दूसरा सवाल: आखिर मुख्य गेट (सिर्फ यही निकास था जिससे कसाब और इस्माइल निकल सकते थे) को क्यों नहीं घेरा गया?

सबसे पहले तो कसाब और इस्माइल से टैरेस पर ही निपटा जा सकता था पर ऐसा हुआ नहीं.

इसके बाद उन्हें कामा से बाहर निकलने से रोका जा सकता था पर करकरे के बार-बार संदेश दिए जाने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका. मुंबई पुलिस का मुख्यालय कामा से थोड़ी ही दूर है. आखिर अतिरिक्त सहायता क्यों नहीं पहुंच सकी? मुख्य दरवाजे पर कब्जा क्यों नहीं किया गया? अगर अतिरिक्त सहायता भेजकर कामा हॉस्पिटल के मुख्य दरवाजे को घेर लिया गया होता तो करकरे, काम्टे और सालस्कर को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती. वे निश्चित ही 11.20 से लेकर आधी रात तक वहीं थे.

तीसरा सवाल: आखिर पूरे 40 मिनट क्यों बर्बाद किए गए? (आईसी 814 के अपहरण के दौरान आपदा प्रबंधन समूह जहाज को अमृतसर में रोकने में असफल रहा. ये चूक बहुत महंगी पड़ी. जहाज कांधार जा पहुंचा और सभी यात्रियों को तीन खूंखार आतंकवादियों की रिहाई के बाद ही छुड़ाया जा सका.)

बिना किसी दबाव या रोक-टोक के कसाब और इस्माइल मुख्य दरवाजे से टहलते हुए बाहर निकल गए और बिल्कुल आजादी से रंग भवन लेन की ओर बढ़ चले. यहां वो पेड़ों की झुरमुट के पास खड़ी एक लाल रंग की कार की ओट में जा खड़े हुए. कंट्रोल रूम से इसकी सूचना मिलने के बाद काम्टे ने सालस्कर को रंग भवन लेन की ओर गाड़ी ले चलने का आदेश दिया था. उनकी कैलिस लाल रंग की कार से बमुश्किल 100 से 150 मीटर दूर थी. तभी इनके ऊपर गोलियों की झड़ी लग गई. जाधव के बयान के मुताबिक, ‘दाहिनी ओर से हमारी कार के ऊपर गोलियों की जबर्दस्त बौछार होने लगी. मैंने दो लोगों को एके-47 लिए हुए देखा. करकरे, काम्टे और सालस्कर सर ने भी फायरिंग शुरू कर दी. मेरे बाएं हाथ और कंधे में गोली लग गई, मेरी कार्बाइन हाथ से गिर गई जिसे मैं उठा नहीं सका.’ 

गोलियों की झड़ी के बीच काम्टे ने जबर्दस्त साहस दिखाया. वो कार से बाहर निकल कर झड़ियों की तरफ फायरिंग करने लगे. काम्टे कसाब को चोट पहुंचाने में सफल रहे. उसके हाथ में गोली लगी. जाधव के बयान के हिसाब से, ‘दोनों ने करकरे साहब, काम्टे साहब और सालस्कर साहब के ऊपर गोलियां चलानी जारी रखीं जिसमें तीनों घायल हो गए. कुछ देर बाद फायरिंग रुक गई. उनमें से लंबा वाला (इस्माइल) हमारी कार के पास आया और पिछला दरवाजा खोलने लगा पर वो खुला नहीं. मैंने मरे होने का नाटक किया. मेरे ठीक बगल वाला आदमी मेरे ऊपर ही गिर गया था. जल्द ही कार फिर से चलने लगी. लंबा वाला लड़का महापालिका रोड पर कार ले जा रहा था. मुझे अहसास हुआ कि करकरे साहब, काम्टे साहब और सालस्कर साहब अपनी सीट पर नहीं थे. उन्होंने विधानसभा के पास कार रोक दी और कार से उतर गए. एक बार फिर से मुझे फायरिंग की आवाज सुनाई दी.’

जाधव इस बात से अनजान था कि करकरे, काम्टे और सालस्कर को कार से नीचे फेंक दिया गया था. सालस्कर अभी जीवित थे उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां 1.05 बजे मृत घोषित कर दिया गया.

चौथा सवाल: क्या सही समय पर सालस्कर को अस्पताल पहुंचा कर उन्हें बचाया जा सकता था? 

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक करकरे, काम्टे और सालस्कर को 12.05 बजे के आस पास गोली लगी थी.

12.19 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू अज्ञात वाकी

टाकी: लोगों का कहना है कि पुलिस की एक गाड़ी अगवा हो गई है.

12.25 रात्रि: कंट्रोल टू अबाल मोबाइल- क्वालिस कार को अगवा किया गया है.

12.40 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू पीटर एलटी मार्ग: स्पेशल ब्रांच-1 लेन में सहायता भेजें. वहां दो-तीन लोग घायल हुए हैं. मेरे ख्याल से काम्टे साहब हैं. तुरंत सहायता भेजें.

12.40 बजे तक कोई भी करकरे, काम्टे और सालस्कर को बचाने के लिए नहीं पहुंचा. एटीएस के मुखिया, पूर्वी क्षेत्र के एसीपी और एक एनकाउंटर विशेषज्ञ 40 मिनट तक सड़क पर ही पड़े रहे. पहले भी सहायता नहीं पहुंची थी और इस बार भी सहायता नहीं पहुंची, कोई एंबुलेंस भी मौके पर नहीं थी. कॉल लॉग रिकॉर्ड के मुताबिक 12.25 बजे के करीब जाधव ने कैलिस से एक वायरलेस संदेश भेजा, ‘रंग भवन लेन से एक क्वालिस को अगवा कर लिया गया है. सालस्कर सर, एटीएस सर और ईस्ट रीजन सर के ऊपर फायर करके. अब आतंकियों ने कार स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, मंत्रालय के पास छोड़ दी है.’

अपने प्राणों की आहुति देने वाले जवानों के परिजन इस बात से बेहद निराश और व्यथित है कि उनके तमाम आपात संदेशों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गई. विनीता काम्टे उन परिस्थितियों के बारे में जानना चाहती हैं जिनमें फंस कर उनके पति की जान गई. वो लोगों के सवाल सुन-सुनकर थक गई थी कि आखिर तीनों सीनियर अधिकारी एक साथ क्यों थे और उन्होंने अपने पति के वरिष्ठ अधिकारियों से इस संबंध में जवाब मांगने का निर्णय किया पर जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि उन्हें सच नहीं बताया जा रहा है.

वो बताती हैं कि वो बड़ी मुश्किल से जेसीपी राकेश मारिया को इस बात के लिए राजी कर पायीं कि वो एक बयान जारी कर ये स्वीकार करें कि उनके पति ने ही कसाब को घायल किया था. विनीता ने तहलका  को बताया, ‘मैंने उनसे कहा कि अगर मेरे पति ने कसाब को घायल नहीं किया है तो कोई बात नहीं है लेकिन अगर उन्होंने ही ये काम किया है तो फिर मैं इसका श्रेय किसी को नहीं लेने दूंगी.’ प्रत्यक्षदर्शियों से उन्हें जानकारी मिली थी कि अशोक काम्टे कार से बाहर निकल कर आए थे और फायर किया था. कसाब ने भी अपने बयान में इस बात की पुष्टि की थी कि एक वर्दीधारी अधिकारी ने कार से बाहर निकल कर फायर किया था. उस रात सिर्फ काम्टे ही थे जिन्होंने वर्दी पहन रखी थी.

वो अपने पति के कॉल रिकॉर्ड भी देखना चाहती थी पर पुलिस आयुक्त हसन गफूर को पत्र लिखे जाने के बाद भी उन्हें कोई जवाब ही नहीं मिला. ‘वो मुझे अलग-अलग कहानियां सुनाते थे. सम्मान का भाव दिखाने की बजाए वो सिर्फ मुझे भटकाते रहे.’ हार कर विनीता ने अपनी वकील बहन रेवती देरे की सहायता से आरटीआई दरख्वास्त दाखिल की. इस पर राकेश मारिया ने घिसा-पिटा रुख दिखाते हुए सूचना अधिकारी को लिख भेजा, ‘धारा 8(एच) (जांच प्रक्रिया में बाधा डालना) के तहत आवेदन को निरस्त कर दिया जाए.’

पांचवां सवाल: आखिर संयुक्त पुलिस आयुक्त परिवारों को भटका क्यों रहे हैं? 

मारिया को ये अधिकार तो है कि वो सूचना देने से मना कर दें पर अपने एक पत्र (जिसकी एक प्रति तहलका  के पास भी है) में तो वो सूचना अधिकारी पर सीधे दबाव डालते हुए नजर आते हैं. हार न मानने को दृढ़ विनीता ने आरटीआई के आदेश के खिलाफ  अपील की. अब उन्हें अपने पति के कॉल रिकॉर्ड की जांच करने की अनुमति मिल गई है. इस बाबत बाद में एक उपायुक्त द्वारा दिया गया आदेश इस मायने में चौंकाने वाला है कि ये कहता है कि मारिया ने सूचना अधिकारी पर दबाव बनाने का प्रयास किया था और विनीता को कॉल रिकॉर्ड की जांच करने का मौका मिलना चाहिए आखिर उनके पति ने देश के लिए अपनी जान दी है.

साफ है कि मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार 26/11 की सच्चाई पर पर्दा डालना चाहती है, ये बात कॉल रिकॉर्ड से भी साफ हो जाती है. इस संबंध में जब मारिया से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि वो लंदन में हैं और मुंबई के पुलिस आयुक्त ने ‘नो कमेंट’ कह कर पल्ला झाड़ लिया.

राज्य सरकार ने दिसंबर 2008 को सरकार और मुंबई पुलिस की भूमिका की जांच के लिए पूर्व गृह सचिव राम प्रधान के नेतृत्व में दो सदस्यीय समिति का गठन किया था. 100 पन्नों की रिपोर्ट में प्रधान ने दोनों को ही क्लीन चिट थमा दी है. उन्होंने मीडिया को बताया, ‘हमले के बाद मुंबई दौरे पर आए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राज्य के नागरिकों से माफी मांगी थी. ये खुद ही साबित करता है कि चूक केंद्र सरकार की ओर से हुई.’ पुलिस की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर प्रधान ने कहा, ‘मुंबई पुलिस को छोड़िए पूरे देश की पुलिस युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं.’ समिति के दूसरे सदस्य वी. बालाचंद्रन के मुताबिक, ‘हमने कंट्रोल रूम में आईं 5,000 कॉलों का विश्लेषण किया, और कंट्रोल रूम स्टाफ द्वारा दिए गए जवाब और उनकी कार्यवाही से हम पूरी तरह संतुष्ट थे.’

रिपोर्ट को अभी विधानसभा में पेश नहीं किया गया है – यहां क्लीन चिट के विरोध में विपक्ष पहले ही वाक-आउट कर चुका है- लेकिन प्रधान और बालाचंद्रन ने पहले ही मीडिया को ये बात स्पष्ट कर दी है कि किसी के सिर ठीकरा नहीं फोड़ा जाएगा.

हालांकि विनीता काम्टे के लिए ये रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं है, वो कहती हैं कि अपने पति के कॉल रिकॉर्ड की जांच के पश्चात वो अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकती हैं. कविता करकरे ने भी प्रधान समिति की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जताई है. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘समिति की रिपोर्ट से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई सहायता नहीं मिलेगी. उस वक्त खुफिया विभाग, तट रक्षक, पुलिस और राज्य सरकार के बीच किसी तरह का समन्वय ही नहीं था. पर समिति इन बातों को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है और मुझे पता है कि वो कभी भी 26/11 को मुंबई में जो कुछ हुआ उसकी कमियों को स्वीकार नहीं करेंगे. अन्यथा मुझे अपने पति को नहीं खोना पड़ता.’ 

चिदंबरमजी, उम्मीद है आप इसे पढ़ रहे होंगे. समिति ने आपकी माफी की आड़ लेकर तमाम सच्चाइयों को दफन कर दिया. आपने आंतरिक सुरक्षा तंत्र में आमूल बदलाव का वादा किया था – ये भी एक वजह है कि हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि आप इसे पढ़ रहे होंगे. क्या हम अगले हमले से निपटने के लिए तैयार हैं वो भी तब जब हम जरूरी सहायता तक समय पर पहुंचाने की स्थिति में नहीं हैं?  

ऐसा कल किसी को न देखना पड़े

फिल्म कल किसने देखा

निर्देशक  विवेक शर्मा

कलाकार जैकी भगनानी, वैशाली देसाई, जूही चावला, ऋषि कपूर

मैं हक्का-बक्का और हैरान हूं. नहीं नहीं, रियलिस्टिक या बुद्धिजीवी सिनेमा की चकाचौंध में बिल्कुल अन्धा होकर मुझे फंतासियों या कोमल प्रेम कहानियों से कोई परहेज नहीं, लेकिन इसके नाम पर बनाई जाने वाली बेवकूफ और छिछोरी फिल्मों से है. क्या यह दिबाकर, अनुराग और इम्तियाज की फिल्मों के गाल पर बेशर्मी से मारा गया तमाचा नहीं है कि बनाओ, तुम्हें जो बनाना है, हम महंगी लोकेशनों पर शूट करके ऐसी ही सस्ती फिल्में बनाएंगे. क्या जैकी भगनानी प्रतिभाहीन निर्माता-पुत्नों की श्रंखला में एक और कड़ी नहीं है जो इरफान और के के सरीखे सक्षम अभिनेताओं को दस दस साल तक इंतजार करने को मजबूर करता है? ऐसा क्यों है कि बॉलीवुड प्रगति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ता है तो अगले ही पल तीन कदम पीछे फिर से नब्बे के दशक की उन कॉलेज वाली प्रेम कहानियों की ओर भागता है, जिनमें प्रेम कहीं नहीं है. स्वीमिंग पूल में नायिका की खुलने को आतुर देह है, उस देह से पहली नजर मिलने के बाद फूट पड़ने वाला तथाकथित प्यार है, अमीर नायिका का घमंड है जो अच्छे स्वभाव वाले नायक की नसों में उसे पाने की लगन भर देता है.

लेकिन जनाब, हक्का-बक्का रह जाने से कुछ नहीं होगा. मन में बनी इन गांठों को खोलने के लिए मैं अपने पास की सीट पर बैठी उन्नीस बीस साल की लड़की की ओर देखता हूं. बेसिर-पैर के गीतों को देखते हुए वो गुनगुना रही है, उसके घुटने थिरक रहे हैं. मोटरसाइकिल रेस का सैंकड़ो बार दोहराया जा चुका एक लम्बा सीक्वेंस देखकर, जिसे सिरे से काट दिया जाना चाहिए था, वह उत्तेजित होकर चिल्लाती है. ओह! तो यह उस ‘यो’ जेनरेशन के लिए है जो तुरत फुरत के प्यार, छोटे कपड़ों, डीजे और भीगी उत्तेजनाओं में पूरी आस्था रखती है. क्या आपने इन फिल्मों के अलावा कहीं और ऐसा देखा है कि अमीर लड़की गरीब (यहां गरीब का अर्थ वे गरीब नहीं, जो उड़ीसा में भूखे मर रहे हैं. गरीब माने दुपट्टा ओढ़ना और हिन्दी के लहजे में हिन्दी बोलना) लड़की का मजाक उड़ाए और उसके चारों और बैठे बीसियों लोग उसका साथ दें, हंसें? समझ नहीं आता कि महाराष्ट्र में ऐसा कौन सा कॉलेज है जिसकी पार्टियों में नाचने के लिए आसानी से पचासों विदेशी लड़कियां मंगवाई जा सकती हैं. बीच में दो चार मिनट के लिए राजपाल यादव और रितेश देशमुख थोड़ा सुकून देते हैं, लेकिन यही वे फिल्में हैं जिनकी कैद से जितना जल्दी हो सके बॉलीवुड को अपनी याददाश्त के रिकॉर्ड से मिटा देना है.

गौरव सोलंकी 

आम कहां से पाएगा

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक महिलायें हैं तो विश्व के आधिकारिक कामगारों का करीब एक-तिहाई हिस्सा पर इस गोल दुनिया के काम का करीब दो तिहाई बोझ उनके सर पर है. इसके एवज में इनकी कुल आमदनी दुनिया की महज दस फीसदी ही है और विश्व की कुल जायदाद का सिर्फ एक फीसदी से भी कम ही इनके नाम है.

कई राजनीतिक दलों के नेता – खासकर पिछड़े समुदाय के – इस बात पर अड़े हैं कि महिलाओं के आरक्षण के भीतर दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए. मगर उनकी ये मांग बेतुकेपन के सिवा और कुछ नहीं 

साफ है कि महिलाओं के साथ हो रहा इतना बड़ा भेदभाव अपने आप या केवल उनकी खुद की कोशिशों से तो आसानी से दूर होने से रहा. इसीलिये देश की विधायिका में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने के प्रयास जारी हैं. मगर 33 फीसदी ही क्यों? शोध कहता है कि यदि किसी संस्था में अल्पसंख्यक समुदाय की 30 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी हो जाती है तो वो संस्था के निर्णयों को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाता है.

मगर महिलाओं के पक्ष में इस सकारात्मक भेदभाव के रास्ते की कई बाधाएं हैं. कई राजनीतिक दलों के नेता – खासकर पिछड़े समुदाय के – इस बात पर अड़े हैं कि महिलाओं के आरक्षण के भीतर दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए. मगर उनकी ये मांग बेतुकेपन के सिवा और कुछ नहीं. जो विधेयक अभी राज्यसभा के सामने है उसमें ये प्रावधान पहले से ही है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए लोक सभा और विधानसभाओं में आरक्षित 22.5 फीसदी सीटों पर भी महिलाओं का ये आरक्षण लागू होगा. रही बात पिछड़े समुदाय की महिलाओं की तो पिछड़ा वर्ग के लिए तो विधायिका में कभी भी आरक्षण का प्रावधान नहीं रहा. इसके बिना यदि लालू, शरद, मुलायम जैसे नेता इतने बड़े नेता बन सकते हैं तो यदि वे चाहें तो महिलाओं के मामले में ऐसा न होने की कोई वजह ही नहीं हो सकती. जहां तक अल्पसंख्यक महिलाओं की बात है तो एक धर्मनिरपेक्ष देश में इस आधार पर आरक्षण देश के संविधान की मूल भावना से कतई मेल नहीं खा सकता.

हाल ही में संसद में सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह का ये बयान कि महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा के नेतृत्व को नष्ट करने की साजिश है, इन नेताओं के असल डर की ओर इशारा करता है. एक तो आरक्षण लागू होने पर कई नेताओं को अपनी सीटें महिलाओं के सुपुर्द करनी पड़ जाएंगी और दूसरा, विधेयक में एक प्रावधान ये भी है कि अलग-अलग समय में महिला आरक्षण अलग-अलग सीटों पर लागू होगा. यानी कि किसी भी बड़े से बड़े नेता की सीट आने वाले समय में महिलाओं के लिए आरक्षित होकर उस नेता की बरसों की मेहनत मटियामेट कर सकती है. मगर ऐसी कई परेशानियां तो तमाम दूसरे आरक्षण लागू होते समय पीड़ित पक्षों ने हमेशा ही गिनाईं हैं. फिर विधेयक में इस आरक्षण का प्रावधान भी तो केवल 15 सालों के लिए ही है. तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि हमारे वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए देश और समाज के बड़े उद्देश्यों को ताक पर रखने से जरा भी नहीं झिझकता ? क्या उन्हें डर है कि जैसा दूसरे आरक्षणों के साथ उन्होंने किया है वैसा ही महिला आरक्षण के साथ होगा और ये हमारी व्यवस्था का एक स्थाई अंग बन जाएगा?

संजय दुबे 

कमजोर पड़ता हथौड़ा और भोथरा होता हंसिया

हालिया चुनावों में वाममोर्चे के दयनीय प्रदर्शन से पश्चिम बंगाल के बाहर ज्यादातर लोगों को हैरानी हुई है. काफी हद तक इतना ही बुरा प्रदर्शन सीपीआई (एम) और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) का केरल में भी रहा पर इससे किसी को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यहां पर वामपंथी  जब-तब सत्ता से बाहर होते रहे हैं. पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा किसी अभेद्य दुर्ग सरीखा था जो यहां के ग्रामीण गरीबों की न हिलने वाली मजबूत नींव पर टिका हुआ था. इनकी मूलभूत दशा बीते सालों के वामपंथी शासन के दौरान बदल चुकी थी और इसी के सहारे 32 सालों तक देश और दुनिया की राजनीति में आए तमाम झंझावातों के बावजूद वाममोर्चा पश्चिम बंगाल में टिका रहा. दुनिया के नक्शे से साम्यवाद का सफाया हो गया, केंद्र में कांग्रेस का प्रभुत्व बीते कल की बात हो गई, हिंदुत्व पर आधारित भाजपा की सरकार दिल्ली में आई और इतिहास बन गई, लेकिन कोलकाता की सत्ता में कोई कंपन तक नहीं हुआ.

क्या वे जरा से मुआवजे और ऐसी नौकरी के एवज में, जिससे उन्हें कभी भी लात मार कर निकाला जा सकता है, अपनी ज़मीन-जायदाद किसी को भी देने के लिए तैयार हो जाएंगे 

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि इस हार ने सभी को हिला दिया है- वामपंथियों के धुर समर्थकों से लेकर उन नए-नवेले प्रशंसकों को भी जो ये मान रहे थे कि बुद्धदेब भट्टाचार्य विकास और आधुनिकता के जिस सरपट राजमार्ग पर राज्य को ले जाना चाहते हैं वो राज्य में दूसरे पुनर्जागरण की शुरुआत करेगा. याद कीजिए नैनो को और उन ढेर सारे वादों को जो उन्होंने राज्य के भविष्य के लिए किए थे. और वो नया केमिकल हब जो राज्य के मेदिनीपुर में बनाया जाना था – एक ऐसे अनजाने से स्थान पर जिसका नाम नंदीग्राम था?

क्योंकि वामपंथियों की स्थिति पश्चिम बंगाल में इतनी मजबूत थी इसलिए आज अफरा-तफरी के आलम में बंगाल के वाम नेता जो सफाई दे रहे हैं वो बिल्कुल खोखली जान पड़ती हैं- उनके मुताबिक वो इसलिए हारे क्योंकि केंद्रीय नेताओं ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और तीसरे मोर्चे की मरीचिका के पीछे भागते रहे. हालांकि मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात के नेतृत्व में खेला जाने वाला ये खेल ये दिखाता है कि वामदलों का केंद्रीय नेतृत्व किस तरह की हवाई दुनिया में रहता है. पर ये लचर तर्क कहीं से भी राज्य में वाममोर्चे की पराजय की वजहों को बयान नहीं करते. सच्चाई ये है कि राज्य नेतृत्व प्रशासन से जुड़ी अपनी खामियों को छिपाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व के ऊपर आरोप मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

वाममोर्चे और विशेष रूप से सीपीएम के खिलाफ जनता की मौजूदा नाराजगी की जड़ में दो मुद्दे हैं. पहला बुद्धदेब भट्टाचार्य के औद्योगीकरण कार्यक्रम के लिए अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि. सवाल ये नहीं है कि राज्य में औद्योगीकरण होना चाहिए या नहीं. सीधा सवाल ये है कि वो जमीन किसकी है और उसे इसके बदले में क्या मिलेगा? लोगों के जबर्दस्त प्रतिरोध को शांत करने के लिए राज्य का वाम-नेतृत्व बार-बार उन्हें इन आश्वासनों से बहलाने के प्रयास करता रहा कि उन्हें नाममात्र के एकमुश्त मुआवजे के साथ ही नौकरियां भी दी जाएंगी. अब यदि यही सवाल उन नेताओं और उनके मध्यवर्गीय समर्थकों से पूछा जाए कि क्या वे जरा से मुआवजे और ऐसी नौकरी के एवज में, जिससे उन्हें कभी भी लात मार कर निकाला जा सकता है, अपनी ज़मीन-जायदाद किसी को भी देने के लिए तैयार हो जाएंगे. अगर वो ऐसा नहीं कर सकते तो फिर किसान इसके लिए क्यों राजी हों? जवाब में कहा गया कि चूंकि औद्योगीकरण एक ‘ऐतिहासिक कदम’ है इसलिए उन्हें ऐसा करना ही चाहिए. किसानों को ये तर्क हजम नहीं हुआ और वो खुलेआम विद्रोह पर उतर आए.

जिस समय पुलिसिया हिंसा की नोक पर सिंगूर में जमीनों की बाड़बंदी की जा रही थी, उस वक्त तक ग्रामीण किसानों और कोलकाता में बैठे नेताओं के बीच का आपसी विश्वास तार-तार हो चुका था

पर क्या हम कभी एक किसान को भी एक उद्योगपति के रूप में नहीं सोच सकते हैं? या फिर क्या उसे उसकी जमीन पर प्रस्तावित उद्योग में कुछ हिस्सेदारी नहीं मिल सकती है? क्या मुनाफे में एक निश्चित हिस्सा उसे नहीं मिल सकता? क्या ऐसा सोचना और करना ‘ऐतिहासिक कदम’ की श्रेणी में नहीं आता?

बीच का कोई रास्ता निकालने की कोशिश में इस तरह के कई प्रस्ताव अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों की तरफ से आए. सिंगूर के मसले पर एकाध बार बुद्धदेब भट्टाचार्य ने इस तरह के वैकल्पिक उपाय की घोषणा की भी. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. जिस समय पुलिसिया हिंसा की नोक पर सिंगूर में जमीनों की बाड़बंदी की जा रही थी, उस वक्त तक ग्रामीण किसानों और कोलकाता में बैठे नेताओं के बीच का आपसी विश्वास तार-तार हो चुका था. इसके बाद अलीमुद्दीन स्ट्रीट के बाबुओं पर उनका विश्वास कभी जम नहीं हो सका.

मुझे याद है एक टीवी पत्रकार ने मुझसे पूछा था कि यदि टाटा राज्य से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर चले जाते हैं तो क्या इससे तृणमूल कांग्रेस को नुकसान नहीं पहुंचेगा? क्या उसकी औद्योगीकरण विरोधी छवि नहीं बन जाएगी? मुझे उनको ये बात समझाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी कि इससे तो विपक्ष और मजबूत ही होगा क्योंकि जिन लोगों को वो इस औद्योगीकरण के समर्थक और ‘बंगाल की आवाज’ के रूप में टीवी पर दिखा रहे हैं वो गिने चुने भूमंडलीकरण से प्रभावित मध्यवर्ग के लोग भर हैं. हालांकि राज्य में विकास और औद्योगीकरण इन दिनों सीपीएम की बातचीत का मुख्य मुद्दा बन चुका है जिसने सत्तारूढ़ दलों का एक नया सामाजिक आधार तैयार कर लिया है. लेकिन इस कोशिश में वे अपने पारंपरिक आधार से उखड़ रहे हैं.

ये तो कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. सिंगूर और नंदीग्राम में जो कुछ हुआ वो सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं थी. उन्होंने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हर दिन चोरी-छिपे चलने वाले वामपंथी आतंक के समूचे नेटवर्क को ही ध्वस्त कर दिया. पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे का किला एक अभेद्य चुनावी मशीनरी के आधार पर टिका हुआ था जिसकी पहुंच ग्रामीण समाज चप्पे-चप्पे तक थी. इतने सालों के दौरान ये चुनावी मशीनरी दुनिया का सबसे अनोखा और प्रभावी निगरानी तंत्र बन गया था. देश के किसी भी हिस्से में कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसा दावा नहीं कर सकती जैसा कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम करती थी – इसके पास एक-एक ग्रामीण का लेखा-जोखा, उसका राजनीतिक झुकाव, उनके मतदान के रुझान जैसी बारीकियों तक का आंकड़ा मौजूद है.

इस सूचना को 80 के दशक में जब पंचायतों का पुनरोदय हुआ तो पार्टी की चुनावी मशीनरी को उपलब्ध कराया गया. पार्टी की चुनावी मशीनरी और पंचायतों – जिसमें पार्टी के ही कैडर भरे हुए थे- के संगम ने एक नए तंत्र का सृजन किया जिसमें हर कोई हर किसी के ऊपर नजर रखता था. ऐसे में पार्टी की जानकारी और सहमति के बिना कुछ भी कर सकना संभव नहीं था. यहां तक की पार्टी ग्रामीणों के छोटे-मोटे झगड़ों में पंच की भूमिका भी निभाने लगी. एक नए किस्म की सत्ता का उदय हो गया था. सिंगूर और नंदीग्राम ने इस पूरे जाल को ही ध्वस्त कर दिया. भय की दीवार ढह गई. विरोध की ज्वाला राशन की दुकानों से लेकर उत्तर बंगाल के चाय बगानों तक फैल गई. सालों से दबी रही कुंठा फूट पड़ी.

इन सबके बीच ही कहीं पर राज्य के मुसलमानों की कहानी भी है. नंदीग्राम में सताए गए ज्यादातर लोग मुसलमान और दलित थे. सार कमेटी की रिपोर्ट में पहले ही ये बात साफ हो चुकी थी कि धर्मनिरपेक्षता के थोथे भाषणों के बावजूद राज्य में मुसलमानों की दशा पूरे देश में सबसे खराब है. और भला ये बात कोई कैसे भूल सकता है कि एनडीए सरकार के कार्यकाल में बुद्धदेब भट्टाचार्य के मदरसों के खिलाफ चलाए गए अभियान ने भी उनके मन में गुस्सा पैदा किया था. एक गहरा क्षोभ पहले से ही लोगों के मन में घर कर चुका था. पुरी प्रक्रिया को कुछ घटनाओं ने तूल भर देने का काम किया जिसमें नंदीग्राम भी शामिल है. इन परिस्थितियों में राज्य के नेताओं के बयानों से बेइमानी की झलक मिलती है. 

इस बीच कोलकाता से ताजा खबर ये मिली है कि राज्य के नेता जिला समितियों के बीच एक प्रश्नपत्र बंटवाने पर विचार कर रहे हैं जिन्हें कार्यकर्ताओं के साथ गहन विचार विमर्श के बाद ही भरा जाएगा. कदम तो स्वागतयोग्य है पर उसके लिए अब शायद काफी देर हो चुकी है ’  

पीएम के अभियान को ले डूबा अभिमान

मायावती को यकीन था कि वे इतिहास बनाने जा रही हैं. अपनी तरक्की की रफ्तार को देखते हुए वे मानकर चल रही थीं कि वे दिल्ली की गद्दी हासिल कर सकती हैं, पहली दलित प्रधानमंत्री बनकर इतिहास बना सकती हैं. मगर इतिहास को बदलने की जंग में गोलाबारूद के तौर पर यदि घमंड और अशिष्टता जैसी विशेषताओं का इस्तेमाल किया जाए तो इसका असर उल्टा ही होता है.

ऐसा नहीं है कि दलितों का मायावती से मोहभंग हो चुका है. मगर ये नतीजे दिखाते हैं कि उनका धैर्य अब जवाब देने की कगार पर है

2007 में हुए विधानसभा चुनावों में मिली भारी जीत के बाद मायावती को लगने लगा था कि उत्तर प्रदेश तो अब उनका ही है. उन्हें विश्वास था कि प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को पूरा करने में समूचा सूबा खुद को उनके चरणों में अर्पित कर देगा. चुनाव नतीजे आने से कुछ दिन पहले उनके एक करीबी ने लखनऊ के एक पत्रकार को बताया भी था कि बहनजी को राज्य में 45 से 50 लोकसभा सीटें जीतने की पूरी उम्मीद है. मगर उन्हें मिलीं सिर्फ 20. उम्मीद और हकीकत यानी 50 और 20 के बीच काफी फासला देखने को मिला.

ऐसा नहीं है कि दलितों का मायावती से मोहभंग हो चुका है. मगर ये नतीजे दिखाते हैं कि उनका धैर्य अब जवाब देने की कगार पर हैनतीजे आने के पहले 24 घंटों के भीतर मायावती ने किसी से भी मिलने से इनकार कर दिया. अगले दिन उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और ऐलान किया कि उनकी हार की वजह कांग्रेस, सपा और भाजपा में बनी गुपचुप सहमति है जो दलित की बेटी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते. जब पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछने की कोशिश की तो वे अचानकर उठ कर वहां से चल दीं. दिलचस्प है कि जिन पर वे अपने खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा रही थीं उन्हीं को इसके बाद उन्होंने बिना शर्त समर्थन की चिट्ठी भेज दी.

इतिहास वे लोग बनाते हैं जिनमें अपना और दुनिया का सही आकलन करने की क्षमता होती है. आत्ममुग्धता और गलतफहमी हमेशा घातक होती है. अपनी प्रेस कांफ्रेंस के बाद से मायावती ने 150 पार्टी पदाधिकारियों और सरकारी अफसरों से इस्तीफे लिखवा लिए. इनमें मंत्री, नौकरशाह, चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और कई सरकारी निकायों के निदेशक शामिल हैं. मीडिया ने इस शुद्धिकरण अभियान पर काफी कुछ लिखा है. मगर किसी ने भी इसके औचित्य पर सवाल खड़े नहीं किए. इनमें से ज्यादातर अधिकारी सरकार के सेवक थे बसपा के नहीं. उन्हें मंत्रियों की तरह ही लाल बत्तियों वाली गाड़ियां और दूसरी सुविधाएं दी गईं थीं. इसके अलावा इन्हें सरकारी खजाने से 25,000 रुपए महीने भी दिये जाते थे. उन्हें राज्य के लिए काम करना था बसपा के लिए नहीं. लगता है कि मायावती, राज्य और खुद में अब कोई फर्क नहीं समझतीं.

हालांकि पिछले कुछ दिनों में उन्होंने कुछ ऐसे काम भी किए हैं जो शुभ संकेत देते हैं. अब वे फिर से बुनियादी चीजों पर काम कर रही हैं. उन्होंने जिलाधिकारियों और पुलिस अफसरों से हर महीने काम की रिपोर्ट देने को कहा है. उन्होंने ऐलान किया है कि वे औचक निरीक्षण कर सरकारी योजनाओं का जायजा ले सकती हैं. उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे महीने में कम से कम एक बार किसी दलित बस्ती का दौरा करें.

2009 के इस चुनाव में एक बात हर जगह समान रही है. लोगों ने हर जगह घमंड को नीचा दिखायादुर्भाग्य से प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने का ये नया जोश पूरी तरह से भेदभाव से भरा लगता है. मायावती इससे तिलमिलाई हुई हैं कि ब्राह्मणों, मुसलमानों और पिछड़े वर्गों ने उन्हें वोट नहीं दिया. इसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने अपनी चर्चित भाईचारा समितियां भंग कर दी हैं जिन्हें दलितों, पिछड़े वर्गों और अगड़ी जातियों को जोड़ने के लिए बनाया गया था. फिलहाल लग रहा है कि मायावती ने सर्वजन समाज का अपना विचार ठंडे बस्ते में डाल दिया है जबकि सच ये है कि नुकसान उन्हें अपनी सोशल इंजीनियरिंग से नहीं बल्कि लचर प्रशासन के चलते हुआ है.

फिर भी जो कदम वे उठा रही हैं वे उनके लिए अच्छे ही साबित होंगे. दरअसल मायावती की उम्मीदों और हकीकत के बीच जो फर्क है उसका सच यह है कि अपनी अपरिपक्व महत्वाकांक्षा के चक्कर में वे भूल गईं कि उनकी असल ताकत किस चीज से बनती है. मायावती इतनी कद्दावर नेता इसलिए बन पाईं कि हजारों साल से शोषित होते रहे लोगों ने उन्हें अपने सशक्तिकरण के प्रतीक के तौर पर देखा, उनकी सफलता को अपनी सफलता माना. ये लोग ही उनकी शक्ति का स्रोत हैं. अगर मायावती को इतिहास बनाना है तो उन्हें इन लोगों की उम्मीदों को पूरा करना होगा. अपनी मूर्तियां लगवाने और अकूत दौलत जमा करने की बजाय उन्हें अपने पूरे समुदाय को अन्याय और गरीबी के फंदे से बाहर निकालना होगा.

ये सही है कि शुरुआत में दलित मायावती की निजी अति देखकर खुश हुए. मायावती ने जितने ज्यादा हीरे पहने, जितने ज्यादा हेलीकॉप्टर खरीदे, जितने ज्यादा ब्लैक कैट कमांडो अपने चारों तरफ लगवाए, दलितों को उतना ही ज्यादा अपनी जीत का अहसास हुआ. दलितों ने अपनी कल्पनाओं को उनमें साकार होते देखा. मगर ये सब आखिर कितने दिन चल सकता था. बहनजी की ताकत पर खुश होने वाले वंचित अपनी जिंदगी बदलने का इंतजार भी कर रहे थे.

शायद वे भूल गईं थी कि समाजवादी पार्टी के राज में जंगलराज को ही मुद्दा बनाकर वे बहुमत से सत्ता में आईं थीं. आपराधिक पृष्ठभूमि के जितने भी उम्मीदवारों को उन्होंने टिकट दिया था वे सब के सब हार गएचुनाव नतीजों से एक हफ्ते पहले तहलका ने उत्तर प्रदेश की यात्रा की. यहां हर वर्ग के लोग असंतुष्ट और नाराज लग रहे थे. मैं जिस कार में घूम रही थी उसके ड्राइवर का कहना था, ‘बहनजी तो अपनी याद में मूर्तियां बनाने में व्यस्त हैं जबकि हमारे पास खाने को तक नहीं है.’ गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के कुल आवासीय बजट का 62 फीसदी हिस्सा लखनऊ के चार वर्ग किलोमीटर के इलाके में खर्च कर दिया गया है. लोगों के घरों में काम करने वाली एक महिला के शब्द थे, ‘बहनजी तो महल में रहती हैं मगर क्या आप मेरी झोपड़ी के बाहर मौजूद नाले की गंध बर्दाश्त कर सकती हैं?’ एक दूसरे सफाईकर्मी का कहना था, ‘मेरे बेटे ने नगर निगम की नौकरी के लिए आवेदन किया था. उन्होंने एक लाख रुपए की रिश्वत मांगी. आप कैसे कह सकती हैं कि ये सरकार दलितों के भले के लिए बनी है?’

ऐसा नहीं है कि दलितों का मायावती से मोहभंग हो चुका है. मगर ये नतीजे दिखाते हैं कि उनका धैर्य अब जवाब देने की कगार पर है. बसपा की झोली में अबकी बार 20 लोकसभा सीटे हैं. यानी पिछली बार से एक ज्यादा. इसके अलावा पार्टी 48 जगहों पर दूसरे स्थान पर रही है. मगर जो सीटें इसका गढ़ हुआ करती थीं उनमें से कुछ इसने खो दी हैं. उन्नाव और बाराबंकी सीट इससे कांग्रेस ने छीनी है तो मोहनलालगंज सपा ने. हाल ही में हुए एक उपचुनाव में इसने भदोही की सीट भी खो दी थी जो आरक्षित थी. मायावती हवा का रूख नहीं भांप सकीं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीते दौर के राजाओं की तरह मायावती भी उस समाज से पूरी तरह कट गई हैं जिससे वे आई हैं.

विधानसभा चुनावों में भारी जीत हासिल करने के बाद उत्तर प्रदेश की हालत सुधारने की बजाय मायावती ने तुरंत ही दिल्ली की गद्दी का अभियान छेड़ दिया. बेहतर होता कि वे राज्य में अपनी स्थिति और मजबूत करतीं मगर इसकी बजाय उन्होंने राज्य की कमान अपने ब्राह्मण प्रभुत्व वाले सलाहकार गुट को सौंप दी और खुद आगे की राह पर निकल पड़ीं. पार्टी शुभचिंतक जानते थे कि ऐसा करके वे अपने अभिमान का सबूत दे रही हैं. मगर बहनजी तक कोई कैसे पहुंचता? वे तो अपने ही पार्टी सदस्यों और मंत्रियों से पूरी तरह कटी हुई थीं. इसके अलावा उन्होंने खुद को मीडिया से भी दूर कर लिया था. एक चुनाव रैली में बोलते हुए उन्होंने कहा था, ‘मीडिया आपको बताएगा कि मैं पार्क और मूर्तियां बनाने पर बहुत सारा पैसा खर्च कर रही हूं, उस पर विश्वास मत करिएगा. मीडिया आपको बताएगा कि मैं दलितों को छोड़कर ब्राह्मणों को प्राथमिकता दे रही हूं. उस पर विश्वास मत कीजिएगा. वे आपको बताएंगे कि मेरी सरकार आपके भले के लिए कुछ नहीं कर रही. उस पर विश्वास मत करिएगा..’

खुद को धोखे में रखना मायावती को ले डूबा. नहीं तो उन्हें अहसास हो जाता कि अपराधियों को टिकट देना अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा. शायद वे भूल गईं थी कि समाजवादी पार्टी के राज में जंगलराज को ही मुद्दा बनाकर वे बहुमत से सत्ता में आईं थीं. आपराधिक पृष्ठभूमि के जितने भी उम्मीदवारों को उन्होंने टिकट दिया था वे सब के सब हार गए.

कुछ ऐसा ही गुमान लालू प्रसाद यादव को भी हो गया था. जमीन की राजनीति कर आगे बढ़े लालू भी पिछड़ों की ताकत के प्रतीक बन गए थे जिसके बूते उन्होंने 15 साल तक बिहार में राज किया. मगर फिर जनता ने देखा कि उसका यह प्रतीक निजी स्वार्थ का गुलाम होकर रह गया है तो उसने इसे उखाड़ फेंका. अगर मायावती ने सबक नहीं सीखा तो उनके साथ ऐसा लालू की अपेक्षा कहीं जल्दी हो सकता है.

2009 के इस चुनाव में एक बात हर जगह समान रही है. लोगों ने हर जगह घमंड को नीचा दिखाया. बुद्धिमत्ता और दृष्टि सिर्फ कुलीन वर्ग की जायदाद नहीं है. ये उन लोगों में भी होती है जो जिंदगी की दुश्वारियां झेलते हैं. बुंदेलखंड का किसान जानना चाहता है कि 45 डिग्री की झुलसाती गर्मी में उसके पास पीने का पानी क्यों नहीं है. पूर्वांचल का किसान पूछ रहा है कि क्यों उसकी फसल को हर साल बाढ़ खा रही है और उसके बच्चे कालाजार से मर रहे हैं. आजमगढ़ के बुजुर्ग जानना चाहते हैं कि उनके बच्चे जेलों में क्यों हैं. और नौजवान जानना चाहते हैं कि आगे बढ़ते वक्त के साथ वे पीछे क्यों छूटे जा रहे हैं.

मायावती की कहानी आज के भारत की सबसे अहम और असाधारण कहानियों में से एक है. एक सरकारी क्लर्क की बेटी से इतनी बड़ी नेता बनने तक की उनकी यात्रा संघर्ष और साहस से भरी रही है. इस यात्रा का पहला अध्याय खत्म हो चुका है. 2009 मध्यांतर है. अब उन्हें कल्पना की ऊंचाई से उतरकर जमीनी हकीकत को देखने की जरूरत है. अगर वे ऐसा करती हैं तो वास्तव में इतिहास बना सकती हैं. दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है. ये बात भला कांग्रेस से बेहतर कौन जानता होगा.’

जलती रस्सी, जाता बल

2009 का आम चुनाव सही मायनों में आम रहा. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि पूरे देश में कोई खास लहर देखने को नहीं मिली. अलग-अलग जगहों पर उम्मीदवारों और पार्टियों की हार-जीत तय करने वाले अलग-अलग कारक रहे. विविधता इतनी थी कि एक ही राज्य में दो जगहों पर दो बिल्कुल अलग समीकरण काम करते दिखे.

जब भाजपा और वाम दलों ने मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए उन्हें मजाक का पात्र बनाया तो जनता को अच्छा नहीं लगा. नतीजतन सिंह उन्हीं गुणों के लिए जनता के हीरो बन गए जिनके लिए उनकी हंसी उड़ाई जा रही थी 

हालांकि इस विविधता में भी कुछ समानता देखी जा सकती हैं. सबसे पहली बात तो ये कि लोग राजनीति के चढ़ते पारे को कुछ शांत कर देना चाहते थे. पिछले 15 सालों से देश में गरमा-गरमी की राजनीति का बोलबाला रहा है. मुझे लगता है कि लोग इससे थोड़ा ऊब चुके थे. मसलन पिछले दो आम चुनावों ने दिखाया कि उत्तर प्रदेश में मतदाताओं का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही रामजन्मभूमि में दिलचस्पी रखता है. भाजपा ने भी इस मुद्दे को शायद इसीलिए इस चुनाव में ज्यादा तवज्जो नहीं दी क्योंकि उसके आंतरिक विश्लेषण में भी यही बात निकलकर आ रही थी. प. बंगाल को छोड़ दें तो अब की बार चुनाव में कहीं भी उस तरह का भावनात्मक ज्वार देखने को नहीं मिला जो अक्सर आम चुनावों में देखा जाता है.

ऐसा बेवजह नहीं हुआ. दरअसल हमारे समाज की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि यहां विविधता अपने चरम स्वरूप में मौजूद हैं. खानपान, सोच, जीवनशैली.सबमें इतने अंतर हैं कि गिने ही नहीं जा सकते. ये अंतर किसी के द्वारा थोपे हुए नहीं बल्कि स्वाभाविक हैं और इसलिए इनसे जिस तरह की विविधता का निर्माण होता है उस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता. नियंत्रित विविधता का आदर्श उदाहरण अमेरिका है. वहां आपको हर तरह का खाना, कपड़ा और सांस्कृतिक गतिविधियां तो देखने को मिलेंगीं. मगर हमारे उलट ये चीजें वहां पर उपलब्ध करवाई गई हैं.

विविधता का हमारे यहां जैसा चरम स्वरूप तब बनता है जब आप उन लोगों के साथ भी सहिष्णुता के साथ रहते हैं जो आपके जीवन के कुछ बेहद बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती देते हैं. दक्षिण एशिया के ज्यादातर लोगों की तरह भारतीयों में भी इस प्रकार की विविधता के साथ जीने की योग्यता है. इसका सबसे शक्तिशाली उदाहरण है इस साल कश्मीर में सज्जाद लोन का चुनाव लड़ना. किसी ने भी इस बात पर एतराज नहीं जताया कि एक अलगाववादी भारत के संविधान के तहत शपथ लेना चाहता है. उल्टे हर किसी ने उत्साह के साथ इसका जिक्र किया. मैं इसे चरम भिन्नता के प्रति सहिष्णुता के उदाहरण के तौर पर देखता हूं. ऐसे समाज में किसी भी तरह की अति का आखिर में खुद ही अंत हो जाता है.

भारत एक ऐसा देश है जहां देवों में भी कुछ दोष हैं और असुरों में भी कुछ अच्छाइयां. मैं इस संस्कृति को महाकाव्य संस्कृति कहता हूं. कोई भी  महाकाव्य देवों और असुरों के बिना पूरा नहीं होता और दोनों के होने से ही कहानी पूरी होती है. ये हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा है और मुझे लगता है कि इसका आखिरकार हमारी जिंदगी पर भी प्रभाव पड़ा है. लोग एक दिशा में एक बिंदु तक जाते हैं और फिर ठहरकर सोचने लग जाते हैं. उन्हें लगता है कि आगे जाना खतरनाक है क्योंकि इससे उनकी जिंदगी का बुनियादी समीकरण बिगड़ सकता है. वे कहते हैं, बस अब बहुत हो चुका, अब सामान्य जीवन की तरफ लौटा जाए. ये चुनाव इसी सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है. शायद हमें राजनीति में इस तरह के विराम की जरूरत भी थी.

ये अच्छा हुआ कि भाजपा केंद्र की सत्ता में आई. इससे न सिर्फ कांग्रेस ने खुद को सुधारा बल्कि भाजपा को भी अहसास हो गया कि अगर अपने फॉर्मूले सही रखे तो वह भी केंद्र में सत्तासीन हो सकती है

चुनाव परिणामों का दूसरा निष्कर्ष ये निकलता है कि लोग गरिमा और शिष्टाचार की उम्मीद कर रहे थे और शायद नकारात्मक प्रचार अभियान, व्यक्तिगत हमलों की अति और द्वेषपूर्ण नारों ने उन्हें नाराज कर दिया. जब भाजपा और वाम दलों ने मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए उन्हें मजाक का पात्र बनाया तो जनता को अच्छा नहीं लगा. नतीजतन सिंह उन्हीं गुणों के लिए जनता के हीरो बन गए जिनके लिए उनकी हंसी उड़ाई जा रही थी. उनकी कमजोरी, गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि, कांग्रेस हाईकमान के दबाव में काम करने की प्रवृत्ति जैसी चीजें अचानक एक तरह की शिष्ट राजनीति का प्रतीक बन गईं. शोर मचाते अपने विरोधियों के उलट सोनिया और राहुल गांधी के अपेक्षाकृति शालीन आचरण ने भी कांग्रेस को फायदा पहुंचाया.

यहां पर मैं एक छोटी लेकिन अहम घटना का जिक्र करना चाहूंगा. दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मैंने एक बैरे से चुनाव परिणामों पर उसकी राय पूछी. उसका कहना था, ‘ये बहुत अच्छा रहा.’ मैंने पूछा कि क्या वह कांग्रेस का वोटर है? उसने जवाब दिया, ‘ऐसी बात नहीं है साहब.          सरदारजी अच्छे आदमी हैं. वे पढ़े-लिखे हैं, वे कोई चोर नहीं हैं और राजनीति में नए हैं. फिर भी वे(विरोधी) उनके पीछे हाथ धोकर पड़े थे और उन्हें कमजोर और डरपोक कह रहे थे. ये देखकर किसे अच्छा लगेगा? मुझे खुशी है, चुनाव नतीजों ने दिखा दिया है कि ऊपरवाला सब देखता है.’ ये उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि ‘ऊपरवाला सब देखता है’ ये विचार कई दूसरे लोगों का भी रहा है.

इस चुनाव का तीसरा निष्कर्ष ये है कि मतदाता घमंड को नीचा दिखाना चाहते थे. जिस तरीके से मायावती दिल्ली फतह करने निकली थीं मगर उत्तर प्रदेश भी नहीं बचा पाईं उससे ये अहम संकेत मिलता है कि उनकी मनमानी और तड़कभड़क लोगों को पसंद नहीं आई. अपनी मूर्तियां लगवाकर अमर होने की लालसा पाले मायावती को शायद भ्रम हो गया था कि अब अगर वे कुछ भी नहीं करें तो भी इतिहास उनका इंतजार कर रहा है. नरेंद्र मोदी और प्रकाश करात का घमंड भी लोगों को नहीं भाया. ये घमंड हर तरह का था. अपनी खास शैली का घमंड, अपरिवर्तनीय होने की गलतफहमी का घमंड, महत्वकांक्षा का घमंड और लोगों की उपेक्षा करने का घमंड. इन सबको मतदाताओं ने पाठ पढ़ा दिया.

नरेंद्र मोदी ने भाजपा, संघ, बजंरग दल और विश्व हिंदू परिषद के भीतर से अपने खिलाफ होने वाले हर संभावित विरोध को किनारे कर दिया है. इनमें से अब कोई भी आसानी से तो मोदी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता. मोदी की नजर सत्ता पर है, पश्चिमी गुजरात और मध्यवर्गीय गुजरातियों में उनका तगड़ा आधार है इसलिए उन्हें कोई हिला नहीं सकता. मगर इस चुनाव ने अखिल भारतीय स्तर के नेता होने की उनकी क्षमताओं पर की सवाल खड़े कर दिए हैं. उन्हें भाजपा के लिए एक स्टार कैंपेनर कहा जा रहा था मगर भारत के मतदाता ने उन्हें नकार कर एक मजबूत संदेश दिया है. भारत में देखा गया है कि विवादास्पद नेता मुश्किल से ही देश के शीर्ष पदों तक पहुंचते हैं. 

मोदी समुदायों की बात न करने के लिए कृतसंकल्प हैं. वे इस बात के लिए भी कृतसंकल्प हैं कि गुजरात में 2002 में जो हुआ उसके लिए माफी नहीं मांगेंगे या मुस्लिम समुदाय के जख्मों पर मरहम नहीं लगाएंगे. वे बस इतना कहकर पीछा छुड़ा लेते हैं कि वे साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों के नेता हैं. ऐसा कहने का आशय ये है कि आप इससे खुद ही मान लीजिए कि वे मुसलमानों के भी नेता हैं. चुनाव नतीजों के बाद मोदी को भी अहसास हो गया होगा कि उन्हें विनम्रता के कुछ सबक सीखने की जरूरत है और ये भी कि भारत में राजनीति करने की भाषा किस प्रकार की होनी चाहिए. भारतीय राजनीति ने इंदिरा गांधी से लेकर मायावती तक कइयों को विनम्रता के सबक सिखाए हैं और अगर मोदी ने ये अभी भी नहीं सीखा है तो वह उन्हें आगे ये सिखा देगी. भले ही ये बात कितनी भी बुरी लगे मगर दुर्भाग्य से प्रकाश करात और नरेंद्र मोदी में एक बड़ी समानता है. ये दोनों ही ऐसे शख्स हैं जो ये समझ ही नहीं सकते कि दूसरे की सोच में भी कोई अच्छाई हो सकती है. ये दोनों ही विचारधारा में बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर सकते. मोदी और मायावती की तरह ही इस चुनाव ने प्रकाश करात के घमंड को भी कम कर दिया है.

आप ऐसा नहीं कर सकते कि किसी फाइव स्टार होटल में एक वक्त के खाने में 12000 रुपए उड़ा दें और कूड़ा बीनते किसी बच्चों को 10 रुपये देकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लें मगर वाम को लगा झटका एक गहरे रोग की तरफ भी इशारा करता है. बंगाल में पार्टी लंबे समय से सत्ता में रही है. हमारे समाज में जब कोई पार्टी तरक्की पर होती है तो असामाजिक तत्व उसकी तरफ खिंचे आते हैं. उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लीजिए. यहां के माफिया तत्व पहले कांग्रेस के साथ जुड़े, फिर भाजपा के साथ, इसके बाद सपा के और फिर बसपा के साथ. बंगाल में वाम दलों के राज को 32 साल हो चुके हैं और सारे असामाजिक तत्व माकपा में गहरे तक जड़ें जमा चुके हैं. इनके चलते पार्टी की ताकत असाधारण थी. गांव दर गांव दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को प्रचार अभियान से रोका गया. हालांकि घमंड और नियंत्रण का ये फंदा अभी पूरी तरह से खुला तो नहीं है मगर ढीला जरूर पड़ने लगा है. विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो प्रकाश करात ने बंगाल का काफी भला किया है. तीन दशक के निर्बाध शासन ने व्यवस्था को पूरी तरह से सड़ा दिया है. भले ही विपक्ष कितना ही बुरा क्यों न हो, मगर ये अंकुश रखने का काम तो करता ही है और अगर आप एक बार भी सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो ये आपको दुबारा धरातल पर लाकर बिठा देता है.

उदाहरण के लिए मैं मानता हूं कि ये अच्छा हुआ कि भाजपा केंद्र की सत्ता में आई. इससे न सिर्फ कांग्रेस ने खुद को सुधारा बल्कि भाजपा को भी अहसास हो गया कि अगर अपने फॉर्मूले सही रखे तो वह भी केंद्र में सत्तासीन हो सकती है. विहिप, बजरंग दल और शिवसेना जैसी उन्मादी शक्तियों को काबू में रखने के लिए भी यह बहुत अहम है. जब आपके पास वध शक्ति होती है तो आपको सड़कों पर तोड़फोड़ कर अपनी ताकत दिखाने की जरूरत नहीं होती. आप उन पर लगाम लगाए रखते हैं क्योंकि आपकी ताकत जगजाहिर होती है और साथ ही आपको सम्मान भी खूब मिलता है.

मगर सिर्फ अपराध और घमंड ही बंगाल और केरल में वामदलों की हार के कारण नहीं रहे. संकट ये है कि उनकी तरह का लेनिनवाद क्यूबा, बंगाल, केरल और चंदन मित्रा के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय गणराज्य’ को छोड़कर अब दुनिया में कहीं भी बचा नहीं है. मुझे तो हैरत होती है कि ये विचारधारा भारत में इतने सारे लोगों को आखिर इतना सम्मोहित कैसे कर सकी. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि सर्वहाराओं के विकास की इस तथाकथित अवधारणा के सबसे बड़े रक्षक मध्यवर्ग से आए कार्यकर्ता हैं. यही वजह है कि भारत में बाकी जगहों के सामाजिक ताने-बाने में जो क्रांतिकारी बदलाव आए हैं उन्होंने प. बंगाल में 32 वर्ष तक वामपंथी शासन रहने के बावजूद यहां के समाज को छुआ तक नहीं है. वहां अभी भी हर चीज पर ऊंची जातियों का प्रभुत्व रहता है और कुछ मायनों में तो ये जांत-पांत को लेकर सबसे ज्यादा जड़ समाज है.

उदाहरण के लिए भारत में प. बंगाल अकेला राज्य होगा जहां आप किसी दलित के मुख्यमंत्री बनने की कल्पना भी नहीं कर सकते. इसके उलट दक्षिण भारत के समाज में काफी खुलापन आया है और इसमें काफी नई ऊर्जा का संचार हुआ है. यहां ए आर रहमान या उनके गुरू इलयराजा समाज की सबसे निचली परत से ऊपर उठी महान प्रतिभाएं हैं. गैरब्राह्मण जातियों में इस तरह की ऊर्जा के प्रवाह का कोई ऐसा उदाहरण बंगाल में देखने को नहीं मिलता.

उम्मीद कम ही है कि इस हार से बंगाल में व्याप्त मार्क्सवाद में कोई ताजा सोच पैदा होगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उपनिवेशवादी संस्कृति का आखिरी अवशेष है. यही वजह है कि हमारे मार्क्सवाद अपनी किताबों के अलावा कुछ और नहीं सोच पाते. इसीलिए उन्होंने लैटिन अमेरिकी या यूरोपीय मार्क्सवाद से कुछ ग्रहण नहीं किया. यही वजह है कि यहां भीतर से कोई नई सोच निकलकर नहीं आई. इस तरह के बौद्धिक जगत में नई सोच सिर्फ दो ही तरीकों से आती है, मौत से या फिर रिटायरमेंट से.

कांग्रेस की तरफ वोटरों का दोबारा रुख करना इस बात का संकेत है कि सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल भी आकार और महत्वकांक्षाओं के लिहाज से इतने बड़े हो गए हैं कि परंपरागत वोट बैंक के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अब पहले जैसी नहीं रहीइस चुनाव का एक और अहम संकेत ये है कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों का समर्थन बढ़ा है. इसे एक अहम सुधार की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है. छोटे दल अब जरूरत से कहीं ज्यादा हो गए हैं और चुनावी ताकत के बिखराव ने फायदा देना बंद कर दिया है. इससे मतदाताओं को महसूस हो गया है कि बेहतर यही है कि केंद्र में बड़ी पार्टियों को आने दिया जाए.

दिलचस्प बात ये है कि भले ही मंडलवाद की राजनीति का जोर कम हुआ हो मगर ये नहीं कहा जा सकता कि मंडल के बाद राजनीति का जो दौर शुरू हुआ था उसका अंत हो गया है. कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में से कई -मसलन उत्तर प्रदेश में दलित और मुसलमान – छोटे दलों के पाले में चले गए थे. दलित बसपा के, मुसलमान मुलायम के और बिहार में दोनों लालू के साथ गए. इन पार्टियों में मुख्य आकर्षण ये था कि छोटी होने के कारण ये अपने वोट बैंक की मांगों के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील थीं जबकि कांग्रेस जैसी किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी में दूसरे गुटों की मांगें आपकी मांगों से टकराकर उन्हें निष्क्रिय कर देती थीं. कांग्रेस की तरफ वोटरों का दोबारा रुख करना इस बात का संकेत है कि सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल भी आकार और महत्वकांक्षाओं के लिहाज से इतने बड़े हो गए हैं कि परंपरागत वोट बैंक के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अब पहले जैसी नहीं रही. नतीजतन कांग्रेस को अब ऐसी नई और छोटी पार्टी के तौर पर देखा जा रहा है जो नया आधार बनाने की कोशिश कर रही है. लोगों को लगता है कि ये उनकी जरूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील साबित हो सकती है.

मंडलवाद का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है ऐसा कहने की और भी वजहें हैं. भारत में शहरों में रहने वाले अमीर वर्ग के भी एक छोटे से हिस्से को छोड़ दें तो यहां व्यक्ति से ज्यादा आज भी उसकी जाति मायने रखती है. पार्टी भी उम्मीदवारों का चयन करते हुए उसकी जाति पर सबसे ज्यादा गौर करती है. बाकी सारी खासियतें उसके बाद कहीं जाकर आती हैं. दरअसल देखा जाए तो मंडलवाद की राजनीति के दौर को अभी इसलिए भी खत्म हुआ नहीं कहा जा सकता क्योंकि सिर्फ बातों की खाने वाले नेताओं का जोर अभी भी कायम है.

हालांकि कुछ पार्टियों ने अब जाति पर पहले से कम जोर देना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके मतदाता वर्ग मुख्यधारा में आ गए हैं. मराठा, पटेल, वोक्कलिगा, लिंगायत, जाट जैसे समुदाय इसका उदाहरण हैं. यादव भी अब लगभग मुख्यधारा में आ चुके हैं और इसलिए वे भी अब इस पर कम ध्यान देते हैं. नीतिश कुमार के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद कुर्मी भी ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे.

मगर अब भी सैकड़ों समुदाय ऐसे हैं जिनके पास पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है. बड़े समुदाय खुद को संगठित करके फायदे की फसल काट चुके हैं. अब छोटे समुदायों की बारी है. जैसे 70 और 80 के दशक में एनटीआर के जरिए कम्मा समुदाय मुख्यधारा में आया था वैसे ही इस चुनाव में चिरंजीवी के आने से कापू समुदाय के साथ हुआ है. ये बनिस्बत कहीं छोटे समुदाय हैं. पहले की बात होती तो उन्होंने बड़े नेताओं को वोट दिया होता पर अब उन्हें लगता है कि बदले राजनीतिक परिदृश्य में वे एक छोटा ही सही पर अहम स्थान प्राप्त कर सकते हैं.

हाल ही में गुर्जरों ने अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने के लिए संगठित होना शुरू किया जैसे कि सिर्फ संसद का एक फैसला ही किसी संगठन को एक जनजाति में तब्दील करने के लिए काफी हो. इस तरह की सोच, आरक्षण के लिए लड़ाई, अतार्किक मांगें और कुछ और दूसरी तरह की वोट बैंक की राजनीति देखने को मिलती रहेगी. मगर दीर्घावधि में ये भारत के लिए अच्छा ही साबित होगा.

जैसे-जैसे व्यवस्था अलग-अलग समुदायों को ज्यादा स्थान देती जाएगी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हरेक का हिस्सा बढ़ता जाएगा. समय के साथ ज्यादा से ज्यादा लोग मुख्यधारा में आते जाएंगे और समस्या खुद ब खुद हल हो जाएगी. 35 से 40 लोकसभा सीटें चाहने वाले मुलायम या लालू जैसे और आठ से दस लोकसभा सीटों की तमन्ना रखने चिरंजीवी सरीखे जातिवादी समूहों में बहुत बड़ा अंतर है. दरअसल पहले से ही बहुत से लोगों के आ जाने से जगह कम होती जा रही है. मगर आने वाली पीढ़ी को इसका सामना नहीं करना पड़ेगा. अगली पीढ़ी को विरासत में कहीं ज्यादा भागीदारी वाला समाज मिलेगा.

आखिर में घमंड पर आखिरी बात. वाम दल भले ही परास्त हुए हैं मगर साम्यवादी रुझान हमारे समाज में अक्षुण्ण है. दरअसल देखा जाए तो ये बहुत जरूरी भी है. अगर यूपीए ये मान लेगा कि ये जनादेश बेलगाम उदारीकरण के लिए है तो वह बहुत बड़ी भूल करेगा. हमारे समाज का एक वर्ग अब भी सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के बारे में सोचता है. ऐसे लोग अब भी हैं जो सोचते हैं कि खुद को एक इंसानी समाज के रूप में जिंदा रखने के लिए ये बहुत अहम है कि गरीबों की तरफ प्राथमिकता से ध्यान दिया जाए.

आप ऐसा नहीं कर सकते कि किसी फाइव स्टार होटल में एक वक्त के खाने में 12000 रुपए उड़ा दें और कूड़ा बीनते किसी बच्चों को 10 रुपये देकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लें. न ही आप ये देखने के लिए 200 साल तक इंतजार कर सकते हैं कि उदारीकरण का फायदा आखिरकार अपने आप ही नीचे तक पहुंच जाएगा.

ये संयोग नहीं है कि यूपीए को चुनाव में विजयी बनाने वाली वास्तविकता राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और किसानों की कर्ज माफी योजना है. भले ही इस पैसे का 90 फीसदी भ्रष्टाचार में डूब गया हो मगर फिर भी ये ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचा है. सारा भ्रष्टाचार दिल्ली या भुनवेश्वर में नहीं है. स्थानीय स्तर पर भी काफी पैसा खाया जाता है. मगर जो लूट रहे हैं उन्हें भी खर्च तो करना ही है. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है. इससे चुनावी लाभ मिलता है. भारत के गरीब हमेशा वोट देते हैं. घमंड को खंड-खंड करने के लिए उनके पास यही तो सबसे कारगर हथियार है.     

 

सदाबहार यमला जट

1980 की गर्मियों की बात है. स्टार और स्टाइल पत्रिका की खोजी रिपोर्टर भारती एस प्रधान तेज धूप में चेन्नई की गलियों की खाक छानने में जुटी हुई थीं. प्रधान को तलाश थी एक पुजारी की जिसके बारे में उन्हें बस इतना ही पता था कि उसका नाम श्रीनिवास आचार्य है और उसने एक ऐसी शादी करवाई है जिसकी खबर पूरे देश में तहलका मचा सकती है.

‘वे बॉलीवुड के सबसे ज्यादा चहेते अभिनेता थे और उनके लिए सब माफ था. आप हाथ बढ़ाइए और वे आपको गले लगा लेंगे. आप गले मिलने के लिए बढ़िए और आपके लिए शाम को एक जाम की पेशकश हो जाएगी.’आखिरकार प्रधान को वह पुजारी मिल गया और उस गोपनीय शादी की विस्तृत जानकारी भी. उन्हें पता चला कि इस आचार्य ने मुंबई में किसी दिलावर खान की शादी हेमामालिनी से करवाई थी. प्रधान को अहसास हो चुका था कि उनके पास उस वक्त की सबसे सनसनीखेज खबर है. दिलावर खान और कोई नहीं बल्कि करोड़ों प्रशंसकों वाले एक्शन हीरो धर्मेंद्र थे.

हालांकि कुछ दूसरे ऐसे लोग भी थे जिनका कहना था कि असल में शादी तो 21 जून 1979 को ही हो चुकी थी मगर इस खबर को जान-बूझकर परदे में रखा गया ताकि धर्मेंद्र की पहली पत्नी प्रकाश कौर को इसका पता न चले. कौर और धर्मेंद्र की शादी को तब तक 25 साल हो चुके थे और उन्होंने धर्मेंद्र को तलाक देने से मना कर दिया था. अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े संकट पर बाद में एक सहेली से बात करते हुए कौर का कहना था, ‘धर्मेंद्र के दोहरे व्यक्तित्व को समझना हो तो आपको उनकी फिल्म जुगनू देखनी चाहिए.’

इस खबर ने रातोंरात प्रधान को स्टार बना दिया. बॉलीवुड में इस खुलासे से खलबली मच गई. कुछ को हैरत थी कि धर्मेंद्र ऐसा कैसे कर सकते हैं. मगर ज्यादातर लोगों को गरम-धरम और ड्रीम गर्ल की ये जोड़ी बढ़िया लगी. इसलिए हैरत की बात नहीं थी कि इस शादी ने धर्मेंद्र की लोकप्रियता में और भी इजाफा कर दिया. प्रधान याद करती हैं, ‘इसके एक साल बाद मैं उनसे मिली. वे हैरान थे कि आखिर मुझे इस शादी की भनक कैसे लग गई थी.’ मगर प्रधान ने धर्मेंद्र को ये नहीं बताया कि ये धमाका और भी बड़ा हो सकता था अगर उनके फोटोग्राफर बीके सनिल ने शादी की तस्वीरों वाला वह फिल्म रोल इस दंपत्ति को लौटा नहीं दिया होता जो गलती से उनके हाथ लग गया था.

इस कहानी को सुनकर धर्मेंद्र के छोटे बेटे बॉबी देओल मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘वे बॉलीवुड के सबसे ज्यादा चहेते अभिनेता थे और उनके लिए सब माफ था. आप हाथ बढ़ाइए और वे आपको गले लगा लेंगे. आप गले मिलने के लिए बढ़िए और आपके लिए शाम को एक जाम की पेशकश हो जाएगी.’ बॉबी के मुताबिक ये लोगों का धर्मेंद्र के प्रति प्यार ही था जिसकी वजह से बॉलीवुड ने इतनी आसानी से उनकी चर्चित दूसरी शादी को स्वीकार लिया. इसके अलावा धर्मेंद्र का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कोई उनसे नफरत कर ही नहीं सकता था. दूसरी शादी से कुछ साल पहले ही उन्हें दुनिया के सबसे खूबसूरत लोगों में शुमार किया गया था. धर्मेंद्र के बाद बॉलीवुड इस उपलब्धि से लंबे समय तक महरूम रहा और 1997 में कहीं जाकर सलमान खान ने इस स्थितिको बदला.

किसी भी फिल्म स्टार की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह पुरुषों और महिलाओं, दोनों में कितना लोकप्रिय है. धर्मेंद्र इस मामले में किस्मत के धनी रहे. यानी महिलाएं भी उनकी दीवानी थीं और पुरुष भी उन्हें खूब पसंद करते थे. 1974 में मीना कुमारी और उनके पति कमाल अमरोही के चर्चित अलगाव और फिर मीना कुमारी के धर्मेंद्र से जुड़ाव के बारे में काफी कुछ जानकारी रखने वाले बॉबी कहते हैं, ‘महिलाएं मेरे पिता की जिंदगी से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं.’

शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र लाइटब्वॉयज को चुपके से पैसे दिया करते थे. बदले में लाइटब्वॉयज का काम ये होता था कि वे शॉट के दौरान कोई गड़बड़ कर दें ताकि धर्मेंद्र थोड़ा और देर तक हेमामालिनी के नजदीक रह सकेंधर्मेंद्र और मीना कुमारी की जोड़ी 1965 में बनी फिल्म काजल में चमकी. इस फिल्म में धर्मेंद्र ने एक ऐसे शख्स का किरदार निभाया था जिसे हीरोइन अपने भाई की तरह मानती है मगर उसके पति को इस रिश्ते पर शक होता है. 1966 में इन दोनों की दूसरी फिल्म फूल और पत्थर आई जो सुपरहिट रही. इस फिल्म में मीना कुमारी का किरदार एक दुखी विधवा का था जो सुरक्षा के लिए धर्मेंद्र की ओर देखती है.

हालांकि ये भी एक विडंबना ही थी कि लगातार हिट फिल्में देने और अपार लोकप्रियता के बावजूद हिंदी सिनेमा के इस हीमैन की झोली से फिल्मी पुरस्कार दूर ही रहे. 1997 में कहीं जाकर उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिल सका. दिलीप कुमार और उनकी पत्नी सायरा बानो से ये पुरस्कार लेते हुए धर्मेंद्र ये बताते हुए थोड़ा भावुक हो गए कि कैसे इतनी हिट फिल्में देने के बावजूद कभी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड नहीं मिला जबकि उनकी प्रतिभा, फिल्मफेयर द्वारा आयोजित एक आयोजन में ही खोजी गई थी. धर्मेंद्र ने अपनी बात खत्म की ही थी कि दिलीप कुमार एक पल गंवाए बिना बोल पड़े, ‘कोई बात नहीं, जब भी मैं ऊपरवाले से मिलूंगा मेरी उससे एक ही शिकायत होगी कि उसने मुझे धर्मेंद्र जितना हैंडसम क्यों नहीं बनाया.’ माहौल हंसी और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

ये धर्मेंद्र की खूबसूरती और अभिनय प्रतिभा ही थी कि उन्होंने 1960 में आई दिल भी तेरा हम भी तेरे  से लेकर 2007 में प्रदर्शित जॉनी गद्दार तक 250 फिल्मों में अपना लोहा मनवाया. आज यकीन करना मुश्किल है कि हकीकत, बंदिनी, फूल और पत्थर, सत्यकाम, जुगनू, राजा जानी, चुपके-चुपके, मेरा गांव मेरा देश, सीता और गीता और शोले जैसी सफल और यादगार फिल्में देने वाले धर्मेंद्र को कभी वह श्रेय नहीं मिला जिसके वे हकदार थे.

जाने-माने फिल्मकार गुलजार हैरानी जताते हैं कि आखिर इस अभिनेता ने क्यों हर बार अपनी फिल्म की हीरोइनों मीना कुमारी, नूतन, माला सिन्हा और सुचित्रा सेन को ही सारी वाहवाही लूटने दी और खुद सिर्फ एक रोमांटिक भूमिका में संतुष्ट रहे. शायद इसकी वजह ये रही कि गठीले बदन के होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व में एक खास मुलायमियत थी और लाखों में एक उनकी हंसी उनके अभिनय से लोगों का ध्यान भटका देती थी.

भारतीय सिनेमा के इस आदर्श लवर ब्वॉय पर गुलजार कहते हैं, ‘मेरे लिए धर्मेंद्र सबसे अच्छे देवदास हैं क्योंकि केवल वे ही ऐसे हैं जिनकी जवानी उनके साथ बनी रही जबकि पारो और चंद्रमुखी उम्र के साथ आगे बढ़ गईं.’

सामंतवादी ठाकुर के शोषण से लड़ते जाट हीरो को लोगों ने पसंद किया और गुलामी, यतीम, बंटवारा और क्षत्रिय जैसी फिल्मों से धर्मेंद्र हीरो के रूप में थोड़ा लंबे समय तक चल पाए. मगर ये वह दौर था जो फौरन ही खत्म भी हो गया

प्यार और शराब को लेकर धर्मेंद्र से जुड़े किस्से अब मिथक सरीखे बन चुके हैं. लेखिका और टीवी एंकर अनुपमा चोपड़ा ने अपनी किताब द मेकिंग ऑफ शोले में इन किस्सों में से कई का जिक्र किया है. शोले  का सेट बैंगलोर के पास स्थित एक गांव रामनगरम में बनाया गया है. चोपड़ा याद करती हैं कि किस तरह शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र लाइटब्वॉयज को चुपके से पैसे दिया करते थे. बदले में लाइटब्वॉयज का काम ये होता था कि वे शॉट के दौरान कोई गड़बड़ कर दें ताकि धर्मेंद्र थोड़ा और देर तक हेमामालिनी के नजदीक रह सकें. चोपड़ा हंसते हुए बताती हैं, ‘लाइटब्वॉयज को इससे रोमांच भी मिलता था और पैसे भी. शूटिंग खत्म होने तक उनमें से हर एक लगभग 1500 रुपए कमा चुका था. एक बार खूब पीने के बाद धर्मेंद्र आधी रात को बैंगलोर स्थित होटल से अचानक निकले और अकेले ही पैदल चलते हुए गांव तक पहुंच गए. इसके बाद वे वहां एक चट्टान पर सो गए. वे प्यार और शराब दोनों साथ-साथ संभाल सकते थे.’

मगर धर्मेंद्र की जिंदगी में प्यार और शराब के अलावा भी बहुत सी दूसरी चीजें हैं जिनके लिए उन्हें याद किया जाता है. 1960 और 1970 के दशक के दौरान उनके फिल्मी सफर पर नजर डाली जाए तो उनके कई रूप दिखते हैं. कहीं उनमें अमिताभ वाला एंग्री यंग मैन दिखता है,

कहीं वादियों में तराने छेड़ता शम्मी कपूर और कहीं आत्ममुग्ध राजेश खन्ना. इन खासियतों के बल पर धर्मेंद्र ने हर फिल्म अपने मजबूत कंधों पर संभाली. लड़ाई के दृश्यों के दौरान वे जब भी चिल्लाते, कुत्ते..तो सिनेमा हॉल में बैठे दर्शकों कों को एक अजीब सा आनंद मिलता. ये डायलॉग धर्मेंद्र के साथ अभिन्न रूप से जुड़ गया था.

बॉलीवुड के इतिहासकार दिनेश रहेजा कहते हैं, ’60 के दशक की उनकी फिल्में संगीत और ड्रामा आधारित रहीं जबकि 70 के दशक में मेरा गांव मेरा देश और जुगनू में वे स्टाइलिश और एक्शन हीरो के तौर पर उभरे.’ आज भी वे कैमरा के सामने शानदार परफॉर्मर के तौर पर जाने जाते हैं. सायरा बानो के शब्दों में, ‘वे हीरोइनों के चहेते थे.’ वहीदा रहमान कहती हैं, ‘वे एक संपूर्ण अभिनेता हैं जिन्होंने हर फिल्म में अपनी एक खास छाप छोड़ी. राजनीति उनके बस की बात नहीं है. हैरत की बात नहीं कि वे संसद में जाने की बजाय खेती-किसानी को तरजीह देते रहे.’ उनके मुरीद कहते भी हैं कि धर्मेंद्र भाषण देने या रिबन काटने के लिए बने ही नहीं हैं.

पहचान भले ही हीमैन के तौर पर ज्यादा हो मगर धर्मेंद्र की कई फिल्में ऐसी भी हैं जिनमें उनके चरित्रों से सरोकार और सामाजिक यथार्थ झलकता है. सत्यकाम व आदमी और फरिश्ता में वे एक ईमानदार इंजीनियर हैं तो ममता  में एक बैरिस्टर. बंदिनी में वे एक जेल डॉक्टर हैं, मेरा गांव मेरा देश में एक ईमानदार पुलिसवाले और यादों की बारात में अपने भाइयों से बेहद प्यार करने वाला एक शख्स.

फिल्मकार समर खान कहते हैं, ‘आप ही बताइये बंगाल के साहित्यिक आदर्शवाद को हिंदी सिनेमा में इतने आदर्श तरीके से किसने दिखाया है?’ उनका इशारा ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म सत्यकाम  की तरफ है. 1969 में आई इस फिल्म को हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर कहा जाता है. इसमें धर्मेंद्र ने एक ईमानदार सिविल इंजीनियर की भूमिका निभाई थी जो अपने फैसलों से कइयों को मुसीबत में डाल देता है. इनमें से सबसे दुस्साहसिक फैसला होता है एक ऐसी लड़की से शादी करना जिसका एक बिगड़ैल शहजादे ने बलात्कार किया है और जो गर्भवती हो गई है.

टिप्पणीकारों ने स्क्रीन पर उनके उपनिवेश विरोधी राष्ट्रवादी आदर्शों की तुलना इंदिरा गांधी द्वारा नेहरू के बाद समाजवाद का एक नया दौर शुरू करने के लिए किए गए कांग्रेस के विभाजन से की. संयोग ही था कि वह साल भी 1969 ही था. धर्मेंद्र खुद भी सत्यकाम  का सबसे अच्छा दृश्य उसे मानते हैं जहां उनका चरित्र अवैध संतान के रूप में अपने पिता अशोक कुमार का सामना करता है जो उसे फटकार लगा रहा होता है. गुलजार कहते हैं, ‘धर्मेंद्र के पास कोई डायलॉग्स नहीं हैं. वे बस अशोक कुमार की बात सुनते हैं और उनकी चिंताओं को हंस कर उड़ा देते हैं.’ गुलजार ये भी जोड़ते हैं कि कई मायनों में सत्यकाम 1973 में आई प्रकाश मेहरा की जंजीर की प्रस्तावना थी जिसने अमिताभ को सुपरस्टार बना दिया. संयोग की बात है कि मेहरा ने ये स्क्रिप्ट पहले धर्मेंद्र को दिखाई थी मगर उन्होंने ये फिल्म करने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उस समय वे बहुत व्यस्त थे.

1973 में एक तरफ जहां जंजीर आई तो दूसरी तरफ श्याम बेनेगल की अंकुर और एमएस सथ्यू की गरम हवा के साथ समानांतर सिनेमा का भी उद्भव हुआ. इसी साल राजकपूर की फिल्म बॉबी आई जिसे खूब कामयाबी मिली. हिंदी सिनेमा का मिजाज अब बदल रहा था. ये बदलाव धर्मेंद्र से ज्यादा दूसरों के लिए फायदेमंद साबित हुआ. अब सलीम खान और जावेद अख्तर यानी सलीम-जावेद की जोड़ी का बोलबाला था जिनकी कहानियां अमिताभ के बगावती तेवरों पर ज्यादा फिट बैठती थीं. इस बदलाव का नतीजा ये हुआ कि अगले दो दशक तक सिल्वर स्क्रीन की धारा बदली रही. यही वजह रही कि 1975 में शोले और चुपके-चुपके के साथ अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच जाने के बावजूद धर्मेंद्र को वह जगह नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे.

हालांकि उनके लिए फिर भी कुछ राहत थी. रहेजा बताते हैं कि 1980 के दशक में मारधाड़ वाली फिल्मों के चलन की वजह से कई अभिनेताओं का करिअर लंबा खिंच गया. वे कहते हैं, ‘इससे 1970 के दौर के और 40 से अधिक उम्र के तीन अभिनेताओं का करिअर लंबा हो गया – धर्मेंद्र, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा.’ रहेजा आगे जोड़ते हैं कि सामंतवादी ठाकुर के शोषण से लड़ते जाट हीरो को लोगों ने पसंद किया और गुलामी, यतीम, बंटवारा और क्षत्रिय जैसी फिल्मों से धर्मेंद्र हीरो के रूप में थोड़ा लंबे समय तक चल पाए. मगर ये वह दौर था जो फौरन ही खत्म भी हो गया.

धर्मेंद्र को फिल्म इंडस्ट्री में 50 साल हो गए हैं. जल्द ही वे अपने बेटों सन्नी और बॉबी के साथ फिल्म चीयर्स-सेलिब्रेट लाइफ में नजर आएंगे. सन्नी कहते हैं, ‘दरअसल ये फिल्म डैड के फिल्म इंडस्ट्री में 50 साल पूरे होने की खुशी मनाने की एक कोशिश है. यानी सत्यकाम का सत्यप्रिय एक नई भूमिका के लिए फिर से तैयार है.’ 

अनूठे तराने, अलबेला संगीतकार

मध्यरात्रि का वक्त था जब निर्देशक अनुराग कश्यप अपने निर्माता विकास बहल के साथ एक शर्मीले स्वभाव वाले युवक से मिलने जुहू स्थित उसके अस्थायी गैराजनुमा स्टूडियो पहुंचे थे. एक साझा मित्र और पार्श्व गायिका शिल्पा रॉव ने उनकी मुलाकात संगीत की इस विलक्षण प्रतिभा से करवाई थी. यहां उन्हें ग्रंज रॉक, लोकगीत, जैज संगीत और उस पर देसी ढोल की थाप से मिलकर बना ऐसा अद्भुत् संगीत सुनने को मिला जिससे वो और मुंबइया फिल्मनगरी तब तक बिल्कुल ही अनजान थे. अगले ही पल एड जिंगल्स और थियेटर के लिए संगीत तैयार करने वाले 29 वर्षीय अमित त्रिवेदी देव-डी को संगीतमय बनाने के पीछे की प्रेरणा बन चुके थे. उसी रात हमें इस बात का अहसास हुआ कि हम वास्तव में क्या बनाने जा रहे हैं और पूरी फिल्म जैसे हमारे सामने जीवंत हो उठीबहल कहते हैं.

त्रिवेदी की अजीबोगरीब और मजेदार धुनें अक्सर उल्टे-सीधे वक्त में जन्म लेती हैं मसलन कभी सब-वे में दोस्तों का इंतजार करते वक्त तो कभी सो कर उठते ही और वो तुरंत इन्हें अपने मोबाइल में सेव कर लेते हैंएक फोटो कंपनी में प्रबंधक के पुत्र त्रिवेदी की जिंदगी एक दोपहर बांद्रा में चहलकदमी के दौरान बदल गई. एक ओपेन एयर संगीत समारोह में चल रहे मशहूर पश्चिमी गीतों ने त्रिवेदी को अंदर जाने पर मजबूर कर दिया. जिन गानों को वे सीडी पर चलता समझ रहे थे वे दरअसल वहां मौजूद स्थानीय बैंड बजा रहे थे. ये देखकर मैं पागल सा हो गया कि ये बैंड मूल गानों को हूबहू बजाए जा रहे थेत्रिवेदी कहते हैं. उसी दिन से त्रिवेदी ने 16 साल की उम्र के लड़कों वालीं तमाम स्वाभाविक गतिविधियां, मसलन क्लास बंक करना, होटलबाजी और लड़कियों के चक्कर काटना, छोड़ दीं. उस वक्त तक वो शर्मीले स्वभाव के हुआ करते थे जिनकी तरफ लड़कियां खासा ध्यान देती थीं. उनकी पहली गर्लफ्रेंड का स्थान उनके पहले निवेश ने ले लिया और ये था 1,800 रुपए में खरीदा गया उनका पहला कैसियो कीबोर्ड. महीनों की बचत से खरीदा गया ये कीबोर्ड जल्द ही उनके जीवन का आधार बन गया. इसके बाद उनका संगीत-प्रेम बप्पी लाहिड़ी और मडोना को पार करता हुआ जाज, रॉक और भारतीय शास्त्रीय संगीत में संभावनाएं तलाशने लगा.

देव-डी और आमिर के संगीत में इतना जादुई आकर्षण और विविधता है कि इसे सुनकर किसी को भी ये लग सकता है कि इस संगीत का रचयिता स्वयं कोई रॉकस्टार सरीखा इंसान होगा. पर उनमें ऐसी कोई झलक तक नजर नहीं आती. त्रिवेदी हमें अपने बीच के ही किसी जाने-पहचाने सादे से शख्स लगते हैं.

मुझे नहीं पता कि मुख्यधारा क्या चीज है और प्रयोगवादी संगीत क्या है. मैं सिर्फ अपने दिल की सुनता हूंवो कहते हैं. इमोशनल अत्याचार में त्रिवेदी ने पंजाबी ब्रास बैंड पार्टी के साथ भारी धातुओं के कटने की आवाज का फ्यूजन किया था. ओ परदेसी में उन्होंने परंपरागत सितार के साथ हिप-हॉप वोकल को अच्छे से गूंथकर पेश किया. लेकिन त्रिवेदी सस्ते चलताऊ फ्यूजन और पूरब-पश्चिम के मेल जैसे पुराने थकाऊ फार्मूले से बचते हैं. सूफी अलाप से लेकर जाज तक आप त्रिवेदी के संगीत को किसी दायरे में नहीं बांध सकते और इसीलिए वो खास हैं. हो सकता है त्रिवेदी बॉलीवुड संगीत को नई परिभाषा न दे पाएं लेकिन उन्होंने परिभाषा निर्धारित करने की प्रक्रिया को तो हंसी का पात्र बना ही दिया है. संगीत निर्देशक विशाल ददलानी कहते हैं, ‘उनके अंदर लोगों को चौंकाने की अनोखी क्षमता है. उनके लिए कोई निर्धारित मानक नहीं है. लोगों को यही नहीं पता कि उनसे क्या उम्मीद की जाए.

त्रिवेदी की अजीबोगरीब और मजेदार धुनें अक्सर उल्टे-सीधे वक्त में जन्म लेती हैं मसलन कभी सब-वे में दोस्तों का इंतजार करते वक्त तो कभी सो कर उठते ही और वो तुरंत इन्हें अपने मोबाइल में सेव कर लेते हैं. इसका जिक्र करते ही उनके चेहरे पर शर्मीली सी हंसी तैर जाती है. वो धीमे से कहते हैं, ‘आपको साफ चरित्र का होना चाहिए.’ ‘गानों से ईमानदारी झलकनी चाहिए. मैं पैसे या प्रसिद्धि के पीछे नहीं भाग रहा हूं.जिस तरह का काम वो कर रहे हैं उसमें ये दोनों चीजें हासिल करना कोई मुश्किल नहीं है. वो कहानी को समझकर ऐसा संगीत बनाते हैं कि वो कहानी की आत्मा बन जाता हैबहल कहते हैं. वो पुराने मानकों और फार्मूलों को तोड़ रहे हैं और ऐसी ध्वनियां रच रहे हैं जो अपने अंतरे-मुखड़े ढूंढ़ लेती हैं.’