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बॉलीवुड के दस सांचे

इस कहानी के सभी पात्न एवं घटनाएं काल्पनिक हैं. यदि इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति या वस्तु से कोई सम्बन्ध पाया जाता है तो इसे मात्न संयोग ही कहा जाएगा. फिल्म के आरंभ में दिखाई जाने वाली इन पंक्तियों का बॉलीवुड ने शपथ की तरह हमेशा पालन किया. बॉलीवुड ने हमें ऐसी सुखांत झूठी कहानियां दिखाईं जो सपनीली दुनिया की बातों जैसी थी. हमने ऐसे नायक देखे, जो असाधारण रूप से चमत्कारी, सौम्य और संस्कारित थे. हमें सुन्दर, बेवकूफ और चरित्रवान नायिकाओं की आदत हो गई. बॉलीवुड ने हमें रोमांटिक गाने और क्रूर खलनायक दिए. बॉलीवुड ने हमें प्रेम-कहानियों को ही कहानी समझना सिखाया. बॉलीवुड ने हमें त्यौहार मनाने सिखाए और करवाचौथ तथा वेलेंटाइन डे को लोकप्रिय बनाया. बॉलीवुड की मांओं ने हमारी मांओं को ज्यादा भावुक बना दिया और हमारे पिताओं को ज्यादा कठोर.

‘एक फिल्मकार ऐसे सपने बुनता है, जिनसे रात काटना आसान हो जाता है. वह घोर अंधेरे की कोख में रोशनी की कल्पना करता है’                               

महेश भट्ट

बॉलीवुड ने हर किरदार से लेकर हर रिश्ते तक के अपने ही सांचे गढ़े और उन्हें बार-बार दोहराता रहा. ‘नया दौर’ से लेकर ‘लगान’ तक हमारी सांसें उन्हीं कहानियों पर थमती-दौड़ती रहीं, जिनके सुखद अंत हमें मालूम थे. हम घोड़ों पर आने वाले डाकुओं की कहानियां देखकर सिहरे और बीसियों गोली खाकर बच गए हीरो को देख खुशी से चिल्लाए भी. ‘रामायण’ के हनुमान ने अपने सीने में श्रीराम को दिखाया और ‘नमक हलाल’ के अमिताभ ने स्मिता को, और हमने दोनों बार विश्वास किया और खुश हुए. महेश भट्ट कहते हैं, ‘एक फिल्मकार ऐसे सपने बुनता है, जिनसे रात काटना आसान हो जाता है. वह घोर अंधेरे की कोख में रोशनी की कल्पना करता है. वह किसी नशे की गोली बेचने वाले या धर्मगुरु से अलग नहीं है, जो काल्पिनक स्वर्ग की बातें करते हैं.’

हम सपनों की लकड़ी से बने उन्हीं साँचों की बात कर रहे हैं, जो हर दौर में बॉलीवुड के नायकों से लेकर नौकरों तक को एक खास छवि में बांधते रहे. समय के साथ उनका आकार बदला जरूर, लेकिन फिर अगले कुछ समयांतराल के लिए नए आकार का सांचा बार-बार इस्तेमाल किया जाता रहा.

यह एकरूपता भी उस दौर के बीतने और बदलने के बाद नजर आती है. हो सकता है कि ढर्रे तोड़ती और अधिक वास्तविक होती जा रही जिन फिल्मों को देखकर हम आज प्रसन्न हो रहे हैं, बीस साल बाद देखने पर इस दशक की फिल्मों में भी कुछ नए स्टीरियोटाइप्स जन्म लेते दिखें. दोहराव, बदलाव और फिर दोहराव का यह सिलसिला इतना रोचक है कि इसमें एक मसालेदार फिल्म के तमाम गुण हैं. अगले कुछ पन्नों पर बिखरा है, ‘दस कहानियां’ बनाने वाले और ‘दस बहाने’ गाने वाले बॉलीवुड के ‘दस’ से लगाव को समर्पित, इसके दस मसालेदार सांचों का यह विश्लेषण.

नायक,  नायिका, जाति व धर्म

दर्द का चितेरा

तैयब मेहता आधुनिक भारतीय कला के बड़े स्तंभ थे. उन्होंने कला को कई नए आयाम दिए. वे हम जैसे कलाकारों की नई पीढ़ी के मार्गदर्शक थे. मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान हमारा उनके पास जाना होता रहता था. वे कम बोलते थे मगर उनके साथ होना ही हमारे लिए अपने आप में बड़ी बात थी. चित्रकारी के दौरान क्या-क्या करना चाहिए इसकी बजाय वे हमें अक्सर यह बताते थे कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए. मेरा मानना है कि ऐसी चीजें रचनात्मकता के पथ पर आगे बढ़ने की दिशा में बेहद अहम होती हैं.

गजगामिनी बनाते वक्त तैयब मेरे थिंक टैंक थे. मैं भारतीय सिनेमा की एक नई भाषा रचना चाहता था. कुछ लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया. मगर तैयब ने ये कहकर मेरा हौसला बनाए रखा कि मैं बड़ा काम कर रहा हूं

एमएफ हुसैन

पहले-पहल उन्होंने जब हमें अपनी पेंटिग्स दिखाईं तो हम चुप रहा करते थे. फिर हमने फैसला किया कि अगली बार से हममें से हर एक उनसे कुछ चुनिंदा सवाल पूछा करेगा. वह मौका भी आया. सवाल सुनने के बाद उन्होंने कहा, ‘तुम लोग भी कैसे बेवकूफी भरे सवाल पूछते हो?’ फिर कुछ रुककर बोले, ‘मुझे लगता है कि तुम्हारा मतलब शायद ये है. इसके बाद वे अपने बेडरूम में गए और हमारे लिए एक किताब लेकर आए जबकि वे अपनी किताबें कभी किसी को नहीं देते थे. कभी-कभी वे अपनी किसी पेंटिग के बारे में हमसे पूछते थे. जब हम उसमें रंगों के प्रयोग या किसी दूसरी विशेषता के बारे में कुछ कहते तो उनकी आंखों में एक चमक आ आती थी.

उनकी कला में काफी गहराई होती थी. अंग विच्छेद वाली और गिरती आकृतियों का जो प्रयोग उन्होंने 70 के दशक में शुरू किया वह कला की दुनिया को उनका महत्वपूर्ण योगदान है. उनके चित्रों में आपको रिक्शा खींचने वाले, बंधे हुए सांड और चीखते हुए मुंह जैसी चीजों के दर्शन होते हैं जो बताता है कि उनकी चेतना आम जिंदगी से जुड़ी हुई थी. हिंसा, आतंकवाद और समुदायों के बीच आपसी विश्वास की कमी से वे बेहद परेशान थे. उनके लिए तो चीखना या फिर जोर-जोर से बोलना तक हिंसा का एक स्वरूप था. तैयब खुद को दर्द का चितेरा कहते थे.

छात्र जीवन में मैंने उनकी फिल्म कूडल (मिलन के लिए तमिल शब्द) देखी थी. 18 मिनट की ये फिल्म इतनी असरदार थी कि सत्यजित रे ने भी इसकी तारीफ की थी. इसमें एक सांड की हत्या का दृश्य बहुत सजीव तरीके से फिल्माया गया था. शायद इसी घटना से उन्हें अपनी एक मशहूर पेंटिग ट्रस्ड बुलकी प्रेरणा मिली. ये फिल्म सिनेमा की विधा पर तैयब की मजबूत पकड़ का सबूत थी. उनकी पृष्ठभूमि सिनेमा से थी और उनका परिवार मुंबई और पुणे में कई सिनेमाहाल्स चलाता है. उन्होंने करिअर की शुरूआत बतौर फिल्म एडिटर की थी मगर फिर तबियत खराब रहने के कारण इसे छोड़ दिया. वे महाश्वेता देवी के उपन्यास हजार चौरासी की मां पर एक फिल्म बनाना चाहते थे. कई साल के इंतजार के बाद आखिर उन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम किया और गोविंद निहलानी ने फिल्म निर्देशित की. हालांकि मूल रूप से वे चित्रकार ही थे. वे धीरे-धीरे काम करते थे और छोटी-छोटी चीजों को लेकर भी इतने सतर्क रहते थे कि कई बार किसी कृति को अंतिम रूप देने तक वे तीन-चार कैनवास नष्ट कर चुके होते थे. उनका मानना था कि जिस कला को सार्वजनिक होना है उसमें कोई खोट नहीं रहना चाहिए.

प्रोगेसिव आर्ट ग्रुप की विभूतियों वीएस गायतोंडे, एसएच रजा, अकबर पदमसी और हुसैन साहब को मैं आधुनिक भारतीय कला के उस्तादों में शुमार करता हूं. मेरी पीढ़ी के कलाकार इनका काम देखते हुए बड़े हुए. हालांकि तैयब का मेरी कला पर तो कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ा क्योंकि मेरी शैली अलग थी, मगर एक विचारक के तौर पर उन्होंने मेरा काफी मार्गदर्शन किया. उनसे ही मैंने जाना कि कलाकार को किन-किन चीजों के लालच में नहीं पड़ना चाहिए और कहां-कहां पर उसका पैर रपट सकता है. उन्होंने ही मुझे बताया कि जब कोई विषय सफल हो जाता है तो किस तरह कलाकार में उसे बार-बार इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है.

समय बदल गया है और अब भारतीय कला में सारी दुनिया की दिलचस्पी है. इस दिलचस्पी का एक बड़ा श्रेय तैयब को भी जाता है. जब क्रिस्टी जैसी कलादीर्घा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कृतियों की नीलामी की तो भारतीय कला के लिए ये एक बड़ी बात थी. महिषासुर नाम की उनकी एक पेटिंग जब पंद्रह लाख डॉलर यानी सात करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत में बिकी तो दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा ली थी. हालांकि जब बाजार और मांग जैसी चीजें नहीं थी तब भी तैयब उतना ही रचनात्मक काम करते थे. तब भी उनमें उतना ही सरोकार, समर्पण और जुनून था जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा.     

 

असली संकट की बेहतरीन फ़िल्म: संकट सिटी

फिल्म  संकट सिटी

निर्देशक पंकज आडवाणी

कलाकार  केके मेनन, अनुपम खेर, रिमी सेन, चंकी पांडे, यशपाल

पैसे के पीछे भागते दर्जन भर मुख्य किरदारों के कमीनेपन और लालच के पीछे यह गीता के ‘न कुछ खोना है, न कुछ पाना है वाले दर्शन की कहानी है

सब उम्मीदें डूब जाने के बाद के के निराश बैठे हैं. बैकग्राउंड में ढलता हुआ सूरज है. के के हाथ बढ़ाकर उसे छूते हैं और बुझा देते हैं. यह किसका कमाल है? सिनेमेटोग्राफर का, एडिटर का, अभिनेता का, निर्देशक का या फ़िल्म के पीछे छिपी हुई उस कविता का, जिसमें मुम्बई के बाहर कचरे की पहाड़ियों पर एक दाढ़ी वाला साधुनुमा आदमी बन्दूक लेकर बैठा है और उसे ही अपना घर बता रहा है? जब नोटों से भरा दो करोड़ का बैग फट जाता है और हवा में राख की तरह उड़ते नोटों को बटोरने के लिए कचरा बीनने वाले बच्चे दौड़ रहे हैं तो यह दृश्य अपने आप में पूरा समाजवाद है. हमारे समय के सबसे अच्छे सम्भावित सुखांतों में से एक.

हैंडहेल्ड कैमरा से फ़िल्माए गए बहुत सारे दृश्य संकट सिटी को आपके इतना क़रीब ला देते हैं कि आप भी फ़िल्म में किसी पात्र की तरह शामिल हो जाते हैं. शुरुआत में दर्शकों को हँसाने की कुछ नाकाम और झुंझलाहट पैदा करने वाली कोशिशों को छोड़ दिया जाए तो संकट सिटी एक शानदार फ़िल्म है, बशर्तें आप इससे आसान कॉमेडी की उम्मीद न करें. फिर तो ऐसा होगा कि अपने वक़्त पर यह आपको इतनी देर तक भी हँसाएगी कि कमाल की गति से बढ़ती इस फ़िल्म में हँसी के चक्कर में आपका एकाध अगला दृश्य छूट जाएगा. लेकिन इसे कॉमेडी कहना ऐसा ही है जैसे पेड़ को देखकर कहना कि यह फल है और तने, जड़, पत्तियों को भूल जाना. एक ड्राइवर का अपनी चोर दोस्त को शरमाकर बताना कि उसने गर्लफ्रेंड कर ली है और एक सस्ती वेश्या से उसके मासूम प्रेम पर आप मोहित हो जाते हैं. इतने कि जब अपनी प्रेमिका के अपमान का बदला लेने के लिए वह अपने अमीर मालिक को मार डालना चाहता है तो उसके सीमित रोल के बावज़ूद आप उसे दिल खोलकर कहानी का नायक स्वीकार कर लेते हैं.

यह चोरों की कहानी है जिनमें अय्याश धर्मगुरु भी हैं और बी ग्रेड फ़िल्म प्रोड्यूसर भी. पैसे के पीछे भागते दर्जन भर मुख्य किरदारों के कमीनेपन और लालच के पीछे यह गीता के न कुछ खोना है, न कुछ पाना है वाले दर्शन की कहानी है. यह मुम्बई की कहानी है मगर लाइफ इन ए मेट्रो नहीं है. महानगरों के असल संकट में फँसे लोग पत्नियाँ बदलने वाले अमीर एग्ज़ीक्यूटिव नहीं हैं और न ही व्यभिचार असली समस्या है. असली संकट मौत का वह भय है जो यशपाल शर्मा बख़ूबी जी गए हैं. असली संकट ख़ूबसूरत और अमीर चेहरों के पीछे छिपी वीभत्स क्रूरता है, जिससे बचने के लिए बहुत सारे भावुक गरीब भी चोर और हत्यारे हो गए हैं.

गौरव सोलंकी    

जो तैरे धारों के विपरीत

वे दलित परिवार में पैदा हुए थे इसलिए कदम-कदम पर सामाजिक तिरस्कार और तमाम दूसरी मुश्किलें उनकी नियति थी. बावजूद इसके उन्होंने हौसला नहीं खोया और कामयाब हुए. निशा सूजन का आलेख, सहयोग संजना

जिस अमेरिका के बारे में आज ये कहा जाता है कि वहां सबके लिए अवसर हैं उसी अमेरिका के नस्लभेदी इतिहास में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जब लंबे समय तक अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के लोग खुद को अश्वेतों से अलग जताने की कोशिश करते रहे ताकि वे अवसरों और अधिकारों से वंचित न रह जाएं. न्यूयॉर्क टाइम्स  के प्रसिद्ध साहित्य समालोचक एनातोली ब्रोयार्ड इनमें सबसे चर्चित नाम हैं जो आखिरी समय तक अपनी अश्वेत पारिवारिक पृष्ठभूमि से इनकार करते रहे. उनका ये व्यवहार कई किताबों, लेखों, फिलीप रॉथ के उपन्यास द ह्यूमन स्टेंस, जिस पर 2003 में इसी नाम की फिल्म भी आई, की प्रेरणा बना. 1979 में एक लेख में ब्रोयार्ड ने अपने दोहरे जीवन के पीछे छिपी पीड़ा को बयां करते हुए लिखा, ‘मुझे लगता था कि लोग हमें घूरते हैं. मेरा चेहरा लाल हो जाता था.

तीन दशक बाद दुनिया के एक दूसरे हिस्से भारत की राजधानी दिल्ली में रहने वाले 34 वर्षीय वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुमित बौद्ध अपने एक लेख में लिखते हैं कि किस तरह उन्होंने नेशनल लॉ स्कूल में अपनी दलित पहचान को छिपाने से इनकार कर दिया. उनके शब्द हैं, ‘मेरे मां-बाप ने कभी मुझे ये बात नहीं बताई थी. दलित होने की वजह से हुए कड़े अनुभवों और अपमान के चलते उन्हें शायद लगा कि मुझे ये नहीं बताना बेहतर होगा. उन्होंने एक नकली जाति निंबेकर रख ली ताकि मैं ऊंची जाति का हिंदू लगूं. यहां तक कि उन्होंने कभी मेरे लिए अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र बनवाने की भी कोशिश नहीं की जिससे शिक्षा और रोजगार में काफी मदद मिलती है. इसलिए स्कूल और कॉलेज के दौरान मैं एक तरह से छिपा हुआ दलित रहा. मैंने अपनी वास्तविक पहचान 18 साल की उम्र में जाहिर की.

सुमित उन अनगितन नौजवानों में से एक हैं जो दलित होने की वजह से रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली मुश्किलों और अपमानों के बावजूद अपनी पहचान पर डटे हैं. उन्होंने अपने अधिकार लड़कर हासिल किए हैं. चुनावी राजनीति और आरक्षण पर बहस के इतर वे खुशी और ऊर्जा के साथ उस राह पर आगे बढ़ रहे हैं जो दूसरे नौजवान दलितों को भी सफलता की प्रेरणा दे सके. वे उन लोगों में से एक हैं जो दलित पहचान के लिए प्रोत्साहन हैं.

ये ऐसे ही कुछ दलितों की कहानियां हैं.

जातिगत भेदभाव सबसे पहले मुंबई के एक कॉरपोरेट ऑफिस में झेलना पड़ा

यवतमाल के खेतों से मुंबई में एक शानदार फ्लैट तक का सफर तय करने वाले आनंद तेलतुंबड़े नौजवान दलितों में आत्मविश्वास की कमी से चिंतित हैं.

आनंद तेलतुंबड़े ने जब खैरलांजी हत्याकांड के बारे में सुना तो उस वक्त वे चीन में थे. जब वे लौटे तो ये देखकर उन्हें बेहद झटका लगा कि मीडिया ने कुछ ही दिन में इस मुद्दे पर खामोशी ओढ़ ली थी. आनंद यवतमाल जिले के एक गांव के रहने वाले थे जो खैरलांजी से ज्यादा दूर नहीं था. अब भले ही वे मुंबई के नेपियन सी रोड जैसे संभ्रांत इलाके में रहते हों मगर सफलता इस विद्रोही बच्चे को जरा भी नहीं बदल पाई है जो जो क्रांतिकारी भगत सिंह के विचार पढ़कर बड़ा हुआ है.

आनंद को एक ऐसे बुद्धिजीवी के तौर पर जाना जाता है जो दलित आंदोलन को लेकर जरा भी झुकने को तैयार नहीं. खैरलांजी : अ स्ट्रेंज एंड बिटर क्रॉप नामक किताब से उनकी निडर सोच लोगों के सामने आई. कठोर स्वर में आनंद कहते हैं, ‘मैंने इसे इसलिए लिखा कि इसने सरकार, मीडिया, समाज और खुद दलित आंदोलन की भूमिका की तहें खोलीं. नहीं तो इसकी क्रूरता के बावजूद खैरलांजी में कुछ भी अनोखा नहीं है. ऐसी घटनाएं रोज होती रहती हैं. ये हमारी व्यवस्था का हिस्सा हैं.

आनंद के माता-पिता अनपढ़ थे. उनकी आय का स्रोत था चूना फैक्टरियों और खेतों में मजदूरी का काम. आठ भाई-बहनों में आनंद सबसे बड़े हैं. शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री ली, फिर आईआईएम अहमदाबाद गए और इसके बाद मैनेजमेंट में पीएचडी किया. वे कहते हैं, ‘जब मैं बड़ा हो रहा था तो दलित शब्द का मतलब एक तरह की श्रेष्ठता और गर्व की भावना होता था. ये विडंबना है कि पहली बार जातिगत भेदभाव का सामना मुझे मुंबई के एक कॉरपोरेट ऑफिस में करना पड़ा.

आनंद नौजवान दलितों के बारे में काफी चिंतित हैं जो असफलता और आत्मविश्वास की कमी का शिकार हैं. वे कहते हैं, ‘अंबेडकर के नेतृत्व ने दलितों में आत्मस्वाभिमान जगाया. मगर अंबेडकर के बाद क्या हुआ? बिखरते, नोटों के लिए बिकते और आरक्षण को रामबाण की तरह पेश करते हमारे नेता आखिर नौजवानों में गर्व और आत्मस्वाभिमान की भावना कैसे जगा सकते हैं?’

लाचारी से कलाकारी तक

बादल नाजुंड़ास्वामी से जब भी कहा गया कि वे कोई काम नहीं कर सकते तो उन्होंने कहने वाले को गलत साबित किया

30 साल के बादल नांजुड़ास्वामी की जिंदगी में एक चीज की निरंतरता रही है. जब भी किसी ने उन्हें खारिज किया उन्होंने सफलता हासिल कर दिखाई. 20 साल की उम्र में उनसे कहा गया कि वे मैसूर के स्थानीय आर्ट्स कॉलेज में नहीं पढ़ सकते क्योंकि ट्यूशन फीस सहित कई दूसरे खर्चे उनके लिए बहुत महंगे हैं. बादल ने 2000 रुपये में एक बीड़ी की दुकान खरीदी और इसमें साइनबोर्ड पेटिंग का काम खोल लिया. इससे होने वाली आमदनी से उन्होंने कालेज की पढ़ाई का खर्चा चलाया.

25 साल की उम्र में उन्हें बताया गया कि वे कितनी भी कोशिश कर पढ़ाई में गोल्ड मेडल हासिल नहीं कर सकते. कॉलेज के एक लेक्चरर ने इसकी वजह बताते हुए उनसे कहा कि वे ब्राह्मण नहीं हैं और यज्ञोपवीत न पहनने वाले के गोल्ड मेडल जीतने की संभावना न के बराबर होती है. बादल ने इस चुनौती को स्वीकार किया और दो गोल्ड मेडल्स जीते. कॉलेज के 27 साल के इतिहास में ये उपलब्धि हासिल करने वाले वह अकेले दलित थे. दो साल बाद ही ओगिल्वी एंड मैदर ने उन्हें अपने बंगलुरु ऑफिस में विजुअलाइजर के पद की पेशकश की. अपने कॉलेज से इस जानी-मानी एड एजेंसी में नौकरी पाने वाले वे सिर्फ तीसरे छात्र थे.

अपने बचपन के बारे में बात करते हुए बादल बताते हैं, ‘मैं मैसूर के कुकरेहल्ली स्थित एक साधारण सरकारी स्कूल में पढ़ा. वहां लोग आपके इलाके का नाम सुनते ही समझ जाते थे कि आप दलित हैं. ब्राह्मण और ऊंची जातियों के लोग हमसे कुछ फासले पर रहा करते थे. हालांकि अलग-अलग जातियों के मेरे कई दोस्त थे मगर भेदभाव हमेशा दिख जाता था.

मगर जाति व्यवस्था के खिलाफ बादल का विरोध सिर्फ निजी अनुभव से नहीं उपजा. नाराजगी जताते हुए वे कहते हैं, ‘ये सुनकर बहुत पीड़ा होती है कि देश में आज भी दलितों को जिंदा जलाया जा रहा है. उतनी ही पीड़ा ऐसे अमीर दलितों को देखकर भी होती है जो समुदाय से पीठ मोड़े हुए रहते हैं.

बातचीत के दौरान बादल की आवाज में हर जगह सच भी झलकता है और पीड़ा भी. कई मुद्दों पर उनका साफ नजरिया देखकर हैरत होती है. आज भी उनके दोस्तों में अलग-अलग जातियों के लोग हैं और उनकी पत्नी दलित नहीं हैं. उनकी नजर में अंबेडकर एक विचारधारा हैं जिसे रोज जीवन में उतारा जाना चाहिए और उनकी महत्ता सिर्फ विशेष मौकों पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण तक सीमित नहीं होनी चाहिए. मायावती उनके लिए सिर्फ इसलिए तारीफ के काबिल हैं कि दलित होने के बावजूद वे इतने बड़े मुकाम तक पहुंचीं. इसके अलावा बादल को उनमें कोई और विशेषता नजर नहीं आती. वे मानते हैं कि भेदभाव से लड़ने का सिर्फ एक ही तरीका है और वह है हर क्षेत्र में घुस कर और डटे रहकर शीर्ष तक पहुंचना.

आखिर में क्या कहना चाहेंगे, इस सवाल के जवाब में बादल कहते हैं, ‘अंबेडकर के बाद हमें एक भी दलित नेता नहीं मिला. हमें ऐसे नेताओं की जरूरत है जो लोगों को आपस में जोड़ने का काम करें. 

मारपीट नहीं मार्गदर्शन है हल

कभी अपनी जाति जाहिर न करने वाले अनूप कुमार आज दलित छात्रों को अपनी पहचान पर गर्व करने के लिए प्रोत्साहन देते हैं

अनूप कुमार ने जिस साल इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया उसी साल मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में आईं थीं. पहले ही दिन फिजिक्स के लेक्चरर ने एससी/एसटी कोटे के तहत दाखिला पाने वाले छात्रों को खबरदार कर दिया. उनके शब्द थे, ‘बेहतर होगा कि वे मेहनत कर लें क्योंकि उनकी कॉपियां मैंने जांचनी हैं, मायावती ने नहीं.

तब तक अनूप को थोड़ा-बहुत अंदाजा हो चुका था कि दलित होने का मतलब क्या होता है. धोबी समुदाय से ताल्लुक रखने और लखीमपुर खीरी के रहने वाले उनके पिता अपनी पीढ़ी के पहले ऐसे व्यक्ति जिन्हें हिंदी, संस्कृत और उर्दू में महारत हासिल थी. मगर तमाम गुणों के बावजूद उन्हें 70 के दशक में खंड विकास अधिकारी या बीडीओ के पद से इस्तीफा देना पड़ा. गांववाले उन्हें अछूत मानकर पानी तक पीने को नहीं देते थे और वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी विद्रोही और खरी जबान नहीं भाती थी.

हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए जब अनूप लखनऊ के एक स्कूल में भर्ती हुए तो उन्हें पता था कि उन्हें क्या करना है. उन्होंने खुद को राजपूत बताना शुरू किया. मगर नकलीपन ओढ़ते ही उन्हें ये भी अहसास हो गया कि इसकी कोई सीमा नहीं है. अब उन्हें नकली गोत्र जैसी और भी चीजों को याद रखना था.

कानपुर में कॉलेज में दाखिला लेते वक्त तक अनूप को पता चल चुका था कि पढ़ाई में उनके अब तक के शानदार रिकॉर्ड के बावजूद लेक्चरर ये जताने से नहीं चूकने वाले कि वे उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं करते. उनके भीतर का विरोध अब बाहर आने लगा. सेकेंड ईयर में उन्होंने दलित फ्रेशर्स के लिए एक वेलकम पार्टी कॉलेज से सात किलोमीटर दूर आयोजित करवाई क्योंकि वे कॉलेज में जातिगत आधार पर काम करने का आरोप नहीं झेलना चाहते थे. थर्ड ईयर तक आते-आते अनूप का नाम कॉलेज कैंपस में मारपीट के लिए जाना जाने लगा था. उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि वे अक्सर बदमाश टाइप लोगों के साथ नजर आएं ताकि कोई दलित छात्रों के साथ रैगिंग के नाम पर बदतमीजी न कर सके. उसी साल उनके एक दोस्त को ऊंची जाति के कुछ छात्रों ने इतना पीटा कि पेट और आंखों में गंभीर चोटों के साथ उसे अस्पताल पहुंचाया गया. हर किसी ने इसके लिए ये कहते हुए अनूप को जिम्मेदार ठहराया कि उन्होंने कैंपस में एक ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें दलितों को लगता है कि वे अपनी पहचान पर डटे रह सकते हैं.

इसके कुछ ही हफ्ते बाद अनूप के सामने ही एक प्रोफेसर किसी दलित छात्र की खिंचाई कर रहे थे. सालों का उबलता गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने प्रोफेसर की पिटाई कर दी. कानूनी पचड़ों के डर से कॉलेज ने अनूप को निकाला तो नहीं मगर उन्होंने अपने पिता से कह दिया, ‘अगर आपने मुझसे यहां रुकने को कहा तो या तो मैं किसी को मार दूंगा या कोई मुझे मार देगा.दुखी पिता और तीन भाई, जिन्होंने उनकी पढ़ाई पर काफी पैसा लगाया था उन्हें घर ले आए.

एक दशक बाद 32 साल के अनूप अब पीएचडी करने की सोच रहे हैं. जीवंतता से किसी चीज का वर्णन उनकी खासियत है. वे उनसे नफरत नहीं करते जिन्होंने उन्हें परेशान किया और कहते हैं कि दोष उनका नहीं सामाजिक व्यवस्था का है. दलित छात्रों के लिए पिछले पांच साल से वे इनसाइट यंग वॉयसेज के नाम से एक पत्रिका निकाल रहे हैं जो देश के 50 विश्वविद्यालयों में छोटी ही सही पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है. नेशनल दलित स्टूडेंट्स फोरम बनाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही.

इंजीनियरिंग कालेज के बुरे अनुभव से हिल चुके अनूप ने घर के पास एक आर्ट्स कालेज में दाखिला लिया और बहुत अच्छे अंक हासिल किए. उन्होंने सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा पास की. इसके बाद वे मास्टर डिग्री के लिए दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय आ गए. वे कहते हैं, ‘यहां आकर मुझे बड़ी हैरत हुई क्यों कि यहां दलित पहचान को लेकर काफी खुलापन था.अनूप पक्का इरादा करके आए थे कि यहां किसी पचड़े में नहीं पड़ेंगे. मगर सबसे पहले ही जिस व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई वह दलित कार्यकर्ता था. हंसते हुए वे कहते हैं, ‘साला, उसने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी.

कुछ समय तक अनूप जेएनयू के राजनीतिक हलकों में सक्रिय रहे. उन्होंने अंबेडकर और ज्योतिबा फुले की किताबें पढ़ीं और इस दौरान खूब आंसू बहाए. उनकी मुलाकात एक नौजवान दलित छात्रा से हुई जिसका ऊंची जाति से ताल्लुक रखने वाले उसके प्रेमी ने शोषण किया था. उन्हें लगा कि विचारधारा तो ठीक है मगर दलित छात्रों की कुछ और जरूरतें हैं जिन पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है. उन्होंने अपने कमरे को लाइब्रेरी में बदल दिया और अंग्रेजी और कंप्यूटर की कक्षाएं आयोजित करने लगे. सिविल सेवा के सपनों को तिलांजलि दे दी गई. अनूप के घरवाले नाराज हो गए. उनका कहना था कि एक नौजवान दलित अपने समुदाय के लिए एक निवेश की तरह होता है. उसने खूब मेहनत करनी चाहिए और एक दलित लड़की से ही शादी करनी चाहिए. ये बताते हुए अनूप उस असहजता को हल्का करने की कोशिश करते लगते हैं जो उनके समुदाय में उनकी सामाजिक सक्रियता और गैर दलित गर्लफ्रेंड को लेकर है.

अनूप का नजरिया साफ है. वे कहते हैं, ‘उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दलितों के लिए कदम-कदम पर खतरे हैं. वे वहां तक पहुंचने के लिए खूब मेहनत करते हैं मगर वहां पहुंचने के बाद उनका आत्मविश्वास चकनाचूर हो जाता है. डिग्री पाने के बाद वे नहीं चाहते कि उन्हें कभी भी फिर से दलित के रूप में पहचाना जाए.अनूप और उनके दोस्त ऐसे छात्रों को भरोसा दिलाते हैं कि वे दलित होने में गर्व का दावा कर सकते हैं और यह भी कि उनके कंधों पर अपने जैसे दूसरे छात्रों को प्रेरणा देने की भी जिम्मेदारी है.

अनूप के मुताबिक ये बहुत जटिल काम है खासकर ये देखते हुए कि समुदायों में गर्व की भावना इतिहास से जुड़ी होती है. वे कहते हैं, ‘हमारे पास न कोई राजा हैं और न योद्धा. हमारा इतिहास बस शोषण का इतिहास है. हम अपने नौजवानों के लिए प्रेरणास्रोत कहां से लाएं? हमारी मांग कोटा नहीं दलित लेक्चरर हैं. हम चाहते हैं कि कैंपस में कोई ऐसा हो जो नौजवान दलित छात्रों की खुद से उम्मीदों को बढ़ा सके.

एक दशक पहले कैंपस में एक घटना के दौरान गुस्से में उबलते हुए वे चिल्लाए थे कि वे मायावती के पास जाएंगे. आज बसपा के बारे में पूछने पर अनूप कहते हैं, ‘मायावती के पास एक राजनीतिक भविष्य है मगर बसपा का राजनैतिक कार्य पूरा हो चुका है. अब हम बसपा के बाद वाले दौर में हैं. जब मीडिया मुझसे भ्रष्टाचार या प्रतिमाओं पर टिप्पणी के लिए कहता है तो वह ये नहीं समझता कि मायावती को वोट देना मेरे लिए अपना राजनैतिक हक जताना है. मैं उन्हें वोट देता हूं क्योंकि मैं ऐसा कर सकता हूं.

कई वार, पर आत्मविश्वास बरकरार

उनके सांवले रंग को देखकर भले ही मकान मालिक उन्हें मकान किराए पर देने से इनकार कर देते हों मगर सेंथारिल ऐसी घटनाओं से हिम्मत नहीं हारतीं

अपने नाम का अर्थ बताते सेंथारिल मुस्करा देती हैं. इसका मतलब होता है लाल अंकुर. यह एक क्रांतिकारी तमिल नाम है.पेशे से पत्रकार 26 साल की सेंथारिल बंगलुरू में रहती हैं और एक राष्ट्रीय अखबार के लिए काम करती हैं. लोग उनसे कहते थे कि वे इस पेशे के लिहाज से बेहद शर्मीली हैं. ये सुनकर उन्हें गुस्सा आता था और इसीलिए उन्होंने अपना विषय पत्रकारिता चुना. स्कूल और कॉलेज के दौरान सेंथारिल और उनके भाई, दोनों पढ़ाई में तेज छात्र रहे. उनके पिता अपनी पीढ़ी के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने रूढियों की बेड़ियों के आगे झुकने से इनकार करते हुए गांव छोड़ दिया था. दरअसल गांव में ऊंची जाति के लोगों का बोलबाला था जो ये तक नहीं देख सकते थे कि जब वे चल रहे हों तो रास्ते में किसी दलित की परछाई भी पड़ जाए. हालांकि पीएचडी का सपना संजोए चेन्नई आने पर भी सेंथारिल के पिता को तब निराशा का सामना करना पड़ा जब कोई भी प्रोफेसर उनका गाइड बनने के लिए तैयार नहीं हुआ. उन्होंने ठान ली कि उनके बच्चे कभी आरक्षण का फायदा नहीं उठाएंगे. मगर बेहतरीन वकील होने पर भी उनके बेटे को भी एक ऐसा वरिष्ठ वकील नहीं मिला जो उसे मार्गदर्शन दे सके.

सेंथारिल के माता-पिता ने आखिरकार कर्नाटक में बसने का फैसला किया. यहां उनके पिता को लेक्चरर की नौकरी मिल गई. हाल ही में उनके परिवार में ये सुनकर रोमांच का माहौल था कि केंद्र सरकार उस याचिका पर विचार कर रही है जिसमें मांग की गई है कि अंबेडकर जयंती को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाया जाए. इस याचिका में सेंथारिल के पिता की भी भूमिका थी. बातचीत के दौरान सेंथारिल कुछ समय पहले हुई एक घटना के बारे में बताते हुए हुए कहती हैं, ‘हमारे एक दोस्त ने हमारे लिए एक घर खोजा और मकान मालिक इसे किराए पर देने के लिए राजी हो गए. अगले दिन जब उन्होंने हमें यानी काले रंग के किरायेदारों को देखा तो उन्होंने घर देने से इनकार कर दिया.सेंथारिल कहती हैं कि वे कई दलित लड़कियों को जानती हैं जिनकी जिंदगी हर समय पहचान खुल जाने के डर के बीच गुजरती है. वे कहती हैं, ‘आप किसी के साथ काम करते हैं और सब ठीक चलता है. फिर एक दिन आपको घर पर बुलाया जाता है और आप हर समय ये सोचकर घबराते रहते हैं कि कहीं अगर आपने किचन में किसी चीज को छू लिया तो अगला कहीं नाराज न हो जाए.

सेंथारिल के माता-पिता ने बचपन से उन्हें ये बात सिखाई है कि दूसरे दलित नौजवानों की हरसंभव मदद करना उनका कर्तव्य है. वे कहती हैं, ‘जब आप दूसरों से बात करते हैं तो आपको अहसास होता है कि ये सब झेलने वाले आप अकेले नहीं हैं. इस तरह आप खुद में आत्मविश्वास पैदा करते हैं.

मुक्ति की राह पर

कवियत्री और अनुवादक मीना कंदासामी का लेखन पहचान के प्रति तमाम पूर्वाग्रहों से उनके संघर्ष को दर्शाता है

विषयों का उत्तेजक होना मीना कंदस्वामी की कविताओं की विशेषता है लेकिन जब यह युवा लेखिका अपनी कविताओं का पाठ करती है तब उसके व्यक्तित्व का अनूठापन और अनुभवों की कड़वाहट भी माहौल में एक अलग तरह का आवेश पैदा करती है. मीना का पहला कविता संग्रह टचजब प्रकाशित हुआ था तो वे 23 साल की थीं. अपनी कविताओं के विषय पर वे कहती हैं, ‘प्यार और उसकी राजनीति मेरी कविताओं को समृद्ध करती है. अक्सर जातिगत अत्याचार की जड़ में अतंरजातीय प्रेम संबंध होते हैं.इंटरनेट की लती 25 वर्षीय मीना की पहली कहानी द स्यूसाइड्स इनबॉक्स दो महिलाओं के पारस्परिक संबंधों पर आधारित है.

प्रोफेसर माता-पिता की संतान मीना ने अपनी पढ़ाई प्राइवेट माध्यम से की. वे कहती हैं, ‘मुझे पता था कि यदि मेरी दलित पहचान को लेकर कॉलेज में कोई टिप्पणी की जाएगी तो मैं शांत नहीं बैठूंगी, ये वक्त की बर्बादी ही साबित होता.हर तरह के दमन के खिलाफ अपने बगावती तेवरों को मीना अपनी दलित पहचान से जोड़कर देखती हैं. तमिलनाडु जिसने नंदानार (तमिल संत जिनके बारे में कहा जाता है कि शिव पूजा करने कारण उनकी हत्या कर दी गई थी.) के समय से ही कई बड़े दलित आंदोलन देखे हैंमें रहने के अपने अनुभव पर मीना कहती हैं, ‘ यहां भेदभाव शिष्टाचार की खाल ओढ़े होता है. मैं यह बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रही लेकिन मैं ब्राह्मण हूं या नहीं ये जानने के लिए दिन में कम से कम एक बार तो मुझसे पूछ ही लिया जाता है कि मैं शाकाहारी हूं या मांसाहारी?’

मीडिया में दलित हस्तियों की खबरों पर बारीक नजर रखने वाली यह कवियत्री कहती हैं, ‘लोग चर्चा करते हैं कि दलितों से दुर्गंध आती है लेकिन जब कोई दलित चुनाव में खड़ा होता है तो कहते हैं कि फलां-फलां दलित बहुत महंगा पफ्र्यूम लगाता है.मीना के पास उदार वाम विचारधारा वाले लोगों सें संबंधित भी कुछ मजेदार बातें हैं वे बताती हैं, ‘ हमारी सेक्सुअल फ्रीडमको लोग बहुत उत्तेजक मानते है, उन्हें लगता है कि हम बंधनमुक्त होते हैं. एक बार जब मैं वाम विचार धारा वाले एक राष्ट्रीय अखबार के संपादक  से मिली तो उन्होंने अपने किसी साथी को यह पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी की क्या मैं असल में दलित हूं? क्योंकि मैं अच्छी अंग्रेजी बोल रही थी.मीना कहती हैं कि अनुवाद के काम के दौरान और पीएचडी लिखते समय उन्हें हर दिन भाषायी पूर्वाग्रहों से जूझना पड़ता है. अपने ब्लॉग पर स्थानीय राजनीति के बारे में लिखने वाली मीना फिलहाल एक उपन्यास लिख रही हैं. यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने अपने लिए इसी तरह की जिंदगी का सपना देखा था, उनका जवाब होता है, ‘मैं अपने लिए कई दूसरी तरह की जिंदगियों के बारे में सोचा करती हूं.’ 

तकनीकी और शहरीकरण से असली बदलाव आएगा

उपन्यासकार अजय नवरिया दलित सशक्तिकरण के लिए सांस्कृतिक क्रांति की भूमिका महत्वपूर्ण मानते हैं

अजय नावरिया जामिया मिलिया इस्लामिया में सहायक प्राध्यापक हैं और शायद देश में पहले दलित शिक्षक होंगे जो किसी विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र पढ़ाते हैं. 37 साल के उभरते हुए चर्चित हिंदी साहित्यकार नावरिया शहरीकरण और तकनीकी को असल मुक्तिदाता मानते हैं और इस विश्वास की छाप उनके साहित्य में भी दिखती है. वे कहते हैं, ‘बचपन में मैं दिल्ली के एक दलित मोहल्ले में रहता था. आज यदि आपके पास एक मोबाइल फोन है, एक मोटरसाइकल है और आप जींस पहनते हैं तो आपको देखकर कोई यह नहीं बता सकता कि आप कौन सी जाति से ताल्लुक रखते हैं.

निम्नवर्गीय परिवार में जन्मे नावरिया बचपन से ही विनम्र विद्रोही थे और चीजों को जांचने परखने में उनकी बेहद रुचि थी. 12 साल की उम्र में जब उन्हें स्कूल में छात्रवृत्ति मिली तो ये उन्हें आहत करने वाला अनुभव था. वे इसकी शिकायत करने सीधे स्कूल के प्रिसिंपल के पास चले गए क्योंकि यह छात्रवृत्ति उनकी बेहतरी के लिए तो थी लेकिन इसकी वजह से उन्हें अपनी कक्षा में खड़ा होना पड़ा और सबके सामने वे दलित छात्र के रूप में पहचाने गए.

नावरिया उन दलित लेखकों में से एक हैं जिनके लेखन में उनके पीछे छूट गए गांव की याद नहीं झलकती. उनकी कोशिश होती है अपने साहित्य में चरित्रों को जातिहीन दिखाया जाए. हालांकि उनके साहित्य में हाशिए पर पड़े वंचित लोगों को जगह देने की भी मजबूत कोशिश होती है और वे मानते हैं कि दलित साहित्य ऐसे ही मुद्दों के बारे में होना चाहिए.

कई गैरदलित स्त्रियों से अपने संबंधों के बारे में बताते हुए नावरिया कहते हैं कि इस दौरान वे हमेशा अपनी पहचान को लेकर सचेत रहते थे. उन्हें कई बार ये भी लगता था कि कहीं ये आकर्षण इसलिए तो नहीं कि सामने वाली महिला ऊंचे समुदाय से ताल्लुक रखती है.

वर्तमान दौर के दलित नेताओं से नावरिया निराश दिखते हैं. वे कहते हैं, ‘हमें उन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है जो हमारी संस्कृति का केंद्रीय तत्व हैं उदाहरण के लिए लैंगिक आधार पर भेदभाव न होना, हमारे भगवान और पुजारी की जरूरत महसूस किए बिना ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण. इसके अलावा मेरा यह भी मानना है दलित संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एक सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत है.नावरिया मानते हैं कि सभ्यता की तरक्की को आवश्यकता नहीं बल्कि सौंदर्यबोध गति देता है.

पहचान का संकट

मोहन कुमार का कहना है कि उनके आसपास के लोग उन्हें कभी भी ये भूलने नहीं देंगे कि वे दलित हैं

पेशे से वकील मोहन कुमार तीन बातों पर यकीन रखते हैं. पहली यह कि जातिगत पहचान मायने रखती है क्योंकि यह वास्तविकता है और इससे हर दिन जूझना पड़ता है. वे कहते हैं, ‘शायद मैं अपनी जाति भूल भी जाऊं लेकिन मेरे आसपास जो लोग हैं वे यह बात कभी नहीं भूलेंगे.

दूसरी बात यह कि भले ही धर्मातरण से जातिगत भेदभाव दूर न होता हो फिर भी दलितों को बौद्ध धर्म अपना लेना चाहिए. मोहन कहते हैं,‘दक्षिणपंथी हिंदुत्व ताकतें बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म में मिलाना चाहती हैं और इससे लड़ने के लिए दलितों का बौद्ध बनना अनिवार्य है.तीसरी और अंतिम बात यह कि बहुजन समाज पार्टी आज वक्त की जरूरत है और वर्तमान दौर में दलितों के पास अपनी बात रखने के लिए इससे अलग कोई विकल्प नहीं है. हालांकि बसपा के प्रति मोहन का ये आग्रह स्वभाविक है क्योंकि वे बहुजन समाज पार्टी की कर्नाटक राज्य इकाई के सदस्य हैं.

डाक विभाग में काम करने वाले मोहन के पिता ने स्कूल और कॉलेज के दिनों में हमेशा उनका उत्साह बढ़ाया. मोहन हमेशा बेहद आत्मविश्वासी, लोकप्रिय और अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी रहे. लेकिन एमबीए के दौरान साथी छात्रों ने दलित पहचान को लेकर उनका मजाक उड़ाया. उन घटनाओं को याद करते हुए मोहन कुमार कहते हैं, ‘तब अचानक ही मुझे एहसास हुआ कि मैं दलित हूं.

एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब रोजगार कार्यालय के एक अधिकारी ने उन्हें बताया कि निजी क्षेत्र की ज्यादातर कंपनियां ब्राह्मण या ऊंची जातियों के उम्मीदवारों को तरजीह देती हैं, ‘मैं ये सोचता था कि योग्यता ही मतलब की चीज है न कि जाति इसलिए फॉर्म में मैंने जाति वाला कालम खाली छोड़ दिया. जब मेरी जाति जानने के लिए उस अधिकारी ने मुझे वापस फोन किया तो ये मेरे लिए सबसे बड़ा झटका था.मोहन कुमार बताते हैं.

हालांकि मोहन हिम्मत नहीं हारे. इस घटना के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और आज वे कर्नाटक उच्च न्यायालय में वकील हैं. आज उनके पास पैसा भी है और सम्मान भी. मोहन कहते हैं, ‘अब कॉलेजों में दलित विद्यार्थियों की संख्या अच्छी खासी बढ़ गई है, फिर भी उनके साथ भेदभाव बदस्तूर जारी है. जहां तक मेरी बात है तो मैंने कानून की पढ़ाई इसलिए की है ताकि जातिवादी दमन के खिलाफ लड़ाई के लिए मैं बेहतर तरीके से तैयार रहूं.अपने विचारों के बारे में स्पष्ट रुख रखने वाले मोहन का मानना है कि उनकी लड़ाई में कानून और बसपा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी.   

 

हिंदुत्व की हार, हिंदू धर्म की जीत

16 मई के बाद से भाजपा के भीतर एक के बाद एक पैदा होते संकट और चुनावी हार में हिंदुत्व की भूमिका पर पार्टी में चल रही बहस को पार्टी या हिंदुत्व के बिखर जाने का संकेत मानना समझदारी नहीं होगी पर ये जरूर कहा जा सकता है कि फिलहाल हिंदुत्व के विचार को भारत ने नकार दिया है. हिंदुत्व भाजपा के मूल में रहा है और ये तय था कि इस पर निर्भरता एक दिन पार्टी के लिए बड़ी समस्या बनने वाली है. आंकड़ों पर नजर डालें तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि विचारधारा के आधार पर भाजपा को वोट देने वाले लोगों का प्रतिशत 10 से ऊपर गया हो. हालांकि हिंदुत्व की परियोजना का आधार खड़ा करने के लिए हिंदुओं में डर और खतरे की भावना उपजाई गई थी. उन्हें बताया गया था कि संख्या के हिसाब से बहुमत होने पर भी उन पर अपने ही देश में अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडरा रहा है.

एक तरह से देखा जाए तो इन चुनावों में हिंदुत्व की हार पश्चिम की भी हार है क्योंकि हिंदुत्व परियोजना भारतीय मानस को औपनिवेशिक पश्चिम से मिला उपहार थी

वैसे हिंदुत्व को अगर कोई पार्टी अपनी विचारधारा बनाती है तो भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए ये बुरा नहीं है. अगर समाज का एक अच्छा-खासा हिस्सा हिंदुत्व या माओवाद या फिर अनियंत्रित पूंजीवाद में यकीन रखता है तो जरूरी है कि इसका प्रतिनिधित्व राजनीतिक रूप से हो ताकि इनसे सामान्य राजनीति के जरिए ही निपटा जा सके. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी का जुड़ाव ईसाई कट्टरपंथियों से है. रिपब्लिकन्स चुनावों से पहले ऐसे तत्वों को जम कर लुभाते हैं मगर चुनावों के बाद इन्हें अप्रत्यक्ष रूप से कुछ छोटे-मोटे फायदे तो पहुंचाए जाते हैं मगर ऐसा कभी नहीं होता कि उन्हें अपने ऊपर हावी होने दिया जाए. मगर भाजपा ये बात नहीं समझ पायी कि हिंदुत्ववादियों के साथ वह कैसा व्यवहार करे कि वे उसका महज एक हिस्सा भर ही लगें और चुनाव के दौरान किसी होम्योपैथिक दवा की तरह उनका लाभ उठाया जाए. किसी विविधतापूर्ण समाज में कोई दल एक ही विचारधारा पर अपना अस्तित्व टिकाने का जोखिम कैसे उठा सकता है?

दरअसल भारतीय राजनीति में विरोधाभासों से निपटने की कला ही सबसे बड़ी समझदारी है. ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा कि आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी में भी कई ऐसे लोग हुआ करते थे जिन्हें हिंदू महासभा या दूसरे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सदस्यता रखने की भी छूट थी. रविंद्रनाथ टैगोर कांग्रेस के भी सदस्य थे और मुस्लिम लीग के भी. कांग्रेस में अलग-अलग तरह की विचारधाराओं को पार्टी के एक हिस्से के रूप में समाहित कर लिया गया मगर भाजपा की दिक्कत ये है कि इसने मान लिया है कि इसका समूचा अस्तित्व ही हिंदुत्व पर टिका हुआ है. अब हारने के बाद उसे यही बोझ लग रहा है जिसे वह उतार फेंकना चाहती है. पर सच ये है कि इससे भाजपा और हिंदुत्व का संबंध और गोपनीय ही होगा. पार्टी के भीतर बहस करने की जो कोशिश हो रही है वह और कुछ नहीं बल्कि विचारधारा से जुड़ी चुनौती की आड़ में हो रहा शक्ति संघर्ष है.

वैसे ये शक्ति संघर्ष भी अपने आप में एक स्वस्थ गतिविधि है. भाजपा के जनता पार्टी की तरह बिखर जाने की तमाम भविष्यवाणियों के उलट ऐसा होना जरूरी नहीं है. जनता पार्टी कई गुटों का गठबंधन थी जबकि भाजपा कई गुटों में बंटी पार्टी बन गई है. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का दौर अब बीत चुका है और सबसे ऊंची कुर्सियां खाली पड़ी हैं. अगर भाजपा चाहती है कि ये बची और ठीकठाक बनी रहे तो इसे कांग्रेस से सबक सीखना होगा. यानी उसे खुद का नेतृत्व करने के लिए कोई नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह ढूंढना होगा. फिलहाल उसके सभी बडे नेता जरूरत से कुछ ज्यादा ही आक्रामक हैं.

परंपरा, अराजकता, विविधता, व्यवस्था के बीच में लगातार चल रहे इस संघर्ष के दौरान भाजपा की चुनावी हार संकेत है कि हिंदुत्व, हिंदू धर्म से हार गया है

हो सकता है कि हार का आकलन मुख्य तौर पर हिंदुत्व के नजरिये से करके भाजपा दूरदर्शिता का परिचय न दे रही हो मगर इसकी हार हिंदुत्व की हार का संकेत तो देती ही है. हिंदुत्व की परियोजना 150 साल पुरानी है और शुरुआत से ही इसका हिंदू संस्कृति से टकराव होता रहा है. ये टकराव 19वीं शताब्दी के मध्य में तब शुरू हुआ था जब हिंदू सुधारवादी आंदोलनों के साथ हिंदुत्व का विचार भी जन्म लेने लगा था. ये आंदोलन आधुनिकता की वकालत करते थे और इन्होंने अपने ज्यादातर तत्व साम्राज्यवादी पश्चिम से ग्रहण किए थे. इनसे जो हिंदुत्व उभरा उसे एक औपनिवेशिक उत्पाद कहा जा सकता है. इसीलिए गांधी मानते थे कि ये सुधारवादी आंदोलन दीर्घावधि में फायदे से ज्यादा हिंदू धर्म का नुकसान ही करेंगे. एक तरह से देखा जाए तो इन चुनावों में हिंदुत्व की हार पश्चिम की भी हार है क्योंकि हिंदुत्व परियोजना भारतीय मानस को औपनिवेशिक पश्चिम से मिला उपहार थी.

हिंदुत्व क्या है इसे लेकर आज हिंदुत्व की आलोचना और बचाव करने वाले दोनों असमंजस में हैं. कइयों को ये कड़वा लग सकता है मगर सच यही है कि हिंदुत्व का विचार पश्चिमी यूरोपीय राज्य व्यवस्था के प्रति सराहना के भाव और अपने यहां इसका देसी स्वरूप लागू करने की कोशिश से उभरा था. जब हिंदुत्व शब्द की रचना करने वाले वीर सावरकर ने ये बात कही कि हिंदुओं को वेद और उपनिषद की बजाय विज्ञान, तकनीक और पश्चिमी राजनैतिक विचारों का अध्ययन करना चाहिए तो उनके दिमाग में यही बात थी. वे ऐसा रास्ता तलाश रहे थे जिसके जरिए विविधता से भरे हुए इस अराजक और अव्यवस्थित समाज को पश्चिमी तौर-तरीकों वाला एक रोबदार देश बनाया जा सके, कुछ-कुछ बिस्मार्क के जर्मनी जैसा.

इसके लिए भारतीयों का अपनी भारतीयता और हिंदुओं का अपनी मूलभूत विशेषता छोड़ना जरूरी था. यहां ये जानना दिलचस्प है कि पश्चिमी संदर्भ में देखा जाए तो कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाले सावरकर निजी जिंदगी में नास्तिक थे. उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से न हो. उन्होंने अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार भी हिंदू रीति से नहीं किया था.

गांधी समझते थे कि भारत में आधुनिक राष्ट्र का अपना अलग संस्करण रचने की क्षमता है और इसे राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के पीछे भागने की कोई जरूरत नहीं है

सावरकर गांधी के आलोचक थे. उनका कहना था कि गांधी अवैज्ञानिक और आधुनिक राजनीति के मामले में अनजान हैं. वे गलत थे. गांधी को राजनीति की गहरी समझ थी और उन्होंने भारतीय समाज ही नहीं बल्कि तमाम विरोध के बावजूद पश्चिमी संस्कृति से भी काफी तत्व ग्रहण किए थे. गांधी आधुनिक राष्ट्र या राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की पारंपरिक धारणाओं में यकीन नहीं रखते थे. उन्होंने कहा भी था कि सशस्त्र राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद से अलग नहीं है. इतिहास के उस दौर में उन्हें रूमानी सोच रखने वाला समझ गया मगर सच ये है कि वे अपने वक्त से काफी आगे चल रहे थे. गांधी समझते थे कि भारत में आधुनिक राष्ट्र का अपना अलग संस्करण रचने की क्षमता है और इसे राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के पीछे भागने की कोई जरूरत नहीं है. विंडंबना देखिए कि आज कई पश्चिमी देश उस पुराने मॉडल से दूर जा रहे हैं. यूरोप के 14 देश अब कोई सेना नहीं रखते और यूरोपीय संघ बनाने के लिए सबने अपनी सीमाएं खोल दी हैं. मगर चीन और भारत राष्ट्र की 19वीं सदी की अवधारणा के विशुद्ध प्रतीक बन चुके हैं.

हिंदुत्व परियोजना यही थी यानी हिंदू धर्म में पश्चिमी राजनीतिक अवधारणा का मेल. शुरुआत में सावरकर का यकीन एक एकीकृत धर्मनिरेपक्ष राष्ट्र में था. इस मायने में सावरकर के हिंदुत्व जैसी बात पहले बंगाल के स्वतंत्रता संगाम सेनानी भूदेव मुखोपाध्याय और उससे भी पहले टैगोर के मित्र ब्रह्मोबांधव उपाध्याय कर चुके थे. उपाध्याय एक ईसाई थे जो खुद को हिंदू ईसाई कहा करते थे. विवेकानंद ने भी कहा था कि एक आदर्श भारतीय वह है जिसके पास एक हिंदू मस्तिष्क और मुस्लिम शरीर हो. मगर फिर सावरकर को लगा कि केवल भौगौलिक आधार ही राष्ट्रवाद की मजबूत भावना के लिए काफी नहीं है और उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में सोचना शुरू किया. मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों के लिए नफरत सावरकर के ही दिमाग की उपज थी जो हिंदुत्व के पहले के संस्करणों में लगभग न के बराबर थी.

इस चुनाव में हार के बाद भाजपा को लगता है कि इसका आधार मध्यवर्ग इससे इसलिए दूर हो गया क्योंकि उसका हिंदुत्व से मोहभंग हो चुका था. शायद ये पूरी तरह से सही नहीं है. भारतीय मध्य वर्ग का हिंदुत्व के कम कठोर पहलुओं से स्वाभाविक जुड़ाव रहा है. दरअसल हिंदू सुधारवादी आंदोलन हिंदू धर्म का एक ऐसा नया स्वरूप उभारने की कोशिश कर रहे थे जो राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के बिल्कुल अनुरूप था. कई मायनों में सभी भारतीय धर्म सुधारक धर्म के एक ऐसे पहलू को विकसित करने की कोशिश कर रहे थे जिससे जुड़ना पूरे भारत के लिए सहज हो. ये सब मध्यवर्ग को आसानी से समझ में आता है जो एक आधुनिक देश में भी रहना चाहता है और साथ ही अपने हिंदू धर्म को भी सुरक्षित रखना चाहता है. अपने उपन्यास कालापानी में सावरकर भविष्य के उस भारत के बारे में लिखते हैं जो पूरी तरह से एक जैसा समाज होगा. जहां जाति, संप्रदाय और भाषा से ऊपर उठकर कोई भी किसी से विवाह कर सकेगा. जहां लोगों का वेश भी एक जैसा होगा और भाषा भी. जहां संगीत, सिनेमा, कपड़ों के मामले में सब एक जैसा व्यवहार करेंगे.

हमारा समाज समझौतों की इस कला से ही जीवित रह सकता है. जिस पल हम किसी चीज के लिए लचीलापन छोड़कर कठोर हो जाएंगे, ये व्यवस्था ढहने लगेगी

ये देश की वैसी ही परिकल्पना है जिसके दर्शन आज भारत के महानगरों में होते हैं. इस नजर से देखा जाए तो सावरकर भविष्यदृष्टा लगते हैं. क्योंकि उन्होंने तब जो बातें कहीं थी वही आज के शहरी मध्य वर्ग में दिखती हैं. एक ऐसा वर्ग जिसकी वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था तक पहुंच है, जो अंग्रेजी में बात करता है और एक जैसे मीडिया के संपर्क में आकर अपना स्वरूप ग्रहण करता है. अगर आप शहरों में पले-बढ़े किसी तमिल, मलयाली या बंगाली बच्चे के नजरिये से देखें तो उसके लिए हिंदू धर्म थोड़ा ओणम है, थोड़ा दीवाली और थोड़ा दुर्गापूजा. ये हिंदू धर्म का नया स्वरूप है जिसे धारण करना आसान है. हिंदुत्व कभी भी भारतीय चेतना के केंद्र में नहीं आ सकता क्योंकि इसे 4000 साल पुराने हिंदू धर्म से अपने आप ही चुनौती मिलती रहती है.

परंपरा, अराजकता, विविधता, व्यवस्था के बीच में लगातार चल रहे इस संघर्ष के दौरान भाजपा की चुनावी हार संकेत है कि हिंदुत्व, हिंदू धर्म से हार गया है. हिंदुत्व, भारतीयों से राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के मुताबिक रहने की उम्मीद करता है. मगर हम भारतीय हैं-जिद्दी और न सुधरने वाले. हम सदियों से विरोधाभासों के बीच जी रहे हैं और हमने ये कला सीख ली है. हमने अराजकता और गलत परिभाषित विचारों के साथ जीना भी सीख लिया है. हम दूसरी पीढ़ी के लिए विकल्प भी खुले रखना चाहते हैं. इन्हीं खासियतों की वजह से हमारी हस्ती कायम रह पाई है जबकि कई सभ्यताएं मिट गईं. यही वे खासियतें हैं जिन्हें भाजपा को अपनी सोच में शामिल करना होगा और इनके प्रति जवाबदेह बनना होगा.

एक बार मैंने महात्मा गांधी की हत्या में शामिल मदनलाल पाहवा का इंटरव्यू लिया था. तब उसकी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी थी. इस कट्टर हिंदू की सबसे यादगार स्मृतियां पाकिस्तान में बिताए गए अपने बचपन के दिनों की थीं जहां बाबा फरीद की मजार थी, जहां एक धार्मिक मेला लगता था और कव्वालियां गाईं जाती थीं. यह बताता है कि हम भारतीय कई तरह से जीने के आदी हैं. इस आदमी की जबान कट्टर हिंदुत्व वाली थी मगर उसकी स्मृतियां अलग तरह की थीं.

इन बातों का मतलब ये नहीं है कि हिंदुत्व खत्म हो जाएगा. असल में जब तक यह खुद को बदलता नहीं तब तक ये वह ताकत हासिल नहीं कर सकता जो इसके पास बीते दशक में रही. इसकी प्रवृत्ति आम भारतीय को असहज करती है और इसलिए इसे भारतीयता और पारंपरिक हिंदू धर्म के हाथों हार का सामना करना पड़ा है. औपनिवेशिक काल से बाहर निकल कर उभरी पीढ़ी के दिल में पश्चिमी चीजों के प्रति आकर्षण और आदर था. मगर आज की पीढ़ी के लिए स्थितियां कुछ अलग हैं. भारतीय अब अपनी ताल में वापस आ चुके हैं इसलिए मध्यवर्ग में भी ज्यादातर के लिए मनमोहन का ‘पश्चिम’-इस विचार के साथ कि कोई भी टाटा या अंबानी हो सकता है-सावरकर के ‘पश्चिम’ से ज्यादा आकर्षक है. एक वैश्विक भौतिक पहचान की महत्वाकांक्षा ने सांस्कृतिक पहचान की महत्वाकांक्षा को पीछे छोड़ दिया है. अब जब कि हिंदुत्व की चुनावी हार हो चुकी है, ये देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा किस रास्ते पर आगे बढ़ती है.

कई मायनों में आडवाणी एक त्रासद व्यक्तित्व हैं. वाजपेयी के उलट वे एक ऐसी जगह पले-बढ़े जहां हिंदू अल्पसंख्यक थे. ईसाई मिशनरी स्कूल में पढ़े इस शख्स के लिए मुसलमान अनजान नहीं थे और शायद वे उनसे वह असहजता महसूस नहीं करते थे जो किसी मराठी ब्राह्मण को महसूस होती थी. मगर इस बात की भी मजबूत संभावना है कि संघ का हिस्सा रहे आडवाणी ने कुछ मायनों में ये भी मान लिया था कि हिंदुत्व सबकी भागीदारी वाली विचारधारा के बजाय एक राजनैतिक हथियार है. राम जन्मभूमि आंदोलन उन्होंने ही खड़ा किया था और इस संबंध में उन्हें कई सवालों के जवाब भी देने हैं मगर जिन्ना पर बयान के बाद उनकी पार्टी की प्रतिक्रिया उनकी त्रासदी को बयां करती है. जिन्ना के बारे में उन्होंने जो कहा उसमें कुछ भी नया नहीं था. ऐसा लगता है कि किसी ने भी इस बात को नहीं समझ. यह बताता है कि हमारी राजनीतिक संस्कृति कहां पहुंच गई है. ये भी काफी अजीब है कि व्यक्तित्व में अपार अंतर के बावजूद जिन्ना भी ऐसे व्यक्ति थे जो सावरकर की तरह पश्चिमी सोच से काफी प्रभावित थे. विचारधारा के मामले में दोनों एक जैसे थे. आडवाणी ने जब जिन्ना को सेकुलर कहा तो वे सिर्फ इस बात को ही स्वीकार कर रहे थे. पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री एक हिंदू थे और इसका पहला राष्ट्रीय गान जिन्ना के अनुरोध पर एक हिंदू ने ही लिखा था.

आडवाणी ने खुद को वाजपेयी जैसा दिखाने की कोशिश की मगर वे अपने अतीत से पीछा नहीं छुड़ा पाए. साथ ही वे खुद को एक ऐसे विचारक के रूप में पेश नहीं कर पाए जिसे एक हीरो के सांचे में ढाला जा सके. इससे भाजपा के सामने खड़ी गुत्थी और भी जटिल हो जाती है. काफी हद तक लगता है कि नरेंद्र मोदी भी अपना शिखर छू चुके हों. इस चुनाव से पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता अब ढलान पर है. समस्या ये है कि उन्होंने अपने बचने के लिए कोई रास्ते नहीं छोड़े. उन्होंने गुजरात में 2002 में हुए दंगों पर न तो ऊपरी तौर पर ही सही पर माफी मांगी और न ही कोई खेद प्रकट किया. संभावना है कि ये प्रकरण उनके पूरे राजनीतिक जीवन पर काला साया बनकर मंडराता रहेगा. इसलिए सही नेता की खोज भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है. एक ऐसा नेता जो सबको आपस में जोड़ सके और उस गर्मागर्मी को कम कर सके जिसे पार्टी के साथ जोड़कर देखा जाने लगा है. सवाल ये भी है कि अगर भाजपा हिंदुत्व को छोड़ती है तो इसकी दक्षिणपंथी राजनीति का स्वरूप कैसा होगा? भारत के ज्यादातर लोग अब भी अभावों में जी रहे हैं और भले ही चुनावी फायदे के लिए ही सही पर नीतियां तय करते हुए उनके बारे में सोचा जाना भी जरूरी है.

भाजपा एक अलग तरह की विचारधारा के रास्ते पर चल सकती है. एक ऐसी विचारधारा जिसमें हिंदुत्व की भी एक भूमिका होगी मगर इससे होड़ लेती कुछ दूसरी अवधारणाएं भी होंगी. हिंदुत्व के सहिष्णु न होने की कोई वजह नहीं है. उदाहरण के लिए टैगोर ने अपने उपन्यास गोरा में हिंदुत्व के पक्ष में मजबूत तर्क दिए हैं. वाजपेयी हिंदुत्व को एक अस्पष्ट से ढांचे की तरह मानते थे. इसमें कोई समस्या नहीं थी. बल्कि भारतीय संदर्भ में ये शायद जरूरी भी था. नवाज शरीफ ने एक बार वाजपेयी से कहा भी था कि मुस्लिम लीग और भाजपा का हिस्सा होने के नाते वे भारत-पाक संबंधों में एक नई शुरुआत करने के लिए सबसे मुफीद हैं क्योंकि तब कोई उन पर कमजोर उदारवादी होने का आरोप नहीं लगा सकता.

सबसे बड़ी बात ये है कि हिंदू दक्षिणपंथी विचारधारा को राजनैतिक धारा में समाहित किया जाना जरूरी है. उन्हें न खत्म किया जा सकता है और न दूर भगाया जा सकता है. चारू मजूमदार और उनके संगठन का प. बंगाल में पुलिसिया दमन कर दिया गया था. मगर 30 साल में ही नक्सल समस्या पलट कर और भी शक्ति के साथ वापस आ गई है. इसलिए हल ये नहीं है कि उन्हें खारिज कर दिया जाए. उन्हें राजनीतिक रूप से उनकी जगह देकर उन पर काबू करना होगा.

भाजपा धारा 370 हटाने और समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग करती रही है. यूरोपीय शैली के एक आधुनिक राष्ट्र में ये वैध मांगें हैं. पर हमें इस रास्ते पर ही क्यों जाना चाहिए? क्यों न धारा 370 को और भी ज्यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल करें. आखिर सिक्किम का विलय करने की बजाय हमने इसे धारा 370 क्यों नहीं दी. हमने नागालैंड और मणिपुर में ये धारा क्यों नहीं लगाई जहां 30 साल की हिंसा ने एक पूरी पीढ़ी के मन में कड़वाहट भर दी है. अगर चिंता ये है कि ये एक सीमावर्ती राज्य है तो हम इसमें संशोधन कर धारा 370ए बना सकते थे. जिसमें कम या ज्यादा अधिकार और फिर से बातचीत के लिए प्रावधान होते. इससे भारत कई मसलों को आसानी से हल कर सकता.

जैसा कि गांधी ने कहा था कि हम एक राज्य की अवधारणा का अपना संस्करण गढ़ने में सक्षम हैं. अब देखिए अपने आप ही हमने कुछ नई चीजें उपजा ली हैं. इसका एक उदाहरण है भारतीय धर्मनिरपेक्षता. धर्मनिरपेक्षतावादी और संप्रदायवादी दोनों ही इस मामले में समझौता किए जाने की शिकायत करते हैं. मगर हमारा समाज समझौतों की इस कला से ही जीवित रह सकता है. जिस पल हम किसी चीज के लिए लचीलापन छोड़कर कठोर हो जाएंगे, ये व्यवस्था ढहने लगेगी.

वर्तमान उठापटक भाजपा और संघ दोनों के लिए एक रचनात्मक पल साबित हो सकती है. अपने पूर्ववर्तियों के उलट मोहनराव भागवत बड़े विचारक नहीं हैं. उनसे किसी को कोई उम्मीद नहीं इसलिए उनके पास ये सही मायने में कुछ रचनात्मक करके खुद को साबित करने का अवसर है.

रंगभेद के रंग और भी हैं

श्रीकांत वर्मा की एक कविता है, ‘न्यूयार्क के सबवे में / नीग्रो पिट रहा है / उसे पिटना ही था / वह नीग्रो था / मियामी की रेत पर नीग्रो पिट रहा है / उसे पिटना ही था / उसने ललचाई आंखों से देखा था जेन को /जो गोरी थी / लास वेगास में नीग्रो पिट रहा है / उसे पिटना ही था / वह जुए में जीता था / कैलीफोर्निया में नीग्रो पिट रहा है / उसे पिटना ही था / उसने उत्तर दिया था, मैं नीग्रो हूं.’

ऑस्ट्रेलिया के रंगभेद पर विलाप करते मीडिया को क्या दिल्ली विश्वविद्यालय पर नजर डालने की फुरसत नहीं निकालनी चाहिए?

ऑस्ट्रेलिया में पिट रहे भारतीय छात्रों की खबर देते मीडिया को यह कविता क्यों याद आनी चाहिए? न भारतीय नीग्रो हैं, न ऑस्ट्रेलिया अमेरिका है और न ही आज 40-50 साल पुराना वह वक्त है, जब वर्मा ने यह कविता लिखी होगी. लेकिन याद आती तो रंगभेद और नस्लवाद के इस प्रश्न को वह कुछ भारतीय छात्रों के साथ हुए इकलौते अन्याय की इकहरी और व्याख्याओं तक सीमित करने से बचता और उसे एक ज्यादा व्यापक मानवीय संदर्भ में और ऐतिहासिक रूप से साम्राज्यवादी परिघटना के विस्तार की तरह देख पाता.

क्योंकि तब उन्हें वह महात्मा भी याद आता जिसे करीब एक सौ बीस साल पहले दक्षिण अफ्रीका में एक रात ट्रेन से फेंक दिया गया था. महात्मा गांधी ने तब रंगभेद के विरुद्ध जो ऐतिहासिक संघर्ष किया, अगर उसकी स्मृति बची होती तो ऑस्ट्रेलिया गए भारतीय छात्र खुद को इतना कातर महसूस नहीं करते.

लेकिन क्यों किसी को कोई कवि, कोई महात्मा याद आए. इन सबसे मुक्त होकर ही तो भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया पढ़ने गए हैं. इक्कीसवीं सदी पर भारतीय या एशियाई मेधा की छाप की आत्ममुग्ध घोषणाएं करते इस मीडिया को भी ऐसे संघर्ष पुराने जमाने की चीज लगते हैं. गांधी को वह संदेह से देखता है और गांधीवादियों को उपहास के साथ. अंबेडकर को वह हिकारत से देखता है और अंबेडकरवादियों को डर और गुस्से में सनी नफरत से.

मुश्किल तब होती है जब यह वर्ग इन सबको पीछे छोड़ अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया के नए आसमानों की उड़ान भरता है और पाता है कि यह जमीन उसे बराबरी पर पांव रखने नहीं दे रही. वह उनके साथ खड़ा होना चाहता है तो पिटता है, पढ़ने में उनसे बेहतर साबित होता है तो पिटता है. और जब वह पिटता है तो मीडिया बताता है कि देखो, ऑस्ट्रेलिया में कितना रंगभेद है.

ऑस्ट्रेलिया में रंगभेद है, यह वहां के मंत्री-संतरी भी मान चुके हैं. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री तक यह बात स्वीकार कर चुके हैं. वहां ऐसे शोध और सर्वे चल रहे हैं जिनसे ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के मन को ठीक से समझ जा सके. यानी ऑस्ट्रेलिया एक तरह से आत्मनिरीक्षण की कोशिश में है. लेकिन क्या हमें भी आत्मनिरीक्षण की जरूरत नहीं है?

ऑस्ट्रेलिया के रंगभेद पर विलाप करते मीडिया को क्या दिल्ली विश्वविद्यालय पर नजर डालने की फुरसत नहीं निकालनी चाहिए? जो एक लाख बच्चे ऑस्ट्रेलिया पढ़ने गए हैं, उनमें से बहुत सारे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र रहे होंगे. क्या उन्हें याद है कि वे और उनके साथी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले पूर्वोत्तर के छात्रों को किन संज्ञाओं और विशेषणों से नवाजते रहे हैं? या घुंघराले बालों और चमकती आंखों वाले नाइजीरियाई और केन्याई छात्रों से किस तरह पेश आते रहे हैं? या रंगभेद को भूल जाएं. जितनी तरह के भेदभावों में भारतीय समाज भरोसा करता है, उन्हें याद करते हुए क्या हमें यह नैतिक अधिकार भी बनता है कि हम ऑस्ट्रेलियाई समाज के रंगभेदी चरित्र पर कोई टिप्पणी कर सकें? दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और स्त्रियों के साथ अपना व्यवहार देखें तो क्या हम किसी दूसरे के व्यवहार पर उंगली उठा सकते हैं? क्षेत्र और भाषा को लेकर जैसे अहंकार और हिंसक रवैये का हम प्रदर्शन करते हैं, क्या उसका कोई जवाब है?

यह आत्मपीड़क प्रश्नाकुलता यह साबित करने के लिए नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया में पिट रहे भारतीय छात्र इसी सलूक के हकदार हैं, बस यह याद दिलाने के लिए है कि वहां गोरे रंग के गुमान में इतराती जो हिंसक और क्रूर प्रवृत्ति भारतीय छात्रों के साथ बदतमीजी कर रही है, उसके विरुद्ध असली संघर्ष सिर्फ मेलबर्न और सिडनी की सड़कों पर नहीं, दिल्ली और लखनऊ के चौराहों पर भी करना होगा.

लेकिन यह देखने-समझने के लिए मीडिया को अपनी अतिरंजित और इकहरी टीवी-दृष्टि के पार जाना होगा, पहचानना होगा कि ऑस्ट्रेलिया हो या भारत, नस्लभेद हो या जातिभेद-इन प्रवृत्तियों के विरुद्ध लड़ाई के लिए एक व्यापक संघर्ष की जरूरत है, ऐसे गैरजरूरी और भड़काऊ विलाप की नहीं, जो ऑस्ट्रेलिया गए भारतीय छात्रों को कहीं ज्यादा असुरक्षित, अकेला और वेध्य बनाता है.

लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं 

 

कार्रवाई तो करनी पड़ेगी

अखबार का काम भ्रष्टाचार से लड़ना है. अगर वही भ्रष्टाचार में इस तरह शामिल हो जाएंगे तो लोकतंत्र में प्रेस की उपयोगिता और विश्वसनीयता क्या रह जाएगी? आलेख प्रभाष जोशी

प्रेस परिषद और चुनाव आयोग के पास प्रेस के खिलाफ इतनी और ऐसी शिकायतें पहले कभी नहीं आई थीं जितनी अप्रैल मई में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान और बाद में आईं. ज्यादातर शिकायतें पैसा लेकर उम्मीदवारों के विज्ञापनों को खबरों के रूप में छापने और पाठकों को यह न बताने के बारे में थीं कि वे खबरें नहीं उम्मीदवारों की प्रचार सामग्री है. ऐसा कर के उम्मीदवार काले धन से इतना और ऐसा कवरेज पा गए जैसा प्रेस में उन्हें कभी मिल नहीं सकता था. फिर यह धन चुनाव के उनके खर्च में भी नहीं जुड़ता क्योंकि न तो उम्मीदवारों ने रसीद मांगी न अखबारों ने दी. यह काले धन से हुआ धंधा था जिसका हिसाब-किताब किसी को रखना नहीं था.

वे बड़ी बेशर्मी से कहते हैं कि हम तो व्यवसाय कर रहे हैं और मुनाफा कमाना हमारा सहज व्यावसायिक अधिकार है. हम लोकतंत्र और समाजसेवा के पुनीत कार्य में नहीं हैं

अखबारों ने बाकायदा पैकेज बनाए थे और रेट कार्ड छापे थे. पैकेज में चुनाव कवरेज के सभी क्षेत्र कवर किए गए थे. फोटू से लेकर इंटरव्यू और अपील तक के अलग-अलग साइज के अलग-अलग दाम तय किए थे. जिनने ये पैकेज खरीदे उन्हीं की खबरें छपीं. जिनने नहीं खरीदे वे अखबारों के पेजों से गायब रहे. उनने शिकायत की तो कोई सुनवाई नहीं हुई. उनसे साफ कह दिया गया कि आप पैसे नहीं देंगे तो खबरें नहीं छपेंगी. ज्यादातर उम्मीदवार दूसरे प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की खबरें देख कर दबाव में आ गए. उनने मतदान नजदीक आते देख कर पैकेज खरीदे और वे अखबारों में अचानक जीतने लगे. कुछ साहसी और दृढ़ निश्चयी उम्मीदवार फिर भी डटे रहे और अखबारों के इस काले धंधे के खिलाफ उनने चुनाव प्रचार में जम कर और खुला अभियान चलाया.

सबसे मजेदार उदाहरण उत्तर प्रदेश में दैनिक जागरण का है. उनके एक मालिक नरेन्द्र मोहन को भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में पहुंचाया था. एक और मालिक महेन्द्र मोहन को समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा में भेजा. भारतीय जनता पार्टी के लखनऊ के उम्मीदवार लाल जी टंडन के जागरण से पुराने और नजदीकी संबंध थे. लेकिन उनसे भी जागरण ने पैकेज खरीदने की मांग की. भाजपा के नेता और मंत्री रहते हुए लाल जी टंडन ने जागरण की बहुत सेवा की थी और वे सहज ही उम्मीद कर रहे थे कि यह अखबार उनका कवरेज करेगा. लेकिन टंडन जी को भी जब बिना पैसे के कवरेज नहीं मिला तो उनने जागरण के खिलाफ सार्वजनिक स्टेंड लिया. प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा कि मैं अखिलेश दास और जागरण दोनों के खिलाफ लड़ रहा हूं. अखबार का काम समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना है. अगर वही भ्रष्टाचार में इस तरह शामिल हो जाएगा तो लोकतंत्र में प्रेस की उपयोगिता और विश्वसनीयता क्या रह जाएगी? लाल जी टंडन को जागरण हरा नहीं सका और अखिलेश दास को जिता नहीं सका.

समाजवादी पार्टी के मोहन सिंह देवरिया से चुनाव लड़े. उनसे भी जागरण ने पैकेज खरीदने को कहा. उनने भरी सभाओं में पूछा कि इस अखबार के एक मालिक को हमने राज्यसभा भेजा. वे बताएं कि उन्हें वहां भेजने के हमने कितने रुपए लिए? जब हमने उनसे पैसे नहीं लिए तो हमारी खबरें छापने के पैसे वे क्यों मांग रहे हैं? मोहन सिंह आप जानते हैं कि संघर्षशील समाजवादी नेता हैं. उनने बिना किसी लाग लपेट के जागरण के खिलाफ अभियान चलाया. लेकिन जागरण ने न उनके अभियान की खबरें छापीं न चुनाव की क्योंकि उनने पैकेज नहीं लिया तो नहीं लिया. वे बसपा के उम्मीदवार से हार गए. उनने सब तरफ शिकायतें कीं लेकिन उनको दुख है कि जिन-जिन संवैधानिक संस्थाओं को इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए थी उनने नहीं की.

भारत में ही नहीं दुनिया में कहीं भी पाठक विज्ञापन के लिए नहीं खबरों के लिए अखबार खरीदता और पढ़ता है. इसलिए खबर की जगह, अखबार और पाठक के बीच विश्वास की जगह पवित्र जगह मानी जाती है

अब इन दो पार्टियों के इन दो उम्मीदवारों का उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि ये मानते थे कि जागरण पर हमारा कुछ अहसान है और यह अखबार ज्यादा नहीं तो हमारा रुटीन कवरेज तो करेगा ही. लेकिन इनको भी जागरण ने बिना पैसे दिए कवरेज नहीं दिया. ऐसा हिंदी इलाके के ही नहीं देश भर के लगभग सभी अखबारों ने किया. लेकिन जागरण का नाम मैं इसलिए ले रहा हूं कि एक ओर उसके विरुद्ध जिम्मेदार नेता सार्वजनिक अभियान चला रहे थे और दूसरी ओर यह अखबार अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी को इस बुरी तरह बेचते हुए मतदाता जन जागरण अभियान चला रहा था. जागरण की भूमिका इसलिए उल्लेखनीय है कि एक तरफ तो आप चुनाव की असली और सच्ची खबरें पैसे लेकर न छापें और दूसरी तरफ जिस मतदाता को खुद आपने ही गुमराह किया है उसके जागरण का अभियान चलाएं. पत्रकारिता के नाम पर इस पाखंड को जागरूक समाज कैसे चलने दे सकता है? सच है कि सब अखबारों ने यह काला धंधा किया है. और उन्हें इस बात की कोई शर्म नहीं है कि चुनाव जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अनुष्ठान के दौरान उनने अपने पाठक/वोटर को सच्ची जानकारी और सुविचारित राय देने के अपने बुनियादी धर्म और जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया. वे बड़ी बेशर्मी से कहते हैं कि हम तो व्यवसाय कर रहे हैं और मुनाफा कमाना हमारा सहज व्यावसायिक अधिकार है. हम लोकतंत्र और समाजसेवा के पुनीत कार्य में नहीं हैं. हम व्यवसाय में हैं. जब लोकतंत्र के कर्ता हमारे नेता और हमारी पार्टियां चुनाव में धन बल, बाहुबल और सत्ता बल का इस्तेमाल करने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं तो हम क्या स्वर्ग से उतरे देवदूत हैं जो चुनाव के समय अपना पत्रकारीय धर्म और जिम्मेदारी निभाएं? चुनाव में धड़ल्ले से काला धन इस्तेमाल करने में अगर हमारे नेताओं और पार्टियों को लोकतंत्र की लाज नहीं आती तो हम तो लोकतंत्र के उनसे छोटे खिलाड़ी और शेयरधारक हैं. जिस काले धन में देश के सब नेताओं और पार्टियों के हाथ हैं उनसे हमें क्यों एतराज होना चाहिए. अगर नेता यह काला धन देकर खबरें छपवाना चाहते हैं तो हम क्यों हरिश्चंद्र के बेटे बनें.

यानी यह साफ है कि अखबार अपने को पत्रकारिता करने वाले लोकहित के रक्षक मानने के बजाए खबरों का व्यापार करने वाले व्यवसायी अधिक मानते हैं. व्यवसाय में लाभ के लिए अगर उन्हें पत्रकारिता से समझौता करना पड़े तो वे मजे में करेंगे क्योंकि जिस समाज में नेता सदाचार और नैतिकता की मिसाल नहीं दे सकते वहां अखबार कैसे आदर्शो के प्रतिमान हो सकते हैं? समाज अगर भ्रष्ट है तो अखबार भी भ्रष्ट होंगे. कोई कानून नहीं है कि जो अखबारों को जिम्मेदार पत्रकारिता करने को मजबूर कर सके. उम्मीदवार कहते हैं कि चुनाव आयोग ने जनता तक पहुंचने के सस्ते साधन और चुनाव प्रचार के आसान तरीकों पर पाबंदियां लगा दी हैं इसलिए उन्हें अखबारों में खबर की जगह खरीदने को मजबूर होना पड़ता है. यानी उम्मीदवार काले पैसे से खबरें छपवाने को मजबूर हैं और अखबार चारों तरफ मची हुई लूट में अपना हिस्सा पाने के लिए खबरों की जगह बेचने में कोई खराबी नहीं समझते.

अब किसी भी तरह से चुनाव जीतने को उतारू उम्मीदवार और पैसा कमाने के लिए पत्रकारिता की फिकर न करने वाले अखबार ही अपने देश के सभ्य लोकतांत्रिक समाज के कारक नहीं हैं. उनकी दलीलें और करतूतें समझी जा सकती हैं लेकिन उन्हें सदाचार के रूप में स्वीकार तो नहीं किया जा सकता, कोई भी सभ्य समाज नहीं करेगा. भारत में ही नहीं दुनिया में कहीं भी पाठक विज्ञापन के लिए नहीं खबरों के लिए अखबार खरीदता और पढ़ता है. इसलिए खबर की जगह, अखबार और पाठक के बीच विश्वास की जगह पवित्र जगह मानी जाती है. यह विश्वास खत्म होगा तो अखबार और पत्रकारिता भी खत्म हो जाएगी.

इसी तरह चुनाव में अगर खर्च की कोई सीमा और आचार संहिता नहीं रहेगी तो चुनाव पैसे का खेल हो जाएगा और उससे चलने वाला लोकतंत्र पूंजीतंत्र हो जाएगा. तब हम कैसे कहेंगे कि लोकतंत्र में वोटर/नागरिक राजा है क्योंकि तब तो जिसके पास जितना ज्यादा धन होगा वह उतने ही ज्यादा वोटों से जीतेगा और लोकतंत्र को धनपति चलाएंगे. यह स्थिति तो किसी भी खुले पूंजीवादी समाज में मान्य नहीं है. चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और बाहरी असर से मुक्त हों तभी वे सच्चे और अच्छे लोकतंत्र के काम के हैं.

इसलिए भारतीय प्रेस परिषद चुनाव में प्रेस की भूमिका पर बहुत चिंतित है. अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन रे मानते हैं कि इस चलन को पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनों के हित में रोकना पड़ेगा और उपयुक्त कानून नहीं हैं तो बनवाने पड़ेंगे. परिषद ने अपने दो सदस्यों को इस मामले में जानकारी जुटाने को कहा है. इसके बाद जांच समिति बैठाई जाएगी और उसकी रपट के आधार पर सरकार से उचित कानून बनाने को कहा जाएगा. चुनाव आयोग के पास भी शिकायतों का ढेर लगा है. वह भी विचार कर रहा है कि किस तरह पैसा देकर पाए गए कवरेज को उम्मीदवार के खर्च में शामिल किया जाए ताकि इस भ्रष्टाचारी तरीके से लोकतंत्र को बचाया जा सके.  

संस्कृति के नाम पर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत बच्चों को मेघालय से कर्नाटक लाया जा रहा है और उन्हें उनकी मूल संस्कृति से काटकर हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई जा रही है. संजना की तहकीकात. सभी फोटो: एस राधाकृष्णा 

कर्नाटक के 35 स्कूलों और मेघालय के चार जिलों में की गई तीन महीने की गहन पड़ताल के दौरान तहलका ने पाया कि साल 2001 से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सोशल इंजीनियरिंग की एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहा है जिसके तहत अब तक मेघालय के कम से कम 1600 बच्चों को कर्नाटक में लाकर उन्हें कन्नड़ और तथाकथित भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाया जा रहा है. मेघालय से लाए जाने वाले इन बच्चों के नवीनतम बैच में कुल 160 बच्चे थे जिन्हें संघ के करीब 30 कार्यकर्ताओं द्वारा सात जून को 50 घंटे का सफर तय करके बंगलुरु लाया गया था.

संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है 

इस परियोजना के मुख्य संचालक संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है. उनका कहना था, ‘संघ ने इलाके में अपने विस्तार और ईसाई मिशनरी समूहों से निपटने के मकसद से एक दीर्घकालिक योजना बनाई है. ये बच्चे इसी का एक हिस्सा हैं. आने वाले समय में ये बच्चे हमारे मूल्यों का अपने परिवार के सदस्यों में प्रसार करेंगे.’ बचपन से ही संघ से जुड़े रहे शेट्टी कर्नाटक के दक्षिण कन्नडा जिले से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने अपने जीवन के तकरीबन आठ वर्ष मेघालय में, वहां की भौगौलिक स्थिति और संस्कृति का अध्ययन करने में बिताए हैं.

अगर मेघालय की बात की जाए तो ये देश के उन गिने-चुने राज्यों में है जहां ईसाई समुदाय कुल जनसंख्या का करीब 70 फीसदी होकर बहुसंख्यक समुदाय की भूमिका में है. बाकी 30 फीसदी में करीब 13 फीसदी हिंदू हैं और 11.5 फीसदी यहां के मूल आदिवासी हैं. सबसे पहली बार ईसाई मिशनरी यहां उन्नीसवीं सदी के मध्य में आए थे. व्यापक स्तर पर धर्मातरण के बावजूद आदिवासियों की एक बड़ी आबादी अभी भी अपने मूल धर्मों से जुड़ी हुई है और इसमें कहीं न कहीं धर्म परिवर्तन करने वालों के प्रति नाराजगी भी है. संघ, आदिवासियों की इसी नाराजगी का फायदा उठाना चाहता है और जैसा कि शेट्टी मानते हैं कि बच्चे और उनकी शिक्षा इसकी शुरुआत है.

बंगलुरु से करीब 500 किलोमीटर दूर उप्पूर में स्थित थिंकबेट्टू हायर प्राइमरी एंड सेकंडरी स्कूल उन 35 स्कूलों में से है जहां इन बच्चों को पढ़ाया जा रहा है. 2008 में छह से सात साल की उम्र के 17 बच्चों को मेघालय से यहां लाया गया था. स्कूल के प्रधानाध्यापक के कहने पर ये बच्चे एक-एक कर खड़े होते हैं और अपना परिचय स्थानीय कन्नड भाषा में देते हैं. मगर अध्यापक महोदय खुद अपना परिचय देने से ये कह कर इनकार कर देते हैं कि ‘आप बच्चों को देखने आए हैं, वे आपके सामने हैं. अगर मैं आपको अपना नाम बताऊंगा तो आप उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल करेंगीं.’ बस इतना पता चल पाता है कि वो एक पूर्व बैंक कर्मचारी हैं और कोने में खड़ी निर्मला नाम की महिला उनकी पत्नी है.

इसके बाद बच्चों से हाल ही में याद किया गया एक श्लोक सुनाने को कहा जाता है. घुटे सिर वाले ये बच्चे अध्यापक के सम्मान में गुरुर्बृह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:.. का पाठ करने लगते हैं. जिस हॉल में ये सब हो रहा है दरअसल वही इनके शयन, अध्ययन और भोजन, तीनों कक्षों का काम करता है. मेघालय के चार जिलों – रिभोई, वेस्ट खासी हिल्स, ईस्ट खासी हिल्स और जंतिया हिल्स से कर्नाटक में संघ से जुड़े विभिन्न स्कूलों में लाए गए ये बच्चे मूलत: खासी और जंतिया आदिवासी समुदायों से संबंध रखते हैं. परंपरागत रूप से खासी आदिवासी सेंग खासी और जंतिया आदिवासी नियाम्त्रे धर्म को मानते हैं.

जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैंमंद्य जिले के बीजी नगर में स्थित श्री आदिचुंचनगिरी हायर प्राइमरी स्कूल के प्रधानाचार्य मंजे गौड़ा कहते हैं, ‘अगर ये बच्चे मेघालय में ही रहते तो ये अब तक तो ईसाई बन चुके होते. संघ इन्हें बचाने का प्रयास कर रहा है. जो शिक्षा बच्चे यहां प्राप्त करते हैं उसमें मजबूत सांस्कृतिक मूल्य स्थापित करना शामिल होता है. जब ये यहां से वापस अपने घर जाएंगे तो इन संस्कारों का अपने परिवारों में प्रसार करेंगे.’ जिन सांस्कृतिक मूल्यों की बात गौड़ा कर रहे हैं उनमें धार्मिक मंत्रोच्चार, हिंदू तीज त्यौहारों का ज्ञान और मांसाहारी भोजन, जो कि मेघालय में अत्यधिक प्रचलित है, से इन बच्चों को दूर रखना शामिल है.

मगर इससे होगा क्या? शेट्टी तहलका को बताते हैं कि छोटी उम्र में भारत के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ाव और अनुशासन तो दरअसल पहला कदम है. ‘यह महत्वपूर्ण है कि ये बच्चे इन मूल्यों को कच्ची उम्र में आत्मसात करें. ये इन्हें हमारे और नजदीक और ईसाइयों की जीवन पद्धति से और दूर ले जाएगा. हम उन्हें श्लोक सिखाते हैं जिससे कि वे ईसाई धर्मगीतों को न गाएं. हम उन्हें मांस से दूर कर देते हैं ताकि वे अपने धर्म में रची-बसी जीव-बलि की परंपरा से घृणा करने लगें’ वे कहते हैं, ‘अंतत: जब संघ उनसे कहेगा कि गाय एक पवित्र जीव है और जो इसे मारकर खाते हैं उनका समाज में कोई स्थान नहीं है तो तो ये बो उसे मानेंगे.’ क्या इन बच्चों को आरएसएस के भावी झंडाबरदारों की भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है, इस सवाल पर शेट्टी केवल इतना कहते हैं कि वे किसी न किसी रूप में ‘परिवार’ का हिस्सा रहेंगे और इस बारे में समय ही बताएगा.

तहलका ने कई स्कूलों का दौरा किया और पाया कि विभिन्न स्कूलों में सिखाये जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों में तो कोई खास फर्क नहीं है मगर आरएसएस की विचारधारा में कोई कितनी गहरी डुबकी लगाएगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि वह बच्चा पढ़ता कौन से स्कूल में है. जो बच्चे मजबूत आर्थिक स्थिति वाले परिवारों से संबंध रखते हैं वे ऐसे स्कूलों में रहते हैं जहां पढ़ने और रहने की समुचित व्यवस्था होती है क्योंकि उनके परिवार इसका खर्च उठाने की स्थिति में होते है. इन अपेक्षाकृत सुविधासंपन्न स्कूलों में अनुशासन उतना कड़ा नहीं होता. मगर उत्तर-पूर्वी राज्य से आए इन बच्चों में से जितनों से हमने मुलाकात की उनमें से करीब 60 फीसदी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले थे जो उप्पूर के थिंकबेट्टू जैसे नाम-मात्र की सुविधाओं और कड़े अनुशासन वाली व्यवस्था में रहते हैं.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है. इनमें से कुछ स्थान हैं पुत्तूर, कल्लाड्का, कॉप, कोल्लुर, उप्पूर, डेरालाकट्टे, दक्षिण कन्नडा में मूदबिद्री और उडुपी और चिकमंगलूर जिले. इनके अलावा बच्चों को प्रभावशाली आश्रमों द्वारा चलाए जा रहे सुत्तूर के जेएसएस मठ, मांड्या के आदिचुंचनगिरी और चित्रगुड़ा के मुरुगराजेंद्र जसे स्कूलों में भी रखा गया है.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है

मगर मेघालय के ये नन्हे-मुन्ने हजारों किलोमीटर दूर कर्नाटक में कैसे आ जाते हैं? इन्हें वहां से लाने का तरीका क्या है? तहलका ने जिस भी बच्चे या उसके माता-पिता से बात की सबका कहना था कि ये सब किये जाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ तुकाराम शेट्टी का है.

आरएसएस से संबद्ध संस्था सेवा भारती के पूर्व कार्यकर्ता शेट्टी जंतिया हिल्स के जोवाई में स्थित ले सिन्शर कल्चरल सोसाइटी के सर्वेसर्वा हैं. हालांकि इस संगठन को तो कोई इसके मुख्यालय से बाहर ही नहीं जानता है किंतु तुकाराम या बह राम – मेघालय में शेट्टी इस नाम से भी जाने जाते हैं – का नाम यहां बच्चा-बच्चा जानता है. साफ है कि संगठन तो आरएसएस से जरूरी दूरी प्रदर्शित करने का जरिया भर है. राजधानी शिलॉंग से लेकर दूरदराज के गांव तक सभी जानते हैं कि बच्चों को कर्नाटक ले जाने वाला असल संगठन संघ ही है. इस संस्था के जंतिया हिल्स जिले में तीन दफ्तर हैं – जोवाई, नरतियांग और शॉंगपॉंग. इसके अलावा सेवा भारती और कल्याण आश्रम जैसे संगठन भी हैं जो बच्चों की पहचान करने और उन्हें कर्नाटक भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

स्थानीय सेंग खासी स्कूल में अध्यापक और कल्याण आश्रम में रहने वाले योलिन खरूमिनी कहते हैं, ‘हमसे उन परिवारों की पहचान करने के लिए कहा जाता है जो ईसाई नहीं बने हैं और जिनका अपने मूल धर्म से काफी जुड़ाव है. साधारणत: ये परिवार ईसाइयों के बारे में अच्छा नहीं सोचते. इनके सामने बच्चों को कर्नाटक में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा जाता है. हम उन्हें हमेशा ये भी बताते हैं कि उनके बच्चों को सेंग खासी या नियाम्त्रे की परंपराओं के मुताबिक ही शिक्षा दी जाएगी.’ खरूमिनी की खुद की भतीजी कर्डमोन खरूमिनी भी कर्नाटक के मंगला नर्सिंग स्कूल में पढ़ती है.

कॉप (जिला उडुपी) के विद्यानिकेतन स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ रही खतबियांग रिम्बाई विस्तार से बताती है कि कैसे 200 बच्चों को विभिन्न गांवों से बंगलुरु लेकर आया गया था. ‘हमें कई समूहों में बांटकर बड़े बच्चों को उनका इंचार्ज बना दिया गया. फिर शिलॉंग से हमें टाटा सूमो में बिठाकर ट्रेन पकड़ने के लिए गुवाहाटी ले जाया गया’ वो कहती है. बंगलुरु में उन्हें विभिन्न स्कूलों में भेजने से पहले आरएसएस के कार्यालय ले जाया गया था.

एक चौंकाने वाली बात तहलका को शिलॉंग के एक संघ कार्यकर्ता प्रफुल्ल कोच और थिकबेट्टू स्कूल के प्रमुख ने ये बतायी कि इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाता है कि एक ही परिवार के दो बच्चों को हमेशा अलग-अलग स्कूलों में भर्ती किया जाए. ‘अगर वे साथ नहीं हैं तो उन्हें अनुशासित करना आसान होता है. अगर हमें उन्हें बदलना है तो उन पर नियंत्रण रखना ही होगा. उनका घर से जितना कम संपर्क रहे उतना ही बढ़िया.’

बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है

तहलका को एक ही परिवार के ऐसे कई बच्चे अलग-अलग स्कूलों में मिले – खतबियांग का भाई सप्लीबियांग रिंबाई केरल के कासरगॉड में स्थित प्रशांति विद्या निकेतन में पढ़ता है जबकि वो कर्नाटक में विद्या निकेतन स्कूल में पढ़ रही है. विद्यानिकेतन के ही एक और छात्र रीन्बॉर्न तेरियांग की बहन मैसूर के जेएसएस मठ स्कूल में पढ़ रही है. मंद्य के अभिनव भारती बॉइज हॉस्टल के बेद सिंपली की बहन विद्यानिकेतन में पढ़ती है. मंद्य जिले के आदिचुंचनगिरी स्कूल में पढ़ने वाले इवानरोई लांगबांग की भी बहन डायमोन्लांकी शिमोगा के वनश्री स्कूल में पढ़ती है. यहां ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें एक ही परिवार के दो या ज्यादा बच्चों को एक साथ पढ़ने दिया जा रहा हो. ऐसा क्यों किया जा रहा है पूछने पर ये बच्चे कुछ बोल ही नहीं पाते.

जब तहलका ने बच्चों के परिवारवालों से पूछा कि वे अपने बच्चों को अलग-अलग क्यों रख रहे हैं तो उनका जवाब था कि इस बारे में उन्हें काफी बाद में जाकर पता लगा. खतबियांग और सप्लीबियांग की बड़ी बहन क्लिस रिंबाई बताती हैं, ‘जब वे गए थे तो हमें बस इतना पता था कि वे बंगलुरु जा रहे हैं. हमें स्कूल के बारे में कुछ पता ही नहीं था. ये तो काफी बाद में हमें पता लगा कि वे अलग कर दिये गए हैं और बंगलुरू में नहीं है. खतबियांग ने हमें ये भी बताया कि वो फिर से कक्षा सात में ही पढ़ रही है.’ जंतिया हिल्स में रहने वाला रिंबाई परिवार काफी समृद्ध है और बच्चों के पिता कोरेन चिरमांग आरएसएस से सहानुभूति रखने वालों में से हैं जिन्होंने अपने बच्चों के अलावा और भी कई बच्चों को कर्नाटक भेजने में अहम भूमिका निभाई है. ‘वे पहले काफी सक्रिय रहा करते थे मगर हाल ही में काफी बीमार होने की वजह से आरएसएस के साथ दूसरे गांवों में नहीं जा पा रहे हैं.’ क्लिस कहती हैं.

अपने भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान और वातावरण से दूर रहने का इन छोटे-छोटे बच्चों पर अलग-अलग तरीके से असर पड़ रहा है. जिन स्कूलों में भी तहलका गया वहां के हॉस्टल वॉर्डन, अध्यापकों और स्वयं बच्चों ने ये स्वीकारा कि मेघालय के उनके गांव और कर्नाटक के उनके स्कूलों की हवा-पानी में काफी अंतर होने की वजह से बच्चों को तरह-तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. चमराजनगर के दीनबंधु चिल्ड्रंस होम के सचिव जीएस जयदेव के मुताबिक मेघालय से आए छ: साल के तीन बच्चों – शाइनिंग लामो, सिबिनरिंगखेल्म और स्पिड खोंगसेइ – के शरीर पर कर्नाटक की भीषण गर्मी की वजह से लंबे समय तक जबर्दस्त चकत्ते रहे. थिंकबेट्टू स्कूल में भी कई बच्चे हमें ऐसे मिले जिनकी त्वचा पर कई महीनों से वहां रहने के बावजूद जलने के निशान साफ देखे जा सकते थे. नागमंगला में आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा चलाए जाने वाले संस्कृत कॉलेज में पढ़ने वाले मेघालय के 11 बच्चों में से सबसे बड़े आयोहिदाहुन रैबोन ने तहलका को बताया कि मेघालय से आने वाले तीन छोटे बच्चे पिछले काफी समय से बीमार चल रहे हैं क्योंकि उन्हें स्कूल में दिया जाने वाला खाना रास नहीं आ रहा है.

इन बच्चों के ऊपर उन्हें अपने घरों से यहां लाए जाने का जबर्दस्त मानसिक प्रभाव भी पड़ रहा है. जिन भी स्कूलों में तहलका जा सका उनमें स्कूल के अधिकारियों ने बच्चों को बुलाकर उन्हें कन्नड में अपना परिचय देने का आदेश दिया. स्कूल के संचालकों के लिए तो ये बड़े गर्व की बात थी कि बाहर से आए ये बच्चे उनकी भाषा को इतने अच्छे तरीके से बोल पा रहे हैं. किंतु बच्चों पर अब तक सीखा सब कुछ भूलने का क्या असर हो रहा है इसकी शायद किसी को कोई परवाह नहीं. विभिन्न स्कूलों के अधिकारियों का दावा है कि मेघालय से आए बच्चे दूसरे बच्चों के साथ अच्छे से घुल-मिल गए हैं मगर सच तो ये है कि ऐसा हो नहीं रहा है. बच्चों से कुछ मिनटों की बातचीत में ही हमें पता लगता है कि कैसे स्थानीय बच्चे उनके अलग तरह के नाम और शक्लों को लेकर उनका मजाक बनाते हैं और इसलिए वे अपने जैसे बच्चों के साथ ही रहना पसंद करते हैं.

हमने एक कक्षा में पाया कि जहां स्थानीय बच्चे एक बेंच पर चार के अनुपात में बैठे हुए थे वहीं मेघालय से आए छ-सात बच्चे एक-दूसरे के साथ बैठने की कोशिश में बस किसी तरह बेंच पर अटके हुए थे. जहां इन बच्चों की संख्या काफी कम है वहां ये अपने में ही गुम रहने लगे हैं. बड़े बच्चों के लिए स्कूल की भौगोलिक स्थिति भी काफी निराश करने वाली है. बंगलुरु से करीब 150 किमी दूर नागमंगला में नवीं कक्षा में पड़ रहा इवानरोई लांगबांग अपनी निराशा कुछ इस तरह व्यक्त करता है, ‘हमें बताया गया था कि में बंगलुरु में पढ़ूंगा. ये तो यहां आने के बाद मुझे पता चला कि ये बंगलुरु से काफी दूर है. यहां हम चाहरदीवारी से बाहर नहीं जा सकते और अगर कभी चले भी जाएं तो उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि बाहर वैसे भी कुछ है ही नहीं.’

इन बच्चों को मेघालय से लाकर पूरी तरह से कन्नड़ भाषी माहौल में डुबो देने का नतीजा छमराजनगर में स्थित दीनबंधु चिल्ड्रन होम में देखा जा सकता है. यहां की केयरटेकर छह साल के एक बच्चे की प्रगति को बयान करते हुए कहती है, ‘सिबिन को यहां रहते हुए अभी दो ही महीने हुए हैं पर उसने काफी कन्नड़ सीख ली है. एक बार उसके घर से फोन आया तो उसने सवालों के जवाब कन्नड़ में देने शुरू कर दिए जो कि जाहिर है कि घरवालों की समझ में बिल्कुल नहीं आई.’ असंवेदनहीना देखिए कि इसके बाद केयरटेकर इतनी जोर से हंसती है जैसे कि यह कोई मजाक की बात हो.

फिर वह कहती है, ‘45 मिनट तक वह महिला जो कि शायद उसकी मां होगी, कोशिश करती रही. सिबिन के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि वह अपनी भाषा भूल गया था.’ इसके बाद वह सिबिन को बताने लगती है कि रात के भोजन को कन्नड़ में क्या कहते हैं.

इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चे जो शारीरिक और मानसिक नुकसान झेल रहे हैं वह सामान्य बोर्डिंग स्कूलों के बच्चों से अलग है. इन बच्चों को यहां लाने के पीछे का उद्देश्य कहीं बड़ा है यह कोच जैसे संघ कार्यकर्ता भी मानते हैं. सवाल उठता है कि इतनी छोटी उम्र के बच्चों को इनके मां-बाप आखिर क्यों इतनी दूर भेज रहे हैं? मेघालय के आठ गांवों की अपनी यात्रा के दौरान तहलका ने पाया कि ऐसे लोगों में से ज्यादातर गरीब हैं जो इस उम्मीद में अपने बच्चों को संघ को सौंप देते हैं कि उनकी देखभाल अच्छी तरह से हो सकेगी. इसका उनसे वादा भी किया जाता है. अक्सर ऐसे बच्चों का कोई बड़ा भाई या बहन पहले ही इस तरह के स्कूलों में पढ़ रहा होता है.

बारीकी से पड़ताल करने पर पता चलता है कि इस समूची प्रक्रिया में झूठ के कई ताने-बाने हैं. इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

मां-बाप ने लिखित रूप में अपनी सहमति दे दी है

जब तहलका ने कर्नाटक के इन स्कूलों का दौरा कर उनसे वे कागजात मांगे जो ये साबित कर सकें कि इन बच्चों का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण कानूनी है तो हमें गांव के मुखिया रैंगबा शनांग द्वारा हस्ताक्षरित पत्र दिखाए गए जिसमें लिखा गया था कि इनके परिवारों की माली हालत बहुत खराब है. इसके साथ ही हमें बच्चों के जन्म और जाति प्रमाणपत्र भी दिखाए गए. मगर किसी भी स्कूल ने कोई ऐसा पत्र नहीं दिखाया जिस पर बच्चे के मां-बाप के दस्तखत हों और जिसमें साफ तौर पर जिक्र हो कि बच्चे को किस स्कूल के सुपुर्द किया जा रहा है. मेघालय में भी तहलका जिन लोगों से मिला उनमें से भी किसी के पास इस तरह के हस्ताक्षरित सहमति पत्र की कॉपी नहीं थी. बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चों की तस्करी जैसा है.

स्कूलों में सेंग खासी और नियाम्त्रे धर्मों की शिक्षा दी जाती है

खासी और जंतिया जनजाति में ईसाई धर्म अपना चुके लोगों और बाकियों के बीच तनातनी रहती है. संघ द्वारा ध्यान से ऐसे बच्चों को चुना जाता है जो गरीब घरों से हैं और अब तक ईसाई नहीं बने हैं. स्वेर गांव की बिए नांगरूम कहती हैं, ‘मुझसे कहा गया कि अपनी बेटी को धर्म परिवर्तन से बचाने का एक ही रास्ता है कि उसे बाहर भेज दो. अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो चर्च मेरे बच्चों को ले जाएगा और उन्हें पादरी और नन बना देगा. मैं बहुत डरी हुई थी इसलिए मैं अपनी बेटी को वहां भेजने के लिए राजी हो गई.’ छह साल बीत चुके हैं मगर बिए को अब भी उस स्कूल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है जहां उसकी बेटी पढ़ रही है. उसके पास कुछ है तो बस बेटी की कक्षा का एक फोटो. वह कहती है, ‘अगर मुझे पता चल भी जाए कि वह कहां है तो मेरे पास उस तक पहुंचने और उसे वापस लाने लायक पैसा नहीं है. पर मैं दूसरे बच्चे को कभी भी वहां नहीं भेजूंगी.’

बिए का टूटा-फूटा घर, जिसमें वह अपनी मां और तीन दूसरे बच्चों के साथ रहती है, उसकी गरीबी की कहानी कह देता है. इससे ये भी संकेत मिलता है कि आखिर क्यों लोग चाहकर भी अपने बच्चों को वापस नहीं ला पाते. दरअसल उनके पास इतना भी पैसा नहीं होता. कई लोगों का तहलका से कहना था कि उनके बच्चे संघ के जिन स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहां उनके धर्म की शिक्षाएं दी जाती हैं. मोखेप गांव के जेल चिरमांग के घर में तहलका को फ्रेम में लगी एक फोटो दिखी. इसमें जेल की बेटी रानी चिरमांग को उसके स्कूल के संरक्षक संत श्री बालगंगाधरनाथ सम्मानित करते हुए नजर आ रहे थे. हमने जेल से पूछा कि भगवा चोले में नजर आ रहे ये संत कौन हैं तो उसका जवाब था कि वे एक सेंग खासी संत हैं जो उस स्कूल को चलाते हैं. उसकी आवाज में जरा भी शंका नहीं थी. बाद में पता चला कि उसका पति डेनिस सिहांगशे संघ का कार्यकर्ता है जिसने माना कि अपनी बेटी का उदाहरण देकर उसने कई दूसरे लोगों को अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने के लिए राजी किया है. डेनिस के शब्दों में ‘लोगों की संघ के बारे में गलत धारणा है. मैं हमेशा उन्हें यही कहता हूं कि संघ उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कृति देगा.’

ज्यादातर मां-बाप इससे अनजान होते हैं कि इन स्कूलों में उनकी संस्कृति के बजाय किसी और ही चीज की घुट्टी पिलाई जा रही है. जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैं. जेएसएस स्कूल की लाइब्रेरी भारतीय संस्कृति प्रकाशन से छपकर आईं उन किताबों से भरी पड़ी है जो संघ की विचारधारा पर आधारित हैं. इनमें सेंग खासी या नियाम्त्रे धर्म की शिक्षाओं का कोई अंश नजर नहीं आता.

बच्चे निराश्रित और असहाय हैं

गैरआदिवासी समाज में पिता के परिवार को छोड़ देने से परिवार को निराश्रित माना जाता है. मगर मेघालय के आदिवासी समाज में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि पुरुष किसी दूसरी स्त्री के साथ रहने लगते हैं और बच्चों की जिम्मेदारी मां संभालती है. अगर मां की मौत हो जाती है तो बच्चे को रिश्तेदार पालते हैं.

बच्चों को खुद को अच्छी तरह से नए माहौल के मुताबिक ढाल लिया है

जब बच्चे मेघालय छोड़ रहे होते हैं तो न तो उन्हें और न ही उनके मां-बाप को ये पता होता है कि उन्हें आखिरकार कहां ले जाया जाएगा. कमजोर आर्थिक हालत और स्कूलों में सुविधाओं के अभाव के चलते मां-बाप का बच्चों से सीधा संपर्क नहीं हो पाता. संघ मां-बाप को बताता है कि उनके बच्चे खुश हैं और नए माहौल में काफी अच्छी तरह से ढल गए हैं. मगर हकीकत कुछ और ही होती है. विद्या निकेतन में छठवीं का छात्र रापलांग्की ढकार इंतजार कर रहा है कि उसके चाचा आएंगे और उसे घर ले जाएंगे. वह कहता है, ‘हम तभी वापस जा सकते हैं जब हमारे घर से लोग यहां आएं और हमें अपने साथ ले जाएं. हर साल जब पढ़ाई खत्म होती है तो हम सुनते हैं कि हमें वापस ले जाया जाएगा. मगर दो साल हो गए हैं.’

तहलका जिन बच्चों से मिला उनमें से सिर्फ दो ही ऐसे थे जिन्हें घर लौटने का मौका मिला था. रापलांग्की के कस्बे रालिआंग में जब तहलका ने उसके चाचा से पूछा कि वे अपने भतीजे को लेने क्यों नहीं गए तो वे हैरान हो गए. उनका कहना था, ‘मुझे तो इसमें जरा भी शंका नहीं थी कि मेरा भतीजा अच्छी तरह से वहां रम गया है. जोवाई में संघ की हर बैठक में हमें आश्वस्त किया जाता है कि बच्चे खुश और स्वस्थ हैं.’

बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच सीधा संपर्क यानी फोन कॉल अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है. अगर मां-बाप बच्चे की पढ़ाई का खर्चा उठाने में असमर्थ हों तो बच्चों को मठों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे स्कूलों में रखा जाता है जिनकी तुलना किसी अनाथाश्रम से की जा सकती है. यहां फोन की कोई सुविधा नहीं होती जैसा कि श्री आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा संचालित हॉस्टल में देखने को मिलता है.

मगर संघ को इससे कोई मतलब नहीं. उसके लिए यह सब एक बड़े उद्देश्य के लिए चलाई जा रही प्रक्रिया का हिस्सा है. एक ऐसी प्रक्रिया जो न सिर्फ बच्चों के लिए शारीरिक और मानसिक यातना पैदा कर रही है बल्कि मेघालय की एक पीढ़ी को उसकी मूल संस्कृति से दूर भी ले जा रही है.    

अच्छे इरादों की औसत फ़िल्म : न्यूयॉर्क

फिल्म       न्यूयॉर्क

निर्देशक     कबीर खान

कलाकार    जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, इरफान, कैटरीना कैफ

पहला हिस्सा प्रेमकथा और थ्रिलर का अहसास देता है और दूसरा हिस्सा उस थ्रिलर को परे हटाकर अचानक एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या की बात करने लगता है

कभी कभी एक तीन मिनट के दृश्य में कोई अभिनेता आप पर वह छाप छोड़ जाता है जो अधिकांश स्टार तीन घंटे की तीन फ़िल्मों में भी नहीं कर पाते. नवाज़ुद्दीन का किरदार उन 1200 निर्दोष मुस्लिमों में से है जिन्हें 9/11 के बाद एफबीआई ने बिना किसी दोष के गिरफ़्तार किया था और सालों तक निर्मम यातनाएँ दी थी. फ़िल्म में जब वह अपनी आपबीती सुना रहा है तो सिर्फ़ उसका चेहरा देखकर आप वह सब देख सकते हैं जो मनुष्य की आज़ादी का सबसे बड़ा प्रतीक होने का दावा करने वाले अमेरिका के यातना शिविरों में इंटरवल के तुरंत बाद दिखता है. वही जिसे हम कुछ साल पहले इराक़ की जेलों से बाहर आई तस्वीरों में देख चुके हैं.

कहानी तो वही पुरानी है जो ‘दिलजले’ से लेकर अब तक चल रही है. बस इस बार फ़िल्म ज़्यादा ईमानदार और वास्तविक है. ईमानदार, यदि ‘क्रैश’ से उठाकर चिपका दिए गए एक भावुक सीक्वेंस को और इंडोनेशिया से चुराए गए प्रीतम के मधुर संगीत को माफ़ कर दिया जाए. फ़िल्म जिस तनाव, डर और फ़िक्र की बात करती है, उसे आरंभ से अन्त तक फ़िल्म के वातावरण में बरकरार रखने में कबीर ख़ान सफल रहे हैं. उसमें बड़ा योगदान सिनेमेटोग्राफ़ी का भी है. लेकिन फ़िल्म कम से कम बीस मिनट छोटी की जा सकती थी और अंत को और तेज और नुकीला बनाया जा सकता था. कहानी में कॉलेज है तो कब तक इन घटनाओं पर रील बर्बाद की जाती रहेगी कि वहाँ जितने खेल होते हैं, हीरो ही निर्विवाद चैम्पियन होता है? पहला हिस्सा प्रेमकथा और थ्रिलर का अहसास देता है और दूसरा हिस्सा उस थ्रिलर को परे हटाकर अचानक एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या की बात करने लगता है, जो प्रशंसनीय तो है, लेकिन कुछ जगहों पर उपदेशात्मक हो जाता है. लाख चाहते हुए भी संवेदनशील मुद्दों पर बनाई गई हिन्दी फ़िल्में इससे नहीं बच पाती. दूसरे हिस्से में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं घटता. जो ज़ोर कहानी की गहराई बढ़ाने पर दिया जाना चाहिए था, वह सारा ऊँची इमारतों को दिखाने पर आ जाता है. उन घटनाओं का अफ़गानिस्तान या इराक़ पर जो असर हुआ, वह कहीं नहीं दिखता। यशराज जैसे बड़े बैनर अपने ऊपर फ़िल्म को लार्जर देन लाइफ़ परिदृश्य में भावनात्मक संदेश घोलकर संतुलित बनाने की एक और अतिरिक्त व्यावसायिक ज़िम्मेदारी थोप लेते हैं, जो इन फ़िल्मों को ‘मिशन इम्पोसिबल’ की तरह अतार्किक रूप से भव्य भी नहीं बनने देती और ‘न्यूयॉर्क’ को ‘ख़ुदा के लिए’ से कोसों नीचे भी बिठा देती है.

नील ने अपने किरदार के अनुरूप जो फ्रस्ट्रेशन ओढ़े रखी है, वह काबिले तारीफ़ है. इरफ़ान हमेशा की तरह बेहतरीन हैं, मगर उनसे अब उम्मीदें कुछ ज़्यादा हैं. जॉन ठीक ठाक हैं और सुन्दर कैटरीना के लिए अब ऐसे किरदार गढ़े जाने लगे हैं, जो उनके हिन्दी के लहजे को तर्कसंगत ठहरा सकें. महत्वपूर्ण बात यह है कि सारी कहानी विदेश में होने के बावज़ूद ‘न्यूयॉर्क’ एन आर आई फिल्म नहीं है. यह देसी है और कुछ अच्छे अर्थों में ग्लोबल भी.

गौरव सोलंकी         

संतुलन की जरूरत

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने 25 जून को अपने मंत्रालय द्वारा 100 दिनों और उसके बाद में किये जाने वाले कामों का ब्यौरा दुनिया के सामने रखा. इसमें तमाम स्वागतयोग्य कदम तो हैं ही कुछ ऐसे सुझाव भी हैं जिन्होंने तरह-तरह की बहसों को जन्म दिया है.

जैसे नई सरकारों को जमने के लिए ‘हनीमून पीरियडदिया जाता है वैसे ही सिब्बल जैसे मंत्रियों को भी नये विभागों से सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ समय मिलना-लेना चाहिए 

सिब्बल चाहते हैं कि दसवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा देने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया जाए. उनके मुताबिक यदि किसी को 11वीं कक्षा में दूसरे स्कूल में प्रवेश पाना हो तो-तो ठीक अन्यथा इस परीक्षा की जरूरत ही क्या है? ऐसा करने से नाहक ही बच्चों को एक साल की हिमालयी मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ता है. सिब्बल की एक दीर्घकालिक मंशा ये भी है कि देश के विभिन्न राज्यों में मौजूद तमाम शिक्षा बोर्डो को खत्म कर एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनाई जाए जिससे न केवल देश के हर कोने में दी जाने वाली शिक्षा में एकरूपता आएगी बल्कि छात्रों और उच्च शिक्षण संस्थाओं को भी तरह-तरह की समस्याओं से निजात मिलेगी.

दसवीं की परीक्षा खत्म करने के संबंध में कुछ तर्क-वितर्क ये हैं कि आज से कुछ दशक पहले तक जब दसवीं कक्षा तक पढ़े लोगों को भी नौकरियां मिल सकती थीं, इसकी परीक्षा बोर्ड की होना कोई तुक की बात थी. मगर आज जब दसवीं का उच्च शिक्षा से कोई संबंध ही नहीं रहा तो इसकी बोर्ड की परीक्षा उचित नहीं जान पड़ती. दूसरी ओर चूंकि अभिभावक और बच्चे दोनों ही जानते हैं कि दसवीं की बोर्ड परीक्षा के अंकों से कुछ बनने-बिगड़ने वाला नहीं हैं इसलिए ये छात्रों को 12वीं की परीक्षा के जबर्दस्त मानसिक दबाव के लिए तैयार करने का एक बहुत बढ़िया तरीका हो सकती है. आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सरीखे राज्यों के शिक्षा व्यवस्थापकों की एक समस्या ये भी है कि उनके यहां ज्यादातर स्कूल दसवीं तक ही शिक्षा देते हैं ऐसे में उन्हें बोर्ड की परीक्षा खत्म करने के लिए या इन स्कूलों को 12वीं तक बनाना होगा नहीं तो वहां की स्थिति में ज्यादा कुछ फर्क नहीं आने वाला. एक ही बोर्ड बनाने के विरोध में भी कई राज्यों के तर्क ये हैं कि ऐसा करना विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को नकारने जैसा होगा. उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब उसमें स्थानीयता का समुचित ध्यान रखा गया हो.

चूंकि वर्तमान सरकार एक तरह से पिछली का ही विस्तार है इसलिए माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने ठीक ही अपने विभागों को बड़े परिवर्तन लाने के लिए महज 100 दिनों का समय दिया है. मगर जैसे नई सरकारों को जमने के लिए हनीमून पीरियडदिया जाता है वैसे ही सिब्बल जैसे मंत्रियों को भी नये विभागों से सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ समय मिलना-लेना चाहिए. दूसरी ओर हालांकि शिक्षा केंद्र-राज्य के अधिकारों के बंटवारे में समवर्ती सूची में है इसलिए इस संबंध में केंद्र  का पलड़ा भारी है मगर हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि संविधान निर्माताओं ने इसे मूलत: राज्यों का अधिकार माना था जो कि 42वें संविधान संशोधन के बाद केंद्र और राज्य दोनों के हिस्से में आ गया. इसलिए इतने महत्वपूर्ण विषय पर कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले यदि सिब्बल राज्य सरकारों की चिंताओं पर भी थोड़ा ध्यान देंगे तो ये बेजा नहीं होगा.

संजय दुबे