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गहरे दुष्चक्र में शिक्षा

जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा होता गया, इसकी उपयोगिता कुछ कुशल पेशेवर इंजीनियर और रट्टामार अफसर निकालने तक सीमित रह गई.   आखिर क्यों?

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उनकी सक्रियता ने हाल के दिनों में बुरी तरह उपेक्षित शिक्षा के एजेंडे को बहस के केंद्र में ला दिया है. उनके प्रस्तावों में शिक्षा को लेकर एक आधुनिक दृष्टि और समझ भी दिखती है. स्कूली बच्चों की पढ़ाई को अंकों के दबाव से मुक्त रखने की बात हो या नर्सरी में दाखिले की न्यूनतम उम्र तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष करने का सुझाव, या फिर दसवीं और बारहवीं में गणित और विज्ञान की पढ़ाई एक करने का इरादा- इन सबमें वह जरूरी संवेदनशीलता है जिसकी कमी शिक्षा में अरसे से महसूस की जा रही है.

लेकिन शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां कहीं ज्यादा गहरी हैं, उसके सवाल कहीं ज्यादा नुकीले हैं. चाहे बिलकुल प्राथमिक स्तर की शिक्षा हो या उच्च शिक्षा- एक बहुपरतीय गैर-बराबरी के अलावा डरावनी अराजकता से लेकर भ्रष्टाचार तक हमारी शिक्षा व्यवस्था के लगभग स्वीकार्य अंग बन चुके हैं. मिसाल के तौर पर यह प्रश्न किसी को तंग नहीं करता- अब तक हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री को भी नहीं- कि स्कूली शिक्षा में सरकारी और निजी स्कूलों के अलग-अलग स्तर अपनी जड़ता में ऐसी सामाजिक गैर-बराबरी की बुनियाद रखते हैं जिससे उबरना अगर असंभव नहीं तो काफी कठिन जरूर हो चुका है.

आलम यह है कि बच्चे का स्कूल तय होते ही तय हो जाता है कि वह भविष्य में क्या बनेगा. अगर वह ठेठ सरकारी स्कूलों में जा रहा है तो उसकी पढ़ाई बीच में टूट जाएगी या किसी तरह दसवीं-बारहवीं पास कर वह चपरासी या इसके आसपास के कुछ पदों की शोभा बढ़ाएगा. अगर वह आम प्राइवेट स्कूलों में पढ़ता है तो क्लर्क से लेकर अफसर तक की नौकरी में कहीं खप जाएगा. अगर वह महंगे पब्लिक स्कूल का छात्र है तो आईएएस बनेगा या आईआईटी-आईआईएम जैसे अभिजात्य संस्थानों का महत्वाकांक्षी छात्र और भविष्य का आला अफसर या मैनेजर होगा. अगर वह सबसे ऊंचे स्कूलों में पढ़ता है या विदेश में पढ़ाई करके लौटता है तो इस देश पर राज करेगा.

निश्चय ही इस नियम के अपवाद भी हैं. सरकारी स्कूलों के बच्चे भी आईआईटी जैसी प्रतियोगिताओं में कामयाब होते हैं और पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी नाकाम रहते हैं, लेकिन ये अपवाद असल में इस नियम की पुष्टि ही करते हैं. दूसरी बात यह कि सरकारी और निजी के बीच का यह फर्क और फासला हाल के दशकों में ज्यादा तेजी से बढ़ा है. इस फासले के बीच शिक्षा ऐसा निवेश हो गई है जिसमें संसाधन झोंके जा सकते हैं. अलग-अलग इम्तिहानों के लिए ट्यूशन से लेकर कोचिंग तक एक पूरा इंतजाम है और जो इस इंतजाम का लाभ ले सकता है वह कामयाबी के कुछ नुस्खे हासिल कर सकता है.

इसलिए जब कपिल सिब्बल दसवीं और बारहवीं के पाठ्यक्रम एक करके सबको बराबरी के मौके देने की बात करते हैं तो लगता है कि यह चांद पर जाने के लिए सीढ़ी बनाने का काम है. शिक्षा की असमानताएं पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पाठ्यक्रम में वे सबसे कम और सबसे देर से दिखती हैं, सबसे ज्यादा वे उस बुनियादी ढांचे में हैं जो इस देश में शिक्षा के तंत्र को नियंत्रित करता है. कहा जा सकता है कि जो सामाजिक गैर-बराबरी है, वही स्कूली गैर-बराबरी में झांकती है और एक असमान समाज में सिर्फ स्कूली तंत्र से बराबरी के मौके पैदा करने की उम्मीद करना गलत है.

इन दिनों कोई मेधावी छात्र हिंदी, संस्कृत, इतिहास, मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र जैसे विषय पढ़ने तक को तैयार नहीं होता, क्योंकि उसे मालूम है कि इन विषयों के अध्ययन से न नौकरी मिलेगी न सम्मान

लेकिन यह तर्क दरअसल उसी दृष्टि से संचालित है जिस दृष्टि से कपिल सिब्बल का दसवीं और बारहवीं के पाठच्यक्रम एक करने का इरादा निकलता है. यह दृष्टि जैसे दसवीं और बारहवीं में गणित और विज्ञान की पढ़ाई को इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगिताएं पास करने का जरिया मानती है. अंतत: यह वह दृष्टि है जिसके लिए शिक्षा कोई पेशेवर हुनर अर्जित करने का, एक अच्छी नौकरी पाने का और एक सफल आदमी बनने का माध्यम है.

शिक्षा को लेकर इस उपयोगितावादी नजरिए ने अनजाने में शिक्षा को उसी जड़ता के कुएं में धकेल दिया है जिससे बाहर आने की कोशिश में न जाने कितने वर्ष खरचे गए. हालत यह है कि जो सबसे अच्छे छात्र हैं, जिन्हें सबसे अच्छी पढ़ाई हासिल हुई है, वे अपने अध्ययन का सबसे कम इस्तेमाल कर पाते हैं. अकसर हम पाते हैं कि किसी खास अनुशासन में आईआईटी करने के बाद लड़के आईआईएम कर लेते हैं और वहां से टॉप करके सबसे ऊंची सैलरी देने वाली किसी फर्म में साबुन से लेकर शीतल पेय तक बेचने के काम में जुट जाते हैं. हाल के दिनों में सूचना प्रौद्योगिकी का जो हल्ला है, उसमें कई भारतीय युवकों ने अमेरिका में जाकर अच्छा काम किया है, लेकिन वह काम भी सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ उपयोगी सॉफ्टवेयर बनाने से आगे जाता नजर नहीं आ रहा.

सच तो यह है कि जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा होता गया, इसकी उपयोगिता कुछ कुशल पेशेवर इंजीनियर और रट्टामार अफसर निकालने तक सीमित रह गई. ज्यादा दिन नहीं हुए जब टाटा के एक बड़े अफसर ने यह शिकायत की कि अब इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी ज्यादा मौलिक प्रतिभाएं नहीं आ रहीं, क्योंकि कोचिंग करके आए हुए छात्र इम्तिहान को पास कर ले रहे हैं, लेकिन नए ढंग से सोचने का माद्दा उनमें नहीं दिख रहा. विज्ञान के अध्ययन की यह विडंबना कला संकाय में जाकर कहीं ज्यादा डरावनी अराजकता में बदल जाती है. इन दिनों कोई मेधावी छात्र हिंदी, संस्कृत, इतिहास, मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र जैसे विषय पढ़ने तक को तैयार नहीं होता, क्योंकि उसे मालूम है कि इन विषयों के अध्ययन से न नौकरी मिलेगी न सम्मान. एक तरह की उदासी और उदासीनता इन विभागों में दिखती है जिसमें अपने पीछे छूट जाने की खरोंच ज्यादा होती है, अपने बढ़ने और पढ़ने का अभिमान कम.

आखिर यह स्थिति क्यों आती है? बस इसलिए कि शिक्षा हमारे लिए कुछ कामयाब उद्यमी गढ़ने का जरिया भर हो गई है, नए मनुष्य बनाने का, नई संवेदनशीलता पैदा करने का माध्यम नहीं रही. साथ ही, वह इस देश की वर्गीय जड़ता और असमानता को तोड़ने की जगह उसे मजबूत करने का माध्यम हो गई है. इस प्रवृत्ति ने विश्वविद्यालयों को उपेक्षा के परिसरों में बदल डाला है और उनकी जगह कुकुरमुत्तों की तरह उगे ऐसे पेशेवर संस्थानों ने ले ली है जो आधी-अधूरी, बेईमानी भरी डिग्रियां बांटकर पैसा कमाते हैं.

स्कूली शिक्षा के मामले में यह विडंबना कहीं ज्यादा गहरे अंतर्विरोध रचती है. हाल के वषों के सारे प्रयोगों के बावजूद शिक्षा उस बैंकिंग पद्घति की बनी-बनाई लीक पर ही है जिसमें कोई शिक्षक बच्चों को कुछ दी हुई किताबें पढ़ाता है और बच्चे उन्हें रटकर ज्यादा से ज्यादा अंक लाने की कोशिश करते हैं. इस पद्घति में जोर इम्तिहानों पर है और शिक्षक का काम ऐसे सवाल तय करना है जिनके जवाब देते बच्चे उलझे. जैसे परीक्षा यह खोज निकालने का अभियान है कि बच्चे क्या नहीं जानते. और रट्टा मारते बच्चों की कोशिश एक बाधा दौड़ पार करते हुए इतने अंक ले आने की है कि मनचाहे कॉलेजों में मनचाहे विषय मिल सकें. दरअसल, बच्चे और पढ़ाई दोनों अंकों में बदल गए हैं. 90 फीसदी लाने वाला बच्चा अच्छा बच्चा है और 90 फीसदी दिलाने वाले स्कूल अच्छे स्कूल हैं.

कपिल सिब्बल इस स्थिति को तोड़ना चाहते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन यह काम सिर्फ ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने से नहीं होगा. कायदे से शिक्षा का पूरा चौखटा बदलने की जरूरत है. शिक्षक हमारे समाज में आत्महीन उपस्थिति है जिसका चेहरा जितना आर्थिक अभाव गढ़ रहा है, उससे ज्यादा सामाजिक अभाव. किसी की तैयार की हुई पाठ्य पुस्तक को ऊंची फीस देकर आए बच्चों को पढ़ा भर देना उसका काम है. इससे ज्यादा की न उससे उम्मीद की जाती है, न उसमें योग्यता दिखती है.

साफ है कि इसके लिए शिक्षक नहीं, वह शिक्षा तंत्र दोषी है जो पढ़ाई को कामयाब मैनेजर बनाने का उपक्रम बना देता है. जाने-अनजाने गणित और विज्ञान के पाठ्यक्रम एक करने का कपिल सिब्बल का सुझाव भी इसी स्थिति को मजबूत करता है. निश्चय ही कमी इस सुझाव में नहीं है, उसके पीछे के नजरिए और सुझाव पर अमल की सीमाओं में है. इन सीमाओं का ही नतीजा है कि हमारे शिक्षण संस्थान बच्चों को दृष्टि नहीं, डिग्री दे रहे हैं. कभी शिक्षा साध्य हुआ करती थी जिसके सहारे मनुष्य अपने-आप को, अपनी सभ्यता को, अपनी चेतना को, अपनी मूल्य दृष्टि को नए सिरे से पहचानता था, उसे पुनर्परिभाषित करता था. अब वह सिर्फ साधन रह गई है जिसे अगर मेहनत से नहीं तो दौलत से हासिल किया जा सकता है और जिसका इस्तेमाल और ज्यादा दौलत जोड़ने के लिए किया जा सकता है. मानव संसाधन मंत्री की बातों से लगता है कि वे इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, लेकिन यह साफ नहीं दिखता कि वे इस दुष्चक्र के फैलावों को पहचानते हैं या नहीं.                                                        

प्रियदर्शन 

जयजयकार और धिक्कार

पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र में जो कुछ भी चल के फिलहाल खत्म-सा हो चुका है यदि उसपर ठहरकर विचार करेंगे तो यह हमारी कम-से-कम वीं गलती होगी: हमने एक चुकी हुई सी राजनीतिक पार्टी को अपना मान, उसके नेता की बेकार की नाराजगी को सर माथे ले कई दिनों तक पूरी मुंबई को सर पर उठाए रखा, बिना यह सोचे कि इस दौरान, देशभक्ति के नाम पर जिस जगह – मुंबई में – हम यह सब कर रहे थे, वहां की सारी व्यवस्था ऊपर वाले के हवाले हो गई थी; हमने अनगिनत बहसों में हिस्सा लिया और बेहद गंभीरता के साथ कुतर्क करने वालों को उससे भी ज्यादा गंभीरता से उनका कर्तव्य याद दिलाने, उनके कामों की निरर्थकता समझाने की कोशिश की; हमारी खुशी का ठिकाना न रहा जब हमने एक साफ-सुथरेनौजवान राजनेता को भारी चुनौती के बावजूद मुंबई पहुंचकर एनएसजी की अभेद्य सुरक्षा में खुलेआमघूमने की हिम्मत दिखाते और घृणा की राजनीति के पैरोकारों को नाकों चने चबवाते देखा; हम दुखी हुए कि नाकों चने वाली बात केवल हमारी खुशफहमी थी और कहीं से कुछ भी तो नहीं बदला था; हमने अपने देश के कई वरिष्ठ-कनिष्ठ राजनेताओं को राजनीति छोड़कर राजनीति करते हुए देश के सामने खड़ी एककड़ी चुनौतीका सामना करने और ऐसा करने के लिए एक फिल्म विशेष देखने की सलाह देते सुना, और हममें से कइयों ने इसे माना भी…

हो सकता है कि 60 साल किसी देश के इतिहास का सिर्फ एक पन्ना भर हों किंतु लोकतंत्र की स्थापित मान्यताओं और परंपराओं की स्थापना के लिए यह इतना कम समय भी नहीं. और अगर यह इतना कम ही है तो क्यों हमें यह याद नहीं रहता कि जो कांग्रेस आज बाल ठाकरे की कारगुजारियों पर सख्त एतराज जता रही है, उसी के वसंतराव नाइक ने 60 और 70 के दशक में वामदलों के वर्चस्व वाली मुंबई की ट्रेड यूनियनों और वाम दलों को कमजोर करने के लिए शिवसेना को जमकर प्रोत्साहन दिया था. जब शिवसेना की महत्वाकांक्षाएं मुंबई और थाणे से बाहर का रुख करने लगीं तो कांग्रेस को उसमें अपना सबसे बड़ा दुश्मन दिखाई देने लगा. काफी बाद में उसने शिवसेना के मुकाबले राज ठाकरे की मनसे खड़ी करवा दी. कुछ दिनों पहले तक वह भी उत्तर भारतीयों को भगाने के नाम पर उत्पात मचा रही थी मगर शिव सेना के वोट काटने की गरज से वह कांग्रेस को प्यारी रही. क्यों हमें यह याद नहीं रहता कि मराठी मानुस की भलाई के नाम पर बनी शिवसेना ने हाल तक भाजपाई हिंदुत्व की सोहबत में इससे किनारा किया हुआ था, मगर जैसे ही उसे मनसे का डर सताया वह फिर से मराठी अस्मिता की दुहाई देने लगी है. और अभी शिवसेना से प्रतिस्पर्धारत मनसे का जवाब आना तो बाकी है. जल्दी ही वह भी कुछ ऐसा ही करेगी और हम हर बार की अपनी गलतियों को भूलकर उन्हें दोहराने में तनिक भी संकोच नहीं करने वाले.

किसी लोकतंत्र और समाज के लिए दो सबसे जरूरी शक्तियों में से एक है जयजयकार की शक्ति और दूसरी है धिक्कार की. पहली हमें अच्छाई को प्रोत्साहित करने के लिए इस्तेमाल करनी होती है और दूसरी बुराई को हतोत्साहित करने के लिए. अफसोस! दोनों के ही लगातार दुरुपयोग या उपयोग न करने ने हमें लोकतंत्र की संजीवनी, इन दोनों शक्तियों से हीन कर दिया है.

संजय दुबे  

केएम नानावटी मुकदमा

यह भारत की उन चुनिंदा घटनाओं में से एक है जिसने कई किताबों और उस दौर की कुछ हिंदी फिल्मों के लिए प्रेरणा का काम किया. 1959 की यह घटना 37 साल के एक खूबसूरत सैन्य अधिकारी कवास मानेकशा नानावटी से जुड़ी है. नौसेना में कमांडर नानावटी पारसी थे जिन्होंने प्रेम आहूजा नाम के एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी थी. ऐसा उन्होंने यह पता चलने के बाद किया था कि उनकी ब्रिटिश मूल की पत्नी सिल्विया के आहूजा के साथ प्रेमसंबंध हैं. सिंधी समुदाय से ताल्लुक रखने वाला आहूजा नानावटी का दोस्त था.

प्रेम संबंधों और हत्या से जुड़ा यह दिलचस्प मामला तुरंत ही सुर्खियों का विषय बन गया. मुंबई के अखबार ब्लिट्ज (इसके मालिक रूसी करंजिया पारसी थे) में हर दिन इस घटना से संबंधित खबरें प्रमुखता से छापी जाने लगीं. कहा जाता है कि ब्लिट्ज ने नानावटी के  पक्ष में एक तरह से अभियान छेड़ दिया था. इन खबरों का असर यह हुआ कि नानावटी के पक्ष में मुंबई का प्रभावशाली पारसी समुदाय रैलियां और सार्वजनिक सभाएं आयोजित करने लगा. नानावटी पर मुंबई की सत्र अदालत में मुकदमा चला जिसमें उन्हें आश्चर्यजनक रूप से हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया. इसके बाद मामला बंबई उच्च न्यायालय में गया जहां नानावटी को हत्या का दोषी माना गया. उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई. लेकिन पारसी समुदाय ने कथित तौर पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराष्ट्र की राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित पर मामले में दखल देने का दबाव डाला.

अब तक यह मामला दो समुदायों के बीच टकराव का मुद्दा बनने लगा था क्योंकि नानावटी की सजा माफी के खिलाफ मुंबई का सिंधी समुदाय एकजुट हो रहा था. आखिरकार तीन साल की सजा काटने के बाद महाराष्ट्र की राज्यपाल पंडित ने नानावटी की दया याचिका स्वीकार करते हुए सजा माफ कर दी. इसके बाद नानावटी अपनी पत्नी के साथ भारत छोड़कर कनाडा चले गए.

इस घटना से प्रेरित होकर बाद में कई किताबें लिखी गईं. प्रसिद्ध लेखिका इंदिरा सिन्हा की द डेथ ऑफ मिस्टर लव नाम से लिखी किताब इनमें सबसे ज्यादा चर्चित रही. इसके अलावा 1963 में सुनील दत्त अभिनीत फिल्म ये रास्ते हैं प्यार के  और 1973 में बनी गुलजार द्वारा निर्देशित फिल्म अचानक भी इसी घटना से प्रेरित मानी जाती हैं.

पवन वर्मा 

झूठ पर सच का कब्जा

पिछले 60 साल से गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है. गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम कभी भी कुछ ऐसा कहता-सुनता-समझता नजर नहीं आता जो पहले न कहा गया हो. इस दिन का जलसा देखकर लगता है कि भारत में कभी कोई तकलीफ थी ही नहीं. सबसे पहले गणतंत्र दिवस समारोह पर भी लोग नाचते-गाते, कदम से कदम मिलाते, एक-दूसरे से गले मिलते नजर आए थे. आज भी बदस्तूर वही सिलसिला जारी है. हां 1950 के समारोह में लोगों को यह तसल्ली जरूर थी कि एक दिन हमारा गणराज्य इस समारोह में दिखाई गई खुशहाली जरूर हासिल कर लेगा. मगर 2010 तक आते-आते वह उम्मीद भी केवल सवाल बनकर रह गई है. आखिर कब गणतंत्र दिवस पर दिखाए गए आमजन की सुरक्षा, तरक्की व आपसी भाईचारे के विज्ञापन हकीकत का जामा पहनेंगे? सलामी लेने वाले राष्ट्रपति बदलते रहते हैं पर गणराज्य की तकदीर और तसवीर नहीं.

हर बार की तरह इस बार मन प्रशासन की सजाई झांकियों में झलकते झूठे नजारे नहीं देखना चाहता था. सो विजय चौक से इंडिया गेट का सफर तय करती झूठ की झांकियों पर सच के नजारों ने कब्जा कर लिया. झूठ के अपहरण के बाद गणतंत्र समारोह का नजारा कुछ ऐसा रहा.

निश्चिंत मन से पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के लिए राष्ट्रपति तैयार हैं, कदम से कदम मिलाते सेना के जवानों से सलामी लेने के लिए. पर यह क्या? जवान राष्ट्रपति को सलामी देने की बजाय लड़कियों-औरतों के कपड़े फाड़ने में व्यस्त हैं. अगली बारी बैंड-बाजे के साथ पुलिस बल की है. पुलिस के सिपाही राष्ट्रपति को सलामी देने की बजाय केपीएस गिल जिंदाबाद, एसपीएस राठौर जिंदाबाद! ये हमारे आदर्श हैं! की पट्टी गले में टांगे गिल और राठौर के चरणों में बैठे हैं. दोनों अफसरानों के होंठ तनी हुई मूछों के बीच से झांकते हुए जी भर-भर मुस्करा रहे हैं. कुछ पुलिस वाले सलाखों के भीतर एक औरत की साड़ी खींचने में व्यस्त हैं. रूपन देओल बजाज रुचिका की तसवीर थामे एक कोने में सिकुड़ी बैठी हैं. 

आशा के विपरीत नजारा देख राष्ट्रपति हैरान हैं. तभी एक और झांकी करीब आती है जिसमें बड़े से चबूतरे पर कम उम्र के एक विवाहित जोड़े को चारों ओर से भीड़ ने घेरा हुआ है. कुछ लोग पेड़ से बंधी रस्सियां जबर्दस्ती उनके गले में डाल रहे हैं. दोनों मासूम जिंदगी की भीख मांग रहे हैं. चारों तरफ से आवाजें आ रही हैं लटका दो इन्हें फांसी पर. ये हमारी जात-बिरादरी के गुनहगार हैं. मारो-मारो की आवाजें बुलंद करती हुई जैसे ही यह झांकी गुजरी कि तभी कुछ जल्दबाजी मचाती हुई एक और झांकी सामने आई. झांकी में त्रिशूल-तलवार थामे कुछ लोग ‘हिंदू धर्म, हिंदू राष्ट्र जिंदाबाद बाकी बचों का सत्यानाश!’ नारा लगाते हुए अंधाधुंध कत्लेआम कर रहे हैं. औरतों के बाल खींचते हुए उनके गुप्तांगों को तलवारों से काट रहे हैं, बलात्कार कर रहे हैं. बेबसी की चीख, रहम की भीख मांगता यह काफिला गुजरा तो आने वाली झांकी में कुछ अंधनंगे लोगों को जबरन झोपड़ी से निकालते सूटबूटधारी नजर आए. एक ने कहा, ‘साहब रोटी मांगता है!’ दूसरे ने कहा, ‘अच्छा, साला नक्सली, माओवादी बनता है! उड़ा दो गोली से! इसकी औरत को बंगले पर भेज दो!’

नंगधड़ंग पिटते लोगों के बाद जो झांकी आई उसपर लिखा है ‘नरेगा’. कुर्सी पर बैठा अधिकारी जमीन पर बैठे मजदूर से कह रहा है, ‘एक हजार अंगूठे लगाने के 100 रुपए, समझे? हाथ से लगा, चाहे पैर से, बस लगा!’ तभी एक व्यक्ति चिल्लाता हुआ आया, ‘तुम्हारी यह धांधली मैं सबको बताऊंगा.’ कुर्सी पर बैठे व्यक्ति ने इत्मीनान से उसकी तरफ एक बार देखा. धांय की आवाज… आदमी जमीन पर.

अगली झांकी में एक औरत अस्पताल के बाहर छाती पीटती रोती हुई आती है. ‘हाय मेरा एक ही बच्चा था. कितनी दूर से गिरते-पड़ते आई थी. महीनों फुटपाथ पर रही. किसी ने अस्पताल में घुसने तक नहीं दिया. मर गया मेरा लाल, मर गया!’ इस झांकी को धकियाते हुए जो झांकी आई उसमें मैडम हुक्मरान सवार हैं. अर्दली कह रहा है, ‘मैडम, खेलों की तैयारी के लिए जगह खाली करवा ली गई है. सारे तंबू तुड़वा दिए. पर मैडम 200 लोग ठंड से मर गए.’ मैडम ने बेरुखी से जवाब दिया, ‘जाने दो, पता नहीं कहां-कहां से आ जाते हैं. यहां भीड़ बढ़ाने.’ ‘मैडम राज्य को सुंदर बनाने की हमारी मुहिम तो जोरों पर है. पर देश की नाक बचाने वाले अच्छे खिलाड़ी भी तो चाहिए.’ मैडम- ‘यह तैयारी हमारे लिए है, देश के लिए नहीं. आगे से ऐसी मूर्खता की बात मत करना.’ अगली झांकी में कुछ कोमल-कोमल गोरे चिट्टे नौजवान लड़के-लड़कियां हैं. लड़कियों ने खादी की महंगी साड़ी और लड़कों ने सफेद कुरता-पायजामा पहना है. सभी पहनावे से परेशान और ऊबे हुए हैं. साड़ी संभालते हुए एक लड़की ने कहा, ‘इस देश के लोगों को कुएं में पड़े रहने देने के लिए हमें यह ढोंग करने जरूरी है. वरना सब हमारी बगल में आकर बैठ जाएंगे.’

सच की पिटारी में अभी और बहुत कुछ बाकी था जो गणतंत्र दिवस की विकास अदालत में पेश होना था. पर राष्ट्रपति इतने ही से घबरा गईं और बगैर दुआ-सलाम वापस लौट गईं.

'जब तक किस्सागोई है, किताबें लिखीं और पढ़ी जाएंगी'

आपकी मनपसंद लेखन शैली क्या है?

ऐसी कोई भी शैली जिसमें भाषा के प्रयोग का आनंद हो, किस्सागोई हो, कुछ टेढ़ी, महीन बुनावट की कसरत हो, सघन भाव संसार हो. फिर वह चाहे रेणु की शैली हो या पामुक की.

इन दिनों क्या लिख-पढ़ रही हैं?

उम्बेर्तो इको की बौदोलिनो, रेणु की परती परिकथा फिर से, बोर्खेज की बुक ऑफ सैंड, बीच-बीच में साईनाथ की एवरी वन लव्स अ गुड ड्रॉट और नैयर मसूद की कहानियां. अंग्रेजी में एक उपन्यास पर काम करने का इरादा है.

कोई महत्वपूर्ण रचना जो अलक्षित रह गई.

बहुत हैं. साहित्य समाज के जोड़-तोड़ ऐसे गूढ़ रहस्य हों, ऐसा तो नहीं है, फिर किन रचनाओं को रेखांकित किया जाए और किन्हें गुमनामी अंधेरों मे ठेल दिया जाये उनका उस रचना की विशिष्टता से बहुधा कोई सीधा तार नहीं भी होता है.

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

पीली छतरी वाली लड़की.

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

परती परिकथा, आधा गांव, गर्दिशे रंगे चमन, सांन्ग लाईंस, इस्ट ऑफ ईडेन, इस्तांबुल,
अ टेल ऑफ लव ऐंड डार्कनेस, जुलूस, मित्नो मरजानी, लाल टीन की छत, कहा पाऊ उसे, काला जल.

किताबें पढ़ने की परंपरा बनी रहे, इसके लिए क्या किया जा सकता है?
जब तक किस्सागोई है, किताबें लिखीं जाएंगी और फिर पढ़ी भी जाएंगी. शायद ये समझना ज्यादा जरूरी है कि किताबें अन्य दृश्य या श्रव्य माध्यमों को रिप्लेस नहीं करेंगी या इसका उल्टा, बल्कि सब विधाएं अपनी अपनी जगह बनाए रखेंगी, उनकी अपनी अहमियत होगी. आजकल कितनी किताबें छपती हैं, ये आंकड़े मेरी बात को ज्यादा सही तरीके से साबित करेंगे. आज के बाजारवादी समय में प्रकाशक घाटे का सौदा तो नहीं करते होंगे.

गौरव सोलंकी

‘इस बार मुझे अपना गांव बेगाना सा लगा’

मेरा गांव बिहार के वैशाली जिले में आता है, गांव का नाम है बान्थु. इसका सामाजिक ताना-बाना कुछ ऐसा है कि यहां भूमिहारों का बोलबाला है. बिहार की सवर्ण जातियों में इस जाति का प्रभुत्व कितना है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं.

अभी कुछ दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं मैं. गांव में प्रवास करीब बीस दिनों का था इसलिए इस बार मेरे पास समय थोड़ा ज्यादा था, अपने उस गांव को देखने-समझने और पहचानने का जहां से मेरी जड़ें जुड़ी हुई हैं. इसी गांव में मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले मुझे अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थीं. वे जैसे भी थे पर बहुत अच्छे लगते थे.

इन लोगों को गांव में हर साल एक-सवा लाख रुपए की लागत से रामभजन करवाकर पुण्य कमाने की भूख रहती है, पेटू साधुओं को पालने की फिक्र रहती है, लेकिन अपने गांव के किसी बेहद गरीब के लिए एक कंबल जुटाना बहुत भारी पड़ जाता है.

अबकी बार वे सभी लोग मुझे अच्छे नहीं लगे.

इसकी वजहें भी बहुत टीस देने वाली हैं. जमाना कितना ही बदल गया हो मगर आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे कमर के नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उसे (भूमिहारों को) अपना मालिक और अन्नदाता कहे, भूखा रहकर भी उनकी बेगारी करता रहे. चुपचाप, कोई शिकायत न करे.

मेरे गांव के चाचा, बाबा और भाई, सभी लोग प्रदेश सरकार से दुखी हैं. उनकी सोच नाक की सीध में जाती है, दाएं-बाएं सोचने की न फुर्सत है, न कुव्वत. सबका एकमत से विचार है कि बिहार की मौजूदा सरकार ने इन छोटी जातियों का मन बढ़ा दिया है. सब लोग दिन-रात पानी पी-पी कर सरकार को गरियाते हैं. उनका मानना है कि घोर कलजुग आ गया है और ऐसे ही चलता रहा तो हर कोई एक ही घाट से पानी पीने लगेगा.

मुझे इस बार लगा कि गांव का सवर्ण वर्ग सबसे ज्यादा भ्रष्ट है, कामचोर है, पाखंड से घिरा हुआ है.

इन लोगों को गांव में हर साल एक-सवा लाख रुपए की लागत से रामभजन करवाकर पुण्य कमाने की भूख रहती है, पेटू साधुओं को पालने की फिक्र रहती है, लेकिन अपने गांव के किसी बेहद गरीब के लिए एक कंबल जुटाना बहुत भारी पड़ जाता है. ये ऐसे लोग हैं जिन्हें यह जरूर मालूम है कि रामचरितमानस में कितनी चौपाइयां और कितने दोहे हैं, लेकिन इनको इसकी जानकारी नहीं होती कि गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली रोड की ढलाई का ठेका किसने लिया था और काम बीच में ही क्यों रुका हुआ है. जानकारी हो भी तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

बड़ी विचित्र स्थिति है. अपने समाज के दोगलेपन पर मुझे हैरत भी होती है और गुस्सा भी आता है. मगर क्या किया जाए. तथाकथित ऊंची जातियों के ये लोग बाहर से बेहद धार्मिक टाइप दिखने वाले ऐसे प्राणी हैं जो मांसाहार और मदिरापान भी दिन देखकर करते हैं.

मैंने अपने गांव में ऐसे लोगों को भी देखा है जो झोपड़ीनुमा घर में रहने वालों से ब्याज वसूलने के किए किसी भी हद तक जा सकते हैं लेकिन यज्ञ के नाम पर एक हजार का चंदा सीना फैलाकर देते हैं और फिर सारे गांव में घूम-घूमकर इस बात का जिक्र करते हैं कि उन्होंने इतना चंदा दिया, फलां से इतनी ज्यादा रकम दी.
इन लोगों को इस बात का बहुत दुख सताता है कि उनके गांव के किनारे झोपड़ी में जिंदगी बिताने वाले लोग कैसे पक्के मकान बनाते जा रहे हैं. इन्हें चिंता होती है कि सब तरक्की करने लग गए तो इनका क्या होगा. इनके महत्व का क्या होगा. ये चाहते हैं कि स्थितियां जैसी आज तक रही हैं आगे भी वैसे ही रहें. उनमें कोई बदलाव न आए. दरअसल, ये अमीर और खाते-पीते लोग हैं जो चाहते हैं कि इनके गांव के गरीब हमेशा गरीब ही रहें. अनपढ़ हमेशा अनपढ़ ही रहें ताकि वे आगे भी इनकी चाकरी करते रहें. ऐसा होगा तभी तो उनकी सामाजिक हैसियत ऊंची बनी रहेगी. 

इन सारी वजहों से मुझे इस बार अपने लोग अपने नहीं लगे, अच्छे नहीं लगे. अपना गांव अच्छा नहीं लगा.

बिहार : कितनी जीत, कितनी हार

‘नीतीश कुमार ने मेरी तरफ देखा और बोले कि उन्होंने बिहार के लोगों से कुछ नहीं कहा है बल्कि खुद से एक वादा किया है कि वे बिहार को बदल देंगे. नीतीश कुमार ने दूसरी बार भी मेरे दिल को छू लिया था. मुझे लगा कि इस आदमी में हिम्मत है.’ पटना स्थित राज्य सचिवालय तक पहुंचते-पहुंचते उमर हेजाजीन उस घड़ी को कोसने लगे थे जब उन्होंने बिहार वापस लौटने की सोची थी. खाड़ी के इस कारोबारी को कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुई मुलाकात याद आ रही थी. नीतीश बिहारी मूल के ऐसे लोगों की तलाश में थे जो बिहार को उसकी बदहाल स्थिति से उबारने में उनकी मदद कर सकें. उमर को याद है कि उस मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री कितने अच्छे मूड में थे. उनका आग्रह था कि उमर आज के बिहार पर एक नजर डालकर तो देखें. इस बैठक में उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी भी मौजूद थे. उमर को लगा कि एक बार कोशिश करने में क्या हर्ज है. इसलिए उन्होंने हामी भर दी और उस साल की अपनी 122वीं फ्लाइट पकड़कर दुबई से पटना के लिए रवाना हो गए.

पटना पहुंचते ही उन्हें अपने फैसले पर शक होने लगा.सदियों तक लोगों के विचार और उनके विकास को आकार देते रहनेवाले इस शहर का अपना आकार ही बिगड़ा पड़ा था. हर तरफ बेहिसाब भीड़, धक्का-मुक्की, शोर-शराबा, झुकी कमर के साथ वजन खींचते रिक्शेवाले और माहौल में बसी सीली गंध. ‘या अल्लाह, कुछ भी नहीं बदला,’ उमर ने सोचा. वे 22 साल बाद पटना आए थे और शहर अब भी पहले की तरह बदहाल था.चमचमाते कपड़े पहने वे सचिवालय में दाखिल हुए तो सबसे पहले उन्हें रोककर उनसे आने की वजह पूछी गई. जैसा कि उमर बताते हैं, ‘मैंने सोचा, भई क्या बात है, मेरे लिए यह प्रोफेशनलिज्म का पहला संकेत था. मैंने चारों तरफ देखा. कोई भी सफेद या खादी के कपड़े पहने नजर नहीं आया.’ औपचारिकताओं से निबटकर उमर मुख्यमंत्री के चेंबर में दाखिल हुए. मुलाकात को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘मैंने उनसे कह दिया कि मुझे बिहार में कोई बदलाव नहीं दिखा. नीतीश कुमार ने मेरी तरफ देखा और बोले कि उन्होंने बिहार के लोगों से कुछ नहीं कहा है बल्कि खुद से एक वादा किया है कि वे बिहार को बदल देंगे. नीतीश कुमार ने दूसरी बार भी मेरे दिल को छू लिया था. मुझे लगा कि इस आदमी में हिम्मत है.’

नीतीश ने उमर से पूछा कि वे बिहार के लिए क्या कर सकते हैं. मुख्यमंत्री का कहना था कि खाड़ी में हजारों बिहारी मजदूर हैं और उमर इस बारे में कुछ सोचें. जैसा कि उमर याद करते हैं, ‘मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं कोई एक क्षेत्र चुन लूं और उसमें निवेश करूं.’ एक दिन बाद ही उमर के पास योजना तैयार थी. खाड़ी देशों में अकुशल श्रमिक के तौर पर काम करनेवाले करीब 10,000 बिहारी हैं. उमर ने सोचा कि क्यों न इन लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर तकनीकी शिक्षा में डिग्री दी जाए ताकि वे ज्यादा कमा सकें और बेहतर जिंदगी गुजार सकें.

मगर बिहार में सिर्फ योजना का होना कोई खास मायने नहीं रखता. योजना को जमीन पर उतारने के लिए जमीन भी चाहिए. और इसी जमीन को पाने की कहानी बिहार में खासी मुश्किलों से भरी है. इसे समझने के लिए हमें बात 1786 से शुरू करनी पड़ेगी. 1786 वह साल था जब लॉर्ड कॉर्नवालिस को भारत का गवर्नर जनरल और बंगाल का कमांडर इन चीफ बनाया गया था. कमान संभालने के बाद कॉर्नवालिस ने राजस्व व्यवस्था का ढर्रा बदलने की ठानी. यह काम बिहार से शुरू हुआ, जो तब पूर्वी भारत के बंगाल प्रांत का हिस्सा था. उसने स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था लागू की. इसके तहत जमीन को सार्वजनिक की बजाय व्यक्तिगत संपत्तियों में तब्दील कर दिया. रियासतों को गांव के गांव मुफ्त में दे दिए गए. बस उनका जिम्मा यह था कि वे उनमें रहनेवाली आबादी से टैक्स वसूल करें और जैसे भी हो सके एक तय रकम नियमित तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाने में पहुंचाएं. यहीं से जमींदारी प्रथा की नींव पड़ी. अब किसान अपनी जमीन के मालिक न होकर बंटाईदार थे और जमींदारों और उनके कारिंदों की मौज थी. पीढ़ी दर पीढ़ी इस जमीन का उत्तराधिकारियों में बंटवारा होता रहा. वक्त के साथ राज तो बदला मगर राज ने समाज की इस व्यवस्था में कभी दखल नहीं दिया. यह सिलसिला अब तक जारी है. यही वजह है कि बिहार में सरकार निजी निवेशकों के लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं करती.

वापस उमर की कहानी पर आते हैं. उमर को तकनीकी शिक्षा के लिए संस्थान खोलना था और उसके लिए जमीन की जरूरत थी. मगर आप समझ ही चुके हैं कि इस मामले में सरकार क्यों कुछ नहीं कर सकती थी. उमर बताते हैं, ‘नीतीश कुमार ने  सुझाव दिया कि मैं एक आईटीआई (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) का अधिग्रहण कर लूं और इसे फायदे में चलाने की कोशिश करूं. हम दरभंगा गए. पता चला कि वहां तो शिक्षकों को महीनों से तनख्वाह ही नहीं मिली है. महंगी मशीनें बेकार हो चुकी थीं. साफ लग रहा था कि किसी भी आईटीआई को चलाने में बहुत मुश्किलें आएंगी. हमने सोचा कि क्यों न हम खुद ही एक इंस्टिट्यूट खोल लें. हमने एक फैमिली ट्रस्ट बनाया और दरभंगा में जमीन खरीदनी शुरू कर दी.’

यह है नया बिहार, जहां मुख्यमंत्री कारोबारियों से खुद बात करता है और चीजें बदलने लगती हैं. नीतीश कुमार जो सुधार ला रहे हैं उनमें से एक यह भी है कि प्रस्ताव अब कहीं जल्दी मंजूर हो जाते हैं

बिहार के इस हिस्से में जोतें बहुत बड़ी नहीं हैं, इसलिए अगर कोई काफी जमीन खरीदना चाहे तो उसे कई लोगों से बात करनी पड़ती है. इस प्रकार यह प्रक्रिया बड़ी जटिल हो जाती है, जिसमें थोड़ी-सी भी लापरवाही हुई नहीं कि मामला फंसा. उमर बताते हैं, ‘एक किसान अचानक तीन लाख रुपए और मांगने लगा. उसका कहना था कि उसे अपनी बेटी का दहेज चुकाना है. तब तक हम उसे उसकी जमीन के लिए तय हुई रकम भी दे चुके थे. आखिर में हमने उसे पैसे दे दिए.’
उमर के ट्रस्ट ने 15 लाख रु. प्रति एकड़ की दर से 32 एकड़ जमीन खरीदी. मगर इससे उनके लिए और मुश्किलें पैदा हो गईं. जैसा कि उमर कहते हैं, ‘छोटे कस्बों में हर चीज का हौवा बन जाता है. हमारे जमीन खरीदने के दो नतीजे हुए. पहला, लोगों को लगने लगा कि मेरे पास पैसे का पेड़ है. मेरे माता-पिता ने आगाह किया कि अब मैं अपहरण के लिए सबसे बढ़िया टारगेट हूं. हमने स्थानीय सिक्योरिटी गार्ड्स रख लिए. मगर इससे मुझे असुविधा होने लगी. मैंने अफ्रीका और श्रीलंका में लोगों को बंदूकधारी गार्डों के साथ चलते हुए देखा है और मुझे यह कभी भी अच्छा नहीं लगा. मेरी हर बातचीत गार्डों को भी पता होती थी. मैंने उन्हें हटा दिया और निजी बंदूक के लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया. दूसरा असर यह हुआ कि जमीनों के दाम बढ़ गए.’

दरभंगा जैसे शहर से उमर ज्यादा कुछ पाने की उम्मीद नहीं कर सकते थे, क्योंकि वह तो खुद ही अपने बोझ तले चरमरा रहा था. प्रस्तावित तकनीकी शिक्षा संस्थान तक पहुंचने के लिए सड़क की भी जरूरत थी. पिछले 22 साल से विदेश में रहते हुए उमर ने फिल्मों, टीवी और रेडियो के लिए निर्माण कार्य किया था. दरभंगा में वे एक नए तरह के निर्माण कार्य से जुड़े. जैसा कि उमर बताते हैं, ‘दरभंगा में सड़कों की हालत बहुत खराब है इसलिए हमने एक कंपनी खोली और सड़कें और इमारतें बनाने का काम शुरू कर दिया.’ ओकपेट कंस्ट्रक्शन एंड सर्विसेज नाम की यह कंपनी दरभंगा के उस हिस्से में 21 किमी सड़क बना रही है, जहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल है. इसमें उमर के 12 करोड़ रु. खर्च हो रहे हैं और उन्हें इस सड़क से दो करोड़ रुपए के मुनाफे की उम्मीद है.

हालांकि दरभंगा के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों जो हलचल हो रही है, उसका लेना-देना सिर्फ उमर की कंपनी से ही नहीं है. राज्य सरकार भी शहर में पुल और सड़कें बना रही है. इसके अलावा केंद्र भी राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने में जुटा है. यानी गरीबों के लिए आज यहां जगह-जगह पर कुछ न कुछ काम उपलब्ध है. आखिरकार ऐसा लग रहा है कि जैसे बिहार का एक हिस्सा जागकर चलने लगा है. अब उमर यहां इतने सहज हो गए हैं कि वे फूड प्रोसेसिंग यानी खाद्य प्रसंस्करण का काम भी शुरू कर रहे हैं. उनकी इस सहजता के इस दायरे में चाय-पानी और बच्चों की मिठाई जैसे भारतीय दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाले शब्द तक आ गए हैं. जैसा कि उमर बताते हैं, ‘मेरे कुल खर्च का सवा फीसदी हिस्सा इसी में जाता है. अगर इससे काम आसान हो जाता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं. यूएई में मुझे सड़कों के लिए भारी-भरकम टेस्टिंग फीस चुकानी पड़ती है. यहां टेस्टिंग करने के लिए इंजीनियर रात में भी आ जाता है. ऐसे में यह जायज ही है कि उसे कुछ मिल जाए.’ उमर के मुताबिक पिछले तीन साल में उन्होंने 32 करोड़ निवेश किए हैं और उन्हें उम्मीद है कि वक्त के साथ ये वसूल हो जाएंगे.

यह है नया बिहार, जहां मुख्यमंत्री कारोबारियों से खुद बात करता है और चीजें बदलने लगती हैं. नीतीश कुमार जो सुधार ला रहे हैं उनमें से एक यह भी है कि प्रस्ताव अब कहीं जल्दी मंजूर हो जाते हैं. दूसरा बड़ा बदलाव हुआ है कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर. अब पटना में सड़कें और बाजार सर्दी के दिनों में भी रात के साढ़े आठ बजे तक गुलजार रहने लगे हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले दिन ढलते ही सड़कें सूनी हो जाती थीं. सूरज छिपने के बाद घर से बाहर रहने का मतलब था कि आपने खुद ही लूट, झपटमारी या फिर अपने अपहरण को न्योता दे दिया है. लोगों के मुताबिक पहले ट्रेन या बस से पटना लौटनेवाले यदि रात दस बजे के बाद शहर पहुंचते थे तो वे पूरी रात स्टेशन पर ही बिताकर सुबह घर जाते थे.

अब माहौल में राहत घुल गई है. इतनी कि कुछ लोग तो फिल्म का नाइट शो भी देख आते हैं और वह भी अपने पूरे परिवार के साथ. बिहार में सबसे बढ़िया कहे जाने वाले मोना सिनेमा में अब कामकाजी दिनों में भी रात के शो में खासी भीड़ रहने लगी है. फिल्मी दुनिया इससे खुश है. जाने-माने निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा यहां बड़ा निवेश कर रहे हैं. वे कहते हैं कि पटना के दिल यानी पाटलिपुत्र इंडस्ट्रियल एस्टेट में बननेवाला उनका पीएंडएम मॉल बिहार का पहला मल्टीप्लेक्स मॉल होगा. पांच मंजिलों वाली इस इमारत में 59 दुकानें और चार फिल्म थिएटर होंगे. इस जगह पर पहले बीमार औद्योगिक इकाइयां थीं. उम्मीद की जा रही है कि मार्च में जब झा की नई और चर्चित फिल्म ‘राजनीति’ आएगी तो यह मॉल भी बनकर तैयार होगा. तब यह देखने को मिल सकता है कि पटना में 1,200 लोग आधी रात को एकसाथ फिल्म देख कर घर लौट रहे हों. ज्यादा पुरानी बात नहीं जब ऐसा सोचना भी दूर की बात थी.झा कहते हैं, ‘कई सालों तक उल्टे गियर में चलती रही गाड़ी को आगे की तरफ दौड़ाने में साढ़े चार लगे हैं. अब हमें निवेश के लिए बेहतर माहौल मिल रहा है. मगर निजी क्षेत्र एक रात में ही पैदा नहीं होगा, वह भी तब जब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु में अवसर बेहतर हों. नजरिया बदलना होगा. बिहारी ही अगर बिहार में नहीं रहेंगे तो दूसरे ऐसा क्यों करेंगे. जाति और वर्ग की समस्या से सिर्फ एक ही चीज निपट सकती है और वह है पूंजी का उत्पादन. मैं अपने हिस्से का काम कर रहा हूं. मॉल के अलावा मैंने बिहार का पहला स्थानीय न्यूज चैनल मौर्य टीवी शुरू किया है, जिसका सारा काम-काज पटना में ही हो रहा है.’

राज्य के पश्चिमी चंपारण जिले के मुख्यालय बेतिया के मूल निवासी झा, नीतीश से खुश हैं. भोजपुरी फिल्मों के सितारे रवि किशन और मनोज तिवारी भी मुख्यमंत्री की तारीफ करते हैं. 100 से ऊपर फिल्मों में काम कर चुके रवि किशन भोजपुरी में देवदास बनाने की तैयारी में हैं जिसकी पृष्ठभूमि पटना की होगी. वे पटना के पास ही एक फिल्म सिटी बनाने की भी वकालत कर रहे हैं. रवि किशन कहते हैं, ‘पहले हम शूटिंग के सिलसिले में रात में यात्रा नहीं कर पाते थे. लोग डरते थे. अब लंबे समय तक घुटन में जीता रहा यह राज्य सांस लेने लगा है. अगर हमें फिल्म सिटी मिल जाए तो मैं भरोसा दे सकता हूं कि यहां हर साल सौ भोजपुरी फिल्में बनने लगेंगी.’ अभिनेता और गायक मनोज तिवारी कहते हैं कि पहले बिहार में सरकार कलाकारों की इज्जत नहीं करती थी. वे बताते हैं, ‘पिछली सरकारों के दौर में परफॉर्मेंस के लिए मुझे मंत्रियों के फोन आते थे. वे हमें डराते थे. डर के मारे मैं उनके लिए परफॉर्म किया करता था. अब अगर सचिवालय से फोन आता है तो वे हमसे हमारी फीस और सुविधाओं के बारे में पूछते हैं. शूटिंग के लिए लोकेशन देने का काम प्राथमिकता से होता है और पुलिस सुरक्षा भी देती है.’

नीतीश हवा का रुख समझ रहे हैं और यह उनकी चाल-ढाल में भी दिख रहा है. अब वे बिहार के हीरो हैं. वे गंगा में तैरते एक जहाज में कैबिनेट मीटिंग बुलाते हैं और मीडिया उन्हें हाथों-हाथ लेता है. वे राज्य के अलग-अलग हिस्सों में डेरा डालते हैं, उसी जगह पर कैबिनेट की बैठक भी कर डालते हैं और हर कोई उनकी तारीफ करता है. उन्हें विश्वास हो चुका है कि वे भारत में पुनर्निर्माण की सबसे बड़ी इबारत लिख रहे हैं. वे यह भी मानते हैं कि वे जो भी कर रहे हैं सही कर रहे हैं. कभी लालू भी ऐसा ही सोचते थे मगर यही सोच उन्हें ऐसी दिशा में ले गई कि बिहार अंधेरे की तरफ बढ़कर उसमें खोने-सा लगा था.

लेकिन ऐसा नहीं कि उनके राज में सब-कुछ हरा ही हरा हो. वास्तविकता यह है कि ज्यादातर चहल-पहल पटना के 30 किमी के दायरे में ही सिमटी हुई है.

बिहार की खासियत है कि यहां हर बात पर हर किसी का एक नजरिया होता है. और यह इतना मजबूत होता है कि उसे डिगा पाना आसान नहीं होता. यह खासियत ही इसे राजनीतिक रूप से देश का सबसे जागरूक राज्य बनाती है. लेकिन जब सत्ता की बात आती है तो लोग राज्य के मुखिया पर ऐसे मोहित हो जाते हैं कि वही मुखिया फिर खुद को सबसे ऊपर समझने लगता है. एक समय लालू राजा थे. अब वह जगह नीतीश ने संभाल ली है. लालू जनता के आदमी थे. वे लोगों से जुड़ सकते थे, सहज बुद्धि से शासन करते थे, हाव-भाव का महत्व जानते थे. नीतीश उनसे अलग हैं. वे नौकरशाहों के चहेते हैं. वे काम कर सकते हैं. वे तर्कबुद्धि से शासन करते हैं. वे वादों को पूरा करने का महत्व समझते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं कि उनके राज में सब-कुछ हरा ही हरा हो. वास्तविकता यह है कि ज्यादातर चहल-पहल पटना के 30 किमी के दायरे में ही सिमटी हुई है.
गया में रहने वाले निरंजन पासवान भाकपा माले (लिबरेशन) के जिला सचिव हैं. यह पटना के बाद राज्य का दूसरा सबसे बड़ा जिला है. गया में एक हवाई अड्डा भी है जो यहां आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिए बनाया गया है. पासवान जिस इलाके में काम करते हैं वह बिहार के सबसे बदहाल इलाकों में से है. ऐसी जगह में गरीबों के बीच काम करते हुए उन्हें बिहार में कोई खास बदलाव नहीं दिखता. वे कहते हैं, ‘हमारे लिए यह हमेशा से ऐसा ही है. हम भूख से मर रहे लोगों के बारे में सुनते हैं, वहां जाते हैं, इसपर आवाज उठाते हैं. लेकिन प्रशासन कह देता है कि मौत बीमारी से हुई है. हमें बताइए कि क्या बदला है?’

गया के डोभी प्रखंड का गाजीचक गांव पटना की तुलना में कम से कम एक सदी पीछे लगता है. रविवार की दोपहर है. हमें एक लड़का नजर आता है जो मरी हुई बकरी की खाल का कोई हिस्सा लिए हुए है. पास जाने पर नजर आता है कि यह टांगों का हिस्सा है. लड़का सावधानी से इसमें सूखी हुई घास भर रहा है. कुछ और बच्चे भी जमा हो गए हैं. पासवान कहते हैं, ‘अब वे इसे पकाएंगे.’ अंदर भरी घास में लगी आग मांस को भीतर से पकाएगी और बाहर का हिस्सा आग से सीधा ही पक जाएगा. यह उनके आज के दिन का खाना है. यहां से बाहर की दुनिया के लिए खाल एक बेकार की चीज है जो फेंक दी जाती है, लेकिन यहां यही स्वादिष्ट व्यंजन है.

इसी गांव में रहती हैं कुंवा देवी. उनके चार बच्चे हैं, तीन बेटियां और एक बेटा. वे अपनी उम्र 35 साल बताती हैं. मई, 2009 में भूख से मरने से पहले उनके पति खेतों में काम करते थे. कुंवा देवी बताती हैं कि उनके पति को बुखार था और स्थानीय झोला छाप डॉक्टर ने उसे मलेरिया बताया था. उनके पास दवा खरीदने लायक पैसा नहीं था. गांव वालों ने आपस में पैसे जमा किए और आखिरकार उन्हें दवा नसीब हुई. लेकिन कुंवा देवी के घर में खाने की चीजों की बेहद कमी थी क्योंकि उनके पति बीमारी की वजह से काम ही नहीं कर पा रहे थे. वे बताती हैं कि पति ने खाना बंद कर दिया था ताकि बच्चे खा सकें. उनके शब्दों में, ‘हम जंगल से घास लाकर उन्हें खिलाते थे. लेकिन इससे क्या होता है.’

पासवान बताते हैं कि कुंवा देवी के पति भूख से मर गए. लेकिन प्रशासन ने कहा कि मौत बीमारी से हुई. कुंवा का परिवार झोंपड़ीनुमा तीन कोठरियों में रहता है, कुल जमा संपत्ति है कुछ बरतन और एक छोटे थैले में भरे मोटे चावल. ये चावल उन्हें खेत पर काम करने के बदले मिले हैं. मजदूरी के रूप में उन्हें पैसा नहीं मिलता. जैसे-तैसे वे अपने बच्चों के लिए मांड़-भात का ही जुगाड़ कर पाती हैं. एक टहनी चुभने के बाद उनकी बाईं आंख की रोशनी भी जाती रही. उनके परिवार में कोई चप्पल नहीं पहनता. बच्चे कई दिनों से नहाए नहीं हैं और चीकट बाल लिए घूम रहे हैं.

पासवान की पार्टी के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य हमें पटना के वीरचंद पटेल मार्ग स्थित अपने कार्यालय में मिलते हैं. अधिकतर पार्टियों के मुख्यालय इसी सड़क पर हैं. भाकपा माले के पड़ोस में भाजपा का कार्यालय है. दीपंकर के आने से पहले तेज बूंदाबांदी हुई है, इसलिए कार्यालय में आग जल रही है. उनकी पत्नी और बेटी लंदन में रहती हैं और वे यहां बिहार के बेहद गरीब लोगों की बेहतरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनकी पार्टी के विधानसभा में पांच विधायक हैं. वे कहते हैं, ‘यह कहना गलत होगा कि पिछले पांच वर्षों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. लालू का 15 वर्षों का कार्यकाल ठहराव का पर्याय बन गया था. अब बड़े अपराधों में कमी आई है. अपराधों का कुछ-कुछ राष्ट्रीयकरण हुआ है. बड़े अपराधी ट्रांसपोर्ट के जरिए कमा रहे हैं. अगर आपके लिए सरकार का खजाना खुला हुआ हो तो आप लूट-पाट और अपहरण क्यों करेंगे? इस दौरान विमर्श के विषय भी बदले हैं. अब सामाजिक न्याय और सम्मान की जगह सुशासन और विकास ने ले ली है…लेकिन एक बड़ी समस्या है. बिहार में सामंतवाद अब भी मजबूत है. सरकार भूमि सुधार लागू करने का दिखावा भर करेगी मगर असलियत में ऐसा नहीं होगा. सामाजिक रूप से भी बहुत थोड़ी ही प्रगति हुई है. बदलाव यों ही नहीं आता. उसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. छोटे बदलाव के लिए भी बड़ा संघर्ष जरूरी होता है.’

जानकार और इस क्षेत्र पर नजर रखनेवाले भी बिहार की वृद्धि दर के ताजा आंकड़ों से हैरत में पड़ गए हैं. पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एनके चौधरी विश्वविद्यालय शिक्षकों की हड़ताल का हवाला देते हैं. वे पूछते हैं कि अगर सब-कुछ इतना ही अच्छा है तो क्या आप ऐसी किसी हड़ताल की कल्पना भी कर सकते हैं जिसमें विश्वविद्यालय के शिक्षकों की एकमात्र मांग यह हो कि उन्हें समय पर वेतन मिल जाए? बिहार के दूसरे अनेक लोगों की तरह चौधरी भी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ), नई दिल्ली द्वारा जारी किए गए बिहार के 11.3 प्रतिशत वृद्धि दर वाले आंकड़े पर चकित हैं. इस आंकड़े ने भारी हलचल पैदा कर दी है. यह आंकड़ा आने के बाद लोगों ने बिहार को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया है. लोग अब बिहार की तुलना गुजरात से करने लगे हैं.

लेकिन चौधरी को यह कोरी कल्पना ही लगती है. वे कहते हैं, ‘हकीकत में इतनी वृद्धि नहीं हो सकती क्योंकि बिहार जादुई अर्थव्यवस्था नहीं है. सांख्यिकी विभाग के मुखिया प्रणव सेन के यह कहने के बाद कि ये आंकड़े सीएसओ के नहीं हैं, इनका आधार कमजोर हो गया है. नीतीश द्वारा किया गया प्रचार औंधे मुंह गिर गया है. इतने अच्छे आंकड़ों पर यकीन करना मुश्किल है. यह तो ऐसा हुआ जैसे आपने किसी भिखारी को अचानक यह कह दिया कि तुम अमीर बन गए हो. अगर आप बहुत नीचे से शुरू कर रहे हों तो आगे की ओर एक छोटा कदम भी बड़ी बात होती है.’

दरअसल, बिहार पिछले साठ साल से लगभग जमा हुआ था. कम से कम पिछली तीन पीढ़ियों से वहां काम-धंधों का कोई इतिहास नहीं. कोई नवजागरण नहीं, कोई उद्योग नहीं.

चौधरी कहते हैं कि बिहार कुछ के लिए चमकदार हो सकता है लेकिन बाकियों के लिए यह अब भी काफी पिछड़ा है. उनके हिसाब से स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और सड़कों के क्षेत्र में कुछ सुधार हुआ है. लेकिन जिन क्षेत्रों में कोई सुधार नहीं हुआ है उनकी सूची कहीं लंबी है. वे बताते हैं कि यहां नौकरशाही को अपार ताकत मिली हुई है, कानून का कोई शासन नहीं है, भूमि सुधार नहीं है, जल संसाधन प्रबंधन नहीं है उच्च शिक्षा की समुचित सुविधा नहीं है. इसके उलट सरकारी धन के अधिक प्रवाह के कारण भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और सरकार रिश्वत लेनेवाले नौकरशाहों पर लगाम नहीं लगा पा रही है. इसके साथ ही पलायन भी बढता जा रहा है.

दरअसल, बिहार पिछले साठ साल से लगभग जमा हुआ था. कम से कम पिछली तीन पीढ़ियों से वहां काम-धंधों का कोई इतिहास नहीं. कोई नवजागरण नहीं, कोई उद्योग नहीं. असमानता यहां हद दर्जे तक है. लेकिन इसके बावजूद लोगों की आंखों में एक उम्मीद दिखती है. यही वह बात है, जिससे यह संभावना जगती है कि बिहार इस बार शायद एक लंबी दौड़ के लिए खुद को तैयार कर रहा है.

एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री) के सदस्य सचिव शैवाल गुप्ता का मानना है कि हालिया घटनाओं का महत्व है. ‘नीतीश कुमार इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं? वे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने बिहार में शासन के अभाव को गंभीरता से लिया. उन्होंने शासन का ढांचा खड़ा करने में थोड़ी सफलता पाई है. वे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने प्रशासनिक सुधार आयोग, भूमि सुधार आयोग आदि बनाए. वे ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें प्रकाश झा जैसी शख्सियतें काम कर सकें. अब यह शर्मीले समाज के बजाय सक्षम समाज के रूप में आगे बढ़ रहा है.’

बिहार फाउंडेशन के जरिए भी बिहार चर्चा में आ रहा है. राज्य सरकार के तहत काम कर रही इस फाउंडेशन का काम है ‘बॉंडिंग और ब्रांडिग’ यानी लोगों को जोड़ना और राज्य की छवि निखारना. देश-विदेश में इसकी शाखाएं हैं. देश में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु में तो देश के बाहर दुबई, दोहा और दक्षिण कोरिया में. ये शाखाएं अपनी जड़ों की पहचान करने और बिहार के लिए कुछ करने में प्रवासी बिहारियों की मदद करती हैं.

अपनी जड़ों से जुड़ाव एक ऐसी चीज है जो बड़ों-बड़ों की संवेदना छू लेती है. जैसे भारत में मॉरीशस के उच्चायुक्त मुखेसुर चूनी बिहार का जिक्र छिड़ने पर भावुक हो जाते हैं. वे मॉरीशस को बिहार का एक विस्तारित हिस्सा ही मानते हैं. बिहार की प्रगति पर गर्वित होते हुए चूनी कहते हैं, ‘लोग अकसर मुझसे पूछते हैं कि क्या आप बिहार के उच्चायुक्त हैं. मॉरीशस के प्रधानमंत्री का संबंध बिहार से है और बिहार तथा उत्तर प्रदेश के लोग मॉरीशस को चला रहे हैं.’ मॉरीशस के सार्वजनिक संरचना, भूपरिवहन और जहाजरानी मंत्री अनिल कुमार बच्चू भी बिहार के बारे में भावुक होकर बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘1970 के दशक में जब मैं दिल्ली में पढ़ रहा था, मेरे सीनियर मुझसे कहते थे कि बिहारियों से संपर्क मत रखो क्योंकि वे पिछड़े हैं और कभी कामयाब नहीं हो सकते. अभी कुछ हफ्ते पहले मेरे प्रधानमंत्री ने मुझसे कुछ बिहारियों को बुलाने के लिए कहा. हमने मॉरीशस में वे सब चीजें संजो कर रखी हैं जो उन्होंने बिहार में खो दी हैं. मॉरीशस छोटा बिहार है. हमारे रिश्ते इतने गहरे हैं कि उन्हें बिहार में सर्दी लगती है तो हमें यहां छींक आती है. हमें अपनी जड़ों से प्यार है. बिहार सभ्यता का स्रोत था और यही भविष्य के भारत का नेतृत्व करेगा.’

लेकिन ऐसा हो इसके लिए अभी बहुत-सी कोशिशों की दरकार है. हालांकि उम्मीद की छोटी-छोटी किरणों कई हैं जो यह बताती हैं कि ईमानदारी और कड़ी मेहनत से बिहार बदल सकता है. राकेश शर्मा को ही लीजिए जो एक व्यवसायी हैं और पटना में शादियों के लिए सामुदायिक भवन किराए पर देते हैं. उनकी रसोई गैस की एजेंसी भी है. वे बताते हैं कि बिजली कटौती के कारण पिछले साल नवंबर-दिसंबर में उनके जेनरेटर में मात्र 20 लीटर डीजल की खपत हुई जबकि 2008 में यह आंकड़ा 200 लीटर था.

यही छोटी-छोटी कहानियां बड़े स्तर पर दोहराकर नीतीश एक नया बिहार बनाना चाहते हैं. लंबे समय से बदहाल यह राज्य आज हर मामले में पेंदी पर है. और नीतीश इतिहास लिखने की राह पर. अगर वे इस पेंदी से राज्य को जरा भी और ऊपर उठा सके तो.

राजू भाई एमबीबीएस

हिरानी के अपने जीवन की पटकथा में ‘3 इडियट्स’ की सफलता वाला दृश्य कोई मायने नहीं रखता. उनके लिए सफलता के मायने अपने जीवन के अधिक व्यक्तिगत और दिल को हौले से छू लेने वाले क्षणों में छिपे हैं. जैसे वह क्षण जब उन्होंने पहली बार अपने पिता से कहा था कि वे एकाउंटेंट न बनकर फिल्में बनाना चाहते हैंसफलता पर आम से अलग रुख रखना हमेशा से ही मुश्किल काम रहा है. बाजार के इस दौर में तो यह और भी मुश्किल है. आज सफलता के मायने हैं शोहरत और पैसा. चलन कहता है कि इसके अलावा सफलता की कोई और माप हो ही नहीं सकती. एक ऐसे व्यक्ति के लिए तो बिलकुल भी नहीं जो पैसे और परंपराओं को बहुत महत्व देने वाले सिंधी समुदाय से आता हो. मगर जब हम बॉलीवुड की अब तक की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म बनाने वाले राजू हिरानी से पूछते हैं कि उनके लिए सफलता के मायने क्या हैं तो 44 साल के इस शख्स की असाधारणता की परतें एक-एक कर खुलने लगती हैं. उनकी नई फिल्म ‘3 इडियट्स’ पहले 20 दिनों में ही 350 करोड़ रुपयों से ज्यादा कमा चुकी थी जो इससे पहले के रिकॉर्ड वाली फिल्म गजनी के मुकाबले दुगुनी रकम है. आंकड़ों को छोड़िए, इस फिल्म ने समाज में सोई हुई एक भावना को जगा दिया है और ‘ऑल इज वेल’ पिछले महीने का राष्ट्रीय नारा बना रहा.

फिर भी अविश्वसनीय ढंग से तहलका के दफ्तर के नीचे एक कॉफ़ी शॉप में बैठे, अपनत्व और नरमी से भरे हिरानी इस विराट सफलता से बेअसर लगते हैं. अपने स्टारडम के बावजूद मेरी सुविधा के लिए वे शहर भर के ट्रैफिक से गुजरकर खुशी से यहां तक चले आए हैं. आम तौर पर इंटरव्यू लेने वाले को ही स्टार के पास जाना पड़ता है. 20 साल से भी पहले हिरानी ने एफ़टीआईआई (फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे) के अपने कमरे के एकांत में उत्तेजना से कांपती हुई उंगलियों से अपनी ऑटोग्राफ बुक में हस्ताक्षर किए थे: राजू हिरानी: एडिटर, निर्देशक, निर्माता, 1988. उस क्षण सारा संसार मानो उनके आगे सर झुकाकर खडा़ था और उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें उसे जीतने से कोई नहीं रोक सकेगा. उनका खुद पर जताया वह भरोसा आज सही साबित हो चुका है.

लेकिन हिरानी के अपने जीवन की पटकथा में ‘3 इडियट्स’ की सफलता वाला दृश्य कोई मायने नहीं रखता. उनके लिए सफलता के मायने अपने जीवन के अधिक व्यक्तिगत और दिल को हौले से छू लेने वाले क्षणों में छिपे हैं. जैसे वह क्षण जब उन्होंने पहली बार अपने पिता से कहा था कि वे एकाउंटेंट न बनकर फिल्में बनाना चाहते हैं. वह क्षण जब उन्हें एफ़टीआईआई में चुन लिए जाने का टेलीग्राम मिला था या जब उन्होंने चेखव की कहानी  ‘द बेट’  पर 5 मिनट की अपनी पहली फिल्म बनाई थी. पलायन, पहचान और कुछ अनोखा ही पा जाने के क्षण जो उनकी फिल्मों को दृढ निश्चय और भोगे गए तनाव के सच्चे-से रंगों से भर देते हैं.

‘आप सोच नहीं सकतीं कि नागपुर के एक सिंधी लड़के को कैसा लगा होगा जब उसके पिता ने उसे आजाद कर दिया. मैं बहुत डरा हुआ था और बाद में उतना ही निश्चिंत भी. मैं तुरंत छत पर गया और पतंग उड़ाता रहा’, हिरानी कहते हैं. इस घटना का असर उन पर इतना गहरा है कि उनकी फिल्मों में भी डर और आजादी का यह भावनात्मक द्वंद्व बार-बार दिखाई देता है. चुना गया रास्ता और छोड़ा गया रास्ता और उन दोनों के नतीजे. फिर वह चाहे 3 इडियट्स में वायरस के बेटे की आत्महत्या हो या फरहान का अपने पिता से यह कहना कि वह इंजीनियर नहीं, फोटोग्राफर बनना चाहता है. हंगरी से फरहान के लिए आई बुलावे की चिट्ठी हो या लद्दाख में अपना हाई स्कूल चलाने वाले रैंचो की खुशी. उनका उस चमत्कार में अडिग विश्वास आज उनके काम में हर जगह झलकता है, जिसने उन्हें फिल्में बनाने की आजादी और पढाई में कम नंबरों वाली उधार की जिंदगी से मुक्ति दी. इसीलिए वे आपको अपने दिल की बात सुनने वाले पुराने संदेश पर नया-नकोर विश्वास दिला पाते हैं.

उनकी सभी फिल्मों में अनिवार्य रूप से मौजूद शिक्षा देने वाले तत्व शायद इस तथ्य से भी उपजे हैं कि अपने काम को लेकर तो वे भाग्यशाली रहे मगर अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में वे उस रास्ते के छूटने के दर्द को भी जानते रहे जिसपर लाख चाहने के बावजूद वे नहीं चल पाए. जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर – जिसके बारे में वे ज्यादा लोगों को बताना नहीं चाहते – उन्होंने दिल की बजाय दिमाग को तरजीह दी. उस फैसले से जुड़ा अकेलापन और दर्द आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ता. इसी याद से जुड़ी पीड़ा ‘3 इडियट्स’ बनाने को और भी जरूरी बनाती है.

हिरानी के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाले अभिजात जोशी उन्हें दूसरे ग्रह से आया प्राणी बताते हैं क्योंकि धरती पर इतना आशावाद और बचपना कहीं और मिलना बेहद मुश्किल है. उनकी फिल्मों में बार-बार दिखने वाली मानवीय स्वभाव की अच्छाई के कारण आमिर उनकी तुलना निर्देशक फ्रैंक कापरा से करते हैं. उनकी छोटी बहन अंजू और निर्देशक श्रीराम राघवन, जिनके घर में वे मुंबई में आते ही ठहरे थे, उन्हें पक्का शरारती बताते हैं. विधु विनोद चोपड़ा उनकी ईमानदारी का गुणगान करते नहीं थकते.

आप उनकी फिल्मों के बारे में फिर से सोचें तो मुख्य कहानी के साथ आपको दर्जनों छोटी-छोटी कहानियां दिखाई देंगी- लालच, माता-पिता के प्रति असंवेदनशीलता, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, परंपराओं से गुलामों की तरह बंधे रहना, माता पिता के दबाव. हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई और शरद जोशी उनकी प्रेरणा हैं

एक कॉफ़ी पीते-पीते ही वे अपने विख्यात हास्यबोध की झलक आपको दिखा देते हैं. हम फिल्म से जु़ड़े कई विवादों की बात कर रहे हैं. पहले चेतन भगत ने आरोप लगाए कि उनके उपन्यास से प्रेरणा लेने के बावजूद उन्हें पर्याप्त श्रेय नहीं दिया गया. फिर महाराष्ट्र के एक कॉलेज में रैगिंग का मामला उछला जिसके बारे में खबरें आईं कि यह थ्री इडियट्स से प्रेरित था और सरकार इसकी जांच करने की योजना बना रही है. हिरानी हँसते हुए कहते हैं, ‘कुछ दिनों बाद सबके पादने के लिए भी मुझे जिम्मेदार ठहराया जाएगा’ (इशारा शायद थ्री ईडियट में चतुर नाम के एक पात्र की तरफ है जो अपनी इस आदत की वजह से बदनाम है).

उनकी यही खुशमिजाजी उनकी सब फिल्मों को जीवन के प्रति गहरी आस्था से भर देती है. लेकिन उनकी तीनों फिल्मों के खलनायक बोमन ईरानी अचंभित-से होते हुए कहते हैं, ‘मुझे तीनों फिल्में पसंद आईं और उनकी इतनी सफलता देखकर मैं रोमांचित हूं, परन्तु यदि आप मुझसे पूछें कि हमें भगवान की जगह क्यों बैठाया जा रहा है तो मेरे पास उसका कोई उत्तर नहीं होगा.’ यह दुविधा भी अपनी जगह जायज ही है. हिरानी की फिल्में किसी भी मायने में धारा से अलग नहीं हैं. हिरानी खुद अपने सिनेमा को फीलगुड सिनेमा कहते हैं. छोटे घावों के लिए उनके पास छोटे-छोटे मरहम हैं और फिल्म के शुरू होने से पहले ही आप जान जाते हैं कि आखिर में जीत अच्छाई की ही होगी. इसीलिए ऊपरी तौर पर उनकी फिल्मों की इस चमत्कारिक सफलता का कोई कारण नहीं दिखता. न तो उनमें बड़े चुटकुले हैं और न ही गिरने-पड़ने वाला हास्य. न ही यह मुन्नाभाई और उसके वफादार प्यारे साथी सर्किट का असर है और न ही बुद्धिमान और नटखट रैंचो का. ये सब यदि अलग-अलग होते तो बॉलीवुड की वैसी ही कॉमेडी बनकर रह जाते जिन्हें आसानी से भुलाया जा सकता है. दरअसल, उनकी फिल्मों की अंदरूनी परत में असामान्य नैतिक क्रोध छिपा है, इसीलिए आप उन्हें देर तक अपने साथ चलते देखते हैं. 

आप उनकी फिल्मों के बारे में फिर से सोचें तो मुख्य कहानी के साथ आपको दर्जनों छोटी-छोटी कहानियां दिखाई देंगी- लालच, माता-पिता के प्रति असंवेदनशीलता, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, परंपराओं से गुलामों की तरह बंधे रहना, माता पिता के दबाव. हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई और शरद जोशी उनकी प्रेरणा हैं. हिरानी मानते हैं कि आजकल के दशर्क नंगी सच्चाइयों को सीधा नहीं देखना चाहते. इसीलिए अपने आक्रोश को चुटकुलों और रोशनी से भरी इस फील गुड पटकथा में बदलने के लिए उन्हें और अमेरिका में रहने वाले जोशी को तीन साल लगे. इस प्रक्रिया में वे मध्यमवर्ग की भ्रष्टता को आईना दिखाते हैं और मध्यमवर्ग अनजाने में ही प्रेरणा पाकर खुद को हल्का-सा बदल भी लेता है.

यह भी मजेदार है कि उनकी फिल्मों में घटने वाली बहुत-सी घटनाएं उनकी अपनी जिंदगी से आई हैं. उनकी पायलट पत्नी मंजीत एक दफा बहुत बीमार थी. एक नामी अस्पताल का डॉक्टर उनसे बहुत बेरुखी से पेश आ रहा था. उन्हें डॉक्टरी हिदायतें देते हुए ही वह लगातार फोन पर बातें किए जा रहा था. हिरानी याद करते हैं, ‘मुझे इतना गुस्सा आया कि मैंने उसका फोन छीनकर उसकी मेज पर पटक दिया.’

ऐसे ही कई हृदयहीन डॉक्टरों से होते हुए ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ निकली. लेकिन जब इसकी पहली कहानी उन्होंने अपने दोस्तों को सुनाई तो सबका यही कहना था कि इसे कोई नहीं देखेगा. उन्होंने फिर से लिखना शुरू किया और जब तीन साल बाद यह फिर से तैयार थी तब गुस्से की कुनैन के ऊपर गुड़ की मिठास थी और वह दवा न रहकर जादू की झप्पी बन गई थी. किसी व्यंग्यकार को मीठा बताना उसे अपना अपमान लग सकता है, किंतु यह तो कहा ही जाना चाहिए कि हिरानी अपनी चिंता को ऐसा मीठा स्वरूप देने में कामयाब हुए हैं जो बेफिक्र शहरी युवाओं को बिना बोर किए नैतिक शिक्षा के पाठ पढ़ा सकती है.

कई मायनों में हिरानी के पिता उनके काम और जिंदगी की केंद्रीय प्रेरणा हैं. वे ही वह नैतिक पैमाना हैं जिससे हिरानी अपना उत्थान और पतन नापते रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मेरा ज्यादातर सिनेमा उनके स्वभाव से ही उपजा है.’ सुरेश हिरानी विभाजन के बाद भारत में शरणार्थी के रूप में आए. उनकी उम्र चौदह साल थी, उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी, आठ भाई-बहन थे और मां अनपढ़. परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए सुरेश ने फिरोजाबाद में चूड़ियों की एक फैक्टरी में मजदूरी की, साइकिल पर आइसक्रीम बेची और आखिर में नागपुर के एक जनरल स्टोर में सामान पहुंचाने का काम करने लगे. धीरे-धीरे उन्होंने कुछ पैसे बचाकर दो टाइपराइटर खरीदे और एक टाइपिंग इंस्टिट्यूट खोला. फिर उन्होंने स्पेयर पार्ट्स का काम भी शुरू कर दिया. अपने संयुक्त परिवार को संभालने के लिए सुरेश दिन में काम करते थे और शाम की कक्षाओं में पढ़ाई. इसी तरह उन्होंने एलएलबी तक की पढ़ाई पूरी की. यह पूछने पर कि कुछ बड़ा करते रहने की यह प्रेरणा उन्हें कहां से मिलती थी, वे जवाब देते हैं, ‘मेरी कल्पनाशक्ति ही मेरी प्रेरणा थी. मैंने फिल्मों से बहुत-कुछ सीखा. खासकर देव आनंद की फिल्मों से. शायद मैं भी फिल्मों में चला गया होता, मगर मेरे सामने पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी.’  

परिवार के लिए अपनी इस इच्छा की बलि देने के कारण ही शायद उन्होंने अपने बेटे को पूरी स्वतंत्रता दी. वे कहते हैं, ‘मेरी पत्नी हमेशा मुझे बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहती थी, लेकिन मैं हमेशा उनकी रुचियों का खयाल रखता था.’ जब राजू ने उनसे कहा कि वह एकाउंटेंसी की जगह सिनेमा सीखना चाहते हैं तो उन्होंने तय कर लिया था कि वे उसे आजाद छोड़ देंगे. हिरानी कहते हैं, ‘मेरे पिता ने ही मुझे एफ़टीआईआई जाने को कहा. अस्सी के दशक में नागपुर का एक सिंधी आदमी उस इंस्टिट्यूट के बारे में जानता था, यह मुझे आज भी बहुत बड़ी चीज लगती है. रिश्तेदार पूछा करते थे कि फिल्म एडिटिंग का क्या मतलब है तो वह कभी जवाब नहीं दे पाते थे. मगर उन्होंने मुझे कभी नहीं रोका.’

सुरेश के आम लोगों से अलग होने का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने टाइपिंग इंस्टिट्यूट में नियमित रूप से आने वाली अध्यापिका शीला को इसलिए अपनी जीवनसाथी के रूप में चुना क्योंकि वे अपनी आगे की पीढ़ियों का मानसिक स्तर बदलना चाहते थे. मुंबई में अपने बेटे के घर में बैठे हुए वे फोन पर कहते हैं, ‘अगर आप सिंधी हैं तो आपके आस-पास के सब लोग केवल पैसे की बातें ही करते हैं. अभी कुछ देर पहले ही मेरे एक दोस्त ने मुझे फोन किया और वह सिर्फ यही बात करता रहा कि उसने अपनी बेटी के लिए अरबपति ढूंढ़ लिया है.’ हिरानी कहते हैं, ‘मेरे पिता एक सच्चे बुद्धिजीवी हैं. वे तर्क का साथ देते हैं और प्रगतिशील हैं. मुझे यह सब उन्हीं से मिला है.’ लेकिन उनका मुख्य गुण, जो हिरानी के सिनेमा में बार-बार दिखता है, ईमानदारी है. ‘वे अन्याय या भ्रष्टाचार बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते. अगर उन्हें लगेगा कि थोड़ा-बहुत भी ऐसा हो रहा है तो वे धड़धड़ाते हुए पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में पहुंच जाएंगे, रिश्तेदारों को डांटने लगेंगे और समाज के बड़ों से झगड़ बैठेंगे.’

सुरेश हँसते हुए सहमत होते हैं, ‘मैं बहुत लड़ाकू था. मैं बहुत बुरा-भला कह देता था और कभी-कभी तो मारपीट तक की नौबत आ जाती थी. मैं कुछ-कुछ मुन्नाभाई जैसा था.’ मुन्नाभाई एमबीबीएस का शुरु आती दृश्य, जिसमें मुन्ना के पिता की जेब एक जेबकतरा काट लेता है, हिरानी के पिता के साथ घटी एक सच्ची घटना है. हिरानी याद करते हैं, ‘मुझे लगता है जैसे यह कल की ही बात है.’ रायपुर के एक ठग ने कोई झूठा बहाना बनाकर उनके पिता से 2000 रूपए ऐंठ लिए थे. जब सुरेश हिरानी को इसका पता चला तो वे चुप नहीं बैठे. ‘वे सुबह पांच बजे उठ गए और तब तक शहर भर के होटल छानते रहे जब तक उसे खोज नहीं लिया. फिर वे उसे सिंधी पंचायत में ले गए ताकि उसे उचित सजा दी जा सके. वहां कोई बुजुर्ग उसे मारने लगे तो मेरे पिता ने उन्हें तुरंत रोक दिया. उन्होंने वहां उपस्थित सभी लोगों को फटकार लगाई और कहा कि वे सब के सब चोर हैं. कोई इनकम टैक्स की चोरी करता है और कोई क़ानून तोड़ता है. उन्होंने कहा कि उस ठग और उनमें इतना ही फर्क है कि वह ठग बेवकूफ है और वे सब चालाक हैं. फिर उन्होंने उस चोर के लिए टिकट खरीदा और उसे रायपुर की ट्रेन में बिठा दिया.’

राजू के पिता की आत्मा उनकी फिल्मों में कहीं गहरे बैठी हुई है. उनकी फिल्मों में किसी को बिलकुल अकेला नहीं छोड़ा जाता और न ही किसी अपरिचित से नफरत ही की जाती है. यहां तक कि उनके तीनों खलनायक – डॉक्टर अस्थाना, सरदार लकी सिंह और प्रोफेसर वायरस – बहुत प्यार करने वाली बेटियों से घिरे हुए हैं.  ‘3 इडियट्स में हिरानी थोड़े अधिक उपदेशात्मक हो गए हैं. इसका नायक रैंचो एक बिलकुल श्वेत चरित्न है (हालांकि आमिर ने उसे खूबसूरती से निभाया है) जो कोई गलती नहीं कर सकता. शराब पीकर भी वह शिक्षण व्यवस्था की कमियों और अपने दिल की बात मानने की बात ही करता है. उसका शरारती होना ही उसे थोड़ा सामान्य बनाता है. मगर जो भी हो, जो पिता नहीं कर पाए, उसे बेटे ने कर दिखाया है. अपनी नैतिकता की कीमत चुकाने से बचने के लिए उसने हंसी का कवच पहनना सीख लिया है. मैं राजू से फिर से पूछती हूं कि सफलता का उनके लिए क्या अर्थ है और वे अपनी चमत्कारिक सादगी से कहते हैं, ‘मुझे डर लगता है कि इसके बाद लोग मुझे सच नहीं बताएंगे, मुझे सच्ची प्रतिक्रियाएं नहीं मिलेंगी और मुझे केवल इसीलिए महत्व दिया जाएगा क्योंकि मैंने तीन हिट फिल्में दी हैं. ऐसा न हो, इसके लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.’

इस मेहनत की शुरुआत करने के लिए राजू और जोशी अपने आसपास की चकाचौंध से दूर असली भारत को देखने जा रहे हैं. वे कहते हैं, ‘हम लोगों से बातें करेंगे, सच्चे अनुभव सुनेंगे. हम अपने आप को दोहराने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते.’ यद्यपि वे ऐसा न होने देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, फिर भी उनका सबसे बड़ा डर यही है. उदाहरण के लिए, उनके सामने ‘मुन्नाभाई चले अमेरिका’ बनाने का विकल्प है. जब उन्होंने पहला सीक्वल बनाया था तो वह सबकी उम्मीदों से परे था. अब यह देखना है कि वे फिर से ऐसा कर पाते हैं या नहीं. 44 की उम्र में, जब उनके सबसे अच्छे साल अभी आने बाकी हैं, यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि हिरानी किस तरह की फिल्में बनाएंगे. लेकिन आप फिर भी अनुमान लगाना चाहें तो सोचने की शुरुआत यहां से की जा सकती है कि वे फिल्में जैसी भी होंगी, उनकी आत्मा पिता और पुत्न के नैतिक दृष्टिकोण के आसपास या बीच में ही कहीं होगी.’

भाभी हुई किताबी

वयस्क कार्टून श्रंखला सविता भाभी डॉट कॉम के जरिए पहली संपूर्ण देसी वयस्क महिला चरित्र सविता भाभी से भारतीयों का पहला परिचय मार्च 2008 में हुआ था. सविता भाभी ने बोझिल-उबाऊ भारतीय घरेलू महिला के एक शोख, चंचल और कामुक पहलू को दुनिया के सामने रखा. एलेक्सा के आंकड़ों ने इसकी सफलता की जो मीनारें खड़ी की थीं, उसके सामने बड़ी-बड़ी वेबसाइटें पानी भरने लगी थीं. 2009 में भारत सरकार ने इसपर अश्लील होने का आरोप लगाते हुए प्रतिबंध लगा दिया. अब इस पॉर्न स्टार को भारत से हजारों मील दूर फ्रांस में शरण मिल गई है.

निश्चित रूप से ये मेड इन इंडिया मार्का एक फूहड़ नकल है, जिसमें सारी चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, मसलन इसके रंग या फिर सविता भाभी की असामान्य छातियां. लोग इसे देखना ही पसंद करते हैं’ 

यौन उत्कंठा से सराबोर, साड़ी में लिपटी सविता भाभी ने 2008 में इंटरनेट पर पदार्पण के साथ ही देशविदेश में सनसनी मचा दी थी. पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से इसपर आ रहा जबर्दस्त ट्रैफिक इसका सबूत था. इस आसमान छूती लोकप्रियता का खामियाजा भी इसे जल्दी ही भुगतना पड़ा. इस वेबसाइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया. सरकार ने यह कदम इन आरोपों के आधार पर उठाया था कि यह परंपरावादी भारतीयों की भावनाओं को चोट पहुंचाती है. सविता भाभी की विषय सामग्री को देखें तो, उसके पास खूब समय था और उसके पति ज्यादातर बाहर ही रहते थे. इसका इस्तेमाल वह नए-नए लोगों के साथ मौज-मस्ती करने में करती थी. ऐसे में उसपर विरोध के सुर पैदा होना अस्वाभाविक नहीं था.

लेकिन इस सम्मोहिनी के बढ़ते कदम को रोक पाना इतना आसान नहीं था- सविता भाभी वापस आ गई है. लेकिन इस चरित्र की वापसी एक अलग अंदाज में हुई है- कागज-कलम के सहारे. सविता भाभी एक और लोकप्रिय माध्यम कॉमिक्स का अवतार ले चुकी है. कॉमिक्स के अवतार में उसे पेश करने का श्रेय गया है यौन विषयक सामग्री के प्रकाशन में अव्वल मानी जाने वाली फ्रांसीसी कंपनी एडिशंस ब्लैंके को. एडिशंस ब्लैंके के मुखिया फ्रैंक स्पेंगलर के मुताबिक उन्हें सविता भाभी का चरित्र पहली ही नजर में भा गया, ‘वह बहुत ही खूबसूरत, मजेदार और वास्तविक है. सविता मस्ती से सराबोर महिला है जो यौन सुख बांटना और पाना पसंद करती है.

स्पेंगलर ने इसे देखने के बाद तुरंत ही लंदन स्थित इसके भारतीय मुखिया से संपर्क किया जिन्हें सारी दुनिया देशमुखके नाम से जानती है. अगले कुछ दिनों के दौरान उनके बीच मेल के जरिए बातचीत जारी रही. स्पेंगलर कहते हैं, ‘हमारी सिर्फ एक बार ही मुलाकात हुई है. वे बहुत सशंकित थे. उनका नाम बताना मेरे लिए संभव नहीं है.एडिशंस ब्लैंके कहती है कि उन्होंने देशमुख से अधिकार हासिल करने के लिए 1,500 यूरो (करीब एक लाख रुपए) एडवांस में दिए और साथ ही रॉयल्टी के तौर पर कमाई का छह फीसदी देने का वादा भी. फिलहाल इसके मुद्रित संस्करण की लोकप्रियता ठीक-ठाक है- 4,000 प्रतियां छपी थीं जिनमें से 2,000 पहले ही बिक चुकी हैं. स्पेंगलर मानते हैं कि निश्चित रूप से यह उतना सनसनीखेज नहीं है जितना यह इंटरनेट पर हुआ करता था.

नए अवतार में सविता भाभी की दो नई  कॉमिक्से आई हैं- बॉलीवुड इन लव  और लव इन बॉलीवुड. इनकी कीमत 13 यूरो (880 रुपए) के करीब है. हर इश्यू में दो कहानियां हैं. स्पेंगलर बताते हैं, ‘हम मई-जून में तीसरा इश्यू प्रकाशित करने पर विचार कर रहे हैं. अगर बिक्री बढ़िया रही तो बिलकुल नई कहानियों का प्रकाशन भी करेंगे, मौजूदा इश्यू पहले से ही इंटरनेट पर आ चुका है.’ हालांकि फ्रांस में पॉर्न कॉमिक्स इतनी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं लेकिन फ्रांसीसी उत्सुकतावश सविता भाभी तरफ खूब आकर्षित हो रहे हैं. स्पेंगलर कहते हैं, ‘निश्चित रूप से ये मेड इन इंडिया मार्का एक फूहड़ नकल है, जिसमें सारी चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, मसलन इसके रंग या फिर सविता भाभी की असामान्य छातियां. लोग इसे देखना ही पसंद करते हैं.और वैसे भी एडिशंस ब्लैंके के सामान्य व्यापार की तुलना में भाभी पर दांव लगाने में कम जोखिम है.

लेकिन सविता भाभी के कारनामों का एक बड़ा प्रशंसक वर्ग आप्रवासी भारतीय हैं जिनके लिए कॉमिक्स श्रंखला सिर्फ एक अतिरिक्त माध्यम भर है. वैसे भाभी को अब भी इंटरनेट पर देखा जा सकता है. बस पता-ठिकाना थोड़ा अलग है. वेबसाइट का नाम है- किर्तु डॉट कॉम. और भाभी की लोकप्रियता का नया आयाम यह है कि हाल के दिनों में स्पेनी और फ्रांसीसी प्रशंसकों ने भी इसके कल्पनाकार को पत्र लिखकर अपनी-अपनी भाषाओं में इसके संस्करण लाने की मांग की है.  

शब्दों की एक बेतकल्लुफ दुनिया

फर्गुसन गर्मजोशी से आपको एक किनारे ले आते हैं. अब आपके सामने मुद्रा के इतिहास, कूटनीति, युद्ध और वैश्वीकरण का एक विशेषज्ञ खड़ा है, जिसके पास आपके सवालों का जवाब देने के लिए समय की कोई कमी नहीं है 

आप किसी स्टॉल पर एसेंट ऑफ मनीया रात पश्मीने कीके पन्ने पलट रहे हों और अपने पीछे गुजरनेवाले किसी आदमी पर यों ही आपकी नजर जाए. चौड़ीसी मुस्कान बिखेरते नील फर्गुसन या कोई नज्म गुनगुनाते गुलजार. आप अवाक हैं. आप उन्हें पकड़ते हैं और पूछते हैं कि किताब के अमुक पन्ने पर जो आपने यह बात लिखी है, उसका क्या मतलब है. फर्गुसन गर्मजोशी से आपको एक किनारे ले आते हैं. अब आपके सामने मुद्रा के इतिहास, कूटनीति, युद्ध और वैश्वीकरण का एक विशेषज्ञ खड़ा है, जिसके पास आपके सवालों का जवाब देने के लिए समय की कोई कमी नहीं है. इस धरती पर कहीं आपके साथ ऐसी घटना घटे तो समझ लीजिए, आप जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हैं.

जाती हुई सर्दियों की गुलाबी धूप के बीच 1860 में बने शानदार दिग्गी पैलेस के लॉन में चर्चित हिंदी कवि अशोक वाजपेयी को चौथी क्लास के बच्चे आकर घेर लेते हैं. उन्हें ऑटोग्राफ देते हुए वाजपेयी अपने बचपन के दिन याद करते हैं, जब उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी के ऑटोग्राफ लिए थे. वे इस आयोजन में युवाओं और बच्चों की भागीदारी से चकित हैं. वे कहते हैं, ‘यह तो अद्भुत है. इतने शानदार और सुव्यवस्थित आयोजन की कल्पना करना मुश्किल है.’

वाजपेयी सही हैं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल कई मायनों में अनोखे अनुभवों से भर देता है. इसके जरिए हजारों साहित्य प्रेमी देश और दुनिया से आए दर्जनों मशहूर लेखकों से रूबरू हुए हैं. पांच दिनों तक हर घंटे चार परिचर्चाओं में वोले शोयंका, हनीफ कुरैशी, नील फर्गुसन, लुईस बर्नियर्स, मार्क टुली, अमिताभ कुमार, विक्रम चंद्रा, स्टीव कोल और क्रिस्टोफ जफरलो आदि ने अपनी किताबों के उद्धरण सुनाए. लोगों ने उनसे सवाल भी किए. इनमें कृष्ण बलदेव वैद, गुलजार, ओम प्रकाश वाल्मीकि, अशोक वाजपेयी, अजय नावरिया और शीन काफ निजाम जैसी हिंदीउर्दू की जानीमानी हस्तियां भी शामिल थीं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल एक ही साथ दुनिया के अधिकतर स्थापित और नए लेकिन महत्वपूर्ण लेखकों से सीधे संवाद का मौका देता है. अंतरराष्ट्रीय साहित्य के इस भव्य उत्सव में दुनिया के सर्वाधिक चर्चित लेखकों की मौजूदगी के बावजूद कोई औपचारिकता नहीं है. पूरे आयोजन स्थल में कहीं भी किसी भी लेखक से मिला जा सकता है और उससे बात की जा सकती है. कार्यक्रम के निदेशक और प्रख्यात अंग्रेजी लेखक विलियम डेलरिंपल कहते हैं, ‘यहां सब एक समान माने जाते हैं. किसी के साथ कोई अलग व्यवहार नहीं होता.’ अपनेपन के इसी भाव के कारण इस साल के आयोजन में लगभग 27 हजार लोगों ने शिरकत की. यह संख्या पिछले साल के 12 हजार के आंकड़े से दोगुनी से भी अधिक है.

लेकिन उत्सव का स्वरूप जितना अनौपचारिक है, इसके दौरान किए गए विचारविमर्श उतने ही गंभीर. पांच दिनों में हुई 80 से अधिक परिचर्चाओं में जिन विषयों पर विचार किया गया, उनका दायरा बहुत व्यापक है. इन परिचर्चाओं में भाषा, साहित्य, जातिपरंपरा, लेखन, भारतपाक संबंध, राजनीति, अर्थशास्त्र, धार्मिक कट्टरपंथ, नक्सलवाद और प्रतिरोध आदि से जुड़ी बहसों का फलक बहुत बड़ा था. सबसे दिलचस्प रहा वह सत्र जिसमें डचसोमालियाई राजनीतिक कार्यकर्ता अयान हिरसी अली ने धर्मों की कट्टरता और रूढ़ियों पर प्रहार किए. हिरसी हाल के दिनों में विवादों में घिरी रही हैं और सुरक्षा कारणों से उनके कार्यक्रम की पहले से घोषणा नहीं की गई थी. इन बहसों ने न सिर्फ भारतीय और विदेशी लेखकोंपत्रकारों की चिंताओं और सरोकारों को पेश किया, बल्कि इस दौरान जिस तरह से साहित्य प्रेमियों और पाठकों ने उनसे सवाल किए, उसने भविष्य के एक सचेत और बौद्धिक भारतीय समाज के लिए भी काफी हद तक आश्वस्त किया.

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखन पर इस आयोजन में खास तौर से ध्यान दिया गया था. हिंदी के अनेक जानेमाने नाम इस आयोजन में शामिल तो थे ही, पी. सिवकामी, लक्ष्मण गायकवाड़, कांचा इलैया और जैफरलो जैसे दूसरी भाषाओं के भी बड़े लेखकविचारक मौजूद थे. जाहिर है, इनकी वजह से पूरे फेस्टिवल के दौरान दलित लेखन और आंदोलन से जुड़ी बहसें सबसे अधिक जीवंत रहीं, जहां दलित लेखन और जीवन से जुड़े अनेक कड़वे और विचारोत्तेजक अनुभव सामने आए.

लेकिन दिमाग को झकझोर कर रख देनेवाली इन चर्चाओंपरिचर्चाओं के बीच संगीत, गायन और कविता पाठ के कार्यक्रम भी हुए. गुलजार और प्रसून जोशी ने अपनी रचनाएं सुनाईं और जावेद अख्तर ने मशहूर शायर फैज अहमद फैज से पहली बार मिलने का अपना रोचक वाकया. पाकिस्तान से आईं फैज की बेटी सलीमा हाशमी ने अपने पिता को याद करते हुए श्रोताओं को भावुकता से भर दिया और पाकिस्तानी उपन्यासकार अली सेठी ने उनकी नज्मों को बेहद खूबसूरती से गाया.

आयोजन का यह पांचवां साल था. आगे ज्यादा से ज्यादा हिंदी तथा दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकोंविचारकों के आने से आयोजन अधिक व्यापक हो सकेगा. इसे ऐसा होना भी चाहिए. आखिरकार दुनिया में कम ऐसी जगहें हैं जहां आप क्रिस्टोफ जफरलो और कांचा इलैया के साथ एक कतार में बैठकर वोले शोयंका को सुन सकते हों.