Home Blog Page 199

दांव पर विश्वसनीयता

कुछ जजों का कहना है कि अदालत द्वारा खुद अपने लिए अपने यहां अपील करने में कुछ गलत नहीं है, क्योंकि नियमों के अनुसार और कोई दूसरा मंच नहीं है जहां अपील की जा सके. इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या केंद्रीय सूचना आयोग, उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय खंडपीठ और फिर पूरी खंडपीठ के एक जैसे फैसलों के खिलाफ तीसरी अपील जरूरी है?मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ के हालिया फैसले ने जनता के जानने के अधिकार को तो मजबूती दी ही है, न्यायपालिका की जवाबदेही पर भी जोर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा संपत्ति की घोषणा के संबंध में दिया गया यह फैसला सूचना के अधिकार की जरूरत को यह संकेत करते हुए थोड़े में ही समझ देता है कि लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक होती है और चूंकि सारे जनसेवक उसी की ओर से कार्य करते हैं, इसलिए उसे यह जानने का हक है कि उसके प्रतिनिधि और अधिकारी क्या कर रहे हैं.

यह अधिकार समानता (अनुच्छेद 14), अभिव्यक्ति (अनुच्छेद 19) और जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) से भी जुड़ा हुआ है. अदालत का कहना था कि न्यायपालिका भी जनता के प्रति समान रूप से जवाबदेह है और जनता को यह जानने का हक है कि मुख्य न्यायाधीश सहित तमाम जज किस प्रकार अपनी शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं, साथ ही उसे जजों की नियुक्ति और उनके खिलाफ आई शिकायतों के निबटारे की प्रक्रिया के बारे में भी जानने का हक है. इस विवाद की जड़ में यह बहस थी कि क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा अपने ही स्तर पर तय की गई आचार संहिता के तहत मुख्य न्यायाधीश के समक्ष घोषित संपत्ति की सूचना सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत मांगी जा सकती है? शुरू में सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगाने की मांग की थी. उसका कहना था कि यह सूचना मुख्य न्यायाधीश के सामने किसी अधिनियम के तहत नहीं पेश की गई है बल्कि जजों द्वारा ही तय की गई एक आचार संहिता के तहत दी गई है, और चूंकि यह सूचना गोपनीय रूप से दी गई है, इसलिए इसे सबकी जानकारी के दायरे में नहीं लाया जा सकता. आगे यह दलील भी दी गई कि मुख्य न्यायाधीश को ऐसी सूचना उनपर भरोसा करते हुए दी गई है और यह एक निजी सूचना है जिसका सार्वजनिक गतिविधि अथवा हित से कोई संबंध नहीं है इसलिए यह आरटीआई के तहत नहीं आती.

लेकिन उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से महाधिवक्ता द्वारा दी गई प्रत्येक दलील को नकार दिया. अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के समक्ष संपत्ति की घोषणा संबंधी आचार संहिता अनिवार्य थी इसलिए जजों के लिए मुख्य न्यायाधीश के सामने अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना जरूरी था. चूंकि जानकारी देना आवश्यक था इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि ऐसा विश्वास के संबंध के तहत किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के वकील ने इस फैसले के खिलाफ अपील की मोहलत की मांग की. मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने वकील की ओर हैरत भरी नजर से देखा, लेकिन फिर उन्हें मोहलत दे दी. इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपने मामले की खुद ही सुनवाई की कोशिश को लेकर मीडिया ने उनकी आलोचना की है. तब जाकर मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि अपील करनी है या नहीं, इस बारे में फैसला अब समूचे सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया जाएगा.

इस मामले में कुछ जजों का कहना है कि अदालत द्वारा खुद अपने लिए अपने यहां अपील करने में कुछ गलत नहीं है, क्योंकि नियमों के अनुसार और कोई दूसरा मंच नहीं है जहां अपील की जा सके. इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या केंद्रीय सूचना आयोग, उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय खंडपीठ और फिर पूरी खंडपीठ के एक जैसे फैसलों के खिलाफ तीसरी अपील जरूरी है? यदि सुप्रीम कोर्ट खुद से जुड़े मामले में अपने ही यहां अपील करता है तो इससे यह संदेह और बढ़ेगा ही कि कुछ छिपाया जा रहा है. मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिए हैं कि जिस एक मामले पर वे सूचना को सार्वजनिक करने से बचना चाहते हैं वह है जजों की नियुक्ति और उनके खिलाफ शिकायतों से जुड़ी जानकारी. केंद्रीय सूचना आयोग ने पहले सुप्रीम कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह कुछ हालिया नियुक्तियों से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करे. तब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय को नजरअंदाज करते हुए अपने यहां एक अपील दायर की थी.

दिनाकरण प्रकरण दिखाता है कि न्यायपालिका में होने वाली नियुक्तियों में अनियमितताएं एक ऐसा मसला है जिसे अदालत ढके रखना चाहती है. इसमें संदेह नहीं कि ऐसा करके वह अपनी बची-खुची विश्वसनीयता को ही गंभीर नुकसान पहुंचा रही है.   

प्रशांत भूषण  

हृदय परिवर्तन से आगे की राह

हिंदी के खबरिया चैनलों के दर्शकों के लिए अच्छी खबर है. इन चैनलों के संपादक कंटेंट के लगातार गिरते स्तर से परेशान और शर्मसार हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि टीआरपी की होड़ में वे और उनके चैनल पत्रकारिता के मूल्यों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. आईबीएन के संपादक आशुतोष ने माना है कि पिछले पांच साल में न्यूज चैनलों में भयानक भटकाव दिखा है. वे अकेले नहीं हैं. ईटीवी के राजनीतिक संपादक और टीवी संपादकों के संगठन के महासचिव एनके सिंह, न्यूज 24 के संपादक अजीत अंजुम और एनडीटीवी के आउटपुट संपादक रवीश कुमार समेत और भी तमाम वरिष्ठ पत्रकारों ने समाचार चैनलों की गिरावट पर गहरी चिंता का इजहार और उससे बाहर निकलने की बेचैनी जाहिर की है.

यानी लंबे समय से चल रही बहस में देर से ही सही अब संपादक भी शामिल होने लगे हैं. कई संपादकों का ‘अपराधबोध’ जगा है और कुछ तो स्थिति से ‘बगावत’ की बात भी कर रहे हैं. इससे एक उम्मीद बनी है क्योंकि अब तक अधिकांश संपादक चैनलों के कंटेंट में लगातार गिरावट की बात मानने को तैयार ही नहीं होते थे. बल्कि वे तो खुद को आक्रामक तरीके से डिफेंड भी करते थे. लेकिन लगता है कि उन्हें भी अब समझ में आने लगा है कि गिरने की भी हद होती है. उम्मीद है कि चैनलों के बाहर चल रही आलोचना और बहस अब अंदर न्यूज रूम में भी असर दिखाएगी. जाहिर है कि ईमानदार आत्मालोचना इसकी शुरुआत हो सकती है. इसलिए इस हृदय परिवर्तन का खुले दिल से स्वागत होना चाहिए. उन संपादकों को बधाई दी जानी चाहिए जो हिम्मत के साथ बोल और आत्मालोचना कर रहे हैं.

लेकिन क्या यह आत्मालोचना सचमुच आत्मसुधार के मकसद से हो रही है या सिर्फ इस ‘पागलपन और गिरावट’ से खुद को अलग दिखाने और अपना हाथ झड़ने के लिए? सच कहूं तो समाचार चैनलों में बेहतरी की उम्मीद को लेकर मन में थोड़ी निराशा और संदेह है. इसकी वजहें हैं. पहली और बुनियादी बात यह है कि सभी चैनल उस बड़े पूंजीवादी कॉर्पोरेट मीडिया मशीन के पुर्जे हैं जिनका मूल मकसद अधिकतम मुनाफा कमाना और मौजूदा सत्ता संरचना को एक आवरण देना है. पूंजीवादी लोकतंत्र के खेल में वे उस तमाशे की तरह हैं जिसकी सीमाएं पहले से तय हैं और जिसका एक मकसद लोगों को मनोरंजन का धीमा जहर देकर सुलाए रखना है. ग्लोबल मीडिया के विस्तार के साथ समाचारों का मनोरंजनीकरण हो रहा है और मनोरंजन का समाचारीकरण.

ऐसे में, न्यूज चैनलों के संपादकों के लिए मौजूदा दायरे यानी टीआरपी से बाहर कुछ अलग करने की गुंजाइश सचमुच बहुत कम होती जा रही है. टीआरपी से व्यक्तिगत तौर पर लड़ पाना किसी भी संपादक के लिए संभव नहीं, इसलिए टी.वी उद्योग के मौजूदा दायरे में टीआरपी से ‘बगावत’ लगभग असंभव है. एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष और वरिष्ठ टीवी संपादक राजदीप सरदेसाई के बयान में यह लाचारी साफ दिखती है. लेकिन सारा दोष टीआरपी पर मढ़ना भी ठीक नहीं. निश्चय ही, कुछ जिम्मेदारी संपादकों की भी बनती है. अफसोस यह है कि बहुतेरे संपादक अपनी गलतियों का सारा ठीकरा टीआरपी पर फोड़ बच निकलना चाहते हैं. जबकि सच यह है कि संपादकों को टीआरपी के आगे झुकने के लिए कहा गया लेकिन उनमें से अधिकांश ने उसके आगे रेंगना शुरू कर दिया.

दरअसल, न्यूज चैनलों की गिरावट को लेकर टीआरपी के शिकायती संपादकों में से कई खुद दर्शकों के स्वाद को बिगाड़ने के लिए दोषी हैं. जो दर्शक पिछले पांच साल से सनसनीखेज, बेसिर-पैर और पांच सीज (क्राइम, कामेडी, क्रिकेट, सिनेमा, सेलेब्रिटी) के आदी हो गए हैं उन्हें रातों-रात कैसे गंभीर खबरों का पारखी बनाया जा सकता है? दर्शकों का स्वाद बदलने के लिए ईमानदारी से अगले पांच साल तक मेहनत करनी होगी. न्यूज रूम में पत्रकारीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी होगी. हर न्यूज चैनल टैबलॉयड चैनल क्यों होना चाहता है? टीआरपी के लिए? यह तो हमेशा से रहा है कि टैबलॉयड अखबारों और चैनलों के पाठक-दर्शक क्वालिटी अखबारों-चैनलों से कई गुना रहे हैं लेकिन जनमत बनाने और प्रभाव के मामले में टैबलॉयड, क्वालिटी अखबारों-चैनलों के आगे कहीं नहीं ठहरते.

तीसरे, चैनल संपादकों को कंटेंट खासकर टीआरपी नहीं दे पाने वाली कथित गंभीर खबरों और चर्चाओं पर गंभीरता से सोचना होगा कि सचमुच में वे कितनी गंभीर होती हैं? दो साल पहले ऐसी ही समस्या से परेशान छह अमेरिकी पत्नकारों द्वारा लिखी किताब ‘वी इंटरप्ट दिस न्यूजकास्ट’ आई थी जिसमें बताया गया है कि कैसे बेहतर कंटेंट के साथ अच्छी रेटिंग भी मिल सकती है. बेचैन संपादकों के लिए यह बेहद काम की हो सकती है. मगर वे तो अपने ही बनाए दायरे में ऐसे फंसे हैं कि उससे निकलना ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ ढूंढ़ने से भी मुश्किल हो गया है.

आनंद प्रधान  

ऑल इज नॉट वेल

लोकप्रियता को समाचार माध्यम भुनाना चाहें, यह समझ में आता है क्योंकि उनका खेल बिक्री और कारोबार से जुड़ा है. लेकिन यह लोकप्रियता जिस तरह हमारे समूचे साहित्यिक-सांस्कृतिक पर्यावरण पर छा गई है, इससे कुछ डर सा लगता हैआमिर खान की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ एक अच्छी फिल्म है. लेकिन अगर इस फिल्म को भारतीय शिक्षा नीति की ऐसी दूरदर्शी आलोचना की तरह पढ़ा जा रहा है जिसपर पहले किसी की नजर न पड़ी तो इसके पीछे लोगों का अज्ञान ज्यादा है, फिल्म की उत्कृष्टता कम. अन्यथा हाल के वर्षों में भारत में- और दुनिया भर में भी- शिक्षा को लेकर जो बुनियादी बहसें चल रही हैं, वे इस फिल्म से काफी आगे की हैं. यही नहीं, चेतन भगत के जिस उपन्यास ‘फाइव प्वाइंट समवन’ से इस फिल्म की मूल कथाभूमि ली गई है, वह अपनी साधारणता के बावजूद कम से कम इस शिक्षा नीति की ज्यादा खरी आलोचना करता है. फिल्म जहां यह दिखाती है कि एक वैज्ञानिक शिक्षण संस्थान में शिक्षा की यांत्रिकता से नाराज नायक फिर भी अपनी प्रतिभा के दम पर टॉप करता है, वहीं उपन्यास बताता है कि वह नायक अपनी प्रयोगशीलता के बावजूद अंकों के लिहाज से कभी औसत से ऊपर नहीं जा पाता. जाहिर है, आमिर खान की फिल्म शिक्षा नीति में नहीं, लोगों के दृष्टिकोण में खोट देखती है, जबकि चेतन भगत का उपन्यास ज्यादा ईमानदारी से बताता है कि इस यांत्रिकता के नुकसान कितने गहरे हैं.

बहरहाल, यह टिप्पणी ‘थ्री इडियट्स’ की समीक्षा के लिए नहीं लिखी जा रही है. इसका मकसद सिर्फ इस तथ्य की तरफ ध्यान खींचना है कि हाल के दिनों में भारत का बौद्धिक मानस किस हद तक उस सतही बॉलीवुड से आक्रांत है जिसका नब्बे फीसदी हिस्सा ख़ुद हॉलीवुड की फूहड़ नकलों में बीतता है और 10 फीसदी सयानी और बारीक नकलों में. इसके बावजूद देश की हर सार्वजनिक और जरूरी बहस में बॉलीवुड का अतिक्रमण जैसे अनिवार्य मान लिया गया है.

इस अतिक्रमण की ताजा मिसाल जयपुर में हुआ लेखक सम्मेलन है जहां एक तरफ नोबेल विजेता लेखकों का स्वागत होता रहा तो दूसरी तरफ गुलजार, जावेद अख्तर, शबाना आजमी और प्रसून जोशी जैसी शख्सियतें खबरें बनाती रहीं. निश्चय ही इन चारों में गुलजार एक बेहतर लेखक हैं और उनके फिल्मी कामकाज के बाहर भी उनके रचनात्मक लेखन का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो अपने बिंबों की ताजगी और अर्थों की नव्यता से अभिभूत करता है. लेकिन गुलजार को भले हो, किसी और को यह भ्रम नहीं होगा कि गुलजार के लेखन की उत्कृष्टता जयपुर के लेखक सम्मेलन में उनकी मौजूदगी का सबब थी, यह दरअसल गीतकार के रूप में उनकी प्रसिद्धि है जो उनके लिए सारे मंच लूटकर ला रही है. फिर गुलजार को छोड़ दें तो जावेद अख्तर और शबाना आजमी या फिर प्रसून जोशी का साहित्यिक अवदान क्या है, और ऐसे सम्मेलन में उनकी उपस्थिति की पात्रता कितनी है, यह बात बहसतलब भी नहीं रह जाती. इसी तरह ओम पुरी और उनकी पत्नी नंदिता पुरी भी बस अपनी फिल्मी हैसियत की वजह से सम्मेलन में मौजूद थे.

इस अतिक्रमण की एक और मिसाल इस गणतंत्र पर दिए गए पद्म सम्मान हैं. जानकीवल्लभ शास्त्री जैसे बुजुर्ग और महत्वपूर्ण हिंदी लेखक को जो पद्म श्री मिलती है वही सैफ अली खान को दी जाती है. आमिर खान भी पद्म भूषण ले जाते हैं. पद्म सम्मानों की ऐसी और भी विसंगतियां गिनाई जा सकती हैं, लेकिन इनकी वजह एक ही है- इनके नियामक वे लोग हैं जो भव्यता से अभिभूत अंग्रेजीपरस्त और संस्कृतिविहीन हैं और उस तबके से आते हैं जिनके लिए सब-कुछ सजावट और इसलिए दिखावे का सामान है.

असल में यह चमकता-दमकता भारत ही है जो कभी ‘थ्री इडियट्स’ देखकर अपनी जाला लगी आला डिग्रियों पर संदेह करता है और ‘चक दे इंडिया’ देखकर भारत का मतलब समझने की कोशिश करता है. उसे अच्छी किताबें पढ़ने की आदत नहीं, जरूरी बहसों में शामिल होने की फुरसत नहीं. फिल्में उसकी बौद्धिक खुराक पूरी करती हैं

असल में यह चमकता-दमकता भारत ही है जो कभी ‘थ्री इडियट्स’ देखकर अपनी जाला लगी आला डिग्रियों पर संदेह करता है और ‘चक दे इंडिया’ देखकर भारत का मतलब समझने की कोशिश करता है. उसे अच्छी किताबें पढ़ने की आदत नहीं, जरूरी बहसों में शामिल होने की फुरसत नहीं. फिल्में उसकी बौद्धिक खुराक पूरी करती हैं

इन आयोजनों और पुरस्कारों को छोड़ दें तो भी नर्मदा आंदोलन से लेकर हॉकी खिलाड़ियों के आर्थिक संकट तक और वंदे मातरम से लेकर समलैंगिकता तक पर बॉलीवुड जिस बेबाकी और आत्मविश्वास से राय जताता है और जिस निष्ठा से हमारे समाचार माध्यम उन्हें जगह देते हैं, उसे देखकर हैरानी और कोफ्त दोनों होती है. निश्चय ही बॉलीवुड को किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने का अधिकार है. यह राय जितनी सुविचारित और स्पष्ट होगी, उतना ही अच्छा होगा, क्योंकि फिर इसका असर उसकी फिल्मों पर भी पड़ेगा जिनकी- दुर्भाग्य से- भारतीय जनमानस तक बहुत गहरी पहुंच है. दरअसल, ‘थ्री इडियट्स’ या ‘तारे जमीं पर’ की कामयाबी या इनसे पैदा हुई बहसें आमिर खान की बौद्धिक गहराई से ज्यादा उनकी सामाजिक लोकप्रियता का प्रमाण हैं. ‘मुन्नाभाई लगे रहो’ या ‘चक दे इंडिया’ से पैदा हुआ स्पंदन भी दूसरे कलाकारों के लिए ऐसे ही प्रमाण सुलभ कराता है.

इस लोकप्रियता को समाचार माध्यम भुनाना चाहें, यह समझ में आता है क्योंकि उनका खेल बिक्री और कारोबार से जुड़ा है. लेकिन यह लोकप्रियता जिस तरह हमारे समूचे साहित्यिक-सांस्कृतिक पर्यावरण पर छा गई है, इससे कुछ डर सा लगता है. लगता है, जैसे हम एक ग्लैमर आक्रांत समय में रह रहे हैं जहां एक बाजारू बौद्धिकता चीजों का मूल्य तय कर रही है. अगर वह बाजारू न होती तो लोकप्रियतावाद से इस कदर अभिभूत न होती. इस बात को कुछ आगे बढ़ाने से बात ज्यादा खुलेगी. जयपुर के लेखक सम्मेलन में हिंदी लेखकों की आवाज मद्धिम- लगभग गुम- है. इसकी एक सरल और लोकप्रिय व्याख्या यह की जा सकती है कि जब हिंदी का लेखक हाशिए पर है, जब उसकी किताबें नहीं पढ़ी जा रहीं, जब वह अपने समाज में पहचाना नहीं जा रहा तो उसे किसी सम्मेलन में क्यों होना चाहिए?

लेकिन सवाल है कि क्या हिंदी लेखन इसलिए हाशिए पर है कि वह खराब लेखन है? या उसमें अपने समय की अनुगूंजें नहीं हैं? या वह अपने लोगों से संवाद नहीं करता? हकीकत इससे ठीक उल्टी है. आज की तारीख में हिंदी लेखन किसी भी दूसरी भारतीय भाषा- जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है- से कहीं ज्यादा अपने समाज की विश्वसनीय तस्वीर पेश करता है. यही नहीं, विचार और संस्कृति से जुड़े मसलों पर उसकी राय कहीं ज्यादा आधुनिक और प्रामाणिक है. हिंदी कविता अंतरराष्ट्रीय स्तर की कविता है और हिंदी का गद्य लेखन भी इस समय के सबसे मुश्किल सवालों को रखता है. सच तो यह है कि इस बाजार आक्रांत समय में बाज़ार के विरोध में और कमजोर आदमी के हक में सबसे ज्यादा अगर कोई अनुशासन खड़ा है तो वह हिंदी साहित्य है. बल्कि  कई बार लगता है कि बाजार उसे अपने विरोध की सजा दे रहा है, उसके आर्थिक पुरानेपन के लिए उसका मजाक बना रहा है.

दरअसल, इस कोण से देखें तो समझ में आता है कि फिलहाल बाजार एक बड़ी नियामक शक्ति है जिसने भारत में अपना एक समाज बना लिया है और उसके बुद्धिजीवी भी खड़े कर लिए हैं. दुनिया भर में घूमते और दुनिया भर का पढ़ते ये बुद्धिजीवी मौलिक होने का भ्रम पैदा करते हैं, लेकिन असलियत उनकी उसी बॉलीवुड जैसी है जिसका सारा वैचारिक कच्चा माल बाहर से आता है. चालू हिंदी और चालू अंग्रेजी जानने वाली और राजनीतिक तौर पर सही और सामाजिक तौर पर आधुनिक लगने वाली लाइन लेने वाली यह बौद्धिकता ही सारे आयोजन और सारे मंच छेककर बैठी दिखाई पड़ती है. जो नया बन रहा समाज है, वह इस बाजार के प्रति कृतज्ञ है क्योंकि वह उसे ऊंची सैलरी और आला जीवन शैली देता है. जो लोग जीवन या विचार में, लेखन या सरोकार में इस बाजार से बाहर हैं, पुराने ढंग के कपड़े पहनते हैं या देसी ढंग से सोचते हैं, वे उपेक्षणीय ही नहीं, उपहासास्पद भी हैं- यह अहंकारी मान्यता इस बाजारवादी बौद्धिकता में कूट-कूटकर भरी दिखाई देती है. इस मान्यता के समांतर लोकतंत्न और अर्थनीति की आड़ में यथास्थितिवाद बनाए रखने की वह चालाकी छुपी नहीं रह पाती जिसका मकसद एक बड़े समाज को और उसकी भाषाओं को ऐसे बड़े आयोजनों से काटे रखना है.

असल में यह चमकता-दमकता भारत ही है जो कभी ‘थ्री इडियट्स’ देखकर अपनी जाला लगी आला डिग्रियों पर संदेह करता है और ‘चक दे इंडिया’ देखकर भारत का मतलब समझने की कोशिश करता है. उसे अच्छी किताबें पढ़ने की आदत नहीं, जरूरी बहसों में शामिल होने की फुरसत नहीं. फिल्में उसकी बौद्धिक खुराक पूरी करती हैं और कुछ बचा रह जाता है, उसे देने के लिए उसका एक छोटा सा बौद्धिक समाज है जो अपनी साहित्यिक गोष्ठियों में जावेद अख्तर और ओमपुरी को पाकर हर्षित होता है और अभिभूत होने के लिए विदेश से लेखक बुलवाता है.

अफसोस कि इसी बाज़ार का, और इससे निकले बौद्धिक तबके का सारे संसाधनों पर कब्जा है, वह हिंदी के एक छोटे से तबके की कूपमंडुकता को हिंदीभाषी समाज के सार्वभौमिक सत्य की तरह पेश कर साहित्य, कला, संस्कृति और विज्ञान पर अपने एकाधिकार को जायज ठहराता है. वह किसी आमिर खान या शाहरुख खान या नंदिता दास या ओम पुरी के बगल में बैठकर इतराता है और इस बात पर मुग्ध रहता है कि उसके कितने बड़े-बड़े लोगों से संपर्क हैं.

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं)   

बड़ी संस्थाओं की बड़ी-बड़ी बातें

पर्यावरण परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की समिति आईपीसीसी पर हाल ही में यह गंभीर आरोप लगा है – जिसे बाद में उसने स्वीकार भी किया – कि उसने 2007 की अपनी चौथी आकलन रपट में 2035 तक हिमालय के सभी ग्लेशियरों के विलुप्त होने की जो बात कही थी वह किसी गहन शोध की बजाय मह अनुमानों पर आधारित है.

बात थोड़ी नहीं कुछ ज्यादा ही अजीब है. दुनिया की सबसे बड़ी और विश्वसनीय जलवायु संस्था, मगर व्यवहार किसी ज्योतिष संगठन सरीखा. इन्हीं तथ्यरूपी अनुमानों पर पिछले कुछ बरसों से विश्व का खरबों रुपए का जलवायु व्यापार संचालित हो रहा है. एशिया के विकासशील देशों पर पर्यावरण के लिए दबाव बनाने के लिए भी विकसित देशों द्वारा इन्हीं का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है.

हमारे लिए घोर परेशानी वाली बात यह है कि आईपीसीसी की आकलन रपट के जिस ग्लेशियरों वाले अध्याय ने यह सारा विवाद खड़ा किया है उसके प्रभारी एक भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर मुरारी लाल थे. जिन वैज्ञानिक महोदय के कुछ साक्षात्कारों को आधार बनाकर ग्लेशियरों के पिघलने की समय-सीमा इस रपट में निर्धारित की गई थी वे भी भारतीय ही हैं, नाम है डॉक्टर सैयद इकबाल हसनैन. अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जिस आईपीसीसी के करीब 2,000 वैज्ञानिकों ने इस रपट को तैयार किया है उसके अध्यक्ष भी एक भारतीय जलवायु विज्ञानी ही हैं, डॉक्टर आरके पचौरी. हालांकि जलवायु विज्ञान को लेकर उनकी अकादमिक योग्यता पर भी अब सवाल उठाए जा रहे हैं.

हसनैन ने तो अब इस बात से ही इनकार कर दिया है कि उन्होंने कभी 2035 तक हिमालयी ग्लेशियरों के खत्म हो जाने का दावा भी किया था. जबकि उनके इस नए दावे को नकारने वाले कम से कम दो साक्षात्कार आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं. गलती स्वीकारने के बाद अपने बचाव में पचौरी का कहना था कि चूंकि आईपीसीसी की रपट करीब दो हजार पेजों की है इसलिए उसमें एक पेज की कुछ पंक्तियों का गलत होना इतनी बड़ी बात भी नहीं है. किंतु रपट की सबसे ज्यादा चर्चा में रही बातों में से एक यही थी. और इसी की वजह से पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली टेरी नाम की संस्था – जिसके पचौरी महासचिव हैं – को करोड़ों रुपए का लाभ पहुंच चुका है. डा. हसनैन भी इस रिपोर्ट के आने के कुछ दिनों के बाद से ही टेरी के उनके लिए ही गठित ग्लेशियोलॉजी विभाग के मुखिया और पचौरी के नजदीकी के तौर पर काम कर रहे हैं. तो फिर इसके बाद भी दोनों में से एक को उसके हवाले से दूसरे की रपट में क्या छपा है यह और दूसरे को पहले ने उसकी रपट में क्या कहा है, यह क्यों पता नहीं चला?

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिकों पर भी दवाई कंपनियों से पैसे लेने और तमाम देशों को स्वाइन फ्लू का जरूरत से कहीं ज्यादा भय दिखाकर अरबों रुपए की दवाइयां और टीके खरीदने के लिए बाध्य करने के आरोप लगे थे. मगर एक आम आदमी की समझ में तो पड़ोस के डॉक्टर की कमीशनबाजियां और राशन की दुकान का घालमेल ही नहीं आता. वह भला इतने ऊंचे स्तर के खेल और व्यापार समझे भी तो कैसे?  

उन आंखों से वाबस्ता अनजान अफसाने

सबा दीवान की हालिया डॉक्यूमेंट्री फिल्म द अदर सांग के एक दृश्य में कैमरा एक पुराने अलबम पर फोकस होता है और इस पर चलती हुई उंगली एक गोल और सुंदर से चेहरे पर ठहर जाती है. फिर एक सारंगीवादक की खरखरी-सी आवाज आती है, ‘ये रसूलन बाई हैं.’ फिल्मकार पूछती हैं, ‘क्या ये हमेशा इतने सादे कपड़े पहनती थीं?’ जवाब आता है, ‘मुजरा नाच तो करना नहीं था.’

‘हालांकि यह साफ था कि ये महिलाएं लड़ाई करनेवाली नहीं थीं, मगर फिर भी उन्हें बागियों को भड़काने और उनकी आर्थिक सहायता करने की सजा मिली’

रसूलन बाई ने 1948 में मुजरा छोड़ दिया था. कथक आधारित यह भावपूर्ण नृत्य तवायफों की पहचान हुआ करता था. इसके बाद उन्होंने अपना कोठा भी छोड़ दिया और बनारस की एक गली में बने मकान में रहने लगीं. रसूलन बाई, जिनके दर्दभरे गीत शायद भारत में ठुमरी की सबसे मशहूर प्रस्तुतियां थे, अब अपने ही शहर में गाना छोड़ चुकी थीं.

उमराव जान, पाकीजा, देवदास…तवायफों के बारे में हमारी जानकारी और धारणा को काफी हद तक हिंदी फिल्मों ने ही ढाला है. इसलिए दीवान की इस फिल्म में श्वेत-श्याम तस्वीरों में नजर आती रसूलन बाई जैसी तवायफों को देख कर थोड़ा अजीब-सा लगता है. दरअसल आज तवायफ शब्द के साथ जो छवि चस्पां हो चुकी है, उसे देखकर कल्पना करना मुश्किल होता है कि कभी तवायफों को बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता था और शायरी, संगीत, नृत्य और गायन जैसी कलाओं में उन्हें महारत हासिल होती थी. तहजीब की तो उन्हें पाठशाला ही समझ जाता था और बड़े-बड़े नवाबों के साहबजादों को तहजीब सीखने के लिए बाकायदा उनके पास भेजा जाता था.अपनी कुशल राजनीतिक समझ के बल पर उत्तर प्रदेश की सरधना रियासत की शासक बननेवाली बेगम समरू एक तवायफ थीं. कला और पत्र व्यवहार के क्षेत्र में माहिर मोरन सरकार 1802 में महाराजा रंजीत सिंह की रानी बनीं. महाराजा ने उनके चित्रवाले सिक्के भी चलाए.

गौर करें कि यह उस जमाने की बात हो रही है जब आम महिलाओं का पढ़ना-लिखना तो दूर घर से बाहर निकलना भी दुर्लभ होता था. उस दौर में तवायफों के पास सारे अधिकार होते थे. यहां तक कि वे चाहें तो शादी करके घर भी बसा सकती थीं और उनसे शादी करनेवाले को बहुत किस्मतवाला समझ जाता था. ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लखनऊ की तवायफें राजकीय खजाने में सबसे ज्यादा कर जमा करनेवाले लोगों में से हुआ करती थीं. ये दस्तावेज लखनऊ नगर निगम के रिकॉर्ड रूम में आज भी रखे हुए हैं.

तवायफों का सबसे सुनहरा दौर शुरू हुआ 18वीं सदी के आखिर में जब मुगलिया सल्तनत बिखर रही थी. उस वक्त कई आजाद रियासतें बन चुकी थीं. इन रियासतों ने तवायफों को वित्तीय संरक्षण दिया. बदले में तवायफें उन रियासतों की कला और संस्कृति की संरक्षक बनीं. उनकी वजह से कथक, ठुमरी, गजल, दादरा जैसी कलाएं फली-फूलीं.

फिर ब्रिटिश हुकूमत शुरू हुई. अब चूंकि अंग्रेज अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मानते थे और उन्होंने भारत को जीता था तो वे इस संस्कृति को भारतीयों पर भी लादना चाहते थे. मगर उन्हें भी अहसास था कि यह काम आसान नहीं है. इसके लिए उन्होंने दो काम साथ-साथ किए. पहला यहां की शिक्षा पद्धति बदली और दूसरा भारतीय संस्कृति के कई प्रतीकों पर हमला किया जिनमें तवायफें भी एक थीं. पाश्चात्य सभ्यता से आकर्षित नवभारतीय मध्य वर्ग ने भी इस काम में उनका साथ दिया. यह प्रक्रिया भारत की आजादी के बाद भी जारी रही और इस प्रक्रिया में तवायफ की छवि बिल्कुल ही बदल दी गई.

‘इस दौरान अंग्रेजों की संस्कृति के प्रभाव तले उभरते मध्य वर्ग ने लगातार तवायफों को अनैतिक और पतनशील करार दिया और हिंदुस्तानी संगीत को उनसे ‘बचाने’ के लिए कई कोशिशें शुरू कीं’तवायफ शब्द दरअसल अरबी भाषा के शब्द तायफा का बहुवचन है, जिसका अर्थ होता है समूह. इतिहासकार कैथरीन बटलर ब्राउन के मुताबिक इस शब्द का पहले-पहल इस्तेमाल दरगाह कुली खान द्वारा 1739 में लिखे गए मरकबा-ए-दिल्ली में गायिकाओं और नर्तकियों के समुदायों के लिए देखने को मिलता है. मगर आम प्रचलन में यह शब्द 19वीं सदी में ही आया. ब्राउन कहते हैं कि तब तवायफों के दो वर्ग होते थे. पहले वर्ग में वे तवायफें थीं जो तहजीब की मिसाल और गाने में कमाल हुआ करती थीं और जिन्हें इस वजह से काफी क्षत हासिल होती थी. आमतौर पर ऐसी तवायफों का रिश्ता जिंदगी भर एक ही शख्स से होता था और वह होता था उनका संरक्षक. दूसरे वर्ग में वे तवायफें थीं, जिनमें गाने के मामले में उतनी प्रतिभा नहीं होती थी और इस कारण वे देह-व्यापार पर ज्यादा निर्भर होती थीं.

मगर 1857 के बाद यह स्थिति तब बदल गई, जब पूरे भारत में ब्रिटिश क्राउन लॉ लागू हो गया. इस कानून के तहत सभी तवायफों को वेश्या का दर्जा देकर उनकी गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रख दिया गया. कई अदालतों ने फैसले दिए कि नाचना और गाना तो बस नाम के लिए है और तवायफों की असली कमाई वेश्यावृत्ति से हो रही है. तवायफों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत के इस अभियान की एक अहम वजह यह भी बताई जाती है कि अंग्रेजों को पता चल गया था कि 1857 की क्रांति की योजना बनाने की जगह के रूप में कोठों की भी मुख्य भूमिका थी. अपनी पुस्तक द मेकिंग ऑफ कॉलोनियल लखनऊ में इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबेर्ग लिखती हैं, ‘हालांकि यह साफ था कि ये महिलाएं लड़ाई करनेवाली नहीं थीं, मगर फिर भी उन्हें बागियों को भड़काने और उनकी आर्थिक सहायता करने की सजा मिली.’

ब्राउन बताते हैं, ‘इस दौरान अंग्रेजों की संस्कृति के प्रभाव तले उभरते मध्य वर्ग ने लगातार तवायफों को अनैतिक और पतनशील करार दिया और हिंदुस्तानी संगीत को उनसे ‘बचाने’ के लिए कई कोशिशें शुरू कीं.’ राष्ट्रीय संगीत बनाने के लिए अभियान चला जिसका मकसद संगीत को मध्य वर्ग की महिलाओं के लिए अनुकूल बनाना था. ऐसे में इसे तवायफों और मुस्लिम संगीतकारों से अलग करने के प्रयास हुए.

तवायफों पर दोहरी मार पड़ रही थी. एक तरफ तो ब्रिटिश हुकूमत उन्हें परेशान कर रही थी और दूसरी तरफ उन्हें मिलनेवाला वह सामंती संरक्षण भी कम होता जा रहा था, जिससे कोठे और उनकी कलाएं फलती-फूलती थीं. ऐसे में तवायफों ने दूसरे विकल्पों की तरफ रुख किया. वह समय रेडियो का था जो उनके लिए एक राहत भरा विकल्प साबित हुआ. ऑल इंडिया रेडियो अपने शुरुआती दिनों में पूरी तरह से गानेवालियों पर निर्भर था. यही हाल रिकॉर्डिंग कंपनियों का भी था. ग्रामोफोन के दौर की जब शुरुआत हुई थी, तो गौहर जान जैसी तवायफों की धूम किसी सुपरस्टार से कम नहीं थी.    

अब समाज में संगीत के नए संरक्षक थे जिन्होंने अपने दरवाजे तवायफों के लिए बंद कर दिए थे. ऐसे में तवायफों ने थियेटर, रेडियो और फिल्म जगत का रुख किया. किदवई कहते हैं, ‘सिनेमा तवायफों के इतिहास का एक हिस्सा है, जिसमें तवायफी कला के ऐसे-ऐसे पहलू दिखाए गए हैं जो हम आगे कभी नहीं देख पाएंगे. इसने तवायफों को एक नई जिंदगी दी, स्क्रीन पर भी और उससे इतर भी.’ सिद्धेश्वरी जैसी तवायफों ने तो अंग्रेजी में भी गाना सीखा.

वह समय बड़ा असाधारण था. इस दौरान ठुमरी कोठे से बाहर निकली. गायन की एक ऐसी अंतरंग और भावपूर्ण शैली जो हमेशा महिलाओं का क्षेत्र रही थी तवायफों के कोठों को छोड़ आगे बढ़ी. आधुनिकता की चकाचौंध के हमले से बचने के लिए उसे ऐसा करना पड़ा. अब वह कंसर्ट हॉल, रेडियो और सिनेमा में आ चुकी थी. इस नई और बदली हुई दुनिया में तवायफ को खुद ही गानेवाली या गायिका बनना पड़ा. इस रूपांतरण की सबसे मशहूर मिसाल हैं अख्तरी बाई फैजाबादी जो बाद में बेगम अख्तर के नाम से जानी गईं. छोटी उम्र में ही प्रसिद्ध होनेवाली अख्तरी बाई ने बाद में शादी कर ली थी और कई साल तक गाना भी छोड़ दिया था. जसा कि लेखिका रेग्यूला कुरैशी लिखती हैं, ‘बाद में वे दुनिया के सामने पूरी तरह से बदले हुए रूप में आईं और एक देश की संगीत विरासत का राष्ट्रीय प्रतीक बन गईं.’

मगर इसके अपने नुकसान थे. नए भारत की आवाज बनने के लिए अख्तरी बाई को एक दोहरी जिंदगी जीनी पड़ी. इतिहासकार सलीम किदवई की मानें तो उनका आदर अपने अतीत के एक-एक टुकड़े से खुद को अलग कर लेने पर निर्भर था जबकि दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने की उनकी क्षमता की जड़ें काफी हद तक इसी अतीत से जुड़ी हुई थीं.तवायफों को मिले इस नवजीवन के कुछ हैरत भरे पहलू भी हैं. फिल्म अभिनेत्री नरगिस का ही मामला लें, जिनकी मां जद्दन बाई भी मशहूर तवायफ थीं. हालांकि अपनी बेटी को फिल्मों के लिए तैयार करते हुए जद्दन बाई ने उसे गाने के अलावा सब-कुछ सिखाया. यह भी एक विरोधाभास ही था कि जद्दन बाई जहां अपनी सुरीली आवाज के लिए जानी जाती थीं, वहीं उनकी बेटी नरगिस के स्टारडम में उनकी गायिकी की कोई भूमिका नहीं थी. यानी नए दौर के साथ तवायफ की भूमिका भी बदल रही थी. पहले नृत्य या मुजरा, फिर सिर्फ गायन और फिर केवल अभिनय. यहां पर हालांकि यह भी कहा जा सकता है कि शायद ऐसा पार्श्वगायन की कला के उभरने से हुआ होगा.

तवायफों का दौर भले ही बीत गया था, मगर उनकी प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई थी. जैसा कि दीवान कहती हैं, ‘मुजरे को हिंदी फिल्मों के जरिए फिर से जिंदा करने की कोशिश हुई है. मुंबई के बारों में लड़कियां तथाकथित भारतीय पोशाक घाघरा-चोली पहनती थीं. इसकी कुछ वजह यह है कि ‘भारतीय नृत्य’ के लिए लाइसेंस लेना आसान हो जाता है और यह भी कि यह दर्शकों को पसंद आती है. वहां पर जानेवाला आदमी यह कल्पना कर लेता है कि उसके सामने फिल्म स्टार रेखा नाच रही है.’ हालांकि बार डांसरों और तवायफों का यह सतही दिखता रिश्ता वास्तव में कहीं गहरा है. संगीत और नृत्य के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का अध्ययन करनेवालीं अन्ना मोरकॉम बताती हैं कि मुंबई की बार डांसरों का 80 से 90 फीसदी हिस्सा डेरेदार, नट, बेड़िया और कंजर जैसी जातियों से आता है, जिनका परंपरागत पेशा ही इस तरह का रहा है. 2005 में मुंबई के डांस बारों में नृत्य पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो अब तक जारी है. इससे 75 हजार ऐसी लड़कियों की जीविका छिन गई.

20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय समाज में नृत्य को गलत नजर से देखा जाने लगा था. मध्य वर्ग ने नृत्य के खिलाफ चले अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई थी. कोठों पर हर तरफ से मार पड़ रही थी. ऐसे में तवायफों ने अपना सम्मान बनाए रखने के लिए मुजरा छोड़ा और गायन या अभिनय का विकल्प चुना. मगर विडंबना देखिए कि अब उसी मध्यवर्ग द्वारा नृत्य को सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है. शामक डावर, प्रभुदेवा जैसे स्टार, बूगी-वूगी और डांस इंडिया डांस, नच बलिये जैसे टीवी शो की लोकप्रियता और रब ने बना दी जोड़ी जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं. तवायफें तो नहीं रहीं मगर सौभाग्य से उनकी कला उनके साथ ही खत्म नहीं हुई. शास्त्रीय संगीत और नृत्य को अब वही मध्य वर्ग संरक्षण दे रहा है जिसने कभी तवायफों का जीना मुश्किल कर दिया था.’

‘यह उन सब मांओं के दूध का कर्ज चुका रही है’

कभी-कभी हमें अपने जिद्दी और अड़ियल वर्तमान को ठीक से जानने के लिए अतीत में लौटना पड़ता है. इसलिए पहले एक फ्लैशबैक.

वह कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन नहीं चला रही और अगर आप करिश्माई भाषणों और जोशीले नायकत्व की उम्मीद कर रहे हैं तो लेटी हुई यह शांत महिला आपको निराश ही करेगी

यह 2006 है. नवंबर में दिल्ली की एक आम-सी शाम. तभी एक रुक-रुककर आती धीमी आवाज आपकी चेतना को चीरती हुई चली जाती है. ‘मैं कैसे समझाऊं? यह सजा नहीं, मेरा कर्तव्य है.. अपने दर्द के कारण धीमी मगर फिर भी अपनी नैतिकता में डूबी हुई ऐसी जादुई आवाज और ऐसे शब्द, जिन्हें आप कभी नहीं भूल सकते. ‘मेरा कर्तव्य.’ आर्थिक प्रगति के उत्साह में गले तक डूबे भारत में ‘कर्तव्य’ का भला क्या मतलब होगा? आप कहीं दूर चले जाना चाहते हैं. आप व्यस्त हैं और उस आवाज में हिंसा का कोई संकेत भी नहीं है. लेकिन तभी एक चित्र बनने लगता है. अस्पताल के एक बिस्तर पर गोरे रंग की एक कमजोर औरत, बिखरे हुए काले बालोंवाला सिर, नाक में प्लास्टिक की एक ट्यूब, दुबले और साफ हाथ, दृढ़ और बादामी आंखें और रुक-रुक कर आती, कांपती आवाज, जो कर्तव्य की बात करती है.

उसी क्षण इरोम शर्मिला की पूरी कहानी रिसना शुरू होती है. आप किसी ऐतिहासिक इनसान के आस-पास हैं. ऐसा कोई, जिसका राजनीतिक विरोधों के इतिहास में पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है. फिर भी आप उसे भूल गए हैं. आपके पास सैकड़ों टीवी चैनल और  मीडिया का अपूर्व गौरवशाली दौर है, मगर फिर भी आप उसे भूल गए हैं. 2006 में इरोम शर्मिला ने पिछले छह साल से न ही कुछ खाया था और न ही पानी की एक बूंद तक पी थी. भारत सरकार उसकी नाक में एक ड्रिप लगाकर उसे जबर्दस्ती जीवित रख रही थी. छह साल से कोई ठोस पदार्थ उसके शरीर में नहीं गया था और पानी की एक भी बूंद ने उसके होठों को नहीं छुआ था. उसने बालों में कंघी करना तक बन्द कर रखा था. वह अपने दांतों को रुई से और होंठों को सूखी स्पिरिट से साफ करती थी, जिससे उसका उपवास न टूटे. उसका शरीर अंदर से खत्म होता जा रहा था. उसके मासिक चक्र बंद हो गए थे, परंतु उसका संकल्प नहीं टूटा था. जब भी उसका बस चलता था, वह नाक से ट्यूब निकाल फेंकती थी. वह कहती थी कि अपनी आवाज को ‘उचित और शांत ढंग’ से सुनाने के लिए यही उसका नैतिक कर्तव्य है.

फिर भी भारत सरकार और भारत के लोग उसके प्रति बेपरवाह थे. वह तीन साल पहले था. बीते साल 5 नवंबर को इरोम शर्मिला ने अपने इस अभूतपूर्व उपवास के दसवें साल में प्रवेश किया, जो मणिपुर और अधिकांश पूर्वोत्तर पर 1980 से थोपे गए अफ्स्पा (सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम) के विरोध में था. सिर्फ इस संदेह के आधार पर कि कोई व्यक्ति अपराध करने वाला है या कर चुका है, यह एक्ट सेना को बलप्रयोग, गिरफ्तारी और गोली मारने तक की छूट देता है. यह एक्ट सेना के किसी भी व्यक्ति के विरु द्ध केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति भी नहीं देता.

शब्दों में क्रूर दिखनेवाला यह कानून इरादों में और भी क्रूर है. आधिकारिक तौर पर इसके लागू किए जाने के बाद से सुरक्षा बलों ने मणिपुर में हजारों लोग मारे हैं. (2009 में ही सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 265 है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक 300 से ऊपर है, जिसका अर्थ है- प्रतिदिन एक या दो ग़ैर कानूनी हत्याएं) विद्रोही संगठनों पर लगाम कसने के बजाय इस एक्ट ने आम आदमी में उबलता हुआ आक्रोश ही पैदा किया है और उससे नए उग्रवादी पनपे हैं. 1980 में जब यह कानून लागू हुआ, मणिपुर में केवल 4 विद्रोही संगठन थे. आज उनकी संख्या 40 है और मणिपुर मौत की घाटी जैसा बन गया है, जहां बेतहाशा भ्रष्टाचार है और उसके दस्ताने के अंदर पुलिस, उग्रवादियों और राजनीतिज्ञों के हाथ एक साथ हैं और निर्दोष नागरिक उस दस्ताने की गिरफ्त में हैं.

डाक्टर आपको बताएंगे कि शर्मिला का उपवास एक चमत्कार है. उसकी स्थिति का अनुमान लगाना ही आपको डरा देता है. लेकिन शर्मिला कभी किसी शारीरिक कष्ट की बात स्वीकार नहीं करती

कुछ साल पहले एक सीडी सभ्य समाज के गलियारों तक पहुंची. इसमें सेना की अपमानजनक क्रूरता और जनता के रोष की फुटेज थीं. छोटे बच्चों, छात्रों, कामकाजी वर्ग की औरतों की तसवीरें थीं, जो सड़कों पर आ गए थे और आंसू गैस या गोलियों का निशाना बन रहे थे. ऐसी तसवीरें थीं, जिनमें आदमियों को नीचे जमीन पर लिटा दिया गया था और फौज उनके सिरों से बस कुछ इंच ऊपर गोलियां दाग रही थी. हर गुजरते दिन के साथ आते किस्से ग़ुस्सा बढ़ाते जा रहे थे. लड़के गायब हो रहे थे, औरतों के साथ बलात्कार किए जा रहे थे. मनुष्य की सबसे जरूरी चीज, उसके आत्मसम्मान को छील-छील कर उतारा जा रहा था.

युवा इरोम शर्मिला के लिए ये सब चीजें 2 नवंबर, 2000 को स्पष्ट हुईं. एक दिन पहले एक विद्रोही संगठन ने असम राइफल्स के एक दस्ते पर बम फेंका था, क्रोधित बटालियन ने मालोम बस स्टैंड पर दस बेकसूर लोगों को मार डाला. उन शवों की दिल दहला देनेवाली तसवीरें अगले दिन के स्थानीय अखबारों में छपीं, जिनमें एक 62 साल की औरत लिसेंगबम इबेतोमी और 18 साल की सिनम चंद्रमणि भी थी, जो 1988 में राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार ले चुकी थी. असामान्य रूप से बेचैन 28 साल की शर्मिला ने 4 नवंबर को अपना सत्याग्रह शुरू किया.

तीन साल पहले की नवंबर की उस सर्द शाम में हॉस्पिटल के एक बर्फ से सफेद गलियारे में पसर कर बैठे हुए शर्मिला के 48 वर्षीय भाई सिंहजीत ने कुछ हंस कर कहा था, ‘हम यहां कैसे पहुंचे?’ उस उदास प्रश्न की अनुगूंज में ही शर्मिला और उनके अद्भुत सफर की कहानी छिपी थी. उस कहानी के बड़े हिस्से को अपने अंदर झांक कर जानने की जरूरत है. ऐसा तनाव, तीव्रता और लगभग असंभव कल्पना का काम इतनी आसानी से नहीं दिखता. यह इंफाल की एक सुदूर झोंपड़ी में शुरू हुआ. राजधानी और राज्य की सारी शक्तियां उनके विरुद्ध लामबंद हो गईं. अस्पताल के उसके छोटे-से कमरे में उसके साथ बंद नर्स थी और बाहर भाई था, जिसके पास कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था और जो न हिंदी बोल पाता था, न अंग्रेजी. दरवाजे पर तैनात पुलिसवाले भी थे.

‘मेंघाओबी’ अर्थात गोरी लड़की, जिस नाम से मणिपुर के लोग उसे पुकारते हैं, इंफाल के पशु चिकित्सालय में काम करनेवाले एक अनपढ़ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सबसे छोटी बेटी थी. वह हमेशा से अकेले रहना पसंद करती थी, क्लास में सबसे पीछे बैठती थी और अच्छी श्रोता थी. उससे बड़े आठ भाई-बहन और थे. जब उसका जन्म हुआ, उसकी 44 वर्षीया मां इरोम सखी का दूध सूख चुका था. जब शाम ढलती थी और मणिपुर अंधेरे में डूबने लगता था, शर्मिला रोना शुरू कर देती थी. उसके सामने से हटने के लिए मां को पास की किराने की दुकान पर जाना पड़ता था, ताकि सिंहजीत अपनी छोटी बहन को गोद में लेकर पड़ोस की किसी मां के पास दूध पिलाने ले जा सके. ‘इसकी इच्छाशक्ति हमेशा से असाधारण रही है. शायद इसीलिए वह सबसे अलग भी है,’ सिंहजीत कहते हैं, ‘शायद इस तरह यह उन सब मांओं के दूध का कर्ज चुका रही है.’ बगल में बैठे इस समझदार गंवई व्यक्ति की कहानी में एक तीखा-सा दर्द था- इस जंग को अपनी अदृश्य सांसें देता हुआ वफादार योद्धा, एक अधेड़ भाई, जिसने बाहर दरवाजे पर रह कर बहन की देखभाल करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, वह आदमी जो बुनाई से प्रतिदिन 120 रू कमानेवाली अपनी पत्नी पर निर्भर है, ताकि वह दृढ़ता से अपनी बहन के साथ खड़ा रह सके.

डेढ़ महीने पहले वह अपने दो साथियों बबलू लोइतेंगबम और कांग्लेपाल की मदद से शर्मिला को किसी तरह मणिपुर से बाहर निकाल लाने में सफल हो गया था. पिछले छह साल से वह पुलिस की निगरानी में इंफाल के जेएन हास्पिटल के एक छोटे-से कमरे में बंद थी. जब भी उसे रिहा किया जाता, वह अपनी नाक से ट्यूब निकाल फेंकती और अपना अनशन जारी रखती. तीन दिन बाद मरणासन्न हालत में उसे ‘आत्महत्या के प्रयास के आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया जाता और यह सिलसिला बार- बार दोहराया जाता. मगर मणिपुर में अनशन, गिरफ्तारी और उस ट्यूब के छह साल थोड़ा काम ही कर पाए थे. लड़ाई को दिल्ली में लाना ही था. 3 अक्तूबर, 2006 को दिल्ली पहुंच कर दोनों भाई-बहनों ने भारतीय लोकतंत्र की आशाओं से भरी वेदी जंतर-मंतर पर डेरा डाला. मीडिया को उनमें कोई रुचि नहीं थी. फिर एक रात पुलिस ने आकर उसे आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और उसे एम्स में फेंक दिया गया. उसने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और गृहमंत्री को तीन भावुक चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. यदि उसने यह करने के बजाय किसी विमान का अपहरण कर लिया होता तो शायद उसकी बात कुछ जल्दी सुनी जाती.

यह सच है कि आज मणिपुर टूटा हुआ और हिंसक समाज है. मगर उसका हल दृढ़ और प्रेरक नेतृत्व में ही खोजा जा सकता है, जिसे निभाने की जिम्मेदारी अब सरकार की है. बाकी दर्शन छोड़कर नैतिकता का कानून लागू कीजिए. बाकी सब अपने आप सुलझ जाएगा

सिंहजीत ने उस हास्पिटल के गलियारे में कहा था, ‘हम अपनी लड़ाई के बीच में हैं. परेशानियां तो आएंगी ही मगर फिर भी हम आखिर तक लड़ेंगे, चाहे इसमें मेरी बहन की जान ही क्यों न चली जाये. लेकिन अगर उसने यह अनशन शुरू करने से पहले मुझे बता दिया होता तो मैं उसे खुद के साथ यह कभी न करने देता. पहले हमें बहुत सारी चीजें सीखनी चाहिए थीं. बात कैसे करनी है, समझौता कैसे करना है, पर हमें कुछ भी नहीं पता था. हम गरीब थे और कुछ भी नहीं जानते थे.’ लेकिन एक तरह से देखा जाए तो शर्मिला की कहानी की विनम्र कर देनेवाली शक्ति का मूल उसकी उसी बिना मार्गदर्शनवाली शुरुआत में है. वह कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन नहीं चला रही और अगर आप करिश्माई भाषणों और जोशीले नायकत्व की उम्मीद कर रहे हैं तो लेटी हुई यह शांत महिला आपको निराश ही करेगी. उस 34 वर्षीया स्त्री का सत्याग्रह कोई वैचारिक उपज नहीं था. अपने आस-पास मृत्यु और हिंसा के चक्र की प्रतिक्रिया में यह उसका नितांत मानवीय उत्तर था, अंदर से एक आध्यात्मिक संदेश जैसा.

शर्मिला ने अपनी कांपती लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा था, ‘पहले पन्ने पर मालोम के शव को देख कर मैं स्तब्ध थी. मैं एक शांति रैली में हिस्सा लेने जानेवाली थी, मगर मुझे लगा कि इस तरह सेना की हिंसा नहीं रोकी जा सकती. इसलिए मैंने अनशन पर बैठने का निश्चय किया.’ 4 नवंबर, 2000 को शर्मिला की मां सखी ने उसे आशीर्वाद दिया था, ‘तुम अपनी मंजिल पाओगी’ और फिर वे तटस्थ भाव से पलट कर चली गई थीं.

उसके बाद चाहे शर्मिला इंफाल में अपनी मां से पैदल पहुंचने की दूरी पर ही कैद थी, वे कभी नहीं मिलीं. दिल्ली की एक फिल्म-निर्मात्री कविता जोशी द्वारा बनाई गई एक फिल्म में सखी रोते हुए कहती हैं, ‘क्या फायदा है? मेरा दिल बहुत कमजोर है. मैं उसे देखते ही रो पड़ूंगी. इसीलिए मैंने तय किया है कि जब तक उसकी बातें नहीं मानी जातीं, मैं उससे नहीं मिलूंगी, क्योंकि इससे उसका संकल्प कमजोर पड़ जाएगा. हमें खाना नहीं मिलता तो हम किस तरह बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं और सो भी नहीं पाते. वे जो थोड़ा-सा द्रव उसके शरीर में डालते हैं, वह उसके सहारे किस तरह अपने दिन और रातें बिताती होगी. अगर पांच दिन के लिए भी यह कानून हटा लिया जाए तो मैं अपने हाथों से उसे एक-एक चम्मच करके चावल खिलाऊंगी. उसके बाद वह मर भी जाती है, तो भी हमें संतुष्टि रहेगी कि मेरी शर्मिला की इच्छा पूरी हुई.’

शर्मिला के लिए यह साहसी, निरक्षर औरत ही भगवान है. यही वह मंदिर है, जिससे शर्मिला को शक्ति मिलती है. यह पूछने पर कि मां से न मिल पाना उसके लिए कितना कष्टकारक है, वह उत्तर देती है, ‘ज्यादा नहीं’, और थोड़ा रुकती है, ‘क्योंकि… मुझे नहीं पता कि मैं यह कैसे समझाऊं. पर हम सब यहां एक खास काम करने आए हैं और उसके लिए हम अकेले ही यहां आए हैं.’ अपने शरीर और दिमाग में संतुलन बनाए रखने के लिए वह दिन में चार-पांच घंटे योग करती है, जो उसने खुद से ही सीखा है. डाक्टर आपको बताएंगे कि शर्मिला का उपवास एक चमत्कार है. उसकी स्थिति का अनुमान लगाना ही आपको डरा देता है. लेकिन शर्मिला कभी किसी शारीरिक कष्ट की बात स्वीकार नहीं करती. वह मुस्कुरा कर कहती है, ‘मैं ठीक हूं, मैं ठीक हूं. मैं अपने ऊपर कोई अत्याचार नहीं कर रही. यह सजा नहीं है, यह तो मेरा फर्ज है. मुझे नहीं पता कि भविष्य में मेरे साथ क्या होनेवाला है. वह तो ईश्वर की मर्जी है. मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि नियमितता, अनुशासन और बहुत सारे उत्साह के साथ आप कुछ भी पा सकते हैं.’ आप इन बातों को सुनी-सुनाई नीरस बातें कहकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन जब वह बोल रही होती है तो यही बातें नायकत्व का चोला पहन लेती हैं.

उसके बाद तीन साल से कुछ नहीं बदला है. दिल्ली आने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अपने उपवास के दसवें साल में भी वह इंफाल हास्पिटल के एक गंदे से कमरे में किसी अदने अपराधी की तरह बंद है. यद्यपि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है, फिर भी कभी-कभी अपने भाई के अलावा उसे किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं है. यहां तक कि कुछ महीने पहले महाश्वेता देवी को भी उससे मिलने नहीं दिया गया. वह किसी के साथ और गांधी और मंडेला की जीवनियों लिए तरसती रहती है. उसका भाईचारे का भ्रम तथा महान और लगभग अमानवीय आशा का खजाना कभी उसका साथ नहीं छोड़ता.

लेकिन भाई की हताशा उतनी ही प्रबल है. शर्मिला के इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की कद्र करने में देश की असफलता उस बेकद्री की एक झलक दिखाती है, जिसके चलते पूरा उत्तर-पूर्व नष्ट हो रहा है. जब 32 साल की मनोरमा देवी को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध रखने के आरोप में असम राइफल्स ने गिरफ्तार किया, तब अफ्स्पा के विरुद्ध शर्मिला के अनशन को चार साल हो चुके थे. एक दिन बाद इंफाल में मनोरमा का शव मिला था, जिस पर यातना और बलात्कार के भयानक निशान थे. मणिपुर उबल पड़ा था. पांच दिन बाद, 15 जुलाई, 2004 को मानवीय अभिव्यक्ति  की सब सीमाएं लांघते हुए 30 आम महिलाओं ने असम राइफल्स के मुख्यालय कांग्ला फोर्ट पर नग्न होकर प्रदर्शन किया था. जो बुरा होना बचा था, उसे पूरा करती आम मांएं और दादियां चिल्ला रही थीं, ‘भारतीय सेना, हमारा बलात्कार करो.’ उन सबको तीन महीने के लिए जेल के अंदर डाल दिया गया.

उसके बाद सरकार द्वारा गठित किए गए हर आयोग ने घावों को बढ़ाने का काम ही किया है. मनोरमा हत्याकांड के बाद गठित किए गए जस्टिस उपेंद्र आयोग की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई. नवंबर, 2004 में प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह ने अफ्स्पा की समीक्षा के लिए जस्टिस जीवन रेड्डी समिति गठित की. उस समिति ने अफ्स्पा को खत्म करने की सिफारिश की और साथ ही उसकी सबसे क्रूर शक्तियों को ग़ैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) एक्ट में स्थानांतरित करने की सलाह दी. इस निष्कर्ष पर हर आधिकारिक प्रतिक्रिया इसे ग़लत ही ठहराती है. तब के रक्षा मंत्नी प्रणब मुखर्जी ने अफ्स्पा को वापस लेने या उसकी शक्तियों को कम करने की बात इस आधार पर खरिज कर दी थी कि ‘अशांत इलाकों’ में ऐसी शक्तियों के बिना सेना ठीक से काम नहीं कर सकती.

रोचक बात यह है कि शर्मिला के मुद्दे को रोशनी में आने के लिए शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेता, ईरान की शिरीन एबादी की 2006 की भारत यात्ना का इंतजार करना पड़ा. पत्रकारों के बीच वे उबलते हुए बोली थीं, ‘यदि शर्मिला मरती है तो संसद इसकी सीधे तौर पर जिम्मेदार है. वह मरती है तो कार्यपालिका, प्रधानमंत्नी और राष्ट्रपति भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं किया…अगर वह मरती है तो आप सब पत्रकार भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि आपने अपना फर्ज नहीं निभाया…’

फिर भी पिछले तीन साल में कुछ नहीं बदला है. ‘मनोरमा मदर्स’ के असीमित आक्रोश के बाद इंफाल के कुछ जिलों से अफ्स्पा हटाया गया, लेकिन वायरस ने अपनी जगह बदल ली. जहां आर्मी ने छोड़ा, वहां मणिपुर पुलिस के कमांडो आ गए. अफ्स्पा के अत्याचार शासन की संस्कृति में ही घुल गए हैं. इसे आप ‘दंडविहीन संस्कृति’ भी कह सकते हैं, जहां मानवाधिकारों के हनन पर कोई सजा नहीं है. इस साल 23 जुलाई को एक पूर्व विद्रोही नवयुवक संजीत को पुलिस ने इंफाल के व्यस्ततम बाजार में भीड़ के सामने दिन-दहाड़े गोली मार दी. पास खड़ी एक निर्दोष महिला राबिना देवी, जिसे पांच महीने का गर्भ था, के सिर में भी एक गोली लगी और वह भी वहीं मारी गई. उसके साथ उसका दो साल का बेटा रसेल भी था. कई लोग घायल हुए. इस पूरे हत्याकांड की तसवीरें लेनेवाले अज्ञात फोटोग्राफर के लिए ये महज संख्याएं बनकर रह जातीं: पिछले साल हुई 265 हत्याओं में से सिर्फ दो, मगर इस बार तहलका में छपी ये तसवीरें सबूत थीं. मणिपुर फिर से उबल पड़ा.

चार महीने बाद भी लोगों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. लोगों की भावनाओं से बेपरवाह मुख्यमंत्नी इबोबी सिंह ने पहले तो बेशर्मी से बच निकलने की कोशिश की. संजित की हत्या के दिन उन्होंने विधानसभा में दावा किया कि उनकी पुलिस ने मुठभेड़ में एक उग्रवादी मारा है. बाद में तहलका के आलेख के सामने आने पर वे बोले कि उन्हें उनके अधिकारियों ने गुमराह किया है और अब वे न्यायिक जांच करवाने के लिए मजबूर थे. हालांकि मुख्यमंत्री और मणिपुर के डीजीपी जॉय कुमार, दोनों तहलका पर घटना को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाते हैं.

अब भी थोड़ी-सी उम्मीद बाकी है. पिछले कुछ महीनों में राज्य में विरोध बढ़ा है और दर्जनों सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं को निरंकुश राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत बहुत ओछे ढंग से गिरफ्तार किया गया है. इनमें एक प्रतिष्ठित पर्यावरण कार्यकर्ता जितेन युमनाम भी थे. 23 नवंबर को एक स्वतंत्न ‘सिटिजंस फैक्ट फाइंडिंग टीम’ ने ‘लोकतंत्र से मुठभेड़: मणिपुर में अधिकारों का हनन’ नाम की रिपोर्ट जारी की और गृह मंत्रालय को एक प्रेजेंटेशन दी. एक दिन बाद गृह सचिव गोपाल पिल्लै ने भूतपूर्व आइपीएस अधिकारी और फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य के.एस. सुब्रह्मण्यम को बताया कि मंत्रालय ने जितेन और दस अन्य लोगों का रासुका के तहत कारावास रद्द कर दिया है. एक और छोटी-सी आशा का संकेत यह है कि तहलका से एक साक्षात्कार में गृहमंत्नी पी चिदंबरम ने अफ्स्पा को अधिक मानवीय और जवाबदेह बनाने के लिए कुछ सुधारों की सिफारिश किए जाने के बारे में कहा है. इन सुधारों को अभी कैबिनेट का मंजूरी का इंतजार है.

उलझी हुई इस दुनिया में अक्सर किसी समस्या का समाधान एक अटल और प्रेरणादायक नेतृत्व में मिलता है. ऐसा नेतृत्व, जो अपने सामने आते प्रश्नों की नैतिकता को जगा सके और बिना किसी शर्त के उसे सही दिशा में सोचने को प्रेरित कर सके. शर्मिला का महान सत्याग्रह भी ऐसा ही एक नेतृत्व है. यह एक सच्चे और सभ्य समाज के विचार को फिर से आधार देता है. यह मृत्युपरक और संवेदनहीन क्रूरता के चेहरे पर क्रूरता का तमाचा मारने से इनकार कर देता है. उसकी याचना सीधी-सी है-सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम को वापस लिया जाए. यह भारतीय गणराज्य के उस विचार में तो कहीं नहीं था, जिसे इसके संस्थापकों ने हमें वसीयत में दिया है. यह अमानवीय है.

यह सच है कि आज मणिपुर टूटा हुआ और हिंसक समाज है. मगर उसका हल दृढ़ और प्रेरक नेतृत्व में ही खोजा जा सकता है, जिसे निभाने की जिम्मेदारी अब सरकार की है. बाकी दर्शन छोड़कर नैतिकता का कानून लागू कीजिए. बाकी सब अपने आप सुलझ जाएगा. लेकिन दुर्भाग्यवश, जब हम हिंसा की भयानक तारीख 26/11 की बरसी मनाना याद रखते हैं, हम उस औरत को भूल जाते हैं, जिसने असीम हिंसा का उत्तर असीम शांति से दिया.

यह हमारे समय का एक दृष्टांत है. यदि इरोम शर्मिला की कहानी हमें रुक कर कुछ सोचने पर मजबूर नहीं करती तो कोई भी चीज ऐसा नहीं कर सकेगी. यह असाधारण होने की कहानी है. असाधारण इच्छाशक्ति, असाधारण सादगी और असाधारण उम्मीदों की. सूचनाओं से भरे हुए इस व्यस्त समय में अपनी बात किसी को सुनवाना असंभव ही है, मगर यदि इरोम शर्मिला की कहानी सुन कर हम नहीं ठिठकते तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे.’ 

‘अवचेतन मन की निराली कथाएं’

आज हिस्टीरियाकी कथाएं हो जाएं.

कुछ कथाएं बस मजा देती हैं और बताती हैं कि जीवन कितना बहुरंगी है. मानव मन के विचित्र पहलुओं से आपको परिचित कराती हिस्टीरियाकी ये कथाएं भी ऐसी ही हैं. हिस्टीरिया हमारे अवचेतन मन का बड़ा पेंचदार खेल है – ट्रेजिकॉमेडीकह लें. ऐसा समझें कि डॉक्टर के पास ऐसा मरीज आता है जिसे वास्तव में कोई बीमारी नहीं है परंतु वह फिर भी या तो बेहोश पड़ा है या पेट दर्द से तड़प रहा है. पति चिंतित खड़ा है कि इसे क्या हो गया डॉक्टर सा? डॉक्टर प्राय: ठीक से बता ही नहीं पाता कि कोई बीमारी नहीं, बस हिस्टीरिया है. वह प्राय: आधा अधूरा सा कुछ कहता है जिसका अर्थ कई बार घर वाले यह निकाल लेते हैं कि बीमारी-फीमारी तो कुछ है ही नहीं, बस, नाटक कर रही है! याद रखें. यह ऐसा विचित्र मरीज है जो बेहोश लाया गया है, बेहोश दिख रहा है परंतु बेहोश नहीं है, और वह नाटक भी नहीं कर रहा, न ही बहाना बनाकर बेहोश बना पड़ा है. वास्तव में उसे कोई बीमारी नहीं परंतु उसका अवचेतन मन उसे विश्वास दिला रहा है कि तू बेहोश है. उसे लग रहा है कि वह बेहोश है जबकि नाटक करके बेहोश हुआ आदमी जानता है कि वह बेहोश न होकर बेहोशी का नाटक कर रहा है. नाटकबाजी चेतन मन का खेल है जबकि हिस्टीरिया अवचेतन मन का. क्यों कर रहा है अवचेतन मन ऐसा खेल? क्योंकि वह ध्यान अपनी किसी समस्या की तरफ खींचना चाहता है. हिस्टीरिया ध्यान खींचने की (अटेंशन सीकिंग) विधि है, अवचेतन मन की. हमारी तरफ अन्यथा ध्यान देने का समय तुम्हारे पास नहीं तो यूं सही – बेहोश हो जाऊं तब तो मेरे लिए दौड़ते फिरोगे न?

मेरा उद्देश्य यह सिखाना है कि यदि कोई डॉक्टर मरीज के बारे में कहे कि इसे कोई बीमारी नहीं है, ‘हिस्टीरियाहै, बसतो मरीज से सहानुभूति से पेश आएं. जानने की कोशिश करें कि क्या मानसिक परेशानी है उसकी? उस कारण को तलाश कर ठीक करें जिसकी तरफ ध्यान खींचने के लिए वह बारबार बेहोश हो जाता है? उसे डांटें मत. यह न कहें कि तेरे को है कुछ नहीं और तू फालतू ही परेशान करती(ता) है सबको. हिस्टीरिया के मरीज को डॉक्टर की नहीं आपकी और आपकी सहानुभूति की जरूरत होती है.

कथा-1

मुझे बताया गया कि एक बेहद इंटरेस्टिंग न्यूरोलोजिक केसबच्चा वार्ड में भर्ती हुआ है. मैं गया. देखा. आठ साल का इकलौता बेटा. बेहद होशियार है, हमेशा टॉप करता है – बाप ने बताया. मां बदहवास सी बोली कि पिछले पंद्रह दिनों से इसकी खोपड़ी की त्वचा इतनी सेंसिटिव हो गई है कि कंघी तो दूर सिर पर उंगली भी छू जाए तो दर्द के मारे बिलबिलाता है, स्कूल नहीं भेज पा रहे. 15 दिनों में कितना पीछे रह गया है स्टडीज में – बाप ने चिंता जताई. इतनी जांचें हो चुकीं. ब्लड टेस्ट, सीटी स्केन, एक्स-रे. पता नहीं क्या हो गया मेरे बेटे को? मैंने पहले पांच मिनट तक बच्चे से बीमारी की बात ही नहीं की. मैंने उससे पूछा कि तुमको कौन सा खेल पसंद है? कौन सा वीडियो गेम? ऐसी ही बातें. बच्चा जब बातों में तल्लीन था और बता रहा था कि कैसे उसने दोस्त की बॉल पर छक्का मारा था, तभी मैंने शाबाशी देते हुए उसकी पीठ पर हाथ रखा और बातें करते हुए हाथ को उसके सिर पर ले आया. कोई दर्द नहीं हुआ उसे. बातों में लगाकर मैं उसकी खोपड़ी को यहां-वहां दबाता भी रहा. कुछ नहीं कहा उसने. बीमारी सामने थी – हिस्टीरिया. कुछ नहीं था बच्चे को. वह तो अपने पिता से परेशान था जो अपने सपनों को उसके जरिए साकार करने की जिद में उसका बचपन छुड़ाने पर तुला था. वह उसे हर चीज में फर्स्ट देखना चाहता था. पढ़ो. इस सब्जेक्ट में आधा नंबर कम कैसे? म्यूजिक सीखो. मैथ्स की कोचिंग चलो. परेशान हो गया था बच्चा. उसी का नतीजा था वह बीमारी.मैंने मां बाप को समझाया कि डॉक्टरों में न भटकें. बाप ठीक हो जाए तो बेटा खुद ठीक हो जाएगा. बाद में वही हुआ भी.

कथा-2

वे चाहे जब पत्नी को उठाए अस्पताल ले आते हैं. शिकायत करते हैं कि ये तो फिर से बेहोश होकर गिर पड़ी डॉक्टर साहब. चाहे जब, चाहे जहां बेहोश हो जाती हैं. हर बार वे अस्पताल भागते हैं. गिरकर कभी चोट नहीं लगती. ऐसा गिरती हैं कि सीधे पलंग या सोफे पर गिरें . सौ जांचें करा चुके, दो सौ तरह के डॉक्टरों को दिखा चुके. उनको बताया जाता है कि हिस्टीरिया वाली बेहोशीहै साहब- अस्पताल न लाएं. कुछ देर में खुद उठ जाएंगी. पर वे मानते नहीं. पत्नी की ठुकाई भी करते रहते हैं कि तू नाटक करके परेशान न किया कर. पत्नी का ध्यान रखते नहीं. वह बेहोश होकर उनका ध्यान खींचती रहती है. अस्पताल में पति महोदय झक मारकर उसके आस-पास रहते हैं. दोनों की नासमझी में हिस्टीरियाबढ़ता जाता है और डॉक्टर परेशान रहता है.

पुनश्च:

फिर कहूंगा कि हिस्टीरियानाटकबाजी नहीं है. मरीज पर नाराज न हों और न ही उसे लेकर डॉक्टरों के पास भटकें. मरीज के मन को समझें. मानसिक तनाव का कारण खोजें और दूर करें. याद रखें ठुकाई करना इलाज नहीं है, बल्कि कारण है.

  

रुचिका के आगे का रास्ता

शायद अब रुचिका को देर-सबेर इंसाफ़ मिल जाए. गृहमंत्नी पी चिदंबरम सीधे इस मामले को देख रहे हैं. मीडिया चाहे तो अपनी पीठ थपथपा सकता है. आखिर जेसिका लाल, नीतीश कटारा और प्रियदर्शनी मट्टू के बाद यह चौथा मामला है, जिसमें उसकी चौकसी ने इंसाफ का गला घुटने नहीं दिया है. खुद हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ को यह शिकायत है कि अगर मीडिया ने शोर न मचाया होता तो अपने गुनाहों के लिए छह महीने की सजा के साथ वे बच निकले होते.

यह सिर्फ इत्तिफाक नहीं कि जिन तमाम मामलों को हाल में मीडिया ने उठाया है वे सब बड़े शहरों के और वैसे मध्यवर्गीय घरों के मामले हैं जिनके साथ वह अपना वर्गीय जुड़ाव महसूस करता है. इन लोगों पर चोट उसे अपने ‘क्लास’ पर चोट लगती है

मीडिया की इस सक्रियता के समांतर शहरी मध्यवर्ग की जागरूकता को भी न्याय के लिए इस बदले हुए परिदृश्य का श्रेय दिया जा सकता है. मानवाधिकारों के लिए एक नई तरह की संवेदना इस शहरी समाज में दिख रही है और प्रतिकार की एक नई भाषा भी, जिसमें मोमबत्तियां जलाने से लेकर नेट पर मुहिम छेड़ने तक की पहल शामिल है. लेकिन जो लोग इस एक मिसाल से यह साबित करना चाहते हैं कि मीडिया अपने सरोकारों को लेकर पूरी तरह सजग है, उन्हें कुछ और बातें याद दिलाने की जरूरत है.

मसलन, जैसे ही रुचिका का मामला सामने आया, वैसे ही कई और कुचली हुई नाइंसाफियों की कराह सामने आ गई. राजस्थान के डीआईजी मधुकर टंडन का मामला याद आ गया और गुजरात में भी एक नाबालिग के साथ एक विधायक के रिश्तेदार के ऐसे ही वहशी सलूक की 11 साल पुरानी ख़बर चली आई. ये घटनाएं सिर्फ यह याद दिलाती हैं कि इस देश में न नाबालिग लड़कियों से बदसलूकी नई है और न ही पुलिस का अपराधी रवैया. अक्सर ऐसे मामलों पर न मीडिया की नजर पड़ती है न किसी और की. रुचिका का मामला भी सामने आ गया तो इसलिए कि उसके पीछे एक ऐसी सहेली खड़ी थी, जो इंसाफ़ के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने और एक लंबा सफर करने को तैयार थी. वरना अगर आराधना और उसका परिवार न होता तो रुचिका एक खोई हुई कहानी का नाम होता और गिरहोत्ना परिवार अपने डरे हुए अकेलेपन से बाहर नहीं आ पाता.

कह सकते हैं कि मीडिया ने वही किया जो उसका काम है. वह रुचिका का मुकदमा लड़ नहीं सकता था, मुकदमा लड़नेवालों को ताकत और रसद दे सकता था. जब उसने देखा कि रुचिका को उसका इंसाफ़ नहीं मिला और उसकी लड़ाई लड़नेवाले अकेले और कातर हैं तो वह अपनी पूरी निष्ठा के साथ इंसाफ़ के पक्ष में खड़ा हो गया. निस्संदेह यह योगदान भी अपने-आप में छोटा नहीं. छोटा है तो वह दायरा जिसमें मीडिया यह सक्रियता दिखाता है. यह सिर्फ इत्तिफाक नहीं कि जिन तमाम मामलों को हाल में मीडिया ने उठाया है वे सब बड़े शहरों के और वैसे मध्यवर्गीय घरों के मामले हैं जिनके साथ वह अपना वर्गीय जुड़ाव महसूस करता है. इन लोगों पर चोट उसे अपने ‘क्लास’ पर चोट लगती है.

एक बड़े फलक पर यह बात उस पाठक वर्ग के लिए भी कही जा सकती है जिसके लिए इन दिनों अखबार निकाले जाते हैं और चैनल चलाए जाते हैं. दिल्ली के अखबारों और टीवी चैनलों को यह मालूम है कि जेसिका या रुचिका की लड़ाई एक बड़ी प्रतिक्रिया पैदा करेगी- सिर्फ अन्याय की प्रकृति की वजह से नहीं- पीड़ितों की सामाजिक-शैक्षणिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की वजह से भी. मीडिया के लिए इस अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना व्यावसायिक रूप से भी फायदेमंद है क्योंकि यह लड़ाई टीआरपी और भरोसा दोनों देती है. इस लिहाज से यह एक सुविधाजनक लड़ाई है जो मीडिया लड़ रहा है. इससे यह तोहमत भी जाती रहती है कि वह सामाजिक सरोकारों के लिए काम नहीं कर रहा है. कुछ मीडिया चैनलों के प्रमुख अभी से ललकारने लगे हैं कि जिन्हें मीडिया पर नाज नहीं है, वे सामने आएं.

नक्सलवाद से लेकर आतंकवाद तक के ख़िलाफ़ कार्रवाई के नाम पर झारखंड और छत्तीसगढ़ से लेकर गुजरात और जम्मू कश्मीर तक ऐसे ढेर सारे मामले हैं जो रुचिका के साथ हुई बदसलूकी या उसके भाई आशु के साथ हुए व्यवहार से कहीं ज्यादा बर्बर और संगीन हैं

लेकिन जो कुछ असुविधाजनक लड़ाइयां हैं, जो कुछ लंबे समय तक लड़नी पड़ सकती हैं, जिनके लिए कुछ क़ीमत चुकानी पड़ सकती है, उनकी तरफ से मीडिया बड़ी आसानी से आंख मूंद लेता है. नक्सलवाद से लेकर आतंकवाद तक के ख़िलाफ़ कार्रवाई के नाम पर झारखंड और छत्तीसगढ़ से लेकर गुजरात और जम्मू कश्मीर तक ऐसे ढेर सारे मामले हैं जो रुचिका के साथ हुई बदसलूकी या उसके भाई आशु के साथ हुए व्यवहार से कहीं ज्यादा बर्बर और संगीन हैं.

पूरे पूर्वोत्तर में पुलिस और सुरक्षा बलों का रवैया ऐसी भूली हुई बर्बरता की एक और मिसाल है. ज्यादा दिन नहीं हुए जब ‘तहलका’ ने मणिपुर में हुई फर्जी मुठभेड़ की तसवीरें छापी थीं. वे तसवीरें आशु के हलफनामे से कम दिल दहलानेवाली नहीं थीं. लेकिन वह मणिपुर का मामला है, इसलिए मीडिया को दिखाई नहीं पड़ता. उसे दस साल से अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला की आवाज सुनाई नहीं पड़ती- क्योंकि मणिपुर दिल्ली से बहुत दूर है और वहां रहने वाले यहां की मध्यवर्गीय जमात के कुछ नहीं लगते.

यह रुचिका के मामले में मीडिया की सक्रियता की आलोचना नहीं है, बल्कि बस यह अनुरोध है कि इस सक्रियता का थोड़ा और सामाजिक विस्तार हो. क्योंकि रुचिकाएं और भी हैं जो न जाने कितने राठौड़ों के हाथों रोज ऐसी जिल्लत झेल रही हैं और इंसाफ़ से महरूम रह जा रही हैं. लेकिन यह अनुरोध सिर्फ दूसरी रुचिकाओं की रक्षा के लिए नहीं है. जिस रुचिका को हम जानते हैं, उसके बचाव के लिए भी है. आखिर किसी एसपीएस राठौड़ को यह हिम्मत कैसे मिलती है कि वह एक रुचिका से बदतमीजी करे और फिर उसके पूरे परिवार का जीना हराम कर दे?

रुचिका मामले में अगर नौ साल तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो इसके लिए सिर्फ राठौड़ नहीं, नीचे से ऊपर तक तंत्न का एक-एक पुर्जा जिम्मेदार है. अगर आशु के ख़िलाफ़ फर्जी मामले जड़े गए, अगर उसे पकड़ कर थाने लाया गया और वहां उसे बेरहमी से यातनाएं दी गईं तो यह काम भी राठौड़ ने अकेले नहीं किया- बिल्कुल निचले स्तर पर खड़े सिपाही से लेकर सबसे ऊपर बैठे अफसर और इन सबको संरक्षण देने वाले नेता भी इसके जिम्मेदार हैं. फिर दुहराने की जरूरत है कि यह राठौड़ का अपराध कम करके आंकने की, उसके खलनायकत्व को कुछ फीका करने की कोशिश नहीं, बस यह याद दिलाने की इच्छा है कि दरअसल जब पूरी व्यवस्था अन्यायी होती है तो रुचिका जैसी मासूम लड़कियां और गिरहोत्ना जैसे आम परिवार कभी भी उसकी चपेट में आ सकते हैं. ऐसी ही व्यवस्था किसी राठौड़ को अदालत से नाकुछ सी सजा पाकर मुस्कुराते हुए निकलने का मौका देती है. रुचिका को बचाना है तो इस पूरी व्यवस्था में मानवाधिकारों के प्रति संवेदना और कानून के प्रति सम्मान और न्याय के प्रति सजगता पैदा करनी होगी.

मीडिया से शिकायत अगर है तो बस इतनी है. वह एक रुचिका का मामला उठा रहा है, पूरी व्यवस्था का नहीं. वह एक राठौड़ को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, उन बुनियादी सुधारों की मांग नहीं कर रहा जो हमारे पुलिस तंत्र के लिए निहायत जरूरी हैं. इसका एक ख़तरा यह भी है कि रुचिका की जो लड़ाई अभी अपने उरूज पर है, वह कुछ दिन बीतने के बाद फीकी न पड़ जाए और कुछ साल बाद अपनी बेख़बरी में हम यह भूल न जाएं कि राठौड़ को सजा दिलाने का काम बाकी रह गया है. यह एक वास्तविक ख़तरा है क्योंकि जितने लोग आज राठौड़ को सजा दिलाने के लिए खड़े हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग उसे बचाते रहे हैं. इस देश में आईएएस और आईपीएस अफसरों को सजा दिलाना कितना कठिन काम है, यह इस बात से भी पता चलता है कि रुचिका गिरहोत्ना के मामले में मीडिया के दस दिन पुराने शोर के बावजूद यह टिप्पणी लिखे जाने तक राठौड़ गिऱफ्तार नहीं हुआ है.

निश्चय ही रुचिका की लड़ाई महत्वपूर्ण है. उसे पूरी ताकत से लड़ने की जरूरत है. एसपीएस राठौड़ को अगर सजा मिलती है तो कम से कम यह संदेश जाता है कि अन्यायी बहुत दूर तक अपने-आप को बचा ले लेकिन देर तक बचा नहीं रह सकता. लेकिन हमारे सामने चुनौती इस छोटे से संदेश से ज्यादा बड़ी है. हमारी पूरी व्यवस्था के मुंह पर गरीब और लाचार लोगों का खून लगा हुआ है. वह आसानी से अपनी आदत छोड़नेवाली नहीं. यह जरूरी है कि हम सारी रुचिकाओं का खयाल रखें और सारे राठौड़ों की शिनाख्त करें- दिल्ली और चंडीगढ़ में ही नहीं, मणिपुर और छत्तीसगढ़ में भी. तभी न्याय और बराबरी का समाज संभव होगा और तभी मीडिया को अपनी पीठ थपथपाने का जायज हक होगा.   

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं)    

अनिवार्य बनाम वैकल्पिक

गुजरात विधानसभा ने 19 दिसंबर को गुजरात स्थानीय प्राधिकरण कानून (संशोधन) विधेयक, 2009’ पारित किया है. इसके कानून बनते ही राज्य के स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव में मतदान करना अनिवार्य हो जाएगा. ऐसा न करने का मतदाताओं को कोई सुस्पष्ट कारण बताना होगा. और ऐसा न कर पाने वालों को दंड भुगतने को तैयार रहना होगा. यह कानून मतदाताओं को इनमें से कोई नहींविकल्प चुनकर सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करने की आजादी भी देता है.

अजब बात यह रही कि मतदान को अनिवार्य बनाने वाले विधेयक को पारित करने के मतदान में गुजरात सरकार के मुखिया यानी  मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तमाम काबीना मंत्रियों के अलावा करीब 40 फीसदी विधायक उपस्थित ही नहीं थे. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने इस विधेयक का जमकर समर्थन किया था, मगर 7 जनवरी को झारखंड विधानसभा में शिबू सोरेन द्वारा विश्वास मत हासिल करने के दौरान राजद के पांचों विधायकों ने उसमें हिस्सा नहीं लिया. कहा जा सकता है कि मोदी और उनके मंत्री जरूरी कामों में लगे थे और राजद विधायकों ने मत न देने के लोकतांत्रिक विकल्प का चयन किया था. मगर यही तर्क तो एक आम भारतीय मतदाता के संदर्भ में भी दिया जा सकता है.

देश की राजनीतिक व्यवस्था में मौजूद इस तरह के तमाम विरोधाभास इस विधेयक पर कोई एक राय बनाने से हमें रोकते हैं. उदाहरणार्थ, सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी देश की सरकार तब तक नहीं बना सकती जब तक उसके पास लोकसभा के कुल सासंदों के आधे से अधिक न हों मगर, कोई व्यक्ति कुल मतों का केवल 10 फ़ीसदी पाकर भी बड़े आराम से सांसद बन सकता है, बशर्ते उसे अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत मिले हों.

विधेयक के पक्ष में कहा जा सकता है कि इससे हमारे प्रतिनिधि किसी एक छोटे से वर्ग या समुदाय के प्रतिनिधि न होकर सही मायनों में जनप्रतिनिधि बन सकेंगे क्योंकि जब 90 फ़ीसदी मतदाता वोट डालेंगे तो 5-10 फ़ीसदी मतों वाले वर्ग या समुदाय का तुष्टीकरण कर चुनाव जीतने और दूसरे वर्गों-समुदायों की अनदेखी की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकेगा. मगर विपक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि मतदान न करने पर सजा का प्रावधान राजसत्ता के हाथों में सामान्यजनों को परेशान करने का एक नया उपकरण भी साबित हो सकता है. या फिर लोग इस प्रावधान के चलते मतदाता सूची में अपना नाम लिखाने से ही कतराने लग सकते हैं.

पक्ष-विपक्ष में ऐसे तमाम तर्क हैं, मगर एक स्वस्थ लोकतंत्र का सतत गतिशील होना भी बेहद जरूरी है. संविधान के 73 और 74वें संशोधन ने स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनावों को अनिवार्य बना दिया था. बाद में महिलाओं के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण, महापौर और पार्षदों का सीधा चुनाव और आरक्षित सीटों की बदलाव प्रक्रिया में संशोधन जैसे सुधार विभिन्न राज्यों द्वारा इन व्यवस्थाओं में लाए क्रमिक बदलावों का ही तो परिणाम हैं. सवाल यह है कि चुनाव सुधार के प्रयोग भी राज्य सरकारों द्वारा निचले स्तर के चुनावों के ज़रिए क्यूं नहीं किए और आंके जा सकते? इससे पहले ऐसे प्रयासों को सिरे से ख़ारिज करना शायद उचित नहीं होगा.

संजय दुबे 

रविंद्र म्हात्रे हत्याकांड

कश्मीर में 1980 का दशक आतंकवाद के उभार का समय था. इस समय भारत सरकार मानकर चल रही थी कि कश्मीरी आतंकवादियों का सीधा संबंध पाकिस्तान से है. हालांकि सरकार को इस बात की जानकारी भी थी कि कुछ पश्चिमी देशों का रवैया आतंकवादियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है और वहां की राजनीतिक पार्टियां इन गुटों का समर्थन करती हैं. तभी 1984 में एक ऐसी आतंकवादी घटना हुई जिससे पूरी तरह साबित हो गया कि पाकिस्तान के अलावा दूसरे देशों में भी कश्मीरी आतंकवादी सक्रिय हैं.

दरअसल, ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उप उच्चायुक्त रविंद्र म्हात्रे का फरवरी, 84 में बर्मिघम से अपहरण कर लिया गया था. इसके पीछे जम्मू कश्मीर लिबरेशन आर्मी (जेकेएलएफ का एक धड़ा) के आतंकवादियों का हाथ था. उन्होंने 10 लाख पौंड की फिरौती और तिहाड़ जेल में बंद आतंकवादी मकबूल बट्ट को रिहा करने की मांग की थी. भारत सरकार ने इन मांगों को मानने इनकार कर दिया जिसके बाद आतंकवादियों ने म्हात्रे की हत्या कर दी. 

म्हात्रे हत्याकांड कश्मीर के आतंकवाद से जुड़ा पहला ऐसा मामला था जब विदेश में भारत के किसी राजनयिक को निशाना बनाया गया था. इस मामले में ब्रिटेन की पुलिस ने पाक अधिकृत कश्मीर के दो ब्रिटिश नागरिकों को गिरफ्तार किया. बाद में जब भारत ने इन दोनों आरोपियों को सौंपने की मांग रखी तो इसे ब्रिटेन ने ठुकरा दिया. दरअसल, उस समय तक कश्मीरी विद्रोही संगठनों को ब्रिटेन की लेबर पार्टी का समर्थन हासिल था. इस हत्याकांड में शामिल दोनों आरोपियों मोहम्मद रियाज और अब्दुल कय्यूम राजा को बचाने के लिए ब्रिटेन में बाकायदा एक छोटे से राजनैतिक समूह का गठन भी किया गया था. इन घटनाओं के बाद भारत और ब्रिटेन के संबंधों में खासा तनाव पैदा हो गया था.

म्हात्रे अपहरण और हत्याकांड 20 साल बाद 2004 में फिर चर्चा में आया जब मोहम्मद असलम नाम के एक व्यक्ति को अमेरिका में गिरफ्तार किया गया. म्हात्रे हत्याकांड में शामिल यह तीसरा व्यक्ति था. बाद में असलम पर ब्रिटेन के क्राउन कोर्ट में मुकदमा चला, लेकिन उसे अपहरण और हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया.

पवन वर्मा