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सेहत की आड़ में सेहत से खिलवाड़

नागेश्वर और वेंकटम्मा से जब कोई सरिता के बारे में पूछता है तो वे कुछ नहीं कहते. बस दीवार पर टंगी एक फोटो की तरफ इशारा कर देते हैं. आप कुछ और कहें इससे पहले उनकी आंखों से आंसू झरने लगते हैं और फिर वे फफक-फकर रो पड़ते हैं.

 ‘यह धोखाधड़ी का बहुत गंभीर मामला है. भारत को इस तरह के टीकाकरण पर सावधान रहने की जरूरत है. स्वास्थ्य मंत्रालय को विस्तार से जांच करनी चाहिए कि अभियान के लिए इन आदिवासी और कम पढ़ी-लिखी लड़कियों को ही क्यों चुना गया’आंध्र प्रदेश में खम्मम जिले के अंजुपका गांव में रहने वाले नागेश्वर और वेंकटम्मा खेतिहर मजदूर हैं. सरिता उनकी बेटी थी. इस साल की 21 जनवरी का दिन वेंकटम्मा को भूलता नहीं. इस दिन उन्हें 13 साल की सरिता घर में बेहोश पड़ी मिली थी. पहले तो उन्होंने सोचा कि बेटी ने आत्महत्या करने के इरादे से कीड़े मारने की दवा पी ली है. मगर ऐसा था नहीं क्योंकि दवा की बोतल ज्यों-की-त्यों अलमारी में पड़ी थी. सरिता को तुरंत पास के स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया जहां सहायक स्टाफ और एक डॉक्टर की टीम ने इस बात की पुष्टि की कि मामला जहर का नहीं है. यहां से उसे 25 किमी दूर भद्राचलम के एक अस्पताल भेज दिया गया. रास्ते में उसे मिरगी का एक तेज दौरा पड़ा. अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने कहा कि सरिता की मौत पहले ही हो चुकी है. पोस्टमार्टम किया गया. मगर इसकी रिपोर्ट सरिता के मां-बाप को नहीं दी गई. इस इलाके में जन्म और मौतों का पंजीकरण करने वाले नल्लीपका स्वास्थ्य केंद्र में सरिता की मौत को खुदकुशी के रूप में दर्ज कर लिया गया. नागेश्वर और वेंकटम्मा ने यह मानने से इनकार कर दिया और इसका विरोध करते हुए अपनी बेटी का अंतिम संस्कार कर दिया.

सरिता की मौत गरीबी, लालच, लापरवाही और उपेक्षा के मेल की कहानी है. नागेश्वर कहते हैं, ‘मेरी बेटी ने आत्महत्या नहीं की थी. उसने जहर नहीं खाया था. उसे टीका लगाने के बाद दौरे पड़ने लगे थे. यह बात उसने भी हमें बताई थी और उसके हॉस्टल सुपरवाइजर ने भी. अस्पताल के  अधिकारी झूठ बोल रहे हैं.’ नरशापुरम जन स्वास्थ्य केंद्र, जहां सरिता को सबसे पहले ले जाया गया था, में तैनात डॉक्टर आर बालसुधा का कहना है, ‘जब सरिता को यहां लाया गया था तो वह जिंदा थी. उसने कोई जहर नहीं खाया था. उसे मिरगी के बेहद तेज दौरे पड़ रहे थे और वह बहुत बीमार थी.’

कुछ समय बाद सरिता के अभागे मां-बाप को पता चला कि भद्राचलम से 60 किमी दूर येरागट्टू गांव में पिछले साल 30 अगस्त को 13 साल की सोडी सयम्मा की मौत भी इसी तरह हुई थी. इसे भी डॉक्टरों ने आत्महत्या करार दिया था, मगर सयम्मा के मां-बाप का कहना था कि उनकी बेटी ने न तो जहर खाया था और न ही फांसी लगाई थी. दोनों ही मामलों में स्थानीय जन स्वास्थ्य केंद्रों ने लड़कियों के जहर न पीने की पुष्टि की थी और उन्हें भद्राचलम इलाके के अस्पताल के लिए रेफर किया था. दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए इन गांवों में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) का टीका लगाया गया था.

यौन संबंध के जरिए फैलने वाला एचपीवी गर्भाशय कैंसर के कई ज्ञात कारणों में से एक है. जानी-मानी कंपनी मेर्क से जुड़ी एमएसडी नाम की एक कंपनी गार्डसिल नाम का टीका बनाती है. कंपनी दावा करती है कि मासिक चक्र शुरू होने से पहले अगर लड़कियों को यह टीका लगा दिया जाए तो इससे उनका गर्भाशय के कैंसर से बचाव हो जाता है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले दुनिया के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठनों में से एक पाथ की भारतीय इकाई ने पिछले साल नौ जुलाई से एचपीवी टीका अभियान शुरू किया. शुरुआत में यह परियोजना नमूने के तौर पर आंध्र प्रदेश और गुजरात में चली. इसके तहत खम्मम जिले में 14,000 लड़कियों को गार्डसिल के तीन डोज दिए गए. इनमें एक बड़ा हिस्सा गरीब और आदिवासी परिवारों से आने वाली लड़कियों का था. जिले के जिन तीन क्षेत्रों को इस अभियान के लिए चुना गया वे थे थिरूमलयपलम (शहरी), कोठगुड़म (ग्रामीण) और भद्राचलम (आदिवासी).

मगर इस अभियान को लेकर कुछ गंभीर सवाल हैं. मसलन, क्या इस टीके को बनाने वालों या फिर उनके सहयोगियों ने इसके सारे संभावित दुष्प्रभावों, जिन्हें हम साइड इफेक्ट्स भी कहते हैं, की जानकारी सार्वजनिक की है? क्या इन नाबालिग लड़कियों के मां-बाप ने अपनी स्वीकृति सारी बातें जानने के बाद दी है? जिस आबादी को टीका लगना था उसका चुनाव किस आधार पर हुआ है? क्या किसी तरह के दुष्प्रभावों या उलटे असर की जानकारी देने के लिए कोई तंत्र बनाया गया है?

इस अभियान को लेकर कुछ गंभीर सवाल हैं. मसलन, क्या इस टीके को बनाने वालों या फिर उनके सहयोगियों ने इसके सारे संभावित दुष्प्रभावों, जिन्हें हम साइड इफेक्ट्स भी कहते हैं, की जानकारी सार्वजनिक की है?

हैदराबाद स्थित सूत्र बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डी नागेंद्र ने इस परियोजना पर पाथ और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ काफी करीब से जुड़कर काम किया है. मंत्रालय का तर्क है कि तीनों इलाकों को गर्भाशय कैंसर की घटनाओं की बड़ी संख्या के कारण चुना गया. मगर इस दावे को कई लोग खारिज करते हैं. सामा रिसोर्स ग्रुप फॉर विमन एंड हेल्थ नाम के संगठन से जुड़ी एनबी सरोजनी कहती हैं, ‘इस बात को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. यह पूरी तरह झूठ है.’ इस संगठन ने दूसरे 80 संगठनों और डॉक्टरों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्रालय को एक ज्ञापन भेजा है.

उधर, पाथ का दावा है कि टीके से होने वाले साइड इफेक्ट्स न के बराबर हैं. संगठन के मुताबिक टीका लगाने के बाद बांह में होने वाले दर्द के अलावा इसका कोई और दुष्प्रभाव नहीं. जबकि अमेरिका स्थित जुडिशियल वॉच और वैक्सीन एडवर्स इवेंट्स रिपोर्टिग सिस्टम (वीएईआरएस) जैसे संगठन बताते हैं कि गार्डसिल से सेहत पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की सूची लंबी है. इनमें खून का थक्का जमना, मिरगी और एलर्जी जैसी चीजें शामिल हैं.

खम्मम में सयम्मा और सरिता की मौत के अलावा भी ध्यान खींचने वाली दूसरी बातें हुई हैं. मसलन, टीके के बाद 120 छात्राओं में मिरगी के दौरे, एलर्जी, डायरिया, चक्कर आने और उल्टी की शिकायत जैसी कई समस्याएं पैदा हो गईं. इसकी खबरें पहले टीवी9 नाम के स्थानीय चैनल पर आनी शुरू  हुईं. नरशापुरम के स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉ आर बालसुधा ने इसकी पुष्टि कीं. यह स्वास्थ्य केंद्र भद्राचलम ब्लॉक के उन चार स्वास्थ्य केंद्रों में से एक था जिसे 16 जुलाई, 2009 से 28 फरवरी, 2010 तक चले टीका अभियान के लिए चुना गया था. नल्लीपका स्वास्थ्य केंद्र से जुड़े डॉ. शेखर बताते हैं, ‘कइयों में समस्याएं पैदा हो गईं. मगर हमें पता नहीं कि क्या आगे जाकर वे गंभीर हुईं क्योंकि हम उन लड़कियों के संपर्क में नहीं हैं.’ इस स्वास्थ्य केंद्र में 2,400 लड़कियों को यह टीका लगाने का लक्ष्य था, मगर 27 फरवरी तक आंकड़ा 1,800 तक ही पहुंच सका था.

माकपा नेता वृंदा करात कहती हैं, ‘यह धोखाधड़ी का बहुत गंभीर मामला है. भारत को इस तरह के टीकाकरण पर सावधान रहने की जरूरत है. स्वास्थ्य मंत्रालय को विस्तार से जांच करनी चाहिए कि अभियान के लिए इन आदिवासी और कम पढ़ी-लिखी लड़कियों को ही क्यों चुना गया. यह गलत धारणा है कि आदिवासी लड़कियों की यौन सक्रियता अधिक होती है और इसलिए उन्हें इस अभियान का हिस्सा बनाना चाहिए.’ करात यह मुद्दा संसद में उठाने की भी योजना बना रही हैं. उधर, इस अभियान में हर अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश के पालन का दावा करने वाला पाथ, मौतों और दुष्प्रभावों की खबर से हो रहे नुकसान को काबू करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता नजर आ रहा है. संगठन के एक शीर्ष अधिकारी तहलका से कहते हैं, ‘हमें आंध्र प्रदेश सरकार के कल्याण विभाग द्वारा सिर्फ जिम्मा सौंपा गया था और हम वक्सीन लगाने की प्रक्रिया में शामिल नहीं थे. हम तकनीकी सहयोगी थे और हम तो बस राज्य सरकार की टीम के साथ गए.’ वे यह नहीं बताते कि उनके संगठन को इस परियोजना, जिसे पाथ-आईसीएमआर पोस्ट लाइसेंस्योर ऑबजर्वेशनल स्टडी ऑफ एचपीवी वैक्सीनेशन नाम दिया गया था और जिसमें बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का पैसा लगा था, के लिए कितने पैसे मिले.

ये मौतें गार्डसिल की वजह से हुईं या नहीं, इसपर बहस की जा सकती है. मगर फिर भी इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 2006 के बाद वीएईआरएस ने ही हजारों मामलों में इस टीके के प्रतिकूल प्रभावों की बात मानी है

पाथ के एक और अधिकारी कहते हैं, ‘अगर टीके से कोई समस्या है तो इसके बारे में एमएसडी ही बता सकती है, हम नहीं.’ ये अधिकारी आगे कहते हैं कि उनका संगठन इस साल खम्मम जिले में 18,000 और लड़कियों को यह टीका लगाने की योजना बना रहा है जिससे यह जानने में मदद मिलेगी कि क्या यह टीका, राष्ट्रीय टीकाकरण योजना में शामिल किया जा सकता है. पाथ के एक अन्य अधिकारी बताते हैं, ‘हमें पूरा यकीन है कि यह गर्भाशय के कैंसर को रोकने वाला सबसे कम जोखिम वाला टीका है और हम इसे समाज के सबसे कमजोर तबकों तक पहुंचाने में मदद करना चाहते हैं. हम गोपनीयता के प्रावधानों से बंधे हुए हैं और इस वजह से दुष्प्रभाव वाली किसी घटना के बारे में जानकारी नहीं दे सकते. हम यही कह सकते हैं कि हम इसकी काफी करीब से निगरानी कर रहे हैं और चिंता की कोई बात नहीं है. ऐसी घटनाओं को संदर्भ से हटाकर बताना इस समूचे जन स्वास्थ्य कार्यक्रम को जोखिम में डाल देगा.’

‘भारत में सात या आठ तरह के गर्भाशय कैंसर पाए गए हैं. दुर्भाग्य से हमारे पास वास्तविक आंकड़े नहीं हैं’

हैरत की बात यह है कि खम्मम के डिस्ट्रिक्ट इम्यूनिटी ऑफिसर डॉ. बी जयकुमार, जिनपर जिले में इस अभियान की जिम्मेदारी है, कहते हैं कि उन्हें बिल्कुल पता नहीं कि इस अभियान के लिए उनके इलाके का चुनाव आखिर हुआ क्यों. उनके पास न इसे साबित करता कोई आंकड़ा है कि यहां पर कैंसर के मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है, न ही उनके या उनकी टीम के पास टीके का सही या गलत असर जांचने का कोई माध्यम है. तो फिर सवाल उठता है कि टीके क्यों लगाए गए? जयकुमार कहते हैं, ‘मुझे इसकी वजहों की जानकारी नहीं है. परिवार कल्याण आयुक्त ने कहा कि यहां पर यह करना है.’ हम उनसे पूछते हैं कि क्या उनके जिले को एक मानव प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था तो वे कहते हैं, ‘ये परीक्षण अंतरराष्ट्रीय बाजार में किए जा चुके हैं.’ मगर खुद जयकुमार ने इस टीके पर कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का अध्ययन नहीं पढ़ा. वे कहते हैं कि यह सब राज्य सरकार का काम है, उनका नहीं.

अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों का यह छलावा बहुत चिंताजनक है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं कि गर्भाशय के कैंसर से बचाव का टीका बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत पर बहुत बड़ा दांव लगा रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में कैंसर से पीड़ित ज्यादातर महिलाओं में इस तरह का कैंसर पाया जाता है. हर घंटे आठ महिलाओं को गर्भाशय के कैंसर की वजह से जान गंवानी पड़ती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी अनुमान है कि प्रति वर्ष एक करोड़ तीस लाख महिलाओं में कैंसर की बीमारी देखने में आती है और इनमें से 74,000 की मौत गर्भाशय के कैंसर से होती है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसका मतलब है कि दुनिया भर में इससे होने वाली मौतों में से एक-चौथाई से भी ज्यादा भारत में होती हैं. यही वजह है कि भारत में गर्भाशय के कैंसर से लड़ाई का बाजार तकरीबन बारह हजार करोड़ रुपए का है. अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियां इसकी उपेक्षा नहीं कर सकतीं. भारत में इस बाजार के बड़े खिलाड़ी दो हैं. मेर्क की भारतीय इकाई एमएसडी और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन जो अपना एचपीवी टीका सेर्वेरिक्स नाम से बेचती है. आगे इस बाजार में होड़ और भी कड़ी होने की पूरी संभावना है. पाथ-आईसीएमआर अध्ययन का एक मकसद यह आकलन करना भी था कि अगर इस टीके को जन स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाए तो सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा.

भारत के लिए चिंता की बात यह भी है कि जून, 2006 के बाद से अमेरिका में गार्डसिल का टीका लगने के बाद 61 मौतों की घटनाएं हुई हैं. इसके बाद वहां के मीडिया में मेर्क के खिलाफ काफी शोर हुआ. सरकारी संगठन वीएईआरएस द्वारा दर्ज ऐसे मामलों की सूची में एक 11 साल की लड़की का मामला भी है जिसे मई, 2007 में गार्डसिल का एक टीका लगाया गया था और उसकी तीन दिन बाद ही गंभीर प्रतिक्रियात्मक एलर्जी से मौत हो गई. एक दूसरे मामले में टीका लगने के तीन हफ्ते बाद 12 साल की एक लड़की छह अक्टूबर, 2007 को नींद में ही चल बसी जबकि उसे कोई दूसरी बीमारी नहीं थी. एक और मामले में 20 साल की एक महिला की, 1 अप्रैल, 2008 को टीका लगने के चार दिन बाद ही मौत हो गई.

ये मौतें गार्डसिल की वजह से हुईं या नहीं, इसपर बहस की जा सकती है. मगर फिर भी इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 2006 के बाद वीएईआरएस ने ही हजारों मामलों में इस टीके के प्रतिकूल प्रभावों की बात मानी है

ब्रिटेन में जहां सेर्वेरिक्स का ज्यादा चलन है, पहली मौत सितंबर, 2009 में सुर्खियों में आई जब 14 साल की नैटली मॉर्टन की टीका लगने के बाद मौत हो गई. यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी भी जर्मनी और ऑस्ट्रिया में हुई उन मौतों का उल्लेख करती है जो कथित तौर पर गार्डसिल से हुई थीं. 2006 में इसकी स्वीकृति मिलने के बाद अमेरिका और यूरोप में गार्डसिल पर 70 से अधिक मौतों और हजारों मामलों में गंभीर समस्याएं पैदा होने का आरोप लगा है. अहम बात यह है कि तहलका को लिखे एक जवाब मेर्क ने खुद भी माना है कि 1 सितंबर, 2009 से गार्डसिल के टीके के बाद वीएईआरएस के पास इसके प्रतिकूल प्रभावों की पंद्रह हजार सैंतीस रिपोर्टें आई हैं जिनमें से 93 फीसदी को गंभीर नहीं माना गया है.

ये मौतें गार्डसिल की वजह से हुईं या नहीं, इसपर बहस की जा सकती है. मगर फिर भी इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 2006 के बाद वीएईआरएस ने ही हजारों मामलों में इस टीके के प्रतिकूल प्रभावों की बात मानी है. इस तथ्य की पुष्टि यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने भी की है. इन प्रतिकूल प्रभावों में तंत्रिका तंत्र, सांस, रोग प्रतिरोधी तंत्र से संबंधित बीमारियां शामिल हैं.

तर्क यह भी दिया जा सकता है कि दुनिया भर में चार करोड़ महिलाओं को गार्डसिल का एचपीवी का टीका लग चुका है और इनमें 70 मौतों या कुछेक हजार प्रतिकूल प्रभावों के मामलों का इसके साथ जुड़ जाना, वह भी जब इस पर राय बंटी हो, कोई बड़ी बात नहीं है. मगर यहां फिर से सवाल इस बारे में ईमानदारी से बताए जाने, यह सब बताने के बाद अनुमति लेने और पर्याप्त निगरानी तंत्र का उठता है. हैदराबाद स्थित ग्राम्या रिसोर्स सेंटर फॉर विमन की डॉ. रुक्मिणी राव कहती हैं, ‘पश्चिमी देश एचपीवी टीके के खतरों के बारे में तभी जागरूक हुए क्योंकि वहां कड़ी निगरानी व्यवस्थाएं हैं जिसके जरिए दवा के प्रभावों का नियमित अध्ययन किया गया. मगर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है.खम्मम में आदिवासियों के बीच काम कर रहे एक संगठन एएसडीएस से जुड़े एसवीआरवी प्रसाद कहते हैं, ‘मुझे समझ में नहीं आता कि उन्होंने इस टीके के लिए खम्मम को क्यों चुना. उन्होंने दिल्ली या हैदराबाद में यह प्रयोग क्यों नहीं किया?’ ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमन असोसिएशन की राज्य इकाई की अध्यक्ष पी ज्योति कहती हैं, ‘ग्रेटर हैदराबाद में कहीं ज्यादा लड़कियां हैं. खम्मम ही क्यों? इससे बहुत सवाल खड़े होते हैं. वे इसे गरीब लड़कियों पर इस्तेमाल करते हैं जो कम पढ़ी-लिखी हैं और जिन्हें टीके और इसके प्रतिकूल प्रभावों के बारे में ज्यादा पता नहीं है.

आरोप और भी हैं. पाथ का दावा है कि टीका तभी असर करता है जब इसे मासिक चक्र शुरू होने से पहले लगाया जाए. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि टीके के लिए जो आयु वर्ग चुना गया था वही गलत था. भद्राचलम के आदिवासी इलाके में एक दशक तक काम करने वाले चिकित्सक एस प्रभाकर कहते हैं, ‘गर्भाशय का कैंसर सिर्फ प्रौढ़ महिलाओं के गर्भाशय को प्रभावित करता है तो फिर हम क्यों ऐसी लड़कियों को टीका लगा रहे हैं जिनके प्रजनांग अभी विकसित ही हो रहे हों.

दूसरे सवाल असर और कीमत से जुड़े हैं. मसलन, क्या एचपीवी टीके हर तरह के गर्भाशय कैंसर को रोक सकते हैं? क्या सरकार इसका खर्च उठा सकती है? जवाब थोड़ा निराशाजनक है. गार्डसिल के एक इंजेक्शन की बाजार में कीमत 2,000 रु. है. इस तरह तीन इंजेक्शनों की कीमत 6 हजार रु. आएगी. इसके इतने महंगे होने और इसके असर के बारे में कोई निश्चितता नहीं होने के कारण राव की तरह अनेक लोगों का मानना है कि यह पूरा अभियान ही झांसा है. वे कहती हैं, ‘6,000 रु. खर्च करने के बाद भी लोगों को गर्भाशय की जांच या स्क्रीनिंग करानी होगी. इन लड़कियों या उनके मां-बाप में से कितनों को पता है कि टीके पर इतना खर्च करने से अधिक सस्ता है शरीर की जांच करवा लेना. टीका बहुत महंगा है और गर्भाशय के कैंसर को रोक पाएगा या नहीं, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते. फिर ऐसा टीका उस देश में कैसे चल सकता है जहां सरकार का सालाना प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च महज 10 डॉलर हो?’

यह भी गौर करने वाली बात है कि एचपीवी टीका गर्भाशय के कैंसर से जुड़े हर कारण के खिलाफ प्रभावी नहीं है. नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के सदस्य डॉ गोपाल दाबाडे कहते हैं कि एचपीवी टीके कितना असर करेंगे यह अभी साबित नहीं हुआ है. मौजूदा गार्डसिल टीका गर्भाशय का कैंसर पैदा कर सकने वाले दो तरह के वायरसों एचपीवी 16 और 18 के संक्रमण को रोक सकता है. यह एचपीवी 6 और 11 के संक्रमण को भी रोक सकता है जो जननांगों में गांठ के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. यह सही है कि दुनिया भर में 16 और 18 एचपीवी गर्भाशय के कैंसर के 70 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन दाबाडे के शब्दों में एचपीवी के अलावा और भी बहुत सारे कारक हैं जिनसे गर्भाशय का कैंसर हो सकता है. यह अनेक लोगों से यौन संबंध बनाने और साफ-सफाई न रखने के कारण भी हो सकता है. अलग-अलग इलाकों में इसकी अलग-अलग वजहें हो सकती हैं.करात इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘मुझे यह चिंता है कि वे टीके को गर्भाशय के कैंसर के समाधान के रूप में पेश कर रहे हैं. कोई पारदर्शिता नहीं बरती जा रही. एचपीवी तो उन वायरसों में से सिर्फ एक है जिनसे गर्भाशय का कैंसर होता है. बाकी का क्या?’

इन आलोचनाओं का असर भी दिखने लगा है. पिछले साल ग्लैक्सो ने भारी-भरकम विज्ञापनों के साथ एक अभियान शुरू किया था, जिसमें दावा किया गया था कि यह टीका रामबाण है. मेर्क भी ऐसा अभियान शुरू करने वाली थी. अभियान के चार महीनों के भीतर दवा नियंत्रक कार्यालय, जो सीधे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है, ने ग्लैक्सो को यह अभियान रोकने के निर्देश दिए.

हमेशा की तरह भारत में पारदर्शिता का अभाव सबसे बड़ी बाधा है. उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि आंध्र प्रदेश परिवार कल्याण विभाग से आदेश आने के बाद हजारों लड़कियों के माता-पिता के नाम सहमति पत्र भेजे गए गए. इन लड़कियों में से ज्यादातर सरकारी होस्टलों में रह रही थीं. सहमति पत्र में दावा किया गया कि खम्मम में मेर्क और वडोदरा, गुजरात में ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन द्वारा मुफ्त में मुहैया करवाया जा रहा यह टीका एचपीवी संक्रमण से बचाएगा. लेकिन इसमें टीके से होने वाले अनेक नुकसानों का जिक्र नहीं था. छात्राओं से कहा गया था कि वे सहमति पत्र पर अपने अभिभावकों के हस्ताक्षर करा लाएं. इसकी एक प्रति तहलका के पास भी है. इसमें लिखा गया है, ‘अगर आप यह टीका नहीं भी लेती हैं तो कोई बात नहीं. आपको इसके लिए कोई सजा नहीं दी जाएगी.सरकारी स्कूलों की अनेक लड़कियों और उनके माता-पिता के लिए यह संकेत ही काफी था.

यह मानना गलत होगा कि टीकाकरण इन दो जिलों तक ही सीमित रहेगा. अनेक गैर सरकारी संगठन ऐसे अभियान के लिए देश के ग्रामीण इलाकों में संभावित इलाकों की तलाश में जुट गए हैं. बिहार की राजधानी पटना से 145 किमी दूर गांव गदरौल का मामला लेते हैं, जिसका जिक्र अब तक कहीं नहीं हुआ है. पिछले दिसंबर में कुछ लोगों का एक दल बक्सर जिले में स्थित इस गांव में पहुंचा जिन्होंने गर्भाशय कैंसर से बचाव के टीकों से होने वालेफायदों पर 45 मिनट की एक कार्यशाला का आयोजन किया. इसमें जिस तरह की टीके की गुलाबी तसवीर पेश की गई, उसके बाद किसी श्रोता ने सवाल पूछने की जरूरत नहीं महसूस की. यह दल मई में फिर गांव में लौटने वाला है. पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के डॉ. भरत सिंह बताते हैं, ‘ग्रामीण बिहार में सबसे बड़ा मिथक यह है कि टीके किसी बीमारी को रोकने का सबसे सुरक्षित उपाय हैं. और बिहार को दोष क्यों दिया जाए? भारत में कुछ ही शहर होंगे जहां डेफिनिटिव स्क्रीनिंग सिस्टम होगा (जहां दवा के दुष्प्रभावों की जांच होती है).स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव जैसी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की अधिकारी कहती हैं कि ऐसे महंगे टीके को राष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम में शामिल करने की कोई संभावना नहीं है. 2008 में उनके पूर्ववर्ती नरेश दयाल ने भी यही रुख अपनाया था.

लेकिन इसके साफ सबूत हैं कि सरकार के पास टीके के बारे में बहुत कम जानकारी है. दो हफ्ते पहले मीडिया के साथ बातचीत में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच का कहना था, ‘भारत में सात या आठ तरह के गर्भाशय कैंसर पाए गए हैं. दुर्भाग्य से हमारे पास वास्तविक आंकड़े नहीं हैं. इसलिए हम रोगग्रस्त इलाकों की गंभीरता के बारे में नहीं जानते. हमारे पास कुछ अस्पतालों से जुटाई बहुत थोड़ी जानकारी है. इसलिए टीका किसी खास व्यक्ति को कितना फायदा पहुंचाएगा, यह हम नहीं जानते.इस बारे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से प्रतिक्रिया पाने के लिए की गई बार-बार कोशिशें बेकार रहीं.

डॉ. राव कहती हैं, ‘मैं इसी तरफ इशारा कर रही थी. भारत में ऐसे अभियानों का मतलब यही है कि वे यहां की भोली-भाली लड़कियों पर इसका प्रयोग करके नतीजे देखना चाहते हैं.दिल्ली स्थित राष्ट्रीय इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी एंड डेवेलपमेंट स्टडीज की डॉ. वाई माधवी इससे सहमत हैं. वे इस टीके के असरकारक होने के संबंध में विस्तृत आंकड़ों के अभाव की ओर भी ध्यान दिलाती हैं. अब तक हुए अध्ययन दिखाते हैं कि टीका सिर्फ पांच वर्ष के लिए ही सुरक्षा देता है. वे कहती हैं, ‘चूंकि टीके द्वारा लंबे समय तक असर और सुरक्षा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए हम दावा नहीं कर सकते कि इससे 60-70 प्रतिशत सुरक्षा भी हासिल हो सकेगी.

इससे कई सवाल उठते हैं. मसलन, अगर बचाव पांच साल के लिए ही होता है तो क्या इसके बाद किसी बूस्टर डोज (यानी फिर से टीका लगाने) की जरूरत होगी? अगर बूस्टर डोज की जरूरत होगी और यह भी नहीं पता कि कितनी बार तो टीके से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का पहलू किस तरह प्रभावित होगा? फिर इन बूस्टर डोजों के लिए पैसा कौन देगा? 2008 के लिए चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान हाराल्ड हाउसन को यह खोज करने पर मिला था कि एचपीवी गर्भाशय कैंसर के लिए जिम्मेदार है. वे कहते हैं कि सबसे अच्छी स्थिति में भी एचपीवी टीकों को बूस्टर डोज की जरूरत होगी.

इस साल 20 फरवरी के अंक में चिकित्सा जगत की मशहूर पत्रिका लैंसेट में प्रकाशित एक लेख में एरिक जे सुबा और स्टेफान एस राब ने वियत-अमेरिकी सर्विकल कैंसर प्रिवेंशन प्रोजेक्ट के हवाले से कहा गया है कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि एचपीवी टीके गर्भाशय का कैंसर रोकने में प्रभावी हैं तब तक विकासशील देशों को अपने इन टीकों पर भारी-भरकम खर्च करने की बजाय अपने सीमित संसाधन गर्भाशय की जांच में लगाने चाहिए. सरोजिनी पूछती हैं कि क्या भारत में किसी ने यह लेख पढ़ा है?

लगता है कि किसी ने नहीं. उन्होंने भी नहीं, जिन्होंने भारी शोर-शराबे के साथ यह टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया है.

शादी का पुराना वीडियो : तो बात पक्की

फिल्म तो बात पक्की

निर्देशक केदार शिंदे

कलाकार तब्बू, शरमन जोशी, युविका चौधरी, वत्सल सेठ

केदार शिंदे की तो बात पक्कीउन कच्ची फिल्मों में से है जो शादी के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं और जिसमें शादी ही जीवन की सबसे मुश्किल समस्या होती है. जिनमें बच्चे या तो नायक-नायिका की मुलाकातें करवाने का काम करते हैं या चिट्ठियां पहुंचाने का. इसीलिए यह नब्बे के सुनहरेदशक की याद दिलाती है. क्योंकि इसमें फिल्म वालों का पसंदीदा शहर पालनपुर है और ऊटी जैसे किसी शहर की एक सुंदर सड़क पर छोटा-सा जौनपुर बस स्टॉपका बोर्ड लगाकर वहीं जौनपुर और आजमगढ़ बना दिया गया है. अब चुनना आपको है. या तो आप नकली पान की दुकानें और ओवरएक्टिंग करती हीरोइन युविका को देखकर झुंझला सकते हैं या भीड़ वाले दृश्यों में पीछे से कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराते लोगों के साथ मुस्कुरा सकते हैं.

प्रीतम का संगीत कहीं-कहीं फिल्म की जान बचाने की कोशिश करता है, लेकिन पंद्रह साल पुरानी शैली के गाने, उनका वैसा ही फिल्मांकन और हर बीस मिनट में उनका ब्रेक की तरह आना उन्हें असहनीय बना देता है. हजार बार घिसी जा चुकी एक कहानी में किसी का अभिनय जितना अच्छा हो सकता है, तब्बू का अभिनय उतना अच्छा है. यह हम आपके हैं कौनया ऐसी ही किसी फिल्म का खराब संस्करण है. इसी तरह  ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का भी.

यह जल्दबाजी में बनी और देर से आई उन फिल्मों में से एक है जिनके चरित्रों को निर्देशक भी ठीक से नहीं जानता. उसके सब शहर तो एक शहर में होते ही हैं, उसके सब किरदार भी एक जैसा सोचते हैं और एक जैसा व्यवहार करते हैं. वे सब अपना जीवन नायक की शादी करवाने या रोकने के लिए ही समर्पित कर देते हैं. सब लोग बेवकूफ होते हैं और उन्हें आसानी से कनफ्यूज किया जा सकता है. निर्देशक शायद इस मिथक के फेर में आकर फिल्म बना देता है कि सब हल्की-फुल्की सुखांत फिल्में चलती ही हैं. यह उबाऊ या बोझिल फिल्म नहीं है, बस बुरी है. इसे झेलना मुश्किल नहीं है मगर इसके विकल्प के रूप में आप अपने घर के किसी सदस्य की शादी का वीडियो या टीवी का कोई सीधा-सरल धारावाहिक भी देख सकते हैं.

गौरव सोलंकी 

चहारदीवारी से आगे की दावेदारी

महिलाएं, पुरुषों से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं.

-महात्मा गांधी

हरियाणा में मेवात जिले के नीमखेड़ा गांव के बीचोंबीच बना है गांव का पंचायत घर. सागसब्जी की क्यारियों और नजदीक ही घूमती बत्तखों और कुत्तों के कारण पंचायत घर का माहौल काफी घरेलू लगता है. भीतर जाने के बाद दीवारों पर चार राइफलें, गोलियों की आठ पेटियां और हिरण की खाल जैसे मर्दानगी के प्रतीक नजर आते हैं. यहीं हमारी मुलाकात होती है 47 साल की आशुबी खान और नौ दूसरी पंचायत सदस्यों से. वे उत्साही स्कूली छात्राओं की तरह हाथ मिलाती हैं, हंसती हैं और बैठ जाती हैं. हम आशुबी को अपना परिचय देते हुए विजिटिंग कार्ड थमाते हैं तो वे इसे उलटा पकड़ती हैं. याद आता है कि आते हुए रास्ते में एक पुलिस अधिकारी तक ने संदेह के साथ कहा था, ‘औरतों की पंचायत? यह मेवात है. यहां तो यह नामुमकिन है.’

जब उन्होंने कहा कि पंचायत का काम तो दूसरी तरह का है तो हमारा जवाब थाबस इंतजार करो और देखो कि पंचायत का काम कैसे होता है

लेकिन यह सच है. नीमखेड़ा की पंचायत में सभी महिलाएं हैं. उन्हें अपनी क्षमताओं को लेकर कोई संदेह नहीं. पंचायत सदस्य 60 वर्षीया सकीना हमारा असमंजस भांपकर मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘हम सब अंगूठाटेक हैं. लेकिन हमने पंचायत के नियमकायदों को याद कर लिया है और जहां जरूरत पड़ती है, हमारे बच्चे लिखपढ़ देते हैं.’

जब 1992 में हुए 73वें संविधान संशोधन के बाद देश भर में एक तिहाई पंचायत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं तो नीमखेड़ा की सीट भी आरक्षण के दायरे में आई. 2005 में गांव के मुखिया परिवार की बहू आशुबी सरपंच के रूप में चुनी गईं. सामंती परिवेश वाले यहां के समाज में उनका चुना जाना कोई खास बात नहीं थी, खास तो वह घटनाक्रम था जो उनके चुने जाने के बाद घटित हुआ. आशुबी याद करती हैं, ‘मुझसे पंचों को चुनने के लिए कहा गया. मैंने कहा कि मैं सिर्फ महिलाओं के साथ काम कर सकती हूं.’ गांव के पुरुषों ने इसपर एतराज जताया. लेकिन आशुबी ने अपनी बात मनवाने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल किया. उन्होंने सभी नौ ग्रामीण वार्डों से एकएक महिला का चुनाव किया और इस तरह एक ऐसी पंचायत बनी जहां सभी सदस्य महिलाएं हैं.

शुरुआत में निरक्षरता के अलावा औरत होने को लेकर भी उनका मजाक उड़ाया गया. 56 वर्षीया सलमा बताती हैं, ‘मर्द हमारी हंसी उड़ाते हुए कहते कि औरतें केवल घरों के भीतर नाचने के लिए हैं. हमने कहा कि फिर हमसे क्यों खेतों, पानी खींचने और लकड़ी जमा करने का काम कराया जाता है? जब उन्होंने कहा कि पंचायत का काम तो दूसरी तरह का है तो हमारा जवाब थाबस इंतजार करो और देखो कि पंचायत का काम कैसे होता है.’ 54 साल की मुहम्मदी कहती हैं, ‘पंचायत सदस्य बनने से हमने बहुतकुछ सीखा है. इसके पहले हम यह भी नहीं जानते थे कि पानी जैसी आम चीज के लिए भी पंचायत को नीतियां लागू करनी होती हैं.’ इस पंचायत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने दिल्ली से राजस्थान के बीच बहने वाली उजीना नहर से अपने गांव को जोड़ दिया है. 79 साल की असिनी पिछले 50 साल तक औरतों को दिन में दो बार दो किलोमीटर दूर एक तालाब से पानी ढोते देख चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘और ऊपर से ये नासमझ मर्द अड़े रहते थे कि हम शाम को बुरका पहना करें.’

मेवात में पानी की बहुत कमी है, यहां सिंचाई नाममात्र को होती है और लोग पूरी तरह वर्षा पर निर्भर हैं. हालांकि अब गांव नहर से जुड़ चुका है, लेकिन पाइपलाइन का काम अभी बाकी है. आशुबी बताती हैं, ‘अफसर हमसे सीधे मुंह बात नहीं करते. हम उनकी खड़ी बोली (हिंदी) नहीं समझ सकते. हमारे अनपढ़ होने के कारण वे हमें बेकार समझते हैं.’ इसके बावजूद इन महिलाओं ने सिंचाई विभाग पर फाटक खोलने के लिए दबाव डाला है. उन्हें यकीन है कि उनके गांव के नल में पानी आएगा.

पंचायत ने अपनी सक्रियता को नया आयाम देते हुए यहां के खंड विकास अधिकारी को लड़कियों का एक जूनियर हाई स्कूल शुरू करने के लिए मंजूरी देने पर मजबूर कर दिया. 45 वर्षीया बख्तियार बताती हैं, ‘एक बार स्कूल खुल जाए तो बहुतसारी लड़कियां पढ़ सकेंगी, जो पहले नहीं पढ़ सकती थीं.’ मेवात में लिंगानुपात बहुत कमएक हजार मर्दो पर 893 महिलाओं का है, जो राष्ट्रीय औसत (एक हजार मर्दो पर 927 महिलाओं) से नीचे है. यह जिला भारत के उन जिलों में से है जहां बाल विवाह सबसे अधिक होते हैं और किशोरी माताएं बहुत हैं, यहां प्रसव के समय मांओं की मृत्यु दर भी बहुत अधिक है. यहां की 98 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं और आबादी का आलम यह है कि औसतन हर परिवार में आठ सदस्य हैं.

गांव के प्राथमिक स्कूल को माध्यमिक स्तर का बना दिया गया है. इसमें नामांकन भी 97 से बढ़कर 800 तक पहुंच चुका है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पक्की सड़क और सरकारी राशन दुकानों का भलीभांति संचालन दूसरी उपलब्धियां हैं. पंचायत ने 72 शौचालय भी बनवाए हैं. फिरदौस मजाक करती हैं, ‘शौचालय न होना अच्छा था, क्योंकि उस समय हम अपनी सहेलियों से मिलते थे. लेकिन जब पेट खराब हो तो शौचालय न होना बुरा है.’

गांव में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम भी रफ्तार पकड़ चुका है. सरपंच आशुबी कहती हैं, ‘आप अगले साल आएंगी तो शायद तब तक हम वह पढ़ने लायक हो जाएंगे जो आपने हमारे बारे में लिखा होगा, इसलिए हमारी तुलना राबड़ी देवी से मत कीजिए.’

 

चैनलों के शोर में बजती चुप्पी

अपने समाचार चैनलों में कुछ अपवादों को छोड़कर आक्रामकता और शोर बहुत है. इस हद तक कि खबरें चीखती हुई दिखती हैं. एंकर और रिपोर्टर चिल्लाते हुए से लगते हैं.  चर्चाएं हंगामाखेज होती हैं.  धीरे-धीरे यह शोर और आक्रामकता चैनलों की सबसे बड़ी पहचान बन गई है. संपादक इस बात को बड़े फाख्र से अपने दमखम, साहस और स्वतंत्रता की निशानी के बतौर पेश करते हैं. उनका दावा है कि उन्होंने हमेशा बिना डरे, पूरी मुखरता से न्याय के हक में आवाज उठाई है. इसके लिए आवाज ऊंची भी करनी पड़ी है तो उन्होंने संकोच नहीं किया है. चैनलों के कर्ता-धर्ताओं का तर्क है कि उनकी आक्रामकता और शोर आम लोगों को जगाने और ताकतवर लोगों को चुनौती देने के लिए जरूरी हैं. बात में कुछ दम है. कई मामलों में यह आक्रामकता और शोर जरूरी भी लगता है.  पहरेदार की उनकी भूमिका को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है. यह भी सही है कि कई मामलों में चैनलों के इस शोर से सत्ता या उसका संरक्षण पाए शक्तिशाली अपराधियों को पीछे हटना पड़ा या कमजोर लोगों को न्याय मिलने का अहसास हुआ़ भले ही चैनलों के भ्रष्टाचार विरोधी या न्याय अभियान का दायरा ज्यादातर कुछ सांसदों, छोटे-मोटे नेताओं-अफसरों, बड़े शहरों और उनके उच्च मध्यमवर्गीय लोगों तक सीमित रहा हो लेकिन इसके लिए भी चैनलों की तारीफ होनी चाहिए़  आखिर कुछ नहीं से कुछ होना हमेशा बेहतर है.

 कल्पना करिए कि आज से 50 या 100 साल बाद जब इतिहासकार हमारे मौजूदा चैनलों की रिकॉर्डिंग के आधार पर आज का इतिहास लिखेंगे तो उस इतिहास में क्या होगा? वह किस देश का इतिहास होगा और उस इतिहास के नायक, खलनायक और विदूषक कौन होंगे?लेकिन समाचार चैनलों से उनके दर्शकों की अपेक्षाएं इससे कहीं ज्यादा हैं. मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने अच्छे अखबार की परिभाषा देते हुए लिखा था कि अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता दिखता है. बेशक, समाचार चैनलों के लिए भी यह कसौटी उतनी ही सटीक है. सवाल यह है कि हमारे शोर करते चैनलों में हमारा वास्तविक देश कितना दिखता है? क्या उनमें देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है? याद रखिए, चैनल कहीं न कहीं हमारे दौर का इतिहास भी दर्ज कर रहे हैं.  कल्पना करिए कि आज से 50 या 100 साल बाद जब इतिहासकार हमारे मौजूदा चैनलों की रिकॉर्डिंग के आधार पर आज का इतिहास लिखेंगे तो उस इतिहास में क्या होगा? वह किस देश का इतिहास होगा और उस इतिहास के नायक, खलनायक और विदूषक कौन होंगे? जाहिर है कि स्रोत के बतौर चैनलों को आधार बनाकर लिखे इतिहास में मुंबई, दिल्ली और कुछ दूसरे मेट्रो शहरों का वृत्तांत ही भारत का इतिहास होगा जिसमें असली नायक, खलनायक की तरह, खलनायक, विदूषक और विदूषक, नायक जैसे दिखेंग़े. इस इतिहास में कहानी तो बहुत दिलचस्प होगी लेकिन उसमें गल्प अधिक होगा, तथ्य कम. शोर बहुत होगा पर समझ कम. थोथापन, आक्रामकता, कट्टरता, जिद्दीपन जैसी चीजें ज्यादा होंगी मगर न्याय और तर्क कम. बारीकी से देखें तो साफ तौर पर चैनलों के शोर और आक्रामकता के पीछे एक षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और भीरुपन भी दिखाई देगा. लगेगा कि चैनल जान-बूझकर शोर-शराबे और आक्रामक रवैए के पीछे कुछ छुपाने में लगे रहते हैं. आखिर वे क्या छुपाते हैं? गौर से देखिए तो वे वह हर जानकारी छुपाते या नजरअंदाज करते हैं जिससे नायक, नायक, खलनायक, खलनायक और विदूषक, विदूषक की तरह दिखने लग़े  इसीलिए चैनल आम तौर पर उन मुद्दों से एक हाथ की दूरी रखते हैं जो सत्ता तंत्र द्वारा तैयार आम सहमति को चुनौती दे सकते हैं.

नहीं तो क्या कारण है कि माओवादी हिंसा को लेकर जो चैनल इतना अधिक आक्रामक दिखते और शोर करते हैं, वे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बंगाल में जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी रिपोर्टिंग के लिए टीम और कैमरे नहीं भेजते? क्या ये जगहें देश से बाहर हैं? इन राज्यों में जमीन,जंगल,नदियों और संसाधनों के साथ ही वहां के मूल निवासियों की क्या स्थिति है, इसके बारे में खबर हर कीमत पर, सच दिखाने का साहस, आपको रखे आगे और सबसे तेज होने का दावा करने वाले चैनलों से नियमित वस्तुपरक रिपोर्ट की अपेक्षा करना क्या चांद मांगने के बराबर है?

क्या चैनलों से यह उम्मीद करना गलत है कि वे मुंबई में बाल-उद्घव-राज ठाकरे को दिन-रात दिखाने और शोर मचाने के बाद कुछ समय निकालकर युवा वकील शाहिद आजमी की हत्या पर भी थोड़ी आक्रामकता दिखाएंगे? या देश भर में कहीं नक्सली, कहीं माओवादी और कहीं आतंकवादी बताकर पकड़े-मारे जा रहे नौजवानों के बारे में थोड़े स्वतंत्र तरीके से खोजबीन करके निष्पक्ष रिपोर्ट दिखाएंगे? क्या वे उन बुद्घिजीवियों-पत्रकारों के बारे में तथ्यपूर्ण रिपोर्ट सामने लाएंगे, जिन्हें नक्सलियों का समर्थक बताकर गिरफ्तार किया गया है या जिनकी हिरासत में मौत हुई है? क्या वे चंडीगढ़ की रुचिका की तरह छत्तीसगढ़ के गोंपद गांव की सोडी संबो की कहानी में भी थोड़ी दिलचस्पी लेंगे और उसे न्याय दिलाने की पहल करेंगे? दरअसल, शोर-शराबे और आक्रामकता के बावजूद ऐसे सैकड़ों मामलों में चैनलों की चुप्पी कोई अपवाद नहीं. यह एक बहुत सोची-समझी चुप्पी है जिसे चैनलों के शोर-शराबे में आसानी से सुना जा सकता है.

आनंद प्रधान 

जरूरी भाजपा

अकसर होता यह था कि जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का घटक कोई धर्मनिरपेक्ष दल -जैसे कि जद (यू) – हिंदुत्व या राम मंदिर पर भाजपा के रुख की आलोचना करता तो भाजपा यह समझाती नजर आती थी कि वह और ऐसा करने वाले दो अलग-अलग दल हैं और गठबंधन में ऐसा होना लाजमी है. मगर हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मुसलिम समुदाय से सदाशयता की अपील की तो सहयोगी शिवसेना ने भाजपा पर ही हिंदुओं और भगवान राम के साथ धोखाधड़ी का इलजाम ठोंक दिया. इसके बाद भाजपा इसे गलत बताते हुए खुद के और शिवसेना के दो अलग दल होने की सफाई देते नजर आई. कुछ समय पहले शिवसेना के मराठी मानुस अभियान का भी भाजपा ने स्पष्ट शब्दों में विरोध कर मुंबई को पूरे देश की बताया था जबकि पहले ऐसे मौकों पर वह कुछ भी बोलना तक मुनासिब नहीं समझती थी.

बीती 20 फरवरी को झारखंड के एक अधिकारी को छुड़ाने के एवज में भाजपा समर्थित शिबू सोरेन सरकार ने कुछ तथाकथित नक्सल समर्थकों को छोड़ने की बात मान ली थी. भाजपा ने इस पर अपने सहयोगी दल से सख्त एतराज दर्ज कराते हुए इसे नितांत ही अस्वीकार्य कदम बताया था. पार्टी पुराने आग्रहों को सावधानी से ताक पर रखते हुए जोर-शोर से महंगाई, आतंकवाद और पाकिस्तान से बातचीत आदि को मुद्दे बनाने का प्रयास करती भी नजर आ रही है.

संक्षेप में कहें तो पिछले काफी समय से अपने द्वारा शासित अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों-सा बर्ताव करती नजर आई भाजपा एक राष्ट्रीय दल और केंद्र में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाती-सी प्रतीत हो रही है. यहां तक कि इंदौर में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में लगे पोस्टर भी भाजपा की मानसिकता में आते बदलाव को दर्शाते प्रतीत हो रहे थे. जहां पहले ऐसी बैठकों में पोस्टरों और बैनरों पर अटल और आडवाणी ही छाए रहा करते थे वहीं इस बार इनमें अपेक्षाकृत निचले स्तर के नेताओं को भी बहुतायत में देखा जा सकता था. ऐसा लग रहा था कि पार्टी व्यक्ति आधारित राजनीति से किनारा करने की कोशिशों की भी शुरुआत कर चुकी है.

यदि यह केवल प्रतीत होने से आगे का सच है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए, किसी पार्टी विशेष के प्रति रुझान के चलते नहीं बल्कि इसलिए कि किसी भी तरह की एकछत्रता, उदासीनता या निरंकुशता की जनक होती है. ऐसी एकछत्रता की भावना वाली सत्ता की नजर एकोन्मुखी होती है, जैसा कि 2004 में हुआ था, जब भाजपा कांग्रेस को चुका हुआ मानने के बाद महानगरों की चकाचौंध को गरीब-गुरबों और गांवों से जोड़ने की भूल कर बैठी थी. लोकतंत्र में विकल्पों का होना सत्ताधारी के होने जितना ही महत्वपूर्ण होता है. आजादी से पहले और बाद के काफी साल तक कांग्रेस के भीतर भी समाजवादियों और दक्षिणपंथियों आदि का प्रतिनिधित्व करने वाले गुट हुआ करते थे जो विपक्ष के ज्यादा मजबूत न होने की स्थिति में सरकार के विचार और कर्मों में संतुलन बिठाते थे. ऐसा होना आज भी जरूरी है और इसके लिए भाजपा जरूरी है.

संजय दुबे 

'हिंदी में हर लेखक को, किसी न किसी स्तर पर, अपने अलक्षित रह जाने का अफ़सोस है'

आपकी मनपसंद लेखन शैली क्या है?

मेरी कोई पसंदीदा शैली नहीं है. शायद ऐसा होता भी न हो. हर रचना अपनी शैली ख़ुद ले आती है. आप अपनी अभिव्यक्ति की नवीनता के लिए उस शैली में कुछ सोचाविचारा, छेड़छाड़ भर करते हैं. भाषा, चरित्नों को सुनने और उन्हें समझने के लिए मैं हर बार अलग शैलियों की ओर गया, जाता रहा हूं.

इन दिनों क्या लिखपढ़ रहे हैं?

जो लिख रहा हूं, वह क्या है, नहीं पता. लेकिन पिछले दिनों जो पढ़ा, उनमें मुख्य हैंओरहन पामुक की द म्यूजि़यम ऑफ इनोसेंस, जे एम कोएट्जी की समरटाइम, हेर्टा म्यूलर की द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स, बेई दाओ की कविताएं और पीटर हैंडके का स्लो होमकमिंग. ठीक इस समय मैं यियून ली का उपन्यास द वैग्रेन्ट्स पढ़ रहा हूं.

रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों?

ऐसे कई हैं. रघुवीर सहाय और विष्णु खरे. अरुण कोलटकर और भाऊ पाध्ये. बोर्खेज और माक्व्रेज. पामुक और कोएट्जी. नेरूदा और चेस्लाव मिवोश. अमोस ओज और हारुकि मुराकामी. किताबों में क्राइम एंड पनिशमेंट, एकांत के सौ वर्ष, रेसीदेंसीया एन ला तिएर्रा से लेकर माय मायकल और एपोकैलिप्स तक. महाभारत, ओडिसी और बाइबल (ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट समेत) की ओर मैं बारबार जाता हूं.

कोई महत्वपूर्ण रचना जो अलक्षित रह गई हो.

हिंदी में हर लेखक को, किसी न किसी स्तर पर, अपने अलक्षित रह जाने का अफ़सोस है. उसका एक विशाल, बहुधा सुनियोजितटयूंड विलाप भी है.

क्या किया जा सकता है कि किताबें पढ़ने की परंपरा, जो धीरेधीरे खत्म हो रही है, खत्म न हो?

मैं इससे सहमत नहीं. रीडरशिप के तुलनात्मक आंकड़े देख लें, बुक्स तक पढ़ी जा रही हैं. हमारी भाषा में भी पाठक बढ़े हैं, बस, हमारे पास उन्हें मापने, उनकी तादाद जांचने के उपकरण नहीं हैं. इसके बावजूद, हिंदी किताबों को और सुलभ होना होगा.

गौरव सोलंकी

सलीब पर साहस (2)

बिहार के बक्सर जिले में स्थित सरिन्जा गांव के शिवप्रकाश को कई साल तक यही लगता रहा कि भारत को लोगों को असली आजादी तो 2005 में मिली जब सूचना का अधिकार कानून पास हुआ. लेकिन जब इस आजादी का इस्तेमाल करने की कोशिश में उन्हें और उनके जसे 18 लोगों को मार खानी पड़ी और जेल जाना पड़ा तो उनकी यह खुशफहमी अब दूर हो गई है.

‘डीएम ने मुझे नौ सादे कागज दिए. उन्होंने मुझ पर यह लिखने के लिए दबाव डाला कि मुझे वे सूचनाएं मिल गई हैं, जिनकी मांग मैंने की थी. जब मैंने इसका विरोध किया, तो उन्होंने धमकी देनी शुरू की. वे कहने लगे-’मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार को बरबाद कर दूंगा. मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा’

2005 से प्रकाश सूचना के अधिकार का इस्तेमाल उन चीजों से जुड़ी जानकारियां पाने के लिए कर रहे थे जो उनके गांव के किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं, जैसे वार्ड कमिश्नर ने अपने कार्यकाल में कितना काम किया है या सरकारी योजनाओं से कितने किसानों को फायदा पहुंचा है आदि. उदाहरण के लिए केंद्र सरकार ने गरीब किसानों के लिए हैंडपंप की खरीद और ट्यूबवेल लगवाने पर 35 प्रतिशत की रियायत दी थी. आरटीआई दस्तावेजों के अनुसार प्रकाश ने पाया कि स्थानीय प्रशासन के दावों में भारी विसंगतियां हैं. वे बताते हैं कि प्रशासन ने स्टेशन रोड स्थित नवीन हार्डवेयर से 1000 ट्यूबवेलों या पीपी रोड स्थित अनिल मशीनरी के यहां से पंपसेटों की खरीद की सूची बनाई है. लेकिन इन दुकानों का अस्तित्व ही नहीं है. खरीद की अधिकतर रसीदें जाली हैं. प्रकाश को अनुमान है कि उनके अपने जिले में ही 10 करोड़ से अधिक का घोटाला हुआ है. उन्हें यकीन है कि इस तरह की धोखाधड़ी पूरे राज्य में चल रही है.

इसके बाद प्रकाश ने कई और सवाल पूछे. आवेदनों की बड़ी संख्या देख कर स्थानीय प्रशासन जवाब देने से कतराने लगा. 2006 में प्रकाश ने बक्सर जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से शिक्षित बेरोजगार योजना के लाभार्थियों और सरकारी रियायती दर पर हैंडपंप और ट्यूबवेल खरीदनेवाले किसानों की सूची मांगी. वे कहते हैं, ‘मुझे लगा कि सरकारी फंड से करोड़ों रुपए फर्जी नामों पर उठाए गए हैं.’ लेकिन उन्हें प्रशासन से कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद प्रकाश ने नियमित अंतराल पर डीएम के कार्यालय को नौ आवेदन भेजे. जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो प्रकाश ने बिहार सूचना आयोग से संपर्क किया. उन्हें उम्मीद कम ही थी मगर आयोग ने उनकी शिकायतों पर कार्रवाई की और डीएम से जवाब तलब किया. प्रकाश कहते हैं, ‘इसीलिए डीएम ने तय कर लिया था कि मुझे सबक सिखाना है.’

बक्सर लौटते ही डीएम ने प्रकाश से कहा कि सारी सूचना उनके चेंबर में रखी हुई है और वे आकर उन्हें ले लें. प्रकाश 2 फरवरी, 2008 को डीएम कार्यालय पहुंचे. लेकिन यहां घटी घटना ने प्रकाश के जीवन को एक दूसरी ही दिशा दे दी. प्रकाश बताते हैं, ‘डीएम ने मुझे नौ सादे कागज दिए. उन्होंने मुझ पर यह लिखने के लिए दबाव डाला कि मुझे वे सूचनाएं मिल गई हैं, जिनकी मांग मैंने की थी. जब मैंने इसका विरोध किया, तो उन्होंने धमकी देनी शुरू की. वे कहने लगे-’मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार को बरबाद कर दूंगा. मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा.’ जब प्रकाश ने झुकने से इनकार किया तो पुलिस बुला कर उन्हें हिरासत में ले लिया गया. उनके खिलाफ डीएम से रंगदारी वसूलने और उनकी हत्या करने की कोशिश के आरोप में एक एफआईआर दायर की गई. 29 दिन तक हिरासत में रहने के बाद प्रकाश सबूतों के अभाव में छूट गए.

जेल से निकलने के बाद प्रकाश का इरादा और मजबूत हुआ. उन्होंने हर जिले में घूम-घूम कर लोगों को आरटीआई और इसके उपयोग के बारे में बताया. उन्होंने अपने जैसे कुछ लोगों के साथ मिल कर आरटीआई मंच का गठन किया ताकि आरटीआई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दी जा सके. प्रकाश बताते हैं कि अन्य 18 कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया है और उन्हें जेल भेजा गया है. वे कहते हैं, ‘डीजीपी ने खुद स्वीकार किया है कि बिहार में आरटीआई कार्यकताओं के खिलाफ जांच के 30 मामले चल रहे हैं.’

आजादी का शुरुआती भ्रम तेजी से बिखर रहा है. लेकिन प्रकाश अब भी डटे हुए हैं. वे कहते हैं, ‘मेरे घरवालों को यह काम पसंद नहीं. उन्हें हम बेवकूफ लगते हैं. ऐसा लगता है कि केवल भ्रष्ट लोगों को ही दौलत और शोहरत मिल सकती है. सच्चाई के रास्ते पर चलना बड़ा मुश्किल है.’

 ‘मैंने हार मान ली है’

सूर्यकांत शिंदे,  मुंबई

  बांबे पोर्ट ट्रस्ट (बीपीटी) में दो दशक तक काम करने के बाद नवंबर, 2009 में सहायक सुरक्षा अधिकारी सूर्यकांत शिंदे को बरखास्त कर दिया गया. उन्हें पांच लोगों का परिवार पालना था, होम लोन चुकाना था और उनका बैंक खाता लगभग खाली था. 45 वर्षीय शिंदे कहते हैं, ‘मैंने हार मान ली है. अब मैं जनता की भलाई के लिए और काम नहीं करना चाहता.’

अगस्त में शिंदे ने जहाजरानी मंत्रालय से शिकायत की. वे बताते हैं कि मंत्रालय ने शिकायत पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन को भेजी और चेयरमैन ने इसे उसी मुख्य सुरक्षा अधिकारी के पास भेज दिया जिसके खिलाफ शिंदे ने शिकायत की थी

उनकी इस हताशा की शुरुआत कुछ साल पहले हुई थी जब शिंदे को आपराधिक साजिश रचने और मुंबई बंदरगाह पर आए कंटेनरों से केमिकल चुराने के आरोप में दो माह के लिए जेल भेज दिया गया. स्थानीय पुलिस ने उन्हें मुख्य साजिशकर्ता बताया. हालांकि शिंदे ने ही चोरियों को उजागर करने की कोशिश की थी. वास्तविकता यह थी कि शिंदे का पहले ही उस इलाके से तबादला कर दिया गया था जहां चोरियां हुई थीं. चोरियों के समय वे हेपेटाइटिस से पीड़ित थे और अस्पताल में भर्ती थे. इस मामले में दो वर्ष बाद एक जज ने उन्हें बरी कर दिया. शिंदे पर तीन अधिकारियों ने आरोप लगाए थे. यहां यह उल्लेखनीय है कि कुछ ही महीने पहले शिंदे ने एक घोटाला उजागर किया था, जिसमें मुख्य सुरक्षा अधिकारी समेत यही तीनों लोग संदेह के घेरे में आए थे. बाद में उन्होंने शिंदे को फंसाने की कोशिश की थी.

फरवरी, 2005 में शिंदे ने दवा बनाने के काम आनेवाले महंगे केमिकल्स और दवाओं की तस्करी से संबंधित एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी. 10 करोड़ रुपए से भी अधिक मूल्य की यह तस्करी बंदरगाह पर मौजूद कंटेनरों से छह महीने से हो रही थी. उन्होंने कंटेनरों और उनकी जगह तथा संदिग्धों के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी. उनके अनुसार संदिग्धों के नाम थे-बरकत अली, परवेज और अमरसिंह राजपूत. ये सभी वांछित तस्कर थे.

शिंदे कहते हैं कि उन्होंने रिपोर्ट पुलिस, बीपीटी चेयरमैन तथा कस्टम और सतर्कता विभाग को सौंप दी थी लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. जब अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने चोरियों की खबर छापी तो मुंबई पुलिस की अपराध शाखा हरकत में आई और शिंदे के दफ्तर पहुंची. शिंदे की शिकायत का उल्लेख करते हुए पांच एफआईआर दर्ज की गईं. तस्करों के गिरफ्तार होने तक शिंदे ने पुलिस की मदद की. लेकिन डच्यूटी पर तैनात बीपीटी अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. शिंदे बताते हैं कि ऐसी चोरियां गेट पास और कंटेनरों की खुफिया सूचना के बिना नहीं हो सकतीं. उन्होंने चोरियों के सात और मामलों को उजागर किया लेकिन अपराध शाखा ने उन मामलों को स्थानीय पुलिस के पास भेज दिया. हैरत की बात यह है कि उनमें से तीन मामलों में शिंदे को ही फंसा दिया गया और 5 जुलाई, 2005 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अप्रैल, 2007 में बरी होने तक उनके दो लाख रुपए मुकदमा लड़ने और जमानत हासिल करने में खर्च हो चुके थे.

1994-97 के बीच शिंदे ने मुंबई बंदरगाह पर आयातित तेल की चोरियों का मामला उजागर किया था. कुछ आरोपित पकड़े गए और कुछ तेल की बरामदगी भी हुई. इससे पहले 1997 में उन्होंने टेट्रासाइक्लिन की चोरी की सूचना दी थी. इसका आरोपित गिरफ्तार हुआ था, लेकिन मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने शिंदे से उनके व्यवहार के बारे में जवाब मांगा था. बाद में शिंदे को मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड़ा था.

शिंदे कहते हैं, ‘मुझे सुरक्षा देने के बजाय बीपीटी ने मुझे निलंबित कर दिया और मेरा वेतन काट लिया.’ ड्यूटी से गायब रहने को लेकर उनके खिलाफ विभाग में अनेक आरोपपत्र दायर किए गए. अब वे ड्यूटी से गायब रहने और अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित चल रहे हैं. शिंदे के पास इसके सबूत हैं कि जिन दिनों वे ड्यूटी पर नहीं आए थे, उन दिनों उनकी सीबीआई और कस्टम के सामने गोपनीय मामलों में पेशी थी.

केंद्रीय सर्तकता आयोग को भेजी गई शिंदे की शिकायतों पर वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. पिछले साल अगस्त में शिंदे ने जहाजरानी मंत्रालय से शिकायत की. वे बताते हैं कि मंत्रालय ने शिकायत पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन को भेजी और चेयरमैन ने इसे उसी मुख्य सुरक्षा अधिकारी के पास भेज दिया जिसके खिलाफ शिंदे ने शिकायत की थी. शिंदे कहते हैं, ‘मैं महाभारत के अभिमन्यु की तरह अकेला पड़ गया हूं. मेरा परिवार सड़क पर है. नई नौकरी मिलने के बाद मैं अपनी तनख्वाह लूंगा और चुपचाप घर चला जाऊंगा.’

सलीब पर साहस (1)

2006 की बात है. तब विजयकुमार डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइजेज के सचिव थे. एक दिन आधीरात के करीब उनके घर की घंटी बजी. दरवाजे पर कुछ लोग थे जिन्होंने कहा कि विजयकुमार के बड़े बेटे का एक्सीडेंट हो गया है और वे उनके साथ चलें. मगर विजयकुमार जानते थे कि उनका बेटा उनसे थोड़ी ही दूर पर आराम से सो रहा है. यह उनकी जुबान खामोश करने की एक और कोशिश थी. तकरीबन एक साल बाद दिसंबर, 2007 में जब वे बेलगाम में नियुक्त थे तो एक दिन एक हुड़दंगी उनके ऑफिस में घुस गया. उसने धमकी देने वाले अंदाज में कहा, ‘मैं दिनदहाड़े दो लोगों का खून कर चुका हूं और अभी-अभी जेल से बाहर आया हूं. मैं आपको एक बार देखना चाहता था.’ यह तब हुआ था जब आधिकारिक रूप से विजयकुमार को पुलिस सुरक्षा मिली हुई थी.

चालीस बार जान से मारने की धमकियां, तीन हमले, दस महीनों में सात ट्रांसफर…फिर भी एमएन विजयकुमार अपना काम उसी जुनून के साथ कर रहे हैं जो उनमें तब था जब 1985 में उन्होंने एक आईएएस अधिकारी के रूप में कर्नाटक से अपने करिअर की शुरुआत की थी

कर्नाटक कैडर के आईएएस अधिकारी के रूप में अपने 25 साल के कार्यकाल में विजयकुमार ने हमेशा भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ करने की कोशिश की है. वे कहते हैं, ‘अगर जनहित के खिलाफ कोई चीज हो रही है और आप अकेले हैं जो उनकी तरफ इशारा कर सकते हैं तो आपको बोलना होगा. जनसेवकों के रूप में हम सतर्क रहने की शपथ लेते हैं.’ 

अपनी जान पर खतरे के बारे में विजयकुमार केंद्रीय सतर्कता आयोग और कर्नाटक मानवाधिकार आयोग, दोनों को लिख चुके हैं मगर कोई फायदा नहीं हुआ. जब उनकी पत्नी जयश्री को यह अहसास हो गया कि व्यवस्था में किसी को भी उनके पति की जान की परवाह नहीं तो उन्होंने जनता के पास सीधे जाने का फैसला किया. जैसा कि वे बताती हैं, ‘मैंने एक वेबसाइट बनाई और हर चीज को दस्तावेज के रूप में इस पर सहेजना शुरू किया. मैं नहीं चाहती थी कि इंसाफ के लिए लड़ाई मुझे उन्हें खोने के बाद छेड़नी पड़े.’

2007 में वेबसाइट शुरू होने के बाद जल्द ही विजयकुमार को तत्कालीन मुख्य सचिव पीबी महिषि की चिट्ठी मिली. इसमें कहा गया था कि सरकारी सेवक की पत्नी इस तरह की वेबसाइट नहीं चला सकती क्योंकि पति और पत्नी के रूप में वे दोनों एक ही इकाई हैं. इसमें यह भी कहा गया था कि वेबसाइट जारी रखने के लिए जयश्री को अपने पति से अलग होना होगा.

इस दंपत्ति के लिए मुसीबत तब शुरू हुई थी जब ऊर्जा सुधार विभाग में विशेष सचिव के रूप में तैनात विजयकुमार ने 344 करोड़ रुपए के दुरुपयोग के खिलाफ आवाज उठाई थी. 2005 में उन्होंने इस बारे में कर्नाटक के मुख्य सचिव को 30 पन्नों की एक रिपोर्ट सौंपी. जैसा कि वे बताते हैं, ‘सबसे बुरी चीज जो मुझे लगी वह यह थी कि गरीबों के लिए किए गए कामों पर करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे किए गए थे. जबकि आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे थे.’ आधिकारिक तौर पर गरीबों तक बिजली पहुंचाने के लिए भारी सब्सिडियां दी जा रही थीं. मगर 800 गांवों के टैरिफ और मीटर रीडिंगों का अध्ययन करने के बाद विजयकुमार ने पाया कि असल में गरीबों के नाम पर अमीरों को सब्सिडियां मिल रही थीं.

तब के मुख्य सचिव केके मिश्रा ने विजयकुमार को चेतावनी दी थी कि वे संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करें. विजयकुमार के मुताबिक मिश्रा ने उनसे कहा, ‘वे तुम्हें खत्म कर देंगे. ऐसा मत करो. वे तुम्हें बर्बाद करने के लिए किसी भी हद तक चले जाएंगे.’ मगर विजयकुमार माने नहीं. मिश्रा जल्द रिटायर हो गए और कुछ समय बाद उनकी जगह पीपी महिषि ने ले ली. विजयकुमार ने मांग की कि उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई की जाए वर्ना वे इसे सार्वजनिक कर देंगे. महिषि का जवाब था, ‘मुझे इससे भी बड़े घोटालों की खबर है. तुम इतना शोर क्यों मचा रहे हो?’ जयश्री भी इस बैठक के दौरान मौजूद थीं. वे महिषि के शब्द याद करती हैं, ‘भ्रष्टाचारियों के ऊपर मेरा हाथ है. जांच करने की जरूरत नहीं.’

तहलका ने जब इस बारे में महिषि से संपर्क किया तो उन्होंने माना कि विजयकुमार उनसे मिले थे. मगर उनका कहना था, ‘वे मेरे पास ऐसी कोई रिपोर्ट लेकर नहीं आए थे जिस पर मैं कार्रवाई करता. इसलिए मैंने उनसे कहा कि वे अपना काम करें और भ्रष्टाचार से निपटने का काम दूसरी संस्थाओं पर छोड़ दें. वे झूठे आरोप लगा रहे हैं.’ महिषि आगे यह भी जोड़ते हैं कि उन्होंने विजयकुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी और अपने और विजयकुमार के बीच के पत्राचार को मनोरोगी वार्ड को भेज दिया था. विजयकुमार कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि मुख्य सचिव ने मेरी रिपोर्ट उन्हीं लोगों को दे दी जिनके खिलाफ मैंने शिकायत की थी. बाद में आरटीआई के तहत आवेदन लगाने पर पता चला कि मेरी रिपोर्ट का कहीं कोई पता नहीं.’

सितंबर 2006 से जून 2007 के बीच विजयकुमार का सात बार तबादला किया गया. एक बार तो उन्हें अपने रैंक से नीचे का पद तक दे दिया गया जबकि असल में उनका प्रमोशन होना था. इन्हीं तबादलों के दौरान एक बार उन्हें एक ऐसे विभाग में भेज दिया गया जो काम ही नहीं कर रहा था. यहां उन्हें चार महीनों तक तनख्वाह नहीं मिली.

विजयकुमार जहां भी गए भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ न कुछ करते रहे और नतीजतन उन्हें फिर दूसरी जगह पटका जाता रहा. बेंगलुरू का क्षेत्रीय आयुक्त बनने के बीस दिन बाद ही विजयुकमार ने एक योजना बनाई जिसमें जनता सूचना के अधिकार के तहत आने वाली जानकारी को बिना किसी झंझट के सीधे इंटरनेट पर देख सकती थी. इसमें खास दिन या समय जैसी कोई बाधा नहीं होती. मगर योजना अमल में आने से दो दिन पहले ही उनका तबादला कर दिया गया. इसके बाद उन्हें मैसूर लैंप्स नाम की एक कंपनी की एक बेकार पड़ी इकाई का प्रबंध निदेशक बना दिया गया. जब उन्होंने इसे पुनर्जीवित करने की एक योजना बनाकर सौंपी तो तबादला कर उन्हें बेलगाम भेज दिया गया. यहां उन्हें कमांड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी में एक ऐसे पद पर काम करना था जो दरअसल इंजीनियरों के लिए होता है.

यह दिसंबर, 2007 की बात है. विजयकुमार ने पुलिस सुरक्षा के बिना बेलगाम जाने से इनकार कर दिया. उन्हें सुरक्षा तो मिली पर सिर्फ कागजों पर. जयश्री बताती हैं, ‘अधिकारी एक बार भी हमारे यहां आए बिना अपनी बीट बुक भरते रहे.’ इस तरह की पुलिस सुरक्षा में रहते हुए विजयकुमार पर दो जानलेवा हमले हुए. जैसा कि वे याद करते हैं, ‘पुलिस का कहना था कि वे मेरी सुरक्षा नहीं कर सकते इसलिए मुझे सीबीआई सुरक्षा के लिए कहना चाहिए.’ इन दिनों वे प्रधान सचिव के स्तर के पद पर हैं और कर्नाटक सिल्क मैनेजिंग बोर्ड के चेयरमैन बनकर काम कर रहे हैं जो कि काफी हद तक नाम का ही पद है.

मगर विजयकुमार यह प्रताड़ना झेलने वाले अकेले नहीं हैं. 2006 से उनकी पत्नी जयश्री उनके समर्थन में लगातार आरटीआई आवेदन दाखिल कर रही हैं. जब भ्रष्टाचार पर बनी एक उच्चस्तरीय समिति की कार्यशैली के बारे में पूछे गए उनके सवालों का कोई जवाब नहीं मिला तो जयश्री ने कर्नाटक सूचना आयोग की शरण ली. आयोग की इमारत से वे बाहर निकली ही थीं कि एक शख्स ने उनका रास्ता रोककर उनसे कहा, ‘अपने सभी आवेदन वापस ले लो वरना नतीजे बहुत खतरनाक होंगे.’ एक अन्य घटना में जब वे मुख्य सचिव के खिलाफ मिली एक जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए एक प्रेस

कॉफ्रेंस में जा रही थीं तो एक बस ने उनकी कार में टक्कर मारने की कोशिश की. जयश्री बताती हैं, ‘ड्राइवर की सतर्कता से हम बच गए. हमारी किस्मत ठीक रही है. जब भी किसी ने हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, कोई न कोई हमें बचाने के लिए मौजूद रहा. मुझे नहीं पता ऐसा कब तक चल पाएगा.’

‘अब भी मेरी जान को खतरा है’ 

एचएस डिलिमा

                                                                                                                                                                                        पांच साल पहले 75 वर्ष के बुजुर्ग पर उनके घर के सामने हंसिए से हमला हुआ. खून से लथपथ होने के बावजूद उन्होंने हमलावर से जूझते हुए अपनी जान बचाई. तब से पांच वर्ष बीत गए. डिलिमा कई बार हमलावर को अंधेरी इलाके में आजादी से घूमते हुए देख चुके हैं. वे उसके घर का पता जानते हैं और उन्होंने कई बार पुलिस को वहां तक पहुंचाने की पेशकश की. इसके बावजूद मुंबई पुलिस ने यह कह कर उनका केस बंद कर दिया कि उनके हमलावर को खोजा नहीं जा सका.

डिलिमा की व्यथा कथा इतनी भर नहीं है. हमले से कुछ ही महीने पहले उन्होंने पुलिस से सुरक्षा की मांग की थी, क्योंकि किसी ने उन्हें जान से मारने की धमकियां दी थीं. यह वही आदमी था, जिसने बाद में उनकी जान लेने की कोशिश कीलेकिन डिलिमा की व्यथा कथा इतनी भर नहीं है. हमले से कुछ ही महीने पहले उन्होंने पुलिस से सुरक्षा की मांग की थी, क्योंकि किसी ने उन्हें जान से मारने की धमकियां दी थीं. यह वही आदमी था, जिसने बाद में उनकी जान लेने की कोशिश की. लेकिन डालमिया को कोई सुरक्षा नहीं दी गई. आज भी वे बिना सुरक्षा के ही घूमते हैं. पिछले एक दशक से डिलिमा मुंबई के अंधेरी पश्चिम इलाके में अवध इमारतों के निर्माण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. वे बताते हैं,‘इस इलाके तक पहुंचने वाले सभी रास्तों पर अवैध इमारतें बन गई हैं. इस इलाके में अब सिर्फ उसी तंग गली के जरिए पहुंचा जा सकता है जहां मैं रहता हूं.’

उनकी शिकायतें वर्षो तक धूल खाती रहीं. नवंबर, 2004 में अधिकारियों ने एक शिकायत पर कार्रवाई की. डिलिमा ने कुछ तसवीरों की मदद से बॉम्बे म्युनिसिपल कारपोरेशन (बीएमसी) से लड़ाई लड़ी और एक स्टे ऑर्डर जारी करवाने में सफल रहे. जल्दी ही अंधेरी की लेन नं 1 का हाउस नं 77 ढहा दिया गया. यह एक छोटी सी जीत थी जिसने आगे के लिए उम्मीदें बड़ी कर दी थीं.

लेकिन इस छोटी सफलता के लिए भी डिलिमा को कीमत चुकानी पड़ी. कुछ ही महीने बाद मार्च, 2005 में एक दिन जब डिलिमा अपने घर लौट रहे थे, तो उनके घर के बाहर उन पर पीछे से हमला हुआ. यह हमला हंसिए से हुआ था. उन्होंने मामले की एफआईआर में कम से कम 8 लोगों के नाम दर्ज कराए, जिन पर उन्हें शक था. तब से डिलिमा न केवल भू-माफियाओं से बल्कि उस पुलिस और व्यवस्था से भी जूझ रहे हैं जिसका फर्ज ही है नागरिकों की सुरक्षा. उनके अनुसार पुलिस ने जांच के नाम पर सिर्फ खानापूरी की. 2006 में एक संक्षिप्त रिपोर्ट जमा कर मामले को बंद कर दिया गया. लेकिन डिलिमा को इसकी जानकारी नहीं थी. जब इस बारे में उनके सवालों को नहीं सुना गया तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन किया. तब कहीं जाकर जनवरी, 2007 में उन्हें पता लगा कि संदिग्धों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं की गई.

इस बीच डिलिमा ने अपनी खोज-बीन के जरिए 2004 में अपनी हत्या की सुपारी देनेवालों के बारे में कुछ पक्की सूचनाएं जमा कर ली थीं. वे उन्हें लेकर अपना मामला फिर से शुरू करने के लिए जून, 2007 में अंधेरी के डीजीपी और एसीपी से मिले. लेकिन अधिकारियों ने केस को फिर से खोलने से मना कर दिया. तब एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मजिस्ट्रेट के आदेश से नवंबर, 2008 में मामला फिर से खुल सका.

लेकिन डिलिमा बताते हैं कि इसके बावजूद कुछ खास कार्रवाई नहीं हुई है. जांच भी रुकी हुई है. इसे लेकर उन्होंने बीएमसी और मुंबई पुलिस को कम से कम 200 चिट्ठियां लिखी होंगी. उन्होंने आरटीआई के तहत जमा किए गए सबूत पेश किए हैं जो करोड़ों रुपए के अवैध निर्माण की तरफ इशारा करते हैं. डिलिमा कहते हैं, ‘मुंबई का बिल्डिंग प्रपोजल्स डिपार्टमेंट खुद ही मानता है कि इन निर्माणों के लिए उससे मंजूरी नहीं ली गई थी.’

लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. 2006 में डिलिमा ने मुंबई हाई कोर्ट में इन्हीं सबूतों के साथ एक जनहित याचिका दायर की थी, जो अब भी लंबित पड़ी है. जबकि डिलिमा को अब भी धमकियां मिल रही हैं. दो महीने पहले उन्हें मुंबई के भू-माफिया की चिट्ठी मिली है, जिसमें कहा गया था कि उनकी हत्या के लिए पांच लाख की सुपारी दे दी गई है.

डिलिमा कहते हैं, ‘मेरे जैसे कार्यकर्ता तब तक सुरक्षित नहीं हैं जब तक पुलिस जवाबदेह और जिम्मेदार नहीं बनती जो कि उसे भारतीय संविधान के मुताबिक होना चाहिए. अब भी मेरी जान को खतरा है.’

सलीब पर साहस

वे बस अपना फर्ज निभा रहे थे. मगर प्रशंसा के बजाय उन्हें मिली प्रताड़ना, परेशानियां और कभी-कभी मौत भी. तुषा मित्तल बता रही हैं कि भारत में व्यवस्था को कोसने के बजाय उसे बदलने का काम कितना जोखिमभरा है.

संजीव चतुर्वेदी की कहानी सही और गलत के बीच होने वाले सनातन संघर्ष की कहानी है. संयोग देखिए कि इसकी शुरूआत उसी कुरूक्षेत्र से होती है जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था. लेकिन चतुर्वेदी का महाभारत थोड़ा अलग है. महाभारत में पांडव पांच थे. यहां चतुर्वेदी अकेले हैं. महाभारत में लड़ाई पांडवों ने नहीं छेड़ी थी. यहां छेड़ी है. यह लड़ाई अप्रैल, 2007 की एक दोपहर को शुरू हुई थी. तब चतुर्वेदी को कुरूक्षेत्र का डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) बने छह महीने ही हुए थे. नेशनल फॉरेस्ट एकेडमी, देहरादून में प्रशिक्षण के बाद उनकी यह पहली पोस्टिंग थी. हरियाणा के सबसे बड़े संरक्षित क्षेत्रों में से एक सरस्वती वन्यजीव अभ्यारण्य की देखभाल का काम उनके जिम्मे था. काले हिरण जैसी कई दुर्लभ प्रजातियों का बसेरा यह अभ्यारण्य 34 साल के चतुर्वेदी के लिए किसी मंदिर जैसा था और भारतीय वन सेवा का अधिकारी होने के नाते वे खुद को इसका संरक्षक मानते थे. उस दोपहर जब वे इसका दौरा कर रहे थे तो एक जगह पर अचानक कुछ देखकर वे जड़ हो गए. सामने का नजारा चौंकाने वाला था. बबूल, नीम और यूकेलिप्टिस के सैकडों पेड़ जमीन पर गिरे हुए थे और कई मशीनें मलबा साफ करने के काम में जुटी थीं. वन्यजीव सुरक्षा कानून का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए जरूरी मंजूरी लिए बिना अभ्यारण्य के बीच से एक विशाल नहर बनाने का काम चल रहा था.

चतुर्वेदी की लड़ाई को सिर्फ एक अभ्यारण्य बचाने का जुनून या भ्रष्टाचार उजागर करने की कोशिश के तौर पर देखना भूल होगी. दरअसल यह यह उस चीज को बचाने की लड़ाई है जिसे वे बहुत पवित्र समझते हैं. यह चीज है अपने बुनियादी कर्तव्य को निभाने का अधिकार

चतुर्वेदी ने तुरंत निर्माण कार्य रोकने के आदेश दिए. इसके बाद उन्होंने पेड़ों के अवैध कटान और पर्यावास के विनाश पर हरियाणा सिंचाई विभाग के ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई. साथ ही उन्होंने राज्य के मुख्य वन्यजीव संरक्षक (चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन) आरडी जकाती को भी इस बारे में सचेत कर दिया.

मगर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय जकाती ने चतुर्वेदी के आदेश को ही निरस्त कर दिया. इसके बाद फौरन ही चतुर्वेदी का तबादला हो गया. चार साल बाद जकाती नेशनल फॉरेस्ट एकेडमी के निदेशक हैं जबकि चतुर्वेदी आज भी तबादलों, आरोपपत्रों और फर्जी एफआईआरों से जूझ रहे हैं. सही रास्ते पर चलने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ रही है.

चतुर्वेदी की लड़ाई को सिर्फ एक अभ्यारण्य बचाने का जुनून या भ्रष्टाचार उजागर करने की कोशिश के तौर पर देखना भूल होगी. दरअसल यह यह उस चीज को बचाने की लड़ाई है जिसे वे बहुत पवित्र समझते हैं. यह चीज है अपने बुनियादी कर्तव्य को निभाने का अधिकार. चतुर्वेदी ने कभी अपने भाई राजीव (वे भी राजस्थान में तैनात आईएफएस अधिकारी हैं) से कहा था, ‘हम जनता के पैसे और प्राकृतिक संसाधनों के ट्रस्टी हैं.’ इसी सोच की वजह से चार साल के दौरान उनका 11 बार तबादला हो चुका है. किसी एक जगह पर उनका सबसे लंबा कार्यकाल साढ़े सात महीने का था. इन चार साल के दरम्यान वे जहां भी गए नई लड़ाई छेड़ते रहे.

कुरूक्षेत्र में अपनी पहली पोस्टिंग के साथ ही चतुर्वेदी की ख्याति एक ऐसे अफसर के रूप में फैल गई थी जिसे कोई भी लालच भ्रष्ट नहीं कर सकता. शायद इसीलिए यह मालूम होते हुए भी 110किमी लंबी हिसार-कुरूक्षेत्र नहर राज्य सरकार की प्रिय परियोजना है, उन्होंने निर्माण कार्य रोकने के आदेश दे दिए. 23 मई, 2007 को चतुर्वेदी ने एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें अभ्यारण्य को नुकसान पहुंचाए बिना नहर के लिए वैकल्पिक रास्ते सुझाए गए थे. मगर अगले ही दिन जकाती ने इसे खारिज कर दिया.

इसके बाद हरियाणा के मुख्य सचिव (वन) एचसी दिसोदिया ने चतुर्वेदी को एक पत्र लिखा जिसमें उनके इस कदम को ‘दुर्व्यवहार’ करार दिया गया था. इस पत्र के शब्द थे, ‘आपको चेतावनी दी जाती है कि आप भविष्य में इस तरह की गतिविधियों में शामिल न हों.’ चतुर्वेदी के तबादले के बाद वन विभाग ने अभ्यारण्य के भीतर पड़ने वाले नहर के हिस्से को वन्य जीवों के लिए जल स्रोत घोषित कर दिया जबकि इसमें पानी ही नहीं था. इसके बाद हरियाणा सरकार ने इसे आरक्षित वन भूमि के दायरे से बाहर कर दिया.

अगस्त 2007 में भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त (सीईसी) में एक याचिका दायर की. इस पर अपने बचाव में हरियाणा सरकार का कहना था कि ‘जो उल्लंघन हुए हैं वे तकनीकी प्रकृति के थे और जानबूझकर नहीं किए गए थे. सरकार ने हमेशा वन और वन्यजीवों के बेहतर प्रबंधन के लिए काम किया है.’ मगर अपने फैसले में सीईसी ने कहा कि ‘वन संरक्षण कानून के तहत जरूरी मंजूरी लिए बिना निर्माण कार्य शुरू कर दिए गए जो वन्यजीव सुरक्षा कानून का उल्लंघन है.’ मगर चूंकि अब भूमि को आरक्षित वन भूमि की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था इसलिए सीईसी की नजर में दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं बनता था. हरियाणा सरकार पर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाकर मामला खत्म कर दिया गया.

छरहरे बदन और खुशनुमा मिजाज के चतुर्वेदी खुद के सरकारी अधिकारी होने का हवाला देकर पहले-पहल तहलका से बात करने से मना कर देते हैं. मगर हिसार में उनसे बार-बार मिलना ज्यादा मुश्किल नहीं है जहां वे फिलहाल डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर के रूप में तैनात हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि वे एक योद्धा हैं तो वे हंसते हैं और कहते हैं कि उन्होंने खुद को कभी इस रूप में नहीं देखा. वे फर्ज के अपनी जवाबदेही में यकीन रखने वाले इंसान हैं और उन्हें लगता है कि अगर वे अपना दायित्व पूरा नहीं करते तो वे अपनी ही नजर में गिर जाएंगे. चतुर्वेदी के परिवार के लोग बताते हैं कि उनसे सुरक्षा लेने को कहा गया पर उन्होंने यह कहते हुए इससे मना कर दिया क्योंकि इससे यह संदेश जाता कि वे डरे हुए हैं. परिवारवालों के मुताबिक चतुर्वेदी ने उनसे कहा, ‘धर्म का अर्थ है बिना शिकायत अपना कर्तव्य पूरा करना, यह चिंता किए बिना कि इसके परिणाम क्या होंगे. मैं अपने काम का आनंद ले रहा हूं.’

कुरूक्षेत्र से चतुर्वेदी का तबादला एक दूरदराज के कस्बे फतेहाबाद कर दिया गया. यहां उन्हें पता चला कि उनका विभाग एक हर्बल पार्क के लिए दुर्लभ पेड़ों और जड़ी-बूटियों की खरीद पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है. उन्हें यह भी जानकारी मिली कि यह पार्क सरकारी नहीं बल्कि एक निजी जमीन पर बनाया जा रहा है जो राज्य की वनमंत्री किरण चौधरी के करीबी बताए जाने वाले ताकतवर नेता प्रहलाद सिंह गिलाखेड़ा के परिवार की है. चतुर्वेदी ने तुरंत काम रोकने के आदेश दिए और इसकी जांच शुरू की कि इस काम के लिए पैसे की मंजूरी कैसे दी गई. मगर उनकी पीठ थपथपाने की बजाय 12 जुलाई, 2007 को हरियाणा के शीर्ष वन अधिकारी प्रधान मुख्य वन संरक्षक जेके रावत ने लिखा, ‘आदरणीय वन मंत्री इससे काफी नाराज थीं और उन्होंने मुझसे फौरन काम दोबारा शुरू करवाने के लिए कहा है.’ चतुर्वेदी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें तीन अगस्त 2007 को निलंबित कर दिया गया. अचानक उनके लिए यह अब निजी गरिमा का मामला बन गया. उन्होंने फैसला किया कि खुद को निर्दोष साबित करने तक वे चैन से नहीं बैठेंगे. उनके भाई राजीव याद करते हैं, ‘उन्होंने कहा कि ये सिर्फ छोटे-मोटे झटके हैं, वे मुझे नहीं हरा सकते.’

चतुर्वेदी जीत भी गए. सेवा नियमों के मुताबिक निलंबन के 15 दिन के भीतर राज्य सरकार को इसके बारे में एक रिपोर्ट बनाकर केंद्र को देनी चाहिए थी. मगर ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं भेजी गई. निलंबन आदेश में इस कार्रवाई की कोई वजह नहीं बताई गई थी. इसमें सिर्फ यही लिखा गया था, ‘अनदेखी और बढ़ावे की गतिविधियों के चलते आपको निलंबित किया जाता है.’ चतुर्वेदी ने सूचना का अधिकार कानून के तहत वन विभाग में आवेदन कर अपनी निलंबन फाइल पर लिखी गई टिप्पणी की जानकारी मांगी. विभाग ने यह कहते हुए इससे मना कर दिया कि ऐसा करने से जांच प्रक्रिया में बाधा आएगी. चतुर्वेदी ने हार नहीं मानी. कई और आवेदनों के बाद राज्य सूचना आयोग ने मामले में दखल देते हुए विभाग से उन्हें यह टिप्पणियां देने को कहा.

ये टिप्पणियां चौंकाने वाली थीं और इससे वन मंत्री चौधरी पर भी सवाल खड़े होते थे. पहले वन विभाग के शीर्ष अधिकारी रावत ने लिखा था, ‘अधिकारी को किसी भी क्षेत्रीय शाखा में रखना विभाग के हितों के लिए ठीक नहीं होगा जहां कई योजनाएं और परियोजनाएं चल रही हैं और लोगों से लेन-देन का काफी व्यवहार हो रहा है.’ इसमें आगे जोड़ते हुए चौधरी के शब्द थे, ‘वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ बार-बार की अनुशासनहीनता को देखते हुए अधिकारी (चतुर्वेदी)को निलंबित किया जा सकता है.’ इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने पहले तो यह लिखा कि चतुर्वेदी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए मगर इसके बाद तुरंत ही यू टर्न लेते हुए फाइल पर लिखा गया, ‘पुनर्विचार के बाद मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव ‘बी’ को मंजूरी दे दी है.’

चतुर्वेदी ने अपने निलंबन के खिलाफ अपील की. जब केंद्र ने राज्य सरकार से इस बाबत पूछा तो कोई जवाब नहीं आया. इसलिए जनवरी, 2008 में राष्ट्रपति के आदेश पर इस निलंबन को रद्द कर दिया गया. निलंबन के दौरान ही उनके खिलाफ एक फर्जी एफआईआर दर्ज कर दी गई थी. इसमें उन पर धमकी देने और कचनार के एक पौधे की चोरी के आरोप थे. यह चोरी मार्च, 2007 में फतेहाबाद में हुई दिखाई गई थी, जबकि उस समय उनकी नियुक्ति वहां थी ही नहीं. बाद में अदालत में पुलिस ने यह मानते हुए अपनी एफआईआर वापस ले ली कि यह भ्रामक तथ्यों पर आधारित थी.

इसके बाद एकता परिषद नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने हर्बल पार्क के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इस पर अप्रैल, 2008 में हरियाणा सरकार को नोटिस जारी किया गया. निजी जमीन पर सरकार द्वारा पार्क बनाने की प्रक्रिया गैरकानूनी थी इसलिए इस पर पर्दा डालने के लिए इस जमीन को फरवरी, 2009 में संरक्षित वन घोषित कर इसका प्रबंधन वनविभाग के हवाले कर दिया गया. न कोई अपराधी साबित हुआ न किसी को सजा मिली. सिवाय चतुर्वेदी के जिन्होंने इस गड़बड़झाले को उजागर किया था. जनवरी, 2008 में बहाली के बाद उन्हें छह महीने तक बिना किसी नियुक्ति के रखा गया. और जब उन्हें नियुक्ति मिली तो यह उनके रैंक से नीचे की थी. वे इसके खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन ट्रिब्यूनल में गए और जीत गए.

सरकार हर तरफ से मुंह की खा चुकी थी. हारकर उसे चतुर्वेदी को झज्झर का डीएफओ बनाना पड़ा. यहां भी उन्होंने पांच करोड़ रुपए का घोटाला उजागर कर डाला जो फर्जी पौधारोपण पर खर्च किए गए थे.  चतुर्वेदी ने अपने विभाग के सैकड़ों लोगों को खुद पेड़ गिनने के लिए कहा.  इसके बाद उन्होंने विभाग के नौ अधिकारियों को निलंबित कर दिया और 40 लोगों को उनकी बर्खास्तगी के आदेश थमा दिए. फिर जैसी कि संभावना थी, उनका तबादला हो गया. चतुर्वेदी के घर की दीवारें और आलमारियां खाली हैं. ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं. कुरुक्षेत्र का यह योद्धा जानता है कि अगला तबादला भी जल्द ही हो सकता है.

भारत में संजीव चतुर्वेदी अकेले ऐसे  व्यक्ति नहीं हैं जो साहस की सलीब टांगे हुए व्यवस्था बदलने की राह पर हैं. यहां हम ऐसे ही कुछ और लोगों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें इस राह पर चलते हुए अनगिनत मुसीबतें उठानी पड़ीं, पड़ रहीं हैं लेकिन उससे डिगना इनको मंजूर नहीं है – 

 सिपाही, जिसे मिली सचेत करने की सजा : सतीश शेट्टी, पुणे

सतीश शेट्टी साधारण व्यक्ति नहीं थे. होते तो उनके दुश्मनों की संख्या इतनी ज्यादा न होती. जाली राशन कार्ड बेचने वालों से लेकर अवैध तरीके से संपत्तियों पर कब्जा जमाकर बैठने और करोड़ों रुपए का घोटाला करने वालों तक उनके दुश्मनों की सूची बहुत लंबी थी. शायद यही वजह थी कि पुणो से सटे तालेगांव में पले-बढ़े शेट्टी को 39 साल की उम्र में ही अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा. 13 जनवरी, 2010 को दिनदहाड़े उन पर हमला हुआ और वह भी पुलिस स्टेशन के पास. अस्पताल पहुंचाए जाने के थोड़ी देर बाद उनकी मौत हो गई. शेट्टी का कसूर यही था कि वे गरीब किसानों को उनके साथ रहे धोखे से बचाना चाहते थे.

कई साल तक सबूत इकट्ठा करने के बाद शेट्टी ने इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रीज (आईजीआर) तक शिकायत भेजी कि बडगाम-मवाल इलाके में जमीन की सैकड़ों अवध रजिस्ट्रियां हो रही हैं. नवंबर, 2009 में आईजीआर ने 2000 रजिस्टर्ड डॉक्यूमेंटों का ऑडिट शुरू किया जिसमें कम से कम 930 फर्जी पाए गए.चार भाई-बहनों में सबसे बड़े शेट्टी को आम तरीके से जीना कभी नहीं भाया. उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. न नौकरी की न शादी. पुणो की एक एडवरटाइजिंग फर्म में काम कर रहे उनके भाई संदीप कहते हैं, ‘समाज सेवा के पीछे वे पागल थे.’ बीस-इक्कीस साल की उम्र में ही वे समाज सेवा से जुड़ गए थे. रेलवे टिकट बुक करने से लेकर कर्ज लेने की प्रक्रियाओं में वे गांववालों की मदद करते. संदीप बताते हैं, ‘उन्हें हर जगह भ्रष्टाचार नजर आने लगा.’ जल्दी ही वे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से जुड़ गए. बाद में उन्होंने भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति नाम का एक संगठन बनाया.

शेट्टी पहली बार तब सुर्खियों में आए जब 1996 में उन्होंने सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में डेढ़ करोड़ के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया. दरअसल इसमें एक राशन विक्रेता ने 200 जाली राशन कार्ड बना रखे थे. मामला सामने आने के बाद एक अदालत ने राशन विक्रेता का लाइसेंस रद्द करते हुए उस पर भारी जुर्माना लगाया. 2004 में शेट्टी के दुश्मनों की सूची में तब और इजाफा हुआ जब उन्होंने रेलवे की जमीन पर कब्जा किए बैठे कुछ ताकतवर लोगों का भांडाफोड़ किया. इनमें एक मेयर और कुछ नेता भी थे. मेयर को कुर्सी गंवानी पड़ी. रेलवे की जमीन पर अवैध रूप से बने सभी लोगों के बंगले गिरा दिए गए. ऐसे ही एक बंगले का मालिक और स्थानीय वकील विजय दाभाड़े अब शेट्टी की हत्या के मामले में एक अहम आरोपित है.

2005 में शेट्टी को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के रूप में अपना सबसे मजबूत हथियार मिला. उस समय मुंबई-पुणो एक्सप्रेसवे की वजह से रियल एस्टेट की कीमतों में बहुत उछाल आया हुआ था. एक तरफ जमीन की कीमतें बढ़ रही थीं और दूसरी तरफ जमीनें कब्जाई जा रहीं थीं. जमीन हड़पने की कई कहानियों के साथ तमाम छोटे-बड़े किसान शेट्टी के पास आने लगे. शेट्टी को पता चला कि नियमों में कुछ ऐसे झोल हैं जिनका फायदा उठाकर किसी की मर्जी के खिलाफ भी उसकी जमीन की रजिस्ट्री और खरीद-फरोख्त हो रही है. संदीप बताते हैं, ‘वे जमीन के एक ऐसे ही छोटे से टुकड़े की पड़ताल कर रहे थे कि उन्हें 3000 करोड़ रुपए के एक घोटाले की गंध मिली. शायद यही वजह है कि वे आज जिंदा नहीं हैं.’ 

कई साल तक सबूत इकट्ठा करने के बाद शेट्टी ने इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रीज (आईजीआर) तक शिकायत भेजी कि बडगाम-मवाल इलाके में जमीन की सैकड़ों अवध रजिस्ट्रियां हो रही हैं. नवंबर, 2009 में आईजीआर ने 2000 रजिस्टर्ड डॉक्यूमेंटों का ऑडिट शुरू किया जिसमें कम से कम 930 फर्जी पाए गए. रजिस्ट्रार को निलंबित कर दिया गया. करोड़ों रुपए के कारोबार वाली कंपनी आइडियल रोड बिल्डर्स (आईआरबी) की तरफ उंगलियां उठीं. संदीप बताते हैं, ‘आईआरबी द्वारा अधिग्रहीत की गई 1800 एकड़ जमीन सवालों के घेरे में आ गई. कंपनी को काफी आर्थिक नुकसान तो हुआ ही, उसे काफी बदनामी भी झेलनी पड़ी.’ इसके बाद शेट्टी को आशंका हो गई थी कि उनकी जिंदगी को खतरा हो सकता है. 24 नवंबर, 2009 को उन्होंने पुलिस सुरक्षा मांगी. मगर उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया. अब पुलिस का कहना है कि उनके आवेदन पर कार्रवाई हो रही थी.

शेट्टी की मौत पुलिस अक्षमता से ज्यादा उस फर्ज की प्रति उदासीनता की उस व्यापक समस्या को दर्शाती है जिसकी जड़ें गहरे धंसी हुई हैं. शेट्टी व्यवस्था के झोल जनता के सामने लाना चाहते थे. मगर वे झोल ही शायद उनकी जिंदगी लील गए. उनकी हत्या की जांच अब लोनावाला के एक दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंप दी गई है. पांच लोग गिरफ्तार हुए हैं. प्राथमिक आरोपित दाभाड़े को संतोष शिंदे नाम के एक सब्जी विक्रेता के बयान के आधार पर गिरफ्तार किया गया था. पुलिस के मुताबिक इस सब्जी विक्रेता ने खुद ही पुलिस से संपर्क साधकर माना था कि दाभाड़े ने उसे शेट्टी की हत्या की सुपारी दी थी जो उसने ठुकरा दी थी. शेट्टी के परिवार ने जो एफआईआर दर्ज करवाई है उसमें मुख्य रूप से आईआरबी पर शक जाहिर किया गया है. कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से इस मामले में पूछताछ की गई है मगर गिरफ्तारी कोई नहीं हुई है.

फिलहाल तो शेट्टी के परिवार के लिए उम्मीद की किरण बांबे हाईकोर्ट ही है जिसने खुद ही इस मामले का संज्ञान लेते हुए शेट्टी द्वारा इकट्ठा किए गए आरटीआई दस्तावेज मांगे हैं. संदीप कहते हैं, ‘कम से कम कोई तो अब इन दस्तावेजों को देखेगा. मेरे भाई को मारने से इंसाफ की प्रक्रिया नहीं रुकने वाली.’

ताल्लुक बोझ बन जाए तो..

ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा कि संघ और भाजपा द्वारा शिवसेना के शगूफे मुंबई मराठियों के लिएकी आलोचना सिर्फ अक्तूबर में होनेवाले बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनजर की जा रही है. चिंताएं दरअसल कहीं व्यापक हैं. उत्तर प्रदेश की तरह ही बिहार से भी हजारों लोग रोजी-रोटी के लिए हर साल मुंबई जाते हैं. हाल के महीनों में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) में बंटे ठाकरे परिवार के बीच जिस तरह उत्तर भारतीयों पर हमले करने की होड़ लगी है उससे दोनों राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए परेशानियां खड़ी हो गई हैं.

भाजपा के लिए मनसे-शिवसेना से दूरी बनाना मध्यवर्ग में अपनी पैठ फिर से जमाने के लिए जरूरी है, जो उससे छिटक गया है. यह एक लंबा और मुश्किल काम है

कांग्रेस तो पूरी तरह ऊहापोह की स्थिति में है कि वह क्या रुख अपनाए. महाराष्ट्र में सबको पता है कि 2009 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपने फायदे के लिए कांग्रेस ने मनसे और राज ठाकरे को बढ़ावा दिया. मराठी मानुस की राजनीति में ताजा पन्ना राज्य की कांग्रेस सरकार ने ही जोड़ा जब उसने कहा कि वह सिर्फ मुंबई के निवासियों और मराठी बोलने वालों को ही टैक्सी ड्राइवर परमिट देगी. हालांकि इस अजीबोगरीब नीति को बाद में सुधार लिया गया लेकिन फिर भी यह छिपा नहीं कि कांग्रेस दो नावों (या शायद दो टैक्सियों) की सवारी कर रही है. मुंबई में यह क्षेत्रीय आधार पर लोगों को डराने-धमकाने की राजनीति करनेवालों का तुष्टिकरण करती है तो दूसरी तरफ बिहार में राहुल गांधी राज ठाकरे की आलोचना करते हुए महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के योगदान की सराहना करते हैं. उधर, दिल्ली में गृहमंत्री पी चिदंबरम दोनों सेनाओं और उनकी जहरीली बयानबाजियों को आड़े हाथों लेते हैं. ऐसा करते हुए दोनों ही आसानी से मुंबई में अपनी पार्टी के रवैये को भुला देते हैं. लेकिन एक समय आएगा जब कांग्रेस को अपना रवैया साफ करना होगा. अभी तो वह दोमुंहा रुख अपनाकर भी इसलिए बच जा रही है क्योंकि विपक्ष भी अपनी दुविधाओं और मुश्किलों से घिरा हुआ है.

उधर, भाजपा और संघ के लिए क्षेत्रीयता की संकीर्ण राजनीति कर रहीं मनसे और शिवसेना की हरकतें परेशानी का सबब बनने लगी हैं. राजनीतिक रूप से सेना हमेशा अपनी अहमियत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती रही है. लोकसभा चुनावों के पहले सीटों के बंटवारे के समय ठाकरे परिवार ने भी अड़ियल रवैया अपनाया. वह यह मानने को तैयार नहीं था कि पिछले एक दशक में उसका आधार कम हुआ है और सीट बंटवारे के अनुपात के मामले में पलड़ा अब भाजपा की तरफ झुक गया है. सेना की जिद के आगे भाजपा आखिरकार झुक गई. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि बाल ठाकरे के रहते उनका रिश्ता नहीं टूटेगा. कांग्रेस-राकांपा की तरफ सेना के खुल्लमखुल्ला नर्म रुख के बावजूद भाजपा ने शांति बनाए रखी. लेकिन इससे पार्टी में सभी लोग खुश नहीं थे. महाराष्ट्र भाजपा के कई अहम नेता सेना के खिलाफ आवाज उठाना चाहते थे. नितिन गडकरी भी इनमें शामिल थे जो अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

भाजपा के लिए मनसे-शिवसेना से दूरी बनाना मध्यवर्ग में अपनी पैठ फिर से जमाने के लिए जरूरी है, जो उससे छिटक गया है. यह एक लंबा और मुश्किल काम है. लेकिन इसकी शुरुआत तब तक संभव नहीं है जब तक पार्टी अपने उस सहयोगी के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार नहीं करती जिसने पिछले कुछ समय से भारत के एक बड़े फिल्मी सितारे, क्रिकेटर और उद्योगपति के खिलाफ मोर्चा खोलकर इसके लिए लगातार मुश्किलें खड़ी की हैं.

लेकिन यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा ही नहीं है. संघ उल्लेखनीय रूप से राष्ट्र की अपनी अवधारणा को लेकर उदार और व्यापक हो सकता है. जैसा कि एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं कि 1970 के दशक में जब आर्य समाज ने हिंदू पंजाबियों को अपनी मातृभाषा पंजाबी की बजाय हिंदी घोषित करने को कहा तो संघ ने इसका विरोध किया था और कहा था कि इससे एक भाषा के रूप में पंजाबी का अपमान होगा, हालांकि कांग्रेस के एक धड़े की शह पाकर आर्य समाज अपने रुख पर अड़ा रहा. इसकी वजह से सिख भड़क गए और 15 साल तक पंजाब जलता रहा.

हालांकि शिवसेना-मनसे परिवार की लड़ाई बिलकुल 1980 के दशक की अकाली दल-भिंडरावाले की लड़ाई जैसी नहीं है. फिर भी इसमें कांग्रेस की लापरवाही और आरएसएस की सतर्कता जैसी उल्लेखनीय समानताएं तो दिखती ही हैं. हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि वैसी त्रासदी फिर दोहराई न जाए. 

अशोक मलिक