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मैत्नेयी पुष्पा के 'गुड़िया भीतर गुड़िया' को बेमतलब की शोहरत मिली

इन दिनों क्या लिख-पढ़ रही हैं?

दस कहानियों की एक सीरीज पर काम कर रही हूं, जिसका नाम है- बशीर की कहानियां. हर्टा म्यूलर का उपन्यास द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स और मनीषा कुलश्रेष्ठ का शिगाफ अभी-अभी पढ़ा.

आपकी मनपसंद लेखन शैली क्या है?

कथ्य और भाषा का मानीखेज संतुलन मुझे बहुत आकर्षित करता है. जैसे यशपाल के झूठा सच, राही मासूम रजा के  आधा गांव, शानी के काला जल, मंजूर एहतेशाम के  बशारत मंजिल और भीष्म साहनी के तमस में. 

रचना या लेखक, जो आपके बेहद करीब हों?

मंटो व इस्मत चुगताई. निर्मल वर्मा व उदय प्रकाश की कुछ कहानियां. संजीव की कुछ चीजें. ममता कालिया की भाषा का प्रवाह. ज्ञानरंजन पसंद हैं, कृष्णा सोबती और चित्रा मुद्गल भी.

ऐसी कोई महत्वपूर्ण रचना जो अलक्षित रह गई हो?

भुवनेश्वर की एक कहानी भेड़िए थी. हिंदी में शायद सबसे पहले उन्होंने फंतासी और यथार्थ का समन्वय रचा. हम आजकल जब जादुई यथार्थवाद की इतनी बातें करते हैं तब उनका जिक्र नहीं होता.

ऐसी कोई रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली?

मैत्नेयी पुष्पा का गुड़िया भीतर गुड़िया.

हाल-फिलहाल खरीदी गई कोई किताब?

बोर्खेज का समग्र, बद्री नारायण का कविता संग्रह और ममता कालिया की दुक्खम सुक्खम.

क्या किया जा सकता है कि किताबें पढ़ने की परंपरा, जो धीरे धीरे कम होती जा रही है, बनी रहे?

हमें हिंदी की किताबों को कंप्यूटर पर उपलब्ध करवाना होगा. साथ ही मार्केटिंग पर भी ध्यान देना होगा. दिल्ली में ही ऐसा कोई एक बुक स्टोर नहीं है, जिसमें हिन्दी की सब किताबें मिल जाएं. सोचिए कि दूसरे शहरों में क्या हाल होगा? लैंडमार्क जैसे बड़े स्टोर्स में हिंदी की किताबों का भी डिस्प्ले होना चाहिए. इस बात पर लोग मुझे उपभोक्तावादी कहकर खारिज करने की कोशिश करेंगे मगर और कोई उपाय नहीं है.

गौरव सोलंकी  

‘इच्छाधारी’ चैनलों की लीला

दिव्य दृश्य है. ऐसा ग्रह संयोग कम बनता है. दिन-रात बाबाओं स्वामियों और ज्योतिषाचार्यों की जय-जयकार करने वाले समाचार चैनलों ने अचानक इच्छाधारी बाबाओं और स्वामियों के खिलाफ अभियान-सा छेड़ दिया है. इसे समय का फेर ही कहना चाहिए कि चैनल इच्छाधारी बाबाओं और स्वामियों के अन्त:पुर की कहानियां चटकारे ले-लेकर बता रहे हैं. बाबाओं के सेक्स रैकेट, आपराधिक नेटवर्क और नैतिक पतन से लेकर आम जनता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता (कृपालु महाराज प्रकरण) को लेकर उनकी खूब लानत-मलामत की जा रही है.

धरम-करम के कारोबार में बराबरी के हिस्सेदार हिंदी समाचार चैनल अपनी वर्तमान मुहिम को और कितना आगे ले जा पाएंगे?

वजह चाहे जो हो लेकिन चैनलों की सक्रियता का असर हुआ है. तमाम बाबाओं, स्वामियों और महाराजों को अपनी पोल खुलने का डर सताने लगा है. अयोध्या के साधुओं ने फैसला किया है कि वे महिला भक्तों से अकेले में नहीं मिलेंगे. ऐसे में, चैनलों के रुख से एक क्षीण-सी ही सही लेकिन उम्मीद जगती है कि वे अपनी इस मुहिम में डटे रहेंगे और उनके कैमरों की निगाहें उन बाबाओं, स्वामियों और गुरुओं की ओर भी जाएंगी जो अभी भी धर्म की आड़ में तमाम गैर कानूनी धंधे कर रहे हैं. लोगों को ठग रहे हैं. लेकिन यह आशंका भी है कि तारों-ग्रहों और धरम-करम के धंधे में खुद भी शामिल चैनल इस मुहिम को और कितना आगे ले जा पाएंगे?

आशंका बेबुनियाद नहीं. क्या यह सच नहीं कि जिन चैनलों को आज अचानक इच्छाधारी बाबाओं, स्वामियों, महाराजों के पतित और पथभ्रष्ट होने का दिव्य ज्ञान हुआ है वे खुद ऐसे बाबाओं, बापुओं, स्वामियों, महाराजों आदि को अपने चैनलों पर बैठाकर उनका महिमा-मंडन करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं? असल में चैनलों की बाबाओं, स्वामियों आदि में अटूट आस्था अब भी बनी हुई है. आश्रम में 63 महिलाओं और बच्चों की भगदड़ में मौत के मामले में आपराधिक असंवेदनशीलता बरतने और उससे पहले बलात्कार के आरोपों में घिरे होने के लिए जिन कृपालु महाराज की इतनी लानत-मलामत की जा रही है वे देश के सर्वश्रेष्ठ चैनल पर अब भी बिला नागा सुबह साढ़े छह बजे भक्तों को प्रवचन दे रहे हैं.

यही नहीं, बाबाओं, स्वामियों आदि की करतूतों के बारे में होने वाली गर्मागर्म चर्चाओं में भी फैसला तमाम गणमान्य और पहुंचे हुए संत, बाबा, स्वामी आदि ही कर रहे हैं. चैनलों के घाट पर इनकी भीड़ लगी हुई है. वे दर्शक को आश्वस्त करने में लगे हैं कि फिलहाल जो कुछ मामले सामने आए हैं, वे गेरुआ पहनकर धरम-करम के पवित्न क्षेत्न में घुस आए गिने-चुने ढोंगियों और कपटियों की करतूतें हैं, बस कुछ अपवाद, बाकी सब बिलकुल ठीक और कुशल से है. आश्चर्य नहीं कि चैनल भी उन्हीं बाबाओं, स्वामियों आदि के खिलाफ खोजी रिपोर्टें दिखाने में जुटे हुए हैं जो न सिर्फ छोटी मछलियां हैं बल्कि जिनका भंडाफोड़ चैनलों की खोजी पत्नकारिता के कारण नहीं, आपसी प्रतिद्वंद्विता और पुलिस कार्रवाई के कारण हुआ है. यही नहीं, अगर इच्छाधारी बाबा भीमानंद या स्वामी नित्यानंद के मामले में सेक्स का एंगल नहीं होता तो शायद ही चैनल इन मामलों में इतनी दिलचस्पी लेते.

सच्चाई यह है कि एकाध अपवादों को छोड़कर अधिकांश हिंदी समाचार चैनल खुद भी इच्छाधारी प्रतीत होते हैं. काल, कपाल, महाकाल से लेकर स्वर्ग की सीढ़ी तक और तेज तारे से लेकर तीन देवियां तक ये इच्छाधारी चैनल भांति-भांति के रूप धरते रहे हैं. एक चैनल ने तो सिर्फ ऐसे ही कार्यक्रमों के जरिए वह ख्याति हासिल कर ली है कि बड़े-बड़े  बाबा, स्वामी आदि उसके संपादकों के आगे पानी भरें. क्या नहीं है उस इच्छाधारी चैनल पर? मृतात्माओं से मुलाकात, काला जादू और भूत-प्रेत से लेकर सृष्टि ख़त्म हो जाने की भविष्यवाणियों तक उसकी लीलाओं ने बाबाओं, स्वामियों आदि को भी शर्मिंदा कर दिया है. उसका प्राइम टाइम अंधविश्वास, जादू-टोने और झाड़-फूंक पर टिका है. मजे की बात यह है कि वही चैनल इन दिनों इच्छाधारी बाबा और स्वामी नित्यानंद के किस्से सॉफ्ट पोर्न के रूप में चटकारे ले-लेकर दिखा रहा है. कई और चैनल उससे बराबरी की टक्कर में हैं.

दरअसल, चैनल भी उस विशाल धर्म उद्योग के हिस्से बन गए हैं जो आम लोगों की आस्थाओं का दोहन करके खड़ा हुआ है. अरबों रुपए के इस उद्योग के विस्तार और उसकी ब्रांडिंग में चैनलों ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अपने नागरिकों को एक बेहतर जीवन और सामाजिक सुरक्षा दे पाने में भारतीय राज्य की विफलता की कब्र पर धर्म उद्योग का यह कारोबार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है. इसे सत्ता और कॉर्पोरेट जगत का पूरा समर्थन हासिल है. चैनल इस कारोबार में बराबर के हिस्सेदार हैं. उन्हें कृपालु महाराजों की प्रतिष्ठापना के बदले करोड़ों रुपए मिल रहे हैं. लेकिन बाकी उद्योगों की तरह इस उद्योग में भी बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अपराधीकरण बढ़ रहा है. उद्यमी स्वामी, बाबा लोग कारोबार को नए-नए क्षेत्नों (सेक्स और नशा व्यापार) में ले जा रहे हैं. इसमें न तो कोई नई बात है और न ही हैरान करने वाला कुछ है. ऐसे में, कुछ दिनों में चैनल फिर बाबाओं, स्वामियों आदि की सेवा में नजर में आएं तो आश्चर्य क्यों होना चाहिए?

आनंद प्रधान 

हुसेन चले गए सरस्वती को बचा लें

मकबूल फिदा हुसेन अब कतर के नागरिक हैं. हालांकि इस दस्तावेजी नागरिकता से उनकी भारतीयता खत्म नहीं हो जाएगी. वे चाहें तो भी यह मुमकिन नहीं है. अपनी कोख, भाषा और मिट्टी हम चुनते नहीं, वह हमारी पैदाइश के साथ चली आती है. बाद में हम जो हो जाएं, जहां चले जाएं, जैसी भी बोली बोलने लगें, चाहे जिस भी देश की नागरिकता ले लें, हमारी बनावट और बुनावट तय करने वाले गुणसूत्र वही रहते हैं, हमारा मुल्क वही रहता है. 

जिस मुल्क को उसके लेखक और कलाकार छोड़कर चले जाते हैं वह बदनसीब होता है, और इस अर्थ में असुरक्षित भी कि वहां आतताइयों और फासीवादियों का कब्जा बढ़ने का अंदेशा बड़ा होता जाता हैमकबूल फिदा हुसेन नाम का कलाकार भी इन्हीं गुणसूत्नों की देन है. उसे पंढरपुर के तीर्थ की मिट्टी ने बनाया है, उसे जैनब की कोख ने बनाया है, उसे हिंदी की फिल्मों ने बनाया है. जिस कला ने उसे शोहरत दी उसके रंगों में, उसकी रेखाओं में यह पूरी परंपरा तरह-तरह से बोलती है. कतर में भी वे जो काम करेंगे उसमें हिंदुस्तान बोलेगा. हालांकि शायद तब वह उतना चटख न रह जाए. क्योंकि अंतत: अपनी अनुपस्थिति की कीमत उन्हें कुछ तो चुकानी ही होगी.

लेकिन अनुपस्थिति की ऐसी नौबत आई क्यों? यह एक मासूम सवाल लग सकता है, क्योंकि सबको मालूम है कि मकबूल फिदा हुसेन के बनाए कुछ चित्रों से नाराज समूहों ने उनके विरुद्ध मुकदमों और प्रदर्शनों की झड़ी लगा रखी थी. लेकिन हुसेन सिर्फ इस असहिष्णुता से घबराकर भागे हों, ऐसा लगता नहीं. वे खुद मानते और बताते हैं कि 99 फ़ीसदी भारतीय उनके साथ खड़े हैं. फिर हुसेन ने अपने विरुद्ध खड़ी कट्टरपंथी ताकतों से संघर्ष क्यों नहीं किया? उनका कुछ बेबसी भरा जवाब यह है कि वे 40 के होते तो करते, 95 बरस की उम्र में उनके पास न इतना वक्त बचा है न सब्र कि अपने बाकी काम छोड़कर यह लड़ाई लड़ें. कतर ने उन्हें सहूलियतें दीं और साधन दिए इसलिए वे कतर के हो गए.

अब इस प्रश्न को दूसरी तरफ से पूछना चाहिए. भारत अपने एक कलाकार को रोक क्यों नहीं सका? और क्या हुसेन अकेले कलाकार हैं जो भारत छोड़कर चले गए और किन्हीं और देशों के हो गए? ध्यान दें तो ऐसे अनेक भारतीय मूर्धन्य हैं जिन्होंने अपनी कला और साधना के लिए पश्चिम को चुना है. भारतीय संगीत और नृत्य से जुड़े कई बड़े गुरु  विदेशों में बसे हुए हैं. हुसेन आज पराये हुए, सितारवादक पंडित रविशंकर न जाने कब से पराये हैं. यही बात फ्रांस में रह रहे सैयद हैदर रजा के बारे में कही जा सकती है. इन लोगों का परायापन चलेगा क्योंकि यह किसी असंतोष से पैदा हुआ परायापन नहीं है, यह बात कुछ जमती नहीं.

बहरहाल, क्या हम हुसेन की, रजा की या किसी दूसरे बड़े मूर्धन्य की कमी महसूस करते हैं? क्या हमारा समाज अपने कलाकारों और गुरुओं के बिना कोई ख़ला, कोई खालीपन महसूस करता है? हुसेन के संदर्भ में यह तर्क हाल के दिनों में कई बार सुनने को आया है कि अगर हुसेन हिंदुस्तान के न भी रहें तो क्या फर्क पड़ेगा? वैसे भी हुसेन इन दिनों बाजार के, बॉलीवुड की सस्ती चमक-दमक के और अपनी शोहरत के गुलाम की तरह कहीं ज्यादा चित्र बना रहे थे, एक ऐसे मेधावी भारतीय की तरह कम जिसका भारतीय समाज से सीधा संवाद हो. लेकिन यह आरोप सिर्फ हुसेन पर क्यों? क्या हमारी समूची समकालीन चित्रकला अपने समाज में कोई जगह बनाने के लिए बेताब दिखती है? उसे आम तौर पर गुण ग्राहक दर्शकों से ज्यादा गांठ के पूरे ग्राहकों की तलाश रहती है जो उसके नाम पर बड़ी रकम का टैग लगा सकें. हाल के वर्षों में भारतीय चित्रकारों के नाम जब भी सार्वजनिक चर्चा में आए हैं तो बस यह बताते हुए आए हैं कि सदेबी या क्रिस्टी में किसी ग्राहक ने उनका कितना बड़ा मोल लगाया है.

राजनीतिक व्यवस्था बताती है कि हुसेन भारत लौटने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें यहां पूरी सुरक्षा दी जाएगी. वह व्यवस्था यह नहीं समझती कि मामला किसी खास नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराने का नहीं, स्वतंत्रता का एक ऐसा माहौल बनाने का है

कमोबेश यही बात संगीत गुरुओं के बारे में कही जा सकती है. उनकी स्थिति बस इस लिहाज से बेहतर है कि उनके कैसेट और सीडी-डीवीडी हिंदुस्तान चले आते हैं, वरना उनके कंसर्ट अक्सर विदेशों में या फिर बड़े भारतीयों के बीच होते हैं. वे ग्रैमी और ऑस्कर के लिए जाना जाना ज्यादा पसंद करते हैं. सवाल है, यह किसका कसूर है? क्या कलाकारों का, जो अपने समाज और देश के प्रति उस तरह निष्ठावान नहीं हैं जिस तरह उनके होने की अपेक्षा हम उनसे कर रहे हैं? या फिर समाज का, जिसमें अपने कलाकारों को प्रेरित कर सकने लायक ऊर्जा और ऊष्मा नहीं बची है?

इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. कुछ अफसोस के साथ हमें यह मानना पड़ता है कि हाल के वर्षों और दशकों में भारतीय समाज की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना कुंद पड़ी है. इस दौर में पैदा हुई नई उपभोक्तावादी भूख ने उसकी प्राथमिकताएं जैसे बदल दी हैं. संगीत के लिए उसकी कॉलर ट्यून है, चित्रों के लिए उसके स्क्रीनसेवर हैं, नाटक की जगह वह कॉमेडी सर्कस और रियलिटी शो देखता है और मनोरंजन और संस्कृति की बची-खुची जरूरत फिल्मों से पूरी कर लेता है. इस सांस्कृतिक शून्य में सतही राजनीति उसे समझती है कि साहित्य और धर्म का मतलब क्या होता है, कला और देश का मतलब क्या होता है. जब यह सतही राजनीति हमारे सांस्कृतिक मूल्य निर्धारित करने लगती है तो वह कलाकार का धर्म देखती है, कला के आवरणों को समझने की जगह निरावत्त सरस्वती और भारत माता को देखकर उत्तेजित होती है और कलाकार से पूछती है कि वह किसी दूसरे धर्मगुरु  की तस्वीर क्यों नहीं बनाता.

कलाकार इस सवाल का जवाब कैसे दे? कैसे बताए कि कला की प्रेरणाओं के पीछे धर्म के ऐसे सुचिंतित आग्रह नहीं होते? किसे बताए कि उसने जो चित्र बनाए हैं वे उस तरह अश्लील या नग्न नहीं जिस तरह प्रचारित किए जा रहे हैं. वे बस चित्रकला की बहुत आम परंपरा के प्रयोग हैं जिसमें नग्नता कहीं से वर्जित नहीं है और न ही वह अश्लील नजर आती है.

अगर समाज इन प्रयोगों से परिचित होता तो वह शायद बहस कर पाता कि ये चित्र अच्छे हैं या नहीं. हुसेन के अपने कृतित्व में सीता, सरस्वती या भारत माता जैसे चित्रों की जगह कितनी है. तब शायद उसे यह भी मालूम होता कि हुसेन ने सिर्फ ऐसे चित्र ही नहीं बनाए हैं; इनसे कई गुना ज्यादा ऐसे देवी-देवताओं को चित्रित किया है जो हमारी परंपरा का सुरुचिपूर्ण और कलात्मक विस्तार करते हैं. उन्होंने ऐसे गणेश बनाए हैं जो लुभाते हैं, ऐसी सरस्वती भी चित्रित की है जो श्रद्धा जगाती है, अपनी मां की तलाश करते-करते हुसेन मदर टेरेसा तक पहुंच गए हैं और नीली कोर वाली उजली साड़ी में उन्होंने करुणा की ऐसी मूरतें बनाई हैं जिनके सामने सिर झुकाने की इच्छा होती है.

यह सब मालूम होता तो समाज अपने कलाकार का ज्यादा सम्मान करता. जिन चित्रों को वह आपत्तिजनक मानता उनके प्रति भी क्षमाशील होता. लेकिन कलाकार और उसका समाज एक-दूसरे से अजनबी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सिर्फ एक कलाकार की स्थिति नहीं, हमारे पूरे सांस्कृतिक संसार की नियति है. यह स्थिति किसी मकबूल फिदा हुसेन को कतर जाने के लिए मजबूर करती है. राजनीतिक व्यवस्था बताती है कि हुसेन भारत लौटने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें यहां पूरी सुरक्षा दी जाएगी. वह व्यवस्था यह नहीं समझती कि मामला किसी खास नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराने का नहीं, स्वतंत्रता का एक ऐसा माहौल बनाने का है जिसमें कोई आदमी आजादी से घुम-फिर सके, लिख-पढ़ सके, सोच-विचार सके. जहां उसे यह डर न हो कि उसकी किताबें जलाई जाएंगी, उसकी तस्वीरें नष्ट की जाएंगी, उसकी फिल्मों के प्रदशर्न रोके जाएंगे, उसके रंगमंच के दौरान हंगामा होगा. राज्य या समाज से यह न्यूनतम अपेक्षा है जो कोई लेखक या कलाकार कर सकता है, वरना राज्य के फर्ज कहीं ज्यादा दूर तक जाते हैं; उसे कला और साहित्य को संरक्षण देने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है.

लेकिन जो व्यवस्था न्यूनतम मानवीय मूल्यों की कद्र नहीं करती उससे हम कला और साहित्य से जुड़े मूल्यों के सम्मान की उम्मीद रखें तो इसमें हमारी नादानी झांकती है. दुर्भाग्य से अभी जो कुछ हो रहा है, वह इन अपेक्षाओं का विलोम है. हमारी लोकतांत्रिक आजादी पर दबाव बढ़े हैं; हमारी अभिव्यक्ति पर पहरे कड़े हुए हैं. जो लोग हुसेन से यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्होंने संघर्ष किए बिना कट्टरपंथियों से हार मान ली, उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने एक दूसरे बूढ़े, रंगकर्मी हबीब तनवीर के संघर्ष में कितना साथ दिया था. हबीब के नाटकों पर लगातार हमले हुए. उन्हें बचाने कौन आया? बांग्लादेश की एक लेखिका हमसे सम्मानजनक शरण मांग रही है; हम वह देने को तैयार नहीं हैं.

यह सिर्फ कला-संस्कृति का नहीं, पूरे समाज के प्रति सरोकार और संवेदनशीलता का मामला है. जिस व्यवस्था में यह संवेदनशीलता नहीं होती उसमें फासीवादी ताकतों की गुंजाइश बढ़ती जाती है. दुर्भाग्य से हमारी व्यवस्था इसी दिशा में बढ़ रही है. कतर जाने का फैसला मकबूल फिदा हुसेन की मजबूरी हो या मंशा, इसमें जितनी उनकी दरारें दिखती हैं, उससे ज्यादा हमारे समाज की. 95 साल की उम्र में जिस बूढ़े को अपना घर छोड़ना पड़े वह एक बदनसीब बूढ़ा होता है. लेकिन जिस मुल्क को उसके लेखक और कलाकार छोड़कर चले जाते हैं वह कहीं ज्यादा बदनसीब होता है, और इस अर्थ में असुरक्षित भी कि वहां आतताइयों और फासीवादियों का कब्जा बढ़ने का अंदेशा बड़ा होता जाता है. अब हुसेन नहीं हैं तो हमारी सरस्वती कहीं ज्यादा खतरे में है.   

प्रियदर्शन
 

आदर्श नहीं पर जरूरी

मई, 2008 में जब अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर संप्रग सरकार चौतरफा वार झेल रही थी तब वामदलों को खुश करने के मकसद से आनन-फानन में महिला आरक्षण के लिए जरूरी संविधान संशोधन बिल राज्यसभा में पेश कर दिया गया. दो महीने बाद ही परमाणु करार पर विश्वास मत के दौरान वामपंथियों की जगह समाजवादी पार्टी ने ले ली जो महिला आरक्षण की धुर विरोधी है. फिर अगले दो साल तक इस विधेयक की किसी को याद तक नहीं आई. पिछले दिनों जब महंगाई के मुद्दे पर समूचा विपक्ष एकजुट हो सरकार की नाक में दम किए दे रहा था तो उसे एक बार फिर से इस संविधान संशोधन विधेयक की उपयोगिता याद आ गई जिसने पलक झपकते ही सारी विपक्षी एकता को हवा कर दिया.

अब बिल राज्यसभा में जैसे-तैसे पारित तो हो गया है मगर यह महिला आरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए उद्धत होना भर है. अभी तो इसे सबसे पहले लोकसभा द्वारा पारित किया जाना है. चूंकि राज्यसभा में नहीं बल्कि महिला आरक्षण को लोकसभा में ही लागू होना है और इसके धुर विरोधी तीनों दलों – सपा, राजद और जदयू – के मुखिया भी इसी सदन से आते हैं, इसलिए यहां विरोध के कुछ और नए आयाम देखने को मिल सकते हैं. इसके बावजूद यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो फिर अति महत्वपूर्ण होने के नाते इसका देश के आधे राज्यों की विधायिकाओं -14- द्वारा अनुमोदन किया जाना जरूरी है. चूंकि इस बिल से इन विधायिकाओं की भी 33 फीसदी सीटें महिलाओं के हाथों में जानी हैं, इसलिए लोकसभा वाला मंजर हमें एक-एक कर 14 बार यहां भी देखने को मिल सकता है. सभी राज्यों को ऐसा कितने समय में करना है इसकी भी कोई सीमा संविधान में नहीं बताई गई है. मान लें कि यह भी कुछ सालों में हो जाता है तो फिर यह विधेयक पहले राष्ट्रपति के पास जाएगा और उसके बाद इस संविधान संशोधन विधेयक की भावनाओं से मेल खाता एक महिला आरक्षण विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित किया जाएगा. तब कहीं जाकर इसका पालन करने के लिए जरूरी संस्थाओं और नियमों के निर्माण का कार्य शुरू होगा.

एक अध्ययन के मुताबिक पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के इतर भी अब काफी महिलाएं चुनकर आने लगी हैं. यह परिघटना लोकसभा और विधानसभाओं पर भी लागू हो सकती है. यानी संसद या विधायिका में महिलाओं की संख्या बढ़कर 45-50 फीसदी या और ज्यादा भी हो सकती है. यही बात पुरुष सांसदों के गले नहीं उतर रही. आज लालू, मुलायम और शरद यादव महिलाओं की हिस्सेदारी के प्रति अपनी सद्भावनाओं का ढिंढोरा पीटते हुए पिछड़ों की जरूरतों का ध्यान रखने की दुहाई दे रहे हैं, मगर जब उनकी ही मदद से पिछड़ों को केंद्रीय नियुक्तियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण दिया जा रहा था तब उन्हें पिछड़ी महिलाओं की याद क्यों नहीं आई? आलोचना इस बात को लेकर भी की जा रही है कि चूंकि आरक्षित सीटें अलग-अलग समय में अलग-अलग होंगी, इसलिए जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों पर ध्यान देना कम कर देंगे. मगर महिलाएं अनारक्षित होने पर उसी सीट से अपना दावा ठोंकने के लिए और ज्यादा मेहनत भी तो कर सकती हैं और पुरुष पांच साल बाद दुबारा दावा ठोंकने के लिए ऐसा कर सकते हैं.

संजय दुबे

सनी का ‘सुनहरा’ दौर! : राइट या रांग

फिल्म राइट या रांग

निर्देशक
नीरज पाठक

कलाकार सनी देओल, इरफान, ईशा कोप्पिकर

फिल्म का पहला दृश्य पूरी लगन से कोशिश करता है कि आप फिल्म के बारे में बुरी राय बना लें. इसके बाद बेवजह एक आइटम गीत आता है, जो इस तरह की थ्रिलर फिल्मों का जरूरी हिस्सा बन गया है और जिसमें बहुत-सारी विदेशी लड़कियां बहुत कम कपड़ों में बार के किसी खंभे के इर्द-गिर्द नाचती हैं. उसके बाद दीपल शॉ इरफान और सनी देओल के साथ कुछ गैर कानूनी काम करते गुंडों को मिलाकर (यह ‘कुछ’ कभी समझ में नहीं आता) दस-पंद्रह या शायद इससे भी ज्यादा मिनट का, पीछा करने वाला सीक्वेंस रचा गया है. हां, इस बात का हमेशा की तरह खयाल रखा गया है कि सनी जब भी घूंसा या गोली मारें, आदमी पांच फीट ऊपर उछलकर आठ फीट दूर जाकर गिरे. और जब भी हमारे दोनों पुलिसवाले नायक किसी गुंडे को मारकर निकलते हैं तो उनके स्टाइल से चलने को स्लो मोशन में दो-दो मिनट दिखाना तो बनता ही है बॉस!

फिर बहुत-सारी चीजें बेमन से इस तरह बारी-बारी से पेश की जाती हैं, जैसे नागरिक शास्त्र के किसी प्रश्न के उत्तर के बिंदु लिखने हों. इसी क्रम में ईशा और उनके बेटे से हमारा परिचय होता है. बेटे को आगे बहुत काम आना है. पिता को उनकी जिम्मेदारियां याद दिलाते रहनी हैं और कई लंबे और खोखली भावुकता से भरे दृश्यों को हम मासूमों पर थोपना है. बेवकूफ खलनायकों को छोड़कर सब किरदार एक जितने मानसिक स्तर के हैं और इसी फेर में वह बच्चा भी बड़े-बड़े और भयंकर डायलॉग बोलता है. फिल्म की पटकथा इतनी सतही है कि आखिर में काम लेने के लिए जो सूत्न शुरू में छोड़े जाते हैं उन्हें आप बिना चाहे ही पकड़ लेते हैं.

आप सोचते रहते हैं कि कोंकणा ने ऐसा रोल जाने क्यों किया होगा. इरफान तो खराब फिल्मों में भी अपने हिस्से की तालियां बटोर ही लेते हैं. वही हैं जो टीवी सीरियल की गति वाली इस थ्रिलर में आपको दो-तीन बार खुलकर हंसने का मौका देते हैं.

कुछ फिल्मों को अपने साधारण होने का अंदाजा होता है. मगर यह उन फिल्मों में से है जो अपने महत्व को कई गुना बढ़ाकर आंकती हैं और इस गुमान में रहती हैं कि उन्होंने एक नई नैतिक बहस को जन्म दिया है और फिर नया समाधान निकाला है. इसके निर्देशक नीरज पाठक ‘परदेस’ के लेखक थे. जिन एकाध अच्छे दृश्यों पर कैमरा भड़ाम-धड़ाम म्यूजिक के साथ आत्ममुग्ध होकर रुक जाता है उन्हें देखकर लगता है कि नीरज के लिए समय भी नब्बे की फॉर्मूला फिल्मों में ही रुका रह गया है.

बहरहाल, अगर आपका काम हर शुक्रवार समीक्षा लिखना नहीं है तो क्यों बेकार में परेशान होते हैं? फिल्में देखना इतना भी जरूरी नहीं.

गौरव सोलंकी

 

मानुस पर नए मानस की तलाश

अपने बेपरवाही भरे अंदाज में जितेंद्र झानवले ने एक घंटे के भीतर 30वीं बार फोन कान से लगाया.  ‘ठीक है, कितने? कहां गया वो?’, कहकर जल्दी से फोन काटा और फिर कुछ लोगों से मुखातिब हुए जो उनके पैर छूने के लिए झुक रहे थे. 30 के करीब इन लोगों में से बहुतों के गले में सोने की चेनें और हाथों में कई अंगूठियां थीं. किसी आम दिन ये सभी लोग बांद्रा और अंधेरी के बीच के इलाके का जिम्मा उठाने वाले शिवसेना कार्यकर्ता झानवले के एक इशारे पर जरा-सी देर में हंगामा खड़ा कर देते. मगर आज उनके हाथ बंधे थे. इसलिए क्योंकि वे बांद्रा पुलिस स्टेशन के भीतर थे जहां उन्हें घेरे पुलिसकर्मियों का काम आज बस यही था कि वे किसी भी तरह झानवले और उनके झुंड को रोके रखें. ऐसा नहीं होता तो उन्होंने कांग्रेस महासचिव और शिवसेना के निशाने राहुल गांधी को परेशान करने के तरीके ढूंढ़ ही लिए होते जो उस दिन मुंबई आए हुए थे. झानवले अपने काम में कितने दक्ष हैं यह इसी से समझ जा सकता है कि बांद्रा पुलिस ने जल्दी से जल्दी उन्हें अपने शिकंजे में ले लिया ताकि उन्हें गांधी से जितना हो सके दूर रखा जा सके.

बाकी मुंबई और महाराष्ट्र अब भी शिवसेना के लिए दूर की दुनिया लगता है. दरअसल, मुंबई के भीतर कई मुंबई हैं. मुंबईकर तो बस एक क्षेत्रीय पहचान है. इस महानगर में कई भाषाएं हैं, कई संस्कृतियां हैं. मगर उन सभी को सिर्फ इसी एक बात से फर्क पड़ता है कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी ठीक से चलती रहेशिवसेना, जिसके लिए झानवले काम करते हैं, बाल ठाकरे ने जून, 1966 में बनाई थी. लंबे समय तक इस दक्षिणपंथी पार्टी को उन हमलों के लिए जाना जाता रहा जो यह ऐसे लोगों पर बोलती थी जो इसके हिसाब से इसके खिलाफ थे. लेकिन अब इसके सामने खुद की राजनीति बदलने की मजबूरी खड़ी है. मराठी पहचान का मुद्दा इसे अब वह फायदा नहीं दे रहा जो पहले देता था. सामने एक दोराहा है और आगे किस रास्ते पर बढ़ा जाए इसपर पार्टी में बहस जारी है.

इस बहस का एक हिस्सा यह भी है कि कैसे अपने हमलावर तेवर थोड़ा कम किए जाएं और पार्टी को नए लोगों से जोड़ा जाए. शाहरुख खान मुद्दे पर इसके रुख और पिछले कुछ समय से सूचना-तकनीकी (आईटी) के प्रति इसके झुकाव को देखकर यह बात समझी जा सकती है. हालांकि बाहर से तो ऐसा लग रहा था कि सेना ने खान के साथ पूरी तरह से टकराव का रास्ता अख्तियार कर रखा है मगर पार्टी, महाराष्ट्र कांग्रेस और राज्य प्रशासन में अंदरूनी लोगों से मिली जानकारियां बताती हैं कि बाल ठाकरे और शाहरुख खान के बीच मुलाकात लगभग तय हो गई थी. बताया जाता है कि समझौता हो जाए इस बारे में मिल-बैठकर बात करने के लिए ठाकरे के निवास मातोश्री और खान के बंगले मन्नत के बीच 20 बार फोन पर बातचीत हुई.

सेना के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक जैसे ही ऐसा लगने लगा कि चीजें सुलझ जाएंगी तभी खान ने बातचीत तोड़ दी. कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि नई दिल्ली में पार्टी हाईकमान को चिंता थी कि शिवसेना के विरोध के मद्देनजर मुंबई में राहुल गांधी की लोकल ट्रेन यात्रा से उसे जो फायदा हुआ है, खान और ठाकरे की मुलाकात से वह कहीं खत्म न हो जाए. समझा जा रहा है कि कांग्रेस नहीं चाहती थी कि शांति का श्रेय, भले थोड़ा ही सही, ठाकरे परिवार को चला जाए. खान तक संदेश पहुंचा दिया गया कि वे ठाकरे से दूर रहें और खान देश से बाहर चले गए.

इस बात से कि शिवसेना खान के साथ शांति समझौता करने की पूरी कोशिश कर रही थी, पार्टी के भविष्य की संभावित राह का पहला संकेत मिलता है.  कांग्रेस के अड़ंगा लगाने के बाद यह नहीं हो सका लेकिन इसके बावजूद सेना ने मुंबई में कोई खास उत्पात नहीं मचाया. सिर्फ अंधेरी में एक घटना हुई जिसमें कुछ सेना कार्यकर्ताओं ने एक सिनेमा हॉल पर पत्थर फेंके.

दूसरा संकेत है आईटी को लेकर शिवसेना का नजरिया. अपना मुद्दा उछालने के लिए पार्टी पारंपरिक रूप से सड़कों को प्राथमिकता देती रही है. लेकिन अब सेना की एक आईटी विंग बन रही है जो तीन चीजों पर ध्यान देगी. पहली, आईटी सेक्टर में ज्यादा से ज्यादा मराठी आएं. दूसरी, पार्टी कैडर को आईटी का प्रयोग सिखाया जाए और तीसरी, इंटरनेट के इस्तेमाल के जरिए पार्टी का विस्तार. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपनी बेबसाइट बनाने और भविष्य की लड़ाइयों के हिसाब से तैयार रहने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. सेना को उम्मीद है कि आईटी के प्रति यह दोस्ताना रवैया युवा मराठियों को आकर्षित कर सकता है और वे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की बजाय उसके पाले में आ सकते हैं.

फिलहाल मनसे और शिवसेना के वोटर एक ही हैं. राज की ज्यादातर योजनाएं और गतिविधियां सेना के कोंकण जैसे पूर्व गढ़ों पर केंद्रित रही हैं. जब भी वे कुछ करते हैं तो ये काफी हद तक सेना को चोट पहुंचाने के लिए ही होता है

बदलाव आ रहा है यह बात दादर स्थित पार्टी मुख्यालय शिवसेना भवन से भी समझी जा सकती है. हालांकि इसमें अब भी दूसरी पार्टियों के नई दिल्ली स्थित मुख्यालयों जैसी बात नहीं है जहां के विशाल खुले प्रांगणों में लोगों का हुजूम टूटा पड़ता है. सेना भवन में सिर्फ उन्हीं को प्रवेश मिलता है जो या तो वहां काम करते हैं या फिर जिनका वहां आने का कार्यक्रम पहले से तय होता है. भीतर जाने पर मैं पाता हूं कि यह बहुत ही साफ-सुथरा है. यहां एक कॉल सेंटर भी है. महिलाएं काली टीशर्ट में नजर आती हैं जिनमें बाईं तरफ शिवसेना का चुनाव चिह्न तीर-कमान भगवा रंग में छपा हुआ है.

मैं रिसेप्शनिस्ट को अपना कार्ड थमाता हूं. उसके द्वारा इसपर दर्ज जानकारी डेटाबेस में दर्ज की जाती है और तुरंत ही मेरे फोन पर मराठी में एक स्वागत संदेश आ जाता है. हर मंजिल पर फ्लैट स्क्रीन टीवी सेट लगे हैं. कैडर को टीवी देखने की मनाही नहीं, बस क्या देखना है और क्या नहीं, इस बारे में अपनी समझ से सावधानी रखने का निर्देश है. यहां मौजूद लोगों से बात करने पर पता चलता है कि अकसर वे क्रिकेट मैच का सीधा प्रसारण ही देखते हैं. पांचवीं मंजिल की लॉबी में आज करीब 30 लोग हैं. इनमें से कुछ भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच चल रहा टेस्ट मैच देख रहे हैं. सचिन तेंदुलकर, जिनके एक बयान की कुछ समय पहले बाल ठाकरे ने आलोचना की थी, जल्दी आउट हो जाते हैं. शिव सैनिक टीवी बंद कर देते हैं.

इससे कई मील दूर जोगेश्वरी में पहली बार सेना के टिकट पर विधायक बने रविंद्र वाइकर एक नई संस्कृति के निर्माण में लगे हैं. जोगेश्वरी वही जगह है जहां बाबरी विध्वंस के एक महीने बाद 1993 में कुछ हिंदू परिवारों की झोपड़ियों को आग लगा दी गई थी. इस घटना में पांच महिलाओं सहित छह लोग मारे गए थे. इससे हिंसा भड़क गई थी और दो हफ्ते तक शिव सैनिक पूरी मुंबई में अलग-अलग जगहों पर मुसलमानों को निशाना बनाते रहे थे. ये घटनाएं अब इतिहास में मुंबई दंगों के नाम से दर्ज हो गई हैं. जोगेश्वरी में बेरोजगारों की संख्या काफी थी जिनकी व्यवस्था से नाराजगी शिवसेना को काफी कैडर उपलब्ध करा देती थी. तब इसे मुंबई का मैला हिस्सा कहा जाता था.

अब उसी जोगेश्वरी की तस्वीर बदल रही है. वाइकर चार बार म्युनिसिपल कॉरपोरेटर रह चुके हैं और अब जोगेश्वरी ईस्ट से विधायक हैं. वे कहते हैं, ‘आप इसे देखिए. क्या आपको विश्वास होता है कि यह वही जोगेश्वरी है.’ यहां तीन विशाल और साफ-सुथरे पार्क हैं जिनका नामकरण 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए हमले में शहीद पुलिस अधिकारियों हेमंत करकरे, अशोक काम्टे और विजय सालस्कर के नाम पर हुआ है. जोगेश्वरी के प्रवेश द्वार पर ही सड़क किनारे एक चमचमाता गणपति मंदिर बना हुआ है. मंगलवार की शाम है और मंदिर में खचाखच भीड़ है. यह देखकर हैरत होती है कि यहां जमा लोगों में से ज्यादातर युवा हैं. वाइकर कहते हैं, ‘हम ऐसे तरीके खोज रहे हैं जिनसे युवा पीढ़ी का ध्यान खींचा जा सके. सत्ता में होने पर हमारी व्यस्तता वादे पूरे करने की दिशा में होती है. जब सत्ता नहीं होती तो हमें पता नहीं होता कि हम क्या करेंगे. इससे कैडर में बेचैनी पैदा हो जाती है. चाहें तो अब भी हम दस हजार लोग इकट्ठा कर सकते हैं मगर अब हम उन फौरी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जिनसे लोगों पर फर्क पड़ता है.’

ऐसा लगता है कि वाइकर मानुस मुद्दे पर समझदारी के साथ काम कर रहे हैं. गणपति मंदिर की छत पर खुली जगह में एक क्लास चल रही है. इसमें करीब 150 छात्र हैं. एक शिक्षक उन्हें टिप्स दे रहा है कि बोर्ड परीक्षाओं में मराठी में ज्यादा से ज्यादा अंक कैसे हासिल किए जा सकते हैं. शिक्षक के पास एक माइक है और स्पीकर के जरिए उसकी आवाज हर छात्र तक पहुंच रही है- ‘आज तक किसी ने भी मराठी में 100 फीसदी अंक हासिल नहीं किए हैं. तुमको यह उपलब्धि हासिल करने वाला पहला छात्र बनना है.’ छात्रों के एक तरफ शिवाजी की प्रतिमा और कुछ समय पहले दिवंगत हुईं बाल ठाकरे की पत्नी मीनाताई की फ्रेम जड़ी और माला लगी तस्वीर दिखती है.

वाइकर का एक आदमकद पोस्टर भी लगा है. यह सेना का नया स्वरूप है. वाइकर के लोगों को जोगेश्वरी की हर चाल और इसमें रहने वाले हर आदमी की जरूरतों का काफी कुछ पता है. वाइकर के दफ्तर को मालूम है कि जोगेश्वरी में कितनी विधवाएं या अनाथ बच्चे रहते हैं, या फिर वहां रहने वाले कितने लोगों के कोई औलाद नहीं है. मंदिर में रोज बूढ़ी महिलाओं को मुफ्त खाना मिलता है. मंदिर के पास ही जॉगिंग के लिए ट्रैक और एक छोटी-सी झील बनाई गई है. रात को यहां घूमने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती है. हालांकि भीतर से जोगेश्वरी अभी भी खचाखच भरा है. मगर बाहर से इसकी तसवीर बदल रही है.

मगर बाकी मुंबई और महाराष्ट्र अब भी शिवसेना के लिए दूर की दुनिया लगता है. दरअसल, मुंबई के भीतर कई मुंबई हैं. मुंबईकर तो बस एक क्षेत्रीय पहचान है. इस महानगर में कई भाषाएं हैं, कई संस्कृतियां हैं. मगर उन सभी को सिर्फ इसी एक बात से फर्क पड़ता है कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी ठीक से चलती रहे. अब यह मुमकिन नहीं कि सारी मुंबई पर सिर्फ एक आदमी की सत्ता चले.

इस सबसे मराठी मानुस की पहचान को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है जो सेना का केंद्रीय मुद्दा है. 70 वर्षीय मराठी साहित्यकार दिनकर गंगल को समझ में नहीं आता कि मराठी मानुस है कौन. वे चेंबूर के पास रहते हैं और उनका ज्यादातर वक्त इसी कोशिश में गुजरा है कि महाराष्ट्रवासी और भी ज्यादा पढ़ने की आदत डालें. 1982 में उन्होंने पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करने के लिए एक यात्रा का आयोजन किया था. गंगल कहते हैं, ‘अभी कोई अगर पूछे तो मैं बता नहीं पाऊंगा कि मराठी मानुस कैसा होता है. मेरे पास सिर्फ वही प्रचलित धारणा है कि ऐसा व्यक्ति महाराष्ट्र में जन्मा और पला-बढ़ा होता है और धाराप्रवाह मराठी बोलता है.’ तो आखिर मराठी मानुस कौन है, इस बारे में बेहतर राय कायम करने के लिए गंगल का प्रस्ताव है कि मार्च में पुणे में हो रहे अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के दौरान 2000 लोगों पर सर्वे किया जाए. जैसा कि वे कहते हैं, ‘वहां दस हजार लोग इकट्ठा होंगे. यह सबसे बड़ा मराठी साहित्य आयोजन है. हम 2000 लोगों से पूछेंगे कि उनकी नजर में मराठी मानुस क्या है.’ गंगल कहते हैं कि अपने चाचा से अलग राह पर चल चुके राज ठाकरे की मनसे कुछ मराठियों के बीच ज्यादा लोकप्रिय है. वे कहते हैं, ‘बड़ी उम्र के महाराष्ट्रवासी और युवा राज की तरफ आकर्षित दिखाई देते हैं. उन्हें राज में इंदिरा गांधी की झलक दिखती है.’

फिलहाल मनसे और शिवसेना के वोटर एक ही हैं. राज की ज्यादातर योजनाएं और गतिविधियां सेना के कोंकण जैसे पूर्व गढ़ों पर केंद्रित रही हैं. जब भी वे कुछ करते हैं तो ये काफी हद तक सेना को चोट पहुंचाने के लिए ही होता है. उनके हमलावर तेवर भी वैसे ही हैं जो अतीत में शिवसेना कैडर के होते थे. हालांकि विदर्भ जैसे इलाकों के एक बड़े हिस्से में मनसे अब भी काफी कमजोर है. इसलिए हालात शिवसेना के हाथ से पूरी तरह से बाहर नहीं निकले हैं.

ऐसा भी लगता है कि मराठी मानुस के पास खुद का एक नजरिया है और शायद वह इतनी आसानी से भावनाओं में न बहे. इसका एक संकेत है 2009 में आई निर्देशक महेश मांजरेकर की फिल्म मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय. मराठी पहचान से जुड़े सवालों को संबोधित करती यह फिल्म अब तक 25 करोड़ रुपए की कमाई कर चुकी है और इसे अब तक की सबसे हिट मराठी फिल्म करार दिया गया है. इसके केंद्र में एक आम मराठी परिवार है जिसका मुखिया अपने काम और अपने बच्चों की असफलताओं से निराश है. वह अपनी मराठी पहचान के साथ-साथ अपने पुरखों को भी कोसता है कि उसने एक मराठी के रूप में जन्म लिया. इससे छत्रपति शिवाजी नाराज हो जाते हैं और ‘जाग’ जाते हैं. इसके बाद वे इस व्यक्ति के साथ बात करते हैं और कहते हैं कि दुनिया पर दोष थोपने से पहले वह अपनी गलतियां देखे कि क्यों मराठी मानुस को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इसके बाद फिल्म का केंद्रीय चरित्र अपना नजरिया बदल लेता है. महाराष्ट्र को भी उम्मीद है कि शिवसेना का नजरिया बदलेगा.

आतंकी जो थे ही नहीं

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का गठन 1986 में आतंकवाद निरोधी बल के तौर पर हुआ था. 90 के दशक के उत्तरार्ध में कई आतंकियों को मार गिराने और तमाम मामलों को सुलझने के दावों के चलते इसका नाम सुर्खियों में आना शुरू हुआ. लेकिन जल्दी ही इसके कुछ अधिकारियों पर अवैध धन उगाही और फर्जी एनकाउंटर करने के आरोप लगने लगे. वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं, ‘दुर्भाग्यवश जब भी अदालतों ने स्पेशल सेल के अधिकारियों को झूठे सबूतों के आधार पर निर्दोष लोगों को फंसाने का दोषी पाया तो उसने इन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. अगर इन्हें कठोर दंड नहीं मिलेगा तो आगे भी पुलिसवाले निर्दोष लोगों को फर्जी आतंकवादी बनाते रहेंगे.’ आंकड़े इसकी पुष्टि करते लगते हैं. पिछले चार महीनों के दौरान दिल्ली की निचली अदालतों ने स्पेशल सेल द्वारा गिरफ्तार किए गए नौ कथित आतंकवादियों को बरी कर दिया है. इनमें से चार आतंकवादियों को स्पेशल सेल ने मार्च, 2005 में एक मुठभेड़ के बाद दक्षिणपश्चिम दिल्ली से गिरफ्तार किया था. पुलिस का दावा था कि उन्होंने देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर होने वाले एक बड़े आतंकी हमले को टाला था. चार साल बाद ये चारों लोग बरी हो गए. इन्हीं चार लोगों की कहानी बयान कर रहे हैं बृजेश पांडे

भरोसा ही नहीं हुआ कि आतंकी का ठप्पा हट गया

दिलावर खान, मौलाना, इमदादउलउलूम मदरसा और मसूद अहमद, बागवाली मस्जिद के इमाम

किसी पुलिसवाले को अपनी तरफ आता देखकर ही मौलाना दिलावर खान और इमाम मसूद अहमद की रूह में कंपकपी दौड़ जाती है. दिल्ली में इमदाद उल उलूम मदरसे में मौलाना दिलावर और पास ही स्थित बागवाली मस्जिद के इमाम मसूद को मार्च, 2005 में स्थानीय पुलिस स्टेशन से बुलावा आया था. वहां उन्हें लोधी कॉलोनी स्थित दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में एक रुटीन पूछताछ के लिए जाने को कहा गया. इसके बाद लोगों को वे पांच साल बाद ही दिखाई दिए.

दिलावर और मसूद को लश्करतैयबा का आतंकवादी करार देते हुए उनपर देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया गया. इसके बाद दोनों को पांच साल तक जेल में सड़ना पड़ा. पिछले महीने पटियाला हाउस कोर्ट ने दोनों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. अदालत ने स्पेशल सेल की यह कहते हुए खिंचाई भी की कि उसकी जांच में तमाम झोल हैं और उसने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया.

दिलावर और मसूद की गिरफ्तारी महज एक व्यक्ति के बयान के आधार पर हुई थी. हामिद हुसैन नाम का वह व्यक्ति कथित रूप से लश्कर का सदस्य था जिसने दावा किया था कि विस्फोटकों की एक खेप दिलावर के पास पड़ी हुई है. हामिद ने मसूद और दिलावर की पहचान की और पुलिस ने दावा किया कि उसने उनके पास से एक ग्रेनेड, एक चीनी पिस्तौल और 24 गोलियां बरामद कीं.

दिलावर स्पेशल सेल द्वारा की गई पूछताछ को याद करते हुए कहते हैं, ‘मैं इतना हैरान था कि मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था..वे मुझसे सिर्फ यही पूछते कि क्या मैं हामिद को जानता हूं. मैंने कहा नहीं तो वे मुझे टॉर्चर करते हुए फिर वही सवाल करने लगे. मैं इनकार करता रहा. उन्होंने कहा कि वे मुझे ऐसा सबक सिखाएंगे जो मैं कभी भूल नहीं सकूंगा. उन्होंने मुझे एक सादे पेपर पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया.’  मसूद की कहानी भी ऐसी ही है. वे बताते हैं, ‘पहले मुझसे हामिद की पहचान करने के लिए कहा गया और फिर उन्होंने साजिश का खुलासा करने को कहा. मुझे समझ में ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं.’

स्थितियां बदतर होती गईं. ‘कैमरे के सामने जानवरों की तरह हमारी परेड कराई गई. स्पेशल सेल के अधिकारी आपस में धक्कामुक्की कर रहे थे ताकि आतंकवादियोंके साथ प्रमुखता से उनकी भी फोटो छपे. उन्होंने मुझसे भी फोटो खिंचवाने के लिए कहा,’ दिलावर बताते हैं. ‘ऊपरवाले में मेरे यकीन का इम्तहान हो रहा था. मैंने ऐसा क्या किया जो मेरे साथ यह हुआ?’

गिरफ्तारी के बाद नजदीकी रिश्तेदारों और दोस्तों ने उनसे किनारा कर लिया. अकेले पड़ गए दिलावर और मसूद धैर्यपूर्वक अपने मामले की सुनवाई का इंतजार करने लगे. फैसला आने में लंबा वक्त लग गया. लेकिन इस साल 8 जनवरी को आए फैसले ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. स्पेशल सेल का मामला अदालत में धराशायी हो गया. एडिशनल सेशन जज धर्मेश शर्मा ने कहा, ‘अभियोग पक्ष ने जो सबूत पेश किए हैं उनपर विश्वास नहीं होता.’ उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि इसका कोई सबूत नहीं है कि पुलिस ने दिलावर को उसके घर से गिरफ्तार किया था. मामले की खामियां उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि वेलकम स्थित दिलावर और मसूद के घरों पर छापे मारने वाली स्पेशल सेल के अधिकारी रमेश लांबा ने दिलावर खान के घर से हथियारों की बरामदगी के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था. जस्टिस शर्मा ने इंस्पेक्टर रण सिंह के बयान पर हैरानी जाहिर की जिसके मुताबिक दिलावर को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस अपने दफ्तर लौट गई थी और उसके आधे घंटे बाद लगभग उसी जगह मसूद को गिरफ्तार करने पहुंच गई थी. जज के शब्द थे, ‘यह उन बयानों से मेल नहीं खाता जो स्पेशल सेल के अधिकारियों ने दिए हैं. इसपर यकीन करना मुश्किल है कि पुलिस पार्टी दोनों को गिरफ्तार करने के लिए एक ही इलाके में दो बार गई और एक में उन्होंने रण सिंह को शामिल किया और दूसरे में नहीं.’ पुलिस की भूमिका पर उंगली उठाते हुए जज ने आगे लिखा, ‘इस बात में भी शक है कि हामिद हुसैन से किसी तरह की पहचान करवाई गई होगी. पुलिस की रोजाना डायरी में कहीं भी उसके नाम का जिक्र नहीं था.’

मौलाना और इमाम के लिए जिंदगी का चक्का पूरा एक चक्कर घूम चुका है. उनके लिए रिहाई एक नई जिंदगी की तरह है. दिलावर कहते हैं, ‘जेल से बाहर आकर मुझे लगा जसे मैं किसी अजनबी दुनिया में आ गया हूं. काफी देर तक तो भरोसा ही नहीं हुआ कि मुझपर लगा आतंकवादी का ठप्पा हट गया है.’ मसूद सिर्फ मुस्करा कर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं.

हालांकि उनकी खुशी जल्दी ही काफूर हो गई थी. अगले ही दिन पुलिस उनके घर आई और उनसे कहा कि वे स्थानीय पुलिस स्टेशन में पेश हों. दिलावर कहते हैं, ‘मैं आपको बता नहीं सकता कि मैं कितना डर गया था. एक ही पल में पिछले पांच सालों की त्रासदी मेरे आगे घूम गई.’ दिलावर के वकील ने उन्हें बेवजह परेशान किए जाने के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की है. वे उदास स्वर में कहते हैं, ‘क्लीन चिट मिल जाने के बावजूद मुझे फिर से गिरफ्तार होने का डर लगा रहता है. लगता है यह डर अब मेरी मौत के साथ ही जाएगा.’

कानून के गलत इस्तेमाल से बरबाद हुआ कैरियरहारून राशिद, मैकेनिकल इंजीनियर

 हारून राशिद को क्या पता था कि बेहतर रोजगार के लिए सिंगापुर जाना उन्हें इतना भारी पड़ जाएगा. बिहार के इस मैकेनिकल इंजीनियर ने दिसंबर, 2004 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अपनी नौकरी छोड़कर सिंगापुर की एक कंपनी ज्वॉइन की थी. 16 मई, 2005 को जब हारून भारत लौटे तो इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उन्हें स्पेशल सेल ने गिरफ्तार कर लिया. उनपर देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर आत्मघाती हमले की साजिश के लिए पैसे की व्यवस्था करने का आरोप लगा.

स्पेशल सेल का दावा था कि हारून ने 10 और 15 जनवरी को सिंगापुर से वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए 49,000 रुपए अपने भाई मोहम्मद यूनिस को भेजे थे जिसने इस रकम को शम्स के हवाले कर दिया. शम्स वही शख्स था जो मार्च, 2005 में दिल्ली के उत्तम नगर में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था. कथित तौर पर हारून ने स्वीकार किया था कि उसने यह पैसा अपने पाकिस्तानी आका अब्दुल अजीज से हासिल किया था. पुलिस का यह भी दावा था कि उसने हारून से 76 पन्ने की ईमेलें हासिल की हैं जो फारूक के फर्जी नाम से लिखी गई हैं. इन मेलों में उसने दूसरे आतंकियों को कूट भाषा में आगामी हमलों का निर्देश दिया था. हारून की गिरफ्तारी को पुलिस ने बहुत बड़ी सफलता बताया था.

लेकिन जब मामला सुनवाई के लिए कोर्ट में पहुंचा तो एक अलग ही तस्वीर सामने आई जिसका सार यह था कि आतंकवाद से निपटने के लिए बनाई गई स्पेशल सेल ने अपने विशेष अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया. हारून के वकील एमएस खान बताते हैं, ‘वह बहुत गरीब परिवार से है, इसलिए सिंगापुर जाने के लिए उसने अपने चाचा से एक लाख रुपए उधार लिए थे. वहां पहुंचने पर उसे लगा कि उसे इतने पैसों की जरूरत नहीं है लिहाजा उसने 49 हजार रुपए अपने भाई को वापस भेज दिए ताकि कुछ उधारी चुकाई जा सके. उसे क्या पता था कि वापस भेजी गई इसी रकम के लिए उसे लश्कर का फाइनेंसर करार दे दिया जाएगा?’

हालांकि कोर्ट में मामला औंधे मुंह गिर पड़ा. यूनिस ने मृत आतंकी शम्स को किसी तरह का पैसा देने से इनकार किया. पुलिस हारून के लश्कर से संबंधों के पक्ष में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाई. जिन ईमेलों को हासिल करने का दावा किया गया था वे भी जांचपड़ताल में गलत साबित हुईं. एसएम खान कहते हैं, ‘इंसपेक्टर कैलाश ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने 18 मई, 2005 को उस ईमेल का पासवर्ड पता लगा लिया था जिसका इस्तेमाल हारून अपने पाकिस्तानी आकाओं से संपर्क करने के लिए करता था और उसी दिन उन्होंने इसका प्रिंट भी निकलवाया था. लेकिन स्पेशल सेल के ही इंस्पेक्टर बद्रीश दत्त ने माना कि 13 मई, 2005 को (कैलाश की कथित सफलता के पांच दिन पहले) हारून ने खुद ही अपने ईमेल पते का पासवर्ड बता दिया था. बद्रीश ने यह भी माना था कि उस पूछताछ के दौरान कैलाश भी वहां मौजूद थे. इससे साफ पता चलता है कि पुलिस ने इन पांच दिनों के दौरान ईमेल के रिकॉर्डों से छेड़छाड़ की.’ अदालत ने पुलिस अधिकारी कैलाश की चुप्पी और अदालत में बोले गए झूठ पर नाराजगी जताई. 76 पन्नों का ईमेल प्रिंट न तो कोर्ट में पेश किया गया और न ही चार्जशीट के साथ लगाया गया. पुलिस डायरी में भी इसका कोई जिक्र नहीं था. हारून को अदालत ने तो बरी कर दिया है मगर उनके वकील के मुताबिक वे अब भी डरते हैं कि कहीं उन्हें फिर से न उठा लिया जाए.

 

मेरी जवानी कौन लौटाएगा सर?’  इफ्तिखार मलिक, पूर्व बायोटेक्नोलॉजी छात्र

देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी पर आत्मघाती हमले की साजिश रचने और लश्करतैयबा का आतंकवादी होने के आरोप में पांच साल जेल में बिता चुके मोहम्मद इफ्तिखार अहसान मलिक के लिए हालात अब बेहतर दिख रहे हैं. 26 वर्षीय इफ्तिखार देहरादून स्थित डॉल्फिन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंस में बायोटेक्नोलॉजी द्वितीय वर्ष के छात्र थे. 7 मार्च, 2005 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उन्हें देहरादून से गिरफ्तार कर लिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस ने दावा किया कि उसे मलिक के पास से एक डायरी मिली थी जिसमें कुरान की भड़काऊ आयतें लिखी हुई थीं. पुलिस का यह भी कहना था कि इफ्तिखार के पास एक पर्ची  भी मिली थी जिसमें गुजरात दंगों का बदला लेने की बात थी और उनसे आईएमए की एक परेड का पास भी बरामद हुआ. पुलिस के मुताबिक इफ्तिखार पाकिस्तानी आतंकवादी शम्स के संपर्क में थे जिसने उन्हें बिहार में सिमी की बैठकों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया था. यह भी कहा गया कि शम्स की डायरी में इफ्तिखार को शाहिदनाम दिया गया था और लश्कर उसकी पढ़ाई का खर्च उठाता था.

इफ्तिखार खुद के निर्दोष होने की दलीलें देते रहे पर कोई फायदा नहीं हुआ. मामला एडिशनल सेशन जज धर्मेश शर्मा के पास पहुंचा जिन्होंने स्पेशल सेल की जांच में तमाम खामियों को उजागर करते हुए इफ्तिखार को सभी आरोपों से बरी कर दिया. जस्टिस शर्मा ने इसपर बेहद हैरानी जताई कि स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर रमेश शर्मा ने कोर्ट को बताया कि इंस्पेक्टर कैलाश सिंघल बिष्ट (जिन्होंने जब्त सामानों की सूची तैयार की थी) देहरादून गए थे और उन्होंने ही इफ्तिखार से आईएमए का पास जब्त किया था. जबकि क्रॉस एक्जामिनेशन में बिष्ट ने कहा कि वे देहरादून गए ही नहीं थे. यह पूछने पर कि फिर उन्हें पास कहां से मिला और उसे जब्त सामान की सूची में क्यों शामिल किया गया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था. इफ्तिखार ने अदालत को बताया कि गुजरात का बदला लेने वाली पर्ची उनसे जबर्दस्ती लिखवाई गई थी. उन्होंने यह माना कि कुरान की आयतें उन्होंने ही लिखी थीं मगर साथ ही यह भी कहा कि वे भड़काऊ नहीं थीं. जस्टिस शर्मा ने इसपर भी हैरानी जाहिर की कि गिरफ्तारी और जब्त सामान की सूची बनाते वक्त पुलिस ने इफ्तिखार के मकान मालिक राम गुल्यानी से संपर्क तक नहीं किया और न ही किसी और को गवाह बनायाक्रॉस एक्जामिनेशन करने पर पता चला कि पुलिस अधिकारी संजय दत्त और बद्रीश दत्तजिन्होंने कथित तौर पर इफ्तिखार का सामान जब्त किया थाकभी भी देहरादून नहीं गए. इफ्तिखार द्वारा लिखी गई कथित पर्ची पर स्पेशल सेल के अधिकारियों के बयान तो और भी विरोधाभासी थे. एक अधिकारी ने बताया कि पर्ची हिंदी में थी जबकि दूसरे का कहना था कि यह अंग्रेजी में थी.

कोर्ट ने कहा कि इफ्तिखार के लश्कर से संबंध होने का कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं है और न ही इसका प्रमाण है कि वह मार्च, 2005 में उत्तम नगर में मारे गए किसी आतंकवादी को जानता था. दूसरे आरोपितों के बयानों में एक बार भी कहीं इफ्तिखार का जिक्र नहीं आया था. सिर्फ आईएमए का पास रखने भर से किसी मकसद का पता नहीं चलता. इसके अलावा पास भी पांच महीने पुराना था और परेड पहले ही संपन्न हो चुकी थी. इफ्तिखार का मुश्किल दौर आखिरकार खत्म हो चुका है. उनकी बहन की शादी होने वाली है और उन्हें लगता है कि 2010 उनके लिए अच्छा बीतेगा.

हालांकि पुलिस का डर उन्हें अब भी हर वक्त सताता है.

फैसल से कसाब तक

आतंकवाद को लेकर जो स्टीरियोटाइप और सुविधाजनक सोच विकसित की जाती है, वह बार-बार गलत साबित होती है

जिस समय भारतीय मीडिया में कसाब की सज़ा को लेकर सनसनी का माहौल बना हुआ था, लगभग उसी समय न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वेयर पर बम से लदी एक गाड़ी मिली जिससे धुआं निकल रहा था. गाड़ी में बहुत आम इस्तेमाल की चीज़ों के सहारे एक ऐसा बम जोड़ा गया था जो फटता तो काफ़ी ख़तरनाक होता. यह 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए आतंकी हमले जितना विनाशकारी नहीं होता, लेकिन अपने मनोवैज्ञानिक असर में उतना ही घातक होता. निश्चय ही न्यूयॉर्क पुलिस अपनी पीठ थपथपा सकती है कि उसने वक्त रहते एक आतंकी साज़िश नाकाम कर यह ख़तरा टाल दिया. इतना ही नहीं, सक्रियता दिखाते हुए उसने इस साज़िश के संदिग्ध आरोपी फ़ैसल शहज़ाद को दुबई फ़रार होने से पहले विमान से उतारकर गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की. इस सक्रियता से चाहें तो हमारी एजेंसियां भी सबक सीख सकती हैं.

लेकिन सीखने लायक सबक इसमें अमेरिका के लिए भी हैं. फ़ैसल शहजाद अमेरिका बम रखने नहीं आया था. वह नब्बे के दशक में पहली बार स्टुडेंट वीजा लेकर अमेरिका पहुंचा था. वहीं उसने एमबीए तक पढ़ाई की. एक निजी कंपनी में ठीक-ठाक नौकरी करने लगा. उसकी शादी भी एक पढ़ी-लिखी लड़की से हुई.उसकी बीवी हूमा खान कोलोरैडो विश्वविद्यालय से विज्ञान की स्नातक है और ऑरकुट नाम की सोशल नेटवर्किंग साइट में ख़ुद को गैरराजनीतिक बताती है. उनके दो बच्चे भी हैं. इस परिवार ने 2004 में कनेक्टिकट में एक छोटा- सा घर भी खरीदा. पाकिस्तानी वायुसेना के एक अफसर के इस बेटे ने अमेरिकी नागरिकता तक हासिल कर ली. यह ऐसी खुशहाल ज़िंदगी थी जिस पर आम हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी को रश्क हो सकता है.

सवाल यहीं से पैदा होता है. फिर ऐसा क्या हुआ कि इस खाते-पीते परिवार के पढ़े-लिखे नौजवान ने अचानक एमबीए की पढ़ाई के बाद पाक-अफगान सीमा पर दहशत की ट्रेनिंग ली और अमेरिका लौटकर उस एक प्रसिद्ध चौराहे पर बम से लदी गाड़ी रखने के बाद पकड़ा गया?
क्या पाकिस्तान की मिट्टी में ऐसा कुछ है कि वह अपने नौजवानों को आतंकवादी बना डालती है? कम से कम इसी आशय की एक ख़बर वाशिंगटन टाइम्स में एक पत्रकार ने दी. उसने बताया कि पाकिस्तान के 11,000 मदरसों से सालाना 5 लाख छात्र निकलते हैं जिनमें से करीब 2 फीसदी- यानी 10,000 के करीब जेहादी हो जाते हैं. यानी पाकिस्तान जेहादी पैदा करने का वह कारखाना है जिससे दुनिया को डरना चाहिए. इससे मिलती-जुलती कुछ और ख़बरें बताती हैं कि पाकिस्तान में किस तरह आतंकवादी शिविर चल रहे हैं और कैसे यह देश एक रोग- यानी- दुष्ट देश में बदल चुका है जो पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है.

फिलहाल इस ख़बर और प्रचार में कितना सच और कितना झूठ है, इस सवाल को यहीं छोड़कर फैसल शहजाद पर लौटें. वाशिंगटन टाइम्स की रिपोर्ट जिन 11,000 मदरसों का उल्लेख करती है, उनमें फैसल शहज़ाद की पढ़ाई नहीं हुई. यानी वह उन 10,000 जेहादियों में नहीं है जो उन मदरसों में तैयार हो रहे हैं. उसने शायद अपने लिए ऐसे जीवन की कल्पना भी नहीं की होगी. फिर फैसल शहज़ाद को किसने बनाया? पाकिस्तान के मदरसों ने या अमेरिका के स्कूलों ने?

भारत के लिए ज्यादा अहम यह समझना है कि आतंकवाद सिर्फ किसी एक मुल्क की साज़िश या किसी एक कौम की सोच से नहीं पनपता

अमेरिका इस सवाल से मुंह चुराता है. वह यह बताना नहीं चाहता कि आतंकवाद का बीज सिर्फ पाकिस्तान की मिट्टी से नहीं, अमेरिका की हवा से भी पोषण पाता है. फैसल शहज़ाद से पहले जिस डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी को शिकागो की पुलिस ने गिरफ्तार किया, उसने भी किसी मदरसे में पढ़ाई नहीं की थी. मुंबई में हेडली के साथ अपने बेटे राहुल भट्ट के संपर्कों का बचाव करते हुए फिल्मकार महेश भट्ट ने ठीक ही कहा था कि डेविड हेडली के आतंकवादी होने की कल्पना कोई कर ही नहीं सकता था. जब हेडली ने शिकागो की अदालत में वादामाफ गवाह बनकर बताया कि उसका नाता किन-किन मुल्कों में चल रही साज़िशों से है तो लोग हैरान रह गए. यह मान लें कि हेडली एक टूटे हुए परिवार का भटका हुआ बच्चा था जो पाकिस्तानी पिता और अमेरिकी मां के तनाव में, पाकिस्तान के अकेलेपन और अमेरिका की अजनबीयत के बीच पहले ड्रग्स और फिर आतंकवाद के जाल में चला गया. लेकिन हाल के दिनों में ऐसे पढ़े-लिखे नौजवान आखिर क्यों आतंकवादी बन रहे हैं जिन्होंने अपने लिए करिअर के कहीं बेहतर विकल्प चुन रखे थे?

फ़ैसल शहजाद का वाकया एक और शख्स की याद दिलाता है. करीब दो साल पहले बेंगलुरु का एक नौजवान मोहम्मद कफ़ील ग्लासगो के एयरपोर्ट पर एक जलती हुई जीप लेकर दाखिल हो गया. उस दिन भी एक बड़ा हमला टला. बुरी तरह झुलसे कफील की आखिरकार अस्पताल में मौत हो गई. कफ़ील तो पाकिस्तानी भी नहीं था.वह हिंदुस्तान से ब्रिटेन गया था और किसी रिसर्च पर काम कर रहा था. कफ़ील के हिस्से की कुछ सज़ा उसके दूर के मित्र या रिश्तेदार डॉ हनीफ ने काटी जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में गिरफ़्तार कर लिया गया. अपनी इस चूक पर बाद में ऑस्ट्रेलियाई सरकार को माफी मांगनी पड़ी.

दरअसल, इन सारी मिसालों को याद करने का मतलब सिर्फ यह बताना है कि आतंकवादी वैसे नहीं होते, जैसी हमारी व्यवस्था मानकर चलती है और अक्सर उन पोशाकों और पृष्ठभूमि में नहीं मिलते, जिनमें उनके मिलने की उम्मीद की जाती है. आतंकवाद को लेकर जो स्टीरियोटाइप और सुविधाजनक सोच विकसित की जाती है, वह बार-बार गलत साबित होती है. इसके नतीजे अलग-अलग तबकों को भुगतने पड़ते हैं. अस्सी के दशक में भारत में हर सिख आतंकवादी की तरह देखा जाने लगा था और आज किसी भी मुसलमान को आतंकवादी करार दिया जा सकता है.
ठीक है कि कसाब, शहजाद और सिद्दीक़ी या ऐसे और भी लड़के मुसलमान हैं और यह भी मुमकिन है कि उनके पीछे खुद को जेहादी बताने वाले कुछ संगठनों की सक्रियता भी रही हो, लेकिन आतंकवाद को इस सपाट चश्मे से देखने का एक नतीजा तो यह होता है कि हम आतंकवादी को खोज निकालते हैं और आतंकवाद की वजहों को समझने में चूक जाते हैं. लेकिन आतंकवादी की यह तलाश भी कई बार गलत साबित होती है और नए आतंकवादी पैदा करने का जरिया बन जाती है.

आतंकवाद की इस सांप्रदायिक शिनाख्त का असर समझना हो तो मालेगांव, अजमेर और हैदराबाद के आतंकी हमलों को देखना चाहिए. अब यह बात खुल रही है कि इन हमलों के पीछे हूजी या किसी और मुस्लिम संगठन का नहीं, भगवा विचारधारा का हाथ था. लेकिन यह सच सामने आने से पहले न जाने कितने लोग सिर्फ इसलिए पूछताछ में पकड़े गए कि वे मुसलमान थे. आतंकवाद की ऐसी सांप्रदायिक पहचानें कितने ख़तरनाक नतीजे पैदा कर सकती हैं, यह गुजरात में सोहराबुद्दीन और इशरत जहां जैसे लोगों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या बताती है. इन दोनों की हत्या के बाद पुलिसवालों ने यही आरोप लगाया कि ये नरेंद्र मोदी को मारने की साज़िश कर रहे थे. शुक्र है कि भारतीय न्याय व्यवस्था अभी इतनी सांप्रदायिक नहीं हो गई है कि वह तथ्यों से आंख मूंद ले. सोहराबुद्दीन मामले में चल रही जांच का एक नतीजा यह है कि कम से कम 5 आईपीएएस अफसरों सहित करीब डेढ़ दर्जन पुलिसवाले इस मामले में सलाखों के पीछे किए जा चुके हैं. काश कि यह इंसाफ़ बाकी मामलों में भी होता. लेकिन अभी वह दूर है, क्योंकि सोहराबुद्दीन के मामले में इंसाफ के साथ पहले हुए खिलवाड़ को देखने के बावजूद हम आतंकवाद को सांप्रदायिक या राष्ट्रवादी चश्मे से बाहर जाकर देखने को तैयार नहीं हैं. बताया जा रहा है कि कसाब की फांसी पाकिस्तान और वहां से चलने वाले आतंकवादी संगठनों के लिए एक सबक होगी. लेकिन कसाब तो अपने नौ साथियों के लिए मरने ही चला था- उसे फांसी होगी तो राहत की सबसे पहली सांस पाकिस्तान लेगा, क्योंकि कसाब के साथ पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा करने वाला आतंकवाद का जीता-जागता सबूत भी ख़त्म हो जाएगा.पाकिस्तान आतंकियों को जिंदा रहने के लिए भारत नहीं भेजता, मरने और मारने के लिए भेजता है.

कसाब को देर-सबेर फांसी हो जाएगी, लेकिन भारत के लिए ज्यादा अहम यह समझना है कि आतंकवाद सिर्फ किसी एक मुल्क की साज़िश या किसी एक कौम की सोच से नहीं पनपता. वह जिन रसायनों से तैयार होता है, वे हमारी अपनी सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगशालाओं में बन रहे हैं. अमेरिका अपनी चौकसी से अपने ख़िलाफ़ हुई साज़िशों को नाकाम कर ले रहा है, लेकिन 9/11 का प्रेत जैसे अब भी उसका पीछा कर रहा है. हमारे तो अपने कई 9/11 हैं जिनकी अमेरिका ने कभी परवाह नहीं की. अमेरिका अपनी राजनीति और सुविधा के हिसाब से आतंकवाद की परिभाषा तय कर रहा है, उसके विरुद्ध युद्ध लड़ रहा है. हमें भी अपने ढंग से अपने यहां पनप रहे उस असंतोष को समझना होगा जो आतंकी साज़िश का हथियार भी बन जाता है. जब तक हमारी सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगशालाएं गैरबराबरी और नाइंसाफ़ी के मेल से तैयार होनेवाला असंतोष का यह रसायन तैयार करती रहेंगी, तब तक कई तरह की हिंसा हमारे ऊपर मंडराती रहेगी- हम इसे आतंकवाद का नाम दे लें या कुछ और कह लें. फैसल की मिसाल देने और कसाब को फांसी दिला देने भर से न आतंकवाद समझ में आएगा और न ही आतंकवादी ख़त्म हो जाएंगे. 

आज नकद कल फसाद-2

कुछ ही मिनट बाद भवानी तहलका से पैसों की बातचीत करने लगता है. ‘मुझे एक आंकड़ा बताओ ताकि मैं सर (मुथालिक) से बात कर सकूं,’ भवानी कहता है. हम एक कागज पर 70 लाख लिखकर भवानी की तरफ बढ़ाते हैं. अगली प्रतिक्रिया में वह पूछता है कि अत्तावर (सेना का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष) को कितनी पेशकश की गई थी.

जब उसे बताया जाता है कि अत्तावर को भी इतनी ही पेशकश की गई थी तो भवानी यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा देता है, ‘अतावर इतने पर कभी राजी नहीं होगा.’ वह कहता है कि पुलिस को निपटाने के लिए हमें कुछ और पैसों का अलग से इंतजाम करके रखना चाहिए.
तहलकाः उन्होंने मुझे दो लाइन बोला था… संगठन के लिए अलग… कार्यकर्ता के लिए अलग… तो मैंने संगठन के लिए 5 लाख कहा… तो बोले देखेंगे… कार्यकर्ताओं के लेवल पे ये तो जायेगा कि केस वगैरह पड़ गया तो ठीक है… कार्यकर्ताओं के लिए 50 हजार… कुछ उसको मिल जाएगा कुछ उसकेे केस में यूज हो जाएगा… दस लड़का आ गया तो 5 लाख… उन्होंने मुझे बोला यूं… संगठन का आप क्या करते हो वो मुथालिक जी के साथ है… और लड़का… वो मैं आपको खुद दूंगा… पुलिस का जो सेटिंग है… वो भी करके दूंगा… कि वो भी करना पड़ेगा.

भवानीः पुलिस का सेटिंग भी करना पड़ेगा… बिना उसका तो नहीं होगा…

तहलकाः नहीं… होगा… तो वहां पर 3 फेज में जा रहा है..थ्री डाइमेंशनल.. संगठन का अलग… कार्यकर्ताओं का अलग…और पुलिस का अलग…

भवानीः पुलिस का अलग…

इसके बाद इस पर चर्चा होती है कि लेन-देन कैसे होगा. हम पूछते हैं कि क्या दंगों के लिए दी जाने वाली राशि नगद की बजाय चेक से दी जा सकती है. भवानी फौरन मना कर देता है. स्वाभाविक है कि दंगे के कारोबार में लेन-देन कानूनी तरीकों से नहीं हो सकता.
तहलका के प्रस्ताव पर श्री राम सेना के कार्यकर्ताओं का रवैया जितना सुनियोजित था उसे देखते हुए इस बात की संभावना बनती है कि संगठन पूर्व में भी इस तरह की गतिविधि में शामिल रहा है. इसमें कानून और पुलिस से निपटने और हिंसक गतिविधियों के बाद कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बच नकलने की सेना की कुशलता भी जाहिर होती है.

उडुपी और मंगलौर में सेना के कार्यकर्ताओं से बातचीत में यह बात और मजबूती से सामने आई. काफी कोशिशों के बाद अत्तावर और जीतेश (सेना की उडुपी इकाई का प्रमुख) हमें उन कार्यकर्ताओं से मिलवाने के लिए तैयार हो गए जिन्हें हमले को अंजाम देना था. कुमार और सुधीर पुजारी नाम के ऐसे दो युवा कार्यकर्ता खुलेआम इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि वे मंगलौर के पब सहित सेना के कई हिंसक प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं. जीतेश, पुजारी और कुमार, तीनों पब हमले में शामिल होने के बावजूद पुलिस की गिरफ्त से बचने में कामयाब रहे. ये तीनों कई साल तक आरएसएस और बजरंग दल में भी रह चुके हैं.

कुछ मिनट की बातचीत के बाद वे बड़बोलेपन में बताते हैं कि किस तरह से उन्होंने पुलिस को चकमा दिया. कुमार एक और घटना के बारे में बताता है जिसमें आठ मुसलमान घायल हुए थे. वह कहता है, ‘हमारे हमले के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था.’ जीतेश के पास इस तरह की तमाम कहानियां हैं. एक दिन पूर्व तहलका से मुलाकात में उसने हमें बताया था कि 2007 में उसने अपने दो साथियों के साथ मिलकर एक चर्च पर हमला किया था. उसके मुताबिक तीन या चार पादरियों को अस्पताल ले जाना पड़ा था जबकि जीतेश और उसके साथियों को जेल की हवा खानी पड़ी थी.

फिर जीतेश इससे भी ज्यादा वीभत्स एक दूसरी घटना का जिक्र करता है. वह उस वक्त केरल के कासरगोड़ में रहता था और बजरंग दल का सक्रिय कार्यकर्ता था. वह एक मस्जिद पर हुए हमले में शामिल था. वह बताता है कि किस तरह से उसने एक मौलवी पर तलवार से हमला किया था. मौलवी की मौत हो गई थी और जीतेश पर हत्या का आरोप लगा था. वह कहता है कि चार महीने जेल में रहने के बाद उसे जमानत मिल गई. उसके मुताबिक इस दौरान बजरंग दल ने उसकी काफी मदद की- वकील नियुक्त करने से लेकर जमानत के आवेदन तक. जेल से छूटने के बाद वह उडुपी आ गया. कुछ साल बाद जब मुथालिक ने श्री राम सेना बनाई तो वह उसमें शामिल हो गया.
हमारे साथ थोड़ा और सहज होने के बाद जीतेश ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी. 2006 में उसने 100 दूसरे कार्यकर्ताओं के साथ एक हथियार प्रशिक्षण कैंप में हिस्सा लिया था जिसे श्री राम सेना ने आयोजित किया था. जिन हथियारों का इस्तेमाल उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान किया था उनमें ज्यादातर गैरलाइसेंसी थे. इससे ज्यादा जानकारी देने के लिए वह तैयार नहीं था. एक दिन बाद अत्तावर से मुलाकात के दौरान वह हमारे साथ था और मंगलौर में प्रस्तावित हमले की  योजना में शामिल होने की तैयारी कर रहा था.

अत्तावर और भवानी से मुलाकात के बाद- जिसमें वे बैंगलुरु, मंगलौर या मैसूर में हमला करने के लिए राजी थे- तहलका एक बार फिर से मुथालिक से मिला. एक चीज जो अभी भी तय करनी रह गई थी वह थी पैसे का आंकड़ा. मंगलौर जेल में अत्तावर से मुलाकात के दौरान रकम 50 से 60 लाख रुपए के बीच थी जबकि भवानी से 70 लाख पर सौदेबाजी हुई. तहलका ने मुथालिक से पूछा कि क्या यह रकम काफी है.

तहलकाः सर, क्या ये ठीक होगा कि मैं फोन पर प्रसाद जी के संपर्क मंे रहूं? क्योंकि फोन पर बात करने से परहेज करता हूं

मुथालिकः हां…हां…

तहलकाः प्रसाद जी तो ठीक है…लेकिन एक बार मैं आपसे कनफर्म करना चाहता था, हो सकता हैै शर्मा जी को यह ठीक न लगे लेकिन मैं पैसे के बारे में साफ बात करना चाहता हूं…क्याेंकि मुझसे तीन जगहों के लिए 60 लाख रुपए की बात कही गई थी

मुथालिकः हां

तहलकाः 60 लाख रुपए…आपकी तरफ से यह है ना?

मुथालिकः इस बारे में आपसे किसने कहा?

तहलकाः वसंत जी ने कहा था…

मुथालिकः हां…हां…

तहलकाः इसलिए मैंने सोचा कि एक बार और कनफर्म कर लूं…

मुथालिकः हां…हां…मैं पैसे के बारे में नहीं बता सकता…यह उनका काम है ये वही कर सकते है.

इस खबर के प्रेस में जाने तक अत्तावर और उसके वकील संजय सोलंकी हमले की रूपरेखा और रकम तय करने के लिए तहलका के संपर्क में थे. सोलंकी ने तहलका को आश्वासन दिया कि सौदा पक्का करने और रकम का आंकड़ा तय करने के लिए अत्तावर के साथ हमारी बातचीत बहुत जल्दी संभव होगी.
मगर हमें इसकी जरूरत नहीं थी.

(के आशीष के सहयोग के साथ)

अपराध रिपोर्टिंग का ‘अपराध’

एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ में समाचार चैनल रिपोर्टिंग के बहुत बुनियादी नियमों और उसूलों की भी परवाह नहीं करते

समाचार चैनलों में अपराध की खबरों को लेकर एक अतिरिक्त उत्साह दिखाई पड़ता है. लेकिन अपराध की खबर शहरी-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से हो और उसमें सामाजिक रिश्तों और भावनाओं का एक एंगल भी हो तो चैनलों की दिलचस्पी देखते ही बनती है. ऐसी खबरों में अतिरिक्त दिलचस्पी में कोई बुराई नहीं बशर्ते रिपोर्ट करते हुए पत्रकारिता और रिपोर्टिंग के बुनियादी उसूलों और नियमों का ईमानदारी से पालन हो.
लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब चैनल ऐसी खबरों को ना सिर्फ अतिरिक्त रूप से सनसनीखेज बनाकर बल्कि खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हैं. यही नहीं, एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ में वे रिपोर्टिंग के बहुत बुनियादी नियमों और उसूलों की भी परवाह नहीं करते. इस प्रक्रिया में उनके अपराध संवाददाता पुलिस के प्रवक्ता बन जाते हैं. वे ऐसी-ऐसी बेसिर-पैर की कहानियां गढ़ने लगते हैं कि तथ्य और गल्प के बीच का भेद मिट जाता है.

ताजा मामला दिल्ली की युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत का है. निरुपमा अपने सहपाठी और युवा पत्रकार प्रियभांशु रंजन से प्रेम करती थीं. दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन निरुपमा के घरवालों को यह मंजूर नहीं था. निरुपमा की 29 अप्रैल को अपने गृहनगर तिलैया (झारखंड) में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी जो बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘हत्या’ निकली. इसे स्वाभाविक तौर पर ‘आनर किलिंग’ का मामला माना गया जिसने निरुपमा के सहपाठियों, सहकर्मियों, शिक्षकों के अलावा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और महिला-छात्र संगठनों को आंदोलित कर दिया (इनमें यह लेखक भी शामिल है).

स्वाभाविक तौर पर अधिकांश चैनलों ने निरुपमा मामले को जोर-शोर से उठाया. हालांकि अधिकांश चैनलों की नींद निरुपमा की मौत के चार दिन बाद तब खुली जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की बात सामने आने के बाद एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस ने इसे प्रमुखता से उठाया. असल में, चैनलों के साथ एक अजीब बात यह भी है कि जब तक किसी खबर को दिल्ली का कोई बड़ा अंग्रेजी अखबार उसके पूरे पर्सपेक्टिव के साथ अपने पहले पन्ने की स्टोरी नहीं बनाता, चैनल आम तौर पर उस खबर को छूते नहीं हैं या आम रूटीन की खबर की तरह ट्रीट करते हैं. लेकिन जैसे ही वह खबर इन अंग्रेजी अख़बारों के पहले पन्ने पर आ जाती है, चैनल बिलकुल हाइपर हो जाते हैं. चैनलों में एक और प्रवृत्ति यह है कि अधिकांश चैनल किसी खबर को पूरा महत्व तब देते हैं जब कोई बड़ा और टीआरपी की दौड़ में आगे चैनल उसे उछालने लग जाता है.

निरुपमा के मामले में भी यह भेड़चाल साफ दिखी. पहले तो चैनलों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, निरुपमा के पिता की चिट्ठी, निरुपमा के एसएमएस    और प्रियभांशु के बयानों के आधार पर इसे ‘ऑनर किलिंग’ के मामले की तरह उठाया लेकिन जल्दी ही कई चैनलों के संपादकों/रिपोर्टरों की नैतिकता और कई तरह की भावनाएं जोर मारने लगीं. खासकर प्रियभांशु के खिलाफ स्थानीय कोर्ट के निर्देश और पुलिस की ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग ने इन्हें खुलकर खेलने और कहानियां गढ़ने का मौका दे दिया. अपराध संवाददाताओं को और क्या चाहिए था? पूरी एकनिष्ठता के साथ वे प्रियभांशु के खिलाफ पुलिस द्वारा प्रचारित आधे-अधूरे तथ्यों और गढ़ी हुई कहानियों को बिना क्रॉस चेक किए तथ्य की तरह पेश करने लगे.

दरअसल, अपराध संवाददाताओं का यह ‘अपराध’ नया नहीं है. इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर चैनलों और अखबारों में क्राइम रिपोर्टिंग पूरी तरह से पुलिस के हाथों का खिलौना बन गई है. सबसे आपत्तिजनक यह है कि अधिकांश क्राइम रिपोर्टर पुलिस से मिली जानकारियों को बिना पुलिस का हवाला दिए अपनी एक्सक्लूसिव खबर की तरह पेश करते हैं.

यह ठीक है कि क्राइम रिपोर्टिंग में पुलिस एक महत्वपूर्ण स्रोत है लेकिन उसी पर पूरी तरह से निर्भर हो जाने का मतलब है अपनी स्वतंत्रता पुलिस के पास गिरवी रख देना. दूसरे, यह पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत यानी हर खबर की कई स्रोतों से पुष्टि या क्रॉस चेकिंग का भी उल्लंघन है. आश्चर्य नहीं कि इस तरह की गल्प रिपोर्टिंग के कारण पुलिस और मीडिया द्वारा ‘अपराधी’ और ‘आतंकवादी’ घोषित किए गए कई निर्दोष लोग अंततः कोर्ट से बाइज्जत बरी हो गए. लेकिन अपराध रिपोर्टिंग आज भी अपने अनगिनत ‘अपराधों’ से सबक सीखने के लिए तैयार नहीं है.