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कटी पतंग-सा था वो… : काइट्स

फिल्म  काइट्स
निर्देशक  अनुराग बसु
कलाकार  ऋतिक रोशन, बारबरा मोरी, कंगना 

‘काइट्स’ का नाम कुछ भी रखा जा सकता था. ‘बादल’ भी और तब शुरुआती सीन में पतंगों की जगह दो बादल दिखाकर एक भावुक-सा डायलॉग मार दिया होता. वैसे ‘गुब्बारे’ ज्यादा मुफीद होता क्योंकि फिल्म के एक दृश्य में गुब्बारे में उड़कर नायक-नायिका अपनी जान बचाते हैं और हमें कृतज्ञ करते हैं. वैसे उन दोनों को नायक-नायिका कहना मजबूरी ही है, नहीं तो वे झूठे, धोखेबाज और पैसे के लिए किसी भी हद तक जाने वाले खलनायकों जैसे ही हैं. जब मधुर बैकग्राउंड संगीत उन्हें मासूम दिखाने की कोशिश करता है तो गुस्सा आता है.

खैर, उन्हें प्यार हो ही जाता है और यह अमर महान प्रेम स्वीमिंग पूल में नहाने के बदन-दिखाऊ दृश्य में होता है. फिर वे दोनों पैसे को भूलने लगते हैं और एक बड़े डॉन से पंगा ले लेते हैं जैसे वे क्रिश हों. हां, कुछ समस्या यह भी है, राकेश रोशन और ऋतिक रोशन, दोनों क्रिश की शक्तियों से बाहर नहीं निकल पाए हैं. फिल्म में जब ऋतिक-बारबरा का पीछा बीसियों कारें करती हैं और ऋतिक कलाबाजियां दिखाते हैं और हर वाहन चलाना जानने का सुबूत देते हैं, तब यह भी लगता है कि यह फिल्म ‘धूम’ का अगला सीक्वल सोचकर बनाई गई है. और आह! कितनी कारें तोड़ी गई हैं, कितनी सुंदर प्राकृतिक लोकेशन बेजान दृश्यों में बर्बाद कर दी गई हैं और ऋतिक जैसे कमाल के डांसर और एक्टर को अतीत में पैर जमाए बैठे पिता जी ने इतना जाया किया है कि मत पूछिए.

दूसरी समस्या भाषा की भी है. आखिर तक यह समझ नहीं आता कि नायक कितनी स्पेनिश जानता है और नायिका कितनी अंग्रेजी. केवल वही किरदार हिंदी बोलते हैं, जिनसे आप उम्मीद नहीं करते होंगे. वैसे पूरी गलती फिल्म बनाने वालों की भी नहीं है. बहुत साल पहले हमने ही ‘कहो न प्यार है’ के लचक भरे डांस देखकर यह छूट दी थी कि कहानी से हमें खास मतलब नहीं है. राकेश रोशन ने धीरे-धीरे इसका ‘खास’ भी हटा दिया और यह समझ लिया कि हमें कहानी से मतलब है ही नहीं. हम तो बस उनके बेटे का सुडौल शरीर और गोरी हीरोइन देखकर तालियां पीटेंगे. यह भी हो जाता मगर उन्होंने अनुराग बसु जैसा प्रतिभावान निर्देशक चुन लिया. जिस तरह नागेश कुकुनूर अच्छी ‘तस्वीर’ और विशाल भारद्वाज अच्छी ‘कमीने’ नहीं बना सकते, उसी तरह अनुराग बसु कितने भी मेहनताने में अच्छी ‘काइट्स’ नहीं बना सकते थे. बिना आत्मा और सिर्फ स्टार वाली कहानियों को साधारण लोग, प्रतिभावान लोगों से कहीं बेहतर ढंग से कह सकते हैं. छोटी और अच्छी फिल्में बना चुके सब निर्देशक बड़े बैनरों के साथ लगातार डूबते ही जा रहे हैं. हमें उम्मीद है कि बड़े सितारों के साथ ‘बॉम्बे वेलवेट’ बनाने निकले अनुराग कश्यप अपने स्तर का खयाल रखेंगे.   

गौरव सोलंकी

देश चलाने का मुगालता

राहत की बात है कि देश समाचार चैनलों के आत्ममुग्ध संपादकों और पत्रकारों के कहे मुताबिक नहीं चल रहा

इधर टीवी चैनलों के कुछ संपादक-पत्रकारों को यह भ्रम हो गया है कि वही देश चला रहे हैं. उन्हें यह भी भ्रम है कि वे जैसे चाहेंगे, देश वैसे ही चलेगा या उसे वैसे ही चलना चाहिए. पत्रकारों में यह भ्रम नई बात नहीं है. कुछ वर्षों पहले एक बड़े अंग्रेजी अखबार के संपादक ने अपनी हैसियत का बखान करते हुए दावा किया था कि दिल्ली में प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताकतवर कुर्सी उन्हीं की है. लेकिन नई बात यह है कि टीवी चैनलों के कई पत्रकारों को यह मुगालता कुछ ज्यादा ही होने लगा है. यही नहीं, कई चैनलों के संपादक-पत्रकार अपने को प्रधानमंत्री से भी ताकतवर मानने लगे हैं. कुछ तो खुद को कानून, न्याय प्रक्रिया, संविधान आदि से भी ऊपर मान बैठे हैं. वे खुद के चेहरे, आवाज़ और विचारों से इस हद तक आत्ममुग्ध हैं कि माने-ठाने बैठे हैं कि देश उनकी तरह ही सोचे, बोले, देखे और सुने. इसके लिए वे हर रात प्राइम टाइम पर अपनी कचहरी लगाकर बैठ जाते हैं जहां फैसले पहले से तय होते हैं और बहस सिर्फ उसकी पुष्टि और दर्शकों के मनोरंजन के लिए होती है. 

लेकिन भ्रम, भ्रम होता है. वह सच नहीं हो सकता. समाचार चैनलों के भारी राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव के बावजूद सच यह है कि संपादक-पत्रकारों के कहे मुताबिक देश नहीं चल रहा है और न ही वे देश चला रहे हैं. ऐसा नहीं है कि यह तथ्य इन आत्ममुग्ध संपादक-पत्रकारों को पता नहीं.  लेकिन वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं. इस कारण उनमें से अधिकांश में एक खास तरह की जिद, आक्रामकता, घमंड और बड़बोलापन आ गया है. नतीजा- वे सुनते नहीं, सिर्फ बोलते हैं. बहस नहीं करते, सिर्फ फैसला सुनाते हैं और संवाद नहीं, एकालाप करते हैं.    

ऐसे ही एक टीवी संपादक-पत्रकारों के शिरोमणि हैं- अंग्रेजी समाचार चैनल ‘टाइम्स नाउ’ के संपादक अर्णब गोस्वामी. उन्हें भी यह मुगालता है कि देश वही चला रहे हैं. उनका यह मुगालता जिद की हद तक पहुंच चुका है. इस जिद से निकली आक्रामकता उनकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है. असल में, उनकी एंकरिंग की सबसे बड़ी ‘खूबी’ उनकी इसी आक्रामकता को माना जाता है जो बड़बोलेपन की सीमा को कब का पार कर चुकी है. इसी से जुड़ी अर्णब की दूसरी बड़ी ‘खूबी’ यह है कि अपने आगे वे किसी की नहीं सुनते. उनके सवालों, तर्कों और तथ्यों का कोई जवाब हो या नहीं हो लेकिन उनके फेफड़ों का कोई जवाब नहीं है. 

निश्चय ही, समाचार चैनलों के लिए थोक के भाव बंटने वाले पुरस्कारों में सबसे ताकतवर फेफड़े का पुरस्कार निर्विवाद रूप से अर्णब गोस्वामी को मिलना चाहिए. उनकी आत्ममुग्धता का आलम यह है कि हर रात प्राइम टाइम पर कभी एक घंटे, कभी डेढ़ और कभी दो घंटे तक कथित तौर पर ‘देश के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों’ पर अपने चुनिंदा अतिथियों के साथ चर्चा में 60 प्रतिशत समय टीवी स्क्रीन पर खुद ही बोलते या दीखते हैं. इन चर्चाओं की खास बात यह है कि उनके कुछ प्रिय विषय और प्रिय अतिथि हैं जो घूम-फिरकर हर दूसरे-तीसरे-चौथे दिन चैनल पर आ जाते हैं. उनका सबसे प्रिय और सदाबहार विषय है- पाकिस्तानी आतंकवाद. कहने की जरूरत नहीं है कि अर्णब पाकिस्तान और आतंकवाद को एक-दूसरे का पर्याय मानते हैं. आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान और आतंकवाद पर होने वाली उनकी सभी बहसों का निष्कर्ष बिना किसी अपवाद के एक ही होता है- पाकिस्तान एक दुष्ट और विफल राष्ट्र है, इस्लामी आतंकवाद की धुरी और उसका निर्यातक है, तालिबान और अल-कायदा उसे चला रहे हैं और भारत को उससे बात करने की बजाय उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. मुंबई में 26/11 के आतंकवादी हमलों के बाद अर्णब का यह अंध पाकिस्तान विरोध युद्धोन्माद भड़काने तक पहुंच गया था. अगर देश सचमुच उनके कहे मुताबिक चला होता तो अब तक पाकिस्तान के साथ चार-पांच बार युद्ध जरूर हो चुका होता. अलबत्ता दो परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच इन युद्धों का नतीजा क्या होता, बताने की जरूरत नहीं है. इसी तरह, अगर देश अर्णब और उनके ‘हिज मास्टर्स वॉयस’ अतिथियों के कहे अनुसार चला होता तो माओवाद से लड़ने के नाम पर अब तक सेना और वायु सेना उतारी जा चुकी होती. बस्तर-दंतेवाड़ा में कारपेट बम बरसाए जा रहे होते. फिर ना जाने कितने निर्दोष लोगों का खून बहा होता?                          

लेकिन राहत की बात यह है कि देश इन आत्ममुग्ध टीवी संपादक-पत्रकारों के कहे मुताबिक नहीं चल रहा है. उम्मीद करनी चाहिए कि देश आगे भी इसी तरह अपना संयम बनाए रखेगा.   

एक साल कई सवाल

किसी सरकार का एक साल पूरा कर लेना कोई बड़ी बात नहीं है. ख़ासकर तब, जब वह इसके पहले पांच साल पूरे कर चुकी हो. इसके बावजूद उनकी यूपीए सरकार जिस तरह एक साल का जश्न मना रही है, उससे हैरानी होती है. मनमोहन सिंह को यह मौका इतना बड़ा लगा कि वे पूरे चार साल बाद पत्रकारों से मुखातिब हुए. कह सकते हैं कि यह सारा तामझाम यूपीए की पहली पारी में भी हुआ था- तब भी साल भर पूरे होने पर डिनर हुआ, मेहमान बुलाए गए और सरकार का रिपोर्ट कार्ड जांचा-बाचा गया. लेकिन उसका फिर भी एक तर्क था. कांग्रेस पूरे आठ साल बाद सत्ता में वापसी कर रही थी और यूपीए बिल्कुल नया प्रयोग था- एक-दूसरे को समझने और एक साथ आगे बढ़ने के लिहाज से वह कवायद शायद ज़रूरी थी.

सरकार के मंत्रियों की पूंजी के खेलों में गैरजरूरी दिलचस्पी है. उनकी सारी सक्रियता किसी लॉबी, किसी जोड़तोड़, किसी जुगाड़ में है

लेकिन यूपीए की दूसरी पारी का पहला साल इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्या इसलिए कि अचानक सरकार कई सवालों से घिरी हुई है? क्या इत्तिफाक है कि पिछले कुछ दिनों में एक-एक कर सरकार के कई मंत्रियों पर विवादों का साया पड़ता रहा. अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को तब जाना पड़ा जब आईपीएल की एक नई टीम खरीदने के सिलसिले में उनकी होने वाली पत्नी का नाम उछला. नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के ई-मेल से आईपीएल के नफा-नुकसान को लेकर चला एक आकलन शशि थरूर तक पहुंचने की बात आते फिर सरकार की जगहंसाई हुई. उसी दौरान यह भी पता चला कि प्रफुल्ल पटेल की बेटी आईपीएल की हॉस्पिटैलिटी मैनेजर है और पिताजी के मंत्रालय के विमानों के रूट बदलवाती रही है- कम से कम दो बार तो यह बात सामने आ ही गई.

थरूर चले गए और पटेल बच गए- इसके पीछे की यूपीए की राजनीतिक मजबूरी की चर्चा फिलहाल न भी करें तो इस प्रसंग ने यह बताया कि सरकार के मंत्रियों की पूंजी के खेलों में गैरजरूरी दिलचस्पी है. वे बतौर मंत्री क्या कर रहे हैं, यह नहीं पता, लेकिन उनकी सारी सक्रियता किसी लॉबी, किसी जोड़तोड़, किसी जुगाड़ में है. इस जो़ड़तोड़ के और भी चेहरे सामने आने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. सरकार के एक और जिम्मेदार प्रतिनिधि, वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश चीन जाकर बोल आए कि गृह और रक्षा मंत्रालय चीनी कंपनियों को लेकर अतिरिक्त चौकन्नापन दिखाते हैं जो ठीक नहीं है. कहा गया कि इस मामले में उन्हें प्रधानमंत्री की भी फटकार झेलनी पड़ी.

इन सबके बीच स्पेक्ट्रम 2 के घोटाले में ए राजा की संलिप्तता की खबरें उछलीं और यह बात भी सामने आई कि इस मामले में उन्होंने प्रधानमंत्री की भी सलाहों की अनदेखी करते हुए फैसले लिए. हालांकि प्रधानमंत्री ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ए राजा का बचाव किया, लेकिन इस बचाव पर कितने लोगों को भरोसा होगा, कहना मुश्किल है.मंत्रियों की सक्रियता ही नही, निष्क्रियता भी चर्चा में रही. महंगाई को लेकर कृषि मंत्री शरद पवार की आलोचना होती रही और उन्हें महंगाई मंत्री का नाम भी दिया गया. कभी किसी उम्मीद में वे बताते कि महंगाई चार दिन की मेहमान है और कभी किसी हताशा में कहते कि वे ज्योतिषी नहीं हैं कि इसके ख़त्म होने की भविष्यवाणी कर सकें.

जनता से कटी ऐसी सरकारें पूंजीशाहों के खेल में आसानी से फंस जाती हैं, विवादों में घिरती हैं और अंततः  अविश्वसनीय नज़र आने लगती हैं

और इन मंत्रियों की बात छोड़ दें. सरकार के जो सबसे समर्थ और सफल मंत्री बताए जा रहे हैं, वे पी चिदंबरम भी नक्सलवाद के विरुद्ध अपने तथाकथित साझा अभियान में पिट ही रहे हैं. सिर्फ नक्सली पलट कर हमले नहीं रहे हैं, कांग्रेसी नेता भी चिदंबरम की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं.
तो क्या सरकार वाकई इतनी नाकाम और बिखरी हुई है? आखिर पहले पांच साल जो सरकार सारी आलोचनाओं के बावजूद काफी संभल कर चलती दिखी, उसके कदम क्यों बहक रहे हैं? क्या यह सत्ता में वापसी का अहंकार है जो अब सरकार के सिर चढ़कर बोल रहा है? या एक तरह की लापरवाही है कि अभी तो चुनाव चार साल दूर हैं?

इन सरलीकरणों से हमें इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे. दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की, उसमें इन सरलीकरणों को दूर करने के लिए उन्होंने दूसरे सरलीकरणों का सहारा लिया- नतीजा यह हुआ कि साल भर पूरा होने के बाद की रस्म अदायगी रही हो या रणनीति, प्रधानमंत्री जनता को भरोसे में लेने में और भरोसा दिलाने में नाकाम रहे. नाकामी सिर्फ इस बात की नहीं है कि मंत्री ठीक से काम नहीं कर रहे या सही फैसले नहीं ले रहे. सच तो यह है कि जो मंत्री काम करने निकलता है, वह अपने सामने समस्याओं का एक विराट जंगल पाता है. इस सरकार के सबसे सक्रिय मंत्रियों में एक, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में सुधार और रद्दोबदल तक के कई साहसी कदम उठाने की कोशिश की, लेकिन उनका एक-एक कदम बता रहा है कि उनके आगे का रास्ता कितनी चुनौतियों से भरा है. प्राथमिक शिक्षा की जड़ता और उच्च शिक्षा की अराजकता- दोनों इतनी व्यापक है कि उनसे पार पाना आसान नहीं.

यही बात पी चिदंबरम के बारे में कही जा सकती है. वे एक लुंजपुंज व्यवस्था लेकर नक्सलवाद से लेकर आतंकवाद तक से लड़ने निकले हैं. वे नक्सलवाद का सामना करने के लिए विकास का सहारा लें या बंदूक का, उनके पास एक जंग खाई व्यवस्था है जो न विकास कर सकती है न बंदूक चला सकती है. मंत्री के दबाव से जब यह व्यवस्था काम करने निकलती है तो विकास के नाम पर लोगों को उजाड़ती है और नक्सलवादियों की जगह आम लोगों को निशाना बनाती है. फिर रास्ता क्या हो? क्या इस लुंजपुंज व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता? इसी सवाल पर मनमोहन सिंह कुछ निराश करते हैं. वे अपनी पूरी बुनावट में एक सज्जन अफसरशाह से ज्यादा कुछ नहीं लगते. वे आंकड़ों की बात करते हैं, व्यवस्था की बात करते हैं, वे नए सपनों की, नए साहस की, नई उड़ानों की कल्पना करते नेता नजर नहीं आते. यह चीज उन्हें एक कमजोर प्रधानमंत्री में बदलती है और प्रधानमंत्री बनने की उनकी किस्मत पर रश्क करने वाले दूसरे कांग्रेसी नेताओं को यह कहने का मौका देती है कि असली प्रधानमंत्री तो सोनिया गांधी हैं और भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी.

ये सारी बीमारियां यूपीए की पहली पारी में भी रही होंगी. लेकिन तब वे इतनी सार्वजनिक क्यों नहीं हुईं? इसकी एक वजह यह है कि वाकई तब सरकार ने यथास्थिति को तोड़ने और बदलने वाले कुछ बड़े फैसले किए. कम से कम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना- जिसे हमारी कल्पनाहीन अनुवाद बुद्धि नरेगा या मरेगा जैसी बेजान संज्ञा देती है- और सूचना का हक- जिसे आरटीआई कहने का फैशन है- दो ऐसे बड़े फैसले थे जिनकी वजह से कुछ प्रशासनिक उनींदापन भी टूटा और कुछ निचले स्तरों पर रोज़गार की हलचलें भी हुईं. दरअसल, तब एनडीए के फील गुड के गुब्बारे को फूटे ज्यादा वक्त नहीं हुआ था और सरकार सावधान थी. वित्त मंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने किसानों के 60,000 करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने का एलान किया था. साफ है कि सरकार जब जनता के पास जाती है तो जनता भी सरकार के साथ आती है.

पिछली बार शायद सरकार के साथ लेफ्ट फ्रंट की हिस्सेदारी भी उसे जनता की तरफ बार-बार जाने को मजबूर करती थी. लेकिन यूपीए की पहली और दूसरी पारी का सबसे बड़ा फर्क यही है कि सरकार जनता की तरफ नहीं देख रही. उसके वर्गीय पूर्वाग्रह बेहद साफ नजर आ रहे हैं. शिक्षा का अधिकार पारित हो गया है, लेकिन उसके क्रियान्वयन पर कोई जोर नहीं है. सूचना के अधिकार में कटौती की कोशिश चल रही है जो अब तक, शायद सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से रुकी हुई है. महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित हुआ तो मनमोहन के मनोबल से नहीं, सोनिया गांधी की जिद से. सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे बुनियादी सवालों पर सरकार की दुविधाएं बेहद स्पष्ट हैं. इन सबके बीच नक्सलवाद के समर्थकों का आरोप है कि सरकार आदिवासियों की हितैषी नहीं, पूंजीपतियों की एजेंट है और उन्हीं के लिए वह जंगलों पर कब्जा़ करने और आदिवासियों को उजाड़ने में लगी है. जाहिर है, जनता से कटी ऐसी सरकारें पूंजीशाहों के खेल में आसानी से फंस जाती हैं, विवादों में घिरती हैं और अंततः अविश्वसनीय नज़र आने लगती हैं. यूपीए का अगर यह हाल हुआ नहीं है तो जल्दी ही हो सकता है. आखिर अपनी ईमानदारी के लिए विख्यात मनमोहन सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो वे बताते कम, छुपाते ज्यादा दिखे. और उनसे सीधे-सीधे पूछ लिया गया कि वे राहुल गांधी के लिए पद छोड़ेंगे या नहीं. दरअसल, कहीं न कहीं यह लगने लगा है कि कांग्रेस भी अपने इस दफ्तरशाह प्रधानमंत्री से ऊबी हुई है और उस नेता का इंतज़ार कर रही है जो उत्तर प्रदेश और हरियाणा की दलित और पिछड़ी बस्तियों में अपने दिन-रात लगा रहा है कि इस देश को और उसके लोगों को बेहतर ढंग से समझ सके. निश्चय ही राहुल गांधी ने पिछले पांच-सात साल से जिस तरह लोगों के बीच जाना शुरू किया है, उससे लगता है कि वे अपने-आप को नेता के तौर पर किसी भी दूसरे कांग्रेसी के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से तैयार कर रहे हैं. लेकिन वे भविष्य के नेता भले हों, वर्तमान का रास्ता तो मनमोहन सिंह और उनकी सरकार को ही बनाना है. मनमोहन सिंह ने कहा कि बहुत-से काम अधूरे हैं. उन्हें यह एहसास भी होना चाहिए कि ये तभी पूरे हो सकते हैं जब उनकी सरकार जनता के ज्यादा करीब जाएगी, अफसरों और एजेंसियों पर कम भरोसा करेगी.

बंबई नगरिया में भोजपुरी भइया

छत्तरपुर में बने फिल्म के इस सेट पर काफी हलचल है. हलचल उस केबिन में भी है जहां फिल्म का एक अहम किरदार अभी-अभी लखनऊ से कांग्रेस की एक रैली में शामिल होकर हेलिकॉप्टर से लौटा है. इतनी थका देने वाली रैली के बावजूद भोजपुरी के इस सुपरस्टार के लिए यह आराम का वक्त नहीं है, रवि किशन को जल्दी ही फिल्म के अगले शॉट की तैयारी करनी है. हिंदी के मुख्यधारा के सिनेमा में तेजी से स्थान बना रहे रवि की यही वह खूबी है जिसकी बदौलत उन्हें भारत के सफलतम निर्देशक मणिरत्नम की रावण और अमेरिकी कंपनी पन फिल्म्स की द मैन फ्रॉम बनारस में काम करने का मौका मिला. रावण में वे अभिषेक बच्चन के बड़े भाई के किरदार में हैं तो अंगेजी फिल्म द मैन फ्रॉम बनारस में वे एक नंग-धड़ंग अघोरी बने हैं. वैसे इस खालिस देसी कलाकार के अंतरराष्ट्रीय फिल्मों से जुड़ाव की यह पहली घटना नहीं है. पिछले दिनों जब कोलंबिया पिक्चर ने स्पाइडर मैन-3 को भोजपुरी में डब करने की योजना बनाई तो कंपनी की एक ही शर्त थी – स्पाइडर मैन के लिए रवि किशन की आवाज ही चाहिए.

‘ बिग बॉस के प्रतिभागी मुझे भोजपुरी एक्टर कहकर बुलाते थे, जबकि मैं उतनी ही अच्छी बंगाली, मैथिली और मराठी बोल सकता हूं, सालों तक मैंने उर्दू थिएटर में काम किया है ‘

इस सुपरस्टार की एक और बड़ी खासियत है उनका हिंदी पट्टी वाला मिलनसार मिजाज. यही वजह है कि बिग बॉस – 2 के दौरान रवि छोटे पर्दे पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले कलाकारों में शामिल रहे और यहीं से वह एक लाइन ‘जिंदगी झंडवा फिर भी घमंडवा ‘ इस अभिनेता की पहचान बन गई. आज रवि, रजनीकांत जैसे भारत के उन गिन-चुने क्षेत्रीय अभिनेताओं में शामिल हो चुके हैं जो शहरी कुलीन तबके के बीच खासा जाना-पहचाना नाम है. अपने केबिन में लगे पलंग पर आराम की मुद्रा में बैठे रवि से जब हमारी मुलाकात होती है तो हमारा पहला वास्ता उनके भोजपुरी सहजता वाले मिजाज की बजाय कुछ किताबी सभ्याचार से पड़ता है. वे अपनी सिगरेट जलाने के पहले औपचारिकता निभाते हुए हमें भी सिगरेट पीने का प्रस्ताव देते हैं. इन औपचारिकताओं को एक बार किनारे कर जब हम बातचीत शुरू करते हैं तो हमें अहसास होता है कि इस अभिनेता का एक ही फलसफा है, जिंदगी अभिनय है और अभिनय जिंदगी. सेट पर लगी फ्लोरेसेंट लाइटों की ओर इशारा करते हुए रवि हमसे कहते हैं,’मैं जब घर में होता हूं तब भी मुझे इस तरह की लाइटिंग पसंद आती है.’

जौनपुर में जन्मे रवि किशन की अभिनय यात्रा की शुरुआत स्थानीय नौटंकियों से हुई थी. यहां वे रामलीला में सीता बना करते थे. लेकिन यह बात उनके पिता को नापसंद थी, रवि बताते हैं, ‘मेरे पिता डिप्टी कलेक्टर थे, जब उन्हें पहली बार मेरे रामलीला में काम करने की बात पता चली तो उन्होंने मेरी बेतरह पिटाई की.’ हालांकि इस दौरान रवि की मां हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं. पिता से पिटाई के बाद भी उन्होंने अपने बेटे को सीता की भूमिका के लिए साड़ियां देना जारी रखा. अपनी मां के बारे में बात करते हुए रवि कहते हैं, ‘जब एक नन्हा पंछी उड़ना चाहता  है तो उसकी मां को उसे आगे बढ़ाना चाहिए ताकि वह पंखों का इस्तेमाल करना सीख सके.’ बातचीत में अक्सर इस तरह के दार्शनिक अंदाज में आ जाने की खूबी भी रवि के लिए ‘राखी का स्वयंवर’ (जहां उनका काम राखी सावंत के बड़े भाई बनकर शादी के इच्छुक उम्मीदवारों को जांचना-परखना था) और ‘राज पिछले जनम का’ (इस कार्यक्रम में उन्हें खुद के बारे में पता चला कि वे एक नागा साधु थे, इस बारे में वे कहते हैं कि उन्हें पता था कि उनकी पिछली जिंदगी उनकी दो सबसे पसंदीदा चीजों- सेक्स या शिव से जुड़ी रही होगी) के दौरान काफी काम की साबित हुई. अपने संघर्ष के दिनों में कई साल मुंबई के लोखंडवाला के एक कमरे वाले फ्लैट के भीतर रहते हुए रवि का एक ही सपना था- अगला अमिताभ बच्चन बनना. हालांकि आज 20  से ज्यादा हिंदी फिल्मों और जय हनुमान जैसे प्रसिद्घ टीवी धारावाहिकों में काम करने के बाद रवि देश में एक जाना-माना चेहरा जरूर बन गए हैं फिर भी बॉलीवुड का महानायक बनने की राह पर उन्हें अभी लंबा सफर तय करना है.

रवि के संघर्ष के दिनों में जब एक दोस्त ने  पहली बार यह सलाह दी थी कि उन्हें भोजपुरी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमानी चाहिए तब रवि की इस पर गुस्से में प्रतिक्रिया थी, ‘ भोजपुरी फिल्में देखता कौन है? क्या तुम मेरा करियर बर्बाद करना चाहते हो?’ लेकिन बाद में अपनी मां के कहने पर रवि ने इस तरफ सोचना शुरू कर दिया. उस समय भोजपुरी सिनेमा एक ऐसी सल्तनत थी जिसका कोई बादशाह नहीं था. इसी समय 2003 में रवि की पहली भोजपुरी फिल्म सैंया हमार रिलीज हुई. अपनी पहली ही फिल्म से रवि ने उत्तर प्रदेश और बिहार में तूफान मचा दिया और इस फिल्म के बाद ही यह माना जाने लगा कि रवि किशन के रूप में भोजपुरी फिल्मों को सबसे बड़ा सितारा मिल गया है. फिल्म से मिली लोकप्रियता के बारे में  बात करते हुए रवि बताते हैं, ‘बिहार में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान शाम के सात बजते ही मुझे अपने कमरे में बंद कर दिया जाता था क्योंकि वहां की भीड़ मुझसे मिलने के लिए ऐसे टूट पड़ती थी जैसे हमारा होटल ही तोड़ डालेंगे. महिलाएं सिंदूर और मालाएं लेकर बाहर खड़ी हो जाती थीं.’

रवि को अपना और भोजपुरी सिनेमा का ‘गॉडफादर’  मानने वाले उनके सहायक सागर हमें यह जानकारी देते हैं कि रवि की बदौलत आज भोजपुरी सिनेमा 100 करोड़ से ज्यादा का उद्योग है और इसमें 40 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ है. रवि के मेकअप मैन हितेश के लिए वे उसके असली हीरो हैं. तकरीबन 130 भोजपुरी फिल्मों में रवि का मेकअप कर चुके हितेश कहते हैं, ‘मैं अपने आखिरी वक्त तक सर के साथ रहना चाहता हूं.’ फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर के निर्देशक श्याम बेनेगल रवि के बारे में कहते हैं, ‘मैंने उन्हें अपनी फिल्म (वेलकम टू सज्जनपुर) के लिए इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें हर तरह की भूमिका में महारत हासिल है, साथ ही उनमें भोजपुरी अंदाज की सहजता भी है. हालांकि उनके साथ काम करते हुए मैंने पाया कि वे जितने कमाल के अभिनेता हैं उतनी ही जबर्दस्त उनकी कॉमेडी टाइमिंग है, इसके अलावा वे खूबसूरत तो हैं ही.’ 

रवि किशन के लिए बिग बॉस से बाहर होना भी बेहद यादगार मौका था. उस वक्त उन्हें कई लोगों ने फोन किए थे. तब रवि को पहली बार एहसास हुआ था कि शहरी अंग्रेजीदां युवा उनको उसी सहजता के साथ स्वीकार कर रहा है जितना वह अक्षय कुमार को करता है. लेकिन उन्हें यह भी एहसास था कि उन्हें अक्षय के गढ़ बॉलीवुड में स्वीकार्यता के लिए अभी काफी इंतजार करना है. इससे जुड़ी अपनी पीड़ा बताते हुए रवि कहते हैं, ‘बिग बॉस के प्रतिभागी मुझे भोजपुरी एक्टर कहकर बुलाते थे, जबकि मैं उतनी ही अच्छी बंगाली, मैथिली और मराठी बोल सकता हूं. सालों तक मैंने उर्दू थिएटर में काम किया है. फिर भी वे मेरे साथ ऐसा व्यवहार करते थे जैसे मैं उनकी कैटिगरी का नहीं हूं.’
भोजपुरी सिनेमा में रवि किशन सबसे बड़ा नाम हैं. ऐसे में बॉलीवुड के चरित्र किरदारों के लिए चुने जाने से पहले रवि के सामने सबसे पहली चुनौती इस छवि से निजात पाना ही थी. रवि के लिए मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में प्रवेश का काम श्याम बेनेगल ने सुगम बनाया. उन्होंने अपनी फिल्मों वेलकम टू सज्जनपुर और वेलडन अब्बा में उन्हें मौका देकर उनके आगे की राह साफ कर दी. बेनेगल कहते हैं, ‘उन्होंने बॉलीवुड का सपना जिया है, और उन्हें उसमें बुरी तरह असफल होने का भी एहसास है. इसलिए इस आदमी में सिर उठाकर और एक ताजेपन के साथ आगे बढ़ने की काबिलियत है.’ तो क्या बॉलीवुड में देर से लेकिन इतनी जबर्दस्त पहचान उनके सालों के संघर्ष का मुआवजा है? इस सवाल पर रवि कहते हैं,  ‘यह सब किस्मत की बात है. मैं पूरी जिंदगीभर शिवभक्त रहा. मुझे पता था कि सफलता के लिए जिंदगीभर इंतजार नहीं करना पड़ेगा- अब मेरा वक्त आ चुका है.’   

दुनिया की साझी धरोहर

चमोली जिले के सलूड़ गांव में आधे से ज्यादा घरों की छतों पर आपको डिश एंटीना लगे दिख जाएंगे. ये इस बात की चुगली करते लगते हैं कि उत्तराखंड के इस सुदूर क्षेत्र में भी मनोरंजन का नाम बंद दरवाजों के पीछे टीवी देखना हो गया है. मगर अप्रैल के दूसरे पखवाड़े में यहां होने वाले एक उत्सव और उसमें जुटी भीड़ देखकर यह बात पूरी तरह से मानने का मन नहीं होता. रम्माण नाम के इस आयोजन को पिछले ही साल यूनेस्को ने अमूर्त कलाओं की श्रेणी में  ‘विश्व की सांस्कृतिक धरोहर’ घोषित किया है.

रम्माण के दौरान होने वाले मुखौटा नृत्य के कथानकों में पहले के पशुचारक समाज की पर्यावरणीय चिंताएं तथा सामाजिक सरोकार भी झलकते हैंदरअसल, जोशीमठ तहसील के कुछ गांवों में रामायण गायन, मंचन और मुखौटा नृत्यों की अनूठी लोक उत्सव परंपरा है. रम्माण शब्द रामायण का ही अपभ्रंश है जिसका गायन गढ़वाली भाषा में होता है. यह एक धार्मिक उत्सव है जिसका आयोजन जोशीमठ के सलूड़-डुंग्रा,डंुग्री-भरोसी व सेलंग गांवों में किया जाता है. सलूड़ में क्षेत्र की रक्षा करने वाले देवता-भूमि क्षेत्रपाल या भूमियाल की हर साल अप्रैल (वैशाख) के महीने पूजा होती है. यह पूजा नौ से लेकर तेरह दिनों तक चलती है. इस मौके पर गांव के लोग धियाणियों (ब्याही हुई बहन-बेटियों) तथा रिश्तेदारों को बुलाते हैं. इस पूजा कार्यक्रम के दूसरे दिन विसुखा के मेले के साथ हर दिन होने वाला मुखौटा नृत्य तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं.

मुखौटा नृत्यों के कथानकों में निरंकार (जलंकार) से पृथ्वी की उत्पत्ति जैसे गूढ़ विषय भी नृत्य और स्थानीय गायन से साधारण ढंग से समझाए जाते हैं. पौराणिक विषयों पर आधारित अन्य नृत्यों में ईश्वर के अवतार, गणेश-कालिका नृत्य, स्वर्ण-मृग नृत्य, नृसिंह नृत्य आदि होते हैं. हर दिन इन कार्यक्रमों में नयापन लाने के लिए स्थानीय दंत कथाओं और लोक कथाओं पर आधारित मुखौटा नृत्य भी होते हैं. इन नृत्यों में नारद का स्थानीय रुप बुढदेवा हास्य-प्रहसनों के द्वारा दर्शकों का खूब मनोरंजन करता है. सारे शरीर पर कंटीली घास चिपकाकर जब बुढदेवा दर्शकों की भीड़ के बीच घुसता है तो एक हलचल-सी पैदा हो जाती है.

मुखौटा नृत्य के कथानकों में पहले के पशुचारक समाज की पर्यावरणीय चिंताएं तथा सामाजिक सरोकार भी झलकते हैं. इन नृत्यों में 20-22 मुखौटे (पत्तर) प्रयोग में लाए जाते हैं. इनमें से सबसे बड़ा पत्तर नृसिंह का है जिसका वजन लगभग 20 किलो होता है. भूमियाल पूजा के आखिर में सारे दिन रम्माण का गायन और मंचन होता है. यानी राम-जन्म से लेकर राजतिलक तक की घटनाओं का. रम्माण शैली में पात्रों के बीच संवादों का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि जागरी (रामायण गायन करने वाला) रामायण गायन करता है और पात्र इस पर नृत्य या अभिनय करते हैं.

गढ़वाल विश्वविद्यालय के ‘लोक-कला और संस्कृति निष्पादन केंद्र’ के विभागाध्यक्ष प्रो डीआर पुराहित बताते हैं, ‘मुखौटा नत्य की परंपरा आदि शंकराचार्य के समय से शुरू हुई थी.’ पुरोहित वर्ष 1990 से रम्माण में सम्मिलित हो रहे हैं. आगे बताते हुए वे कहते हैं कि पहले बदरीनाथ यात्रा शुरू होने से पहले चैत्र के महिने जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में एक सप्ताह का मेला लगता था. इस मेले में यात्रियों के मनोरंजन के लिए मुखौटा नृत्य और रम्माण गायन होता था. जोशीमठ से शुरू होकर यह नृत्य आसपास के सारे गांवों में फैल गया. परंतु अब केवल तीन गांवों में ही मुखौटा नृत्य होते हैं. जोशीमठ में भी यह नृत्य नहीं होता.

सलूड़-डुंग्रा के निवासी डॉ कुशल सिंह भण्डारी बताते हैं कि ये धार्मिक आयोजन सदियों से होते आए हैं. उनके गांव में रम्माण आयोजन के 100 साल पुराने लिखित दस्तावेज उपलब्ध हैं. उनका कहना है कि उससे पहले गांव में कोई भी साक्षर नहीं था. वर्ष 2008 में इंदिरा गांधी  राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली में रामकथा गायन-वाचन व मंचन सम्मेलन का आयोजन हुआ, इसमें सलूड़ की रम्माण को भी गायन और मंचन के लिए बुलावा आया. इस आयोजन से रम्माण राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय राम-कथा समीक्षकों के सामने आई. अमेरिकी रामकथा विद्वान पाॅल रिचर्मिन इस शैली से अभिभूत थीं. इदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने सलूड़ आकर मेले का अभिलेखीकरण किया. डॉ भण्डारी बताते हैं, ‘रिचर्मिन की प्रेरणा से रम्माण के अभिलेखों को यूनेस्को भेजा गया. यूनेस्को ने रम्माण के पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए इसे वर्ष 2009 में अमूर्त कलाओं की श्रेणी में विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया.’

रम्माण में प्रयोग किए जाने वाले पत्तर भोज पत्र नामक पेड़ की लकड़ी से बनाए जाते हैं. डॉ भंडारी बताते हैं, ‘पहले के पत्तर अधिक जीवंत थे लेकिन 2002-2003 में वे सारे चोरी हो गए. चोरों ने सलूड़-डुंग्रा के अलावा बड़गांव, लाता, सेलंग आदि गांवों के सारे पुराने मुखौटे गायब कर दिए.’ सुखद बात यह है कि इसके बावजूद रम्माण के प्रति लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ है. सलूड़ निवासी शरत सिंह रावत बताते हैं कि गांव की इस परपरा को वे पहले से ही दिल लगाकर निभाते थे अब अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद इससे जुड़ाव में और भी गौरव होता है. 

'खाए-पियों' का मैचमेकर

चार साल से नरेश सिद्धू के माता-पिता परिवार की बहू के लिए  हाथ-पांव मार रहे थे. उन्होंने कई मैरिज ब्यूरो से संपर्क किया, शादी की तमाम वेबसाइटों पर उसका प्रोफाइल डाला, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया. वे जानते थे कि ऐसा क्यों हो रहा है. वजह थी नरेश का मोटापा. दिल्ली में अपना कारोबार करने वाले 30, ‘उन दिनों मेरा वजन 90 किलो था. हमेशा यही होता था. लड़कियों के मां-बाप आते मगर मुझे देखते ही अचकचा-से जाते. जाने के बाद उनका फोन आता और वे कहते कि यह रिश्ता नहीं हो पाएगा.’ साल के नरेश फीकी मुस्कान के साथ बताते हैं

फिर एक दिन बिना किसी को बताए नरेश ने अपने जैसे लोगों के लिए ही बनी वेबसाइट ओवरवेट शादी डॉट कॉम पर अपना रजिस्ट्रेशन करवा दिया. उन्हें हैरानी हुई जब कुछ ही हफ्तों बाद ऑनलाइन चैट करते हुए उनकी मुलाकात एक लड़की से हुई जो उनकी तरह ही संगीत का शौक रखती थी. नरेश बताते हैं, ‘मुझे एक ऐसी लड़की मिल ही गई जो मेरी भीतरी सुंदरता देख सकती थी. हमारी जम गई. मैंने पूरी दुनिया को यह बात बताई और सबकी खुशी का पारावार न रहा. हमने पिछले साल ही शादी की है. यह मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा वक्त है.’

‘हमेशा यही होता था. लड़कियों के मां-बाप आते मगर मुझे देखते ही अचकचा-से जाते. जाने के बाद उनका फोन आता और वे कहते कि यह रिश्ता नहीं हो पाएगा’

नरेश को गुड़गांव में रहने वाली दो बहनों, अदिति सिंघल और मेघा गुप्ता का शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने 2008 में अपनी ही एक बहन की व्यथा से प्रभावित होकर यह वेबसाइट शुरू की थी. आज यह वेबसाइट ऐसे अविवाहितों के बीच चर्चा का विषय बनती जा रही है जो मोटापे के शिकार हैं.

शादी के नजरिए से देखें तो हमारी प्रचलित संस्कृति में मोटापे के प्रति हीनता आम बात है. हाल ही में शोएब मलिक-आएशा सिद्दीकी-सानिया मिर्जा के प्रेम त्रिकोण में दो बातें उजागर हुईं. पहली, आएशा ने अपना घर छोड़ने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे बेहद मोटी हैं और दूसरी बात शोएब ने उन्हें छोड़ा ही इसलिए क्योंकि उनके साथी खिलाड़ी कहते थे कि वे बहुत मोटी हैं. मौजूदा दौर की संस्कृति ने भी मोटापे के प्रति हीनभावना को हवा दी है. जी टीवी पर आ रहे एक लोकप्रिय धारावाहिक 12/24 करोलबाग में एक मां अपनी 30 साल की मोटी बेटी के भाग्य को लेकर हमेशा रोती-बिलखती रहती है और आखिरकार वह अपनी बेटी का ब्याह पीले दांतों वाले एक लंपट से कर देती है. गुरिंदर चड्ढा की नई फिल्म इट्स ए वंडरफुल आफ्टरलाइफ भी इसी विषय के इर्द-गिर्द रची गई है जिसमें एक सांवली-मोटी लड़की अपने लिए आदर्श पति की तलाश में है.

आज नरेश जब शादी से पहले की जिंदगी के बारे में सोचते हैं तो पाते हैं कि मोटापे के प्रति सामाजिक धारणाओं का उन पर बहुत गहरा असर पड़ा. वे बताते हैं, ‘मैं इस तिरस्कार को और नहीं झेल सकता था. मेरे परिवार का माहौल इसकी वजह से बहुत तनावपूर्ण हो गया था. मैंने इस वेबसाइट पर इसीलिए रजिस्ट्रेशन करवाया क्योंकि मेरा मोटापा यहां कोई मुद्दा नहीं था. और एक बार किसी ने आपके मोटापे को स्वीकार कर लिया तो उसके बाद वह आपके दूसरे गुणों की परख करता है ताकि वह आपके साथ जीवन बिताने का निर्णय ले सके.’

यह काम इसी तरह से हो यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरवेट शादी डॉट कॉम स्क्रीनिंग प्रक्रिया के दौरान अदिति बेहद सावधानी बरतती हैं. वे बताती हैं, ‘मैं व्यक्तिगत रूप से हर रजिस्ट्रेशन की जांच करती हूं. हम मौज मस्ती की तलाश कर रहे 18 साल के युवाओं को यहां आने की इजाजत नहीं देते, क्योंकि यह एक गंभीर मुद्दा है.’

गीतांजलि सिंह उन अभिभावकों में से एक हैं जिन्हें भरोसा नहीं होता था कि यह वेबसाइट कोई गंभीर प्रयास हो सकती है. वे अपनी 75 किलो की बेटी के लिए एक अच्छा दूल्हा तलाश करने में पांच साल खर्च कर चुकी थीं. वे कहती हैं, ‘मैं इसके बिल्कुल खिलाफ थी. लेकिन जब मैंने देखा कि मेरी बेटी के प्रोफाइल पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं तो मुझे एक उम्मीद दिखने लगी.’ इसी तरह की एक दु्खियारी मां अपनी 35105, ‘उनका मानसिक संतुलन डगमगाने वाला था मगर रजिस्ट्रेशन के दो महीने के भीतर ही उन्हें अपनी बेटी के लिए जीवनसाथी मिल गया.’ वर्षीया बेटी के साथ अदिति के पास पहुंची थीं जिसका वजन किलो था. अदिति बताती हैं.

हम अदिति से पूछते हैं कि क्या उनकी वेबसाइट पर ऐसे लोग भी आते हैं जो वास्तव में मोटे लोगों के प्रति आकर्षित हों. जवाब में वे कहती हैं, ‘हां, ऐसे सामान्य लोग भी खुद को रजिस्टर करवाते हैं जिन्हें मोटापे के शिकार लोगों के साथ शादी करने में कोई दिक्कत नहीं है.’ उनकी बात सही भी लगती है. उनकी बेबसाइट पर रजिस्टर्ड हर व्यक्ति मोटापे का शिकार नहीं है. संजना इसका उदाहरण हैं. 23 साल की संजना मुंबई की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती हैं. वे कहती हैं, ‘मैं एक ऐसा परिपक्व जीवनसाथी चाहती हूं जो मुझे मेरे वजन के इतर देखे. जब मैंने खुद को इस वेबसाइट पर रजिस्टर किया तो मेरे माता-पिता थोड़े आशंकित थे लेकिन मैं अपनी जिद पर अड़ गई.’

आखिर संजना की मुराद पूरी हुई. आजकल वे 27 साल के अंगद सूद के साथ डेटिंग कर रही हैं. अंगद का वजन 90 किलो से भी ज्यादा है और संजना खुश हैं कि उन दोनों को ही फोटोग्राफी का जुनून है. पेशे से चार्टेर्ड एकाउंटेंट अंगद खुद को खुशकिस्मत समझते हैं कि उन्हें संजना जैसी लड़की मिली. अब उन्होंने निश्चय कर रखा है कि अब इस रिश्ते में वे जाति और जन्मपत्री जैसी चीजों को बीच में नहीं आने देंगे. वे पंजाबी हैं जबकि संजना जाट.

मगर ऐसा कभी-कभी ही होता है. ऐसे रिश्तों में भी जाति और धर्म की एक बड़ी भूमिका होती है. अदिति बताती हैं, ‘अभिभावक हमें व्यक्तिगत रूप से फोन करते हैं. तमिल को तमिल रिश्ता ही चाहिए होता है और गुजराती को गुजराती. उनकी भी जाति और धर्म से जुड़ी मांगें होती हैं. यह दुख की बात है.’

वैसे यहां पर भी ऐसा हो सकता है कि वजन में थोड़ा-सा अंतर भी रिश्ता बना या बिगाड़ दे. 25 वर्षीय भाषा प्रशिक्षक राजेश सिंह का वजन 85 किलो है. तमाम लड़कियों द्वारा ठुकराए जाने के बाद उन्होंने यहां पर रजिस्ट्रेशन करवाया था. वे बिना हिचक के कहते हैं कि उनके सामने अगर दो लड़कियां हों और उनमें एक जैसे गुण हों तो वे दोनों में से पतली वाली को चुनेंगे. दिल्ली में रहने वाले राजेश बताते हैं, ‘आप मुझे पाखंडी कह सकती हैं, पर मैं ईमानदारी से यह बात बता रहा हूं. मेरा इस तरह से सोचना एकदम स्वाभाविक है.’  वे शौकिया टेनिस खेलते हैं लेकिन अपना वजन घटाने की चिंता उन्हें कभी नहीं रहती. वे शानदार जिंदगी और बढ़िया खाने की इच्छा रखते हैं और इसे छोड़ नहीं सकते. वे कहते हैं, ‘मैंने देखा है लोग सलाद के पत्तों पर जिंदगी बिताते हैं. मगर इसका कोई मतलब नहीं.’

फिलहाल शादीशुदा खुशहाल जिंदगी बिता रहे नरेश अपनी खोज से जुड़ी एक अजीब विडंबना का जिक्र करते हैं, ‘खुद के मोटा होने के बावजूद, जब मेरे परिवारवालों को पता चला कि मैंने दुल्हन की खोज में कोई विज्ञापन दिया है तो उन लोगों ने वही पुरानी शर्तें जोड़ दीं- जरूरत है- दुबली, लंबी, गोरी और खूबसूरत लड़की की.’ इसकी वजह सिर्फ यह थी कि उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि यहां पर उनका भी मूल्यांकन होगा.

तमाम विरोधाभासों के बावजूद ओवरवेट शादी डॉट कॉम को इस बात का श्रेय तो दिया ही जा सकता है कि उसने मोटापे से परेशान लोगों को उस दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग होने से बचाए रखा है जहां छरहरापन ही सुंदरता का सबसे बड़ा पैमाना है.

बेहतर नहीं तो यही सही

आंध्र प्रदेश सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की एक श्रेणी बनाकर 14 मुस्लिम समूहों को सरकारी नियुक्तियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने का फैसला किया है. इन समूहों में धोबी, फकीर, हाम और कसाई जैसे लोग शामिल हैं. पठान, अरब, मुगल तथा बोहरा जैसे अपेक्षाकृत समृद्ध समूहों को इससे बाहर रखा गया है.

फिलवक्त सर्वोच्च न्यायालय आंध्र प्रदेश सरकार के इस संवेदनशील कानून के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है, किंतु आगे भी ऐसा ही होगा कहा नहीं जा सकता. वह इसी कानून पर एक बार स्थगनादेश देने के बाद उसे हटाकर मामले को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के विचारार्थ भेज चुका है. उसके बाद उच्च न्यायालय के निर्णय को उलट कर उसने सरकार और कानून के पक्ष में 25 मार्च को अंतरिम निर्णय सुनाने के बाद अंतिम निर्णय के लिए इसे एक बड़ी संवधानिक पीठ के हवाले कर दिया है.

जिस तरह से आंध्र प्रदेश सरकार ने इससे पहले साल 2004 और फिर उसके बाद 2005 में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के उलट जाकर मुस्लिम समुदाय के लिए प्रदेश में आरक्षण का प्रावधान किया था – जिन्हें बाद में अदालतों ने अमान्य ठहरा दिया था – वह इस मसले पर आंध्र सरकार की नीयत पर तमाम सवाल खड़े करता है. मगर नीयत चाहे जो भी रही हो आरक्षण के लिए उसने जो आखिरी कानून पारित किया है उसपर विचार करें तो तमाम बातें उसके पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं

सबसे पहले तो हमें उन तर्कों को समझना होगा जो यह कहते हैं कि यह आरक्षण इसलिए भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की इजाजत नहीं देता. संविधान तो अनुसूचित जातियों को छोड़कर पिछड़ी जातियों को आरक्षण की बात भी नहीं करता था मगर उन्हें भी तो संविधान में संशोधन लाकर, इन जातियों को पिछड़ा वर्ग मानकर आरक्षण दिया ही जा रहा है. इसके अलावा आंध्र सरकार जो आरक्षण दे रही है वह सिर्फ पिछड़े मुसलमानों के लिए है न कि समूचे मुस्लिम समुदाय के लिए. यानी इन्हें भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग माने जाने में किसी को ज्यादा परेशानी होनी ही नहीं चाहिए.

मंडल आयोग की सिफारिश पर पिछड़े वर्गों के लिए जो आरक्षण लागू किया गया है उसमें मुस्लिम समुदायों के भी सौ के करीब समूह शामिल हैं. इसके बावजूद सिविल सेवा में मुस्लिम समुदाय का कुल प्रतिनिधित्व बढ़ने की बजाय कुछ घट ही गया है. दूसरे क्षेत्रों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थितियां हैं. ओबीसी आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा पिछड़े समुदायों के कुछ सबसे ज्यादा समृद्ध लोगों ने ही उठाया है. फिर ओबीसी आरक्षण में शामिल मुस्लिम समूह तो पिछड़ों के भी पिछड़े हैं. ऐसे में उनके लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान न हो तो क्या हो?

यह कैसे हो इसपर बहस हो सकती है मगर बिना शक अल्पसंख्यक समुदाय के पिछड़ों और वंचितों को भी इस सकारात्मक भेदभाव की जरूरत है और इसके लिए बदले जमाने की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हमें जातियों और जनजातियों के दायरे से बाहर जाकर सोचने की जरूरत है. या फिर हम इस भेदभाव का कोई और बेहतर तरीका सोचें!

संजय दुबे 

 

बीटी बैंगन और देश की सेहत का भर्ता

बीटी बैंगन और देश की सेहत का भर्ता

एक मामूली-सी सब्जी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा कैसे बन सकती है? शोमा चौधरी बता रही हैं कि किस तरह बीटी बैंगन हमारी जिंदगी के हर पहलू से जुड़ा है और अगर आप इसपर हो रही बहस का हिस्सा नहीं हैं तो मुमकिन है कि कुछ समय बाद प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले चूहों की जगह आप हों

कल्पना कीजिए कि एक साधारण-सा बैंगन भेस बदलने वाला ऐयार बन जाता है और आप नहीं जानते कि उसके इरादे अच्छे हैं या बुरे. या फिर रोटी के साथ आप जिस सब्जी को खाने जा रहे हैं वह कीटनाशक है, तो शायद आप बीटी बैंगन पर मचे बवाल को कुछ-कुछ समझ सकेंगे.

9 फरवरी को जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन के आगमन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया तब वे असल में एक ऐसे विनाश को स्थगित कर रहे थे जिसकी भरपाई भी शायद संभव न होती. उनके इस फैसले ने हर किसी को यह सोचने, समझने और जानने का समय दिया है कि दांव पर क्या लगा है.

हमारे यहां आम तौर पर विज्ञान और कृषि के बारे में बात ही नहीं की जाती. ज्यादातर शहरियों के लिए किसानों और सब्जियों की बातें बोरिंग होती हैं. यदि कोई आपसे कहे कि बीटी बैंगन राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है तो संभव है कि आप उसकी खिल्ली उड़ाएं. मगर ऐसे भी लोग हैं जो देसी बैंगन के समर्थकों की तुलना मंगल पांडे और भगत सिंह से कर रहे हैं और इसे बचाने के लिए लड़ी जा रही लड़ाई को इक्कीसवीं सदी का स्वाधीनता संग्राम बताते हैं. यह अतिशयोक्ति तो है लेकिन इससे भारत में चल रही पूरी बहस का अंदाजा तो हो ही जाता है. वह बहस, जो हमारी जिंदगी के हर पहलू से जुड़ी है- स्वास्थ्य, खाद्य पदार्थों की कीमतों, जैव-संपदा, आर्थिक सुरक्षा, हमारी संप्रभुता और पूरे भविष्य से. अगर आप इस बहस का हिस्सा नहीं हैं तो मुमकिन है कि कुछ समय बाद प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले चूहों की जगह आप ले लें.

हालांकि जयराम रमेश ने इस स्थगन को अनिश्चितकालीन बताया है, मगर आशंका यह है कि यह बहुत छोटा भी हो सकता है. इसीलिए इस बहस में आपका शामिल होना और भी जरूरी हो जाता है. खासकर तब जब मीडिया और सरकार का एक वर्ग हमें यह सिखाना चाह रहा हो कि आम आदमी को विज्ञान के मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है. इसी कड़ी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण इंडियन एक्सप्रेस से कहते हैं देश की वैज्ञानिक उन्नति को विरोध प्रदशर्नों और नारों से नहीं रोका जाना चाहिए. अप्रत्यक्ष रूप से वे शायद पूरी बीटी लॉबी की नाराजगी को जुबान दे रहे हैं.

इस पूरे मामले पर कितना धन दांव पर लगा है, इसपर एक नजर डालते ही आपको इस नाराजगी की वजह समझ में आ जाएगी. भारत के पास विश्व का आठवां सबसे बड़ा बीज बाजार है और प्रतिवर्ष करीब 1 अरब डॉलर का कारोबार करने वाला यह बाजार फिलहाल असंगठित और सरकारी क्षेत्र के हाथ में है. कंपनियों की नजर इसी पर है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीज उद्योग में कॉर्पोरेट का दखल प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इस बाजार का 80 प्रतिशत से भी अधिक क्षेत्र अभी उनकी पहुंच से बाहर है. लेकिन बीटी बैंगन तो सिर्फ दिखाने का दांत है. इसके पीछे 41 बीटी फसलें अनुमति के इंतजार में खड़ी हैं. चावल, आलू, टमाटर, भिंडी से लेकर गेहूं तक. एक अरब भारतीय पेटों का निजीकरण होना था और जयराम रमेश ने उसमें अड़ंगा लगा दिया है. इससे जुड़े उद्योग खुश कैसे रह सकते थे?

संसद के इसी सत्र में जैव-प्रौद्योगिकी विभाग – जो विज्ञान मंत्रालय के अधीन है और जिसका काम है जीन संवर्धित (जीएम) फसलों को बढ़ावा देना – एक बेतुका कानून लाने जा रहा है: राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी नियंत्रक प्राधिकार विधेयक 2009 (एनबीआरएआई). अभी तक गुप्तरखा जा रहा यह विधेयक अलोकतांत्रिक और मनमाने नियमों से भरा पड़ा है. सबसे पहले तो यह पर्यावरण मंत्रालय की समिति से जीएम फसलों को पास करने या रोकने का अधिकार छीनकर विज्ञान मंत्रालय की तीन सदस्यीय समिति को देना चाहता है. इसका मतलब होगा- उनके आसानी से पास हो जाने की गुंजाइश बढ़ना और एक नैतिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे को नितांत तकनीकी मुद्दा बना देना.

यही नहीं, पारदर्शिता बढ़ाने की बजाय यह विधेयक चाहता है कि कंपनियों को अपनी व्यावसायिक सूचनाएं छुपाने के लिए कानूनी संरक्षण मिल जाए. (यह गौर करने लायक बात है कि माहिको द्वारा जमा की गई बीटी बैंगन जैव-सुरक्षा फाइल को सार्वजनिक करवाने के लिए ग्रीनपीस को जैव-प्रौद्योगिकी विभाग से ढाई साल लंबी आरटीआई की लड़ाई लड़नी पड़ी थी. माहिको ही वह कंपनी है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी अमेरिकी बीज कंपनी मोंसेंटो के साथ मिलकर भारत में यह फसल तैयार की है. विभाग कहता रहा कि उस फाइल को सार्वजनिक करने से माहिको के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा. बाद में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद उसे ऐसा करना पड़ा.)

यह बिल भारत के संघीय स्वरूप के भी विरुद्ध है और राज्य सरकारों से कृषि एवं स्वास्थ्य संबंधी अधिकार छीनकर उसी तकनीकी समिति को देना चाहता है (इसकी वजहें शायद इस तथ्य में छिपी हैं कि अब तक अलग-अलग पार्टियों की दस राज्य सरकारें इन फसलों को अनुमति देने से मना कर चुकी हैं). बहुत सारी बेतुकी धाराओं के बीच इस बिल की सबसे चौंकाने वाली धारा 63 है, जो सबूतों और किसी वैज्ञानिक आधार के बिना जीएम फसलों के प्रति जनता को गुमराह करने की कोशिशपर जुर्माने और दंड की सिफारिश करती है. इसके सहारे आप सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को महज सवाल उठाने के जुर्म में जेल में डाल सकते हैं.

भारत में बीटी फसलों को बोने को लेकर इतनी हड़बड़ी क्यों है? अगर ये वाकई जनता के भले के लिए हैं तो फिर किसी बहस से डर कैसा? यदि बीटी के समर्थक इस बहस को जनता की पहुंच से दूर ले जाने में सफल हो जाते हैं तो यह देश के लिए सबसे विनाशकारी घटना होगी. आप जयराम रमेश से सहमत हों या नहीं, पर जिस तरह से उन्होंने बीटी बैंगन का यह निर्णय लिया है वह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत तो है ही. जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति (जीईएसी) – जिसके पास फिलहाल जीएम फसलों को अनुमति देने का अधिकार है – ने 14 अक्टूबर, 2009 को इन फसलों को व्यावसायिक रिलीज के लिए हरी झंडी दिखा दी थी. जयराम रमेश ने इस रिपोर्ट को अपने मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला और 31 दिसंबर, 2009 तक इसपर आम राय मांगी. उन्होंने सात सार्वजनिक चर्चाएं करवाईं – जिनमें वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ, किसानों के संगठन, उपभोक्ता समूह और स्वयंसेवी संगठन शामिल थे – और 9 फरवरी, 2010 को अपने स्थगन संबंधी निर्णय की घोषणा करने के कुछ समय बाद ही उससे जुड़ा सारा विवरण अपने मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया. उसमें उन्होंने जनता की प्रतिक्रियाएं और वे सारे कारण साफ-साफ लिखे थे, जिन्होंने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए बाध्य किया. 

यह न होता तो शायद पूरी कहानी कभी रोशनी में भी न आती. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के निदेशक डॉ एस परशुरामन, जो बीटी बैंगन के मूल्यांकन के लिए बनी पहली एक्सपर्ट कमेटी और विशेष तकनीकी समीक्षा समिति में थे, को दूसरी एक्सपर्ट कमेटी में शामिल होने का न्यौता नहीं मिला. पहली कमेटी में अपने अनुभवों के आधार पर वे कहते हैं कि उन्हें पता था कि यही होगा. वे बताते हैं, ‘हमारा काम थामाहिको और उससे जुड़ी संस्थाओं द्वारा दी गई रिपोटरें को पढ़ना. मैंने 5,000 पन्ने पढ़े और अपनी राय लिखकर दी. जहां तक मैं जानता हूं, मैं ऐसा इकलौता शख्स था. उन रिपोटरें में जिस तरह की वैज्ञानिक कोताही बरती गई थी उसे देखकर मैं चकित था. न कोई निष्पक्ष विश्लेषण था और न ही कोई जवाबदेह कार्यप्रणाली. 99 फीसदी संस्थाओं की रिपोर्टें ऐसे रिसर्च कार्यक्रमों के आधार पर लिखी गई थीं जिन्हें माहिको ने फंड किया था. हर बैठक में सब वैज्ञानिक और भी ज्यादा संतुष्ट दिखते थे. ऐसा लगता था कि बीटी फसलों के दुष्परिणामों के बारे में वे एक बार भी नहीं सोचते. उनकी सारी बहस इन फसलों को अनुमति देने के इर्द-गिर्द ही घूमती थी.

परशुरामन का यह वक्तव्य उस समिति के निष्कर्षों की पुष्टि करता है जिसमें कई प्रतिष्ठित भारतीय और 18 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शामिल थे. 8 फरवरी को इन वैज्ञानिकों ने पृथ्वीराज चव्हाण के एक पत्र की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा. पृथ्वीराज चव्हाण ने वह पत्र जुलाई, 2009 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ अंबुमणि रामादौस के प्रधानमंत्री के नाम लिखे गए एक पत्र के जवाब में लिखा था. तब वे प्रधानमंत्री कार्यालय में एक राज्य-मंत्री थे.

रामादौस ने अपने खत में जीएम खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित परिणामों को लेकर चिंता जताई थी. चव्हाण ने अपने उत्तर – जो करीब पांच महीने बाद लिखा गया था – में लिखा था,  ‘आपके पत्र में जिन मुद्दों का जिक्र किया गया है उनकी अत्याधुनिक वैज्ञानिक आधारों पर सावधानी से जांच कर ली गई है.एक्सपर्ट कमेटी के सदस्यों ने अब यह भेद खोला है कि चव्हाण के पत्र की ज्यादातर पंक्तियां जैव-तकनीकी उद्योग की प्रचार सामग्री से ज्यों-की-त्यों उठाई गई थीं. खासकर आईएसएएए से जो एक प्रकार का छद्म वैज्ञानिक संगठन है जिसमें मोंसेंटो और बायोटेक्नोलॉजी की अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश करती हैं. इस संगठन का मकसद है, विकासशील देशों में जीएम फसलों की व्यावसायिक घुसपैठ करवाना.

इस पत्र में इन वैज्ञानिकों ने चव्हाण के सभी दावों का खंडन करने के साथ-साथ प्रधानमंत्री से यह निवेदन भी किया है कि भारतीय जनता की सुरक्षा और किसानों की भलाई के लिए जीएम फसलों पर फिर से विचार किया जाए. यदि जयराम रमेश ने तथाकथित विज्ञानके बदले आम आदमीको न चुना होता तो हम आज अपनी डाइनिंग टेबल पर आराम से बैठकर दूसरी हरित क्रांति की घोषणाओं को टीवी पर देखते हुए बिना अपनी मर्जी के, बिना परीक्षण और बिना लेबल के बीटी बैंगन खा रहे होते.

सबसे जरूरी सवाल तो यह है कि क्या हमें बीटी बैंगन की जरूरत है? भारत बैंगन का जनक देश है और हमारे यहां बैंगन की तकरीबन 2,400 किस्में पैदा होती हैं. यह सिर्फ 5 लाख हेक्टेयर में उगाया जाता है और इसका सालाना उत्पादन 80 लाख टन है. जब हमारे यहां बैंगन की कोई कमी ही नहीं है तब हमें ऐसी सब्जी का इस्तेमाल करने को क्यों कहा जा रहा है जिसमें संक्रामक बीटी जीन होगा और जो दुनिया की पहली ऐसी बीटी फसल बनेगी जिसका सीधा उपयोग इनसान करेंगे, बिना किसी प्रोसेसिंग या मवेशियों पर प्रयोग किए बिना.

बीटी, बसिल्लस थुरिजिएन्सिस नाम के एक जीवाणु का संक्षिप्त नाम है, जो मिट्टी में पाया जाता है और ऐसे प्रोटीन बनाता है जिनके सेवन से कीड़े मर जाते हैं. 1980 के आसपास मोंसेंटो ने एक ऐसी तकनीक का पेटेंट लिया जिसमें इस जीवाणु के एक कीटनाशक जीन को बीजों में डालकर एक तरह से पौधे को ही कीटनाशक बना दिया जाता है. बताया जा रहा है कि इस पौधे को खाने वाला कीड़ा मर जाता है, मगर उसे खाने वाले आदमी का क्या होता है यह ठीक से कोई नहीं जानता. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ समीर ब्रह्मचारी, जो जीएम खाद्यों के बड़े समर्थक भी हैं, कहते हैं, ‘मनुष्य के शरीर में बीटी जीन कोई असर नहीं कर सकता, इसलिए ये खाद्य पूरी तरह सुरक्षित हैं.मगर बाकी वैज्ञानिक बताते हैं कि यह सुनिश्चित करने के लिए अभी पर्याप्त टेस्ट नहीं हुए हैं और अभी आप नहीं कह सकते कि अंदर जाकर यह जीवाणु किस तरह से रूप बदलकर आपके शरीर पर हमला कर दे.  

अपने आविष्कार के समय से ही बीटी खाद्य ऐसी बहसों का कारण बने रहे हैं. इनके समर्थक कहते हैं कि ये ज्यादा पैदावार देते हैं, सुरक्षित हैं और किसानों का कीटनाशक का खर्च बचाते हैं. इनका विरोध करने वाले लोगों के पास कहीं ज्यादा गहरे और खतरनाक प्रश्न हैं. ये मानव स्वास्थ्य के लिए कितने    सुरक्षित हैं? क्या इनपर पर्याप्त परीक्षण कर लिए गए हैं? हम कैसे भरोसा कर सकते हैं कि इन खाद्यों को कड़ी प्रक्रिया से गुजारने के बाद अनुमति दी गई है? परागण से ये फसलें वातावरण को प्रदूषित करेंगी तो आप कैसे रोकेंगे? इसके अत्यधिक उपयोग को कैसे काबू में करेंगे? जो जैव-विविधता इनसे नष्ट होगी उसे कैसे वापस लाएंगे? क्या ये सब तरह के कीड़ों पर उतनी ही असरदार हैं जितनी कुछ खास किस्म के कीड़ों पर? और क्या इन कीड़ों में कुछ समय बाद प्रतिरोध क्षमता तो विकसित नहीं हो जाती है? कीटनाशक के गुण के अतिरिक्त इन फसलों में ऐसा क्या है कि पैदावार ज्यादा हो? ये बीज ऐसे हैं कि हर साल किसानों को बाजार से नए खरीदने पड़ेंगे और इनकी कीमत भी कम नहीं है, फिर आप किसानों के कौन-से फायदे की बात कर रहे हैं? जीएम खाद्यों पर कोई लेबलिंग भी नहीं होगी, तब वह उपभोक्ता क्या करेगा, जो साधारण खाद्य खाना चाहता है? क्या उसके चुनने के अधिकार को खत्म करना अनैतिक नहीं है? क्या इन बीजों में टर्मिनेटर जीन हैं? और यदि मोंसेंटो जैसी कंपनियों के पास इन बीजों के पेटेंट होंगे तो क्या हम अपने खाने का नियंत्रण भी प्राइवेट कंपनियों को सौंपने जा रहे हैं?

इन सब दावों और सवालों के जवाब जानने के लिए फिलहाल हमारे पास 4 तजुर्बे हैं- बीटी बैंगन की कहानी, बीटी कपास के हमारे अनुभव, बीटी फसलों के दुनिया भर के अनुभव और मोंसेंटो की कहानी. दुर्भाग्यवश, बीटी बैंगन की अब तक की कहानी सुखद नहीं है. अब तक कोई स्वतंत्र परीक्षण नहीं करवाया गया है और जीईएसी द्वारा दी गई अनुमति का आधार वे आंकड़े हैं जिन्हें माहिको और उससे जुड़े संगठनों ने ही उसे दिया है. भारत के जाने-माने सूक्ष्म-जीवविज्ञानी डॉपी एम भार्गव, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जीईएसी के काम पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया गया है, ने माहिको द्वारा जमा किए गए और जीईएसी द्वारा पास किए गए जैव-सुरक्षा के कागजों पर 29 आपत्तियां उठाई हैं. उनके पास परेशान कर देने वाली सच्चाइयां हैं, जिनमें से एक यह भी है कि कुछ परीक्षणों के लिए तो सैंपल ही गलत लिया गया था.

भारत में मोंसेंटो के पूर्व प्रबंध-निदेशक टीवी जगदीशन तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि मोंसेंटो पहले भी अपने कृषि-रसायनों के लिए खुद के आंकड़ों के आधार पर कीटनाशक बोर्ड से स्वीकृति पाती रही है. आंध्र प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के कुलपति और दूसरी एक्सपर्ट कमेटी (जिसने बीटी बैंगन को अनुमति दी) के सह-अध्यक्ष डॉ अर्जुन रेड्डी इन आरोपों को गलत बताते हैं. वे कहते हैं कि कानूनन जो भी परीक्षण जरूरी थे सब किए गए हैं. वे कहते हैं कि हो सकता है कि कुछ और भी टेस्ट जरूरी हों. मगर फिर वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें उपभोक्ताओं और किसानों के हितों का खयाल रखने के लिए नियुक्त किया गया है, न कि कंपनियों की सुविधाओं का खयाल रखने के लिए. इसी भुलक्कड़ी में वे कहते हैं, ‘नौ साल के लंबे अंतराल के बाद आप कंपनी से नए टेस्ट करने के लिए कैसे कह सकते हैं? एक तरफ तो सरकार जीएम खाद्यों पर शोध को प्रोत्साहित कर रही है और दूसरी तरफ उन्हें रिजेक्ट कर रही है. यह कैसे चलेगा?’

मगर इसके साथ-साथ डॉ रेड्डी एक दूसरी चिंता की ओर भी इशारा करते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र में शोध तंत्र के कमजोर होते जाने का मतलब यह है कि आज कृषि अनुसंधान केवल निजी क्षेत्र द्वारा ही संचालित किया जा रहा है. उनके मुताबिक इसने सार्वजनिक हित के विचार को ही धुंधला कर दिया है और इसकी जगह फायदे की भावना ने ले ली है.अब जबकि 51 जीएम खाद्य बाजार में आने की बाट जोह रहे हैं, जिनमें से 41 खाद्य फसलें हैं, ऐसे में वे स्वीकार करते हैं कि भारतीय वैज्ञानिकों को यह अंदाजा भी नहीं है कि इनसे मानव शरीर या पर्यावरण या फिर देश की जैव-विविधता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. वे यह भी बताते हैं कि इस समय देश के बाजार में पांच प्रकार की बीटी कॉटन उपलब्ध है, लेकिन किसान इनकी पहचान करने में असमर्थ हैं. इसपर सरकार की नीति क्या है?’ वे पूछते हैं. अंत में वे जो कहते हैं वह जीएम खाद्यों के पक्ष में जाने वाले एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इंगित करता है. वे कहते हैं, ‘चीन ने पहले ही ट्रांसजेनिक चावल उगाने शुरू कर दिए हैं. हम इस तर्क से आगे बढ़ें कि लोग दिन भर में आधा किलो चावल से ज्यादा खाते हैं. और यदि वे फिर भी ऐसा कर रहे हैं तो हम बैंगन को लेकर इतना परेशान क्यों हैं, जिसे अपेक्षाकृत बहुत कम मात्रा में खाया जाता है.डॉ रेड्डी के इन विचारों से बीटी समर्थकों के एक वर्ग की मानसिकता की भी झलक मिलती है, ऐसी मानसिकता जिसकी बुनियाद आंकड़ों और तथ्यों की बजाय उत्साह, उतावलेपन और प्रतिस्पर्धी देश से पीछे न रह जाएं, जैसी चीजों से बनी है. आज जीएम खाद्यों पर सवाल उठाने पर देश के प्रति आपकी निष्ठा पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं जसा कि मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों पृथ्वीराज चव्हाण, कपिल सिब्बल और शरद पवार के वक्तव्यों से जाहिर होता है. पवार का कहना था कि जीएम बैंगन को फिलहाल बाजार में न लाने जैसे फैसले घड़ी की सुइयों को पीछे करते हुए देश के वैज्ञानिक समुदाय को हतोत्साहित करने का कारण बनेंगे. उनसे पूछा जा सकता है कि घड़ी की ये सुइयां दरअसल जा किस ओर रही थीं और विज्ञान भावनाओं से कब से संचालित होने लगा? देश और जनहित, वैज्ञानिकों की तथाकथित भावनाओं से छोटा कब से हो गया? मगर एनबीआरएआई के कानून बनने के बाद शायद ऐसे सवाल उठाना भी आपको जेल का हकदार बना सकता है.

एक और परेशान करने वाली बात यह है कि डॉ भार्गव के मुताबिक जीईएसी के निर्णय से करीब दो सप्ताह पहले डॉ रेड्डी ने उन्हें फोन कर बताया था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति के सदस्य के बतौर जिन अतिरिक्त परीक्षणों की मांग भार्गव ने की थी उनमें से आठ कराए ही नहीं गए हैं. और जो हुए भी हैं उनमें से कई या तो संतोषजनक या पर्याप्त नहीं थे. रेड्डी ने कथित तौर पर डॉ भार्गव से यह भी कहा कि वे बीटी बैंगन के पक्ष में सिफारिश करने के लिए अत्यधिक दबावमें हैं और उन्हें कृषि मंत्री, जीईएसी और इस उद्योग से जुड़े लोगों के फोन आ रहे हैं. भार्गव ने उन्हें अपनी अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने की सलाह दी. लेकिन दो सप्ताह बाद रेड्डी ने बीटी बैंगन पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी.

एक और चौंकाने वाला सच यह भी है कि बायोतकनीकी विभाग के एक शक्तिशाली नोडल ऑफिसर डॉ केके त्रिपाठी – जो एक ऐसी विशेषज्ञ समिति (आरसीजीएम) के सदस्य भी हैं जो जीईएसी को भेजे जाने से पहले जीएम फसलों के परीक्षण की स्वीकृति देती है – के खिलाफ पुलिस और केंद्रीय सतर्कता आयोग में शिकायतें दर्ज की गई हैं. 27 जून, 2009 को हैदराबाद के नुजीवीडु सीड्स के एसवीआर राव द्वारा पुलिस में दर्ज एफआईआर और 6 जून, 2009 को सतर्कता आयोग को लिखे पत्र के मुताबिक त्रिपाठी लगातार माहिको के बीटी कॉटन का पक्ष लेने और नुजीवीडु और दूसरी कंपनियों के रास्ते में रुकावटें खड़ी करने का काम करते रहे हैं. त्रिपाठी ने तहलका के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया.

एक के दाम में तीन शाहकार : एल एस डी

फिल्म  एल एस डी

निर्देशक  दिबाकर बनर्जी

कलाकार  अंशुमन झा, श्रुति, राज कुमार यादव, नेहा चौहान, आर्य देवदत्त, हैरी, अमित सियाल

एक के दाम में तीन शाहकार, हां, एल एस डी इसी तरह शुरु होती है. इस चेतावनी के साथ कि कैमरा हिलता रहेगा और आउट ऑफ फोकस भी होता रहेगा. दिल, जिगर, भगंदर, बवासीर के रोगियों को कोई रिफंड नहीं दिया जाएगा. पल्प फिक्शन वाले शीर्षकों से और कस्बे में आने वाले सर्कस या जादूगर का जिस तरह रिक्शे पर रखा लाउड स्पीकर प्रचार करता है, उसी शैली में. वे अपनी पिछली शाहकार ‘चर्चगेट की चुड़ैल’ का हवाला देते हैं और एक के दाम में तीन नए शाहकार दिखाने का वादा करते हैं. 

खैर, यह नाम काल्पनिक है. हां, उनके पिछले दो शाहकार ‘खोसला का घोंसला’ और ‘ओए लकी लकी ओए’ तो हैं और उन्हें बार बार देखने के बाद आप इस गुमान में हैं कि आपने दिबाकर को पूरा जान लिया है. दिबाकर हर बार आपके इसी भ्रम को तोड़ते हैं. ‘ओए लकी’ में जब आप उनकी उस डीटेलिंग पर मुग्ध हो रहे होते हैं, जिसमें अभय और नीतू एक कॉफी शॉप में बैठे हैं और बाहर पार्किंग को लेकर दिल्ली के स्टाइल की लड़ाई हो रही है (वह लड़ाई, जिसमें दोनों पक्ष गालियां बकते हुए एक दूसरे को देख लेने की धमकी देते हैं, मगर दूसरे को हाथ तक नहीं लगाते), तब आप सोचते हैं कि इससे ज्यादा गहराई अब नहीं हो सकती. लेकिन वे और गहरे गड्ढ़े खोदते हैं और एल एस डी को देखते हुए आप मान ही नहीं सकते कि यह एक फिल्म होगी. एक साहसी और समझदार निर्देशक ही दिखा सकता है कि डिप्लोमा फिल्म बनाने वाले साधारण लड़कों का कैमरा या तो जूम इन होता रहेगा या जूम आउट. ‘मैं सब का इंट्रीव्यू…इंटरव्यू ले लूं…’ कहती हुई बच्ची जब अटकती है, तो आप यह निश्चय कर लेते हैं कि अब फिल्म बनाने वाले लोग आपके सामने आकर भी कहें कि यह फिक्शन है, तब भी आप उनकी बात नहीं मानेंगे.

फिल्म के सबसे दुखद दृश्य में, जो पहले हिस्से में है, मुझसे अगली कतार में बैठी एक लड़की उठकर चली जाती है. एक लड़का, जो शायद उसका बॉयफ्रेंड है, यह कहते हुए भागता है कि ‘यह तो फिल्म है पागल…’. मैंने ऐसा होते हुए पहले कभी नहीं देखा.

दिबाकर की फिल्मों के बारे में मेरे एक दोस्त ने कहा था कि वे आपको सिनेमाहॉल में जितना हँसाती हैं, बाद के अकेले अँधेरों में उतना ही रुलाती भी हैं. ‘लव, सेक्स और धोखा’ देखने के बाद आपको फिर से ऐसा ही लगता है. आप चाहते हैं कि जो मर गए हैं, वे मासूम से लोग फिर लौट आएं और सब कुछ अच्छा हो जाए. एक अच्छी और प्यारी दुनिया हो, जिसमें कैमरा खलनायक न हो.

मगर उस दुनिया को बनाने के लिए वह कैमरा सबसे ज्यादा जरूरी है, जिससे दिबाकर हमें हमारी ही दुनिया दिखाते हैं. वे आईना लेकर मुस्कुराते हुए हमारे सामने खड़े हैं, इसीलिए उनकी हर फिल्म अमर है और पिछली फिल्म से अच्छी. वे लगातार काली और ‘बहनजी टाइप’ लड़कियों और चश्मे वाले प्रतिभाहीन, साधारण लड़कों के पक्ष में खड़े हैं और जब हम हँस रहे होते हैं, फिल्म हम पर हँसती है.

गौरव सोलंकी    

क्रिकेट की कप्तानी में देश की कहानी

कैप्टन ‘कूल’ तो वे थे ही, मगर उस दिन ऐसा लगा मानो वे शीतलता के हर मानक की परीक्षा लेने पर तुले हों. भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच ग्वालियर में दूसरा एकदिवसीय मैच था. सचिन तेंदुलकर 199 के स्कोर पर पहुंच गए थे. किसी एकदिवसीय मैच में दोहरा शतक जमाने वाला पहला बल्लेबाज बनने के लिए उन्हें बस एक रन बनाना था. मगर धोनी थे कि उन्हें स्ट्राइक देने की बजाय गेंदों को ताबड़तोड़ पीटे जा रहे थे. उनकी हर बाउंड्री के साथ स्टेडियम में बैठे और टीवी पर इस मैच को देख रहे करोड़ों दर्शकों की चिंता थोड़ी और बढ़ जाती. दस गेंदों में 25 रन जमाकर धोनी देखते ही देखते 35 से 60 रन के स्कोर तक पहुंच गए. उनके धुर प्रशंसक तक हर चौके-छक्के के लिए चुपचाप उन्हें कोसे जा रहे थे. आखिरकार आखिरी ओवर की तीन गेंदें रहते सचिन को स्ट्राइक मिली और उन्होंने अपना दोहरा शतक पूरा किया.

जब धोनी ने अपना पहला मैच खेल रहे अमित मिश्रा से राउंड द विकेट गेंदबाजी करने को कहा तो उन्होंने माइकल क्लार्क का विकेट झटक लिया. प्रेस कांफ्रेंस में जब दूसरे कप्तान शायद जब विनम्र बनने का असफल अभिनय कर रहे होते तो धोनी का कहना था, ‘फ्लूक था यार’, यानी तुक्के से मिल गया विकेटलेकिन पारी खत्म होने पर धोनी के दोनों हाथों में लड्डू थे. वे न सिर्फ भारत को 400 रनों के पार ले जा चुके थे बल्कि यह भी पक्का कर चुके थे कि तेंदुलकर दोहरे शतक की अद्भुत उपलब्धि तक पहुंच जाएं. ऐसे ही हैं धोनी. नम्र भी और निर्मम भी. वे बखूबी जानते हैं कि कब बेलागलपेट कहना है और कब व्यावहारिक रहना है. वे इतिहास का बोझ लादकर नहीं चलते. वे सरल हैं मगर एकपक्षीय नहीं. वे भोले हुए बिना निष्कपट रहते हैं. और सबसे बड़ी बात यह है कि अपने दिमाग पर उनकी ऐसी पकड़ है जो ज्यादातर लोगों को अप्राप्य होती है.

सटीक फैसले लेने की धोनी की असाधारण क्षमता उनके अपने सहज ज्ञान पर यकीन से उपजती है. उनका विश्वास बच्चों जैसी इस निश्चितता से आता है कि आखिर में सब ठीक ही होगा. नागपुर टेस्ट में जब उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 8-1 की फील्डिंग लगाई तो सुबह के सत्र में ऑस्ट्रेलियाई टीम सिर्फ 42 रन ही बना सकी. धोनी किसी ऊंचे रूमानी आदर्श का पीछा नहीं कर रहे. उनका लक्ष्य कहीं ज्यादा मूर्त है. और वह यह है कि जब भी वे नेतृत्व करें, टीम जीते. ताकत और टाइमिंग के मेल से बनी उनकी बल्लेबाजी क्रिकेट के शुद्धतम रूप को खोजने वाले किसी सौंदर्यशाशास्त्री को खुश नहीं कर सकती. इसके बावजूद वे एकदिवसीय मैचों के शीर्ष बल्लेबाजों की सूची में भी शीर्ष पर हैं. बल्लेबाजी भी उनकी ऐसी है कि एक जैसी सहजता से वे हमलावर भी हो सकते हैं और सुरक्षात्मक भी. यह इसपर निर्भर करता है कि कोई टेस्ट मैच जीतना है या बचाना है.

आखिर ऐसा कैसे हुआ कि रांची जसे छोटे शहर से निकली यह अद्भुत प्रतिभा आज इस खेल के बड़े हरफनमौलाओं में से एक और सबसे प्रतिष्ठित कप्तान के रूप में उभर चुकी है? दरअसल, भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी की कहानी देश के समाज की अलग-अलग परतों के उदय की कहानी है जिसमें अक्सर समाज में होने वाला बदलाव पहले क्रिकेट में  दिखता है. इसलिए एक तरह से देखा जाए तो धोनी का कप्तानी तक पहुंचना एक ऐतिहासिक अनिवार्यता थी. यह कहानी छोटे शहरों में बसने वाले भारत के उन अवसरों तक पहुंचने की कहानी है जिनसे उसे सालों तक वंचित किया जाता रहा. इन वजहों में खेल को अपने तक सीमित रखकर उसे विशिष्ट बनाए रखने की शासकों की इच्छा से लेकर बुनियादी सुविधाओं की कमी तक शामिल हैं. प्रगति के इस पहलू से देखने पर कुलीन वर्ग से मध्यवर्ग और फिर उससे भी नीचे के तबके तक इस खेल का प्रसार नियति द्वारा नियत लगता है.

शुरुआत में क्रिकेट राजाओं या नवाबों का खेल था. 1932 में जब पहली भारतीय टीम लंदन गई तो इसकी कप्तानी पोरबंदर के महाराजा ने की थी. मगर अच्छे खिलाड़ी से ज्यादा उनकी ख्याति एक ऐसे राजा की ज्यादा थी जिसके खाते में रन कम थे, रोल्स रॉयस कारें ज्यादा, इसलिए मैदान पर कप्तानी सीके नायडू ने की. भारत के दूसरे कप्तान विजयनगरम के राजकुमार बने और इस कड़ी में तीसरा नाम जुड़ा पटौदी के नवाब इफ्तिखार अली का.

भारत की आजादी और देश में आए आत्मविश्वास के साथ कप्तानी में वे लोग आए जो महाराजाओं के यहां काम करते थे. लाला अमरनाथ (पटियाला) और विजय हजारे (बड़ौदा) इसके उदाहरण हैं. इसके बाद एक उथल-पुथल का दौर आया जिसमें कप्तान आया राम गया राम की तर्ज पर आते-जाते रहे. मगर फिर भी एयर इंडिया में काम करने वाले जीएस रामचंद और टाटा से जुड़े नारी कांट्रेक्टर के रूप में कप्तानी के भविष्य मौजूद थे ही.

भारत के पहला टेस्ट खेलने के करीब तीन दशक बाद टाइगर पटौदी कप्तानी की कुर्सी पर स्थिरता लाए. यह एक तरह से महाराजा-नवाब दौर की वापसी थी. हालांकि फर्क यह था कि पटौदी खेल को जानते थे और इसे आम लोगों से बेहतर खेलते थे. कप्तान के तौर पर अजित वाडेकर की ताजपोशी के साथ मध्यवर्ग की क्रांति का सूत्रपात हो चुका था. अगले 13 कप्तान पढ़े-लिखे और अच्छा कमाने वाले लोग थे जो पूरे देश में मध्यवर्ग के उभार को दर्शाते थे.

धोनी के नेतृत्व संभालने के कुछ ही महीनों बाद तेंदुलकर का कहना था, ‘धोनी ने अपना व्यवहार जैसा रखा है उससे मुझे बेहद खुशी है. वे एक संतुलित इंसान हैं जिसके पास एक तेज दिमाग है. उनका तरीका साफ और सरल है.’

उदारीकरण के दौर में अजहरूद्दीन कप्तान बने. उनके आने के बाद क्रिकेट में और भी अधिक पैसा आया और उनकी कप्तानी में भारत ने 14 टेस्ट मैच जीते. इनमें से ज्यादातर जीतें घर पर दर्ज की गईं थीं. इसके बाद आई गांगुली-द्रविड़-कुंबले की पीढ़ी. ये ऐसे कप्तान थे जिनके पास अपने पैसे या फिर शिक्षा की बदौलत क्रिकेट के इतर भी विकल्प थे. और फिर आए धोनी. तब तक राजनीतिक और आर्थिक रूप से शहरी भारत छोटे कस्बों के भारत के साथ घुलने-मिलने लगा था. टीवी ने उस पीढ़ी की कल्पनाओं को उड़ान दे दी थी जिसने 1983 में लॉर्ड्स में कपिल को क्रिकेट का विश्वकप उठाए हुए देखा था. क्रिकेट को महानगरों से बाहर फैलाने के क्रिकेट बोर्ड के फैसले से कई प्रतिभाशाली पर अपर्याप्त प्रशिक्षण पाए नौजवानों का इस खेल की मुख्यधारा में आना मुमकिन हो गया. उनकी महत्वाकांक्षाएं अब अवास्तविक नहीं रह गई थीं. सफलता की भूख उनमें थी ही. इस भूख को ईंधन मिला ज्यादा विकल्पों और निचले स्तर पर मिलने वाली सफलताओं से. नई सदी में भारतीय क्रिकेट में आया यह सबसे बड़ा बदलाव था. अब ऐसी जगहों के युवा भी टीम में आ रहे थे जिन्हें क्रिकेट के हिसाब से अपारंपरिक केंद्र कहा जा सकता है. मसलन, भरूच के मुनाफ पटेल, अलीगढ़ के पीयूष चावला, जालंधर के हरभजन सिंह, पलारिवात्तम के श्रीसंत, क्विलोन के टी योहानन, रायबरेली के आरपी सिंह, कूर्ग के रॉबिन उथप्पा. इन जगहों से अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रिकेटर आने लगे थे.

ऐसे में रांची से भी एक नौजवान निकला. इस नौजवान ने फुटबाल की गोलकीपिंग छोड़कर क्रिकेट में विकेटकीपिंग करनी शुरू की और खेल में ऐसे सरल तरीके का प्रदर्शन किया कि अंडर19 स्तर पर ही उसकी भविष्य के खिलाड़ी के रूप में चर्चा होने लगी. शायद सामाजिक बदलाव धोनी के उभार की व्याख्या कर सकें, मगर ये एक कप्तान के रूप में उनकी सफलता या वरिष्ठ खिलाड़ियों में उनकी स्वीकार्यता की व्याख्या नहीं कर पाएंगे. इसके लिए हमें कुछ दूसरे पहलुओं से देखना होगा. जब तेंदुलकर ने अपना पहला मैच खेला था तो धोनी आठ साल के रहे होंगे. इसके बावजूद धोनी के नेतृत्व संभालने के कुछ ही महीनों बाद तेंदुलकर का कहना था, ‘धोनी ने अपना व्यवहार जैसा रखा है उससे मुझे बेहद खुशी है. वे एक संतुलित इंसान हैं जिसके पास एक तेज दिमाग है. उनका तरीका साफ और सरल है.’ वीवीएस लक्ष्मण उन्हें सर्वश्रेष्ठ कप्तानों में से एक बताते हुए कहते हैं कि धोनी ‘शांतचित्त और संतुलित हैं और उनसे आत्मविश्वास फूटता है.’

बहुत समय तक ऐसा रहा कि भारतीय कप्तान की खासी ऊर्जा मैदान के इतर होने वाले खेल में भी जाया होती रही. क्योंकि उसे पता नहीं होता था कि कौन साथी खिलाड़ी उसे कब डस लेगा. यह सहज स्वीकार्यता ही अपने आप में एक बड़ा बदलाव है. धोनी के पूर्ववर्ती अनिल कुंबले को पता है कि ऐसा क्यों है. वे कहते हैं, ‘वरिष्ठ खिलाड़ियों की वर्तमान पीढ़ी में विनाशकारी अहम नहीं है. टीम ही सब-कुछ है.’ इसके उलट दौर में अपना करियर शुरू करने वाले कुंबले इस बदलाव के साथ धोनी के शांत तरीके, दृढ़ रहने की योग्यता और उससे भी अहम टीम के हित में अपनी बल्लेबाजी का सुर बदलने की क्षमता को भी अहम मानते हैं.

धोनी के कप्तानों द्वारा उनके विकास में अदा की गई भूमिका भी महत्वपूर्ण है. राहुल द्रविड़ के नेतृत्व में उन्होंने 19 टेस्ट खेले. कुंबले के नेतृत्व में 13. कर्नाटक के ये दोनों खिलाड़ी कप्तानी के काम में एक दुर्लभ किस्म की बुद्धि, गरिमा और मानव प्रबंधन कौशल लेकर आए. धोनी ने इनसे सीखा कि अगर टीम की अगुवाई करनी हो तो आपका खुद का प्रदर्शन भी मिसाल होना चाहिए. धोनी ने खुद से पहले टीम को रखने की अहमियत भी सीखी (अब भले ही यह पुराने फैशन की बात लगती हो). भारतीय टीम से पहले किसी भी स्तर पर कप्तानी न करने के बावजूद धोनी ने अगर यह काम बहुत ही सहजता से संभाल लिया तो यह उनकी शुरुआती ट्रेनिंग का ही कमाल था. और उनके व्यवहार का भी. अपना आखिरी टेस्ट खेलते कप्तान कुंबले को मैच खत्म होने के बाद अपने कंधों पर बिठाकर पूरे मैदान का चक्कर लगाते धोनी को देखना कितना अविश्वसनीय दृश्य था इसे समझने के लिए आप सीके नायडू को इसी तरह घुमाते विजी या टाइगर पटौदी को कंधे पर बिठाए अजित वाडेकर या फिर बिशन सिंह बेदी को इसी तरह घुमाते सुनील गावस्कर की कल्पना कीजिए. जिस तरह कोई मालिक अपने नौकरों के लिए हीरो नहीं होता इसी तरह कोई भारतीय कप्तान अपने उत्तराधिकारी के लिए भी हीरो नहीं होता. अपने वरिष्ठों के प्रति सम्मान (सौरव गांगुली से उनके आखिरी टेस्ट में कप्तानी करवाना एक और उदाहरण है) और किसी मैच में जीतने पर स्टंप या फिर कोई स्मृतिचिह्न उस खिलाड़ी को देना जो उनकी नजर में इसके सबसे ज्यादा योग्य हो, बताता है कि टीम की अगुवाई करने के लिए कुछ खूबियां धोनी में जन्म से ही मौजूद हैं.

धोनी अब एक ऐसा गुड़ हो गए हैं जिनकी तरफ किस्सारूपी चीटियां अपने आप आकर्षित हो जाती हैं. खुद को धोनी का पुराना दोस्त कहने वालों, उनके नए परिचितों और उनके पास भी जो इन दोनों श्रेणियों में नहीं आते, धोनी से जुड़ा कोई न कोई वाकया जरूर होता है

भारत के सबसे अनुभवी और सफलतम टेस्ट कप्तान (49 मैचों में 21 जीत) गांगुली ने भारतीय टीम में आत्मसम्मान आंदोलन की दूसरी लहर की अगुवाई की. पहली का श्रेय टाइगर पटौदी को जाता है. उन्होंने टीम में अपनी ही तरह का एक भरोसा भरा. अब धोनी दादा के स्वाभाविक उत्तराधिकारी लगते हैं. उनमें गांगुली जैसी कूटनीति है, पर उन जैसे तर्कहीनता के दौरे नहीं. ट्वेंटी-20 विश्वकप में धोनी के लिए जुनून तब अपने चरम पर पहुंच गया जब पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल मैच के आखिरी ओवर में जोगिंदर शर्मा को बॉल थमाने का उनका फैसला एक मिसाल बन गया. गांगुली की तरह धोनी ने भी युवाओं में भरोसा किया है और तनावपूर्ण परिस्थितियों में उन्हें झोंकते हुए उन्हें पकने का मौका दिया है. जैसा कि गांगुली कहते हैं, ‘उनके पास किस्मत का वह अतिरिक्त उपहार है जिसकी आपको जरूरत होती है.’

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मोहाली टेस्ट के दूसरे दिन आखिरी ओवर में जब धोनी ने अपना पहला मैच खेल रहे अमित मिश्रा से राउंड द विकेट गेंदबाजी करने को कहा तो उन्होंने माइकल क्लार्क का विकेट झटक लिया. प्रेस कांफ्रेंस में जब दूसरे कप्तान शायद जब विनम्र बनने का असफल अभिनय कर रहे होते तो धोनी का कहना था, ‘फ्लूक था यार’, यानी तुक्के से मिल गया विकेट. खुद को बेफिक्री से कमतर कहने की यह खासियत कम कप्तानों में देखी गई है. किंग्स्टन में एक दिवसीय मैच हारने के बाद उनका कहना था, ‘हम विकेट को सही तरीके से समझ नहीं पाए.’ भारतीय कप्तानों के बारे में यह माना जाता है कि वे इतना सुरक्षित महसूस नहीं करते कि सीधे अपनी गलती मान सकें.

फिर भी न तो भाग्य हर बार साथ दे सकता है, न ही तुक्के. लेकिन कहना पड़ेगा कि धोनी की सहजवृत्ति ने कभी-कभार ही उन्हें नीचा दिखाया है, चाहे वह बीसमबीस के फाइनल में युसुफ पठान से बल्लेबाजी का आगाज करवाने का फैसला हो या फिर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एकदिवसीय श्रंखला के फाइनल में प्रवीण कुमार से गेंदबाजी की शुरुआत का निर्णय. धोनी से उनकी टीम के खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलती है. कप्तानी को लेकर उनकी सोच एकदम अनूठी है. उनके शब्दों में कप्तान ‘बुनियादी रूप से एक स्वार्थी इनसान होता है जो खिलाड़ियों को अपने काम के लिए चुनता है.’ धोनी का चुनाव सही होता है. स्टीव वॉ की तरह ही वे भी ध्यान रखते हैं कि पूरी टीम खुद को एक इकाई समझे. वे कहते हैं, ‘बतौर कप्तान मैदान के भीतर और बाहर आपको एक-एक सदस्य के साथ हर पल का लुत्फ उठाना चाहिए.’ हेमिल्टन टेस्ट मैच एक दिन पहले ही खत्म होने पर वे फुर्सत के कुछ पल बिताने पूरी टीम को ऑकलैंड ले गए. वहां उन्होंने खूब आराम किया और पूरी टीम नेपियर टेस्ट शुरू होने से महज 18 घंटे पहले ही वहां पहुंची. कभी-कभी आपस में घुलना-मिलना नेट प्रैक्टिस से ज्यादा अहम होता है. 

धोनी अब एक ऐसा गुड़ हो गए हैं जिनकी तरफ किस्सारूपी चीटियां अपने आप आकर्षित हो जाती हैं. खुद को धोनी का पुराना दोस्त कहने वालों, उनके नए परिचितों और उनके पास भी जो इन दोनों श्रेणियों में नहीं आते, धोनी से जुड़ा कोई न कोई वाकया जरूर होता है. उनके चार लीटर दूध पीने का किस्सा कैसे उड़ा इसके बारे में धोनी ने खुद पता लगाया कि यह बात पूर्व भारतीय खिलाड़ी रवि शास्त्री के मुंह से निकली थी. धोनी कहते हैं कि वे एक या दो ही लीटर दूध पीते हैं और किसी ने इसी को बढ़ा-चढ़ाकर आगे बता दिया.

यह है संक्षेप में धोनी की कहानी. उनसे जुड़ी हर चीज बड़ी बन जाती है. अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय सत्र में धोनी कुछ हद तक एक ‘लार्जर देन लाइफ’ व्यक्तित्व बनकर उभरे जो असाधारण उन्मुक्तता से बल्लेबाजी करता था. प्रशंसकों का अपने पसंदीदा खिलाड़ियों का स्वागत करने का एक विशेष तरीका होता है. कपिल देव या वीरेंद्र सहवाग के प्रशंसकों का तरीका हमेशा गांगुली या द्रविड़ के प्रशंसक से अलग होगा. अपने भारी-भरकम रिकॉर्ड के बावजूद गांगुली और द्रविड़ एक बौद्धिक दर्जे का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके खेल की बाकायदा चीरफाड़ की जाती है. धोनी, कपिल-सहवाग वाली श्रेणी में आते हैं. यानी आगे की कतार वाले दर्शकों के पसंदीदा सितारे.

धोनी के बारे में किस्से तेजी से पैदा हुए हैं. वे तेज रफ्तार बाइक चलाना पसंद करते हैं, किशोर कुमार के फैन हैं, कभी-कभी लंबे बाल रखते हैं, उन्हें जानवरों से लगाव है, खासकर कुत्तों से..जब वे पहली बार बल्लेबाजों की सूची में पहले नंबर पर पहुंचे तो प्रशंसकों और मीडिया की तुलना में उनकी प्रतिक्रियाएं कहीं ज्यादा नियंत्रित दिखीं. प्रशंसकों ने उत्साह से इसका जश्न मनाया जबकि मीडिया इसे लेकर पागल-सा हो गया. हर उस व्यक्ति के इंटरव्यू दिखने लगे जो धोनी से हल्की-सी भी जान-पहचान रखता था. रिश्तेदार, दोस्त, साथी खिलाड़ी सब बार-बार वही कहते दिखे.

अपने भारी-भरकम रिकॉर्ड के बावजूद गांगुली और द्रविड़ एक बौद्धिक दर्जे का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके खेल की बाकायदा चीरफाड़ की जाती है. धोनी, कपिल-सहवाग वाली श्रेणी में आते हैं. यानी आगे की कतार वाले दर्शकों के पसंदीदा सितारे

इस दौरान धोनी ने अपने दो बयानों के जरिए धाक जमा दी. उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि ये चीजें अस्थायी हैं और नंबर 1 का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक उनका प्रदर्शन टीम को जीत नहीं दिला सके. दूसरा, उन्होंने मीडिया से निवेदन किया, ‘कृपया हर बार मेरे 40 रन बनाने पर आप इंटरव्यू लेने के लिए मेरे माता-पिता के पास न दौड़ें.’ पहला बयान उनकी परिपक्वता का संकेत था और दूसरा उनकी खीज का जिसे उन्होंने हंसी-हंसी में व्यक्त कर दिया था. गैर पारंपरिक स्थानों से आने वाले खिलाड़ी आगे बढ़ने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और मिले हुए मौके को हड़बड़ी में जाया नहीं करते. इससे उन्हें दो फायदे होते हैं, एक तो वे अपने लक्ष्य के प्रति बहुत समर्पित हो जाते हैं, दूसरे उनमें बेमतलब की शुद्धता के लिए एक तरह का असम्मान दिखता है. ऐसे क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ियों के लिए तकनीक और सीधे बल्ले से खेलने जैसी बातें सिर्फ किताबी ही होती हैं क्योंकि वहां ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की मांग ज्यादा होती है.

धोनी बिना सोचे-समझे ताबड़तोड़ खेलने वाले खिलाड़ी नहीं हैं, लेकिन उनके भीतर आत्मविश्वास और शारीरिक दमखम का वैसा ही अनूठा संतुलन है जो इन क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ियों की खास पहचान होती है. टाइमिंग ऐसे खिलाड़ियों के खेल की पहचान होती है और धोनी की टाइमिंग तो लाजवाब है. छोटी जगहों से आने वाले खिलाड़ियों पर उम्मीदों का बोझ भी कम होता है. टेस्ट क्रिकेट में पहले विकेट की रिकॉर्ड साझेदारी को तोड़ने के करीब पहुंच गए सहवाग ने बाद में कहा कि उन्होंने कभी वीनू मांकड़ या पंकज रॉय का नाम तक नहीं सुना. धोनी ने भी कभी खुद ही माना था कि शुरुआती वर्षों में उन्हें विव रिचर्ड्स के बारे में पता नहीं था; हालांकि बाद में उन्होंने दावा किया कि रिचर्ड्स उनके हीरो थे. रिचर्ड्स का तो पता नहीं, पर धोनी को तेंदुलकर के बारे में पता था और यह प्रेरणा ही अपने आप में काफी थी. अपने हीरो की तरह ही उनका भारत के लिए मैच जीतने का सपना था और जब उन्होंने विशाखापत्तनम में पाकिस्तान के खिलाफ 148 रनों की शानदार पारी खेली तो वे पूरे देश की निगाहों में आ गए.

छह महीने से भी कम समय के भीतर उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ 183 रन बनाकर अपना ही रिकॉर्ड सुधार दिया; खेल का खात्मा उन्होंने दसवें छक्के के साथ किया. एकदिवसीय क्रिकेट में किसी विकेटकीपर का यह सबसे बड़ा स्कोर था और उस समय तक सबसे बड़े स्कोरधारक सईद अनवर के रिकॉर्ड से महज 11 रन कम. उस टीम के कप्तान रहे द्रविड़ का कहना था, ‘इस तरह की पारी देखना खुशकिस्मती है.’ द्रविड़ ने उस पारी की तुलना सचिन तेंदुलकर द्वारा ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शारजाह में खेली गई 143 रनों की पारी से की थी. 50 ओवर तक उन्होंने विकेटकीपिंग की थी और इसके बाद 46 ओवर तक बल्लेबाजी. यह जितना उनके दिल और दिमाग की परीक्षा थी उतनी ही उनकी शारीरिक क्षमता की भी.

बहुत कम बल्लेबाजों को एकदिवसीय मैचों के प्रदर्शन के आधार पर टेस्ट टीम में स्थान बनाने में सफलता मिली है. होता अक्सर इसके उलट रहा है. लेकिन छोटे संस्करण में उनकी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी के बाद धोनी को टेस्ट टीम से बाहर रखना मूर्खता होती. चयनकर्ताओं को इस बात का अहसास हुआ और उन्होंने दिनेश कार्तिक की जगह धोनी को रखने का फैसला किया. कार्तिक का कोई दोष नहीं था सिवाय इसके कि वे धोनी नहीं थे. इसके बाद एक नई बहस खड़ी हो गई. क्या धोनी अपनी अनूठी शैली टेस्ट क्रिकेट में जारी रख पाएंगे? क्या यह संभव भी है? इन सवालों के जवाब के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. पाकिस्तान के फैसलाबाद में उन्होंने तेज गेंदबाज शोएब अख्तर को हुक शॉट के जरिए छक्का मारकर शुरुआत की और 34 गेंदों में उनके 50 रन आ गए. शतक पूरा करने के लिए उन्होंने सिर्फ 93 गेंदें खेलीं.

उनकी विकेटकीपिंग में सुधार ने भी तभी रफ्तार पकड़ी जब उन्होंने एक बल्लेबाज के तौर पर खुद को स्थापित करना शुरू किया. विकेट के पीछे खराब प्रदर्शन का दौर बीतने के बाद उन्होंने खुद को एक मजबूत कीपर के रूप में विकसित किया. अब वे लेग स्टंप को छोड़ती गेंदों पर स्टंपिंग के साथ मोटा किनारा लेकर निकली गेंद को फुर्ती के साथ लपकने लगे थे. पूर्व भारतीय विकेटकीपर सैयद किरमानी ने कहा था कि धोनी विकेटकीपिंग के बुनियादी नियमों के मोर्चे पर कमजोर हैं. किरमानी ने धोनी की पंजों की बजाय एड़ियों के बल खड़ा होकर गेंद लपकने वाली शैली की आलोचना की. लेकिन इससे धोनी के प्रदर्शन पर किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा. जो चीजें बाकी खिलाड़ियों के लिए गलत लगती वही धोनी की शैली बन गईं, चाहे वह खड़े-खड़े घूमकर की जाने वाली ऑन ड्राइव हो या फिर सपाट बल्ले से लगाई गई कवर ड्राइव.

धोनी को जल्दी ही इस बात का अहसास हो गया था कि वे एक उभरते हुए सितारे हैं. वे आश्चर्य से कहा करते थे, ‘पहले कैमरे मेरे सामने से गुजर जाया करते थे, अब वे मेरे लिए खड़े रहते हैं.’ धोनी सीधे-सीधे अपने दिल की बात कहते हैं. इसी चीज ने उन्हें लोगों का चहेता बनाया. वे कभी भी कोई बेमतलब की बात करते नहीं दिखते. धोनी की इस परिपक्वता के लिए कुछ हद तक यह बात भी जिम्मेदार है कि उन्हें सफलता रातों-रात हासिल नहीं हुई. उनका प्रशिक्षण काफी अच्छे ढंग से हुआ है. अंतरराष्ट्रीय करियर शुरू होने से पहले चार साल उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में बिताए. साल 2004 में उनके शतक की बदौलत पूर्वी जोन ने देवधर ट्रॉफी पर कब्जा जमाया था. इसके बाद उन्होंने इंडिया ए के लिए नैरोबी में पाकिस्तान ए के खिलाफ दो शतक लगाए और सुर्खियों में आए.

महान कवि टीएस इलियट ने लेखकों को प्रसिद्धि पाने के दो तरीके बताते हुए चेतावनी दी थी कि सनसनीखेज बिकाऊ लेखन के जरिए अचानक अर्जित लोकप्रियता से बेहतर होती है धीरे-धीरे सालों की मेहनत से कमाई गई ख्याति क्योंकि यह टिकाऊ होती है. खिलाड़ियों पर भी यह लागू होता है, विशेषकर भारत में. धोनी मेहनत के जरिए हासिल सफलता और रातों-रात मिली ख्याति का सुंदर मिश्रण बनने में सफल रहे. उनके प्रशिक्षण काल का मकसद उन्हें बड़ी सफलता के लिए तैयार करना था और जब उन्हें इसका मौका मिला तो वे इसके लिए पूरी तरह से तैयार थे.

कप्तान के रूप में धोनी के उत्कर्ष को टाला नहीं जा सकता था. धोनी का उदय शायद इसी तरह की पृष्ठभूमि से आने वाले किसी प्रधानमंत्री के आगमन का संकेत हो. खेल में उपेक्षा का जो संदर्भ क्षेत्र पर लागू होता है राजनीति में वह धर्म और जाति पर ज्यादा सटीक बैठता है. तो धोनी की इस धाक का मतलब शायद यह हो सकता है कि भारत अपने पहले दलित, ईसाई या फिर मुसलमान प्रधानमंत्री के स्वागत की तैयारी कर रहा है. आखिर दक्षिण भारत से पहले कप्तान अजहरुद्दीन के आने के बाद ही देश के पहले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री (नरसिम्हा राव) की राह सुगम हुई थी.

भारत में क्रिकेट विकास का भी प्रतीक हो सकता है और खुद विकास भी. अगर आप भारत की राजनीति समझना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले यहां के क्रिकेट को समझना चाहिए. हालांकि धोनी को इन बातों की चिंता शायद ही हो. वे सिर्फ एक इतिहास बनाने में लगे हुए हैं जिसकी विवेचना का जिम्मा उन्होंने औरों पर छोड़ दिया है. 

सुरेश मेनन 

वरिष्ठ खेल पत्रकार