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आज नकद कल फसाद-1

‘ मंगलौर पब अटैक ‘ इस वाक्य को यूट्यूब पर टाइप करने पर 133 वीडियो परिणाम मिलते हैं. पहले वीडियो को अब तक तकरीबन तीन लाख लोग देख चुके हैं. यही वाक्य गूगल सर्च पर लिखा जाए तो 69 हजार वेबसाइटों का संदर्भ मिलता है. संबंधित घटना 24 जनवरी, 2009 की है. उस दिन मंगलौर के एक पब में तकरीबन 35-40 लोगों ने जबर्दस्ती घुसकर महिलाओं पर हमला बोल दिया था. मारपीट की इस घटना को एक दक्षिणपंथी संगठन  श्री राम सेना, जिसे इससे पहले तक शायद ही कोई जानता हो, के सदस्यों ने अंजाम दिया था. संगठन के कैडरों का कहना था कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं का शराब पीना ‘असभ्य आचरण’ की श्रेणी में आता है और यह ‘हिंदू संस्कृति और परंपराओं’ का अपमान है. इस घटना के दो दिन बाद ही भारतीय गणतंत्र की साठवीं सालगिरह थी. 26 जनवरी को पूरे दिन राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर पब से निकलकर दौड़ती, गिरती-पड़ती और पिटती महिलाओं का वीडियो फुटेज दिखाया जाता रहा (यह वीडियो फुटेज टीवी चैनलों को सिर्फ इसलिए मिल पाया था कि पब पर हमला करने के आधा घंटा पहले सेना ने खुद ही पत्रकारों को इसकी सूचना दी थी). टीवी चैनलों पर दिखाए जाने के बाद यह घटना हर जगह चर्चा का विषय बन गई. फ्रांस, रूस और जर्मनी तक के पत्रकारों ने इस घटना की रिपोर्टिंग की. इस तरह दो दिनों में ही श्री राम सेना घर-घर में जाना जाने वाला नाम बन गया.

" मैं इसमें सीधे शामिल नहीं हो सकता. मेरी एक छवि है, समाज में कुछ प्रतिष्ठा है. लोग मुझे सिद्घांतों वाले व्यक्‍ति के रूप में देखते हैं, एक आदर्शवादी और ‌हिंदुत्ववादी के रूप में देखते हैं "

प्रमोद मुतालिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राम सेना

एक संगठन के रूप में सेना ने हमेशा खुद को एक उग्र हिंदूवादी संगठन साबित करने की कोशिश की है. सेना के नेता यह दावा करते रहे हैं कि वे हिंदू धर्म और संस्कृति के झंडाबरदार हैं और उनके कार्यकर्ता इस काम में लगे हुए कर्मठ सिपाही. उनके खुद के शब्दों में, अपने हिंदूवादी एजेंडे को लागू करने के लिए उन्हें लोगों से मारपीट करने, संपत्तियों और कलाकृतियों को नष्ट करने और धर्म से बाहर जाकर जोड़ी बनाने वालों को अलग करने में कोई झिझक नहीं. कुल मिलाकर इस संगठन का पहचानपत्र हिंसा है, नैतिकता और संस्कृति की आड़ में की जाने वाली हिंसा.

हालांकि इस संगठन और उसकी कारगुजारियों के बारे में तहलका की छह सप्ताह तक चली तहकीकात बताती है कि सेना के संस्कृति और नैतिकता की रक्षा के दावे किस तरह एक पाखंड भर हैं. ‘धर्म रक्षा’ के लिए तात्कालिक हिंसक प्रतिक्रिया करना श्री राम सेना के कार्यकर्ताओं का सिर्फ एक घृणित चेहरा है. असल में तो यह संगठन सनकी और आवारागर्द लोगों का एक ऐसा झुंड है जिसे पैसे देकर भी अपना काम कराया जा सकता है. ‘दंगे के लिए ठेका’ लेने वाले इस संगठन की असलियत उजागर करने वाली तहलका की तहकीकात बताती है कि इससे तोड़फोड़ करवाने के लिए बस आपको कुछ कीमत चुकाने के लिए तैयार होना है. श्री राम सेना के इस चेहरे को सामने लाने के लिए एक तहलका संवाददाता ने खुद को कलाकार बताकर श्री राम सेना के अध्यक्ष प्रमोद मुथालिक से मुलाकात की. उसके सामने एक प्रस्ताव और तर्क रखा. तर्क यह था कि नकारात्मक प्रचार भी आखिर प्रचार ही होता है, प्रस्ताव यह था कि श्री राम सेना कलाकार के चित्रों की प्रदर्शनी पर हमला करे जिससे देश-दुनिया में सभी लोगों  का ध्यान उसके चित्रों की ओर चला जाए और वह बाद में ऊंचे दामों पर इन्हें बेच सके (मुथालिक को यह भी बताया गया कि ये चित्र हिंदू-मुसलिम सद्भाव से संबंधित हैं और इनमें खासकर हिंदू-मुसलिम शादियों का चित्रण है). बदले में मुथालिक और सेना को वह प्रचार तो मिलता ही जो मंगलौर पब पर हमले के बाद मिला था, साथ ही इस उपद्रव को आयोजित करने का मेहनताना भी मिलता. इस प्रस्ताव पर मुथालिक की प्रतिक्रिया में गुस्सा या डर कतई नहीं था. उसने तुरंत तहलका संवाददाता को सेना के कई सदस्यों के फोन नंबर दे दिए और फिर एक के बाद एक ऐसे कई आपराधिक चेहरे सामने आते गए जो पेशेवराना अंदाज़ में अराजकता फैलाने के उस्ताद थे. इस पूरी कहानी को जानने से पहले शायद श्री राम सेना और इसके संस्थापक के अतीत के बारे में जानना बेहतर रहेगा.

" श्री राम सेना के पास एक बहुत बढ़िया टीम है, जो भी आप करवाना चाहते हैं कर देंगे. हमारे पास हर चीज की सेटिंग है. सिर्फ एक ही प्रॉब्लम है- मनी प्रॉब्लम " 

कुमार, मंगलौर में श्री राम सेना का एक सदस्य

श्री राम सेना की शुरुआत 2007 में प्रमोद मुथालिक ने की थी जो अब भी इसका राष्ट्रीय अध्यक्ष है. उत्तर कर्नाटक के बगलकोट में जन्मे मुथालिक ने अपने शुरुआती दिन हिंदू दक्षिणपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ गुजारे. वह 13 साल की उम्र से ही शाखा जाने लगा था. 1996 में आरएसएस में उसके सीनियरों ने मुथालिक को अपने सहयोगी संगठन बजरंग दल में भेज दिया. दल का दक्षिण भारत का संयोजक बनने में मुथालिक को एक साल से भी कम समय लगा. मुथालिक को जानने वाले उसे महत्वाकांक्षी, समर्पित और तीखा वक्ता कहते हैं. आरएसएस और इसके दूसरे संगठनों के साथ अपने 23 साल के जुड़ाव में मुथालिक का कई बार कानून से आमना-सामना हुआ और अपने ऊपर लगे भड़काऊ भाषण देने के आरोपों के चलते उसे कई बार जेल भी जाना पड़ा.

हिंदुत्व के प्रति उसके तथाकथित समर्पण का  जब उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला तो 2004 में उसने आरएसएस से अपना नाता तोड़ लिया. उसने दावा किया कि आरएसएस और इससे जुड़े अन्य संगठन पर्याप्त सख्ती न अपनाकर हिंदू हितों से गद्दारी कर रहे हैं. इसके बाद यह अपेक्षित ही था कि 2007 में स्थापना के बाद से ही अत्यंत कट्टर हिंदुत्व की राजनीति श्री राम सेना की पहचान बन गई. मुथालिक कहते हैं कि हिंसा ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है. राजनीति के केंद्रीय रंगमंच पर आने की कोशिश में 2008 में मुथालिक ने राष्ट्रीय हिंदुत्व सेना का गठन किया, जो श्री राम सेना का राजनीतिक धड़ा है. लेकिन यह बुरी तरह से नाकाम रही. चुनाव लड़ने वाला इसका कोई भी उम्मीदवार अपनी मौजूदगी तक दर्ज नहीं करा सका. तहलका से बात करते हुए मुथालिक ने कैमरे के सामने यह स्वीकार किया कि उसके उम्मीदवार राज्य चुनाव इसलिए हार गए क्योंकि ‘हमें कामयाब होने के लिए पैसा, धर्म और ठगों की जरूरत है. हमें यह पता नहीं था. आज की राजनीतिक स्थिति बदतर हो गई है.’

चुनावी राजनीति में फिर से लौटने की कोशिश  के फेर में मुथालिक और सेना ने और अधिक कट्टर रुख अपनाते हुए ‘हिंदू’ पहचान को मजबूती देने की योजनाओं के एक सिलसिले की शुरुआत की. हालांकि इस संगठन का मजबूत आधार तटीय और उत्तर कर्नाटक के कुछ इलाकों में है, लेकिन इसकी गतिविधियां इन्हीं इलाकों तक सीमित नहीं हैं. 24 अगस्त, 2008 को दिल्ली में श्री राम सेना के कुछ सदस्य सहमत नामक एनजीओ द्वारा आयोजित एक कला प्रदर्शनी में घुस गए और एमएफ हुसैन की अनेक तसवीरों को नष्ट कर दिया. एक माह बाद सितंबर में मंगलौर में एक सार्वजनिक सभा में बोलते हुए मुथालिक ने बंेगलुरु बम धमाकों का जिक्र किया, जो एक हफ्ता पहले हुए थे और यह घोषणा की कि सेना के 700 सदस्य आत्मघाती हमले करने के लिए प्रशिक्षण ले रहे थे. उसने घोषणा की, ‘अब हमारे पास और धैर्य नहीं है. हिंदुत्व को बचाने के लिए जैसे को तैसा का ही एकमात्र मंत्र हमारे पास बचा है. अगर हिंदुओं के धार्मिक महत्व के स्थलों को निशाना बनाया गया तो विरोधियों को कुचल दिया जाएगा. अगर हिंदू लड़कियों का दूसरे धर्म के लड़कों द्वारा इस्तेमाल किया जाएगा तो अन्य धर्मों की दोगुनी लड़कियों को निशाना बनाया जाएगा.’

" मैंने पहले 1996 में आरएसएस में काम किया. फिर बजरंग दल में. मैं उस मुख्य टीम में शामिल था जिसने मंगलौर पब में हमला किया था. मगर पुलिस ने जो मामला दर्ज किया है उसमें मेरा नाम नहीं है. मैं कभी गिरफ्तार नहीं हुआ "

सुधीर पुजारी , मंगलौर में श्री राम सेना का एक सदस्य

कुछ महीनों बाद कर्नाटक पुलिस ने राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान हुबली में हुए धमाकों के संबंध में जनवरी, 2009 में नौ लोगों को गिरफ्तार किया. उनका मुखिया नागराज जंबागी सेना सदस्य और मुथालिक का नजदीकी सहयोगी था- इसे तब खुद मुथालिक ने स्वीकार किया था. जुलाई, 2009 में जंबागी की बगलकोट जेल में ही हत्या हो गई. मंगलौर पब हमले के दौरान अपने कैडरों को उकसाने के लिए गिरफ्तार किए जाने के कुछ मिनट पहले मुथालिक ने पत्रकारों से कहा था कि वे इन हमलों को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहे हैं. उसने कहा था- ‘हम अपनी हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए यह कदम उठा रहे हैं और उन लड़कियों को सजा दे रहे हैं जो पबों में जाकर इस संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश कर रही थीं. जो कोई भी मर्यादा की सीमा से बाहर जाएगा हम उसे बरदाश्त नहीं करेंगे.’

मुथालिक  के सुझाए ‘मर्यादा’ में रहने के ये तौर-तरीके आज भी तटीय कर्नाटक में अनेक प्रकार से लागू किए जा रहे हैं. मंगलौर में सेना के कैडर 15 जुलाई, 2009 को एक हिंदू शादी के समारोह में घुस गए और वहां मौजूद एक मुसलिम मेहमान के साथ मारपीट की. पूरे इलाके में मुसलिम लड़के महज हिंदू लड़कियों से बात करने के लिए ही पीट दिए जाते हैं. लव जिहाद (हिंदू लड़कियों को कथित तौर पर मुसलिम लड़कों द्वारा शादी का प्रस्ताव देकर अपने धर्म में शामिल करने की साजिश) के नाम पर स्थानीय लोगों की भावनाओं को भड़काने की भी जमकर कोशिश की जा रही है.

इस तरह अपनी पड़ताल के लिए तहलका के पत्रकार ने खुद को एक कलाकार के रूप में पेश किया और घोषणा की कि उसकी अगली प्रदर्शनी लव जिहाद की सकारात्मक छवि पर होगी. लेकिन इसके बावजूद मुथालिक या सेना के किसी सदस्य पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता दिखा कि वे जिस चीज़ का सैद्धांतिक रूप से विरोध करने का दावा करते हैं उससे संबंधित चित्रों की बिक्री उनके विरोध से बढ़ जाने वाली है.

पेश है तहलका की मुथालिक से मुलाकात का सिलसिलेवार ब्योरा.

 

तहलका की मुथालिक से पहली भेंट हुबली स्थित सेना के दफ्तर में हुई. कला प्रदर्शनी पर पूर्वनियोजित तरीके से हमले का प्रस्ताव रखने से पहले यह कहते हुए कि ‘हिंदुत्व के लिए हम भी कुछ करें’, नकद 10 हजार रुपए दान के रूप में दिए गए. मुथालिक ने झट से पैसे लिए और उन्हें अपनी जेब में रख लिया. उसने मना करने का दिखावा करने तक की जहमत नहीं उठाई.
बातचीत के क्रम में एक ऐसा प्रस्ताव सुझाया गया जो दोनों पक्षों के लिए लाभकारी था.  मुथालिक के चेहरे पर हमने किसी तरह की हैरानी या अचंभे का भाव नहीं देखा – तब भी नहीं जब तहलका संवाददाता ने यह सुझाया कि प्रदर्शनी बंेगलुरु के एक मुसलिम बहुल इलाके में होनी चाहिए ताकि हमले का अधिकतम असर हो. इस सुझाव पर मुथालिक की एकमात्र प्रतिक्रिय़ा थी – ‘हां. हम ऐसा कर सकते हैं. मंगलौर में भी कर सकते हैं.’ इस तरह एक दूसरे शहर मंगलौर, जहां हमला किया जा सकता था, पर भी बात पक्की हो गई. अगले पांच मिनटों के भीतर मुथालिक ने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें दो सेना नेताओं- बेंगलुरु शहर अध्यक्ष वसंतकुमार भवानी और सेना के उपाध्यक्ष प्रसाद अवतार से मिलने का सुझाव दिया जो मंगलौर में रहते हैं.

 

" मैं आपको बताऊंगा कितना पैसा लगेगा. यह मंगलौर पब अटैक की तरह होगा, बल्कि उससे भी बेहतर होगा.आपको पूरा नेशनल मीडिया कवरेज मिलेगा. मैं आपके लिए सब सेटिंग कर दूंगा "

प्रसाद अत्तावर , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, श्री राम सेना

तहलकाः मैं चाहता हूं सर मुझे पॉपुलेरिटी मिले और पॉपुलेरिटी मिलेगी तो मेरा बिजनेस भी बढ़ जाएगा… अगर आप कहें तो मैं… आप मुझे एक दायरा बता दें… कि इतना खर्चा आ गया… इतने लड़के होंगे… इतना एडवो… मतलब वकीलों का… हम लोग तो कंप्लेंट ही नहीं करेंगे… क्योंकि वो तो हमारी अंडरस्टेंडिंग है… तो सर लेकिन ये है कि आप मुझे जो बताएंगे मैं एडवांस आपके यहां छोड़ करके जाऊंगा उसके बाद आपको कहूंगा कि ये सर पूरा आ गया है अब सर काम कर दो…

मुथालिकः मंगलौर में कर सकते हैं… बंगलौर.

तहलकाः बंगलौर में शिवाजी नगर वाले एरिया में मुझे पॉपुलेरिटी ज्यादा मिल जाएगी्… क्योंकि वो पूरा एरिया उन्हीं का है… मुसलिम का ही. आपने अगर प्रेस में एक वक्तव्य भी दे दिया और आपके दस कार्यकर्ता भी पहुंच गए… हम तो उसे बंद कर देंगे न… हमें क्या है… लेकिन उसे ये ही ना पॉपुलेरिटी तो मिल ही जाएगी…

मुथालिकः हां कर सकते हैं…

तहलकाः तो सर मुझे एक सीधा बता दीजिए… या मेरे को दो-चार दिन बाद आने को बता दीजिए… आप पूरा बताइए कि पुष्प ये मेरा खर्चा आ रहा है… तुम इतना कर दो… तो सर मैं पूरा करके उसको प्लान कर देता हूं.

मुथालिकः मैं क्या बता रहा हूं… वहां के हमारे प्रेसिडेंट हैं.

तहलकाः बंगलौर के?

मुथालिकः बंगलौर के… वो भी बहुत स्ट्रांग हैं… उनसे बात करके… आप मैं और वो तीनों बैठकर प्लान करेंगे क्या-क्या करना है… फिर करेंगे… डेफिनेट करेंगे

घंटे भर चली बातचीत गालियों, मुसलमानों के प्रति नफरत भरे संवादों और ‘उनके द्वारा देश को बांटने की योजना’ के इर्द-गिर्द घूमती है. मुथालिक तहलका से कहता है कि लव जेहाद के जरिए मुसलमान अपनी तादाद बढ़ाकर हिंदुओं को पीछे छोड़ना चाहते हैं. वह आगे बताता है कि मुसलमान ब्राह्मण और जैन लड़कियों को निशाना बना रहे हैं ताकि उनके बच्चों में इन जातियों जैसी तेज अक्ल आ जाए जिससे उनके मकसद को मदद मिलेगी. उसके मुताबिक मुसलमानों की यह साजिश पूरे देश में चल रही है और इसकी रफ्तार भी बढ़ रही है. जब हम उससे पूछते हैं कि हिंदू लड़के भी यह काम क्यों नहीं करते तो मुथालिक का जवाब आता है कि श्री राम सेना अब हिंदू युवाओं को भी इस बात के लिए प्रेरित कर रही है.

बातचीत के दौरान हम बार-बार उसके सामने अपना प्रस्ताव दोहराते हैं. मुथालिक को यह प्रस्ताव ठुकराने के कई मौके भी देते हैं. लेकिन  ऐसा करने की बजाय वह अपने दूसरे सहयोगियों को इस बारे में बताने की पेशकश करता है जो इस योजना को लागू करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे. अगली मुलाकात की तारीख तय होती है. निजी फोन नंबरों का आदान-प्रदान होता है और मुथालिक हमें एक हफ्ते बाद आने को कहता है.

सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते मुथालिक  का रुख इसे लेकर साफ है कि अगर इस योजना में उसकी भूमिका सामने आती है तो उसके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी, लिहाजा वह कहता है कि योजना के महत्वपूर्ण पहलुओं पर वह अपने सहयोगियों प्रसाद अत्तावर, वसंतकुमार भवानी और जीतेश से बातचीत करेगा और फिर उन्हें तहलका से संपर्क करने को कहेगा. पूरी बातचीत के दौरान कभी भी इस बात को लेकर संशय नहीं पैदा होता कि मुथालिक ही मुखिया है और अंतिम निर्णय का अधिकार उसी के हाथ में है.

मुथालिक के हस्तक्षेप के बावजूद श्री राम सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रसाद अत्तावर से संपर्क करना आसान नहीं रहा. अत्तावर हर व्यक्ति को संदेह की निगाह से देखता है और फोन करने पर मोबाइल नहीं उठाता. इसलिए तहलका को उससे मिलने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. मुथालिक के विश्वस्त सहयोगी माने जाने वाले अत्तावर को मंगलौर के पब में हुई घटना का सूत्रधार माना जाता है. 2007 में श्री राम सेना  की शुरुआत से ही अत्तावर इससे जुड़ा हुआ है और संगठन के कार्यकर्ता उसकेे एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. अत्तावर मंगलौर में सेना के एक अन्य कार्यकर्ता के साथ मिलकर अपनी एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता है. बाकी लोगों की तरह वह वित्तीय मदद के लिए सेना पर निर्भर नहीं है. जनवरी, 2009 में अत्तावर ने खुलेआम मंगलौर के पब में हुई घटना की जिम्मेदारी ली थी. उस वक्त तहलका के एक रिपोर्टर ने जब एक खबर के सिलसिले में उससे संपर्क किया था तो उसने हमले की योजना बनाने का भी दावा किया था. घटनास्थल पर मीडिया को भी उसने ही फोन करके बुलाया था. कुछ दिनों बाद मुथालिक और अत्तावर समेत 27 लोगों को पब में हुई घटना के संबंध में गिरफ्तार किया गया था. एक हफ्ते बाद जब मजिस्ट्रेट ने उन्हें जमानत दी तो उन सभी का नायकों की तरह स्वागत किया गया था.

अत्तावर के साथ आखिरकार मुलाकात तय हो जाने के बाद सेना के एक कार्यकर्ता जीतेश को तहलका को लेने के लिए भेजा गया. मंगलौर के एक साधारण-से होटल में मुलाकात तय हुई. कुछ मिनट की बातचीत में साफ होने लगा कि वह अपनी गिरफ्तारी से बचने की कोशिश में है और रवि पुजारी गैंग के लिए काम करने के आरोप में पुलिस ने उसके खिलाफ वारंट जारी किया था.  पुजारी के बारे में कहा जाता है कि अपना आपराधिक साम्राज्य खड़ा करने से पहले उसने अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम के साथ काम किया है. पर्यटन और होटल उद्योग के अलावा कथित तौर पर पुजारी की दिलचस्पी कर्नाटक के रियल एस्टेट उद्योग में भी है. अत्तावर पर पुजारी के इशारे पर कर्नाटक के तटीय इलाके के व्यापारियों और बिल्डरों को धमकाने का आरोप है.

" कासरगोड दंगे के लिए मुझपर आईपीसी की धारा 307 के तहत आरोप लगा था. हाफ मर्डर का. मैंने दो या तीन लोगों को तलवार से हत्या कर दी थी. उन्होंने हमारे दो लोगों पर हमला किया था इसलिए हमने उनके दो लोगों को निपटा दिया "
 
जीतेश , श्री राम सेना की उडुपी इकाई का अध्यक्ष 

मुथालिक ने अत्तावर को सब समझा दिया है. इसलिए जब हम उससे मिलते हैं तो उसे ज्यादा कुछ बताने की जरूरत नहीं होती. उसके सुझाव बिल्कुल ठोस और बिंदुवार होते हैं. वह हमें कर्नाटक के बाहर भी प्रदर्शनी आयोजित करने और वहां पर हमला करने का प्रस्ताव देता है. वह कहता है, ‘हम ऐसा मुंबई, कोलकाता या उड़ीसा कहीं भी कर सकते हैं.’ जब तहलका राय देता है कि कलाकार पर हमले का असर काफी बढ़ जाएगा अगर वह अपने सहयोगी रवि पुजारी से कहकर कोई धमकी जारी करवा दे तो अत्तावर सहमति जताते हुए कहता है कि यह हो सकता है. इससे रवि पुजारी के साथ उसका संबंध साबित होता है. एक मिनट बाद ही वह बताने लगता है कि किस तरह पुलिस को भरोसे में लेना होगा, उन्हें सेट करना होगा. इसके अलावा वह यह भी कहता है कि जो लड़के हमले में हिस्सा लेंगे वे मंगलौर से बाहर के होंगे.

तहलकाः हमने तो पुलिस में जाना नहीं है हमने कोई केस भी नहीं करना… तो अगर पुलिस केस डालेगा तो केस रहेगा नहीं क्योंकि कोई पार्टी नहीं है सामने… हम लोग आइडेंटिफाई नहीं करेंगे…

अत्तावरः वो डिपार्टमेंट सेटिंग करके करेगा ना वो मैं करेगा…

तहलका से मुलाकात के छह दिन बाद अत्तावर को मंगलौर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उसे पहले मंगलौर जेल ले जाया गया और फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. उसे बेल्लारी जेल में रखा गया था जिसे कर्नाटक की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली जेलों में से एक कहा जाता है. बावजूद इसके वह यहां से लगातार तहलका के संपर्क में रहा. तहलका, मंगलौर और बेल्लारी जेलों में भी अत्तावर से मिलने में सफल रहा. मंगलौर जेल में मुलाकात के दौरान जब तहलका ने उससे पूछा कि दो शहरों में दंगे करवाने के लिए क्या 50 लाख रुपए काफी होंगे तो उसका जवाब था, ‘मैं फाइनल अमाउंट कैलकुलेट करके आपको बता दूंगा.’  सारी बातचीत ‘फाइनल अमाउंट’ के इर्द-गिर्द घूमती रही. पर प्रस्ताव का एक बार भी विरोध नहीं हुआ.

प्रसादः क्या क्या करना है… होटल का अरेंजमेंट करना है?

तहलकाः नहीं वो हम करेगा… आपका सिर्फ टीम लगेगा और बाकी सब…

तहलकाः दंगा करना है… मारकाट करना है? 50 लाख खर्चा कर रहा है दो शहर के लिए.

प्रसादः मंगलौर में…

तहलकाः हां, दो सौ कार्यकर्ता करीब-करीब हों वहां पर… एक्जीबीशन के टाइम पर.

प्रसादः हां…

महज 2,500 रुपए जेल के कुछ वार्डनों और बेल्लारी जेल के सुपिरटेंडेंट एसएन हुल्लर को देकर हमें अत्तावर के साथ एक अलग कमरे में मुलाकात करने की छूट मिल जाती है. अत्तावर कहता है कि उसकी जेब बिल्कुल खाली है और वह हमसे कुछ रुपए मांगता है. हम 3,000 रुपए दे देते हैं. इस मुलाकात के बाद अत्तावर अक्सर हमें एसएमएस कर फोन करने के लिए कहता है. हाई ‌सिक्योरिटी जेल में मोबाइल और उसकी कनेक्टिविटी अत्तावर के लिए बहुत आसान चीजें लगती है. बाद में उसके वकील संजय सोलंकी  ने हमें बताया कि इसके लिए जेल के सुपिरटेंडेंट को मोटी घूस दी जाती है.

मुथालिक से मुलाकात के कुछ दिनों बाद ही तहलका ने सेना के बेंगलुरु शहर प्रमुख वसंतकुमार भवानी से संपर्क किया. भवानी सेना का जनसंपर्क अधिकारी भी है. अंग्रेजी और हिंदी में धाराप्रवाह बोलने वाला यह शख्स मंगलौर के पब में हुई घटना के तुरंत बाद ही हरकत में आ गया था और एक के बाद दूसरे टीवी चैनलों के स्टूडियो जाकर सेना की कारगुजारी और उसकी विचारधारा का बचाव कर रहा था. रियल एस्टेट व्यवसायी भवानी पैसे वाला व्यक्ति है और अत्तावर की तरह ही वह भी पैसे के लिए सेना पर निर्भर नहीं है. बंगलुरू में सेना कैडरों की संख्या के बारे में पूछने पर वह कहता है, ‘प्रमोद (मुथालिक) भी मुझसे यह सवाल नहीं पूछते. संख्या बतानी जरूरी नहीं. अगर हमारी असली ताकत के बारे में पुलिस को पता चल गया तो मेरे लड़के मुसीबत में पड़ जाएंगे.’ (इस साल फरवरी में जब सेना ने वैलेंटाइन डे के विरोध की घोषणा की तो पुलिस ने एहतियाती उपाय के तहत 400 लोगों को गिरफ्तार किया था).

तहलका से मुलाकात के एक पखवाड़े पूर्व ही भवानी ने मुथालिक के अपमान के विरोध में बंेगलुरू में सेना का एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था (उन्हीं की भाषा में जवाब देने वाली एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कर्नाटक यूथ कांग्रेस के सदस्यों ने वैलेंटाइन डे पर आयोजित एक टीवी चर्चा के दौरान मुथालिक के मुंह पर कालिख पोत दी थी. इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे भवानी और तमाम दूसरे सेना कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया था).

तहलका से मुलाकात के दौरान बातचीत बेंगलुरू में हमले की संभावनाओं, इसके निष्कर्षों और इसके असर को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के आसपास घूमती रहती है. ये रहे भवानी के सुझावः

" अगर हम एक निश्‍चित रकम पर सहमत हो जाएं तो फिर मैं अपने बॉस, मुथालिक से बात करूंगा. वे ही हमें एक्‍शन के लिए ग्रीन सिग्नल देते हैं. उनके पास स्क्रिप्ट तैयार है. आप अपने ऑफर के बारे में सोचिए " 

वसंत कुमार भवानी, बैंगलुरु में श्री राम सेना  का अध्यक्ष
 

भवानीः ये रवीन्द्र कलाक्षेत्र मालूम है न आपको.

तहलकाः हां, हां.

भवानीः उसके पीछे एक खुला स्टेज है.

तहलकाः कितना क्राउड आ सकता है उसमें?

भवानीः टू थाउजेंड…

तहलकाः टू थाउजेंड… लेकिन वे कम्यूनल वाइज तो सेंसिटिव है न?

भवानीः कम्यूनल वाइज भी सेंसिटिव है… बोले तो उधर से मार्केट बहुत नजदीक है…

तहलकाः सिटी मार्केट?

भवानीः सिटी मार्केट…

तहलकाः हां फिर तो उधर मुसलिम एरिया है…

भवानीः इसलिए वो जगह बहुत अच्छा है आपके लिए… शिवाजी नगर से वहां बहुत अच्छा स्कोप है क्योंकि वहां भागल में मुसलिम पॉपुलेशन भी बहुत ज्यादा भी है.

तहलकाः हां, सिटी मार्केट में तो है… लेकिन उधर कमर्शियल एरिया ज्यादा पड़ जाता है उधर?

भवानीः आपका जो थिंकिंग है ना उसके लिए सूट हो जाता है उधर…

तहलकाः हमारी जो प्रोफाइल है उसको सूट करता है.

भवानीः उसको सूट करता है… शिवाजी नगर से ज्यादा सूट है… शिवाजी नगर एक रिमोट एरिया हो गया ये फ्लोटिंग ज्यादा है.

तहलकाः शिवाजी नगर किया तो वहां पर ये लगेगा वहां पर एजूकेटिड क्लास नहीं है तो वहां क्यूं कर रहा है… सिटी मार्केट किया तो…

भवानीः आपके आइडिया के लिए और इस कॉन्सेप्ट के लिए ये मैच हो रहा है… क्योंकि इलिटरेट आके आपका गैलरी तो देखने वाला नहीं है… देखेगा तो ये आपका… अपर क्लास… मिडिल क्लास.

तहलकाः एलीट क्लास…

भवानीः अपर क्लास ही ज्यादा देखेगा…तो अपर क्लास… आप शिवाजी नगर में रखेंगे तो कौन आएगा… ये प्रि-प्लांड लगेगा सबको…

तहलकाः हम्म…

भवानीः अगर शिवाजी नगर किया तो… हां ये अगर एक डाइरेक्शन से सोचेंगे तो सही बात ही… लेकिन उसको ज्यादा हवा नहीं मिलेगा…

तहलकाः हां लोगों को कहीं लग सकता है… कहीं अंडर टेबल एलाइंस है…

भवानीः लग सकता है…

घटनास्थल को लेकर सहमति बन जाने के बाद तारीख को लेकर चर्चा होती है. अपने फोन पर कैलेंडर की तारीखें दिखाते हुए भवानी हमसे सुविधाजनक तारीख के बारे में पूछता है. सप्ताह के कामकाजी दिन या फिर हफ्ते के आखिर में? उसकी राय है कि दूसरा विकल्प ठीक रहेगा क्योंकि उस समय ज्यादा लोग कला प्रदर्शनियां देखने जाते हैं. स्थान और तारीख के बाद वह विरोध की योजना पर आ जाता है. जब हम पूछते हैं कि अगर प्रदर्शनी का उद्घाटन मुसलिम समुदाय के किसी नेता से करवाने पर हमले का असर और भी बढ़ जाएगा तो भवानी न सिर्फ रजामंदी जताता है बल्कि कुछ सुझाव भी दे देता है.

तहलकाः इस प्रोग्राम में, वसंत जी, मुझे पब्लिक बीटिंग जरूर चाहिए… क्योंकि आपका जो ट्रेडमार्क है और मैं चाह रहा इसके अंदर किसी मुसलिम लीडर को बुलाना इनेगुरेशन के लिए… तो मुसलिम कम्युनिटी कुछ न कुछ तो रहेगी… प्रोफेसर हुजरा हैं यहां आईआईएम के अंदर…

भवानीः मुमताज अली को ही बुलाइए न…

तहलकाः किसको…

भवानीः मुमताज अली खान…

तहलकाः ये कौन हैं…

भवानीः वक्फ बोर्ड का मिनिस्टर है न… अभी

तहलकाः कर्नाटक से?

भवानीः हां.

तहलकाः आ जाएगा वो तो… कितना एज होगा मुमताज अली का?

भवानीः फिफ्टी के ऊपर हैं…

तहलकाः फिफ्टी प्लस… ये एमएलसी हैं या एमएलए हैं?

भवानीः एमएलसी होके… बैक डोर एंट्री है… मिनिस्टर हैं वो… हज कमिटी और वक्फ बोर्ड…

तहलकाः उसके अलावा एक और था ना जो बाद में रेल मंत्रा भी बना…

भवानीः सीके जाफर…

तहलकाः जाफर शरीफ…

भवानीः वो उमर हो गया उसके तो…

भवानी कुछ और जरूरी तैयारियों का भी सुझाव देता है मसलन घटनास्थल पर एंबुलेंस-

भवानीः जैसे आप हुसेन का ही नाम रख लेंगे तो अच्छा है… उसे एक दम पॉप्युलर…

तहलकाः नहीं अगर हुसेन का रख दिया तो उससे मेरे को ‘माइलेज’ नहीं मिलेगा हुसेन साहब को ‘माइलेज’ मिल जाएगा…

भवानीः उसको माइलेज जाएगा…मैं इसका एश्योरेंस नहीं दे सकता… आपका डेमेज कितना होगा… डेमेज तो होगा… लेकिन कितना होगा ये गारंटी नहीं ले सकता… क्योंकि हमारे लड़के बहुत फेरोशियस लड़के हैं… वो आगे-पीछे नहीं देखते…

तहलकाः एक बार किया तो किया…

भवानीः किया…मैं उनको अवॉइड भी नहीं कर सकता क्योंकि मेरे ऊपर भड़क जाएंगे…जब नेता ही फेरोशस है तो उनके फॉलोअर्स भी फेरोशस होंगे…इतना तो मैं आपको बोलना चाहता हूं…डैमेज तो होगा लेकिन कितना ये बोल नहीं सकता हूं

तहलकाः पब्लिक बीटिंग्स हो सकती हैं

भवानीः हो सकती हैं…उधर आके जो भी आके उनको…क्योंकि ये सब भी कर देते हैं हमारे लड़के

तहलकाः भीड़ वगैरह आई तो फिर कंट्रोल नहीं होता है…

भवानीः कंट्रोल नहीं होता है…

तहलकाः एंबुलेंस तैयार रखना पड़ेगा ?

भवानीः बिलकुल… वो भी हो सकता है… वो फिर मेरे लोग हैं… जब लेते हैं न कुछ… तो… फिर उनको समझाना पड़ता है… बोलना पड़ता है… केस ज्यादा हो जाएगा… पहले से ज्यादा केस हैं… कंट्रोल करो सिर्फ जो ये डिस्पले है उसको थोड़ा ये…

तहलकाः डेमेज करो…

भवानीः इतना तो मैं समझा दूंगा लेकिन… बोल नहीं सकता न… ऐसे सिरफिरे लोग हैं…

तहलकाः मतलब एंबुलेंस पहले से तैयार रखना पड़ेगा… माइंड में रखकर चलें…

दंगों और तोड़फोड़ के लिए सेना की तैयारियों के और भी सबूत हैं. हमले के बाद की स्थितियों पर बातचीत के दौरान जब हम उनके सामने प्रस्ताव रखते हैं कि हम सेना के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेंगे तो भवानी तत्काल इस सुझाव को खारिज कर देता है. ‘अगर हमलावरों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवाए जाएंगे तो लोगों के मन में शंका होगी कि हमला पूर्व नियोजित था.’ वह कहता है कि उन्हें कोर्ट-कचहरी से कोई फर्क नहीं पड़ता और हमें उनसे कैसे निपटना है, इसके निर्देश हमें मिल जाएंगे.

तहलकाः हमारी तरफ से गैलरी वाले प्रोग्राम के अंदर… आर्ट गैलरी में हम लोगों को कोई केस नहीं करना है… जब कोई राइवल पार्टी ही नहीं है…

वसंतः आपको केस करना पड़ेगा…

(इस बातचीत के बाद अत्तावर की चर्चा के दौरान एक नया सुझाव सामने आता है)

तहलकाः तो केस डालें.

वसंतः डालना पड़ेगा… अगर आप लोग गलती करेंगे तो केस करना पड़ेगा ना हमको.

तहलकाः आपको नहीं लगता कि इसमें मुश्किलें आएंगी?

वसंतः दिक्कत होगी तभी तो परपस पूरा होगा… पानी में उतर गया तो…

तहलकाः ठीक है आप जैसा आदेश करते हैं… लेकिन लगातार डेट पर आना कोर्ट में खड़ा होना… ये शायद किसी भी आदमी के लिए थ्री थाउजेंट किमी से आना टेक्नीकली शायद बहुत-बहुत मुश्किल होगा…

वसंतः उसके लिए रास्ता हम दे देगें न… एक बार आपका ये सक्सेस होने के बाद बैठ के मैं समझा दूंगा… क्या करना है कैसा करना है…

तहलकाः कोई भी लोकल वकील सेट कर दिया वो डेट एक्सटेंड… होती रहेगी…

वसंतः मैं बोल दूंगा आपको… समझा दूंगा… समझा दूंगा कैसा करना है क्या करना है…

तहलकाः ठीक है…

वसंतः लेकिन आप मेंटली प्रिपेयर रहना…

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वीवीआईपी शहर और प्रगति के खंडहर

नेहरू-गांधी परिवार के राजनीतिक रूप से सक्रिय ज्यादातर सदस्यों की कर्मस्थली रहे सुल्तानपुर और रायबरेली में उद्योगों का खुलकर बंद होना और इस प्रक्रिया में लोगों की पहले जमीनें और बाद में रोजगार छिनना एक परिपाटी जैसा बन चुका है. जय प्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में विकास के मुद्दे पर कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी में कभी शिलान्यास को लेकर रस्साकशी चलती है तो कभी किसी फैक्ट्री की जमीन को लेकर. मगर जहां बसपा में विकास के मायने दलित अस्मिता के प्रतीकों से सुसिज्जत स्मारकों का विकास है वहीं कांग्रेस की विकासवादी राजनीति भी काफी कुछ प्रतीकों पर ही टिकी हुई है.

रायबरेली व सुलतानपुर की सीमा पर स्थित जगदीशपुर औद्योगिक क्षेत्र का शिलान्यास स्वर्गीय संजय गांधी ने दोनों जिलों के विकास के लिए किया था. वर्ष 1984 से वहां बड़े उद्योग-धंधे लगने शुरू तो हुए मगर अधिक समय तक टिक नहीं सके. देखते ही देखते एक-एक कर यहां की कुल 127 में से 74 इकाइयों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है देश का सबसे प्रभावशाली लोकसभा क्षेत्र और गांधी परिवार की कर्मस्थली अमेठी. यहां पिछले तीन सालों में हजारों करोड़ों की परियोजनाओं के शिलान्यास गांधी परिवार और उनकी सरकार द्वारा किए जा चुके हैं. पर इनमें से ज्यादातर अभी शुरू तक नहीं हो सकी हैं. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि पिछले 24 सालों में यहां शुरू हुए ज्यादातर बडे़ और कुछ छोटे उद्योग-धंधे एक-एक कर बंद होते चले जा रहे हैं.

लखनऊ-वाराणसी रोड पर राजधानी से करीब 80 किलोमीटर दूर सुलतानपुर जिले की अमेठी लोकसभा का जगदीशपुर औद्योगिक क्षेत्र. रायबरेली व सुलतानपुर की सीमा पर स्थित इस औद्योगिक क्षेत्र का शिलान्यास स्वर्गीय संजय गांधी ने दोनों जिलों के विकास के लिए किया था. वर्ष 1984 से वहां बड़े उद्योग-धंधे लगने शुरू तो हुए मगर अधिक समय तक टिक नहीं सके. देखते ही देखते एक-एक कर यहां की कुल 127 में से 74 इकाइयों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया. आज आलम यह है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाले को सड़क के दोनों ओर खंडहर-हाल फैक्ट्रियां और उनके बोर्ड ही नज़र आते हैं.

लखनऊ की दिशा से आने वाले मार्ग से औद्योगिक क्षेत्र में घुसते ही बाएं हाथ पर सबसे पहले बंद पड़ी मालविका स्टील फैक्ट्री से हमारा सामना होता है. वर्ष 1995 में 29 एकड़ में लगी पिग आयरन बनाने की यह फैक्ट्री शुरू होने के केवल तीन साल में ही बंद हो गई. इसका नतीजा यह रहा कि 1,700 कर्मचारियों के घरों में जलने वाले चूल्हों की आग एकाएक ही मंद पड़कर बुझने के कगार पर जा पहुंची. कर्मचारियों में सबसे अधिक संख्या स्थानीय कामगारों की थी. पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव से पूर्व मालविका को स्टील अथॉरिटी आफ इंडिया ने खरीद लिया. इससे जुड़े समारोह में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व अमेठी के सांसद राहुल गांधी, पेट्रोलियम मंत्री जितिन प्रसाद सहित कई केंद्रीय मंत्री शामिल हुए थे. अब एक साल से ज्यादा समय हो चुका है मगर इससे आगे कुछ नहीं हो सका है.

मालविका से कुछ दूर आगे जाने पर सड़क के किनारे पड़ा आरिफ सीमेंट फैक्ट्री का जंग खाया बोर्ड और चारों तरफ पसरा सन्नाटा यह बताने के लिए काफी हैं कि यह फैक्ट्री अब बंद हो चुकी है. 1986 में लगी आरिफ सीमेंट फैक्ट्री दस साल तक जैसे-तैसे चलने के बाद 1996 में बंद हो गई. बंद फैक्ट्री की देखभाल करने वाले जीके श्रीवास्तव बताते हैं कि कर्मचारियों की यूनियन इसे ले डूबी. स्थानीय लोगों की जरूरतों को देखते हुए कंपनी प्रबंधन ने ज्यादातर उन्हें ही काम पर रखा था. पहले तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ा कर्मचारी संघ ने अपनी मांगों को भी बढ़ाना शुरू कर दिया. श्रीवास्तव के मुताबिक जिस समय फक्ट्री बंद हुई थी उस समय इसमें 100 टन प्रतिदिन तक उत्पादन हुआ करता था.

औद्योगिक क्षेत्र में ही एग्रो के नाम से अगल-बगल में ही कागज बनाने की तीन फैक्ट्रियां हुआ करती थीं. बंद फैक्ट्री की जंग लगी मशीनें और चारों ओर उग आई झाड़ियां उनका हाल बताने के लिए पर्याप्त हैं. इन फैक्ट्रियों के बंद होने के पीछे वहां के कर्मचारी एम जार्ज का तर्क अलग है. वे बताते हैं कि उनके यहां कागज बनता था, लेकिन चाइना का कागज आने के बाद बाजार में स्थानीय कागज की मांग कम होने लगी और मिल बंद हो गई. तीनों एग्रो कारखानों में कुल मिलाकर 400 से अधिक लोग काम किया करते थे जो अब या तो आस-पास के इलाकों में छोटा-मोटा काम करके अपना गुजारा कर रहे हैं या दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों की ओर रुख कर चुके हैं.

एग्रो की ही तर्ज पर शुरू होते ही बंद होने वाले कारखाने यहां बहुतायत में हैं. उदाहरण के तौर पर, कभी 50 से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली रैक्सीन उत्पादक कंपनी राक्सी पेट्रोकेम वर्ष 1985 में लगी और दो वर्ष के भीतर 1987 में बंद हो गई. चिप्स बनाने वाली फैक्ट्री गोल्डन क्रिप्सस 1988 में लग कर 1990 में बंद हो गई.

एक स्थानीय कांग्रेसी नेता बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के समय जगदीशपुर में एक हाईटेक प्रिंटिंग प्रेस भी लगाया गया था, जहां लॉटरी, बस आदि के टिकट छापने की बात कही गई थी. लेकिन स्थितियां ऐसी बनीं कि जमीन लेकर फैक्ट्री तो लग गई लेकिन वहां काम नहीं हो सका 

आलम यह है कि अमेठी लोकसभा क्षेत्र के लोग ही नहीं स्थानीय कांग्रेसी नेता व कार्यकर्ता भी अब विकास के मुद्दे को छलावा बताने लगे हैं. एक स्थानीय कांग्रेसी नेता बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के समय जगदीशपुर में एक हाईटेक प्रिंटिंग प्रेस भी लगाया गया था, जहां लॉटरी, बस आदि के टिकट छापने की बात कही गई थी. लेकिन स्थितियां ऐसी बनीं कि जमीन लेकर फैक्ट्री तो लग गई लेकिन वहां काम नहीं हो सका.  वे यह भी बताते हैं कि यहां अमेठी टेक्सटाइल्स के नाम से एक धागा बनाने की फैक्ट्री भी उसी समय लगाई गई थी लेकिन वह भी बंद हो गई.

आरिफ सीमेंट प्लांट के ठीक पीछे कभी अवध ऑयल प्रोडक्ट के नाम से एक फैक्ट्री हुआ करती थी, लेकिन अब न तो वहां मशीनें बची हैं और न ही इमारत. फैक्ट्री की समतल जमीन को देख इस बात का अंदाजा तक नहीं होता कि यहां कभी ऐसी फैक्ट्री भी थी जो 20 हजार लीटर तेल का उत्पादन किया करती थी. ऑयल मिल के सामने बंद पड़ी राइस मिल के मालिक राकेश उपाध्याय बताते हैं कि कभी यहां डेढ़ दर्जन कमरे और बीस हजार लीटर क्षमता वाली तेल की तीन टंकियां हुआ करती थीं. लेकिन वर्ष 2005 में मिल अचानक बंद हो गई. 4.65 एकड़ में फैली मिल के बीच में अब सिर्फ बिना मूर्ति और गुंबद वाले एक मंदिर के अवशेष ही बचे हैं. ऑयल और आरिफ प्लांट के बीच में जगदीशपुर सीमेंट फैक्ट्री थी जो महज छह साल ही चल सकी और 1997 में बंद हो गई. अहम बात यह है कि इन फैक्ट्रियों के नाम पर स्थानीय किसानों की कई एकड़ जमीन विकास की बलिवेदी पर तो चढ़ गई लेकिन इसका पूरा जायज लाभ किसानों को नहीं मिल सका.

एक-एक कर फैक्ट्रियों के बंद होने का कारण, स्थानीय उद्यमियों के संगठन उद्योग कल्याण संस्थान के अध्यक्ष राजेश मिश्र, सरकार की उदासीनता मानते है. उनका आरोप है कि चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, दोनों ही उद्योग-धंधों के लिए किसी तरह का सहयोग नहीं कर रही हैं. मिश्र बताते हैं कि जब औद्योगिक क्षेत्र का गठन हुआ था उस समय उद्योगों के लिए उत्तर प्रदेश वित्त निगम से फाइनेंस होता था. सरकार की नीति ऐसी थी कि निगम सिर्फ मशीन लगाने और इमारत का निर्माण करवाने के लिए धन उपलब्ध करवाता था. वे बताते हैं, ‘उद्यमी फैक्ट्री तो किसी तरह लगा लेते थे लेकिन कच्चे माल की खरीद और अन्य जरूरतों के लिए उन्हें धन नहीं मिल पाता था, लिहाजा लगाई गई रकम भी फंस जाती थी और धीरे-धीरे ब्याज चढ़ता जाता था. कुछ समय में ही स्थितियां ऐसी हो जाती थीं कि उद्योगों में ताले लग जाते थे.’ वे आगे बताते हैं कि जिस समय एक के बाद एक उद्योग धंधे जगदीशपुर में लगने शुरू हुए स्थानीय लोगों को ही नहीं आसपास के जिलों के भी बेरोजगारों को खूब काम मिला, जिसके कारण सूरत, दिल्ली, मुंबई, लुधियाना जैसे शहरों की ओर होने वाला पलायन खत्म-सा हो गया था. लेकिन स्थितियां फिर से पहले जैसी हो गई हैं.

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की सुलतानपुर इकाई के चेयरमैन शहनवाज बताते हैं कि उद्योग धंधों को बढ़ावा देने के लिए गठित किए गए विभाग भी सरकारी योजनाओं के बारे में फैक्ट्री मालिकों को ठीक से जानकारी नहीं देते. उनका आरोप है कि बैंकों का सहयोग भी उद्यमियों को नहीं मिल पा रहा है और प्रदेश व केंद्र सरकार के बीच विकास के नाम पर चल रहे विवाद का खामियाजा भी स्थानीय उद्यमियों को भुगतना पड़ रहा है. शहनवाज कहते हैं, ‘सरकारी उपेक्षा के चलते वर्ष 2000 तक ऐसी स्थितियां बन गई थीं कि उद्यमियों की अधिकांश इकाइयां बंद हो गईं, लेकिन विभिन्न संगठनों के प्रयास से अब कुछ सुधार हुआ है. मगर अभी भी सिर्फ छोटे उद्यमी ही आ रहे हैं, बड़े उद्यमी अभी भी जगदीशपुर की ओर रुख करने से कतराते हैं.’

‘उद्योगों के बंद होने के कई कारण रहे, लेकिन इनके बंद होने का सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय लोगों को ही उठाना पड़ा’

जिला उद्योग केंद्र सुलतानपुर के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1984 से 1990 के बीच जगदीशपुर औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित हुई 50 से ऊपर फैक्ट्रियां अब बंद हो चुकी हैं. औद्योगिक क्षेत्र में इस दरमियान लगी महज एक दर्जन फैक्ट्रियां ऐसी हैं जो चल रही हैं. वर्ष 1991 से अब तक औद्योगिक क्षेत्र में जो 38 नए उद्योग लगे हैं वे सिर्फ नाम के ही हैं क्योंकि इनमें से 20 में महज चार से आठ व्यक्ति काम करते हैं. अन्य 18 उद्योगों में भी कामगारों की संख्या 10 से 15 के बीच ही है. शहनवाज बताते हैं कि जो भी नए उद्योग लग रहे हैं वे आटा चक्की, मसाला चक्की जैसे कुटीर उद्योग ही हैं.

अमेठी लोकसभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा गांधी- नेहरू परिवार की दूसरी प्रतिष्ठित सीट रायबरेली जिले में भी लगता है. यहां खुले उद्योग-धंधों की कमोबेश जगदीशपुर जैसी ही हालत है. रायबरेली से सलोन कस्बे में पहुंचने से पहले ही सड़क के किनारे एक जंग लगा बड़ा-सा बोर्ड दिखता है. बोर्ड के चारों ओर उग आई बड़ी-बड़ी झािड़यों व पेड़ों को हटाकर देखने पर उसके ऊपर वेस्पा कार कंपनी लिमिटेड लिखा दिखाई दे जाता है. बोर्ड के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर छप्पर में चल रही चाय की दुकान पर बैठे संतकुमार बताते हैं कि यहां स्कूटर बना करते थे, लेकिन अब फैक्ट्री को बंद हुए 17 साल हो चुके हैं. नब्बे एकड़ क्षेत्र में फैली कंपनी अब गार्डों के हवाले है, क्योंकि अभी भी लाखों रुपए का लोहा और कुछ मशीने वहां पड़ी हुई हैं. कंपनी के गेस्ट हाउस में रखा पत्थर बताता है कि कंपनी का शिलान्यास 27 सितंबर 1984 को अमेठी के तत्कालीन सांसद स्वर्गीय राजीव गांधी ने किया था. एक ग्रामीम बुजुर्ग मातादीन बताते हैं कि कंपनी लगाने के लिए आसपास के बगहा, उमरी व बहादुरपुर सहित आधा दर्जन गावों के काश्तकारों की जमीनें ली गई थीं. आज कई ऐसे परिवार उन गावों में हैं जिन्हें विकास की अंधी दौड़ में भूमिहीन होने के लिए मजबूर होना पड़ा और उन्हें कोई रोजगार भी नहीं मिल पाया. ऐसे में स्थानीय किसान खुद को ठगा-सा महसूस न करें तो क्या करें?

रायबरेली जिले के ही गौरीगंज कस्बे के पास सम्राट बाइसिकिल व ऊषा रेक्टीफायर नाम से दो कंपनियां लगी थीं, लेकिन वहां भी अब सिर्फ जंग लगे बोर्ड और जंगल ही नज़र आता है. गौरीगंज से रायबरेली रोड पर कुछ किलोमीटर चलने पर जायस कस्बे का औद्योगिक क्षेत्र पड़ता है. जायस में घुसते ही सड़क के किनारे एक चारदीवारी के भीतर कई खंडहरनुमा हॉल दिखाई देते हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां उत्तर प्रदेश चमड़ा उद्योग निगम ने राजीव गांधी के समय एक कारखाना डाला था. चमड़ा कंपनी के ठीक सामने स्थित राइस मिल के मालिक किसी अनजान डर से अपना नाम बताने की बजाय यह बताते हैं कि यह कारखाना सिर्फ तीन या चार साल ही चला था. चूंकि यहां अब एक भी खिड़की-दरवाजा तक नहीं बचा है, लिहाजा कंपनी में आस-पास के ग्रामीणों को मवेशी चराते देखा जा सकता है.

उद्योगों ­के बंद होने के पीछे जिले के कुछ कांग्रेसी नेता दूसरा ही खेल बताते हैं. एक पूर्व कांग्रेसी विधायक बताते हैं कि जिस समय अमेठी लोकसभा क्षेत्र में उद्योगों को बढ़ावा देने की शुरुआत हुई उस समय केंद्र व राज्य दोनों जगह कांग्रेसी सरकारें थीं, लिहाजा काफी संख्या में उद्यमी इस ओर आकर्षित हुए थे. इनमें अधिकांश केंद्र या राज्य सरकार में शामिल नेताओं से नजदीकी रखते थे. इनका एक ही मकसद था सरकार से मिलने वाली रियायतों का अधिक से अधिक लाभ उठाना. लेकिन 1989 में कांग्रेस की सरकार प्रदेश से चली गई, लिहाजा ये लोग भी फैक्ट्री को नुकसान में दिखाकर यहां से चलते बने. वहीं अपनी ही पार्टी के पूर्व विधायक की इस बात को प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह सिरे से नकारते हैं. वे कहते हैं, ‘जब से कांग्रेस सरकार राज्य से गई है उसके बाद से ही पूरे प्रदेश में बिजली का संकट उत्पन्न हो गया है. इसी समस्या के कारण उद्योग-धंधे एक-एक कर बंद होते गए.’ प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को भी सिंह उद्योगों के बंद होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण बताते हैं. वे कहते हैं, ‘गैरकांग्रेसी सरकारों में अराजकता चरम पर पहुंच गई जिसके कारण उद्यमी अपने को असुरक्षित मानने लगे थे.’

जगदीशपुर से कांग्रेस विधायक रामसेवक कहते हैं, ‘उद्योगों के बंद होने के कई कारण रहे, लेकिन इनके बंद होने का सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय लोगों को ही उठाना पड़ा.’ दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं कि उद्योग लगाने के नाम पर कांग्रेसी नेताओं ने आपस में ही बंदरबांट कर ली थी. उन्हें मालूम था कि कांग्रेस की सरकार जाने के बाद वे मनमानी नहीं कर पाएंगे, लिहाजा जगदीशपुर व अमेठी से जितना फायदा ले सके लेकर चले गए. वे व्यंग करते हुए कहते हैं, ‘अभी भी प्रदेश में बिजली संकट बरकरार है और कानून व्यवस्था चौपट है, ऐसे में कांग्रेस अमेठी व रायबरेली के लिए करोड़ों के प्रोजेक्ट फिर क्यों लेकर आई है.’ उनका आरोप है कि कांग्रेस विकास के नाम पर राजनीतिक बयानबाजी कर जनता को सिर्फ बरगलाने का काम कर रही है. l

 

हिंदुस्तानी ईस्ट इंडिया कंपनी

लम्हों की खता उस वक्त सदियों की सजा बन गई जब 1615 में मुगल बादशाह जहांगीर ने सर थॉमस रो के साथ एक व्यावसायिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. थॉमस रो उस कंपनी के तेज-तर्रार अधिकारी थे जिसने आने वाले साढ़े तीन सौ सालों तक भारत के इतिहास का एक ऐसा अजीबोगरीब अध्याय लिखा जिसमें शोषण और अत्याचार के साथ आधुनिकता और औद्योगीकरण, सभ्यता और शिष्टाचार के साथ वहशत और बर्बरता की इबारतें यहां-वहां छिटकी नज़र आती हैं. वह ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में पहला कदम था. अतिथि को भगवान मानने वाले देश ने इस नई नस्ल का भी दिल खोलकर स्वागत किया. किंतु यहां की नायाब विरासत और अकूत दौलत ने इस अपेक्षाकृत छोटे-से व्यापारिक समझौते को जल्द ही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की सुरसा मे तब्दील कर दिया. बाद में कंपनी के हाथ से भारत का शासन ब्रिटिश सरकार के हाथों में चला गया.

‘भावनात्मक स्तर पर मेरे लिए यह अभिभूत कर देने वाला पल है. यह सोचना ही जोश से भर देता है कि आज मैं उस कंपनी का मालिक हूं जिसका कभी मेरे पूरे देश पर राज था’

ज्यादातर लोगों के लिए यह कहानी 1947 में देश की आजादी के साथ ही खत्म हो गई लेकिन साढ़े तीन सौ साल तक चले  भलाई-बुराई, लूट-खसोट, मनमानी-तानाशाही के खेल का अंतिम अध्याय लिखा जाना अभी बाकी था. और बीते फरवरी महीने की एक शाम मुंबई के एक व्यवसायी संजीव मेहता ने अपने वतन से दूर लंदन में बिल्कुल खामोशी से यह अंतिम अध्याय लिख दिया. इस दिन वे अपने वतन पर सैकड़ों साल तक राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक बन गए.आश्चर्य की बात है कि जिस हिंदुस्तान में इस बात की सबसे अधिक चर्चा होनी चाहिए थी वहां इसकी जानकारी भी बमुश्किल थोड़े ही लोगों को होगी.

इतिहास के इस अंतिम अध्याय को लिखने की अहमियत का अंदाजा संजीव को भी अच्छी तरह से हैः एक कंपनी जिसे दुनिया की पहली बहुराष्ट्रीय कंपनी होने का गौरव हासिल है, जिसके झंडे तले एक समय दुनिया के कुल मानव श्रम का एक-तिहाई हिस्सा काम करता था, ऐसी कंपनी जिसके अतीत में जितने उजले पन्ने हैं उससे कहीं ज्यादा स्याह पक्ष हैं. ‘व्यावहारिक रूप से तो यह मेरे लिए एक बड़ी चुनौती है लेकिन भावनात्मक स्तर पर मेरे लिए यह अभिभूत कर देने वाला पल है. यह सोचना ही जोश से भर देता है कि आज मैं उस कंपनी का मालिक हूं जिसका कभी मेरे पूरे देश पर राज था,’ संजीव का पत्रकारों से बातचीत में कहना था.

ईस्ट इंडिया कंपनी में संजीव ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश किया है. इसके भविष्य के लिए संजीव की योजनाएं बेहद विस्तृत हैं लेकिन कंपनी की पुरानी साम्राज्यवादी सोच का इनमें कोई स्थान नहीं है. मार्च में ही लंदन के विशिष्ट इलाके मेफेयर में कंपनी ने अपना पहला ईस्ट इंडिया कंपनी स्टोर खोला है और आने वाले कुछेक सालों में कंपनी एक बार फिर से भारत में अपने कदम रखने वाली है. लेकिन इस बार स्थितियां और भूमिकाएं अलग रहेंगी. चाय, कॉफी और मसालों की जगह रियल एस्टेट, सुपर स्टोर्स, हॉस्पिटैलिटी ले लेगी.

सन 1600 के आस-पास ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने लंदन के 30-40 व्यापारियों को ‘द कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू ईस्ट इंडिया’ के नाम से लाइसेंस दिया था जिससे उन्हें ब्रिटिश शासन के तहत पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की इजाजत मिल गई थी. पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हीं 30-40 परिवारों के पास इस कंपनी के अधिकार चले आ रहे थे.

2005 से ही संजीव कंपनी को खरीदने की हिमालयी मुहिम में लगे हुए थे. इतने सारे मालिकाना हक रखने वालों को किसी एक मुद्दे पर एकमत करना टेढ़ी खीर था इसलिए पांच साल बाद 2010 में जाकर संजीव को अपने लक्ष्य में कामयाबी मिल सकी.

ज्यादातर लोगों के लिए कहानी एक बार फिर से खत्म हो चुकी है लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक नई कहानी की शुरुआत है. ईस्ट इंडिया कंपनी अब जाकर केवल नाम की नहीं बल्कि हकीकत में भारतीय कंपनी बन गई है.  

सोना, भूख और मृत्यु : सिटी ऑफ गोल्ड

फिल्‍म सिटी ऑफ गोल्ड 

निर्देशक महेश मांजरेकर

कलाकार करण पटेल, सीमा बिस्वास, सिद्धार्थ

आपको जो शहर चटख रंगों वाली खूबसूरत फिल्मों में दिखाए जाते हैं, महेश मांजरेकर सबसे पहले और सबसे बाद तक उनकी सब तस्वीरों को जलाते हैं. वे हमारे सोने के शहरों के सब अमीर शीशे लाचार से दिखते पत्थरों से तोड़ते हैं. यह अस्सी के दशक की मुंबई की कहानी है और उसमें भी कपड़ा मिलों के उन मजदूरों की जो मल्टीप्लेक्स और मॉलों को जगह देने के लिए अपनी भूखी अंतड़ियों की बलि चढ़ा रहे थे.

पहली नजर में फिल्म के पोस्टर पर कीचड़ में सने हुए कई चेहरे आपको डराते हैं. वैसे भी हम खुश रहना और सुखद फिल्में देखना चाहते हैं. मनोरंजन की हवस हम पर इतनी हावी है कि हमारी अगली कतार में बैठे शहरी युवक-युवतियां भूख और मृत्यु के दृश्यों पर ताली पीटकर हंसते हैं.’सिटी और गोल्ड’ इसीलिए डराती है. उसमें भूखे लड़के हैं, जिन्हें अपने पिताओं की कंगाली देखने के बाद हत्याओं का नशा हो गया है. किसी को गोली मारकर वे संभोग के से चरम आनंद में आंखें बंद कर लेते हैं. उसमें ब्यूटीशियन का काम सीखती लड़कियां हैं, जिनकी बढ़ती उम्र उनके पिताओं के कलेजे पर चाकू-सी लगती जाती है. फिर उनका किसी अय्याश बनिया के झूठे प्रेम में फंसकर गर्भवती होना और मजबूरी में पैसे भी पाना है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म कहीं भी आपसे इसलिए बने रहने का अनुरोध नहीं करती कि आप उसके किरदारों की दुर्दशा पर तरस खाएं. वह आपको जोड़े रखती है और मनोरंजन (इस शब्द के सबसे निर्मम और स्वार्थी अर्थ में भी ) भी करती है. हालांकि यह उन फिल्मों में से है जो खालिस जिंदगी ही होती हैं और जिनके कलात्मक पक्ष की बात कर और किसी पैमाने पर तोलकर आप उनका अपमान ही करते हैं. फिर भी यह कहना जरूरी है कि हिंसा के तनाव को महेश और उनके सिनेमेटोग्राफर अजीत रेड्डी जिस स्वाभाविकता से दिखाते हैं वह कमाल है. उसी स्वाभाविकता से महेश चाल में रहने वाले परिवारों के उलझे हुए रिश्ते, उनकी चुहलबाजी और विलाप भी दिखाते हैं.

फिल्म के आखिर में सूत्रधार कहता है कि जिस तरह हम आज कहते हैं कि कभी डायनासॉर हुआ करते थे, शायद उसी तरह कुछ साल बाद कहेंगे कि मिल वर्कर हुआ करते थे. लेकिन शायद हम यह कहेंगे भी नहीं. जब तक हमारे पास प्रेम की उजली कहानियां रहेंगी, हम उनकी शरण में भागेंगे और हकलाते हुए उस भोले लड़के का कारुणिक क्रंदन भूल जाएंगे जिसके जिगरी दोस्त ने उसके पिता को मारा है. उन सब कहानियों की तरह, जिनमें भूख खलनायक है, हम कॉकरोच मारने की उन सब दवाओं को भी भूल जाएंगे जिन्हें लाखों भूखे घरों ने संभालकर रखा है.

गौरव सोलंकी

जवाबदेही विधेयक में छिपे सवाल

अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी हैक्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कोई सबक लिया है? क्या चौथाई सदी लंबी चोट, बदनामी और अपमान की उस स्थायी पीड़ा से हमने कुछ सीखा है जो दुनिया की सबसे भयावह रासायनिक दुर्घटना के पीड़ितों को भुगतनी पड़ी है? परमाणु दुर्घटना होने पर मुआवजा देने संबंधी असैन्य परमाणु जवाबदेही विधेयक को पास करवाने के लिए सरकार जिस तरह की तत्परता दिखा रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि हमने कुछ नहीं सीखा. बल्कि सीखने की बजाय हमारा तंत्र इस तरह की आपदाओं की आशंका के प्रति लगातार इनकार की मुद्रा बनाए हुए है. सरकार दिखावा कर रही है कि उसे अपने नागरिकों की चिंता है और उसे किसी भी आपदा से निपटना अच्छी तरह आता है. इसी तरह का दिखावा 1984 में भी किया गया था जब भोपाल गैस पीड़ितों को उनके अधिकार  दिलाने की बात आई थी. लेकिन बाद में दोषी कंपनी के साथ मिलीभगत करके इन पीड़ितों को मामूली मुआवजा देकर टरका दिया गया.

इस विधेयक में गंभीर खामियां हैं. इसका मुख्य मकसद है किसी परमाणु संयंत्र में होने वाली दुर्घटना से होने वाले संभावित व्यापक नुकसान की जिम्मेदारी इसके डिजाइनरों, निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं से हटाना. इसमें विदेशी परमाणु कंपनियों से कहीं ज्यादा मुआवजा सरकार को देना पड़ेगा. यानी भुगतेगी भी जनता और मुआवजे का पैसा भी उसी जनता की जेब से जाएगा. इस तरह देखा जाए तो यह विधेयक कानून, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के अधिकार और जवाबदेही के मूल सिद्धांतों और जनहित के खिलाफ जाता है. इसका सबसे आपत्तिजनक पहलू ही इसका बुनियादी पहलू है. यह विधेयक विनाशकारी दुर्घटना की क्षमता रखने वाले एक ऐसे उद्योग की जवाबदेही को सीमित करने की बात कहता है जो बेहद खतरनाक और दुर्घटना संभावित माना जाता है.

परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन का अकेला ऐसा तरीका है जिसमें विकिरण के जरिए व्यापक स्तर पर विनाश पैदा करने की क्षमता होती है. इसका घातक असर लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है. अदृश्य होने की वजह से इसकी भयावहता और बढ़ जाती है. पिछले दिनों दिल्ली के एक कबाड़ बाजार में हुए कोबाल्ट-60 विकिरण हादसे से यह बात उजागर भी हो चुकी है. यह तर्क दिया जाता है कि बहुत विनाशकारी दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है मगर दुर्घटना की हालत में इसके नतीजे कितने विनाशकारी होंगे इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती. 1986 में युक्रेन में हुए चेर्नोबिल हादसे को कौन भूल सकता है जहां परमाणु संयंत्र में हुए रेडियोएक्टिव रिसाव में 65,000 लोग विकिरणजनित कैंसर की भेंट चढ़ गए थे और आर्थिक नुकसान का आंकड़ा था 350 अरब डॉलर.

परमाणु दुर्घटना की जवाबदेही सीमित करना सैद्धांतिक रूप से भी गलत है. ऐसा करना दो मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन है- एहतियाती सुरक्षा का सिद्धांत और जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा भुगतान का सिद्धांत. पहला सिद्धांत कहता है कि इतने व्यापक पैमाने पर विनाश की क्षमता रखने वाली किसी ऐसी गतिविधि को इजाजत नहीं मिलनी चाहिए जिसके बारे में पूरी जानकारी न हो. दूसरा सिद्धांत कहता है कि जिन लोगों ने नुकसान किया है वे पीड़ितों को पूरा मुआवजा दें.

दुनिया के इतिहास में परमाणु ऊर्जा सबसे बड़ी औद्योगिक विफलता साबित हुई है. अमेरिकी ऊर्जा विशेषज्ञ एमरी लोविंस के मुताबिक दुनिया भर में इसमें खरबों डॉलर का नुकसान हो चुका हैइन सिद्धांतों और संपूर्ण जवाबदेही की धारणा का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने फैसलों में भी किया है. इनका जिक्र धारा 21 (जीवन का अधिकार), 47 और 48ए (जन स्वास्थ्य उन्नति और पर्यावरणीय संरक्षण) में है. 1996 में कोर्ट ने कहा था: ‘एक बार कोई गतिविधि, जिससे जोखिम जुड़ा हो, शुरू होने के बाद इसे शुरू करने वाला व्यक्ति ही इसके अच्छे या बुरे के लिए जिम्मेदार होगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने जरूरी उपाय कर रखे थे.’

परमाणु जवाबदेही विधेयक में इन सिद्धांतों की अनदेखी की गई है. इसमें मनमाने ढंग से उत्तरदायित्व संबंधी धन की सीमा बेहद कम  (2,300 करोड़ रुपए) निर्धारित की गई है. इसमें भी संचालकों की जिम्मेदारी की सीमा सिर्फ 500 करोड़ रुपए है. बाकी का जो अंतर है उसे सरकार वहन करेगी यानी आप और हम, वे लोग जो इस दुर्घटना के लिए रत्तीमात्र भी जिम्मेदार नहीं हैं.

यह विधेयक परमाणु आपूर्तिकर्ताओं और डिजाइनरों को जवाबदेही के शिकंजे से बच निकलने की छूट देता है. अपने उत्पाद की जवाबदेही के तहत भविष्य में उनके उपकरण (रिएक्टर) से किसी भी तरह के नुकसान की हालत में – मसलन डिजाइन या निर्माण संबंधी खामी उजागर होने पर – उन्हें हर्जाना भुगतना चाहिए. यह पूरी तरह से नाइंसाफी होगी यदि निर्माण या फिर डिजाइन संबंधी किसी खामी के चलते हुई दुर्घटना के बावजूद सारी जिम्मेदारी संचालक के सिर पर हो. संचालक यानी सरकार जो इन रिएक्टरों को परमाणु विद्युत निगम के तहत संचालित करेगी. इस कानून का उतना ही घृणित एक पक्ष और है. यह जवाबदेही की अवधि सिर्फ 10 साल तक सीमित करने की बात करता है जबकि किसी विकिरण दुर्घटना के प्रभावों का असर (कैंसर, जेनेटिक विकार आदि) 20 साल बाद देखने को मिलता है.

स्पष्ट रूप से इस बिल का खाका परमाणु कंपनियों को उनकी जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करने के लिए रचा गया है. और इसकी जड़ें 1960 के दशक में हुए दो सम्मेलनों में जुड़ी हैं – धनी देशों (ओईसीडी) द्वारा प्रायोजित 1960 का पेरिस सम्मेलन और 1963 का वियना सम्मेलन. यह ऐसा दौर था जब लोगों के अंदर ये उम्मीदें बनाई जा रही थीं कि ऊर्जा का भविष्य परमाणु ऊर्जा में ही छिपा हुआ है जो सुरक्षित, सस्ती और पर्याप्त होगी. लेकिन उम्मीदें उम्मीदें ही रह गईं. जितना दावा किया जा रहा था परमाणु ऊर्जा उत्पादन में उसके दस फीसदी भी बढ़ोतरी नहीं हुई. अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी है. वैश्विक ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान लगातार कम होता जा रहा है जबकि पूर्ण रूप से सुरक्षित, हर तरह के प्रदूषण से मुक्त सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन की दर सालाना 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है.

दुनिया के इतिहास में परमाणु ऊर्जा सबसे बड़ी औद्योगिक विफलता साबित हुई है. अमेरिकी ऊर्जा विशेषज्ञ एमरी लोविंस के मुताबिक दुनिया भर में इसमें खरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है. परमाणु ऊर्जा जैसी विनाशकारी तकनीक को सब्सिडी देना 1960 में भी गलत था. आज भी यह हास्यास्पद है जबकि यह तकनीक 60 साल पुरानी हो चली है और शायद अपनी क्षमता का पूरा दोहन कर चुकी है. रेडियोएक्टिव कचरे को निपटाने का कोई सुरक्षित तरीका नहीं है जो अगले हजारों साल तक विनाश पहुंचाने की क्षमता रखता है. कल्पना कीजिए किसी परमाणु संयंत्र के बंद होने के 100 साल बाद उसके कचरा भंडार में रिसाव हो जाता है. तब कौन जिम्मेदार होगा? विधेयक के मुताबिक खुद जनता जिम्मेदार होगी.

लेकिन यूपीए सरकार 1997 के कंवेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) फॉर न्यूक्लियर डैमेज नामक अंतरराष्ट्रीय संधि से इस तरह चिपकी हुई है जैसे यह बड़े पैमाने पर स्वीकार्य हो. जबकि असलियत यह है कि सिर्फ 13 देशों ने इस संधि पर दस्तखत किए हैं और अब तक यह अमल में नहीं आ पाई है. इसे प्रायोजित करने वाली अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए खुद एक निष्पक्ष संस्था नहीं है. इसका मकसद ही परमाणु ऊर्जा का प्रसार करना है.

इस विधेयक का औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार के पास एक ही दलील है कि जवाबदेही को सीमित किए बिना कोई भी विदेशी उद्योगपति भारत में निवेश नहीं करेगा. लेकिन इस दलील से सवाल उठता है कि क्या हमें परमाणु ऊर्जा की जरूरत है भी, और है तो हम इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हैं? यह विधेयक भारतीय और अमेरिकी उद्योगपतियों के दबाव के सामने घुटने टेकने जैसा है. अमेरिकी अधिकारी और औद्योगिक समूह इसके पक्ष में जबर्दस्त लामबंदी कर रहे हैं. परमाणु ऊर्जा समझौते के बाद उन्हें इसका फायदा जो चाहिए. विधेयक को खारिज कर हम इस धोखे से बच सकते हैं. 

खेल खतम, पैसा हजम

मोदी और उनके मित्रों के लिए परेशानियां और भी हैं. इस बात की भी जांच हो रही है कि 2008 में हुई पहली आईपीएल नीलामी के दौरान कहीं उन्होंने कुछ चुनिंदा लोगों को यह तो नहीं बताया था कि वे कितनी बोली लगाएं कि टीम उनकी हो जाए 21 मार्च, सुबह 10 बजकर 28 मिनट, मुंबई के छत्रपति शिवाजी हवाई अड्डे से एक विमान ने तीन मुसाफिरों के साथ चेन्नई के लिए उड़ान भरी. ये तीन कोई आम लोग नहीं थे. इनमें पहले थे वेणुगोपाल धूत, वीडियोकॉन ग्रुप के चेयरमैन, दूसरे थे सुरेश चेलाराम (नाइजीरिया स्थित एक कारोबारी और आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी के साढ़ू) के चचेरे भाई मनोज जैन और तीसरी थीं जैन की पत्नी और स्वर्गीय अभिनेता राज कपूर की बेटी रीमा. ये सभी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की एक नई टीम को खरीदने की हसरत लिए चेन्नई जा रहे थे. दोपहर साढ़े तीन बजे के करीब यह फ्लाइट वापस मुंबई पहुंची तो तब तक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की दो नई टीमों के लिए नीलामी पूरी हो चुकी थी. वीडियोकॉन के हाथ इसमें कुछ नहीं आया था. रीमा जैन काफी नाराज थीं और बताया जाता है कि उस शाम एक पार्टी में उन्होंने अपने दिल की भड़ास निकालते हुए अपने दोस्तों को बताया कि क्यों उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा.

यहां से उठी आरोपों की कानाफूसी हाईप्रोफाइल पार्टियों  के सर्किट में घूमती हुई जब  आईपीएल के मुखिया ललित मोदी तक पहुंची तो जवाब में उन्होंने अपने ब्लैकबेरी फोन से सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर टिप्पणी यानी ट्वीट करना शुरू किया. ऐसी सात टिप्पणियों के बाद मोदी के सितारे गर्दिश में आ गए. क्रिकेट पर लिखने वालों ने ट्विटर की वजह से मोदी पर आए संकट की तुलना प्रसिद्ध गोल्फर टाइगर वुड्स से की जिनकी निजी जिंदगी एक फायर हाइड्रेंट की वजह से काफी चर्चा में आ गई थी. मोदी अब आईपीएल मुखिया के पद से बर्खास्त कर दिए गए हैं. उन पर सट्टेबाजी और काले धन को सफेद करने जैसे गंभीर आरोप हैं. अब वे जी-जान से जुटे हैं कि मामला किसी तरह संभल जाए. 15 अप्रैल की दोपहर वे चुपचाप रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया और मुंबई इंडियंस के मालिक मुकेश अंबानी के दफ्तर पहुंचे. एक घंटे तक चली बातचीत में मोदी ने भारत के सबसे अमीर और प्रभावशाली कारोबारी को यह समझाने की भरसक कोशिश की कि उन्हें परेशान किया जा रहा है और ऐसे में उन्हें मदद की जरूरत है.

लेकिन कुछ नहीं हुआ. मोदी को विनम्रता से बताया गया कि अगर आईपीएल टीमों में हुआ निवेश साफ है तो उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं और अगर इसमें कोई गड़बड़झाला है तो वे मुश्किल में पड़ सकते हैं. इस घटना के गवाह रहे लोग बताते हैं कि मोदी बहुत नर्वस लग रहे थे.
इसके कुछ ही दिन बाद आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने मोदी से गहन पूछताछ की. मोदी फिर से अंबानी से मिलने दौड़े. मगर इस बार टीवी न्यूज चैनलों को इसकी भनक लग चुकी थी. स्क्रीन पर यह खबर ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टियों में दौड़ने लगी. मोदी इस बार भी खाली हाथ ही वापस आए. हां, यह जरूर हुआ कि आईपीएल की टीमों के कुछ मालिकों ने उनके समर्थन में इक्का-दुक्का बयान दे दिए. विजय माल्या, शिल्पा शेट्टी और शाहरुख खान इनमें शामिल थे और इन सभी का कहना था कि आईपीएल भारत में अब तक का सबसे बड़ा खेल ब्रांड है.

मोदी के पिता केके मोदी भी उनके समर्थन में कूदे जिन्होंने दिल्ली में कुछ पत्रकारों से कहा कि ललित मोदी को बीसीसीआई को भूलकर अपनी एक अलग लीग बनानी चाहिए. हालांकि वे यह भूल गए कि इसके लिए खिलाड़ी कहां से आएंगे. अगर मोदी जी टेलीफिल्म्स के सुभाष चंद्रा द्वारा चलाई गई इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) में खेलने वाले खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगवाकर उस लीग की हवा निकाल सकते हैं तो उनके साथ भी तो ऐसा हो सकता है. संक्षेप में मोदी के लिए संदेश साफ था. उन्हें साबित करना था कि वे पाक-साफ हैं. अंदर की जानकारी रखने वाले लोग बताते हैं कि यही वजह थी कि भारत का सबसे ताकतवर कारोबारी एक ऐसे मामले पर सरकार की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता था जिसका केंद्रीय मुद्दा ही भ्रष्टाचार है. मोदी से स्पष्ट तौर पर कह दिया गया कि वे खुद को पाक-साफ साबित करें.

‘एजेंसियों को देश और विदेश से बहुत-सी जानकारियां मिल रही हैं और उम्मीद है कि जल्दी ही आईपीएल से जुड़े कुछ अहम लोगों के खिलाफ पक्के सबूत मिल जाएंगे’

मगर उनके लिए यह आसान नहीं है. इस मामले की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग के अधिकारियों ने उस भव्य नौका की फंडिंग के बारे में पक्के सबूत जुटा लिए हैं जिसका ऑर्डर मोदी ने दो साल पहले दिया था. यह नौका माल्टा से मंगाई गई थी और जल्दी-ही यह भारत पहुंचने वाली भी थी. यही नहीं, मोदी का निजी विमान भी संदेह के घेरे में है क्योंकि प्रवर्तन निदेशालय के पास इसके सबूत हैं कि उत्तर भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री ने भी इसका इस्तेमाल किया है. मोदी की इस मुख्यमंत्री के साथ घनिष्ठता बताई जाती है.

मोदी और उनके मित्रों के लिए परेशानियां और भी हैं. इस बात की भी जांच हो रही है कि 2008 में हुई पहली आईपीएल नीलामी के दौरान कहीं उन्होंने कुछ चुनिंदा लोगों को यह तो नहीं बताया था कि वे कितनी बोली लगाएं कि टीम उनकी हो जाए. 2008 के चैंपियन राजस्थान रॉयल्स का ही मामला लें. विजेता और हारने वाले की बोली का अंतर तीन लाख डॉलर था. यानी छह करोड़ 70 लाख डॉलर की विजेता बोली का महज 0.45 फीसदी. प्रवर्तन निदेशालय अब इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या जीतने वाला समूह (जिसके मुख्य प्रमोटर चेलाराम थे) जानता था कि इसके प्रतिस्पर्धी ने कितनी रकम की बोली लगाई है. बीती मार्च में हुई नई नीलामी में सामने आई कथित अनियमितताओं के बाद तो निदेशालय के पास संदेह करने के लिए सारे कारण हैं.

निदेशालय मल्टी स्क्रीन मीडिया (एमएसएम पूर्व में सोनी एंटरटेनमेंट) द्वारा वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप (डब्ल्यूएसजी) को दी गई उस आठ करोड़ डॉलर की रकम के बारे में भी पड़ताल कर रहा है जो सुविधा शुल्क के तौर पर दी गई. डब्ल्यूएसजी को 91.8 करोड़ डॉलर में आईपीएल के दस साल के प्रसारण अधिकार मिले थे. मगर यह कांट्रैक्ट रद्द हो गया और आईपीएल और एमएसएम के बीच नौ साल के लिए 1.69 अरब डॉलर का एक नया कांट्रैक्ट हुआ. इसके एवज में एमएसएम ने डब्ल्यूएसजी को आठ करोड़ डॉलर दिए.

अब प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी इसकी पड़ताल कर रहे हैं कि क्या इस आठ करोड़ में से ढाई करोड़ डॉलर मोदी, उनके साथियों और कुछ नेताओं के अवैध खातों में गए और क्या मोदी ने इस पैसे का इस्तेमाल केमैन आइलैंड्स की एक कंपनी के मार्फत अपना कॉरपोरेट जेट खरीदने में किया. दिलचस्प यह भी है कि मोदी की कई परिसंपत्तियां ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स या फिर केमैन आइलैंड्स में स्थित कंपनियों के जरिए खरीदी गई हैं और जैसा कि सूत्र बताते हैं कि ‘यही तरीका कई आईपीएल टीमों ने भी अपनाया है.’

जो जयपुर आईपीएल क्रिकेट प्राइवेट लि, राजस्थान रायल्स की मालिक है, उस पर मॉरिशस स्थित ईएम स्पोर्ट्स होल्डिंग्स लि का स्वामित्व है. ईएम स्पोर्ट्स में 44.15 प्रतिशत हिस्सेदारी ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के ट्रेस्को इंटरनेशनल लि के पास है, जिसके मालिक चेलाराम हैं और जो ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स की दो कंपनियों काबु होल्डिंग्स और वेस्टफील्ड्स कंसल्टेंट के जरिए ट्रेस्को पर स्वामित्व बनाए हुए हैं.
ईएम स्पोर्ट्स में 11.74 फीसदी की एक और हिस्सेदारी हांगकांग स्थित ब्लू वाटर एस्टेट लि के पास है, जिसका नियंत्रण लेकलैन मर्डोक के हाथ में है, जो रुपर्ट मर्डोक के बेटे हैं. राज कुंडरा के परिवार के पास बहामास के कुवी इंवेस्टमेंट्स के जरिए 11.70 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. ईएम स्पोर्ट्स में बची हुई हिस्सेदारी मनोज बादले की ब्रिटेन स्थित कंपनी इमर्जिंग मीडिया के पास है.

सूत्रों के मुताबिक जांच की जा रही है कि हिस्सेदारियों का यह जटिल ताना-बाना कहीं हवाला के जरिए काले धन को सफेद करने के लिए तो नहीं बुना गया है. इसकी भी जांच हो रही है कि क्या ऐसी फंडिंग के लिए जरूरी मंजूरी ली गई थी. मोदी को भी अहसास है कि लड़ाई मुश्किल और लंबी है. शायद इसलिए वे 28 अप्रैल की दोपहर मशहूर वकील राम जेठमलानी से मिले और उन्हें अपनी अदालती लड़ाई का जिम्मा सौंपा. लेकिन राजनीतिक हलकोें और दिल्ली के ताकतवर मीडिया को मनाना उनके लिए बहुत मुश्किल है. सूत्र बताते हैं कि मोदी भारत के एक बड़े अखबार के मालिक के बेटे को भी नाराज कर चुके हैं जिन्हें मोदी के आदमियों ने मुंबई में एक आईपीएल मैच के दौरान बॉक्स में उनकी सीट से हटा दिया था. दिल्ली के एक दूसरे बड़े अखबार के साथ भी मोदी के परिवार के मतभेद हैं. इस तरह से उन्हें ज्यादा मदद नहीं मिल पा रही.

विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि ज्यों-ज्यों घोटाले पर संदेह की परत गहराती जा रही है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद इसमें रुचि लेने लगे हैं. सुनने में आया है कि इंटेलीजेंस ब्यूरो, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई)  के प्रमुख रोज प्रधानमंत्री को इस मामले की प्रगति से जुड़ी ताजा जानकारियां दे रहे हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय के एक सूत्र के शब्दों में ‘एजेंसियों को देश और विदेश से बहुत-सी जानकारियां मिल रही हैं और उम्मीद है कि जल्दी ही आईपीएल से जुड़े कुछ अहम लोगों के खिलाफ पक्के सबूत मिल जाएंगे.’ हर मामले की तरह इस मामले का भी राजनीतिक पहलू है. इस घोटाले पर नजर रखने वाले कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि अगर मंत्री- खास तौर से चुनावी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सदस्य- भ्रष्ट पाए जाते हैं तो उन्हें भी खुद को पाक-साफ साबित करना होगा. यह संकेत इससे भी मिलता है कि मोदी के खिलाफ की जा रही जांच के दायरे में धीरे-धीरे और लोग भी आ रहे हैं.

केंद्रीय कृषि, खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्री शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के पति सदानंद सुले का ही मामला लें. सुप्रिया सुले ने शुरू में कहा कि उनके परिवार ने आईपीएल में कोई निवेश नहीं किया है, लेकिन बाद में थोड़ी हिचक के साथ यह माना कि उनके पति की एमएसएम में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है जिसके पास सभी आईपीएल मैचों के टीवी प्रसारण के अधिकार हैं. सुप्रिया के मुताबिक उनके पति को यह हिस्सेदारी अपने पिता बीआर सुले से पावर ऑफ अटार्नी के जरिए हासिल हुई थी. सूत्र बताते हैं कि इसका पता लगाने के लिए जांच चल रही है कि क्या सुले द्वारा उस फ्रेंचाइजी में हिस्सेदारी की पेशकश हुई थी जिसे वीडियोकॉन हासिल करने की उम्मीद कर रहा था. सूत्र के शब्दों में, ‘मामला सुलझाने के लिए हमें गुम फाइल ढूंढ़ने की जरूरत है.’
यह जांच का एक हिस्सा है. प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी बताते हैं कि जांच के दौरान कई ऐसी जानकारियां भी मिली हैं जिनके तार आईपीएल से सीधे नहीं जुड़ते. ऐसी एक जानकारी राकांपा नेता और नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल और उनकी बेटी नियति के ससुर उत्सव पारेख के बीच सीधा संबंध जोड़ती है. पारेख उस एसएमआईएफएस कैपिटल मार्केट्स के प्रमोटर चेयरमैन हैं जो एक बड़े शेयर मार्केट घोटाले में लिप्त रही थी. अब खबरों के अनुसार वे सिंगापुर के चंगी एयरपोर्ट ग्रुप के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में 3,500 एकड़ में बन रहे विवादास्पद अंडाल एयरपोर्ट टाउनशिप के निर्माण के लिए लगाई गई बोली के पीछे हैं. पारेख नागपुर के पास गोंदिया में एक हवाई अड्डे के विकास से भी जुड़े हैं. लखनऊ के पास भी वे एक हवाई अड्डे का निर्माण कर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि उनके कंसोर्टियम का नाम आईपीएल ब्रह्मपुत्र कंसल्टेंसी लिमिटेड है.

मुंबई स्थित प्रवर्तन निदेशालय के सूत्र तहलका को बताते हैं कि पारेख और उनके सहयोगी हाल ही में एक वित्तीय प्रकरण में फंसे थे. पिछले हफ्ते ही सुप्रीम कोर्ट ने निवेश फर्म मैकेर्टिक कंसल्टेंसी सर्विस (जो स्टुअर्ट एंड मैकेर्टिक या एसएमआईएफएस ग्रुप का हिस्सा है) द्वारा दायर एक याचिका खारिज की है. इस फर्म को एक साल के लिए प्रतिभूति कारोबार से प्रतिबंधित कर दिया गया है, क्योंकि इसने डीएसक्यू बायोटेक लि की शेयर कीमतों में धांधली की थी. इस फर्म पर पारेख और उनके एक सहयोगी का नियंत्रण है.

आईपीएल में गैरक्रिकेटीय कार्यक्रमों के आयोजन की जिम्मेदार पटेल की एक दूसरी बेटी पूर्णा भी नकारात्मक वजहों से सुर्खियों में हैं. मैचों के बाद होने वाली पार्टियों में रौब गांठने और एयर इंडिया के हवाई जहाज को अपनी मर्जी से चलवाने के लिए उनकी काफी आलोचना हुई है. मोदी के साथ अपने संबंधों के कारण प्रवर्तन निदेशालय की निगाह रमेश गोवानी पर भी है, जो मुंबई में फोर सीजंस होटल के मालिक हैं, जहां मोदी नियमित तौर पर ठहरते थे. अधिकारी इसकी वजहों की तलाश कर रहे हैं कि क्यों एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री ने होटल में 2009 और 2010 के बीच छह महीने के लिए सुईट बुक कराया था. इसकी भी जांच हो रही है कि क्यों होटल में हर दूसरे दिन बेहद खास तरह से सफाई होती थी. सूत्र बताते हैं कि फाइव स्टार होटल आम तौर पर इस तरह से सफाई नहीं करते. गोवानी रियल एस्टेट के बड़े कारोबारी तथा मुंबई स्थित कमला मिल्स कॉम्प्लेक्स के मालिक हैं. वे पिछले साल तब खबरों में आए थे जब उनके बेटे की शादी में सलमान खान और प्रियंका चोपड़ा नाचने आए थे. अब लगता है सबके लिए जश्न का दौर फिलहाल थम गया है. 

आई.पी.एल के तमाशे में चैनल

समाचार चैनलों की यह ‘खोजी’ प्रवृत्ति उस समय कहां चली गई थी, जब आईपीएल के तमाशे के पीछे यह बड़ा खेल चल रहा था?

चैनल तमाशे के बिना नहीं चल सकते. वे हमेशा किसी न किसी तमाशे की खोज में रहते हैं. चाहे वह फिल्मी तमाशा हो, क्रिकेट का तमाशा या फिर राजनीतिक तमाशा. उन्हें चौबीसों घंटे कोई न कोई तमाशा चाहिए. अगर कोई सचमुच का तमाशा न हो तो उन्हें तमाशा गढ़ने में भी कोई संकोच नहीं होता. हालांकि इन दिनों चैनलों के दिन अच्छे चल रहे हैं. उन्हें तमाशे गढ़ने की उतनी जरूरत नहीं पड़ रही है. सानिया-शोएब की शादी का तमाशा खत्म होते-होते उन्हें उपहार की तरह आईपीएल-ललित मोदी-शशि थरूर का ‘लव, सेक्स, धोखा’ मार्का तमाशा हाथ लग गया. चैनलों को और क्या चाहिए था? एक तो क्रिकेट, उसपर से आईपीएल और फिर उसमें राजनीति, षड्यंत्र, पैसा, सुंदरियों और सत्ता की सनसनीखेज छौंक. देखते-देखते चैनलों पर सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर के किस्से छा गए. मोदी के कारनामों पर से पर्दा उठने लगा. उनके पिछले जीवन के इतिहास से लेकर मौजूदा कारगुजारियों के कच्चे चिट्ठे खोले जाने लगे. उनकी जीवनशैली, कार्यशैली और बड़बोलेपन पर टीका-टिप्पणी होने लगी. आईपीएल टीमों और उनके असली-नकली मालिकों की खोज-खबर ली जाने लगी और खुलासे होने लगे कि कैसे आईपीएल टैक्स चोरी, मनी-लांडरिंग, बेनामी निवेश से लेकर हितों का टकराव का अखाड़ा बन गया है. यह भी कि इस खेल में अनेक नेता और मंत्री भी आकंठ डूबे हुए हैं.    

इस तमाशे के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आईपीएल और मोदी को लेकर जो चैनल अचानक इतनी ‘खोजी पत्रकारिता’ करते दिख रहे हैं, उनकी यह ‘खोजी’ प्रवृत्ति उस समय कहां चली गई थी, जब आईपीएल के तमाशे के पीछे यह बड़ा खेल चल रहा था? चैनलों ने ये सवाल तब क्यों नहीं खड़े किये, जब टीमों और खिलाडि़यों के लिए बोलियां लग रही थीं? उन्हें मोदी की कारगुजारियों, हाई-फाई जीवनशैली, बड़बोलेपन और पिछले इतिहास का ध्यान उस समय क्यों नहीं आया जब मोदी को आईपीएल की ‘शानदार कामयाबियों’ और उसे एक ‘ग्लोबल ब्रांड’ बनाने के लिए बधाइयां दी जा रही थीं?
क्या खबरिया चैनलों को यह सब पता नहीं था? या वे जान-बूझकर अनजान बने हुए थे? लगता तो यही है कि उन्हें सब पता था लेकिन वे भव्य तमाशे और उसकी उत्तेजना, यूफोरिया और धूम-धड़ाके में सब जानते-बूझते हुए भी न सिर्फ चुप रहे, बल्कि उसमें खुद भी पूरी तरह से शामिल हो गए. आईपीएल के इर्द-गिर्द एक यूफोरिया खड़ा करने में मीडिया और खासकर समाचार चैनलों की सबसे बड़ी भूमिका रही.

असल में, मोदी के अपराधों में मीडिया और खासकर समाचार चैनल भी बराबर के भागीदार हैं क्योंकि आईपीएल का तमाशा चैनलों की सक्रिय भागीदारी के बिना खड़ा ही नहीं हो सकता था. याद रहे, यह क्रिकेट तमाशा चैनलों के लिए ही तैयार किया गया था. चैनलों का क्रिकेट प्रेम किसी से छुपा नहीं है. लेकिन चैनलों की क्रिकेट से यह मुहब्बत सिर्फ किसी अद्वैत प्रेम के कारण नहीं बल्कि ठोस कारोबारी कारणों से है. आईपीएल के मुख्य प्रसारणकर्ता सेट मैक्स (सोनी) के नेतृत्व में चैनलों के वितरण पार्टनरशिप ‘वन एलायंस’ से कई बड़े समाचार चैनल भी जुड़े हुए हैं. समाचार चैनल ‘न्यूज 24’ में कोलकाता की टीम के मालिक शाहरुख का पैसा भी लगा हुआ है. एक और बड़े समूह- एनडीटीवी के एक चैनल में बंगलुरु की टीम के मालिक विजय माल्या ने निवेश कर रखा है. सहारा मीडिया के मालिक अब खुद पुणे की टीम के मालिक हैं. एक और बड़ा मीडिया समूह जी टीवी पहले खुद आईपीएल जैसा तमाशा खड़ा करने की असफल कोशिश कर चुका है.

अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि चैनल आईपीएल के ‘खेल’ और मोदी के बारे में सब-कुछ जानकर भी अनजान क्यों बने रहे. यह साफ तौर पर हितों के टकराव का मामला है. आश्चर्य नहीं कि आईपीएल और मोदी पुराण पर चैनलों के कवरेज में भी हितों का यह टकराव साफ दिख रहा है. सबसे अहम सवाल, इतनी गंदगी सामने आने के बावजूद आखिर सभी चैनल आईपीएल को बचाने में एकजुट क्यों हैं? चैनलों का यह कौन-सा अपराध शास्त्र है जो अपराधी (मोदी) से घृणा और अपराध (आईपीएल) से प्रेम का पाठ पढ़ाने में लगा हुआ है? जरा सोचिए, इस तमाशे का खेल खुल चुका है. 

आनंद प्रधान

कौन चला रहा है समानांतर सरकारें?

मैं नहीं चाहता था कि आईपीएल पर लिखूं. इससे बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन श्रीकांत वर्मा की पंक्ति जैसे बार-बार इसी मैदान में लौटाती रही- ‘जो बचेगा, वह रचेगा कैसे?’

जहां हितों का टकराव हुआ, जहां परदा हिलना शुरू हुआ, वहीं राज खुलने शुरू होते हैं. फिर वही पंक स्नान दिखाई पड़ता है जो आईपीएल में नज़र आ रहा है

क्रिकेट को तमाशा बनाने वाली इंडियन प्रीमियर लीग की सामने आ रही अनियमितताओं से जो हैरान हैं, वे शायद कहीं ज्यादा भोले लोग हैं. उन्हें वह नया भारतीय अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र समझ में नहीं आ रहा जिसमें आईपीएल जैसे आयोजन संभव होते हैं. एक विशेषाधिकारसंपन्न तबका इन आयोजनों से अपने शौक भी पूरे करता है, अपनी हैसियत भी हासिल करता है और उसमें निहित दौलत की संभावनाओं का चालाक संरक्षण भी करता है.
20 साल पहले नरसिंह राव के वित्त मंत्री के तौर पर आज के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोटा-परमिट राज और उससे जुड़े भ्रष्टाचार के दौर के अंत की घोषणा करते हुए नई आर्थिक नीतियों का खाका खींचा था. तब तक भारत की तथाकथित मिश्रित अर्थव्यवस्था की सड़ांध इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उदारीकरण का यह झोंका भारतीय उद्योगपतियों और भारत में नई आर्थिक-सामाजिक हैसियत हासिल करने को बेताब मध्यवर्ग के लिए एक बड़ी राहत की तरह आया. सेंसेक्स अचानक एक बड़ी खबर बन बैठा और अपने वैध-अवैध तौर-तरीकों से ऊपर आई भारतीय कॉरपोरेट जगत की हस्तियां देश की नियामक शक्तियां बन गईं.

दरअसल, 21वीं सदी शुरू ही भारत के अश्वमेध की कामनाओं और भविष्यवाणियों से हुई. उदारीकरण ने एक घोड़ा दिया तो बाकी घोड़े सूचना औरतकनीक के क्षेत्र में आई क्रांति ने दिए जिनकी वजह से खाते-पीते मध्यवर्गीय भारतीयों को देश के भीतर और बाहर ढेर सारे मौके मिले. इस प्रक्रिया ने भारतीयता का एक ग्लोबल ब्रांड बनाया जिसके बारे में कहा गया कि वह अपनी मेधा और मेहनत से दुनिया को जीत सकता है. लेकिन इस पर किसी की नज़र नहीं पड़ी कि यह ग्लोबल ब्रांड भारतीय समाज में चुपचाप एक बड़ी दरार पैदा कर रहा है. राष्ट्रीय या सामाजिक पहचान इस ब्रांड की पोशाक भर रही जो बहुराष्ट्रीय मान्यता वाली टेलरिंग शॉप में सिली जाती रही. लेकिन इस नए ब्रांड की त्वचा और आत्मा पैसे से बनती रही. पैसा है तो सफलता है, पैसा है तो ईमान है, पैसा है तो मनोरंजन है. जो पढ़ाई पैसा दिलाए, वही सबसे सार्थक पढ़ाई, जो फिल्म पैसा कमाए, वही सबसे अच्छी फिल्म, जो खेल पैसा जुटाए, वही सबसे अच्छा खेल. बाकी उद्यम बेमानी- चाहे वह जितना भी अच्छा साहित्य हो, कला हो या संगीत हो या फिर खेल ही हो. जो कानून पैसा बनाने की राह में रोड़ा अटकाए, जो कानून करों के गैरजरूरी जाल में पांव उलझाए, वह बीते ज़माने का और बेमानी कानून है- कहीं यह मान्यता इस नए ब्रांड की रगों में खून की तरह बहती रही. इसलिए ऐसे कानूनों को या तो वह अपने पैसे की मदद से ठेंगा दिखाता रहा या अपनी हैसियत से बदलवाता रहा.
आईपीएल इसी सोच की संतान है. यह क्रिकेट का नहीं, पैसे का खेल है. इसने क्रिकेट को लेकर इस देश की दीवानगी का इस्तेमाल भर किया. क्रिकेटरों की बोली लगी और टीमें तैयार की गईं. इसके बाद खिलाडि़यों ने अपने निवेशकर्ताओं की उम्मीदों के मुताबिक रोमांच का झाग पैदा किया, दर्शक जुटाए और आईपीएल को एक कामयाब ब्रांड में बदल डाला.

ध्यान से देखें तो यह हमारी पूरी धूल खाई, जंग लगी, सार्वजनिक व्यवस्था से अलग एक पूरी समानांतर, चमकती हुई, तेज़ रफ़्तार दौड़ती हुई व्यवस्था है जिसकी रास इस देश के ताकतवर घरानों के हाथ में है

लेकिन कामगारों की मेहनत अपनी जगह है, मालिकान के इरादे अपनी जगह. उनके लिए खिलाडि़यों की शोहरत या खेल की दीवानगी बस एक माध्यम है जिसे पैसे में बदलना है. जब पैसा इस हद तक नियामक शक्ति है तो फिर तथाकथित ‘कॉरपोरेट वैल्यू’ या किसी सांगठनिक शुचिता का कोई मतलब नहीं रह जाता. फिर जोड़-तोड़ कर टीमें बनती हैं, हेर-फेर कर कागज तैयार किए जाते हैं और लेन-देन कर किसी को अधिकार दिए जाते हैं, किसी के नाम उजागर किए जाते हैं.खेल पर तब तक परदा पड़ा रहता है जब तक सबके हित सधते हैं. जहां हितों का टकराव हुआ, जहां परदा हिलना शुरू हुआ, वहीं राज खुलने शुरू होते हैं. फिर वही पंक स्नान दिखाई पड़ता है जो आईपीएल में नज़र आ रहा है.

आईपीएल का यह खेल और उसके बाद चल रहा तमाशा कई पुराने खेलों की याद दिलाता है. आधी रात को एक ई-मेल के जरिए ललित मोदी को निलंबित करने वाली बीसीसीआई जिस तरह जांच का नाटक कर रही है, उससे यह साफ है कि यह पूरी कवायद मोदी को बलि का बकरा बनाकर छोड़ देगी और बाकी लोग बेदाग निकल आएंगे. केंद्र सरकार के उन मंत्रियों की जिम्मेदारी कोई तय नहीं करेगा जो आईपीएल के कारोबार की संभावनाओं को लेकर दूसरे मंत्रियों को ई-मेल भेजते रहे और जिनकी बेटियां अपने बाप की हैसियत का इस्तेमाल कर सरकारी विमानों के रास्ते और मुसाफ़िर बदलवाती रहीं.
असल में यह पूरी व्यवस्था इसी तरह चलती है. जब प्रतिभूति घोटाला हुआ तो हर्षद मेहता को उसके इकलौते खलनायक की तरह पेश किया गया. जब मेहता ने बताया कि वह बड़े नेताओं को नोटों से भरे सूटकेस देता रहा है, तब किसी ने आगे जांच की जरूरत नहीं समझी. यह समझना भी किसी को जरूरी नहीं लगा कि हर्षद मेहता आखिर इस व्यवस्था में कैसे जगह पाता है. आने वाले दिनों में और भी हर्षद मेहता दिखे और यह समझ में आता रहा कि यह व्यवस्था ऊपर से जितनी चमकीली है, भीतर से उतनी ही खोखली.

आईपीएल इसी खोखलेपन का एक चमकीला आवरण है. वरना जिस दौर में देश और दुनिया सदी की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी का सामना करने को मजबूर थे, उन दिनों आईपीएल में पैसा लगाया जा रहा था, प्रसारण के अधिकारों का सौदा हो रहा था और प्रतियोगिता भारत से दक्षिण अफ्रीका ले जाई जा रही थी. आखिर ये साधन कहां से आ रहे थे, यह धंधा किस बात का चल रहा था? इसकी न तब जांच हुई न अब होने की संभावना है. जबकि हाल के दिनों में आईपीएल के दुबई कनेक्शन की संदिग्ध और खुसफुसाती चर्चा राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में सुनी जा सकती है.

दरअसल, यह पूरी आर्थिक वैचारिकी एक ग्लोबल नागरिकता को समर्पित है और राज्य और उसके कानूनों को बेमानी मानती है. दुर्भाग्य से राजकाज में शामिल लोगों को भी यह अर्थव्यवस्था माकूल पड़ती है क्योंकि इसके अवांतर लाभ उनकी झोली में, उनके बैंक अकाउंट में गिरते रहते हैं. उनके बेटे-बेटियों को एक-दूसरे के दफ्तरों में नौकरी मिलती है और उनकी प्रेमिकाओं तक को मुफ्त के शेयर मिलते हैं. बदले में परस्पर लाभ और सुरक्षा की गारंटी होती है जो कभी-कभी किसी असंतुलन में टूट जाती है. इस बार टूटी है तो आईपीएल का एक कुरूप पहलू सामने आ गया है.

खतरा यही है कि आईपीएल की ऊपरी साफ-सफाई और उसके रंगरोगन के बाद कहीं बाकी गड़बड़ियां भुला न दी जाएं- क्योंकि जब वे खुलेंगी तो सिर्फ मोदी की ही नहीं, राजनीति और कारोबार के कहीं ज्यादा बड़े चेहरों की कलई भी खुलेगी. शायद इसीलिए मोदी भी आश्वस्त हैं कि उनका कुछ नहीं होगा और बाकी लोग भी इस समूची कवायद पर एक गोपनीय आम सहमति के साथ चलते नज़र आ रहे हैं कि जांच की आंच उन तक न पहुंचे. बड़े सवालों और संकटों को छोटे हितों और टकरावों में सीमित करने की यह कारगर रणनीति भारत के सार्वजनिक जीवन का अभ्यास हो चुकी है.

ध्यान से देखें तो यह हमारी पूरी धूल खाई, जंग लगी, सार्वजनिक व्यवस्था से अलग एक पूरी समानांतर, चमकती हुई, तेज़ रफ़्तार दौड़ती हुई व्यवस्था है जिसकी रास इस देश के ताकतवर घरानों के हाथ में है. इस व्यवस्था के पांव कानून की ज़ंजीरों से नहीं बंधे हैं, इसके हाथ इस देश की सरहदों के बाहर पहुंचते हैं. यह पूरी व्यवस्था हमारे राष्ट्र राज्य और उसके नागरिकों का मखौल बनाकर खड़ी होती है. 2008 के लोकसभा चुनावों के समय जब सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए गृहमंत्री पी चिदंबरम ने आईपीएल की तारीखें बदलवाने की कोशिश की तो इसे इस व्यवस्था ने उनकी हिमाकत देखा. आईपीएल रातों-रात दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया और मोदी की पीठ थपथपाई गई. शायद इसी समानांतर व्यवस्था होने के अहंकार और मुनाफ़े पर टिकी बारीक नज़र की वजह से बेंगलुरु में स्टेडियम के पास धमाकों के फौरन बाद सेमीफाइनल मुकाबले कराए गए. आम लोगों की सुरक्षा के साथ ऐसे खिलवाड़ की इजाज़त अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशील कोई व्यवस्था नहीं देती.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम को पलामू के पठारों और अबूझमाड़ के जंगलों में चलती समानांतर सरकारें नज़र आती हैं, दिल्ली में चलती ये समानांतर सरकारें नहीं दिखतीं. उड़ीसा में हथियारों के दम पर तीन घंटे तक ट्रेन रोक लेने वाले नक्सली खतरनाक नजर आते हैं, लेकिन इंडियन एअरलाइंस के विमान को पैसे और बाप की हैसियत के दम पर अपनी तरफ मोड़ लेने वाले बेटे-बेटियों की फौज परेशान नहीं करती.
संसदीय लोकतंत्र के लिए जितने खतरनाक नक्सलवादी हैं, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक ये लोग हैं जो लोकतंत्र की दुहाई देते हैं और अवैध पूंजीतंत्र का वह खेल खेलते हैं जिसमें संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता सबसे पहले आउट होती है.   

प्रियदर्शन

‘अब हर किसी को गेहूं और चावल चाहिए’

सुबह के आठ बजे हैं. लेकिन 69 वर्षीय भारत के कृषि मंत्री  शरद पवार अपने दिल्ली स्थित घर में बने ऑफिस में व्यस्त हो चुके हैं…अनाज और सब्जियों की लगातार बढ़ रही कीमतों के मुद्दे पर आलोचनाओं से घिरे पवार ने अजित साही और राना अय्यूब से उनके कार्यकाल में कृषि नीतियों पर काफी लंबी बात की. साक्षात्कार के अंश

यूपीए सरकार के कार्यकाल में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन

यूपीए जब सत्ता में आई तब कृषि वृद्धि दर में एक ठहराव आ चुका था. मोंटेक सिंह अहलूवालिया (योजना आयोग के उपाध्यक्ष) की एक रिपोर्ट बताती है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के पहले दो सालों में कृषि वृद्धि दर 3.2 फीसदी थी जो 10वीं योजना से बेहतर थी. हमारा लक्ष्य 4 फीसदी वृद्धि दर का था और यदि हम यह हासिल कर लेते तो देश की कुल वृद्धि दर 8 फीसदी को पार कर जाती. लेकिन पिछले साल देश के कई जिलों में बारिश नहीं हुई. देश का आधे से ज्यादा हिस्सा सूखा पड़ा रहा. हमारे काम से सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि इससे कृषि क्षेत्र में निवेश उल्लेखनीय रूप से बढ़ गया. देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी जो 2004-05 में 14.1 फीसदी थी वह 2008 में 19.8 फीसदी हो गई. किसानों के लिए सबसे जरूरी होता है कि वे सही समय पर बुवाई के लिए बीज खरीद पाएं. पहले वे सूदखोरों के मनमाने ब्याज पर उनसे पैसा उधार लेते थे. जब हमारी सरकार बनी तो उस समय किसानों को फसल के लिए कुल 86 हजार करोड़ रुपए के कर्ज बांटे गए थे, इस साल यह आंकड़ा 3.2 लाख करोड़ रु हो चुका है.

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत हमारे सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम- राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन बेहद सफल साबित हो रहे हैं. हमने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 55 हजार करोड़ रु का निवेश किया है और इसके लिए राज्यों को अधिकार दिया गया है कि वे इन योजनाओं के लिए क्षेत्र का निर्धारण करें.  कुछ राज्य मत्स्यपालन में रुचि ले रहे हैं तो कुछ बागवानी में. उन्हें योजना बनाने का विकल्प भी दिया गया है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत हमने गेहूं, चावल और दालों पर ध्यान केंद्रित किया है. हम चाहते हैं किसानों को अच्छी गुणवत्ता के बीज मिलें. इसलिए हमने 5 हजार करोड़ रुपए जारी किए हैं.

अगले कुछ ही दिनों में सरकार इस साल भंडारण के लिए अनाज की खरीद शुरू कर देगी. हमारा अनुमान है इस बार पिछले साल से ज्यादा अनाज का भंडारण होगा. अब हमें इस दिशा में भी काम करना होगा कि नए अनाज को कहां रखा जाए, साथ ही हम यह भी कोशिश कर रहे हैं कि इसे खुले बाजार में बेच दिया जाए. हम बिक्री भी शुरू कर चुके हैं (इंटरनेट पर). इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत आम लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. इसके तहत वितरित किए जाने वाले अनाज की कीमत 2002 में तय की गई थी. हमारी लागत तब से बढ़ती रही लेकिन हमने राशन के दाम नहीं बढ़ाए.

आपको याद होगा 2009 में जब संसद का सत्र शुरू हुआ ही था तो दो दिनों तक कोई कामकाज नहीं हो पाया क्योंकि उत्तर प्रदेश से आए किसान संसद का घेराव कर रहे थे. पूरा विपक्ष उनकी मांग के साथ सुर मिलाते हुए कह रहा था कि आपको अनाज की कीमत बढ़ानी होगी. फिर जब हमने गन्ने की कीमत बढ़ाई तो उसका असर चीनी पर तो पड़ेगा ही. उस वक्त किसानों को प्रति क्विंटल गन्ने के 120 रुपए मिल रहे थे, अब 250 मिल रहे हैं. इसलिए चीनी की कीमतें भी बढ़ गईं. अब किसानों ने गन्ने का रकबा बढ़ाने पर ध्यान देना शुरू कर दिया. चीनी उद्योग का प्रारंभिक अनुमान है कि इस साल चीनी उत्पादन 140 लाख टन होगा, जबकि मुङो लगता है कि हम 170 लाख टन के आंकड़े को पार कर जाएंगे.

मोटा अनाज या नकदी फसलें

हमारे यहां असली मुश्किल यह है कि यहां कोई मांग ही नहीं है. बचपन में मैं भाखरा खाया करता था (बाजरे की रोटी), आज हम घर में बनी गेहूं की चपाती खाते हैं. हम चाहते हैं कि बाजरा और रागी का उत्पादन हो, लेकिन एक भी राज्य इनको उपजाना नहीं चाहता. वे कहते हैं हमें गेहूं और चावल चाहिए. हम अपने खाने की आदतें बदल रहे हैं पहले जो स्थान ज्वार और बाजरा पर निर्भर थे, अब वहां के लोगों को गेहूं चाहिए. दक्षिण भारत में जहां लोग गेहूं को हाथ भी नहीं लगाते थे उन्हें भी अब गेहूं चाहिए.

खाने की आदतों में बदलाव का मतलब है कि अब आपको मोटे अनाज की बजाय गेहूं और चावल पर ध्यान देना होगा. पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्य अब अपने यहां चावल उत्पादन पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन लगातार गेहूं और चावल की खेती से मिट्टी की उर्वरक क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.

कपास के किसानों की आत्महत्या का मसला

पिछले दो सालों में कपास के किसानों को सबसे ज्यादा सब्सिडी मिली थी. यदि आप विदर्भ की खबरों पर ध्यान दें या वहां जाकर देखें तो पता चलेगा कि इस इलाके में काफी निर्माण कार्य चल रहे हैं और लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है.

मोंसेंटो के समर्थन पर

देखिए, मोंसेंटो बदनाम है. यह उन कुछेक कंपनियों में से है जिसपर अमेरिका में सबसे ज्यादा केस चल रहे हैं. भारत में 40 संस्थान जेनेटिकली मोडीफाइड (जीएम) तकनीक पर काम कर रहे हैं और हम इस दिशा में काफी शोध कर रहे हैं. लेकिन हम काफी सावधानी भी बरत रहे हैं. यदि हम सफल होते हैं तो हमारा तरीका मोंसेंटो जसा कतई नहीं होगा क्योंकि वह कंपनी यहां परोपकार करने नहीं आ रहे हैं, वे सिर्फ पैसा कमाना चाहते हैं. यदि वे शोध में पैसा खर्च करेंगे तो पैसा कमाएंगे भी. हम इसके लिए उनपर इल्जाम नहीं लगा सकते. मेरी शिकायत सिर्फ यह है कि उन्हें किसानों का शोषण नहीं करना चाहिए.

आयात शुल्क कम करने के मुद्दे पर

तीन साल पहले हमारे यहां काफी मात्रा में चीनी का भंडारण किया गया था और इससे कीमत लगातार नीचे जा रही थी. जब हमने इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा तो कीमतें और कम हो चुकी थीं, लेकिन जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से हमने चीनी की खरीद शुरू की तब-तब कीमतें बढ़ जातीं. तो यह क्रम चलता रहा. मुङो पूरा भरोसा है कि अगले दो साल में हालात ठीक रहे तो चीनी, गेहूं और चावल का इतना उत्पादन होगा कि हमें इनका निर्यात करना पड़ेगा. यदि हम दूसरे देशों पर अपने यहां माल बेचने पर प्रतिबंध लगाएंगे तो दूसरे देश भी बाद में ऐसा ही करेंगे.

अगले 20-30 साल के लक्ष्य

देश की 62 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है. आपको महंगाई के कारणों को समझना चाहिए और उनका विश्लेषण करना चाहिए. जब तक हम उत्पादक को प्रोत्साहन नहीं देंगे वह उत्पादन क्यों करेगा? हर वस्तु की कीमत बढ़ रही है. ऐसे में यदि किसान को अच्छी कीमत नहीं मिलेगी तो वह फसल क्यों उगाएगा? यदि आप पूरी अर्थव्यवस्था को सुधारना चाहते हैं तो यह काम अपने ही लोगों की उपेक्षा करके नहीं हो सकता. इसलिए हमें उनकी आमदनी बढ़ानी होगी. हमें सारे देश का चेहरा बदलना होगा, लेकिन इस दौरान आप ग्रामीण भारत की उपेक्षा नहीं कर सकते. इसके अलावा हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है. जब भारत आजाद हुआ था तो 35 करोड़ में से 80 फीसदी लोग खेती पर निर्भर थे, आज 106 करोड़ आबादी में से 62 फीसदी कृषि पर निर्भर है. इस बीच हमारी जमीन उतनी ही रही. आज हर शहर का फैलाव हो रहा है. हम राजमार्ग बना रहे हैं, सेज बना रहे हैं और इस सबके लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है. इन सब वजहों से 85 फीसदी किसानों के पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है. और उनमें से भी 60 फीसदी के पास सिंचाई के लिए पानी नहीं है. यही हमारे यहां गरीबी बढ़ने की भी वजह है. यदि हमें इसमें सुधार करना है, दबाव कृषि क्षेत्रों से हटाकर गैर कृषि क्षेत्रों पर बढ़ाना होगा. हमें सिंचाई सुविधाओं में भी भारी निवेश करना होगा. ये सभी एक-दूसरे से जुड़े मुद्दे हैं. 60 के दशक में संकर किस्मों से हरित क्रांति सफल हुई थी. आज यदि हमें खाद्य संकट से निपटना है तो हमें बीजों की नई किस्में विकसित करनी होंगी जो चाहे संकर हों या जीएम या और किसी तरह के नए बीज हों. लेकिन इसके पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि ये मिट्टी, किसानों, उपभोक्ताओं और जानवरों के लिए सुरक्षित हों इसके बाद ही इन्हें प्रयोग में लाना चाहिए.

धरती कहे पुकार के

बढ़ती हुई कीमतें उस आपदा का सिर्फ एक संकेत हैं, जिससे खेती जूझ रही है. दरअसल भारतीय कृषि क्षेत्र बुरी तरह से चरमरा रहा है. संकट से पार पाने के लिए नजरिए में बड़े बदलावों की जरूरत है. लेकिन कृषि मंत्री शरद पवार आपदा की इस आहट को सुनने के लिए तैयार नहीं. अजित साही और राना अय्यूब की रिपोर्ट

सरकारी नीतियों से लेकर अखबार की सुर्खियों तक तरजीह पाने वाली इस देश की शहरी आबादी को खेत-खलिहान से जुड़ी किसी बात से तब तक कोई खास लेना-देना नहीं होता जब तक या तो सब्जियों के दाम आसमान न छूने लगें या फिर चीनी या दाल जैसी रोजमर्रा की चीज अचानक ही बहुत महंगी न हो जाए. शहरी मध्यवर्ग में ऐसे लोग गिने-चुने ही होंगे जो रबी या खरीफ के बीच का फर्क बता सकते हों. कृषि विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और कार्यकर्ताओं को छोड़कर ज्यादातर लोग डब्ल्यूटीओ, नकदी फसलों, समर्थन मूल्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्य संप्रभुता और मोनोकल्चर या एकलसंस्कृति जैसे शब्दों पर गौर करने की जहमत नहीं उठाते. दस साल पहले तक सैकड़ों में सीमित किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा आज दो लाख के करीब पहुंच चुका है. मगर किसी की इसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं.

 ‘हमारे पास लाखों टन गेहूं गोदामों में है फिर भी हम 15 रुपए किलो की दर पर गेहूं आयात कर रहे हैं. क्यों?’

देखा जाए तो इस तरह की उपेक्षा दिखाकर हम अपने और अपने बच्चों के लिए एक बड़ा जोखिम मोल ले रहे हैं. यह कहने वाले जानकारों की संख्या लगातार बढ़ रही है कि भारत में खेती चौपट होने की दिशा में कदम बढ़ा रही है. अगर हमने इसे लेकर अपना बुनियादी नजरिया और नीतियां नहीं बदलीं तो वह दिन दूर नहीं जब अनाज की कमी और उसकी ऊंची कीमतों के चलते देश में व्यापक भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी. साथ ही करोड़ों किसानों के लिए जीना दूभर हो जाएगा.

अगर आपको अब भी यह बड़ी खबर नहीं लगती तो पढ़िए कि सरकार के कृषि प्रबंधन के आलोचक और कृषि विशेषज्ञ सुमन सहाय क्या कहती हैं, ‘दस साल पहले जब मैंने झारखंड में काम करना शुरू किया था तो वहां कोई नक्सलवाद नहीं था. मैं इन नाराज नौजवानों में से कइयों को जानती हूं. ऐसा नहीं है कि वे सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. वे तो बस खेती करना चाहते हैं. मगर उनमें से ज्यादातर ने मान लिया है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं, सरकार ने उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया है.’

झारखंड के किसानों के पास आज फसलों को देने के लिए पानी नहीं है. पिछली बार बुआई के मौसम में सरकारी बीज भंडारों से बीज मिलने में तीन महीने लग गए. तब तक बुआई के लिए बहुत देर हो चुकी थी. वहां शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जिसे खेती से यह उम्मीद हो कि इससे साल भर तक उसके परिवार का पेट भर जाएगा. सहाय कहती हैं, ‘यहां तक कि जिन किसानों के पास दस-दस एकड़ जमीनें हैं वे भी खेती करने की बजाय शहर जाकर रिक्शा चलाने या फिर किसी दफ्तर में चपरासी की नौकरी करना पसंद करते हैं.’

भारत में खेती के क्षेत्र में तेज गिरावट की शुरुआत तो 1990 के दशक में ही हो गई थी लेकिन पिछले छह साल के दौरान जिस एक व्यक्ति के रहते इसकी सबसे ज्यादा दुर्दशा हुई वे हैं केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार. देश के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक पवार खुद एक किसान के बेटे हैं जिन्होंने महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों की जमीन पर अपनी राजनीति की मजबूत इमारत खड़ी की. उनके बारे में कहा जाता है कि वे न सिर्फ भारतीय बल्कि दुनिया भर की खेती का चलता-फिरता ज्ञानकोष हैं. 2004 की गर्मियों में जब उन्होंने इस मंत्रालय की कमान संभाली थी तो कइयों को उम्मीद थी कि पवार अपने इस व्यापक ज्ञान का उपयोग कर कृषि क्षेत्र की नीतियों में सुधार लाएंगे ताकि किसानों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला जा सके. लोगों को यह भरोसा था कि वे आयात को बढ़ाए बिना खाद्य भंडारों का बेहतर प्रबंधन करके कीमतों को नीचे रखेंगे.

मगर पिछले छह साल से पवार की अगुवाई वाले कृषि मंत्रालय ने लगातार ऐसी नीतियां बनाई हैं कि न तो गरीब किसानों की मुसीबतें कम हुई हैं और न अनाज का प्रबंधन बेहतर हुआ है. इसकी बजाय उनका मंत्रालय मांग और आपूर्ति की बाजारवादी अर्थव्यवस्था, बड़े कॉरपोरेट घरानों, आयात में बढ़ोतरी और पानी व दूसरे संसाधन खाने वाली चावल, गेहूं और गन्ना जैसी फसलों के पक्ष में खड़ा नजर आया है. विडंबना देखिए कि मीडिया में उनकी चर्चा कृषि से ज्यादा क्रिकेट के क्षेत्र में उनके प्रबंध कौशल के चलते होती रही है. वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर कहते हैं, ‘खेती की अपनी व्यापक समझ का इस्तेमाल पवार ने प्रबंधन की बजाय मनमानी के लिए किया.’

परिणाम तो बुरा होना ही था. इस साल फरवरी से इस महीने तक खाद्य पदार्थों की कीमतों ने जबर्दस्त छलांग लगाई तो पवार ने कृषि मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झड़ने की भरसक कोशिश की. ऐसा करने में वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इसके लिए बराबरी का जिम्मेदार बताने की हद तक चले गए. हालांकि फौरन ही उन्होंने यह साफ करने की कोशिश की कि उनके बयान को गलत तरीके से समझ गया है. एक दिन लोकसभा में उनके भाषण के दौरान समूचे विपक्ष ने बीच में ही वॉकआउट कर दिया.

किसान अपनी उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहे थे, इसके बावजूद पवार ने तिलहन से लेकर कपास जैसी फसलों तक पर आयात शुल्क में भारी कटौती का समर्थन किया. यह बड़ी हैरत की बात थीअक्सर अविचलित रहने वाला यह शख्स लड़खड़ाने लगा है यह तब साफ जाहिर हो गया जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी को अपने उस प्रवक्ता को हटाने पर मजबूर कर दिया जिन्होंने देश की कृषि नीतियों के लिए उन्हें कोसते हुए कैमरे के सामने ही असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर डाला. हटाए गए प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी और पवार दोनों से जब इस बारे में बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

हालांकि पवार अपनी नीतियों का बचाव करते हैं (देखें इंटरव्यू). वे कहते हैं कि उनकी बनाई नीतियों की वजह से 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के पहले दो वर्षों में भारतीय कृषि क्षेत्र में 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई जबकि 1990 के दशक के दौरान यह ज्यादातर दो प्रतिशत के आसपास घूमती रही थी. पवार किसानों को दिए जा रहे ऋणों में भारी बढ़ोतरी का भी हवाला देते हैं. कृषि क्षेत्र पर उनका जोर है यह बताने के लिए वे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना सहित कई योजनाएं शुरू किए जाने का हवाला भी देते हैं.

मगर जानकारों का मानना है कि पवार की नीतियों ने भारतीय कृषि को अस्थिर और खतरनाक दिशा में धकेलना शुरू कर दिया है जिससे गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं का दायरा बढ़ा है. खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘खाद्य आयात का मतलब है बेरोजगारी का आयात.’ शर्मा वर्तमान कृषि संकट का ठीकरा पश्चिम, कारोबार, नकदी फसलों और आयात की तरफ झुकी कृषि नीतियों पर फोड़ते हैं. वे कहते हैं कि 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद से मंत्रियों, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों ने भारतीय कृषि की घोर उपेक्षा की है. 

जब पवार ने 2004 में कृषि मंत्री का पदभार संभाला था तो साफ तौर पर कई चीजों की दरकार थी. फर्टिलाइजरों और कीटनाशकों की कीमतें आसमान छू रही थीं, उनपर लगाम लगाने की जरूरत थी. कृषि पैदावार के दाम बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे जिससे किसानों की उपज से होने वाली आमदनी लगातार कम हो रही थी. 2004 में ही एक आधिकारिक सर्वे हुआ था जिसमें यह बात जाहिर हुई थी कि एक किसान की औसत आमदनी 2,200 रुपए महीने से भी कम है. इसपर भी ध्यान देने की जरूरत थी.

किसान अपनी उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहे थे, इसके बावजूद पवार ने तिलहन से लेकर कपास जैसी फसलों तक पर आयात शुल्क में भारी कटौती का समर्थन किया. यह बड़ी हैरत की बात थी. तहलका से बात करते हुए पवार तर्क देते हैं कि अगर वे अब आयात शुल्क में बढ़ोतरी करते हैं तो दूसरे देश भी भारतीय कृषि उत्पादों पर भविष्य में आयात शुल्क बढ़ा सकते हैं. यानी जो गड़बड़ हुई है उसे चलते रहने देना होगा. उसे सही करना एक नई गड़बड़ को जन्म देगा.

महाराष्ट्र में शेतकरी कामगार पार्टी के वरिष्ठ नेता एनडी पाटिल गुस्से में कहते हैं, ‘हमारे कपास किसान आत्महत्या कर रहे हैं और हम 10 प्रतिशत के आयात शुल्क पर कपास का आयात कर रहे हैं.’ पाटिल के मुताबिक डब्ल्यूटीओ के तहत भारत आयातित कपास पर 150 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा सकता है. शर्मा के मुताबिक आयातित कपास पर कम आयात शुल्क हास्यास्पद है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं. इसमें नकद रकम देना भी शामिल है. शर्मा कहते हैं, ‘उन्हें घर में बैठे-बैठे चेक मिल जाते हैं. हमारे किसानों को भी मिलने चाहिए.’ सुमन सहाय को याद है कि जब वे जर्मनी में रहती थीं तो किस तरह उनके पड़ोसी एक किसान परिवार ने नकद सब्सिडी पाने के लिए अपनी गाएं अपने आप को ही बेच दी थीं.

पवार की नीतियों की आलोचना न करने वाले लोग भी आयात को लेकर उनके तर्क को पचा नहीं पाते. महाराष्ट्र के नासिक कस्बे में रहने वाले कृषि नीति शोधकर्ता मिलिंद मुरुगकर पूछते हैं, ‘हमारे पास लाखों टन गेहूं गोदामों में है फिर भी हम 15 रुपए किलो की दर पर गेहूं आयात कर रहे हैं. क्यों?’ मुरुगकर कहते हैं कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि आखिर पवार देश में मौजूद अनाज का भंडार क्यों नहीं खोलते.

अनुभवी कृषि अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री वाईके अलघ आयात शुल्क घटाए जाने पर सावधान करते हैं. हाल ही में उन्होंने आयात शुल्कों पर एक दिशा तय करने के लिए बनाई गई एक समिति के निष्कर्ष सरकार को सौंपे हैं. इस समिति की अगुवाई भी अलघ ने ही की थी. वे बताते हैं, ‘हमने कहा कि सरकार को सक्षम किसान के खर्चे की भरपाई करनी चाहिए. कम शुल्कों पर आयात की इजाजत देने का मतलब यह है कि आप विदेशी किसानों को सब्सिडी दे रहे हैं. एक साल तो तिलहन पर आयात शुल्क खत्म ही कर दिया गया. यानी हम तब मलेशियाई और अमेरिकी किसानों को सब्सिडी दे रहे थे.’

बांबे हाई कोर्ट के पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल, जिन्होंने समाजसेवा के लिए वक्त से पहले ही अपनी नौकरी छोड़ दी, पवार की काफी आलोचना करते हुए आरोप लगाते हैं कि कृषि मंत्री खेती को लेकर राजनीति कर रहे हैं और जमाखोरी के जरिए कृत्रिम कमी पैदा करने वाले व्यापारियों के साथ उनकी मिलीभगत है

उधर, सिंचाई के मोर्चे पर भी पवार की निष्क्रियता समझ से परे है. हैरत की बात है कि चार दशक पहले हरित क्रांति के बाद से आज तक सरकार की नीतियां सिर्फ उसी 40 फीसदी खेती की जमीन की तरफ झुकी रही हैं जो मुट्ठी भर राज्यों में है और जिसे ट्यूबवेलों और नहरों के जरिए व्यापक सिंचाई की सुविधा दी जा रही है. बाकी 60 फीसदी हिस्से की तरफ न के बराबर ध्यान दिया गया है. यह भूमि पूरी तरह से इंद्रदेव की कृपा के हवाले रही है और इसीलिए इसमें ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जो सूखे मौसम की मार झेल सकें. मसलन तिलहन, दालें, ज्वार-बाजरा जैसा मोटा अनाज इत्यादि. अगर सरकार ने इन अनाजों की खेती को प्रोत्साहन दिया होता तो न सिर्फ लाखों किसानों की आजीविका चलती बल्कि देश के करोड़ों गरीब भूखों को सस्ता अन्न मिलता जिनका 80 फीसदी हिस्सा इसी शुष्क जमीन पर रहता है.

शुष्क भूमि के प्रति सरकार की यह उपेक्षा अक्षम्य है. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी से जुड़े विपुल मुद्गल कहते हैं कि हरित क्रांति वाले इलाकों को सरकार औसतन 1.3 लाख रुपए प्रति एकड़ सब्सिडी देती है. इनमें पवार की कर्मस्थली प. महाराष्ट्र के वे इलाके भी शामिल हैं जो गन्ना उगाते हैं और जमकर पानी खर्च करते हैं. इसकी तुलना में शुष्क भूमि वाले इलाकों में सब्सिडी के लाभ का यह आंकड़ा महज पांच हजार रु प्रति हेक्टेयर (तकरीबन ढाई एकड़) है. मुद्गल कहते हैं, ‘किसी ने भी इन इलाकों के लिए एक अलग सिंचाई नीति बनाने के बारे में नहीं सोचा.’ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने 2010 के बजट में इसकी पहल की है. चार करोड़ रुपए का खर्च रखकर. मगर मुद्गल कहते हैं कि यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे जितनी भी नहीं है.

योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह कहते हैं कि भारतीय कृषि को बर्बाद होने से बचाने की मुहिम में जल प्रबंधन एक बड़ी भूमिका निभाएगा. शाह ने प्रधानमंत्री के कहने पर आयोग का सदस्य बनने से पहले दो दशक मध्य प्रदेश के गांवों में बिताए हैं. 1998 में उन्होंने भारत के शुष्क भूमि वाले इलाकों पर एक किताब लिखी थी जिसमें यह बताया गया था कि कैसे हरित क्रांति ने हर जगह एक ही समाधान पेश किया कि पानी चाहिए तो ट्यूबवेल खोद डालो, जिससे स्थितियां खराब होती चली गईं.

तहलका से बात करते हुए शाह बताते हैं कि भारत की शुष्क भूमि में से ज्यादातर उन चट्टानों से बनी है जो लाखों साल पहले तब अस्तित्व में आईं थीं, जब अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप टूटकर अलग हो गया था और कई भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे. ऐसी शुष्क जमीन में भूमिगत जल हजारों साल के दौरान चट्टानों के बीच में बनी खोखली जगहों में इकट्ठा हो गया था. शाह कहते हैं, ‘महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में गन्ना उगाना पारिस्थितिकी और पानी के स्तर के प्रबंधन के बुनियादी सिद्धांतों का मखौल उड़ाना है. पिछले तीस साल में हमने उस पानी का ज्यादातर हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है और अब बहुत कम पानी बचा है.’

खेती को लेकर हर तरफ इसी उपेक्षा का आलम है. जून में जब हर तरफ गर्मी के चलते पानी की कमी होती है तो पंजाब में चावल उगाया जाता है. यह घमंड नहीं तो और क्या है. ऐसी गतिविधियों के चलते हर जगह भूमिगत जल का स्तर खतरनाक तरीके से नीचे तक चला गया है. शाह कहते हैं कि भारत को सिंगापुर जैसे देशों से सीख लेनी चाहिए जहां पुनर्शोधित पानी का खूब उपयोग हो रहा है. यहां तक कि सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे उन उद्योगों में भी जिनमें उच्च गुणवत्ता वाले पानी की जरूरत होती है. वे कहते हैं, ‘देखा जाए तो जरूरत इस बात की है कि स्थानीय लोगों को जल का समुचित प्रबंधन करना सिखाया जाए.’

यह सभी जानते हैं कि पवार की पूरी राजनीति महाराष्ट्र की ताकतवर शुगर लॉबी के इर्द-गिर्द घूमती है जो गन्ना उगाने वालों और चीनी उत्पादक सहकारी संस्थाओं से मिलकर बनती है. बांबे हाई कोर्ट के पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल, जिन्होंने समाजसेवा के लिए वक्त से पहले ही अपनी नौकरी छोड़ दी, पवार की काफी आलोचना करते हुए आरोप लगाते हैं कि कृषि मंत्री खेती को लेकर राजनीति कर रहे हैं और जमाखोरी के जरिए कृत्रिम कमी पैदा करने वाले व्यापारियों के साथ उनकी मिलीभगत है.

जैसा कि पाटिल तल्ख स्वर में कहते हैं, ‘कई व्यापारियों ने मुङो बताया है कि पवार उनसे सरकारी दर से ज्यादा दाम पर गन्ना खरीदने को कहते हैं ताकि कमी पैदा हो जाए. उसके बाद व्यापारी इसे सरकार को कहीं ज्यादा दाम पर बेचते हैं.’ पवार की राजनीतिक, कृषि संबंधी और कारोबारी गतिविधियों पर सालों से नजदीकी निगाह रखने वाले पाटिल का दावा है कि अपनी कठपुतली हुकूमत के जरिए वे महाराष्ट्र की करीब 200 चीनी कोऑपरेटिवों की कमान अपने हाथ में रखते हैं. वे कहते हैं, ‘उन्होंने इनमें से कई कोऑपरेटिवों को बीमार इकाई घोषित करवा दिया था जिससे वे भारी कर्ज की पात्र हो गईं. यह पैसा पवार या उनके आदमियों को मिल गया.’ पवार ने हमेशा इन आरोपों को नकारा है.

पवार के एक और तीखे आलोचक हैं बालासाहेब विखे पाटिल. पाटिल आठ बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और वाजपेयी सरकार में उद्योग मंत्री हुआ करते थे. पवार ने चालीस साल पहले कोआ¬परेटिव कारोबार की बारीकियां विखे पाटिल द्वारा संचालित एक कोऑपरेटिव में ही सीखी थीं. विखे पाटिल को हैरानी है कि एक तरफ तो पवार इतनी सारी चीनी कोऑपरेटिवों को बीमारू इकाई घोषित करवा रहे हैं और दूसरी तरफ वे पुणो में दो चीनी कारखाने शुरू कर रहे हैं. नासिक में तहलका से बात करते हुए विखे पाटिल कहते हैं, ‘अगर कोऑपरेटिव बीमार हैं तो कंपनियां तरक्की कैसे करेंगी?’ वे यह भी कहते हैं कि शुष्क जमीन पर होने वाली फसलों में पवार की दिलचस्पी सिर्फ उन फैक्टरियों को सब्सिडी देने में है जो ज्वार और बाजरे से शराब बनाती हैं. वे कहते हैं, ‘ये हैं पवार की किसान समर्थक नीतियां.’

या फिर जमीन का ही उदाहरण लीजिए जो दशकों से हो रही खूब खेती और कीटनाशकों और खाद के जमकर इस्तेमाल से बर्बाद हो चुकी है. एकलसंस्कृति यानी सिर्फ एक या दो फसलें उगाने की परंपरा भी भारतीय कृषि के लिए बेहद विनाशकारी साबित हुई है. पहले परंपरा यह थी कि किसान बदल-बदलकर फसलें उगाते थे जिससे जमीन हमेशा उपजाऊ बनी रहती थी. लेकिन अब बार-बार एक ही फसल उगाए जाने से जमीन की उर्वरता काफी कम हो गई है. तहलका से बात करते हुए पवार भी एकलसंस्कृति वाली इस खेती पर अफसोस जताते हैं.

लेकिन खेती को लेकर उनका नजरिया यही है कि वही उगाओ जो बाजार चाहता है न कि पेट. और इससे एकलसंस्कृति को ही और बढ़ावा मिलता है क्योंकि नकदी फसलें बाजार की मांग पूरी करने के लिए उगाई जाती हैं न कि पेट भरने के लिए. यही वजह है कि पवार ने अंगूरों की खेती पर जमकर जोर दिया है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे दामों पर बिकने वाली शराब बनती है. पवार की इस बात के लिए भी काफी आलोचना हुई है कि पूर्वी महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में हजारों किसानों ने खुदकुशी कर ली मगर वे कभी उनके परिवारों का हाल तक जानने नहीं गए. सिवाय एक बार तब जब जून, 2006 में उन्हें जबर्दस्ती प्रधानमंत्री के साथ वहां जाना पड़ा था. मैगसेसे पुरस्कार विजेता और वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ तल्खी के साथ कहते हैं, ‘पवार बयान जारी कर रहे थे कि आत्महत्याएं कम हो गई हैं. वास्तव में महाराष्ट्र में हमेशा सबसे बुरी स्थिति रहती है.’ उस साल स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि किसानों की व्यथा का उनके दिल पर गहरा असर हुआ है. साईनाथ इस बात को याद करते हुए कहते हैं, ‘उस समय पवार श्रीलंका दौरे पर जा रही भारतीय टीम की सुरक्षा की बात कर रहे थे.’

यह भी सब जानते हैं कि अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र बारामती, जहां से अब उनकी बेटी सुप्रिया सुले संसद में आई हैं, को पवार ने कृषि क्षेत्र का एक शानदार मॉडल बना दिया है. कृषि क्षेत्र पर नजदीकी से नजर रखने वालीं नई दिल्ली स्थित पत्रकार भवदीप कंग कहती हैं कि पवार कृषि क्षेत्र को हमेशा बारामती के चश्मे से देखते हैं. उन्हें लगता है कि किसानों की खुशहाली, सिंचाई, ज्यादा उत्पादन, फसल के बाद होने वाले प्रबंधन और कृषि प्रसंस्करण की सुविधाओं से आती है. इसका एक उदाहरण दुग्ध कोऑपरेटिव हैं. वे कहती हैं, ‘दुधारू पशु खरीदने के लिए कर्ज से लेकर, दूध संग्रह केंद्रों और फिर वहां से शीतल संयंत्र और ब्रिटैनिया फैक्ट्री तक व्यवस्था में कोई खामी नहीं है.’ भारत से यूरोपीय संघ को जितने अंगूरों का निर्यात होता है उनका 80 फीसदी हिस्सा महाराष्ट्र से आता है. बारामती में भारत की वाइन बनाने वाली पहली फैक्ट्री भी है. अंगूर की एक प्रजाति को तो वहां शरद सीडलेस नाम ही दे दिया गया है.

इसमें कोई शक नहीं कि पवार का यह मॉडल, जिसे कृषि उत्पादन का वैज्ञानिक प्रबंधन भी कहा जाता है, बारामती में बहुत सफल रहा है. इसने बारामती को सूखाग्रस्त और निम्न आय वाले इलाके से बदलकर भारत के सबसे खुशहाल, सिंचित और औद्योगिक इलाकों में से एक बना दिया है. मगर बारामती एक छोटा-सा उदाहरण है जिसका पवार ने कुछ स्पष्ट वजहों से ख्याल रखा है और यह मॉडल पूरे देश में लागू करना बहुत मुश्किल है. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाए?

देविंदर शर्मा इसका जवाब देते हुए कहते हैं, ‘नई खेती.’ वे बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के 23 में से 21 जिलों में यह हो रही है. वहां तीन लाख किसानों ने इसे अपनाया है. वे न खाद का इस्तेमाल करते हैं न कीटनाशकों का. शर्मा कहते हैं, ‘उत्पादन में कोई गिरावट नहीं आई है और फसलों में कीड़े लगने की समस्या भी कम हो गई है.’ पिछले साल वहां सभी किसानों ने अपनी आय में बढ़ोतरी की बात कही. यही नहीं, अपने ही पैसे से किसान एक स्वसहायता समूह भी शुरू कर चुके हैं. शर्मा कहते हैं, ‘क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उसके खाते में पांच हजार करोड़ रुपए की रकम है?’

गैरसरकारी संगठनों द्वारा शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट, जिसे कम्यूनिटी मैनेज्ड सस्टेनेबल एग्रीकल्चर नाम दिया गया है, को आंध्र प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया है. अब तो विश्व बैंक ने भी इसे समर्थन देना शुरू कर दिया है. शर्मा कहते हैं, ‘यह नई खेती प्राकृतिक संसाधनों का नाश नहीं करती. न ही इससे भूमि के स्वास्थ्य, जलस्तर या आजीविका का विनाश होता है. यह ग्लोबल वार्मिग में और गरमी नहीं जोड़ती.’ लेकिन पवार को इस नई खेती में कोई दिलचस्पी नहीं. शायद इसलिए क्योंकि यह नई खेती जीडीपी में कुछ नहीं जोड़ती. क्योंकि इसमें बड़ा कारोबार शामिल नहीं है. क्योंकि यह बाजार के लिए नहीं बल्कि पेट के लिए है.