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‘मुझे नामवर सिंह और मैनेजर पांडेय के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं’

राजेंद्र यादव से साक्षात्कारों की अब तक चार किताबें आ चुकी हैं. उनसे साक्षात्कार लेने वाले की असल चुनौती दोहराव से बचना है. यहां यह कोशिश भरसक की गई है. उन सवालों को बिल्कुल ही छोड़ दिया गया है जो उनसे बार-बार पूछे गए हैं और हर बार उन्होंने उनका एक ही उत्तर दिया है. राजेंद्र यादव से दिनेश कुमार की बातचीत.

लोगों का कहना है कि जिस तरह से नामी बनिये का नाम बिकता है वही हालत हंस की है. यह केवल निकलने के लिए निकल रही है. साहित्य समाज में इसकी हस्तक्षेपकारी भूमिका अब समाप्त हो गई है.  

 यह तो सही बात है कि व्यक्ति हो या संस्था, पत्रिका हो या आंदोलन इनकी ऊर्जा की एक अवधि होती है और अवधि बीत जाने के बाद केवल परंपरा रह जाती है. मगर, हंस के बारे में मैं ऐसा महसूस नहीं करता. मैं अभी भी उसे हिंदी की एक ऊर्जावान पत्रिका मानता हूं. यह इस बात से भी साबित होता है कि हंस का हर नया अंक विमर्शों और बहसों को जन्म देता है. कभी किसी रचना को लेकर तो कभी किसी लेख को लेकर. सबसे अधिक संपादकीय को लेकर. इनदिनों मेरे और तरुण भटनागर को आधार बना कर जो बहस शुरू हुई है,  उसकी अनुगूंज दूर-दूर तक है. यह बहस अगले अंक में भी चलने वाली है. संपादकीय के अलावा हंस के तीन कॉलम ऐसे हैं जिसको लेकर उत्तेजित उत्सुकता बनी रहती है. ये स्तंभकार हैं- शीबा असलम फहमी, तसलीमा नसरीन और मुकेश कुमार. हंस में चलती रहने वाली बहसों को शायद ही कोई नजरअंदाज कर सके. अगले अंक में डॉ. सुधा चौधरी का एक गंभीर और शोधपूर्ण लेख आ रहा है- ‘मोक्ष की निरर्थकता’ आप देखेंगे कि इसको लेकर कितनी लाठियां भांजी जाती हैं. इसलिए मैं नहीं समझता कि हंस एक निश्चित अवधि के बाद ऊर्जाहीन हो जाने की परिपाटी का पालन करने वाली पत्रिका है. 

हंस को एक दौर में प्रियंवद, संजीव, उदय प्रकाश, अखिलेश आदि कई कथाकारों को सामने लाने का श्रेय मिला. इधर रचनाकारों को सामने लाने का श्रेय पत्रिका को नहीं मिल रहा है. क्या यह इसकी भूमिका खत्म होने का संकेत नहीं है?

 शायद तुम्हें यह पता हो कि हंस के 25 वर्ष पूरे होने पर हमने संजीव के संपादन में एक पुस्तक निकाली थी, नाम था-‘मुबारक पहला कदम’. उसमें हंस में छपी उन कथाकारों की पहली कहानी शामिल है जिनकी पहले कहीं कोई कहानी नहीं छपी थी. उसमंे सिर्फ पच्चीस कथाकार थे. इधर पच्चीस कथाकार ऐसे और हैं जिनको लेकर ऐसा ही एक और संकलन तैयार किया जा सकता है. हम लगभग हर अंक में ऐसे रचनाकारों को छापते हैं जिनकी रचनाएं पहली छपी नहीं या छपने के बाद केंद्र में आ गई. इसलिए नवीन रचनाशीलता के संदर्भ में हंस की भूमिका चूक गई है, ऐसा मैं नहीं मानता.

आपने परिवार नाम की संस्था का हमेशा विरोध किया है पर जब हंस के उत्तराधिकार की बात आई तो आपने सब कुछ ताक पर रखकर इसे अपनी बेटी को सौंप दिया. 

पहली बात तो यह है कि बेटी का संपादन में कोई हस्तक्षेप नहीं है. वह सिर्फ व्यवस्था का हिस्सा है. मैंने हंस की नई टीम में सिर्फ इस बात का ध्यान रखा कि मेरे बाद हंस ऐसे हाथों में दिया जाए जो उसकी ऊर्जा और जिजीविषा को बनाए रख सकें. मैं नहीं समझता कि इसमें भाई-भतीजावाद का कोई आरोप लगाया जा सकता है. 

दो दशक का आपका स्त्री विमर्श हिंदी में एक भी बौद्धिक स्त्री को क्यों नहीं पैदा कर सका?

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि बौद्धिक स्त्री से आपका क्या तात्पर्य है. क्या ईमानदारी से कहानियां, उपन्यास लिखने वाली स्त्रियां बौद्धिक नहीं होतीं? फिर भी नाम ही लेना हो तो हम कहेंगे कि हमने रोहिणी अग्रवाल, अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, डॉ. निर्मला जैन, अनामिका, विजया शर्मा जैसी आधा दर्जन लेखिकाओं को प्राथमिकता दी है जो हिंदी के किसी भी समीक्षक या विचारक से उन्नीस नहीं हैं. 

आपका पूरा स्त्री विमर्श सामंती सोच का तो विरोध करता है लेकिन पूंजीवादी विचार के साथ कदमताल मिलाता है. यानी स्त्री मुक्ति को लेकर आपके पास पूंजीवाद (उदारवाद) से अलग कोई वैकल्पिक दृष्टि नहीं है?

पूंजीवाद की एक सकारात्मक भूमिका है कि वह स्त्रियों, दलितों और श्रमजीवियों को सामंती एकछत्रता से मुक्त करता है. मगर, फिर उन्हें अपने और बाजार के लिए इस्तेमाल करना उसकी मूलभूत आवश्यकता है. सामंती गुलामी से मुक्ति की चेतना इन नए वर्ग को यह सामर्थ्य देती है है कि वह संगठित होकर अपने हितों और भविष्य के लिए लड़े. अब बाजार तो इनका इस्तेमाल करेगा ही. सवाल यह है कि इससे कैसे लड़ें. 

हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव; फोटो-शैलेंद्र पांडेय

हाल ही में तहलका के एक साक्षात्कार में वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल ने कहा कि गंभीर साहित्य की चर्चा के समय आपका नाम नहीं लिया जाए तो बेहतर है. 

मैं नवल जी का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे अपनी समझ के विचार से गंभीर विचारकों की सूची से काट दिया है. एक बार मेरी किसी रचना को लेकर डॉ. नगेंद्र ने प्रशंसा की तो कमलेश्वर ने कहा- राजेंद्र, सावधान हो जाओ! कि सोचो तुम्हारी रचना में ऐसा प्रतिक्रियावादी क्या था जिसे डॉ. नगेंद्र ने पसंद कर लिया. मैं शुरू से मानता हूं कि विश्वविद्यालय ज्ञान के कब्रिस्तान हैं. जहां सिर्फ पचास वर्ष पूर्व मरे हुए लोगों का ही अभिनंदन होता है. जीवित और जीवंत लोग उनके गले कभी नहीं उतरते. समाज और राजनीति के दूसरे प्रश्नों से जूझने वाले लेखक विश्वविघालयों के प्राध्यापकों के लिए सबसे बड़े ‘आउटसाइडर’ होते हैं. उनके हिसाब से शुद्ध साहित्यकार वह है जो चौबीसों घंटे रीतिकाल, भक्तिकाल और छायावाद ही घोटता रहता है और प्रगतिवाद तक आते-आते उसकी सांस फूल जाती है. उनके लिए केवल कलावादी और कवि ही साहित्यकार होते हैं. अपने गुरुदेवों से उन्होंने जो पढ़ा था उसे ही वे आज भी छात्रों के कान में उगलते रहते हैं. अभी इन्होंने जयंतियों के नाम पर केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन जैसों की कैसी मट्टी पलीद की है. शायद ही कोई अध्यापक हो जिसकी कलम के शिकार ये गरीब रचनाकार नहीं हुए हों. इनके लिए न यशपाल साहित्यकार हैं न रागेय राघव, न भगवत शरण उपाध्याय न शिवदान सिंह चौहान; क्योंकि वे साहित्य को समाज समीक्षा से जोड़ रहे थे. बेचारे नवल जी भी इसी ग्रंथि के शिकार हैं. उन्होंने केवल मुझे ही नहीं आलोक धन्वा, अरुण कमल, राजेश जोशी, पवन करण आदि सबको जाति बाहर कर दिया है. अगर नवल जी मुझे साहित्यकार मान लेते तो निश्चय ही मेरे मन में यह आशंका होती कि क्या मैं उन्हीं प्रध्यापकीय घुटी और सड़ांध भरी मान्यताओं का शिकार हो गया हूं?

प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पांडेय का कहना है कि आप कहीं से भी मार्क्सवादी नहीं है जबकि आप अपने को मार्क्सवादी ही मानते हैं. क्या कहना चाहेंगे?

मुझे मालूम नहीं कि मैनेजर पांडेय किस आधार पर मार्क्सवादी होने का ’सर्टिफिकेट’ देते हैं. लेकिन मैं यह जरूर जानना चाहूंगा कि मेरी रचनाओं में ऐसा क्या है जो मार्क्सविरोधी है. हो सकता है मैंने लेनिन, मार्क्स और दूसरों के बहुत उद्धरण न दिए हों, लेकिन देशी-विदेशी विद्वान मेरी चेतना और सोच का हिस्सा रहे हैं. उसे मैं अलग से रेखांकित करके नामवर सिंह और मैनेजर पांडेय से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत महसूस नहीं करूंगा. 

हंस प्रतिष्ठान की बहुत करीबी रही लेखिका मैत्रेयी पुष्पा का कहना है कि उन्होंने आपको प्राय: नहीं पढ़ा है और उन पर आपका कोई प्रभाव भी नहीं है. इधर आपकी लंबी बीमारी के दौरान वे न तो आपको देखने आईं और न ही फोन किया. संबंधों में इतनी तल्खी कैसे?

इस बात का जवाब तो मैत्रेयी पुष्पा ही दे सकती हैं. मेरा यह भी आग्रह नहीं है कि मेरा उन पर कोई प्रभाव रहे. वे स्वतंत्र लेखिका हैं, जैसा ठीक समझती हैं करती हैं. इसकी उन्हें पूरी छूट है. संबंधों के बारे में मेरी धारणा यह है कि यह रेलयात्रा का साथ है. जिसका जहां स्टेशन आ जाए उसे वहां उतरकर अलविदा कहने की पूरी स्वतंत्रता है. 

आप पहले किसी को आसमान पर चढ़ाते हैं और फिर अपना हाथ खींच लेते हैं. क्या अजय नावरिया के साथ आपने यही नहीं किया? क्या यह लोगों से खेलना नहीं हुआ?

जिसे तुम खेलना कहते हो या आसमान पर चढ़ाना कहते हो, मेरे लिए वह किसी को आत्मनिर्भर बनाने की प्रक्रिया है. जब वह अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त हो जाता है तो उसे मेरी सहायता की जरूरत नहीं होती. वह अपने व्यक्तित्व के बल पर ही आगे की यात्रा करता है. जैसे तैराकी सिखाने वाला व्यक्ति शिक्षार्थी को तैराकी के मूलभूत नियमों और प्रक्रियाओं से परिचित कराने के बाद उसे इस विश्वास के साथ पानी में छोड़ देता है कि वह खुद ही लहरों और धाराओं से लड़ेगा या उनका इस्तेमाल करेगा. यह बीच में छोड़ना या हाथ खींचना नहीं बल्कि सामने वाले के आत्मविश्वास को जगाना है. 

पंकज बिष्ट अपनी पत्रिका  ‘समयांतर’  में लगातार कहते आ रहे हैं कि आपने और हंस ने  ‘इसटैबलिशमेंट’ (व्यवस्था) का कभी विरोध नहीं किया. आपने दलित विमर्श और स्त्री विमर्श का सुरक्षित दायरा बना लिया.

पंकज बिष्ट हमेशा ही उलटबांसी बोलते रहते हैं. जरूरी नहीं कि सबके अर्थ खुलकर सामने आएं. ‘इसटैबलिशमेंट’ से उनका क्या आशय है? क्या यह केवल वर्तमान सत्ता ही है? परिवार और घरों में चलने वाली सामंती जकड़नें भी इसी ‘इसटैबलिशमेंट’ के अंग हैं. मुझे हर प्रकार की रुढि़यां और संकीर्णताएं ‘इसटैबलिशमेंट’ का हिस्सा ही लगती हैं.

83 साल का भरपूर जीवन! क्या किसी चीज का मलाल भी है?

मलाल सिर्फ मुझे अपने चार-पांच उपन्यासों का है, जिन्हें मैं पूरा नहीं कर पाया. 40-45 साल से गड़े खजाने के रूप में अधूरी पड़ी कहानियां आज भी पूरी नहीं हुईं. अपनी लेखकीय सूची से असंतोष न हो तो आदमी संतुष्ट होकर बैठ जाए. यह असंतोष और मलाल ही आदमी को सक्रिय रखते हैं. 

अखिल भारतीय अश्रुमहोत्सव

एक ढेला उठाइए और उसे सनसना दीजिए! जिसे लगा देखिए वह आंसू बहा रहा है. अरे, अब अपराधबोध से ग्रस्त न हो जाइए! जो रो रहा है उसके आंसू तो पहले से बह रहे थे. आप को यह बताते हुए ही आंखें भर आती हैं कि यहां आंसू बहाने वाले बहुतायत में पाए जाते हैं. जिधर नजर घुमाइए, उधर ही कोई न कोई आंसू बहाते दिख जाएगा. और ऐसे आंसू बहा रहा होगा कि उसे देख कर न चाहते हुए भी उसके बोलने से पहले पूछ लेंगे,‘भाई! सब कुशल-मंगल तो है न!’ और जब आप उसका जवाब सुनेंगे तो आपके आंसू निकल जाएंगे. जिसे आप उसका प्राइवेट मामला समझ रहे थे, वह तो जनहित का निकला. आपके सामने वाला देश को लेकर रो रहा है, देश की दुर्दशा को लेकर. 

देश की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाला जब आंसू बहाना शुरू करता है, तो जल्दी रुकने का नाम नहीं लेता. अक्सर समझ में ही नहीं आता, यह जो सामने बैठा बहुत चाव से आंसू बहा रहा है, उसके आंसू खुशी के हैं या गम के! लेकिन जब वह कहता है कि वह देश के लिए रो रहा है, तब आपको मानना ही पड़ता है कि वह चाव से नहीं व्यथित हो कर आंसू बहा रहा है. देश की दुर्दशा आंसू बहाने वालो कभी-कभी तो स्वयं भारत दिखने लगते हैं. इतने पीड़ित कि देश से ज्यादा उन पर दया भाव जाग्रत होता है. 

यहां आपसे मिलने वाला हर दूसरा व्यक्ति देश की दुर्दशा के नाम पर आंसू बहाता आता है और आपकी दुर्दशा करके किसी तीसरे की दुर्दशा करने निकल जाता है. इन आंसू बहाने वाले प्राणियों को देख कर आप का स्वयं के प्रति विरक्ति भाव पैदा होने लगता है. हाय! एक उसको देखो देश के लिए मरा जा रहा है, एक हम हैं कि पेट के लिए मरे जा रहे हैं. आपके मन में ‘मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम’ वाला भाव पैदा होता है. आंसू बहाने वाला यकायक आपको मुक्तिबोध का ब्रह्म राक्षस दिखने लगता है, और आप स्वयं को अंधेरे में पाते है. उसके सजल नैनों को देखकर ‘मैं ब्रह्म राक्षस का सजल-उर शिष्य होना चाहता’ की इच्छा जाग्रत हो उठती है. आपके मन में प्रबल वेग से यही भाव उठता है कि देश की दुर्दशा पर अगर हम हर समय आंसू नहीं बहा सकते, तो कम से कम रुआंसे तो दिख ही सकते हैं!  

दिन प्रतिदिन देश की दुर्दशा को लेकर आंसू बहाने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. यदि ये ऐसे ही बढ़ते रहे, तो डर है कि कहीं देश में आंसुओं की बाढ़ न आ जाए. देखिए, इस वक्त भी देश की दुर्दशा पर कितने आंसू बहा रहे हैं- बडे़ बाबू अपनी कुर्सी छोड़ पान की दुकान में, आला अधिकारी दफ्तर छोड़ नेता जी के आलीशान आवास में, सत्तारूढ़ दल का नेता मंत्रालय छोड़ टीवी चैनल के स्टूडियो में, विपक्षी पार्टी का नेता पार्लियामेंट हाउस क्षेत्र छोड़ फार्म हाउस में, दरोगा अपराधी छोड़ बार में, एनजीओ बस्ती छोड़ अखबार में, रिपोर्टर खबर छोड़ बाजार में देश की दुर्दशा पर आठ-आठ आंसू बहा रहे हैं. देश की दुर्दशा पर आंसू बहाने का अखिल भारतीय महोत्सव चल रहा है , ऐसे में आप क्यों-कैसे दूर हैं. झिझकिए नहीं. कूद जाइए. आप भी देश की दुर्दशा पर मोटे-मोटे आंसू बहाइए. देखते नहीं, जो देश की दुर्दशा पर आंसू बहाता है, कुछ दिन बाद स्वतः मोटा हो जाता है.

-अनूप मणि त्रिपाठी

कथनी कुछ, करनी कुछ

रिलायंस समूह से जुड़ी संस्था रिलायंस फाउंडेशन तरह-तरह के जनहितकारी काम करती है ऐसा इसकी वेबसाइट बताती है. इस संस्था की प्रमुख और रिलायंस समूह के मुखिया मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी महिलाओं और कन्याओं के कल्याण से जुड़े कई कार्यक्रमों में भाग लेते हुए टेलिविजन पर अक्सर दिख जाती हैं. रिलायंस फाउंडेशन, फिल्म स्टार आमिर खान के लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम सत्यमेव जयते – जिसमें कन्या भ्रूण हत्या सहित महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों को दिखाया गया था – में भी सहयोग करती है. मगर इसी रिलायंस समूह से जुड़ी एक अन्य कंपनी पर कुछ साल पहले कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने के आरोप लगे थे जिससे जुड़ा मामला अभी भी अदालत में चल रहा है.

रिलायंस ने कई क्षेत्रों में कारोबारी सफलता के कई नए रिकॉर्ड स्थापित करने के बाद 2002 में दूरसंचार के क्षेत्र में कदम रखा था. इस क्षेत्र में काम करने के लिए एक नई कंपनी रिलायंस इन्फोकॉम को 31 जुलाई, 2002 को रजिस्टर्ड कराया गया. कंपनी गठन के कागजों की पड़ताल के बाद तहलका ने पाया कि इसकी शुरुआत में दो लोग इसमें बराबर के साझेदार थे. इनमें एक थे मुकेश अंबानी और दूसरे मनोज एच मोदी. मोदी अभी मुकेश अंबानी वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के निदेशक मंडल में हैं. बाद में जब मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के बीच 2005 में विवाद पैदा हुआ तो रिलायंस इन्फोकॉम का स्वामित्व अनिल अंबानी के पास आ गया. इस संबंध में कंपनी के दस्तावेजों में 26 जून, 2005 को बदलाव किया गया. कंपनी के नए निजाम ने इसका नाम बदलकर रिलायंस कम्युनिकेशंस कर दिया.

इसके पहले ही कर लो दुनिया मुट्ठी मेंकी टैगलाइन के साथ रिलायंस इन्फोकॉम ने रिलायंस इंडिया मोबाइल के नाम से मोबाइल सेवा की शुरुआत कर दी थी. इस मोबाइल सेवा के तहत ही आर वर्ल्ड के नाम से मूल्य वर्धित सेवाओं का एक सेक्शन शुरू किया था. इसमें वूमंस वर्ल्ड सेक्शन के तहत कुछ सेवाएं मुहैया कराई जा रही थीं जिनमें से एक का नाम प्लान अ बेबीथा. प्लान अ बेबीके तहत ग्राहकों को बताया जा रहा था कि कैसे अपने होने वाले बच्चे का लिंग निर्धारित कर सकते हैं. इसमें यह साफ तौर पर बताया जा रहा था कि किस समय सेक्स करने से और किस तरह की डाइट लेने से लड़का या लड़की होगी. इसके अलावा इसके तहत कुछ सवालों का जवाब देकर गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग निर्धारण की सुविधा भी दी जा रही थी. इसके लिए एक खास तरह के चीनी कैलेंडर का इस्तेमाल कंपनी कर रही थी. इस चीनी कैलेंडर में गर्भ धारण का वक्त और गर्भ धारण करने वाले की उम्र डालने के बाद गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग बताया जाता था.

कुछ समय तक रिलायंस यह सेवा अपने ग्राहकों को मुहैया कराती रही और पैसे बनाती रही. लेकिन इसी बीच रिलायंस की इस सेवा पर उच्चतम न्यायालय में वकालत करने वाले रवि शंकर कुमार की नजर पड़ी और उन्होंने संबद्ध एजेंसियों के पास रिलायंस की इस सेवा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. वे तहलका को बताते हैं, ‘रिलायंस की यह सेवा प्री-कांसेप्शन ऐंड प्री-नेटल डायगनॉस्टिक टेक्नीक्स (पीएनडीटी) एक्ट, 1994 के प्रावधानों के खिलाफ थी. साथ ही रिलायंस की यह सेवा सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 और भारतीय टेलीग्राफ कानून, 1885 के प्रावधानों के भी खिलाफ थी.’ उन्होंने 2004 के अक्टूबर में दिल्ली सरकार के परिवार कल्याण विभाग और केंद्र सरकार के परिवार कल्याण विभाग के पास रिलायंस इन्फोकॉम के खिलाफ शिकायत कर इस मामले में उचित कार्रवाई की मांग की. रिलायंस इन्फोकॉम मुंबई में रजिस्टर्ड थी इसलिए केंद्रीय परिवार कल्याण विभाग ने महाराष्ट परिवार कल्याण विभाग को इस मामले की जांच का निर्देश दिया.

इसके बाद यह मामला नवी मुंबई महानगरपालिका के संबंधित अधिकारी को सौंपा गया और शिकायत की जांच के बाद नवी मुंबई महानगरपालिका ने 4 नवंबर, 2004 को रिलायंस इन्फोकॉम को नोटिस जारी किया. तहलका के पास इस नोटिस की एक प्रति है. इस नोटिस में यह माना गया है कि रिलायंस इन्फोकॉम ने प्लान अ बेबीसेक्शन के तहत जो सेवाएं मुहैया कराई हैं, वे पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(2) का उल्लंघन हैं. नोटिस का जवाब देने के लिए कंपनी को 15 दिन की मोहलत दी गई. इसके बाद नवी मुंबई महानगरपालिका ने 8 नवंबर, 2004 को रिलायंस इन्फोकॉम को एक और नोटिस भेजा. इसमें कंपनी को बताया गया कि अब भी देश के कुछ हिस्सों में उसकी वेबसाइट पर प्लान अ बेबीसेक्शन दिख रहा है. नोटिस में कंपनी से कहा गया कि वह यह सुनिश्चित करे कि यह सामग्री अब उसकी वेबसाइट पर नहीं दिखे.

‘पुलिस रिलायंस और मुकेश अंबानी को बचाना चाहती है. कंपनी कानून में प्रावधान है कि ऐसे अपराध से न तो मालिक पल्ला झाड़ सकता है और न ही कंपनी’

दिल्ली सरकार के परिवार कल्याण विभाग के पास जो शिकायत भेजी गई थी उसका नतीजा यह हुआ कि रिलायंस इन्फोकॉम के खिलाफ अदालत में मुकदमा दर्ज करा दिया गया. इस मामले की सुनवाई के लिए पहली तारीख 23 दिसंबर, 2004 मुकर्रर की गई. इसके बाद अदालत के निर्देश पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 30 जनवरी, 2005 को रिलायंस के खिलाफ एफआईआर दर्ज की. जिस वक्त एफआईआर दर्ज हुई, उस वक्त न तो रिलायंस इन्फोकॉम के कर्ता-धर्ता मुकेश अंबानी और न ही कंपनी के किसी और अधिकारी को अभियुक्त बनाया गया. कंपनी के खिलाफ पीएनडीटी एक्ट की धारा-22 के उल्लंघन के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया. दिल्ली सरकार के परिवार कल्याण विभाग ने मुकदमा दर्ज कराते हुए यह कहा कि यह मामला न सिर्फ पीएनडीटी एक्ट और आईटी एक्ट के उल्लंघन का है बल्कि इससे कन्या भ्रूण हत्या को भी बढ़ावा मिलता है और रिलायंस के इस कदम से समाज में कन्याओं की स्थिति पर आघात हुआ है. विभाग ने अदालत से यह मांग की कि कंपनी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए.

इसके बाद स्पेशल सेल ने मामले की जांच शुरू की. इस मामले में पुलिस द्वारा 4 दिसंबर, 2007 को अदालत में दाखिल आरोप पत्र के मुताबिक – इस आरोप पत्र की एक प्रति तहलका के पास है – 8 अप्रैल, 2005 को रिलायंस इन्फोकॉम के प्रेसिडेंट महेश प्रसाद से पुलिस ने पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल में ही प्लान अ बेबीसेवा की शुरुआत हुई थी. इस सेवा की सामग्री कंपनी के कंज्यूमर एप्लीकेशंस के प्रमुख सुनील जैन की देखरेख में कंपनी की प्रोडक्ट मैनेजर मनीषा राठौर ने तैयार करनी शुरू की थी. बकौल महेश प्रसाद कुछ समय बाद इन दोनों ने कंपनी की नौकरी छोड़ दी और इनकी जगह क्रमशः कृष्ण मोहन दुरबा और किंजल पोपट ने ली और इस सेवा से संबंधित बची हुई सामग्री इन दोनों ने मिलकर तैयार की.

रवि शंकर कुमार ने रिलायंस इंडिया मोबाइल पर गर्भ निर्धारण के लिए उपलब्ध कराई जा रही सेवा के जो वीडियो बनाए थे उन्हें पुलिस ने हैदराबाद की जीईक्यूडी लैब में जांच के लिए भेज दिया. लैब ने जांच करने के बाद वीडियो को सही पाया. इस दरमियान स्पेशल सेल मामले की जांच करती रही और इस मामले से जुड़े विभिन्न पक्षों से सवाल-जवाब करती रही. शुरुआत में इस मामले की जांच खुद स्पेशल सेल के एसीपी एन सेरिंग ने की लेकिन बाद में यह मामला कई सब इंस्पेक्टरों से होता हुआ जनवरी, 2007 में सब इंस्पेक्टर धर्मेंद्र कुमार के पास पहुंच गया. धर्मेंद्र कुमार ने कृष्ण मोहन दुरबा और किंजल पोपट से पूछताछ की और दोनों ने माना कि यह सेवा उनके कार्यकाल में शुरू हुई थी. रिलायंस की इस सेवा के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने का काम बेंगलुरु की कंपनी वेरिटी टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी ने किया था. इसके बाद स्पेशल सेल ने वेरिटी से वे सारे दस्तावेज और ईमेल जब्त किए जो रिलायंस से इस कंपनी को भेजे गए थे और प्लान अ बेबीसेवा से संबंधित थे.

मगर तीस हजारी कोर्ट में दाखिल किए गए इस आरोप पत्र से यह भी साफ हो जाता है कि पुलिस इस मामले में सिर्फ प्यादों पर निशाना साध रही है. इसमें न तो रिलायंस इन्फोकॉम के उस वक्त के मुख्य प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी का नाम शामिल है और न ही कंपनी का. मामले में कंपनी के पांच अधिकारियों और सॉफ्टवेयर मुहैया कराने वाली कंपनी के दो अधिकारियों को ही आरोपित बनाया गया है. इस बारे में रवि शंकर कुमार कहते हैं, ‘इससे साफ है कि पुलिस कंपनी और कंपनी के मालिक को बचाना चाहती है. यह सच है कि जिन अधिकारियों को आरोपितों की सूची में डाला गया है वे रिलायंस के इस अपराध के गुनहगार हैं. लेकिन कंपनी कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि ऐसे अपराध में सिर्फ अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर न तो कंपनी का मालिक पल्ला झाड़ सकता है और न ही कंपनी.जिन अधिकारियों के नाम आरोप पत्र में हैंउनमें महेश प्रसाद, कृष्ण मोहन दुरबा, सुनील जैन, मनीषा राठौर, किंजल पोपट और वेरिटी टेक्नोलॉजीज के ऋषित झुनझुनवाला और रवि चंद्रा एन शामिल हैं. इनके खिलाफ न सिर्फ पीएनडीटी एक्ट के तहत आरोप तय किया गया बल्कि भारतीय दंड संहिता की धारा 420/511 में भी आरोप तय किए गए. इस आरोप पत्र में पुलिस ने अदालत को यह बताया था कि सुनील जैन और मनीषा राठौर से पूछताछ नहीं हो पाई है क्योंकि दोनों देश से बाहर हैं. इसके बाद अदालत के निर्देश पर पुलिस ने मनीषा राठौर से पूछताछ की और उनके खिलाफ अलग से एक आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया. सुनिल जैन के खिलाफ भी तीस हजारी कोर्ट में एक आरोप पत्र दाखिल किया गया.

पिछले तकरीबन साढ़े सात साल से इस मामले में अदालत से तारीखें मिलती जा रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई न तो किसी अधिकारी के खिलाफ हो पाई और न ही कंपनी के खिलाफ. इस मामले की आखिरी सुनवाई बीते 26 जुलाई को हुई थी और अगली सुनवाई 27 सितंबर, 2012 को होनी है. रवि शंकर कुमार कहते हैं, ‘यह मामला बताता है कि कन्या भ्रूण हत्या को लेकर हमारी व्यवस्था कितनी गंभीर है. एक तरफ तो सरकार इसके खिलाफ कई तरह के अभियान चलाती है लेकिन जब रिलायंस जैसी देश की एक बड़ी कंपनी पैसे कमाने के लिए इसको बढ़ावा देने वाली सेवा मुहैया कराती है तो उसे बचाने में पूरा तंत्र लग जाता है.’

रिलायंस और मुकेश अंबानी को बचाने में पूरा तंत्र कैसे लग गया, यह बताते हुए वे कहते हैं, ‘रिलायंस जो सेवा मुहैया करा रही थी वह आईटी एक्ट की धारा 67 का उल्लंघन है. इसमें पांच साल तक की कैद का प्रावधान है. लेकिन इस मामले में रिलायंस के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत मुकदमा ही नहीं दर्ज किया गया. साथ ही ऐसे मामले की जांच डीएसपी से नीचे के स्तर का अधिकारी नहीं कर सकता, लेकिन इस मामले की जांच सब इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों ने ही की है. इससे पता चलता है कि पूरा तंत्र किस तरह से रिलायंस और मुकेश अंबानी को बचाने में लगा हुआ है.’ रवि शंकर कुमार कहते हैं, ‘अगर इस मामले में सिर्फ अधिकारियों को सजा होती है तो इससे समाज में यह संदेश जाएगा कि यह व्यवस्था ताकतवर लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकती. यह सीधे तौर पर आपराधिक षडयंत्र का मामला है और पीएनडीटी एक्ट का इससे बड़ा उल्लंघन देश में इसके पहले कभी नहीं हुआ है.

'पार्टी बनाने का विचार अन्नाजी का था' – अरविंद केजरीवाल

आम धारणा है कि अरविंद केजरीवाल राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते थे जबकि अन्ना हजारे हमेशा इसका विरोध करते रहे. अन्ना से अलग होने के बाद पहली बार एक विस्तृत साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल, अतुल चौरसिया को बता रहे हैं कि यह सही नहीं है

बमुश्किल साढ़े पांच फुट कद वाले अरविंद केजरीवाल से मिलना कहीं से भी संकेत नहीं देता कि यही शख्स बीते दो सालों में कई बार कई-कई दिनों के लिए ताकतवर भारतीय राजव्यवस्था की आंखों की नींद उड़ा चुका है. जब तक अरविंद किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात न करें , उनके साधारण चेहरे-पहनावे और तौर-तरीकों को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि वे कभी इन्कम टैक्स कमिश्नर थे, देश में आरटीआई कानून लाने में उनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका थी. पिछले साल देश के एक-एक व्यक्ति की जुबान पर उनका नाम था और यही व्यक्ति देश को एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था देने के सपने खुद भी देखता है और औरों को भी दिखाता है. अरविंद की घिसी मोहरी वाली पैंट, साइज से थोड़ी ढीली शर्ट और पैरों में पड़ी साधारण फ्लोटर सैंडलें उस आम आदमी की याद दिलाती हंै जो हमारे गांव- कस्बों और गली-कूचों में प्रचुरता में मौजूद है.

अरविंद से बातचीत करना भी उतनी ही सहजता का अहसास कराता है. अर्थ और कानून जैसे जटिल विषय को जिस सरलता से वे आम आदमी को समझाते हैं उससे उनके असाधारण हुनर का कुछ अंदाजा मिलता है. उनके हर आह्वान पर जब सैंकड़ों युवा गुरिल्ला शैली में केंद्रीय दिल्ली की सड़कों पर निकल पड़ते है तब उनकी जबरदस्त संगठन क्षमता का भी दर्शन होता है. उनके साथ थोड़ा अधिक समय बिताने पर एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जिसकी देशभक्ति और ईमानदारी तमाम संदेहों से परे हो.

लेकिन उन पर ये आरोप भी लगते रहे हैं कि उन्होंने अन्ना का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए किया. हालांकि अरविंद अपने राजनीतिक जुड़ाव को आंदोलन की तार्किक परिणति मानते हैं, मगर उनके और उनके इस कदम के विरोधियों का मानना है कि उनकी तो शुरुआत से ही यही मंशा थी. अरविंद सवाल करते हैं कि यही लोग पहले हमें संघ और भाजपा का मुखौटा कहते थे और अब राजनीतिक महत्वाकांक्षी कह रहे हैं. तो वे लोग पहले यह तय कर लें कि वे किस बात पर कायम रहना चाहते हैं.

एक समाजसेवी के रूप में अन्ना की प्रतिष्ठा ज्यादातर महाराष्ट्र तक ही सीमित थी. आज अगर अन्ना देश के घर-घर में पहुंचे हैं तो इसके पीछे अरविंद केजरीवाल की भूमिका बहुत बड़ी रही है. आज अन्ना और अरविंद के रास्ते अलग हो चुके हैं. अन्ना ने खुद को राजनीति से दूर रखने और साथ ही अपना नाम और फोटो राजनीति के लिए इस्तेमाल नहीं करने देने के संकल्प का एलान कर दिया है. इतने बड़े झटके के बाद भी तहलका से हुई पहली विस्तृत बातचीत में अरविंद के उत्साह में किसी भी कमी के दर्शन नहीं होते, न ही लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण में कोई कमी समझ में आती है. अन्ना के साथ रिश्तों की ऊंच-नीच, उन पर लग रहे विभिन्न आरोपों, राजनीतिक पार्टी और उसके भविष्य पर अरविंद केजरीवाल के साथ बातचीत

राजनीतिक पार्टी ही आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए क्यों जरूरी है?

हम लोगों के पास चारा ही क्या बचा था. सब कुछ करके देख लिया, हाथ जोड़कर देख लिया, गिड़गिड़ाकर देख लिया, धरने करके देख लिया, अनशन करके देख लिया, खुद को भूखा मारकर देख लिया. दूसरी बात है कि देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमें हम क्या कर सकते हैं. कोयला बेच दिया, लोहा बेच दिया, पूरा गोवा आयरन ओर से खाली हो गया, बेल्लारी खाली हो गया. उड़ीसा में खदानों की खुलेआम चोरी चल रही है. महंगाई की कोई सीमा नहीं है, इस देश में डीजल-पेट्रोल की कीमतें आसमान पर हैं. कहने का अर्थ है कि हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है. व्यवस्था में परिवर्तन लाए बिना यहां कोई बदलाव ला पाना संभव नहीं है.

पर कहा यह जा रहा है कि आपने जुलाई से काफी पहले ही राजनीतिक पार्टी बनाने का मन बना लिया था. जुलाई का अनशन जिसमें आप भी भूख हड़ताल पर बैठे थे- एक तरह से स्टेज मैनेज्ड था. आप राजनीतिक दल की घोषणा करने से पहले जनता को इकट्ठा करना चाहते थे. और फिर आपने राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी.

किसने आपसे कहा कि हमने पहले ही राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला कर लिया था?

टीम के ही कई लोगों का यह कहना है. बाद में आपसे अलग हो गए लोग भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जनवरी में पालमपुर में हुई आईएसी की वर्कशॉप में ही चुनावी राजनीति में उतरने का फैसला कर लिया गया था.

ये सब झूठ है. पालमपुर की वर्कशॉप जनवरी में नहीं बल्कि मार्च में हुई थी. ये सच है कि 29 जनवरी को पहली बार पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का विषय हमारी बैठक में सामने आया था. इसके चर्चा में आने की वजह यह थी कि उसी समय पुण्य प्रसून वाजपेयी अन्ना से मिले थे. अन्ना उस समय अस्पताल में भर्ती थे. अस्पताल में ही दोनों के बीच दो घंटे लंबी बातचीत चली थी. मैं उस मीटिंग में नहीं था. पुण्य प्रसून ने ही अन्ना को इस बात के लिए राजी किया था कि यह आंदोलन सड़क के जरिए जितनी सफलता हासिल कर सकता था उतनी इसने कर ली है. अब इसे जिंदा रखने के लिए इसे राजनीतिक रूप देना ही पड़ेगा वरना यह आंदोलन यहीं खत्म हो जाएगा. अन्ना को प्रसून की बात पसंद आई थी. मीटिंग के बाद उन्होंने मुझे बुलाया. उन्होंने मुझसे कहा कि प्रसून जो कह रहे हैं वह बात ठीक लगती है. बल्कि हम दोनों ने तो मिलकर पार्टी का नाम भी सोच लिया है – भ्रष्टाचार मुक्त भारत, पार्टी का नाम होगा. फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हें क्या लगता है. मेरे लिए यह थोड़ा-सा चौंकाने वाली बात थी. मैं तुरंत कोई फैसला नहीं कर पाया. तो मैंने अन्ना से कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिए. मैं सोचकर बताऊंगा. दो-तीन दिन तक सोचने के बाद मैंने अन्ना से कहा कि आप जो कह रहे हैं मेरे ख्याल से वह ठीक है. हमें चुनावी राजनीति के बारे में सोचना चाहिए. उसी समय पहली बार इसकी चर्चा हुई. उसके बाद अन्ना तमाम लोगों से मिले और उन्होंने इस संबंध में उन लोगों से विचार-विमर्श भी किया. तो राजनीतिक विकल्प की चर्चा तो चल ही रही थी लेकिन जो लोग यह कह रहे हैं कि पहले से फैसला कर लिया गया था और हमारा अनशन मैच फिक्सिंग था वह गलत बात है. अगर यह मैच फिक्सिंग होती तो इसे दस दिन तक खींचने की क्या जरूरत थी. मैं तो शुगर का मरीज था. मेरे पास तो अच्छा बहाना था. दो दिन बाद ही मैं डॉक्टरों से मिलकर अनशन खत्म कर देता. दो दिन बाद मैं एक नाटक कर देता कि मेरी तबीयत खराब हो गई है और मैं अस्पताल में भर्ती हो जाता और हम राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर देते.

आप कह रहे हैं कि राजनीतिक दल बनाने का प्रस्ताव अन्ना का था. खुद अन्ना ने भी मंच से कई बार यह बात कही थी कि हम राजनीतिक विकल्प देने पर विचार करेंगे. और अब अन्ना मुकर गए हैं. तो क्या आप इसे इस तरह से देखते हैं कि अन्ना ने धोखा दिया है आपको?

मैं इसे धोखा तो नहीं कहूंगा लेकिन उनके विचार तो निश्चित तौर पर बदल गए हैं. अब वे क्यूं बदले हैं इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है. देखिए, धोखा कोई नहीं देता. इतने बड़े आदमी हैं अन्ना तो मैं इसे धोखा तो नहीं कहूगा. पर उनके विचार क्यों बदले हैं इस बात का जवाब मेरे पास नहीं है न ही उनके मन बदलने का कोई मेरे पास सबूत है. 19 तारीख को कंस्टीट्यूशन क्लब में जो बैठक हुई थी उसमें हम सबने यही तो कहा उनसे कि अन्ना आप ही तो सबसे पहले कहते थे कि हम राजनीतिक पार्टी बनाएंगे तो अब यह बदलाव क्यों. तो उनका जवाब था कि पहले मैं वह कह रहा था अब यह कह रहा हूं. जब पहले मेरी बात मान ली थी तो अब भी मान लो. उनके विचार तो बदल गए हैं इस दौरान, चाहे वे मानें या न मानें.

आप भी हमेशा कहते थे कि जो अन्ना कहेंगे हम वह मान लेंगे. तो अब आप ही उनकी बात क्यों नहीं मान लेते, यह मनमुटाव क्यों?

मैं आपकी बात से सहमत हूं. मैंने कहा था कि अगर अन्ना कहेंगे कि पार्टी मत बनाओ तो मैं मान जाऊंगा. अब मेरे सामने यह धर्म संकट है. मुझे लगता था कि अन्ना पूरा मन बना कर ही राजनीतिक विकल्प की बात कर रहे हैं. और फिर उन्होंने अपना मन बदल दिया. मैं धर्मसंकट में फंस गया हूं. एक तरफ मेरा देश है दूसरी तरफ अन्ना हैं. दोनों में से मैं किसको चुनूं. तो मेरे पास कोई विकल्प नहीं बचा है सिवाय इसमें कूदने के क्योंकि मेरे सामने सवाल है कि भारत बचेगा या नहीं. जिस तरह की लूट यहां मची है संसाधनों की उसे देखते हुए पांच-सात साल बाद कुछ बचेगा भी या नहीं यही डर बना हुआ है.

एक समय था, अरविंद जी जब आप कहते थे कि मैं अन्ना को सिर्फ दफ्तरी सहायता मुहैया करवाता हूं, नेता तो अन्ना ही हैं. फिर आप यह भी कहते रहे कि अन्ना अगर कहेंगे तो मैं राजनीतिक पार्टी नहीं बनाऊंगा. और अब आप अलगाव और राजनीतिक  पार्टी की जिद पर अड़ गए हैं. क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि यह सिर्फ आपकी महत्वाकांक्षा के चलते हो रहा है?

किस चीज की महत्वाकांक्षा?

राजनीतिक सत्ता की महत्वाकांक्षा.

लोग किसलिए राजनीति में जाते हैं. सत्ता से पैसा और पैसा से सत्ता. अगर पैसा ही कमाना होता मुझे तो इनकम टैक्स कमिश्नर की नौकरी क्या बुरी थी मेरे लिए. एक कमिश्नर एक एमपी से तो ज्यादा ही कमा लेता है. अगर सत्ता का ही लोभ होता तो कमिश्नर की नौकरी छोड़ पाना बहुत मुश्किल होता मेरे लिए. आप सोचिए कि सत्ता का मोह होता तो इस तरह की नौकरी छोड़ पाने की मानसिकता मैं कभी बना पाता? कुछ लोगों का कहना है कि आपने तो शुरू से ही राजनीति में आने का तय कर रखा था. ये बड़ी दिलचस्प बात है. 2010 के सितंबर में मैंने जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार किया, फिर मैंने सोचा कि अब मैं इन-इन लोगों को एक साथ लाऊंगा, फिर अन्ना से संपर्क करूंगा, फिर अन्ना चार अप्रैल को अनशन पर बैठेंगे, फिर खूब भीड़ आ जाएगी और फिर संयुक्त मसौदा समिति बनेगी जो बाद में हमे धोखा देगी और फिर उसके बाद अगस्त का आंदोलन होगा जिसमें पूरा देश जाग जाएगा, और फिर संसद तीन प्रस्ताव पारित करेगी, फिर संसद भी धोखा दे देगी, और फिर मैं राजनीतिक पार्टी बना लूंगा. काश कि मैं अगले तीन साल के लिए इतनी रणनीति बना पाऊं.

आप लोगों ने एक सर्वेक्षण की आड़ में राजनीतिक दल की जरूरत को स्थापित करने की कोशिश की. पर उस सर्वेक्षण की अहमियत क्या है? न तो उसका कोई वैज्ञानिक आधार है न ही सैंपल का क्राइटेरिया है. अस्सी फीसदी लोगों ने दल का समर्थन किया है. जब तक हम सैंपल, एज ग्रुप, विविध समुदायों की बात नहीं करेंगे तब तक इसकी क्या अहमियत है? किसी खास सैंपल ग्रुप में हो सकता है कि सारे लोग नक्सलियों को सड़क पर खड़ा करके गोली मारने के पक्षधर हों, या फिर सारे लोग समुदाय विशेष को देश से निकाल देने के पक्षधर हों ऐसे में आपका सर्वेक्षण कोई वैज्ञानिक आधार रखता है?

दो चीजें आपके प्रश्न में हैं. एक तो ये कहना कि जो लोग इस आंदोलन से जुड़े थे वे इस मानसिकता के थे या उस मानसिकता के थे. मैं इस बात से सहमत नहीं हूं. ये सारे लोग इसी देश का हिस्सा हैं. इस देश के लोगों को इस तरह से बांटना ठीक नहीं है. दूसरी बात जो आप कह रहे हैं मैं उससे सहमत हूं कि सर्वे इसी तरह से होते हैं. तमाम लोग सर्वे करवाते हैं. हर सर्वे किसी न किसी सैंपल पर आधारित होता है. अब यह आप पर निर्भर है कि आप उसे तवज्जो देना चाहते हैं या नहीं. उस सर्वे के आधार पर आप कोई निर्णय लेना चाहें या न लेना चाहें यह आपके ऊपर निर्भर है. यह तो अन्ना जी ने ही कहा था कि एक बार सर्वे करवा कर जनता का मिजाज जान लेते हैं. देखते हैं वह क्या सोचती है. उनके कहने पर हम लोगों ने सर्वे करवाया. अन्नाजी ने ही कहा था कि इस विधि से सर्वे करवाया जाए. हमने उसी तरीके से सर्वे करवाया. लेकिन उस सर्वे के बावजूद अन्नाजी ने अपना निर्णय इसके खिलाफ दिया. ये यही दिखाता है कि सर्वे आप करवाकर लोगों का मिजाज भांप सकते हैं फिर निर्णय आप अपना ले लीजिए. उस सर्वे ने हमारे निर्णय को प्रभावित किया हो ऐसा मुझे नहीं लगता, लेकिन सर्वे आपको एक मोटी-मोटा आइडिया तो देता है.

ये बात बार-बार आ रही है कि चुनावी विकल्प का इनीशिएटिव अन्ना का था…

इनीशिएटिव अन्ना का था,  लेकिन बाद में वे ही पीछे हट गए.

हम इसको कैसे देखें… 19 तारीख की बैठक के बाद आपकी इस संबंध में फिर से अन्ना से कोई बात हुई?

उसके बाद तो कोई बात नहीं हुई लेकिन उसके पहले मैं लगातार उनके संपर्क में था. लेकिन उनके निर्णय की वजह क्या रही मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूं.

दोनो व्यक्ति मिलकर एक-दूसरे को संपूर्ण बनाते थे. अरविंद की संगठन और नेतृत्व क्षमता और अन्ना की भीड़ को खींच लाने की काबिलियत मिलकर दोनों को संपूर्णता प्रदान करती थी. उनके जाने से इस पर कितना असर पड़ा है? इस नुकसान को कैसे भरेंगे?

अन्नाजी के जाने से नुकसान तो हुआ ही है. इस पर कोई दो राय नहीं है.

कोई संभावना शेष बची है अन्ना के आपसे दुबारा जुड़ने की..

बिल्कुल. अन्ना एक देशभक्त व्यक्ति हैं. देश के लिए जो भी अच्छा काम होता है अन्नाजी उसका समर्थन जरूर करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है.

हमारी राजनीतिक व्यवस्था में धनबल और बाहुबल का बहुत महत्व रहता है. उससे निपटने का कोई वैकल्पिक तरीका है आपके पास या फिर उन्हीं रास्तों पर चल पड़ेंगे?

नहीं. उसी को तो बदलने के लिए हम राजनीति में जा रहे हैं. आज की जो राजनीति है वही तो सारी समस्या की जड़ है. आज हमारे सरकारी स्कूल ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं मिलतीं, सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारी राजनीति खराब है. बिजली, पानी, सड़कें ये सब इस अक्षम राजनीति की वजह से ही आज तक खराब बनी हुई हैं. यह तो भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है. पैसे और बाहुबल का जोर है. उसी को बदलने के लिए हम राजनीति में जा रहे हैं.

तो तरीका क्या है? क्योंकि पैसे के बिना तो इतने बड़े देश में आप राजनीति नहीं कर पाएंगे, यह सच्चाई है.

इधर बीच मुझसे कई ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने कम से कम पैसे में चुनाव जीतकर दिखाया है. उन लोगों से हम उनके तरीकों पर विचार करेंगे और उन्हें अपनाने की कोशिश करेंगे.

जैसे… कौन लोग हैं?

जैसे बिहार के विधायक हैं सोम प्रकाश. उन्होंने सिर्फ सवा लाख रुपये खर्च करके चुनाव जीता था. और यह पैसा भी वहां के स्थानीय लोगों ने ही इकट्ठा किया था. ऐसे कई लोग आजकल मुझसे मिल रहे हैं देश भर से. बाला नाम का एक लड़का है जिसने अमेरिका से वापस आकर जिला परिषद का चुनाव जीता है. उसके पास भी पैसा नहीं था. पर उसने जीतकर दिखाया है. ये लोग हमसे जुड़ भी रहे हैं.

तो उम्मीदवारों के चयन की क्या प्रक्रिया होगी? इसी तरह के लोग जुटाए जाएंगे?

हम लोग कई सारे मॉडलों का अध्ययन कर रहे हैं. बहुत सारे सुझाव लोगों की तरफ से भी आए हैं. यह कोई पार्टी नहीं है, यह इस देश के लोगों का सपना है. हमने लोगों से पूछा कि इसका नाम क्या होना चाहिए, उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए, पार्टी का एजेंडा क्या होना चाहिए आदि. बीस हजार लोगों ने हमें चिट्ठियां भेजी हैं. भारत सरकार ने जब जन लोकपाल बिल पर लोगों से सुझाव मांगे थे तब तेरह हजार सुझाव आए थे. तब सरकार ने अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन भी दिए थे. हमारे पास कोई विज्ञापन मशीनरी नहीं है सिर्फ जुबानी आह्वान पर बीस हजार से ज्यादा सुझाव लोगों के आ गए. ये दिखाता है कि जनता के भीतर इसको लेकर कितना उत्साह है. इन सभी सुझावों को संकलित करके हमने कुछ ड्राफ्ट तैयार किए हैं. दो अक्टूबर को हम यह पहला ड्राफ्ट जनता के सामने रखेंगे. यह एक तरह से पहला ड्राफ्ट होगा जिसे आगे फाइन ट्यून किया जाएगा लोगों के सुझाव के आधार पर.

बार-बार ड्राफ्टिंग-रीड्राफ्टिंग से जनता का उत्साह कम नहीं हो जाएगा? यह हमने जन लोकपाल की ड्राफ्टिंग के समय भी देखा था.

जनता तो इसमें इंटरेस्ट ले रही है. जितनी बार हम उनसे राय मांगते हैं, लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. जनता तो नीतियों के बनाने में हिस्सेदारी चाहती है.

पार्टियों के साथ हमने देखा है कि जब चुनाव सिर पर आते हैं तब वे सभी विचारधारा को त्याग कर जाति-धर्म और समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार चुनती हैं. ये समस्या आपके सामने भी आएगी. तो इससे निपटने का क्या तरीका होगा आपके पास?

देखिए, जब जन चेतना जागती है तब बहुत सारी दीवारें टूटती हैं. जैसे पिछली बार जब अगस्त का आंदोलन चल रहा था तब मुझसे दिल्ली पुलिस का एक कांस्टेबल मिला. उसने मुझे बताया कि मैं पिछले 16 साल से रिश्वत ले रहा था लेकिन पिछले दस दिन से मैंने रिश्वत नहीं ली है. जितने आनंद का अनुभव मैंने इन दस दिनों में किया है वह पहले कभी नहीं किया था. उसके भीतर से ही चेतना जागी. गुड़गांव में एक अल्टो गाड़ी डेढ़ साल पहले चोरी हो गई थी. उस पर अन्ना का स्टीकर चिपका हुआ था. इस बार जुलाई में जब हम अनशन कर रहे थे तब उस व्यक्ति ने कार एक थाने के पास ले जाकर छोड़ दी. उसने कार पर एक चिट लगाकर छोड़ दी कि अन्ना की गाड़ी अन्ना को मुबारक. जब जन चेतना जागती है तब यह धर्म-जाति की सारी दीवारें तोड़ देती है. मुझे विश्वास है कि भारत में वह समय आ गया है. ये वर्जनाएं धीरे-धीरे टूटेंगी.

चुनाव से पहले या बाद में किसी राजनीतिक पार्टी से गठबंधन करेंगे?

कभी नहीं.

किरण बेदी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. शुरुआत से ही वे साथ रही हैं. अब लग रहा है कि वे दुविधा में हैं. अन्ना के साथ भी दिखना चाहती हैं और आईएसी के साथ भी.

उनकी क्या योजनाएं है ये तो उनसे ही पूछना पड़ेगा. इस बारे में वही बता पाएंगी. उनके मन की दुविधा को मैं नहीं समझ सकता हूं.

दुविधा में हैं वो…

निश्चित तौर पर दुविधा में तो हैं. पर उनके प्रश्न आप उन्हीं से पूछें.

आप लोग लंबे समय से साथ रहे हैं, बातचीत के स्तर पर, कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी के स्तर पर आप उन्हें किस दशा में पाते हैं. कुछ तो संकेत मिल रहा होगा..

मैं कैसे बाताऊं उनके मन की बात.

तो मैं ये मान लूं कि पहले वाली गरमाहट रिश्तों में नहीं रही?

यह बात तो साफ ही है कि वे राजनीतिक विकल्प के साथ नहीं जुड़ना चाहती. उनके अपने कारण हैं उसके लिए. मैं क्या कहूं.

किरण और अन्ना के अलावा सारे लोग आपकी राय से सहमत हैं...

सारे लोग.

शिवेंद्र सिंह चौहान (जिन्होंने फेसबुक पर पहली बार इंडिया अगेंस्ट करप्शन का पन्ना तैयार किया था) आंदोलन के शुरुआती लोगों में से थे. उनसे आपकी किस बात को लेकर तनातनी हो गई?

मुझे कोई आइडिया नहीं है कि शिवेंद्र क्यों नाराज हैं.

आपने उन्हें मनाने की कोशिश की…

मैंने कई बार कोशिश की.

कोई नाम सोचा है आपने अपनी पार्टी का?

अभी तो कोई नहीं.

अगली गतिविधि क्या होगी?

दो अक्टूबर से पहले 29 सितंबर को एक बार दिल्ली के सारे वॉलेंटियर्स की एक बैठक होगी. यह छोटी सी बैठक है.

जब आप राजनीति में उतरेंगे तो सिर्फ भ्रष्टाचार के ऊपर तो राजनीति नहीं होगी. तब आपको कश्मीर से लेकर नक्सलवाद और अयोध्या विवाद जैसे मुद्दों पर एक स्पष्ट राय रखनी पड़ेगी. जो लोग आपका राजनीति में उतरने का समर्थन करते हैं, वही लोग प्रशांत जी के कश्मीर पर विचार का विरोध करते हैं. इनसे कैसे निपटेंगे?

सारे लोग मिलकर बातचीत के जरिए यह बात तय करेंगे. चार लोग बैठकर पूरे देश की नीति तय कर देते हैं. ऐसे ही तो यहां राजनीतिक पार्टियां काम करती हैं. हम सबके साथ बैठकर बात करेंगे कि आखिर देश क्या चाहता है. हम एक ऐसा मंच तैयार करना चाहते हैं जहां सारे लोग बैठकर आपस में मुद्दे सुलझा सकें. किसी मुद्दे पर अगर समाज दो हिस्सों में बंटा है तो उस पर चर्चा होनी चाहिए.

देश का जो मौजूदा राजनीतिक संकट है और जिस तरह की अवसरवादी राजनीति हो रही हैं उस पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?

हम यही तो कह रहे हैं कि सब के सब एक जैसे ही हैं. पर्याय कौन देगा. पर्याय हमारे आपके बीच से ही तो कोई देगा. आप किसी के ऊपर भरोसा नहीं करेंगे तो कैसे काम चलेगा. और जब हम पर्याय देने की बात करते हैं तब लोग कहते हैं कि महत्वाकांक्षी हो गया है. मेरा सवाल है कि देश को पर्याय कहां से मिलेगा और देश के सामने उम्मीद क्या बची है. जो रवैया है राजनीतिक पार्टियों का उससे यह देश बर्बाद नहीं हो जाएगा कुछ दिनों में?

राजनीतिक विकल्प आ जाने के बाद भी क्या आंदोलन किसी रूप में बचा रहेगा या फिर यह खत्म हो जाएगा? और अगर रहेगा तो इसका स्वरूप क्या होगा?

यह आंदोलन ही रहेगा पार्टी नहीं बनेगा. पहले आंदोलन के पास तीन-चार हथियार थे – अनशन एक हथियार था, धरना एक हथियार था, याचिका दायर करना एक हथियार था. अब उसके अंदर राजनीति एक और हथियार जुड़ गया है. मुख्य मकसद आंदोलन ही है, राजनीति एक अतिरिक्त हथियार के तौर पर जुड़ जाएगी.

बाघ अभयारण्यों में प्रतिबंधित पर्यटन

भारत के बाघ अभयारण्यों में पर्यटन को प्रतिबंधित करने से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या है?   

अक्टूबर 2010 के दौरान वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के खिलाफ सभी बाघ अभयारण्यों में जारी पर्यटन पर रोक लगाने की मांग मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से की थी. हाई कोर्ट ने जब अपील खारिज कर दी तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2012 में मध्य प्रदेश के साथ-साथ देश के सभी बाघ अभयारण्यों में कोर और बफर क्षेत्र के नोटिफिकेशन से जुड़ी जानकारी मंगवाई. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उन अभ्यारण्यों को तीन महीने के भीतर कोर और बफर क्षेत्र नोटिफाई करने के आदेश दिए जहां अब तक नोटिफिकेशन नहीं हुआ था. 24 जुलाई, 2012 सुप्रीम कोर्ट ने अभयारण्यों में कोर क्षेत्र नोटिफाई नहीं करने वाले राज्यों पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए सभी बाघ अभयारण्यों में तत्काल प्रभाव से पर्यटन प्रतिबंधित करने का आदेश दिया. मध्य प्रदेश के अलावा आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड पर जुर्माना लगाया गया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मध्य प्रदेश का पन्ना राष्ट्रीय बाघ अभयारण्य क्यों चर्चा में आया?

मध्य प्रदेश में कान्हा, सतपुड़ा, बांधवगढ़, पेंच और संजय टाइगर रिजर्व पहले से ही नोटिफाई हैं. लेकिन मध्य प्रदेश सरकार सिर्फ पन्ना में कोर क्षेत्र घोषित करने से कतरा रही थी. वन्यजीव कार्यकर्ताओं और सुप्रीम कोर्ट के दबाव में नौ अगस्त, 2012 को पन्ना को भी नोटिफाई कर दिया गया. कोर क्षेत्र को चिह्नित किए जाने की धीमी प्रक्रिया पर वन्यजीव कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य सरकार खनन माफिया और रेसोर्ट मालिकों को लाभ पहुंचाने के लिए पन्ना में बफर क्षेत्र नोटिफाई करने से बचती आ रही थी. 

आगे इस मामले से जुड़े अहम मुद्दे क्या होंगे?

22 अगस्त, 2012 को होने वाली इस अगली सुनवाई तक सभी राज्य अपने-अपने प्रदेशों में संचालित वन्य पर्यटन का विस्तृत ब््योरा देने के साथ ही राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण द्वारा निर्धारित गाइड लाइन पर अपनी आपत्तियां दाखिल करेंगे.

-प्रियंका दुबे

राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक

 

इस बार छह पदक हासिल करके भले ही भारत ने ओलंपिक में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो लेकिन तकरीबन सवा अरब आबादी वाले इस देश में बहुतों को यह बात भी अखर रही है कि भारत एक भी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया. एक-एक पदक के लिए भारत के संघर्ष को यहां के खेल संघों के खराब प्रशासन से जोड़कर देखने वालों की संख्या भी कम नहीं है. इस कमी को दूर करने के लिए पिछले तकरीबन दो साल से राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक लाने की कोशिश चल रही है लेकिन खेल संघों की राजनीति इसे आगे नहीं बढ़ने दे रही. 

हालांकि, खेल संगठनों के कामकाज में सुधार के लिए 1989 में भी संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया था. इसमें कहा गया था कि खेलों को राज्य सूची से निकालकर समवर्ती सूची में लाना चाहिए ताकि केंद्र सरकार खेलों को सही ढंग से चलाने का काम कर सके. 2007 में अटॉर्नी जनरल ने यह राय दी थी कि हम खेलों को समवर्ती सूची में लाए बगैर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रतिनिधित्व को आधार बनाकर राष्ट्रीय खेल संघों के लिए कानून बना सकते हैं. इसके बाद 1989 का प्रस्ताव वापस लिया गया और उस समय से खेल मंत्रालय इस नए विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगा है. नया कानून लाने की कोशिश पिछले साल की शुरुआत में तब तेज हुई जब अजय माकन को खेल मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया.

 

  • पिछले साल राष्ट्रीय खेल विकास विधेयक का मसौदा जारी हुआ था
  • कानून बनने पर सभी संगठन आएंगे आरटीआई के दायरे में 
  •  खेल प्रशासन में खिलाड़ियों की 25 फीसदी हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी

 

खेलों के विकास के मकसद से आने वाली इस प्रस्तावित नीति में यह प्रावधान किया गया है कि देश के सभी खेल संगठनों को राष्ट्रीय खेल संगठन के तौर पर नए सिरे से मान्यता लेनी होगी. सभी खेल संगठन सूचना के अधिकार के तहत आएंगे. उन्हें अपने आय-व्यय का ब्योरा देना होगा. यह नीति कई स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने की बात करती है. खेल संघों के प्रशासन में खिलाड़ियों की 25 फीसदी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी. खेल संगठनों के पदाधिकारियों की चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात भी प्रस्तावित विधेयक में की गई है. पदाधिकारियों के लिए 70 साल की उम्र सीमा तय करने की बात भी प्रस्तावित नीति में है. एक स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल बनेगा जहां न सिर्फ खेल संघों के झगड़ों का निपटारा होगा बल्कि खिलाड़ी भी अपनी समस्याएं उठा पाएंगे. 

इस विधेयक का पहला मसौदा पिछले साल फरवरी में जारी किया गया. इसके बाद विभिन्न पक्षों के सुझावों को शामिल करने के बाद एक और मसौदा तैयार हुआ. इसी मसौदे को पिछले साल अगस्त में केंद्रीय कैबिनेट के सामने पेश किया गया. लेकिन वहां से इसे संसद में पेश करने के प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं मिली और इसे वापस खेल मंत्रालय भेज दिया गया. कैबिनेट ने कहा कि इसमें अभी और सुधार की जरूरत है. जानकार बताते हैं कि खेल संघों से संबद्ध नेताओं के दबाव में ऐसा हुआ. कानून का रूप लेने के लिए इस विधेयक के मसौदे को बरास्ते केंद्रीय कैबिनेट संसद के दोनों सदनों से होकर गुजरना होगा.

-हिमांशु शेखर

 

पंजाब का मन'मोहभंग'

पंजाब में 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के नायक रहे मनमोहन सिंह का करिश्मा क्या अब पंजाबी-सिख जनमानस पर धुंधला पड़ रहा है? बृजेश सिंह की रिपोर्ट.

कांग्रेस और पंजाब या यह कहें कि कांग्रेस और सिखों के एक बड़े वर्ग के बीच संबंध बहुत लंबे समय तक तनावपूर्ण और अविश्वास भरे रहे हैं. कई घटनाओं ने इसमें योगदान दिया. जैसे 1960 में सिख बहुमत वाला राज्य बनाने को लेकर चला पंजाबी सूबा आंदोलन जिसे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने तो पहले तो पूरी तरह से नजरअंदाज करने की कोशिश की लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया. इसके बाद भी अलग-अलग मुद्दों को लेकर पंजाब और केंद्र के बीच मौके बेमौके तनातनी चलती रही. इन कड़वाहट भरे संबंधों में भी ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद सिख विरोधी दंगे ऐसी फांस हैं जिसकी तकलीफ आज तक सिख समाज महसूस करता है.

ऐसे में 2004 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद जब सोनिया गांधी ने डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद सौंपा तो इसे सीधे-सीधे कांग्रेस की अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को और निखारने और सिखों के साथ अपने संबंध सुधारने की कोशिश समझा गया. वजह जो भी हो लेकिन मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने से सिख समुदाय के लोग गौरवान्वित थे. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में प्रचारित किया तो इस बात का सबूत भी मिल गया. राज्य की 13 में से 8 सीटों पर उसे जीत मिली जबकि इसके पहले वह सिर्फ दो सीटें  जीत पाई थी. जानकारों के एक वर्ग ने इसे सरदार मनमोहन सिंह के प्रभाव के रूप में देखा. लेकिन समय बढ़ने के साथ चीजें बदलती चली गईं. 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को राज्य में हार का मुंह देखना पड़ा और इसके साथ ही यह सवाल उठने लगा कि क्या मनमोहन सिंह का जादू यहां के पंजाबी-सिख जनमानस से उतर गया? 

हमने जब पंजाब के आम सिखों से इस बारे में बात की तो हमें इस सवाल का जवाब हां में ही मिला. हालांकि कोयला घोटाले में नाम आने के बावजूद ज्यादातर लोग अब भी उन्हें ईमानदार मानते हैं. जालंधर में टूर एंड ट्रैवल्स का व्यवसाय करने वाले जगदीप बरार कहते हैं, ‘ सबको पता है कि सोनिया गांधी जो कहती हैं मनमोहन सिंह वही करते हैं. फिर भी हमें इस बात का संतोष है कि वे ईमानदार हैं. ‘   

जानकारों का एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि यूपीए सरकार में एक के बाद एक घोटाले सामने आने से प्रधानमंत्री की छवि काफी खराब हुई है. इस बात के समर्थन में वे तथ्य रखते हैं कि 2012 के विधानसभा चुनाव के समय जब अमृतसर में प्रधानमंत्री की सभा हुई तो उन्हें सुनने के लिए लोग ही नहीं आए. आधे से अधिक कुर्सियां खाली पड़ी थीं. ऐसा इसलिए हुआ कि सिख समुदाय के बीच अब वे गर्व का विषय नहीं थे. लोगों की इस ठंडी प्रतिक्रिया का नतीजा यह हुआ कि उनकी दूसरी सभा रद्द कर दी गई. 

हालांकि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में आई गिरावट के लिए कुछ लोग यूपीए-2 के प्रदर्शन के अलावा अन्य कारणों को भी जिम्मेदार मानते हैं. पंजाब विश्वविद्यालय (जिससे मनमोहन सिंह का बतौर छात्र और शिक्षक दोनों नाता रहा है) में समाजशास्त्र के प्रोफेसर मंजीत सिंह कहते हैं, ‘ अगर सिर्फ राज्य, धर्म, दाढ़ी और पगड़ी के समान होने के आधार पर कोई यह कहे कि मनमोहन सिंह का पंजाब और यहां के सिखों से गहरा संबंध रहा है तो फिर वह कह सकता है लेकिन हकीकत में उनका कभी भी पंजाब और यहां के लोगों से कोई जीवंत संबंध या संपर्क नहीं रहा.’  कुछ लोगों की यह भी शिकायत है कि प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने कभी आगे बढ़कर पंजाब के लिए कुछ नहीं किया. अमृतसर रह रहे 45 वर्षीय रंगकर्मी केवल धालीवाल शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘ राज्य में लोगों को उम्मीद थी कि उनके यहां का आदमी प्रधानमंत्री बना है तो उनके लिए कुछ तो करेगा लेकिन पंजाब को छोड़िए अपने गृहनगर अमृतसर के लिए भी उन्होंने कुछ नहीं किया. हमें लगता था कि वे पंजाब के लिए आर्थिक स्तर पर ऐसी सहूलियतें देंगे जिससे राज्य की हालत सुधरेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ‘ 

राज्य में आम लोगों की यह भी राय है कि प्रधानमंत्री ने अब तक पंजाब या सिखों से संबंधित किसी विषय पर अपनी तरफ से पहल नहीं की. वह चाहे सदन में सिखों की शादी के पंजीयन से संबंधित आनंद मैरेज एक्ट पास होने की बात हो या फिर सिख धर्म को हिंदू धर्म से अलग करते हुए एक स्वतंत्र धर्म के रूप में स्थापित करने वाला संविधान संशोधन जैसा मामला. अंग्रेजी अखबार डीएनए के ब्यूरो चीफ अजय भारद्वाज के मुताबिक ये शिकायतें भी आखिरकार यही बताती हैं कि मनमोहन सिंह का पंजाब से जुड़ाव औपचारिक ही है. वे कहते हैं, ‘ जो व्यक्ति अपने राज्य से चुनाव नहीं लड़ता और राज्यसभा भी जाता है तो असम से. ऐसे में आप उनके जुड़ाव को भावुक कैसे मानें.’

लेकिन क्या पंजाब के लोगों की उनसे कभी कोई उम्मीद रही? इस सवाल के जवाब में मंजीत कहते हैं, ‘जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया था तो यहां के लोग बहुत प्रसन्न हुए थे कि चलो हमारी कौम से एक व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बना है, जो मेहनती, गैरविवादित, विनम्र और ईमानदार है लेकिन इससे अधिक उनसे यहां के लोगों का जुड़ाव नहीं रहा, ना ही लोगों ने उनसे कोई बड़ी उम्मीदें पाल रखी थीं. लोग यह जानते हैं कि सामने वाला कांग्रेस पार्टी से जुड़ा है और वही करेगा जो पार्टी कहेगी. लेकिन लोग तब जरूर मनमोहन से नाराज होने लगे जब एक के बाद एक घोटाले सामने आने शुरू हुए.’

सिखों से जुड़े हुए किसी मसले पर अब तक डॉ मनमोहन सिंह ने कोई सबसे बड़ी पहल की है तो वह है 1984  के दंगों के लिए सरकार की तरफ से समुदाय से माफी मांगना. हालांकि प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेता इस पर भी असंतुष्ट हैं. नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘ कम से कम वे यह तो कर ही सकते थे कि उस दंगे में शामिल रहे लोगों को सजा दिलवाने की कोशिश करते. उल्टा 2009 में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटर जैसे लोगों को लोकसभा का टिकट दे दिया. ‘

सिखों के प्रधानमंत्री से जुड़ाव महसूस न कर पाने के एक और रोचक कारण का उल्लेख करते हुए अजय कहते हैं, ‘ मनमोहन सिंह हमेशा अनिर्णय की स्थिति में दिखते हैं. उनकी चुप्पी से यह संदेश जाता है कि वे वही करते हैं जो सोनिया गांधी उनसे करने के लिए कहती हैं. ये सारे लक्षण सरदारों के नहीं होते. सरदारों की छवि आक्रामक होती है. सरदार बेचारा नहीं दिखता, मनमोहन का यह व्यवहार सिखों की पारंपरिक छवि के विपरीत जाता है.’ मोहाली में रह रहे एक किसान अरविंदरजीत सिंह भी इस बात का समर्थन करते हुए कहते हैं, ‘ सोनिया गांधी और सरकार के मंत्रियों ने उन्हें एक पुतले में तब्दील कर दिया. कोई उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम ही नहीं करने देता. कभी उन्हें ममता डरा देती हैं तो कभी कोई और.’

यदि मनमोहन सिंह की छवि पंजाब में इतनी खराब हो गई है तो क्या अगले लोकसभा चुनावों में इसका खामियाजा भी कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है? इस संभावना पर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र कहते हैं, ‘ अभी तो यही तय नहीं है कि अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लड़ेगी या राहुल गांधी के. ‘ हालांकि पार्टी के ही एक और नेता नाम बताने की शर्त पर यह साफ-साफ कहते हैं,  ‘ मनमोहन सिंह की छवि से न तो कांग्रेस को फायदा होने वाला है और न ही नुकसान. बात बहुत आगे निकल गई है. यहां केंद्र सरकार की छवि इतनी खराब हो चुकी है कि अब पार्टी उम्मीदवार ही नहीं चाहेंगे कि उनके प्रचार के लिए केंद्र से कोई आए.’

‘स्त्रीवाद मानव मुक्ति का आंदोलन है’

अनामिका हिंदी की चर्चित कवयित्री हैं. उन्होंने उपन्यास भी लिखे हैं और स्त्रीवादी आलोचना की पुस्तकें भी. वे नियमित तौर पर समसामयिक लेखन भी करती हैं. अनामिका स्त्रीवाद की मुखर पैरोकार हैं. स्त्रीवाद को वे किसी भी ‘अतिवाद’ से अलग करती हैं और स्त्री-पुरुष साहचर्य, सहज संबंध की वकालत करती हैं. उनका कहना है कि पुरुष को ‘महबूब पुरुष’ बनाने का काम स्त्रियों का है. स्त्रीवाद का है. अनामिका की किताब ‘स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष’ भारतीय परिवेश में स्त्रीवादी सैद्धांतिकी की किताब है. इसमें वे स्त्री-पुरुष के सहज संबंध का लक्ष्य स्त्रीवाद के सामने रखती हैं और साथ ही स्त्रियों के बीच ‘वैश्विक सखियापे’ का आदर्श भी.  स्वतंत्र मिश्र से उनकी बातचीत.

आपकी किताब  ‘स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष’  भारतीय परिवेश में स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी को समझने-समझाने की एक पहल है. लेकिन क्या आपको नहीं लगता  कि यहां स्त्रीवाद अंतिम औरत से कट गया है और यह घोर अकादमिकता का शिकार हो गया है?

मध्य वर्ग को मैं एक हाइफन की तरह देखती हूं. वह एक पुल की तरह है. मध्य वर्ग को निम्न वर्ग की दिक्कतें मालूम हैं और उच्च वर्ग का विलसित बिखराव भी. यह सही है कि मध्य वर्ग के पास शिक्षा पहले आई. यह भी सही है कि उसे यह समझने में बहुत समय लग गया कि उसकी तात्विक परेशानियां क्या हैं. अपने ही वर्ग चरित्र से बाहर आने में उसे बहुत समय लग गया. किसी भी सोए हुए को जगने के बाद उठकर बैठने में और फिर दूसरों को जगाने में थोड़ा समय तो लगता ही है. गहरी नींद में सोए व्यक्ति को यह लगता है कि पहले मैं जग जाऊं फिर दूसरे को जगाऊं. यह प्रक्रिया स्वाधीनता आंदोलन के समय से ही शुरू हो गई थी.1920-30 के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों में स्त्रियों को चौकस करने वाली बातें लिखी गई हैं. महादेवी वर्मा ने चांद पत्रिका के अपने संपादकीय में यही सब तो लिखा है. मेरा मानना है कि गरीबी का चेहरा स्त्री का चेहरा है. इसे रूपक की तरह देखना चाहिए कि जो भी वंचित है वह स्त्री है. इसलिए गरीबी से स्त्री कभी कटी नहीं है. पूरी दुनिया में सिर्फ 2.2 फीसदी संपत्ति स्त्रियों के नाम पर है. जो स्त्रियां कमाती हैं, उसे भी वे अपने तरीके से खर्च नहीं कर सकतीं. औरतें साइनिंग अथॉरिटी बनकर रह जाती हैं. इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वे अपनी वंचित सखियों के सुख-दुख से अलग हैं. अकादमिक स्त्रियों के लेखन में यह अलगाव कहीं नहीं दिखेगा. गांधी जी के समकालीन लेखकों और लेखिकाओं का लेखन वंचितों को ही समर्पित है. महादेवी वर्मा का पूरा गद्य वंचितों को ही समर्पित है. आज की महिला साहित्यकारों के लेखन में भी वंचित तबके की औरतों का दर्द दिखाई पड़ता है.
स्त्रियों में आपस में खुलकर बतियाने की एक प्रवृत्ति होती है, इसलिए वे किसी से कटकर रह ही नहीं सकतीं. किसान, दलित, आदिवासी स्त्रियों की कथाएं रिकॉर्ड की जा रही हैं. उनकी कहानियों को आर्काइव का हिस्सा बनाया जा रहा है. डॉ. मीता तिवारी जस्सल की पुस्तक अभी-अभी आई है जिसमें लोक गीतों के स्त्रीवादी रंग का अद्भुत विश्लेषण और अंग्रेजी अनुवाद हुआ है. इसलिए स्त्रीवाद के अंतिम औरत से कटने की जो बात फैलाई जा रही है वह ठीक नहीं है.

कई लेखिकाएं खुद को स्त्रीवादी न कहलवाने का आग्रह करती हैं. क्या यह स्त्रीवाद को अलगाववाद के फ्रेम में देखने का आग्रह तो नहीं है?

शेक्सपियर के किंग लीयर में बूढ़ा पिता अपनी तीनों बेटियों से पूछता है कि तुम लोग मुझे कितना प्यार करती हो. बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खूब ठकुरसुहाती बतियाती हैं. बूढ़े पिता अपनी बेटियों की बात से खुश हो जाते हैं. इन खोखली बातों की असलियत समझ कर छोटी बेटी बड़े-बड़े बोल नहीं बोलती और सपाट ढंग से कहती है, ‘पिता जी मैं आपसे उतना ही प्यार करती हूं जितना मुझे आपसे करना चाहिए. न कम, न ज्यादा.’  कार्डेलीया के इस कथन की त्वरा (टोन) में ही कुछ लेखिकाओं ने ऐसा कहा है कि मैं अब स्त्रीवादी नहीं रही. कृष्णा सोबती, मधु किश्वर और मृदुला गर्ग आदि ने ऐसा कहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें स्त्रीवादी दृष्टिकोण से अलग रखकर देखा जा सकता है. वे पुरुषों के बारे में भी लिखेंगी तो उसमें स्त्री दृष्टि परिलक्षित होगी. जैसे अपनी चमड़ी से छुटकारा नहीं मिल सकता है वैसे ही लेखिकाओं को स्त्रीवादी दृष्टिकोण से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. स्त्रीवाद को संकीर्णता के साथ देखा जा रहा है, जबकि यह तो मानव मुक्ति का आंदोलन है. जो स्त्रियां अपने को स्त्रीवादी नहीं कहलवाना चाहती हैं, उन सबकी भाषा भी स्त्रियों की ही भाषा है. स्त्रीवाद को छोटे फ्रेम में नहीं बल्कि बड़े फ्रेम में देखा जाना चाहिए.

आपने अपनी यह किताब युवा पीढ़ी को समर्पित की है.

जी. मेरी सारी उम्मीद ही युवा पीढ़ी से है क्योंकि पके घड़े पर मिट्टी नहीं चढ़ती. मेरा सारा समय छात्र-छात्राओं, अपने और मोहल्ले के युवा बच्चों के साथ ही गुजरता है. मैंने बीजों की पोटली उन्हीं के लिए ली है. मैं युवाओं की ओर देखती हूं कि उनकी दृष्टि में परिष्कार आया है या नहीं. हमदर्द का भाव पैदा हुआ है या नहीं. मैं हमेशा कहती हूं कि पूर्वाग्रह एक किस्म का मोतियाबिंद है. मोतियाबिंद में जैसे साफ-साफ नहीं दिखाई देता है वैसे ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त नजरें चीजों को ठीक से नहीं देख सकती हैं. जो व्यक्ति अभी देखने को उत्सुक हैं और जो नई भाषा बोलने को उत्सुक हैं, हम तो उनसे ही संवाद करना चाहेंगे. साहित्य पूर्वाग्रहों के मोतियाबिंद की सर्जरी तो करता है फिर भी आंखें होते-होते ही ठीक होती हैं. 
जिस ’सखियापे’  की चर्चा आप इस किताब में और अपने तमाम लेखन में करती हैं, क्या वह विभिन्न जाति, वर्ग और नस्ल की स्त्रियों के शोषण, समस्याओं, चुनौतियों, संघर्षों के एकरूपीकरण का प्रयास नहीं है?
 मैं स्त्रीवाद को मोनोलिथ कतई नहीं मानती हूं. अलग-अलग समस्याएं हैं और उन्हें एक ही लाठी से हांका नहीं जा सकता. वर्ग सापेक्ष  समस्याएं हैं. जाति सापेक्ष समस्याएं हैं. लेकिन स्त्री शरीर स्त्री शोषण की आधारभूमि है– मारपीट, अनचाहा गर्भ, अनिच्छा संभोग, गाली-गलौच, ट्रैफिकिंग, पोर्नोग्राफी, डायन दहन, सती दहन, बलात्कार, भ्रूण हत्या आदि-आदि. स्त्री का पूरा शरीर एक टपकता हुआ घाव हो जाता है जिसे बहुत मान और ध्यान से छूना चाहिए. शारीरिक हिंसा के इन संदर्भों में दलित, गैरदलित स्त्रियों में भेद नहीं है. उनके दुखों की आधारभूमि एक ही है. 

आपने इस किताब में लोक चरित्रों, कहावतों और कथाओं से स्त्रीवाद समझाया है. लेकिन उस लोक से स्त्रीवादी आंदोलन व्यापक स्तर पर कट रहा है. दोनों का एक-दूसरे के प्रति लगाव नहीं रहा. यह शहरों तक ही सीमित रह गया है.

यह अभियोग भी गलत है. कैनॉनिकल (शिष्ट साहित्य) और कोलोनियल (औपनिवेशिक साहित्य) दोनों पर पहला प्रहार  स्त्री-विमर्श ने ही किया. मौखिक साहित्य को सबसे पहले महिलाओं ने तवज्जो दी. लोक गीत, चिट्ठियां, घरेलू बातचीत के सहज मुहावरे सचेतन रूप में स्त्री साहित्य ने दर्ज किए. भाषा का वितान बड़ा किया. अगर स्त्रीवाद इतना संभ्रांतवादी होता तब फिर वह इतने सारे स्रोतों से शब्द नहीं ले पाता. मौखिक साहित्य की तो पूरी बुनियाद ही औरतें हैं.
ऋतु मेनन और उर्वशी बुटालिया ने विभाजन का इतिहास लिखा. बंटवारे के बाद स्त्रियों के दर्द का इतिहास तो पूरा का पूरा मौखिक साहित्य ही है. साक्षात्कार लेना, दादी, नानी की चिट्ठियां उजागर करना, मोहल्ले की स्त्रियों तक जाना- ये पूरी शोध प्रवृत्ति ही विकेंद्रित करने वाली है. ये वर्ग चरित्र से बाहर जाने वाली शोध प्रवृत्ति है.

सुर कल्पना

मूल रूप से असमिया और असम में ही पली-बढ़ी कल्पना पटवारी पर भोजपुरी का रंग कुछ ऐसा चढ़ा कि आज वे भोजपुरीभाषी इलाके के घर-घर में जाना जाने वाला नाम हैं. अनुपमा की रिपोर्ट.

‘लोग मुझे कल्पना नाम से जानते हैं. पूरा नाम है कल्पना पटवारी. असमिया नौटंकी और जतरा के प्रतिष्ठित कलाकार विपिन पटवारी की बेटी हूं. असमी मूल की हूं. पढ़ाई वहीं हुई. शुरू में असमिया में गाया, लेकिन न असमिया फिल्म इंडस्ट्री को मेरी आवाज रास आई और न मैं ही उससे तारतम्य बिठा पाई इसलिए संघर्ष करने मुंबई चली गई. गाने का मौका मिला. कई भाषाओं में गाया, लेकिन भोजपुरी से चोली-दामन वाला रिश्ता बन गया. अब तो वही मेरी पहचान की सबसे बड़ी रेखा है.’ सामने खड़े एक शख्स की ओर इशारा करते हुए कल्पना कहती हैं, ‘ये मेरे पति परवेज हैं. ये भी असम के ही हैं. प्रेम विवाह है हमारा. हाल के दिनों में जिंदगी के सबसे सुखद पल देखने को मिले जब दो जुड़वां बच्चे हमारे घर आए. एक का नाम है अरस्तू,  दूसरे का आर्कमिडीज. अब यह न पूछिएगा कि इतने बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक का नाम रखने की वजह क्या है. कुछ बातें अपरिभाषित भी रहने दीजिए.’ बिना औपचारिक मुलाकात और परिचय के ही कल्पना इतना सब कह जाती हैं. फिर बताती हैं, ‘जानती हैं मैंने इतनी बातें क्यों बता दीं, क्योंकि ये सवाल तो आप करती हीं इसलिए इनसे पहले निपट लिए. अब सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें करेंगे हम.’ 

मैं कहती हूं, ‘अच्छी बातों से पहले एक और झंझटी सवाल इसी समय निपटा लेते हैं. जिंदगी का कोई बुरा अनुभव?’ गहरी सांस लेते हुए वे कहती हैं, ‘उन बुरे दिनों को याद नहीं करना चाहती. चार बहनों में मैं सबसे बड़ी थी. घर में चारों लड़कियां ही थीं. दिन भर घर के बाहर मनचलों का जमावड़ा लगा रहता था. कभी-कभी तो मवाली घर में पत्थर भी फेंकते थे. घुटन भरे दिन थे वे. बाहर निकलना दूभर रहता था.’ फिर बात बदलते हुए कल्पना कहती हैं, ‘छोडि़ए उन बातों को, मैं आपको दूसरी मजेदार बात बताती हूं. आज मुझे लोकसंगीत गायिका के तौर पर सब जानते हैं, लेकिन जब मैं छोटी थी और घर में दोतारा बजना शुरू होता था तो मैं भाग जाती थी इधर-उधर, छुपती रहती थी कि फिर दोतारे को पकड़कर बैठना पड़ेगा. मैं पॉप, रॉक, वेस्टर्न म्यूजिक की दीवानी थी और मेरे पिता जी दोतारा बजाने को कहते थे. मुझे ग्लैमरस संगीत भाता था और पिता जी लोकसंगीत के पीछे पड़े हुए थे.’ इसके बाद कल्पना के चेहरे पर थोड़ी उदासी पसर  जाती है. वे कहती हैं, ‘पिता अपनी संतानों के बारे में सब जानते हैं. मेरे पिता जी को मालूम रहा होगा कि मेरी मंजिल लोकसंगीत में ही है, इसलिए वे बचपन से ही पीछे पड़े रहते थे. काश! मैं तब ही इस बात को समझ गई होती तो और भी बहुत कुछ सीखती उनसे.’ 

कल्पना को रुआंसा देख इस बार बात मैं बदल देती हूं, ‘परवेज कब से हैं आपके साथ?’ कल्पना परवेज की ओर देखकर कहती हैं, ‘आठवीं क्लास में थी, तब के साथी हैं परवेज. तब से वैसे ही चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े रहते हैं. लेकिन तब प्रेम-फ्रेम जैसा कुछ नहीं था. एक लगाव शुरू से रहा. अधिकार भाव भी. जब भी मनचले परेशान करते, परवेज ही दिखते थे, जिनसे कुछ कह सकती थी. जब असमिया संगीत में मुझे खासा सफलता नहीं मिली और मैं मुंबई संघर्ष के लिए निकल पड़ी, तब भी मेरे साथ परवेज ही थे, लेकिन सच कह रही हूं, तब भी प्रेम जैसी कोई फीलिंग नहीं थी. हमारी मित्रता थी. मुंबई आए तो परवेज ही मेरे लिए काम की तलाश में भटकते रहे.’ यह बताते हुए कल्पना एक बार फिर परवेज की ओर देखती हैं और कहती हैं, ‘लेकिन अब तो जनाब मेरा प्यार भी हैं, मेरे पति भी और अरस्तू-आर्कमिडीज के पिता भी.’ यह कहकर वे हंस देती हैं. परवेज भी मुस्कुरा देते हैं. 

कई बार कल्पना पर भोजपुरी की अश्लील गायिका होने का ठप्पा भी लगा और ऐसा कहकर उन्हें खारिज करने वालों की एक जमात भी सामने आई

मुंबई में कुछ माह भटकने के बाद कल्पना को कहीं-कहीं कुछ काम मिला और इसी दरमियान एक भोजपुरी गीत भी गाने को मिला. पहली बार भोजपुरी में गाया- हमसे भंगिया ना पिसाई हो गणेश के पापा, हम नईहर जात बानीं…. .’  यह अलबम आया और कल्पना भोजपुरी की हो गईं.  उसके बाद वे कब, कैसे और किस-किस तरह से भोजपुरी मिट्टी में रमती गईं, यह खुद उन्हें भी नहीं पता. कल्पना कहती हैं, ‘अब तो उसी समाज की बेटी हूं, बहू हूं, वे मुझे वैसा ही प्यार और स्नेह देते हैं और मुझे भी यही अच्छा लगता है. संगीत जीवन में भोजपुरी एक आविष्कार की तरह आई थी और इसने मुझे इस कदर अपना लिया, यह बहुत तसल्ली देने वाली बात है.’

कल्पना जब खुद को भोजपुरी की बेटी कहती हैं तो यह अतिरेक जैसा भी नहीं लगता. भोजपुरी गीतों में पुरबी की जो खास विधा है, कल्पना ने उस विधा में इतने लोकप्रिय गीत गाए हैं कि वे वर्षों पहले गाए जाने के बावजूद आज भी पब्लिक डिमांड में उसी तरह बने रहते हैं. हालांकि इस बीच कल्पना पर  भोजपुरी की अश्लील गायिका होने का ठप्पा भी जोरदार तरीके से लगा और ऐसा कहकर उन्हें खारिज करने वालों की एक जमात भी सामने आई. लेकिन हालिया दिनों में कल्पना ने भोजपुरी में एक ऐसा बड़ा काम कर दिया है कि विरोधी भी पानी मांग रहे हैं और जो कल्पना के खिलाफ बोलते चलते थे उनके पास भी जवाब नहीं बचा है. भोजपुरी के लोकप्रिय गायन से परवान चढ़ी कल्पना ने बिहार के सबसे बड़े लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के गीतों को लेकर हाल ही में एक एलबम तैयार किया है. इसका नाम है द लेगेसी ऑफ भिखारी ठाकुर. 

इस एलबम के गीत सुनते हुए साफ अहसास होता है कि उसे तैयार करते हुए उन गीतों को गाते हुए कल्पना के मन में एक जुनून-सा रहा होगा. भोजपुरी के ठेठ अंदाज में कल्पना ने भिखारी के गीतों को सजीव बना दिया है. फिलहाल यह एलबम भारत के साथ दुनिया के उन तमाम मुल्कों में काफी चर्चा में है जहां भोजपुरी बोलने वाले मौजूद हैं. अश्लील गायिका होने की बात छिड़ते ही कल्पना मुस्कुराहट के साथ कहती हैं, ‘यह तो समझ-समझ का फेर है लेकिन सच पूछिए तो शुरू में तो मैंने कुछ गीत सिर्फ वर्डिंग समझकर गा दिए थे, उनका भाव तक मुझे अच्छे से नहीं पता था, लेकिन बाद में मुझे ऐसे गीतों को लेकर दूसरी अनुभूति भी हुई. मैं सोचती हूं कि अगर मैं अपने गांव-समाज से बाहर रहने वाले मजदूरों के लिए गीत गाती हूं, दिन भर की थकान के बाद जब वे शाम को अपने घर पहुंचते हैं और उनकी बीवी साथ में नहीं होती और कुछ गीतों से उनकी यौन कुंठा शांत होती है तो यह गायन की सार्थकता ही है. हालांकि कल्पना इस विषय पर ज्यादा बात करने से बचती हैं. वे अपनी पसंद बताती हैं कि त्रिलोक गुर्टू और शोभा गुर्टू को डूबकर सुनती हैं. दीपेन राव उनके गुरु रहे हैं. लखनऊ के भातखंडे संगीत महाविद्यालय से भी उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली है. गायन में रोल मॉडल के बारे में वे  बताती हैं कि भूपेन हजारिका जैसी गहराई और ऊंचाई वाला कोई गायक उन्हें नहीं दिखता. 

कल्पना फिलहाल असम के भक्ति आंदोलन के दो महान प्रणेताओं श्रीमंत शंकर देवा और उनके शिष्य माधव देवा के गीतों को लेकर काम कर रही हैं. ठेठ असमिया वाद्य यंत्र कालिया वादन के प्रयोग के साथ. भोजपुरी में भिखारी के बाद अब क्या, इस सवाल पर कल्पना कहती हैं, ‘महेंदर मिसिर पर काम शुरू हो चुका है. इंतजार कीजिए. मिसिर जी पूरबी के बेताज बादशाह थे, मैं ठेठ अंदाज में निभाऊंगी उनके गीतों को.’ असम और हिंदी समाज का रिश्ता हाल के समय में गड़बड़ाया हुआ है. वहां मुसलिम समुदाय और दूसरे समुदाय के लोग भी आपस में टकरा रहे हैं. ऐसे में असमिया कल्पना का हिंदी इलाके में राज करना और उनका परवेज को अपना हमसफर बनाना एक मायने में सुकून भी देता है.

शाख-शाख पर कालिदास

देश का राजनीतिक वर्ग तात्कालिक फायदों के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं से बार-बार टकराकर न सिर्फ लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है बल्कि खुद अपनी जड़ें भी खोद रहा है.  हिमांशु शेखर की रिपोर्ट.

‘सीएजी सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है. उसे अपनी रिपोर्ट में सरकार की आलोचना करने का अधिकार मिला हुआ है. संसद में अगर कोई सीएजी की आलोचना करता है तो इसका अर्थ यह माना जाएगा कि वह बगैर किसी भय और पक्षपात के साथ उसके कार्य करने के संवैधानिक अधिकार को चुनौती दे रहा है.’

 जवाहरलाल नेहरू, भारत के पहले प्रधानमंत्री

‘मैं देश को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हमारा पक्ष काफी मजबूत और विश्वसनीय है. सीएजी की बातें विवादास्पद हैं और जब यह मामला संसद की लोक लेखा समिति के सामने आएगा तो इन्हें चुनौती दी जाएगी.’

मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री

भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) को लेकर ये दो बातें दो कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने समय में कही हैं. जब 1952 में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में सीएजी पर हमले होते देखा तो वे उसके बचाव में उठ खड़े हुए थे. हालांकि उस वक्त भी सीएजी पर हमले करने वाले नेता कांग्रेसी थे, लेकिन पंडित नेहरू को चिंता एक ऐसी संवैधानिक संस्था को लेकर थी जिसका गठन संविधान निर्माताओं ने देश में लोकतंत्र की खूबसूरती को बनाए रखने के मकसद से किया था. इसके 60 साल बाद जब सीएजी रिपोर्ट से कांग्रेस के नेताओं और खुद प्रधानमंत्री को परेशानी होती है तो पहले पार्टी अपने दूसरे नेताओं को आगे करती है और फिर खुद प्रधानमंत्री सामने आ जाते हैं. 

कोयला ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है. कोयले ने अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग लोगों का साम्राज्य विस्तार किया है. लेकिन जब सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 2006 से 2010 के बीच कोयला ब्लॉकों के आवंटन से देश को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है तो बवाल मच गया. ये आवंटन उसी दौरान हुए जब कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था. इसलिए विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ा रहा और संसद के मॉनसून सत्र की बलि ले ली. अपने दफ्तर में पंडित नेहरू की तस्वीर टांगने वाले और गाहे-बगाहे अपने भाषणों में उन्हें याद करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने सीएजी को लेकर नेहरू की राय को खारिज करने में देर नहीं लगाई और सीएजी विनोद राय पर तरह-तरह के आरोप मढ़ डाले.

क्या बदल गई सियासी संस्कृति?

सवाल यह है कि 60 साल में एक ही पार्टी के प्रधानमंत्री की राय बदलने का मतलब सिर्फ पार्टी के चरित्र का बदलना है. या फिर देश की सियासी संस्कृति इस कदर बदल गई है कि वह हर संवैधानिक संस्था को ही कठघरे में खड़ा कर देना चाहती है? यहां मामला सिर्फ सीएजी पर हमले का नहीं है. जब चुनाव आयोग चुनाव आचार संहिता के कड़ाई से पालन की कोशिश करता है तो सत्ता में रहने वाले उस पर हमले करने से भी बाज नहीं आते. अगर देश की सर्वोच्च अदालत जनविरोधी नीतियों के खिलाफ कोई राय रखती है तो उसे सरकार की तरफ से हद में रहने की चेतावनीनुमा हिदायत दी जाती है तो उसके निर्णयों को संविधान संशोधन और नए कानूनों के रास्ते चुनौती दी जाती है. और तो और, देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद को ही अपने ढंग से चलाने के हठ के आगे सरकार जनभावनाओं और दूसरे दलों की बातों की अनदेखी करने से बाज नहीं आती. संसदीय समितियों का भी हाल बुरा है. लोक लेखा समिति (पीएसी) और संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में झगड़ा इसलिए हो जाता है कि कहीं अपनी पार्टी पर आंच न आ जाए. तो स्थायी समितियों में किसी विधेयक को सिर्फ इसलिए लटकाए रखा जाता है कि कहीं दूसरा दल इसका चुनावी फायदा न उठा ले.

तो क्या यह माना जाए कि पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के बीच सिर्फ वक्त का नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति का फर्क कुछ इस तरह से पैदा हो गया है कि लोगों के प्रति जवाबदेही और सहनशीलता की जगह असहनशीलता और किसी भी कीमत पर तात्कालिक जीत हासिल करने की प्रवृत्ति राजनीति पर हावी हो गई है? इसे जानने के लिए कुछ संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति और पिछले कुछ साल में इनके प्रति राजनीतिक वर्ग के बदले रवैये को समझना होगा.

जब बोफोर्स मामले पर सीएजी ने रिपोर्ट जारी की थी तो कांग्रेसी नेताओं ने सीएजी पर खूब हमले किए. लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सीधे कभी कुछ नहीं कहा

सीएजीः  चौतरफा हमलों का लक्ष्य…

जब आजाद भारत का संविधान बन रहा था तो ड्राफ्टिंग समिति के प्रमुख भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा की बैठक में कहा कि भारत के संविधान के तहत सीएजी सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी होगा. 30 मई, 1949 को सभा की बैठक में उनका कहना था, ‘मेरा मानना है कि सीएजी का कार्य न्यायपालिका के कार्य से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.’ इसके बाद संविधान के अनुच्छेद-148 से 151 के तहत सीएजी का गठन किया गया. तय किया गया कि सीएजी की नियुक्ति छह साल के लिए होगी और किसी वजह से उसे हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अपनाई जाती है. यानी महाभियोग की. माना गया कि इससे सीएजी के कार्य पर कोई दबाव नहीं रहेगा.

सीएजी को केंद्र और राज्य सरकारों के खर्चों का लेखा-जोखा रखने का अधिकार दिया गया. सीएजी के कर्तव्यों, अधिकारों और सेवा की शर्तों को निर्धारित करने के लिए 1971 में संसद ने एक खास कानून भी बनाया. सीएजी हर साल 64,000 ऑडिट करती है. रॉ, आईबी और एनटीआरओ के खर्च की जांच सीएजी के दायरे में नहीं है. लेकिन फिर भी सरकार जरूरत पड़ने पर इनकी ऑडिट सीएजी से करा सकती है. ऐसी रिपोर्टें सार्वजनिक नहीं की जातीं बल्कि अतिगोपनीय रखी जाती हैं. सैन्य बलों की रणनीतिक परियोजनाओं की ऑडिट के लिए भी विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है.

सीएजी ने जब-जब ऐसी रिपोर्ट दी जिससे सरकार को दिक्कत हुई तब-तब इस पर हमले किए गए. लंबे समय के बाद सीएजी अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में तब चर्चा में आई जब बोफोर्स मामले में इसकी रिपोर्ट आई. उस वक्त देश के महालेखा परीक्षक टीएन चतुर्वेदी थे. सरकार को परेशान करने वाली रिपोर्ट जब सीएजी ने जारी की तो उस पर खूब हमले हुए. लेकिन प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर हल्ला नहीं बोला. हालांकि, कांग्रेसी नेता लगातार हमले कर रहे थे. माहौल कुछ इस तरह का बना कि खुद चतुर्वेदी ने लोकसभा और राज्यसभा के स्पीकर को पत्र लिखकर यह कहा कि अगर सरकार को उनसे इतनी दिक्कत हो रही है तो महाभियोग लाकर उन्हें हटा दे. यह जानकारी तहलका को देते हुए चतुर्वेदी कहते हैं, ‘अभी की तुलना में उस वक्त अच्छी बात यह थी कि खुद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कभी हमला नहीं किया.’ मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ अपने राज्यसभा के दिनों को याद करते हुए चतुर्वेदी कहते हैं, ‘हम दोनों राज्यसभा में साथ रहे हैं. मुझे वे एक सज्जन व्यक्ति लगे लेकिन अब जब मैं उन्हें सीएजी पर हमला करते हुए देखता हूं तो मुझे हैरानी होती है. मुझे हैरानी होती है कि कैसे कोई प्रधानमंत्री संसद में यह कह सकता है कि सीएजी की रिपोर्ट को पीएसी में चुनौती दी जाएगी. पीएसी सरकार की नहीं होती बल्कि संसद की होती है और इसके कामकाज का निर्धारण सरकार का मुखिया नहीं कर सकता.’

प्रधानमंत्री ने भले ही पिछले दिनों संसद में सीएजी पर सीधा हमला किया हो लेकिन परोक्ष रूप से उन्होंने पहले भी सीएजी को हद में रहने की सलाह दी थी. जब पिछले साल वे समाचार चैनलों के संपादकों से मिले थे तो एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि सीएजी ने प्रेस वार्ता की हो. जबकि मौजूदा सीएजी ऐसा कर रहे हैं. इसके पहले कभी भी सीएजी ने नीतिगत मसलों पर टिप्पणी नहीं की. सीएजी को संविधान के तहत परिभाषित भूमिका में ही रहना चाहिए.’ इसके पहले 16 नवंबर, 2010 को भी प्रधानमंत्री ने सीएजी के 150 साल पूरा होने पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा था कि गड़बडि़यों और गलतियों के फर्क को समझते हुए रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए क्योंकि सीएजी की रिपोर्ट को न सिर्फ मीडिया बहुत गंभीरता से लेता है बल्कि जनता, सरकार और संसद भी.

दरअसल, मौजूदा सरकार में सीएजी पर हल्ला बोलने वालों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले या आखिरी व्यक्ति नहीं हैं. हां, उनके सामने आने से इतना जरूर हुआ कि कांग्रेस में जिस नेता की कोई हैसियत भी नहीं है, वह भी सीएजी के खिलाफ बोलने लगा है. 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर आई सीएजी की रिपोर्ट के बाद तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा था. राजा के बाद दूरसंचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल ने न सिर्फ सीएजी पर हल्ला बोला बल्कि यह तक कह डाला कि आवंटन से तो कोई नुकसान ही नहीं हुआ है. कुछ ऐसी ही बात कोयला ब्लॉक आवंटन को लेकर चिदंबरम ने भी कही थीं, लेकिन बाद में उन्हें अपने बयान को बदलना पड़ा. सिब्बल की ‘जीरो लॉस’ की थ्योरी भी नहीं चल पाई और सर्वोच्च न्यायालय ने 122 लाइसेंस रद्द करके सीएजी की बातों को मजबूती दी. अब सरकार इनकी नए सिरे से नीलामी करने वाली है और इससे एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी होगी.

सीएजी पर हमला करते-करते कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह उस स्तर तक चले गए जो लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं के लिए बिलकुल ठीक नहीं है. मनीष तिवारी ने विनोद राय पर भाजपा के एक नेता के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया. वहीं दिग्विजय सिंह ने कहा कि सीएजी राय जिस तरह से काम कर रहे हैं उससे लगता है कि उनका अपना एक राजनीतिक एजेंडा है. उन्होंने टीएन चतुर्वेदी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे सेवानिवृत्त होने के बाद भाजपा के टिकट पर राज्यसभा चले गए और बाद में राज्यपाल भी बने. दिग्विजय सिंह की मानें तो विनोद राय भी किसी ऐसे ही एजेंडे पर काम कर रहे हैं. लोकसभा के महासचिव रहे और कानून विशेषज्ञ सीके जैन कहते हैं, ‘अगर राजनीतिक दलों को ऐसा लगता है तो वे संविधान में संशोधन करके संवैधानिक पदों पर रहने वाले लोगों के लिए इस बारे में प्रतिबंध लगा सकते हैं. संवैधानिक पदों पर रहने वालों के लिए यह नियम पहले से है कि वे सेवानिवृत्ति के बाद केंद्र या राज्य सरकार में कोई पद नहीं ले सकते हैं और न ही कोई संवैधानिक पद. लेकिन राजनीतिक पद को लेकर उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है.’ अगर संवैधानिक पदों से हटने के बाद किसी दल से जुड़ने की दिग्विजय सिंह की बात को ही आधार माना जाए तो कांग्रेस भी आरोपों के घेरे में होगी. मुख्य चुनाव आयुक्त रहे मनोहर सिंह गिल को इस पद से हटने के बाद कांग्रेस ने केंद्र में मंत्री बनाया.

1962 में लोक सभा के स्पीकर ने कहा था कि सीएजी के खिलाफ टिप्पणी नहीं की जा सकती. इसके बाद रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को माफी मांगनी पड़ी थी

संवैधानिक प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाले लोग सरकार की इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि वह सीएजी की रिपोर्ट पर संसद में चर्चा कराना चाहती है. क्योंकि सीएजी की रिपोर्ट में संसद में नहीं बल्कि पीएसी में चर्चा हो सकती है. विपक्ष की तरफ से इस संवैधानिक गड़बड़ी के बारे में कुछ नहीं बोला जा रहा है. मशहूर सांसद और सातवें दशक में लोक लेखा समिति के अध्यक्ष रहे एरा सेझियन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान पर इन शब्दों में हैरानी जताते हैं, ‘मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया से सहम गया हूं.’ चतुर्वेदी कहते हैं, ‘प्रक्रिया यह है कि सीएजी अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है. इसके बाद रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की जाती है. फिर इसे पीएसी के पास भेजा जाता है. वहां इस पर चर्चा होती है और कार्रवाई रिपोर्ट तैयार होती है.’

अगर मनमोहन सिंह अपनी ही सरकार के सहयोगी मंत्री वीरप्पा मोइली से विचार-विमर्श कर लेते तो शायद वे सीएजी पर हमले नहीं करते. वीरप्पा मोइली हाल तक कानून मंत्री रहे हैं और उन्हीं की अगुवाई में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन हुआ था. 2007 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सिफारिश की थी कि सीएजी अपनी जांच में जैसे ही घोटाले को पाए वैसे ही वह ऐसी व्यवस्था करे कि सरकार को उसका पता चल जाए. इससे पहले मोइली ने ही 2006 में एक गोष्ठी में कहा था, ‘सीएजी की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के लिए समुचित व्यवस्था होनी चाहिए. व्यवहार में सरकार कार्रवाई करने के लिए अनिच्छुक रहती है.’ 

केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने तो सीएजी पर हमला करने के क्रम में यह भी कह डाला कि कुछ संवैधानिक संस्थाएं और बड़ी हस्तियां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि खराब करने का षड्यंत्र कर रही हैं. जब पत्रकारों ने उनसे नाम जानना चाहा तो उनका जवाब था कि आप सब अच्छी तरह से उनके बारे में जानते हैं. यहां 50 साल पहले की एक घटना का उल्लेख जरूरी हो जाता है. 1962 में जब उस समय के रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने सेना जीप खरीद पर सीएजी की रिपोर्ट पर सीएजी के खिलाफ टिप्पणी की थी तो उनके खिलाफ अवमानना का नोटिस दिया गया था और उस वक्त लोक सभा के स्पीकर ने कहा था कि सीएजी के खिलाफ टिप्पणी नहीं की जा सकती. इसके बाद कृष्ण मेनन को माफी मांगनी पड़ी थी. सीएजी पर हो रहे हमलों पर लोकसभा के महासचिव रहे और कानून विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अगर इस तरह से संवैधानिक संस्थाओं पर हमले होंगे तो देश का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर होगा.’ 

विपक्ष भी नहीं पाक साफ

ऐसा नहीं है कि सिर्फ कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को अपमानित करने का काम कर रही है. पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि जो भी दल सत्ता में रहता है, वह इन संस्थाओं पर अपनी सुविधानुसार हमले करता है. भाजपा की अगुवाई वाली सरकार जब केंद्र में थी तो उस वक्त भी इसकी तरफ से सीएजी पर कई बार हमले हुए. एक बार तो यहां तक कहा गया कि इस संस्था को अंग्रेजों ने स्थापित किया था इसलिए यह बेवकूफी वाली संस्था है. यह बात 2001 में उस समय के विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने मुंबई के सेंटूर होटल को 145 करोड़ रुपये में बेचने के मामले में आई सीएजी रिपोर्ट पर जवाब देते हुए कही थी. करगिल की लड़ाई के बाद सामने आए ताबूत घोटाले पर चर्चा करते हुए अरुण जेटली ने एक टेलीविजन चैनल पर यह कहा था कि ऑडिट करने वाले अधिकारी जंग लड़ने नहीं जाते लेकिन सेना के जनरल जाते हैं.

सीएजी कार्यालय की नींव रखते हुए नई दिल्ली में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने जुलाई, 1954 में कहा था, ‘एक ऐसे समय में जब सरकार कल्याणकारी योजनाओं पर काफी पैसे खर्च कर रही है तब यह जरूरी हो जाता है कि हर रुपये का हिसाब रखा जाए. यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सीएजी पर है.’ जिस वक्त राजेंद्र प्रसाद काफी खर्च की बात कर रहे थे, उस वक्त सरकार का कुल बजट खर्च 1,354 करोड़ रुपये था. आर्थिक समीक्षा के मुताबिक यह 2011-12 में बढ़कर 22.92 लाख करोड़ रुपये हो गया है. जाहिर है कि सीएजी की भूमिका और जिम्मेदारी बड़ी हो गई है. अगर वह यह जिम्मेदारी सही से न निभाए तो देश के लाखों करोड़ रुपये कहां और कैसे खर्च हो रहे हैं इसका कोई निष्पक्ष हिसाब-किताब देश के पास होगा ही नहीं.  

सुधार की मांग 

बढ़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए सीएजी ने तीन सुधारों का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है. हालांकि, दो साल पहले भेजे गए इन प्रस्तावों पर सरकार ने अब तक अपनी तरफ से स्थिति साफ नहीं की है. इनमें सबसे पहला यह है कि सरकारी संस्थाओं के लिए सूचना के अधिकार की तर्ज पर सीएजी द्वारा मांगे गए दस्तावेज मुहैया कराने के लिए 30 दिन की समयसीमा निर्धारित की जाए. अक्सर जब सीएजी रिपोर्ट तैयार कर रही होती है तो उसे दस्तावेज मिलने में काफी दिक्कतें आती हैं. 

दूसरी बात यह है कि जब सीएजी की रिपोर्ट सरकार को मिले तो वह इसे जल्द से जल्द संसद में पेश करे. अभी होता यह है कि सरकार महीनों तक सीएजी की रिपोर्ट दबाकर बैठी रहती है. कोयला ब्लॉक आवंटन की रिपोर्ट भी सरकार को पिछले संसद सत्र में ही मिल गई थी लेकिन इसे पेश किया गया मॉनसून सत्र में. दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की रिपोर्ट भी साल भर बाद पेश की गई थी.

पीएसी में कांग्रेसी सांसदों ने हल्ला मचाया तो 2जी पर बनी जेपीसी की बैठक में भाजपा सांसदों ने यही काम किया और बैठक से बाहर निकल गए

सीएजी की तीसरी मांग यह है कि पिछले बीस साल में जिस तरह से सरकार की आर्थिक गतिविधियों में बदलाव आया है इसके आधार पर उसके ऑडिट के दायरे के बारे में स्थिति और साफ की जाए. दरअसल, सीएजी इसके जरिए सार्वजनिक निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल के तहत चल रही परियोजनाओं और संयुक्त उपक्रमों के ऑडिट का अधिकार भी चाहती है. एक अनुमान के मुताबिक 80,000 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना खर्च सीएजी के ऑडिट दायरे से बाहर है. इस वजह से संसद को भी यह पता नहीं चल पाता कि यह पैसा कैसे खर्च हो रहा है. चतुर्वेदी कहते हैं, ‘जो लोग यह कह रहे हैं कि सीएजी को नीतिगत मसलों पर टिप्पणी का अधिकार नहीं है, उन्हें यह पता होना चाहिए कि सीएजी ऐसे मामलों में अपनी बात रख सकती है जिससे सरकारी खजाने को नुकसान उठाना पड़ रहा हो.’

दलीय राजनीति की शिकार संसदीय समितियां

सीएजी अपनी रिपोर्ट संसद की जिस पीएसी के पास भेजती है उसकी हालत भी खराब है. इस समिति का मुख्य कार्य है सीएजी की रिपोर्ट का परीक्षण करना. आम तौर पर 22 संसद सदस्यों वाली इस समिति का अध्यक्ष विपक्ष का कोई वरिष्ठ नेता होता है. 1967 से यही परंपरा चली आ रही है. बात पिछले साल की है जब 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर आई सीएजी की रिपोर्ट पर पीएसी में विचार-विमर्श हो रहा था. विचार-विमर्श के बाद भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली इस समिति ने जब अपनी रिपोर्ट का मसौदा तैयार किया तो इसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के सदस्यों ने खारिज कर दिया. इस रिपोर्ट में 2जी मामले को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उस समय के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की भूमिका की आलोचना की गई थी. जब समिति में तनातनी काफी बढ़ गई तो समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी बैठक से निकल गए. इसके बाद विरोध कर रहे सदस्यों ने कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज को अध्यक्ष चुन लिया और जोशी की अनुपस्थिति में रिपोर्ट के मसौदे को खारिज कर दिया. इसके बाद संवैधानिक जानकारों ने रिपोर्ट खारिज किए जाने को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया कि राज्यसभा का सदस्य पीएसी की बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता. सोज राज्यसभा के सांसद हैं.

पीएसी में कांग्रेस और उनके समर्थक सांसदों ने हल्ला मचाया तो 2जी पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की बैठक में भाजपा सांसदों ने यही काम किया और बैठक से बाहर निकल गए. इतना ही नहीं भाजपा सांसदों ने समिति से बाहर निकलने की धमकी भी दी. दरअसल, जेपीसी में विवाद तब पैदा हुआ जब भाजपा सांसद लगातार यह मांग करते रहे कि 2जी मामले में पूछताछ के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम को बुलाया जाए. इस पर कांग्रेस सांसद तैयार नहीं हुए. बाद में इस जेपीसी के अध्यक्ष और कांग्रेस के नेता पीसी चाको ने यह बयान दिया कि बैठक से वाकआउट करने की स्थिति पैदा नहीं हुई थी बल्कि भाजपा सांसद ऐसा करने की तैयारी के साथ आए थे. वहीं भाजपा सांसदों का आरोप था कि उनके साथ बैठक में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया. जैन कहते हैं, ‘आज यह हालत सिर्फ पीएसी और जेपीसी की नहीं है बल्कि संसद की ज्यादातर समितियों की है. जिन समितियों का गठन दलीय दायरे से ऊपर उठकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए किया गया था, वे भी आज दलीय राजनीति की शिकार हो गई हैं.’

स्थायी संसदीय समितियां इसकी उदाहरण हैं. इसमें सबसे दिलचस्प मामला है ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति का है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले पिछले साल जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में लगातार दौरे करके किसानों के मसलों को उठा रहे थे तो उन्होंने कई जगह पर कहा था कि संप्रग सरकार जल्द से जल्द किसानपरस्त जमीन अधिग्रहण कानून लाएगी. इसके बाद सात सितंबर, 2011 को सालों से लटक रहे जमीन अधिग्रहण कानून के नए मसौदे को संसद में पेश कर दिया गया.  13 सितंबर को इसे स्थायी संसदीय समिति में भेज दिया गया. समिति में दलीय राजनीति इसके बाद शुरू हुई. भाजपा और बसपा को लगा कि अगर जमीन अधिग्रहण कानून संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हो गया तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है. इसलिए समिति में इन दोनों दलों के सदस्यों ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी तरीके से विधेयक का मसौदा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले संसद को नहीं लौटाया जाए. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव निपटने के तकरीबन दो महीने बाद ही इस विधेयक को स्थायी संसदीय समिति ने संसद को भेज दिया. यह घटना बताती है कि किस तरह से सियासी दल अपने चुनावी नफा-नुकसान को देखते हुए स्थायी संसदीय समितियों का इस्तेमाल कर रही हैं.

 संकट संसदीय मर्यादा का

जैन कहते हैं कि पीएसी, जेपीसी और स्थायी संसदीय समितियां ही क्यों, आज तो पूरी संसद ही अपनी जिम्मेदारियों से अनजान दिखती है. मौजूदा सरकार पर यह आरोप लग रहा है कि इसने संसद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है. संसदीय व्यवस्था को ठीक ढंग से समझने वाले लोग इस संदर्भ में कुछ मामले गिनाते हैं. इनमें सबसे प्रमुख है लोकपाल का विषय. लोकपाल का मसौदा लोकसभा में कई संशोधनों के साथ पारित होने के बाद राज्यसभा में पहुंचा. 31 दिसंबर, 2011 की रात 12 बजे राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने अचानक ही लोकपाल के मसले पर चल रही संसद की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी. इसके लिए सफाई यह दी गई कि राष्ट्रपति से उन्हें इससे अधिक समय तक राज्यसभा चलाने की अनुमति नहीं मिली थी. लेकिन विपक्ष और कई जानकार यह मानते हैं कि अंसारी ने ऐसा सत्ता पक्ष की मुश्किलों को कम करने के लिए किया था. कई लोग तो बतौर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की दोबारा हुई नियुक्ति को भी सत्ता पक्ष के प्रति उनके समर्पण से जोड़कर देखते हैं.

इसके बाद एक घटना हाल की है. जब कोयला ब्लॉक आवंटन पर संसद लगातार विपक्ष के हो-हल्ले का शिकार होकर नहीं चल पा रही थी तो एक दिन संसदीय कार्य राज्य मंत्री राज्यसभा के उपसभापति पीजी कूरियन को यह सलाह देते हुए सुने गए कि हंगामा होने वाला है इसलिए पूरे दिन के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दीजिए. इस घटना पर जैन कहते हैं, ‘राजीव शुक्ला को बतौर संसदीय कार्य राज्य मंत्री ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है. राजीव शुक्ला ने जो किया वह सिर्फ सभापति का अपमान नहीं है बल्कि यह तो सदन का अपमान है. क्योंकि सभापति को सदन चुनता है और उसे डिक्टेट करने का मतलब यह है कि आप पूरे सदन को डिक्टेट कर रहे हैं.’

आज संसद की हालत यह है कि अगर सत्ता पक्ष से बाहर का कोई सांसद सरकार की स्वस्थ आलोचना भी करे तो सत्ता पक्ष के सांसद उस पर टूट पड़ते हैं. यह बात खास तौर पर तीन लोगों के बारे में दिखती है. सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह. जब पिछले साल अगस्त में अन्ना हजारे रामलीला मैदान में अनशन कर रहे थे उसी दौरान राहुल गांधी ने संसद में इस मसले पर बोलते हुए लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की बात की थी. जब राहुल गांधी अपना लिखा हुआ भाषण पढ़ रहे थे उसी वक्त विपक्ष के कुछ सदस्यों ने टोका-टाकी की तो कांग्रेस के युवा नेताओं की फौज विपक्षी सदस्यों पर बुरी तरह टूट पड़ी थी.

 

स्थायी समिति में भाजपा और बसपा के सदस्यों ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी तरीके से विधेयक का मसौदा विधानसभा चुनाव के पहले संसद को नहीं लौटाया जाए

 

 अब एक बार फिर से यहां पंडित नेहरू का उल्लेख जरूरी हो जाता है. बात 1963 की है. संसद में योजना आयोग के उस दावे पर बहस हो रही थी जिसमें कहा गया था कि देश में गरीब आदमी की आमदनी पंद्रह आने है. यानी एक रुपये से भी कम. उस बहस में हिस्सा लेते हुए राममनोहर लोहिया ने यह साबित किया कि देश के 27 करोड़ लोगों की आमदनी तीन आने से भी कम है. इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार ने अपने अनुमान को खिसका कर आठ आने कर दिया. इसी बहस के दौरान लोहिया ने पंडित नेहरू की तरफ इशारा करते हुए कहा था, ‘इन हजरत को देखिए. इनके कुत्ते का रोज का खर्च 25 रुपये है और देश के आम आदमी की रोजाना आमदनी 25 पैसे से भी कम है.’ उस वक्त नेहरू अपने बाएं हाथ पर अपनी ठोड़ी टेके हुए यह वार चुपचाप झेल गए थे. किसी कांग्रेसी सांसद ने नेहरू की नजर में अपना नंबर बढ़ाने के लिए लोहिया पर हल्ला बोलने का साहस नहीं जुटाया था. क्या अब ऐसा दृश्य संभव है?

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा संसद के अवमूल्यन के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं, ‘देश के प्रधानमंत्री को जब भी समय मिलता है तो वह संसद के सदन में आकर बैठता है. चाहे वह लोकसभा में बैठे या राज्यसभा में. जब संसद में प्रश्नकाल चल रहा होता है तब मनमोहन सिंह सदन में आते हैं. इसके बाद शून्य काल शुरू होता है और सांसद कहते रह जाते हैं कि मैं प्रधानमंत्री जी को यह बताना चाहूंगा, वह बताना चाहूंगा लेकिन मनमोहन सिंह इन बातों की अनदेखी करते हुए सदन से उठकर चले जाते हैं. संसद की इतनी अवज्ञा और किसी शासन में नहीं हुई जितनी मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई है.’

यशवंत सिन्हा जो कह रहे हैं, वह एक तथ्य है लेकिन क्या संसद की साख को कम करने आरोप सिर्फ मनमोहन सिंह या कांग्रेस पर लगाया जा सकता है? मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत दूसरे दलों की इसमें कोई भूमिका नहीं है? यह भी एक तथ्य है कि कई मौके ऐसे आए हैं जब भाजपा पर भी संसद के अवमूल्यन का आरोप लगा. 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में भाजपा द्वारा संसद को पूरी तरह से ठप कर देने की भी आलोचना न सिर्फ कांग्रेस ने बल्कि संसदीय परंपरा के कई जानकारों ने की. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जब देश की जनता द्वारा चुनी गई संप्रग सरकार को अवैध बताया तो उनके इस बयान की आलोचना भी संसद की परंपरा को जानने-समझने वालों ने की. हालांकि, तुरंत ही आडवाणी ने इस मामले पर माफी मांग कर इसे रफा-दफा किया. अभी हाल में जब प्रोन्नति में आरक्षण देने को लेकर राज्यसभा में संविधान संशोधन विधेयक सरकार ने पेश किया तो समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल और बहुजन समाज पार्टी के अवतार सिंह करीमपुरी के बीच हाथापाई तक हो गई. सबने टेलीविजन पर देखा कि इसे रोकने के बजाय दोनों दलों के कुछ और सदस्य इस झगड़े में शामिल हो गए. बाद में मार्शलों को बुलाना पड़ गया. जानकारों का मत है कि ऐसे मामलों में संसद को कठोर कार्रवाई करके नजीर पेश करना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया. पहले भी कई मौके ऐसे आए हैं जब विपक्षी दलों ने संसद की मर्यादा को ठेस पहुंचाई है. इस आधार पर नतीजा यह निकलता है कि संसद के अवमूल्यन के लिए सीधे तौर पर देश का पूरा राजनीतिक वर्ग जिम्मेदार है. 

आज संसदीय बहस का स्तर गिरते हुए इस कदर दलीय दायरों में सिमटकर रह गया है कि सत्ताधारी दल का कोई भी सांसद ऐसे सवाल नहीं पूछता या ऐसी कोई भी बात नहीं बोलता जिससे उसके दल के किसी मंत्री को कोई परेशानी हो. जबकि एक वक्त वह था जब अपने ही दल के लोग जनहित के मसलों पर प्रधानमंत्री पर हमला करने से भी नहीं परहेज करते थे. बात 1965 की है. उस वक्त लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे. अनाज के संकट की वजह से महंगाई बढ़ रही थी. सरकार नाकाम और जनता परेशान दिख रही थी. 24 मार्च को कांग्रेसी सांसद विजय लक्ष्मी पंडित ने लोकसभा में सरकार पर जमकर हल्ला बोला. शास्त्री की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, ‘लोग कहीं भी ठोस निर्णय नहीं ले रहे हैं. ऐसे में आगे की राह में रोड़े ही रोड़े दिखते हैं. केरल से कश्मीर ओर शेख अब्दुल्ला से लेकर वियतनाम तक कोई फैसला नहीं किया जा रहा है. हम अनिर्णय के शिकार हो रहे हैं.’ हमला होता रहा, पक्ष-विपक्ष के सांसद प्रधानमंत्री की ओर देखते रहे लेकिन शास्त्री चुपचाप इस हमले को झेल गए. लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के कार्यकाल में जब तेलंगाना ओर विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक के मसले पर पार्टी के सांसद केशव राव ने पार्टी लाइन से अलग लाइन ली तो उनके पर कतरने में देर नहीं की गई.

चुनाव आयोग पर चोट

मौजूदा सरकार में शामिल लोगों ने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी हमले करने से परहेज नहीं किया. इसी साल हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आचार संहिता की खुलेआम धज्जी उड़ाने वालों में दो केंद्रीय मंत्री भी शामिल हो लिए. विवाद तब शुरू हुआ जब आचार संहिता लगने के बाद केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में नौ फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. चुनाव आयोग ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना. इसके बावजूद खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में एक चुनावी सभा में कहा कि अगर उन्हें चुनाव आयोग सूली पर भी लटका दे तो वे यह सुनिश्चित करेंगे कि पसमांदा मुसलमानों को उनका हक मिले.

इसके बाद विवाद गहरा गया और चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की औपचारिक शिकायत की और तत्काल हस्तक्षेप की मांग की. हर तरफ से जब सरकार पर दबाव बढ़ा तो सलमान खुर्शीद को इसके लिए औपचारिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी. इसके ठीक दो दिन बाद केंद्रीय इस्पात मंत्री और उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने भी मुसलमानों को आरक्षण देने संबंधी बयान देकर चुनाव आचार संहिता या यों कहें कि चुनाव आयोग को अपमानित करने का काम किया. उन्होंने आयोग को चुनौती के लहजे में कहा कि अगर वह उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकता है तो करके दिखाए. वर्मा फर्रुखाबाद के जिस चुनावी मंच से आयोग को चुनौती दे रहे थे उस पर उनके साथ सलमान खुर्शीद और दिग्विजय सिंह भी मौजूद थे. 

इस पूरे मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद एसवाई कुरैशी का कहना था, ‘कुछ नेताओं ने आयोग पर हमले किए और हमने नियम के हिसाब से उनके खिलाफ नोटिस जारी किए और अंततः उन्हें माफी मांगना पड़ा. लेकिन सरकार की नीयत और समय अहम है. जिस तरह से और जिस समय चुनाव आचार संहिता में बदलाव की बात कुछ नेताओं ने उठाई उससे उनकी मंशा को लेकर संदेह पैदा होता है…किसी संस्था में बदलाव की आवश्यकता तब महसूस होती है जब वह ठीक से काम नहीं कर पा रही हो. जबकि चुनाव आयोग का प्रदर्शन शानदार रहा है.’ जो बात कुरैशी बचते-बचाते कह रहे हैं उसे सुभाष कश्यप सीधे तौर पर रखते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि सलमान खुर्शीद को चुनाव के कायदे नहीं पता थे. इसके बावजूद अगर वे आयोग से टकरा रहे हैं तो इसके छिपे अर्थों को समझना होगा. एक ऐसे समय में जब देश की ज्यादातर संवैधानिक संस्थाओं की साख घटती जा रही है, चुनाव आयोग पर जिम्मेदार मंत्रियों द्वारा इस तरह के हमले किया जाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.’

हालांकि, चुनाव आयोग पर हमला करने के मामले में भाजपा भी पीछे नहीं रही है. 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद जब उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने कड़ा रुख अपनाते हुए पहले चुनाव कराने से इनकार कर दिया था तो उस वक्त भाजपा चुनाव आयोग पर जमकर हमले बोल रही थी. खुद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सार्वजनिक सभाओं में बार-बार लिंगदोह का पूरा नाम जेम्स माइकल लिंगदोह दोहराकर यह संदेश देना चाह रहे थे कि चुनाव आयोग उन्हें जान-बूझकर धार्मिक आधार पर निशाना बना रहा है.

हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनावी आचार संहिता की खुलेआम धज्जी उड़ाने वालों में दो केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे

सीवीसी का राजनीतिकरण

केंद्रीय सतर्कता आयोग भी एक ऐसी संवैधानिक संस्था है जिसके अवमूल्यन का आरोप कांग्रेस पर है. मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में कांग्रेस ने नैतिक और कानूनी तकाजों की अनदेखी की और वर्ष 2010 में केरला काडर के प्रशासनिक अधिकारी पीजे थॉमस को यह पद दे दिया. उन पर पामोलिन तेल आयात घोटाले में शामिल होने के आरोप थे.  यह मामला उच्च स्तरीय चयन समिति में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने उठाया भी था लेकिन कांग्रेसी बहुलता वाली समिति ने उनकी अनदेखी करते हुए थॉमस को नियुक्त कर दिया. कांग्रेस ने इस बात की ओर ध्यान देना ही जरूरी नहीं समझा कि जिस व्यक्ति पर खुद भ्रष्टाचार के आरोप हों उसे ऐसे मामलों की जांच की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है. नियुक्ति का यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा और वहां थॉमस की नियुक्ति को अवैध बता दिया गया. इसके बाद थॉमस को सीवीसी के पद से इस्तीफा देना पड़ा और सरकार की बड़ी फजीहत हुई.

न्यायपालिका को चुनौती

कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के प्रतिनिधियों ने कई मौकों पर परोक्ष रूप से ही सही न्यायपालिका को भी अपने दायरे में रहने की सलाह दे डाली है. इस सरकार को उच्चतम न्यायालय से सबसे अधिक दिक्कत हो रही है. क्योंकि सरकार को परेशान करने वाले कुछ मामले अदालत ने खुद अपने हाथ में ले लिए हैं और कुछ जनहित याचिका के जरिए उस तक पहुंचे हैं. जिस ढंग से 2जी मामले की जांच की निगरानी सर्वोच्च अदालत ने अपने हाथ में ली है, उससे भी सरकार को दिक्कत हो रही है. हालांकि, न्यायपालिका के भ्रष्टाचार के मामले उठते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ समय से न्यायालयों खास तौर पर उच्चतम न्यायालय ने जिस तरह से काम किया है उससे लोगों का इस तंत्र पर भरोसा बढ़ा है.

सरकार और अदालत का टकराव उस वक्त ज्यादा बढ़ता हुआ दिखता है जब अदालत चुनावी लाभ से चलाई जा रही सरकारी योजनाओं पर चोट करती है. ताजा मामला हज सब्सिडी का है. सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को हाल ही में यह निर्देश दिया है कि हज सब्सिडी कम करते हुए इसे अगले दस साल में खत्म किया जाए. सरकार के स्तर पर दबी जुबान में ही सही उच्चतम न्यायालय के इस फैसले का विरोध हुआ.

पिछड़ी जाति के लोगों को प्रमोशन में आरक्षण के लिए उच्चतम न्यायालय ने कुछ शर्तें रखी थीं. इनका पालन न करने की वजह से हाल ही में अदालत कई राज्यों में इस तरह के आरक्षण को रद्द कर चुकी है. अब सरकार ने इन शर्तों से छुटकारा पाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश कर दिया है. जानकार बता रहे हैं कि इस संशोधन का उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना लगभग तय है. इस बारे में अटॉर्नी जनरल जीई वहानवती ने कानून मंत्रालय को एक पत्र लिखकर पहले ही बता दिया था कि प्रोन्नति में जाति के आधार पर आरक्षण देने के मामले में कई कानूनी अड़चनें हैं और सरकार के ऐसे किसी फैसले को उच्चतम न्यायालय पलट सकता है. इसके बावजूद सरकार ने जरूरी संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश कर दिया. जानकार मानते हैं कि  यह एक ऐसा मामला है जिसमें सरकार तीन-तीन संस्थाओं का अवमूल्यन कर रही है. पहली बात तो यह कि सरकार अटॉर्नी जनरल की राय को कोई महत्व नहीं दे रही. दूसरी तरफ वह न्यायपालिका के निर्णय की काट के तौर पर संविधान संशोधन का रास्ता अपना रही है. और तीसरी बात यह कि यदि सरकार का यह फैसला उच्चतम न्यायालय पलट देता है तो फिर यह संसद के लिए भी अपमानजनक स्थिति होगी.

 भविष्य के संकेत 

टीएन चतुर्वेदी, सीके जैन और सुभाष कश्यप समेत संविधान की जानकारी रखने वाले लोगों का स्पष्ट मत है कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख गिराने से अंततः लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी और मौजूदा व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठने लगेगा. जो लोग बिना सोचे इस प्रकार का काम कर रहे हैं आखिर में इसका भारी नुकसान उन्हें भी उठाना होगा. खतरा यह है कि पहले से ही विश्वसनीयता के संकट से सबसे अधिक जूझ रहे राजनीतिक वर्ग के औचित्य पर ही देश की जनता सवाल न उठाने लगे. अगर हम सभी संस्थाओं को कमजोर करते रहे तो फिर पूरी व्यवस्था में कोई भी केंद्र ऐसा नहीं बचेगा जिस पर लोग भरोसा कर सकें. ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर अराजकता का खतरा स्वाभाविक है. ऐसे में न सिर्फ वह सपना कहीं खो जाएगा जिसके सहारे आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी बल्कि उस दृष्टि का भी कोई मोल नहीं रहेगा जिसे आधार बनाकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद रखी गई थी.  

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