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‘यह एक लड़की के लिए लड़ रहे दो लड़कों की कहानी नहीं है. यह विचारधारा की लड़ाई है’

रिलीज के पहले ही नक्सलवाद जैसे विषय पर बनी फिल्म चक्रव्यूह अच्छी-खासी चर्चा और बहस पैदा कर रही है. इससे पहले की अपनी दो फिल्मों राजनीति और आरक्षण से भी प्रकाश झा ने आम दर्शकों के बीच ऐसी ही उत्सुकता पैदा की थी. शोनाली घोष से अपनी ताजा फिल्म के बारे में बात करते हुए झा बता रहे हैं कि क्यों एक फिल्म के जरिए माओवादी विचाराधारा पर बात करना जरूरी है  

चक्रव्यूह के लिए नक्सलवाद जैसा विषय कैसे चुना गया?

पिछले कुछ सालों से लगातार खबरें आ रही हैं कि दंतेवाड़ा, जहां दो पक्षों के बीच लड़ाई चल रही है, में आम किसान मारे गए. पहले बयान आता है कि मारे गए लोग नक्सलवादी थे. फिर दावा किया जाता है कि वे नक्सलवादियों को पनाह दे रहे थे. आखिर में कहा जाता है कि इनमें से सिर्फ आधे लोग ही नक्सलवादी थे. असली बात यह है कि नक्सलवादी वे लोग हैं जिन्हें आप अलग-अलग करके नहीं देख सकते. उनके भाई-भतीजे मिलिशिया का हिस्सा होते हैं या उसके मुखबिर. वे आजादी, लोकतंत्र और स्वराज का मतलब नहीं समझते क्योंकि उन्होंने कभी उसका अनुभव ही नहीं किया. गढ़चिरौली के एक प्रसिद्ध लोकगायक थे. वे कहा करते थे, ‘सुना है कि आजादी मिल गई, स्वराज मिल गया, कुछ 50-60 साल पहले वह लाल किले से चला आया. पता नहीं कहां खो गया. उसको दफ्तर-दफ्तर में देखा, पुलिस थाने में देखा. उसको ढूंढ़ा पर कहीं नहीं मिला. देखा नहीं आज तक कैसा है- गोरा है कि लंबा है, बड़ा है या छोटा है. भाई, आपको मिले तो हमारे गांव ले आना. एक बार दर्शन तो कर लें.’ तो यह वह नजर है जिससे ये लोग एक संप्रभु राष्ट्र को देखते हैं. लेकिन वे जहां हैं वहां संप्रभुता नहीं है.

फिल्म के लिए आपने किस तरह की रिसर्च की है?

मैं बीते सालों में कुछ ऐसे लोगों से लगातार मिलता रहा हूं जो इस विचारधारा के समर्थक थे लेकिन बाद में इससे अलग हो गए. इस फिल्म के सहलेखक अंजुम राजाबली जो इस मसले से जुड़े रहे हैं, ने मुझे 2003 में एक कहानी सुनाई थी. पहले संघर्ष और हिंसा सिर्फ दंडकारण्य के जंगलों व आदिवासियों तक सीमित थी लेकिन अब यह दूसरे इलाकों और लोगों तक फैल गई है इसलिए मैंने अंजुम से कहा अब फिल्म बनाई जा सकती है. इसके बाद हमने पुलिसवालों, आम जनता, विस्थापितों और नक्सलवाद के आरोप में जेल गए लोगों से मुलाकात की और इस मसले पर उनकी सोच जानने की कोशिश की.

चक्रव्यूह बनाते हुए नक्सलवाद के बारे में आपकी सोच में क्या बदलाव आया?

70 के दशक में मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था और तब से ही नक्सलवाद के बारे में सुन रहा हूं. हम नक्सलबाड़ी, इस आंदोलन के संस्थापक चारू मजूमदार, वामपंथी विचाराधारा और वर्गहीन समाज के बारे में बात करते थे. बिहार की पृष्ठभूमि भी इससे जुड़ी थी इसलिए मेरा इनकी तरफ स्वाभाविक झुकाव था. लेकिन जब आप फिल्म बनाते हैं तो आपको अपनी व्यक्तिगत सोच अलग रखकर काम करना पड़ता है. मैं पिछले कई साल से फिल्म बना रहा हूं और यह बात मेरे भीतर दिलचस्पी पैदा करती थी कि एक आंदोलन का विस्तार कैसे होता है. नक्सलवाद वाले मसले पर मेरी सहानुभूति सीआरपीएफ के लोगों के साथ भी है. नक्सलवादियों से लड़ाई के लिए तैनात और बेहद खतरनाक स्थितियों में रह रहे इन लोगों को नहीं पता कि वे वहां क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं. ऐसे ही एक सीआरपीएफ कर्मी से जब मेरी मुलाकात हुई तो उसका कहना था, ‘क्या साब, हमें तो कुछ समझ में ही नहीं आता. ये पॉलीटीशियन लोग तो मुर्गे लड़ा रहे हैं. हम नक्सल की गोली से नहीं मरेंगे तो मलेरिया से मर जाएंगे. ‘यहां नक्सलवादियों से लेकर सीआरपीएफ वालों तक सब जानते हैं कि बंदूक से समस्या हल नहीं होने वाली.

प्रकाश झा, हिन्दी सिनेमा के जानेमाने निर्देशक हैं. फोटो:अंकित अग्रवाल

भारत में आप नक्सलवाद की समस्या को किस तरह से देखते हैं?

जो भी तकलीफ और शोषण इन लोगों ने भोगा है वह इस आंदोलन का आधार है. उनके पास इस सब का जवाब देने के लिए बंदूक है. लोग कह सकते हैं कि जिस वजह से वे संघर्ष कर रहे हैं वह ठीक है लेकिन इसके लिए बंदूक को जरिया बनाना गलत है. मैं नक्सलवादियों से पूछता हूं कि जब सरकार उन लोगों तक विकास पहुंचाना चाहती है,  योजना आयोग निवेश के तौर-तरीके खोजना चाहता है तो आप मोलभाव करके यह क्यों नहीं परखना चाहते कि आपके इलाकों में विकास हो रहा है कि नहीं. असल में आप इसका रास्ता रोक रहे हैं. सरकार सड़क बनाती है तो आप उसे उड़ा देते हैं, स्कूल भी तोड़ देते हैं. तो बताएं कि चाहते क्या हैं? आप अबूझमाड़ या सारंडा जाकर देखिए, नक्सलवादी इसे लिबरेटेड जोन (मुक्त क्षेत्र) कहते हैं. यहां उनके ही नियम-कानून चलते हैं. तो अब यह देखना होगा कि क्या इससे वहां रह रहे लोगों को फायदा मिल रहा है. यही चक्रव्यूह है, युद्ध में एक ऐसी स्थिति के बीच फंस जाना जहां से निकलना मुश्किल हो. आपको समझना होगा कि जंगल, खदान और खनिज जो उनके इलाके में हैं, वहां उनका अधिकार है. यही उनकी कुल संपत्ति है. लेकिन वे खुद अब एक ऐसी परिस्थिति में फंस गए हैं जहां वास्तविक शर्तों के आधार पर मोलभाव नहीं कर सकते. अब वे बंदूक के दम पर सत्ता हासिल करने की बात कर रहे हैं.

क्या आपको कभी भी ऐसा लगा कि किसी घटना विशेष पर किसी पक्ष की हिंसा जायज है?

कभी नहीं. हिंसा को तो कभी जायज नहीं ठहराया नहीं जा सकता. इससे कभी हम समाधान तक नहीं पहुंच सकते. यही बात मैंने अपनी फिल्म में कही है. चक्रव्यूह में कबीर (अभय देओल) एसपी आदिली (अर्जुन रामपाल) का करीबी दोस्त है. कबीर अपने दोस्त की मदद करने के इरादे से विरोधी पक्ष में शामिल होता है लेकिन जब वह नक्सलवादियों के साथ जुड़ता है तब उसका वास्तविकता से सामना होता है और उसमें इस विचारधारा के प्रति सहानुभूति आ जाती है. जब देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 25 फीसदी हिस्सा सौ परिवारों तक सिमटा हो और देश के 75 फीसदी परिवारों को प्रतिदिन 30 रुपये से कम की आमदनी पर गुजारा करना पड़ रहा हो तो आपको यह नहीं लगता कि हमारा तंत्र खुद अपने आप में कितना हिंसक है? नक्सलवादी आंदोलन की रीढ़ यहीं है. क्योंकि इसी आधार पर वे वर्गहीन समाज और सबके लिए बराबरी के अवसर की बात कर रहे हैं. हमारे लोकतंत्र ने गरीबों के सामने सम्मान से जीने के मौके नहीं छोड़े हैं तो इस हिसाब से यह लोकतंत्र नहीं है.

क्या आपको इस बात का डर है कि चक्रव्यूह को लेकर सेंसर बोर्ड कुछ सवाल उठाएगा?

ऐसा कुछ नहीं होगा. एक तरफ हमारे यहां नक्सलवादी हैं, दूसरी तरफ सरकार है. मैंने फिल्म में दोनों तरफ से तटस्थ रवैया अपनाया है. सेंसर बोर्ड ने एक गाना पास करने से मना कर दिया था लेकिन अब वह भी फिल्म में शामिल है. हाल ही में मैंने सुना था कि एक गांव की जन मंडली इस फिल्म का गाना गा रही थी, ‘बिरला हो या टाटा, अंबानी हो या बाटा, सबने अपने चक्कर में देश को है काटा. ‘ बोर्ड का कहना था कि मैं इस गाने से उद्योगपतियों की मानहानि कर रहा हूं, हालांकि मैंने इन्हें सिर्फ प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया था. और वे चाहते हैं तो इसका डिस्क्लेमर फिल्म में दिखाया जाएगा.

लेकिन फिल्म में असली संदर्भों के प्रयोग की जरूरत क्यों है?

देखिए, यह तो हर कोई अपनी फिल्म में  करता है. फिल्म की शुरूआत में ही लिखकर यह दावा कर दिया जाता है कि फिल्म में दिखाई गई घटनाओं या व्यक्तियों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है और यदि ऐसा होता है तो यह महज संयोग होगा. लेकिन इस बार मैं ऐसा नहीं करने वाला. संयोग वाली बात कहना मेरी तरफ से बेईमानी वाली बात होगी. मेरी फिल्म मृत्युदंड से लेकर अब तक की सभी फिल्मों के किरदार, घटनाएं और कथानक असल जिंदगी से लिए गए हैं.

चक्रव्यूह के जरिए क्या हासिल करना चाहते हैं?

यही कोशिश है कि एक ऐसा मुद्दा जिसमें दोनों पक्षों में भारी अविश्वास और अस्पष्टता है, को आम लोगों के सामने लाया जाए ताकि हम इसे समझना शुरू करें और समाधान की दिशा में आगे बढ़ पाएं. मैंने इस समस्या को हर कोण से देखने की कोशिश की है, समीकरणों पर से धुंध हटाने की कोशिश की है ताकि इसके समाधान की तरफ बढ़ा जा सके. हालांकि यह बहुत मुश्किल है क्योंकि खुद मुझे नहीं पता कि उचित समाधान क्या है. लेकिन मैं समस्या देख सकता हूं और मुझे यह सोचकर डर लगता है कि समय बीतने के साथ अविश्वास की खाई गहरी होती जा रही है.

आपकी फिल्म में महत्वपूर्ण क्या है, संदेश या कहानी?

जब तक मैं एक अच्छी कहानी नहीं कहूंगा तब तक आप फिल्म में दिलचस्पी नहीं दिखाएंगे और न इसे देखने आएंगे. यह एक लड़की के लिए लड़ रहे दो लड़कों की कहानी नहीं है. यह विचारधारा की लड़ाई है. साथ ही यह उनके अस्तित्व से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा मसला है. यह एक चुनौती है और इसे दिखाना ही मेरा काम है जो मैं लगातार करता हूं.

‘सड़क देखने से पहले ही बाबा इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे’

खदेरू बाबा!  हम उन्हें बाबा ही कहते थे. वे जाति से धोबी थे. दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान में हुए मेरे दाखिले के बारे में उनको किसी ने बताया था. उन्हें बताया गया था कि पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद मेरे पास जिला कलेक्टर से भी ज्यादा पावरहोगी. दीपावली की छुट्टी में घर जाना हुआ था. एक दिन शाम के वक्त वे मिलने पहुंचे. आस-पास बैठे दूसरे लोगों के चले जाने के बाद उन्होंने धीरे से पूछा, ‘बाबू सुननी हअईं की तू बहुत दिल्ली में पढ़त बालअ, तनी डीएम साहेब पर जोर डाली के इअ सड़किया बन जाइत.

बाबा ने पूरे अधिकारपूर्ण अनुरोध के साथ यह बात कही. साथ ही सड़क की जरूरत, अपनी सामाजिक स्थिति और आस-पास के सामंती दुराग्रह की तमाम दास्तान उन्होंने बड़े तकलीफ से बयान की. दरअसल, सड़क का संकट उनके लिए सिर्फ आने-जाने की सुविधा का सवाल नहीं था. यह अपने स्वाभिमान को खड़ा करने और सामंती दबाव से उबरने का संघर्ष भी था. बहू-बेटियों की विदाई दरवाजे से हो, यह एक पिता का सपना होता है. मगर उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले के उस गांव की तकरीबन आधी आबादी के लिए यह आज भी सपना सरीखा है. बाबा की तकलीफ सभी पीड़ित ग्रामीणों की अभिव्यक्ति थी जिसे भरोसे के साथ वे मुझसे साझा कर रहे थे. उन्होंने बताया कि सरकारी नक्शे में सड़क है लेकिन अगल-बगल के लोगों ने उस जमीन पर कब्जा कर रखा है.

वे इसे अपना खेत बताते हैं. इन्हीं खेतों के बीच में पगडंडियां हैं जिससे गांववाले मुश्किल से बाहर निकलते हैं. बरसात में तो इसकी हालत और बदतर हो जाती है. इसे भी अक्सर बंद कर दिया जाता है या रास्ते में कांटे रख दिए जाते हैं. बाबा यह भी बता रहे थे कि जिनका खेत रास्ते में पड़ता है वे दलित परिवारों को पगडंडी बंद करने की अक्सर धमकी देते हैं, अपने यहां काम करने का दबाव डालते हैं और अभद्रता से पेश आते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि हरेक नया ग्राम प्रधान यह सब समस्याएं दूर करने का वादा तो करता है मगर चुनाव के बाद बड़ी कुटिलता से अपने आश्वासन से किनारा कर लेता है. गांव में लोगों को यह विश्वास है कि एक पत्रकार अपने प्रभाव के जरिए प्रशासनिक अमले से सड़क का निर्माण मुकम्मल करवा सकता है.

बहरहाल, पढ़ाई के बाद कुछ दिन की बेरोजगारी झेलकर एक न्यूज एजेंसी में काम किया, फिर दिल्ली के ही एक अखबार में नौकरी मिल गई. इससे पिता जी के आत्मविश्वास को बल मिला जिसकी बदौलत वे तमाम अड़चनों से निपटते हुए सड़क बनवाने में कामयाब रहे. पर आधी-अधूरी. फिर भी बाबा के दरवाजे तक सड़क पहुंचने की मन में एक तसल्ली थी. लेकिन पता चला कि उसे देखने से पहले ही बाबा इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे. वहीं बाकी ग्रामीण अभी भी सड़क से जुड़ने की उम्मीद संजोए हुए हैं.

कभी-कभी ऐसा लगता है किसी भयानक सपने में कोई शैतान मेरा गला दबा रहा हो. या मैं गहरे पानी में डूब रहा हूं और कंठ में आवाज अटकी पड़ी है. यह संकट उन ग्रामीणों के आत्मविश्वास की लड़ाई में मददगार न बनने के अपराधबोध से उपजा है जो मुझे शब्दहीन और अपंग बनाता है. आखिर पत्रकारिता का अर्थ क्या है, यह ताकत है या लोकतंत्र को कारगर बनाए रखने का उपकरण. अनुभव कहता है कि दिग्भ्रमित राजनीति के दौर में पत्रकारिता संचार का माध्यम होने भर से ज्यादा कुछ भी नहीं है. वॉयस ऑफ वायसलेसहोकर भी वॉयसलेस है. इसे लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में पेश किया जाता है लेकिन आज पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग निरीह बनकर रह गया है.

सामान्य-सी समस्या को सत्ता तक पहुंचा न पाने का मुझे मलाल रहेगा. पता नहीं बाबा को किस खबरनवीस ने ये खबर सुना दी थी कि पत्रकार के पास जिला कलेक्टर से ज्यादा पावर होती है. बाबा, माफ करना. मैं तुम्हारी सड़क नहीं बनवा सका. सड़क भी देखे बिना न जाने कितने बाबा दुनिया से चले गए. बाबाओं को इस तरह तकलीफों से भरकर जाते देखना मुझ जैसों की अपंगता ही तो कही जा सकती है.

एक रैंक-एक पेंशन विवाद

क्या है वन रैंक-वन पेंशन का मामला?   

सेवानिवृत्त सैनिकों को मिलने वाली पेंशन में असमानता के चलते देश भर के लाखों पूर्व सैनिक प्रभावित हो रहे हैं. इन्हीं असमानताओं के विरोध में पूर्व सैनिक पिछले 30 साल से ‘वन रैंक-वन पेंशन’ की मांग कर रहे हैं. ‘वन रैंक-वन पेंशन’ का तात्पर्य है कि समान वर्ष तक सेवा प्रदान करने वाले और एक ही पद से सेवानिवृत हुए सैनिकों को (चाहे उनके सेवानिवृत्त होने की तिथि कोई भी हो) समान पेंशन दी जाए जिसमें सभी वृद्धियां शामिल हों. वर्तमान में 2006 से पहले और उसके बाद सेवानिवृत्त हुए सैनिकों की पेंशन में यह अंतर सबसे ज्यादा है. पूर्व सैनिकों की मांग है कि उनकी पेंशन समान की जाए.

क्या है सरकार का रुख? 

पेंशन के इस अंतर को कम करने हेतु केंद्र सरकार द्वारा पहले भी दो बार पूर्व सैनिकों की पेंशन में वृद्धि की जा चुकी है. इसके बाद भी जब ‘वन रैंक-वन पेंशन’ का मुद्दा नहीं सुलझाया जा सका तब प्रधानमंत्री ने कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया. समिति के निर्देशानुसार 24 सितंबर को सैनिकों की पेंशन में वृद्धि हेतु 2,300 करोड़ रूपये स्वीकृत किए गए. इस स्वीकृति के साथ ही यह घोषणा भी की गई कि ‘वन रैंक-वन पेंशन’ का मुद्दा सुलझाया जा चुका है. 

इस घोषणा के बाद भी पूर्व सैनिक क्यों नाराज हैं?   

 2,300 करोड़ रुपये स्वीकृत करके सरकार पेंशन के इस अंतर को कम करने का दावा कर रही है, मगर पूर्व सैनिकों की मांग है कि इस अंतर को कम नहीं बल्कि पूर्ण रूप से खत्म किया जाए. पेंशन में इससे थोड़ी वृद्धि हुई है, मगर अब भी 2006 से पहले और उसके बाद एक ही पद से सेवानिवृत्त हुए सैनिकों की पेंशन में भी अंतर मौजूद है. पूर्व सैनिकों के अनुसार ‘वन रैंक-वन पेंशन’ का उद्देश्य यह भी है कि किसी भी अवस्था में किसी सीनियर को अपने जूनियर से कम पेंशन ना मिले. इस घोषणा के बाद भी यह उद्देश्य अधूरा है.

-राहुल कोटियाल

कौन बोलेगा वहां हिंदी?

जब हमारे किसी प्रतिनिधि को संयुक्त राष्ट्र में हिंदी बोलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती तो वहां हिंदी को मान्यता दिलाने से क्या होगा?

जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में फिर से यह प्रस्ताव पारित हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को मान्यता दिलाने की मुहिम आगे बढ़ाई जाए. किसी भी हिंदीभाषी या हिंदी प्रेमी के भीतर यह सहज कामना होनी चाहिए कि उसकी भाषा हर जगह बोली या समझी जाए और उसे हर मंच पर सम्मान मिले.  इसलिए विश्व हिंदी सम्मेलन में ऐसे किसी प्रस्ताव पर किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए.

लेकिन क्या संयुक्त राष्ट्र में अभी हिंदी बोलने पर पाबंदी है?  वहां अब भी किसी भी भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है, नियम बस इतना है कि उस भाषण का   अनुवाद सिर्फ छह मान्यता प्राप्त भाषाओं- चीनी, अंग्रेजी, अरबी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनी- में होगा. 1977 में विदेश मंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था तो उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा था. लेकिन 1977 से पहले और उसके बाद अब तक क्या किसी दूसरे विदेश मंत्री ने वहां हिंदी या किसी दूसरी भारतीय भाषा में बोलने की जरूरत महसूस की? अगर नहीं तो फिर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को मान्यता दिलाकर क्या होगा? क्या हम इससे खुश होंगे कि वहां हमारे प्रतिनिधियों के अंग्रेजी भाषणों के हिंदी अनुवाद की व्यवस्था हो गई है?

सच तो यह है कि चंद भावुक या होशियार हिंदीप्रेमियों के अलावा किसी और को संयुक्त राष्ट्र या किसी भी मंच पर हिंदी को मान्यता दिलाने का सवाल नहीं सताता. भाषा हमारे राजनीतिक व्यवहार, सरोकार और एजेंडे से पूरी तरह बाहर हो चुकी है. कभी हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का इकहरा और बेमानी नारा देने वाले जनसंघ की राजनीतिक वारिस भारतीय जनता पार्टी को अब उस नारे की व्यर्थता खूब समझ में आती है-इसलिए नहीं कि उसने अपनी भाषा नीति पर कोई विशेष चिंतन किया है, बल्कि इसलिए कि भाषा और वोट के बीच बढ़ती दूरी देखते हुए वह भाषा के सवाल में अपनी दिलचस्पी खो बैठी है.

एक दौर में डॉ राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी राजनीति ने जरूर भारतीय भाषाओं का सवाल उठाया, लेकिन वह धारा भी न जाने कब की तिरोहित हो चुकी है. उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जरूर हिंदी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन समाजवादी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में भाषा का सवाल किस हाशिये पर है, किसी को नहीं मालूम. जबकि कांग्रेस ने कभी विचारधारा वाला दल होने का दावा नहीं किया. वह हमेशा से अलग-अलग शक्तियों का एक उलझा हुआ संतुलन साधती रही जिसने सुविधापूर्वक खुद को भाषा के सवाल से अलग रखा और अंग्रेजी की छतरी ताने रखी.

दरअसल सच्चाई यह है कि आज के भारत का राजनीतिक प्रतिष्ठान- चाहे वह ममता या वाम मोर्चे द्वारा शासित पश्चिम बंगाल हो या द्रमुक या अन्ना द्रमुक द्वारा शासित तमिलनाडु या कांग्रेस-राकांपा या शिवसेना-बीजेपी द्वारा शासित महाराष्ट्र- वैश्विक अंग्रेजी के आगे पूरी तरह घुटने टेक चुका है. हमारी राजनीति इतनी सतही और भोथरी हो चुकी है कि वह बस बिल्कुल तह पर चल रही प्रक्रियाएं देख पाती है और उसी के ढंग से अपनी प्रतिक्रियाएं तय कर पाती है. यह बात उसे कतई समझ में नहीं आती कि देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास में भाषाओं की अहम भूमिका होती है. भाषाएं राष्ट्र का मानस गढ़ती हैं.

या अगर यह बात समझ में आती भी हो तो एक तरह की आम सहमति इस पर बनी हुई है कि अब अंग्रेजी ही इस मुल्क का दिमाग तैयार करेगी. तमाम राज्यों में जिस तरह अंग्रेजी पढ़ने पर जोर दिया जा रहा है, जिस तरह भाषाई माध्यमों के स्कूलों की अनदेखी करके अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस तरह हमारे पूरे मध्यवर्गीय समाज में अंग्रेजी की जरूरत बिल्कुल मानसिक स्तर पर रोप दी गई है, उसे देखते हुए यह साफ है कि भारतीय भाषाओं की लड़ाई कहीं पीछे छूट चुकी है अंग्रेजी इस देश के शासक वर्ग की नई भाषा है.

 काश कि इस देश में कोई एक राजनीतिक दल होता जो भारतीय भाषाओं में रोटी और रोजगार मुहैया कराने का आंदोलन छेड़ता. लेकिन आज के भारत में ऐसे आंदोलन की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं? सच तो यह है कि इस ग्लोबल दुनिया में जैसे हमने मान लिया है कि हमारा विकास अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों-संस्थाओं और भाषाओं की मार्फत ही हो सकता है. हमें अपनी आर्थिक खुशहाली के लिए अंतरराष्ट्रीय पूंजी चाहिए, अपने मनोरंजन के लिए हॉलीवुड की फिल्में चाहिए, अपनी समझ के लिए बाहर से आई किताबें चाहिए और ज्ञान व संवेदना के इन सारे स्रोतों तक पहुंचने के लिए भाषा के तौर पर अंग्रेजी चाहिए. अंग्रेजी की इस विराट अपरिहार्यता के आगे हिंदी की जरूरत किसे है और कितनी है?

बेशक, जरूरत है और बहुत सारे लोगों को है. सवा अरब के भारत में एक अरब से ज्यादा लोग अब भी भारतीय भाषाओं के सहारे अपना जीवनयापन कर रहे हैं, लेकिन उनके जीवन, उनकी संस्कृति, उनके समाज के साथ वही सलूक हो रहा है जो उनकी भाषाओं के साथ हो रहा है- दोनों मर्मांतक उपेक्षा के शिकार हैं. उनके सामने चुनौती है कि वे या तो बदल जाएं या फिर विलुप्त हो जाएं. बाकी 20-25 करोड़ की आबादी या तो अंग्रेजी के साथ चल रही है या फिर उससे गठजोड़ करके काम चला रही है.

दुनिया भर में घूम कर हिंदी सम्मेलन करने वाले और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की मान्यता का प्रस्ताव पास करने वाले या तो इस चुनौती से बेखबर हैं या उन्होंने इससे आंखें मूंद रखी हैं. वरना वे संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को मान्यता दिलाने की मुहिम चलाने से पहले निजी स्कूलों और सामाजिक जीवन के दूसरे व्यवहारों में हिंदी को मान्यता दिलाने का आंदोलन चलाते. और याद रखते कि ऐसा आंदोलन अकेले हिंदी का नहीं हो सकता, इसे सभी भारतीय भाषाओं के साथ  मिलकर ही चलाया जा सकता है. 

उधर कुआं, इधर खाई

लगातार बढ़ते वित्तीय घाटे ने मनमोहन सरकार को इस हालत में ला पटका है कि वह कुछ करे तो मुश्किल है और न करे तो और भी बड़ी मुसीबत है.

कांग्रेसनीत यूपीए सरकार अगर अचानक ही एक के बाद एक आर्थिक फैसले लेने लगी है तो उसके पीछे का संदर्भ जानना भी जरूरी है. 31 अगस्त को भारत के लेखा महानियंत्रक ने जो आंकड़े जारी किए वे बताते हैं कि इस बार बजट में पूरे साल के लिए जितने वित्तीय घाटे का अनुमान लगाया गया था उसमें से 51.5 फीसदी घाटा तो इस वित्तीय वर्ष के पहले चार महीने में ही हो चुका है. मार्च में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने वादा किया था कि वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 5.1 फीसदी से आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा. अब चिंता जताई जा रही है कि यह आंकड़ा छह फीसदी को पार कर सकता है. गौरतलब है कि 2011-12 में सरकार ने वित्तीय घाटे को 4.6 फीसदी तक सीमित रखने का वादा किया था लेकिन साल बीतते-बीतते यह रहा 5.9 फीसदी. 

दरअसल लगातार दो साल के बेलगाम सार्वजनिक व्यय से देश का वित्तीय तंत्र चरमरा गया है. अंतरर्राष्टीय रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग बुरी तरह से गिराने के लिए तैयार बैठी हैं. इस साल तो सरकार के पास पिछले साल जैसा बहाना भी नहीं है जब तेल के दाम बहुत ऊंचे थे और कच्चे तेल के आयात और उस पर दी जाने वाली सब्सिडी से राजकोषीय घाटे पर बहुत ज्यादा दबाव था. आज तो स्थिति उलट है. 2012 में कच्चे तेल के दाम गिरे हैं. इसलिए सरकार की पहली प्राथमिकता वित्तीय घाटे पर अपेक्षित लगाम लगे, ऐसी स्थिति बहाल करना है. गौरतलब है कि डीजल के दाम पांच रु प्रति लीटर बढ़ाने और सस्ते एलपीजी सिलेंडरों पर एक सीमा बांधने से भी1,87000 करोड़ रु के तेल सब्सिडी बिल में महज 11 फीसदी की कमी आएगी.

सीधी-सी बात है कि घाटा कम करना है तो या तो खर्च में कमी लानी होगी या फिर आय यानी राजस्व के स्त्रोत बढ़ाने होंगे

अब सीधी-सी बात है कि घाटा कम करना है तो या तो खर्च में कमी लाइए या फिर आय यानी राजस्व के स्रोत बढ़ाइए. यह घाटा असाधारण रूप से ज्यादा हो गया है तो इसका एक कारण यह भी है कि पिछले आठ साल में यूपीए सरकार ने लोकलुभावन योजनाओं पर बेतहाशा खर्च किया है. कर्ज माफी सहित तमाम कल्याणकारी योजनाओं ने सरकारी खजाने पर बुरा असर डाला है. अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के चलते कांग्रेस को यह लोकलुभावन राह छोड़ना मुश्किल लग रहा है. 2013 के बजट सत्र में आने वाला खाद्य सुरक्षा बिल वित्तीय घाटे के इस बोझ में और बढ़ोतरी ही करेगा. 

अब सरकार के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह आय के स्रोत बढ़ाए. यानी ज्यादा राजस्व का इंतजाम करे. लेकिन पिछले कुछ साल के दौरान विकास पहले जैसी रफ्तार से नहीं हो रहा इसलिए कर संग्रह में भी अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पा रही. यानी लीक से हटकर कुछ सोचना होगा. वित्त मंत्री पी चिदंबरम कुछ अस्थायी इंतजामों से उम्मीद कर रहे हैं. जैसे कि टूजी स्पेक्ट्रम की नीलामी जो जनवरी, 2013 से पहले होनी है. सरकार भले ही ए राजा के समय हुए आवंटनों का बचाव करे लेकिन सच्चाई यह है कि इन आवंटनों के रद्द होने से उसे एक तरह से फायदा ही हुआ है. नीलामी के लिए रिजर्व प्राइस यानी एक तय कीमत 14,000 करोड़ रु रखी गई है. यह रकम संकट के इस समय सरकार के बहुत काम आएगी.

इसके बाद दूसरा जरिया है चुनिंदा सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश. मार्च, 2012 में जब बजट पेश हुआ था तो उसमें इस रास्ते के माध्यम से 30 हजार करोड़ रु जुटाने का लक्ष्य रखा गया था. 2011 में यह लक्ष्य 40 हजार करोड़ रु रखा गया था, लेकिन साल के आखिर में 14 हजार करोड़ रु ही जुटाए जा सके. इस साल यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है बशर्ते शेयर बाजार का रुख सकारात्मक रहे. इसके लिए अच्छे संकेत जाने जरूरी हैं और वित्त मंत्री की सारी कवायद इसी दिशा में केंद्रित लगती है. रीटेल या उड्डयन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेश निवेश का फैसला लेने या रेट्रोएक्टिव टैक्स (पुराने सौदों पर लगने वाला कर) पर ढील का रुख दिखाने का मकसद यही है कि अर्थव्यवस्था में कुछ उम्मीद का संचार हो. सरकार के ये कदम उसकी मजबूरी हैं.

इस हकीकत को देखते हुए कांग्रेस के लिए यही एक रास्ता होगा कि वह लोगों के सामने खुद को इस तरह पेश करे कि वह तो आर्थिक सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन तृणमूल कांग्रेस इस राह में अड़ंगा लगा रही है. अगर चौतरफा आलोचना के बीच वह लोगों को यह समझाने में कामयाब हो जाती है तो उसके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी.

फैसले का फलसफा

केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने के पीछे ममता बनर्जी की रणनीति क्या है? इस एक फैसले से तृणमूल कितने सियासी फायदे की उम्मीद कर रही है? हिमांशु शेखर की रिपोर्ट.

हाल ही में यूपीए सरकार ने जब एक झटके में कई आर्थिक फैसले लिए और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इन फैसलों को वापस लेने के लिए अल्टीमेटम दिया तो किसी ने भी उन्हें खास गंभीरता से नहीं लिया. न राजनीतिक वर्ग ने और न ही मीडिया ने. वजह यह थी कि कांग्रेसनीत सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी ममता पहले भी कई बार गरजी थीं और फिर बगैर बरसे ही शांत हो गई थीं. इस बार भी यही माना जा रहा था. कहा जा रहा था कि ज्यादा होगा तो ममता केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने मंत्रियों को वापस बुला लेंगी. लेकिन हुआ उलटा. ममता ने केंद्र सरकार की नीतियों को जनविरोधी बताते हुए अपना समर्थन वापस ले लिया. पश्चिम बंगाल में वे कांग्रेस के सहयोग से सरकार चला रही थीं. हालांकि तृणमूल कांग्रेस के पास वहां खुद ही बहुमत था लेकिन दोनों दलों का चुनाव से पहले का गठबंधन बाद में भी बना रहा. अब कांग्रेस ने भी बंगाल में सरकार से समर्थन वापस ले लिया है. 

अब सवाल यह है कि ममता का केंद्र सरकार से अलग होने का मतलब उनके प्रदेश के लिए क्या हैं. इस सवाल का जवाब देने के लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना बहुत जरूरी है. पूर्वी भारत के इस राज्य में 30 साल से अधिक समय तक वाम दलों की सरकार रही है. बड़ी मुश्किल से ममता ने इन्हें 2011 में राज्य की सत्ता से बेदखल किया. वे राज्य में भाजपा के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ी हैं, लेकिन उन्हें कामयाबी मिली कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद. प. बंगाल में कांग्रेस और भाजपा यानी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की हालत खराब है. दोनों सहयोगी की भूमिका में ही रह सकती हैं. इसलिए ममता जानती हैं कि राज्य में उनका असल मुकाबला वाम दलों से है. उन्हें यह भी पता है कि अगर उन्होंने कोई सियासी गलती की तो पश्चिम बंगाल में वाम दल मजबूत होंगे और इसका राजनीतिक खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा. 

अब सवाल यह है कि आखिर इसका केंद्र से समर्थन वापस लेने से क्या संबंध है. वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ‘ममता ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेकर राजनीतिक स्तर पर दो मकसद साधे हैं.  प. बंगाल में चुनावी मुद्दे गरीबों से हमदर्दी के आस-पास केंद्रित रहते हैं. वाम दलों ने तीन दशकों तक इन्हीं मुद्दों के सहारे राज किया. ममता को पता है कि अगर उन्होंने कोई गलती की तो इसका सीधा फायदा वाम दलों को होगा. इसलिए उन्होंने खुदरा में विदेशी निवेश, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाने के मसले पर समर्थन वापस लेकर यह संदेश दिया है कि राज्य के गरीबों की चिंता वाम दलों को नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस को भी है.’ वे आगे कहते हैं, ‘समर्थन वापस लेकर ममता ने बतौर मुख्यमंत्री अपने तकरीबन डेढ़ साल के कार्यकाल में जो गलतियां की थीं उन्हें ठीक करने की कोशिश की है. इस दौरान कई तरफ यह बात चलने लगी थी कि ममता बंगाल के लिए कुछ नहीं कर पा रही हैं. लेकिन संप्रग से अलग होने के बाद उन्हें उम्मीद है कि जनता का भरोसा उन पर बना रहेगा.’

पहले भी ममता बनर्जी ने कुछ ऐसे काम किए हैं जिससे ऐसा लगता है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी गरीबपरस्त छवि के साथ समझौता नहीं करना चाहती हैं. जब पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार ने खुदरा में विदेशी निवेश को हरी झंडी दे दी थी तो उस वक्त भी ममता अड़ गई थीं. उस वक्त उत्तर प्रदेश में चुनाव होने थे इसलिए केंद्र सरकार को बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव और मायावती की सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं. यही वजह है कि केंद्र सरकार को ममता के आगे झुकना पड़ा और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का निर्णय टालना पड़ा. तब भी ममता ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि गरीबों की असली हितैषी वे ही हैं. डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर भी ममता  केंद्र सरकार से कई बार टकराती हुई दिखीं. यह बात तो कांग्रेस को रेल बजट के वक्त ही समझ में आ जानी चाहिए थी कि वे किसी कीमत पर अपनी गरीबपरस्त छवि से समझौता नहीं करेंगी. रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने जब बजट में यात्री किराया बढ़ाने का प्रस्ताव किया तो इसका सबसे अधिक विरोध उन्हीं की पार्टी तृणमूल ने किया. अंततः दिनेश त्रिवेदी को इस्तीफा देना पड़ा और किराये में प्रस्तावित बढ़ोतरी नहीं हो पाई.

ममता बनर्जी जब से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी हैं तब से लगातार इस कोशिश में हैं कि राज्य को विशेष पैकेज मिल जाए क्योंकि इसकी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोटे कर्ज का ब्याज देने में ही चला जाता है. जब प्रणब मुखर्जी केंद्रीय वित्त मंत्री थे तो ममता ने इसके लिए काफी कोशिशें कीं लेकिन नतीजा सिफर रहा. जब तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें केंद्र से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था तो ममता की नाराजगी स्वाभाविक है. जानकार बताते हैं कि केंद्र  द्वारा पश्चिम बंगाल को आर्थिक सहयोग देने की राह में सबसे बड़ी अड़चन थी ममता की राजनीति की शैली. केंद्र जिस तरह के आर्थिक बदलाव पश्चिम बंगाल में चाह रहा था उसके लिए ममता तैयार नहीं थीं. इस नाते देखा जाए तो उनको केंद्र सरकार के साथ रहने का कोई फायदा नहीं मिल रहा था. बंगाल की जनता में यह बात होने लगी थी कि ममता राज्य में भी हैं और केंद्र में भी लेकिन सूबे का विकास नहीं हो पा रहा है. ठाकुरता कहते हैं, ‘कांग्रेस के साथ रहते हुए ममता के पास यह विकल्प नहीं था कि वे जिस ढंग से वाम दलों पर हमला करती हैं उसी तरह से कांग्रेस पर भी कर सकें. लेकिन अब वे कांग्रेस पर प. बंगाल के साथ भेदभाव का आरोप लगा सकती हैं. वे जनता को यह संदेश दे सकती हैं कि केंद्र सरकार अपने वादे से मुकर रही है और राज्य को उसका हक नहीं दे रही है. अगर ममता इस संदेश को सही ढंग से लोगों के बीच पहुंचाने में कामयाब हुईं तो 2014 के चुनावों में उन्हें और मजबूती मिल सकती है. चाहे राज्य सरकार का प्रदर्शन कैसा भी रहे.’ 

दरअसल, कई राजनीतिक जानकार केंद्र से अलग होने के ममता के फैसले को अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखते हैं.  संगठन के लिए काम कर रहे एक बड़े कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘ममता जब केंद्र पर भेदभाव का आरोप लगाएंगीं तो उन्हें वैसे मुख्यमंत्रियों का स्वाभाविक समर्थन मिलेगा जो पहले से ही केंद्र पर ऐसा आरोप लगा रहे हैं. ये मुख्यमंत्री इसलिए भी ममता का समर्थन करेंगे कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले उनसे इनके रिश्ते ठीक रहें. पता नहीं कब किसे किसकी जरूरत पड़ जाए.’ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक केंद्र सरकार पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाते रहे हैं. एनसीटीसी के मसले पर ममता, नीतीश और नवीन ने एकजुटता भी दिखाई थी. उस वक्त यह बात भी चली थी कि ममता चाहती हैं कि पूर्वी भारत के राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र की भेदभावपूर्ण नीति के खिलाफ एक साथ मिलकर काम करें. जानकारों की मानें तो अब ममता इस विकल्प की व्यावहारिकता परखने का काम भी करेंगी.

ममता ने पार्टी नेताओं को भरोसा दिलाया है कि समर्थन वापसी से उन्हें कोई राजनीतिक नुकसान नहीं बल्कि फायदा ही होगा

जानकार यह भी बताते हैं कि ममता एक साथ कई राजनीतिक संभावनाएं टटोल रही हैं. एक तरफ वे पूर्वी भारत के मुख्यमंत्रियों का समूह बनाकर नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में हैं तो दूसरी तरफ शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और करुणानिधि की डीएमके से भी उनकी नजदीकियां बढ़ रही हैं. सूत्र बताते हैं कि इन तीनों दलों के प्रतिनिधियों के बीच दो दौर की बातचीत हुई भी है. ऐसे में एक संभावना यह भी है कि ये तीनों दल मिलकर किसी राजनीतिक प्रयोग की योजना बना रहे हों. तीसरी संभावना यह बनती है कि ममता भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो जाएं. वे इस गठबंधन में न सिर्फ पहले रह चुकी हैं बल्कि गठबंधन की सरकार में रेल मंत्री भी रही हैं. हालांकि इसकी संभावना काफी कम बताई जा रही है. एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘ममता को पता है कि पश्चिम बंगाल में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां जीत-हार में मुसलमान वोटों की बड़ी भूमिका होती है. अगर ममता भाजपा के साथ जाती हैं तो यह वोट उनसे अलग होगा. इसलिए ममता ऐसी गलती नहीं करेंगी. 2014 के चुनाव के बाद भी इसकी संभावना इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे. ‘ऐसे में एक संभावना यह भी बनती है कि अगले लोकसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस का विरोध करते हुए ममता राज्य में अधिक से अधिक सीटें हासिल करें और अगर संप्रग के तीसरी बार सत्ता में आने की कोई स्थिति बनती है तो वे फिर से कांग्रेस के साथ खड़ी दिखें.

हालांकि, तृणमूल के लिए भी कांग्रेस से अलग होने का फैसला आसान नहीं था. यही वजह है कि जिस बैठक में अलग होने का फैसला किया गया वह बैठक तीन घंटे से अधिक देर तक चली. यह बात हर कोई जानता है कि क्षेत्रीय दलों में फैसले कैसे लिए जाते हैं. ममता की छवि भी खुद ही निर्णय लेने वाली नेता की रही है. लेकिन इसके बावजूद इतनी लंबी बैठक करके यह फैसला किया गया है. इस बैठक में शामिल ममता बनर्जी के एक सहयोगी बताते हैं, ‘इस बैठक में भी और इसके पहले भी पार्टी में दो राय थी. कुछ लोग यह चाहते थे कि सिर्फ मंत्री वापस लिए जाएं और समर्थन वापस नहीं लिया जाए. कांग्रेस के साथ रिश्ते बरकरार रखने की वकालत करने वाले नेताओं में प्रमुख नाम है राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्रा का. इन नेताओं की चिंता यह भी थी कि बंगाल के लिए चलाई जा रही केंद्र की तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं का भविष्य अधर में लटक जाएगा. लेकिन हर कोई यह मान रहा था कि दीदी जो फैसला करेंगी वही सही होगा.’

तो क्या यह फैसला सिर्फ दीदी का है? वे कहते हैं, ‘बैठक में दीदी ने हर किसी की बात सुनी. उन्होंने पहली बार चुनकर आए विधायकों की बात को भी गंभीरता से सुना. जब बैठक शुरू हुई तो उन्होंने सबसे पहले पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बोलने के लिए कहा. इसके बाद पार्टी सांसद हाजी नुरुल इस्लाम बोले. पहली बार विधायक बनाकर आए बेचराम मन्ना को भी बोलने का अवसर मिला. एक केंद्रीय मंत्री का कहना था कि समर्थन वापस लेने से राज्य की रेल परियोजनाएं लटक जाएंगी. लेकिन ज्यादातर नेताओं ने कहा कि केंद्र से समर्थन वापस लेने का वक्त आ गया है. दीदी अंत में बोलीं और समर्थन वापसी का फैसला सुनाया.’ इस बैठक में ममता ने पार्टी नेताओं को यह भरोसा दिलाया कि समर्थन वापसी से उन्हें कोई राजनीतिक नुकसान नहीं बल्कि फायदा ही होगा. 

बहरहाल, केंद्र सरकार से अलग होने की वजह से पश्चिम बंगाल की तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं. राज्य में 70,000 करोड़ रुपये की रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इसके अलावा तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये की मेट्रो रेल परियोजना का मामला भी अब लटक सकता है. साथ ही 16,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित पैकेज में भी अब देरी हो सकती है. हालांकि, रेल मंत्रालय का कार्यभार संभालने वाले सीपी जोशी ने  कहा है कि प. बंगाल के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ेगा. लेकिन खबर लिखे जाने तक रेलवे द्वारा जारी की गई दुर्गा पूजा स्पेशल ट्रेनों की लिस्ट में पश्चिम बंगाल के लिए कोई गाड़ी शामिल न होने से संकेत कुछ और दिख रहे हैं. हालांकि ठाकुरता कहते हैं कि केंद्र राज्य की परियोजनाओं को टालने का जोखिम नहीं ले पाएगी क्योंकि उसे पता है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद फिर से कांग्रेस को ममता की जरूरत पड़ सकती है.  

अनबूझ अनुमान

300 करोड़ रु सालाना खर्च वाले जिस मौसम विभाग की जिम्मेदारी देश को हवा का ठीक-ठीक रुख बताना है उसकी भविष्यवाणियां खुद हवा के रुख के हिसाब से बदलती रहती हैं. राहुल कोटियाल की रिपोर्ट.

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ‘हरेला’ नाम का एक त्योहार मनाया जाता है. इस दौरान घर में ही किसी बर्तन में सात तरह के बीज बोए जाते हैं और फिर लगातार नौ दिन तक उन्हें पानी से सींचा जाता है. बीजों से जो हरियाली उग आती है उसे ही हरेला कहते हैं. नवें दिन हरेला काटा जाता है और उसे श्रद्धापूर्वक सबमें बांट दिया जाता है. इसी हरेला से लोग उस साल की फसल का अंदाजा भी लगाते हैं. मान्यता है कि अगर हरेला लंबा है तो फसल भी अच्छी होगी. यानी फसल बोने से पहले ही लोग अनुमान लगा लेते हैं कि मौसम साथ देगा या नहीं. मौसम का अनुमान लगाने के ऐसे कई पारंपरिक तरीके विज्ञान के इस युग में भी देश के हर हिस्से में मिल जाएंगे. वैसे तो इसी दौर में मौसम का अनुमान लगाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से लैस भारतीय मौसम विज्ञान विभाग भी है, लेकिन उसकी भविष्यवाणियों का यह हाल है कि उनसे ज्यादा लोगों को एक बड़ी हद तक अपने पारंपरिक तरीकों पर ही भरोसा है.

भारत जैसे कृषिप्रधान देश में अन्न के उत्पादन और जल स्रोतों की पुनः पूर्ति के लिए यह जरूरी है कि बरसात समय पर हो. देश में 80 प्रतिशत बारिश चौमासे यानी मानसून के दौरान ही होती है. सकल घरेलू उत्पाद में14 फीसदी योगदान करने वाला और करीब 65 प्रतिशत आबादी को रोजगार देने वाला कृषि क्षेत्र मुख्य रूप से वर्षा पर ही निर्भर है. भारत में हर साल जल उपलब्धता और फसल की पैदावार सामान्य या कम होना भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर होता है. 2009 का भयंकर सूखा बताता है कि मानसून में देरी या अपर्याप्त वर्षा से देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इसलिए कुछ महीनों पहले होने वाली मौसम की भविष्यवाणी का मकसद यह होता है कि भारतीय कृषि को मानसूनी अनिश्चितता से कुछ हद तक सुरक्षा मिले. 

लेकिन रंग बदलने की वह बदनामी अब मौसम विभाग पर भी चस्पा हो गई है जिसके लिए खुद मौसम हमेशा से बदनाम रहा है. इस साल अप्रैल में विभाग का अनुमान था कि औसत बरसात के 99 फीसदी के साथ मानसून सामान्य रहेगा. फिर जून में विभाग ने अपना अनुमान घटाते हुए कहा कि बरसात 96 प्रतिशत होगी. इसके बाद भी जब मौसम अनुमानों के विपरीत ही बना रहा तो हारकर अगस्त में भविष्यवाणी हुई कि बरसात 90 प्रतिशत से कम ही रहेगी. यह कहने भर की ही देर थी और मानसून जमकर बरस गया. शायद यही वजह थी कि हाल ही में मानसून सत्र के दौरान विज्ञान एवं तकनीक राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने भी मौसम विभाग पर उंगली उठाई. उनका यह भी कहना था कि पिछले कई वर्षों से विभाग लगातार गलत भविष्यवाणी कर रहा है. 

वैसे इस साल कई निजी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत के मानसून का अनुमान लगाते हुए पहले ही कम बरसात के संकेत दे दिए थे, लेकिन मौसम विभाग इन सभी अनुमानों को ठुकराता रहा. इस बारे में बात करने पर विभाग के वैज्ञानिक डॉ. डीएस पई बताते हैं, ‘मौसम विभाग की क्षमताएं मानसून का अनुमान लगाने वाली अधिकतर निजी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बहुत बेहतर हैं.’ वे आगे कहते हैं कि इस साल किसी भी ऐसी संस्था ने कम बारिश का अनुमान नहीं लगाया  था जिसकी प्रक्रिया और क्षमताएं उनके विभाग से बेहतर और विश्वसनीय हों.

यह कोई पहली बार नहीं था जब मौसम विभाग के अनुमान गलत साबित हुए हों. 2009 में भी उसने बताया था कि मानसून सामान्य रहेगा, लेकिन उस साल भारत को पिछले लगभग चार दशकों का सबसे भीषण सूखा झेलना पड़ा था. इसके अलावा 1994 में आई बाढ़ और 1987, 2002, 2004, 2007 और 2009 में पड़े सूखे का भी विभाग को कोई अनुमान नहीं था. इसके बाद भी डॉ. पई अपने विभाग के बचाव में कहते हैं, ‘मौसम का अनुमान लगाने की हमारी क्षमताएं उतनी ही बेहतर हैं जितनी कि किसी भी अन्य देश की. वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली प्रक्रिया ज्यादा बेहतर साबित हो रही है. हालांकि इसमें भी कुछ हद तक सुधार की गुंजाइश है जिसके प्रयास भी किए जा रहे हैं.’

मौसम विभाग की वेबसाइट बताती है कि उसका काम है मौसम से प्रभावित होने वाली कृषि और सिंचाई जैसी गतिविधियों के लिए मौसम संबंधी पूर्वानुमान तथा जानकारी मुहैया कराना. इसके साथ ही उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों, धूल भरी आंधी, भारी बारिश और बर्फबारी, गर्म और ठंडी हवाओं आदि को लेकर जरूरी चेतावनी जारी करना. विभाग कृषि, जल संसाधन प्रबंधन, उद्योग जगत, तेल उत्खनन और राष्ट्र निर्माण की अन्य गतिविधियों के लिए मौसम संबंधी जरूरी आंकड़े भी मुहैया कराता है. विभाग की अगुवाई एक महानिदेशक, पांच अतिरिक्त महानिदेशक और 20 उपमहानिदेशक करते हैं. विभाग के पास एक सुपर कंप्यूटर और कई अत्याधुनिक उपकरण हैं. लेकिन उसे लेकर जो आम धारणा है वह इस पूरे ढांचे का मखौल उड़ाती लगती है.

अपनी सफाई में मौसम विभाग का एक तर्क यह भी होता है कि सन 1989 से 2000 तक उसके अनुमान लगातार 11 साल तक सही रहे हैं. इन वर्षों में भी मौसम विभाग ने हर बार की ही तरह लगभग सामान्य मानसून का अनुमान जारी किया था. अब यदि पिछले 100 साल के दौरान मानसून की प्रवृत्ति देखी जाए तो पता चलता है कि 85 प्रतिशत मौकों पर मानसून सामान्य ही रहा है. यानी सामान्य मानसून की संभावनाएं हमेशा ही ज्यादा होती हैं. आलोचकों के मुताबिक ऐसे में यह अनुमान कि मानसून सामान्य रहेगा, ज्यादातर मौकों पर सही ही होगा. एक वर्ग तो यह भी कह देता है कि मौसम विभाग का अनुमान वैसा ही होता है जैसा अखबारों में छपने वाला राशिफल जिसे न तो पूरी तरह झुठलाया ही जा सकता है और न यह उपयोगी या विश्वसनीय होता है. 

केंद्र से करीब 350 करोड़ रु सालाना बजट पाने वाले विभाग के अनुमान अगर किसी के लिए भी सहायक साबित न होकर महज औपचारिकता ही बने रहें तो उनकी प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है. मौसम विभाग के गलत अनुमानों से जो वर्ग सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं उनमें से एक है किसान. पिछले कई सालों से किसान वर्ग को मौसम विभाग के गलत अनुमानों का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है. भारतीय किसान संघ के सचिव मोहिनी मोहन शर्मा कहते हैं, ‘पिछले 23 सालों में मौसम विभाग सिर्फ नौ बार ही मानसून का सही अनुमान लगाने में कामयाब हुआ है. गलत अनुमानों के चलते हर साल किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है. इससे खाद्य पदार्थों की कीमत में उछाल आता है और अंततः भुगतना तो जनता को ही पड़ता है.’ अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव पुरुषोत्तम शर्मा कहते हैं, ‘गलत अनुमानों से तो किसान प्रभावित होते ही हैं, समय-समय पर मौसम विभाग द्वारा अपने अनुमानों में जो सुधारात्मक परिवर्तन किए जाते हैं वे कभी भी किसानों तक नहीं पहुंच पाते.

मौसम विभाग के अनुमानों को सीधे किसानों तक पहुंचाने की कोई भी व्यवस्था नहीं है. यदि किसानों तक सुधारात्मक या अल्पकालीन अनुमान भी पहुंच जाएं तो कुछ खतरों से तो बचा जा ही सकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में बरसात सिर्फ खेती को ही प्रभावित नहीं करती बल्कि पूरे खेत को ही बहा ले जाती है. ऐसे में यदि क्षेत्रीय स्तर पर अल्पकालीन चेतावनियां भी किसानों तक पहुंच जाएं तो नुकसान कम किया जा सकता है.’ किसानों तक मौसम की अल्पकालीन चेतावनियां और अनुमान कैसे पहुंचाए जाते हैं, यह पूछे जाने पर डॉ. पई बताते हैं कि इंटरनेट और एसएमएस के माध्यम से. यानी मौसम विभाग का एक अनुमान यह भी है कि इन्टरनेट और एसएमएस भारत में किसानों को सूचना पहुंचाने के उचित माध्यम हैं. बेहतरीन क्षमताओं का दावा करने वाले मौसम विभाग द्वारा पिछले कुछ वर्षों में मौसम का अनुमान लगाने की प्रक्रियाओं में बदलाव भी किए गए हैं. नई प्रक्रियाओं को 2003 और 2007 से शुरू किया गया. लेकिन आरोप लगते हैं कि इन दोनों ही प्रक्रियाओं में से एक भी ऐसी नहीं जिससे मौसम के अनुमान कुछ खास उपयोगी साबित हो सकें.

मौसम विभाग के अनुमानों और मौसम के मिजाज के बीच वर्षों से चल रही इस नोक-झोंक के पीछे कुछ राजनीतिक कारण भी बताए जाते हैं. मौसम की जानकारी देने वाली एक निजी संस्था स्काईमेट के मुख्य कार्याधिकारी जतिन सिंह कहते हैं, ‘मौसम विभाग के हाथ बंधे हुए हैं. विभाग चाह कर भी कम बरसात या सूखे का अनुमान नहीं लगाता क्योंकि उस पर राजनीतिक दबाव होता है. कम बरसात होने की संभावना से बाजार पर प्रभाव पड़ता है और इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश करने वाले पूंजीपति नहीं चाहते कि ऐसा कोई भी पूर्वानुमान जारी किया जाए. इसीलिए मौसम विभाग हर साल सिर्फ सामान्य मानसून या उसमे 1-2 प्रतिशत के बदलाव की ही घोषणा करता है.’हालांकि मौसम विभाग ऐसे किसी भी दबाव के होने से इनकार करता है.

डॉ. पई कहते हैं, ‘मौसम की जानकारी जारी करते वक्त ऐसा कोई भी राजनीतिक दबाव नहीं होता. हमारा विभाग अपनी प्रक्रिया और मौसम के हालात देखकर ही अनुमान जारी करता है. बहरहाल कारण चाहे जो भी हों परंतु हकीकत यही है कि इस विभाग की असफलताएं इसकी सफलताओं पर हावी रही हैं. सिर्फ खेती ही नहीं बल्कि सिंचाई, बाढ़-नियंत्रण, जल-परिवहन और बिजली उत्पादन जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसा मुश्किल से ही देखने को मिलता है कि उसके अनुमान बहुत मददगार साबित हो रहे हों. अस्सी के दशक में एक चुटकुला सुनने को मिलता था कि किसी सज्जन ने मौसम का हाल जानने के लिए मौसम विभाग के कार्यालय में फोन किया. विभाग में बैठे अधिकारी ने पर्दा हटा कर खिड़की से बाहर देखा और सारा अनुमान बता दिया.  मौसम की भविष्यवाणी के बारे में विभाग की छवि आज भी कमोबेश ऐसी ही है.

लूट की छूट

छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों का अकूत भंडार है, लेकिन ऐसा लगता है कि इसका फायदा सिर्फ उन्हीं लोगों को हो रहा है जिन पर मुख्यमंत्री रमन सिंह की कृपादृष्टि है. आशीष खेतान की रिपोर्ट.

साल 2011 की बात है. दीवाली का मौका था. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चर्चित अखबार ‘पत्रिका’ के स्थानीय संपादक गिरिराज शर्मा के पास एक विशेष उपहार पहुंचा. राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह के कार्यालय की तरफ से उन्हें दो बड़े-बड़े डिब्बे भेजे गए थे. तहलका से बात करते हुए शर्मा बताते हैं कि पहले डिब्बे में सूखे मेवे थे और दूसरे में एक बढ़िया वीडियो कैमरा, 1000 रु के कड़कते 51 नोट और सोने का एक छोटा-सा राजसिंहासन. 2003 से रमन सिंह छत्तीसगढ़ का राजसिंहासन संभाल रहे हैं. इतने महंगे उपहार का उद्देश्य सिर्फ शर्मा को खुश करना नहीं बल्कि शायद यह संदेश देना भी था कि अगर वे चाहें तो सत्ता से होने वाले फायदों के एक हिस्सेदार वे भी हो सकते हैं. शर्मा ने धन्यवाद प्रेषित करते हुए यह उपहार लौटा दिया. इससे भी अहम तथ्य यह है कि सत्ता के दुरुपयोग और सरकार व धनपशुओं के बीच के गठजोड़ के बारे में खबरें छापकर पत्रिका लगातार राज्य की भाजपा सरकार को आईना दिखाने का पत्रकारीय धर्म निभाता रहा.

नतीजा यह हुआ कि अखबार को मिलने वाले सारे सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए. विधानसभा कार्यवाही के कवरेज के लिए जाने वाले रिपोर्टरों के पास बंद करवा दिए गए. अखबार के कार्यालय पर भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड़ ने हमला किया. मंत्रियों और अधिकारियों ने इसके संवाददाताओं से मिलना बंद कर दिया. किसी आयोजन में यदि मुख्यमंत्री शामिल हो रहे हैं तो यह तय था कि ‘पत्रिका’ के संपादक को इस आयोजन का निमंत्रण नहीं जाएगा. दुर्भावना का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ. मुख्यमंत्री ने खुद दो पन्ने का नोट लिखते हुए ‘पत्रिका’ के राज्य ब्यूरो प्रमुख की पत्नी जो तृतीय श्रेणी की कर्मचारी थीं- को फर्जी आरोपों में उनकी सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया. दस्तावेज बताते हैं कि बर्खास्तगी की कार्रवाई मुख्यमंत्री के आदेश पर शुरू की गई. ऐसा अब तक शायद ही कहीं देखा गया होगा कि लिपिक वर्ग के किसी कर्मचारी के सेवा संबंधी मामले में खुद मुख्यमंत्री ने दिलचस्पी ली हो और उसकी बर्खास्तगी सुनिश्चित की हो. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष बराबरी जैसे बुनियादी अधिकारों के हनन का दावा करते हुए पत्रिका समूह ने उच्चतम न्यायालय में राज्य सरकार के खिलाफ एक याचिका दाखिल की है जिस पर अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है

छत्तीसगढ़ में 23 से ज्यादा दैनिक अखबार हैं और दर्जन भर से ज्यादा समाचार चैनल. लेकिन राज्य में सिर्फ दो साल पुराने पत्रिका जैसे कुछ मुट्ठी भर संस्थान ही हैं जिन्होंने अपनी पत्रकारिता में एक निष्पक्षता बनाए रखी है. राज्य में चल रहे अखबारों और चैनलों की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत सरकारी विज्ञापन ही है. राज्य के जनसंपर्क विभाग का वार्षिक बजट करीब 40 करोड़ रु है. इसलिए हैरानी की बात नहीं कि 2003 से यह विभाग रमन सिंह खुद संभाले हुए हैं. 

सिर्फ खनन का लाइसेंस पाने के लिए फर्जी कंपनियां बना ली गईं और लाइसेंस मिलने के बाद ये कंपनियां सबसे ज्यादा कीमत लगाने वाले को बेच दी गईं

दरअसल राज्य में कई मीडिया घराने विशुद्ध व्यावसायिक गतिविधियों में कूद पड़े हैं खासकर खनन और इससे जुड़े उन व्यवसायों में जिनके बारे में माना जाता है कि उनमें राजनीतिक कृपादृष्टि के बगैर फलना-फूलना असंभव है. इससे पत्रकारिता की आजादी और निष्पक्षता का और ज्यादा क्षरण हुआ है. राज्य में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले अखबार दैनिक भास्कर के प्रोमोटरों को रायगढ़ जिले में नौ करोड़ 16 लाख टन क्षमता वाला कोयला ब्लॉक मिला है. यह ब्लॉक उसे छत्तीसगढ़ सरकार की सिफारिश पर कोयला मंत्रालय ने दिया था. अपने खनन के कारोबार को बढ़ाने के लिए कंपनी खुल्लमखुल्ला अपने अखबार का इस्तेमाल कर रही है. जब कंपनी ने इस इलाके में अपनी बिजली परियोजना की शुरुआत की तो लगभग उसी समय उसने अपने अखबार का रायगढ़ संस्करण भी शुरू किया. ज्यादातर दिन इसमें यह खबर देखने को मिल जाती है कि कोयले का खनन और ऊर्जा संयंत्र किस तरह विकास की दौड़ में अब तक पिछड़े रहे इस इलाके की तस्वीर बदलकर रख देगा. अखबार ने शायद ही कभी सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना की हो, लेकिन उन गांववालों के खिलाफ यह जरूर द्वेषपूर्ण अभियान चला रहा है जो कोयला खनन के लिए दैनिक भास्कर समूह द्वारा किए जाने वाले प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. विरोधियों का दमन करके सरकार भी उसकी भरसक मदद कर रही है. उदाहरण के लिए, धर्मजयगढ़ स्थित जो डॉ बीएसपी ट्राइबल कॉलेज इस विरोध का केंद्र रहा है उसकी मान्यता अप्रैल में वापस ले ली गई. इसका नतीजा यह हुआ कि कई गरीब आदिवासी विद्यार्थी इस साल कॉलेज में दाखिला लेने से वंचित रह गए. गौरतलब है कि रायगढ़ में यही अकेला आदिवासी महाविद्यालय है और आदिवासी छात्रों के लिए यहां शिक्षा पूरी तरह नि:शुल्क है. विरोध की अगुवाई कर रहे इस कॉलेज के प्रधानाचार्य धीरेंद्र मलिया कहते हैं, ‘दैनिक भास्कर समूह मुझे और आंदोलन से जुड़े दूसरे व्यक्तियों को निशाना बनाने के लिए अपने अखबार का इस्तेमाल कर रहा है.’

दैनिक भास्कर समूह के इशारे पर पुलिस ने इस मामले में 14 स्थानीय पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की है. ये सभी अलग-अलग अखबारों से जुड़े हैं और इनमें से कोई भी दैनिक भास्कर का नहीं है. इन पत्रकारों पर तोड़फोड़ और अतिक्रमण का मामला दर्ज किया गया है. इन सभी पत्रकारों की खबरें बता रही थीं कि जमीन के प्रस्तावित अधिग्रहण से किस तरह बड़े पैमाने पर विस्थापन और आजीविका का नुकसान होगा. ऐसे ही एक पत्रकार नारायण बाइन कहते हैं, ‘अगर डीबी पावर जमीन अधिग्रहण कर लेती है तो 500 से भी ज्यादा परिवार बेघर होंगे और इसके अलावा करीब 600 किसानों की आजीविका छिन जाएगी.’ बाइन रायगढ़ से जोहार छत्तीसगढ़ नाम का एक अखबार निकालते हैं. राज्य का दूसरा सबसे बड़ा अखबार है हरिभूमि. इसका मालिकाना  हक आर्यन कोल बेनीफिशिएशन नामक कंपनी के पास है. यह कंपनी एक कोल वाशरी (जहां कोयले को साफ करने का शुरुआती काम होता है), एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और 30 मेगावॉट क्षमता वाला एक पावर प्लांट भी चलाती है. दूसरे अखबारों की कीमत जहां दो या तीन रु है वहीं सप्ताहांत को छोड़ दें तो हरिभूमि केवल एक रु में बिकता है. अखबार के दो संस्करण निकलते हैं. एक राजधानी रायपुर से और दूसरा बिलासपुर से. 

आर्यन कोल बेनीफिशिएशन कंपनी पर कोल इंडिया लिमिटेड की आनुषंगिक कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड, बिलासपुर से बढ़िया किस्म का कोयला चुराकर उसे बाजार में कोल इंडिया द्वारा खारिज कोयले के नाम पर बेचने का भी आरोप लग चुका है. माना जाता है कि इस चोरी के माध्यम से कंपनी ने हजारों करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया. इस मामले की कई बार जांच भी हुई लेकिन इनमें कभी भी पक्के सबूत नहीं जुटाए जा सके. बहुत-से लोग यह भी मानते हैं कि आर्यन ग्रुप द्वारा अखबार निकालने का मकसद ही यह था कि कंपनी के बढ़ते व्यावसायिक हितों की सुरक्षा हो सके. कंपनी के प्रमोटर एनडीए सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. साहिब सिंह वर्मा के निकट संबंधी हैं. इस कंपनी की स्थापना ही सन 1999 में एनडीए के शासन काल में हुई और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के समय कंपनी ने असाधारण तरक्की की. एक पत्र के जरिये राज्य सरकार ने 11 सितम्बर, 2007 को आर्यन ग्रुप को कोल ब्लॉक आवंटित करने की सिफारिश की थी. शायद इसी विशेष कृपादृष्टि का ही परिणाम है कि छत्तीसगढ़ में हरिभूमि और दैनिक भास्कर, जिनका सर्कुलेशन करीब चार लाख रोजाना है आज मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुखपत्र कहलाने लगे हैं. 

छत्तीसगढ़ सरकार और मीडिया के बीच का यह भद्दा गठजोड़ तो इस कहानी का सिर्फ एक पहलू है. आगे जो तथ्य सामने आएंगे वे साफ बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में सत्ता से पोषित भ्रष्टाचार किस हद तक पहुंच गया है. कम से कम तीन ऐसी कंपनियां हैं जिन्हें सारे संवैधानिक और स्थापित नियम-कानूनों का उल्लंघन कर लौह-अयस्क और कोल ब्लॉक आवंटित किए गए हैं और ये तीनों ही कंपनियां भाजपा नेताओं द्वारा सीधे-सीधे प्रमोट की जा रही हैं. राज्य में 70,000 एकड़ से भी ज्यादा खनिज-समृद्ध भूमि (जिसमें से अधिकतर घने जंगलों से ढकी है) निजी कंपनियों को दे दी गई है ताकि वे उनमें दबे खनिज का पता लगा सकें. इस काम के लिए किसी कंपनी को एक विशेष लाइसेंस दिया जाता है जिसे प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस कहा जाता है. वित्तीय एवं तकनीकी क्षमता और खनन क्षेत्र में अनुभव नहीं रखने के बावजूद इन कंपनियों को यह काम दिया गया है.

ऑडिट करने वाले विभाग ने ध्यान नहीं दिया कि संचेती और उनकी सहयोगी कंपनी ने निविदा में जो मूल्य भरा वह बाजार भाव के हिसाब से काफी कम था

खनन का जो कानून है उसके हिसाब से प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस का मतलब है लाइसेंस धारक को खनिजों पर मिलने वाली रियायतों पर विशेषाधिकार. दूसरे शब्दों में कहें तो यदि लाइसेंस धारक संभावित क्षेत्र में खनिज की खोज कर लेता है तो यह इस बात की गारंटी हो जाती है कि खनन का लाइसेंस भी उसे ही मिलेगा. इस कानून का मकसद यह है कि खनन क्षेत्र में निजी निवेश को आकर्षित किया जाए और खनिजों की खोज के लिए अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा मिले. लेकिन रमन सिंह सरकार ने इस मूल भावना के साथ ही खिलवाड़ किया. राज्य में प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस उन इलाकों के लिए दिए गए जिनके बारे में लगभग पक्का ही है कि वहां खनिज भंडार हैं. खेल यह हुआ कि सिर्फ लाइसेंस पाने के लिए कई फर्जी कंपनियां बना ली गईं और लाइसेंस मिलने के बाद ये कंपनियां सबसे ज्यादा कीमत लगाने वाले को बेच दी गईं. 

ऐसी ही एक कंपनी के प्रमोटर सुरेश कोचर भी हैं. कोचर रमन सिंह के स्कूली दिनों के दोस्त हैं. रमन सिंह के मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद यानी 2004 में कोचर ने मां बंबलेश्वरी माइंस ऐंड इस्पात लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई. बनने के दो दिन बाद ही कंपनी ने 661.08 हेक्टेयर क्षेत्र में लौह अयस्क खनन के प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस हेतु आवेदन किया. यह क्षेत्र मुख्यमंत्री के विधान सभा क्षेत्र राजनांदगांव में पड़ता था. कंपनी के पास वित्तीय एवं तकनीकी योग्यता के नाम पर दिखाने को कुछ भी नहीं था. इसके बावजूद 11 जुलाई, 2005 को राज्य सरकार ने केंद्र को एक पत्र लिखा जिसमें इस कंपनी को कोयला ब्लॉक देने की सिफारिश की गई थी. तहलका को मिले साक्ष्य बताते हैं कि कंपनी को आधे दर्जन से ज्यादा आवेदनकर्ताओं पर तरजीह दी गई. इनमें से कुछ आवेदनकर्ताओं के पास तो विनिर्माण संबंधी सुविधाएं भी थीं जबकि कोचर की कंपनी का अस्तित्व सिर्फ कागजों पर था. इसके बावजूद उस पर विशेष कृपादृष्टि हुई. अगले पांच साल तक कंपनी ने कुछ भी नहीं किया और फिर 2008 में इस कंपनी को मोनेट इस्पात ऐंड एनर्जी को बेच दिया गया.

बिलासपुर के वकील सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, ‘बैलाडीला और अरिदोंगरी जैसे खनन क्षेत्रों को जिन्हें राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने माइनिंग लाइसेंस के तहत अपने पास रखा था, प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस के जरिए निजी कंपनियों को दे दिया गया. इसी तरीके से राजनांदगांव के बोरिया-टिब्बू, हहलादी और कांकेर जिलों के ज्ञात खनन क्षेत्रों को भी निजी कंपनियों को दे दिया गया. यह सब कुछ सिर्फ सहमति पत्रों के आधार पर ही किया गया है.’ श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की है. इसमें ऐसे दर्जनों सहमति पत्रों को चुनौती दी गई है. दरअसल जनवरी 2004 से 2010 के बीच सरकार ने लोहा, इस्पात, ऊर्जा और ऐसी दूसरी कई औद्योगिक इकाइयों के लिए 108 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं जिनमें खनिजों की जरूरत पड़ती है. इनमें से ज्यादातर सहमति पत्र उद्योगों में तब्दील नहीं हुए हैं. उदाहरण के लिए, सरकार ने एक संदिग्ध कंपनी अक्षय इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड को 63 हेक्टेयर क्षेत्र में लौह अयस्क के लिए प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस दे दिया. यही नहीं, सरकार ने इस कंपनी के लिए एक कैप्टिव कोल ब्लॉक की भी सिफारिश की, जो कोयला मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा दे भी दिया गया. आवंटन के छह साल बाद भी कंपनी ने प्रस्तावित लौह और ऊर्जा संयंत्र नहीं लगाए हैं.

आरोप लग रहे हैं कि इन सहमति पत्रों के पीछे न कोई योजना थी और न कोई दूरदर्शिता. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी कहते हैं, ‘जांजगीर जिला हमारे सबसे छोटे जिलों में से है, लेकिन धान और अन्य फसलों की अच्छी-खासी पैदावार होने के चलते यहां 90  प्रतिशत सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. यह जिला राज्य में कृषि के लिए सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र है. इस जिले में सरकार ने 30-35 से भी अधिक एमओयू किए हैं. सरकारी अधिकारियों ने ही मुझे बताया है कि यदि जिले में सारे प्रस्तावित पावर प्लांट बने तो सिंचाई के लिए बिल्कुल भी पानी नहीं बचेगा.’ अपेक्षित प्रगति न कर पाने के चलते सरकार द्वारा आज तक केवल 15 सहमति पत्र ही निरस्त किए गए हैं. लेकिन कई मामलों में ऐसा भी हुआ है कि सहमति पत्र तो निरस्त हो गया मगर सरकार ने प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस वापस नहीं लिया. साल 2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना था तो इसका सबसे बड़ा मकसद यह था कि यहां बहुमूल्य खनिजों का जो खजाना दबा हुआ है उसका इस्तेमाल देश के इस हिस्से की उपेक्षित और पिछड़ी आबादी के विकास के लिए होगा. आज भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने यहां न सिर्फ लोगों की उम्मीदों बल्कि लोकतंत्र का भी मजाक बना कर रख दिया है. प्रेस की आजादी पर सुनियोजित हमलों, जनांदोलनों के खिलाफ फर्जी मामलों और भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न जैसी चीजें उसी सड़न से निकल रही हैं जो यहां खनन क्षेत्र में लग गई है. 

साल 2003 से रमन सिंह मुख्यमंत्री होने के अलावा खनन, ऊर्जा, सामान्य प्रशासन और जनसंपर्क विभाग का प्रभार भी संभाले हुए हैं. जैसे कोयला आवंटन मामले में जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की बनती है उसी तरह छत्तीसगढ़ में कोयला और लौह अयस्क भंडार के आवंटन के मामले में यही बात रमन सिंह पर भी लागू होती है. जब तहलका ने इन आरोपों पर रमन सिंह की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की तो उनके कार्यालय से जवाब आया कि मुख्यमंत्री इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे.

भाजपा से राज्य सभा सांसद अजय संचेती की कंपनी एसएमएस को किस तरह एक कोयला ब्लॉक कौड़ियों के दाम आवंटित हुआ, इस पर काफी कुछ कहा जा चुका है. तहलका द्वारा जुटाई गई जानकारी बताती है कि संचेती की कंपनी को 25,000 करोड़ रुपये तक का फायदा पहुंचाया गया है. यह आवंटन छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) ने किया था जो राज्य खनिज विभाग के अंतर्गत आता है. छत्तीसगढ़ के महालेखाकार ने भी इसी साल अप्रैल में जारी अपनी रिपोर्ट में सरकारी खजाने को 1,052 करोड़ रुपये के घाटे का अनुमान लगाया था. भारतीय महालेखा और नियंत्रक (कैग) के तहत आने वाले इस विभाग ने यह अनुमान सरगुजा जिले में आसपास स्थित दो ब्लॉकों के तुलनात्मक विश्लेषण के बाद लगाया था. इन ब्लॉकों का आवंटन इस आधार पर किया गया था कि कंपनी को एक ब्लॉक 552 रुपये प्रति मीट्रिक टन पर मिलेगा और दूसरा ब्लॉक उसे 129.6 रुपये प्रति मीट्रिक टन पर दिया जाएगा. इस आवंटन का सबसे दिलचस्प पहलू है कि जिस दूसरे कोल ब्लॉक को कम कीमत पर आवंटित किया गया उसमें उस गुणवत्ता का कोयला है जिसे बहुत दुर्लभ और बेशकीमती माना जाता है. 

अभी खबरों में यही कहा जा रहा है कि इससे सरकारी खजाने को 1,025 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. भाजपा अपना दामन पाक-साफ बताते हुए दावा कर रही है कि यह आवंटन प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के आधार पर किया गया था. लेकिन तहलका को प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के मिले सभी दस्तावेज एक चौंकाने वाला खुलासा करते हैं. इनके मुताबिक दोनों ब्लॉकों में सुरक्षित कुल कोयले का भंडार आठ करोड़ टन है और इसमें बड़ा हिस्सा उच्च गुणवत्ता के कोयले का है. संचेती की एसएमएस और नागपुर की सोलर एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड (सत्यनारायण नुवाल की यह कंपनी 2005 में एक कोल ब्लॉक खरीद के मामले में सीबीआई जांच के दायरे में है) ने यह कोल ब्लॉक हासिल करने के लिए एक संयुक्त उपक्रम बनाया था. इस उपक्रम को खनन करने और खुले बाजार में कोयला बेचने का अधिकार अगले 32 साल के लिए मिला है.

ऑडिट करने वाले विभाग ने ध्यान नहीं दिया कि संचेती और उनकी सहयोगी कंपनी ने निविदा में जो मूल्य भरा वह बाजार भाव के हिसाब से काफी कम था

निविदा प्रक्रिया 2008 में खत्म हुई थी. यदि संचेती और उनकी सहयोगी कंपनी आज पूरे कोयले को बेचें तो उनका मुनाफा 8,000 करोड़ रुपये से ऊपर बनेगा. लेकिन यह कोयला अगले 32 साल में बेचा जाना है. इस हिसाब से मुनाफा 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये के बीच बैठेगा (दरअसल कोयले की कमी के साथ भविष्य में इसकी मांग और कीमत दोनों में बढ़ोतरी होगी). सरकारी ऑडिट में जिस नुकसान की बात की गई है उसका आकलन दोनों ब्लॉकों के आवंटन के लिए आई निविदाओं के आधार पर किया गया है. लेकिन ज्यादातर जानकारों और ऑडिट करने वाले विभाग ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि संचेती और उनकी सहयोगी कंपनी ने निविदा में जो मूल्य भरा था वह बाजार भाव के हिसाब से काफी कम था. दूसरे ब्लॉक के लिए तो यह असामान्य रूप से कम था. हालांकि इसी तथ्य के चलते यह घोटाला खुला भी.

तहलका के पास जो दस्तावेज हैं वे बताते हैं कि संचेती के संयुक्त उपक्रम को फायदा पहुंचाने के लिए पूरी निविदा प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा गया. सीएमडीसी ने इस प्रक्रिया के लिए नागपुर की एक कंसल्टेंसी फर्म एक्सिनो कैपिटल सर्विस लिमिटेड को नियुक्त किया था. लेकिन इस नियुक्ति में निविदा या कोई चयन प्रक्रिया नहीं अपनाई गई. इस फर्म ने निविदा प्रपत्र के लिए तकनीकी व वित्तीय शर्तें तैयार की थीं. इन शर्तों के आधार पर निविदाओं का मूल्यांकन और संयुक्त उपक्रम के लिए करारनामा भी इसी ने तैयार किया था. यहां संदेह पैदा करने वाला संयोग यह है कि निविदाकर्ता, संचेती के राजनीतिक संरक्षक भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और कंसल्टेंसी फर्म, तीनों ही नागपुर के हैं. इन दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि एसएमएस ने निविदा हासिल करने के लिए संदिग्ध दस्तावेजों का सहारा लिया था. कंसल्टेंट ने एसएमएस के खनन क्षेत्र में अनुभव की कमी की न सिर्फ उपेक्षा की बल्कि उसे कोल ब्लॉक हासिल करने में मदद भी की. निविदाओं के लिए कोई सुरक्षित निधि भी तय नहीं की गई थी. 

सवाल यह भी उठता है कि आखिर अपनी ही खदानों से कोयला निकालने के लिए सीएमडीसी को निजी कंपनियों की क्या जरूरत आन पड़ी थी. दोनों ब्लॉक खुली खदानें हैं. इसका मतलब यह है कि इनसे कोयला निकालने के लिए न तो बहुत खर्च की जरूरत थी और न बहुत ही उन्नत तकनीक की. दूसरा सवाल यह है कि आखिर सीएमडीसी खनन किए और और बेचे गए कुल कोयले से हुए मुनाफे का सिर्फ 51 फीसदी हिस्सा लेने या इतने कम दामों पर कोल ब्लॉक देने के लिए राजी क्यों हुआ.  सीएमडीसी के मुखिया गौरी शंकर अग्रवाल हैं. तहलका से बातचीत में वे पक्षपात के तमाम आरोपों को खारिज करते हैं. उनके मुताबिक सभी निविदाओं के आवंटन में पूरी पारदर्शिता बरती गई है. तहलका ने एसएमएस और सोलर एक्सप्लोसिव्स दोनों कंपनियों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से हमें इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. भ्रष्टाचार का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता. आगे आने वाला उदाहरण तो रमन सिंह द्वारा लिए गए सबसे सनसनीखेज निर्णयों में से एक है. 215 हेक्टेयर इलाके के लिए एक माइनिंग लीज और कांकेर जिले में 700 हेक्टेयर से भी ज्यादा इलाके के लिए प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस देने के लिए उनकी सरकार ने रिकॉर्डों में हेरफेर किया, कानूनी प्रावधानों की उपेक्षा की और अपने ही विभाग के नियमों को तोड़ा-मरोड़ा. 

जून 2004 की बात है. दिल्ली के कुंडेवालान में एक दुकान चलाने वाले दो भाइयों ने ‘पुष्प स्टील ऐंड माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक कंपनी शुरू की. संजय और अतुल जैन नामक इन बंधुओं की कंपनी की पेड अप कैपिटल (शेयर बेचकर जुटाई गई रकम) मात्र 2.25 लाख रु थी. ठीक उसी दिन, पुष्प स्टील ने छत्तीसगढ़ की एक लोहे की खदान के एक प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस के लिए आवेदन भी कर दिया. सात जनवरी, 2005 को रमन सिंह की सरकार ने इस कंपनी के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के अनुसार कंपनी ने 380 करोड़ के कुल निवेश का वादा किया था. हैरानी स्वाभाविक है कि कैसे कोई सरकार कुल जमा सवा दो लाख रु की कंपनी के साथ 380 करोड़ रु का समझौता कर सकती है. लेकिन आगे होने वाली घटनाओं से यह साफ हो गया कि यह एक बड़ी साजिश के तहत किया जा रहा था.

सहमति पत्र के हिसाब से प्रोजेक्ट की लागत तीन हिस्सों में बांटी गई थी : 

• लोहे का कारखाना – 80 करोड़ रु

• ऊर्जा संयंत्र – 75 करोड़ रु

• कंप्लाएंट पार्ट्स – 225 करोड़ रु

यानी 380 करोड़ के निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा न लोहे के कारखाने के लिए था और न ही ऊर्जा सयंत्र के लिए. बल्कि 225 करोड़ की रकम सिर्फ कम प्रदूषण करने वाले कुछ मशीनी हिस्सों को बनाने जैसे अजीब मदों के लिए जारी की गई थी. जाहिर है, यह इस परियोजना के लिए मिले बड़े अनुदान को न्यायसंगत दिखाने के लिए किया गया था. सहमति पत्र के मुताबिक समझौता पारित होने के दो साल के भीतर प्रोजेक्ट पर काम शुरू होना था. दुर्ग जिले के बोराई औद्योगिक क्षेत्र में 12 हेक्टेयर जमीन भी इस प्रोजेक्ट के लिए जारी कर दी गई. लेकिन प्रोजेक्ट का काम आज तक शुरू नहीं हुआ है. 

पांच मई, 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार ने एक आदेश जारी किया. इसमें उसने हहलादी लौह अयस्क भंडार की 215 हेक्टेयर जमीन खनन के लिए लीज पर देने की सिफारिश की. सहमति पत्र के हिसाब से प्रस्तावित लोहे के कारखाने की वार्षिक क्षमता तीन लाख 15 हजार टन प्रति वर्ष थी. लेकिन कंपनी को इतना बड़ा इलाका देने के निर्णय को न्यायसंगत दिखाने के लिए सरकार ने अपने आदेश में यह सीमा अपने आप ही बढ़ाकर चार लाख टन प्रति वर्ष कर दी. साथ ही कंपनी द्वारा बनाए जाने वाले अंतिम उत्पाद को भी लोहे से बदल कर ‘इंटीग्रेटेड स्टील’ कर दिया गया क्योंकि स्टील यानी इस्पात के उत्पादन में ज्यादा लौह अयस्क की जरूरत होती है. इसी आदेश के जरिए सरकार ने कंपनी को 705.33 हेक्टेयर इलाके के लिए प्रॉस्पेक्टिव लाइसेंस जारी करने की भी सिफारिश की. यह आदेश राज्य में खनन मंत्रालय का प्रभार खुद संभाल रहे मुख्यमंत्री रमन सिंह के अनुमोदन के बाद ही जारी किए गए थे.

उसी क्षेत्र में प्रॉस्पेक्टिव लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाली एक प्रतिस्पर्धी कंपनी ने सरकार के इस मनमाने आवंटन के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाई कोर्ट ने 705.33 हेक्टेयर में से 354 हेक्टेयर जमीन के प्रॉस्पेक्टिव लाइसेंस को खारिज कर दिया. पुष्प स्टील ने निर्णय के खिलाफ खंडपीठ में अपील दायर की. मामले में अंतिम निर्णय आना बाकी है. जिस तरीके से ये फैसले लिए गए उसे देखते हुए इस मामले की आपराधिक जांच होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. नतीजा यह है कि दो लाख रु की एक अदनी-सी कंपनी आज हजारों करोड़ रु के खनिज भंडार पर कब्जा जमाए बैठी है. तहलका से बातचीत में कंपनी के डायरेक्टर अतुल जैन इन सभी आरोपों को खारिज करते हैं. जैन कहते हैं, ‘हमारी कंपनी मान्यता प्राप्त और प्रतिष्ठित है. रायपुर में हमारा कारखाना चल रहा है और हम जल्दी ही आगे विस्तार भी करने वाले हैं. हमारा ग्रुप स्टील के व्यवसाय में पिछले 25 साल से है. आप जो भी आरोप लगा रहे हैं वे पूरी तरह निराधार और गलत हैं.’  

यह कहानी बताती है कि राजनीति व पूंजीपतियों के गठजोड़ और प्राकृतिक संसाधनों की लूट की जिस सबसे बड़ी समस्या से आज देश जूझ रहा है उसके लिए भाजपा भी उतनी ही जिम्मेदार है जितनी कांग्रेस. कांग्रेस के पास नवीन जिंदल हंै तो भाजपा के पास अजय संचेती. कांग्रेस के पास ‘लोकमत’ है तो भाजपा के पास ‘हरिभूमि.’ कोयले के मसले पर तो केंद्र और राज्य दोनों ही दोषी नजर आते हैं, लेकिन कोयले से इतर दूसरे प्राकृतिक संसाधनों के मसले पर असली भ्रष्टाचार राज्यों के स्तर पर हो रहा है. और इस तरह से देखें तो कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक भाजपा के हाथ भी भ्रष्टाचार की कालिख से उतने ही रंगे नजर आते हैं जितने कांग्रेस के.

करीबियों पर कृपा

  • प्रकाश इंडस्ट्रीज के कर्ता-धर्ता वेद प्रकाश अग्रवाल हैं. वे जय प्रकाश अग्रवाल के भाई हैं जो सूर्या फाउंडेशन चलाते हैं. सूर्या फाउंडेशन भाजपा समर्थित एनजीओ है जो पार्टी के लिए चुनाव सर्वेक्षण करता है. 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भी इसने भाजपा के लिए एक चुनावी सर्वे किया था. छत्तीसगढ़ सरकार की सिफारिश पर कोयला मंत्रालय ने प्रकाश इंडस्ट्रीज को कोयले के चार ब्लॉक आवंटित किए. इनमें 10 करोड़ टन से भी ज्यादा उच्च गुणवत्तायुक्त कोयले का भंडार बताया जाता है. निर्धारित सीमा से ज्यादा कोयला निकालने और उसकी कालाबाजारी करने के लिए सीबीआई ने कंपनी पर 2010 में छापा मारा था. कंपनी पर जालसाजी और अधिकारियों को रिश्वत देने के भी आरोप हैं. कंपनी को रमन सिंह सरकार की सिफारिश पर कोयले के दो और ब्लॉक आवंटित होने वाले थे कि तभी उस पर सीबीआई का छापा पड़ गया. इसके बाद कोयला मंत्रालय ने ये दो ब्लॉक तो आवंटित नहीं किए मगर जो चार ब्लॉक इसे पहले ही आवंटित हो चुके हैं वे अब भी इसके पास हैं. 
  • एक संयुक्त उपक्रम, जिसमें भाजपा से राज्य सभा सांसद अजय संचेती की 24.99 फीसदी हिस्सेदारी है, को राज्य में दो कोल ब्लॉक आवंटित हुए हैं. इनमें आठ करोड़ टन से भी ज्यादा कोयले का भंडार है. लीज की अवधि 32 साल है और इस दौरान इस संयुक्त उपक्रम को 25 हजार करोड़ रु का अनुचित फायदा होगा. संचेती को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का करीबी माना जाता है. संयुक्त उपक्रम की साझेदार कंपनी सोलर एक्सप्लोसिव्स ने अपनी वेबसाइट पर इन कोयला ब्लॉकों को खजाना करार दिया है. 
  • नवभारत ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के प्रमोटर वीके सिंह हैं जिनकी पत्नी नीना सिंह छत्तीसगढ़ के राजिम से 1998 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं.  2008 में राज्य सरकार ने इस समूह की एक कंपनी नवभारत फ्यूज के लिए लौह अयस्क का एक ब्लॉक आवंटित करने की सिफारिश की. यह ब्लॉक 220 हेक्टेयर का था. कंपनी पहले से ही लोहे का एक कारखाना चला रही थी और लौह अयस्क के ब्लॉक के लिए सिफारिश इस वादे पर की गई कि यह अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी. 2009 में सरकार ने समूह की एक और कंपनी नवभारत कोल फील्ड्स को 36 करोड़ टन कोयला भंडार वाला एक कोल ब्लॉक देने की भी सिफारिश की. आरोप लग रहे हैं कि कंपनी ने अपनी उत्पादन क्षमता के बारे में गलत आंकड़े पेश किए ताकि आवंटन को न्यायसंगत ठहराया जा सके. बताया जाता है कि ब्लॉक मिलने के बाद कंपनी ने अपनी 74 फीसदी हिस्सेदारी 300 करोड़ रु में सोलर एक्सप्लोसिव्स नामक कंपनी को बेच दी. यही कंपनी भटगांव कोल ब्लॉक घोटाले के केंद्र में है.

वादी के हिंदू आतंकवादी

आखिर क्यों कई हिंदू नौजवान कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी संगठनों की तरफ आकर्षित हुए हैं? बाबा उमर की रिपोर्ट. 

मकई के खेतों और अखरोट के बागानों से गुजरते हुए नीलकांत कुमार आखिर में एक कब्र तक पहुंचते हैं. कब्र पर लगे पत्थर पर दर्ज है, ‘शहीद कुलदीप कुमार अल मारूफ कामरान फरीदी’. यह उनके बेटे की कब्र है. जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में बसे जोहंड गांव का कुलदीप 2001 में हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ था. तभी उसने इस्लाम धर्म भी अपनाया और अपना नाम कामरान फरीदी रख लिया. 26 अगस्त, 2006 को एक मुठभेड़ में मारे जाने तक वह इस संगठन में सेक्शन कमांडर बन चुका था. 65 साल के नीलकांत के लिए बेटे की याद भी एक तरह की दुविधा ही है. वे कहते हैं, ‘उसके अलग राह पर जाने से हमारे समाज ने हमारा हुक्का-पानी बंद कर दिया. लेकिन दूसरी तरफ वह एक अच्छा बेटा भी था जिसने एक बार मेरी दवाओं और घर बनाने के लिए 20 हजार रु कमाने की खातिर दिन-रात एक कर दिया था.’ 

एफआईआर के मुताबिक कुलदीप राष्ट्रीय राइफल्स आठ और 10 के फौजियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया और उसके पास से चार ग्रेनेड्स भी बरामद किए गए. नीलकांत कहते हैं,  ‘पुलिस चाहती तो मेरे बेटे और उसके साथी खालिद कश्मीरी (कश्मीरी आतंकवादी) को गिरफ्तार भी कर सकती थी लेकिन पुलिस ने खालिद को तो मौके पर ही मार दिया और मेरे बेटे को गोली मारने से पहले चार घंटे अपनी हिरासत में रखा.’ नीलकांत आगे बताते हैं, ‘मैंने सुना है एक फौजी ने मेरे बेटे से पूछा कि क्या वह अब भी हिंदू है. जब मेरा बेटा इस पर कायम रहा कि वह एक मुसलमान है तो उस जवान ने उसे गोली मार दी. अगर मेरे बेटे ने झूठ बोला होता तो आज वह जिंदा होता.’

कश्मीर मुद्दे की जटिलताओं की ही तरह यहां का आतंकवाद भी उतना ही जटिल है. इसके कई पहलू हैं. इनमें से एक यह भी है कि इस आतंकवाद ने दर्जन भर से ज्यादा हिंदू युवाओं को भी पकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की तरफ खींचा है. कश्मीर की इस लड़ाई ने सिर्फ स्थानीय मुसलिम युवाओं को ही नहीं बल्कि कई विदेशी आतंकियों को भी अपनी ओर आकर्षित और शामिल किया है. एक अनुमान के मुताबिक इन विदेशी आतंकवादियों की संख्या लगभग 5000 के करीब है जिसमें पकिस्तान, अफगानिस्तान और सूडान तक के लोग शामिल हैं. लेकिन हिंदू आतंकियों के इस लड़ाई में शामिल होने का चलन यहां पहले कभी नहीं देखा गया था. कुलदीप उन दर्जन भर हिंदुओं में से एक था जो राजौरी, पुंछ, रियासी, रामबन, डोडा और किश्तवाड़ में इस्लामी संगठनों में शामिल हुए हैं. हिंदू युवाओं के हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैय्यबा और अल-बद्र जैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों की ओर आकर्षित होने के पीछे क्या कारण हैं,  इसकी पड़ताल करने ‘तहलका’ डोडा और किश्तवाड़ के इलाकों में पहुंचा. हमें अहसास हुआ कि इसका जवाब भी कश्मीर मुद्दे जैसा ही उलझा है. 

‘कुछ पुलिसकर्मियों का मानना है कि पैसा और ताकत ही इन हिंदू युवाओं को मुस्लिम आतंकवादी संगठनों की और आकर्षित करते हैं’

पुलिस सूत्रों के मुताबिक अब तक पांच हिंदू आतंकी मारे जा चुके हैं और एक ने आत्मसमर्पण किया है जिसे बाद में अर्धसैनिक बल में शामिल कर लिया गया. बिपिन कुमार 1996 में हरकत-उल-अंसार में शामिल हुआ था. उसे नवंबर 2008 में एक मुठभेड़ में मार गिराया गया. भदरवाह इलाके में चार साल तक आतंक फैलाने के बाद हिजबुल मुजाहिद्दीन के उत्तम कुमार उर्फ सैफुल्ला का भी अगस्त 2005 में यही हश्र हुआ. भदरवाह में ही सक्रिय हिजबुल का एक अन्य आतंकी बिट्टू कुमार भी मारा जा चुका है. संगठन का एक और आतंकी सुभाष कुमार शान 27 जुलाई 2011 को मारा गया. 2003 में हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल सुभाष 2011 तक डिप्टी डिविजनल कमांडर बन चुका था. आत्मसमर्पण करने वाला एकमात्र हिंदू आतंकी हरकत-उल-अंसार का सुनील कुमार है जिसने हथियार डालकर अर्धसैनिक बल में शामिल होने का फैसला किया. 

पुलिस सूत्रों के मुताबिक कई हिंदू आज भी इन आतंकी संगठनों में सक्रिय हैं. डोडा जिले के त्रोने गांव का सुरेश कुमार, किश्तवाड़ के सुर्कोट गांव का सचिन शर्मा, पदियारना के सरपंच की बेटी जानकी देवी , त्रिगम गांव निवासी राजू, रियासी जिले के गुन्दाली गांव का शाम लाल उर्फ़ शमसुद्दीन , नर्खुम्बा गांव का जगदीप सिंह और रियासी जिले के ही कृपाल सिंह (अल-बद्र) और कृष्ण लाल (लश्कर-इ-तय्यबा ) उन हिंदू युवाओं में से हैं जो मुस्लिम आतंकवादी संगठनों में सक्रिय हैं. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक तो यह सूची और भी लंबी हो जाती है . राजौरी और रियासी जिले के पाल्मा निवासी पुरषोत्तम लाल उर्फ काका खान, दर्योती निवासी शाम लाल और उसका भतीजा संजय लाल, दराज निवासी सतपाल, नौशेरा निवासी गुड्डू और राजौरी जिले का ही कृष्ण लाल भी उन हिंदुओं में से हैं जो आतंकी संगठनों में शामिल हैं. किश्तवाड़ के एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘ इन सभी नामों को ग्रुप ‘ए’ में रखा गया है, जिसको कि सबसे खतरनाक और सक्रिय माना जाता है. कई वर्षों से इनका खौफ बरकरार है. इनमें से सबसे खूंखार था सुभाष कुमार शान. कई लोगों को आतंकवादी बनने को उकसाने के अलावा वह तीन फौजियों की मौत के लिए भी जिम्मेदार था.’ 

कुछ पुलिसकर्मियों का मानना है कि पैसा और ताकत ही इन हिंदू युवाओं को मुस्लिम आतंकवादी संगठनों की और आकर्षित करते हैं. लेकिन पैसा ही एक मात्र कारण नहीं है. सुभाष कुमार शान के हिंसा अपनाने के पीछे और भी कई कारण सामने आए हैं. एक पुलिस अधिकारी बताते हैं,  ‘सुभाष को एक मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया था. उसने इस्लाम कुबूल किया और अपना नाम बदल कर वासिफ अली रिजवी कर दिया. लेकिन लड़की ने उसे ठुकरा दिया और तब उसने बन्दूक उठा ली. उसके मां-बाप भी उससे खफा थे. उन्होंने तो उसका शव लेने से भी मना कर दिया था’. 

किश्तवाड़ से 27 किलोमीटर दूर पाल्मर तहसील में स्थित राजना गांव में 49 वर्षीय जीवन लाल और उनकी पत्नी पुष्पा देवी (44)  से जब हम मिले उस दौरान उनके पड़ोसी बशीर अहमद भी वहीं मौजूद थे.

लेकिन सुभाष के माता पिता कुछ और ही दास्तां बताते हैं. किश्तवाड़ से 27 किलोमीटर दूर पाल्मर तहसील में स्थित राजना गांव में 49 वर्षीय जीवन लाल और उनकी पत्नी पुष्पा देवी (44)  से जब हम मिले उस दौरान उनके पड़ोसी बशीर अहमद भी वहीं मौजूद थे. वे इस हिंदू परिवार के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बसने के बाद से हर सुख दुःख में साथ रहे हैं. जीवन लाल जो खुद पुलिस में सिपाही पद पर कार्यरत हैं, कहते हैं, ‘सुभाष जब 10वीं कक्षा में था तब उसका कुछ हिंदू लड़कों से झगड़ा हो गया था. उन लड़कों ने सुभाष को बड़ी बेरहमी से मारा था. जब मामला थाने पहुंचा तो मैंने ही दखल देकर मामला सुलझाया था. मुझे लगता है उसी हादसे ने सुभाष के मन में नफरत भर दी थी. हां, लेकिन उसने आतंकवादी बनने के बाद कभी भी उन लड़कों को कुछ नहीं कहा.’ सुभाष के मां-बाप पुलिस की कहानी को भी सिरे से नकारते हुए बताते हैं कि उन्होंने कभी भी अपने बेटे का शव लेने से इनकार नहीं किया. पुष्पा कहती हैं, ‘यह सब झूठ है . बल्कि सरकार ने ये कभी भी साफ नहीं किया कि जो मारा गया वह मेरा बेटा ही था. हमें तो उसकी मौत की खबर भी मीडिया से मिली. जब तक हम मारवाह (घटनास्थल) पहुंचे तब तक स्थानीय लोग उसका अंतिम संस्कार कर उसे पहाड़ों में दफना चुके थे.’ 

बशीर अहमद का मानना है कि सुभाष के बंदूक उठाने के पीछे सुरक्षा बलों द्वारा किया गया वह नरसंहार भी हो सकता है जिसने सारे पाल्मर को हिला कर रख दिया था. वे कहते हैं , ‘मैं मुस्लिमों के नहीं बल्कि हिंदुओं के नरसंहार की बात कर रहा हूं’. अहमद के मुताबिक फौजियों ने कृष्ण लाल नामक एक ग्रामीण को गोली मार दी थी, उसके भाई अमर चांद को भी इतनी यातनाएं दी गईं कि उसकी भी मौत हो गई और एक पूर्व सैनिक पन्दिथि रघुनाथ को भी मार दिया गया. बशीर कहते हैं, ‘ यहां हिंदू हो या मुसलमान, दोनों ने ही भुगता है. लगता है सुभाष इन्ही नरसंहारों से प्रभावित हुआ था और तभी उसने हथियार उठाये थे’ उधर, किश्तवाड़ के डिप्टी पुलिस अधीक्षक चौधरी अबरार का मानना है कि सुभाष वैचारिक रूप से इस्लाम से प्रभावित था. किश्तवाड़ में मौजूद हिंदूू आतंकवादियों के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘किश्तवाड़ में सात ऐसे आतंकी सक्रिय हैं. लेकिन वे सभी फिलहाल फरार हैं. काफी लंबे समय से उनकी कोई भी गतिविधि दर्ज नहीं की गई है. 

वहीं किश्तवाड़ नगर के पास स्थित सुर्कोट निवासी सुरेश शर्मा अपने बेटे की मौत की गुत्थी सुलझाने में ही उलझ कर रह गए हैं. पुलिस का मानना है कि सचिन शर्मा अक्टूबर 1998 से ही हिजबुल मुजाहिद्दीन के साथ काम कर रहा था जब वह नवीं में पढ़ता था. लेकिन सुरेश शर्मा पुलिस के इस तर्क को मानने से साफ इनकार करते हैं. शर्मा कहते हैं,  ‘14 साल पहले एक सुबह वह घर से निकला और फिर कभी लौट कर नहीं आया. अगर वह आतंकवादी होता तो पुलिस उसे गोली मार देती और उसकी लाश सबके सामने पेश करती. अब तो हमें लगता है कि शायद उसने आत्महत्या कर ली होगी’. एनएचपीसी में कार्यरत शर्मा बताते हैं कि उनके परिवार ने सालों तक पुलिस और फौज की यातनाएं सही हैं. घर पर कभी भी कोई तलाशी लेने आ जाता, परिवार के सदस्यों की तसवीरें खींचता और कभी पकड़े गए आतंकवादियों को घर पर लाया जाता जो ये कबूल करते थे कि वे उनके बेटे को जानते हैं. शर्मा सवाल करते हैं , ‘हम कैसे विश्वास कर लें जब तक हम अपने बेटे को या उसके शव को नहीं देख लेते’ 

हिंदू आतंकियों की गतिविधियों का नजदीक से अध्ययन करने वाले पत्रकार सय्यद अमजद शाह ‘माहौल और संगत के प्रभाव’ को ही हिंदुओं के आतंकवाद को अपनाने का मुख्य कारण मानते हैं और बताते हैं कि इनमें से कई आतंकी तो सीमा पार कर पकिस्तान जा चुके हैं . शाह कहते हैं कि हिंदूओं के आतंकवादी संगठनों से जुड़ने के पीछे पैसा भी एक कारण हो सकता है, लेकिन कुल मिलकर वैचारिक और सैद्धांतिक कारण ही हैं जो इन्हें हथियार उठाने को प्रेरित कर रहे हैं. वे कहते हैं ‘ यदि पैसा ही एक मात्र कारण है तो यह सिलसिला सिर्फ इतने छोटे स्तर पर ही देखने को क्यों मिल रहा है? बन्दूक की नोक पर कमाया हुआ पैसा और शोहरत तो सैकड़ों युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकता था. मामला इससे कहीं ज्यादा जटिल है.’

चुनाव और चुनौती

उत्तराखंड का टिहरी लोकसभा उपचुनाव राजनीतिक विरासत बचाए रखने की लड़ाई तो है ही, नई-नवेली कांग्रेस सरकार के भविष्य के लिए भी बेहद अहम है. मनोज रावत की रिपोर्ट.

आपदा से हुई तबाही के बीच हो रहे टिहरी उपचुनाव में उत्तराखंड के दो राजनीतिक परिवारों की तीसरी पीढ़ी अपनी राजनीतिक विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रही है. देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के हालिया कठोर कदमों के बाद होने वाला यह उपचुनाव एक मायने में इन अलोकप्रिय निर्णयों पर जनता का फैसला भी होगा. साथ ही इसके नतीजे छह महीने से अंतर्विरोधों और अनिर्णयों के साथ डगमगा कर चल रही राज्य की कांग्रेस सरकार के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे. भाजपा ने टिहरी राजपरिवार की बहू माला राज्यलक्ष्मी शाह पर दांव खेला है. कांग्रेस ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के 38 वर्षीय पुत्र साकेत बहुगुणा को उतारा है. 60 वर्षीया ‘महारानी’  से पहले उनकी दो पीढ़ियां नौ बार टिहरी से सांसद रह चुकी हैं. ‘हिमालय पुत्र’ के नाम से प्रसिद्ध साकेत के दादा हेमवती नंदन बहुगुणा 1980 में कांग्रेस और 1983 में दलित मजदूर किसान पार्टी के टिकट पर पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट से सांसद रहे. ‘गढ़वाल चुनाव’ में बहुगुणा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सीधी टक्कर ली थी. उस समय इंदिरा गांधी द्वारा पूरी सत्ता झोंकने के बाद भी बहुगुणा ने चुनाव जीता था. उधर, पहला लोकसभा चुनाव पौड़ी लोकसभा से लड़कर हारने वाले विजय बहुगुणा दो बार टिहरी लोकसभा से भी संसद में पहुंचने में असफल रहे. 2007 में सांसद मानवेंद्र शाह की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे. 

टिहरी लोकसभा सीट तीन जिलों उत्तरकाशी, टिहरी तथा देहरादून जिलों में फैली है. पूरी तरह से पहाड़ी दो जिलों उत्तरकाशी और टिहरी में पांच लाख मतदाता हैं और देहरादून जिले में लगभग सात लाख. भाजपा की तरफ से पहले पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी को संभावित उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन एक तो खंडूड़ी भाजपा की गुटबंदी और वर्तमान पार्टी संगठन के रहते हुए नई सीट पर चुनाव लड़ने के अनिच्छुक थे. फिर बहुगुणा परिवार से नजदीकी रिश्तेदारी भी उनके टिहरी से चुनाव न लड़ने का अघोषित कारण थी. खंडूड़ी के अलावा कोई अन्य दमदार नाम न होने के चलते भाजपा ने चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही आठ सितंबर को राज्यलक्ष्मी को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया था. पार्टी के किसी गुट में न होने के कारण उनकी उम्मीदवारी पर किसी तरह का विरोध नहीं हुआ.

उधर कांग्रेस ने उम्मीदवार तय करने में ही कई दिन लगा दिए. मुख्यमंत्री बहुगुणा अपने परिवार के किसी सदस्य को टिहरी से चुनाव लड़ा कर टिहरी लोकसभा सीट पर अपना दावा बनाए रखना चाहते थे तो केंद्रीय मंत्री हरीश रावत इसका विरोध कर रहे थे. वैसे इसी साल हुए विधानसभा चुनावों से पहले हुए टिकट वितरण में बहुगुणा ने कांग्रेस में परिवारवाद की परंपरा का विरोध किया था. इससे बेटे-बेटियों के लिए पार्टी टिकट की आशा पाले कई नेताओं को धक्का लगा था. इस समय हरीश के ‘परिवारवाद विरोधी’ विचार का समर्थन कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी चौधरी बीरेंद्र सिंह भी कर रहे थे. हरीश खेमे की ओर से मंत्री प्रीतम सिंह, कठिन मौकों पर पार्टी से सांसद का चुनाव लड़ चुके पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट, पूर्व मंत्री किशोर उपाध्याय जैसे नाम सुझाए गए थे. सूत्रों के मुताबिक आलाकमान मंत्री प्रीतम सिंह के नाम पर सहमत थी, परंतु वे लोकसभा उपचुनाव लड़ने से हो सकने वाले राजनैतिक घाटे के लिए सहमत नहीं दिखाई दिए.

इसके अलावा जिस उत्तरकाशी जिले में टिहरी लोकसभा की 14 सीटों में से तीन पड़ती हैं वहां राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष था. जुलाई में ही वहां आई एक प्राकृतिक आपदा में दर्जनों जानें जा चुकी थीं और लोग आपदा राहत व पुनर्वास से संतुष्ट नहीं थे. इसके चलते भी कोई नेता मन से चुनाव लड़ने को राजी नहीं था. प्रीतम के इनकार के बाद हरीश रावत ने मिजोरम के राज्यपाल एमएम लखेड़ा का नाम आगे किया, लेकिन इस पर भी बात नहीं बनी. लोकसभा चुनाव लड़ाने के वादे के साथ विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल कराए गए निशानेबाज जसपाल राणा का नाम तो किसी ने भी नहीं लिया. राणा ने पिछला लोकसभा चुनाव बहुगुणा के खिलाफ भाजपा के टिकट पर लड़ा था. 

एक मायने में देखा जाए तो केंद्र सरकार के हालिया कठोर कदमों के बाद होने वाला यह उपचुनाव इन निर्णयों पर जनता का फैसला भी होगा

14 सितंबर की शाम केंद्र सरकार ने डीजल के दाम पांच रु बढ़ाए और सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित कर दी. उसी रात रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ कस्बे में रात को बादल फटने से आए मलबे के कारण पांच गांवों के 62 लोग सोते हुए दफन हो गए. इन बडी आपदाओं के अलावा प्रदेश के और इलाकों में भी उस रात आधा दर्जन मौतें हुईं. पिछले एक महीने में आपदा से प्रदेश में 140 से अधिक लोगों की जान गई, सैकड़ों परिवार बेघर हुए और अरबों रुपये का नुकसान हुआ. इन सबके बीच मुख्यमंत्री बहुगुणा ने 16 सितंबर को अपने बेटे साकेत के नाम पर हरी झंडी लगवा दी. उसी दिन वे ऊखीमठ का दौरा भी कर आए. 

चुनाव में भाजपा को भ्रष्टाचार और महंगाई के रूप में पके-पकाए राष्ट्रीय मुद्दे मिले हैं. टिहरी और उत्तरकाशी में स्थानीय मुद्दे हावी हैं. वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड जनमंच के संयोजक राजेन टोडरिया टिहरी लोकसभा के रिटर्निंग अधिकारी कार्यालय टिहरी से देहरादून ले जाने सहित कई निर्णयों को पहाड़ विरोधी मानसिकता का प्रतीक मानते हैं. बहुसंख्यक उत्तरकाशी और टिहरी के मतदाताओं व देहरादून में बसे पहाड़ी लोगों पर अब भी टिहरी महाराज की ‘बोलांदा बदरी’ यानी बोलते हुए बदरीनाथ की छवि हावी है. 

 प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल कांग्रेस सरकार के छह महीने के कार्यकाल को असफलताओं से भरा मानते हैं. वे कहते हैं, ‘राजधानी  देहरादून की सड़कों का बुरा हाल देखकर आप राज्य के दूरस्थ इलाकों की दुर्दशा को समझ सकते हैं.’ इस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य कहते हैं, ‘पिछले पांच साल तक प्रदेश पर शासन करने वाली भाजपा हमसे छह महीने में ही विकास कार्यों का हिसाब मांग कर नकारात्मक राजनीति कर रही है.’ मुख्यमंत्री बहुगुणा साकेत का परिचय कराते हुए हर जनसभा में जनता को बताते हैं कि उनका बेटा कंपनी की अच्छी नौकरी छोड़ कर जनता की सेवा करने आया है. साकेत बेहतर प्रबंधन के जरिए क्षेत्र का विकास करने का दावा करते हैं. कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन भाजपा के मुकाबले बेहतर दिखता है. संसाधनविहीन भाजपा कार्यकर्ता उदासीन-से दिखते हैं. हालांकि पार्टी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कोश्यारी इस पर कहते हैं, ‘लोकतंत्र में आखिरकार जनभावना ही प्रबंधन पर भारी पड़ती है.’ 

मुख्यमंत्री बहुगुणा विपक्षी उम्मीदवार राज्यलक्ष्मी पर ताना कसते हुए कहते हैं कि संसद में श्रोता नहीं वक्ता चाहिए. जवाब में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट कहते हैं कि संसद में वास्तव में वक्ता चाहिए, बड़बोले नहीं. वे सवाल करते हैं, ‘उत्तराखंड के औद्योगिक पैकेज को बंद किए जाने पर यहां से चुने गए कांग्रेस के पांचों कुशल वक्ता सांसदों को क्यों सांप सूंघ गया था?’ विदेशों में जाकर अपनी कंपनी के लिए कानूनी पैरवी करने वाले वकील साकेत द्वारा महारानी को मुद्दों पर खुली बहस की चुनौती के जवाब में भट्ट कहते हैं, ‘पहाड़ की समस्याएं भी पहाड़ जितनी पेचीदा होती हैं, इसलिए पहली बार नौकरी छोड़कर पहाड़ आए साकेत को पहाड़ की भाषा, संस्कृति और समस्याओं को समझना चाहिए.’ 

मुख्यमंत्री बहुगुणा अपने छूटे हुए कामों को बेटे द्वारा पूरा करने का वादा कर रहे हैं तो राज्यलक्ष्मी के पति मनुज्येंद्र शाह अपने खानदान के सदियों पुराने रिश्तों की दुहाई देते हुए वोट मांग रहे हैं. मुकाबले में बसपा और सपा नहीं हैं. प्रभावहीन हो चुकी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल (पी) के मंत्री प्रीतम पंवार सरकार में शामिल हैं, पर उनके अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार रस्म अदायगी के लिए लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं.

चुनाव नहीं लड़ रही तीन कम्युनिस्ट पार्टियों ने 16 सितंबर को राज्यपाल को  ज्ञापन देकर टिहरी उपचुनाव को स्थगित करने की मांग की. सीपीआई की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य समर भंडारी कहते हैं, ‘टिहरी लोकसभा की छह विधानसभाएं बरसात में आई आपदा की मार झेल रही हैं. अभी चुनाव करने की संवैधानिक समय सीमा के लिए भी काफी महीने बचे हैं. ऐसे में आपदा में आसरा खोज रही जनता पर चुनाव नहीं लादा जाना चाहिए था.’ टोडरिया भी आपदा के बाद स्कूलों और पंचायत घर में रह रहे आपदा पीडि़तों से वोट मांगने को अमानवीय बताते हुए चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं. कुल मिलाकर इस चुनाव में मुकाबला जन और प्रबंधन के बीच है.