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‘यज्ञोपवीत और मामा की घड़ी में बंधा स्नेह…’

हिंदू धर्म में सोलह संस्कार बताए गए हैं. इस संस्कारों में व्यवहार, नेग, दक्षिणा के नाम पर पैसे या उपहार लेने-देने की परंपरा है. इन पैसों के पीछे कहीं न कहीं रिश्तों की मिठास छिपी होती है. चाहे वह विवाह संस्कार में जूते चुराने की रस्म हो, बुआ द्वारा काजल लगाने की प्रथा हो या फिर विदाई के समय कलेवा खिलाने का रिवाज. हम पैसों के साथ जुड़े संवेदना के तारों की झंकार महसूस करते हैं. मैंने ऐसी ही झंकार महसूस की अपने यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार में.

वर्तमान के आपाधापी के दौर में जनेऊ संस्कार अमूमन शादी, तिलकोत्सव या फिर सामूहिक यज्ञ में कर दिया जाता है. गायत्री परिवार हिंदू संस्कारों को अपने प्रांगण में आयोजित करता है. ऐसे ही एक सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार का आयोजन था. रायबरेली जिले के गायत्री परिवार मंदिर में चार विद्यार्थियों के साथ मुझे भी दीक्षा लेनी थी. प्राचीन काल की गुरुकुल परंपरा में यज्ञोपवीत संस्कार के तुरंत बाद ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) को शिक्षा के लिए गुरुकुल जाना होता था, जहां वह भिक्षा द्वारा अर्जित अनाज आश्रम को देता था और आश्रम उसके भोजन और रहने का प्रबंध करता था. अब गुरुकुल तो रहे नहीं पर उस परंपरा का निर्वाह अब तक किया जा रहा है. हमको वहां उपस्थित परिजनों से ‘भिक्षाम देहि’ की अपील करनी थी और परिजनों द्वारा प्राप्त धन को गायत्री परिवार को दे देना था. यह रस्म तो पूरी हुई.

चूंकि अब गुरुकुल तो जाना नहीं होता है, इसलिए एक अन्य प्रथा निभानी होती है. जनेऊधारी विद्यार्थी काशी में पढ़ने जाने की जिद करता है. ऐसी स्थिति में उसके मामा विद्यार्थी को समझाते हैं कि बेटा, काशी मत जाओ. इसके बदले वो भांजे को उपहार, पैसा वगैरह देते हैं. फिर बाद में भांजे को मान जाना होता है.

मैं अपने ननिहाल में रहता था. मेरी माताजी के भाई के न होने की वजह से मेरा कोई सगा मामा न था. पर एक मुंहबोले मामा थे- ‘रामेश्वर मामा’ जो पास ही में रहते थे, जिनसे हम सारे भाई खूब चुहलबाजियां किया करते थे. सुबह-शाम वे घर आते थे. हमें टॉफी खिलाते और  हमारी शैतानियों में बराबर शरीक होते थे. उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. पर वे कभी जाहिर नहीं होने देते थे. खुशी मन से वे मामा का फर्ज निभाते चले आ रहे थे. आज उन्हें जनेऊ की रस्म निभानी थी.

‘आज अगर मेरे पास गांव में जमीन बची होती तो वह भी तुम्हारे ही नाम कर देता. और आज ही साबित कर देता कि कोई रिश्ता सौतेला नहीं होता’

मंडप के द्वार पर सभी विद्यार्थियों के मामा खड़े हुए थे. उनमें से एक सुरेश ने जब काशी जाने की जिद की तो उसके मामा ने उसे पांच सौ रुपये दिए, इतने में नहीं माना तो एक सोने की अंगूठी पहना दी. भांजा मान गया. दूसरे विद्यार्थी अंकुर ने जिद की तो उसके मामा ने उसे रुपयों की माला पहना दी, फिर भी नहीं माना तो सोने की चेन उपहार में दी. मंडप परिजनों की तालियों से गूंज उठा. इसी तरह तीसरे विद्यार्थी ने  दोबारा जिद की तो उसके मामा ने उसे शेरवानी गिफ्ट कर दी. चौथे आदित्य को तो उसके तीन-तीन मामाओं ने उपहारों से लाद दिया. सारे मंडप ने जोरदार तालियां बजाईं. उल्लास और मस्ती का माहौल था. मेरे मुंहबोले रामेश्वर मामा यह दृश्य देख रहे थे. पर मैं उनके मस्तिष्क पर खिंच रही चिंता की लकीरों को नहीं देख पाया था.

मैंने भी बाकियों की तरह काशी जाने की जिद की. रामेश्वर मामा ने कांपते हाथों से जेब से 21 रुपये निकाल के दिए. मंडप में सुगबुगाहट होने लगी. कोई कह रहा था-‘काश कि इसका कोई सगा मामा होता’  कोई कह रहा था- ‘बड़े रसूखदार बने फिरते हैं, और 21 रुपये दे रहे हैं भांजे को.’ मुझे मामा जी के अंतःकरण में उमड़ रहे वेदना के अथाह सागर का भान न था. लम्हों में सदियों का दर्द पी गए होंगे वे. मैंने भी मामा से दोबारा जिद की, ‘इतने से बात नहीं बनेगी, मैं तो चला काशी.’ रामेश्वर मामा के पास शायद और पैसे नहीं थे. उन्होंने अपनी कलाई घड़ी जिससे वे बहुत प्यार करते थे, उतारी और मुझे पहना दी. और रुंधे स्वर में बोले, ‘बेटा, आज अगर मेरे पास गांव में जमीन बची होती तो वह भी तुम्हारे ही नाम कर देता. और आज ही साबित कर देता कि कोई रिश्ता सौतेला नहीं होता.’

मैंने अपनी कलाई पर उनके आंसू की गर्म बूंदें महसूस कीं. मंडप में सन्नाटा पसर गया था. मैं शायद उस समय उम्र की परिपक्वता तक नहीं पहुंच पाया था. यह करुणा का अतिरेक था या ममता का चरम कि मेरा बालमन बोल उठा, ‘अरे मामा जी, आपने कैसी घड़ी दे दी. मेरी कलाई तो छोटी है. फिट ही नहीं हो रही है, इसे आप ले लीजिए. आप जैसे मामा को छोड़कर मैं कहीं नहीं जाने वाला.’  मामा जी ने मुझे गले लगाया तो लगा जैसे उन्होंने सारी जन्नत पा ली हो. हां, इस बार छलकती आंखों से पूरे पंडाल ने तालियां बजाई थीं.

इस घटना को घटे दस साल हो चुके हैं. हालांकि मैंने जनेऊ पहनना तो छोड़ दिया है लेकिन रामेश्वर मामा के हाथों में आज भी वही घड़ी बंधी हुई है. मैं आज भी मामा जी से चुहलबाजी करता हूं, ‘मामा, मेरा दिल इस घड़ी पर आ गया है, जी में आता है कि फिर से जनेऊ कर डालूं अपना.’ और मामा जी कलाई से घड़ी उतारने लगते हैं. फिर मैं यह कहते हुए मना कर देता हूं, ‘अब क्या फायदा, मेरी कलाई आपकी कलाई से ज्यादा बड़ी हो गई है.’ लेकिन सोचता हूं, क्या मेरा दिल भी कभी रामेश्वर मामा जितना बड़ा हो पाएगा!          (लेखक: पंकज प्रसून,लखनऊ निवासी पंकज हास्य कवि हैं)                          

हैदराबादी रुपया

प्रथम विश्वयुद्ध के समय हैदराबाद भारत की वह रियासत थी जिसने अंग्रेजों की सबसे ज्यादा मदद की थी. हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान, जिन्हें 1937 में अमेरिका की पत्रिका टाइम ने दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति बताया था, ने ब्रिटिश सरकार को वायु सेना की एक स्क्वाड्रन गठित करने के लिए काफी पैसा दिया था. इसे बाद में हैदराबाद स्क्वाड्रन नाम से जाना गया. यही मुख्य वजह थी कि जब निजाम ने अंग्रेजी शासन के सामने रियासत की अपनी मुद्रा जारी करने का प्रस्ताव रखा तो तत्कालीन सरकार इस पर सहमत हो गई. इस तरह भारत में दो मुद्राएं प्रचलित हो गईं.

1918 में रियासत में 5, 10 और 100 रुपये के नोट प्रचलन में आ गए. इन्हें हैदराबादी रुपया कहा गया. इनकी छपाई तब इंग्लैंड के छापेखानों में होती थी और वहां से जहाज के जरिए ये भारत आते थे. 1942 में हैदराबाद स्टेट बैंक (जिसका नाम बाद में स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद हो गया) की स्थापना हुई. इसे हैदराबादी मुद्रा के प्रबंधन का जिम्मा सौंपा गया.

1948 में जब हैदराबाद का भारत में विलय तय हुआ तब रियासत में प्रचलित मुद्रा एक बड़ी समस्या बन गई. स्वतंत्र भारत की सरकार ने तय किया कि कुछ सालों तक देश में दोनों मुद्राएं प्रचलित रह सकती हैं. इस दौरान सरकार ने 7 हैदराबादी रुपये के बदले 6 भारतीय रुपये की विनिमय दर निश्चित कर दी. आखिरकार 1951 में हैदराबादी रुपये की छपाई पूरी तरह से बंद कर दी गई. लेकिन अगले आठ साल तक इसकी वैधता कायम रही.   
-पवन वर्मा

गली-गली में शंकराचार्य

बनारस में गंगा महासभा के कार्यालय में चौपाल लगी है. बात धार्मिक गुरुओं से होते हुए शंकराचार्यों तक जा पहुंचती है. सवाल उछलता है कि जब चार शंकराचार्यों की ही व्यवस्था थी तो अब इतने शंकराचार्य कैसे हो गए. गंगा महासभा के आचार्य जितेंद्र तुरंत यह सवाल लपकते हैं और हिसाब-किताब की भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं, ‘आप खुद सोचें कि ढाई हजार साल पहले जब आदि गुरु शंकराचार्य ने चार शंकराचार्यों और चार मठों की व्यवस्था बनाई थी तब अभी का जो भारत है उस दायरे में हिंदुओं की आबादी करीब एक करोड़ की रही होगी. अब यह लगभग 80 करोड़ है, जबकि असली-नकली, सभी को मिलाकर अभी भी शंकराचार्यों की संख्या 86 तक ही पहुंच सकी है. आदि गुरु शंकराचार्य के ही फॉर्मूले और दृष्टि को देखें तो बढ़ी हुई हिंदू आबादी को सनातनी बनाए रखने के लिए आनुपातिक रूप से 320 शंकराचार्यों की जरूरत तो है ही. इसीलिए सोच रहा हूं कि अब भी 234 शंकराचार्यों की जो कमी है उनके लिए वैकेंसी निकाल दूं!’

आचार्य जितेंद्र यह बात व्यंग्य-विनोद में कहते हैं. भले ही वे कोई वैकेंसी नहीं निकालेंगे, लेकिन संभव है कि वास्तव में अगले कुछ साल के भीतर देश के भीतर शंकराचार्यों की फौज मौजूद हो और उनकी संख्या 320 का आंकड़ा भी पार कर जाए. अभी ही देश में कितने शंकराचार्य हो गए हैं इसका सही-सही अनुमान लगा पाना आसान नहीं. रांची से लेकर हरियाणा तक हर जगह कोई न कोई शंकराचार्य दिख जाता है. एक-एक शहर में भी कई शंकराचार्य देखे जा सकते हैं और बनारस का तो हाल यह है कि एक ही मकान में दो-दो शंकराचार्य नजर आते हैं. अगर आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों की ही बात हो तो वहां भी असली शंकराचार्यों के साथ कई और शंकराचार्य अपनी-अपनी दावेदारी के साथ मौजूद हैं और मठ किसका हो, इस पर सालों से जंग लड़ रहे हैं.

अविमुक्तेश्वरानंद की मानें तो कुछ शंकराचार्य चंदे के लिए बने हैं और कुछ  माफियाओं और नेताओं के बीच मध्यस्थता करके धंधा चलाने के लिए बनाए गए हैं

कई जानकारों की मदद से हम इस समय देश में शंकराचार्यों की संख्या का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं. सभी अपने आंकड़े देते हैं और आखिर में यह जोड़ते हैं कि इतने तो हमारी जानकारी में हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इतने ही हों, और भी होंगे. बनारस स्थित भारतीय विद्वत परिषद के सार्वभौम संयोजक कामेश्वर उपाध्याय की जानकारी में फिलहाल देश में 59 शंकराचार्य हैं. गंगा महासभा के आचार्य जितेंद्र यह संख्या 86 बताते हैं. पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के मुताबिक शंकराचार्यों का कुल आंकड़ा 100 के पार होगा. अखिल भारतीय छद्म शंकराचार्य अन्वेषी समिति बनाकर 2011 के माघ मेले में फर्जी शंकराचार्यों की तलाश करने वाले राकेश 55 शंकराचार्यों से मिल चुके हैं और विवरण के साथ उनके पैंफलेट भी छाप चुके हैं.

शंकराचार्यों की संख्या में दनादन हो रही वृद्धि, इस बढ़ोतरी की प्रक्रिया और इसके परिणामों को समझने के लिए कुछ जगहों पर भटकने पर कई दिलचस्प जानकारियां सामने आती हैं. बनारस में भटकने पर तो हैरान करने वाला यह तथ्य भी सामने आता है कि इस धर्मनगरी में पिछले कई सालों से शंकराचार्यों का उत्पादन भी हो रहा है. फैक्टरी के किसी प्रोडक्ट की तरह.

हाल में चार पीठों के शंकराचार्य तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने इलाहाबाद में चल रहे कुंभ का बहिष्कार करने का एलान किया. शंकराचार्य चाहते थे कि कुंभ मेले में संगम किनारे चारों पीठों को अलग-अलग जगह देने के बजाय उन्हें एक जगह जमीन दी जाए. लेकिन प्रशासन ने इनकार कर दिया लिहाजा शंकराचार्यों ने महाकुंभ का बहिष्कार कर दिया. हालांकि प्रशासन की कई कोशिशों के बाद उन्होंने बाद में यह बहिष्कार खत्म कर दिया.
बनारस में हमारी मुलाकात सबसे पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से होती है. वे ज्योतिषपीठ और शारदापीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के प्रतिनिधि हैं और बनारस श्रीविद्या मठ के प्रमुख भी. अविमुक्तेश्वरानंद हमें मठामनाय महानुशासन नामक एक पुस्तिका देते हुए कहते हैं, ‘आप स्वयं देख लें, इसमें आदि गुरु शंकराचार्य के मठों के बारे में सब कुछ साफ लिखा हुआ है.

एक साथ एक आयोजन के दौरान निशचलानंद, स्वरूपानंद और भारती तीर्थ(बाएं से दाएं)चार मठ होंगे देश में और चार ही शंकराचार्य भी. अब जो इन चारों के अलावा शंकराचार्य बने हैं, वे कैसे बने हैं, यह समझा जा सकता है और उनसे ही पूछिए.’ अविमुक्तेश्वरानंद की मानें तो कुछ शंकराचार्य तो चंदे के लिए बने हैं और कुछ आवश्यकता के आविष्कार की तर्ज पर माफियाओं और राजनीतिज्ञों के बीच मध्यस्थता करके धंधा चलाने के लिए बनाए गये हैं. उनके मुताबिक बहुत-से शंकराचार्यों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन जैसी संस्थाओं और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी खड़ा किया है. वे कहते हैं, ‘चूंकि हिंदू धर्म में ईसाई धर्म या इस्लाम की तरह धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था आरंभिक अवस्था से नहीं है, सो इसे लेकर लोग सचेत नहीं रहते या विरोध नहीं करते. इसलिए यह सब आसानी से हो भी रहा है.’  अविमुक्तेश्वरानंद काशी विद्वत परिषद के बारे में भी समझाते हैं. कहते हैं, ‘बताइए, आदि गुरु शंकराचार्य का 2,519वां साल चल रहा है और विद्वत परिषद 110 साल पुरानी संस्था है, वह कैसे अभिषेक वगैरह करवाकर शंकराचार्य घोषित कर देती है किसी को?’

अविमुक्तेश्वरानंद से लंबी बातचीत के बाद हम उनके मठ से कुछ ही दूरी पर असी घाट किनारे बने शंकराचार्यों के एक मठ में पहुंचते हैं. यहां एक मकान में फिलहाल दो महानुभावों ने जगदगुरु शंकराचार्य उपनाम के साथ अपने-अपने बोर्ड लगा रखे हैं, एक नरेंद्रानंद और दूसरे चिन्मयानंद. दोनों ही खुद को ऊर्ध्वामनाय सुमेरु पीठ काशी का शंकराचार्य कहते हैं. अविमुक्तेश्वरानंद की मानें तो कुछ साल पहले तक इस एक मकान में छह व्यक्ति जगदगुरु ऊर्ध्वामनाय सुमेरु पीठ के शंकराचार्य बनकर ही रहा करते थे.

काशी में कई विद्वत परिषदें हैं जो कभी भी चट मंगनी-पट ब्याह की तर्ज पर शंकराचार्य बनाने का माद्दा रखती हैं. मालेगांव कांड में फंसे अमृतानंद एक ऐसे ही शंकराचार्य हैं

शंकराचार्यों के इस बसेरे में हमारी मुलाकात नरेंद्रानंद सरस्वती से होती है. वे भी जगदगुरु शंकराचार्य हैं! अक्सर विश्व हिंदू परिषद के आयोजनों में गर्जना के साथ मौजूद दिखते हैं. कुछ समय पहले पटना में भी अशोक सिंहल, सुब्रहमण्यम स्वामी के साथ दिखे थे और खून खौलाओ- स्वाभिमान जगाओ जैसे वाक्यों के साथ खूब गरजे थे.

नरेंद्रानंद बातचीत करने के लिए हमें उस मकान के एक छोटे-से कमरे में ले जाते हैं. कमरे में आसन से लेकर सिंहासन तक का प्रबंध दिखता है. बिना इधर-उधर की बात किए हमारा पहला सवाल यही होता है, ‘मठामनाय महानुशासन पुस्तक के हिसाब से तो चार शंकराचार्य ही होने चाहिए, आप शंकराचार्य कैसे हुए?’ नरेंद्रानंद सामने की तख्ती से एक पुस्तिका जैसा कुछ निकालते हैं और उसे पढ़ते हुए कहते हैं, ‘अज्ञानियों ने भरमाया और समझाया है आपको! खेमराज प्रेस से प्रकाशित ब्रह्मसूत्र शारीरिक मीमांसा भाष्य है भ्रांति टीका के साथ, इसके पृष्ठ संख्या 23/24 को पढि़ए, इसमें 35 शंकराचार्यों और मठों का उल्लेख है.’ नरेंद्रानंद किसी मठामनाय उपनिषद और मठामनाय सेतुग्रंथ का हवाला देते हुए तर्क देते हैं कि उसमें भी सात आमनायों यानी दिशाओं और सात मठों का जिक्र है. वे कहते हैं, ‘सच यह है कि स्वरूपानंद, निश्चलानंद और भारती तीर्थ, जो खुद को असली शंकराचार्य कहते हैं, वे खुद ही शास्त्रीय आधार पर सही शंकराचार्य नहीं हैं. मैं तो काशी सुमेरु पीठ का शंकराचार्य हूं, सभी सीमारक्षक शंकराचार्यों के बीच राष्ट्रपति की तरह. मुझसे आकर सभी को सर्टिफिकेट लेना होगा, मुझे किसी के प्रमाण पत्र की दरकार नहीं.’

बोलते-बोलते नरेंद्रानंद कुछ भी बोलने लगते हैं. वे आगे कहते हैं, ‘सोचिए, प्रलय आने पर सभी मठ ध्वस्त हो जाएंगे, लेकिन शंकर के त्रिशूल पर बसे होने के कारण यह काशी नगरी जस की तस रहेगी और यहां का शंकराचार्य ही बचा-बना रहेगा.’ नरेंद्रानंद कहते हैं कि जिस मठामनाय महानुशासन की बात हमें समझाई गई है उस किताब की असली पांडुलिपि कोई दिखा दे तो वे उसकी गुलामी करेंगे. वे चुनौती देते हुए कहते हैं, ‘और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, जो 90 वर्ष की अवस्था पार करने के बावजूद आदि गुरु शंकराचार्य के दो मठों पर कब्जा जमाए हुए हैं, जब चाहें तब आकर हर की पौड़ी में हमसे शास्त्रार्थ कर लें, जो हारेगा वह अपनी संपत्ति दे देगा और वहीं पर जल समाधि ले लेगा.’

नरेंद्रानंद बड़ी-बड़ी बातें एक सुर में बोल जाते हैं. उनके बारे में वैसे भी कहा जाता है कि वे बोलने के उस्ताद हैं. वे जो कह रहे हैं, यह उनका दंभ है, भ्रम है, अतिआत्मविश्वास है या सच्चाई, यह तो वही जानें, लेकिन उनकी बातों से यह साफ हो जाता है कि शंकराचार्यों की इस दुनिया में जो झोलझाल है, वह राजनीति की दुनिया में होने वाले दांव-पेंच से कोई कम जटिल और मजेदार नहीं. यह भी साफ होता है कि शंकराचार्यों की इस दुनिया में सभी एक-दूसरे की पोल खोलने को हर वक्त तैयार बैठे हैं, बस उन्हें जरा-सा उकसाने की दरकार है. नरेंद्रानंद काशी के जिस सुमेरु पीठ का शंकराचार्य होने का दावा करते हैं, उस पर फिलहाल जगदगुरु शंकराचार्य चिन्मयानंद भी दावेदारी में लगे हुए हैं. उस पीठ पर तरह-तरह के विवाद होते रहते हैं. पटना में विहिप के एक आयोजन में खुद को सुमेरु पीठ का शंकराचार्य बताने वाले नरेंद्रानंद

विद्वानों का एक वर्ग हवाला देता है कि काशी को ऊर्ध्वामनाय (ऊपर की ओर स्थित) माना जाता है, इसलिए इसे ऊर्ध्वामनाय पीठ या सुमेरु पीठ कहते हैं. कुछ विद्वान कहते हैं कि 1950 के दशक में हिंदू धर्म सम्राट के नाम से प्रसिद्ध करपात्रीजी महाराज के सौजन्य से यह पीठ अस्तित्व में आया था और पहली बार यहां शंकराचार्य बनाने का चलन शुरू हुआ था. हालांकि नरेंद्रानंद सरस्वती ने अपने लिए जो बुकलेट छपवा रखी है उसमें वे खुद को काशी में 62वें शंकराचार्य के रूप में दिखाते हैं. दूसरी ओर शंकराचार्य के प्रतिनिधिगण इसे महज कल्पना बताते हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘जिस सात आमनायों के जरिए सात मठों का हवाला दिया जा रहा है, उसमें तीन अप्रत्यक्ष हैं. यदि कोई ऊर्ध्वामनाय का ही शंकराचार्य बनना चाहता है तो उसे काशी के बजाय कैलाश में बैठना चाहिए, क्योंकि ऊर्ध्वामनाय कैलाश को कहा गया है, काशी को नहीं.’

यह तो काशी में रहने वाले दो प्रमुख संतों जिनमें एक खुद शंकराचार्य हैं और दूसरे शंकराचार्य के प्रतिनिधि, उनके बीच सवाल-जवाब से पैदा हुई नोक-झोंक और विवाद की झलक भर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में जब शंकराचार्यों की पड़ताल करने की थोड़ी कोशिश भर करते हैं तो और भी अजब-गजब तर्क सामने आते हैं और अजब-गजब शंकराचार्य भी. शो रूम में चमकने वाले कुछ शंकराचार्यों के किस्से जानकर गोदाम की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पिछले दिनों एक शंकराचार्य उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर इलाके के एक रेलवे क्रॉसिंग के पास खुद मारुति 800 कार चलाते हुए दिखे थे. रेलवे क्रॉसिंग पर उनकी गाड़ी लगी थी, उनसे पूछा गया कि शंकराचार्य की गाड़ी है, वे किधर हैं. उनका जवाब था, ‘बताइये क्या बात है, मैं ही शंकराचार्य हूं.’ यह पूछने पर कि क्या अकेले ही चलते हैं, उनका जवाब था, ‘हां, इसी में सिंहासन-आसन सब रख लेता हूं, घूमता रहता हूं, एक चेला भी रहता है साथ में, लेकिन अभी नहीं है.’

भाजपा-कांग्रेस ने अपने-अपने शंकराचार्य बनाने की परंपरा शुरु की तो कई साधु-संत बनारस पहुंचकर विद्वत परिषद के सौजन्य से शंकराचार्य बनने को बेताब होते गए

एक अंगदशरणजी महाराज के शंकराचार्य बन जाने की कथा भी कई जगह सुनाई जाती है. अविमुक्तेश्वरानंद और आचार्य जितेंद्र उनके बारे में लगभग एक सा ही किस्सा बताते हैं. अंगदजी कथा-प्रवचन किया करते थे. लेकिन एक रोज कुछ विद्वानों को मैनेज करके वे खुद ही शंकराचार्य बन बैठे और अपने नाम के आगे जगदगुरु शंकराचार्य लगाकर घूमने लगे. अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘अंगदजी महाराज चार-चार बार शंकराचार्य बने, फिर वापस कथा-प्रवचन की दुनिया में लौटे. अब वे दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी पत्नी अपर्णा भारती प्रथम महिला शंकराचार्य बन गई हैं. हरियाणा के यमुनानगर जिला के रादौर नामक एक स्थान में भी शंकराचार्य पाए जाते हैं, जिन्हें अब रादौर पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य महेशाश्रमजी महाराज कहा जाता है.’ आचार्य जितेंद्र बताते हैं, ‘ये शंकराचार्य बिहार के गोपालगंज जिले के बरनैया गांव के रहने वाले हैं, वहां पहुंचकर उन्होंने पहले खुद एक पीठ बनाया, फिर उसके ईश्वर यानी पीठाधीश्वर बने और फिर नाम के आगे शंकराचार्य लिखने लगे.’ झारखंड की राजधानी रांची में भी कुछ साल पहले तक वनांचल पीठ बनाकर एक जगदगुरु शंकराचार्य रहा करते थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.

पुणे में भी एक शंकराचार्य के किस्से सुनाए जाते हैं कि कैसे कुछ साल पहले वहां एक साधु पहुंचते हैं, 27 नक्षत्रों को लेकर पांच एकड़ जमीन में एक पार्क बनवाते हैं, यज्ञ करवाते हैं और बाद में कुछ विद्वान उन्हें शंकराचार्य बना देते हैं. अमृतानंद, जो मालेगांव बम विस्फोट के बाद चर्चा में आए, उन्हें भी काशी के कुछ विद्वानों ने सर्वज्ञ पीठ का शंकराचार्य बनाया था. इसी तरह विशाखापत्तनम में स्वामी स्वरूपानंदेंद्र, कर्नाटक के सिमोगा में राघेश्वर भारती स्वामी, विद्याविनव विद्यारण्यमहास्वामी, कर्नाटक के ही सिरसी में गंगाधरेंद्र सरस्वती महास्वामी, बेंगलुरु में स्वामी केशवानंद भारती, अभिनव विद्याशंकर भारती स्वामी, कर्नाटक के ही चिकमंगलूर में स्वामी कृष्णनंदातीर्थ, स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती महास्वामी, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में विद्यावारसिम्हाभारती स्वामी, बेल्लारी में विद्यानंदभारती स्वामी, आंध्र प्रदेश के पुष्पागिरी में विद्यानरसिम्हा भारती स्वामीगल जैसे कई नाम मिलते हैं. ये सभी देश के अलग-अलग हिस्सों में जगदगुरु शंकराचार्य बनकर अध्यात्म और उसके संग धर्म के कारोबार को फला-फूला रहे हैं. इतने लोगों ने शंकराचार्य की उपाधि कैसे ले ली, पूछने पर जवाब मिलेगा- बनारस है ना! बनारस के विद्वान हैं ना!

दरअसल बनारस में पहले एक काशी विद्वत परिषद हुआ करती थी. अब पिछले कुछेक सालों में अलग-अलग नामों से विद्वत परिषदों की संख्या आधे दर्जन तक पहुंच चुकी है. इनमें कई विद्वत परिषद और उनसे जुड़े कुछेक विद्वान यहां ऐसे रहे हैं जो चट मंगनी-पट ब्याह की तर्ज पर शंकराचार्य बनाने का माद्दा हर समय रखते हैं. हालांकि अमृतानंद के मालेगांव कांड में आरोपित बनने के बाद बनारस की विभिन्न विद्वत परिषदें थोड़ी सचेत हुई हैं और अब दे-दनादन शंकराचार्य बनाने से बचती हैं. फिर भी चुनाव के समय इधर-उधर से छिप-छिपाकर वे कुछ शंकराचार्यों का उत्पादन कर ही देती हैं. 

यह तो कथित तौर पर फर्जी या मनमर्जी से बने शंकराचार्यों की बात है. लेकिन जो असली शंकराचार्य हैं और आदि गुरु शंकराचार्य के स्थापित मठों में रहते हैं, वहां का विवाद तो इनसे भी ज्यादा गहरा और पेचीदा है. पहला विवाद तो यही है कि चार पीठ हैं तो फिर पिछले कई सालों से तीन ही शंकराचार्य उन्हें क्यों देख रहे हैं.

दरअसल स्वामी स्वरूपानंद 1973 से ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य तो थे ही, 1982 में वे द्वारका पीठ के शंकराचार्य भी बन गए. अब सवाल उठ रहे हैं कि इतने वर्षों में किसी एक मठ पर दावेदारी छोड़कर वे अपने किसी शिष्य को यह जिम्मा क्यों नहीं दे रहे, जबकि उनकी खुद की उम्र 90 के करीब पहुंच चुकी है. दिलचस्प बात यह है कि जब स्वरूपानंद दूसरे मठ का भी जिम्मा संभालने लगे तो यह तर्क भी दिया गया था कि जैसे किसी राज्य में आपात स्थिति में व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक राज्यपाल को दूसरे राज्यपाल का भी जिम्मा दे दिया जाता है वैसे ही यह व्यवस्था हुई है. लेकिन स्वरूपानंद के विरोधी अब यह सवाल पूछते हैं कि राज्यपाल हमेशा के लिए ही दो राज्यों की देखरेख नहीं करता.

दूसरा विवाद यह है कि अब भी चारों प्रमुख मठ यानी द्वारका, ज्योतिष, गोवर्धन और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित कांचीपीठ को आदि पीठ नहीं मानते और न ही वहां के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को शंकराचार्य कहने को राजी होते हैं. यह अलग बात है कि वक्त की मांग पर जयेंद्र सरस्वती का आसन भी शंकराचार्यों के समानांतर लगाया जा चुका है. फिलहाल यदि कांची पीठ और जयेंद्र सरस्वती के विवाद को हटा भी दें तो तीसरा अहम पक्ष यह है कि पिछले कई सालों से आदि गुरु शंकराचार्य के इन चार पीठों, जिनका जिक्र मठामनाय महानुशासन में है, में कई-कई शंकराचार्य अपनी-अपनी दावेदारी की लड़ाई लड़ रहे हैं. पुरी के गोवर्धन पीठ पर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती तो जगदगुरु शंकराचार्य हैं ही, वहां अधोक्षजानंद सरस्वती भी पिछले कई सालों से खुद को उसी पीठ का शंकराचार्य कहते हैं. अधोक्षजानंद के बारे में कहा जाता है कि वे कांग्रेस के समर्थन से बने.

चार मठों के शंक्र्राचार्य कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को नहीं मानते

शारदा पीठ द्वारका पर स्वामी स्वरूपानंद तो जगदगुरु शंकराचार्य हैं ही, उसी पर राज राजेश्वर आश्रम का भी दावा है जो ज्यादातर हरिद्वार में रहते हैं और उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें संघ का समर्थन प्राप्त है. बद्रीनाथ में ज्योतिष पीठ है. वहां के भी शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद तो हैं ही, लेकिन स्वामी वासुदेवानंद भी खुद को उसी मठ का शंकराचार्य कहते हैं और इन दोनों के बीच वर्षों से चलने वाली जुबानी जंग चर्चित रही है. इसी मठ पर तीसरी दावेदारी माधवाश्रम की भी है. दक्षिण यानी कर्नाटक में बसे मठ शृंगेरी की बात करें तो वहां के शंकराचार्य भारती तीर्थ हैं, लेकिन उनके समानांतर 14 अन्य स्वामीगण शंकराचार्य उपनाम से जगदगुरु बने हुए हैं और सभी अपना-अपना काम चला रहे हैं, ज्यादा किचकिच नहीं है.

यह सब खेल उस आदि गुरु शंकराचार्य के नाम पर चल रहा है जो महज 32 साल की उम्र में ही दुनिया से विदा हो गए थे, जिन्हें घुमक्कड़ संन्यासी कहा गया था, जो शास्त्रार्थ के महारथी थे, जो बौद्ध धर्म के विस्तार को रोकते हुए हिंदुओं के लिए नायक सरीखे उभरे थे, जिन पर अब तक 1,500 से अधिक रिसर्च पेपर तैयार हो चुके हैं और तीन करोड़ से अधिक थीसिस लिखे जा चुके हैं. अखिल भारतीय विद्वत परिषद के संयोजक कामेश्वर उपाध्याय कहते हैं, ‘आदि गुरु शंकराचार्य तो दंड और कमंडल के अलावा कुछ नहीं लेकर चलते थे लेकिन अब के शंकराचार्य के आसन-सिंहासन को ही देखकर उनकी भव्यता और फिर उनके मठों तक पहुंचकर उनकी अकूत संपत्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है.’ प्राचीन इतिहास के जानकार डॉ. एचएस पांडेय भी कुछ ऐसा ही कहते हैं. वे बताते हैं, ‘दरअसल यह संपत्ति और वर्चस्व की लड़ाई है क्योंकि इसके जरिए आमदनी के अथाह स्रोत भी खुलते हैं.’

संपत्ति और वैभव-ऐश्वर्य के साथ नाम की लड़ाई है, यह तो साफ पता चलता है. जानकार यह भी बताते हैं कि हिंदू धर्म के इस शीर्ष पद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदुत्ववादी संगठन और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने मिलकर तरीके से इस्तेमाल भी किया है और बर्बाद भी. उनके मुताबिक हालिया अपने-अपने शंकराचार्य खड़े करने की परंपरा रामजन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद परवान चढ़ी. पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती कहते हैं कि बाबरी ध्वंस के बाद शृंगेरी मठ के शंकराचार्य, वैष्णवाचार्य आदि का दिल्ली में चातुर्मास हुआ. उसी समय रामालय ट्रस्ट की स्थापना भी हुई. स्वरूपानंद की अगुवाई में बने इस ट्रस्ट के बारे में कहा जाता है कि इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने विश्व हिंदू परिषद के नियंत्रण वाले रामजन्मभूमि न्यास के मुकाबले खड़ा किया था. निश्चलानंद कहते हैं, ‘हमारे पास भी 67 करोड़ रुपये दिए जाने का प्रस्ताव आया बशर्ते हम एक कागज पर हस्ताक्षर कर दें. ऐसा नहीं करने पर हमारे मठ, पद आदि को बर्बाद करने की धमकी भी दी गई थी.’ निश्चलानंद कहते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उस कागज पर मंदिर के साथ मस्जिद का भी जिक्र था. उसके बाद गोवर्धन पीठ पर चंद्रास्वामी की मदद से एक दूसरे शंकराचार्य स्वामी अधोक्षानंद को खड़ा कर दिया गया. बताया जाता है कि बाद में यह चलन भाजपाइयों ने लपका.  कांग्रेस ने एक शंकराचार्य खड़ा किया तो जवाब में भाजपाइयों और संघियों ने पूरे देश को शंकराचार्यों से पाट दिया.

‘आदि गुरु शंकराचार्य सिर्फ दंड और कमंडल लेकर चलते थे, लेकिन अब के शंकराचार्यों के आसन-सिंहासन और मठ को देखकर उनकी भव्यता आंकी जा सकती है’

उधर, स्वरूपानंद के प्रतिनिधि अविमुक्तेश्वरानंद उलट बात कहते हैं. वे बताते हैं, ‘रामजन्मभूमि आंदोलन के समय संघ-विहिप के लोगों ने स्वरूपानंद से संपर्क किया था. वे लोग स्वामी स्वरूपानंद को रामजन्मभूमि न्यास से जोड़ना चाहते थे लेकिन कोई भी शंकराचार्य उस संगठन से नहीं जुड़ सकता जिसमें नीति-निर्धारक वह स्वयं न हो, सो स्वरूपानंद ने मना कर दिया तो रामजन्मभूमि न्यास वाले लोगों ने दूसरे शंकराचार्य को उनके मुकाबले खड़ा किया, यह सब जानते हैं.’

हालांकि इन सबके बीच नरेंद्रानंद जैसे शंकराचार्य संघ-विहिप का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि जो खुद को असली शंकराचार्य कहते हैं वे अपनी जिम्मेदारी निभा ही नहीं रहे. वे कहते हैं, ‘कश्मीर से लेकर चीन तक के मसले पर बोलते ही नहीं, धर्मांतरण पर बोलते ही नहीं, यात्राएं करते ही नहीं तो किसी राष्ट्रवादी संगठन द्वारा राष्ट्रप्रेमी शंकराचार्यों को सहयोग करने पर हो-हल्ला क्यों मचाया जा रहा है?’

जानकारों के मुताबिक संघ और कांग्रेस द्वारा समानांतर शंकराचार्य खड़े करने की इस राजनीति का एक नतीजा तो फटाफट दिखने लगा था. जब भाजपा-कांग्रेस ने अपने-अपने शंकराचार्य बनाने की परंपरा शुरु की तो कई साधु-संत बनारस पहुंचकर विद्वत परिषद के सौजन्य से शंकराचार्य बनने को बेताब होते गए. जिन्हें विद्वत परिषद से भी सहयोग नहीं मिला, वे खुद किसी कोने में कुटिया बनाकर शंकराचार्यनामी बोर्ड लगाकर जगदगुरु शंकराचार्य बन बैठे. इन स्वयंभुओं में जिन्हें आदि गुरु शंकराचार्य की पुस्तक मठामनाय महानुशासन की जानकारी थी, उन्होंने उस पुस्तक में वर्णित शंकराचार्यों के दस उपनामों में से कोई एक अपने नाम के पीछे लगाने की सावधानी बरती. ये दस नाम क्रमशः वन, तीर्थ, अरण्य, सरस्वती, भारती, पुरी, आश्रम, गिरी, पर्वत और सागर हैं. जिन्हें इसकी जानकारी नहीं थी, वे सिर्फ अपना असल नाम बदलकर आगे आदि गुरु शंकराचार्य जोड़कर ही शंकराचार्य बन बैठे.

आखिर में सवाल फिर वही कि क्या सच में कुछ सालों में 320 शंकराचार्य देश में बन जाएंगे और आबादी के अनुपात में फिट बैठकर आदि गुरु का मान रखेंगे. या फिर यह किसी दूसरी परिणति की ओर इशारा कर रहा है? शंकराचार्यों की जो व्यवस्था हुई थी उसके कुछ कमजोर पहलू थे. पहला कमजोर पहलू तो यही था कि इस पद पर ब्राह्मण को ही विराजमान होना था. जानकारों का मानना है कि बदलते वक्त और समाज में आती जागरूकता के साथ सत्ता-सियासत और सामाजिक वर्चस्व में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के दिन लद गए हैं, सो ब्राह्मणवाद के इस एक बड़े प्रतीक की नियति भी ऐसी ही होनी है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी यह बात मानते हैं. वे कहते हैं, ‘इस पर पुनर्विचार की जरूरत है क्योंकि शंकराचार्यों के मठों में सिर्फ ब्राह्मण बच्चे पढ़ेंगे तो अब यह सामाजिक समीकरण नहीं चलने वाला है, पूरे हिंदू समाज के बारे में सोचना होगा.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘हमारी निजी राय तो यह है कि शंकराचार्यों को भी सोचना चाहिए कि आबादी बढ़ती जा रही है तो दूसरे काबिल संतों और विद्वानों को भी अहम जिम्मेवारी देकर व्यवस्था का विकेंद्रीकरण करना चाहिए. लेकिन इसके लिए कई शंकराचार्य बनाने की जरूरत नहीं है.’

अविमुक्तेश्वरानंद के अनुसार ऐसा भी नहीं है कि सभी फर्जी शंकराचार्य धूर्त ही हैं. वे कहते हैं, ‘उनमें कई काबिल और योग्य भी हैं,  उनसे बात कर उनके बीच दायित्वों का बंटवारा करना चाहिए.’ दूसरी बात यह भी है कि परंपरानुसार यह तय था कि जो शंकराचार्य होगा वह देश की सीमा नहीं लांघ सकता. आज भी जो कथित तौर पर असली वाले शंकराचार्य हैं वे इसका पालन करते हैं. लेकिन हालिया वर्षों में बने कई शंकराचार्य विदेशों की फुरफुरिया उड़ान भरते रहते हैं. उनकी नजर विदेशों में बसे भारतीय हिंदुओं पर रहती है जिनकी आबादी काफी है और उन्हें जजमान या शिष्य बनाने के फायदे भी बहुतेरे हैं. अखिल भारतीय विद्वत परिषद के कामेश्वर उपाध्याय कहते हैं, ‘देश में तो कई पीठ और बनने ही चाहिए, विदेश जाने से भी बंदिश हटाने की जरूरत है क्योंकि आज विदेशों में रहने वाले 12-14 करोड़ हिंदुओं को त्याज्य मानकर उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता. उन्हें भी धार्मिक शिक्षा-दीक्षा की जरूरत है.’ श्री श्री रविशंकर, रामदेव, आसाराम बापू आदि जैसे संतों का उदय और उनके दायरे का अपरंपार विस्तार भी शंकराचार्यों के लिए चुनौती ही है. एक तो समुदाय पर उनकी पकड़ भी ज्यादा है और वे किसी जाति या सीमा के नियमों में बंधे नहीं होते, इसलिए देश-विदेश कहीं भी आते-जाते रहते हैं. इस तरह के कई सवालों और चुनौतियों में उलझे शंकराचार्य आपस में गुत्थमगुत्थी कर रहे हैं.

हम शंकराचार्यों की दुनिया को समझने की जितनी कोशिश करते हैं, नए सवाल पेंच और बढ़ाते जाते हैं. हम आखिर में फिर आचार्य जितेंद्र से पूछते हैं कि हमने यह-यह जानकारी जुटाई, क्या-क्या बचा रह गया. वे कहते हैं, ‘आपने असल चीज तो किसी से पूछी ही नहीं. जब आदि गुरु शंकराचार्य थे तब भारत अखंड भारतवर्ष हुआ करता था. म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर अन्य देशों तक इसका दायरा था. कई वर्षों में एक-एक कर सभी देश अलग होते गए और भारत सिमटकर एक अलग देश के तौर पर बचा रहा. देश के इतने बंटवारे और  टुकड़े होने के बाद भी आदि गुरु शंकराचार्य के चारों पीठ अभी वाले भारत में ही कैसे पड़ गए. क्या इस दायरे को भी फिर से तय करने में झोलझाल किया गया है?’
 

आदि शंकराचार्य और चार मठ
शंकराचार्य  के पद को हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद माना जाता है. वैसे ही जैसे बौद्ध धर्म में दलाईलामा एवं ईसाई धर्म में पोप का पद है. मान्यताओं के अनुसार इस पद की परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य ने आरंभ की जिनका जन्म करीब ढाई हजार साल पहले केरल में मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर हुआ था. हालांकि एक वर्ग उनका जन्म वर्ष 789 ईसवी में बताता है. कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने भारत भर का भ्रमण किया और हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों की स्थापना की. उन्होंने शंकराचार्य पद की स्थापना करके उन पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को आसीन किया. तब से इन चारों मठों या पीठों में शंकराचार्य पद की परंपरा चली आ रही है. 

चार मठ

  • उत्तर का मठ ज्योतिर्मठ है जो उत्तराखंड के जोशीमठ में स्थित है. इसे ज्योतिषपीठ भी कहते हैं.
  • पूर्वी मठ गोवर्धन मठ  है जो उड़ीसा के पुरी में स्थित है.
  • दक्षिणी मठ शारदा पीठ है जो कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित है.
  • पश्चिमी मठ द्वारिका पीठ है जो गुजरात के द्वारिका में स्थित है.

अगर खोटा हूं तो छोटा हूं

बहुचर्चित दिल्ली गैंग रेप के पांच आरोपितों में से एक ने जब बीते पखवाड़े अपने ‘किशोर’ होने का दावा करते हुए अपनी सुनवाई किशोर न्यायालय (जुविनाइल कोर्ट) में स्थानांतरित करने के लिए अपील की तो इस घटना ने वयस्क अपराधियों द्वारा किशोर न्याय अधिनियम (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) के दुरुपयोग की ओर साफ इशारा किया. तहलका ने जब यह मुद्दा खंगाला तो दिल्ली से लेकर बिहार तक ऐसे मामलों का पता चला जहां वयस्क अपराधियों ने इस कानून की आड़ लेकर बच निकलने की कोशिश की है. 

भारतीय किशोर न्याय अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के सभी आरोपितों की सुनवाई विशेष किशोर अदालतों में होती है. इन विशेष अदालतों में होने वाली सुनवाई के बाद किशोर अपराधियों को सामान्य बंदीगृह के बजाय सुधार-गृह भेजा जाता है. किशोरों के लिए सुधारवादी सोच के साथ बनाए गए इस कानून के मुताबिक जघन्यतम अपराधों के लिए मिलने वाली अधिकतम सजा के तौर पर किशोरों को अधिकतम तीन साल के लिए सुधारगृहों में रखा जाता है.  लेकिन कई मामले हैं जो बताते हैं कि किशोर आरोपितों के लिए बनाए गए इस अधिनियम के उदार प्रावधानों का फायदा उठाकर शातिर अपराधी  कठोर सजाओं से बचने और पुलिस को चकमा देने की भरसक कोशिशें कर रहे हैं.

 16 दिसंबर गैंग रेप मामले की दिल्ली की एक फास्ट ट्रैक अदालत में जारी सुनवाई के पहले ही दिन आरोपित विनय शर्मा के वकील एपी सिंह ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश योगेश खन्ना की अदालत में अपील दायर करते हुए चिकित्सीय जांच द्वारा अपने मुवक्किल की उम्र की पुष्टि करवाने की गुहार लगाई. अदालत के बाहर पत्रकारों से बातचीत में उनका कहना था, ‘विनय वयस्क नहीं, किशोर है इसलिए उनके मामले की सुनवाई किशोर अदालत में होनी चाहिए.

उसकी मां का कहना है कि परिवार ने विनय का दाखिला स्कूल में जल्दी करवाने के लिए उसकी पैदाइश मार्च, 1994 की दर्ज करवाई. उसकी असली जन्म तिथि एक मार्च 1995 है. उसकी हड्डियों की मेडिकल जांच करवाने से यह साबित हो जाएगा कि वह अवयस्क है.’  लेकिन कुछ ही घंटों में मेडिकल रिपोर्ट सामने आते ही साफ हो गया कि विनय की उम्र 19 साल है और यह अपील उसे कड़ी सजा से किसी तरह बचाने की तरकीब के तौर पर दायर की गई थी. दिल्ली गैंग रेप मामले में शामिल छह आरोपितों में से एक किशोर आरोपित की सुनवाई का मामला फिलहाल किशोर न्यायालय में है जबकि अन्य पांचों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालत में चल रही है.

जानकार मानते हैं कि किशोर न्याय अधिनियम के बढ़ते दुरूपयोग के लिए कानून के क्रियान्वयन में बरती जा रही लापरवाहियां भी जिम्मेदार हैं

वयस्क अपराधियों द्वारा किशोर न्याय अधिनियम के दुरुपयोग से जुड़ा दूसरा बड़ा मामला तब सामने आया जब हाल ही में दिल्ली पुलिस ने नीरज बवाना नामक कुख्यात अपराधी से जुड़े हालिया अदालती निर्णय के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की. पुलिस आयुक्त (बाहरी दिल्ली) बीएस जायसवाल बताते हैं कि बवाना ने फर्जी दस्तावेज बनवाकर दिल्ली की रोहिणी अदालत में खुद को किशोर साबित करवा दिया था ताकि वह कम से कम वक्त में सुधारगृह से निकल सके.

वे कहते हैं, ‘फिरौती से लेकर हत्या और लूटपाट तक के कई मामलों में पुलिस को बवाना की  तलाश थी. सबसे पहले उसे 2008 में सुल्तानपुरी इलाके में हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया. उसने तभी किशोर होने के आधार पर अपना केस किशोर न्यायालय में शिफ्ट करने की अपील की थी, लेकिन अदालत द्वारा कागजात मांगने पर उसने अपनी अर्जी वापस ले ली.’ इसके बाद बवाना जमानत पर बाहर आया और कुछ दिन बाद फिर हत्या के आरोप में हरियाणा के रोहतक में गिरफ्तार हुआ.

इस बार वह ओपन स्कूल में दाखिले के फर्जी दस्तावेज दिखाकर अपने आपको किशोर साबित करने में सफल हो गया और हरियाणा अदालत ने मामला हरियाणा किशोर न्यायालय के सुपुर्द कर दिया. आगे जोड़ते हुए बीएस जायसवाल कहते हैं, ‘भारत की किसी भी अदालत में दिया गया फैसला हर दूसरी अदालत में मान्य होता है. इसी नियम के तहत बवाना ने खुद को रोहिणी की निचली अदालत से भी किशोर अदालत में स्थानांतरित करवा लिया. फिर जब हमने उस पर मकोका लगवाकर उसके पुराने दस्तावेजों की जांच की तो पता चला कि उसने खुद को बचाने के लिए फर्जी कागजात बनवाए थे ताकि वह अपनी उम्र कम साबित करके मामले को किशोर न्यायालय में ले जा सके और इतने जघन्य अपराध करने के बाद भी सिर्फ तीन साल सुधारगृह में गुजारकर बाहर निकल सके. लेकिन अब दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देते हुए हाई-कोर्ट में अपील दाखिल कर दी है और मामला विचाराधीन है.’

20 मार्च, 2012 को दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में ‘दिल्ली किशोर न्याय बोर्ड’ की प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट अनुराधा शंकर भारद्वाज ने पुलिस समेत किशोर न्याय अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े सभी सरकारी अमलों को फटकार लगाई थी. उनका कहना था कि ढांचागत लापरवाहियों के चलते वयस्क किशोर न्याय अधिनियम की आड़ में सजा से बचने की कोशिश कर रहे हैं और बच्चों को बड़ों की अदालतों में धकेला जा रहा है. अपने निर्णय में वे लिखती हैं, ‘हमें हरसंभव कोशिश करके यह सुनिश्चित करना होगा कि वयस्क अपराधी आरोपी किशोर न्याय अधिनियम का फायदा न उठा पाएं और बच्चों को बड़ों की जेलों में न जाना पड़े.’ लेकिन इन तमाम हिदायतों के बाद भी खूंखार अपराधी लगातार किशोर न्याय अधिनियम को ढाल की तरह इस्तेमाल करके अदालती कार्यवाहियों को उलझाने और अपने आप को बचाने के प्रयास कर रहे हैं. ऐसा ही एक महत्वपूर्ण मामला बिहार के जमुई जिले में सामने आया है.

क्षेत्र में 19 बड़ी डकैतियों को अंजाम देने वाले गुलाबी यादव को स्थानीय जिला अदालत ने मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर किशोर घोषित कर दिया. जिला अभियोजन अधिकारी ज्ञानचंद्र भारद्वाज और तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक राम नारायण सिंह ने बिहार राज्य के महाधिवक्ता को पत्र लिखकर इस निर्णय में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अपील भी की है. तहलका से बातचीत में भारद्वाज बताते हैं कि गुलाबी यादव क्षेत्र के सबसे कुख्यात अपराधियों में से एक है.

क्षेत्र में 19 बड़ी डकैतियों को अंजाम देने वाले गुलाबी यादव को स्थानीय जिला अदालत ने मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर किशोर घोषित कर दियावे कहते हैं, ‘पहले वह अपने स्कूल के दाखिले के कागज लाया लेकिन वे खारिज कर दिए गए. लेकिन फिर 2011 में जिला न्यायालय ने उसे एक मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर किशोर घोषित कर दिया. कानून के अनुसार आरोपी की मेडिकल जांच के दौरान एक रेडियोलॉजिस्ट का मौजूद होना जरूरी है  जबकि यहां पूरे क्षेत्र में एक भी रेडियोलॉजिस्ट नहीं है. जाहिर है कि आरोपी ने कम सजा और जल्दी बाहर निकलने के लिए फर्जी कागजात बनवाए थे. लेकिन इतने खूंखार अपराधी अगर कानून का दुरुपयोग करके बाहर आ गए तो वे आगे और मुसीबत खड़ी कर सकते हैं. इसलिए हमने तुरंत राज्य के महाधिवक्ता को पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के लिए पत्र लिखा.’ 

जानकार मानते हैं कि अपराधियों द्वारा किशोर न्याय अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग के पीछे कानून के क्रियान्वयन में बरती जा रही लापरवाही और पुलिस के साथ अपराधियों का बढ़ता गठजोड़ भी जिम्मेदार है. दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास विभाग के सहायक निदेशक पी खाखा का मानना है कि उम्दा कानूनों के लचर क्रियान्वयन की वजह से दुर्दांत अपराधी किशोरों के लिए बनाई गई न्याय प्रणाली का फायदा उठाने में कामयाब हो रहे हैं. वे कहते हैं, ‘दिल्ली के अंदर इस कानून से छेड़छाड़ करना हमेशा मुश्किल रहा है.

इसलिए अब अपराधी दूसरे राज्यों के किशोर न्याय बोर्डों में खुद को किशोर साबित करवा लेते हैं. बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार की वजह से फर्जी स्कूल एडमिशन कार्ड बनवा पाना बहुत आसान हो गया है. ज्यादा हुआ तो हेडमास्टर को ताकत या पैसे के बल पर धमकाया जा सकता है कि वह बयान देने उपस्थित ही न हो या कह दे कि रिकार्ड ही गुम हो चुका है. अपराधी अपनी जिंदगी बचाने के लिए कई बार गवाहों को धमकाते भी हैं. दूर-दराज के क्षेत्रों में तो पुलिस भी अपराधियों के साथ साथ-गांठ कर अपराधी के फर्जी कागजात तैयार करवाने में मदद करती है. ऐसे में किशोर न्याय अधिनियम का सजा से बचने के शॉर्टकट के तौर पर इस्तेमाल तो होना ही था.’

लेकिन किशोरों के अदालती मामलों को लंबे समय से शामिल रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत अस्थाना मामले का एक दूसरा पक्ष भी रखते हैं. उनके मुताबिक किशोर न्याय अधिनियम के दुरुपयोग की सबसे महत्वपूर्ण वजह है जन्म पंजीकरण कानून का ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाना. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘ आजकल वयस्क अपराधी किशोर न्याय अधिनियम का फायदा उठाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनवाकर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने की बहुत कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन किसी भी कानून का इतना दुरुपयोग तभी होता है जब उसके क्रियान्वयन में झोल हों. लेकिन हर अपराध से निपटने के अपने कानूनी तरीके हैं. ज्यादातर लोग शुरुआत में तो इस कानूनी उठा-पठक में शामिल हो जाते हैं लेकिन बाद में पकड़े जाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या पैदा ही क्यों हो रही है. इसके सबसे बड़ा कारण है जन्म पंजीकरण कानून के क्रियान्वयन में गड़बड़ी. अगर हम हर बच्चे का जन्म पंजीकरण कानूनी तरीके से करवाएं तो इस कानून के दुरुपयोग की गुंजाइश बहुत कम
हो जाएगी.’
(रूपेश सिंह के सहयोग के साथ)

चौटाला का घोटाला

27 जून, 1990 को पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल को उनके मुख्य संसदीय सचिव रण सिंह मान ने नौ पेज लंबा पत्र लिखा था. पत्र देवी लाल के बड़े बेटे ओमप्रकाश चौटाला के बारे में था. चिट्ठी में मान ने देवी लाल को सचेत करते हुए बताया था कि कैसे ओमप्रकाश चौटाला अपने अनैतिक और भ्रष्ट व्यवहार से पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं. कैसे उनके हस्तक्षेप से पार्टी दिशाहीन होती जा रही है और अगर देवी लाल ने समय रहते ओमप्रकाश को नहीं रोका तो वे देवी लाल की राजनीतिक विरासत के अंत का कारण बनेंगे.

कुछ दिनों पहले ही दिल्ली की एक अदालत ने ओमप्रकाश चौटाला एवं उनके बेटे अजय चौटाला को जेबीटी (जूनियर बेसिक ट्रेंड) शिक्षक घोटाले में दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई है. इन दोनों के साथ 53 और लोगों को भी तीन से लेकर 10 साल तक की सजा सुनाई गई है. जेबीटी घोटाला देवी लाल के पुत्र और इंडियन नेशनल लोक दल (आईएनएलडी) प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था. जिस दिन ओमप्रकाश और अजय चौटाला को सजा सुनाई गई उसी दिन से हरियाणा और राष्ट्रीय राजनीति तक में इस बात को लेकर चर्चा है कि क्या यह फैसला चौटाला परिवार और आईएनएलडी के राजनीतिक अंत की तरफ इशारा कर रहा है.

जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा 8(3) के अनुसार, किसी अपराध में दो साल से अधिक के कारावास की सजा पाने वाला कोई भी व्यक्ति सजा खत्म होने के छह साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकता. अगर चौटाला पिता-पुत्र की 10 साल की सजा ऊपर की अदालतों में भी बरकरार रहती है तो वे अगले 16 साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. ऐसी स्थिति में पार्टी तथा चौटाला परिवार के राजनीतिक भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठना लाजिमी है. एक पार्टी के तौर पर आईएनएलडी भारतीय राजनीति की अन्य कई पार्टियों की तरह ही परिवार के रिमोट से संचालित होती रही है. पहले रिमोट चौधरी देवी लाल के हाथ में था. आज ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटों के हाथ में है.

ओमप्रकाश और अजय चौटाला को जेल हो चुकी है और परिवार के तीसरे प्रमुख सदस्य अभय को भी देर-सवेर पिता और भाई की राह जाना पड़ सकता है

एक तरफ जेबीटी मामले में ओमप्रकाश और अजय को कोर्ट ने सजा सुनाई है. वहीं दूसरी तरफ चौटाला परिवार और भी कई गंभीर आरोपों के घेरे में है. आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में दिल्ली की एक अदालत में चौटाला परिवार के खिलाफ सीबीआई ने मामला दर्ज कराया है. यह केस भी सुनवाई के दौर में है और इसमें ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय चौटाला का भी नाम है. सूत्र बताते हैं कि इस मामले में भी चौटाला परिवार को राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. भ्रष्टाचार के एक अन्य मामले में सीबीआई ने  ओमप्रकाश चौटाला के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने की सिफारिश की है. हरियाणा सिविल सेवा में अयोग्य लोगों के नामांकन से संबंधित इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से राय मांगी है. यानी फिलहाल की स्थिति यह है कि ओमप्रकाश चौटाला और अजय को जेल हो चुकी है और परिवार के तीसरे प्रमुख सदस्य अभय को भी देर-सवेर पिता और भाई की राह जाना पड़ सकता है.

खैर, अभय का क्या होता है, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन ओमप्रकाश चौटाला और अजय को मिली सजा इस मायने में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये दोनों ही राज्य में पार्टी के कर्ताधर्ता थे. पिछले कुछ समय से वे दोनों पूरे राज्य में लगातार सभाएं कर रहे थे. सभाओं में खासी भीड़ भी उमड़ रही थी. लोगों के हुजूम को देखकर ओमप्रकाश लगभग हर सभा में उत्साहित होते हुए कहते कि अगली सरकार आईएनएलडी की बनने से कोई नहीं रोक सकता. तभी यह फैसला आ गया.

जानकारों का एक वर्ग मानता है कि चौटाला और उनके बड़े बेटे का जेल जाना आईएनएलडी के अंत की दिशा में एक शुरुआत है. लोकसभा के साथ ही राज्य विधानसभा का चुनाव भी 2014 में होना है. ऐसे में अगर उन्हें अपनी वर्तमान सजा पर ऊपरी अदालत से कोई रियायत नहीं मिलती है तो न तो ओमप्रकाश और न ही अजय चौटाला इन चुनावों में हिस्सा ले सकेंगे. अगर उच्च और सर्वोच्च नयायालय इस सजा को बरकरार रखते हैं तो दोनों अगले लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2029 में ही लड़ सकेंगे. तब तक ओम प्रकाश चौटाला करीब 95 साल के हो चुके होंगे.

इस तरह से परिवार और पार्टी दोनों के लिए एक बेहद अंधकारमय भविष्य दिखता है. प्रश्न उठता है कि 2029 तक क्या पार्टी और परिवार अपने शीर्ष नेतृत्व के अभाव में अपनी राजनीतिक विरासत को जिंदा रख पाएंगे. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, ‘अगर आईएनएलडी परिवार केंद्रित नहीं होती तो उसके बचने की कोई संभावना दिखती. आईएनएलडी और चौटाला उन तमाम राजनीतिक पार्टियों के लिए एक सबक हैं जो व्यक्ति या परिवार केंद्रित हैं. अगर आईएनएलडी में आंतरिक लोकतंत्र होता तो पार्टी के पास ऐसे नेता होते जो चौटाला परिवार के राजनीतिक सीन से गायब होने की स्थिति में पार्टी को आगे बढ़ाते. लेकिन ऐसा नहीं है. यही कारण है कि आज उसके अंत पर चर्चा शुरू हो गई है.’

चौटाला के जेल जाने की स्थिति में भाजपा से उनकी दोस्ती की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है. इसका सीधा फायदा कुलदीप बिश्नोई को मिलेगा

ओमप्रकाश और अजय चौटाला के जेल जाने के बाद मैदान में सिर्फ अभय बचे हैं. इस समय पार्टी को एकजुट रखना और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरने से रोके रखना अभय चौटाला के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व के जेल जाने और 16 साल तक राजनीति से दूर रहने की स्थिति में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोहभंग होगा और वे धीरे-धीरे किसी और पार्टी का दामन थामते नजर आएंगे. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘अभय में उतनी राजनीतिक काबिलियत है नहीं. ऐसी स्थिति में नेता-कार्यकर्ता इस डूबते जहाज से उड़ने में ही अपनी भलाई समझ सकते हैं.’ वरिष्ठ पत्रकार बलवंत तक्षक इस बात को थोड़ा और आगे ले जाते हुए कहते हैं, ‘जो अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर सतर्क हैं, वे अभी की स्थिति में आईएनएलडी से जुड़ने से रहे. और जो पार्टी से अभी जुड़े हुए हैं, वे जल्दी ही अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए कुछ और ठिकाने तलाशते हुए नजर आएंगे.’

हालांकि आईएनएलडी के राज्य सभा सदस्य रणबीर सिंह प्रजापति इस तरह के बयानों से इत्तेफाक नहीं रखते, वे कहते हैं, ‘देखिए, अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो हम उससे निपट लेंगे. हमारे पास अभय चौटाला के साथ ही अशोक अरोड़ा समेत नेताओं की एक लंबी फौज है.’दैनिक जागरण की हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ की राज्य प्रमुख मीनाक्षी शर्मा इन कथनों से अलग कुछ इस तरह से अपनी राय रखती हैं, ‘देखिए, पार्टी के सामने अभी तुरंत तो राजनीतिक अस्तित्व का संकट दिखाई नहीं देता. अभय चौटाला मौजूद हैं ही राज्य में पार्टी का संगठन भी मजबूत है. हां, अगर अभय को भी संपत्ति वाले मामले में सजा हो जाती है तो फिर दिक्कत पेश आएगी.’

मगर हरियाणा, पंजाब जैसे प्रदेशों के इतिहास ज्यादातर जानकारों की आईएनएलडी के कमजोर होने की भविष्यवाणियों के उलट पंजाब विश्वविद्यालय  में समाजशास्त्र के प्रोफेसर  मंजीत सिंह इसके और अधिक मजबूत होने की संभावना हमारे सामने रखते हैं, ‘देखिए, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ जब मामला दर्ज हुआ था तो बाद के चुनाव में वो और अधिक मतों से विजयी हुए थे.’ ‘हरियाणा के जाट बहुत अलग टाइप के लोग होते हैं. अगर उनके मन में ये बात बैठ गई कि चौटाला को कांग्रेस ने जान-बूझकर फंसाया है तो फिर मामला कांग्रेस के खिलाफ जा सकता है.’ मीनाक्षी, मंजीत की बात को विस्तार देते हुए कहती हैं, ‘जाटों की मानसिकता अलग ही होती है. वो ये सोच सकते हैं कि चौटाला ने गलत कर भी दिया तो उन्हें जेल भेजने की क्या जरूरत थी.’

आईएनएलडी के दो शीर्ष नेताओं को जेल होने के कारण राज्य में विपक्ष का स्थान भी एकाएक खाली-सा हो गया है. हरियाणा विधानसभा में ओमप्रकाश चौटाला नेता प्रतिपक्ष हैं, उन्हीं के साथ सजा पाए शेर सिंह बादशामी उप नेता प्रतिपक्ष हैं. इन लोगों के जेल जाने तथा आईएनएलडी के राज्य में कमजोर होने की स्थिति में विपक्ष के स्थान पर जो शून्य बना है उस पर फिलहाल हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां)-भाजपा गठबंधन की नजर है. जिस दिन जेबीटी मामले में फैसला आया, उसी दिन हजकां अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने सभी आईएनएलडी नेताओं और कार्यकर्ताओं से आईएनएलडी छोड़ हजकां में शामिल होने की अपील कर दी. उनकी अपील पर लोग हजकां में जाते हैं या भाजपा में या फिर काग्रेस में यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन ऐसा जरूर माना जा रहा है कि भविष्य में जो लोग भी राज्य कांग्रेस छोड़ेंगे वे जाहिर तौर पर आईएनएलडी से जुड़ने के बजाय हजकां या भाजपा की ओर ही रुख करेंगे.

जानकार बताते हैं कि आईएनलडी के कमजोर होने की स्थिति में हजकां को फायदा होने की उम्मीद तो है लेकिन फिलहाल इसका सबसे अधिक फायदा कांग्रेस को होने वाला है. ऐसा माना जा रहा है कि राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस के लिए इससे अधिक सुकून और राजनीतिक फायदे की बात कुछ और नहीं हो सकती कि उसके सबसे बड़े विरोधी आईएनएलडी और चौटाला परिवार बेहद कमजोर या राजनीतिक तौर पर खत्म हो जाएं. ज्यादातर जानकार इस बात पर एकमत हैं कि सीनियर चौटाला और उनके बेटे के राजनीति से बाहर, जेल में होने की स्थिति में आईएनएलडी के वफादार नेताओं, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का मनोबल गिरना तय है. ऐसे में कुछ समय के बाद आईएनएलडी के कोर जाट मतदाताओं का झुकाव भुपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस की तरफ हो सकता है. इस बात का एक पक्ष और है कि अगर राज्य में चौटाला परिवार सिमटता है, जो जाटों की राजनीति के लिए जाना जाता है, तो फिर ऐसी स्थिति में जाटों का दूसरा ठिकाना दूसरे जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा हो सकते हैं. कभी देवी लाल के संसदीय सचिव रहे और वर्तमान में कांग्रेस प्रवक्ता रण सिंह मान कहते हैं, ‘चौटाला के जेल जाने में हमारी कोई भूमिका नहीं है; लेकिन हां, आईएनएलडी को होने वाले चुनावी नुकसान का फायदा कांग्रेस को ही होगा.’

जिन शिक्षकों की नियुक्ति से ये पूरा घोटाला (जेबीटी) जुड़ा है, उनका भविष्य भी अधर में झूल रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि अगर कोर्ट ने इस मामले में कोई निर्णय नहीं लिया और गेंद राज्य सरकार के पाले में गई तो ये बिल्कुल संभव है कि हुड्डा सरकार इन लोगों की नौकरी बचाने के लिए कोई न कोई व्यवस्था करे. तक्षक कहते हैं, ‘ऐसी स्थिति में चौटाला के प्रति जिस भावनात्मक उभार की बात की जा रही है उसकी हवा निकल सकती है.’ हालांकि मीनाक्षी एक और संभावना की तरफ इशारा करती हैं, ‘देखिए, राज्य में आईएनएलडी और हजकां दोनों कांग्रेस के खिलाफ ही लड़ रहे हैं. ऐसे में इस बात की संभावना भी बनती है कि भविष्य में कांग्रेस से निपटने के लिए दोनों हाथ मिला लें.’

आईएनएलडी के दो शीर्ष नेताओं को जेल होने के कारण राज्य में विपक्ष का स्थान भी एकाएक खाली-सा हो गया है.

आईएनएलडी के राजनीतिक भविष्य के सामने एक और बड़ी बाधा भाजपा से समाप्त हुए उसके राजनीति- रिश्ते से भी उपजती है. हरियाणा में अब तक स्थिति यह रही है कि कोई भी क्षेत्रीय दल भाजपा के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सका है. अब चौटाला पिता-पुत्र के जेल जाने की स्थिति में भाजपा से उनकी दोस्ती की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है. इसका सीधा फायदा हजकां को मिलेगा. अब वह कम से कम भाजपा से अपने संबंध को लेकर निश्चिंत हो सकती है.

आईएनएलडी और देवी लाल की विरासत को पराभव के इस स्तर तक पहुंचाने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार ओमप्रकाश चौटाला को ही बताया जा रहा है. ‘आज तक वे अपने पिता के अच्छे कर्मों से उपजी फसल काट रहे थे. अब वो अपने कुकर्मों की फसल काट रहे हैं. ‘ रण सिंह मान कहते हैं कि देवी लाल जी की समस्या यह थी कि वे घोर परिवारवादी थे. यही कारण है कि ओमप्रकाश अपनी मनमर्जी करते गए और आगे चलकर अपने बेटों के साथ मिलकर उन्होंने एक राजनीतिक दल को ‘गैंग ’ में तब्दील कर दिया.

रशीद चौटाला परिवार की राजनीतिक विरासत में गिरावट को एक अलग नजरिये से पेश करते हुए कहते हैं, ‘देखिए, अर्थशास्त्र में  एक ‘लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न’ होता है जिसे अगर राजनीति में लागू करें तो उसका मतलब है जैसे-जैसे पीढ़िया बढ़ती जाएंगी वैसे-वैसे परिवार का राजनीतिक प्रभाव कम होता जाएगा.’ देवी लाल की मृत्यु के बाद से चौटाला परिवार के हरियाणा में राजनीतिक तौर पर कमजोर होने की तेजी से शुरुआत हुई. स्थिति यहां तक पहुंची कि पार्टी पिछले 2 लोकसभा चुनावों में एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई. 2004 लोकसभा के चुनावों में पार्टी ने हरियाणा, राजस्थान, चंडीगढ़ समेत उत्तर प्रदेश में 20 सीटों पर चुनाव लड़ा. इनमें से 14 पर उसके प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे.

पांच दिन से लेकर पांच साल तक हरियाणा की चार बार सरकार चलाने वाले ओमप्रकाश चौटाला का राजनीतिक जीवन शुरुआत से ही बेहद विवादित रहा है. कहा जाता है कि वे सन् 1997 के आसपास सोने की घड़ियों की स्मगलिंग तक करते थे. एक बार वे दिल्ली एयरपोर्ट पर पकड़े गए. तब देवी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने ओमप्रकाश चौटाला से अपना संबंध समाप्त करने की घोषणा कर दी थी. रुचिका गिरहौत्रा मामले में आरोपित पुलिस अधिकारी एसपीएस राठौर के बचाव में उतरे ओमप्रकाश चौटाला को 1996 में सैकिया आयोग ने आमिर सिंह की हत्या से जुड़े होने के कारण दोषी ठहराया जिसके बाद चौटाला को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था.

2004 लोकसभा के चुनावों में पार्टी ने हरियाणा, राजस्थान, चंडीगढ़ समेत उत्तर प्रदेश में 20 सीटों पर चुनाव लड़ा. इनमें से 14 पर उसके प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थेजानकार बताते हैं कि 1999 में पहली बार पांच साल के लिए सत्ता मिलते ही चौटाला ने भ्रष्टाचार के नए मानक स्थापित करने शुरू किए. मान कहते हैं, ‘अपने उस कार्यकाल में एक तरफ जमकर प्रदेश को लूटा वहीं केंद्र में एनडीए की सरकार होने और उसके सहयोगी होने के बावजूद वे राज्य में कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला पाए.’ ओमप्रकाश चौटाला के दोनों बेटे भी बेहद विवादास्पद रहे. भ्रष्टाचार से लेकर अन्य कई गलत कारणों से ये लोग चर्चा में रहे हैं. यही कारण है कि पिता के साथ ही उन दोनों पर भी गंभीर मामलों में केस दर्ज है. मान कहते हैं, ‘ओमप्रकाश चौटाला के बेटे उनसे भी दो कदम आगे हैं.’ हालांकि आईएनएलडी के नेता पार्टी तथा चौटाला परिवार के राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही अटकलों को खारिज कर देते हैं. आईएनएलडी के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री जसविंदर सिंह संधू कहते हैं, ‘कोर्ट का जो फैसला आया है उसका पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. केंद्र की शह पर सीबीआई ने जो चाल चली है उससे निपटने के लिए पार्टी पूरी तरह तैयार है.’

आईएनएलडी के आम कार्यकर्ताओं से लेकर नेता तक इस बात का प्रचार करने में लगे हुए हैं कि कांग्रेस ने साजिश रच कर सीबीआई के दुरुपयोग से उनके प्रिय नेता को जेल भेजा है क्योंकि वे कभी कांग्रेस के सामने नहीं झुके. इसके साथ वे एक बात और जोड़ते हैं कि चौटाला पिता-पुत्र अपने लोगों को नौकरी दिलाने की वजह से जेल में है. उन्होंने इसके लिए किसी से कोई पैसा नहीं लिया. 25 जनवरी से अभय चौटाला के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य के सभी जिला मुख्यालयों पर जाकर सभाएं करने की शुरुआत भी की है.

रणबीर सिंह प्रजापति कहते हैं, ‘ये सच है कि कोर्ट के फैसले से हमारी पार्टी को भारी झटका लगा है लेकिन ये भी उतना ही सत्य है कि राज्य की जनता हमारे साथ है. हम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जा रहे हैं. हमें पूरी उम्मीद है वहां हमें न्याय मिलेगा.’

नर्मदा पर रार

नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान अपने-अपने राज्यों के सूखे इलाकों में नर्मदा का पानी पहुंचाना चाहते हैं. क्या उनकी यह महत्वाकांक्षी कावेरी जल विवाद जैसी अंतहीन समस्या खड़ी करने वाली है? शिरीष खरे की रिपोर्ट.

भले ही गुजरात और मध्य प्रदेश में एक ही पार्टी भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो लेकिन नर्मदा को लेकर दोनों राज्य द्वंद्व और टकराव के मुहाने पर खड़े हैं. पानी के बंटवारे को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आमने-सामने आ गए हैं.

शिवराज सिंह के करीबी अधिकारी नर्मदा को लेकर ताजा विवाद की शुरूआत मोदी के चौथी बार सत्ता में वापसी के बाद हुए शपथ समारोह से जोड़कर देख रहे हैं. मोदी ने चुनाव के ठीक पहले नर्मदा के पानी से अपनी राजनीतिक फसल बोकर सौराष्ट्र में निर्णायक बढ़त हासिल की थी. सो जब उनका शपथग्रहण समारोह हुआ तब मोदी ने मंच से घोषणा कर दी कि आने वाले दिनों में वे सौराष्ट्र के सारे बांधों को नर्मदा के पानी से लबालब कर देंगे. मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस समारोह में उपस्थित थे. नर्मदा पर मोदी की इस सियासी चाल से सबक लेते हुए चौहान ने अहमदाबाद से भोपाल लौटते ही नर्मदा का पानी मप्र के निमाड़ और मालवा के कोने-कोने तक पहुंचाने की घोषणा कर दी. गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश का यही हिस्सा है जहां भाजपा को सबसे कम बढ़त मिली थी. इसी को ध्यान में रखते हुए चौहान ने नर्मदा का पानी क्षिप्रा में डालने की उस महत्वाकांक्षी योजना को पहले ही हरी झंडी दिखा दी है जिसमें उन्होंने महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन सहित आस-पास के सैकड़ों गांवों की प्यास बुझाने का दावा किया है. मोदी और चौहान के भविष्य की राजनीति काफी हद तक नर्मदा के पानी पर टिकी है और दोनों ही खुद को विकासपुरुष के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं. इसलिए उनके बीच टकराव होना स्वाभाविक है. इसी कड़ी में चौहान ने एनसीए (नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण) और केंद्रीय जल आयोग को इसी जनवरी में पत्र लिखकर मोदी की उस दस हजार करोड़ रुपये  की लागत वाली नर्मदा अवतरण योजना पर सख्त आपत्ति जताई है जिसमें गुजरात सौराष्ट्र के तकरीबन 115 बांधों को नर्मदा के पानी से भरना चाहता है. चौहान ने अपने पत्र में गुजरात पर हर साल निर्धारित मात्रा से एक चौथाई अधिक पानी लेने और कई शहरों में उसके व्यावसायिक इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाया है.

नर्मदा से ही जुड़े एक और मामले में चौहान ने सरदार सरोवर बांध के नीचे प्रस्तावित गरुड़ेश्वर योजना से भी अपना हाथ खींचना तय किया है. मुख्यमंत्री का मानना है कि मप्र को इससे बिजली का कोई लाभ नहीं मिलेगा.
दोनों राज्यों के बीच पानी पर शुरू हो रही इस खींचतान को समझने के लिए हमें दिसंबर, 1979 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के उस निर्णय में जाना होगा जिसमें न्यायाधिकरण ने अगले 45 साल के लिए मप्र को 18.25 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट), गुजरात को नौ एमएएफ और राजस्थान तथा महाराष्ट्र को क्रमशः 0.50 और 0.25 एमएएफ पानी आवंटित किया था.

हालांकि मप्र ने एनसीए में गुजरात के खिलाफ जो आपत्ति लगाई है उसका गुजरात की तरफ से आधिकारिक जवाब आना अभी बाकी है कि वह नौ एमएएफ से अधिक पानी का इस्तेमाल कर भी रहा है या नहीं, लेकिन जल क्षेत्र के कई जानकारों का मानना है कि गुजरात जिस तरह से अपने यहां जल योजनाओं का जाल फैला रहा है उससे यह तो साफ है कि निकट भविष्य में वह बड़े पैमाने पर पानी के इस्तेमाल की तैयारी कर रहा है. जल नीतियों पर शोध करने वाली संस्था सैंड्रप (दिल्ली) के हिमांशु ठक्कर बताते हैं, ‘ गुजरात में तकरीबन 18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जानी है लेकिन फिलहाल यहां नहरें नहीं बनने से सिर्फ दस फीसदी क्षेत्र में ही सिंचाई की जा रही है. मगर जैसा कि गुजरात की तैयारी है वह सौराष्ट्र के बांधों को नर्मदा के पानी से भरेगा, बड़ोदरा जैसे कई बड़े शहरों तक उसका पानी पहुंचाएगा, धौलेरा (अहमदाबाद) में बनने वाले एक विशालकाय औद्योगिक क्षेत्र में जलापूर्ति करेगा और सरदार सरोवर की मूल योजना से अलग गैर-लाभ क्षेत्रों में भी पंपों के जरिए पानी लेने की छूट देगा तो जल्द ही नर्मदा को लेकर दोनों राज्यों के बीच विवादों का नया दौर शुरू होना तय है.’ ठक्कर आगे यह भी जोड़ते हैं कि पानी का इस्तेमाल एक बार शुरू हुआ तो राजनीतिक दबाव इस हद तक बन जाएगा कि फिर उसे रोक पाना संभव नहीं होगा.

गुजरात ने कच्छ के क्षेत्र को हराभरा बनाने के नामपर अधिक पानी की मांग की थी लेकिन आज की तारीख में नर्मदा का 90 फीसदी पानी मध्य गुजरात में जा रहा है

वहीं तहलका के साथ बातचीत में नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर बताती हैं कि गुजरात जिन योजनाओं पर काम कर रहा है वे 1979 में न्यायाधिकरण को बताई गई उसकी मूल योजना से पूरी तरह भिन्न हैं. जैसे नर्मदा का पानी साबरमती में डालने का प्रावधान ही नहीं था. इसी तरह साबरमती के दक्षिण में भी किसी उद्योग को पानी देना तय नहीं था, लेकिन आज वहां पानी पहुंचाया जा रहा है. इसी तरह, मूल योजना में अहमदाबाद का कहीं नाम ही नहीं था. बावजूद इसके उसे भरपूर पानी दिया जा रहा है. कैग की रिपोर्ट में भी यह सामने आ चुका है कि गुजरात ने एक दशक पहले नर्मदा का पानी गांधीनगर तक पहुंचाने के लिए 40 करोड़ रुपये की जो योजना बनाई थी वह मूल योजना के बजट में थी ही नहीं. मेधा मानती हैं, ‘मप्र को समय-समय पर सवाल उठाने चाहिए थे. मगर  ऐसा नहीं हुआ और न ही उसने अपने हिस्से में आने वाले घाटों का कोई हिसाब ही रखा.’
दूसरी तरफ गुजरात के पूर्व नर्मदा विकास मंत्री जय नारायण व्यास ऐसी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘हमने मप्र से कभी नहीं पूछा कि उसने अपने हिस्से के पानी का कैसे इस्तेमाल किया है. इसलिए गुजरात को यह हक है कि वह अपने पानी का जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल करे.’ मगर ऐसा कहते हुए व्यास पानी के बंटवारे के एक अहम सिद्धांत और गुजरात के मूल प्रस्ताव के उस आधार को भुला रहे हैं जिसके चलते न्यायाधिकरण ने गुजरात को सबसे अधिक महत्व दिया था. नदी विवाद से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञों की राय में जब किसी नदी के पानी का बंटवारा किया जाता है तो उसमें रायपेरियन राइट यानी तटवर्ती अधिकारों (बांध के पहले वाले हिस्से का जलग्रहण क्षेत्र और उसके दूसरी ओर वाला जलग्रहण क्षेत्र) को ध्यान में रखा जाता है.

इस लिहाज से जिस जगह पर सरदार सरोवर बना है वहां मप्र के 90 फीसदी जलग्रहण क्षेत्र के मुकाबले गुजरात का जलग्रहण क्षेत्र सिर्फ दो फीसदी है. इस हिसाब से गुजरात को सिर्फ दो फीसदी पानी मिलना चाहिए था. मगर इस योजना में गुजरात को 36 फीसदी पानी दिया गया. साथ ही 16 फीसदी बिजली भी. तब (1969-79) मप्र ने गुजरात को इतना अधिक पानी देने के सवाल पर कड़ा विरोध किया था. मगर न्यायाधिकरण का अपने फैसले के पक्ष में तर्क था कि गुजरात ने कच्छ जैसे सूखाग्रस्त इलाके को हरा-भरा बनाने के नाम पर इतना अधिक पानी मांगा था. ऐसे में अब यदि गुजरात कच्छ को सबसे अधिक पानी नहीं देता है तो यह योजना की मूल भावना के खिलाफ होगा. लेकिन सरदार सरोवर के लाभ क्षेत्र का नक्शा बताता है कि गुजरात कच्छ के खेती लायक इलाके के सिर्फ दो फीसदी हिस्से में ही सिंचाई करेगा. जबकि मध्य गुजरात (बड़ोदरा, अहमदाबाद, खेड़ा, आणंद) को 50 फीसदी से भी अधिक पानी दिया जाएगा. गौरतलब है कि मध्य गुजरात पूरे गुजरात के राजनीति की मुख्य धुरी है. पानी की उपलब्धता के मामले में भी यह इलाका पहले से सम्पन्न माना जाता है. बावजूद इसके इन दिनों सरदार सरोवर बांध का 90 फीसदी पानी अकेले मध्य गुजरात को दिया जा रहा है. जाहिर है इस नदी विवाद का एक निचोड़ यह भी है कि जिस आधार पर एक राज्य न्यायाधिकरण से अधिक पानी की मांग करता है उसी आधार पर बने रहने के लिए वह बंधा हुआ नहीं है.

न्यायाधिकरण की शर्तों के मुताबिक राज्यों के बीच पानी के बंटवारे पर पुनर्विचार 2024 के पहले नहीं किया जा सकता. मप्र को डर यह है कि 2024 के बाद गुजरात और अधिक पानी की मांग न कर बैठे. जलाधिकार पर अध्ययन करने वाली संस्था मंथन अध्ययन केंद्र (पुणे) के श्रीपाद धर्माधिकारी कहते हैं, ‘मप्र यदि योजना के अनुरूप जल परियोजनाओं का ढांचा खड़ा नहीं कर पाता और अपने हिस्से का 18.25 एमएएफ पानी इस्तेमाल नहीं कर पाता है तो 2024 में गुजरात उसके हिस्से का पानी भी मांग सकता है.’ असल में पानी के बंटवारे का एक सिद्धांत यह भी है कि कौन पहले पानी के उपभोग पर अपना अधिकार जमा पाता है. इस सिद्धांत के मुताबिक जो सबसे पहले पानी का उपभोग करता है उसके अधिकार को वरीयता मिल जाती है. इस मामले में मप्र के मुकाबले गुजरात जिस तेजी से जल परियोजनाओं का ढांचा बनाते हुए पानी का उपभोग कर रहा है उससे मप्र की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अगले 11 साल में बुनियादी ढांचे के निर्माण की चुनौती मध्य प्रदेश के लिए बहुत बड़ी है. इस अवधि में उसे नर्मदा घाटी में 29 बड़े, 135 मध्यम और 3 हजार से अधिक छोटे बांध तो बनाने ही हैं, 27 लाख 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई का तंत्र भी तैयार करना है.

‘यदि मध्य प्रदेश योजनाओं के अनुरूप बुनियादी ढांचा नहीं बना पाया तो सन 2024 के बाद गुजरात अधिक पानी की मांग कर सकता है’

इसके लिए मुख्यमंत्री चौहान ने हाल ही में संबंधित विभागों के सभी मंत्रियों और आला अधिकारियों की एक अहम बैठक बुलाकर समय-सीमा से चार साल पहले यानी 2020 तक नर्मदा के पानी का पूरा उपयोग करने की रूपरेखा भी बनाई है. मगर बीते दशकों में नर्मदा परियोजनाओं की सुस्त चाल को देखते हुए यह काफी मुश्किल लक्ष्य लगता है. वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पटैरिया के मुताबिक, ‘बरगी नर्मदा पर बना पहला बांध था, जिसमें 1990 में ही पानी भर दिया गया था लेकिन आज तक उसकी नहरें नहीं बन पाई हैं.’ वहीं इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जैसे बड़े बांधों को बनाने का काम भी अपेक्षा से काफी पीछे चल रहा है. दरअसल मप्र के लिए एक दिक्कत यह भी है कि जिस बड़ी संख्या में उसे बांध बांधने हैं उसी अनुपात में विस्थापितों का पुनर्वास भी करना है. 1979 से 2013 के बीच मप्र से जुड़ा सबसे अहम पहलू यह है कि एक तो वह पानी का सही ढंग से उपयोग भी नहीं कर पाया और उस पर भी बड़े बांधों के चलते उसका बहुत बड़ा हिस्सा डूब गया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के आलोक अग्रवाल के मुताबिक मप्र को यदि सच में नर्मदा के पानी का उपयोग करना है तो उसे चाहिए कि वह विस्थापित परिवारों को पहले बसाए. वे कहते हैं, ‘पुनर्वास नहीं तो बांध नहीं और बांध नहीं तो पानी का उपयोग नहीं हो पाएगा.’

अब जबकि गुजरात नर्मदा से जुड़ी योजना को लेकर सौराष्ट्र की तरफ बढ़ गया है तो दोनों राज्यों के अधिकारियों के बीच हलचल भी बढ़ गई है. मप्र के इंजीनियरों का तर्क है कि यदि गुजरात 9 एमएएफ से अधिक पानी लेगा तो सरदार सरोवर बांध के रिवर बेड (नदी तल) पावरहाउस के लिए पानी कम पड़ जाएगा और बिजली भी कम बनेगी. आखिकार मप्र को बिजली का नुकसान उठाना पड़ेगा. वहीं मप्र सरकार ने रिवर बेड पॉवरहाउस से बिजली बनने के बाद छूटे पानी को समुद्र में जाने से रोकने और उससे अतिरिक्त बिजली बनाने के लिए सरदार सरोवर बांध से 15 किलोमीटर नीचे प्रस्तावित गरुड़ेश्वर योजना से पीछे हटने का निर्णय लिया है. मप्र के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने प्राइस वाटरहाउस कूपर्स नामक कंपनी से सर्वे कराया है और उसने बताया है कि इससे काफी महंगी बिजली बनेगी. अधिकारियों के मुताबिक योजना में आधे से अधिक पैसा मप्र का ही खर्च होता और इसीलिए इससे बनने वाली बिजली का सबसे अधिक बोझ भी मप्र पर ही पड़ता.

गौरतलब है कि गरुड़ेश्वर योजना के निर्माण में 427 करोड़ रुपये खर्च होंगे और यदि मप्र इसमें भागीदार बनता है तो न्यायाधिकरण की शर्त के हिसाब से उसे 242 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. उधर गुजरात में सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एफ जगदीशन को मप्र के इस निर्णय पर कड़ा एतराज है. जगदीशन के मुताबिक, ‘गरुड़ेश्वर सरदार सरोवर बांध की एक अहम योजना है और अब यदि मप्र करार से पीछे हटता है तो हमारे पास न्यायाधिकरण में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा.’

समाजवादी नेता सुनील बताते हैं कि अंतर्राज्यीय नदियों के बीच जब बड़े बांध बनाए जाते हैं तो उनमें इस तरह के भेदभाव निहित होते हैं और विवाद भी पनपते हैं. इस मामले में यदि मप्र को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा है तो इसलिए कि अधिकतर नदियां यहां से निकलती हैं और अपना पानी लेकर पड़ोसी राज्यों में जाती हैं. नदी के उद्गम पर पानी कम होता है इसलिए बड़े बांध उद्गम पर बनाने के बजाय पड़ोसी राज्यों की सीमा पर बनाए जाते हैं. सुनील कहते हैं, ‘मप्र की भौगोलिक स्थिति देखी जाए तो यह एक पठारी राज्य है. इसलिए सीमा पर बनने वाले बांधों का डूब क्षेत्र इस राज्य में आता है और पानी का लाभ नीचे और मैदानी इलाकों वाले पड़ोसी राज्यों को मिलता है.’ सरदार सरोवर बांध के मामले में भी ठीक ऐसा ही हुआ है- सिंचाई का सारा लाभ गुजरात को मिला है और हजारों हेक्टेयर जमीन की डूब मप्र के हिस्से में आई है.  

हकीकत यह भी है कि मप्र के सामने दर्जनों मौके आए जब गुजरात के लाभ के आगे राज्य और उसके बांशिदों के हक प्रभावित हुए लेकिन मप्र के मुकाबले गुजरात की राजनीतिक लॉबी केंद्र के निर्णयों पर भारी पड़ती रही. बदली हुई परिस्थितियों में अब देखना यह है कि चौहान मोदी पर कितना भारी पड़ते हैं.  

नंदी शिंदे, वरुण और ओवैसी नहीं हैं

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दो महत्वपूर्ण लोगों के बयानों की बात करते हैं. एक देश के गृहमंत्री हैं. दूसरे देश और दुनिया के जाने-माने समाजशास्त्री और विचारक.

एक का बयान राजनीतिक फायदे के लिए दिया गया ऐसा बयान था जो खुद पर ही भारी पड़ता दिखा तो, लेकिन इससे ज्यादा कुछ हुआ नहीं. दूसरेका बयान एक अनौपचारिक-सी जनता के सामने किन्हीं संदर्भों में दिया गया एक ऐसा व्यंग्यात्मक कथन था जिसका फायदा हर राजनीतिक पार्टी, राजनेता और राजनीति करने वाले गैर-राजनीतिक संगठन उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

सुशील कुमार शिंदे देश के गृहमंत्री हैं, सोनिया गांधी के कृपापात्र हैं और दलित भी हैं इसलिए विपक्षी दल और मीडिया आदि उनका बाल भी बांका करने की स्थिति में नहीं थे. कुछ हुआ भी नहीं. आशीष नंदी जाने-माने तो हैं लेकिन उतने ताकतवर और देश की राजनीति में तमाम मौकों पर धुरी की तरह इस्तेमाल हो सकने लायक दलित या पिछड़े समुदाय से भी नहीं हैं. वे अपने खिलाफ पुलिस द्वारा मामला दर्ज किए जाने के बाद कई समाचार चैनलों आदि के जरिए अपना बचाव करते, माफी मांगते, पुलिस से बचते घूम रहे हैं.

अब ठीक से इन दोनों बयानों और इनके गुण-दोषों को परखने का प्रयास करते हैं.

सुशील कुमार शिंदे ने कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में पिछले सप्ताह कहा कि भारतीय जनता पार्टी और उसका मातृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चला रहे हैं और देश का गृहमंत्री होने के नाते उनके पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं. लेकिन देश के गृहमंत्री होने का सबसे बड़ा कर्तव्य केवल ठोस सबूत जुटाना और उनके बारे में बताना नहीं बल्कि उन पर समय रहते उचित कार्रवाई करना भी है. लेकिन गृहमंत्री तो गृहमंत्री ठहरे, वे कुछ भी कहने को ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लें तो कोई क्या करे.मगर यह केवल अपने कर्तव्य से मुंह चुराना भर भी नहीं है. यह सीधे-सीधे खुद और अपनी पार्टी को अल्पसंख्यक समुदाय का सबसे बड़ा हितैषी दिखाने की कोशिश करते दिखने की कोशिश भी हो सकती है. राहुल गांधी जब औपचारिक तौर पर पार्टी में नंबर दो नहीं थे तब दिग्विजय सिंह ने कुछ-कुछ इसी तरह के बयान देकर खुद को कांग्रेसी युवराज का दायां-बायां बनाया था. अब तो पार्टी में समय ही राहुल गांधी का आ चुका है. तो फिर शिंदे अपने नेता और गृहमंत्री होने के आधार को मजबूत करने के लिए इस तरह की कोशिश क्यों न करें?

दूसरी तरफ आशीष नंदी जयपुर साहित्य उत्सव नाम के एक ऐसे मंच पर बैठे थे जो हर तरह के विचारों के आदान-प्रदान के लिए शुरुआत से ही मशहूर रहा है. एक चर्चा के दौरान तरुण तेजपाल ने कहा कि भ्रष्टाचार भी समानता लाने का काम कर सकता है. इस पर आशीष नंदी का कहना था कि यह कहना थोड़ा असम्मानित और अश्लील हो सकता है मगर सच यह है कि ज्यादातर भ्रष्टाचार करने वाले आज पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदाय के दिखाई पड़ते हैं. जब तक ऐसा हो रहा है मैं हमारे गणतंत्र को लेकर आशान्वित हूं.

जो लोग आशीष नंदी को पहले से सुनते-पढ़ते-जानते रहे हैं या जिन्होंने जयपुर में ही उन्हें संदर्भ सहित, उनके कथन में छिपे तमाम विरोधाभासों और व्यंग्यात्मकता आदि के साथ समझा होगा वे जानते होंगे कि नंदी के कहने का सीधा-सीधा मतलब क्या था. वे कहना चाहते थे कि बड़े-बड़े पदों पर बैठे तथाकथित उच्च जातियों के लोग भ्रष्टाचार की कला में पारंगत हैं और ऐसा करने के उनके पास इतने और ऐसे मौके मौजूद हैं कि उनके पकड़े जाने की संभावनाएं छोटे और सीधे तरीकों से भ्रष्टाचार में लिप्त होने वाले पिछड़े समुदाय के लोगों की अपेक्षा काफी कम हैं. चूंकि पिछड़े समुदाय के लोगों को अब भी एक इज्जतदार और मूलभूत सुविधाओं वाला जीवन जीने के मौके हमारी व्यवस्था ठीक से नहीं दे पा रही है, इसलिए भ्रष्टाचार को नंदी आशा की निगाहों से देखते हैं और तरुण तेजपाल समानता ला सकने वाले एक उपकरण के रूप में. वे समाज को एक समाजशास्त्री और लेखक की निगाहों से देख रहे थे न कि लिखे हुए कानून के काले-सफेद हर्फों के चश्मे से.

मगर आशीष नंदी की सोच और उनके कहे के मर्म को समझने की जरूरत और समय न तो हेडलाइनों के भरोसे जीने वाले ज्यादातर मीडिया को है और न ही इस मीडिया के भरोसे जीने वाले उन तमाम लोगों को जो पानी पी-पीकर आज आशीष नंदी को दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का विरोधी बता रहे हैं.

वे राजनेता और व्यवस्था के पाये, जो अकबरुद्दीन ओवैसी और वरुण गांधी के हद दर्जे के सांप्रदायिक और भड़काऊ भाषणों पर और स्वर्ण मंदिर परिसर में आतंकियों के लिए स्मारक बनाने की घोषणा पर कुछ बोलने से भी
परहेज कर रहे थे, अब अपने मौनव्रत से बाहर आ गए हैं.

टीबी वाया बीड़ी

जयक्रिस्टोपुर गांव में दिलावर की चुस्ती और फूर्ति देखते ही बनती है. 14-15 साल का दिलावर ठेला चलाते हुए आता है.  बोरा बिछाता है. ठेले पर लाद के लाए बंडलों में से कुछ को खोलता है और सामने बीड़ी के पत्ते और तंबाकू का ढेर लगाकर तराजू से तौलने में व्यस्त हो जाता है. दिलावर आ गया, दिलावर आ गया की सूचना गांव की गलियों में पहुंचती है. दौड़ती-भागती महिलाएं औरबच्चियां एक कॉपी के साथ टोकरीनुमा डाली में बीड़ी लेकर पहुंचने लगती है. दिलावर के साथ बैठा नरूल बीड़ियों को लेता जाता है, टोकरी में रखी कॉपी पर अपने रजिस्टर में कुछ लिखता है. दिलावर से महिलाएं बीड़ी पत्ता औरतंबाकू लेकर विदा होती जाती हैं. आधे घंटे में एक टोकरी बीड़ी पत्ता और तंबाकू तौलकर नन्हा दिलावर तुरंत अपनी दुकान को समेटता है और ठेले को चलाते हुए वहां से विदा हो जाता है. दूसरे गांव के लिए.

जयक्रिस्टोपुर से निकलने के बाद हम भगीरामपुर गांव, अंजना गांव, नया अंजना गांव, चाचकी, इलानी, तारानगर, संग्रामपुर, रहसपुर, चांचपुर आदि गांवों में जाते हैं. अमूमन सभी गांवों में दिलावर की तरह ही कोई न कोई ठेला वाला दिखता है, जो सुबह-सुबह तंबाकू और बीड़ी पत्ते के साथ पहुंचकर उसे देने और बदले में बीड़ी लेने में व्यस्त रहता है. बीड़ी पत्ता मध्यप्रदेश का होता है, तंबाकू गुजरात की और मजदूर पांकुड़ के. ये सारे गांव झारखंड के सीमावर्ती जिले पांकुड़ जिला के गांव हैं. पांकुड़ जिला के सदर प्रखंड के अंतर्गत आनेवाले 128 गांवों में करीब 90 फीसदी गांवों में यह नजारा हर सुबह देखा जा सकता है. ये तमाम गांव बीड़ी गांव हैं. बीड़ी मजदूरों की बसाहट है इन गांवों में. अधिकांश मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. यूं भी पांकुड़ जिला केंद्र सरकार की सूची में विशेष अल्पसंख्यक जिले के रूप में ही दर्ज है. 

इन गांवों में अहले सुबह से लेकर रात में सोने तक अधिकांश लोगों की जिंदगी बीड़ी पर हाथ फेरते ही गुजरती है. बीड़ी और इन गांवों के लोगों की जिंदगी की ऐसी गुत्थमगुथाई हो गयी है कि यहां बीड़ी को हटाते हुए एक बड़े समुदाय और एक बड़ी आबादी के सामने अंधकारमय भविष्य का सवाल सामने आता है. यहां जो लड़की बीड़ी नहीं बना सकती, उसकी शादी में भी हजार मुश्किलें आती हैं. जो जितनी तेजी से बीड़ी के पत्तों पर हाथ फेरते हुए उसमें तंबाकू भरेगा और बीड़ी बनायेगा, वह उतना ही काबिल माना जाता है, योग्य भी. इन्हीं गांवों के लोगों ने मिलकर पांकुड़ को बीड़ी का देश का एक प्रमुख हब बनाया है. अकेले पांकुड़ में वैध तौर पर छह बड़ी बीड़ी फैक्टरियां इन्हीं के बुते चलती हैं. बंगाल की पताका बीड़ी फैक्टरी, महराष्ट्र की सीएनआई और सूरती बीड़ी फैक्टरी, मध्यप्रदेश की बालक बीड़ी फैक्टरी और उत्तरप्रदेश की श्याम बीड़ी फैक्टरी. इन वैध फैक्टरियों के अलावा अवैध तौर पर और बिना ब्रांड वाली कितनी फैक्टरियां है, यह सही-सही बताने की स्थिति में कोई नहीं होता. क्योंकि बीड़ी के धंधे में एक बड़ा खेल चलता है, जिससे पार पाने के लिए अवैध फैक्टरियों को चलाने में ही ज्यादा मुनाफा आता है. 20 लाख तक बीड़ी के प्रोडक्शन करनेवाली कंपनियों को न तो कोई टैक्स देना पड़ता है, न किसी खास नियम-कानून के दायरे मे लाया जाता है, सो अवैध की धूम इन दिनों ज्यादा ही मची है. यह जानकारी हमें रामअवतार गुप्ता से मिलती है, जो श्याम बीड़ी फैक्टरी के प्रबंधक हैं और पांकुड़ में ही रहते हैं.

खैर! यह सब तो तकनीकि पेंच की बात हुई,इस इलाके में घूमते हुए असल सवाल दूसरे किस्म के उभरे. एक बड़ा सवाल यह कि आखिर जिन मजदूरों के बुते वैध-अवैध इतनी फैक्ट्रियां पांकुड़ में चलती है और जिनकी वजह से देश के कोने-कोने के बीड़ी व्यापारियों के लिए पांकुड़ पसंदीदा जगह बना हुआ है, उन मजदूरों के हिस्से में इस बीड़ी से क्या आता है? मजदूरी के तौर पर 1100 बीड़ी बनाने पर 75 रुपये मिलते हैं. मजदूरी का यह हिसाब तो एक हजार बीड़ी का होता है लेकिन तंबाकू-पत्ता देने और बीड़ी कलेक्ट करनेवाले बीचौलिये 100 बीड़ी इसलिए ज्यादा रखते हैं ताकि अगर कुछ बीड़ी डैमेज मिले तो उसकी भरपाई की जा सके. हालांकि सच्चाई यह होती है कि डैमेज कंट्रोल के नाम पर लिये जानेवाले 100 ज्यादा बीड़ियों का भी बीचौलिये अलग से कारोबार करते हैं. अब देखें तो एक मजदूर अगर बीड़ी बनाने में बहुत काबिल है, उस्ताद है तो भी अधिक से अधिक हजार बीड़ी से ज्यादा वह दिन भर की मेहनत के बाद नहीं बना पाता. औसतन 500 बीड़ी से ज्यादा कोई नहीं बना पाता. इससे मजदूरी का हिसाब साफ लगाया जा सकता है लेकिन यह तो मजदूरी है, जिसका हिसाब-किताब साफ-साफ दिखता है और लोगों से बात करने पर पता भी चलता है लेकिन बीड़ी मजदूरों को दूसरी सौगात भी वर्षों से मिल रही है, जिसका न कोई लेखा-जोखा है, न जिसके बारे में पता करने का कोई उपक्रम-औजार और मानक.  यह सौगात टीबी जैसी बीमारियों का है, जो तंबाकू के बीच दिन भर का समय गुजारने के बाद इन्हें मिलता तो है लेकिन टीबी से ही मर जाने तक इन्हें पता ही नहीं चल पाता कि आखिर वे अकाल, काल के गाल में किस बीमारी की वजह से समा गये!

आखिर ऐसा क्यों? जब केंद्र की सरकार देश भर में टीबी से लड़ने के लिए डॉट्स जैसे प्रोग्राम चला रही है, जन जागरूकता अभियान चलाने में लगी हुई है और तमाम संसाधनों और सुविधाओं को बहाल किये जाने की बात कर रही है तो टीबी की ज्यादा संभावनावाले इस इलाके में उस बीमारी की जांच के लिए बुनियादी सुविधा तक क्यों नहीं! क्यों जिला अस्पताल छोड़कर कहीं और टीबी बीमारी वाला प्रचार पोस्टर भी नहीं दिखता. न डॉट्स के कार्यकर्ता मिलते हैं न आंगनबाड़ी जैसे केंद्रों पर इसकी सुविधा मिलती है. स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार कृपासिंधु बच्चन बताते हैं, यह एक खेल है, जिसे समझना होगा. कोई बीड़ी फैक्टरी नहीं चाहेगा कि इलाके में शिक्षा और स्वास्थ्य के समुचित उपाय हो, क्योंकि दोनों सुविधाएं बहाल हो जाने से फिर बीड़ी के धंधे पर असर पड़ेगा. अगर मजदूरों को पता चलने लगे कि उन्हें टीबी जैसी बीमारी हो रही है तो फिर वे सावधान होने लगेंगे, नयी पीड़ी को जोड़ने से हिचकने लगेंगे, इसलिए दूसरे किस्म के स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दिखावे के तौर पर अलग से बीड़ी अस्पताल जैसा संस्थान तो खोल दिया गया है लेकिन इस इलाके विशेष के लिए टीबी से पार पाने के लिए अलग से कोई खास इंतजाम नहीं किया जाता, ताकि यह बीमारी रहस्यमयी बीमारी ही बनी रहे!

बच्चन की बातों को पड़ताल करने के लिए हम पांकुड़ के पास बीड़ी मजदूरों के लिए विशेष तौर पर खोले गये बीड़ी अस्पताल के प्रभारी  डॉ सुहैल अख्तर से तस्दीक करते हैं. डॉ अख्तर जिला चिकित्सा पदाधिकारी भी हैं. वह कहते हैं- हमारे इस केंद्र पर बलगम जांच की व्यवस्था अब तक नहीं है न डॉट्स और टीबी की दवाइयों की सुविधा है. इसके लिए हमने जिला उपायुक्त से आग्रह किया तो उसके लिए टेंडर भी हुआ लेकिन अब तक सुविधाएं बहाल नहीं हो सकी है. साथ ही वर्किंग हैंड की भी भारी कमी है. पिछले साल इस अस्पताल में करीब 1350 मरीज जांच कराने आये थे. उनमें से कितने टीबी मरीज रहे होंगे, यह बगैर जांच के बताने की स्थिति में तो डॉ अख्तर नहीं होते लेकिन वह कहते हैं कि हर माज करीब 10 मरीज तो टीबी के आते ही होंगे, ऐसा उनमें पाये जानेवाले लक्षणों को देखकर लगता है.

पूर्व जिला चिकित्सा पदाधिकारी जितेंद्र सिंह भी कहते हैं कि हमारे पास कोई सुविधा नहीं कि बता सकें कि कितने मरीज टीबी से पीड़ित हैं. अधिकांश बुखार, सर्दी, खांसी मलेरिया आदि से पीड़ित होकर आते हैं लेकिन उनमें टीबी के भी मरीज होते हैं, यह उनके लक्षणों से पता चलता है. बीड़ी मजदूरों के लिए बने बीड़ी अस्पताल में सुविधाओं और संसाधनों के अभाव में भले ही टीबी मरीजों के सही-सही आंकड़े नहीं मिल पाते लेकिन जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ बीके सिंह के हवाले से बीड़ी जोन में टीबी की भयावहता का एक पक्ष उभरकर सामने आता है. बकौल डॉ बीके सिंह, एक जनवरी 2012 से लेकर 31दिसंबर 2012 तक 1200 से ज्यादा टीबी के मरीज पाये गये हैं, जिनका इलाज फिलहाल जिला सदर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्रों में  चल रहा है. जून 2005 से पांकुड़ में टीबी का इलाज शुरू हुआ था. तब से लेकर  अब तक आधिकारिक तौर पर आठ हजार से ज्यादा मरीज चिन्हित किये गये हैं. इतनी संख्या तब है, जब टीबी को लेकर जनजागरूकता अभियान लगभग शून्य दिखता है. प्रचार प्रसार के नाम  24 मार्च को टीबी दिवस के दिन अस्पताल में और कुछ स्कूलों में आयोजन होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी दस्तक तक नहीं पड़ती!

दहशत के चंद घंटों के बीच…

जनवरी की वह सुबह ठीक-ठीक कैसी थी-याद नहीं आ रहा बेशक उस दिन बड़ी ठंढ रही होगी.मगर कुहासा ज्यादा ना रहा होगा क्योंकि हम बहुत पहले तैयार हो गए थे. अब्बा लखनऊ जा रहे थे, शायद चेक-अप के लिए. कार से अम्मी और मैं उनके साथ जा रहे थे. अब्बा की खिदमत के लिए बुद्धू नाम का एक नौकर था. उसे ड्राइविंग आती थी और अब्बा हमेशा उसे अपने साथ ले जाते थे लेकिन अब्बा को खुद कार चलाना पसंद था. पड़ोस में एक पेट्रोल-पंप था, कहीं जाने से पहले वे उस पेट्रोल-पंप पर जरुर जाते . लेकिन उस दिन पहुंचे तो पेट्रोल-पंप बंद मिला.मालिक अभी तक वहीं था, वह कार तक आया और उसी ने खबर सुनायी- किसी ने गांधीजी की हत्या कर दी है.

 इससे ज्यादा उसे पता नहीं था.

अब्बा ने कार वापस घुमा ली. चेहरा तन गया, मैंने इससे पहले उनको इतना गुमसुम नहीं देखा था.जितनी देर घर पहुंचने में लगे,कार में उन चंद लम्हों तक एकदम चुप्पी रही.उतरते ही शायद उस दिन कार गैराज में रख दी गई.उस दिन सबकुछ बड़ा अटपटा हो रहा था.घर में दाखिल होते ही अब्बा ने बाहर के सारे दरवाजे बंद करके कुंडी चढ़ा दी. उन्होंने सबको घर के अंदर रहने का हुक्म सुनाया- घर के एकदम बीच वाले कमरों में. हाजत से फारिग ना होना हो तो हमें भीतर की दोनों अंगनाइयों में भी आने की इजाजत नहीं थी. घर में सिर्फ अब्बा की आवाज सुनाई दे रही थी-  बाकी लोग कुछ कहना हो तो फुसफुसा के बोल रहे थे.

अब्बा शिकार के बड़े शौकीन थे, खासकर जाड़ों में जल-मुर्गाबियों के. उनके पास तीन शॉटगन थे और एक राइफल, एक रिवाल्वर भी था. बरसों पहले पुश्तनी जायदाद के मामले में जान पर बन आई थी तभी खरीदा था उन्होंने वह रिवाल्वर. उन्होंने तीनों हथियारों को पेटी से निकालकर तख्त पर रखा, अपने हाथों से जांच के देखा और गोली भर दी.एक बंदूक बुद्धू को दे गई. तबतक बंदूकों को लेकर मेरा कोई तजुर्बा नहीं था- मुर्गाबियों के शिकार पर मैं अब्बा के साथ जाता तो वे मुझे इतना होशियार नहीं मानते कि  हाथों में बंदूक थमा दें. इसलिए, मैं इस वक्त उनके किसी काम का नहीं था.

अब्बा और बुद्धू हाथों में बंदूक लेकर घर की औरतों के साथ थे–अम्मा, दादी, दाइयां (इनमें बुद्धू की बीवी भी थी) और फिर बच्चे- मेरी तीन बहनें और बुद्धू के ढेर सारे बच्चे. अब्बा शाह दरवाजे पर मुस्तैद थे, बुद्धू भीतर की अंगनाई में किसी शिकारी के से चौकन्नेपन के साथ टहल लगा रहा था. बाहर, पिछवाड़े की तरफ हमारा चौकीदार भगवानदीन, तेल चुपड़ी और लोहे की टोप वाली लाठी लेकर दरवाजे के नजदीक के एक पेड़ के पास मोर्चा लेने को  तैयार था. ओसारे की तरफ हमारा खानसामा सज्जाद एकदम इसी तैयारी के साथ दूसरे दरवाजे के पास एक झाड़ी में घात लगाये बैठा था.

पेट्रोल-पंप पर पहली बार जब खबर मिली तो मैं भी लगभग उतना ही भयभीत था जितना मेरे अब्बा-अम्मी. लेकिन अब, घर में, मेरी बदहवाशी की बड़ी वजह थी उनके चेहरे से झांकने वाली दहशतIमैंने पहले कभी अब्बा को ऐसी सूरत में ना देखा था.मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि बात-बात पर तुनक उठने वाले मेरे अब्बा जो अपने ऊंचे ओहदे और उस ओहदे से जुड़ी ताकत को लेकर एकदम निश्चिंत रहते थे, अचानक इतने असहाय और भयभीत हो उठेंगे. आखिर, उनके पास तीन गांवों की जमींदारी थी, खान साहब का ओहदा भी मिला हुआ था, फिर वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट और स्पेशल रेलवे मैजिस्ट्रेट भी थे. बंद दरवाजों के पीछे पसरे नीम-अंधेरे में अपने आप को टोहता मैं दहशत में था. यही हालत, अम्मा, बहनों और बाकी सबकी थी यहां तक कि दादी को भी अंदर बुला लिया गया था- अमूमन जाड़े के दिनों में वे रसोई से लगते बरामदे में रहती थीं. कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अपने बगल में बैठा लिया, मैं उनका दुलरुआ था- खुद को साधे हुए वे लगातार प्रार्थनाएं बुदबुदा रही थीं.

कोई दो घंटे का अरसा गुजरा होगा (क्या सचमुच ही इतना वक्त बीत गया था?) तभी हमें सुना कि लाऊडस्पीकर पर कुछ ऐलान किया जा रहा है. आवाज लगातार पास आते जा रही थी लेकिन दरवाजों के अंदर शब्द साफ सुनाई नहीं पड़ रहे थे. अपने कानों से टोह लेते हम भय से सिकुड़े जा रहे थे. आखिर को अब्बा ने एक दरवाजा खोला और बाहर निकले.  वे बारजे पर खड़े होकर ऐलान सुनने लगे, खुले हुए हिस्से से हमारी फिक्रमंद आंखे उनपर टिकी हुई थीं.अचानक वे गाली बकने लगे- पहले कभी हमने उन्हें इतने जोर से और इतनी भद्दी गालियां देते ना सुना था. वे बारजे पर धूप में पूरे तैश के साथ खड़े थे. उनको पुराने अंदाज में देखकर हमारे हवाश थोड़े दुरुस्त हुए. साहस बटारकर मैंने बगल का एक दरवाजा खोला और बरामदे में आ गया. मेरे पीछे, दरवाजे के पास अम्मा और बहनें आ जुटीं. पुलिस या फिर फौज की कोई जीप या ट्रक रहा होगा.लाऊडस्पीकर इसी पर लगा था और कोई बार-बार ऐलान सुना रहा था. काश, मुझे ठीक-ठीक वही शब्द अब याद होते,लेकिन याद नहीं आ रहा. लेकिन उन लफ्जों का असर मुझे याद रह गया है – तुरंत भीतर तक उतर जाने वाली राहत का भाव. उन लफ्जों को सुनकर हमने चोरी-छिपे एक-दूसरे को मुस्करा कर देखा क्योंकि उन्हीं लफ्जों से हमने जाना कि (गांधी की) हत्या करने वाला एक हिन्दू है- कोई मुसलमान नहीं, बल्कि एक हिन्दू. जकड़ लेने वाली उस दहशत को अब हम पहचान सकते थे और राहत की वजह को भी. उस वक्त मेरी दादी ने बिल्कुल यही किया था. हमने सुना वह अल्लाह का शुक्रिया कर रही थी कि गांधी का हत्यारा एक हिन्दू निकला, अल्लाह की मेहर कि हत्यारा कोई मुसलमान नहीं था.

जल्दी ही हमारी जिन्दगी रोज के ढर्रे पर आ गई. अचानक चंद रोज तक बंद रहने के बाद स्कूल फिर से खुल गया. एक अबूझ अंतर यही दीख रहा था कि हमारे भूगोल के शिक्षक नहीं आ रहे. वे आरएसएस की स्थानीय शाखा के नेता थे. उन्हें कुछ हफ्तों के लिए हिरासत में रखा गया, फिर छोड़ दिया गया. अब्बा का मर्ज जल्दी ही जाहिर हो उठा और फिर अक्तूबर की एक रात इसी मर्ज ने उनकी जान ली. उनकी मौत से मेरी खुद की जिन्दगी भी बुनियादी तौर पर बदल गई. घर में अब अकेला मर्द मैं ही था,अम्मा पर्दे में रहती थीं, इसलिए अब घर में मुझे ही मुखिया के रुप में देखा जाने लगा, लेकिन यही चलन था और इसी की उम्मीद की जा रही थी. कुछ साल बाद सरकार ने जमींदारी खत्म कर दी और हमारी जीविका का बड़ा जरिया जाता रहा- लेकिन यही भी अपेक्षित था. चाहे थोड़े छोटे पैमाने पर मगर हम अब भी अपनी सफेदपोशी बरकरार रख पा रहे थे. मुकामी तौर पर रसूखदारों के बीच चली आ रही छोटाई-बड़ाई में फर्क पडा था लेकिन अब भी हमारी उनसे जान-पहचान थी और इससे भी बड़ी बात यह कि वे भी हमें अपना मान रहे थे.

नई बात यह हुई कि धीरे-धीरे हमने जाना कि जनवरी के उस दिन जो दहशत हमारी हड्डियों में उतर गयी थी और लगा कि जल्दी खत्म भी हो गयी है, दरअसल हमें छोड़कर कभी नहीं गयी.

(उपर्युक्त सामग्री का चयन और अनुवाद चंदन श्रीवास्तव ने किया है. वे सीएसडीएस की एक परियोजना www.im4change.org के लिए काम करते हैं और उनके आलेख समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं)

नंबर दो अब हुए नंबर दो

कांग्रेस पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार के दखल को लगभग एक सदी होने को है. इस दौरान किसी न किसी रूप में परिवार का जुड़ाव कांग्रेस पार्टी से रहा है. 1919 में राहुल गांधी के परनाना जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू पहली बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए थे. उसके बाद से अब तक यह परिवार कभी भी पार्टी से अलग नहीं हुआ है. जवाहरलाल नेहरू जब 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे तब उन्हें यह जिम्मेदारी उनके पिता से ही स्थानांतरित हुई थी. राहुल के हालिया अभिषेक और जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्ष चुने जाने की स्थितियों में एक अद्भुत साम्य है. पिता मोतीलाल नेहरू ने जवाहर को अध्यक्ष बनाने के लिए महात्मा गांधीजी को जो पत्र लिखा था उसका मजमून यही था कि अब नेतृत्व पर युवाओं के अधिकार को और ज्यादा समय तक रोका नहीं जाना चाहिए. तब जवाहर 27 वर्ष के थे. गांधीजी ने उनके नाम पर अपनी मुहर लगा दी. आज जब राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी में नंबर दो (यह तथ्य सर्वविदित है कि नंबर एक की कुर्सी भी उनके ही परिवार में है) की उपाधि दी गई है तब उनकी प्रोन्नति के लिए सबसे बड़ा तर्क उनका ‘युवा’ होना ही दिया जा रहा है. यह घटना एक सदी के दौरान कांग्रेसी संस्कृति में आए बदलाव की भी तस्वीर है. तब जवाहरलाल नेहरू बाकायदा लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतकर कांग्रेस अध्यक्ष बने थे जबकि राहुल गांधी की प्रोन्नति शुद्ध रूप से एक नियुक्ति है. उन्हें कोई चुनावी बाधा पार करने की जरूरत नहीं है.

विपक्ष इसे दुर्गुण मानता है, कांग्रेसी प्रकाश पुंज. लेकिन इतना तय है कि इस एक नियुक्ति से कांग्रेसी कैडर में उत्साह का संचार हुआ है. 2009 के आम चुनावों में मिली अविश्वसनीय सफलता के बाद से कांग्रेस का झोला सफलताओं से रिक्त ही रहा है. इस दौरान उसके खाते में जितनी नकारात्मक सुर्खियां आई हैं उतनी सरकारों और सत्ताधारी दलों को दसियों साल में भी मयस्सर नहीं होतीं – 2जी घोटाला, सीडब्ल्यूजी घोटाला, कोल घोटाला, अन्ना आंदोलन, वाड्रा मामला, बलात्कार विरोधी प्रदर्शन आदि ने केंद्र सरकार को लगातार पिछले पांव पर रखा है. इसमें अगर कांग्रेस की चुनावी असफलताओं को भी जोड़ दें तो कांग्रेस पिछले तीन साल को एक दु:स्वप्न की तरह याद रखेगी. ऐसे अंधेरे में राहुल का ‘पुनरोदय’ हतोत्साहित कांग्रेस संगठन में तात्कालिक तौर पर एक नई ऊर्जा का संचार करने में सफल रहा है. उनके उपाध्यक्षीय भाषण ने कुछ महत्वपूर्ण नब्जों को टटोला है, कुछ जरूरी कलपुर्जों की मरम्मत की बात कही है लेकिन वे इनके ऐसा होने के पीछे के कारणों पर बात करने से साफ कन्नी काट गए. उन्होंने और भी कई बेहद जरूरी चर्चाओं को छुआ तक नहीं. ये वे जरूरी चर्चाएं हैं जिनसे निकट भविष्य में पार्टी का और उपाध्यक्ष होने के नाते राहुल का सामना होना बिल्कुल तय है.

पांच बातें जो उन्होंने कहीं
1. उन्होंने कहा, ‘ताकत का विकेंद्रीकरण करने की जरूरत है. आम लोगों के हित-अहित का फैसला कुछ मुट्ठी भर और गैरजवाबदेह लोगों के हाथ में नहीं दिया जा सकता. हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अतीत में कहीं अटकी हुई है. लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं. यह व्यवस्था आम लोगों को ताकत देने के बजाय उन्हें दबाती है.’ गैरजवाबदेही की सबसे बड़ी मिसाल क्या स्वयं राहुल गांधी और सोनिया गांधी को ही नहीं कहा जा सकता है? यह तथ्य सर्वविदित है कि सत्ता में कोई सीधी भागीदारी न होने के बावजूद सरकार में सिर्फ उन्हीं की चलती है और बदले में उनकी कोई सीधी जवाबदेही नहीं है. दूसरा मुद्दा सत्ता के विकेंद्रीकरण का है. पिछले आठ साल से राहुल राजनीति में हैं. इस दौरान वे युवा कांग्रेस और एनएसयूआई का कामकाज देखते रहे हैं. लेकिन इन दोनों संगठनों की दशा में अब तक कोई बड़ा लोकतांत्रिक सुधार नहीं दिखाई देता. यहां अब भी सारे निर्णय पहले की तरह ऊपर से थोपे जाने या कुछ चुनिंदा लोगों द्वारा लिए जाने का चलन है. राहुल गांधी की कोशिशों के बावजूद एनएसयूआई अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में असफल रही है. युवा कांग्रेस में उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव की प्रणाली विकसित की थी पर उनके जाने के बाद से ही स्थितियां बेहद खराब हुई हैं. हाल ही में हरियाणा में यूथ कांग्रेस के चुनावों में भयंकर गड़बड़ी सामने आई थी. साल 2009 में उत्तराखंड के राज्य कांग्रेस सदस्यता अभियान के दौरान नेताओं ने अपने रिश्तेदारों को प्रदेश और जिला कांग्रेस समितियों में पहुंचाने के लिए सदस्यता फॉर्मों में जमकर हेरफेर की. राहुल लोगों की बढ़ी हुई अपेक्षाओं की बात तो करते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि जब-जब दलितों औऱ युवाओं ने उनसे कोई अपेक्षा की तो उन्होंने उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उनके घर सोने या सिरे से गायब होने के अलावा और क्या किया. अगर पिछले विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो वे अपने क्षेत्र अमेठी की ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरते ही नहीं दिखते.

2. उन्होंने कहा, ‘हम आज नेतृत्व के विकास पर ध्यान नहीं देते. आज से पांच-छह साल बाद ऐसी बात होनी चाहिए. पहले फोटो हुआ करती थी कांग्रेस पार्टी की. नेहरू, पटेल, आजाद जैसे बड़े कद के नेता हुआ करते थे. उनमें से कोई भी देश का पीएम बन सकता था. हमें हर प्रदेश में ऐसे 40-50 नेता तैयार करने हैं. हर जिले, हर ब्लॉक में ऐसे नेता होने चाहिए. ‘समस्या यह है कि जो बात वे कह रहे हैं उनकी पार्टी बार-बार इसके विपरीत आचरण करती रही है. जब तक पार्टी में जरूरी लोकतंत्र स्थापित नहीं होगा इतने सारे नेता कैसे पैदा हो सकते हैं? मौजूदा राजनीति की सच्चाई यह है कि राज्यों में कोई भी ऐसा कद्दावर नेता दिल्ली में बैठे नेतृत्व को स्वीकार्य नहीं है जो बाद में उनके लिए ही खतरा बन जाए. आंध्र प्रदेश में हमने देखा कि पार्टी ने किस तरह से जगन मोहन को किनारे लगा दिया. ज्यादा पीछे न जाकर हाल के उत्तराखंड विधानसभा के नतीजों पर नजर डालें तो इसी कांग्रेस पार्टी ने राज्य के कद्दावर नेता हरीश रावत को किनारे लगा कर राजनीति के नौनिहाल विजय बहुगुणा को राज्य की कमान थमा दी. जबकि वे राज्य की राजनीति में कहीं से भी स्टेकहोल्डर नहीं थे. लिहाजा इस मुद्दे पर राहुल को जुबानी जमाखर्च से आगे बढ़ना बड़ी चुनौती होगी.

एक सिरे से देखने पर यह बहुत साहसिक लगता है कि कोई नेता अपनी कमियों को स्वीकार करके बदलाव की बात कर रहा है. मगर कुछ लोग राजनीति की शब्दावली में  इसे ‘विरोध की भावना पर सवारी करना’ कहते हैं.

3. उन्होंने कहा, ‘जमीन पर हमारा कार्यकर्ता काम करता है. यहां हमारे जिलाध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष बैठे हैं. टिकट देते समय उनसे पूछा नहीं जाता. ऊपर से निर्णय ले लिया जाता है. होता क्या है कि दूसरे दल के लोग आखिरी समय में पार्टी में आ जाते हैं, टिकट पा जाते हैं, चुनाव हार जाते है और वापस चले जाते हैं. कांग्रेस कार्यकर्ता की इज्जत होनी चाहिए.’ यह समझना बहुत मुश्किल है कि राहुल किस ‘ऊपर’ की बात कर रहे हैं. उनके अलावा ऊपर कौन है? इस विरोधाभास को हाल के एक उदाहरण से समझना आसान है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी का पुनर्गठन किया गया. निर्मल खत्री प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए. एक तो निर्मल खत्री राज्य के तीन प्रमुख जातिगत समीकरणों (ब्राह्मण, यादव ठाकुर) में से किसी में भी फिट नहीं बैठते लिहाजा इस नियुक्ति से सबके साथ स्वयं खत्रीजी को भी आश्चर्य हुआ होगा. ऊपर से पहली बार पार्टी ने जिला और प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के इतर एक नई जोनल व्यवस्था लागू कर दी है. पूरे प्रदेश को आठ जोन में बांटकर उनके जोनल इंचार्ज दिल्ली से नियुक्त कर दिए गए हैं. यह विचित्र विरोधाभास है, एक तरफ वे कह रहे हैं कि ऊपर से आने वाले का सम्मान नहीं होगा दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश  जैसे महत्वपूर्ण राज्य में दिल्ली से भेजे गए जोनल इंचार्ज 2014 के लोकसभा उम्मीदवारों का फैसला करेंगे. फलस्वरूप प्रदेश कमेटी शोभामात्र बनकर रह गई है. इस नई व्यवस्था से पैदा हुई दुविधा को दूर करने के लिए निर्मल खत्री को बयान देना पड़ा कि जोन प्रमुख अलग इकाई के रूप में काम नहीं करेंगे बल्कि उन्हें भी एक टीम के रूप में काम करना होगा. राहुल कह रहे थे कि दूसरी पार्टियों से आए लोगों को टिकट दे दिया जाता है. सच यह है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया था और पार्टी ने 25 फीसदी टिकट सपा-बसपा कार्यकर्ताओं को दिया था.

4. उन्होंने कहा, ‘हम ज्ञान का सम्मान नहीं करते, हम सिर्फ पद का सम्मान करते हैं. आप कितने विद्वान हैं यह मायने नहीं रखता, अगर आपके पास कोई पद नहीं है तो आप किसी लायक नहीं है.’ राहुल गांधी ने यहां एक गंभीर नब्ज पर हाथ रखा है. स्वयं उनकी माता सोनिया गांधी ने पद ठुकराने के मामले में एक मिसाल कायम की है. राहुल ने भी इस मामले में जल्दबाजी नहीं दिखाई है. लेकिन पद पर ज्ञान की सत्ता वे कैसे स्थापित करेंगे इसका कोई रास्ता उन्होंने नहीं दिखाया है. मणिशंकर अय्यर जैसा नेता सरकार से बाहर है. जयपाल रेड्डी जैसों का मंत्रालय पूंजीपतियों के दबाव में बदल दिया जाता है. दूसरी बात यह कि वे किस ज्ञान की बात कर रहे हैं- किताबी ज्ञान जिससे मनमोहन सिंह ताल्लुक रखते हैं या फिर व्यावहारिक ज्ञान जिसका सरोकार भारत से हो. विरोधाभास यहां भी है. 

5. उन्होंने कहा, ‘मैं सब कुछ नहीं जानता हूं. दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो सब कुछ जानता है. मैं कहना चाहता हूं कि जहां से भी जानकारी मिलेगी मैं उसे ढंूढ़ूंगा. मैं आपसे पूछूंगा आपसे सीखूंगा.’ राहुल की नियुक्ति युवा राजनीति के हल्ले में हुई है. ऐसे में एक खतरा यह भी है कि बदलाव की तेज चाल पुराने कांग्रेसियों में बेचैनी का भाव भर सकती है. साथ ही यह दिखाना भी जरूरी है कि उनमें सीखने की प्रवृत्ति है. लिहाजा राहुल ने बिल्कुल सही बिंदु पर अपनी बात समाप्त की है.

उपर्युक्त बातों का क्या निष्कर्ष है? एक तो यह कि राहुल ने आत्ममंथन की प्रवृत्ति दिखाई है. एक सिरे से देखने पर यह बहुत साहसिक लगता है कि कोई नेता अपनी कमियों को स्वीकार करके बदलाव की बात कर रहा है. मगर कुछ लोग राजनीति की शब्दावली में  इसे ‘विरोध की भावना पर सवारी करना’ कहते हैं. यानी सामने वाला सवाल उठाए उससे पहले अपनी कमियों को स्वीकार कर अपने खिलाफ बनी हवा को अपने प्रति सहानुभूति में बदलने की कोशिश करना. राहुल गांधी और उनके प्रबंधकों को पता है कि देश का मिजाज उनके विरुद्ध है. वरिष्ठ राजनीतिक चिंतक योगेंद्र यादव के शब्दों में, ‘अतीत में राजनेता एंटी इन्कमबेंसी की सवारी करते रहे हैं. कई बार यह सफल भी रहा है. पर इसके लिए काल, समय और दशाएं बहुत विशिष्ट होनी चाहिए. दुर्भाग्य से राहुल गांधी के लिए स्थितियां फिलहाल विशिष्ट नहीं हैं. हालांकि अवसर उनके पास कई बार थे पर तब वे पूरी तरह असफल रहे. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय वे जंतर मंतर या रामलीला मैदान जाकर ऐसा कर सकते थे. रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ जब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे तब वो एक पहल कर सकते थे. पर वे चूक गए.’

पांच मुद्दे जो उन्होंने छुए ही नहीं
1. सिर्फ एक महीने पहले दिल्ली की सड़कों पर युवाओं का एक रेला निकल पड़ा था. 23 वर्षीया एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना ने दिल्ली समेत पूरे देश में विरोध की हवा चला दी थी. दस दिन तक लोग राजपथ पर विरोध प्रदर्शन करते रहे थे. मनमोहन सिंह सरकार के सामने अन्ना आंदोलन के शांत होने के बाद यह सबसे बड़ी चुनौती पेश आई थी. इस आंदोलन के दबाव में सरकार ने कई कदम भी उठाए हैं. लेकिन राहुल गांधी ने इतनी बड़ी घटना का अपने पहले उपाध्यक्षीय भाषण में जिक्र करना तक मुनासिब नहीं समझा. इससे उस आशंका को बल मिलता है जिसके मुताबिक राहुल गांधी जटिल मसलों पर चुप्पी साध लेते हैं.

2. इसी साल के अंत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं. ये राज्य हैं-मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम. ये चुनाव एकदम लोकसभा चुनावों की देहरी पर होने हैं. आम चुनावों की दिशा बहुत कुछ इन राज्यों के चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगी. इनमें से दो कांग्रेस के पास हैं, दो भाजपा के पास. लेकिन इतनी महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती का उन्होंने कोई जिक्र तक करना मुनासिब नहीं समझा. उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल की पहली राजनीतिक परीक्षा यही चुनाव होगी.

3.2009 में यूपीए-2 अगर सत्ता में वापस लौटा तो इसके पीछे आंध्र प्रदेश की भूमिका सबसे बड़ी थी. इस सूबे ने कांग्रेस को 30 से ज्यादा लोकसभा सांसद दिए थे. दुर्भाग्य से कांग्रेस का यह दिव्य पुंज फिलहाल ध्वस्त नजर आ रहा है. जगन मोहन के रूप में एक ताकतवर हिस्सा पार्टी से अलग हो चुका है. तेलंगाना का मुद्दा पार्टी में 2009 से ही लटका है. लोकसभा चुनाव से पहले इस पर कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा. लेकिन राहुल गांधी ने इतने महत्वपूर्ण मसले पर भी अपने विचार दर्ज नहीं करवाए.

2009 में यूपीए-2 अगर सत्ता में वापस लौटा तो इसके पीछे आंध्र प्रदेश की भूमिका सबसे बड़ी थी.4. राजनीति में जुमला है: दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर जाता है. लोकसभा की 545 में से 120 सीटें इन्हीं दो राज्यों से आती हैं. यानी लगभग 22 फीसदी सीटें. 2009 में कांग्रेस की सत्ता वापसी की एक वजह उत्तर प्रदेश में मिली अविश्वसनीय सफलता भी थी. पर आज इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की हालत पतली है. दोनों राज्यों की सत्ता से कांग्रेस को बाहर हुए अब दो दशक से ज्यादा बीत चुके हैं. राहुल गांधी यहां भी चूक गए. इन दोनों राज्यों की बैसाखी के बगैर कांग्रेस 2014 का संग्राम फतह नहीं कर सकती. लेकिन राहुल के भाषण में इस स्थिति को सुधारने या कोई वैकल्पिक रास्ता तलाशने का विचार लुप्त है.

5. इस वर्ष में आर्थिक विकास की दर पिछले एक दशक के दौरान सबसे कम रही है. संस्थागत विदेशी निवेश औंधे मुंह गिर पड़ा है. आर्थिक मोर्चे पर मंदी का प्रभाव है. बीते एक दशक से जगमगा रही भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले दो साल के दौरान गर्तोन्मुखी रही है. लेकिन राहुल गांधी ने अपने बयान में इस विषय को पूरी तरह से अछूत माना है.

निष्कर्ष यह है कि राहुल गांधी का भाषण भावनात्मक बुनियाद पर खड़ा किया गया था, इसमें राजनीतिक बयान का सर्वथा अभाव है. इसके अभाव में राहुल नेता तो बन सकते हैं, ‘राजनेता’ (स्टेट्समैन) नहीं.             
अपने उपाध्यक्षीय भाषण में राहुल ने कुछ महत्वपूर्ण नब्जों को टटोला है, कुछ जरूरी कलपुर्जों की मरम्मत की बात कही है लेकिन साथ ही कुछ बहुत जरूरी चर्चाओं को वे गोल कर गए हैं
राहुल एंटी इंकमबेंसी की लहर पर आगे बढ़ना चाहते हैं. लेकिन राहुल के लिए समय और दशाएं ठीक नहीं हैं. अन्ना आंदोलन या फिर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ लगे आरोप के समय वे ऐसा कर सकते थे