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अदालती एक्टिविज्म

क्या हैं अदालत द्वारा दिए गए राजनीतिक सुधारों के चर्चित फैसले?
सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले के अनुसार आपराधिक मामलों में दोषी सिद्ध होते ही किसी भी सांसद या विधायक की सदस्यता निरस्त हो जाएगी. साथ ही ऐसे विधायक या सांसद चुनाव लड़ने से भी तब तक प्रतिबंधित हो जाएंगे जब तक उन्हें ऊपरी अदालत से दोषमुक्त नहीं किया जाता. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया है जो नामांकन के दौरान जेल में या पुलिस हिरासत में हों. एक अन्य निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रदेश में होने वाली जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया है.

अब तक क्या थे संबंधित प्रावधान?
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) के मुताबिक अब तक किसी विधायक या सांसद को सजा होने पर भी उसकी सदस्यता से निलंबित नहीं किया जा सकता था. दोषी सिद्ध होने के तीन महीने के भीतर यदि विधायक या सांसद ऊपरी अदालत में अपील या पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दे तो उसे चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता था. अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को ही निरस्त कर दिया है. इसके साथ ही अब तक जेल में होते हुए भी कोई व्यक्ति चुनाव लड़ सकता था. इस पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 4, 5, और 62(5) की साथ में व्याख्या करते हुए कोर्ट ने माना कि जब जेल में या पुलिस हिरासत में होने के चलते व्यक्ति का मतदान का अधिकार निरस्त हो जाता है तो उसे चुनाव लड़ने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है.

कोर्ट के फैसले में विवाद क्या है?
जेल या पुलिस हिरासत में बंद लोगों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने पर विवाद खड़ा हो गया है. राजनीतिक दलों का तर्क है कि न्यायालय द्वारा दोषी सिद्ध होने तक व्यक्ति को निर्दोष ही माना जाता है. ऐसे में किसी को भी पहले ही प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता. इस प्रावधान का दुरुपयोग होने की भी संभावना कुछ लोग जता रहे हैं. इनका मानना है कि सत्ता पक्ष में बैठे लोग अपने विरोधियों को नामांकन के दौरान झूठे मामलों में पुलिस से गिरफ्तार कराके कर ही चुनावी प्रक्रिया से बाहर करवा सकते हैं.
राहुल कोटियाल

‘मीडिया जरूरत से ज्यादा दिल्ली केंद्रित है’

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दिल्ली के विधानसभा चुनाव करीब हैं. पिछले पंद्रह साल में आपकी सफलताएं क्या रहीं और कौन-से काम करने अभी बाकी हैं? 
हम इस मामले में भाग्यशाली रहे हैं कि पिछले तीन चुनाव हमने जीते. हमने 15 साल यहां काम किया है, इसलिए हमें उम्मीद है कि जनता सही फैसला करेगी. इस समय हम जनता के ज्यादा से ज्यादा करीब पहुंचने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं. हम उन्हें अपने किए गए कामों की जानकारी दे रहे हैं. यह चुनाव आसान नहीं होगा लेकिन हमें अपनी जीत का विश्वास है.

इन सालों में आपकी असफलता क्या रही या किस चीज में आप बदलाव देखना चाहेंगी?
ईश्वर की कृपा से हमारे ऊपर किसी घोटाले का आरोप नहीं लगा है. राष्ट्रकुल खेलों के दौरान थोड़ा-बहुत हल्ला मचा था, लेकिन शुंगलू कमेटी और कैग की जांच में कुछ भी नहीं निकला. इस दौरान हमने तमाम रचनात्मक काम किए हैं. हमें घबराने की जरूरत नहीं है.

हाल के सालों में दिल्ली बड़े जनांदोलनों का गवाह बनी जैसे अरविंद केजरीवाल का आंदोलन. देश के दूसरे हिस्सों में इसकी ज्यादा धमक नहीं थी. इस लिहाज से जनता का गुस्सा दिल्ली सरकार के खिलाफ ही माना जाएगा. आपके घर के सामने भी तमाम विरोध प्रदर्शन हुए.
विरोध मेरे खिलाफ क्यों है? क्योंकि यहां कैमरे वाले इकट्ठा हो जाते हैं. अगर केजरीवाल के 10 लोग यहां इकट्ठा होते हैं तो 50 कैमरे वाले उनके पीछे भीड़ लगा देते हैं. यह कहने के लिए मुझे माफ कीजिएगा पर कैमरे देश के दूसरे हिस्सों में जाते ही नहीं हैं. सारे अखबार, पत्रिकाएं दिल्ली से ही प्रकाशित हो रही हैं, सारे न्यूज चैनल दिल्ली में सिमटे हैं. मीडिया दिल्ली केंद्रित होकर रह गया है. आपको बुरा लग सकता है पर यह सच है. हमंे इसकी आदत पड़ चुकी है.

पर 16 दिसंबर की घटना के बाद भी आपके खिलाफ व्यापक गुस्सा सड़कों पर दिखा था.
मैं जो कर सकती थी मैंने किया. कभी-कभी परिस्थितियां इतनी जटिल हो जाती हैं कि उन्हें सुलझाना आसान नहीं होता. यह सरकार के लिए झटका तो है ही. पर मेरी अंतरात्मा साफ है. मेरी आलोचना हुई जबकि पुलिस मेरे हाथ में नहीं है. मैं अकेली नेता थी जो बाहर निकली और जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों के बीच गई थी. वहां बड़ी संख्या में केजरीवाल के समर्थक भी मौजूद थे. मैंने सोचा कोई बात नहीं, मैं यहां आई हूं एक मृतक आत्मा को श्रद्धांजलि देने जिसकी मौत एक दुखद और अमानवीय घटना में हो गई है.

अरविंद केजरीवाल ने आपके खिलाफ चुनाव लड़ने का एलान किया है. आप इसे कैसे देखती हैं?
पता नहीं. उन्होंने अपना आंदोलन शुरू किया था भ्रष्टाचार के खिलाफ. उनका दावा था कि उन्हें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. और अब उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है. अब वे अपने उम्मीदवार भी घोषित कर रहे हैं. देखते हैं आगे क्या होता है.

लोकायुक्त के साथ आपकी तकरार क्यों है? 
सच बात यह है कि भाजपा ने उनसे शिकायत की थी कि मैंने सरकारी पैसे की बर्बादी की है. उन्होंने 2008-09 का एक मामला लिया था. उनका आरोप है कि हमने अपने चुनावों में सरकारी धन का दुरुपयोग किया है. यह बिल्कुल गलत आरोप है क्योंकि जिस समय की बात वे कर रहे हैं उस दौरान आदर्श आचार संहिता लागू थी. हम सरकार में कुछ करने की स्थिति में ही नहीं थे. इसके बावजूद अगर मैंने या किसी और ने चुनाव आचार संहिता के दौरान एक भी कार का इस्तेमाल किया हो तो मैं जेल जाने को तैयार हूं. चुनाव आयोग ने कभी कुछ नहीं कहा. केवल राजनीतिक फायदे के लिए कुछ लोग मामले को तूल दे रहे हैं.

शहर की एक और बड़ी समस्या यमुना की बात करते हैं. क्या यमुना एक्शन प्लान पर आपका कोई वश है? 
नहीं, यमुना पर किसी का कोई अधिकार नहीं है. जापान ने बड़ी मात्रा में इसके लिए धनराशि दी है. यमुना कई राज्यों से होकर बहती है जैसे हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश. लिहाजा किसको किसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाए? यमुना में आने वाली गंदगी का एक बड़ा हिस्सा हरियाणा से आ रहा है. उत्तर प्रदेश का कहना है कि यमुना की गंदगी का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली और हरियाणा से आ रहा है. मेरा व्यक्तिगत मत है कि नदियों के बारे में एक संपूर्ण नीति बनाने की जरूरत है. यमुना संकट में है. हमने कुछ इंटरसेप्टर की स्थापना की है. इनकी सहायता से गंदा पानी यमुना में मिलने से पहले साफ कर दिया जाता है. इन्हें शाहदरा, नजफगढ़ और एक सहायक नाले के लिए स्थापित किया गया है. इससे थोड़ा सुधार होगा लेकिन फिर भी मेरा विचार है कि नदियों के लिए हमें एक समग्र नीति की आवश्यकता है. यह समय है जब नदियां राष्ट्रीय चिंता का विषय होनी चाहिए.

कौन है यासीन भटकल?

yasin2_210125299बिहार के बोधगया में महोबोधि मंदिर परिसर में नौ बम धमाकों के बाद अंदेशा जताया जा रहा है कि इसके पीछे इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) का हाथ है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस मामले में 12 आतंकवादियों की तस्वीरें जारी की हैं. इनमें आईएम संस्थापकों में से एक यासीन भटकल भी है. यासीन उन लोगों में से है जिनके पीछे कुछ सालों से खुफिया एजेंसियां लगी हुई हैं लेकिन आज भी वह उनके लिए एक गुत्थी बना हुआ है.
12 राज्यों की आतंक निरोधक एजेंसियों द्वारा यासीन के खिलाफ दायर आरोप पत्रों के मुताबिक वह 2008 से हुए कम से कम 10 बम धमाकों में प्रमुख सूत्रधार रहा है. ये बम धमाके अहमदाबाद (2008), सूरत (2008), जयपुर (2008), नई दिल्ली (2008), बनारस के दशाश्वमेध घाट (2010), बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम (2010), पुणे के जर्मन बेकरी (2011), मुंबई (2011), हैदराबाद (2013) और बेंगलुरु (2013) में हुए थे.

आखिर यासीन भटकल कौन है और लगातार इतनी घटनाओं में सीधी भूमिका होने के बावजूद वह सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर कैसे है? 1973 में जन्मा यासीन मूल रूप से कर्नाटक के एक तटीय गांव भटकल का रहने वाला है. उसकी शुरुआती शिक्षा अंजुमन हमी ए मुसलीमीन नाम के मदरसे में हुई थी. 1980 के दशक की शुरुआत में वह पुणे आ गया था. बाद में यासीन शाहबंदरी भाइयों के नाम से कुख्यात- रियाज और इकबाल भटकल (इनसे यासीन का कोई पारिवारिक नाता नहीं है) के संपर्क में आया. इन्होंने ही इंडियन मुजाहिदीन की नींव रखी थी. माना जाता है कि इस समय दोनों भाई देश छोड़ चुके हैं.

यासीन के बारे में बात करते हुए खुफिया एजेंसियों के अधिकारी कहते हैं कि उसकी गतिविधियों पर नजर रख पाना बहुत मुश्किल है. एक अधिकारी के मुताबिक यासीन को तकनीक का प्रयोग करना पंसद नहीं है. इसके बजाय वह परंपरागत तरीकों जैसे भेष बदलने आदि में माहिर है. वे कहते हैं, ‘ एक ऐसा आदमी जो ईमेल नहीं करता, हर पखवाड़े ठिकाना बदलता हो, ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में रहता हो और मोबाइल फोन को कुछ ही सेकंड तक इस्तेमाल करके सिमकार्ड तुरंत नष्ट कर दे, उस पर आप नजर कैसे रखेंगे.’ महाराष्ट्र एटीएस के एक अधिकारी कहते हैं, ‘यहां तक कि उसके करीबी लोग भी उसकी असली पहचान नहीं जानते. उसके ससुर को भी यही पता था कि उसका नाम इमरान है.’

यह भी दिलचस्प है कि एक बार यासीन पुलिस गिरफ्त में आ चुका है. 2008 की बात है जब कोलकाता पुलिस ने उसे फर्जी नोटों के एक मामले में हिरासत  में लिया था. लेकिन एक माह जेल में रहने के बाद उसे जमानत मिल गई. पुलिस उस समय पूरी तरह अनभिज्ञ थी कि यह आदमी कौन है. यासीन ने खुद के बारे में जानकारी दी थी कि वह बिहार के दरभंगा में रहने वाला मोहम्मद अशरफ है.

इसी तरह नवंबर, 2011 में वह चेन्नई में खुफिया अधिकारियों को चकमा देकर बच निकला था. दिल्ली और चेन्नई में तैनात खुफिया अधिकारी एक सूचना के आधार पर जब उसके ठिकाने पर पहुंचे उसके कुछ घंटे पहले ही यासीन वहां से निकल चुका था. उसके ससुर इरशाद खान ने पुलिस को बताया था कि वह बाजार गया है. लेकिन यासीन वापस अपने ठिकाने पर कभी नहीं लौटा.

यासीन का इस तरह बार-बार पुलिस से बच निकलना कोई संयोग है या फिर साजिश. इस बारे में एक अफवाह यह है और जिसे उसकी पत्नी जाहिदा भी मानती हैं कि वह पिछली बार इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) की मिलीभगत से भागने में कामयाब हुआ था. अब यदि ऐसा नहीं है तो क्या यह खुफिया विभाग की नाकामी है? तहलका ने यह सवाल आईबी के पूर्व निदेशक अजीत डोवाल से पूछा तो उनका जवाब था, ‘क्या हम यह नहीं जानते कि दाउद इब्राहीम कहां है? हमें पता है. ठीक है न? लेकिन सब कुछ आईबी अधिकारियों के हाथ में नहीं होता. बाकी पक्षों में भी कार्रवाई करने की पूरी मंशा होनी चाहिए.’

यासीन के पकड़ में न आने पर दिल्ली, मुंबई और दूसरे राज्यों की खुफिया एजेंसियों के आरोप-प्रत्यारोप पिछले दिनों काफी चर्चा में रहे हैं. आईबी के एक अधिकारी बताते हैं, ‘एक बार यासीन पुणे की एक साइकिल दुकान में गया था. वहां से पुलिस को उसकी फुटेज मिल गई लेकिन उन्होंने उसे मुंबई पुलिस से साझा करना जरूरी नहीं समझा.’ जनवरी, 2012 में भी एक ऐसा उदाहरण देखने को मिला था. महाराष्ट्र एटीएस ने नकी अहमद नाम के एक व्यक्ति को मुंबई में हिरासत में लिया था. दिल्ली पुलिस की मानें तो अहमद उनका मुखबिर था और यासीन को फंसाने की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई थी. लेकिन महाराष्ट्र एटीएस को इसकी सूचना नहीं थी और उसकी कार्रवाई ने पूरी योजना पर पानी फेर दिया. इसके बाद उठे विवाद को हल करने के लिए केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह को मध्यस्थता करनी पड़ी.

खुफिया एजेंसियों की क्षमता पर एक सवाल इस वजह से भी उठाया जा सकता है कि यासीन की कोई हालिया तस्वीर उनके पास उपलब्ध नहीं है. एक पुरानी तस्वीर के आधार पर ही वे पहचान की कोशिश करते हैं. हाल ही में इंडियन मुजाहिदीन के पकड़े गए एक आतंकवादी के मुताबिक अब उसका चेहरा मोहरा इतना बदल गया है कि इस तस्वीर से उसका मिलान आसान नहीं है.

हो सकता है बिहार में बम धमाकों की पूरी जांच के बाद सुरक्षा एजेंसियों को यासीन के बारे में कुछ और जानकारियां मिलें. तब इस व्यक्ति से जुड़ी गुत्थी कुछ हद तक सुलझ जाएगी. यदि ऐसा नहीं होता तो सुरक्षा एजेंसियों को आने वाले समय में और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

मध्यप्रदेश: उलटा पड़ा अविश्वास

DSC_1620_58065753411 जुलाई को मध्य प्रदेश विधानसभा के हंगामेदार होने की सौ फीसदी संभावना तो थी लेकिन कौन जानता था कि यह दिन प्रदेश की राजनीति का अति नाटकीय दिन साबित होगा.

अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्षी दल कांग्रेस भाजपा सरकार को हिला देने की तैयारी से आई थी. किंतु विधानसभा के भीतर ही कांग्रेस विधायक दल के उपनेता चौधरी राकेश सिंह ने भाजपा से ऐसे हाथ मिलाया कि कांग्रेस का दांव उलटा पड़ गया.

इस घटनाक्रम पर सरसरी नजर डालें तो कांग्रेस से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह जैसे ही बोलने के लिए खड़े हुए कि उनके पीछे उन्हीं के दल के उपनेता चौधरी राकेश सिंह ने यह कहते हुए हवा निकाल दी कि अविश्वास प्रस्ताव अधूरा है. इतना सुनना था कि भाजपा विधायकों ने नारेबाजी शुरू कर दी और थोड़ी देर बाद रोहाणी ने नेता प्रतिपक्ष के प्रस्ताव का उपनेता द्वारा विरोध करने पर शून्य मान लिया. इसके पहले कि कांग्रेस राकेश सिंह को पार्टी से निकालती, वे मुख्यमंत्री चौहान के साथ भाजपा कार्यालय पहुंचे और भाजपा में शामिल हो गए.

काबिले गौर है कि यह मप्र की 13वीं विधानसभा का आखिरी दिन था. और चुनावी सरगर्मियों के मद्देनजर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के बयानों से जाहिर था कि इस बार उनके द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव हंगामेदार रहेगा. दरअसल सिंह ने एक हफ्ते पहले ही साफ कर दिया था कि इस बार वे मुख्यमंत्री के परिजनों और करीबियों के भ्रष्टाचार से जुड़े मामले उठाएंगे. जवाब में चौहान ने भी सार्वजनिक तौर पर अपने विधायकों को जता दिया था कि ऐसे हालात में उन्हें चुप नहीं बैठना हैं. लेकिन 11 जून को सदन में जो हुआ वह अप्रत्याशित था और अभूतपूर्व भी.

सवाल है कि शिवराज सरकार ने भारी बहुमत होने के बावजूद इस हद तक जाकर अविश्वास प्रस्ताव खारिज क्यों करवाया? राजनीतिक बिरादरी का एक तबका मानता है कि इस बार यदि सदन में चर्चा होती तो मुख्यमंत्री की पत्नी साधना सिंह, उनके साले संजय सिंह, भाई नरेन्द्र चौहान और रोहित चौहान आदि से जुड़े सवाल उठते. विधानसभा की प्रक्रिया संवैधानिक होती है और उसका डाक्यूमेंटेशन हमेशा संदर्भों के तौर पर उपलब्ध रहता है. वहीं इस दौरान लगाये जाने वाले आरोप-प्रत्यारोप अगली दिन मीडिया की सुर्खियां भी बनतें. यही वजह है कि चुनावी साल में चौहान ने ऐसे विवादों से किनारे होना ही ठीक समझा. वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पटेरिया के मुताबिक, ‘चौहान को भलीभांति पता है कि सदन में यदि उनके परिवार पर अंगुलियां उठीं तो इसका असर उनकी उस छवि पर पड़ता जिसकी दम पर पूरी भाजपा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.’

वहीं सूबे का कांग्रेस खेमा मानता है कि वह राकेश सिंह के मामले में बड़ी चूक कर गया. बड़े नेता बताते हैं कि पार्टी को इस बात की भनक थी कि राकेश सिंह और मुख्यमंत्री चौहान के बीच कुछ पक रहा है. लहार के कांग्रेस विधायक डॉ गोविंद सिंह की सुनें तो, ‘हम लोगों को यह तो भान था कि राकेश चुनाव से पहले भाजपा में चला जाएगा, लेकिन यह सोचा भी नहीं था कि वह ऐन मौके पर पीठ पर चुरा घोपेगा.’ वहीं कांग्रेस के अंदरखाने की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुरेश पचौरी के विरोधी धड़ों को फायदा पहुंचेगा. दरअसल सियासी गलियारों में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पार्टी से निकाले गए राकेश सिंह पचौरी गुट के रहे हैं. लंबे समय से पार्टी के अंदर पचौरी और उनकी मंडली हाशिए पर है.

असल में कांग्रेस आलाकमान उन पर लगे इन आरोपों से खफा है कि बीते विधानसभा चुनाव के समय जब वे प्रदेश अध्यक्ष थे तो उन्होंने पैसा लेकर टिकटें बांटी और इसके चलते पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि विधानसभा की दीर्घा में पचौरी न के बराबर ही दिखते हैं. लेकिन इस अविश्वास प्रस्ताव में उनकी भाजपा के दिग्गज नेता कैलाश सारंग के साथ उपस्थिति चर्चा के केंद्र में थी. इस दौरान पचौरी के दीर्घा में रहते हुए राकेश सिंह ने बगावती तेवर अपनाए और कांग्रेस के अविश्वास पर असहमति जता दी. ऐसे में कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन के एक नेता का मत है, ‘इस घटना के बाद पार्टी का पचौरी पर से विश्वास और उठ गया. है’

जानकार बताते हैं कि चुनावी साल में विधानसभा का आखिरी सत्र विरोधी पार्टी के लिए सबसे अहम इसलिए होता है कि इसमें वह सरकार को आखिरी बार घेर सकती है. और इसीलिए कांग्रेस के नेताओं ने इस बार मुख्यमंत्री चौहान पर निशाना साधने के लिए खासी तैयारी भी की थी. लेकिन इस सत्र में जो कुछ भी घटा उसने सिद्ध कर दिया कि सियासी चतुराई में सूबे की भाजपा कांग्रेस से कहीं आगे है. ऐसा इसलिए भी कि भाजपा सरकार ने सत्र की शुरूआत विधेयकों को पास कराने से की और सभी विधेयक पास हो जाने के बाद जब आखिरी में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का मौका आया तो उसने कांग्रेस को अंगूठा दिखा दिया.

पुल तले पाठशाला

दिल्ली मेट्रो के यमुना बैंक स्टेशन के पास ऐसी ही एक अनूठी और प्रेरणादायी पाठशाला है. सभी फोटो: विकास कुमार
दिल्ली मेट्रो के यमुना बैंक स्टेशन के पास ऐसी ही एक अनूठी और प्रेरणादायी पाठशाला है. सभी फोटो: विकास कुमार

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मेट्रो के पुल के नीचे दुकानें सजना तो दिल्ली में आम है, लेकिन उसके तले कोई स्कूल चलता दिखे तो बात खास हो जाती है. दिल्ली मेट्रो के यमुना बैंक स्टेशन के पास ऐसी ही एक अनूठी और प्रेरणादायी पाठशाला है. मेट्रो ब्रिज इसे धूप और बारिश से बचाने वाली छत है. ब्लैकबोर्ड के लिए पुल की दीवार का एक हिस्सा काले रंग से रंग दिया गया है. बच्चों के बैठने के लिए कुछेक गत्ते और चटाइयां हैं. सप्ताह में पांच दिन और रोज दो घंटे चलने वाला यह स्कूल आस-पास रहने वाले मजदूरों, रिक्शाचालकों और उन जैसे तमाम लोगों की उम्मीद है जिनके बच्चे बस्ते में अपने सपने रखकर यहां आते हैं.

हमें कई बच्चे मिलते हैं जिनका जुनून और आत्मविश्वास किसी बड़े स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों जैसा दिखता है. करीब 10 साल का प्रवेश कहता है, ‘बड़ा होकर ट्रेन चलाऊंगा.’  स्कूल की शुरुआत से ही यहां आ रहा प्रवेश बताता है, ‘मेरा स्कूल सबसे अच्छा है. मास्टर तो अच्छे हैं ही, स्कूल भी ऐसा है जहां कोई बंधन नहीं. खुला-खुला.’ कई और बच्चे भी मिलते हैं जिन्हें अपना स्कूल बहुत प्यारा लगता है. सबको यह भी पता है िक पढ़-लिखकर उन्हें क्या बनना है.

उम्मीद और हौसले की इस पाठशाला की शुरुआत कुछ साल पहले राजेश कुमार शर्मा ने की थी. अलीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले 40 साल के शर्मा 20 साल पहले बीएससी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दिल्ली आ गए थे. आ क्या गए थे, मजबूरी में आना पड़ा था. वे बताते हैं, ‘मैं पढ़ने में अच्छा था, लेकिन परिवार बहुत गरीब था इसलिए पढ़ाई छोड़कर दिल्ली आ गया. रोजी-रोटी चलती रहे इसलिए मैंने किराने की एक दुकान खोल ली जिससे आज भी परिवार चलता है. जब अपने पैर जम गए, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो गया तब मैंने सोचा कि अब कुछ ऐसे बच्चों को पढ़ाया जाए जिनके मां-बाप गरीब हैं  और जिनके पास इतने संसाधन नहीं है कि वे बच्चों को स्कूल भेज सकें या पढ़ा सकें. यह इलाका मेरे कमरे के पास है और यहां के लोग भी गरीब ही हैं सो मैंने यहीं से शुरुआत की. यह स्कूल तो दो साल से है लेकिन मैं तो पिछले चार-पांच साल से बच्चों को पढ़ा रहा हूं.’

स्कूल की शुरुआत सिर्फ तीन बच्चों से हुई थी. लेकिन देखते ही देखते बच्चों की संख्या140 तक पहुंच गई. राजेश घबराने लगे क्योंकि अकेले इतने बच्चों को संभालना उनके लिए मुश्किल हो रहा था. उन्होंने बच्चों के मां-बाप से बातचीत करके इस बात के लिए तैयार किया कि जिन बच्चों की उम्र पांच साल से ज्यादा हो चुकी है उन्हें सरकारी स्कूल में भेजा जाए. इस तरह 140 में से 60 बच्चे सरकारी स्कूल में दाखिला पा गए.

[box]‘देश में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत है जो पढ़-लिख नहीं पाते, तो ऐसी हालत में अगर हम कुछेक बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ा देते हैं तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है’[/box]

साल भर पहले स्कूल को एक और शिक्षक मिला. ये थे बिहार के नालंदा से दिल्ली आए लक्ष्मी चंद्रा. लक्ष्मी विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं और दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं. रोजी-रोटी के लिए वे प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं. वे बताते हैं, ‘एक दिन  ट्यूशन के लिए जाते वक्त मैंने देखा कि पुल के नीचे बच्चे बैठे हैं और एक आदमी उन्हें पढ़ा रहा है. उस दिन तो मैं निकल गया क्योंकि मेरी क्लास का समय हो रहा था. अगली सुबह उत्सुकता के साथ जब मैं यहां पहुंचा तो पता चला कि राजेश गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाते हैं. मुझे लगा कि  इस नेक काम में इनका साथ देना चाहिए. बस तभी से मैं स्कूल से जुड़ गया.’

आगे की योजनाओं के बारे में पूछने पर राजेश कहते हैं, ‘देखिए, हमें यह मुगालता नहीं है कि हम कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं. इस देश में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत है जो पढ़-लिख नहीं पाते तो ऐसी हालत में अगर हम कुछेक बच्चों को  थोड़ा-बहुत पढ़ा देते हैं तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. दूसरी बात यह भी है कि हमारी सीमा भी यहीं तक है. लाख चाहकर भी हम दोनों इस देश के हर बच्चे को नहीं पढ़ा-लिखा सकते. रही बात भविष्य की तो जब तक बन सकेगा इसी तरह से पढ़ाते-लिखाते रहेंगे और एक समय के बाद इन्हें सरकारी स्कूल में भेजते रहेंगे. क्योंकि असल चीज जो है डिग्री, वह तो इन्हें वहीं से मिलेगी.’

इस अनूठे स्कूल की तरफ कई गैरसरकारी संगठनों ने भी हाथ बढ़ाया. लेकिन राजेश और लक्ष्मी चंद्रा कहते हैं कि वे अपने  मिशन को कमाई का जरिया नहीं बनाना चाहते. राजेश कहते हैं, ‘देखिए, ऐसा तो है नहीं कि हमारे परिवार का पेट नहीं पल रहा है. अपने लिए कमाई का जरिया है ही हमारे पास.’ इतना कहकर राजेश चुप हो जाते हैं और अपने छात्रों को कुछ बताने-समझाने में लग जाते हैं. स्कूल के भविष्य और इससे जुड़ी मुश्किलों से जुड़े सवालों का जवाब देते वक्त राजेश के चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक दिखती है. मानो कह रहे हों कि अगर भविष्य और मुश्किलों के बारे में सोचा होता तो मेट्रो के पुल तले यह पाठशाला शुरू ही नहीं हो पाती.

2003 में नीतीश कुमार इन्हीं नरेंद्र मोदी की तारीफ कर रहे थे

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी. फोटो:विकास कुमार
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी. फोटो:विकास कुमार

भाजपा के साथ रहने से नीतीश कुमार को काफी मजबूती मिल रही थी. अब साथ छूटने के बाद आप सरकार के कामकाज पर किस तरह का दुष्प्रभाव देख रहे हैं?
निश्चित तौर पर गठबंधन टूटने से सरकार के कामकाज पर नकारात्मक असर पड़ेगा. प्रशासनिक स्तर पर इसका सबसे अधिक असर दिखेगा. हमने सरकार के कामकाज में कभी कोई अड़चन नहीं पैदा की बल्कि इसे सुचारू बनाए रखने में मदद की थी. लेकिन अब यह सरकार कमजोर हो गई है. यहां फिर से जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है. ऐसे में सरकार को निश्चित ही समझौते करने पड़ेंगे.

जदयू-भाजपा की सरकार ने बिहार में विकास की राजनीति को एक नई परिभाषा दी थी. विकास पर इस टूट का क्या असर होगा?
इस गठबंधन का टूटना बिहार के लिए अहितकर है. बिहार में विकास का जो माहौल बना था, वह कहीं न कहीं प्रभावित होगा. दूसरे कार्यकाल के बारे में वैसे ही लोगों में यह धारणा बन रही है कि इस बार कम काम हो रहा है. बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने मिलकर बिहार में निवेश को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की थी. जिसका नतीजा धीरे-धीरे दिखने लगा था. बाहर की कंपनियां बिहार में निवेश करने लगी थीं और कई बड़ी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई थी. लेकिन इस राजनीतिक अस्थिरता के माहौल से निवेश पर भी बुरा असर पड़ेगा. क्योंकि निवेशक वहीं निवेश करते हैं जहां राजनीतिक स्थिरता का माहौल होता है.

आगामी चुनावों को लेकर आपका अनुभव क्या कहता है?
इस बात से नीतीश कुमार भी सहमति व्यक्त करेंगे कि कांग्रेस के प्रति लोगों में जबरदस्त गुस्सा है और जनता चाहती है कि कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हो. नरेंद्र मोदी के तौर पर भाजपा एक बेहतर विकल्प देश की जनता के सामने रख रही है. वे आज देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक चेहरे हैं. इसका फायदा भाजपा को देश भर में मिलेगा और बिहार में भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में हमारी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होगी.

गठबंधन की टूट को भाजपा विश्वासघात करार दे रही है और जदयू गठबंधन धर्म की याद दिला रही है. आखिर गलती किससे हुई है?
जिन नरेंद्र मोदी को लेकर नीतीश जी को इतनी आपत्ति है, 2003 में तो वे उनकी तारीफ कर रहे थे. नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तो घोषित नहीं किया था, उन्हें तो सिर्फ चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था. इसलिए इस मामले को इतना तूल देना वाजिब नहीं था. गठबंधन धर्म की बात वे करते हैं लेकिन इसी गठबंधन धर्म का तकाजा यह है कि सहयोगियों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया जाए. वे तो भाजपा के ऊपर अपनी शर्तें थोप रहे थे. पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरे के प्रति उनकी आपत्ति का मतलब तो यह हुआ कि वे नहीं चाहते कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे. मुझे ऐसा लगता है कि नीतीश जी के मन में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है.

बिहार को तथाकथित जंगल राज से मुक्त कराने का जनादेश मांगने के लिए नीतीश-सुशील की जोड़ी एक साथ जनता के बीच गई थी. अब यह जोड़ी जनता के बीच एक-दूसरे के खिलाफ दिखेगी. क्या यह लोगों को थोड़ा अटपटा नहीं लगेगा?
आप ठीक कह रहे हैं. एक टीम के तौर पर हमने बिहार को आगे ले जाने का सपना देखा था और हम उस पर काम कर रहे थे. इस सफर को बीच में छोड़ने का दुख न सिर्फ हमें है बल्कि बिहार की जनता और बिहार से बाहर रहने वाले प्रदेश के लोग भी इससे दुखी हैं. अब हम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. आने वाले दिनों में हमारी कोशिश यह होगी कि प्रदेश में भाजपा को एक विकल्प के तौर पर पेश करें.

विश्वासमत के दौरान भाजपा के वॉकआउट का क्या मतलब है? कुछ लोग यह कह रहे हैं कि भाजपा के कुछ विधायक सदन में मौजूद नहीं थे इसलिए भाजपा ने अपने आंतरिक मतभेद को छिपाने के लिए वॉकआउट का सहारा लिया.
नहीं, ऐसा नहीं है. भाजपा पूरी तरह से एकजुट है. हमने कभी भी नीतीश जी के बहुमत को चुनौती नहीं दी. हमने वॉकआउट इसलिए किया कि जनादेश साझा था. हम कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहते जिससे यह सरकार अस्थिर हो. हां, अगर सरकार खुद गिरती है तो उसमें हम कुछ नहीं कर सकते. हम कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे बिहार की जनता पर मध्यावधि चुनाव का बोझ पड़े.

आदि चिकित्सा की वैद्यराज महिलाएं

10noa_JARI_BOOTI_KA_CLINICK__1__710110403पुरुषों के वर्चस्व वाले पेशे पर महिलाओं की बढ़ती धाक से जुड़ी यह सकारात्मक खबर झारखंड के कोल्हान इलाके की है. महिलाएं डॉक्टरी के पेशे में तो शुरू से ही पुरुषों से कदमताल करती रही हैं लेकिन वैद्यराज का पेशा अमूमन पुरुषों के ही हाथ में रहा. पुरूषों का ही आधिपत्य रहा इस पेशे पर. लेकिन पिछले कई सालों की मेहनत के बाद सिंहभूम के नोवामुंडी और जगन्नाथपुर इलाके में महिलाएं वैद्यगिरी कर एक नयी राह दिखा रही हैं.जटिया, जगन्नाथपुर, कोटगा आदि साप्ताहिक हाट से लेकर आसपास के करीब तीन दर्जन सुदूरवर्ती गांवों में ये महिलाएं स्वास्थ्य सलाह और दवाएं दे रही हैं. ये महिला वैद्यराज ‘होड़ोपैथी’ की विशेषज्ञ हैं. होड़ोपैथी यानि देसज और आदिवासी समुदाय की चिकित्सा पद्धति. इसी  के जरिये वैद्यराज बनी महिलाएं मलेरिया, ल्यूकोरिया, लकवा, सर्दी-बुखार, चर्मरोग, जोड़ों के दर्द से लेकर दूसरी तमाम बीमारियों का निदान जंगल की जड़ी-बूटियों से तैयार दवाओं से कर रही हैं. सिर्फ इलाज या दवा वितरण ही नहीं, इन महिलाओं द्वारा नोवामुंडी और जगन्नाथपुर इलाके के गांवों में स्वयंसहायता समूह बनाकर गांव की अन्य महिलाओं व लड़कियों को भी होड़ोपैथी पद्धति से अवगत कराया जा रहा है. पिछले 13 सालों के अथक प्रयास के बाद अब करीब 300 महिलाएं पेशेवर तौर पर वैद्य बन गयी हैं और उन्हीं के द्वारा अब दूसरी महिलाओं और लडकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

इस अभियान की सूत्रधार अजीता हैं लेकिन वे खुद पर बात करने को तैयार नहीं होती. सिर्फ यही बताती हैं कि काम महत्वपूर्ण है, नाम नहीं. अजीता मूलतः केरल की रहनेवाली हैं लेकिन अब झारखंड में ही रच-बस गई हैं. वे बताती हैं कि करीब डेढ़ दशक पहले 15 महिलाओं के साथ उन्होंने ओमन नामक एक संगठन बनाकर यह अभियान शुरू किया था. हो भाषा(हो समुदाय की भाषा) में ‘ओमन’ का मतलब अंकुर होता है. शुरुआत में कुछ महिलाएं झारखंड के ही मधुपुर के निकट महेशमुंडा गांव में रहने वाले होड़ोपैथी के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डा. पीपी हेम्ब्रम के पास गईं और उन्हीं से यह गुर सीख कर लौटीं. फिर एक-एक कर महिलाओं और लडकियों को जोड़ने का काम शुरू हुआ.

शुरुआत में स्वाभाविक तौर पर बहुत कठिनाइयां आती रहीं क्योंकि इस पेशे में आने से पहले महिलाओं को कई बार सोचना पड़ रहा था और फिर घर-समाज से इजाजत लेने की बात भी थी. लेकिन धीरे-धीरे राह आसान होती गई. फिर नोवामुंडी में होड़ोपैथी दवाओं की दुकान भी खोली गयी.दवाओं का निर्माण महिलाओं द्वारा कुंदरीजूर गांव में होने लगा. दवा निर्माण के लिए जंगल से नीम, अजरुन, हरसिंगार, तुलसी, चिरैता तथा अन्य औषधीय सामग्री व जड़ी-बूटी जुटाने का काम भी ये महिलाएं स्वयं ही करती हैं.

शुरु में जिन गांवों में ये महिलाएं दवा देने जाती थीं, वहां की गंभीर समस्या मलेरिया है. इसे ध्यान में रखते हुए उन गांवों में इन महिलाओं द्वारा मलेरिया के कारण व उससे बचने के उपाय से संबंधित एक घंटे की फिल्म भी स्थानीय हो भाषा में तैयार की गयी. अपनी बोली में तैयार फिल्म को देखने में लोगों की रुचि जगी, फिर महिलाओं पर समाज का भरोसा बढता रहा और अब तो ये महिलाएं ही कई गांवों में पहली और आखिरी उम्मीद की तरह हैं. स्वास्थ्य में जो फायदा हुआ, वह तो हुआ ही, इसका सबसे बडा फायदा अंधविश्वास को दूर करने में हुआ. रश्मि बताती हैं, ‘डायन आदि के नाम पर प्रताड़ित करने का चलन कम हुआ है, क्योंकि डायन आदि बीमारियों से भी जुडा मामला रहा है. गांवों में होड़ोपैथी को बढावा देने, महिलाओं को वैद्यराज बनाने के साथ ही इस पद्धति के दस्तावेजीकरण यानी डॉक्यूमेंटेशन का काम भी इन महिलाओं द्वारा शुरू किया गया है क्योंकि होड़ोपैथी का लिखित डॉक्टयूमेंटेशन नहीं होने के कारण अगली पीढी में इसके खत्म हो जाने का भी डर है.

इशरत जहां मुठभेड़ मामला: मोदी को मालूम था

इशरत जहां मुठभेड़ मामले की आंच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचती दिख रही है. सीबीआई जल्द ही अदालत में एक शपथपत्र दाखिल करने जा रही है. इसके मुताबिक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पुलिस के उस षड़यंत्र की पूरी जानकारी थी जिसमें वह इशरत जहां समेत चार लोगों की हत्या करके उन्हें आतंकवादी घोषित करने वाली थी. जिस पुलिस अधिकारी की यह स्वीकारोक्ति है, उसका दावा है कि उसने उस समय दो अधिकारियों को इस बारे में बातचीत करते सुना था. इनमें से एक अधिकारी खुफिया ब्यूरो (आईबी) का है और दूसरा पुलिस का. दोनों के बारे में कहा जाता है कि वे मोदी के बेहद करीबी हैं.

संभावना है कि चार जुलाई को सीबीआई आरोपपत्र के साथ ही इस स्वीकारोक्ति को भी अदालत  के सामने रखेगी. यह बयान देने वाला पुलिस अधिकारी खुद इस कथित मुठभेड़ में हुई हत्या का आरोपित है. इस कथित मुठभेड़ को 15 जून, 2004 को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने अंजाम दिया था जिसमें इशरत जहां (19 वर्ष) समेत चार कथित आतंकवादी मारे गए थे. पुलिस का दावा था कि वे सभी मोदी की हत्या करने आए थे.
जिस कथित बातचीत का जिक्र सीबीआई कर रही है, उसमें दोनों अधिकारियों ने कहीं मोदी का नाम नहीं लिया है. सूत्रों के मुताबिक बातचीत आईबी में विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार और क्राइम ब्रांच अधिकारी डीजी वंजारा के बीच है. जिस अधिकारी द्वारा यह शपथपत्र दिया जा रहा है, वह खुद आईपीएस कैडर से है. अधिकारी के मुताबिक वंजारा ने कुमार को उसकी मौजूदगी में बताया था कि चारों की हत्या के लिए सफेद दाढ़ी और काली दाढ़ी ने हरी झंडी दे दी है. सीबीआई का मानना है कि सफेद दाढ़ी शब्द मोदी और काली दाढ़ी अमित शाह के लिए इस्तेमाल किया था. शाह उस वक्त मोदी मंत्रिमंडल में गृह राज्यमंत्री थे और राज्य की पुलिस उनके अधीन थी. मोदी ने गृह मंत्रालय अपने हाथ में रखा था. सीबीआई इस अधिकारी की स्वीकारोक्ति के आधार पर इशरत जहां मुठभेड़ में मोदी की भूमिका की जांच करना चाहती है. यह बयान सीपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ है और अदालत में इसे बतौर सबूत इस्तेमाल किया जा सकता है. एक सीबीआई अधिकारी बताते हैं कि वे इस मामले में आईबी अधिकारी कुमार को आरोपित बनाने जा रहे हैं.

सीबीआई द्वारा दाखिल होने वाले आरोपपत्र में यह दावा भी किया जाएगा कि मारे गए चार कथित आतंकियों का सरगना जावेद अहमद शेख असल में कुमार का मुखबिर था और कुमार उस समय खुफिया ब्यूरो की गुजरात इकाई के प्रमुख थे. सबूत इशारा करते हैं कि कुमार ने जावेद को यह कह कर अहमदाबाद बुलाया था कि उसके लिए कुछ काम है और फिर उन्होंने जावेद समेत चारों की हत्या करवा दी जिनमें इशरत जहां भी शामिल थी. 18 जून को सीबीआई ने कुमार से पूछताछ की थी. कुमार इस समय गांधीनगर में खुफिया ब्यूरो के विशेष निदेशक पद पर तैनात हैं. सीबीआई अगले कुछ दिनों में कुमार को गिरफ्तार कर सकती है. तहलका की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई के पास एक से ज्यादा पुलिस अधिकारियों की स्वीकारोक्तियां हैं जिनमें उन्होंने कुमार को हत्याकांड का कर्ताधर्ता बताया है.

सीबीआई के पास एक गोपनीय ऑडियो टेप है. यह टेप इस मामले के एक आरोपित पुलिस अधिकारी जीएल सिंघल ने नवंबर, 2011 में रिकॉर्ड किया था. टेप में सिंघल की मोदी सरकार के महत्वपूर्ण लोगों के साथ बातचीत है. ये लोग चर्चा कर रहे हैं कि कैसे मामले को कमजोर किया जाए और आरोपित पुलिस अधिकारियों को बचाया जाए. तहलका के पास बातचीत में शामिल कुछ लोगों की जानकारी है. इनके नाम हैं प्रदीप सिंह जडेजा (संसदीय कार्यमंत्री) और भुपिंदर चुडास्मा (शिक्षा मंत्री). बातचीत में शामिल अन्य लोग हैं तत्कालीन गृह राज्यमंत्री प्रफुल पटेल जो पिछले  दिसंबर में विधानसभा चुनाव में हारकर सरकार से बाहर हो गए, सीजी मुर्मू जो मोदी के नजदीकी आईपीएस अधिकारी हैं, एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी और एडिशनल एडवोकेट जनरल तुषार मेहता. यह बैठक गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा स्थापित एसआईटी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट जमा करने से एक दिन पहले हुई थी. टेप में त्रिवेदी को कहते सुना जा सकता है कि अगर कल एसआईटी इशरत जहां मुठभेड़ को फर्जी करार देती है तो हम सबको मिलकर कहना होगा कि एसआईटी ही फर्जी है. मुर्मू कहते हैं कि राज्य अथवा उसके अधिकारियों को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए. अगले दिन पेश की गई रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा कि पुलिस ने इन चार लोगों का अपहरण करके उनकी हत्या कर दी.

मोदी सरकार लगातार कहती रही कि शेख, मुंबई के निकट एक कॉलेज की छात्रा इशरत जहां तथा दो अन्य व्यक्ति जो कथित तौर पर पाकिस्तानी थे, सभी आतंकवादी थे. उसका दावा है कि पुलिस ने अहमदाबाद के बाहर उनको रोकने की कोशिश की जिसके बाद हुई गोलीबारी में वे मारे गए. खुफिया ब्यूरो ने जानकारी दी थी कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने गुजरात में 2002 में मुस्लिमों के नरसंहार का बदला लेने के लिए चार आतंकियों को भेजा है. सीबीआई के पास अधिकारियों की ऐसी स्वीकारोक्तियां हैं जिनमें कहा गया है कि कथित तौर पर कुमार ने इशरत जहां से उस वक्त मुलाकात की थी जब मारे जाने से पहले वह अवैध पुलिस हिरासत में थी. गवाहियों के मुताबिक मृतकों के पास मिली एके 47 राइफल भी कुमार के खुफिया ब्यूरो के कार्यालय से लाकर कथित आतंकियों के शवों के साथ रखी गई थी.

[box]पुलिस अधिकारी सिंघल के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने इकलौते बेटे की आत्महत्या के बाद आखिरकार सच बोलने का फैसला किया[/box]

आरोपपत्र से यह भी पता चलता है कि मारे गए दो अन्य व्यक्ति जीशान जौहर और अमजद अली राणा पाकिस्तानी नहीं थे. वे संभवत: जम्मू और कश्मीर के रहने वाले थे व आतंकी समूहों से ताल्लुक रखते थे. आरोपपत्र के अनुसार कुमार ने पहले दोनों को अपने मुखबिर शेख से मिलवाया और उसे ‘प्रोत्साहित’ किया कि वह उनके संपर्क में रहे. सीबीआई सूत्रों के मुताबिक हत्या के पहले कुमार ने शेख से कहा कि वह दोनों को अहमदाबाद ले जाए, शेख ने ऐसा ही किया. सीबीआई न्यायालय से और वक्त मांगेगी ताकि यह जांच हो सके कि आखिर उन चारों को कुमार से कैसे मिलवाया गया.

सीबीआई का कहना है कि कुमार ने तीनों व्यक्तियों को पाकिस्तान में अपने लोगों को फोन करने को कहा और उनकी बातचीत रिकॉर्ड की. स्रोतों के मुताबिक यही वह बातचीत है जिसे एक समाचार चैनल ने पिछले दिनों प्रसारित किया और कहा कि वे आतंकवादी थे और मोदी को मारने जा रहे थे. बातचीत में इस्तेमाल मोबाइल उनके शवों के पास रख दिए गए थे. सीबीआई का कहना है कि कुमार ने शेख के अहमदाबाद आने से पहले ही पूरी तैयारी कर ली थी जिसके बाद हत्याओं को अंजाम दिया गया. कुमार ने ही शेख के लखनऊ जाने और एक देसी कट्टा खरीदने का इंतजाम करवाया. उनके आदेश पर ही वह महाराष्ट्र में औरंगाबाद गया. वह जिन होटलों में रुका हर जगह उसने कुमार के निर्देश के मुताबिक ही काल्पनिक नाम का इस्तेमाल किया.

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मुठभेड़ की कड़ियां 
वंजारा और गृह राज्यमंत्री शाह दोनों पर एक अन्य हत्याकांड का आरोप भी है. यह मामला है वर्ष 2005 में हुए सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या का. इन्हें भी आतंकवादी बताकर एक मुठभेड़ में मार दिया गया था. वंजारा को इन हत्याओं के लिए2004 और 2005 में गिरफ्तार भी किया गया. शाह को 2010 में इसी हत्याकांड के लिए गिरफ्तार किया गया और उनको तीन महीने बाद जमानत मिल गई. दो महीने पहले भाजपा ने शाह को उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रभारी बनाया था. लेकिन उनके लिए अब एक नई मुसीबत भी खड़ी हो सकती है. सीबीआई एक दूसरे मामले में उनको पूछताछ के लिए तलब करने की योजना बना रही है. यह सादिक जमाल मुठभेड़ मामला है. यह घटना 2003 में हुई थी जब अहमदाबाद में पुलिस ने जमाल को आतंकी करार देते हुए उसे एक मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था.

सीबीआई के मुताबिक शाह, जमाल की हत्या के दिन कुमार के संपर्क में थे. कुमार उन अधिकारियों में शामिल हैं जिनकी इस मामले में अहम भूमिका रही थी.  सीबीआई इस समय उन चार मामलों की जांच कर रही है जिनमें गुजरात पुलिस पर लोगों को मार कर उनको आतंकवादी बताने का आरोप है. सीबीआई का कहना है कि जमाल की हत्या के मामले में कुमार पर साफ आरोप हैं. महाराष्ट्र के पूर्व और वर्तमान खुफिया अधिकारियों ने उनके खिलाफ गवाही भी दी है.

जांच एजेंसी ने इस राज्य के दो वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों दत्ता पल्सागिकर और गुरुराज सवागत्ती से पूछताछ की है. सीबीआई के मुताबिक इन अधिकारियों ने जमाल के आतंकवादी होने के बारे में गलत खुफिया जानकारी दी और इस तरह हत्या के इस षड़यंत्र में शामिल हुए. जांच एजेंसी ने मुंबई पुलिस के निलंबित अधिकारी प्रदीप शर्मा से भी पूछताछ की जिन्हें कभी 100 से भी अधिक कथित अपराधियों को मुठभेड़ में मारने की वजह से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तौर पर जाना जाता था. जमाल गुजरात पुलिस को सौंपे जाने के पहले शर्मा की हिरासत में था. शर्मा इसी तरह के फर्जी मुठभेड़ मामले में हत्या के आरोप में मुंबई में सजा काट रहे हैं.

सीबीआई ने गुजरात में जमाल की हत्या के मामले में डीएसपी तरुण बारोट को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है जिन्होंने कथित तौर पर मुंबई से जमाल की हिरासत हासिल की थी. बारोट 2004 की एक मुठभेड़ के मामले में भी आरोपित हैं. कुमार के खिलाफ सीबीआई की जांच काफी समय से लंबित रही है. एक साल तक खुफिया ब्यूरो कुमार से सीबीआई की पूछताछ की राह में रोड़ा बना रहा.

लेकिन जब जमाल और इशरत जहां दोनों हत्याकांडों में कुमार की भूमिका स्पष्ट होने लगी तो खुफिया ब्यूरो के प्रमुख आसिफ इब्राहीम, सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा और केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह ने कई दिन तक मुलाकात के बाद आगे की राह निकाली. जानकारी के मुतबिक कुमार जून में सीबीआई से मुलाकात के लिए गांधीनगर तब पहुंचे जब उनके आला अधिकारियों ने आश्वस्त किया कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. इसके विरोधस्वरूप सतीश वर्मा नामक सीबीआई अधिकारी ने जांच में शामिल होने से इनकार कर दिया. वर्मा वही अधिकारी हैं जिन पर गुजरात सरकार ने अपने खिलाफ पक्षपाती होने का आरोप लगाया है.

सिंघल के बयान को सीबीआई बहुत अहम मानकर चल रही है. एक समय के जाने-माने पुलिस अधिकारी रहे सिंघल की छवि अब धूमिल हो चुकी है. कहा जाता है कि इस साल उनके 17 साल के इकलौते बेटे द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद उन्होंने सच बोलने का फैसला किया. उन्होंने सीबीआई अधिकारी से कहा, ‘यह ऊपर वाले का इंसाफ है सर, मैंने एक निर्दोष को मारा और मुझे उसकी सजा मिली.’

बेपटरी रेल

जब भी झारखंड और रेल का जिक्र आता है तो यह विडंबना सबसे पहले दिमाग पर दस्तक देती है कि आनुपातिक तौर पर रेल विभाग को सर्वाधिक राजस्व दिलाने के बावजूद झारखंड में रेल सुविधाएं सबसे प्रतिकूल स्थिति में हैं. आंकड़ों के मुताबिक रेल मंत्रालय को होने वाली कुल राजस्व प्राप्ति में 40 प्रतिशत हिस्सा झारखंड से आता है जबकि इस राज्य में उन अधूरी रेल परियोजनाओं की भी पूरी फेहरिस्त है जिनकी घोषणा हुए एक दशक से ज्यादा वक्त बीत गया है.

आजादी के छह दशक बाद भी रेलवे झारखंड में सवारियों की सुविधाओं पर माल ढुलाई को तरजीह देता नजर आता है. हम चाईबासा में रहने वाले प्रो. अशोक सेन की बातों को याद करते हैं जिन्होंने कहा था, ‘अगर आपको पूरे झारखंड में रेल का हाल जानना हो तो सिर्फ हमारे इलाके से जान सकती हैं. चाईबासा कोल्हान का एक प्रमुख स्थान है. यहां से जमशेदपुर के बीच अंग्रेजों के जमाने में भी एक ही सवारी गाड़ी चलती थी, विगत वर्ष तक भी एक ही चलती रही. बहुत आंदोलन के बाद एक और गाड़ी का ठहराव हुआ है. अंग्रेजों ने इसे मालगाड़ी के लिए बनाया था, अब के शासक भी इंसानों की बजाय माल को ही ज्यादा तरजीह देते हैं.’ प्रो. अशोक सेन की बातों को अगर पूरे झारखंड के संदर्भ में देखें तो भी स्थितियां कुछ वैसी ही दिखती हैं. सवारी गाड़ियों का टोटा और मालगाड़ियों की भरमार. झारखंड की रेल लाइन उन इलाकों से ही गुजरती हुई ज्यादा दिखेगी जहां से माल की ढुलाई ज्यादा होनी है. वहीं जिन इलाकों में नागरिक सेवाओं के लिए रेलवे की सेवा बहाल होनी है, वह पिछले कई सालों से या तो अधर में लटकी हुई है या जिन योजनाओं के सपने दिखाए भी गए हैं, अधिकांश कछुआ गति से चल रही हैं.

झारखंड में रांची-कोडरमा रेल लाइन सबसे चर्चित है. पिछले 12 साल से यह अधूरी पड़ी है. जब यह योजना बनी थी, तब इसमें 491.19 करोड़ रु. की लागत आने की बात थी, जो अब बढ़कर 1,099.20 करोड़ रु. तक जा पहुंची है लेकिन काम 75 प्रतिशत ही पूरा हो सका है. जब बिहार-झारखंड एक हुआ करते थे, तब दक्षिण बिहार यानी अब के झारखंड के लिए कई योजनाओं का खाका तैयार हुआ था, जिनके निर्माण की गति करीब एक दशक पीछे है. हालांकि जब झारखंड का निर्माण हुआ तो यह उम्मीद जगी कि अब तक बिहार के कई रेलमंत्रियों के सत्ता में रहने के बावजूद बिहार का जो हिस्सा रेलवे सुविधाओं से वंचित रहा है, उसके लिए कुछ काम होगा. इस उम्मीद को राज्य बनने के दो साल बाद ही फरवरी, 2002 में पंख भी लगे, जब रेल मंत्रालय और झारखंड सरकार के बीच 545 किलोमीटर लंबी छह रेल परियोजनाओं के लिए समझौते पर हस्ताक्षर हुए. समझौते के अनुसार इन परियोजनाओं को फरवरी, 2007 तक पूरा कर लिया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिर यह तय हुआ कि किसी भी तरह मार्च, 2012 तक इसे पूरा कर लिया जाए लेकिन दो साल का अतिरिक्त समय लेने के बाद किसी तरह एक-दो परियोजनाओं पर रेल का परिचालन शुरू हो सका.

इनमें से एक तो देवघर से दुमका रेल लाइन है, जिस पर 12 जुलाई, 2011 से रेल परिचालन शुरू हुआ और दूसरी मंदारहिल-दुमका-रामपुरहाट परियोजना है, जिसके एक हिस्से मंदारहिल से हंसडीहा के बीच 24 दिसंबर, 2012 को रेल परिचालन शुरू हो सका है. अब यदि नमूने के तौर पर देवघर-दुमका रेलवे लाइन के शुरू हो जाने में आए खर्च का आकलन करें तो इसे 178.24 करोड़ रु. में पूरा कर लिया जाना था लेकिन पांच वर्षों का विलंब हुआ तो इस पर 249.45 करोड़ रु. खर्च करने पड़े. यह तो सिर्फ एक योजना में खर्च की बढ़ोतरी की बात है, जाहिर है जिन शेष परियोजनाओं में देरी हुई है, उनमें भी अब खर्च की राशि काफी बढ़ गई है. शेष परियोजनाओं को आरंभिक समझौते के अनुसार 1,997.00 करोड़ रु में पूरा हो जाना था, जिसकी लागत बढ़कर अब 3,771.00 करोड़ रु पहुंच चुकी है. विलंब की वजह पूछने पर आधिकारिक तौर पर कोई कुछ नहीं कहता.

रेल परियोजनाओं में विलंब होने से झारखंड वासियों को जो नुकसान हो रहा है वह तो हो ही रहा है, राज्य को भी जोरदार चपत लग रही है क्योंकि जिन परियोजनाओं का काम झारखंड में चल रहा है, उनमें समझौते के अनुसार राज्य सरकार को आधी राशि देनी है. पहले जब समझौते पर हस्ताक्षर हुए तो केंद्र और राज्य सरकार के अंशदान का हिस्सा क्रमश: 66.66 और 33.33 तय हुआ था, जिसे बाद में आधा-आधा कर दिया गया. रेल की बदहाली के बारे में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा कहते हैं, ‘हालिया रेल बजट से ही समझा जा सकता है कि राज्य को रेलवे कितनी तवज्जो दे रहा है. रेल बजट में 67 एक्सप्रेस और 26 नए पैसेंजर ट्रेनों को चलाने की घोषणा हुई, इनमें से एक भी झारखंड से होकर नहीं गुजरने वाली है.’ झारखंड में प्रतिपक्ष के नेता और वरिष्ठ कांग्रेसी राजेंद्र सिंह की दलील थोड़ी अजीब है. वे कहते हैं, ‘पिछले 16 सालों से कांग्रेस का कोई रेल मंत्री बना ही नहीं. अब कांग्रेसी रेल मंत्री बने हैं तो स्थिति सुधरेगी.’ नेता इस मसले पर अपनी पार्टी का बचाव करते हैं, दूसरे को दोष देते हैं लेकिन वे झारखंड में रेल की स्थिति कैसे सुधरे और कैसे परियोजनाएं सही समय पर पूरी हों, इसकी बात नहीं करते.

झारखंड में रेल परियोजनाओं में विलंब होने से बढ़ती असुविधाएं तथा लोगों की उम्मीदों पर लगता ग्रहण एक पक्ष तो है ही, लेकिन बढ़ती परियोजना लागत के कारण राज्य को लगने वाली चपत भी एक समस्या है. संथाल परगना में मंदारहिल-दुमका-रामपुरहाट परियोजना 130 किलोमीटर की परियोजना है. इसे 1995 में मंजूरी मिली थी. शुरुआती लागत 184 करोड़ रुपये तय हुई थी जो वर्तमान में 675 करोड़ रुपये हो चुकी है. स्थिति यह है कि इतने वर्षों बाद लगभग 75 किलोमीटर काम ही पूरा हो सका है. इसी तरह एक रेल लाइन झारखंड के लोहरदगा से टोरी के बीच का है, जिसके बीच की दूरी 44 किलोमीटर है. इस परियोजना को भी 2007 में ही मंजूरी मिली थी. तब इसे 216 करोड़ रु. में पूरा किया जाना था जबकि अब लागत का खाका 347 करोड़ रु. का हो गया है और निर्माण कार्य की बात करें तो विगत माह तक 14-15 किलोमीटर काम ही पूरा होने की बात बताई गई थी.

इसी तरह एक रेल लाइन देवघर-सुलतानगंज के बीच की है. देवघर-सुलतानगंज के बीच का संबंध गहरा है. सावन के महीने में कांवरिए सुलतानगंज से जल लेते हैं, देवघर में शिवमंदिर में चढ़ाते हैं. लाखों लोगों का आना-जाना होता है. इन दोनों स्थानों के बीच रेल लाइन की मंजूरी 2000 में ही मिली थी. लगभग 114 किलोमीटर की दूरी है और जब इस योजना को मंजूरी मिली थी, तब 138 करोड़ रु. लागत की बात थी, अब यह लागत बढ़कर 469 करोड़ रु. तक पहुंच चुकी है लेकिन भूमि के पेंच में अभी यह तय नहीं कि काम कब तक पूरी तरह शुरू होगा और सपना कब हकीकत में बदलेगा.

कुछ ऐसा ही हाल कोडरमा से जुड़ने वाले तीन रेल परियोजनाओं का भी है. कोडरमा से तिलैया के बीच की परियोजना मात्र 64.76 किमी की है. इसकी मंजूरी 2002 में ही मिली हुई है. मंजूरी के समय इस योजना में 418 करोड़ रुपया लागत आने की बात थी, अब यह लागत 479 करोड़ रुपया तक पहुंच चुकी है. तीन नई परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है. इसके तहत क्रमश: हंसडीहा-गोड्डा, साहेबगंज-पीरपैंती और साहेबगंज-तीनपहाड़ के बीच रेलवे का दोहरीकरण करना है.

राज्य के नागरिक भी इस गुणाभाग को अच्छी तरह समझते हैं. जिले हंटरगंज के रहने वाले बबलू कहते हैं, ‘राजधानी रांची में ही देखिए न कि इतने सालों में भी वहां से कहां-कहां के लिए ट्रेनें चलती हैं. क्या वहां से ट्रेन के जरिए देश के प्रमुख शहरों में भी सीधे जाना संभव है.’ बबलू की बातें गलत नहीं हैं. झारखंड रेल यात्री संघ के मानद सचिव प्रेम कटारूका कहते हैं, ‘रेल परियोजनाओं में विलंब के लिए केंद्र और राज्य एक-दूसरे को दोष दे सकते हैं लेकिन जो राज्य विभाग को सबसे ज्यादा राजस्व देता है, वहां के नागरिकों का भी रेल सुविधाओं पर कोई हक तो बनता है लेकिन झारखंड की ओर तो रेल मंत्रालय कभी ध्यान ही नहीं देता.’

जहां तक रेलवे के कुल राजस्व में झारखंड के 40 प्रतिशत योगदान की बात है तो उसका हवाला कई संदर्भों से लिया गया है. झारखंड में ट्रेनों का संचालन पूर्व रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे और दक्षिण पूर्व रेलवे के अंतर्गत होता है, जिनमें से किसी का जोनल ऑफिस यहां नहीं है. हटिया रेल डिवीजन, रांची के मंडल रेल प्रबंधक गजानन मलय्या कहते हैं, ‘हमारा डिवीजन औसतन 35 करोड़ रुपये प्रति माह राजस्व देता है.’ धनबाद रेल मंडल के वाणिज्यक कर महाप्रबंधक दयानंद कहते हैं कि हमारे मंडल से औसतन प्रति वर्ष करीब 6000 करोड़ रुपये राजस्व दिया जाता है. वैसे धनबाद रेल मंडल के बारे में जानकारी यह है कि इसे देश के 60 रेल मंडलों में दूसरे नंबर का राजस्व मंडल माना जाता है. इस मामले में केवल बिलासपुर मंडल इससे आगे है.

यह हाल तब है जब बिहार के नेताओं का रेलमंत्री बनने का इतिहास रहा है. बिहार के नेताओं की पहली पसंद रेल मंत्रालय रहती है. हालिया वर्षों में ही बिहार के कोटे से जॉर्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार रेलमंत्री रहे हैं. लंदन से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ की कुछ पुरानी कतरनें बताती हैं कि संथालों ने क्षेत्र में रेल लाइन बिछाए जाने का विरोध किया था. इसके लिए जंग भी हुई थी. शायद संथाली तभी जान गए होंगे कि रेल के जरिए माल की ढुलाई तो दिन-रात होगी लेकिन ट्रेनें उनके लिए नहीं चलेंगी. आज भी झारखंड के कई हिस्से में लोगों की ऐसी ही धारणा है. यह धारणा शायद गलत भी नहीं है.

यूपी वाया गुजरात

2014 के आम चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा के मुद्दे भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उत्तर प्रदेश में चुनावी नैया के लिए खेवनहार चुनने में दोनों पार्टियों ने एक विशेष तरह का एका दिखाया है. दोनों दलों ने यह जिम्मा गुजरात से ताल्लुक रखने वाले नेताओं को सौंपा है. कांग्रेस ने जहां मधुसूदन मिस्त्री को प्रदेश चुनाव प्रभारी बनाया है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के खास सिपहसालार अमित शाह को चुनावी कमान सौंपी है. गुजरात के पूर्व गृहराज्य मंत्री शाह जहां अपने आक्रामक तेवरों के लिए जाने जाते हैं वहीं साबरकांठा से पूर्व सांसद मिस्त्री शांत रह कर संगठन को धार देने में माहिर माने जाते हैं. चुनावी प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि सियासी लड़ाई भले ही दो राजनीतिक पार्टियों के बीच हो, लेकिन साख गुजरातियों की दांव पर लगी है. वैसे यह भी संयोग ही है कि दोनों ही दलों ने पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के नेताओं के हाथ से प्रदेश का प्रभार लेकर गुजरात के नेताओं को सौंपा है.

कांग्रेस हो चाहे भाजपा, दोनों ही पार्टियों के पास प्रदेश से कई बड़े राष्ट्रीय नेता मौजूद हैं, इसके बावजूद चुनाव की कमान गुजरात के लोगों के हाथ क्यों सौंपी गई? जानकार इसके पीछे एक ही मजबूत कारण बताते हैं और वह है दोनों पार्टियों में पैर पसार चुका आंतरिक कलह. सबसे पहले बात कांग्रेस की. 2009 के लोकसभा चुनाव के समय पार्टी हाई कमान की ओर से गांधी परिवार के खास दिग्विजय सिंह को प्रदेश का प्रभारी बना कर भेजा गया. उस चुनाव में पार्टी के खाते में 80 में से 22 सीटें आईं. इस अप्रत्याशित जीत से कांग्रेस को तीन साल बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में आशा की एक किरण दिखाई दी. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी दिग्विजय सिंह को ही हाईकमान ने प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया. लेकिन इस बार स्थितियां 2009 वाली नहीं थीं. विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे को लेकर पार्टी कई खेमों में बंट चुकी थी.

पार्टी का संगठनात्मक ढ़ांचा तहस-नहस हो चुका था. स्थितियां यहां तक पहुंच गई थीं कि तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी व दिग्विजय सिंह के बीच भी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रह गए थे. सिंह पर सर्वमान्य होने के बजाय जाति विशेष का नेता होने के आरोप लग रहे थे  लिहाजा गुटबाजी अपने चरम पर आ गई थी. इसका खामियाजा पार्टी को प्रदेश में उठाना पड़ा. लोकसभा चुनाव में पार्टी ने जहां 80 सीटों में से 22 सीटों पर जीत हासिल की थी वहीं 2012 के विधानसभा चुनाव में 403 में से उसके खाते में महज 21 सीटें ही आईं. आलम यह था कि गांधी परिवार की सीटें अमेठी व रायबरेली भी गुटबाजी की भेंट चढ़ गईं. इस हार से कांग्रेस हाईकमान के सामने साफ हो गया था कि लचर संगठन और गुटबाजी के कारण ही लाख प्रयासों के बावजूद पार्टी को उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा.

जानकार बताते हैं कि पार्टी के संगठनात्मक ढ़ांचे को मजबूत न कर पाने और गुटबाजी को रोकने में नाकाम रहने के कारण ही गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले दिग्विजय सिंह को हाईकमान ने उत्तर प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखा दिया. पार्टी की गुटबाजी पर एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘समस्या यह है कि जिनके पास पद है उनका कोई कद नहीं है और जिनका कद है उनके पास कोई पद नहीं है.’ प्रदेश में पार्टी को इस समस्या से उबारने और 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली 22 सीटों को कम से कम सहेज कर रखने के लिए एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो संगठन को मजबूत करके गुटबाजी को कम करवाने का प्रयास कर सके.

पार्टी के ही एक दूसरे नेता बताते हैं, ‘मिस्त्री को संगठनात्मक ढांचे की तैयारी का जादूगर माना जाता है. इसका उदाहरण कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हाल ही में देखने को मिला है. कर्नाटक कांग्रेस की स्थिति भी उत्तर प्रदेश जैसी ही थी. वहां के संगठन को मजबूत करने के साथ ही प्रत्याशियों के चयन में मिस्त्री ने जमीनी स्तर पर काम किया, जिसका परिणाम रहा कि कांग्रेस को वहां सफलता मिली.’  प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता वीरेन्द्र मदान कहते हैं, ’28 जून को प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री के लखनऊ आने के बाद सबसे पहले काम संगठनात्मक ढांचे पर होगा ताकि पार्टी लोकसभा चुनाव में अच्छे परिणाम दे सके.’

भाजपा की स्थिति भी कांग्रेस जैसी ही दिखती है. बसपा व सपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियां जहां प्रत्याशियों के टिकट बांटकर लोकसभा चुनाव के प्रचार में जुट गई हैं वहीं भाजपा में अभी संगठन स्तर पर ही काम चल रहा है. राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी में गुटबाजी पर कुछ विराम लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पार्टी आज भी खेमों में बंटी हुई है. हर गुट अपने-अपने लोगों को लोकसभा टिकट दिलवाने के लिए आतुर है. 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खाते में 80 में से मात्र 10 सीटें आई थीं. इस बार मोदी फैक्टर के चलते जब सुगबुगाहट बढ़ी तो पार्टी से टिकट के दावेदारों की संख्या भी अचानक बढ़ गई है. पार्टी के एक एमएलसी बताते हैं, ‘टिकट के दावेदारों में मौजूदा सांसदों के अतिरिक्त वे विधायक भी हैं जो 2012 का विधानसभा चुनाव जीते हैं. इसके अतिरिक्त टिकट चाहने वालों की फेहरिस्त में कई पूर्व विधायकों व सांसदों के नाम भी शामिल हैं. ऐसे में सबको टिकट देकर खुश करना संभव नहीं है.’ सूत्रों की मानें तो पार्टी को डर है कि टिकट बंटवारे के बाद कहीं गुटबाजी खुल कर सामने न आ जाए जिसका खामियाजा चुनाव में पार्टी को उठाना पड़े. इसे ही ध्यान में रखते हुए प्रदेश के किसी बड़े चेहरे को चुनाव प्रभारी न बना कर गुजरात के अमित शाह को यह जिम्मा सौंपा गया है. मकसद यह है कि स्थानीय नेताओं के इर्द-गिर्द होने वाली गणेश परिक्रमा पर विराम लगाया जा सके.

जानकारों की मानें तो इस सबके अलावा पिछले कुछ समय से मोदी फैक्टर के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भी शाह को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है. पार्टी सूत्रों के अनुसार 80 लोकसभा वाले उत्तर प्रदेश से भाजपा को काफी उम्मीद दिख रही है इसलिए आक्रामक तेवरों वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मस्थली चुनते हुए लखनऊ, वाराणसी या किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर सकते हैं. ऐसे में मोदी के खास सिपहसालार शाह जहां शहरी तबके को गुजरात के विकास का एजेंडा बता कर प्रभावित करने का प्रयास करेंगे वहीं पर्दे के पीछे से हिंदुत्व की हवा को तेज करके एक खास वर्ग को पार्टी से जोड़े रखने के फॉर्मूले को बरकरार रखेंगे.

उधर, पार्टी का एक गुट मोदी व शाह के फॉर्मूले में कम यकीन रखता है. उसका तर्क है कि विधानसभा चुनाव में भी फायर ब्रांड उमा भारती को प्रदेश की कमान सौंपी गई थी, लेकिन चुनाव के बाद जो नतीजे आए वे बदतर थे. ऐसे में पार्टी जब तक गुटों में बंट कर चुनाव लड़ेगी तब तक परिणाम 2012 के विधानसभा चुनाव वाले ही निकलेंगे. इस वर्ग का मानना है कि मोदी या शाह कोई जादूगर नहीं हैं जिनसे अचानक किसी चमत्कार की उम्मीद की जा सके. शाह के प्रदेश प्रभारी बनाए जाने पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी बाहरी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया गया है. पिछले 15 सालों से ऐसा होता आ रहा है. जिस तरह यूपी के दूसरे नेताओं को बाहरी राज्यों का प्रभारी बनाया गया है उसी तरह शाह को उत्तर प्रदेश का.’

दोनों प्रभारियों का राज्य एक है लेकिन कार्यशैली अलग. अमित शाह को अपने आक्रामक तेवरों के लिए जाना जाता है तो मधुसूदन मिस्त्री को अपने शांत स्वभाव के लिए. ऐसे में देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जनता पर किस गुजराती का जादू चलेगा.