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भारत में शरणार्थियों की त्रासदी

अभी हाल में बीते शरणार्थी दिवस (20 जून) पर ही नही बल्कि लगभग हर दिन मैं एक अफगान परिवार के बारे में सोचती हूं जिसे मैं कुछ साल पहले नई दिल्ली में एक क्रॉसिंग पर मिली थी। उन्होंने पर्याप्त कपड़े पहने हुए थे लेकिन वे बेहद भूखे थे और मदद के लिए अनुरोध कर रहे थे। मैं उनसे बात करने के लिए रुकी तो एक दर्दनाक कहानी सामने आई। वे अपने देश में अच्छी तरह रह रहे थे जब तक परिस्थितियों ने उन्हें भारत आने के लिए मज़बूर नही कर दिया। वे यहां आकर शरणार्थी बन गए और उनका जीवन बर्बाद हो गया।

मैंने उनके एक कमरे के शरण स्थल का दौरा किया जो कि जंगपुरा इलाके की बाहरी बस्तियों में था। जहां उनके बच्चे बिना स्कूल और बढ़ते बच्चों की दैनिक ज़रूरतों के बिना जीवित रहने की कोशिश कर रहे थे। उनके अगले दरवाजे का पड़ोसी एक शरणार्थी अफगान परिवार था जो अपने सीमित साधनों और भारतीय समाज के बहिष्कार के साथ जीवित रहने की कोशिश में लगा था। यहां उनके जीवन की एक कठिन त्रासदी दिखी जैसा उन्होंने बताया कि वे इस धारणा के तहत भारत आए थे कि ”अच्छे लोगों के साथ भारत एक बड़ा विशाल देश है। लेकिन हमें यहां शक की नज़र से देखा जाता है। हम अफगानों के प्रति फैली अनेक कहानियों के कारण। हमें दूर रखा जाता है। हम नही जानते कि हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा। हमने कभी कल्पना नही की थी कि हम ऐसे दिन भी देखेगें और विदेशी धरती पर हमारा जीवन भिखारियों से भी बदत्तर होगा। हमारे घरों में सब कुछ था पर अब घर कहां है। हमारे लिए कहीं भी कोई घर नहीं है।

इस शरणार्थी परिवार की त्रासदी या शरण के लिए भटक रहे किसी भी शरणार्थी के मामले को शब्दों में लिखना मुश्किल है। वे जीवित हैं बल्कि ज़रूरी बंदोबस्त के बिना छोटी बस्तियों में जीवन जीने के लिए उन्हें मज़बूर किया जाता है। उनके लिए यह मुश्किल ही नही बल्कि असंभव भी है कि वे मदद के लिए याचना, अनुरोध करें या गिड़गिड़ाएं यदि स्थानीय आबादी उनके साथ कुछ मदद करना ही नहीं चाहती हो। विडंबना यह है कि नई दिल्ली के आधे से अधिक निवासियों के माता-पिता या दादा-दादी ने विभाजन के भय और इसके परिणाम को देखा है। परन्तु जब आज के शरणार्थियों की बात आती है तो वे घबरा जाते हैं।

यह लिखना ज़रूरी नहीं कि हर समय हमारे देश में पाखंड का स्तर ऊंचा रहा है। कोई भी इस प्रकार का तमाशा और खोखले भाषण ‘वर्ल्ड रिफ्यूजी डेÓ पर सुन सकता है लेकिन जैसे ही यह दिन खत्म होता है तब सब खत्म हो जाता है। हम असहाय शरणार्थियों को परेशान करने, उनकी खिल्ली उड़ाने के लिए वापस आ जाते हैं।

यह सब मुझे यह लिखने के लिए मज़बूर कर रहा है कि दक्षिणपंथी भाजपा की सरकार केंद्र में है इस कारण शरणार्थी समस्या और गंभीर हो जाती है खास तौर पर यदि शरणार्थी मुसलमान हों। असल में जब पिछले साल भाजपा सरकार ने रोहिग्यां शरणार्थियों के साथ आतंकी होने का ‘टैगÓ लगा कर उसे खूब उछाला तो एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन और उसके सहयोगियों ने ऐसे तथ्य पेश किए जिनसे साफ हो गया कि उन शरणार्थियों की तरफ से देश की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। एनडीटीवी के पत्रकारों ने चार स्थानों से रिर्पोटिंग की, ये स्थान थे- जम्मू, फरीदाबाद, राजस्थान और नई दिल्ली। उन्होंने वहां विभिन्न पुलिस अफसरों से बात की और पुलिस ने कैमरे पर बताया कि किसी भी शरणार्थी का आईएसआईएस, अलकायदा, इंडियन मुजाहिदीन और जिहादियों से कोई संबंध नहीं है।

एनडीटीवी की वेबसाइट से पता चलता है कि भारत में जहां भी रोहिंग्या लोग रह रहे हैं, वहां उनके किसी आतंकवादी संगठन या अपराधी गैंग के साथ होने के कोई सबूत नहीं मिले हैं। ज़्यादातर रोहिंग्या जम्मू, दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा में बसे हैं। सबसे अधिक रोहिंग्या जिनकी संख्या 5,743 है, जम्मू में बसे हैं। इस साल 20 जनवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में बताया था कि जम्मू-कश्मीर में रहने वाला कोई भी रोहिंग्या किसी प्रकार की आतंकी कार्रवाई में शामिल नहीं है। उन्होंने बताया कि रोहिंग्या के खिलाफ गैर कानूनी तौर पर सीमा पार करने जैसे आरोपां के साथ 17 एफआरआई दर्ज हैं।

एनडीटीवी को पता चला कि इनमें 17 एफआईआर में से दो बांग्लादेशियों के खिलाफ, और एक पाकिस्तानी के खिलाफ। इसलिए 5,743 रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ मात्र 14 एफआईआर हैं। रिपोटरों ने इन एफआईआर को खंगाला तो पाया कि इनमें आठ मामले वीज़ा के, दो मामले बलात्कार के, एक मामला गाए काटने का, एक मामला मारपीट का, एक ब्लैक मार्केट में सामान बेचने का और एक रेलवे संपत्ति को बेचे जाने का था। ये आंकडे उससे मेल खाते हैं जो जम्मू में वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने एनडीटीवी को दिए थे। जम्मू के आईजी डा. एसडी सिंह ने कहा, ”हमें इन के खिलाफ कोई भी गंभीर आपराधिक मामला नहीं मिला है। न ही इनकी कोई संगठनात्मक आपराधिक गतिविधियां सामने आई हैं।ÓÓ

दिल्ली में लगभग 1,000 रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनके पास इस बात को कोई आंकडा नहीं है कि शरणर्थियां के खिलाफ कितने मामले दर्ज हुए हैं। पुलिस को इन लोगों के किसी आतंकी गुट से संबंधित होने की संभावना नज़र नही आ रही। उनके खिलाफ केवल एक एफआईआर है वह भी बलात्कार की जो कि एक रोहिंग्या महिला ने हरियाणा में दर्ज कराई है। रोहिंग्या मुसलमान फरीदाबाद और मेवात में रह रहे हैं। फरीदाबाद और चंडीगढ़ दोनों ही स्थानों की पुलिस ने इन रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ किसी आपराधिक मामला दर्ज होने से इंकार किया है।

मुझे हैरानी है कि हम कभी बैठ कर इस तरह की घटनाओं पर चर्चा क्यों नहीं करते। आज आप एक आलीशान बंगले में रह रहे हैं पर कल आपको वहां से निकाल दिया जाता है आप उजड़ जाते हैं। आप अपने ही देश में शरणार्थी बने लोगों को अनदेखा नहीं कर सकते। यह कोई परीकथा नहीं अपितु कड़वी सच्चाई है। आज सैकड़ों पंडित कश्मीर घाटी से उजड़ कर देश में भटक रहे हैं। आज सैंकड़ों मुस्लिम घरों से उखड़ कर पश्चिम उत्तरप्रदेश में तंबू लगाकर रह रहे हैं। इसी तरह हज़ारों आज असाम में खौफ के साए में जी रहे हैं।

इन हालात में भरोसा नहीं कल आप भी शरणार्थी का ‘टैगÓ लगाने पर मज़बूर कर दिए जाएं।

जेल के अंदर चलीं गोलियां बेटे ने लिया पिता की हत्या का बदला!

बागपत जेल में इसी महीने एक कैदी मुन्ना बजरंगी को दूसरे कैदी सुनील राठी ने गोलियों से भून डाला। एक सप्ताह पहले उसकी पत्नी ने कहा था कि मुन्ना बजरंगी की जान को खतरा है। पुलिस ने अपराधी को तत्काल पुलिस हिरासत में ले लिया है। जेल में हुई इस हत्या को राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गंभीर बताया और उन्होंने जांच के आदेश भी जारी कर दिए। जेल के चार अधिकारी भी मुअतल किए गए हैं।

कहते हैं कथित हत्यारे ने अपने पिता की हत्या का बदला छह महीनों में ले लिया। उसके पिता नरेश राठी तब बागपत जिले की टीकरी नगर पंचायत  के अध्यक्ष थे जब दिसंबर 1999 में उसकी हत्या हुई। सुनील तब 21 साल का था। राठी पिछले साल की जुलाई 31 से बागपत जेल में था। गोलियों की आवाज़ पर मौका-मुआयने से .762 बोर के दस खाली खोखे और कुछ गोलियां मिलीं। इस पूरे मामले की तितरफा जांच हुई। एक तो जेल अधिकारियों द्वारा, एक मजिस्ट्रेट छानबीन और एक न्यायिक जांच। जेल के जिन अधिकारियों को सस्पेंड किया गया उनमें हैं – जेलर उदय प्रताप सिंह, उप जेलर शिवाजी यादव, हेड वार्डेन अरजिंदर सिंह और वार्डेन माधव कुमार।

मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में हत्या करने वाला सुनील राठी हत्या के दो मामलों में उम्रकैद की सज़ा काट रहा है। बागपत में एक हत्या उसने और दूसरी रूड़की में एक व्यापारी की थी। क्योंकि ये उसकी मांग पर रकम नहीं दे पा रहे थे। इनके अलावा दो और हत्याओं के आरोप उस पर है। उस पर गैंगस्टर एक्ट के तहत तीन मामले और चार एक्स्टारशन के मामले भी हैं। राठी को अब फर्रूखाबाद की सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।

पुराने राग-द्वेष, हत्याओं के मामलों के चलते सुनील राठी ने बहुत करीब से गोलियां चला कर मुन्ना बजरंगी की हत्या की। एक जेल में हुई इस हत्या पर ढेरों सवाल उठ रहे हैं। यह हत्या जेल के अंदर एक दूसरे कैदी द्वारा की गई।

पूर्वाचल यानी उत्तरप्रदेश व बिहार के इलाकों में गरीबी, अविकास और बाहुबलियों के लिए ख्यात रहा है। जो लोग बाहुबली और धनपति होने के नाते राजनीति में अपनी आकांक्षाएं आजमाते हैं। उनकी छवि पहले तो अपने समुदाय के लोगों में उनके अपने सेवक के रूप में बनती है फिर यही उभरती है उन्हें अपने कंधों पर हमेशा रखने में। राजनेता बनने के पीछे इनका मूल मकसद होता है अपनी छवि सुधार कर समाज की मुख्यधारा में आना। वे चाहते हैं जो वर्दीधारी उन्हें गिरफ्तार करने या मार देने के लिए तैयार थे। वे ही अब उन्हें सेल्यूट करते भी दिखें।

जौनपुर पूर्वी उत्तरप्रदेश में बहुत ही पिछड़े, गरीबों और पुराने रईसों का मशहूर केंद्र रहा है। इसी जिले के पूरदयाल गांव का था प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी। उसमें बारूद को दागने की गजब पहचान थी। बचपन से ही उसे पिस्तौल और बंदूकों  का खेल भाता था। उम्र के साथ ही उसने निशाने पर गोली चलाना सीख लिया। इसके बाद या तो वह राजनेता बनता या पुलिस के हाथों मारा जाता। मुन्ना बजरंगी पुलिसिया तैनातगी के बावजूद जेल के अंदर मारा जाता। अपराध पैंतीस साल ही अपराध में उसकी सक्रियता के रहे। उस पर हत्या के दो दर्जन मामले और वसूली के ढेरों मामले थे।

एक गरीब किसान के घर में 1964 में जन्मे प्रेम सिंह का पढ़ाई-लिखाई में कभी मन नहीं लगा। वह बमुश्किल पांचवीं कक्षा तक पढ़ा फिर उसने पढऩा छोड़ दिया। उसकी दिलचस्पी कुश्ती लडऩे और दोस्तों के साथ घूमने में थी। बाद में  उसने कालीन के एक व्यापारी के यहां नौकरी कर ली। उसका अपराधी बनना 1982 से शुरू होता है। हाथा-पाई, मारपीट, लूट पाट और धमकी देने का सिलसिला पहले चला। इसी दौरान उसने अपना बकाया न पाने पर कालीन के व्यापारी की हत्या एक दिन कर दी। उसके बाद तो उसका अपराधी जीवन ही शुरू हो गया।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उसे मुंबई से गिरफ्तार किया। तब वह एक खूंखार अपराधी बन चुका था। उत्तरप्रदेश पुलिस के अनुसार 90 के दशक में वाराणसी पहुंचा। उसका परिचय एक छात्र नेता अनिल ङ्क्षसह से हुआ जिस पर अनेक आपराधिक मामले थे। वह आगे चल कर वाराणसी में डिप्टी मेयर बना और मुन्ना बजरंगी उसका शैडो। धीरे-धीरे उसका परिचय कृपा चौधरी से हुआ। उन दिनों यह एक बड़ा नाम था और मुख्तार अंसारी उसी की देखरेख में अपराधी और राजनेता बन रहे थे। करीब दस साल ये सहयोगी रहे। एक दशक में वाराणसी-जौनपुर में इन्होंने न जाने कितनी हत्याएं की। अंसारी ने बजरंगी का इस्तेमाल अपने प्रतिद्वंद्वियों की हत्या कराने में कभी किया। अंसारी को रेलवे और सरकारी महकमों से कांट्रैक्ट दिलाने में भी बजरंगी ने खासी मदद की। स्थानीय व्यापारियों और कोयला बाज़ार से वसूली भी जारी रही।

बजरंगी ने 1995 में स्थानीय बाहुबली छोटे सिंह और बड़े सिंह को वाराणसी में मारा। अंसारी के साथ उसकी खटपट तब बढ़ी जब उसने सुपारी लेकर हत्या का काम शुरू किया। कथित तौर पर उसने भाजपा के राजनीतिक रामचंद्र सिंह को उनके बाडीगार्ड के साथ 1996 में मारा। उसकी खासियत थी वह दिन दिहाड़े भीड़ भरे बाज़ार में गोली चलाता था। वह घर में घुस कर भी लोगों की हत्या करता था।

उत्तरप्रदेश एसटीएफ और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक अभियान में 1998 में समयपुर बादली के पास हुई मुठभेड़ में बजरंगी को 17 गोलियां लगी थीं। जिनमें से ज्य़ादातर शरीर में जख्म बनाती बाहर निकल गई थीं। उसे पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। जैसे ही डॉक्टर ने उसकी जांच की तो शरीर में जि़ंदगी थी। वह सांस ले रहा था। वह जेल गया । वहां से ही अपना धंधा चलाता था। बाद में उसे जमानत मिली। वह इसलिए भी रिहा हो जाता था क्योंकि गवाह उससे दहशत खाते थे।

इसी दौरान अपने बचपन के एक साथी की साली सीमा से उसका प्रेम प्रसंग चला और उसने शादी की। साल भर बाद उसका बच्चा जन्मा। उस समय वह भी दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल में भर्ती था। वह एक मुठभेड़ में घायल होकर अस्पताल पहुंचा था। यहां से ठीक होने पर उसने फिर कई हत्याएं कीं।

उसने व्यापार में भी हाथ आजमाया। गंगा किनारे पुराने मकानों को खरीदने और उन्हें बाज़ार की कीमत पर बेचता। वह डाक्टरों से फिरौती भी लेता। कथित तौर पर उसने अंसारी के कहने पर मोहम्मदाबाद से कृष्णानंद राय की हत्या की। अंसारी और बजरंगी दोनों का नाम एफआईआर में था। अंसारी गिरफ्तार हुए। वे अभी भी बांदा जेल में हैं।

लेकिन उस हत्या के बाद बजरंगी भूमिगत हो गया। चार साल उसने अपराध नहीं किया। उसकी गिरफ्तारी 2009 में मुंबई में मलाड से हुई। उधर अंसारी जेल से चुनाव लड़ते और लगातार जीतते रहे। इस दौरान उनकी बजरंगी में रु चि भी कम हो गई। बजरंगी ने जौनपुर में मरीयाहू से अपना दल के टिकट पर 2012 में चुनाव लड़ा। वहां वह तीसरे नंबर पर रहा। उसकी पत्नी सीमा ने 2017 में चुनाव लड़ा। लेकिन वह भी हार गई। राजनीति में मुन्ना बजरंगी के कामयाब न होने की सबसे बड़ी वजह यह रही कि एक तो वह पढ़ा-लिखा नहीं था, दूसरे उसका दिमाग उतना तेज़ नहीं था जितना अंसारी का है और तीसरे उसका अपना कोई गॉडफादर नहीं था। उसे लगता था कि पैसा फेंकेंगे तो लोग वोट देंगे।

आखिर पकड़ा गया गैंगस्टर दिलप्रीत

अपने आप में यह एक अलग ही मामला है। जिसमें कुख्यात गैंगस्टर दिलप्रीत सिंह उर्फ़ बाबा पुलिस की हिरासत में होने के वाबजूद भी चंडीगढ पुलिस ने चार दिन तक गिरफ़्तारी नहीं दिखाई और न ही अदालत में पेश किया। यह स्थिति तब है, जबकि दिलप्रीत पुलिस हिरासत से फऱार अपराधी है और उसके विरुद्ध लगभग दो दर्जन छोटे बडे मामले दर्ज हैं। पंजाब हरियाणा और चंडीगढ पुलिस ने उसे वांछित अपराधियों की श्रेणी में रखा हुआ है। उसके विरुद्ध हत्या, हत्या के प्रयास और फिरौती वसूल करने जैसे संगीन आपराधिक मामले भी शामिल हैं। वर्ष 2016 में दिलप्रीत पुलिस को चकमा देकर हिरासत से भाग निकला था।

चंडीगढ के सेक्टर 38 स्थित गुरुद्वारे के बाहर दिन दिहाडे भीड़ भाड़ वाली सड़क पर सरपंच सतनाम सिंह की गोलियाँ मार कर हत्या करने और  पंजाबी  सिंगर परमीश वर्मा पर फिरौती के लिए जानलेवा हमला करने और उसके बाद पुलिस को धमकाने के कारण सुर्खियों में आया कुख्यात गैंगस्टर दिलप्रीत उर्फ बाबा आखिरकार कई दिनों की आंख मिचौली के बाद सोमवार नौ जुलाई को पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया। उसे 9 जुलाई की दोपहर को सेक्टर 43 के बस अड्डे के पास एक गुप्त सूचना पर पंजाब और चंडीगढ़ पुलिस ने मुकाबले के बाद पकड़ लिया। वह कार से बस अड्डे की तरफ किसी से मिलने आया था लेकिन पुलिस से खुद को घिरा देख उसने फायरिंग की, इसी दौरान जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने उसके पट्ट में एक गोली मार दी। जोकि उसके पट्ट की हड्डी तोडकर निकल गई। दिलप्रीत को भारी सुरक्षा के बीच पीजीआई में भर्ती करवाया गया। उसे पीजीआई में आप्रेशन के बाद प्राईवेट रुम में रखा गया है। यहाँ पर उसकी सुरक्षा में लगभग दो दर्जन कमांडो रात-दिन पहरा दे रहे थे। मौका-ए-वारदात से पुलिस ने एक पिस्तौल, जिंदा कारतूस, चले कारतूस और एक स्विफ्ट डिजायर गाड़ी को कब्ज़े में लेकर दिलप्रीत पर एक और मामला चंडीगढ सेक्टर 36 पुलिस थाने में दर्ज कर दिया।

चंडीगढ सेक्टर 36 पुलिस थाना कर्मियों ने चार दिन बाद दिलप्रीत को पीजीआई से डिस्चार्ज करवा कर गिरफ्तारी डाल कर शुक्रवार को सेक्टर 43 की जिला अदालत में पेश कर दो दिन का पुलिस रिमांड प्राप्त किया।

दिलप्रीत अपनी गर्लफ्रेंड के साथ चंडीगढ़ सेक्टर 38 में पिछले एक साल से रह रहा था। वह बिना किसी रोक टोक के चंडीगढ़ से हेरोइन तस्करी का धंधा चला रहा था। मौके पर दिलप्रीत की जो गाड़ी बरामद हुई है उसमें नकली दाढ़ी और मूछें मिली हैं। केशधारी दिलप्रीत ने अपने बाल और दाढ़ी छोटी करवा ली थी और पगड़ी की जगह टोपी का इस्तेमाल कर रहा था। वो अपना वेश बदलकर चंडीगढ में रह रहा था।

वह रुपिंदर कौर के साथ उसके मकान में ठहरता था। यहां तक कि दिन-रात हर समय खुलेआम घूमता रहा। उसने लोगों को बता रखा था कि वह रुपिंदर का पति है। चंडीगढ़ के सभी पर्यटन स्थल सहित सिनेमा हॉल व अन्य मार्केट्स में दिलप्रीत घूमता रहा, परन्तु यूटी पुलिस विभाग के इंटेलीजेंस विंग, सीआईडी, क्राइम ब्रांच पुलिस और ऑपरेशन सेल सहित संबंधित थाने की बीट पार्टी के पुलिसकर्मियों को भी यह पता नहीं लग सका।

गैंगस्टर दिलप्रीत अपने एक दोस्त के जरिए वर्ष 2014 में पहली बार गर्लफ्रेंड हरप्रीत कौर के संपर्क में आया था। इसके बाद उनकी नजदीकियां बढ़ी और दिलप्रीत ने हरप्रीत कौर के घर आना-जाना व रहना तक शुरू कर दिया। उनके बीच नजदीकी संबंध बने और इसके बाद दिलप्रीत ने हरप्रीत कौर की छोटी बहन रुपिंदर कौर से नजदीकियां बढ़ाईं। बीते वर्ष रुपिंदर कौर चंडीगढ़ में शिफ्ट हो गई। उसके बाद से गैंगस्टर दिलप्रीत उर्फ बाबा भी उसके सेक्टर-38 स्थित मकान में उसका पति बनकर रहने लगा। दिलप्रीत के विरुद्ध सेक्टर 39 पुलिस थाने में ही सरेआम सरपंच सतनाम सिंह की गोलियाँ मार कर हत्या करने का मामला दर्ज हैं, लेकिन सेक्टर 39 पुलिस को फिर भी यह जानकारी नहीं मिल पाई कि जिस गैंगस्टर को पकडऩे के लिए वह जगह जगह छापेमारी कर रही है, वह उनकी नाक के नीचे आज़ाद घूम रहा है।

दिलप्रीत,रुपिंदर कौर के साथ सेक्टर-38 के उक्त मकान नंबर में बतौर किराएदार लंबे समय से रह रहा था। लेकिन मकान मालिक ने उनकी पुलिस वेरिफिकेशन ही नहीं कराई, जबकि इसी मकान से वह नशा सामग्री सहित अन्य गैर-कानूनी गतिविधियां जारी रखे हुए था। सैक्टर-38 में जिस जगह रुपिन्द्र कौर ने किराए पर मकान लिया हुआ है, उसकी पिछली साइड पर ड्रंकन ड्राइविंग का नाका भी लगता है और जब्त की गई गाडिय़ों भी वहां खड़ी की जाती थी। ऐसे में लोगों ने कहा कि जब वहां लाइट चली जाती थी तो दिलप्रीत के पास जो पहले लांसर होती थी, वह उस गाड़ी में एसी ऑन करके बैठा रहता, जबकि उसके बिलकुल सामने पुलिस ने ड्रंकन ड्राइविंग का नाका लगाया होता था।

स्टेट स्पेशल ऑपरेशन सेल, मोहाली पुलिस को गैंगस्टर दिलप्रीत सिंह उर्फ बाबा की गर्लफ्रेंड रु पिंदर कौर के सेक्टर 38 स्थित घर से दिलप्रीत का एक बैग मिला है। बैग से पुलिस को सेक्सवर्धक 16 गोलियां, कंडोम, मूसली, हुक्का और खसका मिला। पुलिस दिलप्रीत सिंह की दोनों महिला मित्रों हरप्रीत कौर और रु पिंदर कौर से पूछताछ में जुटी है। दिलप्रीत की गर्लफ्रे ड और उसकी बहन को कोर्ट ने पांच दिन के रिमांड पर भेजा है। उसकी गर्लफ्रेड के घर से गन, पिस्टल, गोलियां और 13 गाडिय़ों की नंबर प्लेट मिली हैं। गर्लफ्रेड हरप्रीत नवांशहर से पकड़ी गई थी।

सेक्टर 38 गुरूद्वारे के बाहर हुई सरपंच सतनाम सिंह की हत्या के बारे में दिलप्रीत ने कहा कि उन्हें मंजीत सिंह उर्फ बॉबी लेकर आया था। पहले से ही तय कर रखा था उसका पैरों पर ही गोली मारनी थी। कत्ल नहीं करना था। लेकिन वह मर गया। मंजी के दादा का सरपंच सतनाम से ट्रासपोर्ट को लेकर झगड़ा हुआ था।

चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और पश्चिम बंगाल पुलिस का मोस्टवांटेड इनामी गैंगस्टर हरविंदर सिंह उर्फ रिदा दिलप्रीत के संपर्क में था। चंडीगढ़ में ही दोनों मुलाकात करते रहे। रिदा चंडीगढ़ में अपनी गर्लफ्रेड मनप्रीत कौर के साथ होटल माउंटव्यू में आता रहा है। तीन बार वह होटल माउंटव्यू में दो-दो दिन के लिए रूका। पीयू का एक स्टूडेंट रिदा के लिए ऑनलाइन कमरे बुक करता था। यहीं स्टूडेंट रिंदा को होटल में आकर पैसों का बैग देता था। पुलिस को शक है कि स्टूडेंट ङ्क्षरदा के लिए फिरौती का काम करता है। उसकी तलाश अब पुलिस ने शुरू कर दी है। होटल की सीसीटीवी रिकार्डिग भी हासिल कर ली है। दिलप्रीत ने बताया कि उसकी तरह रिंदा ने भी अपना पूरा लुक बदल लिया है। पुलिस को दिलप्रीत के मोबाइल से रिंदा की अब की तस्वीरें मिली हैं। इसके साथ ही खुलासा हुआ है कि रिंदा उत्तराखंड में जगह बदल-बदलकर रह रहा है।

गैंगस्टरों के सफाए में जुटी पंजाब पुलिस की इस बड़ी कामयाबी पर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह संतुष्ट हैं और उन्होंने ऑपरेशन को अंजाम देने वाली टीम की पीठ थपथपाई। उन्होंने ट्रवीट कर कहा कि कानून को अपने हाथ में लेने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

अदालतों ने फूंकी दिल्ली के पेड़ों में प्राण वायु

दिल्ली फिर बच गई, तकरीबन सत्तरह हज़ार अच्छे मजबूत और लगभग तीस-चालीस साल पुराने हरे पेड़ों से मरहूम होने से। मेट्रो ट्रेन की विकास योजनाओं में हजारों हजार पेड़ दिल्ली और आसपास काट दिए। प्रेरणा प्रसाद और प्रदीप कृष्ण की तरह दिल्ली के सक्रिय नागरिकों के जनमुहिम छेडऩे और एनजीटी और दिल्ली हाईकोर्ट की बदौलत दिल्ली में सांस लेने के लिए हरे फेफड़े हाल-फिलहाल बच सके हैं। अन्यथा अफसर शाही और मंत्री अपनी सुविधाओं के लिए इन्हें कटवाते और दिल्ली में और तबाही ला ही देते। इस मुहिम में सक्रिय प्रेरणा प्रसाद से ‘तहलकाÓ संवाददाता परी सैकिया की बातचीत के कुछ अंश।

              क्या आप पेड़ों को काटे जाने की मुहिम को दिल्ली का ‘चिपको आंदोलनÓ कहना चाहेंगी?

              दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की यह योजना थी कि पुनर्विकास के बहाने सेंट्रल दिल्ली के पेड़ काट डाले जाएं। यह एक बड़ा फैसला था। हमने तय किया कि पानी, वायु और गंदगी से प्रदुषित इस दिल्ली को इसके हरे पेड़ों को न काटने दिया जाए। हमने सिटिजेन फार ट्रीज और ईको प्लोर डॉट.काम के जरिए अपनी बात दिल्ली के तमाम विद्यालयों और नागरिकों के सामने रखी। देखते-देखते हमने देखा कि हमारा आंदोलन इस शहर के नागरिकों का यहां के बच्चों और छात्रों का अपना आंदोलन बन गया है। नगर की हरियाली बनी रहे, जितनी भी है वह बची रहे कम से कम अगली पीढ़ी के लिए यह हमारा मकसद था। यह हम सब की नैतिक जि़म्मेदारी है इसलिए हर नागरिक पेड़ों को काटने से बचाने के लिए हमसे जुड़ा। सब इस बात से सहमत थे कि हम यदि हरियाली की चिंता आज नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा?

              और हम सबने 17 जून (रविवार) से अपना आंदोलन शुरू किया। हमारे साथ लोग जुड़ते रहे और कारवां बनता गया। हम सब पेड़ों के काटे जाने से रोकने की मांग पर अड़े रहे। इस आंदोलन को चलाए रखने के लिए दिल्ली के नागरिकों ने हर तरह का सहयोग किया। पहले दिन हमने डीएमएस बूथ सरोजिनी नगर पुलिस स्टेशन पर प्रदर्शन किया। लोगों में खासा उत्साह दिखा और पूरे आंदोलन में साथ देने के लिए एकजुट भी रहे। आज भी वे हमारे साथ हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोगों का जुटना एक बड़ी बात थी।

              आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय तो यह दावा कर रहे हैं कि वे कालोनी के पुनर्विकास की प्रक्रिया में जुटे हैं और उनकी कोई योजना नहीं है कि एक भी पेड़ न काटने पड़े। दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 जुलाई तक पेड़ों के काटे जाने पर रोक लगा दी। लेकिन ठेकेदार तो तैयारी में ही नज़र आ रहे हैं।

              दरअसल सरकार कहती कुछ है और करती कुछ है। सरकार और उसके लोग पूरी कोशिश पहले दिन से करते रहे हैं कि कैसे प्रर्दशनकारियों में फूट डाली जाए। ये अपने घरों को जाएं और इस बात सोचें कि अब पेड़ नहीं कटेंगे। लेकिन हमने देखा, हाईकोर्ट की और एनजीटी की रोक के बावजूद पेड़ों का कटना जारी रहा। हमने संघर्ष जारी रखा कि जब तक हाईकोर्ट, एनजीटी और सरकार साफ-साफ यह नहीं कहती कि हम अपना फैसला लेेते हैं। हम यहीं डटे रहे।

              यह आंदोलन जो 17 जून से शुरू हुआ इसमें बाद में राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल हो गए। आपका क्या कहना है?

              कुछ राजनीतिक दलों ने ज़रूर इस आंदोलन को अपनी राजनीति का मोहरा बनाया है। उन्हें इस आंदोलन से लाभ ही है वे हमारे प्रति हमदर्दी दिखाते हैं। हम वह तो नहीं चाहते कि वे सिर्फ इस आंदोलन में इसलिए आएं कि वे दिखा सकें कि हमारे बीच वे भी हैं और टीवी चैनेल को अपनी वाइट देकर लौट जाएं। लेकिन हमारी यह इच्छा ज़रूर है कि पेड़ों को कटने से रोकने के लिए ये लोग एक ज़रूरी हल ढूंढें। यह सिर्फ दिल्ली नहीं बल्कि तमाम गांवों और शहरों  के लिए यह एक ज़रूरी मामला है। इस पर रोक की मांग हर कहीं होगी लेकिन वे ऐसा समाधान निकालें कि उनकी विकास परियोजना की अवधि के भीतर ही मजबूत, हरे और उपयोगी पेड़ भी तैयार हुए।

              आपने सिटिजन आंदोलन से कैसे सोशल आरगेनाइजेशन को जोड़ लिया?

              इसके लिए मुझे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। मैंने सुना कि सत्ररह हज़ार से भी ज्य़ादा मजबूत और हरे-भरे पेड़ काट दिए जाएंगे तो कई  सामाजिक संगठन इसका पहले से विरोध कर भी रहे थे। मैंने एवाट्सएप ग्रुप बनाया और हर किसी से इस आंंदोलन से जुडऩे का अनुरोध किया। हमने एकता जताई और हम सभी लड़े और जीते भी।

              यह मुद्दा महत्वपूर्ण क्यों था?

              हर किसी को साफ शुद्ध हवा सांस लेने के लिए चाहिए। हम बिना साफ शुद्ध हवा के कैसे जीवित रह सकेंगे। इस साफ शुद्ध हवा की ज़रूरत राजनीतिक, नौकरशाह और मजदूर को भी है। पेड़ हवा की शुद्धता और सफाई में सहयोग करते हैं।

              आप देश के किसी भी गांव- शहर में भीषण गर्मी, बेहद बारिश, और बेहद सर्दी पर किसी से भी बात करें तो वह यही कहता है कि पूरे देश से पेड़ों को अंधाधुंध काट डालने से ऐसा हुआ है। पूरे देश का पर्यावरण चौपट हो गया है इसके लिए हम कम लेकिन मंत्री, नौकरशाह और नेता ज्य़ादा जिम्मेदार हैं। पूरे देश में पेड़ बचाने का आंदोलन होना चाहिए।

              क्या आप इस आंदोलन को पूरे देश में तेज़ करेगी?

              हां, ज़रूर। हाई वे बनाया जाना है चारधाम को आपस में जोडऩे के लिए। कमज़ोर पहाडिय़ों क्या हाईवे का वज़न सह सकेंगी। जब पेड़ कट जाएंगे तो पहाडिय़ों को कौन संभालेगा जब धंसने लगेंगी।

क्या था एनजीटी का आदेश

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शुरू में ही अपने आदेश में कहा था कि दक्षिण दिल्ली की सात कालोनियों में जो पेड़ हैं वे कतई न काटे जाएं। यह आदेश नेशनल बिल्डिंग्स कांस्ट्रक्शन कारपोरेशन (एनवीसीसी) और सेंट्रल पब्लिक वक्र्स डिपार्टमेंट को दिए गए हैं। साथ ही यह ताकीद की गई हैकि अगले आदेश तक यथा स्थिति रहे।

एनजीटी की बेंच की अध्यक्षता जस्टिस जावेद रहीम कर रहे थे। वे एनजीटी के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने गृह और शहरी मामलों के मंत्रालय को इस संबंध में नोटिस भी जारी किए हैं। ये नोटिस सेंट्रल पाल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन को भी जारी किए गए हैं। उनसे 19 जुलाई तक अपनी बात रखने को कहा गया है।

चूंकि यह मामला हाईकोर्ट में भी है इसलिए यदि प्रस्तावित तौर पर 17 हजार पेड़ काटे जाते हैं तो इसका पर्यावरण पर गहरा असर पड़ेगा। एनजीटी ने सभी संबंधित महकमों से मांग की वे बताएं कि कितने पेड़ काटने की उनकी योजना है।

उधर दिल्ली में सरकार चला रही आप के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने केंद्र पर आरोप लगाया है कि इसने एनजीटी को यह जानकारी नहीं दी है कि नए सिरे से परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। उन्होंने शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी के बयान का हवाला दिया कि उन्होंने वादा किया था कि एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। उन्होंने कहा कि अदालत में एनबीसीसी के वकीलों का कहना था कि वे अपनी परियोजना को रि-डिजाइन कर रहे हैं। लेकिन वे तो याचिका का ही विरोध करते रहे और रि-डिजाइन की बात ही नहीं की। केंद्र से आप का यही अनुरोध भी रहा है।

दिल्ली में यों भी मेट्रो और अन्य हाउसिंग कार्यक्रमों के चलते पेड़ों की तादाद बेहद कम हो गई है। अच्छे मजबूत पेड़ों को इतनी बड़ी तादाद (1700 से ऊपर) काटने पर अमल रूकवाने के लिए गैर सरकारी संस्था सोसाइटी फार प्रोटेक्शन ऑफ कल्चरल हैरिटेज, पर्यावरण, ट्रैडीशनस एंड प्रमोशन ऑफ नेशनल अवेयरनेस, ग्रीन सर्किल और शहर के सक्रिय कार्यकर्ता उत्कर्ष बंसल ने प्रस्तावित 17000 पेड़ों को गिराने और दक्षिण दिल्ली की कालोनी का परिदृश्य बदलने की योजना पर अमल का विरोध किया। इसमें तर्क दिया गया था कि जनरल पूल की सात रेजिडेंशियल कालोनीज से बिना पर्यावरण पर संभावित असर पर बात किए बगैर ही काम शुरू कर दिया गया।

याचिका दायर करने वालों को कहना था कि किसी और जगह पौधे लगा देने से वनीकरण की संभावना नहीं बनती। यों भी बड़े पैमाने पर दिल्ली शहर के फेफड़ों की तरह काम कर रहे हरे और मजबूत पेड़ जो बीस -तीस साल के होंगे उनके न रहने पर पर्यावरण विनाश ही होगा।

डालर की तुलना में लुढ़कता रुपया

एक ज़माना वह भी था जब देश के रुपए की कीमत काफी ज्य़ादा थीं। आज एक डालर की कीमत लगभग 69 रुपए मात्र है। अब एक डालर के बदले तकरीबन 69 रुपए मात्र देने होते हैं। इसका मतलब है कि अमेरिकी डालर के मुकाबले रुपया लगातार लुढ़कता गया है। इसका व्यापक असर दिखता है जब हम तेल-गैस का कोई उत्पाद खरीदते हैं। इसका मतलब हुआ कि कंप्यूटर मोबाइल वगैरह और भी ज्य़ादा महंगे हो गए। रुपए की गिरती हालत पर खुद प्रधानमंत्री खासे बेचैन रहे हंै। उन्होंने कहा कि रु पया यदि इसी तरह लुढ़कता रहा तो मजबूत आर्थिक हालात वाले देश इसका बेजा लाभ उठा सकते हैं।

प्रधानमंत्री रुपए के लुढ़कने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं दिल्ली सरकार को। वे कहते है कि यदि ये सजग होते तो ऐसा नहीं होता।

दरअसल रुपए की कीमत जो लगातार गिरती जा रही है उस पर देश के वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को लगातार नज़र रखनी चाहिए थी। इस साल की पहली जनवरी से रुपया एशिया में दूसरी करंसी की तुलना में सबसे खराब तरीके से लुढ़कता दिखने लगा था लेकिन इसे नजरअंदाज़ कर दिया गया। उन सबके पास रटारटाया यही जवाब था कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल महंगा हो रहा है। जबकि तेल भी महंगा उतना नहीं था।

रुपए के लुढ़कने से प्रधानमंत्री भले चिंतित हैं। लेकिन आर्थिक जगत के लोग इसे सामान्य प्रक्रिया मानते है। केंद्रीय वित्त मंत्री का कहना है कि देश में मैक्रो-इकॉनॉमिक इंडिकेटर बहुत मजबूत हैं इसलिए रुपए की गिरावट भी संभाल ली जाएगी।

वित्तमंत्री ने सही कहा। 28 जून को रु पया जो लुढ़क कर रुपए 68.46 मात्र से पैसे पर आ गया था। उसने 29 जून को तैंतीस पैसे की उछाल ली। तब सेंसेक्स भी 386 पवाइंट पर था। रुपए में कुछ सुधार दिखा।

वित्त मंत्री ने हर समस्या की जड़ कांग्रेस को ठहराते हुए जानकारी दी कि जब 2013 में रुपया 68.8 मात्र प्रति डालर हो गया तो आरबीआई (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के गवर्नर रघुराम राजन ने फारेन करेंसी नान रेसिडेट बैंक(एफसीएनआरबी) शुरू की। इसके तहत डिपाजिट लिए। भारत में तीन साल के लिए 32 बिलियन डालर आए। इनके बल पर भारतीय करंसी कुछ साल टिकी रही। वित्त मंत्री ने बताया कि हमने 32 बिलियन डालर वापस कर दिए। आप देख सकते है पांच साल में रुपए की कीमत नहीं घटी।

भारत में विदेशी मुद्रा रिजर्व 304 बिलियन डालर 2013-14 में थी। आज यह 2017-18 के अंत में 425 बिलियन डालर है। इसके चलते एकाउंट डेफिसिट और फिस्कल डेफिसिट गिरा ही है।

आस्ट्रेलिया ने जीती ट्रॉफी और भारत ने दिल

चैंपियन ट्राफी की शुरूआत 1978 में हुई थी। इस टूर्नामेंट के 37 संस्करण हो चुके हैं। जिनमें से 15 बार आस्ट्रेलिया ने यह खिताब जीता। भारत लगातार दूसरी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंचा। लेकिन चार में से तीन क्र्वाटर तक अपना प्रभुत्व बनाने और दोनों छोरों और मिडफील्ड में अपना दबदबा कायम रखने के बावजूद भारत चैंपियन ट्राफी का फाइनल विश्व चैपियन आस्ट्रेलिया से हार गया। निर्धारित समय तक 1-1 से बराबर रहने के बाद शूट आऊट में 1-3 का स्कोर मैच की सही तस्वीर पेश नहीं करता। यह नहीं दर्शाता कि भारत जीत के कितने करीब पहुंच कर हार गया। उसने कितने मौके गंवाए उसकी पकड़ कितनी मज़बूत थी। यही वजह है कि मैच हारने के बाद भारत के मध्य पंक्ति के खिलाडी मनप्रीत सिंह रो पड़े और 18 साल के विवेक प्रसाद जिसने भारत का एकमात्र गोल किया ने मैच के बाद कहा, ‘यह जख्म हमेशा ताजा रहेगा’। भारतीय कप्तान का कहना था कि, ‘हमने आस्ट्रेलिया को ट्राफी तोहफे में दे दी’। खेल के पंडित कुछ भी कहें पर भारत का प्रदर्शन चारों क्र्वाटर में बिलकुल परिपक्व और तकनीकी तौर पर मज़बूत रहा बस फर्क इधर-उधर का रह गया। अगर यह अंतर न रहता तो शायद ब्रेडा का स्टेडियम पूरी रात जश्न में डूबा रहता।

अंत में जब आस्ट्रेलियाई खिलाडी जीत का जश्न मना रहे थे तब भारतीय खिलाडियों के चेहरे पर निराशा और उदासी थी और वे होटल जाने के लिए बेताव थे। कोच हरेंद्र सिंह ने कहा कि, ‘आज की रात नींद मुश्किल से ही आएगी। यह दर्द कई सप्ताह तक रहेगा’।

हालांकि टीम की सुबह की बैठक में निर्देश स्पष्ट थे कि गलतियां कम की जाएं और रक्षा पंक्ति को बिखरने नहीं देना। लेकिन पहले क्र्वाटर के मध्य में कोच हरेंद्र ने आस्ट्रलियाई खिलाडिय़ों को रक्षात्मक होते हुए देखा। उस समय उन्होंने खिलाडिय़ों से अपना स्वभाविक खेल खेलने के लिए कहा पर यह भी कि गेंद का ‘पोजेशन’ आसानी से विपक्षी टीम के हाथ में नहीं आने देना”।

इसके बाद मैच का मिजाज ही बदल गया। मिडफील्ड ने पूरा मैदान घेर रखा था। डिफेंस उनके और मिडफील्ड के मध्य के अंतर को कम करने के लिए आगे आया। उन्होंने आस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों के लिए कोई खाली स्थान नही छोड़ा था जब भी वे कोई आक्रमण करते तो लगातार सुरेंद्र कुमार, वरूण कुमार, और जर्मनप्रीत सिंह उन्हें रोकने के लिए सामने होते। वीरेंद्र लकड़ा ऐसे खेल रहा था जैसे वे कोच को यह दिखाने की कोशिश कर रहा हो कि वह एक डिफेंडर से बेहतर फारवर्ड हैं। वह बार-बार झुक कर और अपना सिर नीचे करके इस तरह से ड्रिविल कर रहा था कि आस्ट्रेनिया के खिलाडी भौचक्के रह जाते और वह आस्ट्रेलिया की रक्षा पंक्ति को इस तरह काट कर निकलता जैसे गर्म चाकू मक्खन में से निकल जाता है। उसने बार-बार गेंद को विपक्षी खिलाडिय़ों से दूर रखते हुए और गेंद को सिमरनजीत की तरफ धकेल दिया, वह खिलाड़ी जिसका खेल हर मैच के बाद निखरता चला गया।

शुरूआती मिनट में ही अमित रोहिदास ‘रेफरल’ के लिए गए और उन्हें पहला पेनल्टी कार्नर मिला था। फिर दूसरा भी मिला आस्ट्रेलिया हैरान था कि उसने कहां पकड़ ढीली छोड़ी। श्रीजेश के सामने उन्होंने कई बार गेंद मारने का प्रयास किया लेकिन गेंद श्रीजेश के पैड पर सीधी लगी।

इस बीच सुरेन्द्र ने खुद को आस्ट्रेलियाई रक्षकों से बचाया और दिलप्रीत के लिए पास फैंका जिसने गेंद एसवी सुनील के लिए बढ़ा दी। उसके सामने सिर्फ आस्ट्रेलियाई गोलकीपर था लेकिन गेंद रोकते समय सुनील उसे अपने ही पांव पर लगा बैठा।

उधर आस्ट्रेलियाई खिलाडी ब्लैक गोवरस, अरन जलेवेस्की, टॉम क्रेग, डेनियल बेले, भारतीय स्ट्राइकिंग घेरे के आसपास ही मंडराते रहे। जबकि रक्षकों ने गेंद को सावधानी से बचा लिया। श्रीजेश भी जोश में था वह हर शॉट को गोल से दूर करता रहा। दोनों टीमों ने असाधारण खेल का प्रदर्शन किया और फाइनल में श्रीजेश और आस्ट्रलियाई गोलकीपर लवेल टायलर ने अपना सर्वोतम प्रदर्शन किया।

दूसरे क्र्वाटर में सिमरनजीत ने आस्ट्रेलिया के आधे हिस्से में प्रवेश किया, अधिकांश डिफेंस को तोड़कर शानदार ढंग से गेंद सुनील को थमा दी। जो इसे नियंत्रित नही कर सका। इस बीच आस्ट्रेलिया ने दबाव बनाया और 24 वें मिनट में पहला पेनल्टी कार्नर अर्जित किया। एक डमी ‘पुश’ के कारण भारतीय रक्षक पंक्ति थोड़ा विचलित हुई और गोवरस ने फ्लिक से गेंद गोल में पहुंचा दी। यह गेंद श्रीजेश के हाथ से लग कर गई थी। सामान्य स्थिति में यह गेंद रुकनी चाहिए थी। यह एक साधारण आसान गोल था जो श्रीजेश को मैच के बाद भी परेशान करता रहेगा।

अब भारत ने लक्ष्य का पीछा किया। भारत ने तीसरे पेनल्टी कार्नर को भी गंवा दिया था। यहां तक की लकड़ा जो कि गेंद को आस्ट्रेलिया की ‘डी’ में ले गए थे और उनके पास गोल करने का मौका था पर वे चूक गए। मध्यांतर समय तक आस्ट्रेलिया एक गोल की बढ़त के साथ आगे था।

मनप्रीत और दिलप्रीत ने भारत को अपना चौथा पनेल्टी कार्नर दिया। वरूण ने इसे मनप्रीत की तरफ पास किया जोकि शूट के समय अपना संतुलन खो बैठे। दोनों टीमें एक दूसरे के आगे पीछे दौड़ रही थी। तीसरे क्र्वाटर के 8वें मिनट के बाद सुरेंद्र ने गेंद को मनदीप तक भेजा जो आस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों को धोखा देकर गेंद को लक्ष्य तक ले गए और गेंद को गोल की तरफ उछाल दिया। लेकिन गेंद गोल पोस्ट से टकरा कर खेल में वापिस आ गई। दर्शकों की भीड़ चिल्लाई। भारतीय खेमे में बैंच पर बैठे कोच हरेंद्र आश्चर्यचकित थे कि बराबरी कैसे हो। यह मौका चिंगलिंगसाना के छोर से आया जब उसने एक क्रास फैंका और विवेक प्रसाद ने सर्तकता के साथ गेंद को गोल में पहुंचा दिया। 18 साल के इस नवोदित खिलाड़ी का यह शानदार गोल था जो अपना पहला बड़ा फाइनल खेल रहा था। विवेक ने टायलर के दाई तरफ खाली जगह देखी और गेंद को उस तरफ से गोल पोस्ट के अंदर डाल दिया।

अचानक मैंच में दोबारा रोमांच आ गया और भारत के हमले तेज़ होने लगे। तीसरे क्र्वाटर के अन्तिम दो मिनट में तो गेंद भारत के पास ही रही। इस क्र्वाटर में भारत ने 53 फीसद गेंद अपने नियंत्रण में रखी और बार-बार आस्ट्रेलिया की ‘डीÓ में प्रवेश किया और चार शाट्स गोल पर जमाए।

फाइनल क्र्वाटर अत्याधिक उत्तेजित रूप से शुरू हुआ। मनप्रीत आस्ट्रेलियाई स्ट्राइकिंग सर्किल में पूरी तेज़ी से बढ़ा। उसने गेंद दिलप्रीत के लिए बढ़ाई पर टायलर ने दिलप्रीत का शाट बचा लिया इससे पहले एक शाट बाहर भी चला गया था। भारत के जवाबी हमले बहुत तेज थे इसको देखते हुए आस्ट्रेलिया ने अपने ज़्यादा खिलाडिय़ों को आगे नहीं भेजा।

मैच के आखिरी पांच मिनट में सुनील दाहिनी तरफ से आगे आया और उसने एक क्रास फैंका जो आस्ट्रेलियाई खिलाडियों को छकता हुआ मनप्रीत के पास पहुंच गया। मनप्रीत ने उसे सिर्फ रोक कर गोल में डालना था। परन्तु मनप्रीत गलत तरफ चला गया था क्योंकि आस्ट्रेलियाई डिफेंडर ने उसे कवर कर लिया था। मैच को जीतने का अवसर आया और चला गया।

आखिरी मिनट में भारत ने गेंद पर कब्जा कर लिया और आस्ट्रेलिया की टीम को दूर रखा जो शायद अधिक राहत प्राप्त कर रहे थे।

श्रीजेश की आश्चर्यजनक फार्म को देखकर कर सबको यह लग रहा था कि भारत शूट आउट में जीत सकता है। आस्ट्रेलिया ने कप्तान अरन जेलवेस्की के साथ अच्छी शुरूआत की। सरदार ने गोलकीपर के पैड के बीच से बॉल को निकालने की कोशिश की पर गेंद फ्लैप से टकरा कर रुक गई। दूसरी ओर डेनियल बेले ने साफ गोल कर 2-0 की बढ़त बना ली। भारत के हरमनप्रीत सिंह फिर चूक गए और मैथ्यू स्वान और टॉम क्रेग स्कोर नहीं कर पाए और जब मनप्रीत ने गोल किया तो भारत को एक उम्मीद बन गई थी लेकिन जर्मनी एडवर्ड ने गोल कर ट्राफी अपने नाम करवा ली। 36 प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलिया की यह 15वीं जीत थी।

भारत का लगातार यह दूसरा रजत पदक था। राष्ट्रमंडल खेलों में मिली बड़ी हार के बाद वे इस टूर्नामेंट में अपनी खोई हुइ अस्मिता पाने के लिए आए थे। हार के बाद और आस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ क्या हो सकता था उस के बारे में टीम की बैठक हुई। ब्रेडा में जो भी हुआ उस पर वे गर्व से देखेंगे। कोच हरेंद्र ने कहा, ‘मैच खत्म होने के बाद मैंने टीम को गर्व महसूस करने के लिए कहा। उन्होंने विश्व चैंपियन के खिलाफ फाइनल खेला और वे आसानी से मैच को बदल सकते थे। खैर कोई बात नहीं हमारे पास और अवसर आएंगे और आने वाले समय मं कुछ ब्ड़ा हो सकता है।’

सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर का पुरस्कार श्रीजेश के जख्मों को भर नहीं सकता। उन्होंने कहा, ‘व्यक्तिगत पुरस्कार ठीक है यह थोड़े समय के लिए रहता है।’ ”जादू चैंपियन ट्राफी जीतने में था तब व्यक्तिगत पुरस्कार का महत्व था। तब इसका महत्व समझ में आता जब टीम जीतती। यह मेरे लिए ठीक है। यह एक उपलब्धि बनता अगर टीम जीतती”।

आस्ट्रेलियाई पेनल्टी कार्नर पर बात करना श्रीजेश को बेहद परेशान कर रहा था। उन्होंने खुद को कोसा, ‘मैंने उस तरह के गोल खाकर टीम को मुसीबत में डाल दिया। एक गोलकीपर के रूप में आप इस तरह गोल नही खा सकते। मुझे पता है कि मैंने टीम का नुकसान किया’।

अभी तक यह श्रीजेश का शानदार प्रदर्शन था जिसने मुश्किल परिस्थितियों में टीम को बचाया। विवेक उत्साहित था कि उसने इतने बड़े फाइनल में स्कोर किया परन्तु बिल्कुल निराशा था कि भारत हार गया। ‘हम यहां जीतने के लिए आए थे और टीम की बैठक में यही हमारी मनोदशा थी’ उन्होंने कहा। ‘हम जानते थे कि वास्तव में क्या करना है और हमने जीत के लिए सब कुछ किया। शायद थोड़ा करना और ज़रूरी था”।

मनप्रीत के आंखों में आसूं थे और उसे दूसरी बार रजत जीतने का उत्साह नही था। ”सब कुछ हमारे पक्ष में था और हम पिच पर सब कुछ सही तरीके से कर रहे थे। हां हमें मौके का लाभ उठाना चाहिए था”। लंबे समय तक उसने अपने सिर को पकडे रखा। उसने अपने आसुंओं को पोंछा। आखिकार उसने देखा और कहा, ”इसमें कुछ समय लगेगा, लेकिन हम आगे आने वाली एशियाई खेलों और विश्व कप की चुनौतियों को देखेंगे”।

कई बाद कौशल भ्रमित हो सकता है। बॉल पर कब्जा और तेज काऊटर हमलों ने भारत को एक नई पहचान दी। इस पल में थोडे समय के लिए भावना से रहित चैंपियनल ट्राफी रजत पदक एक तरफ चिकित्सकीय हो सकता है। जिसे आसपास कुछ बड़ी चुनौतियां हैं।

फुटबाल का बादशाह फिर बना फ्रांस

बीस साल बाद एक बार फिर फीफा फुटबाल विश्व कप फ्रांस पहुंच गया। रूस में 14 जून से चल रहे विश्व कप फुटबाल टूर्नामेंट के फाइनल में फ्रांस ने जुझारू टीम क्रोएशिया को 4-2 से हरा दिया। आज से 60 साल पहले जब ब्राजील ने स्वीडन को फाइनल में 5-2 से परास्त किया था, उसके बाद निर्धारित समय के भीतर यह सबसे बड़ी जीत है। हालांकि 1966 के फाइनल में इंग्लैंड ने जर्मनी को इतने ही अंतर (4-2) से हराया था पर वह मैच अतिरिक्त समय तक चला था।

आधे समय तक विजेता टीम 2-1 से आगे थी। क्रोएशिया की शुरूआत बहुत तेज़ थी, लेकिन फ्रांस को मिली एक फ्री किक जो कि ग्रीज़मैन ने ली थी, पर क्रोएशिया का खिलाड़ी मैंडज़ूकिक गेंद ‘क्लीयरÓ करने के प्रयास में सिर से गेंद अपने ही गोल में डाल बैठा और फ्रांस को 1-0 की बढ़त मिल गई। यह गोल 18वें मिनट में आया। अपने ही गोल में गेंद डालने की इस विश्व कप की यह 12वीं घटना थी। ‘नॉक आउटÓ में यह लगातार चौथा अवसर था जब क्रोएशिया पहला गोल खा कर पिछड़ गया था। प्री क्र्वाटर, क्र्वाटर और सेमीफाइनल इन सभी मैचों में भी उस पर पहला गोल हुआ था। पर सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ बराबरी का गोल करने वाले प्रीसिस ने यहां भी 10 मिनट के बाद अपनी टीम को बराबरी पर ला दिया। लुका मोड्रिकस की ‘बाक्सÓ के बाहर से ली ‘फ्री किकÓ को साइम वरसालीडकों ने सिर से प्रीसिस की ओर बढ़ा दिया प्रीसिस ने ‘बाक्सÓ में गेंद संभाली और दो फ्रांसिसी रक्षकों को चकमा देते हुए अपने बांए पैर से ज़ोरदार तिरछा शॉट लगा कर गेंद को गोल कीपर के बांए तरफ गोल में डाल दिया (1-1)

लेकिन प्रीसिस उस समय ‘हीराÓ से ‘जीरोÓ बन गए जब फ्रांस को मिली एक फ्लैग किक पर उन्होंने अपनी बाजू लगा दी पर यह रैफरी और सहायक रैफरी को नहीं दिखा। इस पर फ्रांस के खिलाडिय़ों ने रैफरी से अपील की। अर्जेंटीना के रैफरी नेस्टर मिताना ने ‘वीएआरÓ रिव्यू देखा और बेझिझक फ्रांस को पेनाल्टी दे दी। यह इस दूर्नामेंट की 28 वीं पेनाल्टी थी यह भी एक रिकार्ड है। क्रीज़मैन को इसे गोलकीपर के दांए ओर से गोल में डालने में कोई कठिनाई नहीं हुई । इस टूर्नामेंट में उसका यह चौथा गोल था। यह गोल खेल के 38वें मिनट में हुआ। 1974 के बाद किसी भी विश्व कप के फाइनल में आधे समय तक के ये सबसे ज़्यादा गोल थे (2-1)। 1974 में पश्चिमी जर्मनी भी नीदरलैंड्स के खिलाफ आधे समय तक 2-1 से ही आगे था।

आधे समय के बाद क्रोएशिया ने हमले तेज किए। मैदान में और ‘हवाÓ में भी वे फ्रांस के खिलाडिय़ों पर भारी पर रहे थे, पर फ्रांस की रक्षा पंक्ति ने गज़ब का खेल दिखाया। उन्होंने क्रोएशिया की टीम को गोल पर निशाना नहीं लेने दिया। इस बीच एमबैपे और ग्रीज़मैन ने एक हमला बनाया और बॉक्स के कोने पर खड़े पोगवा को गेंद थमा दी। उसका दाएं पांव से लिया गया शॉट गोली ने रोका पर लौटती गेंद कारे उसने आसानी से गोल में पहुंचा दिया (3-1)।

छह मिनट बाद लुकस हरनेड्डज़ ने बाए छोर से ज़ोरदार हमला बनाया ओर 19 वर्षीय एमबैपे को पास थमा दिया इस युवा खिलाडी ने शानदार नीचा शॉट लगा कर अपना खाता खोला और साथ ही टीम को 4-1 की बढ़त दिला दी। पेले (विश्व कप 1958) के बाद विश्व कप फाइनल में गोल करने वाला वह सबसे कम उम्र का खिलाडी बन गया।

पिछले तीन मैचों में पिछडऩे के बाद लगातार वापसी करने वाली क्रोएशिया की टीम कुछ हताश सी हो गई। उसके लिए तीन गोल की बढ़त को खत्म कर पाना नामुमकिन न सही पर कठिन ज़रूर था। मैच खत्म होने से 20 मिनट पहले फ्रांस के गोलकीपर हुगो लौरिस ने एक भयानक भूल कर दी। सैमुयल उमटीटी के बैक पास पर गोलकीपर लौरिस ज़्यादा ही ढीला हो गया और उसने पीछे से आ रहे मंदज़ूकीक पर पूरा ध्यान नहीं दिया । उसने उसे छक्काने की कोशिश की लेकिन उसके पैर से लग कर गेंद गोल में चली गई और स्कोर 4-2 हो गया। विश्व कप के इतिहास में इस तरह का गोल होने का शायद यह पहला अवसर था।

गोल्डन बूट

इंग्लैंड के कप्तान हैरी कैने को टूर्नामेंट में सर्वधिक गोल (6) करने के लिए ‘गोल्डन बूटÓ मिला और क्रोएशिया के लुका मोड्रिकस को ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंटÓ चुना गया और उन्हें ‘गोल्डन बॉलÓ दी गई। बैल्जियम के ‘मिड फील्डरÓ ईडन हैजर्ड को दूसरे नंबर का खिलाडी चुना गया। बैल्ज्यिम के गोल रक्षक थीबाउट कोर्टियस को ‘गोल्डन ग्लव्सÓ दिया गया।

गैरी लिंकर (1986) के बाद जिन्होंने विश्व कप में सर्वाधिक छह गोल किए थे , कैने सबसे ज़्यादा गोल करने वाले दूसरे अंग्रेज खिलाड़ी बन गए। कैने ने तीन गोल पेनाल्टी किक से किए हैं। कैने ने छह में से दो गोल टुनीशिया के खिलाफ, तीन पानामा के खिलाफ और एक कोलंबिया के खिलाफ किया। इनमें से तीन गोल पेनाल्टी से, दो बॉक्स के अंदर मिली गेंद से और एक सिर से किया। कैने ने गोल पर कुल 14 शॉट मारे इनमें से छह पर गोल हुए।

मारियो जगालो (ब्राज़ील) और फ्रांज बेकेनबॉट (जर्मनी) के बाद दिदिए तीसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने पहले खिलाडी और फिर कोच के रूप में विश्व कप जीता है।

बैल्जियम को तीसरा स्थान , इंग्लैंड को 2-0 से हराया

डेढ़ हफ्ता पहले तक फीफा वर्ल्ड कप 2018 में विजेता पद की दावेदार मानी जा रही बैल्जियम और इंग्लैंड क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर रहे हैं। शनिवार शाम को बैल्जियम ने सेंट पीटर्सबर्ग स्टेडियम में खेले गए फीफा वर्ल्ड कप के तीसरे स्थान के मैच में इंग्लैंड को 2-0 से हरा दिया। सेमीफाइनल में दोनों टीमें अपने प्रतिद्वंदियों से हार गईं थीं।

बैल्जियम ने एक पखवाड़े के भीतर दूसरी बार इंग्लैंड को हराया। ग्रुप चरण में भी बैल्जियम ने 82 साल के लंबे अंतराल के बाद इंग्लैंड हो हराया था। ये फीफा वर्ल्ड कप में बैल्जियम का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। गेरेथ साउथगेट ने क्रोएशिया से सेमीफाइनल में हारी इंग्लैंड टीम में चार बदलाव किये थे। इंग्लैंड ने विश्व कप में अपनी सबसे युवा टीम उतारी जिसमें खिलाडिय़ों की औसत आयु 25 वर्ष 174 दिन थी।

बैल्जियम शुरू से ही आक्रामक थी और उसने इंग्लैंड के डिफेंस और अटैक को पूरे मैच में पंगु सा करके रखा। बैल्जियम ने चौथे मिनट में ही गोल कर इंग्लैंड को जबरदस्त झटका दे दिया जिससे इंग्लैंड कभी भी बाहर नहीं निकल पाया। टीम में वापसी करने वाले थॉमस म्यूनिएर ने यह गोल किया। थॉमस पहले सेमीफाइनल मैच में निलंबन के चलते नहीं खिलाये गए थे। नासेर चाडली के बाई तरफ से दिए क्रास पास पर म्यूनिएर ने गोल किया।

इस विश्व कप में बैल्जियम की टीम ”रेड डेविल्स” के नाम से मशहूर हुई। हॉफ टाइम तक बैल्जियम 1-0 से आगे रही थी। दूसरे हाफ में 1-0 की बढ़त के मनोविज्ञानिक लाभ के साथ बैल्जियम के खिलाडिय़ों ने एक के बाद इंग्लैंड पर हमलों की बौछार की। हालांकि गोल का अवसर बैल्जियम को 82वें मिनट में मिला जब ब्रुइने से मिले पास पर हैजार्ड ने गेंद गोलपोस्ट के भीतर नेट में मार दी। इस तरह बेल्जियम फीफा वर्ल्ड कप में तीसरा स्थान हासिल करने में पहली बार सफल हुआ। हैजार्ड को ”मैन ऑफ द मैच” चुना गया।

दर्शकों की शोर के बावजूद इंग्लैंड टीम को इस विश्व कप में जीत की जगह हार की निराशा के साथ देश वापस लौटना पड़ा। बेल्जियम का विश्व कप में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन इससे पहले 1986 में था जब वह चौथे स्थान पर रहा था। भले ही बैल्जियम कप नहीं जीत पाया लेकिन उसने तीसरा स्थान पहली बार हासिल कर अपने समर्थकों को निराश नहीं होने दिया।

सेमी फाइनल मैच

इससे पूर्व खेले गए सेमीफाइनल मैचों में भी एक कड़ी चुनौती थी। यहां पर क्रोएशिया की टक्कर 1966 के विजेता इंग्लैंड से थी। यहां हालांकि पहला गोल इंग्लैंड ने किया पर क्रोएशिया ने बराबरी की और फिर विजयी गोल दाग कर 2-1 से जीत दर्ज कर ली। इस मैच में क्रोएशिया ने 22 शॉट गोल पर ट्राई किए जबकि इंग्लैंड केवल 11 बार ही कर पाया। गेंद पर भी 56 फीसद नियंत्रण क्रोएशिया का रहा और 44 फीसद गेंद इंग्लैंड के पास रही। क्रोएशिया को आठ और इंग्लैंड को चार कार्नर मिले।

फ्रांस और बैल्जियम के बीच खेला गया दूसरा सेमीफाइनल भी अत्याधिक रोमांचक रहा। इस मैच में फ्रांस ने बैल्जियम पर 1-0 से जीत दर्ज की। हालांकि इस मुकाबले में गेंद 64 फीसद बैल्जियम के कब्जे में रही और पासों की सटीकता भी बैल्जियम की 91 फीसद और फ्रांस की 83 फीसद थी फिर भी एक मात्र गोल फ्रांस ने कर जीत दर्ज की और फाइनल में स्थान बनाया।?

वीएआर का सफल प्रयोग

पहली बार वीडियो असिस्टेंट रैफरी का प्रयोग हुआ। इसका 440 बार इस्तेमाल हुआ। 62 मैचों में 19 फैसले रिव्यू हुए और 16 निर्णय बदले गए।

फेयर प्ले से नॉकआएट राउंड

पहली बाद फेयर प्ले से कोई टीम (जापान) नॉक आउट राउंड में पहुंची। स्नेगल को ज़्यादा येलो कार्ड (6) के कारण टूर्नामेंट से बाहर जाना पड़ा।

दबदबा टूटा, दायरा बढ़ा

88 साल पुराने टूर्नामेंट में चुनिंदा देशों का दबदबा टूटा। पहली बार क्रोएशिया फाइनल में तो रूस क्र्वाटर में पहुंचा। इंग्लैंड भी 28 साल बाद सेमी फाइनल खेला।

प्रेम के रूप

असमय प्रेम कविताएं

तुम्हारी छुअन से खिली पंखुड़ी

मेरा प्यार है

—-

प्यार का कोई न समय है, न उम्र

न देश, न धाम और न नगर

ओह! मुझे हर बार लगा

मेरा प्यार है-

नुकीले कांटों के बीच

फूलों का खिलना

जैसे पैने दुर्दान्त दांतों से घिरी

मेरी जीभ

—-

खालीपन बराबर बढ़ रहा है

हर दिन, हर ऋतु, हर सूर्यास्त

कहां से लाऊं ऐसा भरापन

जो मुझे नीचे गिरने से बचा सके

—–

तुम्हारी आंखों का नीलापन

मेरा प्यार हैं

कितनी बहुरंगीय धारियां है इसमें

और कितनी अनजानी शक्लें

स्फाटिक के रंबों में जैसे झिलमिलाती

एक उज्जवल रेख

मेरे अच्छे भविष्य की भी है

ये वस्तुएं तुम्हारे

विश्व बाज़ार से गायब हैं

हल्की धूप की परतों में

सुहाता गुनगुनापन जैसे

तुम्हारी सौम्य घनी पलकें

———-

गेहूं के दानों का दूधियाना।

मेरा प्यार है

जो धूप में पक रहा है

अन्न बनने को

अभी समय है

जब तक चैत आये

मैं जीवन की हरीतिमा को

सुनहरा होते देखूं

बदलते रंगों की

रोएंदार छाया में

मैंने तुम्हारे होने की लहरें सुनीं

पतझड़ के गिरने की

खाकी खडख़ड़ाहट मैंने सुनी

नदियां चाहे किसी पर्वत शिखर से फूटे

बहती हंै सागर की तरफ

जीवन ही वह धार है जल की

जो काली चट्टान को तोड़ कर

निर्झरित होगी

ओह! तेज़ हवा ने जब मुझे

मंजरित आम की तरह झकझोरा

मेरी फलवान नयी टहनियां हिलीं

भूरी नसों-दार पतियां विचलित हुई

पर जड़ों ने भरोसा नहीं खोया

जिस तरह उजाले से मैं जिया हूं

आज तक… वह मेरा प्यार है।

पारदर्शी जल में

जैसे मछलियों की बिछलन

कहां है अभी वसंत का आगमन

उसे मैं बीहड़ों में छोड़ कर आया हूं

उसकी जगह देखता हूं धुंधलके में

पथराई तुम्हारी सूनी आंखें

खोखले दिल का विस्तृत होता आयतन

—-

सुनो, सुनो अभी और भी सुनो

यदि मृत्यु अटल है इस तमस की तरह

तो जीवन भी अविनाशी है

वह अक्षय स्रोत कहां है

जहां से निरंतर फूटते हैं

मार्ग-वाहीं निर्झर

खिलते हैं अनचय बन फूल

और बिना कहे मुरझा कर गिर जाते हैं

कोई नहीं सुनता उनका त्रासद रूदन

इन्हीं में होता है प्रस्फुटित युग बीज

—-

तुम न बोलो चाहे

अपने ताजा घावों से रिसी भाषा

पर मुझे बोलने दो कवि की तरह

यह कर्म चुना है मैंने

मैं बोलूंगा

उनकी धूर्तता और

लफ्फाजी के विरूद्ध

हमारे मुंह सी दिए गए हैं

सुनहरे तारों से

जिसे तुम सौभाग्य समझ रहे हो

यह जादुई दुनिया मेरी नहीं है

मेरी धरती वह है

जो असंख्य खुरों से खुदी है

वे कौन हैं जो मुझे

रंगीन विज्ञापनों से चकित किए हैं

क्या कहूं… कितना त्रासद है

तुमने मुझे अपना कर मुट्ठी भर

रजत सिक्कों के लिए त्यागा है

दिल्ली दरबार तुम्हारे लिए खुला है

राजपथ पर चलने वाले कवियों की आत्मा

अंदर-अंदर मर चुकी है

भले ही वे पंच सितारों में जश्न मना रहे हों।

—–

धरती की अनंत गति से ही बदलती है ऋतुएं

आने वाले बेहतर दिनों का भरोसा करो

जिन्होंने भय और आतंक के सिवा

और कुछ जाना ही नहीं

वे अब लहलहाती दुनिया के

स्वप्न देख रहे है

ऐसा कभी नहीं हुआ

पतझड़ की गंधहीन सरसराहट से

पेड़ निपात हों

और वसंत न फूटे

अंत तक चाहूंगा

आदमी का सिर ऊंचा रहे

हिमालय शिखर की तरह

मैं अपने हृदय को खंगालता रहूं

जो गहरा है समुद्र से भी।

अलविदा! चैंपियन ट्राफी

पाकिस्तान हाकी फेडरेशन और उनके प्रमुख एयर मार्शल नूर खान के प्रयासों से जिस चैंपियन हाकी ट्राफी का जन्म 17नवंबर 1978 को लाहौर में हुआ वह 40 साल बाद पहली जुलाई 2018 को नीदरलैंड्स के ब्रेडा में इतिहास बन गई। इन 40 सालों में इसके 37 संस्करण खेले गए। पहले टूर्नामेंट में कुल पांच टीमों ने भाग लिया था । ये टीमें थी – मेजबान पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, ग्रेट ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और स्पेन। यह वह वक्त था जब हाकी के कृत्रिम मैदान नए-नए आए थे और खेल की तकनीक और उसके कई नियम बदले गए थे। ध्यान रहे कि इन कृत्रिम मैदानों का इस्तेमाल पहली बार 1976 के माँट्रियल (कैनेडा) के ओलंपिक खेलों में हुआ था। इसका इतना असर पड़ा कि कुछ ही समय पहले 1975 में विश्व कप जीतने वाली भारत की टीम एक लीग मैच में आस्ट्रेलिया से छह गोल खा गई। वह समय भारतीय हाकी के पतन की शुरूआत के तौर पर याद किया जाता है। उस ओलंपिक के स्वर्ण पदक का फाइनल आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैड़ के बीच खेला गया । उस समय पाकिस्तान की टीम काफी मज़बूत थी, पर वह भी सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया से 1-2 से हार कर बाहर हो गई थी। पर तीसरे स्थान के लिए खेले गए मुकाबले में उसने नीदरलैंड्स को 3-2 से हरा कर कांस्य पदक जीत लिया। लेकिन भारत अपने पूल ‘एÓ में तीसरे स्थान पर रह का पदकों की दौड़ से पहले ही बाहर हो गया था। यहां उसे सातवां स्थान मिला।

इन हालात में चैंपियन ट्राफी का शुरू किया जाना सभी देशों को पसंद आया। पहले टूर्नामेंट में भारत नही था। इसका खिताब मेजबान पाकिस्तान ने जीता। उस समय की पाकिस्तानी टीम में सलीम उल्ला, हनीफ खान, अख्तर रसूल और कप्तान असलाहूद्दीन सिद्ीकी जैसे धुरंधर खिलाडी थे।

इस टूर्नामेंट का दूसरा संस्करण 1980 में खेला गया। मेजबानी फिर से पाकिस्तान ने की, पर तीन से 11 नवंबर तक चली इस प्रतियोगिता को इस बार कराची में आयोजित किया गया। इसमें कुल सात टीमों ने हिस्सा लिया। इस बार भारत भी इसमें था। पर वह छह में से केवल एक ही मैच जीत पाया और उसके दो मैच ‘ड्राÓ रहे और तीन मैच वह हार गया। भारत को एकमात्र जीत ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ मिली जिसे उसने 6-3 से परास्त किया। यहां पाकिस्तान विजेता बना जबकि भारत को पांचवा स्थान मिला। 1981 में भी इसकी मेजबानी कराची को मिली। इस बार भारत इसमें नहीं था। पाकिस्तान का प्रदर्शन इस बार फीका रहा और वह छह टीमों में से चौथा स्थान ही पा सका। पहले तीन स्थान नीदरलैंड्स, आस्ट्रेलिया और जर्मनी को मिले।

1982 में भारत इन मुकाबलों में खेला और नीदरलैंड्स और आस्ट्रेलिया के बाद तीसरा स्थान लेने में सफल रहा। भारत ने खेले पांच मैचों में से तीन में जीत दर्ज की। दो में उसे हार का मुंह देखना पड़ा। पाकिस्तान चौथे, जर्मनी पांचवे और सोवियत यूनियन की टीम छठे स्थान पर रहे।

यदि चैंपियसं टा्रफी के रिकार्ड पर नज़र डालें तो पता चलता है कि इसमें यूरोपीय देशों और आस्ट्रेलिया का दबदबा रहा है। एशियायी देशों में केवल पाकिस्तान ही इसे तीन बार जीत सका है। आस्ट्रेलिया ने यह खिताब 15 बार, जर्मनी ने 10 बार, नीदरलैंड्स ने आठ बार और स्पेन ने एक बार इस पर अपनी मुहर लगाई है। भारत केवल दो बार इसके फाइनल में खेला है।

भारत का प्रदर्शन

चैंपियंस ट्राफी उस समय शुरू हुई जब अंतरराष्ट्रीय हाकी में कृत्रिम टर्फ आ चुकी थी। 1976 में माँट्रियल ओलंपिक से इस टर्फ की शुरूआत हुई। इस कृत्रिम टर्फ का आना भारत के लिए नुकसान देह रहा। 1975 में प्राकृतिक मैदान पर विश्व कप जीतने वाली भारत की टीम 15 महीने बाद माँट्रियल ओलंपिक खेलों में एक नौसिखिया टीम नज़र आने लगी। हालांकि यहां उसने पूल ए के पहले मैच में अर्जेंटीना को 4-0 से हराया। पर अगले मैच में वह नीदरलैंडस से 1-3 से और आस्ट्रेलिया से 1-6 से हार गई। उस समय तक भारत की यह सबसे बड़ी हार थी। 1928 के बाद यह पहली बार था कि भारत ओलंपिक के सेमी फाइनल में नहीं पहुंच पाया था। अंत में उसे सातवां स्थान मिला। 1964 का ओलंपिक विजेता और 1975 के विश्व कप जीतने वाला देश मैदान के हालात बदलते ही सातवें स्थान पर आ गया। हालांकि पाकिस्तान यहां सेमीफाइनल में था।

1978 में जब चैंपियनस ट्राफी की शुरूआत हुई तो भारत की हाकी बिखर चुकी थी। इसी कारण पहली चैंपियनस ट्राफी में हिस्सा नहीं लिया था। बाद में भी वह कुछ अधिक नहीं कर पाया। चैंपियनस ट्राफी में भारत ने कुल दो रजत और एक कांस्य पदक जीता है। भारत को तीन बार इस प्रतियोगिता की मेजबानी का अवसर मिला सबसे पहले 1996 में यह मद्रास में आयोजित की गई इसमें भारत चौथे स्थान पर रहा। 2005 में चेन्नई में आयोजित प्रतियोगिता में भारत पांचवें स्थान पर रहा और 2014 में जब यह भुवनेश्वर में खेली गई तो भारत फिर चौथे स्थान पर ही रहा।

अब यह प्रतियोगिता कभी नहीं खेली जाएगी और भारत के खाते में केवल दो रजत और एक कांस्य ही रहेगा।

हिमा ने रचा इतिहास भारत को पहला स्वर्ण

अंतिम 50 मीटर में ज़ोदार फर्राटे के साथ रोमानिया की आंद्रेया मिकलोस को पीछे छोड़ चौथी लेन में भाग रही भारत की 18 वर्षीय हिमा दास ने आइएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक चैंपियनशिप में 400 मीटर का स्वर्ण पदक जीत कर एक नया इतिहास रच दिया। उन्होंने यह दूरी 51.46 सेकेंड में पूरी की। हालांकि गोल्ड कोस्ट में इस साल हुई राष्ट्रमंडल खेलों में हिमा ने 51.32 सेकेंड का समय निकाला था, लेकिन वहां वह छठे स्थान पर थी। इससे पूर्व पिछली चैंपियनशिप जो 2016 में हुई थी उसमें भारत के नीरज चोपड़ा ने जैवलियन थ्रो में स्वर्ण पदक जीत कर एथेलिटिक्स में पहला स्वर्ण पदक जीतने का श्रेय पाया था।

जहां तक ट्रैक की बात है तो उसमें किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में मिल्खा सिंह के 1958 के राष्ट्रमंडल खेलों की 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने के बाद आज तक कोई पदक नहीं आया है। देखा जाए तो भारत की झोली में ट्रैक का यह स्वर्ण पदक 60 साल बाद आया है। उस समय था मिल्खा सिंह, समय निकाला था 46.6 सेकेंड, अब है हिमा दास समय 51.46 सेकेंड।

इसके अलावा सीमा पुनिया (2002) ने डिस्कस में कांस्य पदक और नवजोत कौर ढिल्लों (2014) ने डिस्कस में कांस्य पदक जीता था। इस प्रकार विश्व अंडर-20 एथलेटिक चैंपियनशिप में भारत अब तक कुल चार पदक जीते हैं – इन में दो स्वर्ण और दो कांस्य।

फिनलैंड में चल रही इस मौजूदा प्रतियोगिता में हिमा का स्वर्ण पदक उस समय ही पक्का हो गया था, जब उसने सेमीफाइनल ‘हीटÓ में सबसे बेहतर (52.25 सेकेंड) समय निकाला था। फाइनल में हिमा को रोमानिया की आंद्रेया मिकलोस से चुनौती मिलने की उम्मीद थी। शुरू के 350 मीटर तक रोमानिया की धाविका आगे थी, लेकिन अंतिम 50 मीटर में हिमा ने बाजी पलट दी। मिकलोस को 52.07 सेकेंड के समय के साथ रजत और अमेरिका की टेलर मैन्सन (52.28 ) को कांस्य पदक मिले।

श्रीराम सिंह का 42 साल पुराना रिकार्ड टूटा

उधर 58वीं अंतर राज्यीय एथलेटिक चैंपियनशिप में केरल के जिनसन जॉनसन ने 800 मीटर की दौड़ में 1:45.65 मिनट का समय निकाल कर महान धावक श्रीराम सिंह का 42 साल पुराना रिकार्ड तोड़ दिया। श्रीराम ने यह रिकार्ड 1976 के मांट्रियाल ओलंपिक में (1:45.77) बनाया था। इसके साथ वह एशियाई खेलों के योग्यता स्तर पाने में भी सफल हो गया। एशियाई खेलों को 800 मीटर की दौड़ का क्वालीफाईंग समय 1:47.50 मिनट है।

इससे पूर्व जॉनसन ने 2016 में बंगलूर में 1:45.98 का समय निकाला था। ”रिकार्ड तोडऩे के लिए ही बनाए जाते हैं। मुझे खुशी है कि जॉनसन ने मेरा रिकार्ड तोड़ा है।ÓÓ श्रीराम सिंह ने टिप्पणी की। इस मुकाबले का रजत पदक हरियाणा के मनजीत सिंह (1:46.24) और कांस्य मणिपुर के मोहम्मद अफसाल (1:46.79) को मिला। हरियाणा का ही बेअंत सिंह 1:46.92 मिनट का समय लेकर चौथे स्थान पर रहा।