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कहीं आप भी शिकार तो नहीं ‘अल्ज़ाईमर’ के

साधारण भाषा में इसे भूलने की बीमारी कहा गया है। विश्व में यह बीमारी अपने पांव तेजी से पसार रही है। इस पर लगाम लगाने के लिए सितंबर के महीने को विश्व अल्ज़ाईमर महीने के रूप में मनाया जा रहा है। वैसे हर साल 21 सितंबर को यह दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरूआत 2012 से हुई है। यह माना जाता है कि दुनिया के हर तीन में से दो व्यक्ति इस बीमारी के शिकार हैं। इस तरह इसे वैश्विक समस्या के तौर पर देखा जाने लगा है।

अल्ज़ाईमर’ की बीमारी ‘डिमेंशिया’ का ही एक प्रकार है। साधारण भाषा में इसे भूलने की बीमारी कहा गया है। विश्व में यह बीमारी अपने पांव तेजी से पसार रही है। इस पर लगाम लगाने के लिए सितंबर के महीने को विश्व अल्ज़ाईमर महीने के रूप में मनाया जा रहा है। वैसे हर साल 21 सितंबर को यह दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरूआत 2012 से हुई है। यह माना जाता है कि दुनिया के हर तीन में से दो व्यक्ति इस बीमारी के शिकार हैं। इस तरह इसे वैश्विक समस्या के तौर पर देखा जाने लगा है। इस कारण इसकी रोकथाम के लिए पूरी दुनिया में एक मुहिम शुरू की गई है।

डिमेंशिया क्या है?

‘डिमेंशिया’ एक शब्द है जो दिमागी विकारों को प्रकट करता है। जैसे यादाशत कमज़ोर होना, सोच में विकार आना, व्यवहार और भावनाओं में विकार उत्पन्न होना। इस बीमारी के शुरूआती लक्षणों में यादाश्त कमज़ोर होना, अपने रोज़ाना के काम करने में कठिनाई होना, भाषा के साथ समस्या पैदा होना और व्यक्तित्व में बदलाव आना शामिल हैं। ध्यान रहे की दुनिया का हर मानव अलग है इसलिए उस पर डिमेंशिया का प्रभाव भी अलग-अलग पड़ता है। कोई दो व्यक्ति ऐसे नहीं होते जिन में डिमेंशिया में लक्षण एक से पाए जाते हों। किसी भी मानव पर इस बीमारी से पडऩे वाला प्रभाव उसके स्वास्थ्य, उसकी सामाजिक परिस्थिति और उसके व्यक्तित्व के आधार पर ही पड़ता है।

अल्ज़ाईमर और डिमेंशिया की दूसरी बीमारियों के लक्षणों में अंतर होता है लेकिन ऊपरी तौर पर उनमें कई सामानताएं होती है। इनमें आम है यादाश्त में कमी और काम न कर पाने की समस्या। इस वजह से मरीज़ अपने काम-काज और सामाजिक कार्यों से दूर हो जाता है। जब इस तरह के लक्षण अधिक उभरने लगें तो डाक्टरी सहायता ले लेनी चाहिए। हालांकि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है? लेकिन फिर भी डाक्टरी सहायता से हालात सुधर सकते हैं। यह बीमारी समाज के किसी भी वर्ग के प्राणी को हो सकती है। एक अनुमान के अनुसार इस समय विश्व के 460 लाख लोग डिमेंशिया से ग्रसित हैं। डाक्टरों का कहना है कि मरीज़ों की यह गिनती 2050 तक 1210 लाख का आंकड़ा पार कर लेगी। हर तीन सेकेंड में दुनिया में इस बीमारी का एक नया मरीज़ पैदा हो जाता है।

वैज्ञानिकों को मत है कि ऐसे बहुत से तत्व है तो इस बीमारी को बढ़ाने में सहायक होते है। इसमें सबसे बड़ा है उम्र का बढऩा। हर पांच साल में 65 साल से ऊपर के मरीज दुगने हो जाते हैं। 85 साल से ऊपर के तो लगभग एक तिहाई लोग इससे पीडि़त हैं।

ज़्यादातर यह बीमारी बढ़ी उम्र में शुरू होती है। इसका कारण वंशानुगत, जीवन शैली और वातावरण हो सकता है। इनमें से हर ‘फैक्टर’ हर इंसान पर अलग असर डालता है। किसी पर जीवनशैली का असर होता है तो किसी पर उसके इर्द-गिर्द के वातापरण का। वैज्ञानिक इस खोज में लगे हैं कि आयु के साथ दिमाग में आने वाले बदलाव किस तरह तंत्रिका कोशिका को नुकसान पहुंचा कर इस बीमारी को तेजी से बढऩे देते हैं। इनमें दिमाग के किसी भाग का सिकुड़ जाना, किसी भाग में सूजन होना, या ऊर्जा देने वाली कोशिकाओं को खत्म होना शामिल है।

अल्ज़ाईमर के लक्षण

इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी बात को एक दम भूल जाता है वह बातचीत में एक ही बात को बार-बार दोहराता रहता है। अपना सामान रख कर भूल जाता है। समारोहों की तिथियां वगैरा भी उसे याद नहीं रहती। कई बार वह उस रास्ते को भी भूल जाता है जिस पर उसका रोज़ का आना-जाना होता है।

2016 में किए गए एक शोध के अनुसार अल्ज़ाईमर में शुरूआती लक्षणों में हंसोड़ेपन की भावना में बदलाव आना भी शामिल है। इसके साथ ही वस्तुओं की पहचान न कर पाना, किसी दृश्य के सभी भागों को एक साथ देख पाने में कठिनाई होना और किसी लिखी इबारत को पढऩे में मुश्किल पेश आना इस बीमारी के आम लक्षण हंै। कई बार कुछ युवाओं को भी यह बीमारी अपना शिकार बना लेती है। इसमें कई बार दिमाग पहले से ही क्षतिग्रस्त हो जाता है पर उसके लक्षण बाद में सामने आते हैं।

इस बीमारी को मुख्यतम तीन चरणों में बांटा जा सकता है- पहला, चरण है प्री क्लीनिकल जब इसके लक्षण भी सामने नहीं आए होते। दूसरा जब दिमाग पर हल्का सा असर पड़ता है और उसके लक्षण भी बहुत हल्के होते हैं। तीसरा है- डिमेंशिया। इस चरण में यह बीमारी पूर्ण रूप से उभर कर सामने आ जाती है।

अल्ज़ाईमर होता कैसे है?

इस बीमारी पर काम कर रहे डाक्टरों का कहना है कि ‘ब्रेन सेल्स’ के मरने के कारण अल्ज़ाईमर की बीमारी होती है। यह व्यक्ति के स्नायुमंडल से जुड़ी बीमारी है। इसका अर्थ यह है कि जैसे-जैसे दिमाग में ‘सेल’ मरते रहते हैं उसी के साथ यह बीमारी बढ़ती रहती है।

इसके साथ कुछ ऐसी बातें जो इस बीमारी को विकसित करने में सहयोग देती है, पर उन्हें जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। इनमें सबसे बड़ी समस्या है उम्र की। उम्र बढऩे के साथ इस बीमारी के बढऩे की संभावना बढ़ जाती है।

इसके अतिरिक्त जिन परिवारों में यह बीमारी आ चुकी है उनके सदस्यों को इसके होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। यह बीमारी वंशानुगित भी चलती है। कई बार इंसान के शरीर में इस तरह के ‘जीन्स’ आ जाते हैं जो इस बीमारी को बढ़ाते हैं। इन तीनों ही चीजों पर इंसान का कोई बस नहीं है।

बीमारी से बचाव

इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। विज्ञान ने अभी तक कोई ऐसी दवा नहीं बनाई है जो इस बीमारी में सहायक हो, लेकिन कुछ चीजें़ ऐसी हैं जो बीमारी को नियंत्रित करने में इंसान की मदद करती हैं। इनमें है –

1. लगातार व्यायाम करना।

2. अपने स्वास्थ्य और हृदय को ठीक रखना।

3. दिल की बीमारी, शूगर, मोटापा, धुम्रपान और उच्च रक्तचाप से बच कर रहना।

4. अपने लिए स्वास्थ्यवर्धक खुराक लेना।

5. पूरी उम्र कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करते रहना।

कुछ अध्ययन यह भी बताते हैं कि यदि इंसान खुद को दिमागी और सामाजिक कार्यों में लगाा कर रखें तो ‘अल्ज़ाईमर’ की बीमारी से बचा जा सकता है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट एक बड़ा खतरा

लोगों को भूख से छुटकारा और शुद्ध भोजन मिलना चाहिए जिसमें किसी किस्म की कोई मिलावट या ज़हर न हो, न ही कीटनाशक दवाओं के कण हों और न ही कोई गंदगी, यह हमारे मौलिक अधिकार में दिया गया है। इसके बावजूद जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जो पानी हम पीते हैं, और जो भोजन हम करते हैं उसमें कीटनाशकों के कण मिलते हैं। भोजन में रेत, मिट्टी, चाक पाऊडर, गंदा तेल, कोलतार, डाई के रंग, पारा, सिक्का, कीटनाशक, लारवा आदि पाए जाते हैं। मछली में ‘फारमोलिन’ का बेतहाशा इस्तेमाल होता है। इसके अलावा चूहे इत्यादि भी इसमें ज़हर घोलते हैं।

खाद्य अपवर्तन अधिनियम 1954 और खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 जिसके तहत खाद्य नियंत्रक की नियुक्ति होती है के सही इस्तेमाल न होने के कारण भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और दूसरी कानून लागू करने वाली एजेंसियां व टेस्ट करने वाली प्रयोगशालाएं खाद्य पदार्थों में मिलावट को बढ़ावा ही दे रही हैं।

खेतों में रसायनिक उर्वरकों का बेजां इस्तेमाल से इसके कण खाद्य पदार्थों में आ जाते हैं और इसके अलावा कोल्ड स्टोर्स और बाज़ारों में सही सफाई व्यवस्था का न होना तथा शीतल पेय समेत खाने की चीज़ों में मिलावट खाद्य सुरक्षा के लिए बड़े खतरे हैं। इसी का परिणाम है कि कैंसर, अलसर और दमें जैसी बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हंै। इसकी वजह असुरक्षित भोजन, दूध में यूरिया या साबुन की मिलावट, घी में जानवरों की चर्बी, लाल मिर्च में ईंटों का बुरादा वगैरा बेगैरत व्यापारियों द्वारा केवल भारी मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है। इसमें भ्रष्ट अधिकारियों और प्रशासन की पूरी मिल भगत रहती है। इसी वजह से देश में लोगों की सेहत को भारी खतरा रहता है।

इन सबके होते नियंत्रक नियुक्त करने के बावजूद भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) भी ज़्यादा प्रभावी नहीं हो रहा। वह सिर्फ ‘प्रेसेसड’ भोजन पर यह लेबल चिपकाने का काम कर रहा है कि ‘एफएसएसएआई द्वारा प्रमाणित’। इससे आगे न तो वह कोई जांच करता है और न कोई नमूने लिए जाते हैं। इसमें लगातार चैकिंग भी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप इस पदार्थों को तैयार करने वाले व व्यापारी लोगों की सेहत को ऐसा नुकसान पहुंचा रहे हैं जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। खाद्य पदार्थों में मिलावट के साथ दूषित हवा और पानी के साथ हमारा स्वास्थ्य ढांचा यह सब आम लोगों की जेबों पर भी मार कर रहा है, क्योंकि लोगों की आय का बड़ा हिस्सा दवाइयों पर खर्च हो जाता है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट का अनुमान इस बात से लगता है कि खाद्य व्यापार में भ्रष्टाचार एक संस्कृति बन चुका है। इसमें सभी शामिल हैं और अफसरों की कोई जबावदेही नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें आराम से बैठी हैं और उन्हें लोगों की सेहत की कोई चिंता नहीं। जब तक संविधान की धारा 311 में संशोधन कर अधिकारियों और नौकरशाहों की जबावदेही सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक इस व्यवस्था के रहते सुधार की कोई संभावना नहीं। इसके साथ ही अफसरों को ‘जनहित’ में किए जाने वाले अधिकार को खत्म कर उन्हें जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना होगा।

केंंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक जांच में खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य एंव उपभोक्ता मामलों की ओर से देश में खाद्य पदार्थों में बढ़ रही मिलावट पर कोई उत्तर तक नहीं मिला। कुछ भी हो हालात को सुधारने के लिए उपभोक्ता को इस मामले में अधिक जागरूक करने की ज़रूरत है। उन्हें उपभोक्ता के अधिकारों के बारे में बताने की ज़रूरत है। समय की मंाग है कि खाद्य पदार्थ बेचने वाले स्थलों की नियमित जांच हो ताकि वहां कोई वैक्टीरिया न पनपे जो खाने की चीज़ों को खराब कर सके। लोगों को जागरूक करने के लिए मीडिया की सहायता भी ली जानी चाहिए।

गलियों में खाद्य पदार्थ बेचने वाले मिलावटी भोजन के एक बड़े स्त्रोत हैं। वे खुले में बैठते हैं जहां दूषित हवा और पानी खाने की चीज़ों को प्रभावित करता है। असुरक्षित पीने का पानी सबसे ज़्यादा खतरनाक है। इस प्रकार खाद्य पदार्थों में मिलावट लगातार चल रही है। सरकार ने पूरे देश में स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर बहुत पहले 30 बड़े खाद्य पार्क निर्मित करने को मंजूरी दी थी पर वे अभी कहीं नजऱ नहीं आ रहे। आरगेनिक खेती भी इसका कोई पुख्ता समाधान नहीं है। वैसे भी इस तरह की खेती पर खर्च बहुत ज़्यादा आता है। असल में इस तरह के मामले में वैज्ञानिक सोच और अध्ययन की ज़रूरत है। साथ ही बार-बार खाद्य पदार्थों के नमूने भरे जाने चाहिए ताकि लोगों को शुद्ध आहार मिल सके।

कुपोषण के शिकार 3000 बच्चे मरते हैं रोज़

15 अगस्त यानी आजादी दिवस करीब है और मुल्क की 72वीं आजादी दिवस के मौके पर वज़ीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी लाल किले से मुल्क की उपलब्धियों बावत अवाम व दुनिया को बताएंगे मगर क्या वह इसका जिक्र करेंगे कि इस मुल्क में लगभग 19 करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। कुपोषण से हर रोज तीन हजार बच्चे दम तोड़ जाते हैं। इन आंकड़ों का जिक्र इस लिए किया जा रहा है क्योंकि मुल्क की राजधानी दिल्ली में हाल ही में एक गरीब विस्थापित परिवार की तीन बच्चियों (उम्र 8,4,2 साल) की मौत का मामला सुर्खियां बना।

मौत की वजह को लेकर सत्तारूढ़ दल आप और विपक्षी दल कांग्रेस व भाजपा एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं यानी मासूमों की मौत पर सियासत जारी है। बेशक यह सवाल अपनी जगह बरकरार है कि तीन बच्चियों की मौत एक साथ कैसे हो सकती है,और पोस्टमार्टम रिपोर्ट व एसडीएम की जांच रिपोर्ट में तीन बहनों की मौत बावत जो कहा गया है, उसे समझना जरूरी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती हैं कि कुपोषण और खाना नहीं मिलने के चलते ही उनकी जान चली गई। एसडीएम की रिपोर्ट में भूख को सीधे तौर पर मौत का कारण नहीं बताया गया। इसमें बताया गया कि तीनों बच्चियां पहले से बीमार थीं, उन्हें डायरिया हो गया था। पोषक तत्वों की कमी की वजह से उनकी मौत हुई।

गरीबी के कारण उन्हें पोषक आहार नहीं मिल रहा था। इन तीन बच्चियों की मौत को लेकर अधिकांश नेतागण सदमे में हैं कि मुल्क की राजधानी दिल्ली में भुखमरी, कुपोषण की समस्या कैसे हो सकती है। पर इस महानगरी का हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। नंदी फाउंडेशन की जनवरी में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि राजधानी में 6 साल तक की उम्र वाले 31 फीसदी बच्चे यानी लगभग हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। नंदी फाउंडेशन के सदस्यों में सचिन पायलट, पूनम महाजन, डिंपल यादव और जय पांडा जैसे देश के युवा सांसद सदस्य हैं। दिल्ली में कुपोषण वाली इस तस्वीर को राष्ट्रीय स्तर पर देखने के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2014-15) का जिक्र करना प्रासगिंक होगा।

इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पांच साल से कम आयु वर्ग के 38 प्रतिशत बच्चे नाटे हैं और इसी आयुवर्ग के 21 प्रतिशत बच्चों का वजन कद के अनुपात में कम हैं। भारत में दुनिया के एक तिहाई नाटे बच्चे हैं। नाटेपन, जन्म के वक्त कम वजन होने की अहम वजह कुपोषण है। दुनिया में पांच साल से कम आयु के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं। हर साल भारत में तीन हजार बच्चों की भूखमरी और कुपोषण से मौत हो जाती है। यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल से कम आयु के बच्चों की होने वाली मौतों में से पचास फीसदी मौतों में कुपोषण का प्रत्यक्ष योगदान है।

बच्चों में कुपोषण व भूख से मरना एक गंभीर समस्या है इसे ऐसे समझा जा सकता है कि इसका प्रभाव न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी, मौजूदा

अर्थव्यवस्था पर पड़ता है बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी रहता है और कुपोषित आबादी अर्थव्यवस्था को पुश करने में भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पाती। कुपोषण के कारण मुल्क की जीडीपी को सालाना 2.95 फीसदी का नुकसान होता है। दरअसल कुपोषण के संदर्भ में यह बात ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि अगर कोई बच्चा जिंदगी के शुरूआती दो-तीन साल में ही कुपोषित हो गया तो उससे होने वाले प्रभाव अपरिवर्तनीय हैं।

भूख, कुपोषण केवल नाटा ही नहीं बनाता बल्कि दिमाग को भी पूरी तरह से विकसित नहीं होने देता। बाल्यावस्था में ही कुपोषित होने पर बच्चे की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, स्वस्थ बच्चे की अपेक्षा वह कक्षा में गैर हाजिर अधिक रहता है। बड़ा होने पर उसकी उत्पादक क्षमता कम हो जाती है और वह दूसरों की तुलना में कमाता भी कम है। ऐसे अधिकांश बच्चे बड़े होने पर भी अपने अभिभावकों की तरह गरीबी के ही कुचक्र में फंसे रहते हैं और गरीबी के ये हालात अंतत: उन्हें मार देंगे, उन बच्चों से पहले जो बचपन में भूखे नहीं सोए होंगे।

हाल ही में जिस मुल्क ने फ्रांस को पछाड़ दुनिया की सबसे बड़ी छठी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल किया है, उसका एक स्याह पहलू यह भी है कि ग्लोबल हंगर इंडक्ेस की रिपोर्ट 2017 के मुताबिक भारत 119 देशों की फेहिरस्त में 100वें पायदान पर खड़ा है। भारत भूखमरी से निपटने में उतरी कोरिया, बांग्लादेश और इराक से भी पीछे है। बेरोजगारी को दूर करने को लेकर सरकार के पास कोई ठोस जवाब नहीं है। दिल्ली में जिन बच्चियों की मौत हुई, उनके पिता मंगल सिंह के पास कोई स्थाई रोजगार नहीं था। यही नहीं बीते कई सालों से दिल्ली की अति अविकसित बसाहट में रहने वाले इस परिवार के पास राशन कार्ड तक नहीं था।

यही ऐसा अकेला परिवार नहीं था बल्कि आस-पास के कई परिवारों का राशन कार्ड नहीं बना हुआ था। हैरत है कि गरीबी उन्मूलन और भोजन के मौलिक अधिकार को लागू करने के लिए केंद्र सरकार व राज्य सरकारों की कई योजनाएं चलने के बावजूद जमीनी हकीकत क्या है,उसे ऐसी घटनाएं बयां करती हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को नोटिस जारी कर रिपोर्ट देने को कहा है। इसके साथ ही आयोग ने दोनों सरकारों से अंत्योदय योजना की स्थिति के बारे में रिपोर्ट पेश करने को कहा है। आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि मीडिया रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए हैं, इससे जाहिर होता हैं कि यह तीनों बच्चियों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ। राष्ट्रीय मानवाधिकारों आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 21 और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा है कि खाद्य का अधिकार जीने के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बीती 8 मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर वजीर ए आजम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय पोषण मिशन लांच किया और इसका तीन साल का बजट 9046.17 करोड़ रूपये है। मिशन का लक्ष्य 2022 तक नाटे बच्चों की संख्या को 25 प्रतिशत तक लाना है जो मौजूदा वक्त में 38.4 प्रतिशत है। वर्तमान में पांच साल से कम आयुवर्ग के बच्चों में नाटापन घटने की दर 1 फीसदी है। जन्म के समय पैदा होने वाले कम वजन वाले बच्चों की संख्या में सालाना दो फीसदी की कमी लाना है। मिशन बनाने के पीछे की मंशा तो समझ में आती है पर अहम सवाल यह है कि भूख, कुपोषण को एड्रस करने वाली मौजूदा योजनाओं में बरती जाने वाली लापरवाही, असंवेदनशीलता की कीमत नादान बच्चों को चुकानी पड़ती है।

सार्वजानिक वितरण प्रणाली, मिड डे मील व आंगनबाड़ी जैसे कार्यक्रमों का लाभ हर जरूरतमंद तक पहुंचे, यह एक बहुत बड़ी चुनौती अभी भी मुल्क के सामने है। भुखमरी/कुपोषण के कारण मुल्क के किसी भी कोने में होने वाली मौत दुनिया की छठी अर्थव्यवस्था पर खून के छींटे से कम नहीं।

कारखानों के जहरीले धुएं में दम तोड़ती जि़ंदगी

अचानक हुए ज़ोरदार धमाके ने पूरे बिल्डिंग को हिलाकर रख दिया …दरवाजे खुल गए खिड़कियों के कांच टूट गए… बिल्डिंग में रहने वाले लोग घबरा गए मैं बाहर आई देखा तो धुआं ही धुआं…. लिफ्ट बंद थी नीचे जाना भी मुमकिन नहीं था बच्चे चिपक गए थे उनकी घबराने की आवाज पूरे बिल्डिंग में सुनाई दे रही थी अफरा-तफरी का माहौल था कौन बचाने आता है ऐसे वक्त में… अगर बदकिस्मती से टैंक फट जाते तो हम में से यहां कोई जिंदा नहीं दिखता… हम आज भी घबराए हुए हैं हम चाहते हैं कि हमें यहां से दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए।’

‘पिछले साल 11 अगस्त को गैस लीक हुई थी सब डरे हुए थे सहमे हुए थे सब सोच रहे थे की अगर ज्य़ादा गैस लीक होती तो कौन जिंदा बचता? वैसे भी आसपास की कंपनियों से निकलने वाली गैसों ने हमारी जि़ंदगी लगभग खत्म कर दी है दुनिया भर की बीमारी है किसी को सांस लेने में तकलीफ किसी को दिल की बीमारी तो किसी को चमड़ी का रोग किसी के बाल झड़ रहे हैं हम लोग तिल तिल कर मर रहे हैं…माहूल गांव में भी लोग ऐसे ही जी रहे हैं।’

‘दुनिया सुबह उठकर सांस लेती है तो उन्हें स्वच्छ हवा मिलती है लेकिन हमें यहां की ज़हरीली हवा में सांस लेना पड़ता है बदबू जहरीली गैस शरीर की चमड़ी ऐसी जैसी जला दी गई हो सांस लेने में परेशानी होती है गले के भीतर जलन होती है क्या करें सांस लेना बंद कर दें…. सी लॉर्ड कंपनी की वजह से सब हो रहा है हमें पता है हम सांस ले रहे हैं उस हवा में जहर है हमारी सांसे बंद हो जाएंगी लेकिन इन कंपनियों से निकलने वाला ज़हर कभी बंद नहीं होगा दरअसल इंसान की कीमत ही क्या है?’

सच कहा जाए तो यह सभी हमारी मौत का तमाशा देख रहे हैं …तिल-तिलकर मरते देखने का लुत्फ उठा रहे हैं यह जानते हैं कि जिस जगह में हमें भेजा गया है वह इंसान के रहने के काबिल नहीं है फिर भी भेज दिया गया है इससे बेहतर तो वह लोग थे जिन्हें हिटलर ने गैस चैंबर में भेज दिया था उनको यह तो पता था कि उनकी मौत निश्चित है हमें तो यहां जीने के लिए भेजा गया है….।

कुर्ला के संतोषी माता नगर से अपने परिवार के साथ आई थी 2012 में हमें पता नहीं था कि हम लोगों को जिस जगह शिफ्ट किया जा रहा है मौत की गुफाएं है यहां पर आने के बाद मेरी मां को सांस लेने की तकलीफ होने लगी डॉक्टर ने बताया यहां का वातावरण उन्हें सूट नहीं हो रहा था… कहां जाते हमारा घर जो कुर्ला में था वह तोड़ा जा चुका था सब कुछ खत्म हो गया 1 साल के अंदर मेरे माता और पिता दोनों नहीं रहे मेरी भी तबीयत ठीक नहीं है पता नहीं मैं रहूंगी या नहीं। मेरा 11 साल का बच्चा नहीं बच पाया… इलाज करवाया… लेकिन उसकी जि़ंदगी लील गया माहूल… जबसे इस जगह पर आए बीमारी ने पकड़ लिया था… कौन यहां पर खुश हैं? सभी बर्बाद हो रहे हैं…।

हम किसी का नाम नहीं दे रहे नाम से क्या है नाम अलग अलग हैं चेहरे अलग अलग हैं लेकिन दर्द सभी का कमोबेश एक सा ही है।

यह माहुल है। मुंबई उपनगर चेंबूर और ट्रांबे से लगा छोटा सा गांव। माहुल में 30000 से अधिक प्रोजेक्टर अफेक्टेड पीपल रह रहे हैं यानी पीएपी। यहां के ट्रांजिट कैंप में इन्हें मुंबई के अलग अलग इलाकों से यहां लाकर बसाया गया कुछ…कुर्ला, विद्याविहार, घाटकोपर के हैं… कुछ बांद्रा महालक्ष्मी के तो कुछ तानसा पाईप लाईन या फिर माजगांव के। यह सब लोग अपने अपने-अपने इलाके में, भले ही छोटे-मोटे कमरों में थे लेकिन अपनी जिंदगी अपनी तरह से हंसते खेलते गुजार रहे थे। कभी शहर के सुधार के नाम पर कभी शहर के विकास के नाम पर और कभी सुरक्षा के नाम पर उनके बने बनाए आशियाने को उजाड़ दिया गया।

स्लम रिहेबिलिटेशन अथॉरिटी (एस आर ए ) ने यहां पर 7 मंजिला इमारतों का निर्माण कराया था। 72 इमारतों में वन रूम किचन है। देखरेख का जिम्मा बीएमसी के पास है इन इमारतों के आसपास हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम के रिफाइनरीज हैं। सी लॉर्ड कंटेनर्स, अजीज लॉजिस्टिक लिमिटेड टाटा पावर और आरसीएफ यानी राष्ट्रीय केमिकल फर्टिलाइजर फर्टिलाइजर्स है। इन्हीं कंपनियों से निकलने वाली प्रदूषित जहरीली गैस ने इन तमाम लोगों की जिंदगी जीते जी नरक बना रखी है।

2014 में यहां के निवासियों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपनी स्थिति के बारे में और सीलार्ड कंटेनर्स के खिलाफ शिकायत की थी। यहां पर 10 स्टोरेज टैंक जिनमें तकरीबन 7.30 करोड़ लीटर केमिकल है जिससे कैंसर होता है। ऐसे ही खतरनाक रासायनिक कंपाउंड है जो आसानी से वाष्पिकृत हो जाते हैं। एनजीटी ने अपनी रिपोर्ट में इस जगह को इंसानों के लिए असुरक्षित बताया है। यहां पर टाउलीन डायआइसोसाइनेट की मात्रा 45.9 मिलीग्राम पर क्यूबिक मीटर पाई गई है। अमरीकी सुरक्षा मानकों के तहत यह मात्रा 0.14 मिलीग्राम पर क्यूबिक मीटर मानी गई है। इस की अधिकता के चलते इंसान को कई प्रकार के खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं। श्वसन संबंधी बीमारियां अस्थमा और हृदय से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं। भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम रिफाइनरीज द्वारा उगली जा रही है गैस पर भी सवालिया निशान उठाया गया था। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस फैक्ट्री पर एनजीटी ने सवालिया निशान उठाए थे महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में उन्हें क्लीन चिट दे दी थी! हलांकि 2014 -15 की रिपोर्ट में महाराष्ट्र का प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने इस बात का जिक्र जरूर किया है कि वहां पर निकले बैंजोपायरीन की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक है। साथ-साथ बेंजीन, टाउलीन, झायलीन जैसी गैसों का समावेश किया गया है।

2013 में मुंबई के केई एम हॉस्पिटल ने एक सर्वे किया था इस इलाके में रिपोर्ट के अनुसार इस इलाके में स्वास्थ्य संबंधी बीमारी सबसे बड़ी समस्या है। तकरीबन 60 फ़ीसदी से ज्य़ादा लोगों को एक महीने में तीन बार से अधिक सांस लेने की दिक्कतों से जूझना पड़ता है। बावजूद सी लॉर्ड कंटेनर्स आज भी वहीं पर है! सभी केमिकल इकाई, फैक्ट्री जस के तस हैं। और जिंदगी से जद्दोजहद करते विस्थापित, पुनर्वासित और बदकिस्मत लोग भी वहीं पर। माहुल के निवासियों की समस्याओं को लेकर मुखर मेघा पाटकर सवाल पूछती है ऐसा कैसे हो सकता है कि जो इलाका इंसानों की रिहायशी के लिए असुरक्षित है वहां पर लोगों को जीने के लिए भेज दिया जाता है माहुल में सेटल और रिसेटल करना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ है। घुटने आर्डर दिया है कोर्ट ने की माहुल में किसी को शिफ्ट न किया जाए सुरक्षित नहीं है।

16 लाख देकर माहूल में सुविधाओं के सर्वे करने की बात की है क्योंकि सुरक्षा के मुद्दे की बात को दबा दिया गया है और वहां पर सुविधाओं का मसला उठाया गया। इन विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जगह का रोना रोने वालों को कौन बताए कि जगह की कमी नहीं है…. कुर्ला में 6000 घर खाली है भांडुप घाटकोपर कांजुरमार्ग में जगह की कमी नहीं है ..तत्काल टेंपरेरी शिफ्टिंग करते हैं तो इन्हें राहत मिल सकती है यह सारी जगह बीएमसी, एसआरए और म्हाड़ा के अंतर्गत आती है। प्रदूषण की वजह से सौ के करीब लोगों की जिंदगी चली गई है, बीमारियों के चलते लोग परेशान हैं, जिन इमारतों में यह लोग हो रहे हैं उन बिल्डिंग में दरारें पड़ चुकी है, लिफ्ट बंद है, पानी टपकता है चारों तरफ गंदगी है… सीवरेज का पानी ओवरफ्लो होकर बहता है नारकीय जीवन है यहां के लोगों का… फिर भी सरकार क्यों चुप बैठी है? बीएमसी अपनी सीमाओं की, मजबूरियों की बात कहकर यह काम राज्य सरकार का है कहते हुए हाथ खड़े कर देती है… इनकी मौत का जिम्मेदार कौन है?

यहां पर प्रदूषित हवा तो है ही इसके अलावा दूषित पानी भी है गंदगी है जिसके चलते यहां बीमारियां तेजी से फैलती है लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती जाती है। साफ सफाई का कोई सरोकार नहीं है। पीने का पानी नल में सिर्फ 1 घंटे आता है। स्कूल और अस्पताल नजदीक नहीं। स्किन, ब्लड प्रेशर, सांस की बीमारी अस्थमा, आंखों में जलन, गले में जलन सूजन इन सब चीजों से परेशान लोगों को इलाज कराने के लिए घाटकोपर, सायन या फिर क्राफड़ मार्केट जाना पड़ता है जो यहां से काफी दूर है। आने जाने की सुविधा के नाम पर सिर्फ बेस्ट की दो बसें हैं। स्टेशन काफी दूर है यहां पर विस्थापितों की आय काफी कम है। आना जाना बहुत खर्चीला हो जाता है। दरअसल यह जो लोग जिस इलाके में रहते थे उनकी रोजी-रोटी उसी आसपास के इलाके से जुड़ी हुई थी।

राज्य रोजगार के अभाव में आर्थिक रुप से तंगी नेवी इनकी जिंदगी को तकलीफ दे बना दिया है। छोटे-मोटे प्राइवेट क्लीनिक नज़दीक थे और सरकारी अस्पताल की सुविधा भी थी और सरकारी स्कूल भी। आनन फानन में सरकार ने इन्हें यहां पर भेज तो दिया लेकिन बुनियादी सुविधाएं देना भूल गईं। घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन के बिलाल खान कहते हैं मुझे आप दुनिया का कोई भी हिस्सा बता दें जहां पर जीते-जागते अच्छे लोगों को ऐसी जगह पुनर्वासित किया जाता है जहां के हालात बद से बदतर है इससे बेहतर वे झोपडिय़ों में ही रहते हैं जहां पर कम से कम हवा तो साफ़ थी।

महात्मा गांधी के डेढ़ सौ साल मसला, कैसे याद करें राष्ट्रपिता को [विकास संवाद का बारहवां आयोजन सेवाग्राम, वर्धा में]

मध्यप्रदेश का एक पैरवी समूह जो विकास, कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर गत 15 वर्षों से प्रदेश में कार्यरत है, प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर एक मीडिया संगोष्ठी करता रहा है जिसमें वह देश भर के लीडिंग पत्रकारों को बुलाकर किसी एक विषय पर फोकस करते हुए चर्चा, बहस और मुद्दों को सामने रखता है साथ ही यह उम्मीद होती है कि ये पत्रकार साथी यहां से लौटकर अपने अखबारों, पत्रिकाओं या चैनलों में जाकर इन मुद्दों की पैरवी करें; यह भी कोशिश होती है कि पत्रकार सिर्फ अपने बीट से संबंधित ही नहीं – बल्कि व्यापक स्तर पर अपनी समझ बनाएं और पढ़े लिखे; ऐसा नहीं कि पत्रकार पढ़े-लिखे नहीं है परंतु अपने दैनंदिन कामों में उन्हें कई बार इतना समय नहीं होता कि वह विभिन्न संदर्भ टटोलकर पढ़े-लिखे, विश्लेषण करें, मंथन करें या अपने साथियों के साथ बैठकर खुले और मुक्त भाव से चर्चा कर सकें। गत 12 वर्षों से आयोजित होने वाला यह मंथन इस वर्ष गांधी जी के सेवाग्राम जिला वर्धा में आयोजित था. उल्लेखनीय है कि यह गांधीजी का 150 जयंती वर्ष होगा जिसमें सरकार ने घोषणा की है कि इसे धूमधाम से मनाया जाएगा यह संयोग ही है कि यह कस्तूरबा का भी 70 वां जन्म वर्ष है, विकास संवाद ने अपना बारहवां मीडिया विमर्श अबकी बार सेवाग्राम वर्धा में दिनांक 17 से 19 अगस्त तक किया था जिसमे देश भर से करीब 130 पत्रकार आये थे

निश्चित ही इस तरह के आयोजन बहुत श्रम साध्य होते हैं और इन की तैयारी लगभग 3 से 4 माह पूर्व आरंभ करना होती है जिसमें नाम छाँटने से लेकर स्थान का चयन, आरक्षण, सामग्री तैयार करना, वक्ता तय कर उन्हें बोलने के लिए तैयार करना और फिर उन सब को निमंत्रित करना और अंत में आयोजन सफल और सिद्ध हो जाए इसके लिए भरसक प्रयास करना; विकास संवाद की पूरी टीम इस काम में अपना समय, ऊर्जा और तन-मन-धन झोंक देती है तब कहीं जाकर आयोजन असली रंग रूप ले पाते हैं। इस काम में टीम के साथ – साथ विकास संवाद के साथ जुड़े सहयोगी साथी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए एक बड़ा समूह इस महती कार्य को पिछले 12 वर्षों से लगातार पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता से करता आ रहा है, निश्चित ही इसके लिए सब बधाई के पात्र हैं साथ ही वह पत्रकार जो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे और आज एक दो बच्चों के पप्पा है – से लेकर देश के विभिन्न बड़े अखबारों और न्यूज़ चैनल्स में काम कर रहे हैं बड़े पदों पर आसीन साथी भी धन्यवाद के पात्र है – जिन्होंने प्रतिवर्ष इसे एक रस्मी आयोजन ना मानकर शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी समझकर इसमें शिरकत की है और विकास तथा शिक्षा स्वास्थ्य और कुपोषण से जुड़े मुद्दों को मीडिया की मुख्यधारा में लाकर खबर बनाया है

यह बात तसल्ली देती है कि हर वर्ष नए साथी इस में जुड़ते हैं और जो नहीं आ पाते वह अपनी टीस बाहर से व्यक्त करते हैं, कितने अफसोस की बात है कि इस तरह के आयोजनों के लिए भी मीडिया संस्थानों में दफ्तर की छुट्टी का प्रावधान नही हो पाता है और किसी किसी को झूठ बोलकर या छुट्टी लेकर आना पड़ता है

युवाओं की सीखने की लगन और बहस करने की भावना को देखा जाना चाहिए जो बहुत स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछते है, पढ़ते है, बहस करते है और जाते समय बहुत भावुक होकर जाते है. इस पूरी यात्रा में देशभर के पत्रकारों में एक सार्थक चर्चा हुई है और सामंजस्य भी पैदा हुआ है वे साल भर अपने मुद्दे शेयर कर चर्चा करते है और लगभग पारिवारिक रिश्तों में तब्दील हो चुके इन संबंधों की ऊर्जा हर संवाद में स्पष्ट दिखाई देती है

एक शिकायत अक्सर सबको रहती है कि समय कम है या सत्र दिन दिन भर के बहुत लंबे और बोझिल हो जाते है जिसे इस बार कई मित्रों ने औपचारिक रूप से आयोजकों को दर्ज किया है और यह खुशी की बात है कि सचिन जैन ने इसे स्वीकारा भी है और आश्वस्त किया है कि अगली बार से कुछ समानांतर रूप से चर्चा सत्र और व्याख्यान सत्र आयोजित किये जायेंगे अलग अलग विषयों पर ताकि सबको आपस मे बातचीत और अपनी बात कह के सुनने का मौका भी मिलें

सेवाग्राम और बापू

बहुत सारी खराब बातों के बावजूद भी बहुत सारी अच्छी बातें अभी भी सेवाग्राम के आश्रम में मौजूद हैं, इनमें से प्रमुख हैं – स्वच्छता, प्रार्थना और स्वावलंबन; पूरे परिसर में स्वच्छता अपने आप में बहुत बड़ी बात है जो आपको हर जगह नजर जायेगी, दिनभर कर्मचारी आपको सफाई करते नजर आएंगे

बापू की धरोहर भी महत्वपूर्ण हिस्सा है इस विरासत का – जिस तरह से गांधी की सारी सामग्री को एक परिसर में संजोया गया है वह वह अकल्पनीय है, हर कुटी का अपना इतिहास और अपनी कहानी है; हर कुटी में तख्तियां लगी है कि यहां कौन आया था, इनका क्या उपयोग हुआ था और इनका क्या संदर्भ है। बापू की धरोहर – यथा टाइपराइटर, पेन, घड़ी, चश्मा, कपड़े, छड़ी, संडास, टेलीफोन, बर्तन, बाल्टियां, टब, टेबल पलंग, मसाज टेबल आदि बहुत सावधानी से रखे भी गए हैं और सुरक्षित भी किए गए हैं ताकि आने वालों को सारी चीजें तसल्ली से देखने को मिले और वह स्वतंत्रता के इस मसीहा की उपयोग की हुई सामग्री को देख सकें

बापू की कुटी बनाने के लिए मीरा बहन को कहा गया था कि यदि वह सौ रुपए से अधिक सामग्री की होगी तो बापू नहीं रहेंगे अस्तु मीरा बहन ने सारी सामग्री आसपास से जुटाई – बांस, मिट्टी, पत्थर, घास और फिर उस पर गोबर से लिपाई करके इतना मजबूत बनाया कि आज का सीमेंट और बालू के ढाँचे भी उसके सामने टिक नहीं पाते प्रबंधकों ने बताया कि दुनिया के बेहतरीन 3 आर्किटेक्ट को बुलाकर जब हमने नए ढांचे बनवाने के लिए कहा था तो आग्रह किया था कि बापू की कुटी को जरूर देखा जाए; उनमें से एक विश्व विख्यात आर्किटेक्ट की आंखों में पानी आ गया कि कैसे इतना मजबूत काम मात्र 100 रुपए में हो गया

प्रतिदिन सुबह शाम होने वाली प्रार्थनाएं यहां का प्रमुख आकर्षण है जिसमें बीच मैदान में बैठकर शाम को ठीक 5:45 पर सांध्यकालीन प्रार्थना होती है सुबह की मैं अटेंड नहीं कर पाया था, इसलिए नहीं कहूंगा पर शाम वाली प्रार्थना आत्मा के कोर कोर को जागृत करने का कार्य अवश्य करती है कोई आडंबर नहीं कोई पूजा पाठ नहीं हार फूल नहीं मात्र गांधी का फोटो और एक चरखा रखा होता है सर्व धर्म प्रार्थना जापानी प्रार्थना से शुरू होती है और अंत गुरुवाणी से होता है, इसके बाद एक भजन होता है – तत्पश्चात रघुपति राघव राजा राम की धुन गाई जाती है और किसी एक किताब के एक पृष्ठ का वाचन होता है हमने भगवान सिंह द्वारा लिखित किताब ‘अंबेडकर और गांधीÓ के तीन पन्ने 3 दिन तक रोज़ सुने मुझे याद आया कि जब यह किताब छप कर आई थी तो हंस के संपादक स्व राजेंद्र यादव ने इस किताब पर एक लंबा संपादकीय लिखा था और इस बहाने दलित और हरिजन शब्द के मायने सामने रखते हुए एक नए सिरे से बहस को प्रस्तुत किया था पूना पैक्ट, अम्बेडकर गांधी की बहस को हमने समझा था

स्वालंबन – सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक सिद्धांत है जो सेवाग्राम ने अभी तक अपने अंदर बनाए रखा है अच्छी बात यह है कि आश्रम में प्रवेश से लेकर देखने और फोटो खींचने शूटिंग करने की निशुल्क सुविधा है कहीं भी कोई शुल्क नहीं लिया जाता, कोई रोकटोक नही और बिल्कुल भी डाँट फटकार नही, कोई भी आपको विशाल वृक्षों के नीचे घूमने से एओक नही सकता, मौलश्री से लेकर नीम पीपल बरगद के इतने घने और ऊंचे पेड़ है कि अब अगर हम बोयें भी तो इन्हें बड़ा होने के पहले ही विकास नामक भस्मासुर निगल जाएगा

दूसरा भोजनालय में जो भी सामग्री बनाई जाती है वह सादी, शुद्ध और सात्विक होती है; मांसाहार का प्रयोग सर्वथा अनुचित है, पूरे परिसर में गुटखा, सिगरेट, पान, तंबाकू, शराब और मांसाहार पर कड़ा प्रतिबंध है; यात्री निवास या गेस्ट हाउसेस के कमरों में यदि कोई करता भी होगा तो संभव है छुप कर करता हो, पर मुझे लगता है यहां आने पर सबके मन में एक पवित्र भाव आ ही जाता है जो उन्हें इस तरह के कर्म करने से रोकता है

भोजनालय में कार्यकर्ताओं से पूछने पर उन्होंने बताया कि लगभग सारा अन्न, दूध, मसाले और सब्जियां आसपास की ही हैं और सब जैविक खेती से उपजाई जाती हैं; महिला बचत गट अर्थात महिलाओं के स्व सहायता समूह बने हैं जो यह काम करते हैं और आश्रम में प्रतिदिन सप्लाई करते हैं, खाने में दोनों समय गुड रखा होता है साथ ही दही या छाछ जरूर होता है जो बापू को प्रिय था। हमें पहले दिन भोजन में मीठा नहीं परोसा गया था क्योंकि देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी का देहावसान हो गया था और यह राष्ट्रीय शोक का विषय था इस बात को लेकर हमें अच्छा लगा कि भोजन में भी इस तरह से सावधानी बरती गई थी

पूरे परिसर में यह तीन सिद्धांत आज भी हर कसौटी पर खड़े हैं इसलिए गांधी भी है सेवा आश्रम भी है और लोग भी हैं पूर्ण सभ्यता, शुचिता और संस्कृति को बचाते हुए

देश के गांधी अड्डे और सिद्धांत

एक ही है सेवाग्राम देश में, एक है कस्तूरबाग्राम इंदौर में और फिर देशभर में फैले है – गांधी चबूतरे और गांधी आश्रम, पीठ, अध्ययनकेन्द्र और पुस्तकालय नुमा अड्डे जिनमे अब ना गांधी जिंदा है और ना गांधी के सिद्धांत या मूल्य, बचा है तो झगड़ा, तर्क – कुतर्क, हिसाब – किताब, श्रेय लेने की पागल दौड़ और खादी के झब्बे पहनें नकली लोग – जो ना कुछ कर पा रहें और ना इन अड्डों की कुर्सियां छोड़ रहें; अपने पोपले मुंह और नकली बत्तीसी से देश का ज़मीनी गांधी चबाते अब सिर्फ येन केन प्रकारेण अनुदान डकारने की फिराक में रहते है; हाँ – यह अभी संतोष की बात है कि मोदी सरकार के पांच करोड़ अनुदान लौटाकर मॉरल बनाये रखते है और छबि भी जिसमे सेवाग्राम भी शामिल है

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगने लगा है पिछले 32 वर्षों में देश भर गांधी विनोबा या अन्य सर्वोदयी महान संतों के आश्रम, अकूत चल अचल सम्पत्ति देखकर कि या तो ये सब राजसात करके नया कुछ किया जाये या इन्हें पुनरुद्धार करके नवसृजन किया जाये क्योकि अब ये सिर्फ बड़े – बड़े ढाँचें है जो बड़ा तगड़ा मेंटेनेंस मांगते है और इतना रुपया इस देश मे नही कि गरीबी, भुखमरी, बीमारी, मलेरिया, कुपोषण या रोजगार के बदले इन्हें बनाएं रखने के लिए धन उपलब्ध करवाया जाए

शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, पशु पालन, खेती, स्वाध्याय, सौर ऊर्जा, खादी उत्पादन और ग्रामीण विकास के सभी क्षेत्रों में ये जिन तरीकों को अपना रहें है वे महज पुराने होने से असफल नही है, बल्कि अब उन तौर तरीकों में प्रतिबद्धता, मूल्य और सिद्धांतों का गहरा घालमेल है और अंदर ही अंदर इन जगहों पर बैठे लोगों में कुर्सियों से चिपके रहने का भी बड़ा लालच है और उम्र के आठवें, नवमें दशक में पदों के प्रति लालसा खत्म नही हो रही; ये लोग वो दीमक बन गए है जो गांधी का चरखा चबा गए, भरे पेट पर देश खा गए, फिर भी ये भूखे के भूखे – मांग रहें अनुदान

सेवाग्राम में नई तालीम के प्रबंधक हो या ट्रस्टीगण सबने अपनी अपनी जगह पर बड़े बड़े धंधे खोल रखें है और यहां ईमानदारी के चोगे ओढ़ रखें हैं इंदौर कस्तूरबा ग्राम से हम सब वाकिफ ही है कि कैसे यह संस्थान एक व्यवसायिक केंद्र बन गया कुल मिलाकर

मुझे हर जगह देशी विदेशी लोग बहुतायत में दिखते है, यात्रियों के झुंड दिखते है, गांधी को लेकर झंडा उठाएं अपना एजेंडा लिए लीगों के हुजूम नजर आते है अधिकाँश युवा है जिनके पास विकल्प है वे कर्मशील भी है सम्भवत: दृष्टि ना हो पर दृढ़ इरादे जरूर है पर कोई भी प्रबंधन इन्हें जगह नही देना चाहता – मसलन सेवाग्राम में मगा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि है [जैसा भी है कच्चा – पक्का, उसकी चर्चा कल] जहां गांधी अध्ययन के युवा छात्र है अभी तक दर्जनों पी एच डी कर निकल चुके है पर कोई भी इस पैतृक संस्थान में टिकते हुए नजर नही आया आखिर क्यों

बातें थोड़ी ज़्यादा ही कड़वी है पर इधर तीन चार बरसों में लगातार गांधी आश्रमों में गया हूँ सेवाग्राम सहित इसलिए प्रश्न उठते है दिमाग़ में, कचोटते है और लगता है कि मुझे कम से कम सिलसिलेवार लिखना तो चाहिए ही कि कही कोई तो सोचे और इस बात से भी मैं मुतमईन हूँ कि कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और राजनैतिक सत्ता गांधी को इस्तेमाल सब करेंगे पर गांधी चाहता कोई नहीं

विकास के चरण पड़े सेवाग्राम पर

सेवाग्राम में सरकार ने 145 करोड़ की विकास योजना बनाई है वर्धा विकास प्राधिकरण लागू कर रहा है, पोस्ट आफिस तोडऩे की फिराक में है उसके ठीक सामने पक्की नाली बनाई है जो सात करोड़ की है और पीछे सार्वजनिक शौचालय बन रहे है .मगन भाई संग्रहालय की विभा ने बताया कि लोगों के विरोध के बाद भी सरकार हस्तक्षेप करके सेवाग्राम को विकसित कर मूल स्वरूप बिगाड रही हैं और सौ रुपये में बना बापू का मकान आज करोड़ों रुपयों की बर्बादी देख रहा है

संस्थान के प्रबंधकों में एका नही है और आपस मे स्वार्थवश झगड़ते रहते हैं जिससे गांधी आश्रम की हालत खराब होती जा रही है, देश भर के सौ पत्रकारों को विभा जी ने जिस दर्द के साथ दास्तान सुनाई विकास, 145 करोड़ रुपयों की कहानी वह दर्द से ज़्यादा व्यक्तिगत कुंठा ज़्यादा लगी मुझे. क्या बात है कि जिस पोस्ट आफिस का उपयोग गांधी करते थे वहां प्रबंधन ने एक व्यक्ति को गत 35 वर्षों से क्वार्टर के रूप में रहने को दिया है – क्या यह है गांधी की विरासत को संवर्धित करने का तरीका और सदुपयोग

तीन दिन पत्रकारों की गोष्ठी में आश्रम में खादी भंडार होते हुए नई तालीम के प्रबंधन ने नागपुर के चलते फिरते खादी भंडार को बुलाकर रखा था और बिक्री करवाई जोकि अपने आपमें सवाल है, क्यों नही आश्रम की खादी की दुकान को प्रमोट नही किया लगभग दो लाख की बिक्री हुई है क्या इससे आश्रम के खादी बनाने वालों को लाभ नही मिलता

सवाल कई है – गांधी के 150 साल पूरे होने पर 2 अक्टूबर से देशभर में आयोजन होंगे पर इसकी अभी कोई तैयारी दिखाई नही देती सर्वोदय सेवा संघ कलेक्टिव के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी भयानक बूढ़े और अक्सर बीमार रहतें हैं ऐसे में क्या उम्मीद की जाएं कि ये लोग गांधीवाद और गांधी के मूल्यों, सीखों को आम जन तक ले जाएंगे और देश मे भयमुक्त साम्प्रदायिकता मुक्त माहौल बनेगा, सिर्फ मेकेनिकल ढँग से नित्य प्रार्थनाएँ गाने से काम नही चलेगा अब और खादी के झब्बे पहनने से भी देश गाँधीमय हो जाएगा ?

मगा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विवि और गांधी

अशोक वाजपेई की प्रतिभा से हम सब वाकिफ हैं, हम सब जानते हैं कि वह एक बेहतरीन कवि, विचारक, आलोचक और गद्य विधा के लेखक हैं, सम्पादकीय हुनर है, साथ ही उनके पास जो विरल दृष्टि है वह इस समकालीनता में दुर्लभ है. अशोक वाजपेई मूलत: टीकमगढ़ मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं जो बुंदेलखंड का इलाका है और बुंदेलखंड ने देश को तीन विलक्षण व्यक्ति दिए; एक – अशोक वाजपेयी, दो – प्रोफेसर कृष्ण कुमार और तीसरे – नवगीतकार स्वर्गीय नईम जो देवास में मृत्यु पर्यंत रहें। अशोक वाजपेई ने सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेजी में एम ए करने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में काम करने का ठाना और आजीवन वे मध्यप्रदेश काडर में विभिन्न वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर रहे, इस दौरान उनका कविता और साहित्य से रुझान बराबर बना रहा. यह सौभाग्य ही है कि मध्यप्रदेश में अशोक वाजपेई, स्व सुदीप बनर्जी, अशोक जी के भाई डाक्टर उदयन वाजपेई ने कविता की एक अलग जमीन बनाई और उसे पोषित करते रहे. अशोक जी ने ना मात्र कविता रची, बुनी -गुनी, बल्कि कविता के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भी रहे . मध्य प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में साहित्यकारों के नाम से पीठ स्थापित की, तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह के कार्यकाल में भारत भवन जैसे विशाल सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना भोपाल में की – जो आज देश-विदेश में संगीत और ललित कलाओं के लिए प्रसिद्ध है. सेवानिवृत्ति के बाद अशोक जी सक्रिय भी रहे और उन्होंने सेवाग्राम के समीप महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की और प्रथम कुलपति रहे.

दुर्भाग्य की उस विश्वविद्यालय में आज गांधी तो है परंतु गांधी के मूल्य छात्रों में एक सिरे से नदारद है, विशुद्ध गुंडे और मवाली किस्म के छात्र वहां शोध और अध्ययनरत है। किस्सा यूं है कि सेवाग्राम में जब गांधी से संबंधित राष्ट्रीय मीडिया संगोष्ठी चल रही थी तो पहले दिन से ही पत्रकारिता के छात्र गोष्ठी में भाग लेने के लिए आए थे पत्रकारिता विभाग के कुछ प्राध्यापक भी वहां मौजूद थे यह सभी छात्र या तो एम फिल कर रहे थे या पीएचडी, इनके साथ – साथ हिंदी तथा गांधी अध्ययन और बौद्ध अध्ययन के छात्र भी थे

पहले दिन उन्होंने पंजीयन के समय पत्रकारों को दी जानेवाली किट की मांग की जिसमें एक खादी का झोला प्रमुख था, साथ ही एक लेटर पैड, एक पेन और गांधी दर्शन से संबंधित विकास संवाद का प्रकाशन था, चूंकि झोले निश्चित मात्रा में ही बनवाए गए थे वह भी कर्नाटक के बेंगलुरु से मंगवाए गए थे इसलिए निश्चित संख्या में ही उपलब्ध थे और ये सिर्फ पंजीकृत और आमंत्रित पत्रकारों के लिए ही थे, झोले को छोड़कर शेष सामग्री सभी छात्रों को भी निशुल्क दी गई थी – छात्रों को बताया गया कि ये झोले आपके लिए नहीं है, सीमित संख्या में है और यदि फिर भी झोले बचते हैं – कोई नही आया तो तो आखिरी दिन दिए जा सकते हैं।

बड़ी संख्या में विवि के छात्र रोज सुबह शाम आते – खाना खाते, नाश्ता करते, चाय पीते और शाम को कार्यक्रम समाप्त होने के पूर्व ही चले जाते हैं. इस बात का इनसे कोई धेला नही लिया गया सब कुछ निशुल्क था और यह जताया भी नही गया था, आखरी दिन जब वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के साथ-साथ अन्य लोगों का व्याख्यान था और देशभर के पत्रकारों को वर्धा या नागपुर से वापसी के लिए ट्रेन और हवाई जहाज पकडऩे थे – तो भोजन के समय पहले आमंत्रितों को भोजन करने दिया गया और छात्रों को निवेदित करते हुए कहा गया कि वे थोड़ा रुक जाएं क्योंकि वे स्थानीय हैं और सब के साथ बाद भोजन कर सकते हैं, विकास संवाद के साथ वरिष्ठ लोगों ने भी सबसे अंत मे ही भोजन किया था उस दिन, भीड़ होने से अक्सर अव्यवस्था हो रही थी लगातार, इस बात पर छात्रों को बहुत गुस्सा आया कि हमें भोजन कक्ष में जाने से रोका गया और यह हमारा अधिकार है, यह हमारा शहर है आदि आदि बकवास करने लगें और उन्होंने पंजीयन पर बैठे विकास संवाद के महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदतमीजी से झगड़ा किया और मांग की कि हमें खादी के झोले तत्काल दिए जाएं, आयोजकों ने उन्हें भरसक समझाने की कोशिश की और खाने के लिए भी मनाया – परंतु वे विशुद्ध गुंडई और दादागिरी पर उतर आए और कहने लगे कि हम बच्चे नहीं हैं, हम शोध छात्र हैं, हम देख लेंगें और हमें सब मालूम है – यहां क्या हो रहा है. एक समाज सेवी संस्था – जो अपने न्यूनतम संसाधनों, सीमित साधनों और आर्थिक प्रयासों से और लोगों की सहभागिता से ऐसे नेक आयोजन करती है – उसकी मंशा पर सवाल उठाना और नाजायज मांग करना कहां तक छात्रों के लिए जायज है।

अफसोस यह है कि विश्वविद्यालय के कोई भी जिम्मेदार प्राध्यापक वहां थे नहीं, अधिकांश लोग शनिवार – रविवार होने से अपने घर चले जाते हैं और इनमें से भी बहुत से लोग अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में हिस्सेदारी करने के लिए मॉरीशस गए हुए थे, खैर – जैसे तैसे वरिष्ठ लोगों के हस्तक्षेप से छात्रों को मनाकर खाना खिलाया गया और वापस विवि में रवाना किया गया – परन्तु अफसोस यह है कि छात्रों का यह उज्जड रवैया बेहद शर्मनाक और घटिया था। बाद में कुछ लोगों ने बताया (जो यही से पूर्व में पीएचडी है) कि आजकल विवि में नेतागिरी आम है और कक्षा में छात्रों को पढ़ाना मुश्किल ही नही नामुमकिन है, इतना माहौल खराब है कि प्राध्यापक कक्षाओं में जाना ही पसन्द नहीं करतें और दलित – सवर्ण की लड़ाईयों के साथ छूटभैया राजनीति भयावह रूप से हावी है, कबीर पहाड़ी पर तमाम अनैतिक कार्य होते है और वीसी भी रोक नही पा रहें, पूरा विवि तदर्थ और कार्यवाहकों के भरोसे चल रहा है और गांधी के मूल्य तो दूर सामान्य सदाचार और शिष्टाचार भी विवि में नही है, हॉस्टलों में पूर्व छात्रों का अवैधानिक कब्जा है और विवि के पास स्थित पंजाबी कॉलोनी में छात्रों के कमरे है जहां से कई प्रकार की अनैतिक गतिविधियां चलाई जाती है

यह दर्शाता है कि अशोक जी ने जिस स्वप्न और दृष्टि के साथ हिंदी विवि की परिकल्पना की थी – उसकी त्वचा पर गुंडई और राजनीति की कितनी कलई चढ़ चुकी है सवाल यह है कि इसे कौन और कैसे और कब उतारेगा, गांधी के देश और गांधी के संस्थान में विश्व शान्ति हेतु द्वितीय विश्व सम्मेलन जिस हॉल में हुआ था – उसके ठीक सामने यदि युवा छात्र नाजायज मांगों के लिए किसी एनजीओ के लोगों से सरकारी संस्थान मानकर लड़ाई करें, बात सुनने और समझने को तैयार ना हो तो उनकी शिक्षा – दीक्षा का क्या महत्व है, शर्म आती है कि हमने एक ऐसी पीढ़ी पैदा की हैं – जो बेहद लापरवाह, उज्जड और गंवार है – बावजूद इसके की इनके पास सरकारी छात्रवृत्ति पाकर पाई हुई पीएचडी की डिग्रियाँ है।

परंपरा के नाम पर प्रदूषण का खेल

चंडीगढ़। पवित्र कही जाने वाली तीर्थ नगरी हरिद्वार में 28 जुलाई से 9 अगस्त तक कांवड़ मेला चला। 25 जुलाई से6 अगस्त तक हरकी पैड़ी और शहर के अन्य हिस्सों में घूृमने का अवसर मिला। कांवड मेले के दौरान जहां हरकी पैड़ी मेला क्षेत्र में शोरगुल और गंदगी का आलम पसरा रहा, वहीं राष्ट्रीय राजमार्ग से लगती शहर की मुख्य सड़कें कांवडिय़ों से अटी रहीं। हाल यह था कि स्थानीय लोग तो असुविधा झेल ही रहे थे कि बाहर से आने वाले संवेदनशील श्रद्धालु और पर्यटक भी व्यवस्था का आलम देखकर दांतों तले उंगली दबाते।

गौरतलब है कि कांवड़ लाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले तक काफी हद तक श्रद्धा-भक्ति का उदाहरण पेश करती थी लेकिन इसके बाद कांवड़ यात्रा की सच्चाई दिनों-दिन दूषित होती चली गई। हालांकि सच्चे श्रद्धालुओं की संख्या अब भी काफी है लेकिन परंपरा और कर्मकांड के नाम पर ध्वनि प्रदूषण और गंदगी फैलाने वाले भारी पड़ रहे हैं।

शास्त्रों के मुताबिक गंगा में मल-मल कर स्नान करने, साबुन-तेल का इस्तेमाल करने, स्नान के बाद उतारे हुए कपड़े और अन्य वस्तुएं न डालने का सख्त निर्देश किया गया है। इसके बावजूद कांवड़ मेले में चारों तरफ गंदगी फैली रही। ऊपर से लगातार बरसात होने से कीचड़ के चलते मेला क्षेत्र और मुख्य सड़कों पर जगह-जगह कचरे के ढेर लगे दिखाई दे रहे थे। जगह-जगह टूटी सड़कें दुर्घटनाओं को न्योता दे रही हैं। कहा जाए तो शासन व्यवस्था काफी कमज़ोर दिखाई देती है। निगम कर्मचारी भी कहीं-कहीं सफाई करते हुए मिल जाते हैं।

स्वच्छ -निर्मल गंगा का सपना अधूरा:

गंगा में मिलते बरसाती नाले, सीवर, पब्लिक द्वारा गिराया जाता कचरा, गंदे कपड़े और प्लास्टिक के चलते गंगा को स्वच्छ-निर्मल बनाने के सरकारी नारे खोखले दिखाई देते हैं। अगर कहीं कुछ काम हुआ भी हो तो वो समुद्र में बूंद के समान ही होगा। शहर के संवेदनशील और बुद्धिजीवी लोग गंगा की इस दयनीय अवस्था से काफी दुखी और चिंतित हैं। कांवड़ मेले के बारे में उनका कहना है कि कांवडि़ए कहीं भी जहां-तहां गंदगी फैलाते चलते हैं, नतीजा यह होता है कि मेले के बाद शहर में कोई न कोई बीमारी फैल जाती है। हालांकि वो इस बात से भी इन्कार नहीं करते कि गंगा में गंदगी फैलाने वाले स्थानीय लोगों की संख्या भी काफी है जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है।

कांवडिय़ों का संदेश

कांवड़ मेले में विश्राम करते हुए और चलते हुए बहुत से कांवडिय़ों से जब कुछ मुद्दों पर बात की गई तो उन्होंने एकमत से स्वीकारा है कि बहुत से कांवडि़ए कानून का पालन नहीं करते। ज़ोर-ज़ोर से डीजे बजाते हुए चलते हैं। दिल्ली से आए राहुल, अमित और राजू पहली बार आए हैं। लेकिन ये युवा बाहरी कर्मकांड पर ज्य़ादा विश्वास नहीं रखते। वे कहते हैं उन्हें सिर्फ भोले से प्यार है। मानते हैं कि बाबाओं के चक्कर में उनका धार्मिक विश्वास कम हुआ है। हरियाणा-पंजाब से आने वाले बहुत से कांवडि़ए मानते हैं कि इस दौरान लड़की छेडऩे की घटनाएं होती हैं जबकि महिलाओं का सम्मान करना चाहिए। कांवड़ यात्रा की श्रद्धा के नाम पर शोरगुल और अन्य प्रदूषण हावी हुआ है, ऐसा ज्य़ादातर कांवडि़ए स्वीकार करते हैं।

पुलिस के लिए चुनौती नशे का बढ़ता चलन

ज्य़ादातर कांवडि़ए बस, ट्रेन या फिर अपनी गाड़ी से आते हैं और जाते पैदल हैं। कोई तीन सौ, साढ़े तीन सौ तो कोई चार सौ किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। देखने में आता कि बहुत से कांवडि़ए बीड़ी, भांग, गांजा पीते हुए चलते हैं। महेश-सुरेश, बलवंत, काका और अमरकांत कांवड़ लेकर भिवानी जा रहे थे। उन्होंने माना कि यात्रा के दौरान अक्सर कांवडि़ए बीड़ी-सिगरेट, गांजा, सुल्फा, भांग का सेवन करते हैं। कहते हैं वे अपने को शिव के भक्त से ज्य़ादा भूत-प्रेत मानते हैं। ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मी बताते हैं कि कई कांवडि़ए शराब भी साथ लाते हैं। नशे का बढ़ता चलन पुलिस के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है।

बच्चों और महिलाएं भी आगे

कांवड़ लेकर जाने में बच्चों और महिलाओं की संख्या भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस बार भी युवा और बूढ़ी महिलाएं तक कांवड़ लेकर चलती रहीं। हरिद्वार से साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक पैदल कांवड़ ले जाना शीला को मुश्किल नहीं लगता। उसने पुत्र कामना से कांवड़ लाने की प्रतिज्ञा की थी जो पूरी हुई। दिल्ली में रहने वाली यूपी के सुल्तानपुर की ललिता का बेटा छत से गिर गया था। अस्पताल ले जाते समय उसने मन्नत मांगी थी, पुत्र सकुशल था। संतोषजनक बात यह है कि महिलाएं स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत योजना को महत्वपूर्ण मानती है और उसकी पक्षधर हैं।

बिजनेस को लग चुके हैं पंख

कांवड़ मेले के दौरान हर तरह का व्यापार फला-फूला है। स्थानीय लोगों की मानें तो इस आयोजन से यहां का व्यापार कई सौ गुना बढ़ गया है वो चाहे तरह-तरह के कांवड़ हों, गंगाजल भरने की प्लास्टिक बोतलें, धातुओं के बर्तन, शिव की तस्वीरों वाली टी-शर्ट, गमछे, पतलून, घुंघरू, छाते, सजावट का सामान और खाना-पीना। यही कारण है कि रु पया-पैसा श्रद्धा और परंपरा पर हावी हो गया है। खुले में बिकने वाला खाने-पीने का सामान इस्तेमाल के बाद गंदगी और बीमारी फैलाने की वजह बनता जा रहा है। व्यापारियों और कांवडिय़ों के लिए कहीं कोई नियम-कानून लागू होते नज़र नहीं आते। जुर्माने के बावजूद प्लास्टिक का खुलेआम इस्तेमाल हो रहा है। कहीं कोई चैक करता दिखाई नहीं देता।

जलपान की व्यवस्था

कांवडिय़ों के लिए शहर में कई धार्मिक संस्थाओं ने जलपान और भण्डारे की व्यवथा कर रखी थी। लेकिन ज्य़ादातर कांवडि़ए खा-पीकर दोने पत्तल वगैरह रखे गए डस्टबिन में डालने की बजाए इधर उधर फेंक कर चलते बनते थे। शहर के दुकानदार बताते थे कि राह चलते कांवडि़ए शौच के लिए कहीं भी इधर उधर चले जाते हैं। कई कांवडि़ए आश्रमों में शौच के लिए जाते रहे तो कई नहाने के लिए शरण मांगते देखे जा सकते थे।

शहर में बढ़ी अव्यवस्था

तीर्थ नगरी को वर्षों से जानने समझने वाले गंगा सभा के महासचिव आर.के. मिश्रा बताते हैं कि 25-30 साल पहले लेटने वाले (सैंकड़ों में) कांवड़ और उठक कांवड़ (हज़ारों में) होते थे जो बांस के कांवड़ में शीशे की बोतलों मेें गंगाजल भरकर ले जातेे थे। धीरे-धीरे प्लास्टिक और धातुओं ने उनकी जगह ले ली। अब मोटरसाइकिल, गाडिय़ों में खाने का सामान भरकर लाते हैं, खाकर बचा-खुचा कचरा वहीं छोड़ जाते हैं। पहली श्रेणी वालों से इनकी संख्या बहुत बढ़ गई है। लेटकर जाने वाले श्रद्धालू कांवडि़ए इक्का-दुक्का ही बचे हैं। इसलिए शहर में बदतमीजी और छेडख़ानी की घटनाएं बढ़ गई हैं। कुछ दिनों के लिए शहर में अघोषित कफ्र्यू जैसी स्थिति हो जाती है। स्थानीय लोगों को असुविधा होती है।

पुलिस व्यवस्था फिर भी ठीक

हज़ारों-लाखों कांवडिय़ों की निगरानी छोटी बात नहीं, फिर भी कांवड़ मेले में पुलिस प्रशासन की व्यवस्था चुस्त नज़र आई। जगह-जगह पुलिसकर्मी ट्रैफिक की व्यवस्था संभालते नज़र आए। कई जगह तो सड़कों पर गड्ढे भरते भी नज़र आए। पुलिसकर्मियों का कहना था कि इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर कांवड़ मेला ठीक-ठाक रहा। कावंड़ मेला प्रकोष्ठ के मोहन सिंह का कहना है कि कांवडिय़ों की संख्या में हर साल दस-बारह फीसदी की बढ़ौतरी हो रही है। पिछले वर्ष मेले में साढ़े तीन करोड़ के आसपास कांवडि़ए आए थे। उन्होंने बताया कि केवल

हरिद्वार में पांच हज़ार पुलिसकर्मी तैनात किए गए। प्रकोष्ठ में उपस्थित पुलिसकर्मियों का कहना है कि यदि सभी विभाग मिलकर काम करें तो हरिद्वार की पवित्रता को दूषित होने से बचाया जा सकता है।

शक्ति, पर कोई शक्ति नहीं नौकरशाहों के पास

अनुचित क्या है अगर नौकरशाह आज के भारत की वास्तविक सच्चाई को इंगित करता है। आखिरकार वे जमीनी सतह पर आधारित समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

हर कोई हैरान है कि नौकरशाह सेवानिवृत होने के बाद ही क्यों अपने संस्मरण लिखने की हिम्मत जुटा पाते हैं? क्योंकि नौकरी के दौरान निर्धारित मापदंडों से बाहर बोलने या लिखने का उन्हें हक नहीं होता। बाद में उन पर कोई बंदिश नहीं होती है फिर भी कुछ ही हैं जो रिटायर होने के बाद भी स्पष्ट रूप से लिख पाते हैं। शायद उनके प्रशिक्षण की अवधि और कार्यकाल के दौरान जिम्मेदारी से बचने की उनकी प्रवृति उन्हें सुरक्षित क्षेत्र में सीमित कर देती है। यहां राजनीतिक मालिक का डर कम होता है।

देखिए किस तरह प्रशासन ने देश में होने वाली बलात्कार की घटनाओं पर जम्मू-कश्मीर कैडर के नौकरशाह शाह फैजल के ट्वीट पर प्रतिक्रिया की है। ट्वीट में कहा गया,” पितृसत्ता + जनसंख्या + निरक्षता + शराब + अश्लीलता + टक्नोलोजी + राजकता = रेपिस्तान!

केंद्र इस पर सिर्फ क्रोधित ही नहीं हुआ बल्कि उसने 2011 बैच के इस टॉपर नौकरशाह के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी दिया है। वास्तव में 35 वर्षीय शाह फैजल जम्मू-कश्मीर के एकमात्र आईएएस अधिकारी हंै, जिन्होंनेे सिविल सेवाओं में टॉप किया है और वर्तमान में अध्ययन छुट्टी पर एडवर्ड एस मेसन फैलोशिप पर हार्वड कनैडी स्कूल में हैं।

मुझे बताइए, इस ट्वीट में क्या गलत है। शायद वास्तविकता को बताने के लिए कुछ अतिरिक्त शब्द जैसे – लिंचिस्तान, जंगल राज और हत्यारे शासक जोडऩे चाहिए थे।

 इसके साथ ही क्या एक नौकरशाह वास्तविक सच्चाई को बताने का मूल अधिकार नहीं रखता? वह केवल धूल भरी फाइलों का नहीं बल्कि जनता का प्रशासक होता है। बेशक आज के शासन में नौकरशाह का काम राजनीतिक शासकों की सेवा करना होता है न कि सामान्य जनता का काम करना जिन्हें सुरक्षा के नाम पर दूर रखा जाता है।

अगर एक नौकरशाह जोर से बोलने या स्पष्ट रूप से लिखने की हिम्मत करता है तो वह अकेला हो जाता है उसे सस्पैंड कर दिया जाता है।

तमिलनाडु कैडर के चतुर्वेदी बद्रीनाथ प्रशासन द्वारा प्रताडि़त किए गए पहले नौकरशाह थे। यह 70 के दशक के प्रारंभ का समय था जब सरकारी उद्यम- ‘टाइम कैप्सूलÓ की पृष्ठभूमि में विवाद उभरा था, और इस नौकरशाह ने उस कैप्सूल में जोड़ी गई ऐतिहासिक सामग्रियों के संदर्भ में कई प्रश्न उठाए थे। यह बताना आवश्यक नहीं कि इससे इस नौकरशाह का करियर गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था। परन्तु उसका मनोबल और आत्मविश्वास नहीं।

मेरे साथ कई साक्षात्कारों के दौरान उन्होंने विस्तार से बताया था कि निलंबित होने और पूछताछ के बाद भी वह अपनी बात पर दृढ़ बने रहे और फिर ‘धर्मÓ पर लिखने लगे।

बेशक बाद में उन्होंने समय से पहले सेवानिवृति ले ली और अकादमिक दुनिया, बाबूगिरि से दूर हो गए पर 2010 में पुडुचेरी में अपनी मृत्यु से पहले तक उन्होंने किताबें लिखी।

आज के भारत में यही मिश्रित स्थिति है। सरकार का आदेश आने से पहले दक्षिण पंथी ताकतें अपना कृत्य कर जाती है।

यहां तक की नौकरशाहों की राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी सार्वजनिक कार्यक्षेत्र से दूर रखा जाना चाहिए। क्या 2016 में हमने मध्यप्रदेश के नौकरशाह अजय गंगवार की दुर्दशा नहीं देखी जिन्हें फेसबुक पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्रशंसा करने के बाद तबादले का आदेश सौंपा गया था। तब मध्यप्रदेश के बरवानी जिले के कलेक्टर गंगवार को अपनी एक पोस्ट को भी हटाना पड़ा जिसमें कि अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की आलोचना प्रतीत होती थी।

इस साल के शुरू में बरेली के जि़ला मेजिस्ट्रेट राघवेंद्र विक्रम सिंह पर भी सेवा नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था, जब उन्होंने फेसबुक पर उत्तरप्रदेश के कुछ जि़लों में हिंसा उकसाने का आरोप दक्षिणपंथी ताकतों पर लगाया था।

कासगंज में सांप्रदायिक दंगे भड़कने के तुरंत बाद सिंह ने फेसबुक पर लिखा, ‘अजब रिवाज बन गया है। मुस्लिम मुहल्लों में जलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओं। क्यों भाई वो पाकिस्तानी हैं क्याÓ?

दरअसल पिछले साल भी सिंह ने इस तरह की एक पोस्ट लिखी थी। जहां उन्होंने इस तथ्य की आलोचना की थी – बरेली के खेहम इलाके में कावडिय़ों का समूह मुस्लिम प्रभुत्व वाले गांव से उत्तेजक नारे लगाते गुजर रहा था। लेकिन इस बहादुर , ईमानदार नौकरशाह को जिसने यह बताने की हिम्मत की उसे फेसबुक पोस्ट को हटाने के लिए मज़बूर किया गया।

कासगंज में दंगों के दौरान वहां नियुक्त कम से कम दो अधिकारियों ने टेलीविजन पर सुना और देखा कि कासगंज के मुस्लिम प्रभुत्व वाले क्षेत्र के कई युवा राष्ट्रीय ध्वज फहराने की तैयारी कर रहे थे, बाइक पर सवार आदमियों ने जो कि वीएचपी और हिन्दुत्व बिग्रेड से संबंधित थे उन्होंने न केवल ध्वज फहराने के सामारोह में बाधा डाली बल्कि उत्तेजक नारे भी लगाए।

 इस तथ्य को नजऱअंदाज नहीं किया जा सकता कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कासगंज में सापं्रदायिक दंगों के बाद जि़ला पुलिस प्रमुख सुनील कुमार का तबादला कर दिया क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक पागलपन की गहरी सच्चाइयों को उजागर किया था।

यह निश्चित नहीं है कि कासगंज के तत्कालीन जि़ला मेजिस्ट्रेट को क्या दंड मिला था क्योंकि वह भी आज के उत्तरप्रदेश में प्रचलित जमीनी वास्तविकताओं के बारे में ईमानदार थे। उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट से बताया – ‘राज्य के हर हिस्से में ऐसे समूह हैं जो अल्पसंख्यक समुदाय के इलाके में बलपूर्वक प्रवेश करके राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें भड़काते हैं।

मुझे बताइए कि इसमे क्या गलत है अगर कोई नौकरशाह वास्तविक सच्चाई को बताता है और उसके बारे में बोलता या लिखता है। आखिरकार वह ज़मीनी वास्वविकताओं पर केंद्रित है।

अब तक का भारत का सबसे बढिय़ा प्रर्दशन

बहुत लम्बे आरसे के बाद यह पहला मौका था जब पोडियम पर दो भारतीय खिलाड़ी एक साथ खड़े थे। मंजीत स्वर्ण पदक और जिनसन जॉनसन रजत पदक के लिए। उधर पीवी सिंधु बैडमिंटन के फाइनल में हार गयी जिससे उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। भारत के एशियन खेलों में अब तक 9 स्वर्ण हो गए हैं। पुरुष हॉकी के पूल ‘ए’ के आखिरी मैच में भारत ने श्रीलंका को 20-0 से बुरी तरह हराया। मैच में कभी भी श्रीलंका भारत के लिए चुनौती पेश नहीं कर पाया। भारत एशियाई खेलों के 10वें दिन 9 स्वर्ण, 18 रजत और 22 कांस्य पदकों के साथ 9वें स्थान पर काबिज है।

एशियाई खेलों में भारत को नौवां गोल्ड मेडल मिला पुरुष वर्ग के 800 मीटर ट्रैक में। मंजीत सिंह ने स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। उनके साथ भारत के ही जिनसन दूसरे स्थान पर रहे और सिल्वर मेडल भी देश के लिए जीता। शुरुआत में मंजीत पीछे थे लेकिन अंत में उन्होंने पूरा जोर लगाते हुए सभी अन्य धावकों को पीछे छोड़ दिया। मंजीत ने 1.46.15 का समय लेते हुए अन्य प्रतिभागियों को कोई मौका नहीं दिया।

शुरुआत में पीछे चल रहे मंजीत चौथे स्थान पर थे। अंतिम 50 सेकण्ड में उन्होंने अपना पूरा दमखम लगाते हुए गोल्ड जीतकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जिनसन जॉनसन भी शुरू में तीसरे नम्बर पर थे लेकिन अंतिम समय में उन्होंने अपना अभियान दूसरे स्थान पर समाप्त किया।

बैडमिंटन फाइनल में पीवी सिंधु ने सिल्वर मेडल जीता। वे फाइनल में ताइ चु यिंग से हार गई। सिंधु को भले ही हार मिली लेकिन वो एशियाड में सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं।

भारत ने महिला कंपाउंड आर्चरी में भी सिल्वर मेडल जीता है। वे फाइनल में वलर््ड चैंपियन साउथ कोरिया से हार गए। भारतीय टीम आखिर पलों मे लडख़ड़ा गई और 231-228 से हार गई। भारत को आखिरी शॉट में 10 की जरूरत थी लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए। पुरुष आर्चरी टीम को भी फाइनल में हार मिली और वो गोल्ड से चूक गई।

उधर पुरुष आर्चरी टीम को भी सिल्वर मेडल मिला। इसके पहले हिमा दास और दुती चंद दोनों ने महिला 200 मीटर के सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया है। दुती ने अपनी हीट में टॉप करके क्वालीफाई किया वहीं हिमा ने लकी लूजऱ के तौर पर क्वालीफाई किया।

पुरुष टेबल टेनिस टीम ने भी ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रचा। भारत ने पहली बार एशियन गेम्स में मेडल जीता। वहीं कुराश में पिंकी बलहारा ने सिल्वर मेडल जीता और मलाप्रभा को ब्रॉन्ज मेडल हासिल हुआ। अनस, पूवाम्मा, हिमा दास और राजीव अरोकिया ने मिक्सड रिले रेस में सिल्वर मेडल जीता जबकि 4 गुना 400 मीटर रिले रेस में भी भारत ने रजत ही जीता।

कबड्डी में भारत का ताज छिना

भारतीय पुरुष कबड्डी टीम पहली बार बिना स्वर्ण पदक के घर लौटी है। 1990 से लेकर 2014 तक भारत ने पुरुष कबड्डी में सात स्वर्ण पदक जीते हैं। ईरान के हाथों भारत की सेमीफाइनल में हार से आम दर्शक सदमें में हैं। आखिर भारतीय कबड्डी को हुआ क्या है? क्या यह टीम में एक ‘अंहकार’ के कारण हुआ या फिर टीम के चयन में कुछ कमी रह गई।

भारत की कबड्डी टीम बहुत मज़बूत मानी जाती है। पर इस बार टीम की रक्षा पंक्ति काफी कमज़ोर साबित हुई। इनमें सुरजीत सिंह और सुरेंद्र नड्डा का न होना काफी भारी पड़ गया। ये दोनों खिलाड़ी ऐसे हंै जिन्होंने प्रो कबड्डी लीग और 2016 विश्व कप में शानदार प्रदर्शन किया था। इनके स्थान पर लिए गए राजू लाल चौधरी निरंतर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। बीच-बीच में वह अच्छा खेले पर एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में तो खिलाड़ी को हमेशा ही अच्छा खेलना पड़ता है। असल में यह टूर्नामेंट किसी प्रकार के प्रयोग के लिए नहीं था। यहां भारत को अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम लेकर ही आना चाहिए था।

दाएं छोर को सुरक्षित करने वाला मोहित छिल्लर शुरू से ही कमज़ोर साबित हो रहा था। बांग्लादेश जैसी टीम के खिलाफ भी वह प्रभावित नहीं कर पाया। यह पहला मैच था। टीम के साथ गए पदाधिकारियों को यह संकेत समझ लेना चाहिए था। पता नहीं वे लोग क्या अंदाजा लगाए बैठे थे। वैसे तो 2016 के विश्व कप में जब कोरिया ने भारत को 34-32 से हरा दिया था तो यह स्पष्ट हो गया था कि अब भारत का मुकाबला करने के लिए ईरान और कोरिया तैयार हैं। यदि लोगों को याद हो तो उस टूर्नामेंट के फाइनल में भी ईरान ने आधे समय तक बढ़त ले रखी थी। उस समय अजय ठाकुर ने शानदार ‘रेड्स’ डाल कर बहुत मुश्किल से टीम को जिताया था। भारत के लिए वह एक ‘वेकअप काल’ थी। पर भारत नहीं जागा।

अजय ठाकुर की चोट

भारतीय टीम का पूरा दारोमदार अजय ठाकुर पर था। एक बार चोट के कारण जब उन्हें बाहर जाना पड़ा तो पूरी टीम जैसे बिखर सी गई। इसके साथ ही यदि कोरिया के खिलाफ मैच की बात करें तो भी यह संकेत साफ थे कि भारत केवल अपने पुराने नाम के भरोसे नहीं जीत सकता। पूल मैच में कोरिया से हार में भी हमारी रक्षा पंक्ति का लचर खेल दिखा था। एक टीम जो पिछले 28 साल से नहीं हारी थी उसके लिए यह हैरानी भरा था कि उनके पास किसी खिलाड़ी का स्थान लेने वाला कोई दूसरा खिलाड़ी नहीं था।

एक कमी जो टीम में देखने को मिली वह थी अनुभव की। टीम में प्रदीप नरवाल, मोनू गोयट और राहुल चौधरी जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे, पर उनमें अनुभव की कमी साफ नजऱ आई। यह भी साबित हुआ कि प्रो कबड्डी लीग में खेलना और एक बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेलने में ज़मीन आसमान का अंतर है। इन खिलाडिय़ों को अभी उस स्तर पर खेलना सीखना होगा। यदि आप दुबई में आयोजित कबड्डी मास्टर्स पर नजऱ डालें तो पाएंगे कि इन खिलाडिय़ों ने वहां उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया जितना प्रो कबड्डी लीग में किया था। असल में भारत को एक संतुलित टीम चाहिए थी। ऐसी टीम जिसमें युवा और अनुभवी दोनों ही तरह के खिलाड़ी होते। टीम में पूर्व कप्तान अनूप कुमार और मनजीत छिल्लर की कमी महसूस की जा रही थी।

प्रो कबड्डी प्रीमियर लीग ने इस खेल को दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया। लोकप्रियता के साथ इसे पूरी गंभीरता से भी लिया जाना ज़रूरी था। इसी वजह से कोरिया और ईरान जैसी नई मज़बूत टीमें तैयार हो गई। भारत, पाकिस्तान और बंाग्लादेश जैसी टीमें जहां कबड्डी पारंपरिक रूप से खेली जाती है, अब पिछड़ते दिख रहे हैं। नए देशों के खिलाडी जब प्रो कबड्डी जैसी प्रतियोगिताओं में भारत या पाकिस्तान के खिलाडिय़ों के खिलाफ खेलते हैं तो उनकी सारी तदवीरें सीख लेते हैं। फिर वे भारत के खिलाफ अपनी रणनीति तैयार कर लेते हैं।

विश्व कप के बाद आयोजित कबड्डी मास्टर्स में कोरिया और ईरान ने अपनी दोयम दर्जे की टीमें उतारी थी। इन पर जीत में भारत को कोई कठिनाई नहीं हुई। इस वजह से भारत यह अनुमान नही लगा पाया कि इन दोनों देशों ने पिछले दो सालों में अपना स्तर कितना बढ़ा दिया है।

भारत को अब गंभीरता के साथ सोचने की ज़रूरत है। यह ठीक है कि इस टीम के आत्मविश्वास को एक झटका सा लगा है, लेकिन अभी सभी कुछ खत्म नहीं हुआ। इस हालत में उन्हें सही टीम तैयार करनी होगी। एक सही ‘कंबीनेशन’ के साथ। उन्हें यह भी मानना होगा कि अब कोई भी मुकाबला आसान नहीं है। भविष्य में बाकी देश और मज़बूत हो कर उभरेंगे। भारत को अपनी पुरानी निर्धारित पद्धति में नए हालात के अनुसार बदलाव भी करना पड़ेगा। नई रणनीति इज़ाद करनी होगी।

कबड्डी में खोए गोल्ड की कुछ भरपाई कर दी एथलीटों ने

कबड्डी और पुरुष हाकी के सेमीफाइनल में हारने की पीड़ा पर इस बार देश के एथलीटों ने काफी हद तक मरहम लगाने की काम किया है। विदेश की धरती पर 19 पदक भारत ने एथलेटिक्स में कभी नहीं जीते। भारत में दो बार आयोजित इन खेलों में 1951 में भारत ने 31 पदक जीते जिनमें 10 स्वर्ण पदक थे देश के लिए इतने पदक एथलेटिक्स में फिर कभी नहीं आए। 1982 में नौवें खेल फिर दिल्ली (भारत) में आयोजित किए गए। इस बार भारत ने एथलेटिक्स में कुल 20 पदक पाए जिनमें से चार स्वर्ण थे।

जहां तक स्वर्ण पदकों का प्रश्न है भारत ने 1951 के बाद 1978 बैकांक में सात, 1998 बैकांक में सात , 2002 बुसान में सात और 2018 में फिर सात स्वर्ण पदक जीते।

इस बार जकार्ता में जब देश ईरान के हाथों भारतीय पुरुषों की कबड्डी टीम की 18-27 की हार से उबरने की कोशिश में था तो उसी समय भारत के तेजिंदर पाल सिंह तूर ने गोला फैंक स्पर्धा में 20.75 मीटर गोला फैंक कर भारत को एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक दिला दिया। इसके बाद युवा एथलीट नीरज चोपड़ा ने भाला फैंक प्रतियोगिता में 88.05 मीटर तक भाला फैंक कर देश की झोली में दूसरा स्वर्ण पदक डाला।

इससे पूर्व भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट ने कुश्ती मुकाबलों में दो स्वर्ण पदक जीत कर देश पर परचम लहराया। देश के युवा निशानेबाज भी पीछे नहीं रहे। सौरव चैधरी ने 10 मीटर एयर पिस्टल निशानेबाजी में स्वर्ण पदक पर निशाना साधा तो महिला निशानेबाज राही सरनोबत ने 25 मीटर एयर पिस्टल में यह कमाल कर दिखाया। भारत को एक स्वर्ण पदक नौकायन और एक टेनिस के पुरुष युगल मुकाबलों में मिला। 30 अगस्त तक भारत की झोली में 13 स्वर्ण, 21 रजत और 25 कांस्य पदक यानी कुल 59 पदक पड़ चुके थे। इन 13 स्वर्ण पदकों में से सात स्वर्ण पदक अकेले एथलेटिक्स में आए थे। देश के लिए स्वपना बर्मन ने हेप्टथलॉन स्पर्धा में इतिहास रचा वह शाटपुट, हाई जंप और जैवलिन थ्रो में पहले लंबी कूद में दूसरे और 800 मीटर में तीसरे स्थान पर रही। उसने कुल 6026 अंक अर्जित किए जो उसे स्वर्ण पदक दिलाने के लिए काफी थे। इसके साथ ही अरपिंदर पाल सिंह ने त्रिकूट में 6.77 मीटर छलांग लगा कर देश को स्वर्ण पदक दिलाया।

पुरुषों की 800 मीटर दौड़ बहुत ही रोमांचक रही। इसके फाइनल में दो भारतीय धावक भी थे। इनमें जिंनसन जॉनसन को स्वर्ण पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। दूसरे धावक मनजीत सिंह पर लोगों की निगाहें भी नहीं थी। दौड़ शुरू होते ही भारत के दोनों धावक पिछड़ गए लगते थे। मंजीत तो छठे स्थान पर था। आखिर मोड़ तक आते-आते भारतीय धावक आगे बढ़े। 750 मीटर की दौड़ पूरी होने तक मंजीत से पदक की कोई आस नही लग रही थी, लेकिन अंतिम 50 मीटर में मंजीत ने जो फर्राटा लगाया उसने न केवल सभी विदेशी धावकों को पीछे छोड़ दिया अपितु वह अपने साथी जिनसन जॉनसन को भी पछाड़ कर सोने का पदक ले उड़ा। जॉनसन को दूसरा स्थान मिला।

1500 मीटर में भी इन दोनों ने काफी जोर लगाया लेकिन इस दौड़ में जॉनसन की बढ़त को कोई कम नहीं कर सका और स्वर्ण पदक भारत के जॉनसन के गले की शोभा बना। मंजीत सिंह को चैथा स्थान मिला।

पुुरुष हाकी में निराशा

पूल मैचों में रिकार्ड तोड़ गोल दागने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम सेमीफाइनल में अंतिम क्षणों में सब कुछ ही गंवा बैठी। अंतिम पलों तक 2-1 की बढ़त पर चल रही भारतीय हाकी टीम ने मलेशिया के खिलाफ अंतिम पलों में पेनाल्टी कार्नर दे दिया और मलेशिया ने इसे गोल में डाल कर 2-2 की बराबरी हासिल कर ली। पर पेनाल्टी शूट आउट में 6-7 से हार कर न केवल स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर हो गया, बल्कि उसके 2020 के टोक्यो ओलंपिक में टीम के भाग लेने पर भी एक प्रश्न चिन्ह लग गया। ओलंपिक में खेलने के लिए अब उसे क्वालीफाइंग टूर्नामेंट खेलने होंगे। पुरुष तो दौड़़ ये बाहर हुए लेकिन महिलाएं चीन को 1-0 से हरा कर फाइनल में प्रवेश कर गईं। फाइनल में उसकी टक्कर जापान से है जिसने पांच बार के चैंपियन दक्षिण कोरिया को 2-0 से परास्त का दिया।

पुरुष हाकी टीम ने पूल के पांच मैचों में कुल 76 गोल किए थे, जबकि उनके खिलाफ मात्र तीन गोल हुए। महिलाओं ने पूल में खेले चार मैचों में 38 गोल किए जबकि उनके खिलाफ मात्र एक गोल हुआ। इसी दौरान पुरुषों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक मैच में सर्वाधिक गोल करने का अपना रिकार्ड भी बेहतर किया 1932 में लास एजिंलेस ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। इस बार उन्होंने हांगकांग को 26-0 से परास्त का नया रिकार्ड कायम किया है।

खेलों का छठा दिन देश के नौकायन के इतिहास में नया अध्याय लाया। चार सदस्यों वाली रोईंग टीम ने स्वर्ण पदक जीत लिया। इस टीम में स्वर्ण सिंह, दत्तू मोकनल, सुखमीत सिंह और ओमप्रकाश शामिल थे। इसके अलावा दुष्यंत चौहान ने लाइट वेट सिंगल स्कल मुकाबले में कांस्य और भगवान सिंह और रोहित कुमार ने लाइट वेट डबल स्कल में कांस्य पदक जीते। इस तरह रोइंग में उस दिन एक स्वर्ण और दो कांस्य पदकों के साथ भारत को तीन पदक मिल गए।

टेनिस में रोहन बोपन्ना और दिविज शारण ने देश को स्वर्ण पदक दिलाया। निशानेबाजी में हिना सिंधू ने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का कांस्य पदक जीता। कबड्डी के लिए यह दिन भी खराब रहा। भारतीय महिला टीम फाइनल में ईरान से पिट कर रजत पदक ही जीत पाई। टेनिस में ही एक कांस्य पदक प्राजनेश गुन्नेस्वरण को मिला। इसके साथ ही देश के 25 पदक हो गए।

सातवां दिन स्क्वैश का रहा। इस दिन भारत के सौरव घोषाल, दीपिका पालीकल और जोशना चिनअप्पा ने कांस्य पदकों पर कब्जा जमाया। पर इस दिन असली खबर एथलेटिक्स के मैदान से आई जहां तेजिंदर पाल सिंह तूर ने 20.75 मीटर गोला फेंक कर देश को एथलेटिक्स का पहला स्वर्ण पदक दिलाया।

घुड़सवारी में भारत को रजत पदक दिलाया फौद मिजऱ्ा ने । ध्यान देने की बात यह है कि 1982 के दिल्ली एशियाड के बाद घुड़सवारी में भारत का यह पहला व्यक्तिगत पदक है। इसके बाद मिजऱ्ा, राकेश कुमार, आषीश मलिक और जतिंदर सिंह ने घुड़सवारी की टीम स्पर्धा में भी रजत पदक जीत लिया। ट्रैक से एक अच्छी खबर आई और हिमा दास ने राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ते हुए महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में रजत पदक जीता। मोहम्मद अनास ने भी 400 मीटर की दौड़ में रजत पदक जीता। ट्रैक का तीसरा रजत दुत्तीचंद ने 100 मीटर की दौड़ में पाया। 100 मीटर महिला दौड़ में यह पदक 20 साल के बाद आया है। इसके साथ देश को दो कांस्य पदक ब्रिज में मिले।

अगले दिन भारत को सायना नेहवाल से फाइनल में पहुंचने की उम्मीद थी पर वह ताय तेजु यिंग जैसी मज़बूत दीवार को नहीं लांघ पाई और उसे कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। देश को 11 वां रजत पदक धरुन अप्पासामी ने पुरुषों की 400 मीटर बाधा दौड़ में दिलवाया। उसने 48.96 सेकेंड का समय निकाल कर राष्ट्रीय रिकार्ड भंग किया। यह दिन सुधा सिंह का भी था। उसने महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपल चेज़ में दूसरा स्थान प्राप्त कर रजत पदक जीत लिया। जबकि लंबी कूद का रजत पदक भारत की नीना वराकिल ने पाया। भारत के शिविर में उस समय खुशी की लहर दौड़ गई जब नीरज चोपडा ने आशा अनुसार प्रदर्शन करते हुए भाला फेंक स्पर्धा में 88.06 मीटर की थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीत लिया।

खेलों के 10 वें दिन पीवी सिंधू से स्वर्ण पदक की आशा टूट गई और यिंग के खिलाफ वह आसानी से हार गई। उसे रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। उधर भारतीय पुरुष और महिला तीरांदाजी टीमों के तीर बहुत नाजुक समय पर निशाना चूके और उन्हें रजत पदक ही हासिल हुए।

नए खेल ‘कुराशÓ में 53 किलोग्राम भार वर्ग में पिंकी बलहारा ने चांदी का मेडल पाया। इसी स्पर्धा के पुरुष वर्ग में एमवाई जाधव ने कांस्य पदक पाया। उस दिन का चमत्कारी प्रदर्शन तो पुरुषों की 800 मीटर दौड़ में हुआ जहां भारत में मंजीत सिंह ने अप्रत्याशित रूप से स्वर्ण पदक जीत लिया। लगभग 750 मीटर तक पदकों की दौड़ से बाहर लग रहे मंजीत ने अंतिम 50 मीटर में अपने साथी जिनसन जॉनसन समेत चार धावकों को काटकर यह पदक जीता। इस स्पर्धा का रजत पदक जिनसन जॉनसन को मिला। भारत की 4 400 मीटर मिश्रित रिले की टीम भी रजत पदक लेने में कामयाब रही। इस दौड़ में भारत की ओर से मोहम्मद अनास, हिमादास, पुनामा राजू और राजीव अरोकिया ने भाग लिया था।