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नेताओं से मेल मुलाकातें बढीं आश्रय गृह में हुई दो मौतें

अनुमाया ह्यूमन रिसोर्सेज फाउंडेशन के तहत संचालित आश्रा आश्रय गिरि की असलियत का खुलासा इत्तफाक ही है। वहां रह रही दो महिलाओं की मौत और उनके अंतिम संस्कार के वक्त हुए विवाद से ही इस गैर सरकारी संगठन की करतूतें सामने आ गईं और मुख्य संचालिका मनीषा दयाल और सचिव चिरंतन कुमार को गिरफ्तार किया गया। दोनों अभी न्यायायिक हिरासत में हैं। पुलिस की ओर से काफी पूछ-ताछ और जांच-पड़ताल कर ली गई है। आश्रा आश्रय गिरि को अब सरकार संभाल रही है।

तमाम जानकारियों के मुताबिक मनीषा दयाल ने तकरीबन ढाई साल पहले अपना गैरसरकारी संगठन अनुमाया ह्यूमन रिसोर्सेज फाउंडेशन खड़ा किया और उसके तहत आश्रा आश्रय गिरि का कामकाज चल रहा है। इसके पहले मनीषा कई गैरसरकारी संगठनों से जुड़ी थीं और उनके कामकाज में हिस्सा ले रही थीं। उन्हें गैर सरकारी संगठनों के कामकाज का अच्छा-खासा अनुभव हो गया है और उसी के बल पर ही बड़े मजे में अपना संगठन चला रही थीं। मनीषा दूसरे गैर सरकारी संगठनों से हट गई तो स्वतंत्र रूप से खेलों और सांस्कृति के विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने लगी। उसी दौरान उनका विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के संपर्क हुआ। तमाम पार्टियों, खासकर राजद, जद (एकी), कांग्रेस के नेताओं से संपर्क हुआ। इस संपर्क से उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करने में मदद मिली। उन्हें सरकार के बड़े अधिकारियों से भी संपर्क हुआ। उनकी भी मदद मिली। उनका दायरा बढ़ा और प्रसिद्ध हुई।

राजधानी पटना के बीच इलाके राजीव नगर के नेपाल नगर में मनीषा के सुधार गृह आश्रा आश्रय गिरि हैं। सुधार गृह के पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति ने 9 अगस्त को राजीव नगर थाने को सूचना थी कि सुधार गृह से महिलाएं भाग रही हैं और हंगामा हो रहा है। पुलिस तुरंत हरकत में आई। कहना न होगा कि मुजफ्फरपुर बालिका सुधार गृह कांड ठंडा नहीं पड़ा है। सुधार गृहों को लेकर सरकार और प्रशासन काफी सतर्कता बरत रही है। ऐसे समय में नेपाल नगर के महिला सुधार गृह के बारे मेंं सूचना मिलते ही पुलिस के तुरत हरकत में आ जाना अस्वाभाविक नहीं था। महिलाओं भाग नहीं पाई। जो चली भी गई, वे वापस आ गई। इसी बीच सुधार गृह के संचालकों ने पुलिस से शिकातय करने वाले पड़ोसी के खिलाफ यह शिकायत कर दी कि उसकी ओर से महिलाओं को भगाने की कोशिश की जा रही है। उस पड़ोसी को परेशान होना पड़ा। एक ही दिन बाद रात में सुधार गृह में दो महिलाओं की तबीयत खराब हो गई और उनकी मौत भी हो गई। सुधार गृह के लोगों ने उन्हें पटना मेडिकल कालेज अस्पताल ले गए। इसी बीच उनकी मौत हुई। फिर एक दिन बाद आश्रा आश्रय गिरि के लोगों ने दो महिलाओं मेें एक का हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार कर दिया। दूसरे का अंतिम सरकार नहीं हो पाया। वह किस धर्म की थी, इसका पता नहीं था। अफरातफरी थी ही कि पुलिस को इसकी सूचना मिल गई। वह मौके पर पहुंच गई। दोनों महिलाओं की मौत संदिग्ध बन गया। सुधार गृह के लोगोंं का कहना है कि दोनों महिलाओं की मौत पीएमसीएच में अस्पताल में हुई। पीएमसीएच के अधिकारी डाक्टरों का कहना है कि दोनों महिलाओं को मृत अवस्था में ही लाया गया था। फिर यह भी सवाल उठा कि इसकी सूचना पुलिस को क्यों नहीं मिल पाई। दोनों मृत महिलाओं का पोस्टमार्टम कैसे और किसके आदेश से हुआ। पुलिस ने आश्रा आश्रय गिरि में छापा मारा। जांच-पड़ताल शुरू हुई। मनीषा दयाल और चिरंजन कुमार फरार हो गए। बाद में उनकी गिरफ्तारी हुई।

जांच-पड़ताल के दौरान पता चला कि इस सुधार गृह में काफी अनियमितताएं बरती गई हैं। इसमें 50 महिलाओं को रखने की अनुमति है। लेकिन 75 से ज्यादा महिलाएं रखी जाती थीं। महिलाओं को सहूलियत कम, यातनाएं ज्यादा थी। खाने-सोने-शौच की समस्याएं ही समस्याएं थीं। सरकार की ओर से करीब 42 लाख रुपए आश्रय गिरि को मुहैया कराया गया है, लेकिन उसके खर्च के हिसाब-किताब ठीक-ठीक नहीं मिल रहा है। अपराध में यह भी गिना जाता है। महिलाओं का उत्पीडऩ, देह व्यापार के आरोप या उसके सबूत नहीं मिल पाए हैं। लेकिन दो महिलाओं की मौत कैसे हुई, यह रहस्य बना हुई है। मनीषा और चिरंतन को यही कानून की गिरफ्त में लेने के लिए काफी है।

आश्रा आश्रय गिरि का वाकया सामने आ जाने के बाद मनीषा और चिरंजन की खोज खबर हुई। मनीषा गया में एपी कोलोनी की रहने वाली हैं और उनकी पढ़ाई लिखाई वहीं हुई। बताते हैं कि पटना मेें पढऩे-लिखने के लिए आई और बीच में पढ़ाई छोड़ दी। वे साधारण परिवार की रही है। विवाह पटना सिटी के कपड़ा के कारोबार करने वाले राजीव वर्मा से हुई। लेकिन मनीषा जब विभिन्न गैर सरकारी संगठनों से जुडऩे लगी और बाद में खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने लगी तो पति से झंझट होने लगा और बाद में वे दोनों अलग-अलग रहने लगे। इनका 12 साल एक पुत्र है। वह अपने पिता के साथ ही रहता है। मनीषा बिल्कुल अलग रहने लगी। बताते हैं कि पटना में उनका अपना एक शानदार फ्लैट है। गया-बोधगया के रास्ते मेंं भी एक भव्य मकान बन रहा है। कीमती बड़ी गाड़ी से चलती है। बताते हैं कि उन्होंने इसे कांग्रेस के एक नेता से खरीदा है। वे विधायक भी हैं।

खरीद फरोख्त के कागजात पर संदेह जताया जा रहा है।

मनीषा के एक भाई भी गैर सरकारी संगठन चलाते हैं। उन पर भी सरकारी धन का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार करने का आरोप है। उनका संगठन मुंगेर में सक्रिय था। मनीषा को गैर सरकारी संगठनों के संपर्क में लाने में भाई मददगार रहे हैं। बाद में मनीषा का खुद अपना नेटवर्क तैयार हो गया। बताया तो यह भी जा रहा है कि मुजफ्फरपुर के बाला सुधार गृह कांड के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर से इनको मदद मिलती रही है। ब्रजेश ठाकुर का भी अपना कई गैर सरकारी संगठन हैं। ब्रजेश ठाकुर के दैनिक अखवार प्रात:कमल में मनीषा के कार्यक्रमों को आध-आध पन्ना जगह मिलती थी। इसलिए भी दोनों के बीच अच्छा-खासा संपर्क होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

जानकार बताते हैं कि चिरंतन कुमार पटना के जाना माना एक निजी अंग्रेजी स्कूल के संचालक के पुत्र हैं। गैर सराकारी संगठनों के कामकाज में सक्रिय रहते हुए ही मनीषा और निरंतन एक दूसरे के करीब हुए। निरंतन ने मनीषा को अपना गैर सरकारी संगठन खोलने में काफी मदद की। वे खुद में उसके सचिव हैं। मनीषा के एक पत्रकार भी मददगार रहे हैं। लेकिन पत्रकार के खिलाफ ऐसा कोई आरोप नहीं है जिससे वे कानून के कठघरे में खड़े हों। लेकिन पुलिस की अभी जांच पड़ताल चल ही रही है। वे भी संदेह के घेरे में हैं।

मनीषा के मामले की जब खोजबीन चल रही थी तब कई नेताओं, सरकार के बड़े अधिकारियों के साथ उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर जारी हुई। जद (एकी) के पूर्व मंत्री और मौजूदा समय में विधायक श्याम रजक और मनीषा की तस्वीर पर काफी टिकाटिप्पणी हुई। श्याम रजक बड़े दलित नेता हैं। वे प्रभावशाली नेता कहे जाते हैं। राजद की सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बाद में नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री हुए। इस बार मंत्री नहीं हो पाए। उनका साफ  कहना है कि उनके पास बड़ी संख्या में लोग आते हैं। विभिन्न मौके पर, कार्यक्रमों में तस्वीरें खींची जाती हैं। उनका तर्क के औचित्य पर सवाल नहीं उठा। दूसरे नेताओं और अधिकारियों से ऐसी ही बात कही जा रही है। मनीषा को राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दकी की पत्नी नूतन की मौसेरी बहन बताया जा रहा है। अब्दुल बारी सिद्दकी ने इसे इनकार नहीं किया बल्कि उनका कहना है कि मनीषा से कोई संपर्क नहीं है। वे उसे जानते नहीं। कभी एक बार पारिवारिक किसी कार्यक्रम में देखा भर था। वैसे भी मनीषा अपने परिवार से दूर हो गई हैं। परिवार के दूर के संबंधियों से दूर-दूर का ही संबंध है।

यह आसानी से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनीषा ने विभिन्न पार्टियों के विभिन्न नेताओं से सपंर्क साधा था और इसको भी खारिज नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं किया हो। अपने संपर्क की वजह से वे खुद प्रभावशाली हो गई थीं। अपना एक गैर सरकारी संगठन होने की वजह से उन्हें किसी से संपर्क करने में सहूलियत हो जाती थी। साथ में मददगार चिरंतन कुमार और एक पत्रकार थे। नाम किए हुए एक निजी अंग्रेजी स्कूल के संचालक के पुत्र होने की वजह से चिरंतन कुमार का अपना दबदबा था। उनके लिए किसी नेता और अधिकारी के पास पहुचना कोई मुश्किल नहीं था। फिर मनीषा के गैर सरकारी संगठन में सचिव होने का कारण उनका और दायरा बढ़ गया। मनीषा के लिए बहुत उपयोग हो रहे थे। मनीषा के मददगार पत्रकार वास्तव में पत्रकार नहीं थे। वे जिस संस्थान में थे, वहां गैरपत्रकारिता के विभाग में थे। लेकिन उन्होंने सांस्कृति कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिल जाता था। जब वे सांस्कृति कार्यक्रम के चलते मनीषा के संपर्क में आए, तो मनीषा ने उनसे करीबी बनाई और तथाकथिक पत्रकार भी मददगार हो गए।

जानकार बताते हैं कि आश्रा आश्रय गिरि के लोगों ने दूसरी मृत महिला को अंतिम संस्कार करने में कामयाब हो गए होते तो उनके सामने कोई समस्या ही नहीं खड़ी होती। आश्रा आश्रय गिरि में दो महिलाओं की मौत हुई। उन्होंने दोनों महिलाओं का पोस्टमार्टम करा लिया था। एक महिका का अंतिम संस्कार कर भी दिया। वह हिंदू थी। लेकिन दूसरी महिला का नाम वैसा नहीं था कि वह हिंदू मानी जा सकती थी। वह अल्पसंख्यक समुदाय की बताई जा रही है। उसके लिए सर्टिफिकेट लेने की कोशिश भी हुई लेकिन कामयाबी नहीं मिली। तब तक इस बात का पता चल गया। पुलिस भी पहुंच गई। सवाल तो यह भी है कि पटना मेडिकल कालेज अस्पताल के अधिकारियों की ओर से क्यों नहीं पुलिस को सूचना दी गई जब कि उनके और आश्रा आश्रय गिरि के लोगों के बीच झंझट भी हुआ था। साफ है कि अतिम संस्कार तक पैसे का खेल हुआ होगा। आखिर में पैसे का ही कोई पेंच फंसा होगा जिससे बात कुछ और हो गई। अंतिम संस्कार के वक्त दोनों मृत महिलाओं के घर से उनका कोई अपना नहीं था।

मेजर गोगोई पर अभियोग सरकार का कश्मीर में सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों पर अलग रुख

जिस दिन सेना की अदालत ने मेजर गोगोई पर श्रीनगर के होटल में एक स्थानीय लड़की के साथ जाने का अभियोग लगाया उसी दिन एक अखबार की एक खबर का र्शीषक था, ”एक नागरिक को ढाल बनाने पर छोड़ दिए गए, पर होटल जाने पर पकड़े गए’’। पिछले साल अप्रैल में इस अधिकारी ने पत्थराव करने वालों से बचने के लिए एक आम नागरिक फारुक डार को ढाल बना कर बडगांव के गावों में घुमाया था। इस घटना का वीडियो सामने आने पर इसकी चारों ओर भारी आलोचना हुई थी लोगों में इस घटना पर भारी गुस्सा था। लेकिन सेना ने उसे सज़ा देने की बजाए उसे ‘क्लीन चिट’ दी और यह कहते हुए कि गोगोई ने शानदार काम किया है उसे एक मेडल भी प्रदान किया और वह भी सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के हाथों। कश्मीर में इसे घाव कुरेदने वाली घटना के तौर पर देखा गया।

विडंबना यह है कि डार उन गिन चुने लोगों में से एक था जिसने हुर्रियत का विरोध किया और उनके कहने के मुताबिक संसदीय उप चुनाव में वोट नहीं डाला। उसने कश्मीर के आज़ादी आंदोलन के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का साथ दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि उसे कोई ईनाम देने की जगह केंद्र ने उसे प्रताडऩा के लिए सेना के हवाले कर दिया। डार के बारे में सभी कुछ जानते हुए भी सेना ने केवल अपने इस तर्क को पुख्ता करने के लिए कि पत्थरबाजों के खिलाफ उनके किसी साथी को जीप पर बांधना सही कदम था, उसे पत्थरबाज घोषित कर दिया गया।

पर अब सेना ने उसी मेजर के खिलाफ एक स्थानीय लड़की के साथ होटल में जाने के मामले में ‘कोर्ट मार्शल’ की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उस समय गोगोई एक लड़की के साथ होटल गया। वहां स्वागत कक्ष में कमरा देने के मुद्दे पर उसका और वहां रिसेप्शन पर मौजूद महिला के बीच गरमा गरमी हो गई । उसे दो अभियोगों में दोषी पाया गया। पहला एक स्थानीय लड़की से दोस्ती करना जबकि सेना के सभी जवानों और अफसरों को ऐसा न करने की हिदायत है। दूसरे ऐसा उस समय करना जब आप ‘आपरेशनल एरिया’ में डयूटी पर हों। मज़ेदार बात यह है कि ‘मानव ढाल’ मामले में सेना की जांच अभी चल रही है। पर अब जबकि उसे सेना प्रमुख ने उसी कार्य के लिए मेडल दे दिया है, उस जांच का कोई अर्थ नही रह जाता। जांच में इस बात का कोई जि़क्र नहीं है कि गागोई एक नाबालिग लड़की को होटल में क्यों लाया, पर यह ज़रूरी है कि उसने अपने ‘कमांडिंग ऑफिसर’ को बिना बताए कैंप क्यों छोड़ा।

कुछ लोग इसे ‘आदर्श न्याय के तौर पर देख रहे हैं ।

आज दक्षिणपंथियों के बीच पूरी चुप्पी है । ये वे लोग हैं जो गोगोई के मानवाधिकार उल्लंघन पर खुशियां मना रहे थे। वे उस समय भी उसकी तरफदारी कर रहे थे जब वह एक नाबालिग लड़की को होटल ले गया था। यह बात निघट राठर ने सोशल मीडिया पर लिखी। उसने लिखा कि अब जबकि सेना की अदालत ने मेजर गोगोई के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है, तो उन लोगों की जुबान पर ताला लगा गया है। अब वे फंस गए हैं कि क्या करें। अब न तो वे सेना पर उंगली उठा सकते हैं और न ही उसके खिलाफ बोल सकते हैं जिसकी तारीफ में वे आसमान सिर पर उठाए हुए थे।

 मानव ढाल बना फारूक डार खुद इसे खुदा का न्याय मानता है। उसने लिखा,”मेरे लिए न्याय हो गया और यह न्याय खुदा ने किया है। उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती’’। डार ने तहलका को बताया। उसने कहा मैंने कई बार घाटी में बंद की ‘काल’ का विरोध करके वोट डाले पर उन्होंने मुझे ही पत्थरबाज बना कर जीप से बांधा और मेरी पिटाई की।

इसी प्रकार उस नाबालिग लड़की जिसे वह लेकर होटल गया था के पिता ने मेजर को दोषी करार देने पर संतोष जताया और सेना प्रमुख से अपना वह वादा निभाने की गुजारिश की है जिसमें उन्होंने दोषी को मिसाल योग्य सज़ा देने का आश्वासन दिया था। उसने कहा कि इस घटना से हमारे परिवार ने बहुत कुछ भोगा है। हम फिर से अपना सामान्य जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। उसने पत्रकारों से कहा कि यदि उस अफसर को अपने किए की सही सज़ा मिले तो हमे पूरा संतोष मिलेगा।

इसके साथ ही लड़की के पिता ने समीर अहमद मल्ला को भी सज़ा देने की मांग ही है। समीर ही वह आदमी था जो किसी न किसी बहाने गोगोई को लड़की के घर ले गया था और उस समय भी मेजर के साथ था जब उसने होटल के स्टॉफ के साथ झगड़ा किया था। लड़की के पिता ने कहा कि वह भी दोषी है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता।

यह गऱीब परिवार जो एक गांव में रहता है, उस घटना के बाद से सामाजिक तौर पर घुटन में रह रहा है। उस लड़की को दूर किसी रिश्तेदार के यहां भेज दिया गया है। हालंाकि उस लड़की ने अदालत में दर्ज बयान में कहा है कि वह अपनी मर्जी से मेजर के साथ होटल गई थी।

कश्मीर में लोग सेना का दोहरा व्यवहार देख रहे हैं। एक अपने अफसर के प्रति और दूसरा आम कश्मीरी के प्रति। वे कहते हैं कि जब कोई फौजी अफसर किसी नागरिक के साथ ज़्यादती करता है तो सेना उसे अनदेखी कर देती है और उस अफसर को ईनाम तक दिया जाता है । उसकी कार्रवाई सही साबित की जाती है। एक स्थानीय पत्रकार का कहना है कि जब कहीं सेना के साथ कोई बात हो जाए तो तुरंत कार्रवाई की जाती है। इसी कारण मेजर के होटल मामले को तुरंत हल कर लिया गया पर मानव ढाल का मामला आज तक लटका हुआ है।

मेजर अदित्य कुमार को शौर्य चक्र दिए जाने पर भी काफी रोष है क्यों वह कभी दुश्मन से सीधे तौर पर लड़ा ही नहीं। इस साल जनवरी में मेजर कुमार की यूनिट ने शोपियां में पत्थरबाजों पर गोली चलाई थी जिसमें तीन नागरिक मारे गए थे। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अदित्य सहित सेना की टुकड़ी के खिलाफ धारा 302 (हत्या) और धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत मामला दर्ज किया, लेकिन जब कुमार के पिता लैफ्टिनेंट कर्नल कर्मवीर सिंह ‘एफआरआई’ को खत्म करवाने सुप्रीम कोर्ट चले गए तो अदालत ने इस मामले में पुलिस की काईवाई पर रोक लगा दी। फिर कुमार को पुरस्कार दिए जाने पर यहां लोगों में गुस्सा भड़क गया।

नसीर का कहना है कि कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन पर केंद्र सरकार की नीतियां कश्मीरियों को देश से ओर दूर कर देगी और इससे और अधिक हिंसा हो सकती है।

केवल जन्म से नागरिकता नहीं

जैसे उसके घर के दरवाजे पर दूसरी बार तेज दस्तक हुई तो उसने साडी के पल्लू को कंधे पर डाला और वह घर से बाहर निकल कर गंदे आंगन में खडी थी। उसने देखा कि उसका बुर्जुग, अत्यन्त परेशान पति उस गंदगी पर बैठा था और बुदबुदा रहा था – ”कागजात, वे यह साबित करने के लिए कागजात देखना चाहते हैं कि हम यहां पैदा हुए थे।’’

‘क्या’! वह मुश्किल से इतना ही बोल सकी।

‘हमें यह साबित करना होगा कि आप और मैं इस भूमि से संबंधित है। अन्यथा हमें बाहर निकाल दिया जाएगा। हमारे नाम नागरिकों की उस सूची में नहीं हैं पता नहीं अब हमारे साथ क्या होगा?’

‘लेकिन क्या वे जानते नहीं कि पिछले साल की बाढ़ ने हमारे सारे सामान को बर्बाद कर दिया था, हमारे बक्से पानी में बह गए थे-’

‘ अब-सारा गांव यह जानता है परन्तु सरकार नहीं। हम बर्बाद हो गए– हमें समुद्र या जंगलों में फैंक दिया जाएगा या मार दिया जाएगा।’ उसका पति उससे आगे कुछ नहीं बोल पाया और एक तरफ लुढ़क गया।

असम के सैंकड़ों और हज़ारों निवासी निर्वासित होने से पहले हर दिन धीरे-धीरे मर रहे हैं। आखिरकार असम के नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के नवीनतम मसौदे में 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं है, जी हां असम की 12 फीसद आबादी को छोड़ दिया गया है।

नागरिकों की सूची से नाम बाहर होने का सदमा उन्हें मारने के लिए पर्याप्त है। हालांकि आज तक असम के इन 40 लाख लोगों के स्वास्थ्य संबंधी कोई जांच नहीं की गई। दिल के दौरे, या मधुमेह या रक्तचाप के बढ़ते स्तर की जांच करने के लिए कुछ नहीं किया गया। लेकिन यह महत्वूपर्ण खोज हो सकती है, साथ ही यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार ने सरकार की तीव्रता और सदमें के कारण बीमार पडऩे वाले या धीरे-धीरे मरने वालों के लिए चिकित्सकों और स्वास्थ्य देखभाल करने वालों को नियुक्त किया है।

हालांकि वे जिन्हें एनआरसी से बाहर रखा गया है। उन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने का दूसरा मौका दिया जाएगा, लेकिन यह अपने आप में एक बहुत कठिन प्रक्रिया है। क्या प्रतिष्ठान यह उम्मीद करता है कि इन लोगों के पास उनके जन्म, नागरिकता और पैतृक पृष्ठभूमि के कागज़ात होंगे। अगर एनआरसी देश के अन्य राज्यों में नागरिकता का सर्वेक्षण करता है तो देश में गृह युद्ध फैल सकता है। अगर लाखों लोगों का भारतीय नागरिक स्वीकार नहीं किया जाता तब उनकी जिंदगी के साथ क्या होगा। क्या हम लाखों लोगों को निर्वासित कर देंगे, क्योंकि वे यह साबित नहीं कर सके कि वे इस देश से संबंधित हैं।

प्रोफेसर वीके त्रिपाठी जो आईआईटी दिल्ली में भौतिक विज्ञान पढ़ाते है,ं सदभव मिशन भी चलाते हैं और असम संकट पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं के अनुसार -”मिट्टी का बेटा वह नहीं जो राष्ट्र की मिट्टी में जन्मा हो। परन्तु वह जो मिट्टी में रहता है, भूमि में काम करता है और राष्ट्र के लिए अन्न उगाता है और आसपास के लोगों के साथ अपने आराम और उतार-चढ़ाव को बांटता है। वह भूमि का बेटा है। वह चाहे हिंदू हो या मुसलमान, असमिया, बाग्ंला,बोडो,हिंदी या अन्य भाषा बोलता हो। सभी मज़दूर वर्ग के लोग मिट्टी के सच्चे बेटे हैं। वे यहां पैदा हुए, उनके पूर्वज शताब्दियों से यहां रहते आए हैं। उन्होंने इस धरती में अपना खून, पसीना मिलाया है, और अपनी कमाई का आधा हिस्सा देश के लिए दिया है। धरती का टुकडा जहां वे रहते हैं उनके साथ संबंधित है। उन्होंने कभी भी किसी की संपत्ति को लुटा नहीं, लेकिन कई बार वे शोषक और आततायी लोगों के शिकार हुए। उनके पास मातृभूमि में स्वतंत्रता और गरिमा के साथ रहने का मौलिक अधिकार उनसे कही अधिक जो शासन और शोषण करते हैं।

प्रोफेसर त्रिपाठी ने आंकड़ों और तथ्यों के साथ तर्क दिया ” 1871 की जनगणना में असम में मुस्लिम आबादी 28.7 फीसद थी, 1941 मेें 25.72 फीसद, 1971 में 24.56 फीसद, 1991 में 28.43 फीसद, 2001 में 30.92 फीसद और 2011 में 34.2 फीसद (राज्य की कुल 320 लाख की जनसंख्या में)।’’

हालांकि भूमि और संपत्ति में उनका फीसद हिस्सा बहुत कम है। केवल 7.9 फीसद शहरों में और 5.8 फीसद ग्रामीण इलाकों में औपचारिक रूप से है। हिन्दुओं के लिए ये आकंड़े 23.1 फीसद और 12.3 फीसद है।

”बाकी अनौपचारिक सेक्टर में हिंदू और मुस्लिम जनता की आय कम है- 36 फीसद लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं (अखिल भारतीय औसत 26 फीसद के खिलाफ)। जि़ले जहां मुस्लिम आबादी 45 फीसद से ज़्यादा है धुबरी के अपवाद के अलावा। (धुबरी 28.6 फीसद, गौलपाडा 60.3 फीसद, बारपेटा में 50.19 फीसद, कैला कंडी 43.79 फीसद, करीमगंज 48.23 फीसद, नागांव 39.96 फीसद, मारिगांव 80.14 फीसद)।

उन्होंने आगे कहा,” असम में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का केवल 60 फीसद है, जबकि विकास दर राष्ट्रीय औसत का आधा है।

 1991-2000 के दौरान असम में मजदूरी की वार्षिक वृ़िद्ध दर नेगटिव (-0.12 फीसद) है जबकि देश में यह $3.36 फीसद थी इसके लिए यदि हम असुरक्षा का डर जोड़ते हैं तो काम करने वालों के लिए असम आकर्षण का स्थान नहीं है। वास्तव में पिछले दो दशकों से बड़े पैमाने पर लोग असम से केरल की तरफ प्रवास कर चुके हैं और केरल के स्थानीय लोग मध्य पूर्व की ओर चले गए हंै।

प्रोफेसर त्रिपाठी ने आगे कहा कि मज़दूर वर्ग की नागरिकता पर हमला करने के लिए भारत के विभाजन को वजह नहीं बनाया जा सकता। विभाजन वास्तव में -शासन प्राधिकरण का विभाजन था- कुछ राज्य मुस्लिम लीग द्वारा शासित थे और शेष कंाग्रेस द्वारा। लोग जहंा चाहे रह सकते हैं। यहां मजदूर वर्ग के हितों और उनकी दुर्दशा के लिए कोई सोच नहीं है। न्याय की मांग है कि भारत में पैदा हुए मजदूर वर्ग में से चाहे कोई भी हो उसे भारतीय नागरिक के रूप में माना जाना चाहिए।

”वास्तव में नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 3 में 2003 में हुए संशोधन के अनुसार  निम्न आधार पर भारतीय माना जाएगा:

1. 1950 और 1987 के बीच पैदा हुआ व्यक्ति उसके माता-पिता की नागरिकता कुछ भी हो।

2. 1987 और 2003 के बीच पैदा हुआ व्यक्ति जिसके माता पिता में से कोई एक भारतीय हो।

3. 2003 के बाद पैदा हुए व्यक्ति जिसके माता-पिता भारतीय नागरिक हैं।

इस संशोधन के संदर्भ में एनआरसी को निर्वासित मामलों को फिर से देखना चाहिए। सरकार को मज़दूर वर्ग के लिए भारत-पाकिस्तान-बाग्ंला देश की सीमा को पार करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि इन वर्गों को ब्रिटिश भारत या नए बने राष्ट्र में कभी भी उनकी सही महत्व नहीं दिया गया। विदेशों में जाने वाले भारतीयों को वहां कुछ साल काम करने के बाद उस देश की नागरिकता मिल जाती है। कई देश वहां अवैध प्रवासियों के पैदा हुए बच्चों को पूर्ण नागरिकता प्रदान करते है। यहा हम उन लोगों की बात कर रहे है जिनके पूर्वजों शताब्दियों से यहां रहते थे और इस धरती को सेवा करते थे। वे उन अधिकारों के लायक है जिनकी मांग हम अप्रवासी भारतीयों के लिए अन्य देशों में करते हैं – प्रोफेसर त्रिपाठी ने कहा।

यौन शोषण मामले में संवेदनशीलता ज़रूरी

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विज़ुअल हैंडीकेपेड (एनआईवीएच), देहरादून में नए निदेशक की नियुक्ति हुई है। केंद्र सरकार के संचालित इस संस्थान को जल्द ही नया प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल मिल जायेंगे। मौजूदा निदेशक को स्थानांतरित और दो अन्य को बर्खास्त कर दिया गया है। ये बड़े फेरबदल परिवर्तन संस्थान में छात्रों की हड़ताल के चलते हुए हैं जो 16 अगस्त से लगातार जारी थी।

छात्रों का मांगपत्र वैसे तो 31 मांगों के साथ था लेकिन इनमें सबसे गंभीर यौन उत्पीडऩ की शिकायत है कि कैसे छात्रों के प्रति जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने इनसे निपटा। छात्रों की तरफ से अप्रैल, 2018 में लगाए गए यौन प्रतारणा के आरोपों को भी बहुत विवादित तरीके से निपटने का ढोंग किया गया। इनमें से एक प्रभारी संगीत शिक्षक के खिलाफ तो प्रशासन ने एक्शन लिया लेकिन दूसरे को छोड़ दिया गया। इस बार, हालांकि दूसरे शिक्षक के खिलाफ छात्रों के एक समूह की तरफ से लगाए गए हैं।

इन छात्रों ने आरोप लगाया है कि उनमें से कुछ को पकड़ कर उनके प्राइवेट पार्ट्स को छुआ गया और भद्दी टिप्पणियां की गईं। छात्रों ने शिकायत की कि इस घटना की जानकारी प्रिंसिपल और निदेशक दोनों को दी लेकिन बजाये आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के, उलटे छात्रों को ही प्रताडि़त किया गया। यहाँ तक कि छात्रों को शालीन ड्रेस पहनाने की सलाह दी गयी।

दिलचस्प बात यह है कि दूसरे संगीत शिक्षक के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज की गई है। लेकिन निदेशक और अन्य के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है जबकि यह सब की जानकारी उनको दी गयी थी और उनकी तरफ से कोई रिपोर्ट इस मामले में दजऱ् नहीं की गयी जबकि पूरा मामला उनके संज्ञान में था। यह बच्चों के खिलाफ यौन संरक्षण क़ानून के तहत मामला बनता है।

इस तरह के विकृत, भयानक और प्रतिकूल अपराध पीडि़तों के लिए अवसाद, पोस्ट-आघात सहित शॉर्ट टर्म और दीर्घकालिक तनाव, विकार के रूप में सामने आ सकते हैं। लेकिन इसकी कोई परवाह नहीं की गयी और बच्चों के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार अधिकारियों ने इसके बारे में सोचा तक नहीं। यह उनकी इस मामले से निपटने के प्रति संवेदनशीलता और भूमिका के प्रति सवाल खड़ा करता है। यह असंभव ही है कि संस्थान में बाल संरक्षण नीति होगी जो पोस्को एक्ट के तहत ज़रूरी है। अगर है भी तो ऐसा लगता है यह कागज़ों तक सीमित होगी।

इसी प्रकार विकलांगता अधिनियम के तहत बच्चों के अधिकार की भी अनदेखी की गयी है। आरपीड़ी क़ानून में बाकायदा सजा का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि जिस व्यक्ति के ऊपर विकलांगता वाले बच्चे की जिम्मेवारी है और वह उसका शारीरिक शोषण करने का जिम्मेवार पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

छात्राओं की शिकायत है कि पुरुष कर्मचारी लड़कियों के छात्रावास में अपनी मर्जी से प्रवेश करते हैं, उनके कई शौचालयों और बाथरूम में दरवाजे तक नहीं और जिनमें हैं उनमें उन्हें दरवाजे और खिड़कियां बंद रखने से मना कर दिया जाता है। इन सब चीजों को देखते हुए छात्रावास में रहने वाले बच्चों में असुरक्षा की जबरदस्त भावना घर कर गयी है। क्या यह यौन उत्पीडऩ का सीधा और साफ़ उदाहरण नहीं है ?

प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल की बर्खस्तगी और निदेशक के तबादले से ही जाहिर हो जाता है कि यह मामला कितना संगीन है। यहाँ सवाल यही है कि छात्रों के आरोपों पर आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग मानदंड क्यों अपनाये गए। अन्य मामलों की तरह पीडि़तों के बयान पुलिस स्टेशन में दर्ज किये गए। हालांकि पोस्को अधिनियम में अनिवार्य रूप से कहा गया है कि ऐसे बयान सामान्य व्यक्ति के निवास या ऐसी जगह जहां पीडि़त सुरक्षित महसूस करता हो, में ही दर्ज किये जाने चाहियें। संस्थान में अधिकारियों ने क्यों यह अनुमति दी यह बेहद परेशान करनी वाली बात है।

अधिक परेशानी वाला तथ्य यह है कि माता-पिता को यह बयान दर्ज करने के समय सूचित ही नहीं किया गया। यह भी कार्यवाही में खामी वाली बात है। यह बातें संस्थान के अधिकारियों और पुलिस मशीनरी दोनों में पॉस्को अधिनियम के प्रति अज्ञानता की तरफ इशारा करती हैं।

ऐसे संस्थान जहां अक्षम बच्चों या लोगों को रखा गया है, में निगरानी तंत्र की आवश्यकता पर जोर देना अक्षमता अधिकार संगठनों की बड़ी मांग रही है। इसे उनकी तरफ से वर्मा समिति के सामने रखा गया है जिसका गठन 2012 के दिल्ली गैंग रेप मामले के बाद किया गया था।

समिति ने अन्य चीजों के अलावा यह भी सिफारिश की थी कि उच्च न्यायालयों को पर्यवेक्षण तंत्र के रूप में कार्य करना चाहिए। लेकिन यह भी नहीं हुआ है। बिहार के मुजफ्फरपुर और मध्य प्रदेश के भोपाल में भयानक घटनाओं के मामलों को देखते हुए आवश्यक है कि इन संस्थानों के सार्वजनिक और निजी डोमेन दोनों में नियमित सामाजिक ऑडिट हों। अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी 2013 की एक रिपोर्ट में इस तरह के संस्थानों के भीतर यौन अपराधों को दस्तावेज के रूप में दर्शाया है।

इसमें साफ़ तौर पर बताया गया है कि किसी भी तरह की विकलांगता से पीडि़त महिलाएं और बालिकाएं ऐसे अपराधों की आसान शिकार होती हैं। बहुत से मामले में ऐसी महिलाएं या बालिकाएं अपने साथ हो रही ज्यादती को दूसरों को बताने में असमर्थ होती हैं। एक रिपोर्ट में यह सामने आया है कि ऐसी महिलाएं सामान्य महिलाओं के मुकाबले तीन गुना शारीरिक और यौन दुव्र्यवहार की शिकार होती हैं।

यौन दुव्र्यवहार के अलावा, कभी-कभी कुछ संस्थानों में विकलांग लड़कियों / महिलाओं के साथ उनके वस्त्रों को लेकर अशिष्ट व्यवहार किया जाता है। पावलोव अस्पताल, कोलकाता के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सख्त रूलिंग देनी पड़ी थी।

विकलांग महिलाओं के खिलाफ हिंसा के संबंध में समेकित आंकड़ों की अनुपस्थिति वकालती और नीति पहलों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग विकलांग महिलाओं/लड़कियों से जुड़े मामलों का ऐसा कोई समेकित रेकार्ड नहीं रखता। एनआईवीएच के मामले को जिस तरीके से देखा गया वह न केवल संस्थान के अधिकारियों वल्कि पुलिस की असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। मानक ऑपरेटिंग प्रक्रियाओं (एसओपी) को हर जांच पड़ाव पर यह संदर्भित करना चाहिए की विकलांग महिलाओं की क्या विशिष्ट आवश्यकताएं हैं और विभिन्न एजेंसियों की क्या भूमिका होनी चाहिए।

हिमाचल बन रहा अपराध का अड्डा

पहाड़ी सूबे हिमाचल की जनता प्रदेश में बढ़ती अपराध घटनाओं से बहुत चिंता है। किसी समय अपनी सुरक्षा के लिए जाने जाने वाले हिमाचल प्रदेश में अपराध, खासकर रेप की घटनाएं बड़ी चिंता के रूप में सामने आ रही हैं। शिमला के निर्भया गैंग रेप मामले के बाद दर्जनों घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि हिमाचल पहले जैसा हिमाचल नहीं रहा और यहाँ लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा एक बड़े मुद्दे के रूप में सामने आ रही है।

तहलका की छानबीन से सामने आया है कि पिछले सात महीने के अपेक्षाकृत छोटे समय में हिमाचल में रेप की 197 घटनाएं पुलिस के पास रिपोर्ट हुई हैं। इसके अलावा 333 छेडख़ानी जबकि महिला उत्पीडऩ के 98 मामले सामने आए हैं। हिमाचल जैसे राज्य के लिए यह आंकड़े बहुत चिंता पैदा करने वाले हैं।

जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और यूएन के एड्स मिशन से जुडी रहीं सारिका कटोच का कहना है कि निश्चित ही इस दिशा में ज्यादा करने की ज़रुरत है। ‘यह क़ानून के साथ साथ सामाजिक विषय भी है। पीडि़ता की मानसिक दशा से लेकर उसके भविष्य तक के लिए इस तरह की घटनाएं बड़े परिवर्तन लाती हैं और कई बार तो मामला बहुत संवेदनशील बन जाता है।Ó सारिका कहती हैं कि इस मामले में छोटी उम्र से ही बच्चों को शिक्षित किया जाना ज़रूरी है।

गुडिय़ा गैंगरेप मामले की स्याही अभी सूखी भी नहीं है कि सिरमौर जिले में एक नाबालिग के साथ दुराचार की शर्मनाक घटना सामने आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपियों ने लड़की को अगवा कर अलग-अलग जगह ले जाकर उसकी अस्मत लूटी। पुलिस के मुताबिक इस मामले में 6 आरोपियों को अब हिरासत में लिया गया है।

मिली जानकारी के मुताबिक जिन छह आरोपियों के नाम सामने आये हैं उनमें से एक नाबालिग बताया जा रहा है। आरोप है कि आरोपियों ने सिलसिलेवार वारदात को अंजाम दिया। लड़की को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर आरोपियों ने एक-एक कर हवस मिटाई। नाबालिग किसी तरह आरोपियों के चंगुल से भागी और नाहन के महिला पुलिस थाने पहुंचकर अपने साथ हुई वारदात की जानकारी दी।

लड़की की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। इस मामले में पुलिस ने 6 आरोपियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। पुलिस मामले की तफ्तीश में जुट गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक सिरमौर जिले के गिरिपार इलाके की एक 14 वर्षीय लड़की के साथ आरोपियों ने पिछले चार से पांच दिन तक अलग-अलग जगह दुष्कर्म किया। मिली जानकारी के मुताबिक लड़की अपने घर से 16 अगस्त को संगड़ाह में स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित मेले के लिए निकली थी। संगड़ाह पहुंचने के बाद लड़की को एक आरोपी ददाहू ले आया। रात के समय लड़की को पनार इलाके में युवक ने अपने घर पर रखा। मामला यहीं नहीं थमा।

शिकायत के मुताबिक अगले दिन लड़की को ददाहू छोड़ा गया, जहां से एक आरोपी उसे नाहन ले गया। यहां पर भी एक होटल में दुराचार हुआ। इसके बाद फिर से नाबालिग को ददाहू ले जाया गया। ददाहू के बाद फिर नाहन और अन्य स्थानों पर आरोपियों ने हवस का शिकार बनाया। इस मामले में पुलिस ने प्रदीप, अशोक, दीबू, नरेश और विक्रम को हिरासत में लिया है। एक नाबालिग लड़के पर भी इस वारदात में शामिल होने का आरोप है। नाहन में डीएसपी हेडक्वार्टर बबीता राणा ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि मामले की छानबीन की जा रही है और छह लोगों को हिरासत में लिया गया है।

हिंदू और कितना बदनाम होगा?

हिंदूओं का राज और बदनाम कौन? हिंदू! हां, पांच साल पहले हर दिन इस्लाम, मुसलमान इस वैश्विक हल्ले में घिरा हुआ था कि ये कैसे हैं और आज दुनिया में चर्चा है कि ये हिंदू कैसे हंै! कैसा देश है जहां भीड़ पीट-पीट कर लोगों को मारती है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी केन्या, दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर हंै। और जान ले वहां के विदेश मंत्रालयों ने मोदी से मुलाकात की तैयारी में अपने नेताओं के लिए जो ब्रीफ बनाई होगी उसमें खबरों-घटनाओं के हवाले से लिखा होगा कि नरेंद्र मोदी उस देश, सरकार के मुखिया हंै जहां भीड़ लोगों को मारती है। गौरक्षा के नाम पर गौरक्षक पीट-पीट कर हत्या करते हंै। संभव है हिंदूवादी इस सबकों दुनिया का पक्षपाती नजरिया, सेकुलरों का, हिंदू विरोधियों का नजरिया माने। कई हिंदू यह मूर्ख सोच भी लिए हुए होंगे कि इससे हिंदुओं की मर्दानगी जाहिर हो रही है और इससे नरेंद्र मोदी का डंका बजा हुआ है! वे वैश्विक हीरो हैं। सो गौरक्षा और मॉब लिंचिंग पर दुनिया में हिंदू बदनाम नहीं है बल्कि बतौर कौम हिंदुओं की 56 इंची छाती में यह श्रीवृद्धि है!

क्या सचमुच? सवाल इसलिए है क्योंकि संघ परिवार, भाजपा, मोदी सरकार यानि हिंदू जनजागरण की आकांक्षी जमात में किसी में भी शर्म से डुबने जैसा यह बोध नहीं दिखलाई दिया है कि जो हुआ है या हो रहा है वह हिंदुओं की बदनामी वाली बात है। कभी कठुआ जैसी शर्म तो कभी मॉब लिचिंग। बावजूद इसके संघ के इंद्रेशकुमार, भाजपा के विनय कटियार, मंत्री गिरिराज किशोर, अर्जुन मेघवाल से ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौन या मुखर प्रतिक्रिया में शर्म, ग्लानि की वह भाव-भंगिमा नहीं दिखी कि जो हो रहा है उससे हम हिंदू कलंकित हो रहे हंै। इससे संघ, भाजपा के राजनैतिक दर्शन, हिंदू हित की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ रही है बल्कि दुनिया भर में मैसेज बन रहा है कि ये हिंदू कैसे जाहिल, काहिल, मूर्ख है जो अपने ही देश में, अपनी ही सरकार में कानून के राज को जंगल राज में बदल डाल रहे हैं।

हां, 2014 और उससे पहले अपना मानना था, अपने को उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का अर्थ होगा कानून के राज का बहुसंख्यक हिंदुओं की आंकाक्षाओं के अनुसार बदलना और बनना। यदि हिंदू की धर्म भावना, आस्था गौहत्या पर पाबंदी चाहती है तो गौहत्या पाबंदी का अखिल भारतीय कानून बनेगा। यदि समाज की समरसता के लिए समान नागरिक संहिता की ज़रूरत है तो उसका कानून बनेगा। यदि एक देश, एक जन, एक संविधान की भारत की तासीर है तो जम्मू-कश्मीर की धारा 370 पर फैसला होगा! ऐसी दस तरह की बातें थी जो देश, विदेश व आज़ाद भारत के 70 साल के अनुभव पर संविधान और कानून में सुधार, संशोधनों की ज़रूरत को बनाए हुए थी। तभी मोदी को अभूतपूर्व हिंदू जनादेश मिला। कोई माने या न माने अपना मानना है कि इसमें सर्वाधिक आसान गौहत्या पाबंदी पर केंद्र सरकार का कानून बनवा सकना था। खुद नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार में दस बार पिंक क्रांति के हवाले गौहत्या और बीफ के मुद्दे पर बोल-बोल कर भरोसा बनवाया था कि उनकी सरकार आई तो गौहत्या रूकवाने का अखिल भारतीय कानून बनाएगी।

मगर क्या हुआ? गौहत्या रोकने के लिए उन्होंने अपनी सरकार से संसद में कानून नहीं बनवाया लेकिन भक्तों और समर्थकों में यह माहौल बनवा डाला कि सरकार को नहीं बल्कि हिंदू भीड़ को गौरक्षक बन कर उन्हे ठोकना है, उन्हे मारना है जिन पर शक हो कि ये बीफ खाते है या गायों की तस्करी कर रहे हैं।

जाहिर है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज का यह इतिहास बनवाया है कि गौरक्षा के लिए कानून स्थापित नहीं किया मगर गाय के नाम पर जंगल राज ज़रूर बनवा दिया! मोदी राज ने हिंदू को वह बना डाला जो खैबर के दर्र में कट्टर जि़हादी मुसलमान करता मिलेगा। देश के संविधान के तहत हुए चुनाव से जनता ने जनादेश दिया, हिंदू भावना व आस्था को मान्यता मिली, उसकी राजनैतिक ताकत बनी और उससे कानून बनना था मगर उल्टे हिंदू को चार सालों में गंवार, मूर्ख व मॉब लिंचिंग वाला बनवा दिया!

यह हिंदू के साथ मोदी-शाह का नंबर एक विश्वासघात है। यह मोदी राज का वह धत्कर्म, पाप है जिसमें हिंदू दुनिया में मॉब लिंचिंग करता दिख रहा है। हम भी इस्लाम और कट्टरपंथी मुस्लिम जिहादियों जैसे गए-गुजरे माने जाने लगे है। श्रीनगर में मस्जिद के बाहर पंडित लेबल पर पुलिस अफसर की मुस्लिम लिंचिग और अलवर में पहलू खान या रकबर ख़ान को पीट-पीट कर मार देने की हिंदू लिंचिग में क्या फर्क है!

क्या इसे कथित हिंदु राज की गौरवगाथा व हिंदुओं का जागना माना जाए या जाहिल, मूर्ख और शैतान बनना? जो हुआ है, जो हो रहा है वह हिंदूओं की दुनिया में बदनामी है। मैं यहां अप्रासगिंक मिसाल दे रहा हूं, मगर हकीकत बतलाने वाली है इसलिए जाने कि डोनाल्ड ट्रंप ने राज संभालते ही कानून बना कर आंतकी देशों के मुसलमानों का अमेरिका में आना रोका। उन्होंने इस्लाम से नफरत करने वाले कट्टरवादी गौरो में यह हवा नहीं बनवाई कि यमन का मुसलमान दिखे तो शक करो। मारो। फ्रांस में महिलाओं के बुर्के पर कानून बना कर प्रतिबंध लगा। डेनमार्क ने कानून से मस्जिद निर्माण पर पाबंदी लगाई। यूरोप में मुस्लिम विद्वेष और घृणा की कई तरह की बाते हुई हंै मगर किसी नेता, मंत्री ने लोगों को उकसाते हुए ऐसे डॉयल़ॉग नहीं मारे कि यदि लोग बीफ खाना छोड़ दें तो रुक जाएंगी मॉब लिंचिंग की घटनाएं। या यह कि जैसे-जैसे पीएम मोदी की लोकप्रियता बढ़ेगी, वैसे वैसे मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती जाएंगी। या यह कि मुसलमान हिंदूओं की भावना समझे!

लाख टके का सवाल है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने क्यों नहीं हिंदू की भावना समझी? यदि समझी होती तो केंद्र सरकार गौवध को जुर्म करार देने का क्या अखिल भारतीय कानून नहीं बना डालती? जिस भावना पर सरकार बनी उसके लिए सरकार और उसके मंत्रियों ने कानून नहीं बनाया और हिंदूओं को उकसा रहे है, कि अपनी भावना में चाहे जिस पर शक करों। उसे ठोकों और मारों!

इसलिए क्योंकि ठोकने, मारने से भावनाओं की सुनामी आती है, बर्बादी होती है जबकि कानून में सब कुछ बंधा होता है, सुधरा होता है, समझा होता है! ध्यान रहे यहां बात दंगे, धर्मयुद्व, हिंसा-प्रतिहिंसा की नहीं है बल्कि शक और बेवजह के फितूर पर भावना के भडकाने की है।

और जान लिया जाए नरेंद्र मोदी व अमित शाह का अब अस्तित्व तभी है जब भावनाओं के ऐसे भभके बने रहे। 2019 का लोकसभा चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आएगा त्यों-त्यों भावनाओं के इन भभकों पर सुनामी बनाने के दस तरह के जुगाड़ होंगे। तभी आने वाले दिन हम हिंदुओं के लिए बहुत विकट है। हमें दुनिया में अभी बहुत बदनाम होना है। न मॉब लिंचिग रुकेगी और न दुनिया में यह घिन बनती रुकनी है कि उफ! हिंदू ऐसे भी होते हैं!

सोचे, ऐसी घिन हिंदूओं को ले कर कब बनी थी? और क्यों न इसे मोदी सरकार का हिंदुओं को बदनाम बनाने वाला पाप माना जाए?

कोलकाता की जर्जर वह इमारत जिसे याद करते हैं नरगिस व डॉ. लोहिया के लिए

यूं तो कलकत्ता की ज्य़ादातर इमारतें अपनी चारदीवारियों के भीतर कई इतिहास समेटे हुए है। खासकर मध्य कलकत्ता जहां ब्रिटिश कालीन कई इमारतें बरबस आपको अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। इसी इलाके में लेनिन सरणी जो पूर्व में धर्मतल्ला रोड से जानी जाती थी। उसी के सामने एक पतली सी गली इंडियन मिरर स्ट्रीट के नाम से जानी जाती है। वैसे तो कलकत्ता में दर्जनों पुरानी सड़कों व गलियों के नाम बदल गए हैं। लेकिन इंडियन मिरर स्ट्रीट इससे अछूता है। ठीक तिराहे पर दो मंजिला पुराना एक मकान है। आठ इंडियन मिरर स्ट्रीट पर खड़ा यह मकान जितना पुराना है, इतिहास उतना ही समृद्ध। कऱीब 150 साल पुराने इस मकान की तारीखी बातों से स्थानीय लोगों को कोई वास्ता नहीं,क्योंकि ज्यादातर लोगों को इस बारे में कोई मालूमात नहीं है। वैसे यह मकान दो शख्सियतों की वजह से जाना जाता है। एक समाजवादी चिंतक व राजनेता डॉ.राममनोहर लोहिया और दूसरा सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री नरगिस। जिनका जन्म इसी मकान की ऊपरी मंजि़ल में हुआ था। नरगिस की मौसी मल्लिका जान यहां रहती थीं। बाद में उन्हीं के नाम पर यह इलाका जानबाजार के नाम से भी प्रचलित हुआ।

दूसरी शख्सियत का नाम है डॉ. राममनोहर लोहिया। भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की धातु का बना इंसान। वैसे तो कलकत्ता में सोशलिस्ट पार्टी का दफ़्तर डलहौजी के पास था। लेकिन डॉ.लोहिया के ख़ास रहे ठाकुर जमुना सिंह और दिनेश दासगुप्ता (दादा) के यहां रहने की वजह से लोहिया समकालीन समाजवादियों का यहां मज़मा लगता था। दिनेश दासगुप्ता का जन्म पांच नवंबर 1911 को चटगांव स्थित धौलाघाट में हुआ था। सोलह वर्ष की उम्र में वे क्रांतिकारी सूर्य सेन (मास्टर दा) की इंडियन रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो गए। अप्रैल 1930 के चटगांव शस्त्रागार अभियान में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया। चटगांव शस्त्रागार अभियान के बाद ब्रितानी सरकार के खिलाफ धौलाघाट में गुरिल्ला युद्ध में वे ब्रिटिश सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। 1932 में न्यायालय ने उन्हें दस वर्षों की सजा मुकर्रर कर प्रताडऩा के लिए मशहूर अंडमान सेल्यूलर जेल भेज दिया। जेल में कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने कई बार भूख हड़ताल की। 1938 में दिनेश दासगुप्ता और उनके साथियों को रिहाई मिली। उनके कई साथी बाद में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए, लेकिन अंडमान बंदियों के बीच मार्क्सवादी साहित्य के वितरण और अपने कुछ साथियों के देश की आजादी की लडाई को महत्व न देने के कारण कम्युनिस्टों के प्रति उनके मन में संदेह उत्पन्न हो गया। बाद में वह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होकर चटगांव जिले में संगठन को मजबूत बनाने में जुट गए। वर्ष 1940 में रामगढ़ (अब झारखंड) में पार्टी के अधिवेशन से लौटते वक्त उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। छह साल की सजा मिलने के बाद उन्हें क्रमश: हिजली (मेदनीपुर) भूटान के समीप बक्सा किले और ढाका जेल में रखा गया। कारावास की इस अवधि में भी उन्होंने जेल में भूख हडताले की। आजादी के एक वर्ष पूर्व 1946 में उन्हें रिहा कर दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद दिनेश दासगुप्ता पश्चिम बंगाल कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संसदीय बोर्ड में शामिल हुए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुडऩे के बाद उन्होंने कई अहम जिम्मेदारियां निभाई। बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में विघटन होने के बाद वे डॉ.राममनोहर लोहिया की अगुवाई में सोशलिस्ट पार्टी व संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर उनसे आग्रह किया गया कि वे राज्यपाल का पद स्वीकार करें। इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए उन्होंने कहा,मैं एक क्रांतिकारी हूं और मेरे जीवन का ध्येय सत्ता सुख नहीं है।

डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में वे सोशलिस्ट पार्टी में पूरी निष्ठा से जुड़े रहे। आज़ादी के बाद भी दिनेश दा को कई बार जेल जाना पड़ा। चाहे वह अंग्रेजी हटाओ आंदोलन हो या दाम बांधो आंदोलन। श्रमिक संघों का आंदोलन हो या फिर आदिवासियों का आंदोलन वे लगातार सक्रिय रहे। डॉ.राममनोहर लोहिया की रचनाओं को उन्होंने बांग्ला भाषा में अनुवाद कर बंगाली भद्रजनों को भारतीय समाजवाद से परिचित कराया।

बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध 1971 में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। मुक्ति योद्धाओं को प्रशिक्षित करने कई बार उन्होंने बांग्लादेश की गुप्त यात्राएं भी कीं। बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान ने कई मौकों पर उनसे सलाह-मशविरा किया। बांग्लादेश बनने के बाद ढाका की एक जनसभा में शेख मुजीब ने मुक्ति मुक्ति में दिनेश दासगुप्ता के अविस्मरणीय योगदान की चर्चा की थी। आपातकाल 1975 में दिनेश दा भी गिरफ्तार किए गए। इमरजेंसी खत्म होने के बाद वह गैर बराबरी के शिकार आदिवासी समाज के बीच काम करते रहे। 23 अगस्त 2006 को उनका कलकत्ता में निधन हो गया। दिनेश दा अविवाहित थे और अपनी जिंदगी का अधिकांश समय वे इंडियन मिरर स्ट्रीट के इसी आठ नंबर बाड़ी (घर) में रहे। यहीं पर उनके हमउम्र और डॉ.लोहिया के खास रहे ठाकुर जमुना सिंह भी रहते थे।

जमुना बाबू वैसे तो विवाहित थे, लेकिन उनका परिवार कभी यहां नहीं रहा। वह मूलत: उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। परिवार में उनकी पत्नी और पांच बच्चे थे। लेकिन समाजवादी आंदोलन में इस कदर वह मुलव्विस थे कि परिवार के प्रति उनका ध्यान ही नहीं रहा। सत्तर के दशक में ठाकुर जमुना सिंह दूर के रिश्ते में अपने एक भतीजे रामकुबेर सिंह को कलकत्ता ले आए। जो आखिरी समय तक उनके साथ रहे और अब भी आठ इंडियन मिरर स्ट्रीट में उनका एक ऑफिस है। रामकुबेर सिंह बताते हैं, कलकत्ता आने पर डॉ. लोहिया तो खैर यहाँ आते ही थे। फिर यहीं से चंद फर्लांग की दूरी पर उनकी बैठकी होती थी। जहां वर्तमान में एस्प्लानेड मेट्रो स्टेशन है।

इस मकान और डॉ. लोहिया से जुड़ा एक ऐतिहासिक व रोचक किस्से के बारे में वह बताते हैं। ‘यूगोस्लाविया के उप राष्ट्रपति, राजमर्मज्ञ और कम्युनिस्ट लेखक-विचारक मॉलबिन डिलास डॉ.लोहिया के अच्छे मित्र थे। लोहिया से मिलने वह 1956 में कलकत्ता आए। विमान पट्टी पर उनके स्वागत में सरकारी अमले कई वाहनों सहित मौजूद थे। यह देखकर उन्होंने कहा, इस औपचारिकता की कोई आवश्यकता नहीं,क्योंकि यह राजकीय यात्रा नहीं बल्कि उनकी निजी यात्रा है। उसके बाद डॉ. लोहिया के साथ इंडियन मिरर स्ट्रीट के इसी मकान में पहुंचे। तीन दिनों तक यहां रहे और उसके बाद लोहिया जी के बालसखा बालकृष्ण गुप्त जी के मकान मार्बल हाउस में रहे। सप्ताह भर लोहिया और डिलास के बीच समाजवाद और साम्यवाद पर चर्चा होती रही। यूगोस्लाविया लौटने के बाद उन्होंने ‘द न्यू क्लासÓ नामक किताब लिखी। दुनिया के कई भाषाओं में यह कि़ताब प्रकाशित हुई। काफ़ी विवादों में रही उनकी यह किताब। राष्ट्रपति मार्शल टीटो के कार्यकाल में उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

पचासी वर्षीय योगेंद्रपाल सिंह लोहिया अनुयायी व समाजवादी चिंतक व लेखक हैं। कई दशकों से वह कलकत्ता में हैं। इस मकान से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य के बारे में वह बताते हैं,मैनकाइंड और जन पत्रिकाओं के शुरूआती दो अंक यहीं से प्रकाशित हुए। बाद में इन दोनों पत्रिकाओं का प्रकाशन हैदराबाद के हिमायतनगर स्थित सोशलिस्ट पार्टी के केंद्रीय कार्यालय से होने लगा। उनके मुताबिक 1971 में साप्ताहिक अख़बार चौरंगी वार्ता का प्रकाशन आठ इंडियन मिरर स्ट्रीट के इसी मकान से शुरू हुआ था। इस साप्ताहिक के संस्थापक संपादक डॉ.रमेश चंद्र सिंह थे। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और जयप्रकाश छात्र आंदोलन की कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट चौरंगी वार्ता ने साहसिक ढंग से प्रकाशित की।

आठ नंबर मकान के सामने साठ वर्षों से चाय की दुकान चलाने वाले श्यामल घोष की उम्र इस समय पचहत्तर साल है। पंद्रह वर्ष की उम्र से वह अपनी दुकान चला रहे हैं। डॉ.लोहिया से उनकी पहली मुलाकात 1963 में हुई थी। उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा से आए समाजवादी नेताओं के साथ वह कोई मीटिंग कर रहे थे। बैठक के दिन वे वहां चाय लेकर गए थे। श्यामल घोष बताते हैं, डॉ.लोहिया कॉफी पीना ज्य़ादा पसंद करते थे,लेकिन उनकी चाय की तारीफ भी खूब किया करते थे। कभी-कभी वे खुद कॉफी का डिब्बा लेकर उनके पास आते थे। रोजाना आमदनी और खर्चे के बारे में पूछते थे। उनकी मौत के बाद भी राजनारायण,कर्पूरी ठाकुर और रवि राय जैसे समाजवादी नेताओं का आना-जाना रहा। लेकिन 1983 में ठाकुर जमुना सिंह की मृत्यु के बाद तो इंडियन मिरर स्ट्रीट की रौनक ही खत्म हो गई। इसके बाद रवि राय जब भी कलकत्ता आते,ठीक सामने लेनिन सरणी स्थित ओडिशा सरकार के गेस्ट हाउस उत्कल भवन में ठहरते। लेकिन सुबह और शाम चाय पीने हमारे पास जरूर आते। क्या यह ऐतिहासिक मकान शत्रु संपत्ति घोषित है। इस बारे में रामकुबेर सिंह बताते हैं,गृह मंत्रालय इस भवन को एनिमी प्रॉपर्टी घोषित करने पर विचार कर रही है। दरअसल, यह मकान एक मुस्लिम परिवार का है। वाजिद खान, रउफ खान और मल्लिका जान तीन भाई-बहन हैं। बंटवारे के समय इनमें से कुछ लोग पूर्वी पाकिस्तान चले गए। नतीजतन इस आधार पर गृह मंत्रालय इसे शत्रु संपत्ति घोषित करना चाहती है।

(लेखक पत्रकार हैं और डॉ.लोहिया से जुड़े शोध कार्यों में संलग्न हैं)

हद से गुज़र गया दर्द और मर्ज!

बालिग और पूरी तरह होशमंद शख्स आखिर कैसे बलात्कार पर आमादा हो सकता है? लेकिन न सिर्फ आमादा है, बल्कि दरिन्दगी पर उतारू है? पगलाए कुत्ते की सी सनक है….. बर्बरता भी ऐसी कि राक्षस को भी मात कर दे! ऐसी घटना तो सन्न करने वाली है कि मासूम बच्ची से बलात्कार, फिर हत्या और फिर बलात्कार? निखालिश बर्बरता ही नहीं वहशत पर सवार पागलपन और यह सिलसिला अंतहीन है, न रुकता है और थमता है ….. फांसी की सजा मुकर्रर होने और दो दरिन्दों को सूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी किसी दरिन्दे को इबरत नहीं मिली है…. ऐसी वहशत में कदम-कदम पर पाक्सो कोर्ट खुल भी जाए तो क्या होगा? राजस्थान के हर जिले शहर, कस्बों और मोहल्लो में बच्चियों के मां-बाप बुरी तरह थर्राए हुए हैं, लेकिन इस बात से बेखबर है कि ‘आखिर किस तरफ से दरिन्दा अपने पैने दांतों से जीभ लपलपा रहा है? लेकिन सरकार है कि उसे शर्मिन्दगी तक नहीं है….

उसकी उम्र कोई तीन साल की रही होगी…. अबोध और मासूम। जयपुर के निकटवर्ती कानोता गांव में सोमवार 2 जुलाई की रात दस बजे के करीब अपने दो भाई-बहनों के साथ घर के बाहर छुपम-छुपाई का खेल खेल रही थी। खेलने में मगन उस मासूम को कहां पता था कि कोई दरिन्दा उसकी मासूमियत पर अपने पैने दांत गड़ाने की ताक में है। पड़ोस में रहने वाला युवक था वो… उसकी फुंफकार से बेखबर बच्चों को लगा, ‘अंकल उनका खेल देख रहे हैं, लेकिन नशे में धुत्त दरिन्दे की वहशत मासूम बच्ची को निगलने को बेताब थी। वो लकड़बग्घे की तरह लडख़ड़ाता हुआ दबे पांव मासूम बच्ची के सिर पर पहुंचा और अपने पंजों में दबोच लिया। साथ खेल रहे चार साल का भाई और दो साल की बहन दहशत से कांपते-थर्राते घर के भीतर दौड़ गए…. दरिन्दे के चंगुल में फंसी डर से कांपती बच्ची के प्राण कंठ में अटक गए, बिलखती बच्ची की कलेजा फाड़ देनेवाली चीख आखिर मां को सुनाई दे ही गई, भीतर से दौड़कर आती मां ने बाहर जो नजारा देखा तो उसके होश फाख्ता हो गए, लेकिन ममता ने जोर मारा तो पूरी ताकत से उस राक्षस से उलझ गई, लेकिन तब तक वो दुष्कर्मी बच्ची के साथ दर्द के हर दाव आजमा कर भाग छूटा था। जख्मी और कराहती बच्ची को लेकर घटना से सन्न हुए मां-बाप अस्पताल दौड़े। लेकिन अस्पताल ने तुरंत मदद की बजाय पुलिस थाने की राह सुझा दी…. खून से सनी लथपथ बच्ची बेपनाह दर्द से बेहाल एक-एक फुट ऊंची उछल रही थी, आखिर बच्ची अस्पताल पहुंची तो मरणासन्न हालत में! जयपुर के जे.के लोन में बच्ची के सिरहाने बैठी रोती, बिलखती मां बच्ची के हाथ में पैसे रखते हुए बोली, ‘चुप हो जा बेटी, घर जाएंगे तो आइसक्रीम खा लेना। बच्ची के तन की चोट दुरूस्त भी हो गई तो मन की चोट हरदम कराहती रहेगी, ‘वो तो अंकल थे, सोचा था मेरे साथ खेलने आए हैं, लेकिन अंकल ने तो…!

शनिवार 22 जून

सीमावर्ती जिले बाड़मेर के गिराज थाना क्षेत्र का एक गांव है, ऊनारोड। दरिन्दा ना जाने कब से आठ साल की मासूम तारा (बदला हुआ नाम) की ताक में था? नाना के घर आई हुई तारा अपने ननिहाल में नींद में गाफिल सोई हुई थी, घर पर उसके अलावा कोई ना था? पहले ही ताक में बैठे दरिन्दे के लिए अचूक मौका था, उसे उठाया और दबोच कर घने जंगलों में घुस गया….. मासूम की नींद खुली, वो चौकी और दरिन्दे की आंखों में तैरती वहशत से थर्राई तो चीख पड़ी, लेकिन सुनने वाला कौन था? उसने पहले चीखती-बिलखती बच्ची से रेप किया फिर शोर से भिन्नाकर उसका गला दबा दिया, उसके बाद फिर रेप किया और बच्ची को ऊंचाई से गिरते झरने में फेंक दिया। आखिर पुलिस की दौड़ धूप रंग लाई, जो दरिन्दा पकड़ा गया, चालीस वर्षीय रईस उर्फ रसीद था। उसने गुनाह कबूल कर लिया लेकिन इस बात का क्या जवाब था कि उसके प्राइवेट पार्टस तो ऐसे कर दिए मानों बर्छी भालों से रोंदे गए हों? वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी कहते हैं, ‘आसुरी अहंकार को अपराध बोध कैसा….अब तो धरती को ही फटना होगा या फिर यदा-यदा हि धर्मस्य…

एक दुष्कर्म पीडि़ता की खुद बयानी

‘…..मेेेरे साथ आठ साल की उम्र में जो बीती, उसे बयान करने के लिए तो आखर की भी समझ नहीं थी? पता ही नहीं था, किसे कैसे और क्या बताऊं? लेकिन अब 15 साल की उम्र में इसके मायने पता है और मां भी बता रही है ‘जब मेरे साथ यह वारदात हुई तो कुकर्मी मुझे घर के पास एक वीराने में छोड़ गया था और मैं बुरी तरह बदहवास थी…… बस इतना ही समझ पाई कि मेरे साथ जो हुआ, वो बहुत बुरा था, खराब था। चार घंटे तक मां मेरे इलाज के लिए जूझती रही, डाक्टरों से मिन्नतें करती रही, लेकिन इलाज की बजाय नसीहतें मिल रही थी कि, ‘इसे घर ले जाओ…।Ó बाद में थाना कोर्ट-कचहरी का अंतहीन सिलसिला चलता रहा…ना पुलिस मददगार रही, ना बिरादरी के लोग? अलबत्ता बचपन के इस तनाव ने मेरी उम्र में जरूर चार साल का इजाफा कर दिया?

मंा ने बताया पेट में पत्थर

‘…….वो करीब नो साल की थी, परिवार को उसके साथ हुई बेरहमी का पता तब चला जब वो प्रेग्नेंट हो गई। शरीर में आए बदलाव को वो समझ पाती? कहां थी इतनी समझ? मां से बार-बार पूछा तो आखिर खीझकर कह दिया, ‘तेरे पेट में पत्थर है।Ó मैं सहमकर दीवार के पीछे छिप गई, ‘मेरे पेट में कहां से आया पत्थर? एक बलात्कार पीडि़ता युवती की यह पीड़ा इंसानियत के पूरे वजूद को हिलाकर रख देती है। कि, ‘सबसे ज्य़ादा रूला देने वाली स्थिति तब पैदा होती थी, जब बलात्कारी अदालत में टकराता था, उसकी मुस्कुराहट मेरे भीतर तक चोट करती थी…आज मेरे जैसी कई भुक्तभोगी जिंदा तो है लेकिन मुर्दा की तरह ….शरीर के जख्म शायद भर भी गए लेकिन मन के जख्म?

वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत की मानें तो ‘एक बच्ची ने तो डायपर पहना हुआ था, लेकिन वो भी दरिन्दों की शिकार हो गई। ना बुर्का बच पाता है ना डायपर, ना जाने दरिन्दे कैसे बच जाते हैं? पंत कहते हैं – बलात्कार के खिलाफ तमाम क्रोध-प्रतिशोध और फांसी को कानून बनने के बावजूद हालात बेचैन करने वाले हैं। हर समझदार और संवेदनशील व्यक्ति इसके मायने तो समझता है लेकिन बावजूद इसके ये हमारे समाज का सबसे क्रूर और विदू्रप यथार्थ है। विडंबना बस यह है कि न्यायपालिका की अपनी सीमाएं और समस्याएं हैं। सबसे बड़ी समस्या है संख्या। राजस्थान की सिर्फ निचली अदालतों में ही 14 लाख से ज्य़ादा केस विचाराधीन है और फाइलों के इस ढेर में चेन स्नेचिंग और कार चोरी के साथ 6 साल की बच्ची के दुष्कर्म जैसा अमानवीय कृत्य भी एक केस नंबर ही है ….. उफ! ….कितनी बेरहम है ये व्यवस्था? इसीलिए हर जिले में पॉक्सो अदालतों की ज़रूरत है ताकि संवेदना का गुरूत्वाकर्षण तंत्र पर ऐसा दबाव बनाए कि किसी मां-बाप या बच्ची को यह बोझ सहना ही ना पड़े।

याद रखें कि दुष्कर्म सिर्फ दुखद घटना नही ंहै। यह असाधारण और कई बार की अंतहीन त्रासदी है। जो भी महिला इस पाश्विक यातना से गुजरती है, मान के चलिए उसके देह और आत्मा पहले ही भीतर तक छलनी हो चुकी होती है। देह में बचे थोड़े बहुत श्वास के लिए एक इकलौती उम्मीद है न्याय? इसके अलावा तो पीडि़ता का सब कुछ पहले ही दरहम-बरहम हो चुका होता है। इसलिए अगर लाज रखने की यह आखिरी ढाल भी हमें देर से ही न्याय दे तो कई अंदेशे और आशंकाएं तो पैदा होंगी ही?

वकील नहीं करेंगे आरोपियों की पैरवी

आगरा रोड पर कानोता के पास मालपुरा चैड़ में तीन साल की मासूम के साथ दरिन्दगी को लेकर आरोपी पवन के खिलाफ पूरा समाज एकजुट हो गया है। वकीलों ने भी घटना को लेकर आक्रोश जताया है। घटना को लेकर उत्तर भारत की सबसे बड़ी बार एसोसिएशन, जयपुर से इस मामले के आरोपित पवन की पैरवी नहीं करने का निर्णय किया है। एसोसिएशन की बैठक में यह निर्णय किया गया। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जयपुर की ओर से इस मामले में रणनीति तय करने के लिए बैठक बुलाने की तैयारी है। मुकेश समेत गांव के कई लोगों ने बताया कि पुलिस की कमजोर पैरवी की वजह से अपराधी छूट जाते हैं। वे दुबारा घिनौना अपराध करते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ समाज को ही सख्त एक्शन लेना होगा। कोई भी घटना करे तो उसके पूरे परिवार को बेदखल करने की सजा मिलनी ही चाहिए। सुमेल ग्राम पंचायत समिति भवन में सरपंच, पंचायत के अन्य प्रतिनिधियों के साथ आमजन की आपात बैठक बुलाई गई। बैठक में लोगों ने कहा कि कल किसी अन्य बालिका के साथ ऐसी घटना हो सकती है। ऐसे दरिन्दों को सबक मिलना चाहिए। पूरे परिवार को गांव से बेदखल किया जाए, तभी लोग चैन की सांस लेंगे। सुमेल सरपंच मदनलाल गुर्जर ने बताया कि लोगों ने गुरूवार सुबह आरोपी के घर का बिजली-पानी का कनक्शन काट दिया है। लोगों की मांग पर पंचायत के कोरम में आरोपी पवन के परिवार को बेदखल करने का प्रस्ताव लिया जाएगा।

प्रशासनिक चूक से धधका मालपुरा

साम्प्रदायिक सद्भाव की निगाह से बेहद नाजुक डाल पर टिके हुए टोंक जिले के मालपुरा कस्बे में प्रशासन की मामूली चूक ने राख में दबी चिंगारी को भड़कने का मौका दे दिया। बवाल उस कस्बे में पैदा हुआ जहां की जमीन 1992 की बाबरी मस्जिद ढहाने की घटना से पहले ही खदबदाई हुई थी, जिसके जेरेसाया कस्बे में अब तक 28 लाशें बिछ चुकी थी। जिसकी शुरूआत मालपुरा के ही हिन्दूवादी राष्ट्रीय पार्टी के स्थानीय नेता कैलाश माली की हत्या से हुई।

राजस्थान पुलिस के डीआईजी सत्यनारायण जैन ने तभी इस बात के अंदेशे की तरफ इशारा कर दिया था कि, ‘ग्रामीण इलाकों में साम्प्रदायिकता सिर उठाने लगी है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था, ‘भविष्य में स्थिति विध्वंसक हो सकती है। बहरहाल इस घटना से मालपुरा कुख्यात हो चुका है। मुख्य घटनाओं पर गौर करें तो, ‘गुरूवार 24 अगस्त को हिन्दूवादी संगठनों द्वारा निकाली गई तिरंगा यात्रा पथराव की शिकार हो गई। सूत्रों के अनुसार यात्रा निकालने की सहमति सांसद सुखबीर सिंह जोनपुरिया और मालपुरा विधायक कन्हैया लाल चौधरी की मौजूदगी में विभिन्न संगठनों की बैठक में हुई। लेकिन प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी, बावजूद इसके संगठन यात्रा निकाल बैठे।

इसका नतीजा क्या हो सकता था, इसका प्रशासन को पूरा अंदाजा था, फिर भी प्रशासन ने यह कहते हुए समाधान कर दिया कि, ‘ठीक है लेकिन यात्रा उनके बताए मार्ग से निकाले।“ किन्तु ऐसा नहीं हुआ और हिन्दूवादी संगठन के कावडिए न सिर्फ तय रास्ता बदल गए। बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थल की तरफ से यात्रा निकाल बैठे। संगठन में अति उत्साही युवा ज्य़ादा तैश में आ गए और दुकानों में तोड़-फोड़ कर दी। इस पर बवाल पैदा होना ही था, नतीजतन गुस्साई भीड़ ने न सिर्फ जमकर पथराव किया, बल्कि आधा दर्जन दुकानों को फूंक दिया। दंगे की आशंका में प्रशासन ने कस्बे में बेमियादी कफ्र्यू लगा दिया, लेकिन आग तो अब भी धधक रही है। लगता है डीआईजी जैन ने गलत नहीं कहा था? हालांकि अब तो जि़ला कलैक्टर भी प्रशासनिक चूक को मानते हैं। प्रशासन भले ही अपना सिर धुने, लेकिन इस घटना से पूरा सूबा तनाव के तंदूर पर बैठ गया है।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार कहते हैं, ‘असहिष्णुता का जिन्न अगर एक बार बोतल से बाहर आ गया तो उसे फिर बोतल में डालना संभव नहीं है। मालपुरा में भड़की हिंसा ने एक तरह से समूचे राज्य को चपेट में ले लिया हैं इनकी खिलाफत में अगर प्रदर्शनों को देखें तो लगता है इस ओट में राजनीति चमकाने की कोशिश की जा रही है। टिप्पणीकारों का कहना है कि अगर हिन्दूत्व राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देता है तो इस्लाम भी उस राष्ट्र के प्रति वफादारी की सीख देता है जिसमें इस्लाम के अनुयायी बस जाते हैं।

लेकिन क्या इस तरह के विवाद देश और इसके स्थायित्व को नुकसान नहीं पहुंचा रहे? इससे किसी धर्म का सम्मान नहीं हो रहा, बल्कि कुल मिलाकर यह वोट बैंक के लिए नेताओं की होड़ को बढ़ा रहा है। क्या इस तरह की हिंसक घटनाएं धार्मिक सनक को बढ़ावा नहीं दे रही? वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी कहते हैं, जिस तरह हिन्दू-मुस्लिम समुदायों का धु्रवीकरण बढ़ रहा है, उसके आगे देशहित गौण हो चुका है। पिछले दिनों राजस्थान के बूंदी में एक प्रतिमा को लेकर हिन्दूवादी संगठन और मुस्लिम आमने-सामने हो गए और जिन नेताओं पर सौहार्द रखने का दायित्व था, वे जुबानी जहर उगलने में जुट गए। आखिर कब तक बात-बेबात पर भड़कते रहेंगे लोग?

यूजीसी को खत्म करने के प्रस्ताव पर बटे लोग

वर्तमान केंद्र सरकार की प्रवृति शक्ति का केंद्रीयकरण करना और बाजारवाद को बढ़ावा देना है। तथापि यूजीसी को खत्म करने के लिए हालिया निर्देश एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत के उच्च शिक्षा आयोग के विधेयक में भारत की उच्च शिक्षा के शासन को सुधारने का प्रस्ताव है। यह विधेयक यूजीसी अधिनियम 1956 को बदल कर उसे भारत के उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के रूप में पुनर्गठन करना है। संस्था अपने नए रूप में विश्वविद्यालयों में अकादमिक मानकों को स्थापित करने और उन्हें सुधारने का काम करेगी।

सरकार ने संस्थानों को खोलने और बंद करने के लिए मानदंड बनाने, संस्थाओं को अधिक लचीलापन और स्वायत्तता प्रदान करने के लिए, महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां करने के नियम बनाने का निर्णय भी लिया है। चाहे विश्वविद्यालय किसी भी कानून के तहत शुरू किए गए हों (राज्य कानून सहित)।

वर्तमान सरकार का एक उच्च तकनीकी दृष्टिकोण है चाहे मामला यूजीसी का हो। यूजीसी में शिक्षाविदों की संख्या में तेजी से कमी आई है। जाति पक्षपात को मज़बूत करने के साथ ही उच्च शिक्षा का सांप्रदायिकरण हो रहा है। सबसे अधिक परेशान करने वाला तथ्य यह है कि प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग में महिलाओं, दलितों, ओबीसी विद्वानों के लिए कोई आरक्षण नहीं है।

अकादमिक नौकरशाहों उप-कुलपति, प्रोफेसर सहित यह नौकरशाहों से भरा है, जो की राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित होते हैं,। भारत के प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग यूजीसी की तुलना में अपेक्षाकृत कम अकादमिक होगा। आयोग के कुल 12 सदस्यों में से तीन नौकरशाह होंगे – उच्च शिक्षा सचिव, कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के सचिव, विज्ञान और प्रोद्योगिकी विभाग के सचिव।

यह स्पष्ट है कि मुख्य रूप से नौकरशाही शिक्षाविदों से बना यह कमीशन यूजीसी के अकादमिक स्तर को पक्षपात और बाबूगिरि के साथ तेजी से कम कर देगा। शिक्षा का यह सांप्रदायिकरण वास्तव में बाजारीकरण के साथ अच्छी तरह से मेल खाता है। आत्मकेंद्रित व्यक्ति जो नव उदार बाजार के लिए बनाए गए है और जो पूंजीवाद पैदा करते हैं वे न केवल उन पक्षपातों को पूरा करते हैं जिन पूर्वाग्रहों से वे ग्रस्त हैं और वे पक्षपात की धारणा को मजबूत करते है। लोगों को पैसे के द्वारा जांचा जाता है और वे उत्पीडित और अधिकारहीन को अल्पसंख्यकों की तरह घृणा से देखते हैं। मसौदे में उल्लेख किया जाना चाहिए कि अधिकारहीन, सामाजिक समूह, लिंग, अल्पसंख्यक समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

जेएनयू से अर्थशास्त्र के सेवामुक्त प्रोफेसर प्रभात पटनायक के अनुसार सभी सभावनाओं में वर्तमान सरकार के नव उदार विकास के आधार पर यह एक नौकरशाही निकाय बन जाएगा। भारत में अकादमिक संस्थान कभी भी सरकारी हस्तक्षेप से पूरी तरह आजाद नहीं रहे हैं। लेकिन एचआरडी मंत्रालय द्वारा सीधे विश्वविद्यालय फंड को नियंत्रित करने से हमारे स्ंास्थानों के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप काफी हद तक बढ़ जाएगा।

संस्थानों को ‘स्वायत्तताÓ देना भारत के प्रस्तावित उच्च आयोग (एचईसी आई) के प्रमुख बिंदुओं में से एक है। यद्यपि स्वंय स्वायत्तता देना बुरा प्रस्ताव नहीं है, और विश्वविद्यालयों को प्रभावशाली ढंग से कार्य करने के लिए स्वायत्तता की आवश्यकता है, परन्तु वर्तमान सरकार की स्वायत्तता योजना लागत में कटौती और फीस बढ़ाने के पैकेज के साथ आई है। यह फीस तय करने का मामला है इससे पिछडी आर्थिक स्थिति वाले छात्र उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाएंगे जब तक कि वे कजऱ् न ले। हमारे देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है यदि छात्र ऋण लेते हैं तो उनमें से बड़ी संख्या में छात्र ऋण वापस करने में असमर्थ होंगे और मौजूदा किसान आत्महत्याओं के समान यह सामूहिक आत्महत्या का कारण बन जाएगा।

स्वायत्तता के नाम पर सरकार उच्च शिक्षा के निजीकरण की दिशा में जा रही है। एचईसीआई का उद्देश्य वर्ग विभाजन के साथ उच्च शिक्षा की श्रेणी प्रणाली स्थापित करना है- पहली श्रेणी उच्च वर्ग के लिए, दूसरी श्रेणी मध्यम वर्ग के लिए और तीसरी श्रेणी साधारण जनता के लिए। अगर यह लागू हुआ तो हमारे पास पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त और अत्याधिक फीस वाले विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय होंगे, लेकिन इस के साथ ही तीसरी श्रेणीे के सामान्य छात्रों की बड़ी संख्या होगी जिसे सरकार की मान्यता नहीं होगी। यह अस्पष्ट है कि यूजीसी के बिना विश्वविद्यालय कैसे काम करेंगे। हम यह नही जानते की संस्थान कैसे धन प्राप्त करेंगे, और वे किससे संबंधित होंगे। सरकार के हस्तक्षेप की गैरहाजिरी में वे धन के लिए पूंजीपतियों पर निर्भर रहेंगे। इससे उच्च शिक्षा पर अधिक नियंत्रण राजनेता और कोपरेटस की मिलीभगत का होगा।

वित्त और अकादमिक निर्णय एक स्वायत्त निकाय द्वारा अकादमिक मानदंडों के आधार पर किए जाने चाहिए और यह किसी भी राजनीतिक संस्थान से अलग होने चाहिए। वर्तमान सुधार राज्य को उच्च शिक्षा की दिशा में अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से मुक्त करने का प्रयास है। हालांकि समय की आवश्यकता उच्च शिक्षा में एक ऐसे सार्थक सुधार की है जो पहुंच, निष्पक्षता और सामथ्र्य जैसी ज़रूरतों को पूरा करे। यह स्वायत्त कालेजों के निर्माण, जिसमें प्रवेश, पाठ्यक्रम और फीस के मामले में स्वतंत्रता होगी। यह पूरी तरह से उच्च शिक्षा क्षेत्र में ‘प्रबंधन कोटाÓ के साथ ‘स्वंय वित्त वाले पेशेवर कालेजोंÓ की श्रृंखला का आगे बढ़ाएगा।

यूजीसी ने अक्सर शैक्षिक संस्थानों में सरकारों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का रोका है, परन्तु जब संस्थागत प्रमुख को यह महसूस होगा कि वित्त सीधा मंत्रालय के नियंत्रण में है तो उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से जो भी कहा जाएगा उसे वे मानेगे। भारत एक विशाल देश है और हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थिति हर राज्य में अलग -अलग है। सरकार एचईसीआई जैसी संस्था का निर्माण कर सकती है जो राज्य की मदद उसकी स्थिति के अनुसार करे। उच्च शिक्षा में सुधार सामथ्र्य, पहुंच, गुणवत्ता की आवश्यकता और सभी को शिक्षा प्रदान करने की सामाजिक जिम्मदारी को पूरा करे।