सुजीत ठाकुर, नई दिल्ली
सियासी मुकाबले में कांग्रेस,भाजपा के मुकाबले बहुत पीछे है। असंतोष,गुस्से या आक्रोश जैसे सत्ता विरोधी रुझानों की सुनामी में भी विपक्ष सत्ता पक्ष के दरकी हुई दीवार को ढ़हाने में नाकाम है। यह आलम तब है जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम को सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मान रहे हैं। इस बात की मुनादी दिल्ली विश्वविद्धालय छात्र संघ चुनाव के नतीजे करते हैं।
दिल्ली विश्वविद्धालय छात्र संघ चुनाव में भाजपा की छात्र संघ इकाई (एबीवीपी) के सामने कांग्रेस की छात्रसंघ इकाई (एनएसयूआई) चारो खाने चित्त हो गई। चार में तीन पद एबीवीपी ने जीता जबकि एक निर्दलीय ने। एनएसयूआई खाता भी नहीं खोल सका।
डीयू के चुनाव नतीजे जिस वक्त घोषित हो रहे थे राहुल गांधी इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम को संबोधित करने के लिए वहां पहुंचे थे। लेकिन सभा शुरू होने से पहले ही एबीवीपी की डीयू में गूंज उन्हे सुनाई दे गया। सूत्रों का कहना है कि, इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम 19 सितंबर को विशेष रणनीति के तहत रखा गया था। टीम राहुल इस बात को लेकर आश्वस्त थी और शायद राहुल गांधी को भी आश्वस्त कर गई थी कि डीयू के नतीजे एनएसयूआई के पक्ष में ही आएगा। एक हद तक आंकलन सभी था क्योंकि काउंटिंग के वक्त कांटे का मुकाबला नजर आ रहा था। टीम राहुल शायद यह मान कर चल रही थी कि कुछ ही महीने पहले दिल्ली में जेन-जी आंदोलन की वजह से सरकार बैकफुट पर आई और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, सत्य निकेतन पीजी का गिरना, होस्टल की समस्या आदि मुद्दे ऐसे हैं जो केंद्र और दिल्ली में सत्तारूढ़ भाजपा के संगठन को भीतर तक हिला चुकी है। ऐसे में छात्रों की आवाज को, छात्रों की गूंज के नाम से जब राहुल गांधी एक आधार दे रहे हैं तो ऐसे में डीयू में एबीवीपी को हराना चुटकी का काम है। शायद इसी वजह से ओवर कॉनफिडेंट कांग्रेस ने उपाध्यक्ष दीपांशु शौकीन को तब मनाने की पुरजोर कोशिश नहीं की जब उन्होने एनएसयूआई से अलग हो निर्दलीय लड़ने का फैसला किया। शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की और उसने एबीवीपी उम्मीदवार को हराया। शौकीन की जीत को इस नजरिए से भी देखा जा सकता है कि एबीवीपी के उपाध्यक्ष उम्मीदवार से छात्रों की नाराजगी वाला वोट एनएसयूआई को जाने की जगह निर्दलीय के पास गया।
एबीवीपी ने 2025 में भी अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के तीन पद जीते थे। उस चुनाव में NSUI केवल उपाध्यक्ष पद जीत सकी थी। 2026 में भी लगभग यही नतीजे रहे। अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार उपाध्यक्ष पद एनएसयूआई की जगह निर्दलीय के पास गया। मतलब साफ है की एबीवीपी का संगठन बीते एक साल में छात्रों के तमाम नाराजगी के बाद भी कमजोर नहीं हुआ और एनएसयूआई छात्रों इस नाराजगी को अपने पक्ष में कमजोर संगठन की वजह से नहीं कर पाई।




