संविधान संशोधन नहीं हुआ तो क्या होगा? परिसीमन और महिला आरक्षण पर बढ़ सकती है अनिश्चितता

नई दिल्ली। संसद में परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच एक बड़ा संवैधानिक सवाल सामने आया है—यदि प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं होता, तो आगे क्या होगा? संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति में वर्तमान व्यवस्था ही लागू रहेगी और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन सहित परिसीमन की प्रक्रिया पर अनिश्चितता बनी रह सकती है।

वर्तमान में 106वें संविधान संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए नई जनगणना के बाद परिसीमन (Delimitation) आवश्यक है।

केंद्र सरकार ने इसी उद्देश्य से एक नया संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित किया है, जिसके जरिए परिसीमन की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा कर महिला आरक्षण को 2029 के आम चुनाव से पहले लागू करने का रास्ता तैयार करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यदि यह संविधान संशोधन पारित नहीं होता, तो मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं होगा और महिला आरक्षण का क्रियान्वयन अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन तक टल सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान संशोधन विफल होने की स्थिति में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की वर्तमान सीमाएं तथा सीटों का मौजूदा आवंटन यथावत रहेगा। यानी नए सिरे से सीटों का पुनर्विन्यास या महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण नहीं हो सकेगा।

परिसीमन को लेकर राजनीतिक मतभेद भी तेज हैं। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने आशंका जताई है कि नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने से उनकी संसदीय हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।

संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि आवश्यक समर्थन नहीं मिलता, तो संशोधन प्रभावी नहीं हो पाएगा और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ही आगे की प्रक्रिया चलेगी।