तहलका Magazine/Exclusive Report / Edition : 16-31st May 2026
ममता सिंह।
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर को जातीय हिंसा की आग में झुलसते तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं! सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां शांति की राह आसान नहीं दिख रही है। जो लड़ाई मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुई थी, उसने पहले ही पूरे राज्य को दो हिस्सों में बांट दिया है। हजारों लोग राहत शिविरों में हैं और समुदायों के बीच अविश्वास की खाई गहरी हो चुकी है। इस बीच, 2026 के ताजा घटनाक्रम ने इस संकट को और अधिक चिंताजनक बना दिया है। अब यह लड़ाई सिर्फ दो पक्षों की नहीं रही, नगा समुदाय के आने से यह मामला अब और उलझ गया है।
मणिपुर का नक्शा एक तश्तरी जैसा है। बीच में इंफाल घाटी है, जो कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 10% है। लेकिन इस छोटे से हिस्से में राज्य की 53% आबादी (मुख्य रूप से मैतेई समुदाय) रहती है। घाटी विकसित है, राजधानी यहीं है और राजनीतिक रसूख भी यहीं से तय होता है। ऐसे में यह लड़ाई सिर्फ धर्म या जाति की नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व और अधिकार’ की है। घाटी के लोग अपनी बढ़ती आबादी के लिए जगह चाहते हैं, तो पहाड़ों में रहने वाले समुदाय अपनी जमीन और पहचान को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। अब नगाओं की एंट्री ने इसे दो पक्षों की लड़ाई से हटाकर एक ऐसा त्रिकोणीय संघर्ष बना दिया है, जिसमें हर कोई अपनी ‘पैतृक जमीन’ को सुरक्षित करने की होड़ में है। फरवरी 2026 में उखरुल के लिटन गांव से भड़की चिंगारी ने अब कुकी और नगा समुदायों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। जब बिष्णुपुर के मोइरांग में घर के अंदर रॉकेट हमले ने दो मासूम जिंदगियां छीन लीं, तो लगा कि हिंसा का सबसे भयावह दौर शुरू हो गया है। लेकिन उसके तुरंत बाद नगा बहुल इलाके उखरुल के मुल्लम और सिनाकेइथेई गांवों में हुई गोलाबारी ने यह साफ कर दिया कि अब निशाना केवल मैतेई नहीं, बल्कि नगा गांव भी हैं।
उखरुल और कामजोंग जिलों में शुरू हुए ताजा संघर्ष में अब तक आधिकारिक और पुख्ता रिपोर्टों के अनुसार, 12 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, हालिया घटनाओं को लेकर कोअलिशन ऑफ इंडिजीन्स राइट्स कैंपेन (सीआईआरसीए) ने आरोप लगाया है कि मणिपुर के कामजोंग जिले के गांवों नामली, वांगली और चोरो पर हाल ही में हुए हमले म्यांमार स्थित कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा (केएनए-बी) और म्यांमार के पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) जैसे समूह शामिल थे। यानी अब की तमाम घटनाएं ‘सीमा पार आतंकी हमले‘ जैसी ही प्रतीत हो रही हैं।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि इस पूरे संघर्ष में ‘म्यांमार फैक्टर’ सबसे खतरनाक मोड़ बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से होने वाली घुसपैठ ने मणिपुर की आग को और भड़का दिया है। म्यांमार के विद्रोही संगठन अपने सजातीय ‘भाइयों’ की मदद के नाम पर भारतीय सीमा में घुसकर हमले कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर देश की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। नगा गांवों में मची तबाही और वहां से गायब होते लोग बता रहे हैं कि यह अब कोई मामूली लड़ाई नहीं रह गई है। विद्रोहियों के पास मौजूद सैन्य ड्रोन, रॉकेट लॉन्चर और स्नाइपर राइफलें साफ इशारा कर रही हैं कि सीमा पार से उन्हें पूरी रणनीतिक मदद मिल रही है। यानी कल तक भारत सरकार जिस चारों क्षेत्र को ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया का व्यापारिक द्वार बनाना चाहती थी, वह आज मलबे और अविश्वास के ढेर में तब्दील हो चुका है।
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले तीन सालों से नगा समुदाय, कुकी-मैतेई विवाद से दूर रहा है। इस समुदाय की चुप्पी और तटस्थता ने ही राज्य को पूरी तरह बिखरने से बचाए रखा, लेकिन जब आंच उनके गांवों और घरों तक पहुंच गई तो उनके भी सब्र का बांध टूट पड़ा! नगा संगठनों का आरोप है कि कुकी विद्रोही उनके इलाकों में घुसपैठ कर रहे हैं। उनकी जमीनों पर हक जमाने की कोशिशें दिनोदिन बढ़ रही हैं। जानकारों का कहना है कि यदि नगा समुदाय की रक्षा के लिए नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड- इसाक-मुइवा यानी एनएससीएन (आईएम) जैसे बड़े और ताकतवर संगठन ‘अपने’ लोगों के समर्थन में मैदान में उतर आए, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। लंबे समय से ‘शांति वार्ता’ से बंधे ये संगठन यदि फिर हथियार उठाते हैं या ‘ग्रेटर नगालिम’ की मांग फिर से हिंसक हुई तो इसकी आंच सिर्फ मणिपुर तक नहीं रहेगी; असम, नगालैंड और मिजोरम भी इसकी चपेट में आ जाएंगे, जिससे पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है!
मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई सरकार राज्य में स्थायी शांति बहाली की कोशिश तो कर रही है, लेकिन ये प्रयास सिर्फ ऊपरी तौर पर ही दिख रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का मुद्दा बताकर सरकार को घेर रहे हैं, वहीं एन. बीरेन सिंह अब भी हिंसा की मुख्य वजह ड्रग्स और घुसपैठ को ही मान रहे हैं। हालांकि, बीते विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद चुनाव ड्यूटी से लौटे अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा तो संभाल लिया है, लेकिन फिर भी सवाल यह है कि क्या सिर्फ बंदूकों के साए में खौफजदा लोगों का भरोसा जीता जा सकता है?
यदि मई 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो मई 2023 से भड़की इस आग में अब तक 250 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 63 हजार से ज्यादा लोग अपने घरों को छोड़कर कैंपों में शरण लेने पर मजबूर हैं। तीन साल बीत जाने के बाद भी विस्थापितों की सुरक्षित घर वापसी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। समुदायों के बीच पैदा हुई नफरत की खाई को भरने के लिए अब केवल वादे नहीं, बल्कि दशकों का समय और एक ईमानदार राजनीतिक संकल्प चाहिए।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में भारत सरकार के पास ‘त्रिकोणीय शांति फॉर्मूला’ ही इकलौता रास्ता बचता है। मणिपुर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता साथ मिलकर आगे बढ़ने की ओर जाता है और दूसरा उस अंतहीन अंधेरे की ओर, जहां से लौटना नामुमकिन होगा। यदि सबको साथ लेकर चलने वाली राजनीति तुरंत शुरू नहीं हुई, तो मोइरांग के उन मासूमों और उखरुल की जली हुई बस्तियों की रौनक कभी वापस नहीं लौट पाएगी।
उखरुल और कामजोंग पर क्यों है नजर?
उखरुल और कामजोंग में छिड़ा यह नया संघर्ष मणिपुर की हिंसा का सबसे जटिल अध्याय है। यह अब केवल एक जातीय दंगा नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक और रणनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है। विश्वसनीय सूत्रों और ताजा घटनाक्रमों के आधार पर इसके पीछे की मुख्य वजहें हैं- इंफाल से उखरुल और कामजोंग का रास्ता म्यांमार सीमा तक पहुंचने का सबसे छोटा और अहम रूट है। कुकी विद्रोही इस इलाके पर कब्जा कर घाटी और पहाड़ियों के बीच अपना मजबूत आधार बनाना चाहते हैं, ताकि सीमा पार से हथियारों और रसद की सप्लाई सीधे उनके हाथ में रहे। मालूम हो कि मणिपुर से म्यांमार की करीब 390 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा है। खुफिया जानकारी के मुताबिक, ज्यादातर घुसपैठ म्यांमार सीमा से ही हो रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कामजोंग में देखने को मिला, जहां सीमापार से आए विद्रोहियों ने ड्रोन और रॉकेट हमलों से सुरक्षा एजेंसियों की नींदें उड़ाकर रख दी हैं। इन विद्रोहियों की कोशिश नगा गांवों को खाली कराकर अपने लोगों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना तैयार करने की है! उखरुल और कामजोंग लंबे समय से नगाओं का गढ़ रहे हैं, जहां 90 के दशक में भी खूब खून-खराबा हुआ था। जानकारों की मानें तो अब कुकी विद्रोही ‘अलग प्रशासन’ के लिए म्यांमार बॉर्डर से सटी जमीन चाहते हैं! मैतेई बहुल घाटी में जगह न मिलने के कारण वे अब नगा इलाकों में आबादी बसाकर राज्य का भूगोल बदलने की कोशिश में हैं। इस संघर्ष के पीछे अफीम की खेती और ड्रग्स का अरबों का कारोबार भी बड़ी वजह है। विद्रोही तस्करी के रास्तों पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। सरकार के ‘वार ऑन ड्रग्स’ अभियान ने इनके धंधे को चोट पहुंचाई है, जिसे दोबारा शुरू करने के लिए अब इन शांत जिलों को युद्ध के मैदान में तब्दील किया जा रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उखरुल-कामजोंग का यह ‘छोटा पैच’ पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा की चाबी है। कुकी विद्रोहियों का लक्ष्य यहां के स्थानीय नगाओं को विस्थापित कर एक ऐसा हथियारबंद गलियारा बनाना है, जो उन्हें सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा से जोड़ दे और भविष्य में ‘स्वतंत्र प्रशासन’ की मांग को भौगोलिक मजबूती दे सके।
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