
तहलका डेस्क।
नई दिल्ली/भोपाल। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक भोजशाला को स्पष्ट रूप से हिंदू मंदिर करार देना और हिंदुओं को निरंतर पूजा-अर्चना का अधिकार सौंपना न्यायशास्त्र के इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ है। न्यायालय ने सुदृढ़ साक्ष्यों के आधार पर रेखांकित किया कि इस पावन स्थल पर हिंदू उपासना की निरंतरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
सन 1034 में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा स्थापित यह ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ केवल एक संरचना नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सभ्यतागत अस्मिता का जीवंत प्रतीक था। यद्यपि वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी, 1401 में दिलावर खान गौरी और 1514 में महमूद शाह खिलजी जैसे आक्रांताओं ने इस भव्य मंदिर को क्षतिग्रस्त कर मस्जिद का स्वरूप देने का बार-बार प्रयास किया, किंतु इसकी दीवारों और स्तंभों में अंकित संस्कृत शिलालेखों ने इसके मूल चरित्र को जीवित रखा।
इस ऐतिहासिक निर्णय का सबसे मजबूत आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक और अकाट्य सर्वे रिपोर्ट है। निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया के तहत किए गए इस सर्वे में परिसर से भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे देवी-देवताओं की 94 प्राचीन मूर्तियां, अवशेष और परमार कालीन सिक्के बरामद हुए, जिन्होंने विवादित ढांचे के पीछे दबे वास्तविक सच को सार्वजनिक कर दिया। विद्वान न्यायाधीशों द्वारा स्वयं किए गए प्रत्यक्ष निरीक्षण, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक साहित्य (जैसे कवि मदन के नाटक) ने इस बात पर अंतिम मुहर लगा दी कि यह वाग्देवी मां सरस्वती का ही पावन धाम था।
यह निर्णय केवल एक स्थल की मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक आत्मा की पुनर्स्थापना है। अब समाज और सरकार के समक्ष इस परिसर को पुरातन काल की भांति संस्कृत और धर्मशास्त्रों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बनाने की महती जिम्मेदारी है। इसके साथ ही, वर्ष 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान खुदाई से प्राप्त और वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की मूल वाग्देवी प्रतिमा को भारत वापस लाने की अदालती टिप्पणी अत्यंत स्वागत योग्य है।
यह फैसला किसी समुदाय की पराजय नहीं बल्कि ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है, जिसे संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर सभी को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।



