तहलका Magazine/Edition : 16-31 may 2026
ममता सिंह।

Pic Credit : Naveen Bansal
भारतीय राजनीति का केंद्र अब 2029 की ओर मुड़ चुका है जिसके लिए 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव एक निर्णायक ‘सेमीफाइनल’ माने जा रहे हैं। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों ने देश के पांच राज्यों की सियासी दिशा तय कर दी है। परिणामों ने बता दिया है कि मतदाताओं का मिजाज बदल रहा है। अब संकीर्ण मानसिकता की राजनीति नहीं चलेगी। पश्चिम बंगाल से केरल और तमिलनाडु तक, नए की उम्मीद और पुराने के प्रति गुस्से के चलते मौजूदा व्यवस्थाएं ढहती दिखीं। असम में जहां हिमंता की पकड़ बरकरार रही, वहीं बंगाल ने शुभेंदु अधिकारी के राजतिलक के साथ ऐतिहासिक ‘भाजपा युग’ में प्रवेश किया। दक्षिण में अभिनेता विजय की पार्टी ने तमिलनाडु की सत्ता पर कब्जा कर सबको चौंका दिया। पुडुचेरी में रंगासामी का जादू फिर चला, जबकि केरल में कांग्रेस गठबंधन की प्रचंड जीत हुई है।
नतीजों ने बता दिया है कि राजनीति अब केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध के सहारे नहीं जीती जा सकती। आज के दौर में चुनावी वैतरणी पार करने के लिए डेटा इंटेलिजेंस और हाई-टेक बूथ मैनेजमेंट जैसे आधुनिक हथियारों को अपनाना अनिवार्य हो चुका है। पुरानी वैचारिक जकड़न और घिसे-पिटे सिद्धांतों के बूते हाई-टेक संसाधनों से लैस विरोधियों को मात देना अब पूरी तरह असंभव जान पड़ता है। चुनावी मैदान में कामयाबी की डगर अब पहले जैसी सहज नहीं रह गई है, यहां हर कदम पर नई तकनीक और सटीक रणनीतिक कौशल की दरकार होती है।
कांग्रेस के लिए इन नतीजों में सबसे बड़ा सबक यह छिपा है कि राहुल गांधी को अब अपनी नीति निर्धारण में लचीलापन लाना ही होगा। केरल की सफलता और तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी ‘टीवीके’ का उदय इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जहां क्षेत्रीय क्षत्रपों को ‘फ्री हैंड’ दिया गया, वहां करिश्माई नतीजे सामने आए। अब वह समय बीत चुका है जब दिल्ली में बैठकर राज्यों की किस्मत के फैसले तय किए जाते थे। राहुल गांधी को अब क्षेत्रीय चेहरों को न केवल बड़ी पहचान देनी होगी, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की पूरी स्वायत्तता भी सौंपनी होगी।
विपक्ष को यह समझना होगा कि जीत तभी मुमकिन है जब चुनाव को केवल राष्ट्रीय विमर्श में उलझाने के बजाय राज्यों के स्थानीय मुद्दों और जनता की जमीनी जरूरतों पर केंद्रित किया जाए। ऐसे में मुख्य विपक्षी दल होने का दावा करने वाली कांग्रेस को भाजपा के ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल की काट ढूंढनी होगी। कांग्रेस को तत्काल ऐसे कैडर की तलाश शुरू कर देनी चाहिए जो तकनीकी और रणनीतिक रूप से सक्षम हों। आज कांग्रेस सेवादल की जो बदहाली है, वह किसी से छिपी नहीं है।
संदेश साफ है कि 2027 के राज्यों के चुनावों और 2029 की बिसात बिछाने के लिए अब नए चेहरे और स्पष्ट विजन का फॉर्मूला अपनाना ही होगा। सत्ता पक्ष को पटखनी देने के लिए सत्ता विरोधी लहर का सही समय पर सटीक इस्तेमाल अनिवार्य है, वरना सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। चुनाव नतीजों ने कांग्रेस और क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने जो बड़ी चुनौती पेश की है, उसे पाटने के लिए कार्यकर्ताओं को किताबी बातों के बजाय जमीनी कसरत पर अधिक ध्यान देना होगा। अब केवल ‘मोदी विरोध’ के नकारात्मक नैरेटिव से मतदाता रीझने वाले नहीं हैं। दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए महज सांगठनिक फेरबदल काफी नहीं, बल्कि आधुनिक मॉडल को आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा।
पश्चिम बंगाल में वामफ्रंट का कैडर ‘वैज्ञानिक’ तरीके से बूथ की निगरानी के लिए जाना जाता था। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का बूथ प्रबंधन भी लगभग उसी वामपंथी ढर्रे पर ही आधारित रहा। तृणमूल ने 15 साल सत्ता संभाली, लेकिन आधुनिक दौर के अनुरूप अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव नहीं किया, जिसका खमियाजा उसे वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा। दूसरी ओर, भाजपा का पूरा जोर तकनीक और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसे आधुनिक सुधारों पर रहा। भाजपा ने अपने कैडरों को डेटा और टेक्नोलॉजी पर केंद्रित किया, जबकि तृणमूल और कांग्रेस के दिग्गज केवल भाषणों के जरिए हमलावर रहे। विपक्ष मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए जाने का दावा करता ही रह गया, जबकि भाजपा ने तकनीक के मोर्चे पर बाजी मार ली।
दस्तावेजों की पड़ताल के नाम पर करीब करीब 27 लाख मतदाताओं को वोट डालने से रोका गया, क्योंकि निर्वाचन आयोग के अनुसार उनके कागजात अधूरे थे। ममता बनर्जी, कांग्रेस और वामदलों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, लेकिन भाजपा को घेरने के चक्कर में वे इसकी तह तक जाने में नाकाम रहे। तृणमूल कांग्रेस केवल आरोप-प्रत्यारोप में ही उलझी रही और अपने वोट बैंक को सुरक्षित व समृद्ध करने के जमीनी मोर्चे पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत, भाजपा कैडर लोगों के घरों तक पहुंच कर वोटर लिस्ट दुरुस्त करने में जुटा रहा। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में मतदाताओं की चुप्पी नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश छिपा है। जरूरत बस इस जमीनी हकीकत और जनता के संकेत को सही समय पर समझने की है।
पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि अब राज्य में ‘जय श्रीराम’ और ‘खेला होबे’ जैसे नारों की गूंज फीकी पड़ चुकी है। इनकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है और भविष्य में महज इन नारों के दम पर सत्ता की दहलीज तक पहुंचना नामुमकिन है। परिणामों का विश्लेषण करें तो ‘एसआईआर’ के अलावा कई ऐसे कारक हैं, जिन्होंने तृणमूल की विदाई तय की। हार के लिए केवल सरकारी मशीनरी पर आरोप लगाना महज खानापूर्ति के सिवाय कुछ और नहीं, असलियत कहीं अधिक गहरी है। पश्चिम बंगाल में दलित और ओबीसी वोट बैंक में हुए बिखराव ने ममता बनर्जी की बंगाल से विदाई में आग में घी का काम किया। भाजपा ने मतुआ और राजबंशी समुदायों के बीच अपनी पैठ इतनी मजबूत की कि तृणमूल के अभेद्य दुर्ग ढहते चले गए। हुमायूं कबीर और ओवैसी ने ‘दीदी’ के पारंपरिक वोट बैंक में ऐसी सेंध लगाई कि ध्रुवीकरण का सीधा लाभ भाजपा की झोली में जा गिरा। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि मतदाता अब तुष्टिकरण नहीं, बल्कि समान अवसर चाहता है। अपनी ही सीट भवानीपुर न बचा पाने वाली ममता के पतन की पटकथा वामपंथ से आए उन ‘दागी’ कैडरों ने लिखी, जिन्हें तृणमूल ने शरण दी थी।
दूसरी ओर, तमिलनाडु में ‘टीवीके’ सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी है। यहां के मतदाता लंबे से क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के चक्रव्यूह में फंसे थे। लेकिन नायक से जननायक बने विजय ने उस राजनीतिक शून्यता को भर दिया है जो जयललिता और करुणानिधि जैसे दिग्गज नेताओं के जाने से पैदा हुई थी। तमिलनाडु की जनता अब तक थेवर, वनियार और कोंगु वेल्लालर जैसी जातियों में बंटी थी, जिसे टीवीके ने तमिल पहचान के विजन से तोड़ दिया। तमिलनाडु में दशकों पुराने द्रविड़ किलों को ढहाते हुए अभिनेता विजय की पार्टी ने 108 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। हालांकि, बहुमत के 118 के आंकड़े से वे थोड़ा दूर थे, लेकिन कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर उन्होंने तमिलनाडु में एक नए राजनीतिक युग की आधिकारिक शुरुआत कर दी है।
तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीति के इस बड़े उलटफेर ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही भविष्य के लिए सतर्क कर दिया है। अब दोनों ही दल फूंक-फूंककर कदम उठाने को मजबूर हैं। जहां तक असम का सवाल है, भाजपा ने वहां जीत की हैट्रिक लगाकर अपनी पकड़ साबित की, लेकिन सबसे चौंकाने वाली खबर गौरव गोगोई की हार रही। गौरव न केवल कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा हैं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के उत्तराधिकारी भी हैं। इसके बावजूद, वह जोरहाट सीट पर भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से 23,182 वोटों से मात खा गए।
असम में, हिमंत बिस्वा सरमा ने असमिया अस्मिता को मोदी सरकार के विकास विजन से कुछ इस तरह जोड़ा कि विपक्षी वोट बैंक पूरी तरह बिखर गया। इसी का परिणाम था कि कांग्रेस के राष्ट्रीय चेहरा गौरव गोगोई को जोरहाट में हितेंद्र नाथ गोस्वामी से 23,182 मतों से करारी हार झेलनी पड़ी। असल में असम में कांग्रेस की हार के पीछे बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) और अन्य क्षेत्रीय दलों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। भाजपा उन सीटों पर भी जीती, जहां मुकाबला त्रिकोणीय था।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो असम में भाजपा के जीत की पटकथा विधानसभा चुनाव के पहले ही लिख दी गई थी, जब नगांव के कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। बोरदोलोई ने दिसपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। उनके पाला बदलने से असम की सियासत ऐसे गरमाई कि मतदाताओं के बीच यह संदेश चला गया कि राज्य में तीसरी बार भी भाजपा ही सरकार बनाएगी। वाकई, बोरदोलोई का भाजपा में जाना असम चुनाव का सबसे बड़ा ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हुआ। साथ ही,
अल्पसंख्यक समाज को लेकर उन्होंने जो बिसात बिछाई, उसका सीधा असर 2026 के विधानसभा परिणामों में दिखाई दिया।
अब मतदाता जाति और धर्म की पुरानी बेड़ियों को तोड़कर ‘विकास’ और ‘राष्ट्रहित’ को प्राथमिकता दे रहा है। सूचना के इस दौर में आम नागरिक अब इतना सजग है कि वह नेताओं के वादों और जमीनी हकीकत के अंतर को तुरंत भांप लेता है। यानी जनता अब व्यवस्था की सुस्ती या राजनीतिक संकीर्णता को सहन करने के मूड में नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उभरा यह नया मिजाज बताता है कि लोकतंत्र अब केवल वोट देने तक सीमित नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का माध्यम बन चुका है। स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति अब भावनात्मक मुद्दों को पीछे छोड़कर ‘परफॉरमेंस’ की राह पर चल पड़ी है। जहां व्यवस्था उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती, वहां जनता का आक्रोश बड़े बदलाव लाने की ताकत रखता है।
मोदी फैक्टर: विपक्ष के हर चक्रव्यूह का जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए एक ब्रांड से कहीं बढ़कर हैं। विपक्षी नेता भी अब परोक्ष रूप से स्वीकार करने लगे हैं कि मोदी न केवल भारत, बल्कि विश्व के लोकप्रिय नेताओं में शुमार हैं। पीएम का विजन स्पष्ट है और मतदाताओं में भरोसा जताने में कामयाब होते हैं कि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की कामयाबी के पीछे असल चेहरा पीएम मोदी का ही है। वहां के लोगों ने इस विश्वास के साथ मतदान किया कि देश को श्रेष्ठ बनाने के लिए बंगाल में परिवर्तन अनिवार्य है। वरना, ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को ढहाना असंभव था। इन चुनावों की जीत का लाभ अगले साल महत्वपूर्ण राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड एवं पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में मिलना तय माना जा रहा है। मोदी की हर हुंकार में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना निहित रहती है।
कांग्रेस की चुनौती: राहुल का गणित और 2029 की राह

हालिया विधानसभा चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस को अपनी रणनीति में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। केरल में जीत के बावजूद पार्टी तमिलनाडु में जनता की नब्ज पहचानने में चूक गई। यदि राहुल गांधी ने समय रहते थलापति विजय के साथ पुख्ता गठबंधन किया होता, तो आज राज्य में दो-तिहाई बहुमत की सरकार होती। वहीं, बंगाल में ममता बनर्जी पर उनका सीधा हमला भी आत्मघाती साबित हुआ, जिसने गठबंधन की संभावनाओं को खत्म कर दिया। राहुल गांधी के लिए 2029 की राह तभी आसान होगी, जब वे क्षेत्रीय दिग्गजों के साथ 2027 के लिए बेहतर सामंजस्य बिठाएंगे।
उम्मीदों का ‘नायक’

तमिलनाडु में दशकों पुराने द्रविड़ किलों को ढहाकर अभिनेता जोसेफ विजय ने नया राजनीतिक इतिहास रच दिया है। उनकी पार्टी टीवीके ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि विधानसभा में बहुमत जुटाकर विजय ने अपनी रणनीतिक सूझबूझ से विरोधियों को दंग कर दिया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने ‘चरणबद्ध शराबबंदी’ जैसा साहसिक फैसला लेकर जता दिया कि उनके लिए जनहित राजस्व से ऊपर है। महिलाओं की सुरक्षा और भ्रष्टाचार पर उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने उनकी ‘पर्दे वाले नायक’ की छवि को असल जिंदगी में भी पुख्ता कर दिया है। विजय की सबसे बड़ी खूबी उनका संतुलन है; जहां एक ओर राहुल गांधी के साथ उनकी वैचारिक नजदीकी है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी के साथ विकासपरक तालमेल राज्य के लिए नई उम्मीदें जगाता है। खुद को किसी गठबंधन का पिछलग्गू बनाने के बजाय एक स्वतंत्र और सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर विजय ने साबित कर दिया है कि वे लंबी रेस के खिलाड़ी हैं।
हिमंता का मास्टरस्ट्रोक

असम में हिमंता बिस्वा सरमा एक ऐसे रणनीतिकार बनकर उभरे हैं, जिन्होंने ‘सत्ता विरोधी लहर’ को पूरी तरह बेअसर कर दिया। चुनाव से ठीक पहले मटक समुदाय के आरक्षण की मांग और सांस्कृतिक आइकन जुबीन गर्ग के निधन (सितंबर 2025) के बाद उपजे असंतोष ने राज्य का माहौल ‘बर्निंग’ बना दिया था। विपक्ष, खासकर अखिल गोगोई और गौरव गोगोई ने जुबीन गर्ग की मौत और जांच में देरी को सरकार के खिलाफ बड़ा चुनावी हथियार बनाने की कोशिश की। हालांकि, हिमंता की सूझबूझ ने विपक्ष की इस चाल को विफल कर दिया। उन्होंने न केवल जांच के लिए एसआईटी गठित की, बल्कि मटक समुदाय के साथ सीधा संवाद कर ऐसे फैसले लिए जिससे जनता का आक्रोश भरोसे में बदल गया।
सवाल 27 लाख मतदाताओं का
राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, लेकिन असली सवाल पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाताओं का है जो लोकतंत्र के इस पर्व से बाहर रह गए। गौर करने वाली बात यह है कि चुनाव से पहले मतदाता सूची में 91 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें से 34 लाख लोगों ने वोट देने के हक के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। ममता बनर्जी जिस भवानीपुर सीट से शुभेंदु अधिकारी से करीब 15 हजार वोटों से हारीं, वहां लगभग 47 हजार लोगों के वोट मतदाता सूची से गायब मिले! राजनीतिक गणित देखें तो भाजपा और तृणमूल के बीच जीत-हार का अंतर मात्र 13 लाख वोटों का है। बेशक, यदि ये लोग भी वोट डालते तो चुनावी नतीजे क्या होते, इसका अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है! यह भी सच है कि बंगाल में घुसपैठियों की समस्या पुरानी है, वामपंथियों से लेकर कांग्रेस और फिर तृणमूल तक, हर सरकार ने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। सवाल यह भी बड़ा है कि यदि वो घुसपैठिए हैं तो उन्हें उनके मूल स्थान पर भेजना चाहिए। लेकिन ऐसा न करना भी पूरे सिस्टम की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
शून्य पर सिमटा वाम: एक युग का अंत!

पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में लंबे समय तक राज करने वाले वामफ्रंट का वर्ष 2026 में पूरी तरह से सफाया हो गया। केरल के नतीजों ने वामपंथ की विदाई पर अंतिम मुहर लगा दी है, जबकि बंगाल और त्रिपुरा से मतदाता इन्हें पहले ही बेदखल कर चुके हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि वामपंथ आज भारत में अपने सबसे कठिन दौर में है। आज का युवा ‘वर्ग संघर्ष ’ जैसी अप्रासंगिक विचारधारा से खुद को नहीं जोड़ पा रहा। डिजिटल क्रांति के इस युग में वामपंथ की पुरानी नीतियां विकास की दौड़ में थक सी गई हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जनता को अब अंतहीन आंदोलनों से सरोकार नहीं रहा, वह बुद्धिमानी से हर पल बेहतर अवसर तलाश रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि 2029 में वामफ्रंट क्या करेगा। क्योंकि अब उनके पास कोई बड़ा चेहरा तक नहीं बचा। केरल कांग्रेस ने चुनाव नतीजों के बाद कई दिनों की मशक्कत और गहन मंथन करके वरिष्ठ नेता वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना।
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