
सुजीत ठाकुर, तहलका
नई दिल्ली। 24 सितंबर, 2026। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नींव पर खड़े सियासी दल किनारे लग चुके हैं। अब नंबर उन दलों का है जो ओबीसी के प्रभावशाली जातियों के रहनुमा के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और बिहार की राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख हैं। जातीय जनगणना की बाट जोह रहे ऐसे दलों को रोहिणी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के साथ ही बड़ा झटका लग सकता है। केंद्र सरकार उचित समय और मौके पर इस रिपोर्ट को संसद में रखकर इसके सिफारिशों को लागू करने का फैसला ले सकती है।
चमके ओबीसी चैंपियन दल
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक ओबीसी को नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण मिलता है। मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के बाद कई राज्यों में सियासी दलों ने खुद को ओबीसी चैंपियन के रूप में स्थापित किया। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार प्रमुख हैं। सपा और राजद ने ओबीसी के साथ अल्पसंख्यकों को जोड़कर वर्षों तक सत्ता हासिल भी किया।
नीतीश कुमार की इंट्री
बिहार में नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ लेकर अन्य पिछड़ा दल और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को साथ लेकर लालू यादव और बाद में तेजस्वी यादव को पछाड़ने में सफलता पाई। नीतीश ने सेक्यूलर पॉलटिक्स के नाम पर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को भी रोकने में सफलता पाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति के साथ ही ओबीसी और एससी के प्रभावशाली जातियों को छोड़ कर इस समुदाय से आने वाले कम प्रभावशाली जातियों को साधा और लोकसभा तथा यूपी के दो विधानसभा चुनावों में सफलता हासिल की।
हासिए पर जा पहुंचे तुष्टिकरण वाले दल
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि “पिछले तीन लोकसभा चुनावों और हाल में संपन्न पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव सहित दर्जनों विधानसभा चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों को नाम पर राजनीति करने वाले दल किनारे लग चुके हैं। ऐसे दल अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अब सॉफ्ट हिंदुत्व की बात करने लगे हैं, कम से कम मुस्लम तुष्टिकरण की बात करने से गुरेज कर रहे हैं”।
जातीय जनगणना का राग दरबारी
इन परिस्थितियों को भांपते हुए ही कई विपक्षी दलों ने जातीय जनगणना का राग अलापना शुरू किया। जितनी हिस्सेदारी उतनी भागीदारी का नारा बुलंद किया गया। विपक्षी दल यह मानकर चल रहे थे कि केंद्र सरकार जातीय जनगणना के मुद्दे पर बैकफुट पर रहेगी। लेकिन इस मांग और उसके सियासी असर का आंकलन करते हुए केंद्र सरकार ने पहले ही रोहिणी आयोग का गठन कर दी। आयोग गठित करने के पीछे मकसद था कि ओबीसी आरक्षण का लाभ की समीक्षा की जाए। अर्थात ओबीसी के सभी जातियों में लाभ के वितरण में क्या अंतर है इसकी समीक्षा हो जाए और आयोग इस तरह का फॉर्मूला दे ताकि लाभ ओबीसी की सभी जातियों को मिले।
केंद्र सरकार का पैंतरा
आयोग का गठन अक्तूबर 2017 में किया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय की अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया था। आयोग के कार्यकाल को 13 बार विस्तार दिया गया। छह साल के बाद आयोग ने 31 जुलाई 2023 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी। आयोग की रिपोर्ट दरअसल, वह हथियार के रूप में स्टोर है जो जातीय जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद इस्तेमाल किया सकता है।
क्या है सिफारिश?
रोहिणी कमीशन के गठन का उद्देश्य था केंद्रीय सूची में शामिल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)की जातियों का उप-वर्गीकरण करना। ऐसा इसलिए ताकि ओबीसी के लिए आरक्षण के 27 फीसदी कोटो का न्यायसंगत वितरण हो सके। यही वह टर्निंक प्वाइंट है जिसके आधार पर ओबीसी की ऐसी जातियां जिन्हे आरक्षण का लाभ पूर्ण रूप से नहीं मिलता है या फिर ओबीसी के प्रभावशाली जाति उनके आरक्षण का लाभ हासिल कर रही हैं वह अपने अधिकार की मांग कर सकें।
सूत्रों का कहना है कि आयोग ने केंद्रीय नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में मिले दाखिलों के आंकड़ों (लगभग 1.3 लाख नौकरियों) का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि 97 फीसदी लाभ ओबीसी में शामिल सिर्फ 25 फीसदी जातियों को ही मिला है। इतना ही नहीं, कुल आरक्षण का 24.95 फीसदी लाभ सिर्फ 10 प्रभावशाली ओबीसी जातियों ने उठाया है।
सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में शून्य प्रतिनिधित्व का भी जिक्र है। ओबीसी शामिल 983 जातियों (करीब 37 फीसदी) का नौकरी और दाखिलों में प्रतिनिधित्व शून्य रहा है। अन्य उप-जातियों की हिस्सेदारी 2.68 फीसदी रही है। सूत्रों का कहना है कि ऐस में ओबीसी के सभी जातियों को आरक्षण का लाभ मिले इसके लिए चार श्रेणियों का विभाजन फॉर्मूला तैयार किया गया है। कोटे के अंदर कोटा देने के लिए आयोग ने ओबीसी की कुल 2633 जातियों को चार श्रेणियों 1,2,3 और 4 में बांटने की सिफारिश की है।
श्रेणी 1 (सबसे वंचित जाति) 1674 को 2 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव है। श्रेणी 2 में 543 जाति समूह को 6 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव है। श्रेणी 3 में 328 जाति समूहों को 9 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव है। श्रेणी 4 में सबसे ज्यादा लाभ पाने वाली 97 जाति समूहों को 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव है।
कोटे के अंदर कोटे से का सियासी गुणाभाग
ओबीसी वर्ग के भीतर जो जातियां राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हैं (जैसे उत्तर भारत में यादव, कुर्मी, जाट, या दक्षिण व पश्चिम भारत के कुछ प्रभावशाली ओबीसी समूह), वे इस रिपोर्ट की सिफारिशों का विरोध कर सकती हैं क्योंकि आरक्षण के एकाधिकार में कमी आएगी। ओबीसी जातियां अब तक 27% के पूरे ओपन पूल में से अपनी मजबूत साक्षरता और संसाधनों के बल पर सबसे ज्यादा सीटें और नौकरियां हासिल कर लेती थीं। उप-वर्गीकरण लागू होने से वे केवल 10 फीसदी (श्रेणी 4) तक के कोटे तक सिमित हो जाएंगी। अब तक ये जातियां उन जातियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही थीं जो शैक्षणिक या सामाजिक रूप से बेहद पिछड़ी हैं। कोटे के भीतर कोटा होने से अब इन ताकतवर जातियों को आपस में ही मुकाबला करना होगा, जिससे उनके लिए चयन कठिन हो जाएगा। प्रभावशाली जातियां ओबीसी राजनीति की अगुवा रही हैं और बड़े वोट बैंक के रूप में काम करती हैं। कोटे के विभाजन से ओबीसी वर्ग के भीतर आंतरिक विभाजन (अति-पिछड़ों की लामबंदी) बढ़ेगा, जिससे इन जातियों का राजनीतिक मोलभाव करने का दबदबा कमजोर हो सकता है।



