असम में IVF तकनीक से लखिमि नस्ल की दुनिया की पहली बछिया का जन्म, पशुपालन में बड़ी उपलब्धि

असम में IVF तकनीक से जन्मी लखिमि नस्ल की बछिया
असम के वेटरनरी एंड फिशरी विश्वविद्यालय में IVF तकनीक के जरिए लखिमि नस्ल की बछिया का जन्म हुआ।

लखीमि ने रचा कमाल, IVF से असम में जन्मी बछिया बेमिसाल

स्नेहल चौरसिया | नई दिल्ली

असम में लखिमि नस्ल की दुनिया की पहली IVF बछिया का जन्म

असम ने पशुपालन और जैव प्रौद्योगिकी ने रचा कमाल, IVF से असम में जन्मी बछिया बेमिसाल

असम ने पशुपालन और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। राज्य की स्वदेशी ‘लखिमि’ नस्ल की दुनिया की पहली IVF बछिया का जन्म हुआ है। यह उपलब्धि असम के वेटरनरी एंड फिशरी विश्वविद्यालय में हासिल की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आधुनिक प्रजनन तकनीक के जरिए स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण की दिशा में यह एक अहम कदम है।

ART लैब में IVF तकनीक से हुआ बछिया का जन्म

इस बछिया के जन्म के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पूरी प्रक्रिया वेटरनरी साइंस की ART (Assisted Reproductive Technology) लैब में की गई। इस परियोजना को केंद्र सरकार के राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत सहयोग मिला है।

लखीमि असम की महत्वपूर्ण स्वदेशी पशु नस्लों में शामिल है। आधुनिक तकनीक के जरिए इस नस्ल के प्रजनन और संरक्षण से बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही, इससे राज्य के पशुपालकों को भी भविष्य में लाभ मिलने की संभावना है।

इस उपलब्धि पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने खुशी जताई। उन्होंने इसे सभ्यता, संस्कृति और सृजन का संगम बताते हुए कहा कि आकार में भले ही यह बछिया छोटी हो, लेकिन बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इसका महत्व बहुत बड़ा है।

वैज्ञानिक दृष्टि से यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि IVF जैसी उन्नत तकनीक के माध्यम से देशी पशु नस्लों की आनुवंशिक विरासत को संरक्षित करने के नए रास्ते खुल सकते हैं। असम की यह पहल पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर सामने आई है.द्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। राज्य की स्वदेशी ‘लखिमि’ नस्ल की दुनिया की पहली IVF बछिया का जन्म हुआ है। यह उपलब्धि असम के वेटरनरी एंड फिशरी विश्वविद्यालय में हासिल की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आधुनिक प्रजनन तकनीक के जरिए स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण की दिशा में यह एक अहम कदम है।

इस बछिया के जन्म के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पूरी प्रक्रिया वेटरनरी साइंस की ART (Assisted Reproductive Technology) लैब में की गई। इस परियोजना को केंद्र सरकार के राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत सहयोग मिला है।

स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और पशुपालकों को लाभ की उम्मीद

लखिमि असम की महत्वपूर्ण स्वदेशी पशु नस्लों में शामिल है। आधुनिक तकनीक के जरिए इस नस्ल के प्रजनन और संरक्षण से बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही, इससे राज्य के पशुपालकों को भी भविष्य में लाभ मिलने की संभावना है।

इस उपलब्धि पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने खुशी जताई। उन्होंने इसे सभ्यता, संस्कृति और सृजन का संगम बताते हुए कहा कि आकार में भले ही यह बछिया छोटी हो, लेकिन बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इसका महत्व बहुत बड़ा है।

वैज्ञानिक दृष्टि से यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि IVF जैसी उन्नत तकनीक के माध्यम से देशी पशु नस्लों की आनुवंशिक विरासत को संरक्षित करने के नए रास्ते खुल सकते हैं। असम की यह पहल पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर सामने आई है.