एम. रियाज हाशमी
नेपाल में 26 अगस्त की तबाही को महज अचानक आई बाढ़ कहना हिमालय के इस संकट को छोटा करके देखने जैसा
होगा। यह एक श्रृंखलाबद्ध आपदा थी, जिसमें ऊंचाई पर हिमखंड और चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटा, करीब 1,200 मीटर नीचे आ गिरा और बर्फ, चट्टान, मिट्टी तथा पानी ने मिलकर तेज मलबे की धारा का रूप ले लिया। इसका असर भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में करीब 100 किमी नीचे तक दिखाई दिया।
वैज्ञानिक इस घटना की तुलना 2021 के चमोली हादसे से कर रहे हैं, जबकि नीचे की ओर इसके व्यापक असर की तुलना 2013 की केदारनाथ त्रासदी से की जा रही है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डवलपमेंट के वरिष्ठ हिमनद विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद फारूक आजम ने भी घटना की प्रक्रिया को चमोली हादसे से मिलता-जुलता और नीचे की ओर इसके असर को केदारनाथ जैसा बताया है। यानी तबाही सिर्फ पानी से नहीं आई। पहाड़ का मलबा भी इस बाढ़ की विनाशकारी ताकत बन गया। और पहाड़ के टूटने से तबाही की पूरी श्रृंखला पैदा हुई।
यूनिवर्सिटी आॅफ कैलगरी के भू-आकृति विज्ञानी डैनियल शुगर के अनुसार, उपग्रह तस्वीरों में करीब 600 मीटर चौड़ा हिमनद हिस्सा टूटता दिखाई दिया। इतनी ऊंचाई से गिरने पर बर्फ और चट्टान की ऊर्जा नीचे आते-आते पानी, मिट्टी और मलबे को मिलाकर बेहद तेज धारा में बदलती है।
आईसीआईएमओडी के वैज्ञानिक यह भी जांच रहे हैं कि कहीं इस मलबे ने ल्हेन्दे खोला नदी को कुछ समय के लिए रोककर प्राकृतिक बांध तो नहीं बना दिया था। अगर ऐसा हुआ, तो पीछे जमा पानी के अचानक निकलने से सैलाब की ताकत और बढ़ी होगी। एक लाइन में- पहाड़ टूटा, मलबा नदी में गिरा, नदी का रास्ता प्रभावित हुआ और पानी उसी मलबे को लेकर नीचे की ओर दौड़ पड़ा।
‘मौत का सैलाब’
ऊंचाई से गिरा हिमखंड नदी में पहुंचकर सामान्य बाढ़ से कई गुना ताकतवर कैसे बन गया?
पहाड़ से गिरने वाला हिमखंड अकेला नीचे नहीं आता। उसके साथ चट्टान, मिट्टी और पानी जुड़ते जाते हैं। यह मिश्रण जितना भारी होता जाता है, उसकी मारक क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है।
आईसीएमओडी के अनुसार 26 अगस्त की सुबह त्रिशूली नदी के गलछी केंद्र पर करीब 30 मिनट में जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ गया, जबकि मलेखु में लगभग इसी अवधि में सात मीटर की वृद्धि दर्ज की गई। इतनी तेज वृद्धि बताती है कि नीचे रहने वाले लोगों के पास बचाव के लिए कितना कम समय रहा होगा। यही ऐसी आपदाओं में पारंपरिक बाढ़ चेतावनी व्यवस्था की सीमा भी सामने लाती है- जब सैलाब बारिश से नहीं, बल्कि पहाड़ के अचानक टूटने से पैदा हो, तो केवल नदी का पानी मापना पर्याप्त नहीं है।
कब तैयार हुई तबाही की जमीन? आपदा कुछ मिनटों में आई, लेकिन हिमालय के कमजोर होने की कहानी दशकों पुरानी है।
26 अगस्त को तबाही अचानक हुई, लेकिन हिमालय के अस्थिर होने की प्रक्रिया पुरानी है। हिंदूकुश हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण हिमनद सिकुड़ रहे हैं, बर्फ तेजी से पिघल रही है और ऊंचाई वाले इलाकों में लंबे समय से जमी बर्फ तथा मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है।
हिमनद पीछे हटते हैं तो नई झीलें बन सकती हैं और पुरानी हिमनदी झीलें बड़ी हो सकती हैं। दूसरी ओर, जमी हुई बर्फ और मिट्टी के पिघलने से चट्टानों तथा ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
आईसीआईएमओडी ने साफ कहा है कि इस खास घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी रही, यह अभी तय करना जल्दबाजी होगी। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि ‘‘जलवायु परिवर्तन ने यह हिमनद तोड़ दिया।’’
लेकिन गर्म होता हिमालय उन परिस्थितियों को जरूर बदल रहा है, जिनमें हिमनद और पर्वतीय ढलान स्थिर रहते हैं। यही भविष्य के खतरे की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि है।
क्यों हुआ इतना बड़ा नुकसान?
प्राकृतिक खतरा अकेला आपदा नहीं बनता, इंसानी बसावट और निर्माण उसे त्रासदी में बदलते हैं।
प्राकृतिक खतरा तब बड़ी मानवीय त्रासदी बनता है, जब उसके रास्ते में बस्तियां, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और बाजार मौजूद हों।
कईं दूसरे जियोलोजिस्ट ने भी ध्यान दिलाया है कि पारंपरिक हिमालयी बस्तियां अक्सर नदी से ऊपर और सुरक्षित स्थानों पर बसाई जाती थीं, जबकि अब कई जगह बस्तियां नदी के बेहद करीब पहुंच गई हैं।
केदारनाथ का सबक यहां साफ है- प्रकृति खतरा पैदा करती है, लेकिन इंसान यह तय करता है कि उस खतरे के रास्ते में क्या खड़ा होगा।
नेपाल में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी दिखाया है कि सड़कों के आसपास भूस्खलन का खतरा अधिक रहा। ढलान काटना, पानी की निकासी का सही इंतजाम न करना और मलबे को असुरक्षित तरीके से डालना पहाड़ को कमजोर कर सकता है।
पहाड़ को काटकर बनाई गई सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती; वह पानी, मिट्टी और ढलान के स्वाभाविक संतुलन को भी बदल सकती है।
अब नेपाल आपदा को लेकर चीन पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
प्रभावित क्षेत्र चीन-नेपाल सीमा के बेहद करीब है और पूरे इलाके में सड़क, सीमा संपर्क, व्यापार मार्ग तथा बिजली परियोजनाओं से जुड़ी गतिविधियां बढ़ी हैं। इसलिए चीन के निर्माण कार्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन अभी कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि चीन की किसी निर्माण परियोजना ने इस खास हिमनद के टूटने को सीधे पैदा किया। आईसीआईएमओडी के वैज्ञानिक घटना के वास्तविक कारण और उससे जुड़े दूसरे कारकों का अध्ययन कर रहे हैं।
मगर, इसका अर्थ यह भी नहीं कि निर्माण और आपदा जोखिम के बीच कोई संबंध नहीं है। चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र में हिमनदों और हिमनदी झीलों पर हुए अध्ययनों ने पहले ही गंभीर खतरे की तस्वीर सामने रखी है। एक अध्ययन में 28 हिमनदी झीलों को अचानक फटने वाली बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील पाया गया।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है- ‘‘क्या चीन ने नेपाल की यह बाढ़ पैदा की?’’
बल्कि सवाल यह है- ‘‘क्या बदलती जलवायु के बीच हिमालय की प्राकृतिक क्षमता से अधिक निर्माण- चाहे वह चीन करे, नेपाल करे या भारत- आपदा के खतरे को और बढ़ा रहा है?’’
कहां–कहां मंडरा रहा है खतरा?
नेपाल की एक घाटी नहीं, चीन से भारत तक पूरा हिमालय जोखिम में है।
चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र के वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक 28 संवेदनशील हिमनदी झीलों के संभावित फटने की स्थिति में 3,000 से ज्यादा इमारतें, करीब 50 पुल, नौ बिजली परियोजनाएं और लगभग 50 किलोमीटर सड़क खतरे में आ सकती है।
एक अन्य अध्ययन के अनुसार ऐसी संभावित बाढ़ चीन और नेपाल में करीब 103 किलोमीटर सड़क, 103 पुल, दो प्रमुख सूखे बंदरगाह और 3,301 इमारतों को प्रभावित कर सकती है। यानी खतरा किसी एक देश की सीमा में बंद नहीं है। नदी सीमा नहीं मानती।
नेपाल में पैदा हुआ सैलाब चीन को प्रभावित कर सकता है और चीन की तरफ बनी कोई हिमनदी झील फूटी तो नेपाल उसकी चपेट में आ सकता है। नेपाल की नदियां आगे भारत में प्रवेश करती हैं।
इसलिए हिमालयी आपदा प्रबंधन को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, साझा हिमालय की साझा सुरक्षा के रूप में देखना होगा।
कैसे बचा जा सकता था?
सिर्फ नदी का पानी मापने से काम नहीं चलेगा, पहाड़ के टूटने को पहले पकड़ना होगा।
पूरी आपदा को रोक पाना शायद संभव नहीं था, लेकिन नुकसान कम किया जा सकता था।
ऐसी घटनाओं में चेतावनी का संकेत बारिश से नहीं, ऊंचे पहाड़ पर बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने से भी मिल सकता है। इसलिए भविष्य की व्यवस्था को पूरे पहाड़ पर नजर रखनी होगी।
उपग्रह तस्वीरों से हिमनदों में बदलाव, ऊंचाई वाले इलाकों में चट्टानों के खिसकने के संकेत, हिमनदी झीलों के आकार और पानी के स्तर तथा नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी जरूरी है। इन सूचनाओं को जोड़कर कुछ ही मिनटों में नीचे बसे लोगों तक चेतावनी पहुंचानी होगी।
लेकिन सिर्फ उपकरण पर्याप्त नहीं होंगे। जहां खतरा मालूम है, वहां निर्माण के नियम भी बदलने होंगे। सड़क और बिजली परियोजनाओं से पहले पहाड़ की मजबूती, ढलान, नदी का पुराना रास्ता और संभावित बाढ़ का वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य होना चाहिए।
सबसे बड़ा खतरा क्या है?
हम हर बार आपदा के बाद कारण खोजते हैं, जबकि पहाड़ पहले से संकेत दे रहा होता है
नेपाल की त्रासदी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आपदा को एक अकेली घटना की तरह देखना बंद करना होगा।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितनी बारिश हुई, बादल फटा या नहीं, भूकंप आया या नहीं। असली सवाल है-पिछले कुछ दशकों में पहाड़ कितना बदल चुका है?
हिमालय में बर्फ पिघल रही है, हिमनद पीछे हट रहे हैं, नई झीलें बन रही हैं, चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है और दूसरी ओर इंसानी गतिविधियां उन्हीं घाटियों में बढ़ रही हैं।
नेपाल की घटना इस पूरी बदलती तस्वीर को एक साथ सामने रखती है।
यह सिर्फ बाढ़ नहीं थी। यह हिमनद के टूटने, चट्टान गिरने, मलबा बहने, नदी के रास्ते के प्रभावित होने और अचानक आई बाढ़ के एक के बाद एक जुड़ते जाने की कहानी थी।
केदारनाथ ने सिखाया कि नदी का रास्ता रोककर विकास नहीं किया जा सकता।
चमोली ने बताया कि बर्फ और चट्टान अचानक एक साथ टूट सकती है।
नेपाल ने तीसरी चेतावनी दी है- भविष्य की हिमालयी आपदा शायद एक घटना नहीं, बल्कि कई घटनाओं के एक साथ जुड़ने से पैदा होगी। अगर विकास, जलवायु परिवर्तन और आपदा के खतरे को अलग-अलग समस्याएं मानकर नीतियां बनाई गईं, तो संभव है कि अगली बार चेतावनी सुनाई देने तक बहुत देर हो चुकी हो।
6.5 लाख करोड़ का नुकसान कैसे?
प्रत्यक्ष नुकसान: घर, सड़कें, पुल, बिजली ग्रिड और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षति।
अप्रत्यक्ष नुकसान: कृषि उत्पादन में गिरावट, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में रुकावट, पलायन और रोजगार का संकट।
समग्र असर: यदि पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक तंत्र को शामिल करें, तो नुकसान का आंकड़ा ‘‘बिलियंस से ट्रिलियंस’’ तक पहुंच जाता है।
यूएनडीआरआर की ग्लोबल एसेसमेंट रिपोर्ट 2025 (ॠअफ2025) में भारत के लिए हर साल “6.5 लाख करोड़ (लगभग $78-80 बिलियन = “6.5-6.7 लाख करोड़) के नुकसान का सीधा उल्लेख नहीं है। यह आंकड़ा रिपोर्ट में बताए गए वैश्विक नुकसान ($330 बिलियन/वर्ष = “27 लाख करोड़), क्षेत्रीय जोखिम वितरण, और भारत की जनसंख्या व जोखिम प्रोफाइल को आधार मानकर निकाला गया नीतिगत अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत का औसत वार्षिक प्रत्यक्ष नुकसान $9.8 बिलियन (“78,000 करोड़) है, जिसमें से $7 बिलियन (“56,000 करोड़) केवल बाढ़ से होता है। अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं (वर्ल्ड बैंक, एडीबी, आईपीसीसी) पहले ही भारत के लिए $70-80 बिलियन (“5.8-6.7 लाख करोड़) सालाना नुकसान का अनुमान दे चुकी हैं।
6.5 लाख करोड़: आपदा की सालाना कीमत
यूएन रिपोर्ट का खुलासा: 2050 तक आपदा नुकसान में 30% वृद्धि की आशंका, जीडीपी का 2% तक वार्षिक असर
संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (यूएनडीआरआर- यूनाइटेड नेशंस डिजास्टर रिस्क
रिडक्शन) की ग्लोबल एसेसमेंट रिपोर्ट 2025 ने भारत को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत हर साल औसतन “6.5 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान आपदाओं से झेल रहा है, जबकि आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर- डिजास्टर रिस्क रिडक्शन) में निवेश नाममात्र है।
रिपोर्ट कहती है कि आपदाएं अब केवल ‘प्राकृतिक’ नहीं रहीं, बल्कि अविकसित नियोजन, अराजक शहरीकरण, खराब भूमि उपयोग और कमजोर संस्थागत व्यवस्था के कारण और घातक हो गई हैं। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में जलभराव की बढ़ती घटनाएं पुराने जल निकासी तंत्र की नाकामी को दर्शाती हैं, वहीं पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन अवैध निर्माण और जंगलों की कटाई से जुड़ा है।
हर आपदा के बाद राज्य सरकारें पुनर्निर्माण के लिए कर्ज लेती हैं। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ता है और सामाजिक योजनाओं में कटौती करनी पड़ती है। रिपोर्ट ने इस प्रवृत्ति को ‘‘ऋण-जोखिम चक्र’’ कहा है, जो देश की दीर्घकालिक विकास गति को प्रभावित कर रहा है।
भारत के लिए खतरे बढ़ रहे हैं- 2023 में बाढ़ से 1.2 लाख मौतें हुईं, जो वैश्विक आंकड़े का 22% हैं। अनुमान है कि 2050 तक भूकंप और बाढ़ से वार्षिक नुकसान 30% तक बढ़ सकता है और यह देश की जीडीपी का 2% तक खा सकता है। फिलहाल देश में डीआरआर पर खर्च जीडीपी का महज 0.4% है, जबकि वैश्विक औसत 1.2% है।
सबसे ज्यादा असर गरीब, महिलाएं और बच्चे झेलते हैं। जल संकट में महिलाएं रोजाना एक से डेढ़ घंटा पानी भरने में लगाती हैं। बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है और पलायन से शहरी झुग्गियों में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं।
एनडीएमए का जवाब
हम बहु–स्तरीय प्रयास कर रहे हैं
एनडीएमए (नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी) ने कहा है कि भारत सरकार डीआरआर को लेकर कई मोर्चों पर सक्रिय है। डीआरआर फंडिंग 15वें वित्त आयोग (“2.28 लाख करोड़) और स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी/ एक्सपेंडिचर्स फाइनेंस कमेटी प्रक्रिया से आती है। शहरी बाढ़ और भूकंप-भूस्खलन जोखिम प्रबंधन के लिए क्रमश: “2,500 करोड़ और “750 करोड़ आरक्षित हैं। स्मार्ट सिटी मिशन, अटफवळ, ढटअ और अन्य योजनाओं में डीआरआर घटक शामिल किए गए हैं। रअउऌएळ और उअढ जैसी डिजिटल चेतावनी प्रणाली लागू है। हर गांव/ वार्ड के लिए लोकल रिस्क प्लान अनिवार्य किया गया है। सरकार डीआरआर को मुख्यधारा की योजनाओं में एकीकृत कर रही है और स्थानीय स्तर पर लचीलापन बढ़ाने पर जोर है।




