
अरविंद चतुर्वेदी
जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नित्शे ने कहा था ‘मुझे इस बात का दुख नहीं है कि तुमने मुझसे झूठ बोला, मुझे दुख इस बात का है कि अब से मैं तुम पर विश्वास नहीं कर पाऊंगा।’
विश्वास किसी भी रिश्ते या व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव है। लिहाजा जब
देश के बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में यह विश्वास डगमगाता है तो टीस और गहरी हो जाती है।
भारत में राम आस्था के प्रतीक हैं। अयोध्या से चित्रकूट को जोड़ने वाला बहुचर्चित ‘राम वनगमन पथ’ लगभग 210 किलोमीटर लंबा फोरलेन कॉरिडोर है। इसकी लागत करीब “4,400 से “4,550 करोड़ है। लेकिन इसके अंतर्गत शृंगवेरपुर धाम में गंगा नदी पर बनने वाले पुल और सड़क मार्ग के लोकार्पण से पहले ही दरारें आने और सड़क धंसने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
प्रयागराज के शृंगवेरपुर धाम के पास लगभग 100 मीटर के दायरे में 4 अलग-अलग स्थानों पर भारी दरारें आ गईं। सड़क का एक हिस्सा नीचे बैठ गया। किनारे का बॉर्डर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इस घटना ने राम भक्तों और आम जनता को गहरी निराशा दी है।
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने 13 जुलाई 2026 को कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के मौके पर मंच से कहा था कि ‘उत्तर प्रदेश के महामार्ग अमेरिका के बराबर होंगे।’
लेकिन इसके तुरंत बाद कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर जो नजारा देखने को मिला, उसने इन दावों की हवा निकाल दी। उद्घाटन के महज दो हफ्ते बाद ही “6.7 लाख प्रति मीटर की लागत से बनी शोपीस सड़क (यानी हर एक मीटर की कीमत एक अच्छी हैचबैक कार जितनी!) ढहने लगी।
कमाल तो तब हुआ जब सड़क को सुखाने के लिए ठेकेदार ने मानसून के बादलों के नीचे 10 साधारण पेडस्टल पंखे खड़े कर दिए। यह कल्पना और विश्वास की एक ऐसी छलांग है कि अगर यह मामला इतना गंभीर न होता, तो बेहद हास्यास्पद लगता। सोशल मीडिया पर लोगों ने चुटकी ली कि अगर आपने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर यह ‘पंखों वाला शो’ नहीं देखा, तो भारतीय इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना देखने का मौका गंवा दिया है।
पिछले 30 वर्षों से परिवहन बुनियादी ढांचे की कमी भारत के विकास में एक बड़ी बाधा रही है। बिना अच्छी सड़कों के औद्योगिक विकास संभव नहीं है। इसलिए हाल के दिनों में हम भारी मात्रा में राजमार्ग और एक्सप्रेसवे बना रहे हैं, लेकिन सवाल गुणवत्ता पर है:
जल निकासी के अभाव में नए देहरादून एक्सप्रेसवे का हिस्सा दरक जाता है।
टोंस नदी पर बना एक पुल उद्घाटन के 17 दिन बाद ही बह जाता है।
भूस्खलन के कारण मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के ‘मिसिंग लिंक’ पर बनी सुरंग बंद हो जाती है।
गंगा एक्सप्रेसवे के मेरठ-प्रयागराज कैरिजवे (किलोमीटर 421 के पास) पर भारी बारिश के कारण 10 मीटर गहरा गड्ढा बन जाता है और उन्नाव के पास एप्रोच रोड पहली बारिश में ही धंस जाती है।
देश भर में एल-शेप के फ्लाईओवर और कहीं न जाने वाले अधूरे पुल खड़े हो चुके हैं। यह सड़न अब डिजाइन, पर्यवेक्षण और घटिया कार्य संस्कृति में साफ महसूस की जा रही है। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम—ठेकेदार ‘फर्स्ट-वर्ल्ड’ (विकसित देशों) की दरों पर जनता को ‘थर्ड-वर्ल्ड’ की टोल सड़कें परोस रहे हैं।
संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 में देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 91,287 किलोमीटर थी, जो बढ़कर वर्ष 2026 तक 1,46,572 किलोमीटर से अधिक हो गई है (यानी नेटवर्क में लगभग 60% की ऐतिहासिक वृद्धि)।
आँकड़े बताते हैं कि सड़कें लंबी हुई हैं, लेकिन नेता, अफसर और ठेकेदारों का गठजोड़ पूरे सिस्टम पर हावी दिखता है। एक बार फिर यह विश्वास बहाल करना होगा, क्योंकि विश्वास एक कांच के बर्तन जैसा है; एक बार टूटने के बाद उसे जोड़ा तो जा सकता है, लेकिन उसकी दरारें हमेशा यह याद दिलाती हैं कि व्यवस्था को दुरुस्त करने में सतर्कता और ईमानदारी कितनी ज़रूरी है।



