स्टेट वॉच — गोवा: कानून जो अपनों के विरोध से ही रुका

तहलका ब्यूरो

25 अगस्त को गोवा की बीजेपी सरकार ने एक फैसला लिया जो राज्य के लिए असामान्य था। मंत्रिमंडल ने ‘गोवा प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्ज़न ऑफ रिलीजन बिल, 2026’ को मंजूरी दे दी — एक ऐसा कानून जो जबरदस्ती, लालच, धोखे या शादी के जरिए कराए गए धर्म-परिवर्तन पर उम्र-कैद तक की सजा का प्रावधान करता। हिंदू पुजारी हों या मुस्लिम मौलवी, कोई भी इस दायरे से बाहर नहीं रखा गया था। नाबालिग, महिला, दिव्यांग या अनुसूचित जाति-जनजाति के किसी व्यक्ति का धर्मांतरण साबित होने पर सजा और भी कड़ी — 5 से 14 साल तक कैद।

योजना थी कि यह बिल 31 अगस्त से शुरू होने वाले तीन दिवसीय मानसून सत्र में पेश हो जाएगा।

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्य पहले ही ऐसे कानून बना चुके हैं — गोवा इस सूची में अगला नाम बनने वाला था। पर हुआ कुछ और।

विरोध बाहर से नहीं, भीतर से आया

गोवा के चर्च नेताओं और कैथोलिक संगठनों ने इस बिल पर तीखी आपत्ति जताई। यह कोई हैरानी की बात नहीं थी। पर असली मोड़ तब आया जब बीजेपी के अपने विधायक ही इसके खिलाफ खड़े हो गए। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत को कैल्जुई तट के दो बीजेपी विधायकों माइकल लोबो और डेलाइला लोबो के साथ-साथ निर्दलीय विधायक अलेक्सो रेजिनाल्डो लॉरेंको से मिलना पड़ा, जो सरकार को समर्थन देते रहे हैं। इन सभी ने खुलकर कहा कि यह कानून राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है। नतीजा यह हुआ कि सत्र शुरू होने के ठीक दिन, सोमवार को, सरकार ने बिल को विधानसभा के एजेंडे से हटाने का फैसला कर लिया। कोई वोटिंग नहीं हुई, कोई बहस नहीं, बिल पेश होने से पहले ही ठंडे बस्ते में चला गया।

गोवा अलग क्यों है?

यह समझना जरूरी है कि गोवा बाकी राज्यों जैसा नहीं। यहां ईसाई आबादी का हिस्सा देश के औसत से कहीं ज्यादा है, और सदियों पुराना हिंदू-कैथोलिक सह-अस्तित्व राज्य की पहचान का हिस्सा रहा है।

पुर्तगाली शासन के दौर से चला आ रहा यह सामाजिक ताना-बाना गोवा की राजनीति में आज भी बीजेपी को भी एक अलग रास्ता अपनाने पर मजबूर करता है — यही वजह है कि पार्टी के अपने विधायक तक इस बिल के खिलाफ खड़े होने से नहीं झिझके।

चर्च का तर्क भी गौर करने लायक है। आर्चडायसिस ऑफ गोवा की काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस ने साफ कहा है कि जबरदस्ती, धोखे या डर से कराए गए धर्मांतरण का वे भी विरोध करते हैं, पर मौजूदा आपराधिक कानून पहले से इसे संभालने के लिए काफी हैं। ऐसे में नया कानून किसलिए? नया कानून, उनके अनुसार, मिशनरी संस्थाओं, स्कूलों और अस्पतालों के रोजमर्रा के काम को शक की नजर से देखने का बहाना बन सकता है।

उम्मीद अभी बाकी है

सरकारी सूत्रों के मुताबिक बिल पूरी तरह खारिज नहीं हुआ — बस फिलहाल रोका गया है। मुख्यमंत्री ने विधायकों को भरोसा दिलाया कि आगे इस पर फिर बात होगी, शायद कुछ बदलावों के साथ। यानी यह कहानी अभी अधूरी है। गोवा का यह प्रकरण एक बड़े सवाल की तरफ इशारा करता है — जो कानून पूरे देश में एक जैसे ढांचे पर बनते दिख रहे हैं, क्या वे हर राज्य के अपने सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से ढल सकते हैं? गोवा ने फिलहाल इसका जवाब खुद अपनी सरकार के भीतर से दे दिया है — कम से कम अभी के लिए।

स्टेट वॉच / दिल्ली-एनसीआर

चलती बस में गैंग रेप

तहलका ब्यूरो

4 अगस्त की रात, भारी बारिश और अंधेरे के बीच, ग्रेटर नोएडा के पारी चौक पर एक 16 वर्षीय छात्रा गलती से बस से उतर गई। वह मैनपुरी, उत्तर प्रदेश से नोएडा में अपने चचेरे भाई से मिलने आई थी। रास्ता भटकी हुई, अकेली और बारिश में भीगती लड़की ने पास से गुजरती एक खाली स्लीपर बस को रुकवाया। बस के चालक कुलदीप और परिचालक संदीप ने उसे बताया कि वे नोएडा सेक्टर 63 की तरफ जा रहे हैं, और उसे बस में बिठा लिया।

पुलिस के अनुसार, बस चलते ही हालात बदल गए। लड़की के मुताबिक परिचालक ने पहले अभद्र हरकतें शुरू कीं, और फिर दोनों आरोपियों ने कथित तौर पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया तथा विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। बस करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करके दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके पहुंची, जहां लड़की को छोड़ दिया गया। पुलिस ने दोनों आरोपियों को टिमरपुर के एक बस पार्किंग स्थल से गिरफ्तार किया और फोरेंसिक जांच के लिए बस जब्त कर ली।

जो बात इस मामले को और गंभीर बनाती है

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त से एक हफ्ते के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है। आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर के पत्र में एक विवरण खास तौर पर चिंता बढ़ाने वाला है — रिपोर्टों के अनुसार आरोपियों में से एक पहले भी 2024 में पॉक्सो अधिनियम के तहत एक ऐसे ही मामले में गिरफ्तार हो चुका था, और उसके बाद उसे किसी दूसरी जगह तैनात कर दिया गया था। अगर यह जानकारी सही साबित होती है, तो सवाल सिर्फ दो आरोपियों तक सीमित नहीं रहता — यह उस पूरी जांच-पड़ताल व्यवस्था पर उठता है, जो निजी बस ऑपरेटरों को अपने कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांचने के लिए बाध्य करती है, या नहीं करती।

एनसीडब्ल्यू ने पीड़िता की पहचान की सुरक्षा, तत्काल चिकित्सा-मनोवैज्ञानिक सहायता और मुआवजे की भी मांग की है — और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी।

अकेली सवारी का सवाल

यह मामला 2012 के निर्भया कांड की याद दिलाता है — वही दिल्ली, वही चलती बस, वही डर कि रात में सफर करना कितना असुरक्षित हो सकता है। पर एक फर्क भी है: 2012 के बाद कड़े कानून बने, फास्ट-ट्रैक अदालतें बनीं, फिर भी 2024 के एनसीआरबी आंकड़े बताते हैं कि उस साल महिलाओं के खिलाफ 4 लाख 41 हजार से ज्यादा अपराध दर्ज हुए, जिनमें करीब 29,500 दुष्कर्म के मामले शामिल थे। इनमें से 96.8 प्रतिशत मामलों में आरोपी पीड़िता का जाना-पहचाना व्यक्ति निकला — यानी सार्वजनिक परिवहन सुरक्षा की बहस का सिर्फ एक हिस्सा है, पूरी तस्वीर नहीं।

पर इस मामले में एक नया सवाल भी है — जब कोई अजनबी मदद का हाथ बढ़ाए, तो भरोसा कहां तक सुरक्षित है? स्लीपर बसों में पर्दों से घिरे बर्थ, बिना निगरानी वाले लंबे रात के सफर, और चालक-परिचालक की पहचान व पृष्ठभूमि जांचने की ढीली व्यवस्था — ये सब मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जिसमें अकेली यात्रा करने वाली महिलाओं और नाबालिगों के लिए जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

आगे का रास्ता

जांच अभी जारी है, और आरोप फिलहाल आरोप ही हैं — अदालत में साबित होना बाकी है। पर इस मामले ने जो सवाल खड़े किए हैं, वे जांच पूरी होने का इंतजार नहीं करेंगे: निजी बस ऑपरेटरों की जवाबदेही कौन तय करेगा? कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांच अनिवार्य क्यों नहीं? और पिछली बार पॉक्सो के तहत गिरफ्तार व्यक्ति दोबारा ड्राइविंग सीट तक कैसे पहुंच गया?

निर्भया कांड ने देश को सड़कों पर ला दिया था। तेरह साल बाद, एक और चलती बस, एक और नाबालिग, वही सवाल — क्या हमने वाकई कुछ सीखा है?

स्टेट वॉच / महाराष्ट्र

गणपति बाप्पा मोरया

तहलका ब्यूरो

जब भी राष्ट्रीय मीडिया गणेशोत्सव पर कैमरा घुमाता है, वह लगभग हमेशा एक ही जगह जाकर टिक जाता है — मुंबई का लालबागचा राजा, या पुणे की गलियां। यह तस्वीर झूठी नहीं है, पर अधूरी जरूर है। असल गणेशोत्सव उससे कहीं बड़ा है — नागपुर के सांस्कृतिक मंडलों से लेकर कोल्हापुर की देखावों वाली रात तक, नाशिक की गोदावरी-किनारे की मिरवणुक से लेकर विदर्भ के छोटे कस्बों की घरेलू पूजा तक। यह एक ऐसा त्योहार है जो हर सौ किलोमीटर पर अपना लहजा बदल लेता है, पर अपनी जड़ नहीं छोड़ता।

एक जड़, कई शाखाएं

गणेश चतुर्थी की जड़ें कोंकण और गोवा के घरेलू अनुष्ठानों में हैं, जहां इसे चवथ कहा जाता है — मिट्टी की छोटी प्रतिमा, घर में डेढ़ से इक्कीस दिन की स्थापना, और परिवार के भीतर सिमटी आस्था। उन्नीसवीं सदी के आखिर में पुणे ने इसे बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में सार्वजनिक मंच बनाया, ताकि औपनिवेशिक दौर में लोग एक जगह जुट सकें। बीसवीं सदी में मुंबई की मिलों और चॉलों ने इसे मोहल्ले की पहचान बना दिया — और आगे चलकर लालबागचा राजा जैसे मंडलों ने इसे राष्ट्रीय-वैश्विक कद दे दिया।

यह इतिहास जितना सच है, उतना ही अधूरा भी — क्योंकि इसके बाद जो एक सदी गुजरी, उसमें यह त्योहार महाराष्ट्र के हर हिस्से में अपने ढंग से बढ़ता गया, और हर जगह की अपनी कहानी है।

नागपुर-विदर्भ: सांस्कृतिक मंच बनाम घरेलू सादगी

विदर्भ में गणेशोत्सव की बुनावट पुणे-मुंबई से जानबूझकर अलग रखी गई लगती है। नागपुर में बीते चार वर्षों से केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी की पहल पर ‘सांस्कृतिक गणेशोत्सव’ आयोजित हो रहा है, जिसमें शहर के गणेश मंडलों और कला संस्थाओं को एक मंच पर जोड़कर कला, साहित्य और परंपरा को बढ़ावा दिया जाता है — यानी यहां जोर भव्यता से ज्यादा सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर है। साथ ही नागपुर महानगरपालिका हर साल ‘इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव स्पर्धा’ चलाती है, जिसमें मंडलों को पर्यावरण-अनुकूल मंडप और मूर्ति के मानकों पर प्रोत्साहित किया जाता है। प्रशासन ने मंडलों को अनुमति के लिए ‘एक खिड़की प्रणाली’ भी दी है, ताकि हर एनओसी के लिए अलग दफ्तर के चक्कर न काटने पड़ें।

पर विदर्भ की असली पहचान इसके परे है — छोटे कस्बों और गांवों में आज भी गणपति काफी हद तक घरेलू या मोहल्ला-स्तर का उत्सव बना हुआ है, जहां डिजाइनर पंडाल और करोड़ों के बजट वाली होड़ नहीं, बल्कि पड़ोस की साझा भागीदारी केंद्र में रहती है। यही वह विदर्भ है जो राष्ट्रीय सुर्खियों में शायद ही कभी आता, पर यहीं त्योहार का वह मूल रूप अब भी सांस लेता है जिससे कोंकण की चवथ शुरू हुई थी।

कोल्हापुर: देखावों की रात, जो सोने नहीं देती

कोल्हापुर में गणेशोत्सव की पहचान उसकी देखावा संस्कृति से है — मूर्तियों के साथ बनाए गए बड़े, अक्सर तकनीकी और सजीव दृश्य-प्रदर्शन, जो पौराणिक कथाओं से लेकर सामाजिक संदेशों तक कुछ भी दिखा सकते हैं। उत्सव के नौवें दिन जैसे खास मौकों पर शहर की पेठें — शिवाजी पेठ, मंगळवार पेठ, राजारामपुरी, लक्ष्मीपुरी — देर रात तक देखावे देखने निकले लोगों से भर जाती हैं। आसपास के जिलों से परिवार अपनी गाड़ियों में सवार होकर दोपहर से ही शहर पहुंचना शुरू कर देते हैं। भीड़ इतनी होती है कि सड़कों पर बैरिकेड, वन-वे यातायात और पार्किंग की अलग व्यवस्था करनी पड़ती है। कोल्हापुर की यह परंपरा बताती है कि गणेशोत्सव सिर्फ भक्ति या राजनीति का मंच नहीं — यह एक जीवंत, लोकप्रिय कला-रूप भी है, जहां हर मंडल एक-दूसरे से बेहतर ‘कहानी’ दिखाने की होड़ में रहता है।

नाशिक: गोदावरी की मिरवणूक और आगे की योजना

नाशिक में गणेशोत्सव की मुख्य विसर्जन मिरवणुक भद्रकाली के वाकडी बारव से शुरू होकर शहर के कई अहम चौराहों से गुजरती हुई गोदावरी किनारे पहुंचती है — रविवार कारंजा मित्रमंडळ का ‘चांदीचा गणपती’ और सूर्यप्रकाश नवप्रकाश मित्रमंडळ का ‘नाशिकचा राजा’ जैसे मंडल इस जुलूस के जाने-पहचाने नाम हैं, जिनके लिए हजारों पुलिसकर्मियों का बंदोबस्त लगाया जाता है।

आगे की एक दिलचस्प कड़ी भी है: 2027 में नाशिक-त्र्यंबकेश्वर में महासिंहस्थ कुंभमेळा होना है, और कुंभमेळा प्राधिकरण ने गणेशोत्सव को ही इसकी जनजागृति का मंच बनाने की योजना बनाई है — ‘महासिंहस्थ गणेश मंडळ स्पर्धा’ के प्रस्ताव के जरिए मंडलों को अध्यात्म, पर्यावरण, तकनीक और सामाजिक सहभाग जैसे विषयों से जोड़ने की कोशिश हो रही है। यानी नाशिक में गणपति अब एक और बड़े धार्मिक आयोजन की पूर्वपीठिका बनते दिख रहे हैं।

मिट्टी की वापसी: नाशिक से नागपुर तक एक साझा चिंता

एक सूत्र है जो कोंकण की चवथ से लेकर आज के विदर्भ, कोल्हापुर और नाशिक तक — पूरे राज्य को जोड़ता है: पर्यावरण की चिंता। नाशिक में गोदावरी किनारे की शाडू मिट्टी, जो सदियों से मूर्ति बनाने के काम आती रही, अब मूसलाधार बारिश और तेज बहाव के कारण घटती जा रही है — नतीजतन इस बरस कई मंडलों ने शाडू मिट्टी के पुनर्वापर की पहल शुरू की है। नागपुर में गोबर से बनी ‘गोमय गणेश’ मूर्तियां लोकप्रिय हो रही हैं, जिन्हें बाल्टी या गमले में ही घर पर विसर्जित किया जा सकता है, और जो नदी-कुएं का पानी दूषित नहीं करतीं। महावितरण जैसी सरकारी एजेंसियां भी राज्यभर के मंडलों से पर्यावरण-अनुकूल और सुरक्षित उत्सव मनाने की अपील कर रही हैं। यह किसी एक शहर का अभियान नहीं — यह पूरे महाराष्ट्र में एक साथ उठ रही आवाज है, जो कोंकण की सादगी को आधुनिक भाषा में दोहरा रही है।

पुणे का डीजे-विवाद: राज्यव्यापी सवाल की एक झलक

पुणे में इस बरस डीजे और तेज साउंड सिस्टम पर पुलिस की सख्ती सुर्खियों में है — तय डेसीबल सीमा का उल्लंघन करने वाले प्लाज्मा और हाई-पावर सिस्टम पर कार्रवाई की चेतावनी, विसर्जन जुलूसों में लेजर और प्लाज्मा लाइट पर पाबंदी। पुणे के 200 से ज्यादा मंडलों ने खुद डीजे-मुक्त उत्सव के आह्वान का समर्थन किया है, जबकि कुछ मंडल पूछ रहे हैं कि ढोल-ताशों के लिए नियम अलग क्यों हैं। पर यह बहस सिर्फ पुणे की नहीं है। शोर, भीड़, ट्रैफिक और सार्वजनिक जगह के इस्तेमाल का यही सवाल कोल्हापुर की देखावा-रातों में, नाशिक की भीड़भरी मिरवणुक में और नागपुर के इको-फ्रेंडली मंडलों की योजना में भी अलग-अलग रूप में मौजूद है। पुणे का डीजे-विवाद दरअसल एक राज्यव्यापी सवाल की सबसे तेज आवाज भर है।

एक त्योहार, अनेक भाषाएं

महाराष्ट्र के गणेशोत्सव को समझने का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि उसे किसी एक शहर की कहानी मान लिया जाए। असल में यह एक साथ कई कहानियां हैं — पुणे में राजनीतिक इतिहास, मुंबई में मिल-मजदूरों की विरासत, कोल्हापुर में दृश्य-कला की परंपरा, नाशिक में धार्मिक-प्रशासनिक योजना, और विदर्भ में सांस्कृतिक मंच व घरेलू सादगी का मेल। इन सबके बीच एक ही धागा बार-बार लौटता है — मिट्टी की तरफ वापसी, शोर पर संयम, और उत्सव को समुदाय के काम आने वाला बनाने की कोशिश। गणपति को विघ्नहर्ता कहा जाता है। शायद इस राज्य के हर कोने में यह त्योहार अपने-अपने तरीके से यही सवाल पूछ रहा है — भक्ति, भव्यता और जिम्मेदारी के बीच वह संतुलन कैसे बने, जो हर शहर, हर कस्बे और हर गली को अपनी शर्तों पर मंजूर हो।

स्टेट वॉच / कश्मीर

नेपाल त्रासदी — कश्मीर के लिए चेतावनी

रियाज वानी

पिछले सप्ताह नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई भयावह हिमनद टूटने और बाढ़ की घटना ने उस खतरे को बेहद स्पष्ट कर दिया है, जिसे जम्मू-कश्मीर नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है: गर्म होता हिमालय नए जोखिम पैदा कर रहा है, जबकि इस क्षेत्र में उन्हें पहचानने और उनका सामना करने के लिए जरूरी व्यवस्थाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं।

26 अगस्त की इस आपदा में नेपाल और तिब्बत की घाटियों से पानी, बर्फ, कीचड़ और मलबे का सैलाब गुजरा, जिसमें प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार सैकड़ों लोगों की मौत हुई और 1,300 से अधिक लोग लापता हैं। सड़कें, पुल और बस्तियां क्षतिग्रस्त या तबाह हो गईं। अमेरिका के यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे ने बाद में संकेत दिया कि जिस भूकंपीय गतिविधि को शुरुआत में भूकंप समझा गया था, वह वास्तव में हिमनद टूटने और मलबे के प्रवाह से उत्पन्न हुई थी।

कश्मीर के लिए यह चेतावनी इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि वैज्ञानिक पहले ही इस क्षेत्र में कई संवेदनशील हिमनदीय झीलों की पहचान कर चुके हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के एक अध्ययन, जो जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी में प्रकाशित हुआ था, ने पांच झीलों — ब्रमसर, चिरसर, नुंदकोल, गंगाबल और भागसर — को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के लिहाज से ‘बहुत अधिक संवेदनशील’ श्रेणी में रखा था। अध्ययन के अनुमान के मुताबिक, इन झीलों से गांदरबल, शोपियां और कुलगाम जिलों में करीब 2,704 इमारतों, 15 प्रमुख पुलों, सड़कों के कुछ हिस्सों और एक जलविद्युत संयंत्र को खतरा हो सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर में जियोइन्फॉर्मेटिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर इरफान राशिद ने सावधान किया कि इन झीलों को आज अस्थिर बताना उचित नहीं होगा, लेकिन उन्होंने कहा कि नेपाल की आपदा ने यह विचार करने की जरूरत जरूर रेखांकित की है कि आने वाले समय में परिस्थितियां किस तरह बदल सकती हैं।

उन्होंने कहा, ‘कुछ वर्षों में गंगाबल जैसी झीलें जोखिम बन सकती हैं। गंगाबल के ऊपर की ओर हरमुख ग्लेशियर है और यह एक तीखी ढलान पर स्थित है। नेपाल जैसी आपदा को देखते हुए हमें ऐसे कारकों को भी ध्यान में रखना होगा।’

चिंता केवल अलग-अलग झीलों तक सीमित नहीं है। जून में प्रकाशित एक शोध में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत पश्चिमी हिमालय को अध्ययन किए गए हिमालय के तीन हिस्सों में सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र बताया गया। 20वीं सदी की शुरुआत के बाद से इस क्षेत्र के तापमान में करीब 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है और भविष्य में यहां बर्फबारी में सबसे अधिक कमी आने का अनुमान है। उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2081-2100 के दौरान पश्चिमी हिमालय में सर्दियों का तापमान 20वीं सदी की शुरुआत के स्तर की तुलना में 7.18 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

अध्ययन ने यह भी चेतावनी दी कि ग्लेशियरों के पीछे हटने और नई झीलों के बनने के साथ जीएलओएफ का खतरा पूर्वी हिमालय से पश्चिम की ओर फैल सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज के डीन और जलवायु वैज्ञानिक प्रो. गुलाम जिलानी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में तत्काल चिंता कश्मीर घाटी की तुलना में लद्दाख और चिनाब घाटी में अधिक है।

उन्होंने कहा, ‘जांस्कर, नुब्रा और श्योक विशेष रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और नई हिमनदीय झीलें बन रही हैं।’

उन्होंने किश्तवाड़, डोडा और रामबन के उन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों की ओर भी ध्यान दिलाया, जहां ग्लेशियरों से पोषित जलधाराएं हैं और ऊपर की ओर किसी झील या जल अवरोध के टूटने से बाढ़ का पानी संकरी घाटियों से तेजी से नीचे आ सकता है। हालांकि, जिलानी ने आगाह किया कि किसी हिमनदीय झील की मौजूदगी या उसके विस्तार का अर्थ यह मान लेना सही नहीं है कि निकट भविष्य में जीएलओएफ होना तय है।

उन्होंने कहा, ‘कश्मीर में ऐसी कई झीलें सदियों से मौजूद हैं और कभी नहीं फूटीं। उनकी स्थिरता का आकलन केवल सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर नहीं किया जा सकता।’

उन्होंने कहा, ‘रिमोट सेंसिंग झीलों की पहचान करने और उनके विस्तार की निगरानी में मदद कर सकती है, लेकिन यह मोरेन बांध की भूगर्भीय स्थिरता का निर्धारण नहीं कर सकती। इसके लिए विस्तृत मैदानी जांच जरूरी है।’

यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। कश्मीर की समस्या वैज्ञानिक चेतावनियों की कमी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों की जानकारी और जमीन पर लागू की जा रही व्यवस्थाओं के बीच मौजूद अंतर है।

सरकार ने पहले ही लगातार सैटेलाइट और मैदानी निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण, इकोजोनिंग योजनाओं और जिला आपदा प्रबंधन योजनाओं में जीएलओएफ परिदृश्यों को शामिल करने जैसे उपायों की रूपरेखा तैयार की है। फिर भी उपलब्ध आकलन के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में अभी तक रियल-टाइम निगरानी के लिए जरूरी हार्डवेयर या कार्यशील प्रारंभिक चेतावनी नेटवर्क मौजूद नहीं है, जबकि महत्वपूर्ण बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण भी अधूरे हैं।

कश्मीर और लद्दाख में ग्लेशियरों तथा हिमनदीय खतरों का अध्ययन कर चुके राशिद का मानना है कि समाधान आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से उसका अनुमान लगाने की दिशा में बढ़ने में है। जनवरी 2026 में प्रकाशित उनके अध्ययन में कश्मीर हिमालय में 155 हिमनदीय झीलों का मानचित्रण किया गया और पाया गया कि 1992 से 2024 के बीच बर्फ से संपर्क वाली प्रोग्लेशियल झीलों के क्षेत्रफल में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

उन्होंने कहा, ‘बड़ा वैज्ञानिक सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस विशेष घटना को किस चीज ने ट्रिगर किया, बल्कि यह भी है कि क्या हिमालय में ऐसी ही संवेदनशील जगहों की पहचान कहीं और की जा सकती है।’

और यहीं नेपाल से मिलने वाला बड़ा सबक सामने आता है। चुनौती सिर्फ अगली जीएलओएफ की भविष्यवाणी करना नहीं है। चुनौती यह पहचानना है कि कौन-से भू-दृश्य संवेदनशील हैं, उनके आसपास विकास को नियंत्रित करना है और यह सुनिश्चित करना है कि चेतावनियां कार्रवाई में बदलें।

राशिद ने कहा, ‘मूल रूप से यह विज्ञान-नीति-कार्यान्वयन के बीच का अंतर है। इसे पाटने के लिए निरंतर संस्थागत भागीदारी की जरूरत है।’

जम्मू-कश्मीर के लिए इस अंतर को अब नजरअंदाज करना और मुश्किल हो गया है। नेपाल ने वास्तविक दुनिया में यह दिखा दिया है कि किस तरह ऊंचाई वाले क्षेत्र में होने वाली भूगर्भीय घटना बहुत तेजी से मानवीय त्रासदी में बदल सकती है। अब सवाल यह है कि क्या कश्मीर इस चेतावनी पर उस समय कार्रवाई करेगा, जब यह अभी सिर्फ चेतावनी है या फिर अपनी खुद की आपदा के जरिए इसका सबूत मिलने का इंतजार करेगा।

स्टेट वॉच / तमिलनाडु

खुला स्टेनली डैम का फाटक

मोहिनी सेंगर

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 1 सितंबर को मेट्टूर बांध के गेट खोलकर कावेरी का पानी डेल्टा के किसानों के लिए रवाना कर दिया। 80 दिन की देरी के बाद खुले बांध ने धान की खेती की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को बड़ी राहत दी है। सरकार ने फिलहाल जलाशय की स्थिति और पानी की आवक को देखते हुए 45 दिनों तक सिंचाई के लिए पानी छोड़ने की योजना बनाई है। मेट्टूर बांध से सामान्य तौर पर हर साल 12 जून के आसपास डेल्टा सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाता है। लेकिन इस बार कावेरी बेसिन में कम बारिश और जलाशय में पर्याप्त भंडारण नहीं होने के कारण तय समय पर गेट नहीं खुल सके।

2026-27 के सिंचाई वर्ष की शुरुआत में बांध में उपयोग योग्य जल भंडार महज 41.223 टीएमसी बताया गया था। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ पेयजल की जरूरत थी, तो दूसरी तरफ लाखों एकड़ कृषि भूमि को बचाने की चुनौती। 1 सितंबर को जलाशय का स्तर करीब 91.56 फीट था। इसकी अधिकतम क्षमता 120 फीट है। आगे जलाशय में पानी की आवक और डेल्टा की सिंचाई जरूरत के अनुसार रिलीज किया जाएगा। यह पानी डेल्टा जिलों की कृषि के लिए महत्वपूर्ण है और धान की फसल के लिए इसकी अहम भूमिका है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद मेट्टूर का यह विजय का पहला दौरा था। उन्होंने खुद स्लुइस गेट खोलकर पानी छोड़ा और बहती कावेरी पर फूल अर्पित किए। किसानों से मुलाकात के दौरान कृषि से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। बांध का कार्यक्रम पूरा कर विजय सलेम एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। रास्ते में चिन्नकवूर इलाके में खेत के पास उनका काफिला अचानक रुक गया। वजह थीं वहां मौजूद बुजुर्ग महिला चेल्लम। विजय उनके पास पहुंचे। हालचाल पूछा, नाम जाना और खाने के बारे में भी पूछा।

मुलाकात ने मुख्यमंत्री के पूरे दौरे को अचानक एक अलग रंग दे दिया। मुलाकात का सबसे अच्छा पल तब आया जब मुख्यमंत्री ने अपनी आंखों पर लगा क्रिश्चियन डायर का सनग्लास उतारकर चेल्लम को पहना दिया। इस चश्मे की कीमत करीब 40 हजार रुपये है। चेल्लम बाद में वही चश्मा पहने विजय के साथ खड़ी नजर आईं और लोगों की ओर हाथ हिलाया। विजय ने इसी दौरे में एक किसान के घर जाकर परिवार से मुलाकात भी की और पारंपरिक उपहार के तौर पर धोती-साड़ी दी। विजय के मेट्टूर दौरे का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है।

कावेरी जल बंटवारे पर पुराना विवाद

कावेरी जल बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद अभी जारी है। तमिलनाडु ने कर्नाटक से कथित कमी पूरी करने की मांग उठाई है, जबकि कर्नाटक की ओर से अलग पक्ष रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होनी है। ऐसे वक्त में मेट्टूर का गेट खुलना किसानों के लिए राहत और सरकार के लिए बड़ी जिम्मेदारी दोनों है। इसलिए मेट्टूर के खुले फाटक को अंतिम समाधान की तरह देखना मुश्किल है। किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं कि मेट्टूर खुला या नहीं। सवाल यह है कि पानी कितने दिनों तक चलेगा, कितनी दूर तक पहुंचेगा और क्या फसल के पूरे चक्र को संभाल पाएगा।