पंजाब में चार महीने से भी कम समय शेष रहते मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार को सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के विरोध का एक और सामना करना पड़ सकता है। कर्मचारियों और पेंशनरों ने सरकार की ओर से घोषित तीन प्रतिशत महंगाई भत्ते (डीए) की वृद्धि को अपर्याप्त बताते हुए इसे ‘दिवाली का तोहफा’ मानने से इनकार कर दिया है।
करीब चार लाख सरकारी कर्मचारियों और 3.5 लाख पेंशनरों ने 13 नवंबर से महीनेभर तक चलने वाले आंदोलन का ऐलान किया है। उनका आरोप है कि सरकार वेतन संबंधी लाभों, पेंशन सुधारों और सेवा शर्तों से जुड़े अपने वादे पूरे करने में विफल रही है। विरोध प्रदर्शनों का समापन 13 दिसंबर को शंभू से अमृतसर तक प्रस्तावित मानव श्रृंखला के रूप में होगा।
यूनियन नेताओं सुखचैन खेड़ा और गुरनाम सिंह विर्क ने बताया कि 1 से 5 दिसंबर तक कर्मचारी और पेंशनर अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी के सभी 91 विधायकों के आवास के बाहर प्रदर्शन करेंगे और सत्तारूढ़ पार्टी के पुतले जलाएंगे। इसके बाद 6 दिसंबर को पुतलों की राख का विसर्जन बूढ़ा नाला में किया जाएगा।
आंदोलन के अंतिम चरण में 13 दिसंबर को शंभू से अमृतसर तक मानव श्रृंखला बनाई जाएगी। इसके माध्यम से कर्मचारी और पेंशनर अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के साथ-साथ अपनी लंबित मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करेंगे।
यूनियन नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे टुकड़ों में की जाने वाली घोषणाओं और आंशिक राहत से संतुष्ट नहीं होंगे। जब तक सरकार उनकी सभी मांगें पूरी नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। उनकी प्रमुख मांगों में लंबित डीए एरियर का तत्काल भुगतान, छठे और सातवें वेतन आयोग की बकाया राशि जारी करना, शेष 10 प्रतिशत डीए का भुगतान, पुरानी पेंशन योजना लागू करना, पुराने वेतनमान और भत्ते बहाल करना तथा कर्मचारियों की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाली नीतियों को वापस लेना शामिल है।
कर्मचारी संगठनों और आप सरकार के बीच टकराव का एक बड़ा मुद्दा पुरानी पेंशन योजना का क्रियान्वयन बना हुआ है। कर्मचारी नेताओं ने सरकार पर अपने वादे से पीछे हटने का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछली सरकार ने OPS को अधिसूचित किया था, लेकिन मौजूदा सरकार के करीब चार साल सत्ता में रहने के बावजूद इसे लागू करने के लिए कोई प्रभावी ढांचा तैयार नहीं किया गया।
मीडिया के सामने एक प्रस्तुति के दौरान जॉइंट कोऑर्डिनेशन कमेटी के नेताओं ने कर्मचारी संबंधी मुद्दों पर सरकार के दावों को भ्रामक बताते हुए उन्हें चुनौती दी। इस दौरान आप नेताओं के पुराने वीडियो क्लिप भी दिखाए गए। इनमें नवंबर 2022 में भगवंत मान द्वारा OPS लागू करने की घोषणा के अलावा आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और वित्त मंत्री हरपाल चीमा के वे बयान भी शामिल थे, जिनमें उन्होंने पंजाब में पार्टी की सरकार बनने से पहले पुरानी पेंशन योजना का समर्थन किया था।
यूनियन नेताओं ने सवाल उठाया कि कर्मचारियों से किए गए इन वादों को बार-बार दोहराने के बावजूद सरकार ने अब तक उन्हें जमीन पर उतारने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए।
डीए एरियर को लेकर भी बढ़ा टकराव
यूनियनों ने सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाए कि पंजाब के कर्मचारियों को देश में सबसे अधिक वेतन मिल रहा है। उन्होंने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज किया कि डीए की लंबित किस्तों का अधिकांश बोझ पिछली सरकारों से विरासत में मिला है।
सुखचैन खेड़ा ने सरकार के दावे को चुनौती देते हुए कहा, “जब कांग्रेस चुनाव हारी थी, तब केवल सात प्रतिशत डीए बकाया था। अकाली-भाजपा सरकार कोई भी डीए बकाया छोड़कर नहीं गई थी।”
यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार छठे वेतन आयोग के एरियर के भुगतान को लंबित डीए के निपटारे के रूप में पेश कर रही है। उनका दावा है कि अभी भी 10 प्रतिशत डीए बकाया है, जिसे तत्काल जारी किया जाना चाहिए। उन्होंने सभी लंबित एरियर के भुगतान की भी मांग की।
गौरतलब है कि यूनियनों का यह ऐलान मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा तीन प्रतिशत डीए वृद्धि की घोषणा के एक दिन बाद आया है। इस वृद्धि के साथ कर्मचारियों का कुल डीए बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया है। राज्य सरकार के अनुसार, इस फैसले से सरकारी खजाने पर हर महीने 90 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
इससे दो महीने पहले सरकार ने आठ प्रतिशत डीए वृद्धि की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री मान ने कहा था कि इन दोनों किस्तों के चलते सरकार पर सालाना 3,988 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
हालांकि, ताजा घोषणा भी कर्मचारी और पेंशनर संगठनों को संतुष्ट नहीं कर पाई है। उनका कहना है कि डीए में वृद्धि से लंबित एरियर, पेंशन लाभ और सेवा शर्तों से जुड़े वर्षों पुराने विवादों का समाधान नहीं होता।
विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही यह आंदोलन आप सरकार के लिए एक नई राजनीतिक चुनौती बन सकता है। करीब 7.5 लाख कर्मचारियों और पेंशनरों की भागीदारी तथा उनके परिवारों का संभावित समर्थन इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बना सकता है।
फिलहाल यूनियनों ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल डीए वृद्धि की घोषणा के आधार पर आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा। उनका सरकार को सीधा संदेश है कि कर्मचारियों से किए गए वादों की विश्वसनीयता घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक क्रियान्वयन से तय होगी।




