10 अक्टूबर को चेन्नई में राहुल गांधी की ‘छत्रों की गूंज’: सीईसी के विरोध के बीच छात्रों की पहुंच राजनीतिक परीक्षा में पहुंची

शिक्षा और नौकरियों से जुड़े बैनर लेकर एक बड़ी जन-रैली में इकट्ठा होते छात्र (सांकेतिक तस्वीर)
'छात्रों की गूंज' को छात्रों के साथ सीधे संवाद के मंच के तौर पर पेश किया जा रहा है; इसका छठा संस्करण 10 अक्टूबर को चेन्नई के आइलैंड ग्राउंड्स में होगा। यह एक सांकेतिक तस्वीर है।

चेन्नई में 10 अक्टूबर को होने वाला कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पार्टी के लिए महज युवाओं से संवाद का आयोजन नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की एक बड़ी परीक्षा भी है।

एक तरफ राहुल गांधी तमिलनाडु के छात्रों के बीच शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखेंगे, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के केंद्र में है। ऐसे में चेन्नई का कार्यक्रम यह तय करने में अहम हो सकता है कि कांग्रेस का विरोध केवल संस्थागत सवालों तक सीमित रहता है या वह युवाओं की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़कर एक व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप लेता है।

चेन्नई के आइलैंड ग्राउंड्स में होने वाला यह कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ पहल की छठी कड़ी है। इसमें छात्रों के परीक्षा संबंधी संकट, बेरोजगारी, कोचिंग संस्थानों की भूमिका और शिक्षा पर सरकारी खर्च जैसे मुद्दे उठने की संभावना है। तमिलनाडु कांग्रेस ने छात्रों को पंजीकरण के जरिए संवाद में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है।

चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन और चेन्नई की राजनीतिक टाइमिंग

इस कार्यक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने 8 अक्टूबर को राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। वहीं, 10 अक्टूबर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी और विभिन्न छात्र संगठनों के संयुक्त आंदोलन की भी घोषणा हुई है।

यहीं कांग्रेस के सामने राजनीतिक रणनीति की असली चुनौती है। राहुल गांधी का चेन्नई में रहना युवाओं के बीच संवाद और दक्षिण भारत में पार्टी की पहुंच बढ़ाने का अवसर है, लेकिन दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन भी विपक्ष की एकजुटता और नेतृत्व की सक्रियता का प्रतीक बन सकता है। दोनों मोर्चों को अलग-अलग गतिविधियों की तरह चलाने के बजाय कांग्रेस इन्हें लोकतंत्र, नागरिक अधिकार और युवाओं के भविष्य से जोड़कर साझा राजनीतिक संदेश दे सकती है।

नया सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने दो अलग दिखने वाले अभियानों को एक ही राजनीतिक नैरेटिव में बदल पाएगी? यदि चेन्नई में छात्रों की समस्याओं को लोकतांत्रिक जवाबदेही से जोड़ते हुए उठाया जाता है और दिल्ली के आंदोलन को भी युवाओं की भागीदारी मिलती है, तो पार्टी का संदेश केवल पार्टी कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा।

तमिलनाडु में कांग्रेस के लिए कितनी बड़ी संभावना?

तमिलनाडु में यह पहल कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पार्टी की राजनीति गठबंधन सहयोगियों और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों से भी प्रभावित होती है। छात्रों के बीच सीधे संवाद से कांग्रेस अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। खासकर नीट, महंगी कोचिंग, शिक्षा की लागत और रोजगार जैसे मुद्दे ऐसे हैं जो अलग-अलग सामाजिक वर्गों के युवाओं और उनके परिवारों को जोड़ सकते हैं।

लेकिन इस कार्यक्रम की सफलता का पैमाना केवल भीड़ या राहुल गांधी के भाषण पर तालियां नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह होगा कि क्या कांग्रेस छात्रों की शिकायतों को दर्ज कर आगे की कार्रवाई, नीति संबंधी मांगों और निरंतर संवाद में बदल पाती है। यदि कार्यक्रम के बाद छात्र संगठनों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ नियमित संपर्क बनाया जाता है, तो यह पार्टी के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक पूंजी बन सकता है।

विपक्ष को कैसे मिलेगा बल?

चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे आंदोलन और छात्रों की गूंज के बीच एक संभावित साझा सूत्र है—व्यवस्था के प्रति जवाबदेही। एक तरफ विपक्ष चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है, दूसरी तरफ छात्र परीक्षा व्यवस्था, शिक्षा की उपलब्धता और रोजगार के अवसरों को लेकर चिंतित हैं। इन दोनों मुद्दों को जोड़ने से कांग्रेस लोकतंत्र की रक्षा के अपने अभियान को व्यापक सामाजिक आधार देने की कोशिश कर सकती है।

हालांकि, विपक्षी एकजुटता अपने आप में ताकत की गारंटी नहीं है। अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक प्राथमिकताओं का अंतर, आंदोलन की निरंतरता और छात्रों की वास्तविक भागीदारी इसकी दिशा तय करेंगे। कांग्रेस के सामने यह भी चुनौती है कि वह युवाओं के मुद्दों को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित न रहने दे।

चेन्नई का कार्यक्रम कांग्रेस के लिए अवसर है, लेकिन उसकी असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी। यदि राहुल गांधी छात्रों की आवाज को पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में जगह देते हैं और चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन को भी लगातार, शांतिपूर्ण और व्यापक जनभागीदारी वाला बनाते हैं, तो कांग्रेस को संगठनात्मक ऊर्जा और विपक्ष को एक नया मुद्दा-आधारित आधार मिल सकता है। अन्यथा, छात्रों की गूंज एक दिन के आयोजन और चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कुछ दिनों की राजनीतिक हलचल बनकर रह जाने का जोखिम उठाएंगे।