
नई दिल्ली: भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस को विशेष और वैश्विक स्वरूप देने के लिए ‘सूर्यपथ तिरंगा’ ग्लोबल रिले का आयोजन किया गया। इस अनूठी पहल के तहत भारतीय तिरंगा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उगते सूरज के मार्ग का अनुसरण करते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर क्रमिक रूप से फहराया गया। यह आयोजन ‘हर घर तिरंगा 2026’ अभियान का हिस्सा है।
फिजी से शुरू हुई तिरंगे की यात्रा
‘सूर्यपथ तिरंगा’ की शुरुआत भारतीय समयानुसार रात 1:30 बजे फिजी की राजधानी सुवा स्थित भारतीय उच्चायोग से हुई। इसके बाद तिरंगे को क्रमशः न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और म्यांमार में भारतीय मिशनों और पोस्ट पर फहराया गया।
इसके बाद यह यात्रा बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव होते हुए उज्बेकिस्तान और ओमान तक पहुंची। भारतीय समयानुसार सुबह 9:45 बजे संयुक्त अरब अमीरात और 10:30 बजे कतर में तिरंगा फहराया गया। शुरुआती नौ घंटों में ही यह प्रतीकात्मक रिले 21 देशों और भारतीय मिशनों या पोस्ट तक पहुंच चुका था।
अफ्रीका और यूरोप तक पहुंचा तिरंगा
इसके बाद तिरंगे की यात्रा पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप की ओर आगे बढ़ी। कुवैत, सऊदी अरब, इथियोपिया, रूस, केन्या, इजराइल, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका में भी भारतीय मिशनों ने इस पहल में हिस्सा लिया। भारतीय समयानुसार दोपहर 12:30 बजे तिरंगा दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया पहुंचा।
इसके बाद रिले यूरोप की ओर बढ़ी और लातविया, जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, मोरक्को और आइसलैंड तक पहुंची।
अमेरिका तक जारी रहा सफर
तिरंगे की यह प्रतीकात्मक यात्रा अटलांटिक पार करते हुए अमेरिका महाद्वीप की ओर बढ़ी। ब्रासीलिया, ब्राजील में शाम 4:30 बजे और परामारिबो, सूरीनाम में 4:45 बजे रिले के निर्धारित पड़ाव थे। इसके बाद यह यात्रा अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में समाप्त होने वाली थी।
संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने ‘सूर्यपथ तिरंगा’ को भारत की एकता, विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों को दुनिया भर में जोड़ने वाली पहल बताया। विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव रणधीर जायसवाल ने कहा कि यह अभियान दुनिया भर में भारत की स्वतंत्रता का उत्सव मनाने का एक अनूठा तरीका है।
इस पहल के माध्यम से तिरंगा केवल एक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में नहीं, बल्कि भारत की एकता, देशभक्ति, राष्ट्रीय गौरव और ‘विकसित भारत’ के संकल्प के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में पहुंचा।
