सियासी चौसर — पीएम ने पदाधिकारियों से पूछा: कांग्रेस का खात्मा कैसे हुआ?

पीएम नरेंद्र मोदी ने नए पदाधिकारियों की पहली बैठक में परिचय के दौरान सभी पदाधिकारियों से एक सवाल पूछा। पीएम मोदी ने पूछा, कांग्रेस कैसे खत्म हुई? नए बनाए गए पदाधिकारियों ने अलग-अलग जवाब देने शुरू किए। किसी ने कहा परिवारवाद, किसी ने भ्रष्टाचार, किसी ने जवाब दिया प्रदेश में नेतृत्व की कमी, तो किसी ने कहा लीडरशिप का अभाव। कुछ ने कहा कमजोर संगठन और दिखावा करना।

पीएम मोदी ने जब सबके अलग-अलग जवाब सुन लिए, तब उन्होंने सबको एक साथ जवाब दिया कि आप लोगों को ये सब नहीं करना है।

विवादों वाली किताब

जब सोनिया गांधी की आत्मकथा नवंबर में बाजार में आएगी। इस

किताब को भारत में विवाद और पेंग्विन के इनकार के बाद हार्पर कॉलिंस ने इसे छापने की सहमति दी है। यह भारत के सबसे चर्चित राजनीतिक परिवार के लिए एक दिलचस्प कहानी होगी। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष स्वतंत्रता के बाद नेहरू-गांधी परिवार की पहली सदस्य बन जाएंगी, जिनका संस्मरण प्रकाशित हो रहा है, हालांकि इस परिवार ने तीन प्रधानमंत्री दिए हैं।

जवाहरलाल नेहरू सबसे पहले इस दिशा में आगे बढ़े थे, लेकिन स्वतंत्रता से काफी पहले। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने से 11 साल पहले उनकी  आॅटोबायोग्राफी, जिसे टुवर्ड फ्रीडम के नाम से भी प्रकाशित किया गया, जो 1936 में आई थी । इंदिरा गांधी ने कभी पारंपरिक आत्मकथा नहीं लिखी। इसके सबसे निकट ‘माई ट्रुथ’ थी, जो 1980 में प्रकाशित हुई और व्यापक व्यक्तिगत साक्षात्कारों तथा उनके विचारों पर आधारित थी। इस पुस्तक में इलाहाबाद में उनके बचपन, अपने पिता के साथ उनके संबंध, उनकी शिक्षा और, स्वाभाविक रूप से, उनकी राजनीतिक सोच की झलक मिलती है। यह किताब एक बेहद नाटकीय दौर में सामने आई थी—जब वह कुछ समय के लिए सत्ता से बाहर थीं। राजीव गांधी ने भी अपनी कोई आत्मकथा नहीं लिखी। इसके बजाय उनके जीवन का लेखा-जोखा परिवार के सदस्यों, सहयोगियों, इतिहासकारों और जीवनीकारों ने प्रस्तुत किया। दिलचस्प बात यह है कि राजीव के जीवन की सबसे अंतरंग झलकियों में से एक खुद सोनिया गांधी ने उपलब्ध कराई। 1992 में उन्होंने ‘राजीव्स वर्ल्ड : फोटोग्राफ्स बाय राजीव गांधी’ का संकलन और परिचय लिखा था। यह चार दशकों में खींची गई उनकी अपनी तस्वीरों का संग्रह था।

इस संस्मरण में सोनिया गांधी के कैमरे पर किया गया काम भी दिखेगा। यही उनके संस्मरण को महज एक और राजनीतिक आत्मकथा से अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। जिस परिवार के बारे में पीढ़ियों से दूसरे लोग लिखते आए हैं, इस बार नेहरू-गांधी परिवार के एक सदस्य ने खुद अपनी कहानी लिखी है।

पीएमईजीपी में नंबर वन कश्मीर

यह अविश्वसनीय लग सकता है, लेकिन यह सच है। जम्मू-

कश्मीर राज्य प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत रोजगार सृजन परियोजनाओं के लिए धन प्राप्त करने में नंबर एक पर है। पीएमईजीपी के तहत परियोजनाओं के लिए मार्जिन मनी (एमएम) प्राप्त करने के मामले में 37 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्य इसके बाद आते हैं। और ऐसा केवल एक साल नहीं हुआ! यह पिछले पांच वित्तीय वर्षों—2021-22 से 2025-26—के दौरान हुआ है। सरकार पीएमईजीपी के तहत परियोजनाओं के जरिए रोजगार पैदा करने के लिए हर साल 3,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करती है। इस कार्यक्रम ने पिछले पांच वर्षों के दौरान देशभर में अनुमानित करीब 36.33 लाख रोजगार अवसर पैदा किए।

पीएमईजीपी के तहत जम्मू-कश्मीर ने सबसे बड़ा हिस्सा हासिल किया। 2021-22 में 467 करोड़ रुपये के साथ जम्मू-कश्मीर शीर्ष पर था। उत्तर प्रदेश को 411 करोड़ रुपये, गुजरात को 286 करोड़ रुपये और महाराष्ट्र को 129 करोड़ रुपये मिले। इसके बाद के तीन वर्षों में भी कहानी लगभग यही रही, हालांकि 2025-26 में बदलाव आया, जब उत्तर प्रदेश को 303 करोड़ रुपये मिले, जबकि जम्मू-कश्मीर को 155 करोड़ रुपये मिले।

सरकार को जल्द ही इस योजना को अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखने पर निर्णय लेना बाकी है। रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं के लिए देशभर में लंबित स्वीकृत आवेदनों के वास्ते मार्जिन मनी सब्सिडी के रूप में धन जारी किया जाता है।

एनडीए के सहयोगी चुपचाप बीजेपी को दे रहे चेतावनी

एनडीए के भीतर एक नई बेचैनी उभरती दिखाई दे रही है। सहयोगी दलों के संकेत बता रहे हैं कि वे शायद अब बीजेपी की दूसरी भूमिका निभाने से संतुष्ट नहीं हैं। ताजा संकेत

एनसीपीआई नेता सुदीप बंदोपाध्याय की ओर से आया, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एनडीए का एक संयोजक नियुक्त करने का आग्रह किया। इस मांग ने राजनीतिक हलकों को हैरान कर दिया है, क्योंकि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से किसी भी सहयोगी दल की ओर से सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई मांग नहीं की गई थी। बंदोपाध्याय ने तर्क दिया कि एक समर्पित समन्वयक से संवाद और गठबंधन प्रबंधन बेहतर होगा, खासकर तब जब संसद का सत्र न चल रहा हो।

महत्वपूर्ण बात यह है कि न तो बीजेपी और न ही टीडीपी और जेडीयू जैसे प्रमुख सहयोगियों ने इस पर टिप्पणी करना चुना है। एनसीपीआई, जिसके 20 लोकसभा सांसद टीएमसी से आए हैं, को तेजी से ऐसे सहयोगियों के व्यापक समूह का हिस्सा माना जा रहा है, जो अधिक बड़ी भूमिका की मांग कर रहे हैं। इसके संकेत अन्य जगहों पर भी दिखाई दे रहे हैं। जेडीयू ने बिहार में अपनी खुद की लाल रेखाएं खींचनी शुरू कर दी हैं। सम्राट चौधरी सरकार के 550 से अधिक स्कूलों को मॉडल संस्थानों में बदलने, उनका नाम बदलकर सरस्वती विद्या निकेतन रखने और उन्हें भगवा रंग में रंगने के फैसले पर उसकी आपत्ति सावधानीपूर्वक शब्दों में व्यक्त की गई, लेकिन संदेश स्पष्ट था। जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, ‘शिक्षा का केवल एक ही रंग होता है।’ यह शिक्षा के राजनीतिकरण को लेकर असहजता का संकेत था।

इस बीच, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू अब भी पर्दे के पीछे से काम करने वाले विशिष्ट खिलाड़ी बने हुए हैं—चुपचाप बातचीत करते हैं और परिणाम हासिल करते हैं। बीजेपी के सहयोगी दलों की वजह से ही एफसीआरए विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। अलग-अलग देखें तो ये घटनाएं सामान्य गठबंधन राजनीति का हिस्सा लग सकती हैं। लेकिन सामूहिक रूप से ये कुछ बड़ा संकेत देती हैं: एनडीए के सहयोगी दल अब अपनी भूमिका और प्रभाव का दावा करने लगे हैं और बीजेपी को चुपचाप चेतावनी दी जा रही है।

इंतजार कीजिए बीजेपी में कुछ बड़ा होना बाकी है

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की नई संगठनात्मक टीम में 65 में से 51 चेहरे नए हैं। महीनों की राजनीतिक उठापटक, विचार-विमर्श और गणनाओं के बाद आखिरकार बहुप्रतीक्षित टीम सामने आ गई है। फिर भी राजनीतिक विश्लेषक यह तय करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि यह कोई बड़ा बदलाव है या फिर महज ‘चू-चू का मुरब्बा’-  अलग-अलग और बेमेल चीजों को एक ही कटोरे में डालकर तैयार किया गया अजीबोगरीब मिश्रण।

स्मृति ईरानी और राम माधव की वापसी तथा विनोद तावड़े की बड़ी पदोन्नति के अलावा ऐसा बहुत कम है, जिसे राजनीतिक भूकंप कहा जा सके। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि असली फेरबदल अभी पर्दे के पीछे इंतजार कर रहा है। इसका सबसे बड़ा संकेत क्या है? कई ऐसे मंत्री, जिनके सरकार से संगठन में जाने की उम्मीद थी, अभी भी अपने पदों पर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, संगठनात्मक सर्जरी अभी पूरी नहीं हुई है।

और फिर सरकार भी है। मंत्री और सत्ता के पेड़ पर उम्मीद से बैठे राजनीतिक पक्षी महीनों से दूसरे दौर का इंतजार कर रहे हैं। जब भी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा, वह कहीं अधिक नाटकीय हो सकता है। माना जा रहा है कि कम से कम दो दर्जन मंत्री या तो हटाए जाने की जद में हैं या उनके विभाग बदले जा सकते हैं। नबीन की संगठनात्मक बस से छूट गए कुछ प्रमुख नेताओं को इसके बजाय मंत्री पद मिल सकता है।

तत्कालता स्पष्ट है। कई मंत्री पहले से ही तीन-तीन विभाग संभाल रहे हैं, जिससे सरकार एक सुचारु रूप से चलने वाली मशीन के बजाय ‘एक व्यक्ति-तीन मंत्रालय’ वाले सर्कस जैसी दिखने लगी है। तो अभी-अभी हुआ क्या है? शायद बीजेपी के फेरबदल का केवल पहला भाग। दूसरा भाग अभी लोड हो रहा है। फिलहाल यह छक्का मारकर आगे बढ़ गई हो सकती है।

फडणवीस ने खींच दी है लंबी लाइन

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) या उसके नेतृत्व

वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) भारत के 23 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में सत्ता में है, जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, असम और बिहार जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं। लेकिन कोई मुख्यमंत्री कभी यह कहने की हिम्मत नहीं करता कि ‘मैं अपने राज्य में ही रहूंगा और कहीं नहीं जाऊंगा।’ यहां तक कि उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ ने भी ऐसा कभी नहीं कहा।

हालांकि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अलग हैं। उन्होंने हाल ही में सार्वजनिक रूप से दावा किया कि ‘मैं महाराष्ट्र में ही रहूंगा।’ बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम की घोषणा के बाद अब पूरे देश का ध्यान केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार पर है। पिछले कई सप्ताह से चर्चा चल रही है कि बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा।

लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी लगातार दिल्ली का दौरा करते रहे हैं। इससे अटकलें पैदा हुईं कि क्या फडणवीस दिल्ली आ सकते हैं। हालांकि उन्होंने इससे इनकार किया। उन्होंने कहा, ‘महाराष्ट्र की जनता ने मुझे चुना है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है। इसलिए मैं मुंबई में ही रहूंगा।’ मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि ‘अगर मैं दिल्ली में होता हूं तो चचार्एं होती हैं और जब मैं मुंबई में होता हूं, तब भी चचार्एं होती हैं। इसलिए जो लोग जो कहना चाहते हैं, उन्हें कहने दीजिए। बहुत से लोग सोचते हैं कि मुझे दिल्ली जाना चाहिए। हालांकि, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि मैं मुंबई में ही रहूंगा।’

यूपी में तावड़े की अग्निपरीक्षा

महाराष्ट्र की राज्य राजनीति से 2019 से बाहर होने के बाद

राजनीतिक वनवास के वर्षों के पश्चात विनोद तावड़े ने उल्लेखनीय वापसी की है। प्रमुख ओबीसी नेता अब बीजेपी के सत्ता ढांचे में हाशिये पर रहने वाले व्यक्ति नहीं हैं; उन्हें तेजी से पार्टी के अग्रिम पंक्ति के संकटमोचक के रूप में देखा जा रहा है।

तावड़े बीजेपी के महासचिव रह चुके हैं और बिहार का प्रभार भी संभाल चुके हैं। हालांकि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत का काफी श्रेय तत्कालीन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को दिया गया, जो राज्य के चुनाव प्रभारी थे। अब तावड़े को बीजेपी का सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है: उत्तर प्रदेश।

उनका कद बढ़ाया जाना बहुत कुछ कहता है। संगठनात्मक वरीयता क्रम में बीजेपी के आठ महासचिवों में तावड़े सबसे ऊपर हैं, जबकि स्मृति ईरानी चौथे स्थान पर हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हाईकमान ने विशेष रूप से तावड़े से पूछा था कि वह संगठन में काम करना पसंद करेंगे या सरकार में शामिल होना। उन्होंने पार्टी को चुना—और उन्हें उत्तर प्रदेश का दायित्व मिला, जिसे व्यापक रूप से 2027 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का राजनीतिक वाटरलू माना जा रहा है।

दांव इससे ऊंचे शायद ही हो सकते हैं। अयोध्या राम मंदिर से जुड़ा ‘चंदा चोरी’ विवाद और सीजेपी के रूप में जेन-जी का उभरना बीजेपी की चिंताओं को और बढ़ा चुका है। बीजेपी ने 2017 में 403 में से शानदार 312 सीटें जीती थीं, लेकिन 2022 में यह संख्या घटकर 255 रह गई। तावड़े का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है: इस गिरावट को रोकना और 2027 में इससे बेहतर आंकड़ा हासिल करना।