
ममता सिंह।
नई दिल्ली। अर्जेंटीना का विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से पूरी तरह नाता तोड़ लेना और वैश्विक स्तर पर बदलते कूटनीतिक समीकरण इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि अब देशों के लिए अपनी सीमाएं, राष्ट्रीय संप्रभुता और तात्कालिक स्वार्थ ही सर्वोपरि हो चुके हैं। दुनिया अब सामूहिक विकास के बजाय ‘अपनी राह, अपना फायदा’ की दिशा में तेजी से बढ़ रही है।
Argentina के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जेवियर माइली (Xavier Miley) का यह कदम केवल एक राजनीतिक पैंतरा नहीं, बल्कि उन वैश्विक संस्थाओं के खिलाफ सीधी जंग है जो संप्रभु राष्ट्रों की नीतियों को प्रभावित करने का दावा करती हैं। माइली का यह ‘Trump स्टाइल’ फैसला उस विचार पर सीधा प्रहार है जिसके तहत किसी देश की जन-स्वास्थ्य नीतियों का रिमोट कंट्रोल विदेशी अधिकारियों के हाथ में होता है। इसे ‘स्वास्थ्य राष्ट्रवाद’ के एक नए उभार के रूप में देखा जा रहा है।

अर्जेंटीना में विश्वविद्यालय फंडिंग कानून को लागू करने के लिए सड़कों पर उतरे हजारों प्रोफेसर और छात्र… Pic source: Argentina Reports
अर्जेंटीना ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसकी सीमाओं, अस्पतालों और स्वास्थ्य बजट पर फैसला केवल उसकी संसद और सरकार करेगी। President Miley के इस आक्रामक राष्ट्रवाद को उनके समर्थक और दक्षिणपंथी संगठन ऐतिहासिक मानकर सराह रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे अर्जेंटीना को संकट के समय अपनी मर्जी से सीमाएं बंद करने, दवाइयां या वैक्सीन चुनने और विदेशी दबाव से मुक्त होने की पूर्ण आजादी मिल गई है।
लेकिन इस बड़े Political फैसले के बाद अर्जेंटीना का आंतरिक माहौल पूरी तरह अशांत है और जनता चुप नहीं है। देश के भीतर इस निर्णय को लेकर एक गहरी खाई खिंच गई है। जहां सरकार और उसके समर्थक इसे ‘स्वाभिमान की बहाली’ कहकर उत्सव मना रहे हैं, वहीं देश का चिकित्सा जगत, वैज्ञानिक, विपक्षी दल और आम नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतरकर इसका पुरजोर विरोध कर रहा है।
चिकित्सा विशेषज्ञों और डॉक्टरों में गहरी चिंता और आक्रोश है कि Global Health Network, अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान, वित्तीय मदद और सस्ती जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति बंद होने से देश का पहले से ही चरमराया हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है। विशेष रूप से देश के कुछ हिस्सों में हाल ही में उभरे हंतावायरस जैसे संक्रामक मामलों के बीच डब्ल्यूएचओ जैसी संस्था से अलग होना आम आदमी के जीवन को सीधे तौर पर खतरे में डालने जैसा माना जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों को डर है कि यदि अर्जेंटीना का यह दक्षिणपंथी दांव राजनीतिक रूप से सफल रहा, तो ब्राजील, हंगरी और इटली जैसे देशों में भी वैश्विक संगठनों को छोड़ने की होड़ मच सकती है। इससे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा का जो साझा सुरक्षा कवच था, वह बिखर जाएगा। साफ है कि 2026 की यह नई दुनिया अब पुराने आदर्शों पर नहीं, बल्कि कठोर हकीकत और सीधे फायदे पर टिकी है।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की हैसियत अब कमजोर पड़ रही है क्योंकि वास्तविक शक्ति उन राष्ट्रों के हाथ में जा रही है जो अपनी शर्तों पर इतिहास लिख रहे हैं। आज की कूटनीति का कड़वा सच यही है कि अब ‘सबका साथ’ बीते दौर की बात हो चुकी है, और ‘केवल अपना भला’ ही इस नई व्यवस्था का मूल मंत्र बन चुका है।



