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पीएम ने स्वदेशी युद्धपोत आईएनएस विक्रांत नौसेना को समर्पित किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को स्वदेशी युद्धपोत (एयरक्राफ़्ट कैरियर) आईएनएस विक्रांत देश और नौसेना को समर्पित किया। भारत में बनने वाला सबसे बड़ा युद्धपोत आईएनएस विक्रांत 262 मीटर लंबा और 62 मीटर चौड़ा है। उन्होंने नौसेना का नया ध्वज भी समर्पित किया। इससे पहले केरल के कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड पहुंचने पर पीएम को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया। इसके निर्माण की शुरुआत 2009 में यूपीए सरकार के समय हुई थी, जब तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने इसके निर्माण शुरुआत कार्यक्रम में शिरकत की थी।

पीएम ने इस मौके पर विक्रांत को विशेष और विशिष्ट बताया। उन्होंने कहा कि यह भारत की प्रतिबद्धता का परिणाम बताया। उन्होंने देशवासियों को इसके जलावतरण पर बधाई दी। करीब 20 हज़ार करोड़ रुपये से तैयार हुआ आईएनएस विक्रांत अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है और इससे आने से भारत की नौसेना क्षमता और मजबूत होगी। इसके ऊपर से 30 एयरक्राफ्ट उड़ान भर सकते हैं। एक साल के ट्रायल के बाद इसे आज पीएम ने नौसेना के बेड़े में शामिल किया। अब भारत के पास दो विमान वाहक पोत हो गए हैं।

भारत के समुद्री इतिहास में आईएनएस विक्रांत अब तक का सबसे बड़ा जहाज है। पीएम मोदी कोचीन शिपयार्ड में 20,000 करोड़ रुपये की लागत से बने इस स्वदेशी अत्याधुनिक स्वचालित यंत्रों से युक्त विमान वाहक पोत का जलावतरण किया। इस मौके पर रक्षमंत्री राजनाथ सिंह, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, सीएम पिनराय विजयन, नौसेना के तमाम बड़े अधिकारी उपस्थित थे। उन्होंने नौसेना का नया ध्वज भी समर्पित किया।

आईएनएस विक्रांत को इसलिए इसे समंदर में चलता फिरता शहर कहा जा रहा है। यहाँ पहुँचने पर पीएम को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। आईएनएस विक्रांत हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने में योगदान देगा। आईएनएस विक्रांत पर विमान उतारने का परीक्षण नवंबर में शुरू होगा, जो 2023 के मध्य तक पूरा हो जाएगा।

भारत में बनने वाला सबसे बड़ा युद्धपोत आईएनएस विक्रांत 262 मीटर लंबा और 62 मीटर चौड़ा है। आईएनएस विक्रमादित्य के बाद यह देश का दूसरा विमानवाहक पोत होगा, जिसे रूसी प्लेटफॉर्म पर बनाया गया। आईएनएस विक्रांत हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने में योगदान देगा। आईएनएस विक्रांत पर विमान उतारने का परीक्षण नवंबर में शुरू होगा, जो 2023 के मध्य तक पूरा हो जाएगा।

ड्रग्स की दलदल: मुम्बई से कोलकाता तक फैला है ड्रग्स तस्करी का जाल

मुम्बई से कोलकाता तक फैला है ड्रग्स तस्करी का जाल

नशा नाश कर देता है। यह एक बुरी लत है। सब कुछ जानते हुए भी बहुत-से लोग इसमें फँस जाते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि ड्रग्स, हेरोइन, कोकीन, ब्राउन शुगर और तमाम तरह के ख़तरनाक नशे की लत में वे लोग भी डूबे हुए पाये जाते हैं, जो सम्भ्रांत और उच्च वर्ग के होते हैं। राजनीति, बॉलीवुड, हॉलीवुड और उद्योगजगत कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। लेकिन स्कूल के बच्चों और युवाओं को नशे की लत लगना एक चिन्ता की बात है। अगर इस पर रोक लगानी है, तो नशा तस्करों पर शिकंजा कसना होगा। यह दुर्भाग्य ही है कि पूरे देश में नशा तस्करों का जाल फैला है। ‘तहलका’ की छानबीन बॉलीवुड की ड्रग पार्टियों की हक़ीक़त सामने लाती है, और यह भी कि कोलकाता की सडक़ों पर ड्रग्स प्राप्त करना कितना आसान है। मुम्बई से कोलकाता तक फैले इस जाल का ख़ुलासा करती तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

‘एक समय मैं कोकीन का लगातार 12 घंटे तक सेवन करता था। शाम 9:00 बजे से शुरू होकर अगले दिन सुबह तक। इससे मुझे ऊर्जा मिलती थी। बॉलीवुड के कुछ सितारे कोकीन क्यों ले रहे हैं? सिर्फ़ ऊर्जा पाने के लिए। लगातार तीन शिफ्टों में फ़िल्मों की शूटिंग करना। घर न जाना, और आराम न करना; उन्हें थका देता है। इसलिए ताज़ा ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उन्हें कोकीन की ज़रूरत होती है। उसी कारण ने मुझे भी ड्रग्स की ओर खींचा। मेरे साथ काम करने वाला कोई भी घर जाने को राज़ी नहीं था। वे सब मेरे आस-पास बैठकर ड्रग्स लेते थे, तो मैं ख़ुद को इसे लेने से कैसे रोक सकता था? तो मैं भी ऊर्जा की ख़ातिर उसमें डूब गया। हम एक रात में कोकीन पर लाखों रुपये ख़र्च कर देते थे।’ यह कहानी बॉलीवुड के एक मशहूर डांस कोरियोग्राफर और संगीतकार से डीजे (डिस्क जॉकी) बने कलाकार की है, जिसने अपना नाम साझा न करने की शर्त पर ‘तहलका’ को यह सब बताया।
यह डीजे, जिसने अमिताभ बच्चन के लिए सिंगापुर के उनके सुइट और मुम्बई में शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान के घरों में परफॉर्म करने का दावा किया; एक भारतीय फ़िल्म गायक / संगीत निर्देशक हैं। मुख्य रूप से इन्होंने बॉलीवुड में ही काम किया है। इस संगीतकार ने मुख्य रूप से लोकप्रिय संगीत की रचना की है, और उनके तीन रीमिक्स एल्बम काफ़ी हिट रहे हैं। भारत में डीजे संगीत के अग्रणी लोगों में शुमार यह कलाकार कुछ बॉलीवुड सितारों की ड्रग पार्टियों की अंदरूनी कहानियों की जानकारी रखने के लिए भी प्रसिद्ध है। सुरक्षित रूप से यह कहा जा सकता है कि वह बॉलीवुड की अधिकांश ड्रग पार्टियों के चश्मदीद गवाह हैं। ख़ुद को बॉलीवुड और ड्रग्स विषय पर फ़िल्म बनाने की चाहत रखने वाले फ़िल्म निर्माता के रूप में पेश करते हुए ‘तहलका’ रिपोर्टर ने मुम्बई के फाइव स्टार होटल में इस संगीतकार से मुलाक़ात की। डीजे ने ‘तहलका’ के सामने खुलकर स्वीकार किया कि एक समय वह ख़ुद कोकीन ले रहे थे।
डीजे : आई यूज्ड टू डू इट वन्स अपोन अ टाइम। (मैं इसे एक बार किया करता था।)

रिपोर्टर : आप कौन-सी लेते थे पहले?
डीजे : कोकीन।
रिपोर्टर : कोकीन लेते थे आप?
डीजे : अब कोई च्वॉइस ही नहीं रहा। अब सब ले रहे हैं यहाँ बैठाकर, अब क्या करूँ? देयर वाज अ टाइम व्हेन आई यूज्ड टू ड्रिंक आलसो। (एक समय था, जब मैं भी शराब पीता था।) बट आई डू नॉट ड्रिंक नाउ। (लेकिन मैं अब नहीं पीता।)

डीजे ने ‘तहलका’ को बताया कि एक समय था, जब वह लगातार 12 घंटे तक कोकीन का सेवन करता था। रात 9:00 बजे से शुरू होकर अगली सुबह लगभग उसी समय तक जारी रहता था।
रिपोर्टर : डीजे भाई! आपको आदत कैसी पड़ी?
डीजे : आदत नहीं पड़ी, आदत नहीं पड़ी। बीकॉज जस्ट फॉर… यह मेरा दोस्त है, यह ले रहा है। यह मेरी जान है। तू भी मेरी जान है। तू भी स्वाद कर तो ले यार।
रिपोर्टर : आपने काफ़ी टाइम तक तो लिया न, आपने?
डीजे : मे बी फॉर अ फ्यू मंथ्स (शायद कुछ महीनों के लिए) …6-8 महीने।
रिपोर्टर : इतना ही? कितना ग्राम लेते थे आप?
डीजे : अ लॉट (काफ़ी ज़्यादा) …वो ख़त्म ही नहीं होता था। हम लोग शुरू करते थे 9:00 बजे रात को। और वो ख़त्म होता था दूसरे दिन सुबह 10:00-11:00-12:00 बजे।
रिपोर्टर : 12 घंटे?
डीजे : हाँ।

डीजे ने समझाया कि कोकीन ने उन अभिनेताओं और बॉलीवुड के अन्य लोगों को ऊर्जा दी, जो रात भर काम किया और लगातार कई शिफ्ट में काम किया।
रिपोर्टर : एनर्जी (ऊर्जा) आती है?
डीजे : एक्टर (अभिनेता-अभिनेत्री) लोग क्यों ले रहे हैं? बीकॉज दे डू (क्योंकि वे करते हैं) तीन शिफ्ट। नींद-वींद सब गुल हो जाती है। नशा एक बोतल दारू पी लो और आप दो लाइन मार लो कोकीन। योर नशा विल बे लेवलाइज्ड। (आपका नशा बराबर बना रहेगा।)
रिपोर्टर : आप ने क्यों किया इतना लम्बा?
डीजे : मेरी कम्पनी ऐसी थी। कोई घर जाने के लिए तैयार नहीं है। पैसे पड़े हुए हैं। गड्डियाँ पड़ी हुई हैं। लाखों रुपये हैं; …और मँगाओ और मँगाओ!

डीजे ने अब ‘तहलका’ को बताया कि कैसे कोकीन किसी व्यक्ति को सुपर एक्टिव (बहुत सक्रिय) बनाती है, उसकी ऊर्जा के स्तर को बढ़ाती है। इसका सेवन करने के बाद कोई बेकार नहीं बैठ सकता; उन्हें लड़कियाँ, संगीत, नृत्य आदि चाहिए।
डीजे : कोकीन इज अ हाई किक। …इफ यू हैव इट; बट वुड यू डू ऑफ्टर दैट? यू गो मैड। (कोकीन आपको शिखर पर ले जाती है। …अगर यह आपके पास है; उसके बाद आप क्या करोगे? आप पागल हो जाओगे)। तुमको चाहिए होंगी लड़कियाँ। तुमको चाहिए होगा म्यूजिक; तुमको चाहिए होगा। तुम कहीं रूम मैं बैठे गये न! इनको मार दोगे आप।
रिपोर्टर : कोकीन के बाद?
डीजे : हाँ।

जैसे ही डीजे के साथ बातचीत आगे बढ़ी, उसने ख़ुलासा किया कि कैसे बॉलीवुड के लोग ‘गोटे’ (उनके सप्लायर को दिया गया स्थानीय नाम) के माध्यम से ड्रग्स प्राप्त करते हैं। वे उनके भरोसेमंद लोग हैं, जो उन्हें नियमित रूप से ड्रग्स की आपूर्ति करते हैं।
रिपोर्टर : हाँ, सर बता रहे थे गोटे होते हैं?
डीजे : दे गो ऐंड दे पिकअप स्टफ फॉर देम, दे डू नॉट गो देमसेल्वेस। (वे जाते हैं और उनके लिए सामग्री उठाते हैं, वे ख़ुद नहीं जाते।)
रिपोर्टर : और कभी पकड़े गये ये लोग?
डीजे : पकड़े गये न, …का क्या हुआ था?
रिपोर्टर : वो तो ख़ुद ही पकड़ा गया था, उसका भी ये ही हुआ था। उसका कैसे हुआ था?
डीजे : नहीं, नहीं; सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) ने नाम लिया था।

बॉलीवुड में इस समय कौन-सी ड्रग की ज़्यादा माँग है? इसके जवाब में डीजे ने कहा- ‘कोकीन’। और इसके रेट का भी ख़ुलासा किया- 10,000 रुपये प्रति ग्राम। और 4-5 लोगों में एक ग्राम कुछ भी नहीं है। फिर हम सप्लायर की तलाश करते हैं। वे जिस आपूर्तिकर्ता का चयन करते हैं, वह हमेशा एक ऐसा व्यक्ति होता है, जिस पर कोई सन्देह नहीं कर सकता। एक बूढ़ा आदमी पुराने स्कूटर पर आएगा और माल दे देगा।
रिपोर्टर : अभी सबसे ज़्यादा क्या बिकता है बॉलीवुड में?
डीजे : कोकीन।
रिपोर्टर : कोकीन?
डीजे : हम्म।
रिपोर्टर : बहुत महँगा होगा?
डीजे : इट इस एक्सपेंसिव। (यह महँगी है।)
रिपोर्टर : क्या रेट होगा सर?
डीजे : अभी रुपये 10 थाउजेंड फॉर अ ग्राम। (अभी एक ग्राम 10 हज़ार रुपये की है।)
रिपोर्टर : कोकीन?
डीजे : अ ग्राम, …ग्राम इस नथिंग (एक ग्राम, …एक ग्राम कुछ भी नहीं।)
रिपोर्टर : एक ग्राम में कुछ नहीं है?
डीजे : एक ग्राम में कुछ नहीं है। तीन, चार, पाँच लोग कम-से-कम होता है।
रिपोर्टर : एक टाइम (समय) में?
डीजे : हाँ, एक टाइम में। खल्लास (ख़त्म) हो जाता है। मैं लूँगा, चार पाँच लाइन बना लिया। मैं लूँगा, उसको दो चाहिए। उसने दो लाइन मार दी, तो ख़र्चा हो गया और ज़्यादा। उसको फोन करो।
रिपोर्टर : सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) को?
डीजे : वो आएगा स्कूटर पर, टूटी-फूटी। बुड्ढा आदमी को ये लोग सिलेक्ट (चयनित) करते हैं साला। कोई बोल ही नहीं सकता है, इसके पास क्या है? वैसा वाला आदमी आएगा।
रिपोर्टर : कितने टाइम (समय) में आ जाता है?
डीजे : वह फटाफट आ जाता है। हर एरिया (क्षेत्र) में उनके रहते हैं; हर एरिया में उनके रहते हैं।

डीजे के मुताबिक, बॉलीवुड में कोकीन कभी न ख़त्म होने वाली कहानी है। सितारे अपने आपूर्तिकर्ता के बारे में चर्चा करते हैं। उसकी क़ीमत के बारे में, शुद्धता के बारे में। और वो भी पूरी रात।
डीजे : मेरा डीलर कौन है, और तेरा डीलर कौन है? मेरा माल अच्छा है। …तेरा माल कैसा है? …कितना प्योर (शुद्ध) है?
रिपोर्टर : अच्छा यह भी बात होती है?
डीजे : अरे यह तो मेन (मुख्य) है। सब्जेक्ट (विषय) यह है। यहाँ पर शुरू होती है, …सुबह हो जाती है।
रिपोर्टर : की डीलर किससे लिया?
डीजे : हाँ, कहाँ से आया है? कोलंबिया के कौन-से गाँव से आयी है। और वो कहाँ पहुँचा और कहाँ मिक्सिंग (मिलावट) हुई? और फिर, …क्या मिलाया उसमें और फिर। हाँ; यहाँ रखा, तो उसमें मेरा एक साइड मेरा थोड़ा-सा ज़्यादा हुआ। तेरा कम हुआ। अरे, बड़े कमाल चीज़ कोकीन है। मतलब नेवर एंडिंग स्टोरी है यह। (कभी न ख़त्म होने वाली कहानी है यह।)

डीजे के बाद ‘तहलका’ ने बॉलीवुड के एक और नामी असिस्टेंट एक्शन डायरेक्टर (एडी) से मुलाक़ात की, जो कई बॉलीवुड ड्रग पार्टियों का चश्मदीद गवाह है। उसने भी बॉलीवुड सितारों के ड्रग्स के प्रति प्रेम का ख़ुलासा किया; लेकिन स्टोरी में अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर। इस एडी के मुताबिक, मुम्बई का मीरा रोड ड्रग्स का ठिकाना है, और वहाँ कई अफ्रीकी सितारों को ड्रग्स बेचते हैं।
रिपोर्टर : इनको मिलती कैसे है, सबको?
एडी : अरे, कितनी मिलती है; आप चले जाओ मीरा रोड में। कितने नीग्रो (अफ्रीकी) लोग बीच रहे हैं ड्रग्स।
रिपोर्टर : मीरा रोड में?
एडी : फिर।
रिपोर्टर : मीरा रोड तो बहुत दूर है?
एडी : हाँ।
अब एडी ने ‘तहलका’ से कहा कि सितारे खुलेआम ड्रग पार्टी नहीं करते हैं। वे एक कमरे में निजी तौर पर ड्रग्स लेते हैं। इसलिए कोई भी यह पता नहीं लगा सकता है कि उन्होंने कोई दवा खायी है या नहीं। उनकी आँखों से ही पता चल सकता है कि उन्होंने नशा किया है।
एडी : वैसे ड्रग्स व$गैरह वाली पार्टी ऐसी नहीं होती।
रिपोर्टर : कैसी होती है?
एडी : ड्रग्स वाली पार्टी में सिर्फ़ एक्टर लोग ही रहते हैं।
रिपोर्टर : जो ड्रग लेते हैं?
एडी : हाँ, और वो चुपके से एक रूम में ही करते हैं। …वो लोग और किसी के सामने करते नहीं हैं। अब क्या लिया? वो भी नहीं मालूम पड़ेगा आपको। क्या लेकर आया वो। लेकिन उसकी आँखों से देखकर पता चल जाएगा। ..इतनी जल्दी इतना नशा नहीं होता किसी को।

एडी ने अब एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक की घटना सुनायी, जिसके साथ वह उनके सहायक के रूप में काम कर रहा था। एक विज्ञापन फ़िल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक ने इतनी चरस ली कि वह अगली सुबह शूटिंग के लिए नहीं उठ सका। बाद में उसने एडी को विज्ञापन शूट करने के लिए कहा।
एडी : मैं अपना किस्सा बताता हूँ, उनके साथ क्या हुआ था।
रिपोर्टर : हाँ, नहीं वो चरसी वाला बताएँ।
एडी : चरसी वाला?
रिपोर्टर : हाँ।
एडी : चरसी वाला, हम लोग गोवा में थे।
रिपोर्टर : एक मिनट!
एडी : सर ने तो पी ली, दबा के एकदम।
रिपोर्टर : कौन-सी पी थी?
एडी : वो तो मालूम नहीं क्या थी? पर इतनी पी ली कि पूछो मत।
रिपोर्टर : दारू तो नहीं थी न?
एडी : दारू थी न! दारू थी।
रिपोर्टर : नहीं, चरस की बात हो रही है?
एडी : दारू, चरस सब वहीं करते वो।
रिपोर्टर : ओके (ठीक है।) फिर क्या हुआ?
एडी : फिर क्या उठे ही नहीं। …तो सुबह शूट हैं। मेरे को बोला, ‘बंटी तू जा के कर।’
रिपोर्टर : कौन-सी फ़िल्म?
एडी : फ़िल्म नहीं थी; .. एड (विज्ञापन) फ़िल्म थी।

मुम्बई, महाराष्ट्र के बाद अब ‘तहलका’ देश के एक और मेट्रो शहर की सडक़ों पर बिक रही नशीली दवाओं की तलाश में कोलकाता, पश्चिम बंगाल का स$फर तय किया। कोई आश्चर्य नहीं हुआ, जब हम आसानी से दार्जिलिंग में कार्तिक नाम के एक पेडलर से मिल लिये। हमने कार्तिक से कहा कि हम दार्जिलिंग में 100 लोगों की ड्रग पार्टी का आयोजन कर रहे हैं। उसके लिए हमें गाँजा चाहिए। कार्तिक तुरन्त हमें किलो के हिसाब से आपूर्ति करने के लिए तैयार हो गया।
रिपोर्टर : अच्छा कार्तिक कितना माल दे सकते हो हमें, अभी तुम पार्टी के लिए?
कार्तिक : अभी दोस्त के साथ बात कर लेते हैं।
रिपोर्टर : नहीं गाँजा कितना दे सकते हैं? 100 लोगों के लिए, …100 लोगों के लिए गाँजा दे दोगे?
कार्तिक : हाँ, दे देंगे।
रिपोर्टर : हम्म।
कार्तिक : हाँ।
रिपोर्टर : कितना होना चाहिए 100 लोगों के लिए?
कार्तिक : 100 लोगों के लिए आप जितना बोलोगे उतना दे देंगे। एक किलो, डेढ़ किलो।
रिपोर्टर : दे दोगे?
कार्तिक : हाँ, दे देंगे।
रिपोर्टर : क्या रेट (भाव) होगा, एक किलो का?
कार्तिक : 1 केजी (एक किलो) का क्या रेट चल रहा? वो देखना पड़ेगा। …अभी बाज़ार का डेली का रेट ऊपर-नीचे होता है न! …100 ग्राम (का) 600-700 रुपये लेता है।
रिपोर्टर : 100 ग्राम 700 रुपए का?

इसके बाद कार्तिक हमें गाँजे का वह पाउच दिखाता है, जो वह अपने साथ ले जा रहा था।
रिपोर्टर : ये क्या है ये? नहीं, ये क्या है ये?
कार्तिक : गाँजा।
रिपोर्टर : हमें चरस चाहिए।
कार्तिक : चरस चाहिए?
रिपोर्टर : हाँ।
कार्तिक : चरस तो अभी शाम को मिलेगा।
रिपोर्टर : ये कितने का है, पुडिय़ा?
कार्तिक : ये 300 का है।
रिपोर्टर : तुम तो बहुत महँगा दे रहे हो?
कार्तिक : महँगा नहीं है। हम लोग रोज़ ही लेते हैं।

कार्तिक ने ‘तहलका’ को बताया कि वह बागडोगरा से जो गाँजा ख़रीद रहा है, वह उच्च गुणवत्ता का है। इसलिए 5-6 ग्राम के एक पाउच की क़ीमत उन्हें 600 रुपये पड़ती है।
रिपोर्टर : तुम कहाँ से लेते हो, ये गाँजा?
कार्तिक : ये तो हम बागडोगरा से लेते हैं।
रिपोर्टर : तुम कितने का लेते हो पैकेट अपने लिए?
कार्तिक : 300 का लेते हैं।
रिपोर्टर : 300 का ही लेते हो आप भी? महँगी है यार!
कार्तिक : ये तो महँगा पड़ेगा ही। ये हाई क्वालिटी का है।
रिपोर्टर : एक पाउच में कितना होता है? एक पाउच…?
कार्तिक : एक पाउच में मान लीजिए होगा… 5-6 ग्राम।

कार्तिक के बाद दार्जिलिंग में ही हमारी मुलाक़ात एक और ड्रग तस्कर संजय मंडल से हुई। उसने ‘तहलका’ से बातचीत में माना कि हमसे मिलने से ठीक पहले वह ब्राउन शुगर ले रहा था। संजय ने बताया कि एक ग्राम ब्राउन शुगर का रेट 2,000 रुपये है। वह हमें ब्राउन शुगर की आपूर्ति करने के लिए सहमत हो गया।
रिपोर्टर : तुम भी लेते हो ब्राउन शुगर?
संजय : कभी-कभी लेता हूँ; …लेता हूँ।
रिपोर्टर : हमें तो तुमने दिलवायी नहीं? तीन दिन से यहाँ पर हैं।
संजय : सुनिए सर! मैं लेता हूँ। मैं तो अभी भी ले ही रहा था। आप लोग फोन करें, तो मैं…।
रिपोर्टर : ब्राउन शुगर अभी है?
संजय : सामने से लेना पड़ेगा।
रिपोर्टर : कितने का?
संजय : यहाँ 2,000 रुपये का एक ग्राम आता है।
दार्जिलिंग से ‘तहलका’ ने कोलकाता की यात्रा की, और कोलकाता हवाई अड्डे के पास एक और ड्रग पेडलर से मिला, जिसका नाम भी कार्तिक ही था। वह फुटपाथ पर बैठा था और गाँजा बेच रहा था।
रिपोर्टर : है कुछ?
कार्तिक : हाँ।
रिपोर्टर : क्या है?
कार्तिक : गाँजा है।
रिपोर्टर : चरस है, चरस?
कार्तिक : चरस नहीं है।
रिपोर्टर : कोकीन?
कार्तिक : कोकीन, चरस नहीं है। सिर्फ़ यही है।
रिपोर्टर : गाँजा?
कार्तिक : हाँ।
रिपोर्टर : एक पैकेट कितने का है?
कार्तिक : एक 200 (रुपये) का करके है।
रिपोर्टर : एक पैकेट मैं कितना है?
कार्तिक : ये कितना है? मालिक जानता है। हम नहीं जानता है। हम लोग तो पैकेट में करके बेच देता है। हम बेचता है।

अब कार्तिक ने हमें खुले गाँजे और पाउच वाले गाँजे दोनों की दरें बतायीं, जो वह ग्राहकों को बेच रहा है।
रिपोर्टर : 25 ग्राम गाँजा कितने का बताया आपने?
कार्तिक : 600 रुपये का।
रिपोर्टर : 600 रुपये का 25 ग्राम गाँजा, खुला? और ये पैकेट जो है, 200 रुपये का?
कार्तिक : 200 है ये।
रिपोर्टर : दोनों में कितना है?
कार्तिक : वो हम नहीं जानता।

कार्तिक ने अब स्वीकार किया कि वह हर रोज़ कोलकाता हवाई अड्डे के पास बैठता है, और गाँजा बेचता है।
रिपोर्टर : टाइम (समय) क्या है, यहाँ बैठने का?
कार्तिक : आप 12:00 बजे के बाद आइएगा।
रिपोर्टर : दोपहर को 12:00 बजे के बाद? …और रात को कितने बजे तक?
कार्तिक : 6.30 बजे तक।
रिपोर्टर : रोज़ मिलते हो आप यहीं? नाम क्या है आपका?
कार्तिक : हमारा नाम कार्तिक है।

कार्तिक के बाद ‘तहलका’ संवाददाता की मुलाक़ात एक और ड्रग तस्कर चंदू से कोलकाता के नेशनल हाईवे पर हुई। चंदू एक ग्राहक को गाँजा बेचते हुए मिला। उसने तुरन्त हमें गाँजे के पाउच के दाम बताये, जो वह बेच रहा था।
रिपोर्टर : चरस-चरस?
चंदू : चरस नहीं है।
रिपोर्टर : गाँजा?
चंदू : है।
रिपोर्टर : चरस नहीं है?
चंदू : नहीं।
रिपोर्टर : गाँजे की पुडिय़ा?
चंदू : 200 रुपये का दिया है।
रिपोर्टर : गाँजा क्या रेट है?
चंदू : 100 रुपये का है। 20 रुपये का है।

कोलकाता की सडक़ों पर ड्रग तस्करों से मिलने के बाद ‘तहलका’ संवाददाता ने अब कोलकाता की सडक़ों पर गाँजा बेचने वाली एक महिला से बातचीत की। महिला ने ‘तहलका’ को अपना नाम नहीं बताया। लेकिन हमें आश्वासन दिया कि वह जो गाँजा बेच रही है, वह उच्च गुणवत्ता का है, और इसकी क़ीमत भी उचित है। उसने दावा किया कि अगर हम हवाई अड्डे से वही गाँजा ख़रीदते हैं, तो हमें उससे दोगुनी क़ीमत चुकानी पड़ेगी, जितना वह चार्ज कर रही है उससे। उसने आगे ख़ुलासा किया कि उसने शुरू में सोचा था कि हम पुलिस वाले हैं।
महिला तस्कर : 500 रुपये का है गाँजा।
रिपोर्टर : चरस है?
महिला तस्कर : चरस नहीं गाँजा है। अच्छे वाला।
रिपोर्टर : दिखाओ?
महिला तस्कर : ये बहुत अच्छे वाला है। ये एयरपोर्ट (हवाई अड्डे) पर ले जाएगा, 1,000 रुपये का बेचेगा।
रिपोर्टर : हमें बेचना नहीं है, हमें तो अपने लिए चाहिए।
महिला तस्कर : जानता है। हम सोच रहा था पुलिस वाला है, इसलिए नहीं दिखाया। …ये अच्छे वाला है। एक लीजिए, दूसरी बार आओगे यह लेने के बाद।

‘तहलका’ की जाँच में ख़ुलासा हुआ है कि सिर्फ़ बॉलीवुड ही नहीं है, जो नशे की गिरफ़्त में है। फैशन उद्योग सहित अन्य उद्योग भी ड्रग्स के बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए जाने जाते हैं। उद्योगों की बात तो छोडि़ए, मुम्बई और कोलकाता की सडक़ों पर भी ड्रग्स आसानी से मिल जाती है। यह ड्रग्स इसलिए आसानी से उपलब्ध हो जाती है, क्योंकि इसका बाज़ार बहुत विस्तृत है।
शराब और नियमित सिगरेट के विपरीत यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि आपकी बग़ल में खड़ा व्यक्ति नशीली दवाओं के प्रभाव में है, या नहीं। अफ़सोस की बात है कि स्कूली बच्चे भी नशे के आदी हो रहे हैं। इसकी वजह सभी शहरों में आसानी से इसकी उपलब्धता है।
कोलकाता में एक स्थान पर जाँच के दौरान हमने पाया कि ग्राहक पैसे लेकर आ रहे हैं और तस्कर से गाँजा पाउच ख़रीद रहे हैं। बस, बाज़ार से किसी भी प्रकार की ड्रग ख़रीदने के लिए सभी की जेब में अच्छी नक़दी का होना ज़रूरी है।

नशा और चुनौतियाँ

हाल में चंडीगढ़ में मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो की तरफ़ से आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि नशीले पदार्थों के प्रति केंद्र की शून्य-सहिष्णुता नीति बेहतर नतीजे दिखा रही है। उनके मुताबिक, पिछले सात साल के दौरान दर्ज मामलों की संख्या में 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है और गिरफ़्तारियों में 260 फ़ीसदी की। शाह ने कहा कि आज़ादी के 75वें साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नशा मुक्त भारत के आह्वान को अमृत-काल के इस दौर में एक दृढ़ संकल्प में बदलना होगा। गृह मंत्री ने कहा कि सन् 2014 से 2022 के आठ वर्षों में ज़ब्त की गयी ड्रग्स की क़ीमत पिछले आठ वर्षों की तुलना में क़रीब 25 गुना ज़्यादा है। यह अब तक का बहुत अच्छा रिकॉर्ड है। हालाँकि ‘तहलका’ एसआईटी की जाँच में ड्रग पार्टियों की कड़वी सच्चाई के साथ-साथ यह भी पता चलता है कि कोलकाता की सडक़ों पर ड्रग्स कितनी आसानी से उपलब्ध हैं। इस मुद्दे की कवर स्टोरी ‘ड्रग्स की दलदल’ से ज़ाहिर होता है कि न केवल बॉलीवुड नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की चपेट में है, बल्कि फैशन उद्योग सहित अन्य उद्योग भी बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थों के उपयोग के लिए जाने जाते हैं। उद्योगों को भूल जाइए, मुम्बई और कोलकाता की सडक़ों पर ड्रग्स आसानी से उपलब्ध हैं। यहाँ तक कि स्कूली बच्चों को भी इस जाल में फँसाया जाता है; बशर्ते आपकी जेब भारी हो।

जब राजस्व विभाग के ख़ुफ़िया निदेशालय ने गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर ईरान से आ रही भारी भरकम 21,000 करोड़ रुपये की हेरोइन के तीन कंटेनर पकड़े थे, तो इससे हर किसी को बड़ा झटका लगा था। मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो के इस ड्रग भंडाफोड़ मामले ने ख़तरे की घंटी बजा दी; क्योंकि इसने देशव्यापी नेटवर्क का ख़ुलासा किया कि यह डार्कनेट (फ़र्ज़ी कम्यूप्टर नेटवर्क के ज़रिये फाइल शेयर करना) और क्रिप्टो मुद्रा का उपयोग मादक पदार्थों के धन्धे के लिए करता था। नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय दिवस को चिह्नित करने के लिए जारी यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम (यूएनओडीसी) की हालिया विश्व ड्रग रिपोर्ट ने महिलाओं और युवाओं के बीच नशीली दवाओं के उपयोग को चिह्नित किया है। 2022 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 15-64 आयु वर्ग के क़रीब 284 मिलियन लोगों ने ड्रग्स का इस्तेमाल किया, जो पिछले दशक की तुलना में 26 फ़ीसदी ज़्यादा है।

एम्फैटेमिन (निद्रारोग और मोटापे से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा, जिसका लगातार इस्तेमाल इसका आदि बना देता है); औषधीय दवाओं, दर्द निवारक दवाओं, तनाव मुक्ति दवाओं, अनिद्रा की दवाओं, इंजेक्शन से ली जानी वाली दवाओं का ग़ैर-चिकित्सा इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या 45 से 49 फ़ीसदी है। भारत अवैध अफ़ीम उत्पादन के लिए दुनिया में तीन सर्वाधिक बदनाम गोल्डन क्रिसेंट क्षेत्रों (पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान) और तीन गोल्डन ट्रायंगल (म्यांमार, थाईलैंड और लाओस) के बीच घिरा हुआ है, जो हमें इन क्षेत्रों में उत्पादित अफ़ीम के लिए एक गंतव्य और एक पारगमन मार्ग होने के कारण अधिक संवेदनशील बनाता है। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि दुनिया भर में उपयोग की जाने वाली अवैध अफ़ीम में से आधी से अधिक गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र से आती है। अन्य महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय नशीले पदार्थों की तस्करी का मार्ग गोल्डन क्रिसेंट का क्षेत्र है।

‘तहलका’ रिपोर्ट इस बात की याद दिलाती है कि भारत को नशा मुक्त देश बनाने और नशा तस्करी के नेटवर्क को तोडऩे के लिए गुप्त अभियान शुरू करने की तत्काल आवश्यकता है। सवाल यह है कि क्या हमारे पास इस सपने को पूरा करने के लिए कोई योजना है? चरणजीत आहुजा

किसानों की मित्र बने सरकार

किसानों का स्थगित आन्दोलन एक बार फिर सुनामी की तरह लौटने के संकेत मिल रहे हैं। इस बार केंद्र सरकार की वादाख़िलाफ़ी के विरोध में देश भर के किसानों ने हुंकार भरी है और माँगें पूरी न होने पर दोबारा आन्दोलन करने की चेतावनी दी है। अगर किसानों का यह आन्दोलन दोबारा खड़ा होता है, तो शर्तिया केंद्र सरकार की मुसीबतें बढ़ेंगी। क्योंकि एक तरफ़ केंद्र सरकार में ताक़तवर जोड़ी कांग्रेस समेत विरोधी छोटे दलों को ख़त्म करके 2024 में बड़ी जीत के साथ चुनावी समर फ़तह करना चाहती है। वहीं दूसरी तरफ़ जनता में उसके प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा है। जनता में विरोध भरने का काम पहले भी किसानों आन्दोलन ने किया था और अगर अब किसान के विरोध-प्रदर्शन पर उतरे, तो जनता का उन्हें भरपूर समर्थन मिल सकता है।

11 दिसंबर, 2021 को कुछ शर्तों और केंद्र सरकार के वादों के साथ स्थगित हुआ किसान आन्दोलन दोबारा उसी जन-सैलाब के साथ उठ खड़ा होगा, इसकी उम्मीद केंद्र सरकार को अभी भी नहीं है। लेकिन एक डर तो उसे है, कि कहीं किसान उसकी चुनावी रणनीति पर पानी फेरते हुए सत्ता से बाहर न कर दें। केंद्र की सत्ता में क़ाबिज़ भाजपा की मुश्किल यह है कि वह एक तरफ़ जनता का विरोध सह रही है, तो दूसरी तरफ़ कई दल उसके ख़िलाफ़ खड़े हैं। स्थिति यह है कि सरकार पर विरोध करने वालों पर कड़ी नज़र रखने के साथ-साथ ईडी और सीबीआई का सहारा लेने के आरोप लगने लगे हैं। अगर यह आरोप सही हैं, तो यह तरीक़ा असंवैधानिक और अनैतिक ही माना जाएगा।

फ़िलहाल किसानों की चेतावनी के 15 दिन 6 सितंबर को पूरे हो जाएँगे। अगर अब भी केंद्र सरकार ने किसानों की माँगें स्वीकार नहीं कीं तो किसान कितनी ताक़त से दोबारा केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े हो पाते हैं, यह देखना होगा। जानकार ऐसा मान रहे हैं कि सरकार के झुकने की कम ही उम्मीद है। क्योंकि सरकार का मानना यह है कि अब किसान आन्दोलन की कमर टूट चुकी है और वह पहले की तरह कभी खड़ा नहीं हो सकेगा। अर्थशास्त्रियों की चिन्ता यह है कि अगर किसान आन्दोलन दोबारा शुरू हुआ, तो इस बार अर्थ-व्यवस्था की हालत बहुत ही पतली हो जाएगी और लोगों को जीवन जीने में दिक़्क़तें पैदा होंगी। सरकार का क्या है, वह तो अपनी ग़लतियों का ठीकरा किसान आन्दोलन पर फोड़ देगी। कुछ लोगों का मानना है कि संयुक्त किसान मोर्चा में मतभेद और दो-फाड़ से साफ़ है कि अब आन्दोलन पहले की तरह नहीं चल सकेगा।

ज्ञात हो कि किसान आन्दोलन को स्थगित हुए एक साल होने वाला है। लेकिन केंद्र सरकार ने अपने वादों को अभी तक नहीं निभाया है। अब न्यूनतम समर्थन मूल्य, क्रॉप डायवर्सिफिकेशन और जीरो बजट फार्मिंग को लेकर केंद्र द्वारा बनायी गयी समिति की पहली बैठक के दिन ही संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनीतिक) ने सरकार के विरोध में एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है। किसानों के सिर उठाते ही केंद्रीय गृह मंत्री अजय मिश्रा उर्फ़ टेनी की बौखलाहट एक बार फिर सामने आ गयी है। भाजपा नेता टेनी की बौखलाहट का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने किसानों की तुलना कुत्तों से तक कर डाली। इससे किसानों में आक्रोश है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि किसानों द्वारा जब दिल्ली में किसान आन्दोलन स्थगित किया गया था, तब सरकार ने जो वादे किये थे, उन वादों को सरकार ने जल्द-से-जल्द पूरा करने के बजाय विश्वासघात किया है। इसी के चलते 22 अगस्त, 2022 को क़रीब 19-20 राज्यों के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्रित होकर सरकार को अपनी ताक़त का नमूना पेश किया और वादे पूरे करने का 15 दिन का समय दिया।

किसानों ने साफ़ कर दिया है कि अगर सरकार उनकी माँगों को लेकर गम्भीर नहीं हुई, तो इस बार पूरे देश के किसान दिल्ली पहुँचकर आन्दोलन करेंगे। हालाँकि सरकार का कहना है कि उसने एमएसपी पर समिति का गठन कर दिया है; लेकिन इस समिति के गठन से किसान ख़ुश नहीं हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने ऐसा एक भी सदस्य समिति में नहीं रखा है, जो किसानों के हित में निष्पक्ष काम कर सके।

हालाँकि संयुक्त किसान मोर्चा में भी अन्दरख़ाने राजनीति होने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मतभेद उभरकर सामने आएगा, ऐसी सम्भावना कम ही दिखती है। क्योंकि संयुक्त किसान मोर्चा में फ़िलहाल 40 संगठन एकजुट रहे हैं। हालाँकि समिति में जाने को लेकर उनमें तनातनी रही है। रही अजय मिश्रा उर्फ़ टेनी के विरुद्ध सरकार के कार्रवाई करने की बात, तो इन दिनों उत्तर प्रदेश में अपने बदज़ुबान नेताओं पर शिकंजा कसने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार अपने इस बदज़ुबान नेता के विरुद्ध भी कार्रवाई करेगी? सरकार यह भी कह सकती है कि उसने तो एमएसपी निर्धारण के लिए समिति बना दी है। इस पर सरकार से पूछा जा सकता है कि उसने समिति कब बनायी? क़रीब साढ़े सात महीने बाद। क्या यह सब कुछ दिलासा नहीं है, जिसका उपयोग आन्दोलन को ठण्डा करने के लिए ही किया गया है। ऐसे में सरकार किसानों की माँगें मानती है या नहीं, इसका जवाब भले ही मिल जाए, पर अगर इस बार किसान आन्दोलन खड़ा हुआ, तो उसके समाप्त होने का जवाब किसी के पास नहीं होगा।

किसानों की प्रमुख माँगें
1. फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को स्वामीनाथन आयोग के अनुरूप सी2+50 फ़ीसदी फार्मूले के हिसाब से लागू किया जाए।
2. लखीमपुर खीरी मामले के पीडि़त किसान परिवारों को इंसाफ़ मिले। मुख्य आरोपी को जेल भेजा जाए और उसके पिता व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय शर्मा उर्फ़ टेनी को बॉर्खास्त करके गिरफ़्तार किया जाए।
3. जेलों में बन्द किसानों को छोड़ा जाए। उन पर दर्ज मुक़दमे वापस लिये जाएँ।
4. देश के सभी किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया जाए।
5. बिजली संशोधन विधेयक 2022 रद्द किया जाए।
6. गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए और गन्ने की बक़ाया राशि का भुगतान तत्काल
किया जाए।
7. प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के तहत किसानों के बक़ाया मुआवज़े का भुगतान तुरन्त किया जाए।
8. भारत विश्व व्यापर संगठन (डब्ल्यूटीओ) से बाहर आये और सभी मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द किया जाए।
9. अग्निपथ योजना वापस ली जाए।

नशे की गर्त में गुलाबी शहर

खुलेपन की आँधी ने भले ही नैतिकता को नेस्तनाबूद कर दिया हो; लेकिन महानगरों में खिलते, महकते कैसीनो, बार डांस क्लब, नशा फ़रोख़्त करते हुक्का बार और बेहयाई की नुमाइश करने वाले रेव पार्टियों के ठेकेदार पूरी तरह निहाल हो गये हैं। यहाँ नयनसुख का निवेश अंशधारियों के लिए हर पल मुनाफ़े का महाकाव्य रचयिता नज़र आ रहा है। केंचुल की तरह बदलते रिश्तों के कैक्टस और नागफनी को आँचल में छिपाये जादूगरनियों की अन्तहीन तलाश का सफ़र ख़त्म होता नज़र नहीं आता। इंची टेप से नपा हुआ सौंदर्य ब्रह्मपुत्र की तरह छलांगता-उछलता नज़र आता है। अंतरंगता कब अलगाव में बदल जाए? यहाँ गुमान तक नहीं होता। यहाँ आने वाली सिंदूरी महिलाओं में पति की लंपटता का गरल पीने की ग़ज़ब क्षमता है, तो इसलिए कि वे इससे अपनी दीदा-दिलेरी के ख़्वाब सँजोती हैं, तब दाम्पत्य जीवन की शाख पर ‘आई लव यू मोर’ मार्का एक नया उल्लू बोलने लगता है। उच्च-मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग में ऐसे कितने अफ़साने रचे जाते हैं? इसका पता तो तब चलता है, जब अफ़साने अख़बारी सुर्ख़ियों में ढलते हैं।

20 अगस्त को जयपुर के जयसिंहपुरा खोर के एक इलाक़े में एक फार्म हाउस पर जवाँ होती रात में जब रेव पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त सुलेल चौधरी की अगुवाई में छापामारी के साथ 13 युवतियों समेत इवेंट आयोजक नरेश मल्होत्रा मानवेन्द्र सिंह और मनीष शर्मा को गिरफ़्तार किया। पुलिस दस्ते में शामिल क्राइम ब्रांच के पुलिस निरीक्षक ख़लील अहमद ने बताया कि पार्टी के लिए लड़कियाँ नेपाल और दिल्ली से बुलायी गयी थीं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि युवतियाँ नशे में ग़ाफ़िल कैसीनों के गिर्द झूमते लोगों का ध्यान बँटाकर रक़म ऐंठने की कोशिश में थी। दिलचस्प बात है कि इस पार्टी में कर्नाटक के एक पुलिस अधिकारी को भी शामिल पाया गया। पुलिस ने यहाँ से दारू के बेहिसाब कंटेनर और हुक्के बरामद किये। इससे पहले एक घटना का हवाला दें, तो अजमेर रोड स्थित बाईपास पर एक रिसोट्र्स से पुलिस ने देर रात में देहाचार में मस्त जिन युवतियों को घेरे में लिया, उनमें अभिजात्य परिवारों की सात लड़कियाँ भी थीं। इनमें दो आईएएस की तैयारी कर रही थीं और पाँच अन्य बीए, एमए थीं।

इन घटनाओं पर इरा त्रिवेदी द्वारा लिखित पुस्तक ‘इंडिया इन लव’ की याद ताज़ा हो जाती है। जयपुर हो या कोई और महानगर विभिन्न स्थानों पर सप्ताहांत में स्वर्गिक आनन्द लेने के लिए इस तरह की पार्टियों का आयोजन किया जाता है- ‘ठिकाने फार्म हाउस भी होते हैं, तो बार क्लब भी होते हैं। इन पार्टियों में जिनमें युवा, सम्पन्न और फैशनेबल लोग शामिल होते हैं। एक नयी उप-संस्कृति पैदा की है, तो लगभग जीवन का अंग बन गयी है। समृद्ध नोजवान और कुछ चर्चित लोगों की फार्म हाउसों तथा क्लबों की पार्टियाँ में अब कोकीन का इस्तेमाल भी शामिल हो गया है। कमाल की बात है कि कोकीन का सेवन हाई प्रोफाइल लोगों का स्टेटस सिंबल हो गया है। कहते हैं कि कोक के इस्तेमाल से पार्टियाँ जवाँ हो उठती है। संगीत, कोक, वोदका शॉट्स, डांस फ्लोर सब कुछ नशे की मस्ती में समा जाता है। महँगी शराब और कोक से मिलने वाली ऊर्जा और मौज़-मस्ती यह तय कर देती है कि पार्टी क्षितिज पर सूरज आने के साथ ही ख़त्म होगी।’
बेशक पुलिस अभी कोक के इस्तेमाल का ख़ुलासा करने में चुप्पी साधे हुए है। लेकिन सूत्र कहते हैं कि कुछ लोग सम्भोग क्षमता बढ़ाने के लिए इसमें एक्सटेंसी भी मिला देते हैं। सूत्र कहते हैं कि इस खेल में शामिल बड़ी हस्तियों में रसूख़दार लोग और लेखक भी शामिल होते हैं। बहरहाल पुलिस की तफ़्तीश अभी जारी है। तहक़ीकात से इस खेल के सौदागरों में एक सम्पन्न तबक़े के तंत्र का ख़ुलासा हो सकता है। सोशल मीडिया ने ‘लाइक्स’ की ओट में खुलेपन के इतने दरवाज़े खोल दिये हैं कि नैतिक बोध की चादर ओढ़े सेक्स का उन्मुक्त आचरण अब चौंकाता नहीं।

मित्रों मरजानी की कथा की नायिकाएँ यहाँ क़दम-क़दम पर नज़र आती हैं, जो अपनी देह से सन्तुष्ट और देह की तुष्टि चाहती हैं। अपनी देह को देखकर वे आत्ममुग्ध हैं। यहाँ आधुनिक सोच वाली नारी की इच्छाओं आकांक्षाओं, उसके तार्किक सपनों और तेवरों को मनोयोग पूर्वक लाने की कोशिशें ठिठकने को प्रेरित करती हैं। साड़ी में पूरी तरह ढकी औरतें भी मुस्कान से इच्छा जगाती लगती हैं। कभी भी लगता है कि यह एक मांस का बाज़ार है और इच्छाओं के नग्न नृत्य की नुमाइश हो रही है। अश्लीलता और निर्लज्जता की मार्केटिंग के ख़िलाफ़ क़दम उठाये जाने की इच्छा के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी को लामबंद नहीं करने देती। अनेक दृश्य तो बेहद लुभावने लगते हैं। मॉल्स की सीढिय़ाँ चढ़ते समय कसी हुई साड़ी के नीचे अनायास होने वाली नितंबों की लययुक्त थिरकन किसी दक्ष नृत्यांगना की सायस की जाने वाली आकर्षक नृत्य मुद्राओं से भी ज़्यादा लुभावनी लगती हैं।

मित्रता की दूरी तो हर पल दैहिक दूरी को लाँघती नज़र आती है। वर्जनाओं को तोडऩे वाला फैशन यहाँ बख़ूबी नज़र आता है। बेढंगे क़िस्म के तमाम रंग आकृतियों और कपड़ों का मेल गेटिंग अप आफ्टर सैक्सफील की मादकता में महकती तथा पट्टियों से युक्त बिकनी टॉप और जोफ स्ट्रेप्स सलवार सरीखा लिबास तो साफ़-साफ़ झटके देता है। यह छवियों का मायावी संसार है, जहाँ सजने-सँवरने के तमाम बुज़ुर्ग साधनों को नकार कर मध्यम वर्गीय कन्याएँ अपनी देह को अनावृत करती नज़र आती हैं। लोगों की आर्थिक स्थिति का प्रभाव यहाँ लोगों के आचरण आपसी सम्बन्धों और देह की भाषा में साफ़ नज़र आता है।

कहना ग़लत नहीं होगा कि आधुनिकता में बढ़ते पुट और पाश्चात्य प्रभाव में भारतीय जीवनशैली को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्त्री-पुरुष के यौन व्यवहार और प्राथमिकताएँ बदल गयी हैं। अब दोस्ती और प्रेम के इज़हार के लिए ठिकानों की तलाश मुश्किल नहीं है।

आइए, आपको एक ऐसे ही ठिकाने का नज़ारा करवाएँ, जहाँ सुरमई उजालों और चम्पई अँधेरों में महकती है- गुलाबी नगर की गुलाबी रातें। धज्जी भर कपड़ों में उफनते मादक जिस्म तेज़ बजते रीमिक्स की धुन पर थिरकते कम हैं, सुलगते तंदूर की-सी बेचैनी ज़्यादा दर्शाते हैं। दो पल के लिए उनके क़दम थमते भी हैं, तो टकीला गटकने और नींबू-नमक चाटने के बाद फिर अलोकिक मुद्रा में आ जाते हैं। हॉट स्पॉट पर गहमागहमी भरे माहौल में झिलमिल टॉप पहने देह को करिश्माई तरीक़े से लचकाती कमनीय बालाएँ छक कर मस्ती के मूड में नज़र आती हैं। औरत होने का भरपूर आनन्द लेने वाली ये लड़कियाँ जयपुर को जीवंत करती लगती हैं। यही है गुलाबी नगर की नाइट लाइफ।

गुलाबी नगर की गुलाबी रातों का यह मंज़र तक़रीबन सभी डिस्कोथेक में एक जैसा है। अब वो दिन लद गये, जब सप्ताहांत पर लोगों का मूड लतीफ़ेबाज़ी का होता था, अब उन्हें उत्तेजना का कैप्सूल चाहिए। मल्टीनेशनल्स में भारी-भरकम पैकेज से निहाल हुए यंगस्टर्स को वीकेंड की इन पार्टियों का बड़ी बेक़रारी से इंतज़ार रहता है। अव्वल तो पारम्परिक सोच वाले लोग यहाँ आते ही नहीं। इत्तेफ़ाक़ से आ भी जाएँ, तो वीतरागी होने का ढोंग करने की बजाय उन्हें उन्मत्त देह की भाषा समझ में आने लगती है; जो गुलाबी होठों और नशीली निगाहों से छन-छनकर झरती है कि स्त्री शरीर तो प्रकृति की सुंदरतम् कृति है। इसके अनावरण का शोक कैसा? हालाँकि कहने को इन डिस्कोथेक में कपल्स को ही इजाज़त है। लेकिन वीक एंड की मस्त रातों का बेसब्री से इंतज़ार करने वाले सिद्धार्थ की मानें, तो अकेले जाने का इंतज़ाम भी हैं। वह कहते हैं कि वहाँ बहुत-सी लड़कियाँ मिल जाती हैं, जिन्हें जोड़ीदार की तलाश रहती है। ऐसे जोड़ीदार की, जो उन्हें अफोर्ड कर सके। यानी जो उनके पीने-पिलाने का ख़र्च बर्दाश्त कर सके और जो उनकी बाहों-में-बाहें डालकर उनकी रात को मस्त बना सके। उनसे सिर्फ़ इतना भर कहना होता है कि क्या आप अकेली हैं? वे हामी भरती हैं, तो अगला सवाल होता है कि क्या आप को किसी का इंतज़ार है? लेकिन उनकी खिलखिलाती बेसाख़्ता हँसी ही इसका जवाब होती है कि वे तैयार हैं।

इन डिस्कोथेक्स में सिर्फ़ यंगस्टर्स ही आते हों, ऐसा नहीं है। एक प्रतिष्ठित कारोबारी की मानें तो यहाँ व्यावसायिक रिश्ते भी बनते हैं। यहाँ सोशलाइट्स भी आती हैं, तो धनकुबेर और आर्ट तथा लेखन की दुनिया में खोये-खोये से लोग भी जो बड़े बिंदास अंदाज़ में व्हिस्की गटकते हैं; लेकिन उनकी मखमूर निगाहें नारी देह की गहराइयों में डूबती नज़र आती है। आनंद का यह कारोबार इतना ख़र्चीला है कि हज़ारों रुपये तो सिर्फ़ अन्दर दाख़िल होने के लगते हैं, फिर फ्लोर पर जोशीले जुनून के साथ थिरकने के लिए महँगी शराब गटकना और एक-दूसरे का बदन बाहों में पिरोकर आनंद की बुलंदियों तक पहुँचने का सफ़र कुबेरों को ही रास आ सकता है।

आनंद से सराबोर सुमित बताते हैं कि यहाँ नाइट आउट के मौक़े नहीं के बराबर हेाते हैं; लेकिन कभी कभी केजुअल मुलाक़ातें ज़िन्दगी में नया रंग भी घोल देती है। क्या जोड़े भी बदलते हैं? इस सवाल पर वे कहते हैं कि किसी-किसी में ख़ास आकर्षण जोडिय़ाँ बदलने के हालात पैदा कर सकता है। लेकिन इससे कोई बदतर हालात दरपेश हुए हों, ऐसा कुछ मैंने नहीं देखा। अलबत्ता मर्दों की निगाह में उठने के लिए नपा-तुला खाकर इंच टेप पर सधे शरीर की नुमाइश के लिए तैयार किये गये भडक़ाऊ जिस्म देखना कोई नई बात नहीं है। वीक एंड की सुरमई रातों में पार्टियों की जान और शान बनने वाली इन बालाओं में भारी-भरकम पैकेज पर मल्टीनेशल्स में करेाड़ों के वारे-न्यारे करने वाली हस्तियाँ भी होती हैं। यह अलग बात है कि बेहद कामयाब प्रोफेशनल्स को पार्टियों के बीच मिनी स्कर्ट और लाइक्रा में पहचानना मुश्किल होता है। एक मल्टीनेशनल की सीओ मोनिका ठुमकती सी कहती है, यहीं तो देखने को मिलता है, अधेरे में जगमगाती ज़िन्दादिली का आलम।

एक बड़े कारोबार से जुड़ी रिद्धिमा कहती हैं कि हर रोज़ 16 घंटे काम करने के बाद कुछ तो राहत चाहिए। वीकएंड की जवाँ जगमग रातें थकी ज़िन्दगी में मस्ती घोल देती है। एक नामवर महिला पत्रकार यह कहती हैं कि तो ग़लत क्या है? जयपुर सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा का शहर ही नहीं है, मुम्बई की तरह मस्त शहर बनता जा रहा है; लेकिन उनके लिए वो कामयाब हैं; पैसा जिनकी मुट्ठी में रिसता है।

धुँधली-सी सकुचाती रोशनी में उन्मुक्त यौवन की चकाचौंध में गिलासों की खनक के बीच बहती मदिरा में डुबकियाँ लगाते दीपक घोशाल एक कामयाब व्यवसायी बड़े बेबाक लगते हैं। उनका कहना है कि यहाँ मैं सब कुछ भूल जाता हूँ। अपने हफ़्ते भर का तनाव, सारी परेशानियाँ, यहाँ तक कि ख़ुद को भी भूल जाता हूँ। अपनी महिला मित्र को भींचते हुए कहा कि हम दोनों संगीत की लय और थिरकन में पूरी तरह बँध जाते हैं। नयी पीढ़ी की इस बहुरंगी ज़िन्दगी के बेशुमार रंगों में झपकी भी घुली हुई है, तो तृष्णा भी, यह अलग बात है कि यह सातवाँ रंग एकाएक नज़र नहीं आता। लेकिन अरिंदम कहते हैं कि ‘अगर ऐसी रंगीली रातें न हों, तो पाँच दिन तक काम करने का हमारा जेाश ही ग़ायब हो जाए। जानी-मानी पेंटर टीना कहती हैं कि हमें कोई तितलियाँ न समझे, हम बख़ूबी डंक भी मारना जानती हैं।

रतोंधी सरीखी इन रातों में भले ही संयम और संस्कार टूटते हैं; लेकिन अक्सर यहाँ आने वाले डायमंड के कारेाबार से जुड़े विक्की की मानें, तो इसे कामुकता नहीं कहा जा सकता। वह कहते है कि भला यह कोई वर्जित क्षेत्र है? यहाँ बदनाम खुलापन नहीं, बल्कि ऐसा खुलापन है, जो एक नयी और शानदार दुनिया से रू-ब-रू कराता है। हॉट स्पॉट पर आने के बाद देह और मन अपने आप स्वच्छंद हो जाता है। इस सवाल पर कि क्या यहाँ का माहौल अतृप्त इच्छाओं को गुदगुदाता है? क्या मर्यादाओं को तोड़ता है?

उनकी गर्लफ्रेंड तृप्ति बड़ी बेबाकी से कहती है कि अगर यही मर्यादा है, तो यह तो बाग़-बग़ीचों से लेकर, ईटिंग ज्वाइंट्स …और टूरिस्टों के डेन में सभी जगह टूट रही है। यहाँ नियमित आने वालों में यायावरी लेखक रॉबर्ट कहते हैं, फणीश्वरनाथ रेणु ने ऐसे रिश्तों को लेकर एक पूरा विमर्श बुना है। उस जमाने में क्या लोग वर्जित क्षेत्र की देहरी पर नहीं पहुँचे थे? क्या तब लोगों के बीच यौनाकर्षण नहीं था? फ़र्क़ था, तो सिर्फ़ इतना कि सब कुछ ढका-छिपा था। ढकने से तो किसी भी ढकी चीज़ में सड़ांध भर जाती है। इस खुलेपन ने इस सदियों की सड़ांध को ख़त्म कर दिया है, तो क्या ग़लत किया है? आज तो तथाकथित महिला पत्रिकाएँ गर्भवती स्त्रियों के पेट को भी फैशन स्टेटमेंट की तरह दिखा रही है।

फ़िल्मों ने तो सब कुछ उघाडक़र रख दिया है। कपड़े उतारकर नंग-धडंग हेाती अभिनेत्रियों के सैक्सी उतावलेपन से यह माहौल ज़्यादा अच्छा है। यहाँ मादकता की महक है और बन्धनों की बेहूदा केंचुल उतारने की जोशीली ख़्वाहिश है। रहा सवाल शिकारी क़िस्म के लेागों का, तो यह नस्ल तो कहाँ नहीं है? यह थकाऊ मशक़्क़त के बाद राहत और मौज़-मस्ती के लम्हे खोजने वाले कामयाब लोगों की दुनिया है, ताकि जिस्म को फिर से रिचार्ज किया जा सके। जब हमें विराट सफलता की तलछट मिल सकती है, तो दहकते जिस्मों का रेशमी अहसास क्यों नहीं?

झूमते माहौल से फुर्सत पाये लम्हों में वोदका का एक लम्बा सिप लेती नियति को सनसनी बेहद पसन्द है; लेकिन वे यह कहते हुए निरुत्तर कर देती है कि क्या यह माहौल फ़िल्मों के आइटम डांस से बुरा है। लेकिन कोई अंधी भड़ास निकाले तो क्या किया जा सकता है। उनका सवाल बेहद चुभता है कि स्त्री प्रधान फ़िल्मों में अभिनेत्रियों को नंगी टांग अड़ाने का अधिकार मिल सकता है, तो यहाँ खुलासन तो है; लेकिन कम-से-कम खोखलापन तो नहीं है। इस औघड़ दौर में कोई अभिनेत्री कपड़े उघाडक़र सितारा बन सकती है, तो डिस्कोथेक भी एडवांसमेंट और लाइफ की नयी नस्ल है, जो निराली है, तो नशीली भी है। अब उन त्रस्त आत्माओं को तो कुछ नहीं कहा जाता, जो जिस्म की नदी में कूदना तो चाहते हैं; लेकिन रस्म अदायगी की तरह। यहाँ है न रस्में, न क़समें हैं, बस मस्ती की उफनती झील है, जिसमें तैरने को हर कोई बेताब है। कम-से-कम यहाँ स्वाभाविकता को खोकर रिश्तों को ढोने की बेबसी तो नहीं है?

इन डिस्कोथेक में केवल रूमानियत ही नहीं महकती। अक्सर होने वाली उद्योगपतियों की पार्टियों का भी एक जुदा रोशन चेहरा होता है। इनमें फ़िल्मी सितारे भी होते हैं, तो कामयाबी के आकाश में उड़ान भरने वाले व्यावासयिक घरानों के लोग भी। अलबत्ता यह कहना मौजूँ होगा कि वक्ष-दर्शना बालाएँ और नाइट लाइफ की मादक मस्तियाँ यह दर्शाने को का$फी है कि अब जयपुर में भी यौन क्रान्ति बुरी तरह धधक रही है।

जयपुर कितना बदला है? यह इसी बात से ज़ाहिर है कि कभी मुजरों में महकते गुलबदन अब नज़र नहीं आते, शास्त्रीय संगीत अब सुकून की नहीं नफ़ासत की नुमाइश का ज़रिया बन गया है। बाग़-बग़ीचे अब प्यार-गाहे बन गयी हैं। जहाँ 36 बने जोड़े कौतूहल नहीं जगाते। ईटिंग ज्वाइंट्स खाने-पीने से कहीं ज़्यादा दिलबर की बाहों में खोये रहने के डेस्टिनेशन बन गये हैं। महँगे होटलों या फिर पाँच सितारा सैरगाहों में लडक़े लड़कियाँ यहाँ तक कि किटी पार्टी खेलने वाली गृहणियाँ भी रेन डांस के नाम पर कृत्रिम बारिश में भीगती थिरकती नज़र आती हैं। इनके आयोजक कहते हैं कि बेशक इनमें का$फी लोग आते हैं। इसे कारोबारी नज़रिये से नहीं देखा जाना चाहिए।
यह बदलते जयपुर की सूरत है, जहाँ यंगस्टर्स को इसी में राहत मिलती है। डांस फ्लोर पर अधेड़ उम्र के लोगों की भी कमी नहीं है। लेकिन सब कुछ अजीब तो तब लगता है, रिश्तों की बंदिशों से दूर माँ-बेटियाँ भी बारिश में थिरकती नज़र आती हैं। इसके बाद आपत्ति उठाने की कौन-सी बात रह जाती है।

बँटवारे की माँग

भाषा और जनसंख्या के आधार पर अलग राज्य की माँग कर रहे कई राज्यों के लोग

हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर अलग मिथिला राज्य बनाने की माँग को लेकर मिथिलांचल के लोगों ने धरना प्रदर्शन किया। मैथली भाषा संविधान की अष्टम अनुसूची में दर्ज है और उत्तरी बिहार और झारखण्ड के एक हिस्से में अलग मिथिला राज्य की माँग काफ़ी पहले से रही है। मिथिला ही नहीं देश भर में एक दर्ज़न के क़रीब अलग राज्य की माँगें हैं और इन्हें लेकर आन्दोलन भी चल रहे हैं।

अगस्त में संसद के सत्र के दौरान सरकार ने भले कहा था कि फ़िलहाल उसका नये राज्य बनाने का अभी कोई इरादा नहीं है, वरिष्ठ भाजपा नेता उमेश कट्टी, जो कर्नाटक सरकार में केबिनेट मंत्री भी हैं; ने कुछ समय पहले दावा किया था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में 50 राज्य बनाने का फ़ैसला किया है। उनके मुताबिक, मोदी इस पर विचार कर रहे हैं। देखें तो भारत में राज्यों का गठन भाषा के आधार पर हुआ था और वर्तमान में जिन राज्यों में अलग राज्य बनाने की माँग उठ रही है, वह भी भाषा के आधार पर ही रही है। यह माना जाता है की बड़े राज्यों की अपेक्षा छोटे राज्य बेहतर विकास करते हैं। हालाँकि राज्यों का बँटवारा वहाँ की स्थितियों पर भी निर्भर करता है। देखें तो उत्तर से लेकर दक्षिण और पश्चिम तो उत्तर पूर्व तक अलग राज्यों की माँग चल रही हैं। वैसे हाल के दशकों में देखा गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल अपने राजनीतिक लाभ के हिसाब से अलग राज्यों को लेकर अपना रुख़ रखते रहे हैं।

वर्तमान में देश में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। देश की आज़ादी के समय भारतीय भूभाग में मौज़ूद 565 रियासतों का एकीकरण कर राज्यों का गठन किया गया था। तब देश में 17 राज्य बनाये गये थे। इसके बाद समय-समय पर पुनर्गठन के ज़रिये नये राज्य बनाये जाते रहे हैं। ख़ासतौर पर भाषाई आधार पर बँटते-बँटते 65 साल में 28 राज्य हो गये हैं। देश में आख़िरी बार 2019 में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर दो केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू कश्मीर और लद्दाख़ बनाये गये थे।

‘तहलका’ की जुटायी जानकारी के मुताबिक, गृह मंत्रालय के पास आज की तारीख़ में राज्यों का पुनर्गठन कर अलग राज्य बनाने की माँग वाले एक दर्ज़न से ज़्यादा प्रस्ताव लम्बित हैं। राज्यों का मसला काफ़ी संवेदनशील भी है, क्योंकि एजेंसियों के इनपुट्स के मुताबिक ही इसका फ़ैसला होता है। कारण है देश की सुरक्षा और अस्थिरता का रिस्क, ख़ासकर सीमावर्ती राज्यों में। पहले बात हरित प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) की माँग की। इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छ: मंडलों आगरा, अलीगढ़, बरेली, मेरठ, मुरादाबाद और सहारनपुर के 22 ज़िलों को जोडक़र अलग राज्य की माँग है। दिसम्बर, 2009 में तब प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अलग हरित प्रदेश के गठन का समर्थन कर चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में ही पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) की भी माँग है। उत्तर में नेपाल, पूर्व में बिहार, दक्षिण में मध्य प्रदेश के बघेलखण्ड और पश्चिम में उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से घिरे क्षेत्र हैं। यहाँ सबसे ज़्यादा भोजपुरी बोलने वाले लोग हैं और 23 लोकसभा और 117 विधानसभा क्षेत्र इस इलाक़े के तहत पड़ते हैं।
दक्षिणी गुजरात में अलग सौराष्ट्र राज्य की माँग है और इसके लिए आन्दोलन सन् 1972 में ही शुरू हो गया था। सौराष्ट्र संकलन समिति, यह आन्दोलन कर रही है और सौराष्ट्र क्षेत्र के 300 से अधिक संगठन उसके साथ हैं। समिति का आरोप रहा है कि सौराष्ट्र काफ़ी अविकसित क्षेत्र है और अलग राज्य बनकर ही वह विकास कर सकता है। वहाँ पानी की सुविधाओं के अलावा रोज़गार मुख्य माँग है और बड़ी संख्या में क्षेत्र के युवा रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों को पलायन करते हैं। सौराष्ट्र क्षेत्र में गुजरात के अन्य हिस्सों के विपरीत भाषा भी भिन्न है।

पूर्वी महाराष्ट्र में विदर्भ, जिसमें अमरावती और नागपुर सम्भाग शामिल हैं, के लिए अलग राज्य की माँग है। सन् 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम में विदर्भ बॉम्बे स्टेट में शामिल था। बाद में राज्यों के पुनर्गठन आयोग ने नागपुर को राजधानी बनाकर अलग विदर्भ राज्य की स्थापना की सिफ़ारिश की; लेकिन इसे महाराष्ट्र में शामिल कर दिया गया। महाराष्ट्र का गठन 1 मई, 1960 को किया गया था।उत्तरी असम में पुनर्गठन करके अलग बोडोलैंड राज्य की माँग तो बहुत लम्बी है। इसके लिए बड़ा आन्दोलन हो चुका है। आन्दोलन के ही कारण केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो लिबरेशन टाइगर्स फोर्स के बीच 10 फरवरी, 2003 को एक समझौता हुआ जिसके बाद बोडो-बहुल चार ज़िलों के 3,082 गाँवों में शासन व्यवस्था को बेहतर तरीक़े से चलाने के लिए बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद् (बीआरसी) गठित की गयी।

बोडो राज्य की माँग को लेकर आन्दोलनकारियों ने हिंसक आन्दोलन चलाया था, जिसमें बड़ी संख्या में लोग भी मरे। बोडो आदिवासी इलाक़ों को अलग राज्य बनाने का यह आन्दोलन आज भी है। बिहार में मिथिलांचल की माँग भाषाई आन्दोलन के समय से है। मैथिली भाषा बोलने वाले उत्तरी बिहार और उससे सटे झारखण्ड राज्य के इलाक़ों को मिलाकर मिथिलांचल बनाने की माँग अब फिर तेज़ी पर है। मैथिली भाषी लोगों की बात की जाए, तो सात करोड़ से अधिक लोग मैथली बोलते हैं। हाल में दिल्ली में भी इस माँग को लेकर धरना-प्रदर्शन लोगों ने किया। यह लोग उत्तरी बिहार और झारखंड के मैथिली भाषा बोलने वाले ज़िलों को जोडक़र मिथिलांचल की माँग कर रहे हैं।
उत्तरी पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड की माँग भी काफ़ी पुरानी है। पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में दार्जिलिंग पहाडिय़ों के निवासी गोरखा (नेपाली) हैं और अलग राज्य की माँग उठाते रहे हैं। इस आन्दोलन और माँग के पीछे कारण स्थानीय लोगों की जातीय-भाषाई-सांस्कृतिक भावना है। वैसे क्षेत्र को अलग प्रशासनिक क्षेत्र की मान्यता की माँग 1907 में ही हो गयी थी। गोरखालैंड को अलग राज्य बनाने का बड़ा आन्दोलन 80 के दशक में शुरू हुआ, जब सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने हिंसक आन्दोलन किया।

दक्षिणी तमिलनाडु में कोंगूनाडू की माँग क्षेत्रीय भेदभाव से उपजी माँग है। पश्चिम तमिलनाडु, दक्षिण कर्नाटक और केरल के मध्य-पूर्व के इलाक़ों को एक करके कोंगूनाडु (कोंग देशम) राज्य की माँग कई बार उठ चुकी है। राज्य की अर्थ-व्यवस्था का घर कहलाये जाने वाले कोंगूनाडू क्षेत्र को अलग राज्य बनाने के लिए कोंगूनाडु मक्कल देसिया काची, कोंगू वेल्लाला ग्वार्थवर्गाल पेरावईम, तमिलनाडु कोंगू इलाग्नार पेरावई जैसे संगठन सक्रिय हैं।

कर्नाटक में दो नये राज्य बनाने की माँग के लिए भी आन्दोलन हुए हैं। कर्नाटक के गोवा से सटे तुलु भाषी क्षेत्र में तुलुनाडु के नाम से अलग राज्य की लोगों की माँग है। उधर कर्नाटक में ही दक्षिण-पश्चिम इलाक़े को कुर्ग राज्य बनाने की माँग होती रही है।
जम्मू-कश्मीर से 5 अगस्त, 2019 को धारा-370 हटाने के बाद देश में एक राज्य कम हो गया। जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्ज़ा ख़त्म हो गया और इसे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ नाम से दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया। देश में दिल्ली, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दमन और दीव, चंडीगढ़, पुडूचेरी भी अन्य केंद्र शासित प्रदेश हैं। इनमें से कई पूर्ण राज्य की माँग करते रहे हैं।

नये राज्य नहीं : केंद्र
केंद्र सरकार का फ़िलहाल कहना है कि देश में अब राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या नहीं बढ़ायी जा रही है। ज़ाहिर है नये राज्य बनाने की माँग को लेकर हो रहे आन्दोलनों को इससे झटका लगा है। संसद के मानसून सत्र में लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य अदूर प्रकाश ने देश में नये राज्यों के गठन को लेकर एक सवाल पूछा था। इस सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन को बताया कि ऐसा कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। राय ने कहा- ‘नये राज्यों के निर्माण के लिए विभिन्न संगठनों, समुदायों या मंचों से सरकार को प्रस्ताव या आग्रह मिलते रहते हैं। फ़िलहाल ऐसा कोई भी प्रस्ताव सरकार के पास नहीं है।’

“जनसंख्या में वृद्धि के मद्देनज़र मैं व्यक्तिगत रूप से नये राज्यों के गठन के विचार का समर्थन करता हूँ। कर्नाटक से दो राज्य, उत्तर प्रदेश से चार, महाराष्ट्र से तीन और इसी तरह के अन्य राज्य बनने चाहिए। नया उत्तर कर्नाटक राज्य गठित करने का सपना भी जल्द साकार होगा और देश में आने वाले तीन साल में राज्यों की कुल संख्या 50 हो जाएगी।’’
उमेश कट्टी
कर्नाटक के मंत्री का दावा

टोल की पोल

उत्तर प्रदेश में बने कई टोल प्लाजा पर नहीं है कैश लाइन 7 नक़दी देने पर वसूला जाता है दोगुना टोल टैक्स

हरियाणा में टोल प्लाजा पर टैक्स की अनाप-शनाप वसूली के चलते वहाँ किसानों और स्थानीय लोगों ने टोल प्लाजा का इतना विरोध किया कि कई बार सरकार को टोल प्लाजा बन्द करने पड़े। लेकिन उत्तर प्रदेश में टोल प्लाजा पर लूट का खेल बिना किसी रोक-टोक के जारी है। इसी को देखते हुए मोदी सरकार देश में टोल प्लाजा में बदलाव के लिए नयी तकनीकों पर विचार कर रही है। उसी के तहत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने संसद के मानसून सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा था कि टोल प्लाजा ने ट्रैफिक जाम और लम्बी कतार जैसी कई समस्याएँ पैदा की हैं, जिन्हें सरकार समाप्त करना चाहती है।

इधर बीच-बीच में ऐसी ख़बरें भी आती रहती हैं कि कई लोग टोल टैक्स की चोरी करने के लिए कार एवं हल्के वाहनों के फास्ट टैग स्टीकर अपने भारी-भरकम वाहनों पर लगाकर टोल टैक्स बचाने में कामयाब हो जाते हैं। इस बड़े गड़बड़झाले की वजह से भी सरकार और टोल टैक्स वसूलने वाली कम्पनियों की सिरदर्दी बढ़ी है। इसलिए टोल की दो-तरफ़ा चोरी हो रही है। एक तरफ़ कम्पनियाँ टोल टैक्स की चोरी कर रही हैं, और दूसरी तरफ़ कुछ वाहन चालक तमाम साम, दाम, दण्ड, भेद अपनाते हुए टोल न देने के नये-नये तरीक़े खोज ही लेते हैं।

सरकार इस चोरी से निपटने की तैयारी कर रही है। इसका मतलब है कि उसे टोल प्लाजा की लूट-खसोट की जानकारी है। कहा जा रहा है कि भविष्य में सेटेलाइट के ज़रिये सीधे टोल कटेगा। अगर सरकार की यह योजना कामयाब होती है, तो जिस तरह का वाहन होगा, टोल अपने आप उसी तरह से कट जाएगा। लोग बताते हैं कि टोल प्लाजा पर टोल वसूलने वाली निजी कम्पनियाँ जिनकी हैं, वे टोल वसूली के लिए बाउंसर आदि भी रखते हैं। ये कम्पनियाँ आम आदमी का ख़ून कैसे चूसती है? इसकी एक बानगी ख़ुद भाजपा किसान संघ मोर्चा के वरिष्ठ नेता नरेश सिरोही ने सामने रखी। अपने इस अनुभव को उन्होंने फेसबुक पर लिखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उसमें टैग किया। इस पूरे घटनाक्रम में वह एक आम आदमी बने और ख़ास आदमी भी। दोनों ही उनके साथ दो तरह का व्यवहार हुआ।

भाजपा किसान संघ मोर्चा के वरिष्ठ नेता ने बताया कि वह 2 अगस्त को ग्रेटर नोएडा से लखनऊ जाने के लिए यमुना एक्सप्रेस-वे के द्वारा अपने निजी वाहन से निकले। उन्होंने बताया कि इस एक्सप्रेस-वे को एक निजी कम्पनी जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड संचालित कर रही है। ग्रेटर नोएडा और आगरा के बीच तीन टोल प्लाजा पड़ते हैं। ख़ैर, उस दिन किसी तकनीकी ख़राबी की वजह से सिरोही की गाड़ी पर लगा फास्ट टैग कार्ड काम नहीं कर रहा था। जब वह पहले टोल प्लाजा पर पहुँचने वाले थे, तो उन्होंने अपने ड्राइवर को कैश वाली लाइन में गाड़ी ले जाने को कहा। लेकिन यहाँ कैश पर्ची कटवाने के लिए कोई लाइन नहीं थी। गार्ड से कैश (नक़दी) वाली लाइन के बारे में पूछने पर कहा कि यहाँ तो सब फास्ट टैग वाली लाइनें ही हैं, कैश वाली एक भी लाइन नहीं है। नरेश सिरोही बताते हैं कि वह एक लाइन में वाहन लेकर पहुँचते हैं और सुपरवाइजर से आगरा तक के टोल की पर्ची काटने के लिए कहते हैं। इस पर सुपरवाइजर कहता है कि साहब आपके पास फास्ट टैग न होने पर आपको तय टोल शुल्क का दोगुना भुगतान करना पड़ेगा। सिरोही ने बिना बहस किये तीनों टोल पर दोगुने पैसे देकर आगे निकलते गये।

इसके बाद भाजपा नेता यूपीईआईडीए यानी उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एक्सप्रेस अथॉरिटी, आगरा से लखनऊ एक्सप्रेस-वे टोल प्लाजा की तरफ़ बढ़ते हैं। यह टोल उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित है। सिरोही उस कैश (नक़दी) लाइन में अपना वाहन लेकर जाते हैं। लेकिन यहाँ लखनऊ तक जाने के लिए सिंगल पर्ची माँगने पर सुपरवाइजर 650 रुपये की एक पर्ची पकड़ाता है। इसके बाद पुन: लखनऊ से वापस ग्रेटर नोएडा आने के दौरान भाजपा नेता ने प्रदेश सरकार द्वारा संचालित लखनऊ से आगरा एक्सप्रेस-वे के टोल प्लाजा पर 650 रुपये की पर्ची कटवाते हैं और निर्विघ्न आगरा पहुँच जाते हैं। इसके बाद वह निजी कम्पनी जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड द्वारा संचालित यमुना एक्सप्रेस-वे के पहले टोल प्लाजा पर पहुँचकर बूथ पर मौज़ूद सुपरवाइजर से नक़दी लेने को कहते हैं। लेकिन सुपरवाइजर कैश लाइन होने इनकार करता है और दोगुने पैसे देने को कहता है। इस बार सिरोही अपने ख़ास आदमी होने का परिचय देते हुए टोल प्लाजा के मैनेजर को बुलाने का आग्रह करते हैं। सुपरवाइजर फोन द्वारा मैनेजर से बात करके आने का आग्रह करता है और भाजपा नेता का परिचय बताता है। लेकिन मैनेजर वहीं से बैठे-बैठे कहता है कि गेट खोल दो और जाने दो, क्यों पंगा ले रहे हो। भाजपा नेता इस तरह बिना टोल पर्ची कटवाये दूसरे टोल की तरफ़ बढ़ जाते हैं। दूसरे टोल प्लाजा भी उनसे दोगुने पैसे माँगे जाते हैं। भाजपा नेता आम आदमी की तरह दोगुने पैसे देकर पर्ची कटवाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। यही क्रम तीसरे टोल प्लाजा पर भी दोहराया जाता है। उन्होंने दोगुनी टोल वसूली करने वाले सुपरवाइजर से और जहाँ अपना परिचय दिया वहाँ भी सुपरवाइजर से बातचीत की।

यह तो एक ख़ास आदमी की बात रही, जिन्होंने दोनों तरह से टोल प्लाजा की स्थितियों का जायज़ा लिया। लेकिन उन यात्रियों का क्या, जिनसे ख़ुद उत्तर प्रदेश सरकार टोल बढऩे के नाम पर टिकट के पैसे से ज़्यादा लगवाकर अलग से वसूली करवा रही है। जी हाँ, यह बात ख़ुद उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग की रोडवेज बस के एक कंडक्टर ने एक यात्री से कही। यात्री ने बताया कि जब वह मीरगंज-मिलक के बीच से पीलीभीत से दिल्ली जाने वाली बस में बैठा, तो बस कंडक्टर ने उसके टिकट में मशीन से कटे किराये के बाद 7 रुपये पेन से और जोड़ दिये। और 308 रुपये के टिकट के 315 रुपये वसूल किये। जब कंडक्टर से इस बारे में हील-हुज्जत की, तो उसने कहा कि नयी मशीनें अभी बरेली मण्डल में नहीं आयी हैं; लेकिन किराया बढ़ गया है। अगर आपको दिक़्क़त है, तो आप रोडवेज अधिकारियों से बात कर सकते हैं। यह पैसा हमारी जेब में नहीं जाता, हम तो एक रुपया भी फ़ालतू नहीं ले सकते। यह ऊपर से आदेश है और पिछले छ:-सात महीने से ऐसा ही चल रहा है। क्योंकि टोल बढ़ गया है।
सवाल यह है कि टोल बढऩे पर, डीजल और पेट्रोल बढऩे पर सरकार जब किराया बढ़ा देती है, तो न तो इसकी सूचना यात्रियों को पहले से दी जाती है और न ही कोई पक्का टिकट काटने का समय पर इंतज़ाम होता है।

नरेश सिरोही कहते हैं कि ज़ाहिर है कि एक आम किसान होने ग्रामीण पृष्ठभूमि से भली-भाँति परिचित होने के नाते वह आज भी ज़मीन से जुड़े हुए हैं और अपने पद या पार्टी के नाम पर रुतबा दिखाने का शौक़ नहीं रखते। वह आम आदमी की तरह ही साधारण रहना पसन्द करते हैं। उन्होंने कहा कि आम आदमी के इस महँगाई के दौर में हल्कान होने से वह भली-भाँति परिचित हैं। टोल प्लाजा पर हो रही अवैध वसूली वाले पूरे घटनाक्रम को देखकर उनके मन में आज भी द्वंद्व चल रहा है कि निजी कम्पनियाँ, जिन्हें सरकारें बेहतर सुविधा के देने के नाम पर बढ़ावा देती हैं, वो किस तरह अवसर मिलते ही आम आदमी का ख़ून चूसती हैं। हालाँकि आत्म सन्तोष इस बात को लेकर है कि वर्ष 1990 के बाद जब उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण दौर की शुरुआत हुई, तबसे ही राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी, पूज्य सुदर्शन, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, मदन दास, बजरंग लाल गुप्ता, गोविंदाचार्य, किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत, प्रोफेसर नजुद्दा स्वामी तथा कुछ वामपंथी विचारधारा से जुड़े महानुभावों के नेतृत्व में जिस व्यवस्था के ख़िलाफ़ हम लड़ाई लड़ रहे थे, वह ठीक थी। पिछले कई दिनों से दिल्ली और लखनऊ की यात्रा के बीच सफ़र करने आत्ममंथन और आकलन करने और इस पूरे घटनाक्रम को देखकर मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि ये निजी कम्पनियाँ कुछ ख़ास लोगों का मुँह बन्द रखने के लिए उनकी मुँह पर गुड़ चिपकाकर उपकृत कर देती हैं। लेकिन उसके बदले सामान्य लोगों से खुली लूट करती हैं।

बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यूनियन परिवहन मंत्री को इस गम्भीर विषय पर तत्काल विचार विमर्श करने की आवश्यकता है, ताकि आमजन को राहत मिल सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

एकाधिकार की ओर भाजपा!

भाजपा के सांगठनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया में हुए व्यापक फेरबदल चर्चा में है। संसदीय बोर्ड से नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान जैसे वरिष्‍ठ नेताओं को बाहर करने के साथ ही महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल आदि कई राज्यों में महत्त्वपूर्ण बदलाव हुए। इसे साल 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र संगठनात्मक मुद्दों एवं उभरती राजनीतिक चुनौतियों से निपटने तथा सामाजिक और क्षेत्रीय रूप से अधिक समावेशी बनाने की कार्ययोजना बताया जा रहा है। हालाँकि इसके गहरे परोक्ष निहितार्थ हैं। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है- ‘प्रारम्भ में पदाधिकारियों का चयन आंतरिक चुनाव से होता था। लेकिन आज हर पद पर चयन हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुमति आवश्यक है। स्वामी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और सरकार से नाराज़गी छुपी नहीं है। फिर भी उनका बयान अन्यथा नहीं लिया जा सकता।’

सन् 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के चार मुख्य दावेदार- नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह एक तरह से पार्टी में विभिन्न शक्ति-केंद्र थे। हालाँकि इनमें पूँजीपतियों के साथ और प्रचार के माध्यम से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निर्विवाद रूप से सर्वाधिक हो चली थी। लेकिन तब भी असुरक्षा तो बनी ही थी। केंद्र की सत्ता में आने के बाद सुषमा स्वराज के स्वर्गवास, जनाधार विहीन राजनाथ सिंह के ख़ामोश हो जाने के बाद मोदी को चुनौती देने वाले एकमात्र नितिन गडकरी ही थे। सन् 2019 आते-आते यह चुनौती भी लगभग समाप्त हो गयी। हालाँकि गडकरी के पास वृहत् जनाधार है। पार्टी काडर में उनका सम्मान है। उन्हें संघ का भी पूर्ण समर्थन रहा है। केंद्रीय मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली प्रभावित करती है, जिसके प्रशंसक विपक्षी नेता भी हैं। उन्होंने अपने व्यक्तित्व को मोदी सरकार के आभामंडल में विलीन नहीं होने दिया; बल्कि उनके बेबाक बयानों एवं समालोचना से मोदी सरकार को कई बार रक्षात्मक होना पड़ा है। मोदी की अब तक की राजनीतिक यात्रा को क़रीब से देखने वाले जानते हैं कि वह अपने समक्ष कोई चुनौती बर्दाश्त नहीं करते, और न ही अपने विरोधियों को माफ़ करते हैं। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव संजय जोशी का हश्र इसका बेहतरीन उदाहरण है। सन् 2012 में उनको संगठन से बाहर करवाने के लिए नरेंद्र मोदी ने जैसा अमर्यादित आचरण दिखाया था, उस समय उसे लेकर मोहन भागवत, एम.जी. वैद्य जैसे संघ के पदाधिकारियों से लेकर राजनाथ सिंह, सुशील मोदी आदि भाजपा नेताओं ने भी आपत्ति ज़ाहिर की थी। अत: गडकरी को हाशिये पर धकेलने की कोशिशों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यही स्थिति शिवराज चौहान, योगी आदित्यनाथ की है। इनकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी के बरअक्स कम नहीं रही है। दोनों ने ही मुख्यमंत्री के रूप में अपनी विशिष्ट कार्यशैली से सम्मान अर्जित किया है। दोनों की छवि बेदाग़ बतायी जाती है। भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्रियों में मात्र शिवराज और योगी ही ऐसे हैं, जो मोदी-शाह की अनुकम्पा के बजाय अपनी क़ाबिलियत एवं व्यापक जनाधार के बलबूते सत्ता में हैं। इन्हें अनदेखा करना अभी भी मोदी-शाह के लिए दुष्कर है। अत: इनके समक्ष प्रतिपक्ष खड़ा करके इनका मार्ग बाधित करने का प्रयास हो रहा है। बताते चलें कि सन् 2014 में लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री पद के लिए जो नाम सुझाये थे, उनमें शिवराज चौहान भी थे। अत: उनका शीर्ष नेतृत्व के निशाने पर होना अचरज की बात नहीं है। इसी प्रकार बहुत-से आम जनमानस योगी आदित्यनाथ को 2024 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देख रहे हैं।

मध्य प्रदेश में सत्यनारायण जटिया विकल्प बने हैं, जिनके नरेंद्र मोदी से मधुर सम्बन्ध हैं। आश्चर्यजनक है, जटिया एक लम्बे समय से सक्रिय राजनीतिक धारा में उपेक्षित थे। उनकी 76 वर्ष की आयु भी नयी ज़िम्मेदारी का समर्थन नहीं करती। यह आयु तो मार्गदर्शक मण्डल के लिए निर्धारित थी। फिर भी केंद्रीय नेतृत्व उन्हें आगे ला रहा है, तो अवश्य इसका विशेष आधार होगा। वहीं उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में ऐसे नेता शामिल किये गये, जो पूरे कोरोना-काल में योगी को हटाने की मुहिम चलाते रहे थे। उत्तर प्रदेश में समानांतर सत्ता संचालनकर्ता संगठन महासचिव सुनील बंसल, जिनके योगी से मतभेद जगज़ाहिर हैं; उन्हें तेलंगाना, बंगाल और ओडिशा का प्रभारी बनाकर शीर्ष नेतृत्व ने अपने प्रति वफ़ादारी को तरजीह देने का सन्देश पार्टी काडर को दिया है। भूपेंद्र चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा की कमान सौंपने के पीछे बड़ा कारण उनका अमित शाह का विश्वस्त होना है।

मार्गदर्शक मण्डल की व्यवस्था भी निष्कंटक एकाधिकार स्थापना के छद्म उपायों में शामिल है, जिसके अंतर्गत 70-75 साल की आयु पूरी कर चुके नेताओं को चुनावी राजनीति एवं सरकार में भागीदारी से हटाकर मार्गदर्शक मण्डल भेजने की नयी परम्परा स्थापित हुई। इसके माध्यम से लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार जैसे वरिष्ठ नेताओं से पीछा छुड़ाया गया। इसके नियम भी केंद्रीय नेतृत्व के अनुकूल परिवर्तित होते रहे हैं। उस आयु सीमा पर पहुँच चुके मोदी अब तक सत्ता त्यागने की मन:स्थिति में नहीं दिख रहे हैं।

वर्तमान में प्रचलित एकाकी निर्णयन की प्रथा भाजपा के अब तक के इतिहास में कभी भी नहीं रहीं है। उदाहरणस्वरूप सन् 2002 के गुजरात दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक वर्ग द्वारा नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के निर्णय के बावजूद वह अपने पद पर बने रहे; क्योंकि आडवाणी के नेतृत्व में दूसरा वर्ग इसका विरोधी था। तात्पर्य यह है कि भाजपा का नेतृत्व कभी भी एकध्रुवीय नहीं रहा है। यहाँ तक कि किसी विषय पर असहमत होने पर भाजपा नेता कई बार सार्वजनिक रूप से भी अपनी नाराज़गी व्यक्त करते थे। किन्तु वर्तमान परिस्थिति यह है कि केंद्रीय नेतृत्व से असहमति जताने वालों को केंद्र या राज्य सरकारों में तो छोडि़ए, पार्टी में रहना कठिन है।

यह एकाकी नेतृत्व रणनीतिक रूप से स्थापित हुआ। सन् 2014 की पहली पारी में मोदी के विश्वासपात्रों को संगठन के महत्त्वपूर्ण पदों पर फिट किया जाने लगा। जैसे अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बना दिये गये। दूसरे कार्यकाल तक जनाधार वाले नेताओं को हाशिये पर धकेला जाने लगा, जैसे सुमित्रा महाजन, मुरली मनोहर जोशी, हुकुमदेव नारायण, करिया मुंडा, बैस, कोश्यारी आदि। साथ ही ऐसे लोग पार्टी एवं सरकार में भर्ती किये गये, जिनका जनाधार तो छोडि़ए, आम जनता नाम तक नहीं जानती।

असल में इस समय भाजपा में यस मैन की माँग सर्वाधिक है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में एस. जयशंकर, अश्विनी वैष्णव, हरदीप पुरी, आर.के. सिंह जैसे भूतपूर्व नौकरशाह भरे हैं। अनायास ही नहीं पार्टी में नौकरशाहों को प्राथमिकता मिलने लगी है, जिन्हें न लोकतांत्रिक आन्दोलनों के संघर्ष की समझ है और न ज़मीनी मुद्दों से उनका कोई जुड़ाव है। इन आयातित जनप्रतिनिधियों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि राजनीतिक सत्ता द्वारा स्थापित अपने वजूद की वास्तविकता को ये भलीभाँति जानते हैं।

सत्ता की जी-हुज़ूरी का हुनर इनमें विशेष गुण होता है। मोदी-शाह जैसे नेताओं के विरोध की क्षमता इनमें नहीं है। बग़ैर जनाधार के लोकसभा-विधानसभाओं एवं विभिन्न मंत्रालयों में घुस चुके इन भूतपूर्व नौकरशाहों को पता हैं कि उनकी कुर्सी मोदी-शाह की कृपा का प्रतिफल है। अत: ये कभी भी सत्तासीन नेतृत्व के समक्ष संकट बन भी नहीं सकते, बल्कि इनका पूरा ज़ोर अपनी संरक्षक सत्ता को सुरक्षित करने पर होता है। आश्चर्य है कि लोकतंत्र की उन्नति एवं विकास के मानक स्थापित करने के लिए जनप्रतिनिधि के तौर पर उस नौकरशाही को थोपा जा रहा है, जो इस लोकतंत्र की दुरावस्था के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी हैं। ये मूल रूप से उसी प्रशासनिक व्यवस्था के नुमाइंदे हैं, जिन्हें इस देश में कार्य अक्षमता, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही तथा आम जनता के प्रति निकृष्ट व्यवहार के लिए जाना जाता है। हर लोकसभा या विधानसभा चुनाव में जनता मतदान द्वारा जब सरकारें बदलती हैं, तो उसका ध्येय किसी दलीय सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक रवैये में बदलाव होता है। आज उसी अभिकरण के सदस्य पिछले दरवाज़े से भारतीय जनतंत्र पर लादे जा रहे हैं।

इसी सन्दर्भ में भाजपा के कार्यक्रमों पर ध्यान दीजिए। पहले की तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी की नज़र आने वाली तस्वीरें दुर्लभ हो चुकी हैं, बल्कि अब तो सब कुछ मोदीमय नज़र आने लगा है। भाजपा नेताओं के बातचीत के तरीक़े अब कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों के नेताओं की वाक्-शैली से होड़ कर रही है, जिसमें वे सिर्फ़ अपने पार्टी नेतृत्व का महिमामंडन करने में लगे रहते थे। अर्थात् जो कुछ अच्छा है, वो हमारे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की देन है; और कुछ बुरा हुआ, तो दोषारोपण के लिए पार्टी के दूसरे नेता एवं नौकरशाही तो हैं ही। यह भाजपा में चाटुकारिता की नयी परम्परा की शुरुआत है। पार्टी के आंतरिक विषय के लिए तो यह ठीक हो सकता है; लेकिन एक लोकतांत्रिक सरकार के नज़रिये से सर्वथा अनुचित है। जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने व्यक्ति पूजन की भावना के विरुद्ध कभी चेतावनी दी थी।

पार्टी विद् डिफरेंस की वर्तमान हालत धीरे-धीरे कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों की भाँति होती जा रही है; क्योंकि इसमें आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। जहाँ पद पाने की एकमात्र योग्यता शीर्ष नेतृत्व का यस मैन होना है। वरना क्या वजह थी कि उच्च शिक्षित एवं अनुभवी नेताओं के होते हुए भी मानव संसाधन मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों को इंटरमीडियट पास स्मृति ईरानी को सौंप दिया गया? इसी तरह गृह राज्य मंत्रालय अजय मिश्र को दिया गया, जो गम्भीर क़िस्म के आपराधिक मामलों के आरोपी हैं। संघ, जो अब तक भाजपा नेताओं की नकेल कसता रहा है; बहुत हद तक मोदी के समक्ष बेबस नज़र आ रहा है।
भाजपा की स्थापना के पश्चात् ऐसा पहली बार हो रहा है कि पार्टी विशुद्ध रूप से एकाधिकार की ओर बढ़ चुकी है। अब मोदी और शाह की मंशा क्या है? यह तो ईश्वर जाने। परन्तु इतिहास की सीख है कि किसी व्यक्तित्व को दल से बड़ा एवं राष्ट्र के समानांतर खड़ा करने का प्रयास लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। भारत ऐसी ही कोशिशों का दुष्परिणाम 80 के दशक में भुगत चुका है। अब एक बार फिर उससे भी ख़राब मुहाने पर खड़ा है।
(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। यह उनका अपना विचार है।)

आख़िर नाराज़ क्यों हैं गडकरी और चौहान?

भाजपा संसदीय बोर्ड से बाहर किये जाने से मायूस हैं दोनों दिग्गज

भाजपा संसदीय बोर्ड से हटाये जाने के क़रीब एक हफ़्ते बाद आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में लक्ष्मणराव मानकर स्मृति संस्था के एक कार्यक्रम में वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भाजपा के सत्ता में आने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और दीनदयाल उपाध्याय के कार्यों को दिया। साथ ही यह भी कहा कि देश निर्माण की सोचने वाला सामाजिक-आर्थिक सुधारक एक सदी से दूसरी सदी तक की सोचता है, जबकि नेता अगले चुनाव की सोचता है। उन्होंने अपने पूर्व राज्य में मंत्री पद के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बताया कि वह मंत्री पद की परवाह नहीं करते। क्योंकि वह ज़मीनी आदमी हैं। गडकरी के शब्दों से उनकी नाराज़गी उजागर होती है। गडकरी के अलावा भाजपा की सर्वोच्च और सबसे ताक़तवर संस्था संसदीय बोर्ड से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी हाल में बाहर कर दिया गया था और कुछ हलक़ों में इसे इस दृष्टि से देखा गया कि क्योंकि यह दोनों नेता ‘भविष्य में भाजपा नेतृत्व के लिए चुनौती’ बन सकते थे, उनके पर कतर दिये गये।

राजनीतिक हलक़ों में भाजपा के भीतर तनाव की ख़बरें भले कांग्रेस जैसी न हों, फिर भी इक्का-दुक्का बाहर आती रहती हैं। गडकरी को मोदी सरकार में सबसे बेहतर काम करने वाले मंत्रियों में गिना जाता है। हालाँकि उनकी छवि प्रधानमंत्री मोदी भक्त की कभी नहीं रही, बल्कि वे नागपुर (आरएसएस) के प्रतिनधि माने जाते हैं। भाजपा के कामयाब अध्यक्ष रहे हैं और भाजपा में उनका क़द तीन बड़े नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टक्कर का है। ऐसे में उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड से बाहर करने के बाद राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चा है कि वह इससे प्रसन्न नहीं हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाते रहे हैं। भले पार्टी में नेतृत्व को लेकर विरोधी सुर खुले रूप से भाजपा के भीतर नहीं सुनने को मिलते हैं। लेकिन यह माना जाता है कि पार्टी में कुछ ऐसे नेता हैं, जो भाजपा के भीतर लोकतंत्र कमज़ोर होने की बात ढके-छिपे स्वर में कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि भाजपा दो प्रमुख लोगों के ही इर्द-गिर्द सिमट गयी है। यही स्थिति इंदिरा गाँधी के ज़माने में कांग्रेस में थी, जब राज्यों के क़द्दावर नेताओं के पर कतर दिये जाते थे, ताकि वे नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोलने की जुर्रत न करें। नेतृत्व की इसी नीति ने कांग्रेस को ज़मीन पर कमज़ोर कर दिया।

भाजपा की दो बड़ी समितियों में यह फेरबदल सिर्फ़ भविष्य की राजनीति को लक्ष्य में रखकर किया गया फेरबदल भर नहीं है। होता, तो 79 साल के येदियुरप्पा दोनों समितियों में जगह नहीं पाते। इस लिहाज़ से शिवराज सिंह चौहान अभी महज़ 63 साल के हैं, जबकि नितिन गडकरी 65 साल के। राजनीति में यह कोई ज़्यादा उम्र नहीं मानी जाती। लिहाज़ा उम्र का तक़ाज़ा भी यहाँ लागू नहीं होता; क्योंकि यह दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (71 वर्ष) की उम्र से भी कम के नेता हैं। ऐसे में गडकरी और चौहान को संसदीय बोर्ड से बाहर करने पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा होना स्वाभाविक है।

भाजपा के कुछ नेताओं ने इस फेरबदल को पार्टी की आने वाले चुनाव में उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से लेकर उत्तर पूर्व की राजनीति को साधने की रणनीति बताया है। लेकिन यहाँ यह ग़ौर करने वाली बात यह है कि गडकरी को बाहर करके उनके राज्य महाराष्ट्र से जिन देवेंद्र फडणवीस को चुनाव समिति में जगह दी गयी है, उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा की राजनीति में गडकरी का कट्टर विरोधी माना जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या गडकरी को निशाना बनाया गया है, ताकि भाजपा में उनका क़द छोटा किया जा सके?

यह सही है कि पार्टी नेतृत्व ने नये संसदीय बोर्ड में पार्टी में लम्बे समय से योगदान दे रहे नेताओं को जगह दी है। लेकिन चूँकि बाहर ऐसे दो नेताओं को किया गया है, जिन्हें मोदी-शाह के नेतृत्व के लिए चुनौती माना जाता है; तो यह पूछा जा रहा है कि ये दोनों ही क्यों बाहर किये गये, अन्य (और कोई) क्यों नहीं? सभी जानते हैं कि संसदीय बोर्ड में कर्नाटक के जिन पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को शामिल किया गया है, जबकि उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। उनकी उम्र भी 79 साल है। अभी भी न्यायालय में उनके ख़िलाफ़ कई मामले रहे हैं, जिनमें भूमि के कुछ हिस्से को ग़ैर-अधिसूचित करने और उद्योगपतियों को आवंटित करने के आरोप वाला मामला भी है। माना जाता है कि येदियुरप्पा दक्षिण में अपना क़िला खड़ा करने की भाजपा की क़वायद का एक हिस्सा हैं। भाजपा ने येदियुरप्पा को बहुत ख़राब तरीक़े से मुख्यमंत्री पद से हटाया था और उसे डर है कि इससे पार्टी को नुक़सान होगा। लिहाज़ा येदियुरप्पा तमाम विरोधाभासों के बावजूद बड़ी कश्ती पर सवार किये गये हैं।
देखना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक में उनका मज़बूत लिंगायत समुदाय इसे कैसे लेता है? येदियुरप्पा किसी भी दक्षिण भारत राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री बनने वाले पहले नेता रहे हैं। वैसे एक और नेता पार्टी का इकलौता मुस्लिम चेहरा शहनवाज़ हुसैन ने पार्टी के लिए लगातार काम किया है; लेकिन अब चुनाव समिति से बाहर हो गये हैं। वाजपेयी के ज़माने में तेज़ी से भाजपा में उभरे शहनवाज़ का राजनीतिक करियर फ़िलहाल भँवर में लगता है। क्योंकि बिहार में हाल में नीतीश कुमार की पलटी के बाद मंत्री पद भी उनके हाथ से निकल गया था।

भाजपा की रणनीति
दक्षिण भारत पर भाजपा की कसरत का आभास संसदीय बोर्ड में के. लक्ष्मण को लेने से भी होता है। दरअसल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भाजपा ख़ुद को मज़बूती करना चाहती है। आरएसएस के आक्रामक नीतिकार की छवि रखने वाले बी.एल. संतोष भी दक्षिण भारत में भाजपा के प्रभारी रहे हैं और वहाँ की नब्ज़ पहचानते हैं। नये संसदीय बोर्ड में भाजपा नेतृत्व ने दक्षिण और उत्तर पूर्व पर ख़ास नज़र रखी है। संसदीय बोर्ड में सुधा यादव के लेना अर्धसैनिक बलों को ध्यान में रखने के लिए है। क्योंकि उनके पति बीएसएफ में थे, जो कारगिल ऑपरेशन में शहीद हो गये थे। यह माना जाता है कि सिख भाजपा से नाराज़ हैं। लिहाज़ा उन्हें साधने की दृष्टि से वरिष्ठ सदस्य इकबाल सिंह लालपुरा को संसदीय बोर्ड में जगह दी गयी है।

फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में सिख बहुल पंजाब में भाजपा महज़ दो सीटों पर सिमट गयी थी। हालाँकि लालपुरा कोई ऐसा चेहरा नहीं, जो पार्टी को पंजाब में पुनर्जीवित कर सकें। दूसरे किसान अभी भी भाजपा से सख़्त नाराज़ हैं और नये सिरे से आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं। सत्यनारायण जटिया, के. लक्ष्मण, सर्बानंद सोनोवाल, बी.एस. येदियुरप्पा और इकबाल सिंह लालपुरा को संसदीय बोर्ड में जगह मिलना इस बात का सन्देश देने की कोशिश है कि भाजपा उन लोगों का सम्मान करेगी, जो उसके वफ़ादार रहते हैं। कुछ युवा चेहरों पर भी भरोसा किया गया है। हालाँकि बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि क्या गडकरी और चौहान का कोई योगदान नहीं था? जो उन्हें संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से बाहर कर दिया गया। कम-से-कम गडकरी और चौहान के दिल में तो यह कसक है, जो उनकी बातों से झलकती भी है।
राके
महाराष्ट्र में हाल के घटनाक्रम से लगता था कि पार्टी में देवेंद्र फडणवीस क़द घटा है। उन्हें शिंदे जैसे नेता से नीचे उप मुख्यमंत्री का पद देने से यह सोच पुख़्ता हुई थी। हालाँकि उन्हें गडकरी पर तरजीह देकर चुनाव समिति में शामिल किया गया है। चुनाव समिति में भूपेंद्र यादव भी लिये गये हैं, जो अमित शाह के बेहद क़रीबी माने जाते हैं। उनके अलावा राजस्थान के ओम माथुर भी हैं, जहाँ विधानसभा चुनाव जल्द ही होने हैं। चुनाव समिति में चार स्थान अभी ख़ाली हैं। लिहाज़ा कुछ और नाम अगले महीनों में जुड़ सकते हैं।

एक विधायक, एक पेंशन; पंजाब सरकार का मास्टरस्ट्रोक

पूर्व विधायकों को मिलेगी एक ही कार्यकाल की पेंशन, भले ही कितनी भी बार रहे हों विधायक

मासिक पेंशन मिलेगी 60,000 रुपये और राज्य के पेंशनर्स की तर्ज पर ही मिलेगा महँगाई भत्ता

पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने एक विधायक, एक पेंशन क़ानून लागू कर दिया है। राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने लगभग 42 दिन बाद इस सम्बन्ध में राज्य सरकार के गत विधानसभा सत्र में पारित ‘पंजाब राज्य विधानमंडल सदस्य (पेंशन और चिकित्सा सुविधाएँ नियमन) संशोधन विधेयक-2022 को मंज़ूरी प्रदान कर दी है। इस सम्बन्ध में बीती 11 अगस्त को गजट अधिसूचना जारी होने के साथ ही पेंशन संशोधन राज्य में अधिनियम के रूप में तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।

अधिनियम में नयी पेंशन की गणना के तहत राज्य में अब किसी भी पूर्व विधायक को एक ही कार्यकाल की पेंशन मिलेगी, भले ही वह कितनी ही बार निर्वाचित हुआ है। यह पेंशन 60,000 रुपये मासिक होगी और इस पर राज्य सरकार के पेंशनर्स को देय महँगाई भत्ते की दर भी लागू होगी। अधिनियम में पेंशन वृद्धि का भी प्रावधान किया गया है। किसी भी पूर्व विधायक की 65, 75 और 80 वर्ष उम्र होने पर उसकी मासिक पेंशन में क्रमश: पाँच, 10 और 15 फ़ीसदी की वृद्धि होगी।

विदित हो कि पहले प्रत्येक पूर्व विधायक को उसके हर कार्यकाल के लिए पेंशन मिलती थी। उसमें हर वर्ष वृद्धि भी होती रहती थी। ऐसे में कुछ विधायकों की पेंशन पाँच से छ: लाख रुपये तक पहुँच चुकी थी। सरकार ने पेंशन में बदलाव को लेकर विधानसभा में विधेयक लाने से पहले गत 2 मई की मंत्रिमंडल की बैठक में पंजाब राज्य विधानसभा सदस्य पेंशन और चिकित्सा सुविधाएँ विनियमन) अधिनियम-1977 में संशोधन के प्रस्ताव को मंज़ूरी देकर इसे अध्यादेश के माध्यम से लागू करने का प्रयास किया था। यह प्रस्ताव मंज़ूरी के लिए राज्यपाल को भेजा गया; लेकिन वहाँ से इसे जल्द प्रस्तावित विधानसभा सत्र में संशोधन विधेयक के रूप में लाने का सुझाव दिया गया। इस पर सरकार ने गत विधानसभा सत्र में पेंशन संशोधन विधेयक पेश किया और इसे उसी दिन पारित कर मंज़ूरी के लिए राज्यपाल को भेज दिया था।

राज्य की आम आदमी पार्टी की सरकार के एक विधायक-एक पेंशन को एक बड़ा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। देश में यह अपनी तरह का एक बड़ा और ऐतिहासिक फ़ैसला है, जिससे सरकारी और जनता के पैसे की राजनेताओं की मौज़ पर लगाम लगी है। यह फ़ैसला न केवल सराहनीय है, बल्कि जनता को भी रास आ रहा है। आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों से पूर्व ही जनता किये गये वादों में यह ऐलान किया था कि अगर वह सत्ता में आती है, तो वह ‘एक विधायक, एक पेंशन’ योजना लेकर आएगी।

राज्य सरकार का यह फ़ैसला जनभावनाओं के इसलिए भी अनुरूप है; क्योंकि उसमें राजनेताओं को सरकारी ख़ज़ाने से मिल रही अनाप-शनाप सहूलियतों, राज्य सरकारों द्वारा जनता की गाढ़ी कमायी के पैसे के दुरुपयोग और मूलभूत जनसुविधाओं की उपेक्षा के प्रति विरोध और रोष झलकता है।

पेंशन में बदलाव के फ़ैसले को राज्य की ख़स्ता हालत सुधारने तथा वित्तीय प्रबंधन, नियोजन और नियंत्रण बेहतर बनाने के एक ठोस क़दम के रूप में देखा जा रहा है। राज्य सरकार अपने इस फ़ैसले के माध्यम से अपनी कार्यप्रणाली को लेकर एक अहम संदेश जनमानस में देने में भी काफ़ी हद तक सफल रही है।

आम आदमी पार्टी ने पंजाब में उसकी सरकार के इस क़दम से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस समेत उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक नज़ीर और नसीहत पेश करते हुए इनसे उनके शासित राज्यों में इस फ़ैसले को अपने यहाँ लागू करने की बड़ी चुनौती दे डाली है। सोशल मीडिया समेत अन्य संचार माध्यमों पर भी इन दलों पर इसी तरह का फ़ैसला लेने की माँग उठ रही है। देश के तीन राज्यों गुज़रात, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष के अन्त तक विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी ने ‘एक विधायक, एक पेंशन’ को राजनीतिक मुद्दे में तब्दील करके अपनी चुनावी रणनीति को अन्तिम रूप देने के साथ-साथ विरोधी दलों को कड़ी टक्कर देने के संकेत दिये हैं।

बहरहाल पंजाब सरकार के इस फ़ैसले से अनेक पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों की जेब ख़ासी हल्की होने जा रही है, जो एक से अधिक यानी छ: पेंशन्स तक ले रहे थे। इनमें तीन पूर्व विधायक छ:-छ:, दो पूर्व विधायक पाँच-पाँच, 12 पूर्व विधायक चार-चार, 39 पूर्व विधायक तीन-तीन, 56 पूर्व विधायक दो-दो तथा 127 पूर्व विधायक एक कार्यकाल की पेंशन ले रहे थे। यानी 112 पूर्व विधायक ऐसे हैं, जो एक से अधिक पेंशन ले रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, रजिंदर कौर भट्ठल और कैप्टन अमरिंदर सिंह सबसे ज़्यादा कार्यकाल की पेंशन्स लेने वालों में शामिल हैं। बताया जाता है कि इनकी मासिक पेंशन पाँच लाख रुपये से ऊपर है।

बलविंदर सिंह भुंदड़, सरवन सिंह फिल्लौर, आदेश प्रताप सिंह कैरों, गोविंदर सिंह लौंगोवाल, गुलजार सिंह राणिके, मदन मोहन मित्तल, रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रतन सिंह अजनाला, सुखदेव सिंह ढींडसा, अजीत इंदर सिंह मोफर, सुनील जाखड़, अश्विनी सेखड़ी, तीक्ष्ण सूद, सुरजीत सिंह ज्याणी, चुन्नीलाल भगत, जनमेजा सिंह सेखों, लक्ष्मीकांता चावला, मोहिंदर कौर जोश, बीबी जागीर कौर, मनोरंजन कालिया और मनतार सिंह बराड़ एक से अधिक पेंशन्स लेने वाले पूर्व विधायकों में शामिल रहे हैं। राज्य में ऐसे भी अनेक नेता हैं, जिन्हें विधायक के अलावा लोकसभा और राज्यसभा सदस्यता की भी पेंशन मिल रही थी।

प्रदेश के मुख्यमंत्री भगवंत मान का एक विधायक, एक पेंशन विधेयक को मंज़ूरी मिलने पर कहना है कि इससे जनता की गाढ़ी कमायी और करदाताओं के पैसे की बचत होगी। उन्होंने ट्वीट किया कि सरकार के राज्य की अर्थ-व्यवस्था में सुधार की दिशा में इस अहम फ़ैसले से बहु-पेंशन के रूप में जा रहा बड़ा पैसा बचेगा, जिसे जनता के कल्याण पर ख़र्च किया जाएगा। एक बयान में उन्होंने विधायकों को एक तरह से नसीहत देते हुए कहा कि वे अपनी इच्छानुसार राजनीति में आये हैं। ऐसे में उनका पेंशन पर हक़ कैसे बनता है? उनके अनुसार, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय नायकों ने ऐसे लोकतंत्र की परिकल्पना की थी, जहाँ निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के कल्याणार्थ लोक सेवक के रूप में काम करेंगे। अफ़सोस है कि गत लगभग 75 वर्षों में इन नेताओं ने सरकारी ख़ज़ाने से मोटा वेतन और पेंशन ली; जिसके लिए आम जनता और करदाताओं को निचोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि यह पैसा जनता की भलाई और विकास पर ख़र्च होना चाहिए था।

वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के अनुसार, राज्य में 100 से अधिक पूर्व विधायक हैं, जो एक से अधिक पेंशन्स ले रहे हैं, जिससे राज्य के ख़ज़ाने पर बड़ा बोझ पड़ रहा है। सरकार इस बोझ को कम करने का प्रयास कर रही है। राज्य में वर्तमान विधायक को 25,000 रुपये और मंत्री को 50,000 रुपये वेतन मिलता है। लेकिन बैठक, यातायात समेत सभी भत्ते जोड़ दिये जाएँ, तो एक विधायक और मंत्री लगभग एक लाख रुपये महीना तक लेता है। उनका कहना है कि राजनेता अगर सेवा भाव से राजनीति में आते हैं, तो एक पेशन से भी उनका गुज़ारा चल सकता है। सरकार के इस फ़ैसले से ख़ज़ाने के हर वर्ष लगभग 20 करोड़ रुपये और पाँच साल में 100 करोड़ रुपये बचेंगे।
अब आम आदमी पार्टी का फ़ैसला वास्तव में क्या मास्टरस्ट्रोक साबित होता है? और आने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फ़ायदे की कसौटी पर यह कितना खरा उतरेगा? यह तो वक़्त ही बताएगा। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों के कामकाज को स्वीकारने अथवा नकारने को लेकर मत (वोट) के माध्यम से अपनी मुहर लगाने का अधिकार केवल और केवल जनता को ही हासिल है।